विचार / लेख

पारसियों के बारे में जनधारणा और हकीकत
28-Oct-2025 8:37 PM
पारसियों के बारे में जनधारणा और हकीकत

- लक्ष्मण सिंह देव

एक दिन मैं जहांगीर पटेल से मिलने गया, जो पारसी समुदाय की सबसे पुरानी और सबसे लोकप्रिय पत्रिका ‘पार्सियाना’ (Parsiana) के एडिटर-इन-चीफ हैं। यह पत्रिका 1964 में स्थापित हुई थी और दुनिया भर के पारसी समुदाय की मुखपत्र मानी जाती है। विशेष रूप से भारत के वे पारसी जो अंग्रेज़ी भाषा में निपुण हैं, उनके लिए यह एक मंच की तरह है।

मेरे एक लेख को लगभग एक साल पहले पार्सियाना में प्रकाशित किया गया था, इसलिए जहांगीर मुझे अच्छी तरह जानते हैं। हम पहले भी कई बार बातचीत कर चुके हैं। उस दिन उन्होंने मुझे एक दुखद समाचार दिया-उन्होंने बताया कि पत्रिका का प्रकाशन अक्टूबर माह में बंद किया जा रहा है।

यह खबर मेरे लिए बहुत चौंकाने वाली थी, क्योंकि शापूरजी पालोनजी, टाटा समूह और गोदरेज समूह जैसी बड़ी कंपनियाँ इस पत्रिका की प्रायोजक हैं। मैंने उनसे पूछा- ‘आप लोग प्रकाशन क्यों बंद कर रहे हैं? क्या आर्थिक संकट है?’

उन्होंने कहा, ‘पैसा कोई समस्या नहीं है, समस्या यह है कि हमारे पास पर्याप्त पारसी स्टाफ नहीं है जो पत्रिका के लिए काम कर सके। हमारे पास धन है, लेकिन लोग नहीं हैं। हम केवल पारसी लोगों को ही नियुक्त करते हैं, किसी गैर-पारसी को नहीं।’

भारत में पारसी सबसे सम्पन्न अल्पसंख्यक समुदाय हैं। करीब 15 वर्ष पहले तक अगर कोई पारसी व्यक्ति 80,000 रुपये प्रति माह से कम कमाता था, तो उसे गरीब माना जाता था, और बॉम्बे पारसी पंचायत उसकी आर्थिक सहायता करती थी। यह पंचायत पारसी समुदाय की सर्वोच्च संस्था है।

भारत और पाकिस्तान में पारसियों के सभी धार्मिक स्थल गैर-पारसियों के लिए निषिद्ध हैं। वे अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए अन्य समुदायों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं। उनका तर्क है कि जब वे 8वीं शताब्दी में गुजरात के तट पर आए थे, तो उन्होंने हिंदू राजा सिद्दी राणा से यह वादा किया था कि वे किसी हिंदू को अपने धर्म में परिवर्तित नहीं करेंगे और भारत की संस्कृति में ऐसे घुल-मिल जाएंगे जैसे दूध में शहद मिल जाता है।

किंवदंती के अनुसार, पारसी नेता ने राजा से कहा कि एक गिलास दूध लाओ। जब राजा ने कहा कि उनके राज्य में नए लोगों के लिए जगह नहीं है, तो उस नेता ने दूध में शहद मिलाया और कहा- ‘हम भी ऐसे ही घुल-मिल जाएंगे और आपके राज्य को मधुर बना देंगे।’

परंतु पुरातात्विक प्रमाणों के अनुसार यह ‘संजान’ की कहानी काल्पनिक है, जिसे 15वीं शताब्दी में एक पारसी पुजारी ने गढ़ा था। वास्तव में पारसी भारत में पहली बार 8वीं शताब्दी में नहीं आए थे- जैसा कि मैंने अपने एक शोध लेख में प्रमाणित किया है।

अब सवाल उठता है कि वे गैर-पारसियों को अपने अग्नि-मंदिरों में प्रवेश क्यों नहीं करने देते? इसका कारण काफी कटु है। उनका मानना है कि गैर-पारसी अशुद्ध होते हैं, और अगर कोई गैर-पारसी उनके पवित्र अग्नि को देख ले, तो वह अग्नि अपवित्र हो जाएगी। 1960 के दशक में जब एक पवित्र अग्नि गुजरात से मुंबई लाई जा रही थी, तो पुलिस की व्यवस्था की गई थी ताकि कोई ‘अशुद्ध’ व्यक्ति उस अग्नि को न देख सके।

लोकप्रिय धारणा के विपरीत पारसी ‘अग्नि की पूजा’ नहीं करते-वे केवल अग्नि को पवित्र प्रतीक मानते हैं।

यह भी कहा जाता है कि पारसी शांतिप्रिय होते हैं और झगड़ा नहीं करते, पर यह पूरी तरह सत्य नहीं है। 16वीं शताब्दी में गुजरात के एक तटीय नगर में जब पारसी बहुसंख्यक हो गए, तो उन्होंने एकमात्र हिंदू बनिया व्यापारी को ‘अशुद्ध’मानकर नगर से निकाल दिया। क्रोधित बनिया दो वर्ष के लिए दूसरे नगर चला गया और फिर कोली और राजपूत योद्धाओं को लेकर लौटा। उसने पारसियों को हराया और उन्हें मजबूर किया कि वे उसे नगर में दोबारा बसने दें। यह घटना स्वयं पारसी इतिहास ग्रंथों में भी वर्णित है।

इतिहास में दो बार हिंदू–पारसी दंगे और कई बार मुसलमान-पारसी संघर्ष दर्ज हैं। वास्तव में बड़ी संख्या में पारसी 10वीं शताब्दी में भारत आए, जब ईरान में उन पर अत्याचार बढ़ गया था।

11वीं शताब्दी तक ईरान के लगभग सभी प्रमुख नगरों में अग्नि-मंदिर मौजूद थे। जब पारसी राजाओं का शासन था, तब उन्होंने यहूदियों, ईसाइयों और मनिवादी मतावलंबियों का उत्पीडऩ किया। कई बार उन्होंने चर्च तोडक़र उन्हें अग्नि-मंदिर में बदल दिया और पुराने पैगन मंदिरों को भी अग्नि-मंदिर बना दिया। जब ईरान पर मुसलमानो का हमला हुआ तो इस्फ़हान जिसे उस समय यहूदाबाद कहा जाता था क्योंकि यहूदी काफी संख्या में थे उन्होंने मुसलमानो की फ़ौज का स्वागत किया क्योंकि पारसियों के जुल्म से परेशान थे।

दिलचस्प बात यह है कि ईरान की कई जामा मस्जिदें इन्हीं अग्नि-मंदिरों के ऊपर बनी हैं- जैसे सारी, शीराज़ और इस्फ़हान की जामा मस्जिदें। ईरान में इस तथ्य को खुले तौर पर स्वीकार किया जाता है। उदाहरण के लिए, सारी नगर की जामा मस्जिद के भीतर लगे बोर्ड पर लिखा है कि यह मस्जिद एक अग्नि-मंदिर के स्थान पर बनी है।

यही कारण है कि ईरान में विभिन्न समुदायों के बीच आज भी कटुता कम है-क्योंकि वहाँ लोग इतिहास के सत्य को स्वीकार करते हैं। जबकि भारत में कूप मंडूक ‘वामपंथी’ और ‘दक्षिणपंथी’ इतिहासकार अक्सर सच्चाई छिपाते हैं, जिससे धार्मिक वैमनस्य और बढ़ता है।

इतिहास की कटु सच्चाइयों को स्वीकार करना समाज को परिपक्व बनाता है। जब हम अपने पूर्वजों की गलतियों को स्वीकार करते हैं, तो समाज में सामान्यता आती है। लेकिन जब सच्चाई छिपाई जाती है, तो वैमनस्य भीतर ही भीतर बढ़ता है और समाज को नुकसान पहुँचाता है।

पारसियों ने भी कभी अन्य समुदायों के धार्मिक स्थलों को तोडक़र अपने मंदिर बनाए, और बाद में मुसलमानों ने उन्हीं अग्नि-मंदिरों पर मस्जिदें बनाईं। जब शिया सत्ता में आए, तो उन्होंने उन्हें शिया मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया।

ईरान में जऱथुस्त्र की कबा (Kaba of Zoroaster) जो शीराज़ के पास स्थित है, वहाँ पत्थर पर खुदा हुआ आदेश मिलता है जिसमें ‘झूठे धर्मों’ पर दमन का उल्लेख है। मतलब खुलेआम अल्पसंख्यक के साथ अत्याचार की संस्तुति है

आज किसी गैर-पारसी को पारसी धर्म अपनाने की अनुमति नहीं है। हालांकि ईरान में एक अलग स्थिति है- वहाँ के कम से कम 10 प्रतिशत लोग स्वयं को ‘मूल रूप से पारसी’ मानते हैं।


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