विचार/लेख
अणु शक्ति सिंह
युद्ध का एक कि़स्सा मेरे ज़हन में आधा-अधूरा है। शायद यह जापानी ही है जिसे बचपन में कभी पढ़ा गया था।
कहानी कुछ यूँ है, ‘सुबह का वक्त है। पति दफ्तर के लिए निकल चुका। पूरे गर्भ वाली पत्नी दो साल के बेटे को नहला रही है। बेटा नहाने में बदमाशी कर रहा है। हाथ से फिसल फिसल जा रहा है। साबुन उसकी आँखों में चला गया है। बेटे की कुनमुनाहट चालू है कि गर्भस्थ शिशु भी हलचल करता है। बेटे को थामते हुए महिला बैठती है। आने वाले शिशु के विषय में सोचती है। उम्मीद करती है कि बेटी होगी।
वह खयाल में ही डूबी है कि धमाका होता है। धमाके में लाखों लोग तुरंत मर जाते हैं।
पति बचता है किसी तरह। वह अपने घर पहुँचता है। जली हुई हालत में माँ-बेटे की लाश मिलती है। स्त्री के पेट से बाहर गर्भस्थ शिशु जिसके गाल पर बड़ा सा चीरा है।’
मैं कहानियाँ नहीं भूल पाती, न ही कविताओं का मजमून। यह किस्सा मेरी चेतना में दु:ख बनकर बैठा हुआ है। आज वह दु:ख क्रिस्टोफर नोलान की ओपनहाइमर ने एक बार फिर सहला दिया।
यह फि़ल्म एक ऐसे वैज्ञानिक की गाथा हो सकती है जिसने अमेरिका को कथित रूप से उसका आज दिया। उसके उत्थान और पतन के रूप में दर्ज किया जा सकता है।
या फिर एक बेहद महत्वाकांक्षी राजनयिक के बदले और चाहनाओं के फलक कीज् पर कहानी इतनी ही सीधी होती तो क्रिस्टोफर नोलान की कृति कैसे होती?
इंटरस्टेलर बनाने वाला शख़्स तहों में कहानियाँ बुनता है। आण्विक गुणों को जुदा ढंग से समझने के लिए बेकरार ओपनहाइमर ब्लैक होल पर जर्नल लिखता है। यह युद्ध में डूबा हुआ काल है। हिटलर की क्रूरताओं का। यहूदियों के हॉलोकास्ट होने का और अपनी जमीन छोडक़र भाग जाने का। अपने समय का महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंटस्टाइन दशक पहले ही अपने यहूदी होने की कीमत अदा कर चुका था। जर्मनी छोडक़र अमेरिका जा बसा था। दुनिया खून और मांस के लोथड़े में बंटी हुई थी।
क्रूरताएँ अपनी पराकाष्ठा पर थीं, और और वीभत्सताओं का इंतजार करते हुए। ठीक इसी वक़्त विज्ञान भी अपने उरूज पर था। क्वांटम मैकेनिक्स की दुनिया में एक साथ कई उस्ताद सक्रिय थे। नील्स बोर अपने गुरु रदरफोर्ड के थिर परमाणु सिद्धांत को खारिज कर चुके थे। परमाणु के नाभिक से जुड़ी हुई कई नई बातें दुनिया के सामने थीं।
उसी जाहिर समय जर्मनी में भी एक कमाल का फिजिसिस्ट वर्नर हाइजनबर्ग भी काम कर रहा था। वही जिसने क्वांटम मैकेनिक्स का सिद्धांत दिया था।
दुनिया भर में खुसफुसाहट थी, हाइजनबर्ग के न चाहने पर भी हिटलर उससे ऐसा हथियार बनवा सकता था जो दुनिया को नेस्तनाबूद कर दे। अमेरिका पहले यह हथियार बनवाना चाहता था।
एक वैज्ञानिक को इसकी बागडोर सौंपी जाती है। ओपनहाइमर को वह अपनी टीम बनाता है। उसका एक साथी उसे चेन रिएक्शन को लेकर आगाह करता है। दुनिया के खत्म हो जाने का खतरा मंडराने लगता है।
अमेरिका जल्दबाज़ी में है। फ़्लैशबैक में चल रही कहानी को सुना रहा राजनयिक अपनी ताजपोशी के इंतजार में है।
उस कहानी में ग्रीक कथाओं का वह देश-निकाला नायक है जिसने ईश्वर से आग चुराकर मनुष्यों को दे दी और ख़ुद नर्क में जलता रहा। उसी कहानी में अंतर्मन की जागृति लिए हुए भारतीय मिथक है जो संभोग के क्षणों में भी कर्तव्यबोध जागृत करता है। मनुष्यता को प्रश्रय देता है।
ग्रीक कथाओं का शापित नायक अचानक से ओपनहाइमर के चेहरे में नजऱ आने लगता है। अमेरिका के एक छुपे हुए शहर में वैज्ञानिकों के एक दल से जूझते हुए, उनकी सहमति-असहमति झेलते हुए।
दूसरा विश्व युद्ध लाखों जान ले चुका है। जर्मनी हार रहा है। जापान नहीं हारेगा, अमेरिका जानता है। जापान को हराना है तो वह हथियार चाहिए। ओपनहाइमर की टीम लगी हुई है। वे लगातार काम कर रहे हैं। उनकी तड़प, चाह देखकर कौन नहीं चाहेगा कि वे सफल हो जाएँ।
यहीं नोलान का जादू चलता है। आप चाहते हैं कि ये संघर्षरत वैज्ञानिक सफल हों। आपके पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं कि उनका सफल होना लाखों जान की क़ीमत होगा। आप एक बारगी चाहते हैं कि यह परीक्षण फेल हो जाए। एक दूसरा कि़स्सा लिख दिया जाए, ठीक टेरेंटीनो की इनग्लोरियस बास्टर्ड की तरह।
आप यह भी जानते हैं ओपनहाइमर सफल हुआ था। हिरोशिमा बर्बाद हो गया था। नागासाकी नेस्तनाबूदज् उसी वक्त लाखों लोग मारे गये थे। पीढिय़ाँ बाद तक मरती रही थीं।
ओपनहाइमर परमाणु बम बना लेता है। अमेरिका जश्न में झूमता है। जापान आग में खत्म होता है। ओपनहाइमर के जहन में जहन्नुम का एक दरवाजा खुलता है जहां पछतावा उसे रोज जला रहा है। नोलान इसे शब्दों में नहीं, बिंबों में दर्ज करते हैं। नोलान हिन्दी कविता लिख रहे होते तो जरूर केदारनाथ सिंह के अच्छे मित्र होते। बिंब और दर्शन अपनी संपूर्णता में, यही तो नोलान की खासियत है।
ओपनहाइमर का किस्सा कायदे से लिटल बॉय और फैट मैन के छ: और नौ अगस्त को फटने के बाद ख़त्म हो जाना चाहिए था।
इस खात्मे को तारीफों से और सम्मानों से सजा हुआ होना था पर क्या मनुष्यों को आग देने वाले नायक प्रोमेथियस की मुक्ति संभव थी?
एक आग जलती रही। देव भंजित होते रहे, शाप देते रहे। यूरेनियम के परमाणु का चेन रिएक्शन दुनिया तो नहीं ख़त्म कर पाया। एक दूसरी शृंखला शुरू हो गई। रुस और अमेरिका का शीत युद्ध दुनिया भर में आण्विक हथियारों के जखीरे के तैयार होने की शुरुआत थी।
ओपनहाइमर मेडल ऑफ मेरिट के साथ मुस्कुराते हैं। नोलान के निर्देशन से कसी सिलियन मर्फी की मुद्राएँ थोड़े और दु:ख के साथ हृदय में धंस जाती हैं। कोई मृत शरीर नहीं दिखता है। रक्त की बूँद भी नहीं। बावजूद इसके युद्ध दिखता है, विध्वंस भी। कचोट से मन भर उठता है। फादर ऑफ एटोमिक बॉम्ब माने जाने वाले काले-सफ़ेद में लिपटे नायक के लिए संवेदनाएँ तड़प उठती हैं। भविष्य दिखता है। अंधेरा दिखता है। शक्ति की लड़ाइयों की चौंध में बंद हो जाती हैं आँखें। (ओपनहाइमर देखते हुए)
बहुत सार संक्षेप में अपनी बात कहने की कोशिश के बावजूद भारत का संविधान दुनिया में सबसे भारी-भरकम है। इसलिए वहां सूत्र रूप में जो कहा गया। केवल उसकी जांच की जाए, तो मौजूदा निजाम की संविधान विरोधी हरकतों का आसानी से खुलासा हो जाता है।
संविधान की उद्देशिका में अधिकारपूर्वक कहना है कि ‘हम भारत के लोग‘ संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य बनाने और हर व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने का ऐलान करते हैं। अनुच्छेद 1 में राज्यों और प्रदेषों की सूची है जो संविधान की पहली सूची में दर्ज हैं। राज्यों की सूची में 28 नामों में 18 वें नंबर पर मणिपुर का उल्लेख है। अनुच्छेद 5 के अनुसार संविधान के लागू होने पर हर व्यक्ति भारत का नागरिक होगा जो खुद या जिसके माता या पिता में से कोई भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा हो। लिहाजा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मणिपुर की राज्यपाल अनुसूइया उइके और मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भारतीय नागरिक हैं। संवैधानिक पदों के पदाधिकारी होने से वे नागरिकोंं से ज्यादा हैसियत नहीं रखते।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में संविधान का 42 वां संशोधन 3 जनवरी 1977 को लागू किया गया। उसमें अनुच्छेद 51 क में मूल कर्तव्यों की फेहरिश्त है जिसमें 11 मूल कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया है। संवैधानिक पदाधिकारी सहित हर नागरिक का फर्ज है कि मूल कर्तव्यों का पालन करे ही। इनमें है कि स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे। कहीं नहीं है कि अंगरेज हुक्काम को चि_ी और प्रतिवेदन लिखकर दो कि आजादी के आंदोलनकारियों से हमारा बैर है और अंगरेज सरकार उन्हें प्रताडि़त करो। कछ लोगों ने ऐसा किया है। उस विचारधारा के लोगों को भी आंदोलन के आदर्शों को अपनाना होगा। मूल कर्तव्य हैं कि देश की रक्षा करो और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करो। जाहिर है मणिपुर की रक्षा करना इस वाक्य में षामिल है। पूरा देश चीत्कार कर रहा है।
संसद और विधानसभाओं में मांग उठ रही है। सडक़ों पर आंदोलन हो रहा है लेकिन देश की रक्षा और राष्ट्रीय सेवा नागरिक की हैसियत में भी संवैधानिक पदाधिकारियों द्वारा नहीं की जा रही है। प्रावधान कहता है भारत के सभी लोगों में समरसता और समान बिरादराना भाव कायम करो। जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो। ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के खिलाफ है। मणिपुर में माताएं, बहनें सडक़ों पर बलात्कार और हत्याएं भोग रही हैं। कुकी, नागा, मैतेयी आदि समूहों के संघर्ष में सरकार की ढिलाई या शह पर कत्लेआम मचा हुआ है। सरकारी गोदामों से हथियार दिए या छीने जा रहे हैं। कैसा है नागरिक कर्तव्य जिससे देष का हर संवैधानिक अधिकारी बंधा हुआ है।
51 क (झ) में कर्तव्य कहते हैं सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें। करोड़ों-अरबों रुपयों की निजी और सरकारी संपत्ति लूटी जा रही है। आग के हवाले कर दी जा रही है। हिंसा का तांडव नाच रहा है। तो क्या मूल कर्तव्यों की सूची फ्रेम में जकडक़र घरों या दीवारों में महज लटकाने के लिए है? मणिपुर में शांति और सहयोग कायम करने की ज्यादा जिम्मेदारी केन्द्रीय और प्रदेश की सरकारों पर है।
राष्ट्रपति का दायित्व है वे मंत्रिपरिषद को सलाह दें और उससे सलाह लें कि किस तरह देष को हाहाकार के इस बदनाम समय से बाहर निकाला जा सकता है। साफ कहता है अनुच्छेद 75 (3) कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार होगी। लेकिन संसद में मणिपुर पर बहस करने से कतरा रहे हैं। अनुच्छेद 78 कहता है प्रधानमंत्री का कर्तव्य होगा कि संघ के क्रियाकलाप के पशासन संबंधी सभी विनिश्चय स्वयं राष्ट्रपति को दें या मांगे जाने पर जरूरी जानकारी दें। कहां कर रहे हैं मौन प्रधानमंत्री?
इतना कहकर बहाना नहीं किया जा सकता कि मणिपुर की समस्या राज्य की समस्या है।
संविधान पूर्वज मानते थे कि कभी किसी राज्य में बड़ी गड़बड़ी के कारण जनता को सम्मानपूर्ण जीने की हालत यदि नहीं होगी। तो राज्यपाल और राज्य की मंत्रिपरिषद के साथ साथ केन्द्र को भी जिम्मेदारी देनी पड़ेगी। सोच समझकर डॉ. अम्बेडकर की अगुवाई में नेहरू के समर्थन के कारण अनुच्छेद 355 शामिल किया गया। उसमें लिखा है केन्द्र का कर्तव्य होगा कि वह बाहरी आक्रमण और अंदरूनी अषांति से हर राज्य की सुरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का संविधान के प्रावधानों के मुताबिक चलाया जाना सुनिश्चित करे। कहां चल रही है ऐसी सरकार मणिपुर में? क्या खूंरेजी, बलात्कार, हत्या, लूटपाट और दहशतगर्दी से चलने वाली सरकार को कोई संवैधानिक सरकार कहेगा? तीसरी अनुसूची के तहत केन्द्रीय मंत्रियों को शपथ लेनी पड़ती है कि वे संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे। भारत की प्रभुता और अखंडता को बरकरार रखेंगे। मंत्री के रूप में कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और साफ मन से निर्वाह करेंगे। भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और कानून के अनुसार इंसाफ करेंगे। ऐसी ही षपथ राज्य के राज्यपाल और मंत्री भी लेते हैं। दुनिया जानती है मणिपुर में कुछ भी संवैधानिक नहीं चल रहा है। तब फिर केन्द्र और राज्य का निजाम कैसे कह सकता है कि हम अपनी जवाबदेही का पालन कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी बीच-बीच में कुछ टिप्पणी कर तो देता है। हालांकि उन टिप्पणियों से सरकार को कोई तकलीफ नहीं होती। एक दिन पीडि़त जनता को खुश होने का वहम हो जाता है कि शायद कुछ अच्छा हो। अच्छा होता नहीं है। सरकार और विपक्षी दलों में तो केवल यही सिर फुटौव्वल बची है कि लोकसभा की कार्यवाही किस नियम के तहत हो। एक नियम में सीमित बहस होगी। दूसरे नियम में असीमित बहस की गुंजाइश है। एक मेंं वोटिंग होगी। दूसरी बिना किसी वोटिंग ध्वनि मत से मुद्दे को किसी किनारे किया जा सकता है। ऐसा ही तो राज्यसभा की कार्यवाही में उपसभापति हरिवंश ने एक बार खुलेआम कर दिया है।
दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है की तर्ज पर संविधान में मूल कर्तव्य षामिल तो हो गए हैं लेकिन इनसे कहीं ज्यादा कारगर गांधी के विचार थे। उन्होंने संविधान बनने की प्रक्रिया के वक्त सुझाव दिया था कि नागरिक कर्तव्यों को इस आधार पर शामिल किया जाए कि जो नागरिक कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा। उसे मूल अधिकार नहीं मिलेंगे। उसमें सबसे महत्वपूर्ण था कि हर नागरिक देश के कल्याण के लिए अपनी काबिलियत के मुताबिक नकद रुपयों अन्य तरह की सेवा या श्रम के जरिए अपने कर्तव्य करेगा। हर नागरिक पूरी कोशिश या प्रतिरोध भी करेगा कि मनुष्य के द्वारा मनुष्य का षोषण नहीं किया जाए।
कांग्रेस नेतृत्व ने संविधान सभा में गांधी को पूरी तौर पर खारिज कर दिया। देश को मुश्किल हालात में गौतम अडानी, मुकेश अंबानी, रतन टाटा जैसे तमाम लोगों से कहा जा सकता था कि अपनी इच्छा या लोगों के आह्वान पर अनुरूप देष के लिए तय किया हुआ आर्थिक योगदान तो करें ही। आज वे देश की दौलत लूटने में इस कदर गाफिल हैं कि संविधान की किताब की गांधी की सुझाई आयतों को अगर छू लेगें। तो उन्हें बिजली का धक्का जैसा लगेगा। कहता है संविधान का अनुच्छेद 51 क (घ) में कि जरूरी होने पर आह्वान किया जाने पर हर नागरिक देश की सेवा करे। उसकी रक्षा करे। करोड़ों हैं जो सरकार और प्रधानमंत्री को आह्वान कर ही रहे हैं कि वे देष की रक्षा करें। सेवा करें। लेकिन वे देख रहे हैं इसके बावजूद प्रधानमंत्री को मणिपुर जाने की कोई नीयत ही नहीं है। मणिपुर जल रहा है याने भारत जल रहा है। सरकारी तंत्र उस आग को आश्वासन की पिचकारी से बुझाने की कोशिश कर रहा है।
ये सब तर्क राजनीति के नहीं है। ये संविधान की धरती से उगे हैं। संविधान में और कई प्रावधान हैं जो मणिपुर की समस्या को हल करने बेचैन हो रहे होंगे। अनुच्छेद 356 भी कहता है कि राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दषा में वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। लेकिन मणिपुर के राज्यपाल से उनकी असफलता की रिपोर्ट कोई कैसे मांगें। आरोप तो केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों के ऊपर लग रहे हैं। आज केन्द्र और राज्य मेंं कहीं भी अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होतीं तो राज्य सरकार भंग हो जाती। यह डबल एंजिन की सरकार केवल एक्सीडेन्ट कर रही है। इससे कम खराब हालत में कई प्रदेश सरकारें पहले भंग हो ही चुकी हैं।
अरुण कान्त शुक्ला
साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढक़र जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढक़र आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहत है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई संबंध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।
तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमा प्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।
फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमा प्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढऩी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने जोर पकड़ा है।
खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?
संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।
फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना जोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मंत्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की जरूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।
इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।
मुसलमान अगर शासकों का दामन पकडक़र कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुखर्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, जमींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी खातिर करते हैं।
इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं, ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई जमाना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के जमाने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन जमानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह जमाना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर गऱीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। ‘संस्कृति’ अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।
उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। *ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बंद किए हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।
(मूलत:यह लेख 15 जनवरी 1934 जागरण में प्रकाशित हुआ था)
डॉ. आर.के. पालीवाल
हमारे यहां आजकल महात्मा गांधी को गरियाने का नया फैशन सा हो गया है। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर कुछ लोग बंटवारे से लेकर तुष्टिकरण तक गांधी को कसूरवार ठहराने के फतवे जारी करते हैं। ऐसे लोग खुद तो गांधी के विराट व्यक्तित्व से परिचित नहीं हैं लेकिन युवाओं के अधपके मन को भ्रमित कर रहे हैं। ऐसे लोगों से एक विनम्र अनुरोध है कि वे थोड़ी देर ठहरकर शांति से अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर यह सोचें कि आखिर देश विदेश की इतनी सारी नामचीन हस्तियां सत्य, शांति और सादगी के महान उपासक महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और चरित्र को क्यों सर्वोच्च कोटि का मानती थी और क्यों आज भी विश्व के करोड़ों लोग उनके बताए शांति के रास्ते को सर्वश्रेष्ठ मार्ग मानते हैं। आखिर क्यों संयुक्त राष्ट्र संघ ने गांधी के जन्मदिन दो अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस घोषित कर इस महामानव को सम्मानित किया है। यही नहीं हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय में महात्मा गांधी की मूर्ति भी स्थापित की गई है।
भारत ही नहीं विश्व के सभी महाद्वीपों के सैकड़ों देशों में गांधी की मूर्तियां स्थापित की गई हैं।उन पर कई हजार किताबें लिखी गई हैं और अभी भी लिखी जा रही हैं। भारत सहित विश्व के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में गांधी पर पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स पढ़ाए जाते हैं और शोधकार्य हो रहे हैं। गांधी के जीवन और विचारों को प्रचारित प्रसारित करती इंटरनेट पर हजारों वेबसाइट हैं। बॉम्बे सर्वोदय मंडल द्वारा संचालित वेबसाइट द्वद्मद्दड्डठ्ठस्रद्धद्ब.शह्म्द्द पर पिछ्ले कुछ साल में सैकड़ों देशों के करोड़ों लोग विजिट कर चुके हैं। गांधी द्वारा स्थापित साबरमती और वर्धा आश्रमों में प्रतिदिन हजारों लोग गांधी के आकर्षण से खींचे आते हैं और वहां रखी पुस्तिका में एक से बढक़र एक उदगार व्यक्त करते हैं।यह सब तब हो रहा है जब गांधी कभी किसी लाभ के पद, यथा भारत के प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति या मंत्री आदि नहीं रहे फिर भी विश्व के सैकड़ों देशों में उनकी मृत्यु के पचहत्तर साल बाद भी उन्हें बेहद सम्मान के साथ याद किया जाता है।
आइंस्टीन गांधी के बारे में भाव विभोर होकर लिखते हैं कि भविष्य की पीढिय़ां यकीन नहीं करेंगी कि हमारी पीढ़ी ने गांधी जैसी सख्शियत को धरती पर आम आदमी की तरह चलते हुए देखा है।रोमा रोला ने आध्यात्मिक सख्शीयत की खोज में निकली मीराबेन को गांधी की शरण में भेजा था। पंजाब की राजकुमारी अमृत कौर ने गांधी के सानिध्य के लिए राजमहल के ऐशो आराम त्यागकर आश्रम का तपस्विनी जीवन अपनाया था। गांधी के प्रभाव में आकर ही लोहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपनी अच्छी खासी बैरिस्टरी और जमीदारी त्यागकर खुद को देश सेवा में झौंक दिया था। सरदार पटेल की तरह सरोजनी नायडू से लेकर महादेव देसाई और डॉ सुशीला नैयर आदि न जाने कितने नाम हैं जिन्होंने गांधी के आकर्षण में अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दिया था।लुई फिशर उनकी सटीक जीवनी लिखने भारत आए थे। लॉर्ड माउंटबेटन ने उन्हें शांति के लिए फौज से बड़ा काम करने वाला वन मैन आर्मी का खिताब दिया था। हिंदी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद और उनकी सहधर्मिणी गांधी के अनन्य प्रशंसक थे।
गांधी की हत्या के बाद भी उनके सहयोगियों ने गांधी के मार्ग पर चलकर अदभुत कार्य किए हैं। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में कितनी जमीन गरीबों के लिए दान में मिली है। जयप्रकाश नारायण और नारायण देसाई के नेतृत्व में शांति सेना ने पूर्वोत्तर में कितना अदभुत काम किया है। सुभाषचंद्र बोस ने अपनी पहली सैन्य टुकड़ी का नाम गांधी ब्रिगेड रखा था।आज भी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता अपने धरने प्रदर्शन गांधी मूर्ति के नीचे बैठकर करते हैं।भारत आने वाले विशिष्ट राजकीय अतिथि अपनी भारत यात्रा में गांधी से जुड़े स्थलों पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जाते हैं।सूर्य सरीखी इतनी दैदीप्यमान विभूति पर कीचड़ उछालकर लोग अपनी ही क्षुद्रता और अपने ही हल्केपन का परिचय देते हैं। आपके गरियाने से गांधी की वैश्विक और सदाबहार छवि पर कोई असर नहीं पड़ेगा इसलिए अपनी उर्जा गांधी को गरियाने में जाया मत करो।
प्रभात पटनायक
मिसाल के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की लंबाई 5 फीट 8 इंच हो, तो उसका बीएमआइ 25 किलोग्राम/ एम2 से घटकर 18.5 किलोग्राम एम2 पर आ जाने के लिए, उसके वजन में 18 किलोग्राम की कमी की जरूरत होगी। किसी व्यक्ति के वजन में इस दर्जे की कमी तो काफी लंबे अर्से तक लगातार भोजन में कटौती से ही हो सकती है।
इसी साल 3 अप्रैल को, योजना राज्य मंत्री, राव इंद्रजीत सिंह ने राज्यसभा में बताया था कि सरकार के पास, गरीबी के अनुमान के लिए 2011-12 के बाद के कोई आंकड़े ही नहीं हैं। इसलिए, उन्हें इसका कोई अनुमान ही नहीं है कि उसके बाद से कितने लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाया जा चुका है।
यूएनडीपी की गरीबी की अवधारणा
बहरहाल, 18 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने एलान किया कि 2005 से 2019 के बीच भारत ने 41 करोड़ 50 लाख लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर पहुंचाया था। बेशक, उसके बाद के दौर के संबंध में उसके पास कोई जानकारी नहीं है, फिर भी महामारी से पहले की अवधि के संबंध में उसने जो दावा किया था, उसे खूब उछाला गया है। लेकिन, इसे उछालते हुए इसे अनदेखा ही कर दिया गया कि न सिर्फ गरीबी की यूएनडीपी की अवधारणा, आम तौर पर इस संज्ञा से जो अर्थ समझा जाता है, उससे बहुत ही भिन्न है, बल्कि यह भी कि यूएनडीपी की अवधारणा न तो सैद्घांतिक रूप से पुख्ता है और न ही सांख्यिकीय दृष्टि से किसी मजबूत आधार पर खड़ी हुई है। इसे लेकर जो तूमार बांधा जा रहा था, बस झूठा ही था।
भारत के गरीबी के आधिकारिक अनुमान भी हालांकि अब सीधे पोषण-संबंधित वंचितता पर आधारित नहीं रह गए हैं, फिर भी ये अनुमान पोषण संबंधी हालात को आकलन का प्रस्थान बिंदु तो बनाते ही हैं और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के वृहद नमूना उपभोक्ता खर्च सर्वेक्षण, इन अनुमानों के लिए सांख्यकीय आधार मुहैया कराते हैं। अगर 2011-12 के बाद के वर्षों के लिए हमारे अपने देश के गरीबी के कोई अनुमान ही नहीं हैं, तो इसलिए कि इसके बाद के अगले ही सर्वे के नतीजों को, जो 2017-18 के संबंध में था, केंद्र सरकार ने दबा ही दिया था और उसके बाद से इस तरह का कोई सर्वे कराया ही नहीं गया है।
इसके विपरीत, यूएनडीपी द्वारा इस अनुमान के लिए अनेक संकेतकों का प्रयोग किया जाता है और इन संकेतकों को अलग-अलग भार देते हुए, एस समेकित माप निकाला जाता है। इन संकेतकों में शामिल हैं- क्या शरीर भार सूचकांक 18.5 किलोग्राम/एम2 से कम है; क्या पिछले पांच वर्षों में परिवार में 18 वर्ष से कम आयु में किसी बच्चे की मृत्यु हुई है; क्या परिवार का कोई सदस्य ‘स्कूल में प्रवेश की आयु+ 6 वर्ष’ आयु का या उससे बड़ा है, जिसने कम से कम छ: साल की स्कूली शिक्षा पूरी की हो; क्या स्कूल जाने की आयु का कोई बच्चा है, जो आठवीं कक्षा पूरी करने की आयु तक स्कूल नहीं गया हो, आदि-आदि।
गरीबी की जगह पर आधुनिकीकरण का माप
अब ऐसे किसी भी समाज में जो ‘आधुनिकीकरण’ की प्रक्रिया से गुजर रहा हो, इन सभी संकेतकों में सुधार तो दिखाई देगा ही। ऐसे किसी भी समाज में अठारह वर्ष से कम के बच्चों की मृत्यु दर घटती ही है। संगियों के दबाव तथा अपना जीवन बेहतर करने की आकांक्षाओं से ज्यादा संख्या में माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजेंगे, तब तो और भी ज्यादा जब स्कूल जाने वाले बच्चों को मुफ्त दोपहर का भोजन भी मिलता हो। इसी प्रकार, कम से कम छ: साल की स्कूली शिक्षा पूरी करना काफी आम फहम हो जाता है, भले ही बाद में बच्चा स्कूल छोड़ ही दे, आदि-आदि। बहरहाल, इन सभी मानकों पर स्थिति में सुधार और परिवार की आय का सिकुडऩा यानी आय का मालों की कम से कम होती पोटली को खरीदने में समर्थ होना, आसानी से एक साथ भी चल सकते हैं। दूसरे शब्दों में जब परिवारों की स्थिति पहले से खराब हो रही हो और इसलिए देश में गरीबी, आम तौर पर उससे जो अर्थ समझा जाता है, उस अर्थ में बढ़ रही हो, तब भी यूएनडीपी के उक्त मानक गरीबों की संख्या में गिरावट दिखा सकते हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो यूएनडीपी का गरीबी का पैमाना, जो अपने दावे के अनुसार ‘‘बहुआयामी गरीबी’’ को प्रतिबिंबित करता है, वास्तव में गरीबी में कमी को ‘‘आधुनिकीकरण’’ का समानार्थी ही बना देता है। लेकिन, वास्तविक गरीबी का संंबंध सिर्फ ‘‘आधुनिकीकरण’’ होने-न होने से ही नहीं होता है, बल्कि उसका संबंध तो इस सवाल से होता है कि इस आधुनिकीकरण की कीमत कौन चुका रहा है; इसका बोझ मेहनतकश उठा रहे हैं या अमीर उठा रहे हैं। और यूएनडीपी के गरीबी के माप में कुछ भी है ही नहीं, जो इस बाद वाले सवाल से दो-चार होता हो।
भारत में शासन के तत्वावधान में ‘‘आधुनिकीकरण’’ के तेजी सेलतथा उल्लेखनीय रूप से हो रहे होने से कोई इंकार नहीं कर सकता है। और ठीक यही चीज है, जो यूएनडीपी के गरीबी के माप में प्रतिबिम्बित होती है। लेकिन, जैसाकि हम पीछे देख आए हैं, गरीबी से आम तौर पर जो अर्थ लिया जाता है, उस अर्थ में गरीबी का संबंध आधुनिकीकरण की कीमत चुकाए जाने से होता है। सवाल यह है कि क्या ‘‘आधुनिकीकरण’’ के लिए राजकोषीय संसाधन, मेहनतकश जनता के उपभोग की कीमत पर आ रहे हैं; और यह कि क्या बदलते जमाने के हिसाब से अपनी जिंदगियों का ‘‘आधुनिकीकरण’’ करने के लिए, परिवारों को अपने जीवन स्तर में गिरावट को झेलना पड़ रहा है, जिसकी अभिव्यक्ति सबसे बढकऱ, अपने खाद्य उपभोग में कटौती में होती है, क्योंकि जब भी परिवार के बजट पर दबाव बढ़ता है, आम तौर पर वह अपने खाद्य उपभोग में ही कटौती करता है।
खाद्य उपभोग ही गरीबी का सटीक पैमाना
प्रसंगत: कह दें कि पोषण की स्थिति को गरीबी का आकलन करने का बुनियादी पैमाना मानने का असली तर्क ठीक यही है। ऐसा कत्तई नहीं है कि यह कहा जा रहा हो कि सिर्फ पोषण से ही फर्क पड़ता है, हालांकि पोषणगत वंचितता पर जोर देेेने वाले विद्वानों के संबंध में गलत तरीके से ऐसा मान लिया जाता है और उन पर ‘‘कैलोरी तत्ववादी’’ होने का आरोप लगाया जाता है। मुद्दा यह है कि पोषणगत वंचितता ही वह असली या आम्ल परीक्षा है, जिससे कुल दरिद्रीकरण सामने आ जाता है। पोषणगत आहार, वास्तविक आय का एवजीदार सूचक है और यह वास्तव में किसी अनिवार्य रूप से प्रश्नों के घेरे में आने वाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की मदद से, रुपया आय को घटाकर वास्तविक आय आंकने की तुलना में, कहीं बेहतर सूचक है। पोषणगत आहार की स्थिति में गिरावट (यहां हम उस सबसे ऊपरले संस्तर के मामले में ऐसी गिरावट को छोड़ सकते हैं, जो स्वास्थ्य संबंधी कारणों से और अति-उपभोग से बचने के लिए, पोषणगत आहार में कटौती करता है), इसका काफी भरोसेमंद लक्षण है कि संबंधित परिवार की दशा, बदतर हो रही है।
बेशक, यूएनडीपी के अधिकारी यह दलील देंगे कि वे भी न्यून-पोषण को अनदेखा कहां कर रहे हैं। आखिरकार, उनके सूचकांक में भी, 1/6वां हिस्सा तो पोषण का ही रहता है। लेकिन, पोषणगत वंचितता से वे जो अर्थ लगाते हैं, वह कुछ और ही है। इससे उनका आशय यह नहीं होता है कि कैलोरी या प्रोटीन आहार घट रहा है या नहीं, बल्कि उनका आशय सिर्फ यह होता है कि व्यक्ति का बॉडी-मास इंडैक्स (बीएमआइ), 18.5 किलोग्राम/एम2 से नीचे तो नहीं चला गया। कैलोरी या प्रोटीन आहार में कमी के पहलू से पोषणगत वंचितता के कई-कई प्रभाव होते हैं। इससे काम करने की क्षमता घट जाती है, इससे संबंधित व्यक्ति रोगों के लिए वेध्य हो जाता है, आदि, आदि। बॉडी-मास इंडैक्स का गिरना भी, इस तरह के दुष्प्रभावों में से एक हो सकता है। लेकिन, यूएनडीपी के सूचकांक में, पोषणगत वंचितता के सिर्फ एक संभव नतीजे, बीएमआइ में गिरावट को ही लिया जाता है और वह भी तब, जबकि वह एक खास सीमा से नीचे चला जाता है, जो 18.5 किलोग्राम/एम2 पर तय की गयी है। यूएनडीपी सूचकांक में इसे ही पोषणगत वंचितता के नाप का, इकलौता पैमाना बना दिया गया है। वास्तव में बीएमआइ में गिरावट का अनिवार्य रूप से यह अर्थ नहीं होता है कि यह 18.5 किलोग्राम/एम2 की सीमा से नीचे ही चला जाएगा। पोषणगत वंचितता तो, बॉडी मास इंडैक्स के एक खास सीमा से नीचे खिसकने के बिना भी, काफी अर्से तक चलता रह ही सकती है।
मिसाल के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की लंबाई 5 फीट 8 इंच हो, तो उसका बीएमआइ 25 किलोग्राम/ एम2 से घटकर 18.5 किलोग्राम एम2 पर आ जाने के लिए, उसके वजन में 18 किलोग्राम की कमी की जरूरत होगी। किसी व्यक्ति के वजन में इस दर्जे की कमी तो काफी लंबे अर्से तक लगातार भोजन में कटौती से ही हो सकती है। इसका अर्थ यह हुआ कि यूएनडीपी के गरीबी के अनुमान में दर्ज होने की नौबत आने से पहले भी, पोषणगत वंचितता व्यक्ति की सलामती तथा स्वास्थ्य पर काफी चोट कर चुकी होती है। और यह इसके ऊपर से है कि इस वंचितता को भी, इस सूचकांक में कुल 1/6वें हिस्से के बराबर वजन दिया गया है।
यूएनडीपी के दावे और वृहद नमूना सर्वे की हकीकत
यूएनडीपी के गरीबी के आकलन और राष्ट्रीय नमूना सर्वे के वृहद नमूना सर्वे के जरिए सामने आने वाले गरीबी के आकलन के अंतर को, निम्रलिखित से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। यूएनडीपी का अनुमान कहता है कि 2005-06 में भारत में 64.5 करोड़ ऐसे लोग थे जो ‘बहुआयामी’ पैमाने से गरीब थे और यह संख्या 2015-16 तक घटकर 37 करोड़ रह गयी थी। इसका अर्थ यह हुआ कि इस अवधि में 27 करोड़ 50 लाख लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर पहुंचा दिया गया और इसके बाद से, 2015-16 और 2019-20 के बीच, 14 करोड़ और लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर कर दिया गया।
इसके विपरीत, राष्ट्रीय नमूना सर्वे का 2017-18 में आया 75वां चक्र यही दर्शा रहा था कि ग्रामीण भारत में 2011-12 और 2017-18 के बीच, सभी सेवाओं व मालों पर प्रतिव्यक्ति वास्तविक खर्च में 9 फीसद की गिरावट हुई थी। सर्वे का यह नतीजा इतना ज्यादा चोंकाने वाला था कि केंद्र सरकार ने इन आंकड़ों के जारी किए जाने के चंद घंटों के अंदर-अंदर ही, उन्हें सार्वजनिक पहुंच से दूर कर दिया। (यहां हमने 9 फीसद की जिस गिरावट को उद्यृत किया है, उन संक्षिप्त नतीजों पर आधारित हैं, जिन्हें कुछ लोगों ने इन आंकड़ों के सार्वजनिक पहुंच से हटाए जाने से पहले ही डाउनलोड कर लिया था। इन नतीजों पर उस दौर में प्रैस में भी कुछ चर्चा हुई थी।)
वास्तव में ग्रामीण आबादी का वह हिस्सा जो 2,200 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन का आहार हासिल नहीं कर पा रहा था, जो कि वह मूल मानदंड था, जिसे भारतीय योजना आयोग ने ग्रामीण गरीबी का आंकलन करने के लिए शुरूआत में लागू किया था, 2011-12 में 68 फीसद था। यह हिस्सा खुद ही 1993-94 के 58 फीसद के स्तर से बढकऱ यहां तक पहुंचा था। बहरहाल, 2017-18 तक यह हिस्सा और भी बढकऱ अनुमानत: 77 फीसद पर पहुंच गया। इस तरह, यूएनडीपी के गरीबी के अनुमान जिस अवधि में करोड़ों लोगों के ‘बहुआयामी गरीबी’ से ऊपर उठा दिए जाने की बात करते हैं, उसके कम से कम एक हिस्से में तो ग्रामीण गरीबी में, जाहिर है कि उसी अर्थ में जिस अर्थ में गरीबी को हमेशा से समझा जाता रहा है, ऐसी भारी बढ़ोतरी दर्ज हुई थी कि भारत सरकार ने, जाहिर है कि अवसरवादी तरीके से यही तय कर लिया कि इन तमाम आंकड़ों को ही दबा दिया जाए!
शहरी-ग्रामीण, सबमें गरीबी बढ़ी है
यहां तक हम ग्रामीण गरीबी की ही बात कर रहे थे। महामारी की पूर्व-संध्या में भारत में ‘‘यूजुअल स्टेटस’’ बेरोजगारी की दर, पिछले 45 साल के अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई थी, जिससे हम सुरक्षित तौर पर यह अनुमान लगा सकते हैं कि गरीबी, उसे सामान्य तौर पर जैसे समझा जाता है, घट नहीं सकती थी, बल्कि शहरी तथा ग्रामीण आबादी, दोनों को मिलाकर गरीबी इस दौरान बढ़ी ही होगी, जबकि यूएनडीपी के अनुमान से इससे उल्टा ही संकेत मिलता है।
हमने पीछे जो कुछ कहा है, वह यूएनडीपी के उक्त पैमाने मात्र की आलोचना नहीं है, बल्कि उसे गरीबी का पैमाना बताए जाने की ही आलोचना है। गरीबी के मोर्चे पर क्या हो रहा है, यह भारत में एक गर्मागर्म बहस का मुद्दा बना रहा है। यूएनडीपी, गरीबी मिटाए जाने की एक बहुत ही दिलकश तस्वीर लेकर इस बहस में कूद पड़ा है। लेकिन, वह गरीबी की संज्ञा का इस्तेमाल, इस बहस में बाकी सब जिस अर्थ में करते हैं, उससे बिल्कुल भिन्न अर्थ में कर रहा है। जब तक हम इस अंतर को ध्यान में नहीं रखेंगे, हमारे लिए इसकी व्याख्या करना मुश्किल ही होगा कि कैसे एक देश, जो 2022 में विश्व भूख सूचकांक पर, 121 देशों में, सिखक कर 107वें स्थान पर पहुंच गया है, उसी समय दसियों करोड़ लोगों को ‘‘गरीबी से ऊपर’’ उठा सकता है?
(लेखक राजनैतिक टिप्पणीकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं।)
-अरुण दीक्षित
मैहर की पहचान इसलिए नहीं है कि वह एमपी का एक शहर है! उसकी पहचान सिर्फ इसलिए है कि वहां देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है! वह मंदिर जो देश ही नहीं पूरी दुनिया में मशहूर है। लाखों लोग हर साल देवी दर्शन के लिए मैहर पहुंचते हैं!
वे दोनों इसी मंदिर की समिति के सेवादार हैं। उन्होंने एक मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी करके देश को एक बार फिर दिल्ली के निर्भया कांड की याद दिलाई है! यह भी गजब का संयोग है कि जिन्होंने निर्भया के समय पूरा देश सिर पर उठा लिया था वे आज मणिपुर को, देश के अन्य हिस्सों में हुई घटनाओं से जोडक़र, जस्टीफाई करने में जुटे हैं! सबसे दुखद पहलू यह है कि संसद के भीतर मणिपुर की घटनाओं का बचाव वे भी कर रही हैं जो कुछ महीने पहले गोमांस परोसने के आरोप से घिरी अपनी युवा बेटी के बचाव में भावुक अपीलें कर रही थीं! खबर अब दुनियां तक पहुंच चुकी है। लेकिन इस काम में उन चैनलों की भूमिका सीमित है जो 2012 में जमीन आसमान एक किए हुए थे।
पहले घटना जान लें! उसकी उम्र करीब 12 साल है। सतना जिले के मैहर में स्थित मशहूर शारदा देवी मंदिर के पास उसके दादा की झोपड़ी है। बाप है नहीं। घर में मां के अलावा दादा-दादी और एक छोटी बहन है।सरकार के सबको घर और आर्थिक सुरक्षा दे देने के दावे के बीच उसका परिवार भिक्षाटन करके गुजारा करता था। ‘देवी की कृपा’ से गुजारा चल रहा था। 27 जुलाई को दोपहर तीन बजे के आसपास वह अपनी झोपड़ी के बाहर खेल रही थी। खेलते-खेलते वह गायब हो गई।
घरवालों ने बहुत खोजा लेकिन वह नहीं मिली! अगले दिन गांव की ही एक महिला ने थोड़ी दूर जंगल में उसे पड़ा देखा। वह बुरी तरह घायल थी। परिवार के लोग पहुंचे तो पहली नजर में उन्हें लगा कि शायद मर गई है! फिर समझ में आया कि सांस चल रही है। तत्काल पास के अस्पताल ले गए। वहां एक महिला डॉक्टर ने प्राथमिक जांच की। उसने पाया कि बच्ची का शरीर क्षत-विक्षत है। उसके जननांग में करीब सवा फुट लंबी लकड़ी घुसी हुई है। डॉक्टर ने उसे तत्काल निकाला। चूंकि हालत खराब थी इसलिए उसे फौरन सतना भेजा गया। फिर वहां से रीवां के बड़े अस्पताल भेजा गया। फिलहाल वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। डॉक्टर उसे बचाने में लगे हैं।
इधर मैहर में पुलिस ने सुराग के आधार पर शुक्रवार को शारदा देवी मंदिर समिति के दो कर्मचारियों को पकड़ा। अतुल बढ़ोलिया और रवींद्र रवि नाम के ये दोनों युवा कर्मचारी जेल भेज दिए गए हैं। पुलिस के मुताबिक इन दोनों ने ही बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया फिर उसे मारने की नियत से उसके जननांग में बड़ी लकड़ी घुसेड़ दी ताकि वह मर जाए। बाद में वे दोनों उसे जंगल में बेहोश छोडक़र चले आए। इन दोनों की उम्र करीब 30 साल बताई गई है।
पुलिस के हिसाब से कहानी खत्म! अपराध हुआ! अपराधी पकड़ लिए गए! आगे का काम अदालत का।
इस बीच बच्ची के स्वघोषित ‘मामा’ ने भी बाबा जी के तोतों की तरह रटा-रटाया बयान दोहराया! मैहर में बेटी से दुष्कर्म की जानकारी मिली है। मन पीड़ा से भरा हुआ है। बहुत व्यथित हूं। अपराधी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। बच्ची के इलाज की व्यवस्था करने को कहा है। पुलिस को कहा गया है कि कोई अपराधी बचना नहीं चाहिए!
यह बयान पहली बार नहीं आया है। हर घटना के बाद वे ऐसा ही बयान देते रहे हैं। पहले वे हर बलात्कारी को फांसी देने की बात कहकर अपने द्वारा बनाए गए फांसी के कानून का भी जिक्र फख्र से करते थे। लेकिन फांसी का कानून बनाए जाने के बाद भी न तो राज्य में बलात्कार कम हुए और न ही आज तक कोई बलात्कारी फांसी पर लटकाया गया। हालांकि निचली अदालतों ने दो दर्जन से ज्यादा बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई है। लेकिन सभी मामले अभी अदालतों में ही उलझे हैं! उधर केंद्र सरकार के आंकड़ों में एमपी महिलाओं के साथ अपराधों के मामले में देश में सबसे ऊपर चल रहा बताया जा रहा है।
फांसी के कानून से पहले धर्म की बात कर ली जाए। जिन दो दरिंदों ने मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी की है, वे दोनों मैहर देवी मंदिर समिति के कर्मचारी थे। हालांकि कल को समिति इसे नकार भी सकती है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि करोड़ों लोगों के आस्था के केंद्र पर दिन-रात काम करने वाले लोग एक मासूम बच्ची के साथ जघन्य अपराध कर सकते हैं। उसका शरीर नोच सकते हैं। आपकी कल्पना में ये बात आए न आए पर ऐसा हुआ है।
इसी के साथ यह सवाल उठा है कि कानून की हालत तो पहले से खराब है पर क्या अब धर्म का अस्तित्व भी खत्म हो रहा है? एक ओर जहां राम के नाम पर चलने वाली राज्य सरकार शबरी को भी देवी बना रही है। सरकारी खजाने से अरबों रुपए खर्च करके मठ मंदिर और देवताओं के लोक बना रही है। बाबाओं और कथित संतों के चरणों में पड़ी है! दूसरी ओर धर्म से जुड़े और मंदिरों में काम करने वाले लोग ही बच्चियों से दुराचार कर रहे हैं!
आगे बात करने से पहले एक नजर सरकार के धार्मिक कार्यों पर डाल लीजिए! मध्यप्रदेश सरकार उज्जैन में महाकाल लोक बनवा रही है। ओरछा में राम राजा लोक बन रहा है। ओंकारेश्वर में शंकराचार्य का भव्य स्मारक बन रहा है! दतिया में पीतांबरा देवी का महालोक बन रहा है तो सलकनपुर में देवी लोक बनाया जा रहा है। सौसर में सरकार हनुमान महालोक बनवा रही है तो जानापाव में परशुराम लोक बनाने का ऐलान हो चुका है। सागर में अगले महीने संत रविदास के भव्य मंदिर का शिलान्यास खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करने वाले हैं। उसके लिए अभी प्रदेश में समरसता यात्राएं घूम रही हैं। यह काम बीजेपी ही कर रही है। चित्रकूट में दिव्य वनवासी रामलोक बनेगा तो रीवा के त्यौंथर में शबरी के वंशजों से जुड़ी कोलगढ़ी का जीर्णोद्धार भी सरकार करा रही है। इसी श्रंखला में सरकार ने भोपाल में महाराणा प्रताप लोक बनाने की भी ऐलान किया है।
यह अलग बात है कि भगवान के ये लोक भी उनके भक्तों के भ्रष्टाचार से बच नहीं पाए हैं। उज्जैन के जिस महाकाल के महालोक का उद्घाटन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था वह कुछ महीने में ही क्षतिग्रस्त हो गया। ऋषि मुनियों की प्रतिमाएं धराशाई हो गईं। आरोप है कि महालोक में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। लेकिन खुद सरकार भ्रष्टाचार छिपाने की कोशिश कर रही है।
इन लोकों के अलावा मुख्यमंत्री और उनके मंत्री अपने-अपने इलाकों में कथा भागवत के बड़े आयोजन करा रहे हैं। अविवाहित स्त्रियों को खाली प्लाट बताने वाले धीरेंद्र शास्त्री की कथा मुख्यमंत्री ने अपनी विदिशा में कराई थी। सीहोर में रुद्राक्ष बांट कर हर साल लोगों को परेशानी में डालने वाले प्रदीप मिश्र की सेवा में तो पूरी सरकार लगी रही है। कमोवेश हर जिले का प्रशासन और पुलिस इन धर्म के ठेकेदारों की सेवा में लगी दिखती है।
उधर विपक्षी दल भी इस मोर्चे पर पीछे नहीं है। खुद पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी धीरेंद्र शास्त्री की कथा अपने छिंदवाड़ा में करा रहे हैं।
सवाल यह है कि जब चारों ओर धर्म और उसके ठेकेदारों का ही बोलबाला है तो फिर प्रदेश में इतना अधर्म क्यों हो रहा है? सरकार कर्ज लेकर हजारों करोड़ रुपए इन लोकों और महालोकों पर खर्च कर रही है! लेकिन समाज पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा हालत यह है कि एमपी में न तो कानून का डर दिखाई दे रहा है और न ही धर्म का!
न बेटी सुरक्षित है न बेटे। न युवतियां सुरक्षित हैं और न 90 साल की बुजुर्ग महिलाएं!
मुख्यमंत्री छोटी बच्चियों से लेकर बड़ी उम्र तक की महिलाओं के लिए कुछ न कुछ कर रहे हैं। बच्चियों के पैदा होने से लेकर उनकी पढ़ाई और शादी की व्यवस्था भी सरकारी खजाने से की जा रही है। लाडली बहनों को हर महीने एक हजार जेब खर्च दे रहे हैं। बुजुर्ग महिलाओं को हवाई जहाज से तीर्थ यात्रा करा रहे हैं। और तो और वे रैंप पर टहलते हुए अपनी बहनों के पांव को कांटों से बचाने के लिए उन्हें चप्पल देने का ऐलान कर रहे हैं। धूप से बचाने के लिए छाता दे रहे हैं।भले ही कर्ज लेकर करें! लेकिन अपने कुल बजट का एक तिहाई बच्चियों और महिलाओं पर खर्च कर रहे हैं!
यह अलग बात है कि इतना सब करके भी वे उन्हें सबसे जरूरी चीज, सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रहे हैं। वे मामा बने! भाई बने! श्रवण कुमार बने! लेकिन बेटी बहन और माताओं को दरिंदों से बचाने में सफल नहीं हो पाए। सबसे अधिक समय तक एमपी का मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना लेने, बलात्कारियों को फांसी का कानून बना देने और पुलिस में 33 प्रतिशत महिलाओं की भर्ती कर देने के बाद भी वे अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा नहीं कर पाए! उनका मन बहुत कोमल है! बहुत व्यथित रहता है। वे सख्त बात भी करते हैं! लेकिन फिर भी न बच्चियां सुरक्षित हैं और न उनकी माताएं और दादियां! राम भी उनकी मदद करते नहीं दिख रहे हैं।
वे रोज बड़े-बड़े दावे करते हैं! लेकिन इनके बाद भी उन्हें रोज व्यथित होना पड़ता है। न अपराधी डर रहे है और न वे ‘कृष्ण’ बन पा रहे हैं। फिर भी ‘शो मस्ट गो ऑन’ की तर्ज पर उनका काम चल रहा है। चलता रहेगा। इस सबके बाद अब आप ही बताइए कि अपना एमपी गज्जब है कि नहीं!
-डॉ. आर.के. पालीवाल
समाज सेवा, लेखन, पत्रकारिता, खेल, कला, विज्ञान और शिक्षा आदि क्षेत्रों में विशिष्ट सेवा के लिए सरकारों द्वारा पुरस्कार देना और सरकारों की जन विरोधी नीतियों से घोर असहमति के कारण विरोध स्वरूप पुरस्कार वापिस करना लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में बहुत पुरानी और स्वस्थ परंपरा है। यह सही है कि पुरस्कार लौटाने पर सरकार की किरकिरी जरूर होती है। लेकिन संवेदनशील सरकार वही है जो पुरस्कार लौटाने वाले विशिष्ट नागरिकों द्वारा पुरस्कार वापिस करने के कारणो पर गंभीरता से विचार कर उनके निवारण की कोशिश करे। वरिष्ठ गांधीवादी लेखक विष्णु प्रभाकर ने राष्ट्रपति भवन के समारोह में आमंत्रण के बावजूद उचित प्रोटोकॉल नहीं मिलने से पदम पुरस्कार वापस भेजा था। तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने विष्णु प्रभाकर से व्यक्तिगत रूप से संपर्क साधकर उन्हें ससम्मान राष्ट्रपति भवन आमंत्रित कर इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझा लिया था। यह विष्णु प्रभाकर जी की विनम्रता और अब्दुल कलाम साहब का बड़प्पन था जिसने अप्रिय स्थिति को पूरी संवेदनशीलता के साथ सहजता से संभाल लिया था।
इस तरह की स्थितियों सेे बचने के लिए पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय की संसदीय समिती ने यह सिफारिश की है कि पुरस्कार ग्रहण करने से पहले पुरस्कृत लोगों से यह लिखित में लेना चाहिए कि भविष्य में वे पुरस्कार नहीं लोटाएंगे। इसे और स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुरस्कार पाने वाले लोग भविष्य में सरकार की किसी नीति आदि के विरोध में पुरस्कार लौटाने का अधिकार खो देंगे। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो बहुत से आत्म सम्मानी विभूतियों के लिए पुरस्कार लेना सहज संभव नहीं होगा क्योंकि पुरस्कार के साथ इस तरह की शर्त बहुत से खुद्दार लेखकों और कलाकारों के लिए आहत करने वाली होगी।
ब्रिटिश सरकार द्वारा आजादी के आंदोलन में सरकारी दमन चक्र द्वारा सत्याग्रह को कुचलने पर भी कई प्रबुद्धजनों ने ब्रिटिश शासन द्वारा दिए गए पुरस्कार लौटाकर शासन की क्रूर नीतियों का विरोध किया था। इसी तरह आज़ादी के बाद भी ऐसे कई उदाहरण हैं जब सरकार की दमनकारी नीतियों के विरोध मे पुरस्कार वापसी हुई है। प्रतिष्ठित लेखकों और पत्रकारों की नृशंस हत्या के बाद सरकार द्वारा अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही नहीं होने पर कई लेखकों ने पुरस्कार वापिस किए थे। हाल ही में महिला पहलवानों के खिलाफ कथित यौन दुराचरण के आरोपी सासंद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होने पर खिलाडिय़ों द्वारा पुरस्कार वापिस किए जाने और उन्हें गंगा में प्रवाहित करने के प्रयास किए थे।
जब कोई पुरस्कृत व्यक्ति पुरस्कार वापिस करता है तब उसका यह कदम राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक चर्चा का विषय बनता है। ऐसे समय सरकार के खिलाफ जन आक्रोश भी उमड़ता है। इसीलिए संभवत: सरकार चाहेगी कि प्रतिष्ठित लेखकों, कलाकारों और खिलाडिय़ों आदि से यह अवसर छीन लिया जाए जो निश्चित रूप से उनकी व्यक्तिगत आजादी का हनन है। इसी परिप्रेक्ष्य में संसदीय समिती के इस प्रस्ताव का सबसे कड़ा विरोध वाम विचार धारा के लेखकों के संगठन जनवादी लेखक संघ की तरफ से आया है। यह सही भी है कि कोई आत्म सम्मानी व्यक्ति सशर्त पुरस्कार प्राप्त करने में अपनी प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगाना चाहेगा। दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि पुरस्कार पाने के लिए लालायित काफ़ी लोग इस शर्त को स्वीकार भी कर लेंगे। ऐसी स्थिति में बेहतर लोगों की जगह हल्के लोगों को पुरस्कार मिलने से पुरस्कारों की गरिमा का ह्रास होगा। पहले ही सरकारी पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पर काफी प्रश्नचिन्ह खड़े किए जाते रहे हैं। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाएगा तब सरकारी पुरस्कार बहुत हल्के हो जाएंगे।
डॉ. आर.के. पालीवाल
भाजपा में इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कद सबसे ऊंचे हैं। इसी हिसाब से घर-घर मोदी, मोदी है तो मुमकिन है और भाजपा कार्यकर्ताओं की भीड जगह-जगह मोदी मोदी चिल्लाती है। इंदिरा गांधी के समय में जिस तरह कांग्रेस का मतलब इंदिरा गांधी हो गया था वर्तमान भाजपा की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही हो गई है। जहां तक अमित शाह का प्रश्न है वे मोदी जी के बाल सखा की तरह हैं। जहां मोदी जी जन सभाओं का दायित्व संभालते हैं वहां अमित शाह चुनावी राज्यों में स्थानीय नेताओं को दिशा-निर्देश देते हैं। राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र के लिए भले ही ऐसी स्थिती उचित नहीं कही जा सकती लेकिन दल की विजय के लिए यह सैनिको के अनुशासन की तरह सफल साबित हो रहा है।
प्रधानमंत्री ने इधर कई बार भारतीय जनता पार्टी को विस्तारित करने के लिए पसमांदा मुस्लिम समाज को साथ जोडऩे का आव्हान किया है। कुछ समय पहले पांचजन्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरफ से भारतीय जनता पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए केवल प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और हिन्दुत्व के भरोसे नहीं रहने की सलाह दी गई थी। पांचजन्य की भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निर्भरता कम करने की सलाह मानना तो भाजपा के वर्तमान परिदृश्य में असंभव है लेकिन शायद हिंदुत्व के बाहर निकलकर पार्टी के विस्तार की सलाह मान ली गई है। पसमांदा मुस्लिम समाज मुस्लिम जमात का वह वर्ग है जिसमें बुनकर समाज के अंसारी आदि गरीब मुसलमान आते हैं। इनमें काफी बड़ी आबादी उस गरीब वर्ग की है जिसने इतर कारणों से धर्मांतरण कर मुस्लिम धर्म स्वीकार किया था लेकिन इसके बाद भी उनकी आर्थिक और सामाजिक हैसियत में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इस समाज की स्थिति आजादी के पहले भी खराब थी और आजादी के बाद भी उसमें ज्यादा परिर्वतन नहीं हुआ है। यही कारण है कि आजादी के आंदोलन के समय भी इस समाज के कई नेता मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ नहीं जुडक़र या तो आजादी के आंदोलन में कांग्रेस के साथ थे या अपनी अलग संस्था मोमिन कांफ्रेंस से संबद्ध थे।
उत्तरप्रदेश और बिहार में पसमांदा मुस्लिम समाज की काफी संख्या है। कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में उनका अच्छा खासा वोट बैंक है। उत्तर प्रदेश में यह वोट बैंक शुरूआती दौर में कांग्रेस के साथ हुआ करता था लेकिन कांग्रेस की स्थिती कमजोर पडऩे पर यह कभी समाजवादी पार्टी और कभी बहुजन समाज पार्टी की तरफ लुढक़ता रहा है। इसी तरह बिहार में कांग्रेस की कमजोरी के कारण यह समूह राष्ट्रीय जनता दल की तरफ आ गया था।
भारतीय जनता पार्टी से यह समूह अभी तक दूर रहा है। असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी एआई एम आई एम ने भी उत्तर भारत में इस वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की काफी कोशिश की है लेकिन उन्हें बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली। यह समाज किसी एक दल की बपौती नहीं बना है शायद इसीलिए प्रधानमंत्री की नजऱ इस वर्ग पर पड़ी है। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने 27 जुलाई से पसमांदा मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोडऩे के लिए स्नेह यात्रा अभियान शुरू किया है। यह यात्रा विशेष रूप से उन्हीं क्षेत्रों में होकर गुजरनी है जहां पसमांदा मुस्लिम समुदाय की अच्छी खासी संख्या है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय जनता पार्टी की स्नेह यात्रा में इस समाज के कितने लोग जुड़ेंगे। एक तरह से राम मंदिर के लिए रथ यात्रा से लेकर अब तक भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व के मुद्दे से बाहर निकलकर इस तरह का कोई विशेष अभियान उत्तर भारत में नहीं चलाया है जिससे उसका उदार और समावेशी चेहरा सामने आए। यदि यह बदलाव हाथी दांत की तरह दिखावा न होकर असली साबित हुआ तो निश्चित रूप से यह स्वागत योग्य कदम है।
प्रकाश दुबे
छलांग मारकर इस नतीजे पर पहुंचने से पहले, कि कार्यपालिका की बात न्यायपालिका को माननी पड़ी, उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश भूषण गवई क कथन याद करें। उलाहने से उभरे सवाल याद करें-1-क्या निदेशालय के बाकी अधिकारी अपने को अक्षम साबित होते महसूस नहीं करेंगे? 2- एक ही व्यक्ति के भरोसे काम चल रहा है? कल मैं यहां नहीं रहूंगा, तो देश की शीर्ष अदालत बैठ जाएगी? वरिष्ठता क्रम के मुताबिक न्यायमूर्ति गवई आगामी बरसों में देश के मुख्य न्यायाधीश पद के निर्विवाद दावेदार हैं। उनकी तीखी टिप्पणी के बावजूद संजय कुमार मिश्रा को 45 दिन तक प्रवर्तन निदेशालय का मुखिया बनाए रखने की मांग पर सरकार कायम रही। प्रधानमंत्री के दृढ़निश्चय, दूरदर्शिता तथा अर्जुन की तरह एक ही लक्ष्य पर आधारित संकल्प की जीत है। ईडी में संजय नज़रिए के रुतबे का संकेत तो है ही।
साहसी न्यायाधीश के तीखे बोल के बाद सर्वोच्च अदालत ने व्यापक जनहित में फैसले पर पुनर्विचार किया। बदल दिया। यह भी संकेत मिला कि इस्पाती ढांचा कहलाने वाली नौकरशाही अपनी दावेदारी और नियमों का हवाला देने में हिचकती है। हिचक के पीछे नैतिक कारण हैं, या भय? इस बहस से बचते हुए मूल मुद्दे पर विचार करें।श्री मिश्र1984 में राजस्व सेवा में आए। दो साल की नियुक्ति और सेवा विस्तारों को मिलाकर पांच बरस से आर्थिक मामलों की जांच और रोक के लिए बने प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक पद पर विराजमान हैं। केंद्र सरकार ने दलील दी कि अंतरराष्ट्रीय संगठन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की आगामी रणनीति में हिस्सेदारी के लिए देश को उनकी जरूरत है। अदालत ने मान लिया।
इन दिनों जी-20 का डंका बजता है। 1989 में विकासशील देशों के जी-7 की पेरिस में हुई बैठक में मनीलांडरिंग पर काबू पाने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स का गठन हुआ था। ट्विन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने विषय सूची में आतंकी गतिविधियों पर निगहबानी का मुद्दा जुड़वाया। साल भर के अंदर अप्रैल 1990 में आई एफएटीएफ की पहली रपट में 40 सिफारिशें की गई थीं। 2004 में विशेष तौर पर नौ और सिफारिशें जुड़ीं। भारत 2010 में पूर्णकालिक सदस्य बना। अब तक कितनी सिफारिशों पर भारत में अमल हुआ? सेवाविस्तार पाने में यशस्वी निदेशक से यह पूछना गलत लग सकता है। टास्क फोर्स की साल में तीन बैठकें होती हैं। फरवरी, जून और अक्टूबर। जून 2023 में बैठक हुई। आम नागरिक को जानकारी नहीं मिलती।
सुप्रीम कोर्ट को दस्तावेज खंगालते हुए पूछने का अधिकार है कि भारत के हिस्से में क्या आया? आतंकी गतिविधियों पर भारत सहित दुनिया के कई देशों की नजऱ है। तीन देश काली सूची में शामिल हैं। तीनों देशों से भारत के कूटनय संबंध है। इनमें म्यांमार शामिल है जिसका उल्लेख मणिपुर के संदर्भ में बार बार होता है। रक्षा मंत्री ने तीन दिन पहले पाकिस्तान को हडक़ाते हुए कहा-जरूरत पडऩे पर हमला किया जा सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान को एफएटीएफ ने काली सूची से हटा दया।
भारत ने सहमति कब और क्यों दी? निदेशक की उपलब्धियों में इस तथ्य को शामिल किया गया होगा। एफएटीएफ में पर्यवेक्षक हैसियत से शामिल इंटरपोल का भी भारत सदस्य है। दर्जनों खुफिया एजेंसियां हैं। वित्त मंत्री और दो राज्यमंत्रियों के अलावा वित्त सचिव स्तर के आधा दर्जन से अधिक अधिकारी हैं। उन्होंने पूछताछ की होगी। भारत ने बार बार पाकिस्तान को आतंकी देश कहा है। जनता को पता लगे कि किस विवशता में भारत ने फैसले का समर्थन किया? परिचित कराने का काम ईडी का है। 2014-15 से वर्ष 21-22 के बीचईडी की उपलब्धि है-888 मामले दर्ज किए गए। अनेक नामी गिरामी लोगों को घेरा। दबोचा। इनमें से मात्र 23 मामले ही दोषसिद्ध हो सके। ऐसा क्यों? आम नागरिक अदालत का मुंह ताके या ईडी से सवाल करे?
भ्रष्टाचार मुक्त भारत का प्रधानमंत्री का सपना लोगों को भाया। हालिया अदालती निर्णय से मिला संकेत उनके प्रशंसकों को पसंद नहीं आया होगा-140 करोड़ के देश के पास नौकरशाही के अदना से पुरजे का विकल्प नहीं है। न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने रायबरेली से इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया। इमरजेंसी लागू करने के अगले दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल की बैठक में नहीं पहुंचीं।
वरिष्ठतम मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने बैठक में कहा- इंदिराजी का कोई विकल्प नहीं है। पार्टी के अध्यक्ष भोले असमिया देबकांत बरुआ ने भक्तिभाव से इंदिरा इज इंडिया का नारा दिया। इंडिया शब्द को इन दिनों मुहाजदीन की कतार में बिठाया जा रहा है। इस पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी के प्रदेश में जन्मे संजय दृष्टि वाले ईडी विशेषज्ञ के प्रकरण से इंदिरा इज़ इंडिया नारा गंगा नहा गया। नारे को बुरा मानने वाले अब भी हैं। वे बुरा कहते रहेंगे।गलत नहीं कह सकते। संबंधित अधिकारी के लिए महा कृपा प्रसाद मिलने के बाद तो बिल्कुल नहीं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
देश के सबसे बड़े संयुक्त इंसानी उद्यम की यह भारत कथा है। देश का संविधान लगभग तीन सौ प्रतिनिधियों के तीन साल के लगातार परिश्रम का उत्पाद है। यह पहली और एकमात्र समावेशी राष्ट्रीय किताब है। आगे भी ऐसी किताब के लिखे जाने की संभावना नहीं दिखती। महान विचार के देश में सैकड़ों हजारों विश्वस्तरीय बुद्धिजीवी हुए हैं। उनके लिखे की रोशनी से दुनिया जगमग है। तब लेकिन देश में राजशाही रही है। कई नामचीन हस्ताक्षर राजदरबारों के आश्रय में रहे तो उनसे भी असाधारण कालजयी स्वतंत्र विचारक सूर्य की रोशनी की तरह जिज्ञासा और जिजीविशा के आकाश में सुरक्षित हैं। सदियों की राजनीतिक गुलामी के बाद देश 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ। लोकतांत्रिक सहकारी समाज को चलाने उसे संविधान लिखने की जरूरत महसूस हुई। अब संविधान ही केन्द्रीय किताब है, प्रतिनिधि है और प्रामाणिक है। उसके अनुसार ही देश को हर क्षण चलना है। राज्यसत्ता और नागरिक उसके संगत ही जिरह और बहस कर सकते हैं। उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
इक्कीसवीं सदी भारतीय राजनीति के लिए बेहद मुश्किल, परेशानदिमागी की भी है। राजनेता उन पूर्वजों के मुकाबले बौने और बंद दिमाग हैं जिन्होंने देश को आजाद करने अपना निजी और पारिवारिक जीवन बरबाद भी कर दिया। आज राजनीति नेताओं का अधिकारनामा हो गई है। सीढ़ी दर सीढ़ी सत्ता में पहुंचने वाले लोग नीचे गिर गए हैं कि संविधान तक को अपनी हिफाजत करने में तरह तरह की परेशानियां हो रही हैं। राजनीति ने सबसे अच्छे इंसानी मूल्यों को ही तहस-नहस कर दिया है। जनता किसी तरह संविधान के छाते के नीचे खड़ी होकर खुद को सुरक्षित करने के जतन कर रही है। राजनीतिक पार्टियां और हर तरह के नुमाइंदे सेवा, चरित्र और सभ्यता से महरूम होकर ऐसे करतब कर रहे हैं कि लोकतंत्र के भविष्य को ही दहशत हो रही होगी। इंसान की बुनियादी समस्याओं को हल करने के बदले गाल बजाते नेताओं की प्रतियोगिताएं लोग देख रहे हैं। शब्द अपने में गहरे अर्थ समेटे होते हैं। राजनेता अपने कर्तव्य से मुंह चुराकर बस शब्द का कचूमर निकाल रहे हैं। उससे कई तरह की विषमताएं और पेचीदगियां पैदा होती हैं।
फिलवक्त देश के केन्द्र में खुद को संसार की सबसे बड़ी पार्टी कहती दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है। उसके साथ दो तीन दर्जन छोटी मोटी पार्टियां अपने कारणों से गठबंधन में हैं। केन्द्र के निजाम से मुकाबला करने 26 राजनीतिक पार्टियों का जमावड़ा मैदान में एकजुट होकर आया है। सभी पार्टियां 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम को निर्णायक और मुकम्मिल तौर पर अपने पक्ष में कर लेना चाहती हैं। भाजपा की अगुवाई में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस, (राष्ट्रीय गणतांत्रिक गठबंधन) और कांग्रेस की अगुआई में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (अर्थात संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सत्ता में रहा है। कांग्रेसनीत गठबंधन के बदले कांग्रेस सहित 26 पार्टियों का नया गठबंधन ‘इंडिया’ नाम से सामने आया है। अंगरेजी के ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र। शब्द के पहले अक्षरों को मिलाकर ‘इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इंडियन एलायंस’ नामकरण हुआ है। इस चुनौती के कारण सुरक्षित लगते प्रधानमंत्री मोदी ने ‘इंडिया’ शब्द पर ही फिकरा कसा है। मानो दांत में कोई कंकड़ अटक रहा है। भारत पर कभी हुकूमत कर चुकी ईस्ट इंडिया कंपनी और राजनीतिक और आतंकी जमावड़ों जैसे इंडिया मुजाहिदीन के नामों वगैरह के संदर्भों में कटाक्ष करने की कोशिश की गई है। इंडिया नामधारी गठबंधन ने कटाक्ष की उपेक्षा करते कहा है कि हम अपनी राह चलें। हमें मालूम है कि हमारे नाम का अर्थ क्या है।
अंगरेज भारत पर हुकूमत गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के मुताबिक करते थे। तब ‘इंडिया’ शब्द की परिभाषा अंगरेजी में इस तरह थी"India means British India together with all territories of any Indian Ruler under the suzerainty of His Majesty, all territories under the suzerainty of such an Indian Ruler, the tribal areas, and any other territories, which His Majesty in Council may, from time to time, after ascertaining the views of the Federal Government and the Federal Legislature, declare to be part of India. Again, 'British India' was defined in the same clause as- "British India" means all territories for the time being comprised within the Governors' Provinces and the Chief Commissioners' Provinces.
रतीय संविधान के लिए कई समितियां और उपसमितियां बनाई गईं। उनकी अलग-अलग जिम्मेदारियां थीं। संविधान के अनुच्छेद 1 में भारतीय संघ का नाम और राज्यक्षेत्र का ब्यौरा विचारण में आया। संविधान की उद्देषिका में भी अंगरेजी में ‘इंडिया’और हिन्दी में भारत नाम का अनुवादित शब्द उपयोग में आया। नामकरण वाले अनुच्छेद के लिए डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में बनी प्रारूप समिति की सिफारिश रही कि उसे हिन्दी में लिखा जाए ‘इंडिया अर्थात भारत राज्यों का संघ होगा।’ उसे अंगरेजी में कहा गया ‘इंडिया दैट इज भारत।’ निर्दोष दिखने वाला यह वाक्य लंबी बहस के लिए संविधान सभा की तकरीर में आया। डॉ. अम्बेडकर ने 17 सितम्बर 1949 को अंतिम रूप से नाम को लेकर अपना प्रस्ताव रखा। अगले दिन 18 सितम्बर को उस पर बहस मुबाहिसा होकर नामकरण हो भी गया। बहस शुरू होते ही हरिविष्णु कामथ ने प्रस्ताव किया कि देश को ‘भारत अथवा अंग्रेजी भाषा मेंं इंडिया राज्यों का संघ होगा‘ कहा जाए या ‘हिंद अथवा अंग्रेजी में इण्डिया राज्यों का संघ होगा’ कहा जाए।
कामथ ने अलबत्ता कहा ‘‘भारत में नये गणराज्य को नवजात शिशु समझा जाए। परंपरा है नवजात शिशु का नाम रखा जाता है। जनता का विचार है कि उसका नाम भारत, हिन्दुस्तान, हिन्द, भरतभूमि, भारत वर्ष या ऐसा ही कुछ रखा जाए। ‘संविधान सभा देश के चुनिंदा लगभग 300 प्रतिनिधियों की उच्च अधिकारिता प्राप्त संस्था रही। उसे जातियों और लोगों में चल रही बहस वगैरह के आधार पर अधिकृत तौर पर सुझाव लेने की जरूरत नहीं रही है। इस संबंध में इतिहास में भारत नाम को उल्लेखित करते हरिविष्णु कामथ को भारसाधक सदस्य डॉ. अम्बेडकर ने एक तरह से झिडक़ा। कहा ‘‘क्या इन सब बातों की खोज करना जरूरी है? मैं समझ नहीं पाता कि इसका क्या मकसद है। भले ही वह किसी अन्य संदर्भ में रुचिकर हो सकता है। मुझे तो लगता है कि भारत नाम का शब्द विकल्प के बतौर रखा गया है। ‘कामथ ने उलट जवाब दिया ’1937 में आयरलैन्ड के पारित आयरलैन्ड के संविधान के नामकरण का अनुच्छेद कहता है- ‘राज्य का नाम आयर अथवा अंगरेजी भाषा में आयरलैंड है।’ इस तरह का आंकलन हम क्यों नहीं कर सकते? वैसे भी उदाहरण के लिए जर्मनी के लोग हमारे देश को इंडियेन कहते हैं और यूरोप के कई देश अब भी हिन्दुस्तान कहते हैं। इंडिया अर्थात भारत एक भद्दी पदावली है।
मैं नहीं समझ पाता हूं कि मसौदा समिति ने ऐसी रचना क्यों की। यह तो मुझे एक संवैधानिक भूल दिखाई देती है।
ऐसे राष्ट्रधर्मी मौके को आदत के अनुरूप हिन्दी के बड़े योद्धा सेठ गोविन्ददास ने लपका। उन्होंने संवैधानिक जिरह के बदले इतिहास में डूबकर भारत शब्द की महिमा बताने से परहेज नहीं किया। कह दिया कि कुछ लोगों को भ्रम हो गया है कि इंडिया इस देश का सबसे पुराना नाम है, जबकि यह गलत है। सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने तुनककर कहा ‘यह किसने कहा कि इंडिया सबसे पुराना नाम है?’ गोविन्ददास ने कहा कि एक पर्चा निकला है जिसमें यही सिद्ध करने की कोशिश की गई है। महावीर त्यागी ने टोका क्या इंडिया शब्द अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का है? तो गोविन्ददास ने कहा ‘‘यह यूनानियों के कारण है। वे जब भारत आए तो सिंधु नदी की सरहद पर उन्होंने उसका नाम इंडस रखा और सिंधु के पार के क्षेत्र को इंडिया कहा। उन्होंने बताया यह बात एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका में भी लिखी है। चीनी यात्री हुएनत्सांग ने भी भारत विवरण में भारत शब्द लिखा है। ‘सिकंदर तो ईसा मसीह के तीन सौ बरस पहले आया था। वह भारत फतह तो नहीं कर पाया लेकिन यूनानियों के शब्द-उच्चारण ने भारत का ‘इंडिया’ नामकरण कर दिया। ऐसा लोग मानते हैं। विवेकानन्द ने भी इस थ्योरी का समर्थन किया है। राष्ट्रभक्ति में उन्मादित होकर गोविन्ददास बोलने लगे ‘हमें अपने देष के इतिहास और संस्कृति के अनुरूप ही देश का नाम रखना चाहिए। आजादी की लड़ाई महात्मा गांधी की अगुआई में हमने लड़ी। तब भी हमने भारत माता की जय के नारे लगाए थे। ‘वैसे यह बात अलग है कि महात्मा गांधी ने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान जैसे शब्दों का ठीक ठीक और सार्थक संदर्भो में इस्तेमाल किया है। गांधी तो भारत शब्द का इस्तेमाल कभी-कभार करते थे। हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, हिन्दुस्तानी सभा, हिन्दुस्तान सेवादल, हिन्दुस्तानी तमिल संघ, हिन्दुस्तान मजदूर सेवक संघ वगैरह गांधी से जुड़ते हैं। गोविन्ददास ने दार्शनिक अंदाज में कहा ‘मुझे विश्वास है जब हमारा संविधान हमारी राष्ट्रभाषा में बनेगा, उस समय यही भारत नाम यथार्थ स्थान प्राप्त करेगा।‘ संविधान में लेकिन राष्ट्रभाषा का जन्म तक नहीं हो पाया।
मद्रास के प्रतिनिधि कल्लूरी सुब्बाराव भारत शब्द विवाद को लेकर ऋग्वेद तक पहुंचे। उन्होंने माना कि यूनानियों के कारण सिंधु को इंडस कहा गया। इसलिए यह भी कहा हम अब पाकिस्तान को हिन्दुस्तान कह सकते हैं क्योंकि सिंधु नदी तो अब वहां पर है। अम्बेडकर ऐसी बहस से बार-बार उकता रहे थे। उन्होंने कहा अभी तक तय नहीं हुआ है कि देश का नाम क्या हो। पहली बार यहां वाद-विवाद हो रहा है। देशी राज्यों के प्रतिनिधि रामसहाय ने कहा हमारे ग्वालियर, इंदौर और मालवा की तमाम रियासतों ने मिलाकर अप्रेल 1948 में अपनी यूनियन का नाम मध्यभारत रख लिया है। खुशी की बात है कि पूरे देश का नाम भारत रखा जा रहा है। फिर वे भी इतिहास की परतें खोलने लगे और खासतौर पर धार्मिक किताबों की। जाहिर है वहां बार-बार भारत शब्द का इस्तेमाल अलग संदर्भ में हुआ है। संविधान सभा में कई कांग्रेसी सदस्य अपने बोलचाल, डीलडौल और पोषाक को लेकर पांडित्यपूर्ण लगते रहे। उनमें कमलापति त्रिपाठी भी हैं। उन्होंने तर्क किया ‘जब कोई देश पराधीन होता है। तब वह अपना सब कुछ खो देता है। एक हजार वर्ष की पराधीनता में भारत ने भी संस्कृति, इतिहास, सम्मान, मनुष्यता, गौरव, आत्मा और शायद अपना स्वरूप और नाम भी खो दिया है। आजाद होने के कारण यह देश यह सब हासिल करेगा।’ उन्होंने कई उल्लेख वेदों, उपनिषदों, कृष्ण और राम के संदर्भ में भी किए जिनका संविधान की जिरह से लेना देना भले ना रहा हो, लेकिन एक राष्ट्रवादी माहौल तैयार करने में ऐसे नामों और विशेषणों का उल्लेख करने की परंपरा विकसित होती रही है। अम्बेडकर फिर झल्लाए और उन्होंने पूछा कि क्या यह सब कहना जरूरी है? उत्तरप्रदेश के हरगोविन्द पंत ने सबसे ज्यादा सपाट और सीधी बात की। उन्होंने भारत षब्द को विकल्पहीन कहते सलाह दी कि क्यों नहीं इस देश के नाम के लिए भारत षब्द को ही ग्रहण कर लिया जाता। उन्होंने कहा इंडिया नाम के शब्द से न जाने क्यों हमारी ममता हो गई है। यह नाम तो हमें विदेशियों ने दिया है। वे हमारे देश का वैभव सुनकर हम पर हमला करने आए थे। विदेशियों ने यह नाम हमारे ऊपर थोपा है।
संविधान सभा में नाम को लेकर खासा विवाद हुआ है। अब दिखता है कि उस वक्त के कद्दावर काठी के नेता नामकरण विवाद से खुद को अलग रख चुके थे। बहस में जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, के. एम. मुंशी, अलादि कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आयंगर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मौलाना आजाद, जगजीवन राम, पुरुषोत्तमदास टंडन, गोविन्द वल्लभ पंत वगैरह की कोई भूमिका नहीं रही। बी. एम. गुप्ते ने द्विअर्थी बात कह दी कि मैं भारत नाम का तो समर्थन करता हूं लेकिन उसे स्वीकार करने से तमाम तरह की पेचीदगियां और विषममताएं भी पैदा होंगी। डॉ. अम्बेडकर ने फिर स्पष्ट किया कि सरकारी प्रस्ताव यही है कि देश का नाम इंडिया अर्थात भारत होगा। भारत शब्द को इंडिया के साथ संलग्न कर रखा जाए अथवा नहीं? उसके बरक्स प्रस्ताव से अलग जाकर भारत शब्द की शाब्दिक, फलित, ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक महत्ताओं पर विस्तृत शोध की जरूरत नहीं है।
संविधान सभा में एक बात खास रही। वह अब भी भारतीय राजनीति में मुख्य है। कैसी भी तकरीर हो। उसे सत्ताधारी दल खारिज करना चाहता है, तो उसमें कोई रोक टोक नहीं है। अम्बेडकर गैरकांग्रेसी सदस्य थे। मुख्यत: गांधीजी की सलाह के कारण नेहरू और पटेल ने उन्हें न केवल निर्वाचित किया बल्कि सबसे महत्वपूर्ण प्रारूप समिति का अध्यक्ष भी बनाया। अम्बेडकर उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। उन्होंंने संविधान को मुकम्मिल तौर पर बनाने के लिए बहुत परिश्रम किया है। कुछ महत्वपूर्ण सदस्यों की राय से अम्बेडकर का इत्तफाक नहीं होता था। उन्होंने अमूमन ऐसे प्रस्तावों को नेहरू के कारण कांग्रेसी बहुमत उपलब्ध होने से बार-बार खारिज कराया। उसका खमियाजा देश आज भुगत रहा है। इन विपरीत हालातों में भी समाजवादी तेवर के हरिविष्णु कामथ ने मत विभाजन की मांग की। अन्यथा प्रस्ताव मौखिक रूप से ही खारिज हो जाता। ऐसा राज्यसभा के मौजूदा उपसभापति हरिवंष ने लगभग पराजित होते एक सरकारी प्रस्ताव को ध्वनि मत से पारित करने का ऐलान तो किया है। उससे देश की राजनीति में भूचाल आ गया। कामथ का प्रस्ताव संविधान सभा की कार्यवाही में किसी गैर सरकारी प्रस्ताव में सबसे अधिक समर्थन जुटा पाया। वह 38 के मुकाबले 51 मतों से खारिज किया गया।
उल्लेखनीय है कि उपेन्द्रनाथ बर्मन नाम के सदस्य ने संविधान की उद्देशिका पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जरूर कहा था कि संविधान के पूरे ड्राफ्ट में जहां जहां इंडिया शब्द आया है। वहां-वहां उसको हटाकर भारत वर्ष लिखा जाए। हालंाकि यह बात नहीं मानी गई। यह भी है कि नामकरण संबंधी मूल प्रस्ताव जब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा की बहस के लिए 15 नवंबर 1948 को पेश किया था। तब सबसे पहले अनंत शयनम आयंगर ने कहा था कि इंडिया के बदले भारत, भारत वर्ष या हिन्दुस्तान शब्द रखा जाए। लेकिन संविधान सभा में अंतिम बहस होने के दिन आयंगर बिल्कुल नहीं बोले।
संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नामकरण संवाद को लेकर चुप्पी साधे रहे। लेकिन पंचायती राज को लेकर उन्होंने अध्यक्ष की हैसियत में संविधान सभा के सलाहकार बी.एन. राव को आग्रह का पत्र तो लिखा था। लोकतंत्र में एक विशेष लक्षण कई बार मुनासिब फैसले करने से रोक देता है। वह है बहुमत का सिद्धांत। अम्बेडकर को इसका बहुत फायदा मिला। उन्होंने अपने आखिरी भाषण में 25 नवंबर 1949 को कहा था कि कांग्रेसी सदस्यों के बहुमत के कारण वे असुविधाजनक स्थिति में नहीं होते थे क्योंकि बहुमत उनके साथ होता था। नामकरण विषय भी 15 नवंबर 1948 को विचारण में आया। तब गोविन्दवल्लभ पंत ने उस पर वाद-विवाद को मुल्तवी करने का आग्रह किया जिससे सदस्य एक राय हो सकें। लेकिन हुआ कहां। 18 सितंबर 1949 को एक राय होने के बदले मत विभाजन में अम्बेडकर के प्रस्ताव के ही खिलाफ काफी वोट पड़े। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 545 के सदन में करीब 415 सदस्यों का समर्थन था। फिर भी उन्होंने कई प्रस्तावों मसलन दलबदल विरोधी विधेयक तक को सर्वसम्मति से पास कराया। लोकतंत्र में बहुमत कई बार नैतिक मूल्यों को पराजित भी करता है। इस जुगत में तो नरेन्द्र मोदी माहिर हैं। कई बार उनका साथ सुप्रीम कोर्ट भी देता है। दोनों स्थितियों में लोकतंत्र की पराजय होती है। नरेन्द्र मोदी तो संवैधानिक संस्थाओं की ही पराजय कर रहे हैं। उनके लिए संसद खुशामदखोरी का जमावड़ा हो जाए। तो वे भारत के इतिहास में अमर हो जाएंगे। इंडिया षब्द के मौजूदा विपक्षी पार्टियों के साथ जुडऩे का एक पक्ष और है। संविधान के अनुच्छेद 51 क से सभी राजनीतिक दल सहमत हैं। इसके बरक्स भाजपा संघ और समर्थक जमावड़े को भारत की सामासिक संस्कृति, सर्वधर्म समभाव और वैज्ञानिक भाव बोध से गहरा परहेज है। अंगरेजी का इंडिया षब्द अपनाने से दक्षिण भारत के अहिन्दी भाषी राज्यों में विपक्षी पार्टियों को समर्थन मिलने की बेहतर उम्मीद होगी। यह भी संघ भाजपा युति को तकलीफदेह अनुभव हो रहा होगा क्योंकि दक्षिण में उनकी पैठ नहीं बन पाती है।
प्राण चड्ढा
इस प्रसिद्ध कहावत के समान छतीसगढ़ में टाइगर सम्वर्धन अब शुरू है।अचानकमार टाइगर रिजर्व यह टाइगर के लिए चीतलों की संख्या नाकाफी है इसलिए राजधानी रायपुर की टाइगर सफारी से 150 चीतलों को लाया जा रहा है। इससे यहां के टाइगर किसी दूसरे पार्क को खुराक की कमी से शिफ्ट नहीं हो जाएं। वहीं अचानकमार टाइगर रिजर्व के लिए महाराष्ट्र और मप्र से एक टाइगर और दो टाइग्रेस को लाने की अनुमति मिल गयी है। वो भी निकट भविष्य में पहुंच सकते हैं। यहां पहले चीतल कम है और टाइगर ला रहे हैं। यह पता किये बिना की चीतल कम क्यों हुए और उनके कारणों के निराकरण किये बगैर,यह फैसला अदूरदर्शिता पूर्ण है।
‘अब तक करोड़ो की राशि हर बरस व्यय और तमाम कोशिशों के बावजूद छतीसगढ़ में टाइगर संरक्षण और संवर्धन का काम पटरी पर नहीं आ सका है। छतीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व में सबसे प्रबल सम्भावनाये हैं। पर इसके लिए दूरगामी सोच का अभाव छलक रहा है। यहां बाइसन की संख्या काफी बढ़ गयी हैं। टाइगर 6 से 8 होने की सम्भावना है,लेकिन उनके लिए प्री-बेस को बढ़ाने कोई प्रयास नहीं किया गया है। पहले यहां बिलासपुर के कानन पेंडारी से चीतल ले जाकर छोड़े जाते थे। टाइगर खुराक की कमी के कारण पार्क से विमुख न हो जाये इसलिए रायपुर की टाइगर सफारी से 150 चीतल लाने की योजना पर काम चल रहा है।
एटीआई में प्रवासी टाइगर और टाइग्रेस भी हैं। बांधवगढ़ की एक टाइग्रेस और कान्हा नेशनल पार्क के एक टाइगर की पहचान कुछ समय पूर्व हुई है। यहां टाइग्रेस की संख्या टाइगर से अधिक है जिससे अधिक शावक होने की आशा है। अर्थात जल्दी यहां टाइगर बढ़ सकते हैं।एक टाइगर के एरिया में दो या तीन टाइग्रेस रह सकती हैं लेकिन दूसरा प्रतिद्वंदी टाइगर नहीं।
अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) में सैलानियों को जिप्सी सफारी के दौरान टाइगर दिखाई जिस दिन दिखता है तो वह उनके लिए जश्न का दिन हो जाता है। मगर टाइगर दर्शन का संयोग का माह में एक बार का भी औसत नहीं है। लेकिन विभिन्न जगह में लगाए गए कैमरों में टाइगर कैप्चर होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
एटीआर का टाइगर यहां चीतल का शिकार कम ही करता है। गाँव वालों के मवेशी जो जंगल में घूमते हैं वह टाइगर की खुराक बन जाते हैं क्योकि वो चीतल से टाइगर के लिए आसान शिकार जो होते हैं। चीतल भी यहां जंगल में कम हैं जो कोर ज़ोन की बसाहट के आसपास छोटे झुंड में दिखते हैं। कुल मिलाकर अब जितने टाइगर बताते जा रहे हैं उनके अनुपात में कान्हा या बांधवगढ़ से बहुत कम हैं।
अचानकमार अभ्यारण्य की स्थापना 1975 में हुई बाद यह टाइगर रिजर्व बन गया परन्तु आज तक इसमें कोर एरिया में बसे 19 गांव की आबादी और उनके मवेशियों के दबाव बना है। इन गांव वाले में कई के पास तीर कमान है, और कुत्ते भी हैं जिनसे चीतलों पर शिकार का खतरा मंडराते रहता है। एक जोड़ा कुत्ता भी चीतल का शिकार कर सकता है।अब वह समय है पार्क एरिया से आबादी को हटाया जाए जिसके पहले चरण के उनके कुत्ते और तीर कमान पर जंगल मे प्रवेश पर रोक लगनी होगी। इसके लिए दमदार निर्णय लेने की जरूरत है।
पार्क में गर्मी के दिनों पानी के कमी नहीं होय और चीतल की कमी दूर लिए हरे चारा के बड़े मैदान विकसित करने होंगे जिसके लिए जलदा,सिहावल और बाहुड़ के मैदान, चारागाह बन सकते हैं। जिस पर कोई काम नहीं किया जाता। जिस वजह ही रायपुर के टाइगर सफारी और पहले बिलासपुर के चिडिय़ा घर से चीतल छोड़े जाते रहे है। निश्चित ही अगर चीतल बढ़ा गए तब प्रवासी टाइगर यहां के रहवासी टाइगर का स्थायी बसेरा एटीआर बन जायेगा।
अर्जुन ठाकुर
पहाड़ी इलाके दिखने में जितने खूबसूरत होते हैं, उनमें खतरा भी उतना ही अधिक होता है। यह वह क्षेत्र होते हैं जो सबसे अधिक भूकंप प्रभावित होते हैं। फिर चाहे वह उत्तराखंड का इलाका हो या फिर धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला जम्मू-कश्मीर का क्षेत्र हो। जम्मू कश्मीर का पहाड़ी क्षेत्र बादल फटने या चट्टानों के खिसकने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ साथ भूकंप के लिए भी अति संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। 8 अक्टूबर 2005 को जम्मू कश्मीर में आया 7.6 तीव्रता वाला भूकंप आज भी लोगों को भयभीत कर देने वाली तस्वीरों की याद दिला देता है। जिसमें 1350 लोगों ने अपनी जानें गवाई थी और बड़े पैमाने पर निजी व सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ था। हाल के दिनों में आए भूकंप के कुछ झटकों ने जहां लोगों को फिर से डरा दिया है वहीं यह भू वैज्ञानिकों के लिए भी किसी चेतावनी की तरह है।
इसी वर्ष अप्रैल में जम्मू कश्मीर से प्रकाशित एक प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र ने संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित कोलोराडो विश्वविद्यालय में भूकंप विज्ञानी और भूविज्ञान के प्रोफेसर रोजर बिल्हम द्वारा इस क्षेत्र में किये गए एक अध्ययन के हवाले से कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्रकाशित की हैं। जिसमें प्रोफेसर बिल्हम ने चेतावनी दी है कि 9 तीव्रता वाले एक बड़े भूकंप से जम्मू कश्मीर में भूस्खलन और बाद में बड़ी तबाही होने की संभावना हो सकती है। इन संवेदनशील क्षेत्रों में विशेषकर पीर पंजाल और चिनाब घाटी प्रमुख है। हाल के दिनों में जिला डोडा, किश्तवाड़ और रामबन में भूकंपों का सिलसिला भी देखने में आया है। वैज्ञानिक तौर पर भी जिला डोडा भूकंप के मामलों में सबसे नाजुक क्षेत्रों में एक चिन्हित किया गया है। जहां अक्सर कम तीव्रता वाले भूकंपओं का सिलसिला लगातार कई वर्षों से जारी है। इसके बावजूद भी इस जिला में बिना शोध और इंजीनियर की सलाह के बड़े-बड़े मकानों का बनना जारी है। घर बनाने से पहले किसी भी प्रकार से जमीन की जांच नहीं की जा रही है। जिसके कारण आने वाले समय में चिनाब घाटी विशेषकर जिला डोडा के इलाकों में भयानक तबाही की आशंका व्यक्त की जा रही है।
इसकी छोटी सी मिसाल हमें पिछले दिनों देखने को मिली, जब डोडा के तहसील ठाठरी के पहाड़ी बस्ती क्षेत्र में कई घरों में बड़ी-बड़ी दरारें आई जिससे स्थानीय लोगों में दहशत फैल गई। वहीं कुछ दिनों पहले ही जिला डोडा के ही तहसील भलेसा स्थित शिनू इलाके की एक पूरी बस्ती के करीब 15 से 16 मकानों में दरारें देखी गई हैं। जिसके बाद जिला प्रशासन ने खुद इस क्षेत्र का दौरा किया और सभी घरों को असुरक्षित घोषित कर दिया। इस प्रकार की तबाही भलेसा के किलोहतरान, काहाल जुगासर व कई अन्य क्षेत्रों में भी हुई है। यह घर अब बिल्कुल भी रहने काबिल नहीं हैं। 13 जुलाई को आए भूकंप के दौरान भलेसा स्थित पंचायत हिलुर कुंतवाडा के सरपंच के अनुसार इस पंचायत के 21 घरों में दरारें आ गई हैं। गनीमत यह रही कि किसी तरह के जानमाल का नुकसान नहीं हुआ है।
विशेषज्ञों की चेतावनी है कि डोडा, कुलगाम, पीर पंजाल के कई इलाके आने वाले समय में भूकंप के कारण तबाह हो सकते हैं। चिनाब घाटी के किश्तवाड़ में ‘ढूल हस्ती’ और रामबन में ‘बगलिहार’ जैसे कई छोटे बड़े बांध हैं जो इस भूकंप की चपेट में आ सकते हैं। कई विशेषज्ञ तो यह भी कहते हैं कि इन बांधों के बनने के कारण ही चिनाब घाटी में भूकंपों के सिलसिले तेज हुए हैं क्योंकि बांधों को बनाते समय मिट्टी का कटाव और पानी के बहाव को एकदम से रोकना भी इसका एक बड़ा कारण है। प्रोफेसर रोजर बिल्हम के अनुसार यदि भविष्य में इस क्षेत्र में 9 तीव्रता वाले भूकंप आते हैं तो झेलम नदी भूस्खलन के कारण बंद हो जाएगी। यदि ऐसा होता तो 3 महीने के भीतर कश्मीर घाटी पानी में डूब सकती है। प्रोफेसर बिल्हम के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) डेटा रीडिंग से पता चलता है कि कश्मीर घाटी के उत्तर में जंस्कार पर्वतों में चट्टानों की क्रमिक गति अधिक बढ़ी है। इसका अर्थ यह है कि भूकंप के कारण आने वाले समय में ऐसे क्षेत्रों की फटने की संभावनाएं अधिक हैं और यह क्षेत्र लगभग 200 किलोमीटर चौड़ा हो सकता है। इस क्षेत्र में श्रीनगर शहर सहित कश्मीर घाटी के कई क्षेत्र शामिल हैं जहां करीब 1।5 मिलियन लोग रहते हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर भविष्य में ऐसा हुआ तो जम्मू कश्मीर विशेषकर चिनाब घाटी और कश्मीर घाटी के लगभग 3 लाख लोग अपनी जानें गंवा सकते हैं।
डोडा जिला के (भलेसा) स्थित नीली के रहने वाले अयूब जरगर, जो उच्च शिक्षा विभाग में काम करते हैं, उनका कहना है कि हिमालय का पश्चिमी भाग जिसमें जम्मू और कश्मीर शामिल है, भूंकप जोन 5 के अंतर्गत आता है। जिसे सबसे खतरनाक और भूकंप संभावित क्षेत्र माना जाता है। ऐसा कहा गया है कि सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों के कारण इन क्षेत्रों में मध्यम से उच्च तीव्रता वाले भूकंप किसी भी समय आ सकते हैं। जिसे हाल के दिनों में अनुभव भी किया गया है। अयूब जऱगर कहते हैं कि लोगों और प्रशासन को एहतियाती कदम उठाने और हर समय सतर्क रहने की जरूरत है। जिन भवनों की क्षति हुई है इसके पीछे का कारणों को समझना होगा। भूकंप रोधी भवनों का निर्माण समय की मांग है ताकि बड़ी क्षति को रोका जा सके। निवारक उपायों के लिए जागरूकता फैलाई जानी चाहिए और अधिक निवारक उपायों का पता लगाने के लिए क्षेत्र में विशेषज्ञों की टीम को तैनात किया जाना चाहिए। जिन लोगों के घर भूकंप के दौरान क्षतिग्रस्त हो गए थे, उनके लिए भूकंप रहित मकानों को बनाने की आवश्यकता है। नए इमारतों का निर्माण इस प्रकार करने चाहिए, जिससे भूकंप के दौरान कम से कम नुकसान हो।
डोडा जिले के ही रहने वाले भूगोल के जानकार प्रदीप कोतवाल कहते हैं कि हमें यह समझने की आवश्यकता है कि इमारतों को होने वाले नुकसान की सीमा न केवल भूकंप की तीव्रता पर निर्भर करती है बल्कि निर्माण के प्रकार पर भी निर्भर करती है। प्राय: यह देखा गया है कि कश्मीर में सदियों पुराने बने विशेष आकार वाले मकान आज भी सुरक्षित खड़े हैं। लकड़ी से बने मकान लचीले होने के कारण काफी बड़ी त्रासदी से बचाने में सहायक रहे हैं। परंतु आज आधुनिकता शैली में जीने के कारण इस प्रकार के मकानों का प्रचलन खत्म होता जा रहा है।जिससे भविष्य में माली नुकसान के साथ जानी नुकसान भी अधिक हो सकता है। सुरक्षित भवन निर्माण के लिए इंजीनियरों का सुझाव सबसे अधिक जरूरी हो जाता है। क्या वह जमीन घर बनाने लायक है? क्या वह घर पुरानी पद्धति के अनुसार बनाया जा रहा है या किसी नवीनतम शहरी डिज़ाइन के अनुसार बनाया जा रहा है?
इस वक्त करीब 60 लाख लोग जम्मू कश्मीर में हाई रिस्क जोन में रहते हैं। जिससे काफी बड़ा विनाश देखने को मिल सकता है। ऐसे में सरकार को इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि इन हाई रिस्क जोन के अंदर किस प्रकार के मकानों को बनाने की अनुमति दी जाए? जबकि सरकारी कोष व सरकारी मदद से बनने वाले मकानों को भी ऐसे स्थानों पर बनाया जा रहा है, जो कभी भी भूकंप के कारण ताश के पत्तों की तरह ढह सकते हैं, जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत बनाये जा रहे घर भी शामिल हैं सवाल यह उठता है कि क्या हम इतनी बड़ी तबाही को रोकने के लिए कोई नई भवन प्रणाली को सामने नहीं ला सकते हैं जिससे भविष्य में एक बड़ी त्रासदी को समय पूर्व रोका जा सके?
उम्मीद है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन मौके की नज़ाकत को समझते हुए इस दिशा में गंभीरता से काम करेगी ताकि भविष्य में होने वाली किसी भी बड़ी त्रासदी को पहले से रोका जा सके। (चरखा फीचर)
आम तौर पर अधिक वजऩ (ओवरवेट) होना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। यहां तक कि चिकित्सक भी स्वस्थ रहने के लिए वजऩ कम करने की सलाह देते हैं। लेकिन एक हालिया अध्ययन में ओवरवेट के रूप में वर्गीकृत लोगों की मृत्यु दर तथाकथित ‘आदर्श वजऩ’ वाले लोगों की तुलना में थोड़ी कम पाई गई है। इन लोगों का वजऩ अधिक ज़रूर था लेकिन ये मोटे (ओबेस) नहीं थे।
इस बात को लेकर तो कोई विवाद नहीं है कि वजऩ बहुत अधिक हो तो सेहत के लिए हानिकारक होता है। लेकिन उपरोक्त अध्ययन से लगता है कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि स्वास्थ्य जोखिम कितने वजन के बाद शुरू होते हैं।
आदर्श वजऩ पता करने के लिए बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) देखा जाता है। बीएमआई की गणना वजऩ (किलोग्राम में) को ऊंचाई (मीटर में) के वर्ग से भाग देकर की जाती है। अधिकांश देशों में 18.5 से 24.9 के बीच के बीएमआई को स्वस्थ माना जाता है; 25 से 29.9 को ओवरवेट और 30 से अधिक को मोटापा ग्रसित की श्रेणी में रखा जाता है। 1997 में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में इनके उल्लेख के बाद तो इन सीमाओं को लगभग पूरी दुनिया में मान्यता मिल गई।
फिर कुछ अध्ययनों से पता चला था कि 25 से ऊपर बीएमआई वाले लोगों की मृत्यु दर दुबले-पतले लोगों से कम है। लेकिन ये अध्ययन काफी पुराने हैं जब लोग आज की तुलना में दुबले हुआ करते थे। इन अध्ययनों के सहभागियों में जनजातीय विविधता भी नहीं थी।
इस मुद्दे को समझने के लिए रटगर्स इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आयुष विसारिया और उनके सहयोगियों ने 1999 में शुरू हुए एक अध्ययन का विश्लेषण किया जिसमें 20 वर्ष तक 5 लाख जनजातीय रूप से विविध अमेरिकी वयस्कों के जीवन को ट्रैक किया गया था। इन लोगों का वजऩ और लंबाई ज्ञात थे। इस विश्लेषण में 22.5 से 24.9 बीएमआई के स्वस्थ बीएमआई वाले लोगों की तुलना में 25 से 27.4 बीएमआई वाले लोगों में मृत्यु का जोखिम 5 प्रतिशत कम पाया गया। इसके अलावा 27.5 से 29.9 बीएमआई वाले लोगों में मृत्यु का जोखिम 7 प्रतिशत कम पाया गया। ये निष्कर्ष वर्तमान बीएमआई की सीमाओं से काफी अलग प्रतीत होते हैं।
फिर भी शोधकर्ताओं के अनुसार इस आधार पर कोई भी निष्कर्ष निकालना थोड़ी जल्दबाजी होगी। यह कहना ठीक नहीं होगा कि वर्तमान में अधिक वजऩ के रूप में वर्गीकृत बीएमआई वर्तमान स्वस्थ श्रेणी से बेहतर है। आम तौर पर इस तरह के जनसंख्या अध्ययन में पूर्वाग्रह हो सकते हैं जिससे परिणामों में विसंगतियां हो सकती हैं। मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि अकेले बीएमआई मृत्यु के जोखिम का द्योतक नहीं है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन बीएमआई के साथ कमर की माप और अन्य कारकों को भी ध्यान में रखने की सलाह देता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार बीएमआई को आबादी के स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए बनाया गया था। इसका उपयोग व्यक्तियों को स्वास्थ्य सलाह देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
भारत के सिनेमा घरों में 22 जुलाई को रिलीज हुई क्रिस्टोफर नोलन फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ रिलीज होने के चौबीस घंटों के भीतर विवादों में गिर गई है।
फिल्म के एक दृश्य में मुख्य कलाकार ‘सेक्स सीन’ के दौरान संस्कृत में लिखा एक वाक्य पढ़ते हैं। इस सीन को लेकर भारतीय सोशल मीडिया में चर्चा हो रही है।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने फिल्म देखने वालों के हवाले से दावा किया है कि ये पंक्तियां हिंदुओं की पवित्र मानी जाने वाली भगवद् गीता से हैं। उनका कहना है कि फिल्म से इस सीन को हटाया जाए।
180 मिनट की ये फि़ल्म दुनिया का पहला एटम बम बनाने वाले वैज्ञानिक जे। रॉबर्ट ओपेनहाइमर की कहानी पर आधारित है।
शुक्रवार को रिलीज हुई इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस में अच्छे रिव्यू मिले हैं। फिल्म कारोबार पर नजर रखने वालों के मुताबिक ये फिल्म पहले दो दिन में 30 करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है।
विवादित सीन और विरोध
फिल्म के एक सीन में ओपेनहाइमर का किरदार निभाने वाले सिलियन मर्फी मानसिक रोग विशेषज्ञ जीन टैटलर (फ्लोरेंस पुग) के साथ दिखते हैं। इस सेक्स सीन में जीन एक किताब उठाती हैं और ओपेनहाइमर से पूछती हैं कि ये कौन सी भाषा में लिखा है।
वो ओपेनहाइमर से किताब का एक पन्ना पढऩे को कहती हैं। जीन के कहने पर ओपेनहाइमर पढ़ते हैं- ‘मैं अब काल हूं जो लोकों (दुनिया) का नाश करता हूं।’
सीन में ये नहीं दिखता कि जीन ने जो किताब हाथों में ली है उसका नाम क्या है लेकिन उसके पन्ने पर जो दिखता है वो संस्कृत जैसा कुछ दिखता है।
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों का दावा है कि ये पंक्तियां भगवद् गीता से हैं।
भारत सरकार के इंफॉर्मेशन कमिश्नर उदय माहुरकर ने फिल्म के निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन के नाम एक खुला खत लिख कर अपना विरोध जताया है। महुरकर ‘सेव कल्चर सेव इंडिया फाउंडेशन' के संस्थापक भी हैं।
उन्होंने फि़ल्म के विवादित सीन को ‘हिदुत्व पर हमला’ कहा है और कहा है कि नोलन इस सीन को हटाएं।
उन्होंने लिखा, ‘लाखों हिंदुओं और पवित्र गीता से जीवन में बदलाव लाने वालों की तरफ से गुजारिश करते हैं कि इस पवित्र किताब की गरिमा बनाए रखें और पूरी दुनिया में इस फिल्म से विवादित दृश्य को हटाएं। इस अपील को नजरअंदाज करने को जानबूझकर भारतीय सभ्यता का अपमान माना जाएगा। हम आपसे जल्द से जल्द इस पर कार्रवाई करने का उम्मीद कर रहे हैं।’
‘एटम बम के जनक’ कहे जाने वाले ओपेनहाइमर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संस्कृत सीखी थी और वो भगवद् गीता से प्रभावित थे।
16 जुलाई 1945 में पहली बार एटम बम के विस्फोट को देखने के बाद एक इंटरव्यू में ओपेनहाइमर ने कहा था ‘मुझे पौराणिक हिंदू किताब भगवद् गीता की कुछ पंक्ति याद आई।’
उन्होंने कहा, ‘भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि उन्हें अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए। वो अपना विराट रूप दिखाते हुए अर्जुन से कहते हैं, मैं अब काल हूं जो लोकों (दुनिया) का नाश करता हूं।’
ये गीता के 11वें अध्याय का 32वां श्लोक है जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘काल: अस्मि लोकक्षयकृत्प्रविद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।।’
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक फिल्म को सेंट्र्ल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) ने यू/ए रेटिंग दी है। फिल्म की अवधि को छोटा करने के लिए इसके कुछ दृश्य हटाए गए हैं जिसके बाद भारत में ये फिल्म 13 साल से अधिक उम्र के बच्चे देख सकते हैं।
अमेरिका में इसे आर-रिस्ट्र्क्टेड (पाबंदी) रेट मिला है जिसका मतलब ये है कि अगर दर्शक की उम्र 17 साल से कम है तो उसके साथ फिल्म देखने के लिए अभिभावक या किसी वयस्क का होना जरूरी है।
ये क्रिस्टोफर नोलन की पहली आर रेटेड फिल्म है।
माहुरकर ने फिल्म के सर्टिफिकेशन को लेकर सवाल उठाए हैं और कहा है, ‘मुझे ये नहीं समझ आया कि सीबीएफसी ने इस सीन के साथ फिल्म के प्रदर्शन की इजाजत कैसे दी है।’
सीबीएफसी के चेयरपर्सन प्रसून जोशी और सेंसर बोर्ड के दूसरे सदस्यों ने अब तक इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इस बीच कुछ लोगों ने भारत में फि़ल्म के बॉयकॉट की मांग की है।
एक यूजर ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मुझे पता चला कि फिल्म में एक विवादित सीन है जिसमें भगवद् गीता को भी शामिल किया गया है। मैं यहां पर बात नहीं दोहराना चााहता लेकिन ये आपत्तिजनक सीन है। हिंदुत्व को सकारात्मक और सही तरीके से दिखाने के लिए आप हॉलीवुड या पश्चिम पर भरोसा नहीं कर सकते।’
एक अन्य यूजर ने लिखा, ‘हिंदू इस बात से खुश हैं कि ओपेनहाइमर में भगवद् गीता का जिक्र है, लेकिन वो लोग इस बात से नाराज हैं क्योंकि हॉलीवुड ने खुले तौर पर गीता का अपमान किया है। सेक्स के दौरान पवित्र पंक्तियों को बोलना अपमानजनक है और नस्लीय भेदभाव है। फिल्म का बॉयकॉट किया जाना चाहिए।’
कुछ लोग ये भी सवाल उठा रहे हैं कि क्रिस्टोफर नोलन पूरी फिल्म में कहीं भी भगवद् गीता का सीन डाल सकते थे लेकिन उन्होंने इसी सीन को क्यों चुना।
कुछ लोगों का कहना है कि ये माना जा सकता है कि इस ओपेनहाइमर गीता से प्रभावित थे लेकिन इस सीन में ये दिखाना जरूरी नहीं था।
एक और व्यक्ति ने लिखा कि वो ओपेनहाइमर की जगह कन्नड़ सिनेमा देखना चाहेंगे।
इस यूजर ने लिखा, ‘हर कोई कह रहा है कि ओपेनहाइमर एक मास्टरपीस है लेकन ये जानने के बाद कि इसमें भगवद् गीता का जिक्र एक सेक्स सीन में किया गया है, मैंने सोचा है कि मैं कन्नड़ फिल्म देखूंगा।’
एक और यूजर ने लिखा कि फिल्म के एक सीन में एक नग्न लडक़ी भगवद् गीता लेकर आती है और सेक्स के दौरान ओपेनहाइमर उसमें से कुछ पंक्तियां पढ़ते हैं। ये सीन बेहद अपमानजनक है।
फिल्म के प्रोमोशन के दौरान सिलियन मर्फ़ी ने कहा था कि फिल्म के लिए तैयारी करते वक्त उन्होंने भगवद् गीता पढ़ी थी। उन्होंने कहा था कि ये किताब ‘बेहद खूबसूरती से लिखी गई’ और प्रेरणा देने वाली है।
यूनिवर्सल पिक्चर्स की इस फिल्म में सिलियन मफऱ्ी और फ्लोरेंस पुग के अलावा रॉबर्ट डाउनी जूनियर, मैट डैमन, एमिली ब्लंट, जोश हार्टनैट, केसी एफ्लैक, रामी मलिक और केनेथ ब्राना हैं। (www.bbc.com/hindi)
-मनीषा तिवारी
यह एक प्रचलित तथ्य रहा है कि भारत के ऊतर पूर्वी राज्यों मे महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अधिक स्वावलंभी है, परिवार में उनका मान है और वो पुरुषों पर डॉमिनेटिंग प्रकृति की है, लेकिन इसका ये मतलब नही कि जब औरत के देह की बात हो तो पुरुष अपना घृणित पुरुषत्व भूल जाए, योद्धा अपनी जीत का पताका औरत को नग्न करके उसके शरीर पर ना फहराए, और विजयी भव का संतोष परिवार और समाज की औरतों के निजी अंगों को भेदे बिना ही पा लिया जाए। इस दुनिया में, चाहे वह सभ्य हो या असभ्य, ऐसा कब नहीं हुआ है भला !
वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, व प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाये तो मणिपुर मे औरतों को नग्न अवस्था मे परेड कराये जाने और भीड़ द्वारा उनके निजी अंगो के साथ खिलवाड़ करने की घटना प्रथमदृष्टया तो राज्य में लॉ एंड ऑर्डर के तहस-नहस हो जाने का मामला लगता है। थोड़ा और गहरे जाएँ तो यह घटना एक विशेष लिंग व जाति के प्रति नीच सोच और राजनीतिक दाँव-पेंच का मामला लगता है। थोड़ा और गहरे जाकर विचारें तो यह कृत्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज भी औरतों की देह को उनके परिवार और समाज की इज्जत, मान और सम्मान ढोने वाला कैरियर ही समझा जा रहा है। यदि औरत तथाकथित नीची जाति के परिवार समाज से है तो वह इस लायक भी नहीं।
प्रश्न है कि क्या बदल गया है पिछले हजार वर्षों में जब पांचाली को उनके ही पतियों ने चौसड़ के दांव पर लगा दिया था, जब एक आदिवासी स्त्री को अपने स्तन ढँकने के एवज में अपने स्तन कटवाने पड़े थे, या फिर एक तथाकथित निम्न जाति व गरीब परिवार की परंतु सुंदर दिखने वाली स्त्री को देवदासी के लिए चुन लिया जाता था ? कल भी देवी देवताओं, धर्म, जाति की आड़ मे औरतों पर तथाकथित सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों को उनके कर्तव्य और परिवार, समाज की इज्जत के रूप मे थोपा जाता रहा और आज भी हम उसी समाज के बीच खड़े हैं जंहा जाति, वर्ण और संप्रदाय की लड़ाई मे एक औरत की देह पर वर्चस्व दिखा कर हम अपने विरोधी की इज्जत पर धावा बोलने का हुंकार भरते हैं।
वह देश जहां एक औरत को किसी पुरुष द्वारा उसकी मर्जी के बगैर घूरने भर से लैंगिक शोषण काअपराध कारित किया जाना माना जाता है एवं कानून में इस हेतु ऐसे अपराधी के लिए कठिन सजा का प्रावधान रखा जाता हैं वंहा मणिपुर मे घटी यौन हिंसा की यह घटना हमे सोचने पर मजबूर करती है कि हम वापस उसी युग मे चले गए हैं जहां से चले थे। आज हम अपनी औरतों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और भावनात्मक अधिकारो को सुरक्षित रखने के अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर क्या ही कर पाएंगे जब हम एक औरत को उसकी अपनी ही ‘देह पर अधिकार’ जैसी मूलभूत अधिकार के अनुभव से वंचित देख रहे हैं ?
यदि हमारे देश मे मोनार्की नहीं है, लोकतन्त्र है, देश मे चुने हुए प्रधानमंत्री है और राज्य में चुने हुए मुख्यमंत्री हैं तो हम उनसे इतना पुछने का भी हक़ रखते है कि ऐसा क्यों है कि आप ऐसी घटनाओं को होने से रोक नहीं पाये? ऐसा क्यों है कि करोड़ों अरबों रुपये से आपके ही मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा तैयार महिला सशक्तिकरण की योजना ऐसे गंभीर प्रकरण को चिन्हित करने एवं समय पर कार्यवाही करने मे फेल हो गई? क्या कारण है कि सरकार द्वारा विषेशरूप से महिला हिंसा को एड्रैस करने के लिए ही तैयार इन वृहद योजनाओं का लाभ वो औरत नहीं ले सकी जिसे लगभग । 9 दिन पूर्व मानसिक एवं शारीरिक रूप से लज्जित किया गया जिसके छोटे भाई को उसके ही समक्ष भीड़ द्वारा जान से मार दिया गया जबकि पीडि़त के कुछ शुभचिंतक आपके राज्य शासन, प्रशासन से मदद की गुहार लगाते रहे।
वर्ष 2012 मे भारत सरकार महिला सशक्तिकरण के तहत अपनी प्रमुख योजनाएं लेकर आई, जिसे पूर्ण शक्ति केंद्र (पीएसके) कहा गया। जिसका उद्देश्य महिला हिंसा की घटनाओं को एड्रैस करना व पीडि़ता के लिए न्याय की व्यवस्था करने के साथ साथ जरूरतमन्द महिला को कल्याणकारी मामलों में पंजीक=त करना, पात्र योजनाओं में आवेदन करने में मदद करना और इन आवेदनों की प्रगति की निगरानी करना था। परंतु आने वाले समय मे सरकार पीएसके योजना गाइडलाइन के अनुसार सहायता प्रणाली (सार्वभौमिक महिला हेल्पलाइन) विकसित नहीं कर पाई और जिसके अभाव में यह योजना विफल रही और इसे बंद कर दिया गया।
वर्ष 2012 के निर्भया प्रकरण के पश्चात बनाई गई न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिश पर भारत सरकार ने नागरिक समाजों के परामर्श से ‘हिंसा प्रभावित महिलाओं को एकीकृत सहायता’ प्रदान करने के लिए सखी वन स्टॉप सेंटर (महिलाओं की शिकायत का प्रतिनिधित्व आपराधिक न्याय प्रणाली तक सुनिश्चितकरने के लिए एक भौतिक सुविधा) और महिला हेल्पलाइन 181 के सार्वभौमिकरण के नाम से दो वृहद योजनाओं का अत्यंत आधुनिक और अभिनव डिज़ाइन तैयार किया । इन समेकित योजना को 8 विशेष अभिनव गुणो के साथ तैयार किया गया था। यह योजना महिला (शिकायतकर्ता) के रेफेरल की बात नहीं करती थी बल्कि महिला के प्रतिनिधित्व की बात करती थी। इस योजना को डिजाइन ही इस प्रकार से किया गया था कि यह दर्ज शिकायत पर किसी को भी मैनुपूलेशन/ हेरा-फेरी का मौका नहीं देता था एवं साथ ही शिकायत से संबन्धित सभी स्टेकहोल्डर द्वारा किए गए कार्य का रियल टाइम डाटा संधारण करता था। इस योजना के डिज़ाइन में सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच टेक्नोलोजी इंटिग्रेशन की बात थी ताकि सभी संबंधित स्टैकहोडर्स समेकित रूप से एक केस फाइल के साथ पीडि़ता के साथ जुड़े रहे और संबंधित नियम व कानून के अंतर्गत अपनी जिम्मेदारी का अनुपालन करते रहे। इस डिजाइन मे मुख्यत: रिमोट मोनिटरिंग की बात भी थी, जिसके अंतर्गत केस/कम्प्लेंट मे संबंधित स्टेक होल्डर्स द्वारा आवश्यक कार्यवाही न किए जाने पर तत्काल मॉनिटरिंग सेक्शन मौके पर कोर्स करेक्शन हेतु सबंधित स्टेकहोल्डर को ताकीद कर सके। तत्पश्चात इस डिजाइन मे प्रत्येक केस फाइल और कम्प्लेंट को देश के सबसे वृहद लीगल फ्रेमवर्क ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण’ और इसके राज्य, जिले व ताल्लुक स्तर के कार्यालयों से टेक्नोलोजीकली जोड़े जाने की भी बात थी ताकि जरूरत पडऩे पर पीडि़ता को अलग से कानून का दरवाजा न खटखटाना पड़े बल्कि पीडि़ता की सहमति से उसकी शिकायत को इसी रास्ते न्याय प्राप्ति के अंतिम चरम दरवाजे तक सरलता से पहुंचाया जा सके और महिला नि: शुल्क विधिक सेवा का लाभ ले सके। इस योजना के संचालन की जि़म्मेदारी किसी विशेसज्ञ बाह्य संस्था को सौंपा जाना था जबकि अनुश्रवण की जि़म्मेदारी सरकार की थी। यह योजना महिला हिंसा के विरूद्ध न्याय प्राप्ति की दिशा मे किए गए प्रयास मे मील का पत्थर के तौर देखी जा रही थी।
दुर्भाग्यवश यह योजना देशभर मे लागू करवा पाने मे सरकार पुन: असफल रही। उससे भी अधिक दुखद यह रहा कि जिन राज्यों (छत्तीसगढ़, असम, मेघालय, जम्मू कश्मीर) मे 2015-16 की योजना गाइडलाइन के अनुसार यह योजना संचालित की जा रही थी वंहा की सरकारे इस अति पारदर्शी, नियमबद्ध, त्वरित मॉनिटरिंग व्यवस्था से डरने लगी थी। फलस्वरूप उनके नौकरशाह अपने अपने स्तर पर इस योजना/व्यवस्था का विरोध करने लगे। विभिन्न विभागों के आला अधिकारी इस बात से डरने लगे कि यह कैसी व्यवस्था है जिसमे एक पीडि़त महिला सीधे तौर पर दर्ज कम्प्लेंट पर की गयी कार्यवाही के बाबत उनसे पूछताछ करती है जिसका मौके पर ही जवाब देने के लिए नौकरशाह बाध्य थे, जो स्वत: रियल टाइम डाटा सिस्टम (वॉइस रेकॉर्ड सहित) संधारित द्वारा कर लिया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि एक ओर जहां 2011 से ही भारत सरकार ने योजना के संचालन में तकनीकी और ईक्षाशक्ति की कमी का ऐलान करते हुए योजना को पुन: पारंपरिक कॉल सेंटर मे बदल दिया वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़, असम, मेघालय, एवं जम्मू एवं कश्मीर की सरकारो ने भारत सरकार को यह बताना भी आवश्यक नहीं समझा कि उनके राज्य मे यह योजना 2016 की ही योजना दिशा-निर्देश के अनुसार चल रही है और यह भी कि उनके राज्यों मे यह योजना पीडि़ता /महिलाओं की मुखर आवाज बनकर सामने आयी है और समाज के एक बहुत बड़े वर्ग मे सुरक्षा और संतोष का भाव भरने मे मील का पत्थर साबित हुई है।
वर्ष 2011 से वर्ष 2022 तक भारत सरकार एवं नीति आयोग ने 2016 में लाई गई 181 महिला हेल्पलाइन और सखी वन स्टॉप सेंटर की एकीकृत इकाई के साथ आयी इस क्रांतिकारी योजना को यह कहते हुए कि, इस योजना के संचालन और अनुश्रवण मे समस्याएँ रही, पूरी तरह से मटियामेट कर दिया। वर्ष 2016 की सभी अभिनव, आधुनिक संरचना को खत्म कर पुन: पुराने घिसे-पिटे पारंपरिक डिजाइन में तैयार कर मिशन शक्ति के नाम से आयी नई फैशनेबल योजना पुन: नौकरशाहों के हाथ संचालन के लिए सौंप दी गई है। अब संचालन भी सरकारी नौकरशाह करेंगे और संचालन का अनुश्रवण, मूल्यांकन भी नौकरशाह खुद ही करेंगे।
कुल मिलाकर सच्चाई यही है कि सरकारे किसी की भी हों, महिलाओं के सम्मान की बहाली की इक्षाशक्ति किसी भी सरकार के पास नहीं है। औरतें आज भी शतरंज रूपी राजनीति की मोहरे हैं, चेक नहीं। यदि केंद्र में बैठी श्रीमती स्मृति ईरानी ने और वर्तमान भारत शासन द्वारा पोषित संस्थाओं और व्यवस्थाओं ने मणिपुर की महिलाओं को नहीं सुना तो यह कहना भी गलत नहीं होगा कि छत्तीसगढ़, असम, मेघालय और जम्मू-कश्मीर राज्यों ने मौन रहकर उनका साथ दिया। बहुत संभव है कि कल ऐसी ही घटना किसी अन्य राज्य में घटित हो जाये। क्या करेगी एक औरत, एक महिला, एक पीडि़ता यदि देश ने इन्हें अपनी शिकायत रखने और उस पर सवाल करने की कोई व्यवस्था ही नहीं दी। ये बात दीगर है कि हमने कानून की किताबों मे बड़े-बड़े कानून छाप दिए परंतु उनके क्रियान्वयन के लिए इतने सारे विंडो तैयार कर दिये कि एक शिकायतकर्ता अपनी पूरी जिंदगी एक विंडो से दूसरे विंडो पर चक्कर लगाते रहे और अंत तक ये न समझ पाये कि उसे सचमुच कहाँ जाना था। साँप भी मर जाये, लाठी भी ना टूटे।
- सुदीप ठाकुर
प्रधानमंत्री मोदी की एक कथित भविष्यवाणी दो दिनों से अखबारों और खबरिया चैनलों में चर्चा में है। यह 2019 के लोकसभा चुनाव से थोड़ा पहले संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा पर प्रधानमंत्री के जवाब की वीडियो क्लिप है, जिसमें वह यह कहते हुए नजर आ रहे हैं, ‘मैं आपको (विपक्ष) को इतनी शुभकामनाएं देता हूं कि आप इतनी तैयारी करें कि आपको 2023 में फिर से अविश्वास प्रस्ताव लाने का अवसर मिले।’
कथित मुख्यधारा का मीडिया प्रधानमंत्री की इस भविष्यवाणी की आड़ में विपक्ष के आगामी अविश्वास प्रस्ताव में सरकार की सुनिश्चित जीत को 2024 के प्रस्थान बिन्दु की तरह देख रहा है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि 2019 के चुनाव से करीब साल भर पहले मोदी सरकार ने 2018 में भी अविश्वास प्रस्ताव का सफलतापूर्वक सामना किया था।
मगर इन चार बरसों में राजधानी दिल्ली से होकर गुजरने वाली यमुना में काफी पानी बह चुका है! इन चार वर्षों में बहुत से जख्म मिले हैं, उनमें मणिपुर के घटनाक्रम ने सबसे ताजा और गहरा जख्म दिया है। इसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को आहत किया है।
दरअसल लोकतंत्र की एक विसंगति यह भी है कि वह नैतिकता पर नहीं बल्कि संख्या बल पर चलता है। प्रधानमंत्री और सदन के उनके प्रबंधक यह बखूबी जानते हैं। इसके बावजूद अविश्वास प्रस्ताव संसदीय लोकतंत्र में वह हथियार है, जिसके जरिये विपक्ष सरकार को बेनकाब करने की कोशिश करता है। यह संसदीय प्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिससे सरकार को जवाबदेह बनाया जा सके या नहीं, लेकिन इससे विपक्ष को संसद के भीतर अपनी बात कहने का मौका मिलता है। यह विपक्ष का अधिकार है।
कहने की जरूरत नहीं कि यह दुधारी तलवार है, क्योंकि इसके जरिये सरकार को अपनी ताकत दिखाने का भी मौका मिलता है। और वैसे भी लोकसभा का मौजूदा आंकड़ा स्पष्ट तौर पर सरकार के पक्ष में है।
मगर ऐसे दौर में ,जब दोनों सदनों में विपक्ष की आवाज को लगातार कमजोर किया जा रहा हो, महत्वपूर्ण विधेयकों को संसदीय परंपराओं और नियमों की अनदेखी कर आनन-फानन में पारित कर दिया जा रहा हो, तब विपक्ष के पास अपनी बात कहने का यही एक तरीका बचता है और ढ्ढ.हृ.ष्ठ.ढ्ढ.्र ने यही किया है।
यह सवाल बेमानी है कि करीब तीन माह से जल रहे मणिपुर में महिलाओं के साथ भीड़ द्वारा की गई हिंसा और यौन उत्पीडऩ का वीडियो संसद सत्र से ठीक पहले कैसे सामने आया। बल्कि पूछा तो यह जाना चाहिए कि चार मई की घटना के बाद राज्य और केंद्र की डबल इंजिन सरकारों ने जातीय हिंसा में जल रहे मणिपुर में शांति और सद्भाव कायम करने के लिए किया क्या?
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को इतिहास में ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज किया जाएगा जिसने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में कहें तो, 'राजधर्म' का पालन नहीं किया। मणिपुर की हिंसा के बाद गुजरात के 2002 के दंगों के समय वाजपेयी की तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को दी गई नसीहत के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।
वाजपेयी ने तब कहा था, ‘मेरा एक ही संदेश है कि वो राजधर्म का पालन करें... यह शब्द काफी सार्थक है, मैं उसी का पालन कर रहा हूं, उसी के पालन का प्रयास कर रहा हूं। राजा के लिए शासक के लिए प्रजा प्रजा में भेद नहीं हो सकता न जन्म के आधार पर न जाति के आधार पर न संप्रदाय के आधार पर। मुझे विश्वास है कि नरेंद्र भाई यही कर रहे हैं...’
वाजपेयी यह देखने के लिए उपस्थित नहीं है कि उनकी ही पार्टी के एक और मुख्यमंत्री को उन्हें ऐसी ही नसीहत देने की जरूरत पड़ती। इस मुख्यमंत्री की सरकार जाति और संप्रदाय के आधार पर प्रजा प्रजा में भेद कर रही है। बीरेन सिंह 'राजधर्म' का पालन करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। इसके बावजूद वह सत्ता में बने हुए हैं।
बेशक, किसी मुख्यमंत्री द्वारा अपने राज्य में अपने सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने से संबंधित अपनी जवाबदेहियों को पूरा न करने का यह पहला मामला नहीं है। लेकिन मणिपुर में जो कुछ हुआ और हो रहा है, वह अभूतपूर्व है। यह मुख्यमंत्री के रूप में ली गई शपथ का भी घनघोर उल्लंघन है। आप कह सकते हैं कि ऐसी शपथ को कौन गंभीरता से लेता है? पर सवाल है कि क्या संवैधानिक जवाबदेही से जुड़ी इस शपथ पर बात नहीं होनी चाहिए?
संविधान की तीसरी अनुसूची मंत्रियों के शपथ से संबंधित है, जिनमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। दो तरह की शपथ होती हैं, एक पद की और दूसरी गोपनीयता की। इसमें केंद्र और राज्य के मंत्रियों की शपथ का प्रारूप दिया गया है:
‘मैं अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूं/ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूं, कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंत:करण से निर्वहन करूंगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा। ’
राज्य के मंत्री के रूप में ली जाने वाली शपथ में संघ की जगह राज्य पढ़ा जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि ‘सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान...’ से आशय लिंग, जाति, वर्ग और संप्रदाय के आधार पर पक्षपात के बिना से है।
मणिपुर में हम इस शपथ का उल्लंघन होते देख रहे हैं। हैरानी इस बात की है कि प्रधानमंत्री मोदी ने संसद के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाहर कुछ पंक्तियों में मणिपुर की हिंसा का जिक्र करते हुए उसमें छत्तीसगढ़ और राजस्थान को भी जोड़ लिया।
निस्संदेह मणिपुर ही नहीं, बल्कि किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में किसी भी नागरिक के साथ साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। हिंसा की 'बाइनरी' मंशा पर सवाल खड़े करती है। यह वाकई अनूठा मामला है जब प्रधानमंत्री के संसद में बयान के लिए विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ा है।
(स्वतंत्र पत्रकार और हाल ही में आई किताब, ‘दस साल : जिनसे देश की सियासत बदल गई’, के लेखक)
भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर राजनीति इतनी हावी रहती है कि उनके लोगों के बीच आपसी रिश्तों को अक्सर भुला दिया जाता है. दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती और शादियां होना उतना भी हैरतअंगेज नहीं है जितना अकसर मान लिया जाता है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
सीमा हैदर और सचिन के प्रेम की गुत्थी अभी पूरी तरह से सुलझी भी नहीं थी, तब तक अंजू का मामला सामने आ गया। प्यार के लिए पाकिस्तान से भारत आ जाने वाली सीमा की तरह प्रेम के लिए ही भारत से पाकिस्तान चली जाने वाली अंजू भी सुर्खियों में आ गई। दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती और प्रेम के किस्से उतनी हैरतअंगेज बात है नहीं जितनी इन सुर्खियों को देखकर लग रहा है। आखिर दोनों देशों को एक से दो हुए ज्यादा वक्त भी तो नहीं बीता है।
लंबी फेहरिस्त
अभी भी दोनों देशों में ऐसे लोग जिंदा हैं जिनका जन्म बंटवारे के पहले के भारत के उस इलाके में हुआ था जो आज उस देश का हिस्सा नहीं है जहां वो आज रहते हैं। शायद इनमें सबसे जाना माना नाम भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का है। दोनों देशों में कितने ही ऐसे परिवार हैं जिनके कुछ सदस्य सीमा के इस तरफ हैं तो कुछ उस तरफ। इन्हीं आपसी ताल्लुकात का एक आयाम हिंदुस्तानियों और पाकिस्तानियों के बीच प्रेम और शादी से बने रिश्ते भी हैं।
भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर शोएब मलिक की शादी के बारे में सब जानते हैं। मलिक की ही तरह एक और पाकिस्तानी क्रिकेटर हसन अली ने 2019 में भारत की शामिया आरजू से शादी की थी। मलिक और अली से बहुत पहले दो और मशहूर पाकिस्तानी क्रिकेटर जहीर अब्बास और मोहसिन खान हिंदुस्तानी महिलाओं से शादी कर चुके हैं। अब्बास ने कानपुर की रहने वाली रीता लूथरा से शादी की थी। उन्हें अब समीना अब्बास के नाम से जाना जाता है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक रीता का परिवार बंटवारे से पहले फैसलाबाद में रहता था और दोनों के पिता पुराने दोस्त थे। मोहसिन खान ने बॉलीवुड अभिनेत्री रीना रॉय से शादी की थी। 2015 में भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री निगार खान ने पाकिस्तानी व्यवसायी खय्याम शेख से शादी की थी। इसी तरह पाकिस्तानी अभिनेत्री सोनिया जहां ने भारतीय बैंकर विवेक नारायण से शादी की थी। यह फेहरिस्त बहुत लंबी है और इसमें सिर्फ क्रिकेटर और अभिनेत्रियां ही शामिल नहीं हैं।
साझी संस्कृति
कभी पंजाब सूबे के गवर्नर रहे पाकिस्तानी राजनेता सलमान तासीर ने भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह से शादी की थी। इसी तरह दोनों देशों के मशहूर गोल्फरों नोनिता लाल और फैसल कुरैशी भी पति-पत्नी बने थे। यह तो वो नाम हैं जो मशहूर हैं। दोनों देशों में रहने वाले और एक दूसरे के परिवारों से शादी का रिश्ता जोडऩे वाले आम लोगों की संख्या तो कहीं ज्यादा है। वरिष्ठ भारतीय पत्रकार कमर आगा कहते हैं कि दशकों से दोनों मुल्कों के लोगों के बीच शादियां होती रही हैं।
उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, ‘दोनों तरफ परिवार बंटे हुए हैं। अंग्रेजों ने दोनों देशों के बीच एक लकीर जरूर खींच दी लेकिन दोनों देशों की संस्कृति एक ही रही है। इसलिए दशकों से शादियां होती रही हैं।’
आगा ध्यान दिलाते हैं कि कश्मीर और पाकिस्तानी कश्मीर जैसे सीमावर्ती इलाकों में तो यह बहुत ही आम है। कश्मीर के अलावा दूसरे सीमावर्ती इलाकों में भी हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी परिवारों के बीच शादी के रिश्ते बनाये जाते हैं।
पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सोढ़ा राजपूतों के यहां तो राजस्थान के सीमावर्ती जिलों के राजपूत परिवारों में शादी करने की पुरानी परंपरा है। बीते कुछ सालों में इस परंपरा को झटका लगा है क्योंकि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों पर बर्फ जम गई है और वीजा मिलना मुश्किल हो गया है। (dw.com)
- दिलीप मंडल
पूर्व सांसद फूलन देवी क्या ठाकुर यानी क्षत्रिय विरोधी थीं? ये हो सकता है कि फूलन देवी ने बेहमई में जिन 21 लोगों को मारा या जिनको मारने का आरोप उन पर लगाया जाता है, वे ठाकुर थे। लेकिन ये न भूलें कि वह गाँव जिस किसी भी जाति या धर्म का होता, उनकी अपनी जाति का होता तो भी वीरांगना फूलन देवी वहाँ वही करतीं, जो उन्होंने किया। ये उनके लिए ज़ुल्म और अपमान का बदला लेना था।
ये जानना अब संभव नहीं है कि जो मारे गए क्या वे ही वे अपराधी थे, जिन्होंने फूलन देवी पर जुल्म ढाए थे। आत्मसमर्पण के बाद कई सरकारें आईं और गईं पर फूलन देवी पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ। तर्क के लिए, चलिए मान लेते हैं कि फूलन देवी ने बेहमई में ठाकुरों को मारा। लेकिन ठाकुर समाज के सबसे मान्यवर लोगों ने क्या फूलन देवी को इसके लिए दोषी माना? क्या कोई कड़वाहट रखीं? ये न भूलें कि जब फूलन देवी हिंसा और प्रतिहिंसा से थक चुकी थीं और उन्होंने हथियार डालने का फैसला किया तो उनकी शर्त थी कि केस उनपर यूपी में है पर हथियार वे सिर्फ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय अर्जुन सिंह के सामने डालेंगी। अर्जुन सिंह इस मौके पर खुद आए और फूलन ने अपनी बंदूक उन्हें सौंप दी।
फूलनजी मध्य प्रदेश की जेल में पूरी सुरक्षा में रहीं। अर्जुन सिंह जी ने विश्वास का मान रखा। उनको प्रणाम। क्या आप फिर भी कहेंगे कि फूलन देवी की ठाकुरों से कोई दुश्मनी थी? फूलन देवी ने सार्वजनिक जीवन में आने के क्रम में जो शुरुआती सभाएँ कीं, उनमें प्रधानमंत्री वीपी सिंह खुद शामिल हुए। फूलन देवी के माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। ये कैसा ठाकुर विरोध हुआ? फूलन देवी जब सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रही थीं तो तमाम ठाकुर नेता उनके समर्थन में पहुँचे। लालू यादव ने उनकी पटना में विशाल सभा कराई। तमाम राजपूत नेता उस सभा में मंच पर आए। उनके मरने पर मुलायम सिंह के साथ ही, सपा के दूसरे सबसे बड़े नेता अमर सिंह ने फूलन देवी की अर्थी को कंधा दिया? किसी में कोई कड़वाहट नहीं बची थी महोदय। राष्ट्रपति के आर नारायण ने बहुत शानदार शब्दों में उनको श्रद्धांजलि दी। फूलन देवी ने अपने हिसाब से विद्रोही भूमिका निभाई और बस। सबने यही माना। हम सब चाहेंगे आगे क़ानून और न्याय अपनी भूमिका निभाए और किसी को फूलन देवी न बनना पड़े।
दुनिया की सबसे बड़ी TIME मैगज़ीन ने उन्हें विश्व की सबसे महान विद्रोही महिलाओं में शामिल किया। वे गुरु रविदास जयंती पर नागपुर में बौद्ध धम्म की छाया में चली गईं। हथियार डालने तक किसी की हिम्मत नहीं थी कि फूलन देवी को पकड़े। निहत्थी फूलन देवी को एक कायर ने भेदी बनकर मार डाला। इसमें कोई शौर्य नहीं है। फूलन देवी किसी जाति की विरोधी नहीं, महान विद्रोहिणी थीं। नमन।
-जुबैर अहमद
अनिल जोंको आदिवासी हैं और चाईबासा में रहते हैं। अनिल ‘हो’ जनजाति हैं। छोटे से आदिवासी गाँव में वह अपने पुश्तैनी घर में बहन के साथ रहते हैं।
चाईबासा से 20 किलोमीटर दूर बसे इस आदिवासी बहुल गाँव में ज्यादातर घर कच्चे हैं और वहाँ बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
40 वर्षीय जोंको इन दिनों जमीन के मालिकाना हक को लेकर कानूनी विवाद में उलझे हैं। वह थोड़े परेशान थे इसलिए अदालत में सुनवाई से पहले अपने माता-पिता की कब्र पर जाकर प्रार्थना कर रहे थे।
उन्हें उम्मीद है कि मुक़दमा जल्द निपट जाएगा क्योंकि केस की सुनवाई एक ऐसी अदालत में हो रही है जो केवल आदिवासियों के लिए बनी है। वहाँ सिर्फ उनके पारिवारिक मामलों की सुनवाई होती है।
इस अदालत को यहाँ ‘मानकी-मुंडा न्याय पंच’ के नाम से जाना जाता है। यह एक परंपरागत पंचायत है, जोंको जिस अदालत में गए थे, उसकी स्थापना फरवरी 2021 में हुई थी।
आदिवासियों की इस विशेष अदालत के बारे में अनिल जोंको कहते हैं, ‘मानकी मुंडा न्याय पंच के बारे में मैंने पहली बार सुना है। न्याय पंच में गाँव से संबंधित ज़मीन विवाद का केस चलता है, ये जानकारी वहाँ जाने के बाद हुई।’
अनिल जोंको का मुकदमा एक ऐसी अदालत में चल रहा है जो केवल आदिवासियों के लिए बनी है और वहाँ सिफऱ् उनके पारिवारिक मामलों की सुनवाई होती है।
उन्हें ये न्याय पंच पसंद है क्योंकि इस ‘न्याय पंच में सब अपने क्षेत्र के लोग ही रहते हैं। वहां कार्रवाई ‘हो’ भाषा में ही होती है’।
इस अदालत में न कोई वकील होता है और न ही कोई जज। फ़ैसला तीन पंचों के हाथ में होता है। एक को प्रतिवादी नामित करता है, दूसरे को याचिकाकर्ता और तीसरे व्यक्ति की नियुक्ति स्थानीय प्रशासन करता है, जो कार्यवाही की अध्यक्षता करता है।
इस अदालत के फ़ैसले को एसडीएम के दफ़्तर भेजा जाता है, जहाँ इसे अंतिम मंज़ूरी दी जाती है।
ज़मीन के विवादों और पारिवारिक मसलों को सुलझाने के लिए आदिवासियों के अपने अलग कानून और अपनी अलग अदालतें हैं। अब सरकार चाहती है कि सिविल मामलों में देश भर में सभी लोगों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) यानी एक जैसा कानून लागू हो।
आदिवासी नाराज हैं, यूसीसी को लेकर
झारखंड में यूसीसी का कड़ा विरोध हो रहा है। उनका कहना है कि अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड आया तो उनका सदियों पुराना जीवन जीने का ढंग खत्म हो जाएगा और चाईबासा में बनाई गई आदिवासियों की स्पेशल अदालत का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
स्थानीय वकील शीतल देवगम कहती हैं, ‘मैं भी ‘हो’ ट्राइब हूँ। मैं भी यहीं की हूँ। यहाँ के रीति-रिवाज मेरे ऊपर भी लागू होते हैं, तो मेरे नजरिये से जो लैंड का मैटर है, जो अदालत में आ रहा है अगर यूसीसी आ गया तो ये सबसे ज़्यादा किसान और आदिवासी लोगों के लिए दिक्कत होगी।’
गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में लगभग 750 आदिवासी समुदाय हैं और झारखंड में इनकी संख्या 32 है। इनके रीति-रिवाज और इनकी जमीन को बचाने के लिए अंग्रेज़ों के ज़माने से ही कुछ विशेष कानून लागू हैं।
पर्सनल लॉ के तहत विवाह, विरासत, गोद लेने, बच्चे की कस्टडी, गुजारा भत्ता, बहुविवाह और उत्तराधिकार से संबंधित मामले आते हैं, लोग आम तौर पर मुस्लिम पर्सनल लॉ की बात तो जानते हैं लेकिन कई समुदायों के अलग पर्सनल लॉ हैं, जिनमें आदिवासी भी शामिल हैं।
कई आदिवासी समूहों को डर है कि एक समान सिविल कोड को लागू करने से उनकी परंपराओं पर असर पड़ेगा। मसलन, झारखंड में आदिवासियों की संपत्ति और परंपराओं की हिफाजत के लिए अंग्रेजों के जमाने से ही तीन कानून लागू हैं-
विल्किन्सन नियम-1837 में ब्रिटिश राज के दौरान लागू किए गए इस नियम के तहत, आदिवासियों के बीच भूमि संबंधी विवादों का निपटारा करने के लिए आदिवासी अदालतें स्थापित की गईं। इन्हीं परंपराओं और प्रथाओं के अनुसार, फरवरी 2021 में चाईबासा के मानकी मुंडा न्याय पंच की स्थापना की गई थी।
छोटानागपुर किरायेदारी अधिनियम- ये कानून 1908 में आया जो आज भी लागू है। यही कानून आदिवासी भूमि के गैर-कानूनी अधिग्रहण के खिलाफ उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
संथाल परगना किरायेदारी अधिनियम: 1876 में लागू किया गया यह अधिनियम जि़ला उपायुक्त की इजाज़त के बिना संथालों के स्वामित्व वाली भूमि को ग़ैर-संथाल व्यक्तियों या संस्थाओं को बेचने पर रोक लगाता है।
इनके अलावा, संविधान की पाँचवीं अनुसूची में दस राज्यों का जि़क्र भी मिलता है, जहाँ आदिवासी बहुल क्षेत्रों में उनकी परंपराओं की हिफाजत की बात कही गई है। इसी तरह से संविधान की छठी अनुसूची में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी संस्कृति की सुरक्षा की बात की गई है, जहाँ उनकी परंपरा की हिफाजत के लिए जिला परिषद होते हैं। पांचवीं अनुसूची में झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान शामिल हैं।
संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी संस्कृति की सुरक्षा और रख रखाव के उद्देश्य से मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और असम में स्वायत्त जि़ला परिषदों की स्थापना का प्रावधान करती है।
झारखंड में आदिवासियों के अधिकारों के लिए सालों से लडऩे वाली सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला यूसीसी के बारे में कहती हैं, ‘एक देश में एक क़ानून कैसे चलेगा? पहले से ही हम पाँचवीं अनुसूची में हैं, हमारे लिए छोटानागपुर अधिनियम है, संथाल परगना अधिनियम हमारे लिए है, हमारे लिए विल्किंसन रूल है। हमारे ग्राम सभा को अपना अधिकार है।’
दयामनी बताती हैं कि ये मामला केवल ज़मीन-जायदाद तक सीमित नहीं है, वे पूछती हैं, ‘शादी करने का अपना कस्टमरी लॉ है। यहाँ पर हमारे प्रॉपर्टी का कौन उत्तराधिकारी होगा उसके लिए हमारा अपना कस्टमरी लॉ है। इस देश में 140 करोड़ जनता है। अब कन्याकुमारी से कश्मीर तक विभिन्न जातीय समुदाय के लोग हैं, अलग-अलग मज़हब के लोग हैं, तो उनको आप एक धारा में कैसे खड़ा करेंगे?’
आदिवासी औरतों का संपत्ति में हिस्सा
ज़मीन आदिवासियों के जीवन के केंद्र में है। यूसीसी से उन्हें सबसे अधिक खतरा जमीन छिन जाने का है।
शादी हो या गोद लेने की परंपरा, आदिवासियों में ये सब मसले भी कहीं न कहीं जमीन से ही जुड़े हैं।
जैसा कि राँची के सेंट जेवियर्स कॉलेज के प्रोफेसर संतोष कीड़ो कहते हैं, ‘जमीन ईश्वर की ओर से हमें दिया गया उपहार है। हम इसके व्यक्तिगत रूप से मालिक नहीं हैं। हम केवल इसका उपयोग करते हैं और फिर अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं।’
आदिवासी समाज में बेटियों को उनके पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता। उनकी शादी के बाद उनके पतियों की जायदाद में भी उनकी हिस्सेदारी नहीं होती। यूसीसी के आने से स्त्री-पुरुष के बीच समानता आएगी और आदिवासी औरतों को जायदाद में हिस्सेदारी मिल सकेगी।
दयामनी बारला बताती हैं कि एक आदिवासी बेटी जब अपने पिता के घर होती हैं तो वो पिता की संपत्ति का उपयोग करती है और जब वो अपने पति के घर चली जाती है तो वो अपने पति की संपत्ति की सुविधाएं पाती है।
वो कहती हैं, ‘उनका कागज में नाम नहीं होता है लेकिन इसके बावजूद आप देखिए कि हमारे समाज में दहेज की प्रथा नहीं है, दहेज न लाने के कारण लड़कियों को जलाया नहीं जाता। हमारे यहाँ बलात्कार की घटनाएं न के बराबर हैं।’
प्रोफेसर संतोष कीड़ो के मुताबिक आदिवासी समाज में औरतों के अधिकार सुरक्षित हैं। जमीन में उनकी हिस्सेदारी पर वो कहते हैं कि आदिवासी जायदाद सामूहिक मिलिकियत होती है, जिसे किसी व्यक्ति या संस्था को ट्रांसफऱ नहीं किया जा सकता।
क्या आदिवासियों को यूसीसी में रखा जाएगा?
ये साफ है कि केंद्र सरकार को आदिवासियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
अनौपचारिक रूप से केंद्र की तरफ से ऐसे इशारे मिल रहे हैं कि उन्हें यूनिफॉर्म सिविल कोड से बाहर रखा जा सकता है। लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यूसीसी में सभी समुदायों को शामिल करना चाहिए।
राँची टेक्निकल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अमर कुमार चौधरी एक ऐसे ही जानकार हैं। वो कहते हैं, ‘मेरे विचार में आदिवासियों को यूसीसी से अलग नहीं रखना चाहिए। समय लीजिए, बहस कीजिए, कुछ देर बाद हो, दस साल बाद लागू करें क्योंकि ये अगर लागू होगा तो सबके लिए अच्छा होगा। देखिए अब देश आगे बढ़ रहा है। सबको साथ चलने की ज़रूरत है। यूसीसी सबके लिए हो। लेकिन किसी प्रकार का कोई कन्फ्यूजन न हो।’
प्रोफेसर अमर ख़ुद आदिवासी नहीं है, पर उनके बीच दशकों से काम करते रहे हैं। वो बीजेपी और आरएसएस से भी जुड़े हैं। वो ये भी ज़ोर देकर कहते हैं कि आदिवासियों से बातचीत के बिना उन्हें यूसीसी में शामिल न किया जाए।
वो कहते हैं, ‘देखिए मैं तो उनके बीच ही रहता हूँ। ये शुरूआती दौर है और जो लोग इस पर बात कर रहे हैं वो पढ़े-लिखे लोग हैं। ये लोग इस मुद्दे को समझ रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जो आदिवासी रह रहे हैं, जो पहाड़ों और जंगलों में रहते हैं, उनको यूसीसी के बारे में कुछ नहीं मालूम इसलिए इस पर बात होनी चाहिए, उनके अंदर जागरूकता लानी चाहिए। यूसीसी उनके लिए सही है या ग़लत है, इससे पहले उन्हें इसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए।’
हाल में झारखंड के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने भी एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में इस बात पर ज़ोर दिया था कि जब तक आदिवासी समाज यूसीसी के लिए तैयार न हो उन्हें इससे बाहर रखना चाहिए।
यूसीसी पर बनी स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष और भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी ने भी हाल में आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखने की वकालत की थी लेकिन केंद्र सरकार ने औपचारिक रूप से इस पर कोई फैसला नहीं किया है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी यूसीसी पर बहस मीडिया में आई ख़बरों पर हो रही है। अभी बिल का मसौदा भी सामने नहीं आया है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
यदि हमने गांधीजी के विविध विषयों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेखों और विभिन्न अवसरों पर दिए गए महत्त्वपूर्ण भाषणों को गहराई से पढ़ा और समझा है तो यह कयास लगाना संभव है कि यदि गांधीजी आज जीवित होते तो भारत और विश्व की वर्तमान परिस्थितियों और प्रमुख समस्याओं से निबटने के लिए वे क्या करते। दूसरे शब्दों में कहें तो गांधी विचार का ठीक से चिंतन मनन करने वाले व्यक्तियों में गांधी की दृष्टि से यह समझ विकसित हो जानी चाहिए कि उन्हें वर्तमान परिदृश्य में किन किन रचनात्मक कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत में गांधी के लिए आज सबसे महत्त्वपूर्ण मणिपुर होता। वे उन इलाकों में नंगे पैर घूमते जहां दंगाईयों की भीड ने दूसरे समुदाय की संपत्ति नष्ट की है और महिलाओं के साथ जघन्यतम हिंसा की है।
गांधी ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि समय और परिस्थितियों के अनुसार मनुष्य के विचार बदलते हैं। यह बदलाव प्रकृति का भी नियम है और मनुष्य जीवन का भी नियम है। उम्र और अनुभव के आधार पर भी हमारे विचार बदलते हैं। गांधीजी के जीवन और विचारों में भी समय के साथ कई अभूतपूर्व बदलाव हुए हैं। इन्हीं बदलावों का परिणाम था कि युवावस्था में अंग्रेजों की तरह पश्चिमी जीवन शैली को अपनाने वाले सूट बूट पहनने और चम्मच छुरी से खाना खाने वाले इंग्लिश जेंटलमैन बैरिस्टर मोहन दास से वे लंगोटी वाला फकीरी जीवन अपनाकर महात्मा गांधी बन गए थे। यह अपने आप में गांधी के व्यक्तित्व और विचारों में अभूतपूर्व बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है।
मुझे भी पूरा विश्वास है कि गांधी आज की ज्वलंत मुद्दों और समस्याओं के समाधान के लिए अपने रचनात्मक कार्यों की प्राथमिकता में भी परिर्वतन करते और समय के अनुसार कुछ नए रचनात्मक कार्यों को भी अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल करते। उदाहरण स्वरूप गांधी के समय हमारे प्राकृतिक परिवेश ज्यादा प्रदूषित नहीं हुए थे,आबो हवा जहरीली नहीं हुई थी , प्रकृति और पर्यावरण में वैसा असंतुलन नहीं था जिसकी वजह से भारत सहित पूरा विश्व मौसम परिर्वतन की दिनोदिन गंभीर होती समस्या से जूझ रहा है। इस दौरान खेती में अंधाधुंध रसायनिक खाद, कीटनाशकों और हर्बिसाइड एवम प्रिजर्वेटिव्स के उपयोग से हमारा तीन समय का भोजन बेहद जहरीला हो गया है। प्राकृतिक असंतुलन एवम जहरीली आबो हवा और भोजन ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हर व्यक्ति प्रभावित हो रहा है और मनुष्य सहित पूरी प्रकृति के स्वास्थय पर गम्भीर खतरा मंडरा रहा है। घर घर में गम्भीर बीमारियों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
जिन दिनों महात्मा गांधी ने खादी को अपने रचनात्मक कार्यों में प्राथमिकता प्रदान की थी उन दिनों देश में कपड़े का भारी संकट था, अधिसंख्य आबादी को कपड़ा नसीब नहीं था। आज हमारे यहां कपड़ा इफरात में है और हम विदेशों को कपड़ा निर्यात कर रहे हैं। आज कपड़े से ज्यादा शुद्ध हवा और शुद्ध पानी की किल्लत है और शुद्ध सात्विक स्वास्थ्य वर्धक भोजन तो दुर्लभ हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ साथ हमारी कचरा संस्कृति के कारण नदियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। एक तरह से हमारा समृद्ध मध्यम वर्ग और प्रबुद्घ समाज भी साफ आबोहवा और शुद्ध जैविक भोजन के लिए तरस रहा है।
जहरीली होती आबो हवा, नाला बनती नदियां, ज़हरीला होता भोजन और बंजर एवम जहरीली होती कृषि भूमि और इन सबके कारण बीमार होती अधिसंख्य आबादी निश्चित रूप से गांधी का सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करती। संभवत: वे खादी से अधिक जोर प्रकृति और पर्यावरण एवम सबके स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए केंद्र में रखते और सरकार को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए बाध्य करते। गांधी विचार और गांधी के रचनात्मक कार्यों में विश्वास करने वाले हम लोगों का यह कर्तव्य बनता है कि गांधी की अनुपस्थिति में हम देश में अमन चैन बनाए रखें और जैविक खेती को केंद्र बिंदु बनाकर ग्राम विकास और राष्ट्र निर्माण में अपना यथा संभव यथाशक्ति योगदान करें।
दिनेश आकुला
24 जुलाई, 1980 के उस भाग्यशाली दिन से तैंतालीस वर्ष बीत गए हैं, परन्तु उत्तम कुमार की रहस्यमयी पर्सनैलिटी की चमक आज भी उसके श्रद्धालु अनुयायियों के दिलों में तेजी से चमकती है। उत्तम कुमार ने अपनी खूबसूरती से परिपूर्ण चार्म से दर्शकों को मोह लिया, उनके प्रत्याशित भूमिकाओं को रंग भर दिया। तीन शानदार दशकों तक वे बंगाली सिनेमा पर राज करे, उस समय के साक्षात्कार हैं जो उसके विरुद्ध कोई टक्कर नहीं थी।
3 सितंबर, 1926 को, उत्तर कोलकाता के अहिरी टोला में, एक सम्पन्न लेखक परिवार में जन्मे उत्तम कुमार का असली नाम अरुण कुमार चट्टोपाध्याय था। उनके पिता भी चलचित्र उद्योग में काम करते थे और मेट्रो सिनेमा हॉल में फिल्म ऑपरेटर रहते थे, जिससे उन्हें चालचित्र के संसार से संबंध बना। परन्तु उत्तम कुमार का प्रिय शौक थिएटर था। परिवारीक नाटक समूह, सुहृद समाज, ने उन्हें अभिनय की दुनिया में प्रवेश करने का मौका दिया। इस तरह से उत्तम कुमार की अभिनयक कला ने पकड़ बना ली। विद्यार्थी जीवन में अध्ययन का काम थोड़ा पीछे छोड़ दिया था, लेकिन वे तैराकी आदि में भी लगे रहते थे। तांत्रिक कलाओं में व्यवस्थित होने के बाद उन्होंने अपने दोस्तों के साथ लुनर क्लब बनाया। उत्तम कुमार के माता-पिता उनके पढ़ाई से परेशान थे, लेकिन उनके पिता ने उनमें एक अभिनेता का संभावित आँकलन किया था और उन्हें शुरुआती उम्र से ही स्वतंत्रता दी थी कि उन्हें उनके सपनों का पीछा करने की अनुमति है।
चक्रबेरिया स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उत्तम कुमार ने सरकारी वाणिज्य विद्यालय में प्रवेश लिया, जहां उनका अभिनयक कला और भी निखरती रही। ‘ब्रज कनै’ नामक एक प्रसिद्ध नाटक में उन्होंने फानी राय का किरदार निभाया, जिससे उन्हें समीक्षा की सराहना मिली, और उनकी कला की प्राशंसा हुई। उन्हें रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु, सुभाष चंद्र बोस के योगदान, और बाद में नक्सलवादी आंदोलन के उदय से प्रभावित होने का भी बड़ा प्रभाव हुआ।
1948 में, उत्तम कुमार ने गौरी देवी से विवाह किया, हालांकि, दोनों परिवारों से मुखाकाक मिला। आखिरकार वे अलग हो गए, लेकिन गौरी देवी ने उन पर अमर प्रभाव छोड़ा। उन्हें सुप्रिया देवी से प्यार का अनुभव हुआ, जिसके साथ उन्होंने अपने बाकी के दिन बिताए। उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी बंगाली सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण चिन्ह बन गई। उन्होंने मिलकर 60 फिल्मों में काम किया, जिनमें से 30 फिल्में उन्होंने साथ में की। यह जोड़ी हिंदी सिनेमा में भी चमकी, उत्तम कुमार ने 15 हिंदी फिल्मों में काम किया, जिसमें उनकी आखिरी रिलीज ‘प्लॉट नंबर 5’ शामिल थी।
कुछ वर्षों के बाद, उत्तम कुमार ने थिएटर और पोर्ट ट्रस्ट में काम करना छोडक़र फिल्म जगत में किरदार निभाने का निर्णय लिया। उनका पहला चढ़ाव फिल्म उद्योग में 1947 में ‘माया डोरे’ के साथ हुआ, लेकिन यह फिल्म तक़़दीर में सिर्फ चलता दिखाई नहीं दी। उनकी पहली रिलीज फिल्म ‘दृष्टिहीन’ (1948), जिसे नितिन बोसे ने निर्देशित किया था, उन्हें उनके जन्म के नाम अरुण कुमार चट्टोपाध्याय के नाम से जाना जाता था। अगले साल, उन्होंने ‘कामोना’ (1949) में मुख्य भूमिका किया, जिसके बाद उन्होंने अपना नाम फिर से अरुण चट्टोपाध्याय पर रखा और बाद में ‘सहजात्री’ (1951) से उत्तम कुमार के नाम से जाना जाने लगा। पहले कुछ सालों में उनकी फिल्में नुकसान में चली गईं, लेकिन अग्रदूत द्वारा निर्देशित ‘अग्नि परीक्षा’ (1954) उनके लिए वाहवाही का काम करी। साथ ही, प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक सत्यजीत राय के साथ ‘नायक’ (1966) में शर्मिला टैगोर के साथ विजयी काम करने से उनकी महत्वपूर्ण विकास और सम्मान की प्राप्ति हुई।
उत्तम कुमार की शानदारता ने अभिनय के सिवाए उन्हें अन्य कई किरदारों में भी बिखर दिया, जैसे कि उत्पादक, निर्देशक, लेखक, गायक और संगीतकार। उन्होंने अपने बैनर अलो चाया के तहत कई फिल्में निर्माण कीं, जैसे कि ‘हरनो सुर’ (1957) और ‘सप्तपदी’ (1961), जो अजय कर द्वारा निर्देशित थीं, और जिन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले। 1963 में, उन्होंने अपने बैनर को ‘उत्तम कुमार प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से पुनरूत्पन्न किया, जिसकी पहली फिल्म ‘भ्रांति विलास’ (1963) थी। इसके बाद आने वाली कुछ महत्वपूर्ण फिल्में ‘उत्तर फल्गुनी’ (1963) और ‘जोतुगृह’ (1964) थीं, जिन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने भी सम्मानित किया। उत्तम कुमार ने निर्देशन में भी कई महत्वपूर्ण फिल्में कीं, जैसे कि ‘सुधु एकती बच्चर’, ‘बोन पलाशीर पदाबली’ और ‘कलंकिनी कांकाबती’ (मृतक के बाद रिलीज हुई)।
उत्तम कुमार ने अभिनय के साथ-साथ गायकी में भी अपनी प्रतिभा दिखाई, जैसे कि फिल्म ‘काल तुमी अलेया’ (1966) में उनकी संगीतकार हेमंत कुमार और आशा भोसले के साथ निर्मित गाने थे। आशा भोसले ने एक और उनके संगीत संगीतकारी का साथ दिया था, जिसमें उन्होंने फिल्म ‘सब्यासाची’ (1977) में एक गाना गाया। 1967 में, उत्तम कुमार ने हिंदी फिल्म निर्माण की शुरुआत की थी ‘छोटी सी मुलाकात’, जिसमें ग्रेसफुल वैजयंतीमाला के साथ अभिनय किया।
दुर्भाग्यवश, यह फिल्म दर्शकों को नहीं प्रभावित कर पाई और उत्तम भारी कर्ज में डूब गए। अपने कर्ज चुकाने के लिए वे कई फिल्मों के साथ हस्तक्षेप करने पर मजबूर हुए, और अंतत: तपन सिन्हा द्वारा निर्देशित ‘बंचारामेर बागान’ (1988) के रिलीज के समय उन्हें चौपट किया गया। इन परेशानियों के बीच, उन्हें 1968 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला उनकी फिल्म ‘एंटोनी फिरिंजी’ के लिए, जिसमें उन्होंने प्रसिद्ध गायक अंतरा चौधुरी के साथ काम किया था।
समय के साथ, उत्तम कुमार के स्वास्थ्य समस्याएं उनकी ताकत को कम करने लगीं। 1967 में ‘चिडिय़ाखाना’ फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें पहला हार्ट अटैक आया, जो उनकी शारीरिक संघर्ष की शुरुआत का संकेत था। इसके बाद आई हार्ट संबंधी समस्याएं और ‘छोटी सी मुलाक़ात’ की हार ने उन्हें और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में डाल दिया। अंत में, 23 जुलाई, 1980 को ‘ओगो बोधु सुंदरी’ की शूटिंग के दौरान उन्हें फिर से हार्ट से संबंधी समस्या हुई। तब भी उन्होंने रात को पार्टी में शामिल होने का फैसला किया, और शराब के अधिक सेवन के कारण अनजाने में अपने भाग्य को बुला लिया। विपदा मध्यरात्रि को उनको लगी, जिससे उन्हें कोलकाता के बेलव्यू क्लीनिक में भर्ती कराया गया, जहां पाँच कार्डियोलॉजिस्ट उन्हें बचाने के लिए काम कर रहे थे। लेकिन लड़ाई 16 घंटे तक चली, और 53 वर्षीय उत्तम कुमार ने 1980 में जुलाई महीने को विदा हो गए।
उत्तम कुमार की असमय निधन ने बंगाली सिनेमा में एक सुनहरे दौर की समाप्ति का संकेत किया, जिसके बाद सिनेमा में एक अपूर्ण रिक्त स्थान रह गया। उनके अंतिम संस्कार में अनगिनत शोकसंतापी उनके चारों ओर इसकी पुष्टि की, जो उनके दिलों में उनके प्रभाव की गहरी छाप छोड़ गया। बंगाली सिनेमा उनके जाने के बाद कभी भी पूरी तरह से नहीं सुधर सकी, वे एक अद्भुत हीरो थे।
समय के साथ, उनकी यादें बुझने के बजाए उनकी प्रशंसा के बांध को मजबूत किया है। उत्तम कुमार को आज भी ‘महानायक’ के प्यारे श्रीखंडनाम से जाना जाता है। 2012 में पश्चिम बंगाल सरकार ने ‘महानायक सम्मान’ की स्थापना की, जो एक प्रतिष्ठित सम्मान है जो महान अभिनेता के अनवरत उपास्य विरासत का प्रतीक है। उत्तम कुमार हमारे बीच तो नहीं हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा और चार्म कभी नहीं ढले हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि वे सदैव बंगाली सिनेमा के रत्न हैं।
उन्नीसवीं सदी के नवजागरण की शुरुआत का श्रेय राजा राममोहन राय (1772-1833) को दिया जाता है। उसके बाद ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820-1891) और रामकृष्ण परमहंस (1836-1886) आदि कहे जाते हैं। नवजागरण का लेकिन वाचाल पहला विद्रोह मौलिकता और देशभक्ति का अक्स समेटे बाईस वर्ष के एक कवि-शिक्षक में फूटा है। 26 दिसंबर 1931 को मौत की आगोश में सोने वाले डेरोजि़ओ (1809-1831) के जन्म वर्ष में ही टेनिसन, ग्लैड्स्टन, डार्विन, एडगर एलन पो, अब्राहम लिंकन, ऑलिवर होम्स, फिट्जराल्ड जैसे विष्वविख्यात व्यक्तित्व भी पैदा हुए। अंग्रेजी रूमानी काव्य के विलियम वर्डसवर्थ, कॉलरिज़, लॉर्ड बायरन, षेले और कीट्स जैसे दिग्गज हस्ताक्षरों के समानांतर एक भारतीय नौजवान कविता की पूरी ताजगी, चुनौती और ऊर्जा के साथ मौजूूद रहा है। निखालिस अंग्रेज नहीं होने से ईस्ट इंडियन समुदाय उस कसैले नस्लीय बर्तानवी व्यवहार से अछूता नहीं था जो सौतेली संतानों को मिलता है।
नवजागरण के मुख्य घटनाक्रमों में 1784 में एशियाटिक सोसाइटी, 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज, 1817 में हिन्दू कॉलेज, 1824 में संस्कृत कॉलेज तथा वारेन हेस्टिंग्स द्वारा 1782 में कलकत्ता मदरसा की स्थापनाओं का बुनियादी महत्व है। अचरज है समकालीन राजा राममोहन रॉय के लेखन तथा ईष्वरचंद्र विद्यासागर रचित जीवनियों के ‘जीवन चरित्र’ में डेरोजिओ का उल्लेख तक नहीं है। थॉमस एडवडर््स की डेरोजिओ की जीवन गाथा कलकत्ता में 1884 में ही प्रकाशित हो पाई। कई समान सामाजिक चुनौतियों से जूझते विवेकानन्द ने भी डेरोजि़ओ का उल्लेख नहीं किया। दुखद है उसके समकालीनों ने उसके कार्यों और लेखन का पूरा ब्यौरा भविष्य की पीढिय़ों के लिए सुरक्षित नहीं किया। चौदह वर्ष में ही डेरोजिओ की जेम्स स्कॉट एंड कंपनी की व्यापारी फर्म में क्लर्क की नौकरी में नियुक्ति हुई। फिर तबादला भागलपुर हो गया। वहां कुदरत में उसमें कवि जी उठा। छुटपुट काव्य रचनाओं के प्रकाशन के अलावा उसने मशहूर जर्मन दार्शनिक काण्ट पर गवेशणात्मक शोध लेख सवाल उठाते प्रकाशित किया। एक तरुण के लिए वह नायाब उपलब्धि थी। उसकी कविताओं से प्रभावित साहित्य-मर्मज्ञ शिक्षाशास्त्री डा. जान ग्रान्ट ने केवल अठारह वर्ष में हिन्दू कॉलेज (स्कूल) में अध्यापक पद पर उसकी नियुक्ति करवाई।
डेरोजि़ओ ने इतिहास बोध की दुर्लभ मेधा का परिचय देते अपने छात्रों को नैतिक सांस्कृतिक ऊंचाई पर ला खड़ा किया। कलकत्ता के अन्य दिग्गजों ने ऐसी संभावनाओं को नहीं तलाशा था। उसने सती प्रथा, दहेज प्रथा और बाल विवाह की कुरीतियों और मूर्तिपूजा के खिलाफ और विधवा विवाह के समर्थन में समाज सुधार का राममोहन राय की तरह लगभग पहला बिगुल फूंका। छात्रों में अध्ययनप्रियता और अध्यवसाय के बीज रोपे। कहा तर्क के बिना किसी भी सत्य को स्वीकार करना ज्ञान का अपमान करना है। डेरोजिओ बुुनियादी तौर पर कवि था। हालांकि उसके बहुविध गद्य में ऊर्जा की चिनगारियों के स्फुलिंग रहे। उसे नवजागरण के ज्ञान का पहला विस्फोट माना गया है। घर घर में मषहूर था हिन्दू कॉलेज का डेरोजिओ का कोई विद्यार्थी झूठ नहीं बोल सकता। समाज की कुरीतियों को दूर करने के उसके विद्रोही रोल के खिलाफ कॉलेज के प्रबंध न्यासियों को उकसाया गया। उन्होंने माना वह अद्भुत प्रतिभाषाली षिक्षक था। फिर भी उसे स्कूल की नौकरी से निकाल दिया। कारण बताओ नोटिस का जवाब तपेदिक से ग्रस्त डेरोजिओ ने दिया। वह एक नवयुवक का नायाब तार्किक स्फुरण है।
वाणिज्य का अध्यापक डेरोजिओ अंग्रेजी साहित्य के प्रारंभिक षिक्षकों में भी था। उसके द्वारा स्थापित स्टडी सर्किल में सामाजिक कुरीतियों, धर्म, दर्शन, साहित्य, राजनीति से संबंध जलते सवालों पर बहस मुबाहिसा होता। वह विद्यार्थियों को स्वतंत्र, निर्भीक और स्पष्ट विचारों के लिए उत्साहित करता था। उसके तर्क तलवार की धार की तरह पैने होते। वह समाज सुधारक तथा बुद्धिजीवी चिंतक के रूप में मशहूर था। एक अर्थ में उसे नास्तिक भी कहा गया। हिन्दू कॉलेज के लिपिक हरमोहन चटर्जी का संस्मरण मार्मिक है कि डेरोजिओ ने अपने विद्यार्थियों के जेहन पर इतना अधिकार कर लिया था कि वे अपने निजी मामलों में भी उसकी सलाह के बिना अपनी राय नहीं रखते थे। अटूट विश्वास था उसे भी अपने विद्यार्थियों में! कितनी उम्मीदें संजोई थीं समवयस्क अध्यापक ने! विद्यार्थियों ने भी उसके विश्वास की मर्यादा निभाई। दक्षिण मुकर्जी, ताराचन्द चक्रवर्ती, के.एम. बनर्जी, रामतनु लाहिरी, रामगोपाल घोष, रामनाथ सिकदार जैसे विद्यार्थियों ने उस मशाल की ज्योति से बंगाल को ही नहीं सारे भारत को आलोकित किया है जो डेरोजिओ ने ‘यंग बंगाल मूवमेंट‘ स्थापित कर उनके हाथों में दी थी।
कॉलेज के जीवन मेंं ही डेरोजिओ ने ‘पार्थेनॉन‘ नाम की पत्रिका प्रकाशित की। उसकी लेखनी ब्रिटिश हुकूमत, सामाजिक कुरीतियों और शैक्षणिक दुव्र्यवस्थाओं के खिलाफ आग उगलती। रूढि़वादियों के एक वर्ग ने पत्रिका के दूसरे संस्करण की सारी प्रतियां इस डर से खरीद लीं कि विद्यार्थियों के हाथों में न पड़ जायें। कॉलेज की प्राध्यापकी छूट जाने के बाद डेरोजि़ओ ने गेस पेपर्स नहीं छपवाए। ट्यूशनें नहीं की और लडक़ों को परीक्षोपयोगी नोट्स नहीं लिखवाए। उसने साहस नहीं खोया और संघर्षशील बना रहा। उसके घर पर विद्यार्थियों की भीड़ जमा रहती। उससे उसे और हिम्मत मिलती। उसने ‘ईस्ट इंडियन‘ नाम का समाचार पत्र निकालना भी शुरू किया। पत्रकारिता के इतिहास का यह महत्वपूर्ण पत्र बहुत लोकप्रिय हुआ। डेविड हेयर, डॉ. एडम आदि शिक्षाशास्त्रियों के साथ उसने हिन्दू फ्री स्कूल तथा धरमतल्ला अकादमी में भी काम किया। मौत का साया उस पर मंडराने लगा था। 26 दिसंबर 1831 को तेईसवें वर्ष हैजा की बीमारी से अचानक वह चल बसा। इतना शोक उन दिनों अन्य किसी की मृत्यु का नहीं मनाया गया। डेरोजि़ओ ने कलकत्ता का पहला वादविवाद क्लब ‘एकेडेमिक एसोसिएषन‘ अपनी अध्यक्षता में स्थापित किया। मानिकतल्ला मकान के बागीचे में होने वाली इसकी बैठकों में बंगाल के डिप्टी गवर्नर डबल्यू. डबल्यू. बर्ड, चीफ जस्टिस सर एडवर्ड रायन, वाइसरॉय लॉर्ड बैंटिंक के निजी सचिव कर्नल बेन्सन तथा डेविड हेयर जैसे बुद्धिजीवी भी आते थे।
वैश्वीकरण की विकृतियां भोगते भारत मेंं कोई कल्पना कर सकता है कि लगभग दो सौ वर्ष पहले एक नवयुवक यह कह रहा हो ‘कुछ लोगों का विचार है कि औपनिवेशीकरण से हमारे देश की कई बुराइयों को प्रभावी तरीके से खत्म करने में मदद मिलेगी। लेकिन देखना है कि ऐसी कोई हालत कब होती है। मुझे इस पर यकीन नहीं है, और इस धारणा में कि सभी कोशिशों की बनिस्बत औपनिवेषीकरण में ही भारत का फायदा है। यह सत्य के मुकाबिले लफ्फाज़ी ज्यादा है। हालांकि कुछ आशावादी चिंतकों का उलट विचार है। लेकिन अगर सचमुच ऐसा होने की संभावना हो तो भी मेरे विचार में इसमें सबसे बड़ी बाधा औपनिवेशीकरण पर अमल करने मेंं है।‘ भारत के यूरोपीय औपनिवेशीकरण की मुखालफत करते डेरोजिओ ने कहा था गोरे अंग्रेज बदहाली तो हिन्दुओं और मुसलमानों की कर रहे हैं। वही हाल भारत के एंग्लोइंडियन या अन्य यूरोपीय परिवारों का होगा। डेरोजिओ का पूर्वाभास सच हुआ। वह इतिहास को जांचने के लिए भूगोल जैसे सामाजिक विज्ञान के स्फुलिंग को अपनी नायाब मेधा के जरिए पहचानता था।
महात्मा गांधी ने चंपारण में नील की खेती के अन्याय को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन किया। गांधी न केवल राष्ट्र नेता बल्कि परिव्राजक भी थे। उनसे 23 वर्ष के नवयुवक की तुलना नहीं हो सकती। लेकिन डेरोजिओ ने ही नील की खेती के किसानों पर हो रहे जुल्म का आगाज़ किया था। गांधी की चम्पारण चेतना एक ईस्ट इंडियन किशोर में कोई सौ बरस पहले जागृत हुई थी। इस तर्क का लेखा-जोखा न इतिहास में दर्ज है और न ही गांधी साहित्य में।
डेरोजि़ओ को अंग्रेजों से हमदर्दी नहीं थी। हालांकि वह राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं था। उसने साहित्य, संस्कृति, सामाजिक विज्ञान और जातीय समीकरणों की ब्रिटिश अवधारणाओं को झिंझोड़ते भारत की बेहतरी को लेकर वैचारिक अरुणोदय की तरह गुमनाम लेकिन उज्जवल जीवन जिया और असमय चला गया। यूरोपीय नवोदय को भारत में लाये जाने का वह विरोधी नहीं था। उसका नजरिया विज्ञान सम्मत था। उसने इस बात की बेबाक वकालत की कि अंग्रेज हुक्मरान भारत में रूढिय़ों, वर्जनाओं, अफवाहों और अंधविश्वासों के बरक्स यूरोपीय नवोदय की फितरत की शिक्षा, संस्कृति और कला के उच्चतर और व्यापक शिक्षण का इंतजाम करें। यह सरकार का पहला कर्तव्य हो, जिससे आधुनिक षिक्षा कस्बों तक फैले।
उसने यह मांग की कि भारत के भाग्य को ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी तिजारती संस्था के भरोसे छोडऩे के बदले ब्रिटिश संसद को हस्तक्षेप करना चाहिए। उससे भारतीयों और इंडो-ब्रिटन प्रकृति के देशवासियों को यथासंभव यूरोपियों के बराबर अधिकार मिलें। उसकी भविष्यवाणी सच 1857 में हुई कि ऐसा नहीं होगा तो जनविद्रोह रोकना मुष्किल होगा। उसने कहा था शासक और षासित के रिष्तों को जोडऩे का काम कलाओं और विज्ञान को सौंपना चाहिए। जेरेमी बेन्थम को उद्धृत करते हुए डेरोजिओ ने कहा था कि आदर्ष शासन वही होता है जो ज्यादा से ज्यादा लोगों की ज्यादा से ज्यादा भलाई कर सके।
प्रकाश दुबे
1990 में इंजीनियरिंग कालेजों में सौ विद्यार्थियों में बमुश्किल दस छात्राएं होती थीं। 2023 आधा बीतने से पहले प्रीति भारतीय प्रौद्योगकी संस्थान मद्रास की निदेशक बन चुकी हैं। मुंबई आइआइटी में काम कर चुकीं प्रीति अघायलम चेन्नई में रसायन विभाग की अधिष्ठाता (डीन) हैँ। अफ्रीकी महाद्वीप के जंजीबार में बनने जा रहे आइआइटी की जिम्मेदारी उन पर है। दूसरा उदाहरण-भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक संजय द्विवेदी ने रवानगी से पहले इंदौर के पत्रकारों पर मीडिया विमर्श का सहेजकर रखने वाला अंक तैयार कराया। पूर्णकालिक महानिदेशक आने तक अनुपमा भटनागर संस्थान संभालेंगी। भारतीय प्रेस परिषद की अध्यक्ष रंजना प्रकाश देसाई इन दोनों में एक समानता है। तीनों संस्थाओं में सर्वोच्च पद पहली मर्तबा किसी महिला को सौंपा गया है। लाखों में नहीं, अरबों में एक। (अरब का मतलब यहां देश नहीं, सौ करोड़)। ऊंची-ऊंची हांकने भर से 143 करोड़ के देश में महिलाओं को रगेदती, चीरहरण करती भीड़ की क्रूरता और हमारी चुप्पी का पाप कम नहीं होता।
आधा रहे सो पेंशन पावै
मंदिर-मढ़ी में पूजा पाठ करने वाले सब लोग ज्योतिषी तो होते नहीं। औरों का भविष्य बांचने वालों में अनेक अपने और यजमान को गच्चा खाने से नहीं बचा पाते। चुनाव तैयारी में राम रहीम की पेरोल रिहाई का पुण्य कमाने के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने आजू बाजू नजऱ डाली। मंथन किया। ज्ञान प्राप्त हुआ। अविवाहित व्यक्तियों को मासिक वृत्ति देने का ऐलान कर दिया। हरियाणा में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का अनुपात बहुत कम है। दिमाग पर जोर देने पर मुख्यमंत्री को कुछ देर बाद लगा कि योजना में विधुरों को शामिल करना चाहिए। पत्नी विहीन व्यक्तियों ने कोई अपराध नहीं किया है, जो उन्हें ऐसे संबोधन से नवाजा जाए, जो यहां लिखना ठीक नहीं होगा। हर एक हरियाणवी विधुर के खाते में महीने में दो हजार सात सौ पचास रुपए पेंशन जमा होगी। सावन के मौसम में पिया को तलाशती सुंदरियां नजऱ न आएं, कोई बात नहीं। प्रधानमंत्री हरियाणा सरकार की कई बार पीठ थपथपा चुके हैं। पेंशन की व्यवस्था के भरोसे जीवन बिता लेंगे। हजारों नौजवान बेरोजगार हैं। माना। 70 हजार से अधिक हरियाणवी एक अदद जीवन संगिनी की कमी का रोना रोते हैं।
अच्छे दिन की उम्मीद
जनता दल-एस के महत्वाकांक्षी देवगौड़ा पिता पुत्र से किस्मत के साथ ही कांग्रेस और भाजपा ने दूरी बना ली। दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बनने चले देवेगौड़ा ने समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव को खास तौर पर प्रचार के लिए बुलाया था। उनकी रणनीति कर्नाटक विधानसभा चुनाव में फुस्स हो गई। विपक्ष नेताओं की बैठक में कुमारस्वामी को बुलाने का अखिलेश ने आग्रह नहीं किया। भाजपा नेता जनता दल एस को अपनी हार का कारण मानते हैं। दोनों मिलकर लड़ते तो कर्नाटक सरकार बच सकती थी। मायावती बुआजी की तरह देवेगौड़ा काका भी हित साधने के लिए लुढक़ना जानते हैं। नीतीश कुमार और राहुल गांधी पर वार कर कुमारस्वामी दांव चल चुके हैं। भाजपा का एक वर्ग जनता दल एस नेता कुमारस्वामी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद देने की सलाह दे रहा है। दांतों तले अंगुली काहे दबाते हैं? एक भूतपूर्व नेता प्रतिपक्ष महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री है। दो दो उपमुख्यमंत्री बन बैठे। बेंगलूरु से उडक़र पाला बदलने वालों को देश-मध्यप्रदेश की सत्ता मिली। कुमारस्वामी की राह में अड़ंगा बाकी है। पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा मानें, तब न बात बने।
कौन बनेगा
वो दिन याद करो। जब कोर कमेटी में सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी दहाड़ते थे। कभी-कभार वेंकैया नायडू मुंह खोलते थे। राजनाथ सिंह मौन व्रत कम ही तोड़ते थे परंतु अरुण जेटली की वकालत से बात सध जाती थी। जीवन के अंतिम दिनों में जेटली की तबीयत और दिल दोनों दुखी थे। तय यह होना है कि मिसिर जी के कारण बेहद चर्चित हो चुके ईडी के आसन पर कौन विराजमान हो? सत्ता और विपक्ष दोनों में जेटली के परम भरोसेमंद सीमांचल दास दौड़ में शामिल हैं। प्रवर्तन निदेशालय में जिम्मेदारी निबाह चुके हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण ने सीमांचल सहित तीन बांकुरों की सिफारिश भेजी है। मुकाबला बहुत कड़ा है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के मुखिया नितिन गुप्ता सेवानिवृत्त होने वाले हैं। नागपुर में रह चुके हैं। ईडी की कुर्सी मिलने पर दो साल और काम करने का अवसर मिलेगा। सीबी डीटी के सदस्य प्रवीण कुमार होड़ में शामिल हैं। राजस्व सेवा और कारोबारियों में खुसुरपुसर जारी है कि मिसिर जी के जाने के बाद नए मिसिर जी आ सकते हैं। बहरहाल मंत्री की सूची से मिश्र गायब हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
नासिरुद्दीन
मणिपुर में ढाई महीने से ज़्यादा वक़्त से हिंसा हो रही है। इस पर देश को जागने के लिए एक वीडियो का इंतजार था। वह बीते बुधवार (19 जुलाई) को पहली बार सामने आया।
इस खौफनाक वीडियो के सार्वजनिक होने से पहले ज़्यादातर लोगों को मणिपुर में चल रही जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा की गंभीरता का अंदाजा नहीं था।
सैकड़ों नौजवानों के हुजूम के बीच बिना कपड़े के दो महिलाओं को पकडक़र ले जाया जा रहा है। उनके जिस्म के साथ बर्बरता हो रही है। खबरों के मुताबिक इनमें से एक के साथ कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार भी हुआ है। लेकिन, जो दिख रहा है, वह बलात्कार से भी बढक़र है।
सवाल है, सामूहिक बलात्कार की बात पर ना भी जाएं तो जो होता हुआ दिख रहा है, वह क्या है?
जो किया गया, वह क्यों किया गया?
हर वह हरकत बलात्कार है, जो किसी की ख्वाहिश के बगैर उसके शरीर के साथ की जाए। किसी के सम्मान को इस तरह चोट पहुँचाना और सम्मान के साथ सरेआम खेलना... बलात्कार ही है। शरीर भेदना जरूरी नहीं है तो यहाँ जो हो रहा है, खुलेआम हो रहा है। यह हिंसा मर्दाना सत्ता, दबंग मर्दानगी और नफरत की उपज है। और मणिपुर की इस आपसी संघर्ष में महिलाओं के साथ यौन हिंसा की यह कोई अकेली घटना नहीं है। ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आ रही हैं।
स्त्री शरीर यानी जंग का मैदान?
मणिपुर जैसे संघर्ष का सबसे बड़ा निशाना लड़कियाँ और महिलाएँ होती हैं। लड़कियों का शरीर जाति-धर्म, राष्ट्र, क्षेत्र, नस्ल की जंग का मैदान बनता है।
मर्दाना ख्य़ाल यह मानता है कि समुदाय, राष्ट्र, जाति और धर्म को जीतना है तो दूसरे पक्ष की स्त्रियों को ‘जीतो’।
अगर इन्हें हराना है तो दूसरे पक्ष की स्त्रियों पर हमला करो। अब वह लडक़ी एक अकेली न रहकर अपने समुदाय की नुमांइदा बन जाती है। उसके जरिये समुदाय पर हमला किया जाता है।
मर्दाना सत्ता यह भी मानती है कि महज जीतना या हराना नहीं है। स्त्री शरीर पर हमलावर होना है। हमला भी कहाँ करना है, यह भी वह बताती और सिखाती है। इसलिए हमले के नतीजे में महज किसी की हत्या नहीं होती है। मर्दाना सत्ता बताती है कि यौन हिंसा करनी है। स्त्री के ख़ास अंगों को निशाना बनाना है।
उन अंगों को ही निशाना क्यों बनाना है? क्योंकि समाज, परिवार, जाति, धर्म, राष्ट्र, समुदाय, नस्ल सबकी इज्जत का भार स्त्री उठाये है। मर्दाना ख्याल ने इज्जत उसके कुछ अंगों में समेट दी है।
इसीलिए अगर दूसरे समूह की स्त्रियों के उन अंगों को निशाना बनाया जाए तो मर्दाना समाज मान लेता है कि उसने उस समुदाय, परिवार, जाति, धर्म, राष्ट्र, नस्ल की ‘इज़्जत लूट ली’। ‘इज़्ज़त मटियामेट कर दी’।
स्त्रियों के साथ ऐसी यौन हिंसा कर हमलावर पक्ष अपने को विजेता और दूसरे समूह को पराजित भी मानता है। यही नहीं, वह ऐसा करके दूसरे समूह के मर्दों को नीचा भी दिखाता है।
मणिपुर में भी एक पक्ष अपने को विजेता मान रहा है। दूसरे को पराजित दिखा रहा है। वह वीडियो देखें। बेबस लड़कियों के साथ उछलकूद करते नौजवान मर्द कैसे उत्साह में हैं।
ऐसा नहीं है कि ऐसी जीत का उत्साह सिर्फ स्त्रियों के साथ हिंसा में होता है। कई मर्दों को भी ऐसी हिंसा झेलनी पड़ती है। जहाँ एक समूह दूसरे समूह के मर्द की मूँछ काट डालता है। सर के बाल मुँड़वा देता है। यानी उन्हें मर्दानगी के कथित पहचान से मरहूम कर बेइज्जत करता है।
नफरत और नफरत की राजनीति
भीड़ का विजयी उत्साह बिना नफरत के मुमकिन नहीं है। यह नफरत बिना नफरती राजनीति के मुमकिन नहीं है।
राजनीति यानी नफरत को विचार का रूप देना। नफरत का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना। समाज को नफरत के आधार पर दो या कई खेमों में बाँट देना।
यह अहसास पैदा कर देना कि एक का रहना, दूसरे के लिए ख़तरनाक है। इस नफऱती राजनीति का पितृसत्तात्मक विचारों से मेल और नई तरह की हिंसक मर्दानगी का उभार, ऐसी घटनाओं में आसानी से देखा जा सकता है।
इसका नतीजा क्या हुआ?
पिछले कुछ सालों में हम यौन हिंसा के मामले में अभियुक्तों का धर्म, जाति और राष्ट्रीयता देखकर खुलेआम उनके साथ खड़े होने लगे या चुप रहने लगे या यौन हिंसा झेलने और इंसाफ के लिए लडऩे वाली लड़कियों और स्त्रियों के खिलाफ हो गए।
हाल के दिनों में ही ऐसे अनेक उदाहरण हमारे आसपास हैं, जहाँ हमें बतौर समाज एक आवाज में यौन हिंसा की मुखालफत में खड़े हो जाना चाहिए था लेकिन यह नहीं हो पाया।
यही नहीं, इस राजनीति का नतीजा है कि राज्य भी विचार के हिसाब से यौन हिंसा करने वालों के साथ कहीं न कहीं खड़ा नजऱ आता है। अगर ऐसा न होता तो मणिपुर में दो महीने पहले हुई घटना पर कार्रवाई हो चुकी होती।
यही नहीं, इस वीडियो के आने के बाद भी बहुतेरे लोग अब भी ऐसे हैं, जो किंतु-परंतु के साथ बात कर रहे हैं। वे इस हिंसा की बात के जवाब में किसी और हिंसा का हवाला देने लगते हैं।
जब हम एक हिंसा का हवाला दूसरी हिंसा से देते हैं तो हम हिंसा का विरोध नहीं बल्कि हिंसा का समर्थन ही कर रहे होते हैं। यह बतौर समाज हमारे हिंसक और स्त्री विरोधी होते जाने की बड़ी पहचान है।
यौन हिंसा पर नफऱती राजनीति का साया
यह आपसी नफरत और नफरत की राजनीति हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। नफरत और नफरत की राजनीति में हमने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है। इसीलिए हम यौन हिंसा अपनी सुविधा के अनुसार देखते हैं।
कुछ दिनों पहले की बात है। देश की नामचीन महिला पहलवान धरने पर बैठी थीं। वे चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थीं कि हमारे साथ यौन हिंसा हुई है। चूँकि उनका धरना ख़ास तरह की राजनीति को पसंद नहीं था तो उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाये गए। उनका मजाक बनाया गया। उनसे सुबूत माँगे गए।
मगर उनके पास दिखाने को कोई खौफनाक वीडियो नहीं था। इसलिए वे महीनों तक धरने पर थीं। हमारा समाज कान में तेल डालकर चुपचाप सो रहा था।
हालांकि अब क़ानूनी प्रक्रिया के तहत मामले की सुनवाई हो रही है लेकिन इस पूरे मामले को राजनीति के चश्मे से ही देखा जाता रहा।
ऐसा कुछ और घटनाओं में भी हुआ है।
मणिपुर में दो महिलाओं के निर्वस्त्र कर परेड निकालने के मामले में एक अभियुक्त की गिरफ्तारी के बाद उसके घर पर महिलाओं ने हमला किया और तोडफ़ोड़ की।
कठुआ, बिलकिस और मुजफ्फरनगर याद है?
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक बच्ची के साथ सामूहिक यौन हिंसा होती है। इस हिंसा की वजह धार्मिक नफऱत थी। पहले तो उस यौन हिंसा को झुठलाने की कोशिश की जाती है। उसमें कामयाबी नहीं मिलती है। इसके बाद अभियुक्तों के पक्ष में जुलूस निकालते जाते हैं। पैरवी की जाती है।
यह उस बच्ची के साथ हुई यौन हिंसा को जायज़ ठहराना नहीं था तो क्या था? यौन हिंसा करने वाले को एक समूह का हीरो बनाना नहीं था तो क्या था?
कठुआ मामला
21 साल पहले गुजरात में गोधरा ट्रेन कांड के बाद बड़ी साम्प्रदायिक हिंसा हुई। दाहोद जि़ले में हिंसा से बचने के लिए बिलकिस और उसके परिवारीजन भाग रहे थे।
21 साल की बिलकिस गर्भवती थीं। हिंसक भीड़ ने बिलकिस के साथ सामूहिक बलात्कार किया। उसके परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी गई। इसमें उनकी तीन साल की बेटी भी थी।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सामूहिक बलात्कार के मामले में 11 लोगों को उम्र कैद की सजा हुई। ये सभी लोग बीच-बीच में अलग-अलग कानूनी उपायों का इस्तेमाल करके जेल से आते-जाते रहे।
एक साल पहले इन 11 लोगों की सज़ा वक्त से पहले ख़त्म कर दी गई। ये सभी बाहर आ गए।
बाहर आकर वे ‘हीरो’ हो गए। किसके हीरो? समुदाय के? धर्म के?।।। और जिसके साथ यौन हिंसा हुई, वह ठगी-सी रह गई।
मुजफ्फरनगर में 2013 में साम्प्रदायिक हिंसा होती है। यहाँ कई महिलाओं के साथ बलात्कार की खबर आती है।
यहाँ भी बलात्कार की वजह ख़ास धार्मिक पहचान थी। मक़सद बज़रिये स्त्री समुदाय पर हमला था।
लंबी कानूनी लड़ाई में कुछ केस वापस हो जाते हैं। कुछ महीने पहले नौ साल बाद एक मामले में दो लोगों को 20 साल की सजा होती है। कई केस वापस हो गए।
क्या यह महज संयोग है कि मणिपुर, कठुआ, गुजरात या मुजफ्फरनगर में एक हमलावर समूह दूसरे समूह की महिलाओं के साथ यौन हिंसा करता है? महिलाओं को निशाना बनाने का पहला मक़सद हत्या का नहीं था। पहले उनके साथ यौन हिंसा फिर उसके बाद कुछ और।
दुखद तो यह है कि ऐसे ज़्यादातर मामलों में यौन हिंसा सिफऱ् एक समुदाय का मुद्दा बन कर रह जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो बिलकिस के मुजरिमों की सज़ा न तो वक़्त से पहले ख़त्म की जाती और न ही उनको सामाजिक सम्मान मिलता। यही नहीं मुजफ्फरनगर की कई पीडि़तों को अपने क़दम पीछे नहीं खींचने पड़ते।
अगर ऐसा होता रहेगा तो मणिपुर जैसी घटनाएँ कैसे रुकेंगी?
जहाँ भी संघर्ष, वहाँ निशाना स्त्रियाँ
दुनियाभर में जहाँ भी समुदायों के बीच संघर्ष है, वहाँ निशाने पर स्त्रियाँ हैं। ख़ासतौर पर कमजोर पक्ष की स्त्रियाँ। हमारे देश में इस तरह की ढेरों घटनाएँ आजादी और बँटवारे के वकत भी हुईं। उस दौर में हिन्दुओं, सिखों और मुसलमानों ने एक-दूसरे की महिलाओं का अपहरण किया। उनके साथ यौन हिंसा की। यह मानकर की कि हमने दूसरे की ‘इज्जत लूट ली’ और दूसरे पर ‘जीत हासिल’ कर ली है।
बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के वक्त बंग्ला भाषी होने की वजह से वहाँ की महिलाओं पर बहुत यौन हिंसा हुई।
पूर्वी यूरोप में बोस्निया की महिलाओं के साथ, म्यांमार में रोहिंग्या महिलाओं के साथ, इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) का यजीदी महिलाओं को यौन दासी बनाकर यौन हिंसा करना- बज़रिये स्त्री शरीर जीतने और हराने के ऐसे अनेक मर्दाना उदाहरण हमें मिल जाएँगे।
तो क्या यह सब चलता रहेगा?
जहाँ संघर्ष है, वहाँ की स्त्रियों को यह सब झेलना ही होगा।
अगर हम चाहते हैं कि ऐसी यौन हिंसा रुके तो कुछ कदम उठाये जाने बहुत ज़रूरी हैं।
ऐसी हिंसा को किसी एक व्यक्ति के खिलाफ यौन हिंसा समझनी भूल होगी। यह यौन हिंसा समुदाय के खिलाफ है, समाज और संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है, स्त्री जाति के सम्मान के खिलाफ है। इसलिए सबसे पहले इस तरह की यौन हिंसा को कानूनी तौर पर अलग दर्जे की यौन हिंसा मानना होगी।
इसके लिए तय वकत में केस का निपटारा ज़रूरी है। कड़ी से कड़ी सजा देनी ज़रूरी है। सामाजिक तौर पर सजा देना और जुर्माना लगाना होगा। उस इलाके के जिम्मेदार प्रशासनिक और पुलिस अफसरों पर भी कार्रवाई करनी होगी।
राज्य अपनी जि़म्मेदारी से बच नहीं सकता। इसलिए ऐसी घटनाओं में राज्य को जिम्मेदार बनाना होगा।
इज़्जत के मर्दाना सोच को नकारना होगा। स्त्री के कुछ यौन अंग किसी समुदाय, धर्म या राष्ट्र की इज्जत के रखवाले नहीं हैं, यह समझना और समझाना होगा।
सबसे बढक़र लडक़ों और मर्दों को इंसान बनना होगा। वे स्त्री का जुलूस निकालकर, अपने को अमानवीय बना रहे हैं।
ध्यान रहे, कल जब संघर्ष थमेगा लडक़े और मर्द अपने धर्म, जाति, राष्ट्र, समुदाय की स्त्रियों का जुलूस निकालेंगे। उनके सम्मान के साथ खेलेंगे। इतनी ही बुरी तरह से यौन हिंसा करेंगे। वे अपनी स्त्रियों का भी जीवन बदतर कर देंगे। यह तय है।
आवाज़ उठाने की आदत डालनी होगी
किसी भी सभ्य समाज में ऐसी किसी भी हिंसा को बर्दाशत करने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
अगर यह गुंजाइश लगातार बनी है तो बतौर सभ्य समाज, हमें अपने बारे में सामूहिक तौर पर जल्द से जल्द सोचना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि अगर यह वीडियो न आया होता तो हम यौन हिंसा के आरोपों की बात मानते या नहीं?
अगर हम चाहते हैं कि मणिपुर जैसी घटना का कोई और वीडियो किसी और कोने से न आए तो हमें बतौर समाज कुछ चीज़ें तुरंत करनी होंगी। यौन हिंसा, चाहे जो करे उसका विरोध करने और उसके खिलाफ आवाज उठाने की आदत डालनी होगी।
नफरत और नफरत की राजनीति ने हमें यौन हिंसा के आरोपितों का धर्म, जाति, समुदाय देखकर बोलने की आदत डाल दी है। शुरुआत इस आदत को खत्म करने से ही होगी। (bbc.com/hindi)
- कृष्ण कांत
अच्छा खासा पढ़ा लिखा आदमी कार में बैठते ही उजड्ड और जाहिल कैसे हो जाता है?
सामने लाल बत्ती है, पैदल लोग सडक़ पार कर रहे हैं, वह गाड़ी और तेज कर देता है।
15 लोगों की भीड़ सडक़ पार कर रही है, जिसमें बच्चे हैं, वह उस भीड़ के बीच से गाड़ी निकालता है।
सडक़ पर पानी भरा है, बगल में लोग खड़े हैं, वह स्पीड से गाड़ी निकालता है, खड़े हुए लोग कीचड़ से भीग जाते हैं।
सडक़ पार करता हुआ आदमी हाथ से रुकने का इशारा करता रहता है लेकिन वह वहशी कार वाला कार धीमी भी नहीं करता।
वह खिडक़ी से सिर निकाल कर रिक्शे वाले या किसी पैदल को गाली बक देता है।
वह भीड़ भरे संकरे बाजार में, जहां पैदल चलना भी मुश्किल है, वहां गाड़ी लेकर घुस जाता है और सब पर रौब झाड़ता है जैसे वह धरती का राजा हो।
यह सब मेरे निजी अनुभव हैं। हालांकि, कुछ एक बार ऐसे भी लोग मिले जिन्होंने अपनी कार रोककर लोगों को सडक़ पार करने दी। लेकिन यह अपवाद है।
कार खरीदने से पहले अमीरजादों को समाज में रहने का नियम सिखाना चाहिए।
सरकार को एक ‘कार ड्राइविंग तमीज सीखो’ एकेडमी खोलनी चाहिए और जो लोग ऐसी जाहिलाना हरकत करते पाए जाएं।
उनको यहाँ बंद करके तीन महीने का कोर्स कराना चाहिए और बदले में इनसे कम से कम एक लाख की फीस+जुर्माना वसूलना चाहिए।
अगर आप कार वाले हैं और ऐसी असामाजिक हरकत करते हैं तो यह पोस्ट आपके लिए है। मैं बताना चाहता हूं कि आप जाहिल हैं।
अगर आप ऐसा नहीं करते तो बधाई और इज्जत के पात्र हैं।


