विचार/लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
मध्य प्रदेश देश के उन चंद राज्यों में शरीक है जिन्हें कुदरत से प्राकृतिक संसाधनों का असीम भंडार मिला है। यहां नर्मदा, बेतवा, चंबल और क्षिप्रा जैसी सदानीरा नदियां और उन पर बने बांधों से प्रदेश की जनता को भरपूर पीने का पानी मिलता है और किसानों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हैं।
सतपुड़ा और विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं में पचमढ़ी और मड़ई आदि पर्यटक स्थल हैं,कान्हा, बांधवगढ़, सतपुड़ा, पन्ना और शिवपुरी जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि पाए नेशनल पार्क हैं और पार्क बनने की कगार पर खड़ी रातापानी सरीखी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में विचरते बाघ, भालू, तेंदुए और हिरणों की विभिन्न प्रजातियों वाले सागौन के खूबसूरत वन हैं जिनकी सी पी टीक देश भर में प्रसिद्ध है। इतनी प्राकृतिक संपदा के बावजूद मध्य प्रदेश का नाम विकसित राज्यों में नहीं आता। इसका कारण सरकार की प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव भी है। इसका ताजा प्रमाण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा प्रदेश सरकार पर लगाया गया पांच लाख का जुर्माना है।
वैसे तो देश भर में कस्बों, शहरों और महानगरों के पास से गुजरती छोटी-बड़ी तमाम नदियों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है लेकिन कुछ नदियों की हालत अत्यन्त दयनीय हो गई है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पास से बहती कलियासोत नदी की हालत भी पिछले बीस पच्चीस वर्षों में बहुत चिंताजनक हो गई है। चारों तरफ फैलते भोपाल में नदी के दोनों किनारों पर अतिक्रमण कर हजारों मकान बनाए जाने से नदी का प्राकृतिक मार्ग संकरा हो गया । कहीं कहीं उसकी प्राकृतिक धारा को ही मोड़ दिया गया है। भोपाल से निकलकर जैसे ही नदी पंद्रह किलोमीटर आगे बढ़ती है मंडीदीप के औद्योगिक क्षेत्र की कंपनियों के रसायनिक कचरे से यह नदी लगभग मर ही गई है। कुल मिलाकर भोपाल और मंडीदीप ने मिलकर अच्छी खासी शुद्ध जल की कलियासोत नदी को जहरीले नाले में तब्दील कर दिया है। कलियासोत की हालत बेहद चिंताजनक है।
बेतवा नदी की अध्ययन एवं जन जागरण यात्रा के दौरान नदी किनारे स्थित गांवों के निवासियों ने हमे भी बड़े दुखी मन से बताया था कि तीसेक साल पहले कलियासोत हमारी जीवन दायिनी नदी थी जिसमे हमने तैरना सीखा, जिसके जल से चर्म रोग ठीक हो जाते थे, जिसका पानी हम और हमारी गाय भैंस पीती थी लेकिन हमारे बच्चे नदी के प्रसाद से वंचित हैं। अब नदी का पानी इतना ज़हरीला हो गया कि इसके किनारे खड़े होने पर दुर्गंध आती है। इसमें घुसने पर चर्म रोग हो जाता है। मंडीदीप के औद्योगिक कचरे ने हमारी जीवन दायिनी नदी की हत्या कर दी। बड़ी-बड़ी औद्योगिक इकाइयों के पूंजीपतियों के सामने सरकार में हमारी कोई सुनवाई नहीं है। हाल ही में संपन्न हुई एनजीटी की सुनवाई में इन ग्रामीणों की व्यथा का बेंच के न्यायमूर्तियों ने भी अहसास किया है।
एनजीटी ने अपने पूर्व के आदेशों का अनुपालन नहीं होने के कारण मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को सुनवाई में बुलाया था ताकि सरकार द्वारा की गई कार्यवाही की सही जानकारी प्राप्त हो सके। प्रदेश के मुख्य सचिव भी बैंच को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए कि पिछले साल दो साल में मध्य प्रदेश सरकार ने कलियासोत नदी के सरंक्षण के लिए क्या ठोस प्रयास किए हैं। मुख्य सचिव के बिना सही जवाब की तैयारी के आने पर बैंच ने नाराजगी जाहिर करते हुए सरकार के उदासीन रवेये के कारण सरकार पर पांच लाख रुपए की पेनल्टी लगाई है जिसे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खाते में तुरंत जमा करने के आदेश दिए हैं। यह देखना अत्यंत त्रासद है कि जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के न्यायमूर्तियों के निर्देशों के प्रति भी मध्य प्रदेश शासन गंभीर नहीं है तब वह आम जनता और पर्यावरणविदों की कहां सुनेगा!
-पल्लव बागला
भारत के चंद्रयान-3 उपग्रह ने बुधवार शाम विक्रम लैंडर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर इतिहास रच दिया है.
विक्रम लैंडर को दक्षिणी ध्रुव के क़रीब सॉफ़्ट लैंड करना था जो बड़े अच्छे ढंग से हुआ. ये भारत के साथ-साथ दुनिया भर के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है.
सारी दुनिया की निगाहें चंद्रयान-3 पर टिकी थीं. इस सफलता के साथ ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करने वाला पहला देश बन गया है.
और चांद पर सॉफ़्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बन गया है. इससे पहले रूस, चीन और अमेरिका ने चंद्रमा पर सॉफ़्ट लैंडिंग की है.
लेकिन इन सबका काम भूमध्यरेखीय क्षेत्र में था. विक्रम लैंडर ने दक्षिणी ध्रुव के क़रीब सॉफ़्ट लैंडिंग की है जो भारत के लिए बहुत गर्व की बात है.
दक्षिणी ध्रुव पर कैसे उतरा विक्रम लैंडर
हम बार – बार सॉफ़्ट लैंडिंग शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन ये सॉफ़्ट लैंडिंग इतनी भी आराम से नहीं हुई है. विक्रम लैंडर दस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चांद की सतह पर आकर बैठा है.
अगर उसे छोड़ दिया जाए तो वह बहुत तेज रफ़्तार से गिरेगा, जैसे चंद्रयान-2 का लैंडर चांद की सतह पर क्रैश कर गया था.
लेकिन चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर इस तरह बनाया गया कि वह चांद की सतह पर जाकर मोहब्बत से बैठ जाए. और बाद में वह बेंगलुरु स्थित कमांड सेंटर के साथ बातचीत कर सके.
ये बहुत बड़ा और मुश्किल काम है. दुनिया में अब तक जितनी भी सॉफ़्ट लैंडिंग हुई हैं, उनमें से दो में से एक ही सॉफ़्ट लैंडिंग सफल हुई है. इससे पहले भारत के चंद्रयान-2 का लैंडर क्रैश कर गया था.
लेकिन इसके बाद चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर का चांद पर उतर जाना एक बड़ी उपलब्धि है. विक्रम का नाम भारत में स्पेस टेक्नोलॉजी के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर दिया गया.
ऐसे में ये उनके लिए भी बहुत ख़ुशी का दिन होगा, वो जहां पर भी हैं.
विक्रम लैंडर की गति कैसे कम हुई?
चांद की सतह पर उतरने से पहले विक्रम लैंडर की रफ़्तार कम करना भी एक चुनौती थी.
इसके लिए चंद्रयान -3 के विक्रम लैंडर को 125*25 किलोमीटर की ऑर्बिट में रखा गया था. इसके बाद इसे डिऑर्बिट किया गया.
इसके बाद जब उसे चांद की सतह की ओर भेजा गया तब उसकी रफ़्तार 6000 किलोमीटर प्रति घंटे से ज़्यादा थी.
इसके बाद कुछ ही मिनटों में जब उसे चांद की सतह पर सॉफ़्ट लैंड किया तो उसकी गति बेहद कम कर दी गयी.
ऐसा करने में विक्रम लैंडर पर लगे चार इंजनों का सहारा लिया गया.
इसके बाद दो इंजनों की मदद से विक्रम को चांद की सतह पर उतार दिया गया.
अब बाहर कैसे आएगा प्रज्ञान रोवर
चंद्रयान – 3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर पहुंच गया है. लेकिन अब इंतज़ार इसके रोवर प्रज्ञान के बाहर निकलने का है.
लेकिन प्रज्ञान को विक्रम लैंड से बाहर निकलता हुआ देखने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा.
विक्रम लैंडर के चांद की ज़मीन पर बैठने की वजह से जो धूल के कण उछले हैं, उन्हें अगले कुछ घंटों में वापस ज़मीन पर बैठने या विक्रम से दूर जाने का मौका दिया जाएगा.
इसके बाद विक्रम लैंडर से एक रैंप खुलेगा जिसके सहारे प्रज्ञान चांद की ज़मीन पर चलना शुरू करेगा.
प्रज्ञान रोवर और विक्रम लैंडर एक दूसरे से बातचीत कर सकते हैं.
विक्रम लैंडर चंद्रयान -2 के ऑर्बिटर और बंगलुरू स्थित कमांड सेंटर दोनों से बात कर सकता है.
विक्रम और प्रज्ञान दोनों ही सौर ऊर्जा से संचालित हैं. इन्हें चांद की रोशनी वाली जगह पर ठीक से पहुंचाया गया है. क्योंकि अब 14 दिन तक रोशनी रहेगी तो प्रज्ञान और विक्रम काम कर सकेंगे.
कुछ समय में चांद की सतह से पहली तस्वीरें आएंगी जिनमें प्रज्ञान विक्रम की तस्वीरें लेगा और विक्रम प्रज्ञान की तस्वीरें लेगा.
ये चांद की सतह से खींची गई इस तरह की पहली तस्वीरें होंगी.
विक्रम और प्रज्ञान 4*2.5 किलोमीटर के उस क्षेत्र में काम करेगा जिसका नाम मैंने कलाम विहार दिया है.
क्योंकि भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब ने ही कहा था कि भारत को चांद की सतह पर दक्षिणी ध्रुव के क़रीब अपना झंडा पहुंचाना चाहिए.
ऐसे में ख़ुशी का ये सारा खेल कलाम विहार से ही हो रहा है.
प्रज्ञान और विक्रम में कैसे बात होती है?
प्रज्ञान और विक्रम के बीच बातचीत का माध्यम रेडियो वेब्स हैं. ये इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेव होती हैं.
इन्हें इस तरह बनाया गया है कि प्रज्ञान अपने लैंडर विक्रम से बात कर सके.
प्रज्ञान सीधा बेंगलुरु स्थित कमांड सेंटर से बात नहीं कर सकता है.
लेकिन विक्रम सीधे बेंगलुरु स्थित कमांड सेंटर से बात कर सकता है.
हालांकि, चंद्रयान -3 के प्रोपेल्शन मॉड्यूल में कोई कम्युनिकेशन डिवाइस नहीं है.
इस पूरी प्रक्रिया में चंद्रमा से धरती तक संदेश आने में सवा सेकेंड का वक़्त लगता है. और ये सारी प्रक्रिया ऑटोमेटेड ढंग से होती है.
अंतिम मिनटों में किसके हाथ में था कंट्रोल
आख़िरी कुछ मिनट जब सबकी सांसें अटकी थीं, तब सारा काम कंप्यूटर ने किया.
इसरो के वैज्ञानिकों ने सारी कमांड्स लोड कर दी थीं.
कंप्यूटर ने इन सभी कमांड्स को ठीक ढंग से अंजाम दिया जिससे विक्रम लैंडर आराम से चांद की सतह पर पहुंच गया. (लेखक वरिष्ठ विज्ञान पत्रकार हैं।)
(bbc.com/hindi)

सुनील से सुनें : इसरो का इतिहास वैदिक काल का नहीं है...
हिन्दुस्तान के इसरो का चन्द्रयान-3 कुछ मिनटों में चांद पर उतरने जा रहा है। पूरे देश में, और दुनिया भर में जगह-जगह पर बसे हुए भारतवंशी मंदिरों के हवन से लेकर मस्जिदों की नमाज तक कर रहे हैं। और देश धार्मिक भावनाओं में भी डूबा हुआ है। कुल मिलाकर देश में जो वैज्ञानिक सोच होनी चाहिए, उसके ऊपर धर्म नाम की जलकुंभी पूरी तरह छा चुकी है, और जनता की वैज्ञानिक चेतना नाम की चीज गिने-चुने लोगों में बची है। इस अखबार ‘छत्तीसगढ़’ के संपादक सुनील कुमार की इस न्यूज रिपोर्ट को देखें।
शोध-निर्माण में कमी स्वास्थ्य आपातकाल को दे रही आमंत्रण
सुनीता नारायण
अब हम जानते हैं कि गंभीर बीमारी की हालत में ली जाने वाली दवा- एंटीबायोटिक्स हमें बीमार करने वाले रोगाणुओं को मारने में लगातार अप्रभावी होती जा रही हैं। रोगाणुरोधी प्रतिरोध अथवा एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) नामक यह खतरनाक महामारी एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग और दुरुपयोग के कारण होती है। रोगाणु उत्परिवर्तन (म्यूटेट) माध्यम से इन दवाओं के खिलाफ रक्षा तंत्र का निर्माण करने में सफल हो गए हैं। यही वजह है कि आज एएमआर लगातार जानें ले रहा है।
अनुमानों के अनुसार, जीवन रक्षक दवाओं के अप्रभावी रहने के कारण 2019 में लगभग 50 लाख मौतें हुईं।? मुद्दा और गंभीर है। न केवल हम दवाओं के मौजूदा स्टॉक को संरक्षित कर रहे हैं बल्कि नई एंटीबायोटिक दवाओं के उत्पादन में भी लगातार कमी आ रही है। अनुसंधान, विकास और खोज के व्यवसाय में लगी प्रमुख दवा कंपनियां भी इनका उत्पादन लगातार कम कर रही हैं।
इसका मतलब यह होगा कि आने वाले वर्षों में हम तिहरे खतरे में होंगे। एक, जिन एंटीबायोटिक्स के बारे में हम आज जानते हैं, वे पूर्णतया अप्रभावी हो जाएंगी। दो, कोई नई एंटीबायोटिक्स उपलब्ध नहीं होंगी और तीन, इन दवाओं तक आम जनता की पहुंच कम होगी क्योंकि समय के साथ इनकी मांग में इजाफा ही होगा। यह एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल है। शायद आज तक हमने जो कुछ भी देखा है, उससे भी अधिक गंभीर।
पेनिसिलिन पहली एंटीबायोटिक थी, जिसकी खोज 1928 में हुई थी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1940 के दशक में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन देखा गया। इसके बाद दवाओं की इस श्रृंखला पर दुनिया की निर्भरता काफी बढ़ गई। इसके बाद के दशकों में और भी खोजें की गईं। लेकिन 1980 का दशक आते-आते ये सब बंद हो गया।
रोगाणुरोधी दवाओं की नवीन श्रेणियों की खोज करने की बजाय दवाओं की उन्हीं पुरानी श्रेणियों के फार्मूले में फेरबदल किया गया। इसके फलस्वरूप बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ आसानी से प्रतिरोध विकसित कर सकते थे। समस्या इसलिए भी जटिल है क्योंकि रोगाणुओं की एक नई किस्म उत्पन्न हुई है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) प्रायोरिटी पैथोजन (प्राथमिकता वाले रोगजनक) कहता है। इनमें से अधिकांश प्रायोरिटी पैथोजन नकारात्मक बैक्टीरिया हैं जिनकी कोशिका दीवारें जटिल होती हैं और वे निमोनिया सहित विश्व के सबसे खतरनाक संक्रमणों के लिए जिम्मेदार हैं।
हमें इन प्रायोरिटी पैथोजन से निपटने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं की नई श्रेणियों की आवश्यकता है। हमें दुनिया भर के लोगों के लिए उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, उन लोगों के लिए भी जिनके पास नई दवाओं की ऊंची कीमतों का भुगतान करने की क्षमता नहीं है।
दवा विकास के विभिन्न चरणों में रोगाणुरोधी एजेंटों की डब्ल्यूएचओ की वार्षिक समीक्षा से पता चलता है कि पिछले पांच वर्षों में स्वीकृत 12 एंटीबायोटिक दवाओं में से केवल दो को ही नवीन माना जा सकता है। इनमें से केवल एक ही प्रायोरिटी पैथोजन को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। डब्ल्यूएचओ ने इन प्रायोरिटी पैथोजन को गंभीर, उच्च और मध्यम श्रेणी में उप-वर्गीकृत किया है।
इससे भी बुरी बात यह है कि नई दवाओं की संख्या में लगातार कमी आ रही है। पिछले कुछ वर्षों से केवल एक या दो एंटीबायोटिक्स ही नई दवा के व्यावहारिक प्रयोग के चरण तक पहुंच पाए हैं। भविष्य और भी अंधकारमय है। किसी दवा के अनुमोदन चरण में पहुंचने से पहले के बिंदु- क्लिनिकल परीक्षण के चरण 3 में केवल नौ नई दवाएं हैं और उनमें से अधिकांश का लक्ष्य प्रायोरिटी पैथोजन नहीं है। असली विडंबना यह है कि नवीन एंटीबायोटिक दवाओं पर कोई शोध नहीं हुआ हो, ऐसा नहीं है। प्री-क्लिनिकल बास्केट में 217 से अधिक रोगाणुरोधी दवाएं हैं। इनका विकास बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों और छोटी कंपनियों की प्रयोगशालाओं में हो रहा है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 80 प्रतिशत प्री-क्लिनिकल नॉवेल दवाएं उन संस्थानों ने विकसित की हैं जहां 50 से कम कर्मचारी काम करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे कोई दवा विकास के क्रम में बढ़ती है, उसी हिसाब से लागत भी बढ़ती जाती है और इनोवेशन ठंडे बस्ते में चला जाता है।
बिग फार्मा कंपनियां अनुसंधान एवं विकास में निवेश क्यों नहीं कर रहीं? या फिर छोटे व्यवसायों से तकनीकें अपनाकर उन्हें बाजार तक क्यों नहीं पहुंचा रही हैं ? और कुछ नहीं, तो नई खोजें तो की ही जा सकती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि बिग फार्मा एंटीबायोटिक व्यवसाय से बाहर क्यों हो रही हैं?
मेरे सहयोगियों ने अपने विश्लेषण में पाया है कि वे अन्य दवाओं के माध्यम से भारी मुनाफा कमा रहे हैं? कारण आर्थिक और नैतिक- दोनों हैं। फार्मास्युटिकल कंपनियों का कहना है कि विकास की लागत अधिक तो है ही साथ ही जोखिम वगैरह भी हैं। लेकिन असली वजह ये है कि कैंसर या डायबिटीज जैसी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं में मुनाफा कहीं ज्यादा होता है।
इसके अलावा, रोगों की एक और श्रेणी है जिसे ऑर्फन डिजीज के नाम से जाना जाता है। ये वैसी दुर्लभ बीमारियां हैं जिनसे केवल कुछ मिलियन ही प्रभावित होते हैं लेकिन जिनके लिए दवाएं आवश्यक और उच्च-स्तरीय हैं। अत: इनसे संबंधित अनुसंधान और उन दवाइयों को बाजार में लाने में अच्छा मुनाफा है। नैतिक मुद्दा यह है कि कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा कमाने के बावजूद महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक कारोबार से बाहर निकल रही हैं।
निराशाजनक स्वास्थ्य आपातकाल के इस दौर में गेम चेंजिंग समाधानों की आवश्यकता है। नई एंटीबायोटिक दवाओं में निवेश करने के लिए कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए जी-7 सरकारें आज जो कर रही हैं, वह महत्वपूर्ण तो है लेकिन पर्याप्त नहीं। दवाओं के इस वर्ग को दो अनिवार्यताओं द्वारा परिभाषित किया गया है। एक, उनका उपयोग सीमित होना चाहिए। दुरुपयोग और अति प्रयोग ही एएमआर की समस्या पैदा कर रहा है। इन जीवन रक्षक दवाओं का संरक्षण किया जाना चाहिए जिसका अर्थ है सावधानीपूर्वक, प्रतिबंधित उपयोग, भले ही मुनाफे में कमी हो। दूसरा, इन दवाओं तक सबकी पहुंच सुनिश्चित की जानी है।
इसका मतलब है कि दवाओं को सस्ता करना होगा जो दवा कंपनियों के अधिकतम मुनाफे के फलसफे के खिलाफ जाता है। अब समय आ गया है कि एंटीबायोटिक्स को वैश्विक सार्वजनिक वस्तु के रूप में देखा जाए। इसके लिए शायद फार्मास्युटिकल कंपनियों के मुनाफे पर नए कर लगाने होंगे। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि सार्वजनिक अनुसंधान का उपयोग आम जनता की भलाई के लिए किया जाए। (navjivanindia.com)
(साभार: डाउन टू अर्थ, सुनीता नारायण जानी-मानी पर्यावरणविद हैं)
रश्मि सहगल
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली हिमाचल प्रदेश सरकार ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में एक जांच आयोग गठित किया जाए जो देखे कि आखिर क्यों राज्य को इस साल इतनी बड़ी पर्यावरणीय आपदा का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि इस आपदा में 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और राज्य भर में सैकड़ों परिवार बेघर हो गए।
हिमाचल प्रदेश में बीते सप्ताह 70 से ज्यादा लोगों की जान चली गई, भारी बारिश के कारण शिमला के नजदीक एक मंदिर के ढहने से कई लोगों की मौत हो गई और बहुत सारे लोग उसमें फंस गए थे। हिमाचल का पड़ोसी राज्य उत्तराखंड इससे भी बदतर पर्यावरणीय आपदा से दोचार हुआ। पिछले कुछ दिनों में वहां भी 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। सबसे हालिया त्रासदी तब हुई केदारनाथ जा रहे पांच तीर्थयात्रियों की कार लगातार बारिश के कारण हुए हुए भूस्खलन की चपेट में आ गई।
हिमाचल के मुख्यमंत्री सुक्खू का मानना है कि सिर्फ भारी बारिश और भूस्खलन ही नहीं बल्कि दोषपूर्ण विकास योजना के कारण पुल टूटे और सड़कें तबाह हो गईं जिससे हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। राज्य में पानी और बिजली की आपूर्ति लाइनों को बड़ा नुकसान हुआ और दूरसंचार सेवाएं भी प्रभावित हुईं।
हिमाचल की मांग, मुआवज़ा भरे केंद्र
मुख्यमंत्री ने केंद्र से मुआवजे के रूप में 14,000 करोड़ रुपये की मांग के अलावा 126 मेगावाट की औट मंडी स्थित लारजी जल विद्युत परियोजना को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के गलत निर्माण से हुए नुकसान के एवज में 658 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा है।
सुक्खू ने इस बाबत केंद्रीय परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को पत्र भेजा है। इसमें कहा गया है कि फोर-लेन के कारण सड़क ब्यास नदी में चार मीटर तक घुस गई जिससे नदी संकरी हो गई और खतरा बढ़ गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह बात 2019 में एनएचएआई को बताई भी गई थी, लेकिन उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि एनएचएआई की इस गलती के कारण ब्यास में बाढ़ आने पर नदी का जल स्तर सड़क से चार मीटर ऊपर तक बढ़ गया।
पत्र में कहा गया है कि ‘नदी का तल 894 मीटर पर है और नदी की अधिकतम अनुमानित जल सीमा 904 मीटर है। फोर-लेन सड़क 910 मीटर की ऊंचाई पर है। लेकिन बाढ़ के बाद, जल स्तर 914 मीटर तक बढ़ गया जिसके कारण गाद लारजी विद्युत संयंत्र में घुस गया।’ मजबूरन बिजली उत्पादन को रोकना पड़ा और बांध की मरम्मत का काम दिसंबर, 2023 के अंत तक ही पूरा हो पाने की संभावना है। इसलिए राज्य सरकार इसकी वजह से राजस्व की हानि के बदले मुआवजे की मांग कर रही है।
एनएचएआई के लिए काम करने वाली कंपनी पर एफआईआर
लेकिन मामला इतने पर ही नहीं रुका। शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंद्र सिंह पंवार ने एनएचएआई और परियोजना को क्रियान्वित करने वाली कंपनी जीआर इंफ्रास्ट्रक्चर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनपर आपराधिक लापरवाही का आरोप लगाया। पंवार ने आरोप लगाया है कि सोलन और परवाणु के बीच राजमार्ग के निर्माण में पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन किया गया। उन्होंने इस बात की जांच की मांग की है कि यह उल्लंघन लापरवाही के कारण हुआ या फिर मिलीभगत के कारण।
एफआईआर में कहा गया है कि: ‘पहाड़ की कटाई ढलान में की जानी चाहिए थी जबकि उसे सीधे काट दिया गया। कथित तौर पर जिन लोगों के भले के लिए यह परियोजना लाई गई, उन्हीं के लिए यह एक स्थायी समस्या बन गई है। यह आपराधिक उपेक्षा का मामला है जिससे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र, मानव जीवन और जान-माल का भारी नुकसान हुआ। लोग अपनी कृषि उपज को बाजार तक नहीं ले जा पा रहे जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।’
उत्तराखंड में भी झेली भारी तबाही
उधर उत्तराखंड में जहां गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के चार पवित्र मंदिरों तक जाने वाली चार धाम सड़क परियोजना के निर्माण में भी पहाड़ों की सीधी कटाई की गई और जिसके कारण ऐसी ही क्षति हुई, वहां इस तरह की कोई एफआईआर नहीं की गई। ऋषिकेश और कर्णप्रयाग के बीच रेल संपर्क के कारण तो और भी अधिक पर्यावरणीय क्षति हुई है।
चार धाम योजना ने भारत के पर्यावरण मानदंडों का तो बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया। पर्यावरण और वन मंत्रालय के नियमों के मुताबिक 100 किलोमीटर से अधिक लंबाई वाली किसी भी सड़क परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन जरूरी होता है, लेकिन यहां तो 900 किलोमीटर की परियोजना थी जो 529 भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से गुजरने वाली थी। लेकिन सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने नियमों को ‘बाईपास’ करने का तरीका निकाल लिया और पूरी परियोजना को 53 खंडों में बांटने का फैसला किया और फिर दावा किया गया कि इनमें से प्रत्येक एक स्वतंत्र परियोजना थी!
उत्तराखंड सरकार ने भी 1980 के वन संरक्षण अधिनियम से बचने के लिए इसी हथकंडे का इस्तेमाल किया। दिखाया गया कि जंगलों के केवल छोटे हिस्से काटे जा रहे हैं और यह स्वीकार नहीं किया कि ये खंड अलग नहीं थे और कुल मिलाकर मामला 50.8 हेक्टेयर के जंगल का था क्योंकि तब इसके लिए पहले मंजूरी लेनी पड़ती।
सड़क निर्माण में 'आपराधिक भूल'
उत्तरकाशी जिले में काम कर चुकी पर्यावरण कार्यकर्ता मल्लिका भनोट कहती हैं, ‘बड़ी चतुराई से पूरे वन क्षेत्र को छोटे-छोटे खंडों में विभाजित कर दिया गया।’ जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, बेंगलुरु में कई दशकों से हिमालयी क्षेत्र का अध्ययन कर रहे पर्यावरण भूविज्ञानी के एस वल्दिया ने कहा कि सड़क निर्माण प्राधिकरण ने राज्य के भूवैज्ञानिक और जल विज्ञान को नजरअंदाज करके ‘आपराधिक भूल’ की है। क्या करना है और क्या नहीं, इसे दस्तावेज की शक्ल दी जा चुकी है। इसके बावजूद इंजीनियर और निर्माता कंपनी ने उन्हें ताक पर रख दिया। ’
चार धाम परियोजना के निर्माण में नियमों और दिशानिर्देशों की अनदेखी के अलावा कई वैज्ञानिक मानदंडों का भी उल्लंघन किया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सड़कें बनाते समय इस भूकंप-प्रवण राज्य की भूकंपीय दोष रेखाओं को भी ध्यान में नहीं रखा गया! वल्दिया ने चेतावनी दी कि ये दोष रेखाएं सक्रिय हैं और कई जगहों पर सड़कें इन्हें काट रही हैं। इससे भी खतरनाक बात यह है कि कुछ सड़कें तो इन दोष रेखाओं के साथ-साथ बनाई गई हैं। नतीजा यह है कि जमीन में छोटी सी भी हलचल सड़कों के आधार की चट्टानों को कमजोर कर देती है जिससे ये हिस्से धंसने और भूस्खलन के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
वैसे ही, जल निकासी की ओर भी ध्यान नहीं दिया गया। इंजीनियरों ने वर्षा जल के निकलने की व्यवस्था नहीं की। वल्दिया का मानना है कि जहां 1-2- मीटर लंबे पुल की जरूरत थी, वहां इंजीनियरों ने छोटी पुलिया बनाईं। जहां नालियां बनी भी हैं, वे कटान के मलबे से भर गई हैं।
दुःस्वप्न बन गई इस साल की चार धाम यात्रा
इस सारी उपेक्षा ने चार धाम यात्रा को एक दुःस्वप्न में बदल दिया है। इस वर्ष, पिछले दो महीनों से उत्तराखंड में हुई लगातार बारिश के कारण जगह-जगह भूस्खलन हुए और रोजाना के आधार पर औसतन 500 से 800 तीर्थयात्रियों के चार धाम मार्ग में जगह-जगह फंसे होने की खबरें आती रहीं। कई घर ढह गए हैं। लोक निर्माण विभाग के सर्वेक्षण से पता चला है कि राज्य में 75 से ज्यादा पुल उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं। पिछले दो महीनों के दौरान कम-से-कम पांच प्रमुख पुल ढह गए हैं। हाल ही में प्रभावित होने वाला क्षेत्र मालन नदी पर बना पुल है जो कोटद्वार-सिगड्डी-हरिद्वार को जोड़ता है। इसके वजह से 50,000 लोग कटकर रह गए हैं।
राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (एसईओसी) से मिली जानकारी के मुताबिक, इस मानसून में अब तक 58 लोगों की जान चली गई है और 37 लोग घायल हुए हैं जबकि 19 अब भी लापता हैं। लेकिन एसईओसी अपनी वेबसाइट पर यह भी स्वीकारता है कि इस जानकारी को और अपडेट करने की जरूरत है। इसके अलावा राज्य में 1,167 घर क्षतिग्रस्त या पूरी तरह नष्ट हो गए हैं और कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा बह गया है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर जयराम रमेश की अध्यक्षता वाली स्थायी संसदीय समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि कैसे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बढ़ते पर्यटन ने अनधिकृत संरचनाओं के निर्माण को बढ़ावा दिया है, जिनमें होमस्टे, गेस्ट हाउस, रिसॉर्ट, होटल और रेस्तरां शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर हुए इन अवैध निर्माणों के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हुआ और इनके कारण स्थिति और खराब हुई।
समिति ने पर्यावरण मंत्रालय से हिमालय को बचाने के लिए पारिस्थितिकी रूप से नुकसानदेह गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की और उसने विस्तार से उन कदमों के बारे में बताया है जो हिमालयी क्षेत्र में कथित विकास परियोजनाओं के अंतर्गत होने वाले निर्माण पर नजर रखने की योजना है।
ईएसए अधिसूचना संशोधित करने की तैयारी
राज्य एक बड़ी त्रासदी से दो-चार हो रहा है, इसके बावजूद पुष्कर सिंह धामी सरकार इस पहाड़ी राज्य की जनता या पारिस्थितिक भलाई को लेकर चिंतित नहीं दिख रही। वरिष्ठ सरकारी सूत्र बताते हैं कि फरवरी, 1989 की पर्यावरण स्थल आकलन (ईएसए) अधिसूचना को संशोधित करने की तैयारी की जा रही है। इस ईएसए को खास तौर पर दून घाटी की सुरक्षा के लिए लाया गया था ताकि भूमि का उपयोग नहीं बदला जा सके, विशेषकर ऐसे मामलों में जहां भूमि चारागाह या अन्य पर्यावरणीय सुरक्षात्मक गतिविधियों के लिए अलग रखी गई हो। ईएसए को खत्म करने का मतलब होगा इलाके में प्रदूषण फैलाने वाले निर्माण की इजाजत जो फिलहाल इन अधिसूचित क्षेत्रों में प्रतिबंधित है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दून घाटी अधिसूचना जारी की गई थी और यह घाटी के पर्यावरण की रक्षा के लिए तैयार की गई थी और इसकी एक वजह यह भी थी कि यह एक प्रमुख जलग्रहण क्षेत्र है और गंगा बेसिन में बहने वाली कई नदियों का शुरुआती बिंदु।
इस अधिसूचना को हटाने से राज्य को इस संवेदनशील क्षेत्र में चूना पत्थर उत्खनन सहित कई हानिकारक उद्योग स्थापित करने की अनुमति मिल जाएगी। हालांकि वन मंत्री मंत्री सुबोध उनियाल ने बड़ी बेबाकी से कहा कि वह ईएसए को खत्म करना चाहते हैं ताकि राज्य में एक बार फिर बूचड़खानों और अन्य गैर प्रदूषक गतिविधियों को शुरू किया जा सके। हालांकि रीनू पॉल जैसे पर्यावरणविदों को आशंका है कि इसके बहुत बुरे नतीजे होंगे।
राज्य मशीनरी के भीतर एक मजबूत धड़ा एक बार फिर चूना पत्थर उत्खनन शुरू किए जाने का पक्षधर है जो चंद व्यापारियों और नेताओं के लिए नोट छापने की मशीन की तरह है। एक समय था जब चूना पत्थर उत्खनन ने देहरादून की पहाड़ियों को तहस-नहस कर दिया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के कारण इसे रोका जा सका था। रिटायर्ड सैनिकों की सेवाएं लेकर एक इको टास्क फोर्स की स्थापना की गई और इसकी मेहनत के कारण मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों को फिर से हरा-भरा करने में बड़ी सफलता मिली। पॉल कहती हैं, ‘अब वह सारी मेहनत बर्बाद हो जाने वाली है।’(navjivanindia.com)
अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय राकेश शर्मा से वहां से लौटने के बाद भारत में अक्सर लोग पूछा करते थे कि क्या उनकी अंतरिक्ष में भगवान से मुलाक़ात हुई.
इस पर उनका जवाब होता था, "नहीं मुझे वहां भगवान नहीं मिले." राकेश शर्मा 1984 में अंतरिक्ष यात्रा पर गए थे.
उनकी अंतरिक्ष यात्रा को तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं. और अब उनसे मिलने वाले उनके प्रशंसक सच्चाई और अपनी काल्पनिकता के बीच का फर्क बड़ी आसानी से मिटा रहे हैं.
वो बताते हैं, "अब मेरे पास आने वाली कई महिलाएं, अपने बच्चों से मेरा परिचय यह कह कर कराती है कि ये अंकल चांद पर गए थे."
अंतरिक्ष से लौटने के एक साल बाद तक राकेश शर्मा हमेशा प्रशंसकों से घिरे रहते थे. वो हमेशा कहीं ना कहीं जाते रहते थे. होटलों और गेस्ट हाउस में रुका करते थे.
समारोहों में वे लोगों के साथ तस्वीरें खिंचवाया करते थे. भाषण दिया करते थे.

प्रशंसक कपड़े तक फाड़ देते थे
बुजुर्ग महिलाएं दुआएं देती थीं. प्रशंसक उनके कपड़े तक फाड़ देते थे. ऑटोग्राफ लेने के लिए चीखा करते थे. नेता वोट बटोरने के लिए उन्हें अपने क्षेत्र में होने वाले जुलूसों में ले जाया करते थे.
वो पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "यह एक बिल्कुल ही अलग एहसास था. प्रशंसकों के इस दीवानेपन से मैं खीझ चुका था और थक चुका था. हर वक्त मुझे हंसते रहना होता था."
राकेश शर्मा 21 साल की उम्र में भारतीय वायु सेना से जुड़े थे और वहां वे सुपरसोनिक जेट लड़ाकू विमान उड़ाया करते थे.
पाकिस्तान के साथ 1971 की लड़ाई में उन्होंने 21 बार उड़ान भरी थी. उस वक्त वो 23 साल के भी नहीं हुए थे.
25 साल की उम्र में वे वायु सेना के सबसे बेहतरीन पायलट थे. उन्होंने अंतरिक्ष में 35 बार चहल कदमी की थी. और अंतरिक्ष में ऐसा करने वाले वो 128 वें इंसान थे.
जो बात सबसे आसानी से भुला दी गई वो यह थी कि जिस साल राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में जाने की उपलब्धि हासिल की वो साल सिर्फ़ इस उपलब्धि को छोड़ दें तो भारतीय इतिहास के सबसे ख़राब सालों में शुमार किया जाता है.
1984 का यह साल पंजाब के स्वर्ण मंदिर में सिख अलगाववादियों के ख़िलाफ़ फ़ौजी कार्रवाई और इसके प्रतिशोध में सिख अंगरक्षकों के द्वारा इंदिरा गांधी की हत्या के लिए भी जाना जाता है.
इसके बाद देश भर में सिखों के ख़िलाफ़ दंगे भड़क गए थे.
इस साल के आख़िरी में भोपाल गैस कांड में हज़ारों लोग मारे गए थे. यह दुनिया के सबसे त्रासदीपूर्ण दुर्घटनाओं में से एक था.
अंतरिक्ष में जाने से पहली कड़ी मेहनत
इंदिरा गांधी 1984 से पहले भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों को शुरू करने के लिए प्रयासरत थी. इसके लिए वो सोवियत संघ से मदद ले रही थीं.
राकेश शर्मा को 50 फाइटर पायलटों में टेस्ट के बाद चुना गया था. उनके अलावा रवीश मल्होत्रा को भी इस टेस्ट में चुना गया था और इन दोनों को रूस प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था.
अंतरिक्ष में जाने से एक साल पहले राकेश शर्मा और रवीश मल्होत्रा स्टार सिटी गए थे जो कि मॉस्को से 70 किलोमीटर दूर था और अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण केंद्र था.
राकेश याद करते हुए कहते हैं, "वहां बहुत ठंड थी. हमें बर्फ में एक इमारत से दूसरी इमारत तक पैदल जाना होता था."
उनके सामने जल्दी से जल्दी रूसी भाषा सीखने की चुनौती थी. क्योंकि ज़्यादातर उनकी ट्रेनिंग रूसी भाषा में ही होने वाली थी. हर दिन वो छह से सात घंटे रूसी भाषा सीखते थे. इसका असर यह हुआ कि उन्होंने तीन महीने में ठीक-ठाक रूसी सीख ली थी.
राकेश शर्मा की विनम्रता
उनके खान-पान पर भी ध्यान रखा जाता था. ओलंपिक ट्रेनर उनके स्टेमिना, गति और ताक़त पर नज़र रखे हुए थे और उन्हें प्रशिक्षित कर रहे थे.
प्रशिक्षण के दौरान ही मुझे बताया गया कि मुझे चुना गया है और रवीश मल्होत्रा बैकअप के रूप में होंगे.
राकेश शर्मा बड़ी विनम्रता से मानते हैं, "यह कोई बहुत मुश्किल नहीं था."
लेकिन विज्ञान पर लिखने वाले लेखक पल्लव बागला का मानना है कि राकेश शर्मा ने 'विश्वास की ऊंची छलांग लगाई है.'
उन्होंने लिखा है, "वो एक ऐसे देश से थे जिसका कोई अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम नहीं था. उन्होंने कभी अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना नहीं देखा था. लेकिन उन्होंने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में एक दूसरे देश जाकर कठोर प्रशिक्षण हासिल किया. नई भाषा सीखी. वो वाकई में एक हीरो हैं."
अंतरिक्ष में जाने का 'बोरिंग' दिन
तीन अप्रैल 1984 को एक सोवियत रॉकेट में राकेश शर्मा और दो रूसी अंतरिक्ष यात्रियों, यूरी माल्यशेव और गेनाडी सट्रेकालोव अंतरिक्ष के लिए रवाना हुए थे.
यह उस वक्त के सोवियत रिपब्लिक ऑफ़ कजाख़स्तान के एक अंतरिक्ष केंद्र से रवाना हुई थी.
राकेश शर्मा उस लम्हे को याद करते हुए कहते हैं, "जिस समय हम रवाना हो रहे थे वो बहुत ही बोरिंग था क्योंकि हम लोगों ने इसका इतना अभ्यास किया था कि यह किसी रूटीन की तरह हो गया था."
जब मैंने पूछा कि पृथ्वी से अंतरिक्ष में जाते वक्त क्या वे परेशान भी थे.
राकेश का जवाब था, "देखिए अंतरिक्ष में जाने वाला मैं 128वां इंसान था. 127 लोग ज़िंदा वापस लौट आए थे. इसलिए घबराने की कोई ऐसी बात नहीं थी."
मीडिया ने इस अंतरिक्ष मिशन को भारत और सोवियत संघ की दोस्ती को और प्रगाढ़ होने के रूप में देखा.
राकेश शर्मा और उनके साथ जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने अंतरिक्ष में करीब आठ दिन गुजारे.
सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ताँ हमारा

राकेश शर्मा वो पहले इंसान थे जिन्होंने अंतरिक्ष में योग का अभ्यास किया. उन्होंने योगाभ्यास करके यह जानने की कोशिश की इससे गुरुत्व के असर को कम करने में मदद मिल सकती है क्या.
उन्होंने बताया,"यह बहुत मुश्किल था. आपके पैरों के नीचे किसी भी वजन का एहसास नहीं होता है. आप पूरी तरह से हवा में तैरते रहते हैं. इसलिए हमें ख़ुद को थाम कर रखने के लिए कोई उपाय कर के रखना था."
जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से पूछा था कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिख रहा है तो उन्होंने हिंदी में कहा था, 'सारे जहां से अच्छा'.
यह मोहम्मद इक़बाल का एक कलाम है जो वो स्कूल के दिनों में हर रोज़ राष्ट्रीय गान के बाद गाया करते थे.
राकेश शर्मा बयां करते हैं, "यह मुझे अच्छी तरह से याद है. इसमें कुछ भी देशभक्ति के उन्माद जैसा नहीं था. वाकई में अंतरिक्ष से भारत बहुत मनमोहक दिख रहा था."
न्यूयॉर्क टाइम्स ने उस वक्त लिखा था कि लंबे समय तक भारत की अपनी कोई मानव अंतरिक्ष यात्रा नहीं होने वाली है. बहुत लंबे समय तक राकेश शर्मा अंतरिक्ष जाने वाले इकलौते भारतीय बने रहेंगे.
अंतरिक्ष से लौटने के बाद
राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष से लौटने के बाद फिर से एक जेट पायलट के तौर पर अपनी ज़िंदगी शुरू की.
उन्होंने जगुआर और तेजस उड़ाए. उन्होंने बोस्टन की एक कंपनी में चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर के तौर पर भी सेवा दी जो जहाज, टैंक और पनडुब्बियों के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करती थी.
क्या फिर अंतरिक्ष में जाना चाहेंगे?
रिटायर होने के बाद राकेश शर्मा ने अपने सपनों का घर बनाया. इस घर की छतें तिरछी हैं, बाथरूम में सोलर हीटर लगे हुए हैं, बारिश का पानी एक जगह इकट्ठा होता है.
वो अपनी इंटीरियर डिजाइनर बीवी मधु के साथ इस घर में रहते हैं. उनके ऊपर एक बायोपिक बनने की चर्चा है जिसमें चर्चा ये है कि आमिर खान राकेश शर्मा की भूमिका निभाएंगे.
मेरा उनसे आख़िरी सवाल था. क्या आप फिर से अंतरिक्ष जाना चाहेंगे?
अपनी बाल्कनी से बाहर देखते हुए उन्होंने कहा, "मैं अंतरिक्ष में दोबारा जाना पसंद करूंगा. लेकिन इस बार मैं एक पर्यटक के तौर पर जाना चाहूंगा. जब मैं वहां गया था तो हमारे पास बहुत सारे काम थे करने को. (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
विगत सौ साल में मनुष्य ने प्रकृति का जितना विनाश किया है उतना हमारे पूर्वजों ने पिछ्ले हजार साल में नहीं किया था।आजादी के पहले अंग्रेजों ने वनों की अंधाधुंध कटाई और लकड़ी की ढुलाई के लिए सुदूर क्षेत्रों तक रेल लाइन पहुंचाने का काम इसीलिए तेज गति से किया था। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद भी हमारी सरकारों ने प्रकृति की सबसे बडी सौगातों वन और नदियों पर ध्यान नहीं देकर बड़ा अक्षम्य अपराध किया है। इसी वजह से वन क्षेत्र कम हुए हैं और बड़े बड़े वन अंचलों में वनों की गुणवत्ता घटी है जिसके दुष्परिणाम स्वरूप नदियों में भी किनारों की मिट्टी के कटाव के कारण उथलापन आया है। औद्योगिकरण, उपभोक्तावादी अप संस्कृति, व्यक्तिगत स्वार्थ और शहरीकरण की अंधी दौड़ ने हमे प्रकृति से इतना विमुख कर दिया कि हमारी पवित्र देवी सम पूज्य सैकड़ों नदियां कब नाला बन गई हमे इसका अहसास ही नहीं रहा। सरकारी विज्ञापनों में हमे नदियों पर बने बांधों में लबालब भरा पानी और खेतों में लहलहाती फसलों के आकर्षक विज्ञापन तो दिखाए गए लेकिन प्रकृति के विद्रूप बनी सड़ती गंधाती नदियों, बंजर होती भूमि, हर साल नीचे धंसते भू जल स्तर, नंगी होती पहाडिय़ों और पेस्टीसाइड के अंधाधुंध होते उपयोग से गम्भीर बीमारियों से जूझते हुए तिल तिल मरते बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों को जान बूझकर दूर रखा गया। सरकार के चमकीले विज्ञापनों पर पलता प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी प्रकृति को रौंदती सरकारी नीतियों और उसके गंभीर दुष्परिणामों को जनता की नजरों से छिपाने के लिए उतना ही अपराधी है जितनी केंद्र और राज्यों की सरकारें हैं।
प्रकृति का संकट केवल किसी एक देश का संकट नहीं है अब यह वैश्विक संकट बन गया है। जलवायु परिर्वतन के दुष्प्रभाव चारों तरफ दिखाई पड़ रहे हैं। जहां जहां प्रकृति से जितनी ज्यादा छेड़छाड़ की गई है वहां वहां इसके दुष्परिणाम भी उतने ही शक्तिशाली स्वरूप में उपस्थित हो रहे हैं। इसी तरह जहां जहां प्रकृति की भौतिक संरचनाएं ज्यादा संवेदनशील हैं, जैसे हिमालय पर्वत श्रृंखला, वहां अक्सर इसका दुष्प्रभाव उतना ही ज्यादा है। चाहे कुछ साल पहले घटी केदारनाथ की तबाही हो या पिछले साल जोशीमठ में दरकती धरती हो या हाल ही में सामने आई हिमाचल प्रदेश की आपदा हो, ये सब घटनाएं हमे खतरे की घंटी बजाकर चेताने की कोशिश कर रही हैं लेकिन इतनी भीषण आपदाएं भी हमारे सरकारी नक्कारखाने में तूंती की आवाज बनकर रह गई हैं। सरकार पूंजीपतियों की लूट के हथियार बने प्रकृति को रौंदते विकास के हाथी को रोकने का कोई गंभीर प्रयास नहीं करती। एक बड़ा कारण यह भी है कि विकास का यही हाथी भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाही के लिए घूस और कमीशन के छत्तीस भोग उपलब्ध कराता है और यही राजनीतिक दलों के चंदे का प्रमुख स्रोत है जिसके बूते चुनाव लडक़र सत्ता का सुख भोगा जाता है। इन परिस्थितियों में सरकारों और सरकारों की गोदी में खेलती मीडिया से उम्मीद करना बेकार है। कोई बड़ा जन आंदोलन ही अब हमे बचा सकता है।
के एन गोविंदाचार्य के नेतृत्व में शुरु हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने प्रकृति केंद्रित विकास को अपने आंदोलन की केंद्रीय थीम बनाया है । गांधी भवन भोपाल में इस आंदोलन के देश भर से जुटे कार्यकर्ताओं के तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में अधिकांश वक्ताओं ने इसी विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त की है। प्रकृति विरोधी वर्तमान विकास के अश्वमेघ को कैसे रोका जाए और इसके दुष्परिणामों का सहज समाधान निकट भविष्य में कैसे हो, इसके लिए बहुमत यही रहा कि हमे सादगी और आवश्यकता के लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग का गांधीवादी संकल्प ही इस संकट से बचा सकता है। इसके अलावा कोई अन्य ब्लू प्रिंट या शॉर्ट कट दिखाई नहीं देता ।
अपूर्व गर्ग
ये महिलाओं को तय करना है उन्हें क्या पहनना ओढऩा है।
बुर्का-घूंघट या बिना बुर्का-घूंघट लिबास ये उनका निजी चयन है।
जिन्हें इस इस वेशभूषा से असुविधा है ,जिन्हें लगता है उनके सामने वो महिलायें भी बिना घूंघट या बुकऱ्े के संवाद करे, आराम से रहें तो उनकी जि़म्मेदारी बनती है कि वो ये सुनिश्चित करें, महिलाओं को भरोसा दिलाएं कि वे उनके अधिकारों को लेकर संवेदनशील हैं और उनका व्यक्तित्व ऐसा हो जो महिलाओं के लिए सम्मानजनक हो।
ये बात सबसे अच्छी तरह सिखा गए महात्मा गाँधी।
महात्मा गाँधी जब दिल्ली बिरला हाउस में अपना अंतिम उपवास कर रहे थे।
इस उपवास से ये भी हुआ कि कुछ दिनों बाद गांधीजी की जान बचाने लोगों ने अनशन शुरू कर दिए और हिन्दू-मुसलमान गले मिलने लगे।
करीब सौ बुर्कापोश मुसलमान स्त्रियां गांधीजी से अनशन तोडऩे की प्रार्थना करने पहुंचीं। उन्होंने कहा वे अब सुरक्षित हैं और पिछले तीन दिनों से उनके साथ अनशन कर रही हैं।
गांधीजी ने बुर्कापोश स्त्रियों से कहा -‘इस्लाम के नियम के अनुसार पिता ,पुत्र ,भाई और सम्बन्धियों से तो पर्दा नहीं किया जाता . यदि आप मुझे अपना पिता और भाई समझती हैं तो मुझसे यह पर्दा क्यों है ?’
एक सौ स्त्रियों के बुर्के सहसा उठ गए।
गांधीजी ने सभी को आश्वस्त किया ज्यों ही ये सांप्रदायिक द्वेष समाप्त हो जाएगा वे अनशन समाप्त कर देंगे।
संजय श्रमण
जर्मनी में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान डिनर के बाद एक जर्मन पति अपनी गर्भवती पत्नी से बात कर रहे थे, अपनी अजन्मी बिटिया के बारे में वे योजना बना रहे थे, क्या नाम रखेंगे कैसे उसका अपना कमरा सजाएंगे कैसे उसके जन्म पर पार्टी करेंगे इत्यादि। साथ में उनकी एक अन्य बिटिया भी थी जो अपनी आने वाली बहन के लिए योजना बना रही थी और अपनी माँ से बार-बार कुछ पूछ रही थी।
इस दम्पत्ति को गर्भ में पल रही बिटिया की जानकारी हो चुकी थी। उनके देश का कानून भारत की तरह इस जांच पर पाबंदी नहीं लगाता, भारत में अगर अजन्मी बच्ची का लिंग पता चल जाए तो उसके लिए कैसी प्लानिंग होगी आप कल्पना कर सकते हैं। पूरी संभावना है कि बच्ची की गर्भ में ही हत्या कर दी जाए। इसीलिये भारत में गर्भस्थ शिशु की लिंग जांच विरोधी कानून बनाना पड़ा है।
आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
व्हाट्स एप और फेसबुक के जरिये जर्मन बच्चे पढ़ाई और स्कूल-कॉलेज के असाइंमेंट हल करने और प्रोजेक्ट इत्यादि बनाने के लिए नेटवर्किंग करते हैं. भारत के बच्चे इन साधनों से जातीय, धार्मिक दंगों का पाठ पढ़ते हैं और राजनीतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक प्रोपेगेंडा का शिकार बनाये जाते हैं। आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
यूरोपीय समाजों में ट्रेफिक, सार्वजनिक स्थलों (पार्क, सडकों, स्कूलों, कालेजों) आदि में ष्टष्टञ्जङ्क कैमरों से सुरक्षा और अनुशासन को बेहतर बनाने का काम लिया जाता है। भारत में आजकल पूजन पंडालों में देवी-देवताओं की लाइव पूजा को बड़े स्क्रीन पर दिखाया जाता है। साइबर पूजा चल निकली है. मोबाइल एप के जरिये कर्मकांड और पूजा पाठ किया जा रहा है।
आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
विज्ञान और तकनीक से औद्योगीकरण और मशीनीकरण करने वाले यूरोपीय समाज ने अपने पर्यावरण को बेहतर बनाने का तरीका भी खोज लिया है. लेकिन भारत पाकिस्तान बांग्लादेश जैसे मुल्क औद्योगीकरण से उत्पादन जरूर कर रहे हैं लेकिन अगली पीढिय़ों के लिए जहरीला वातावरण भी तैयार कर रहे हैं। आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
ऐसे कई और उदाहरण हैं। इन सबका एक ही कारण है. दक्षिण एशियाई समाजों ने लोकतंत्र, मानव अधिकार, सभ्यता और वैज्ञानिक सोच की लड़ाई अपनी जमीन पर नहीं लड़ी। निश्चित ही कोलोनियल लूट ने भी उन्हें कमजोर बनाया है. कुल मिलाकर इन समाजों में सामाजिक चेतना, सभ्यता और लोकतंत्र की समझ ही विकसित नहीं हो सकी है।
विज्ञान और तकनीक को कहीं से उधार ले आने से ये तय नहीं होता कि आपका समाज उसे इस्तेमाल करने की बुद्धि भी हासिल कर चुका है। इन ताकतवर साधनों को इस्तेमाल करने की बुद्धि कहीं से उधार नहीं ली जा सकती। बन्दर अपने हाथ में उस्तरा जरूर ले सकता है लेकिन वो कब खुद की और दूसरों की नाक काटेगा या उससे खुद की या दूसरों की रक्षा करेगा ये बुद्धि उसे अपने परिश्रम से ही हासिल करनी होगी।
अरुण कान्त शुक्ला
अगस्त के महीने को यदि परसाई का महीना कहा जाए तो कम से कम साहित्य जगत में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। 22 अगस्त 2024 को वे इस दुनिया में आये और 10 अगस्त 1995 को दुनिया से अलविदा कह गये। उनका लेखन काल लगभग भारत की स्वतंत्रता से प्रारंभ हुआ और बाद के लगभग पचास वर्षों तक निरंतर बना रहा7 उनका लेखन काल भारत की आजादी के वे वर्ष थे जब 250 वर्षों की अंग्रेजों की गुलामी और लूट खसोट से मुक्त हुआ भारत न केवल अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था बल्कि स्वयं के निर्माण के लिये उसने निजी और सरकारी पूंजी के जिस मिले जुले रास्ते पर चलने का निर्णय सत्ता में आये लोगों ने लिया था, उसके दुष्परिणाम भी साफ़ साफ़ देख रहा था। परसाई भारत के आम इंसान की अभिलाषाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूरी किये जाने के पक्षधर विचारक थे और एक विचारक के रूप में उन्होंने समाज की हर अभिलाषा को स्वर दिया और हर राजनीतिक –सामाजिक विसंगति पर प्रहार किया। हरिशंकर परसाई के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी निडरता है। अपने समय की विसंगतियों और संकीर्णताओं पर उन्होंने बेपरवाह लिखा और इसकी कीमत भी चुकाई। उनकी कलम से तिलमिलाकर लोगों ने उन पर हमले किए। आर्थिक अभाव लगातार बना रहा, फिर भी उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। साहित्य जगत में आज इस तरह के सवाल अक्सर पूछे जाते हैं कि प्रेमचन्द होते तो क्या लिख रहे होते? परसाई होते तो क्या लिख रहे होते?
उनके निधन के लगभग 4 वर्ष पूर्व भारत में घोषित रूप से पूंजीपति और कारपोरेट परस्त आर्थिक नीतियों और जिस धार्मिक, साम्प्रदायिक राजनीति का उफान हम देख रहे हैं, उस राजनीति की शुरुवात हो चुकी थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जिस प्रहार को आज का स्वतन्त्र चिंतन झेल रहा है, उसके बीज दिखाई देने लगे थे।परसाई के लेखन के स्वर्णिम युग में जो सामाजिक विसंगतियाँ बिल से सर बाहर निकाल रही थी, उनका खुला नृत्य प्रारंभ होना शुरू हो गया था। परसाई यदि असामयिक मृत्यु को प्राप्त नहीं करते तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि वे आज के नफरती हालातों पर, राजनीति के धर्म के साथ घालमेल पर, देश में 1991 के बाद आईं तथाकथित उदारवादी नीतियों जो शासन और पूंजीपति के भाईचारे के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं, अवश्य ही नियमित और करारी चोट कर रहे होते और न केवल शासन बल्कि समाज के उस हिस्से की भी हिटलिस्ट में होते जो भारत की विविध सभ्यता को हिंदूवादी बनाने के लिये हाथ में तलवार और त्रिशूल लिये सडक़ों पर घूम रहा है।या वे पंसारे-कलबुर्गी या गौरी लंकेश की गति को प्राप्त कर चुके होते।या, फिर शायद हाल यह होता कि उन पर उनकी पहले की लिखी किसी ‘पंच लाइन’ के आधार पर कोई पंचायत स्वत: संज्ञान लेकर उन्हें सजा सुना चुकी होती। या फिर देश के अनेक स्वघोषित बुद्धिजीवी उनके इस वाक्य, ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं’ के आधार पर उनके खिलाफ मानहनि का मुकदमा दायर कर चुके होते। या फिर अंतरात्मा की आवाज या देशहित या अपने क्षेत्र, राज्य की जनता के हित में करोड़ों रुपये लेकर दल बदल कर सत्ता सुख पाने वाले लोग, ‘अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिए। जरूरत पड़ी तो फैलाकर बैठ गए, नहीं तो मोडक़र कोने से टिका दिया’ जैसी लाइन लिखने के लिए परसाईजी को सबक सिखाने का निर्देश अपने कार्यकर्ताओं को दे चुके होते।
प्रश्न वहीं पर है कि परसाई होते तो क्या लिख रहे होते? परसाई जी की छवि एक सशक्त व्यंग्यकार की है। मेरा मानना है कि वे उससे बड़े लोकशिक्षक थे। उनके व्यंग्य जहां हृदय पर चोट करते हैं, करुणा जगाते हैं, वहीं विसंगति को दूर करना चाहिये की सोच को भी पैदा करते हैं। उनके निबंध समाज की गूढ़ बातों के रहस्यों को खोलते हैं7 मैं सिर्फ दो उदाहरण से अपनी बात कहूंगा। जब उन्होंने अपना निबंध युग की पीड़ा का सामना लिखा था तब भारत को स्वतंत्र हुए मात्र 17 वर्ष हुए थे तब उन्हें देश के भूखे-नंगे लोग दिख रहे थे, आज जब देश के राजनेता दम्भ से भरकर ये कहते हैं कि वे देश के 85 करोड़ लोगों को 35 किलो अनाज लगभग मुफ्त दे रहे हैं तो वे कितने कठोर होकर उस पर प्रहार नहीं करते। उन्होंने अपने निबंध पगडंडियों का ज़माना में शिक्षा क्षेत्र में बेईमानी की परतें उधेडी थीं7 उन्होंने लिखा था " देखता हूँ, हर सत्य के हाथ में झूठ का प्रमाणपत्र है। आज जब सत्य का पूर्ण लोप हो गया है और लोकतंत्र के तथाकथित रूप से मंदिर कहे जाने वाले सदनों और विधानसभाओं तक में असत्य तालियों की गडग़ड़ाहट के साथ स्थापित किया जाता है, तो निश्चित रूप से उनकी लेखनी और पैनी होकर प्रहार करती।
परसाई मात्र व्यंग्यकार नहीं थे। वे लोक शिक्षक थे, समाज-निर्देशक थे। परसाई का लेखन केवल सुधार के लिये नहीं होता था।वे बदलाव के लिये लिखते थे। वे बदलाव के लिये केवल लेखन पर नहीं लेखक की जमीनी जुड़ाव की बात भी करते थे। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया। जबलपुर में भडक़े दंगे रुकवाने के लिए गली-गली घूमे। मजदूर आंदोलन से जुड़े। लोक शिक्षण की मंशा से ही वे अखबार में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। उनके स्तंभ का नाम था, ‘पूछिए परसाई से’ पहले हल्के और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे। धीरे-धीरे परसाईजी ने लोगों को गंभीर सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया। यह सहज जन शिक्षा थी। लोग उनके सवाल-जवाब पढऩे के लिए अखबार का इंतजार करते थे।
परसाई अपने बारे में वे कहते थे, ‘मैं लेखक छोटा हूं, लेकिन संकट बड़ा हूं।’ आज साहित्य में ऐसे बड़े संकटों की घोर आवश्यकता है, जब सत्ता की चोटी पर बैठे लोग बुद्धिजीवियों को राष्ट्रद्रोही और देशद्रोही के तमगों से नवाज रहे हैं और उनसे खुलकर कह रहे हैं कि या तो हमारी प्रशंसा में लिखो, समर्थन में लिखो या फिर राष्ट्रद्रोही का तमगा गले में लटकवाने के लिये तैयार रहो। ऐसे समय में परसाईजी ज्यादा प्रासंगिक हैं। आज वे होते तो मौजूदा संकटों पर उनकी चोट भी बहुत बड़ी होती, शायद सबसे बड़ी होती, गहरी होती।
‘जब मेरे बच्चे बड़े हो रहे थे, तब मुझे बड़ा दुख होता था कि वे अपने नाना जी के बिना बड़े हो रहे हैं। उनसे कुछ सीख नहीं सकते, उन्हें देख नहीं सकते। इस बात का भी दुख है कि किसी मुद्दे पर बात करने के लिए वे नहीं है।’ मुक्ता दाभोलकर ने बीबीसी मराठी से बातचीत में बताया है कि वह अपने पिता डॉ। नरेंद्र दाभोलकर को कैसे याद करती हैं और उन्होंने जो काम शुरू किया था उसे कैसे आगे बढ़ा रही हैं। ठीक दस साल पहले 20 अगस्त, 2013 को सामाजिक कार्यकर्ता और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एएनआईएस) के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। लेकिन दाभोलकर की हत्या के बाद भी उनके विचारों पर आधारित आंदोलन रुका नहीं है। बीते दस साल उनके आंदोलन और आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए कैसे रहे हैं, यह हमें उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर ने बताया है।
बीबीसी मराठी संवाददाता जान्हवी मूले से मुक्ता दाभोलकर ने जो बताया है, उसका संपादित अंश पढि़ए। डॉक्टर दाभोलकर की हत्या के बाद यही सोचा कि चाहे कुछ भी हो, आंदोलन के काम को इसी जोश के साथ जारी रखना है। यह वैचारिक ही नहीं बल्कि भावनात्मक प्रतिक्रिया थी। किसी व्यक्ति की हत्या करके उनके विचारों को ख़त्म करने की कोशिश की गई थी। यही कारण है कि बीते दस सालों में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के हम सभी कार्यकर्ताओं ने अपनी क्षमता से अधिक काम करने का प्रयास किया। इसमें राज्य भर में घूमना, लोगों से मिलना, व्याख्यान देना और संगठन की गतिविधियों को पहले की तरह जारी रखना जैसी बातें शामिल हैं।
हम पांच साल से उस जगह पर जा रहे हैं जहां डॉक्टर दाभोलकर को गोली मारी गई थी। हमारी मांग यही थी कि जांच ठीक से होनी चाहिए। डॉक्टर की हत्या से पहले ही जाति पंचायतों की मनमानी के खिलाफ काम शुरू हो चुका था। पिछले दस वर्षों में वह काम और बढ़ गया है। 2017 में जादू-टोना विरोधी सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अधिनियम पारित किया गया था। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने जादू-टोना विरोधी कानून के तहत दर्ज मामलों की पैरवी करने में भी महत्वपूर्ण काम किया।
जादू-टोना विरोधी अधिनियम की सफलता
कुछ साल पहले यह कानून कर्नाटक में भी पारित हुआ था, लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, वहां ज्यादा मामले दर्ज नहीं किये गये थे। हम जानते हैं कि कानून पारित करने से कोई बदलाव नहीं आता, बल्कि कानून लागू करने की जिद करने वाले लोगों की जरूरत होती है।
महाराष्ट्र में अब अगर किसी भी तरह का जादू-टोना आदि होता है तो अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति कार्यकर्ताओं और आम लोगों के साथ-साथ पुलिस का भी मानना है कि इसे संज्ञान में लिया जाना चाहिए। महाराष्ट्र में इस कानून के तहत एक हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज किये गए। इसका मतलब है कि यहां आंदोलन जिंदा है।
10 साल बाद मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगी, जादू-टोना विरोधी कानून के खिलाफ कई आपत्तियां दर्ज की गईं, कहा गया कि ‘यह कानून धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करेगा’ या ‘इस कानून का इस्तेमाल एक ही धर्म के लोगों के खिलाफ होगा।’ आम लोगों में ऐसी आपत्तियों से डर उत्पन्न होता है। राजनेता भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से निर्णय लेने से डरते हैं। लेकिन जादू टोना कानूनों के आंकड़े साबित करते हैं कि ये सभी आपत्तियां झूठी हैं। इसमें सभी जादू टोने में हर जाति और हर धर्म के गुरू शामिल हैं। साथ ही यह बात भी स्पष्ट हुई कि इससे किसी भी तरह के धार्मिक आचरण में कोई समस्या नहीं होती है। बावजूद इन सबके, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के सामने कोई आसान चुनौती नहीं थी।
श्रम और राजनीतिक इच्छाशक्ति
हमारे समाज में विज्ञान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का दौर है। बिना किसी प्रमाण के यह दावा किया जाने लगा है कि पौराणिक काल में भारत के पास सब कुछ था, और यह प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है।
दूसरी ओर, संगठित तौर पर भी अंध विश्वास की जड़ें मजबूत होने लगी हैं। राम रहीम बाबा और बागेश्वर धाम जैसे बाबा अभी भी हैं जो कॉरपोरेट तरीके से अपना साम्राज्य चलाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके राजनीतिक संबंध भी हैं। यह कॉरपोरेट प्रचार सोशल मीडिया पर भी फलता-फूलता नजर आ रहा है। जैसे-जैसे ऐसे लोग मजबूत हो रहे हैं, तेजी से बढ़ रहे हैं, आंदोलन के सामने चुनौती बढ़ती दिख रही है। राजनेता इनके खिलाफ कोई स्टैंड लेते नजर नहीं आ रहे हैं।
दरअसल, भारतीय संविधान के अनुसार वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना भारतीय नागरिक का मूल कर्तव्य है। लेकिन राजनेता न तो यह कर्तव्य निभाते दिख रहे हैं और न ही अपने व्यवहार से ऐसा कोई मानक स्थापित कर रहे हैं। राजनेताओं को लगता है कि लोगों को खुश रखना होगा। अगर उन्हें लगता है कि किसी चीज़ से लोगों को ठेस पहुंचेगी, तो वे ऐसा कुछ नहीं करते हैं, ऐसा करने से बचते हैं। इसके विपरीत, बड़ी संख्या में ऐसे नेता हैं जो लोगों की भावुकता का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते हैं। उच्च संवैधानिक पद पर बैठे राजनीति में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो वैज्ञानिक सोच को स्पष्टता से जाहिर करते हैं।
अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने एक ओर जहां आंदोलन का काम जारी रखा है, वहीं दूसरी ओर हत्याकांड की जांच सुचारू हो, इसके लिए भी कोशिश की है। हमारे प्रयासों की वजह से मामले की हाई कोर्ट से निगरानी हो रही है। हम इस जांच की हाई कोर्ट की निगरानी को न रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट गए हैं। मुक़दमा चल रहा है, और यह महत्वपूर्ण है कि समय से इसमें न्याय हो।
चार हत्याओं के दस साल बाद भी मास्टरमाइंड नहीं पकड़ा जा सका है। (जैसे नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी की भी हत्या हुई थी।) चार हत्याओं के बाद भी मास्टरमाइंड तक पहुंचना मुश्किल नहीं होता। लेकिन दस साल में उन्हें पकडऩे की राजनीतिक इच्छाशक्ति हमने कभी नहीं देखी, चाहे सरकार किसी की भी रही हो। आशंका है कि भविष्य में भी ऐसी घटनाएं होंगी। चूंकि हत्या करने वाले लोगों को व्यवस्था से शह मिल रही है, इसलिए दावे से नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा नहीं होगा।
सोशल मीडिया की चुनौती
दस साल पहले, सोशल मीडिया हर किसी के दैनिक जीवन का उतना हिस्सा नहीं था जितना आज बन गया है। इसलिए आज झूठ भी तेजी से फैलता है। ऐसे में हमारे सामने चुनौती जरूर बढ़ गई है। जब भी सोशल मीडिया पर कुछ गलत बातें, अंधविश्वास फैलाया जाता है तो हम तुरंत उसका जवाब तैयार करके प्रसारित कर देते हैं। बेशक, सोशल मीडिया ऐसा मॉडल है कि वहां जिस बात पर विवाद होता है वो बात ज़्यादा फैलती है। जहां दावे झूठे साबित हुए हों या फिर विवादों को सुलझाने का प्रयास किया गया है, वे सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होते हैं। यह हम सभी के लिए एक बड़ी चुनौती है। मुझे लगता है कि छोटे बच्चों के बीच सोशल मीडिया के संदेशों में सच और झूठ की पहचान सिखाने पर काम करने की आवश्यकता है। क्योंकि अंतत: अंधविश्वास को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही खत्म किया जा सकता है। यह सबूत खोजने और फिर विश्वास करने का एक साधारण मामला है।
आपको अपनी पोस्ट में भी ऐसा ही करना सीखना चाहिए। लेकिन हमें बड़ी संख्या में युवाओं को यह सिखाने की जरूरत है कि किसी भी दावे से संबंधिति सबूत को कैसे खोजें।
इस दौरान जब मैंने कुछ बच्चों से पूछा तो शहर के कॉलेजों में पढ़ रहे बच्चे फैक्ट फाइंडिंग वेबसाइट का नाम नहीं बता सके। हम जो लिख रहे हैं, पढ़ रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात जो साझा कर रहे हैं, वह सच है या झूठ? हमें इसे हर तरफ से जांचना सीखना चाहिए। इस दिशा में हमें और अधिक काम करना चाहिए। ये काम आज हमारे बच्चों के लिए ही नहीं, समाज के हर बच्चे के लिए ज़रूरी है। हर किसी को इस विचार की आवश्यकता होगी। नि:संदेह, कोई भी आंदोलन केवल विचारधारा से उत्पन्न नहीं होता है। इसलिए हम विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
हमारा जीवन कितना बदला
डॉ. दाभोलकर की हत्या के बाद हमारी निजी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। हमारा व्यक्तित्व और हमारा जीवन अनुभव बदल गया है। हमने जितना हो सके उतना देने की कोशिश की है। यही सोच है जो तर्कसंगत सोच वाले लोगों को ताकत देती है कि जो जैसा है, वैसा ही उसका सामना करना है। जैसी बाहरी चुनौतियाँ थीं, वैसी ही कुछ आंतरिक चुनौतियाँ भी थीं। हम इससे सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे और काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जैसे-जैसे साल बीतते हैं, हम अलग-अलग चरणों में उन चीज़ों का दर्द महसूस करते हैं जो हमने खो दी हैं, ख़ासकर डॉ. दाभोलकर की उपस्थिति। जैसे-जैसे समय बीतता है दुख की यह भावना और अधिक तीव्र होती जाती है। वह गहरी उदासी आपको नीचे नहीं खींचती, बल्कि वह वैसे ही बनी रहती है।
यदि किसी प्रियजन की असामयिक हत्या हो जाए, तो लोगों को उसका दर्द सहना पड़ता है, इसका कोई विकल्प नहीं है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
इस 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री को लगातार दसवीं बार भाषण देने का सौभाग्य मिला था। इस भाषण ने उन्हें सर्वाधिक बार लाल किले से भाषण देने वाले चुनिंदा प्रधानमंत्रियों यथा मनमोहन सिंह, इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू आदि प्रधान मंत्रियों की श्रेणी में पहुंचा दिया। भारतीय जनता पार्टी के वे सर्वाधिक झंडा फहराने वाले नेता पहले ही बन चुके हैं। इतनी बार लाल किले से झंडा फहराने वाले किसी भी प्रधानमंत्री से उत्तरोत्तर बेहतर भाषण की उम्मीद निरंतर बढ़ती जाती है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भले ही अमृत महोत्सव काल के प्रधान मंत्री के इस उदबोधन की प्रशंसा करें लेकिन दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष लाल किले से प्रधानमंत्री के उद्बोधन की अधिकांश नागरिकों और विशेष रूप से प्रबुद्धजनों ने तरह-तरह से आलोचना की है।
पत्रकारिता जगत के वर्तमान दौर में विशिष्ट स्थान बना चुके रवीश कुमार सहित बहुत से लोग इस भाषण में बोले गए तथ्यों को झूठ का पुलिंदा बता रहे हैं जिसे थोड़ी उदार भाषा में गलत बयानी कहा जा सकता है। रवीश कुमार और बिहार के लोगों ने इस बात की कड़ी आलोचना की है कि प्रधानमंत्री ने बिहार में नए एम्स का श्रेय लिया है जबकि ऐसा कोई एम्स बनाने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही है। चुनावी सभाओं में इस तरह के अतिश्योक्तिपूर्ण बयानों को भले ही प्रधान मंत्री के शुभचिंतक जुमला मानकर भुला दें लेकिन लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक दिन प्रधान मंत्री से सही तथ्यों पर आधारित बड़े नीतिगत मामलों में बोलने की उम्मीद रहती है।प्रधान मंत्री के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे चाहे संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बोल रहे हों या अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे हों, किसी सार्वजनिक सभा में चुनावी भाषण दे रहे हों या देश के प्रधान मंत्री के रुप में लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का ऐतिहासिक संदेश दे रहे हों, उनकी भाषा और भाव भंगिमा समय और परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होती बल्कि वे हमेशा चुनावी मोड़ में दिखाई देते हैं।
इधर प्रधानमंत्री के उद्बोधनों में अहंकार की मात्रा और अपने विरोधियों की कटु आलोचना निरंतर बढ़ती जा रही है जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके अहंकार पूरित संबोधनों से प्रेरित होकर उनके दल के अधिकांश नेता उनसे भी ज्यादा अहंकार पूर्ण भाषा का प्रयोग करते हैं। ऐसे लोगों की संख्या में भी लगातार बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है। इस संबोधन में भी प्रधान मंत्री ने कांग्रेस को निशाना बनाकर परिवार वाद से मुक्त राजनीति की बात की है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर इसकी कड़ी आलोचना की है। यह सही भी है। आज की राजनीति में ऐसा कोई राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दल नहीं है जिसमें परिवारवाद हावी नहीं है। कांग्रेस के नेताओं की असंतुष्ट संततियों को भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश कराने के बाद और अपने दल के वरिष्ठ नेताओं के परिजनों और नजदीकी रिश्तेदारों को विधान सभाओं और लोकसभा मे भेजने के बाद भाजपा को परिवारवाद की आलोचना करने का कोई नैतिक आधार नहीं है। भाजपा ने जिन क्षेत्रीय दलों से गठबंधन किया है परिवार वाद के मामले में वे दल भी कटघरे में हैं।
परिवार वाद के साथ उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की नीति पर विपक्ष को घेरा है। यदि प्रधानमंत्री दस साल के निरंतर कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं कर पाए तो यह उनकी सरकार की विफलता है। वे इसका ठीकरा किसी अन्य के सिर पर नहीं फोड़ सकते। जहां तक तुष्टिकरण का प्रश्न है उसमें यदि कांग्रेस पर अल्प संख्यक समुदाय के तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे हैं वैसे ही आरोप बहु संख्यक वर्ग के बारे में भाजपा पर भी लगते रहे हैं। प्रधान मंत्री का यह दावा कि अगले साल भी वही प्रधान मंत्री के रुप में आएंगे , यह न केवल उनका व्यक्तिगत अहंकार है अपितु लोकतंत्र की मूल भावना के भी खिलाफ है क्योंकि लोकतंत्र में अपना नेता चुनने का अधिकार सांसदों को है। कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के संबोधन से आम नागरिकों को निराशा ही हुई है।
विष्णु नागर
मैंने पूछा -आप हिंदू हैं या मुसलमान?
आपने हंस कर जवाब दिया-‘न मैं हिंदू हूं, न मुसलमान।
मैंने कहा- नहीं यह बात नहीं है, आप हिंदू तो हई हैं।
आपने कहा-‘जिस धर्म में रहकर लोग दूसरे का छुआ पानी नहीं पी सकते, उस धर्म में मेरे लिए गुंजाइश कहां? मेरी समझ में नहीं आता कि हिंदू धर्म किस पर टिका हुआ है?
मैं उन पर व्यंग करते हुए बोली--‘स्त्रियों के हाथ में।
आप बोले-‘हिंदू धर्म सबसे ज्यादा स्त्रियों को ही चौपट कर रहा है। जरा सी गलती स्त्रियों से हुई कि उन्हें हिंदू समाज ने बहिष्कार किया। सबसे ज्यादा हिंदू स्त्रियां चकलाखाने में हैं। सबसे ज्यादा हिंदू स्त्रियां मुसलमान होती हैं।ये आठ करोड़ मुसलमान बाहर के नहीं हैं, घर के ही हैं। यह सब तुम्हारी ही बहनें हैं और मैं यह भी कहता हूं कि ऐसे तंग धर्म में रहना भी नहीं चाहिए। पहली बार जब हिंदुओं के मौजूदा धर्म की नींव पड़ी, तब पुरुष कर्ताधर्ता थे। उन्होंने अपने लिए सारी सुविधाएं रख लीं। हिंदू स्त्रियों को छोटे से दायरे के अंदर बंद कर दिया। फिर वह कैसे उदार विचार का होता ?वे स्त्रियां न देवियां थीं, न मिट्टी का लोंदा।जो- जो अच्छाइयां या खराबियां, पुरुषों में होती हैं वे ही सब उन स्त्रियों में भी पाई जाती हैं। तो जब तक कि दोनों बराबर बराबर न हों, तब तक कैसे कल्याण होगा? पुरुषों की वे सुविधाएं स्त्रियों को भी मिलनी चाहिए। थोड़ी-थोड़ी गलतियों में अपनी बेटी- बहनों को निकाल देते हैं। फिर वे कहीं न कहीं तो जरूर जाएंगी। हिंदुओं की कोशिश तो यह होती है कि उन स्त्रियों को दुनिया ही से विदा कर दिया जाए। सरकार के भय से जरा चुप रहते हैं ।
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मैं बोली-‘आप किस मजहब को अच्छा समझते हैं?
आप बोले-‘अवश्य मेरे लिए कोई मजहब नहीं। राम, रहीम बुद्ध, ईसा,सब बराबर हैं। इन महापुरुषों में जो कुछ किया सब ठीक किया। उनके अनुयायियों ने उसको उल्टा किया। कोई धर्म ऐसा नहीं है कि जिस में इंसान से हैवान होना पड़े।इसीसे मै कहता हूं मेरा कोई खास मजहब नहीं है। सबको मानता भी हूं ।इस तरह के जो नहीं हैं, उनसे मुझे कोई मोहब्बत नहीं। यही मेरा धर्म समझो।
(‘प्रेमचंद घर में ’ पुस्तक के संपादित अंश। प्रेमचंद और उनकी पत्नी शिवरानी देवी के बीच हुआ संवाद)।)।
एडटेक कंपनी अनएकेडमी ने उस टीचर को बर्खास्त कर दिया है, जिसने अपने स्टूडेंट्स को चुनाव में उन उम्मीदवारों को वोट देने कहा था जो पढ़े-लिखे हों।
करण सांगवान नाम के इस टीचर को बर्खास्त करने की सूचना देते हुए अनएकेडमी के को-फाउंडर रोमन सैनी ने ट्वीट कर लिखा कि सांगवान ने कंपनी की आचार संहिता को तोड़ा है इसलिए इसे उन्हें हटाना पड़ा।
अपने वीडियो में पढ़े-लिखे नेताओं को वोट देने की अपील के बाद करण सांगवान ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर ट्रेंड करने लगे।
सांगवान के इस ट्वीट के वायरल होने के बाद ‘एक्स’ पर यूजर इस बात को लेकर भिड़ गए कि पढ़े-लिखे नेताओं को वोट देने की अपील करना कितना सही है।
सांगवान के इस वीडियो के बाद कुछ लोगों ने उनके पक्ष में ट्वीट किया।
यूट्यूबर और पत्रकार अजित अंजुम ने लिखा, ‘करण सांगवान को बॉयकॉट गैंग के दबाव में अनएकेडमी से निकाल दिया गया?’ पढ़े लिखे नेता को ही वोट देना ‘ये कहने की सजा मिली लॉ के टीचर करण सांगवान को?’
बायजूज के ‘आकाश’ तक पहुंचने और भंवर में फंसने की कहानी
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, ‘जो लोग दबाव में झुक जाते हैं और धमकाए जाते हैं, वे कभी भी वैसे नागरिक बनाने में मदद नहीं कर सकते जो दुनिया में सभी बाधाओं के सामने खड़े रहते हैं।’
‘ये देखना दुखद है कि ऐसे रीढ़विहीन और डरपोक लोग एजुकेशन प्लेटफॉर्म चला रहे हैं।’
प्रोफेसर दिलीप मंडल ने लिखा, ‘करण सांगवान बता रहे हैं कि जिसके पास सबसे ज़्यादा डिग्री हो उसे इलेक्शन में चुन लो। फिर चुनाव ही क्यों करना?’
‘ये लॉ के कैसे टीचर हैं, जिसे पता नहीं कि भारतीय संविधान में चुनने और चुने जाने के लिए शिक्षा, भूमि स्वामित्व और संपत्ति की कोई शर्त नहीं है? ये आज़ादी से पहले के चुनावों में होता था। संविधान ने इस गड़बड़ी को ठीक किया।’
मनिका नाम के यूजर ने लिखा, ‘इनके पढ़े लिखे होने का क्या फायदा? एक शिक्षक होने के नाते यह उनका कर्तव्य है कि वे अपने छात्रों के लिए अपडेट रहें। ये हमारे प्रधानमंत्री का अपमान है।’
विजय पटेल नाम के एक यूजर ने लिखा, ‘सब कुछ स्क्रिप्ट के मुताबिक़ चल रहा है। इस स्क्रिप्ट का अगला मूव ये होगा कि कोई राजनीतिक नेता करण सांगवान से अपने मीडिया और पीआर टीम के साथ दो-तीन दिन के अंदर मिलेगा।
अरविंद केजरीवाल भी विवाद में कूदे
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस विवाद में कूद पड़े। उन्होंने लिखा, ‘क्या पढ़े-लिखे लोगों को वोट देने की अपील करना अपराध है? यदि कोई अनपढ़ है, व्यक्तिगत तौर पर मैं उसका सम्मान करता हूं। लेकिन जनप्रतिनिधि अनपढ़ नहीं हो सकते।’
उन्होंने कहा, ‘ये साइंस और टेक्नोलॉजी का जमाना है। 21वीं सदी के आधुनिक भारत का निर्माण अनपढ़ जनप्रतिनिधि कभी नहीं कर सकते।’
पिछले दिनों अनएकेडमी प्लेटफॉर्म पर कानून पढ़ाने वाले लीगल पाठशाला के करण सांगवान का वीडियो सोशल मीडिया वायरल हुआ।
‘एक्स’ पर दिख रहे इस वायरल वीडियो में करण मोदी सरकार की ओर से हाल ही में पुराने आईपीसी, सीआरपीसी और भारतीय गवाही कानून में बदलाव करने के लिए लाए गए बिल पर बात कर रहे हैं।
इस वीडियो में वो कहते दिख रहे हैं कि क्रिमिनल लॉ के जो नोट्स उन्होंने बनाए थे वे बेकार हो गए हैं।
वो कह रहे हैं, ‘मुझे पता नहीं कि मैं हंसू या रोऊं क्योंकि मेरे पास कई बेयर एक्ट, केसलोड्स और ऐसे नोट्स हैं, जो मैंने तैयार किए थे। ये किसी के लिए बड़ा कठिन काम है। आपको नौकरी भी करनी है।’
इस वीडियो में वो आगे कहते दिख रहे हैं, ‘लेकिन एक बाद ध्यान में रखिए। अगली बार उसे वोट दें जो अच्छा पढ़ा-लिखा हो ताकि आपको दोबारा इस तरह की परेशानी से न गुजरना पड़े।’
वो कह रहे हैं, ‘ऐसे शख्स को चुनें जो पढ़ा-लिखा हो, जो चीजों को समझता हो। उस शख्स को न चुनें जो सिर्फ नाम बदलना जानता है। अपना फैसला ठीक तरह से लें।’
कितना बड़ा है अनएकेडमी का कारोबार?
अनएकेडमी की शुरुआत 2010 में हुई थी। इसे गौरव मुंजाल ने एक यूट्यूब चैनल के तौर पर शुरू किया था। इसके बाद दिसंबर 2015 में रोमन सैनी और हिमेश सिंह इसमें शामिल हुए।
तीनों ने मिलकर अनएकेडमी कंपनी बनाई। ये एक ऐसा प्लेटफार्म है जिस पर ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षक जुड़ सकते हैं। ये एक ऐप के जरिये काम करता है।
फिलहाल इसका रेवेन्यू बढ़ कर 130 करोड़ रुपये हो गया है।
अगस्त 2021 में इसे टेमासेक, जनरल अटलांटिक, टाइगर ग्लोबल और सॉफ्टबैंक विजन फंड ने 44 करोड़ डॉलर की फंडिंग की थी।
हालांकि अनएकेडमी के लिए 2023 अच्छा नहीं रहा है। फंडिंग की कमी की वजह से इस साल की शुरुआत से अब तक ये 3,500 कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
भारत जैसे गरीब देश में, जहां तीन चौथाई आबादी को मुफ्त में राशन देना पड़ता है, जहां करोड़ों लोग उचित स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में सालोसाल असाध्य बीमारियों को सहते हों, वहां सरकारें अपनी छोटी छोटी योजनाओं के शिलान्यास के नाम पर आए दिन करोड़ों रुपए के विज्ञापन मीडिया में जारी कर जिस तरह से नागरिकों से तरह तरह के कमरतोड़ टैक्स के रुप में वसूली रकम को बेहयाई से खर्च करती हैं वह बेहद शर्मनाक है।
यह सब तब और भी ज्यादा शर्मनाक लगता है जब मणिपुर में कत्लेआम मचा हो, हरियाणा का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक आग में झुलस रहा हो, और सरकारें अपनी अक्षमता पर पर्दा डालने के लिए बे सिर पैर के कुतर्क गढ़ रही हों, ऐसी दुखद परिस्थितियों में प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री का चमचमाते डिजाइनर कपड़ों में विज्ञापनों में मुस्कराता चेहरा कितना अशोभनीय लगता है उसे शालीन शब्दों में अभिव्यक्त करना मुश्किल है।
कुछ दिन पहले दैनिक भास्कर में एक ही समाचार के एक एक पेज के दो विज्ञापन प्रकाशित हुए थे। प्रधानमंत्री को मध्य प्रदेश के कुछ रेलवे स्टेशन के कायाकल्प की योजना का शिलान्यास करना था। इन दोनों विज्ञापनों के माध्यम से यही सूचना दी गई थी। इस आयोजन की सूचना पीटीआई, रेडियो और दूरदर्शन के प्रचार माध्यम से आसानी से जनता को दी जा सकती थी। लेकिन सरकार मीडिया को उपकृत कर अपने पक्ष में नियंत्रित करने के लिए दोनों हाथ से विज्ञापन जारी करती हैं।
इस कार्यक्रम का एक विज्ञापन भारत सरकार ने किया था और उसी समाचार का दूसरा विज्ञापन मध्य प्रदेश सरकार ने किया था। दोनों सरकार भी एक ही राजनीतिक दल की हैं। सरकार के एक अखबार को एक दिन में दिए विज्ञापन की बात दो पेज के विज्ञापन पर ही खत्म नहीं हुई। इसी दिन मध्य प्रदेश की सरकार ने इसी अखबार में अपनी अन्य योजनाओं की पीठ थपथपाते हुए दो पेज के अन्य विज्ञापन भी दिए थे। कुल मिलाकर सरकार के एक ही अखबार में एक ही दिन चार पेज के विज्ञापन थे, जिनमें प्रदेश सरकार के तीन पेज के विज्ञापन थे। मध्य प्रदेश वह प्रदेश है जिसकी गिनती गलत कामों में बहुत ऊपर होती है। उदाहरण के लिए सबसे ज्यादा महिलाएं लापता होने में यह प्रदेश अग्रणी है। घातक एक्सीडेंट्स के मामले में तमिलनाडु के बाद यह प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर आता है। यहां शिक्षा, स्वास्थ, बिजली और सडक़ों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। ज्यादा दुर्घटनाओं के पीछे बहुत खराब सडक़ें भी मध्य प्रदेश को शर्मशार करने में बराबर की सहयोगी हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री सार्वजानिक मंच से प्रदेश की सडक़ों को अमेरिका से बेहतर बताते हैं जबकि सोशल मीडिया के माध्यम से मध्यप्रदेश के निवासी आए दिन खराब सडक़ों की शिकायत करते रहते हैं।
जहां तक विज्ञापनों का संबंध है इसका कुछ ईलाज कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिबंध लगाकर किया था कि विज्ञापनों में केवल प्रधानमन्त्री या प्रदेश के मुख्यमंत्री की ही फोटो प्रकाशित हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से हर मंत्रालय से मंत्रियों की फोटो के साथ जारी होने वाले विज्ञापनों पर तो रोक लगी थी लेकिन वह इलाज आधा-अधूरा ही रहा। अब तमाम मंत्रालय प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के नाम से विज्ञापन जारी करने लगे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय को इन विज्ञापनों की भी कोई सीमा निश्चित करनी चाहिए ताकि एक ही कार्यक्रम के दो दो विज्ञापनों में जन धन की बरबादी रोकी जा सके। यह भी देखने में आता है कि चुनावी वर्ष में सरकारी विज्ञापनों की संख्या बेतहासा बढ़ जाती है। इस पर चुनाव आयोग को भी नजऱ रखनी चाहिए क्योंकि सरकार अंधाधुंध विज्ञापन जारी कर अपने राजनीतिक दल की छवि चमकाने के लिए जन धन की बरबादी करती है। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश से चुनाव आयोग ही ऐसी धन बर्बादी को नियंत्रित कर सकता है।
बलराज साहनी
‘विमल राय’ अब इस संसार में नहीं हैं। मैं उनसे अपने कथन की पुष्टि नहीं कर सकता, लेकिन मुझे लगता है कि ‘दो बीघा जमीन’ में कंगाल बस्ती की मालकिन का पात्र उन्होंने शायद उसी भीड़ में से लिया था।
विमल राय और हृषिकेश मुखर्जी दिन-भर शर्टिंग करते और सारी रात नई ‘लोकेशनों के लिए भटकते। कलकत्ता में प्रात:काल के समय सडक़ें धोने का रिवाज है। उस वातावरण को फिल्माने के लिए उन्होंने मुझे रात के तीन बजे ही रिक्शा में जोत दिया। मुझे इतना ज़्यादा रिक्शा चलाना पड़ा कि भूख के मारे मेरा बुरा हाल हो गया। एक बस्ती के बाहर मैंने एक हलवाई को गर्म-गर्म दूध बेचते देखा। मैं उसके पास गया और आधा सेर दूध देने के लिए कहा।
हलवाई ने एक नजर मुझे देखा और कडक़कर कहा, ‘जानो, दूध नहीं’ कड़ाही में यह क्या उबल रहा है? मैं पैसे दे रहा हूं, मुफ्त तो नहीं मांगता!’
‘कह जो दिया, दूध नहीं है !’ उसके गुस्से का पारा और भी चढ़ गया था।
दोपहर का समय था। गर्मी बेहद थी। कैमरा एक ट्रक में छिपाकर लगाया गया था। सारी यूनिट उस ट्रक पर सवार थी। रुमाल का इशारा पाते ही मैं रिक्शा लेकर दौड़ पड़ता था। कभी सवारी उतारता, कभी नई सवारी लेता। कभी दो सवारियां, कभी तीन। प्यास के मारे मेरी बुरी हालत थी। लेकिन ट्रक वालों को रोकना संभव नहीं था। एक जगह सडक़ के किनारे मैंने एक पंजाबी सरदार का ढाबा देखा, तो कुछ क्षणों के लिए रिक्शा एक ओर खड़ा करके भागता हुआ गया, और बड़े अपनत्व से पंजाबी में बोला, ‘भाई जी, बहुत सख्त प्यास लगी है। एक गिलास पानी पिलाने की कृपा कीजिए।’
‘दफा हो जा, तेरी बहन की... उसने मुझे घुसा दिखाकर कहा। एक पंजाबी आदमी रिक्शा चलाने का घटिया काम करे, यह उसे शायद सहन नहीं हो पाया था। मेरे मन में आया कि में उसे अपनी असलियत बताऊं और दो-चार खरी-खरी सुनाऊं, पर इतना समय नहीं था।
एक पानवाले की दुकान पर मैंने ‘गोल्ड फ्लैक’ सिगरेट का पैकेट मांगा और साथ ही पांच रुपये का नोट उसकी ओर बहाया। पान वाले ने कुछ देर मेरा हुलिया देखा, फिर नोट लेकर उसे धूप की ओर उठाकर देखने लगा कि कहीं नकली न हो। आखिर कुछ देर सोचने के बाद उसने मुझे सिगरेट का पैकेट दे दिया। अगर वह मुझे पुलिस के हवाले भी कर देता, तो कोई हैरानी की बात न होती।
चौरंगी में शूटिंग करते समय भीड़ जमा होने लगी थी। विमल राय ने मुझे और निरूपा राय को कुछ देर के लिए किसी होटल में चले जाने के लिए कहा। हम फौरन एक रेस्तरां में दाखिल हुए, तो वेटरों ने हमें धक्के देकर बाहर निकाल दिया।
हम भारतीय सभ्यता और उसके मानवतावादी मूल्यों की डींगें मारते नहीं थकते; पर हमारे देश में सिर्फ पैसे की कद्र है, आदमी की कद्र नहीं है। यह बात मैंने उस शूटिंग के दौरान साफ तौर पर देख ली थी। हमारे देश में गरीब आदमी के पास पैसा हो, तो भी उसे चीज़ नहीं मिलती। यह हमारी सभ्यता की विशेषता है। (मेरी फिल्मी आत्मकथा)
फैसल मोहम्मद अली
देश के इतिहास का सबसे बड़ा परीक्षा-भर्ती घोटाला
घोटाले में लेन-देन की अनुमानित राशि तीन अरब डॉलर
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर भी लगे थे आरोप
मामला 2013 में दस साल पहले सामने आया, अब तक ठोस नतीजा नहीं
घोटाले के 40 से ज़्यादा अभियुक्तों, गवाहों और जाँचकर्ताओं की संदिग्ध मौत
जहर पीने, फाँसी लगाने, डूबने और अज्ञात कारणों से हुई मौतें
साल 2012, 19 साल की एक लडक़ी की लाश उज्जैन में रेलवे ट्रैक पर मिली, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह दम घुटना बताया गया।
पुलिस ने इसे पहले हत्या माना, आदिवासी लडक़ी की लाश को लावारिस बताकर दफन कर दिया गया, बाद में एक बार फिर पोस्टमॉर्टम कराया गया और इसे आत्महत्या बता दिया गया।
झाबुआ जि़ले की नम्रता डामोर के पिता मेहताब सिंह ने पिछले दिनों मुझे बताया, ‘नम्रता को व्यापम से जुड़े मामलों की जानकारी हो गई थी इसीलिए उसे मार डाला गया।’
जब मेहताब सिंह मुझसे बात कर रहे थे तो मेरे शरीर में एक सिरहन-सी उठ रही थी क्योंकि मैं जिस सोफ़े पर बैठा था, उसी पर साल 2015 की एक दोपहर मेरे जैसा ही एक पत्रकार बैठा था, वह अचानक ही रहस्यमय ढंग से मौत की नींद सो गया था।
नम्रता डामोर की संदिग्ध मौत और व्यापम घोटाले से जुड़े तारों की तफ्तीश करते हुए आठ साल पहले ‘आजतक’ के रिपोर्टर अक्षय सिंह मेहताब सिंह के घर पहुँचे थे। मेहताब सिंह ने बताया, ‘चाय पीने के बाद अक्षय सिंह के मुँह से झाग निकला और उनकी साँसें सदा के लिए रूक गईं।’ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) घोटाले से जुड़े तकऱीबन 40 लोगों की संदिग्ध हालत में मौतें हुईं हैं जिसने इस भर्ती घोटाले को भयावह और रहस्यमय बना दिया है।
इस मामले में लोग बात करने से कतराते हैं, यहाँ तक कि पत्रकार भी इस मामले की तह में जाने की कोशिश को खतरनाक बताते हैं जबकि राज्य सरकार का कहना है कि ये सभी स्वाभाविक मौतें हैं जिनका व्यापम से कोई ताल्लुक नहीं है।
इन संदेहास्पद मौतों के बाद जानी-मानी पत्रिका ‘इकोनॉमिस्ट’ ने परीक्षा घोटाले पर अपनी रिपोर्ट को ‘डायल एम फॉर मध्यप्रदेश’ शीर्षक दिया था। ‘इकोनॉमिस्ट’ ने अपनी रिपोर्ट में लेन-देन की कुल अनुमानित राशि को तीन अरब डॉलर (तकरीबन 240 अरब रुपए) बताया है।
व्यापम का व्यापक जाल और राजनीति
ताजा अपडेट ये है कि व्यापम घोटाले की जांच को लेकर इंदौर हाईकोर्ट में 10 अगस्त को एक याचिका दायर की गई है।
मामले को उजागर करने में अग्रणी रहे पारस सकलेचा ने अदालत से अनुरोध किया है कि उनकी जो शिकायत दिसंबर 2014 से लंबित है उसमें निश्चित अवधि के भीतर कार्रवाही करने का हुक्म जारी करे। अपनी शिकायत में रतलाम के पूर्व निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा ने राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर, बड़े अधिकारियों और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की जाँच की माँग की थी। सकलेचा 2017 से कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं।
पारस सकलेचा कहते हैं कि उन्होंने प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) घोटाले की जानकारी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को साल 2009 में ही दे दी थी जिसके बाद फर्जीवाड़े की छानबीन के लिए दिसंबर माह में समिति का भी गठन किया गया था।
रतलाम के अपने घर पर बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, ‘समिति बनाए जाने और मुख्यमंत्री के कड़ी कार्रवाई के आश्वासन के बाद भी चार सालों तक घोटाला जारी रहा बल्कि इसका दायरा भी बढ़ता गया तो इससे लगता है कि मुख्यमंत्री घोटाला रोकने के प्रति गंभीर नहीं थे।’
‘आपके पास विभाग है, जाँच की बात भी आप कह रहे हैं, फिर भी घोटाला जारी रहता है, तो हम कह रहे हैं कि इसमें शिवराज सिंह चौहान की भागीदारी की भी जाँच होनी चाहिए।’
तमाम तरह के राजनीतिक हंगामों, दबावों और मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी की गिरफ्तारी के बावजूद शिवराज सिंह चौहान से मामले में कभी पूछताछ भी नहीं हुई। किसी तरह का केस ज़ाहिर है उनके विरूद्ध कभी दर्ज नहीं हुआ।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गोविंद मालू इन आरोपों को सिरे से निराधार बताते हैं और कहते हैं कि मामले में जो भी पहल हुई वो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद व्यवस्था को ठीक करने के लिए की।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी आरोपों को बार-बार निराधार बताया है, उनका दावा है कि व्यापम से जुड़े मामलों में उन्होंने ठोस कार्रवाई की है। कभी डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले राजीव आज अपने पिता की आटा-चक्की के काम में मदद करते हैं।
बर्बाद हो गए कई परिवार
केवल पत्रकार अक्षय सिंह या छात्रा नम्रता डामोर की ही बात नहीं है, संदेह पैदा करने वाले हालात में हुई तकरीबन 40 मौतों की वजह से बड़ी संख्या में परिवार तबाह हुए हैं।
घोटाले के एक अभियुक्त राजीव कहते हैं, ‘इसके चक्कर में फँसकर कई परिवार तबाह हो गए। भारी मानसिक तनाव में लोगों ने सुसाइड कर लिया, शादियां टूट गईं, कई के मां-बाप इसी गम में चल बसे।’
ऐसा ही एक मामला ग्वालियर का है, घोटाले में नाम आने के बाद गजराज मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर चुके रामेंद्र सिंह ने फांसी लगाकर ख़ुदकुशी कर ली।
जवान बेटे की मौत के गम में चंद ही दिनों बाद मां ने तेजाब पी लिया और चल बसीं।
बेटे और बीवी की मौत के बाद 62 साल के नारायण सिंह भदौरिया कहते हैं, ‘चार दिनों के भीतर ही बेटे और बीवी को गंवाने के बाद अब मुझे मरने की जल्दी है, अब जीने की कोई तमन्ना नहीं है।’
व्यापम के फंदे में फंसे नौजवानों का हाल
इस घोटाले में बिचौलियों, राजनेताओं और अफसरों के नेटवर्क ने 20-22 साल के नौजवानों को पैसों के बदले पीएमटी (प्री-मेडिकल टेस्ट), इंजीनियरिंग वगैरह की प्रवेश परीक्षाएँ धोखाधड़ी से पास करवाकर दाखिले का सपना बेचा, अब मध्य प्रदेश के सैकड़ों युवा महीनों जेल की सलाखों के पीछे काटने के बाद आज भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
अपनी जि़ंदगी की कहानी शेखर ने एक वाक्य में सुना दी, ‘हमसे कहा गया कि हमारे आगे जो व्यक्ति बैठा है उससे जवाब नकल करना है, इस तरह हमने पीएमटी पास कर ली, कॉलेज में एडमिशन हो गया, फिर प्रदेश में व्यापम नाम का घोटाला उजागर हुआ, हमारे खिलाफ क्रिमनल केस रजिस्टर्ड हुआ, हमें कॉलेज से निकाल दिया गया, जेल हुई, सात-आठ माह जेल में काटने पड़े, फि़लहाल हाई कोर्ट से जमानत पर रिहा हैं।’
राजीव कहते हैं, ‘फंस गए हैं हम। कुल मिलाकर कहीं के नहीं रहे, हमारे दस साल निकल गए हैं, शायद हमें सज़ा हो जाएगी, इस तरह हमारे कुल सतरह साल निकल जाएंगे। सत्रह साल के बाद मुझे नहीं लगता हम किसी मतलब के रह जाएँगे।’
मध्य प्रदेश के एक छोटे से क़स्बे में पले-बढ़े राजीव का ख़्वाब था कि वो पीएमटी पास करें, मगर पीएमटी में जब लगातार दो बार नाकामी मिली तो उनके परिवार वालों ने एक बिचौलिए को पाँच लाख रूपये दिए। इन पैसों के एवज में बिचौलिये ने राजीव के लिए एक ऐसा व्यक्ति उपलब्ध करवाया जिसने उनके बदले इम्तिहान दिया।
लंबी खिंच रही जांच के दस सालों में राजीव और शेखर की जिंदगियों में भी बड़े बदलाव साफ देखने को मिलते हैं, कभी डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले राजीव पिता की आटा चक्की में कभी-कभार मदद करते हैं, शेखर का गुजारा एक प्राइवेट कंपनी में छोटी-मोटी नौकरी करके होता है, दोनों की उम्र और तीस को पार कर गई है। शेखर अपने पैतृक शहर में नहीं रहते क्योंकि ‘लोगों से नजऱें नहीं मिला सकते। हालांकि मुझसे अधिक पीड़ा मेरे बूढ़े माता-पिता को झेलनी पड़ रही है।’
राजीव कहते हैं कि लोगों का गलत ख्याल है कि हम जैसे सभी लोग बड़े पैसे वाले थे, कुछ के पास शायद एक-दो बीघा जमीन थी जिसे बेचकर लोगों ने बिचौलियों के पैसे चुकाए। हमारे परिवार को सूद पर पैसे लेने पड़े थे उन लोगों को देने के लिए।
हाई कोर्ट के वकील उमेश बोहरे ने राजीव और शेखर जैसे पचास से ज़्यादा लोगों की जमानत करवाई है, वो कहते हैं कि व्यापम घोटाले में ‘जो अच्छे परिवार से हैं वो बच जाएंगे, गरीब मारे जाएँगे।’
न्याय व्यवस्था से जुड़े एक अन्य व्यक्ति का कहना है कि जिन्होंने मेडिकल-इंजीनियरिंग या दूसरे कोर्सेस में दाखिले के लिए रिश्वत और धोखाधड़ी का सहारा लिया उनके साथ क्यों किसी तरह की हमदर्दी की जाए?
‘इंजन-बोगी सिस्टम’ कैसे काम करता था?
सरकारी संस्था व्पापम सूबे के तकनीकी कॉलेजों में प्रवेश के लिए परीक्षा करवाने के लिए जि़म्मेदार है। उसके ऊपर सरकारी नौकरियों में भर्तियों के लिए भी इम्तहान कराने की जिम्मेदारी है।
बिहार के चारा घोटाला से भी बड़ा बताए जाने वाले इस परीक्षा स्कैम में पुलिस के मुताबिक मेडिकल-इंजीनियरिंग वगैरह की प्रवेश परिक्षाओं में कैंडिडेट की बजाए दूसरों से लिखवाए जाते थे। एग्जाम शीट्स इम्तिहान का वक्त खत्म होने के बाद भरे जाते थे।
‘इंजन-बॉगी सिस्टम’ नाम की व्यवस्था में बैठने का इंतजाम इस तरह किया जाता था ताकि आगे-पीछे बैठे परीक्षार्थी नकल कर सकें।
दूसरों के बदले परीक्षा देने वाले लोग या फिर जिनके जवाब की नकल दूसरों को करने को कहा जाता था, वो सभी ज़्यादातर मामलों में पहले से ही मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे होते थे और इन सभी को पैसे देकर दूसरे शहरों से लाया जाता था, इन्हें सॉल्वर कहा जाता है।
सीबीआई ने अपने एक बयान में कहा है कि इन सॉल्वर्स को उत्तरप्रदेश, बिहार, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों से लाया जाता था। ज्यादातर मामलों में ये साल्वर्स या तो मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे छात्र हुआ करते थे या ये कोचिंग में पीएमटी की तैयारी कर रहे तेज़ दिमाग़ लडक़े होते थे।
नौजवान कैसे फँसते थे चंगुल में?
राजीव और शेखर एक दूसरे से सैकड़ों किलोमीटर के फ़ासले पर रहते हैं, लेकिन दोनों की जि़ंदगियां लगभग एक-सी हैं। दोनों पीएमटी पास करने में नाकाम रहे थे और परिवार वालों का दबाव झेल रहे थे, जिसके बाद उन्होंने बिचौलिए का सुझाया रास्ता चुना।
शेखर के मुताबिक, उन जैसे लोग ही व्यापम घोटाला नेटवर्क का टार्गेट हुआ करते थे, ‘ये उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटजी थी जिससे हम लोगों का संपर्क ऐसे लोगों से हुआ।’
राजीव के मामले में उनके भाई के एक रिश्तेदार ने उनसे कस्बे में संपर्क करके कहा कि परेशान होने से बेहतर है कि पाँच लाख रूपये खर्च करो, मेडिकल कॉलेज में सेलेक्शन पक्का, 20-25 हजार रूपए एडवांस देने के बाद उनके डॉक्यूमेंट्स ले लिए गए और उन्हें बताया गया उनकी जगह कोई और व्यक्ति पीएमटी में बैठेगा और उनका नाम एडमिशन लिस्ट में शामिल होगा। इसके बाद उन्हें एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला भी मिल गया।
राजीव कहते हैं, ‘हम एडमिशन लेने गए तो वहां पूरी कमेटी बैठी थी। उन्होंने हमारे डॉक्यूमेंट्स देखे फिर भी हमें एडमिशन दे दिया जबकि हमारे एडमिट कार्ड में जो तस्वीर लगी थी वो उस व्यक्ति की थी जिसने मेरे बदले में मेडिकल की प्रवेश परीक्षा दी थी।’
वे कहते हैं, ‘ये एजेंट, एग्जाम हॉल में होने वाली गड़बडिय़ां, दाखिले की जांच समिति में बैठे लोग, ये पूरा नेटवर्क दस-बारह लोगों का नहीं हो सकता, एक पूरा सिस्टम काम कर रहा था लेकिन आज दस सालों बाद हम लोगों को सज़ा हो रही है, लेकिन ये नहीं देखा जा रहा है कि हम इस जाल में कैसे फँसे, हमें आगे करके असली दोषियों को बचाने की कोशिश हो रही है।’
एसटीएफ और सीबीआई ने अपने मुकदमों में सैकड़ों परीक्षार्थियों और अभिवावकों को भी शामिल किया, जिसको लेकर नागरिक समूहों से लेकर, व्हिस्लब्लोअर, राजनेता और ख़ुद छात्र सवाल उठाते रहे हैं।
क्या घोटाले के जिम्मेदार लोग पकड़े गए?
ऐसे सवाल बहुत सारे दूसरे लोग भी उठाते हैं। खासतौर पर इसलिए भी कि पीएमटी में घोटाले को लेकर राज्य के विभिन्न थानों में 25 साल पहले से ही मामले दर्ज होते रहे हैं। इनकी संख्या कई रिपोर्टों में 55 तक बताई गई है।
बीबीसी से बातचीत में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जांच को गलत दिशा में ले जाने का आरोप लगाते हैं।
वे हरियाणा की मिसाल देते हैं जहाँ शिक्षक घोटाले में जिन लोगों ने बहाली के लिए पैसा दिया था उन्हें अभियुक्त नहीं गवाह बनाया गया और इस तरह जाँच करने वाले टॉप पर बैठे लोगों तक पहुँचे।
‘लेकिन यहां जिन्होंने पैसे दिए हैं, उन्हें ही अधिकतर जेल हो रही है। कुछ उन लोगों को भी जेल हुई जिन्होंने पैसे लिए लेकिन वो सब छूट रहे हैं। मेरा सवाल है सीबीआई से कि उन लोगों को क्यों नहीं गवाह बनाया गया जो बता रहे हैं कि कैसे हम इस जाल में फँस गए?’
व्यापम घोटाले को उजागर करने वालों में शामिल रहे डॉक्टर आनंद राय कहते हैं, ‘जेल हो रही है छोटे लोगों को। यह एक पिरामिड की तरह है, जिसमें नीचे परीक्षार्थी हैं, अभिवावक हैं, जेल इन लोगों को हो रही है जिन लोगों ने पैसा बनाया वे पिरामड में ऊपर हैं, उन्हें कुछ नहीं हो रहा, वो छूट गए सब बड़े लोग थे। अब आप 10-15 साल तक भी जांच जारी रखोगे तो क्या होगा?’
डॉक्टर आनंद राय का कहना है कि लंबी लड़ाई कभी-कभी हताश कर देती है, बड़ी अदालतों में तो फिर भी कई बड़े वकील मुफ्त मुकदमे लडऩे और दूसरी तरह की मदद कर देते हैं लेकिन छोटी अदालतों में ये बहुत मुश्किल है।
कुछ सप्ताह पहले ही मध्य प्रदेश में पटवारियों की भर्ती में घोटाले का मामला सामने आया है यानी भर्ती और शायद प्रवेश परीक्षा घोटाला सूबे में बदस्तूर जारी है।
विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा रहेगा और जाहिर है व्यापम घोटाला उसी से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट में भी व्पापम घोटाले की जांच को लेकर कई अर्जियां सुनवाई के लिए लंबित हैं। (bbc.com/hindi)
राजेन्द्र शर्मा
लीजिए, अब ये क्रिसिल वाले भी महंगाई का राग अलापने लगे। अरे ऋण रेटिंग एजेंसी हो, अपने काम से काम रखो ना भाई। किसी की ऋण रेटिंग बढ़ाओ, किसी की घटाओ, पब्लिक की बला से। उसे न ऋण मिलना है, न किसी रेटिंग की जरूरत पडऩी है। पर ये क्या कि महंगाई-महंगाई राग अलापने लगे। और वह भी पब्लिक की खाने-पीने की चीजों की महंगाई का राग। कह रहे हैं कि पिछले महीने शाकाहारी थाली की कीमत पूरे 34 फीसद बढ़ गई है। यानी पब्लिक महीने भर पहले खाने पर जितना खर्च कर रही थी, उससे 34 फीसद ज्यादा पैसा जुटाए या फिर अपना खाना ही एक-तिहाई घटाए। यानी पहले तीन रोटी खाती हो, तो अब दो रोटी में ही काम चलाए! और बाकी सब भी उसी हिसाब से घटाती जाए।
कमाल ये है कि उसी क्रिसिल के हिसाब से मांसाहारी थाली की कीमत भी बढ़ी जरूर है, लेकिन शाकाहारी थाली के मुकाबले काफी कम। शाकाहारी थाली की कीमत में 34 फीसद बढ़ोतरी के मुकाबले, मांसाहारी थाली की कीमत 13 फीसद ही बढ़ी है। हम पूछते हैं कि क्रिसिल वालों के यह बताने का क्या मतलब है? क्रिसिल वाले क्या यह कहना चाहते हैं कि मोदी जी की सरकार मांसाहारियों पर ज्यादा मेहरबान है? क्या वे मोदी सरकार पर मांसाहार को बढ़ावा देने की तोहमत लगाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं? वर्ना अलग से इसका आंकड़ा देने का क्या मतलब है कि शाकाहारी थाली की कीमत, मांसाहारी थाली की कीमत से ज्यादा बढ़ी है!
इस तरह के थाली-भेद को बढ़ावा देने वाला आंकड़ा ही नहीं, हम तो कहते हैं कि कोई भी आंकड़ा देने का मतलब ही क्या है? अगर बहस के लिए यह भी मान लिया जाए कि खाने की थाली महंगी हो गयी है, तब भी उसका आंकड़ा बताने से क्या हासिल है? आंकड़ा बताने से क्या पब्लिक की तकलीफ कम हो जाएगी? उल्टे आंकड़ों से तो लोगों की तकलीफ ही बढ़ जाती है। जिन्हें पहले नहीं पता चला था, उन्हें भी पता चल जाता है कि उनकी थाली महंगी हो गयी है। और तो और, जिन्हें कभी थाली भर खाने नसीब नहीं होता है, वे भी थाली के महंगी हो जाने का शोर मचाने लगते हैं। ऊपर से शाकाहारी और मांसाहारी का झगड़ा और कि किसे बढ़ावा दे दिया, किस को हतोत्साहित कर दिया। इसीलिए तो मोदी जी की सरकार, आंकड़ों का चक्कर ही निपटाने में लगी है। न रहेंगे आंकड़े और न होगी इसकी कांय-कांय कि यह लुढक़ गया, वह गिर गया। और जो कोई बाहर वाला आंकड़े बताने की कोशिश करेगा, तो उसका हाथ के हाथ खंडन कर दिया जाएगा। फिर चाहे वह भूख में दुनिया के 121 देशों में अमृतकाल वाले भारत के 107वें नंबर पर होने का ही आंकड़ा क्यों न हो!
खैर, क्रिसिल वालों के ‘‘रोटी-राइस रेट’’ का मामला तो मोदी जी की सरकार को बदनाम करने के षडय़ंत्र का ही मामला लगता है। षडय़ंत्र भी लोकल नहीं, ग्लोबल। क्रिसिल के नाम में इंडिया होने से क्या हुआ, अमरीकी स्टेंडर्ड एंड पुअर से उसका कनेक्शन भी तो है। अगर यह षडय़ंत्र नहीं, तो और क्या है कि शाकाहारी थाली 34 फीसद महंगी होने की हैडलाइन बनवाई जा रही है, जबकि रिपोर्ट में अंदर यह माना जा रहा है कि इसमें से 25 फीसद बढ़ोतरी, सिर्फ टमाटर के दाम बढऩे से आई है। यानी टमाटर को निकाल दें, तो शाकाहारी थाली में सिर्फ 9 फीसद बढ़ोतरी हुई है यानी मांसाहारी थाली से भी 4 फीसद कम! क्या क्रिसिल वालों को पता नहीं है कि सरकार ने पहले ही टमाटर को फल घोषित कर दिया है! और फल के दाम को पब्लिक की खाने की थाली में कौन जोड़ता है जी! क्रिसिल वालों को अगर पहले टमाटर के फल घोषित किए जाने का पता नहीं भी था, तो रिपोर्ट जारी करते समय तो यह अस्वीकरण जोड़ सकते थे। टमाटर का विकास कर मोदी जी ने उसे फल बना दिया, पर भारतविरोधी षडय़ंत्र करने वाले अब भी उसे सब्जी-भाजी में ही जोडऩे पर तुले हैं। (व्यंग्य)
सनियारा खान
अभी कुछ दिनों पहले मुझे हिटलर के बारे में एक कहानी पढऩे का मौका मिला। एकबार हिटलर सदन में एक मुर्गी लेकर आया। फिर सभी सांसदों को हैरान करते हुए वह उस मुर्गी के सारे पंख एक एक करके नोंचने लगा। बेचारी मुर्गी पहले ही भूख के कारण परेशान हो रही थी । उसके बाद पंख नोच लिए जाने के कारण वह दर्द से बिलबिलाने लगी। वह मुर्गी छटफटाते हुए हिटलर को देखने लगी। अब हिटलर ने अपने जेब से थोड़े से अनाज के दाने निकाल कर अपने पैरों के चारों तरफ छिडक़ दिया। वह मुर्गी उसके पैरों के चारों तरफ घूम घूम कर अनाज खाने लगी। अनाज खा कर वह हिटलर के पैरों के पास आ कर फिर से खड़ी हो गई। हिटलर जानता था था कि लोगों से सब कुछ छीन कर भी अगर बाद में उन्हें थोड़ा सा खाना खिलाया जाए तो लोग सब कुछ भूल कर बेवकूफ की तरह उसी छीननेवाले का ही जय जय करने लगते हैं। अब मुर्गी को एक तरफ हटा कर हिटलर ने सदन के स्पीकर की तरफ देख कर गर्व से कहा कि गणतांत्रिक देशों की जनता और उस मुर्गी में कोई फर्क नहीं है। उनके नेता भी उनसे सब कुछ लूट कर उन्हें मजबूर कर देते हैं। ऐसी बदतर हालत में उन्हीं नेताओं से उन्हें जरा सा भी कुछ मिल जाए तो सारी जुल्म भूल कर उन नेताओं को ही अपना सब कुछ समझने लगते हैं। कितनी सच्ची बात है!
इलेक्शन के पहले पहले हर बार मुर्गियों के सामने दाना डालना शुरू हो जाता है, और मुर्गियां बिल्कुल भूल जाती है कि पंख नोंचने वाले भी यही लोग ही तो थे।
शिल्पा शर्मा
एक बार किसी एकांत में जाकर, आंखें बंद कर के ख़ुद से पूछिए आप जिस राह चल निकले हैं वह हीरो बनने की राह है या विलन या फिर विलन का पंटर बनने की? आपको सही जवाब मिल जाएगा, क्योंकि हमारा अंतर्मन हमें हमेशा सही राह दिखाता है। जो व्यक्ति अपने अपने काम को सही तरीक़े से करता है वही देश का सच्चा हीरो होता है, न कि उन्माद फैलाने वाला। आपके उस धर्म को, जो आपके जन्म के हज़ारों साल पहले से बचा हुआ है और आप रहें या न रहें यह आगे भी बचा रहेगा, उसके नाम पर आपको आपस में लड़ाने वालों का मोहरा बनकर विलन के पंटर न बनें।
जब हमारे देश को कम लोग पढ़े-लिखे हुआ करते थे, तब से भी किस्सागोई के जरिए हम सब तक कई तरह की कहानियां पहुंच ही जाती थीं। अब जबकि हमारे देश में शिक्षा का स्तर बढ़ा है, कहानियों की पहुंच और गहरी हुई है। फिर बात दादी-नानी की कहानियों की यानी बेड टाइम स्टोरीज की हो या किताबों की हो या फिर रील्स के जरिए। और टीवी सीरीयल्स, वेबसीरीज और फिल्में तो कहानियों की आमद का बड़ा जरिया हैं ही।
अच्छा, अधिकतर कहानियों का आप विश्लेषण करें तो पाएंगे कि कुछ उसमें एक हीरो होता है, कुछ उसके अपने लोग और समर्थक होते हैं। वहीं कहानी में एक विलन होता है और कुछ लोग उसके समर्थक होते हैं। अमूमन हीरो के समर्थक भले लोग और विलन के समर्थक बुरे लोग होते हैं। हम सभी जो लोग 70’ के दशक से लेकर वर्ष 2000 या उसके बाद की भी कुछ फिल्मों को देखकर बड़े हुए हैं या फिर वे युवा जिन्होंने ये फिल्में देखी हैं, वे हीरो और विलन के बेसिक, मेलो ड्रमेटिक कंसेप्ट से परिचित होंगे। वर्ष 2000 के बाद की फिल्मों की कहानियों की यदि चर्चा करें तो ज्यादातर हीरो और विलन के बीच का यह फर्क बड़ा हल्का या मामूली सा रह गया। कई, बल्कि अधिकतर फिल्मों में असल जिंदगी के विलन को हीरो बनाकर पेश करने और उसका महिमामंडन करने की भी परंपरा चल पड़ी, जो कई बार ग़लत भी नहीं होती, क्योंकि वह हमें कहानी को दूसरे नजरिए से देखना सिखाती है।
अपनी बात मैं तब की फिल्मों के हवाले से अपनी बात कहना चाहूंगी, जब कहानियों में हीरो और विलन का या यूं कहें कि अच्छाई और बुराई अंतर बड़ा साफ दिखाया जाता था। तब लोग (दर्शक/पाठक) विलन या उसके साथी होने की बजाय, हीरो और उसके साथी की ओर रहना पसंद करते थे। यदि आपने उन फिल्मों में विलन के खेमे के पंटरों को देखा हो, जो अपने आका के कहने पर, बिना अक्ल लगाए किसी से भी मार-पीट को तैयार हो जाते थे और ख़ुद भी चोटिल हो जाते थे। उनका कोई पूछने वाला नहीं होता था। अगर मान लो बच-बचा के वे अपने बॉस तक यह सूचना देने पहुंच भी जाते थे तो उनका बॉस उन्हें मार देता था या मरवा देता था।
यूं तो कहानियां सुनने के बाद हर कोई अपने आपको उस कहानी के हीरो की जगह रखकर देखता है, उसका हीरो समझता है या वैसा बनना चाहता है। लेकिन फिर भी भला क्यों कई लोग विलन के पंटर बनकर ही रह जाना चाहते हैं? नहीं समझे आप? मेरा इशारा उन छुटभैया मोहल्ला नेताओं से है, जो चंद पैसों और अपने इलाक़े में हल्की-सी धौंस जमाने का रुतबा पाने के लिए स्थानीय स्तर के छोटे-मोटे दंगा फैलाने, बलवा करने वाले ग्रुप्स का हिस्सा बन जाते हैं। उन्हें लगता है या फिर उनके मन में यह बिठा दिया जाता है कि ऐसा करके वे अपने धर्म को बचा रहे हैं और इसे वे हीरो होना समझ लेते हैं। लेकिन जब उपद्रव के वीडियोज़ में उनके फ़ुटेज सामने आते हैं तो उन्हें हवालात में जाना पड़ता है और उनका परिवार उन्हें छुड़ाने की क़वायद में परेशान होता रहता है। तब इन ग्रुप्स के बड़े नेता इन्हें बचाने तक के प्रयास नहीं करते। तो विलन के खेमे में क्षणिक हीरो बनने का क्या फ़ायदा होता है इन्हें?
कई लोग जो ग्रुप्स के बाहर से धर्म के नाम पर इनका ऊपरी समर्थन करते हैं, वक्त पडऩे पर वो आपके किसी काम आना तो दूर, उनसे बचना शुरू कर देते हैं। एक बार यदि ये लोग सहज रूप से सोचें कि जो धर्म (सनातन हो या मुस्लिम) हजारों या सैकड़ों साल से चला आ रहा है, जब आप नहीं थे तब भी था और आपके बाद भी रहेगा ही, उसे बचाने की आखिर क्या जरूरत है? वह तो बचा ही हुआ है, बचा ही रहेगा। बस, आप अमन-चैन से रहो।
हम सभी जानते हैं कि इन दिनों सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी में युवाओं को महज़ कुछ पैसों के लिए भर्ती किया जा रहा है। इन युवाओं को रोजग़ार की ज़रूरत है और देश में रोजग़ार के अवसर आवश्यकता से बहुत कम हैं (और मौजूदा सरकार चाहती भी नहीं है कि वह रोजगार पैदा करे, क्योंकि वह सत्ता पाने के लिए, वोटों के लिए अपनी जनता का धार्मिक ध्रुवीकरण चाहती है) तो वे इन छोटे-मोटे ग्रुप्स या बड़ी पार्टियों के मीडिया सेल एजेंट के रूप में काम करने लगते हैं। पर क्या इस तरह का उन्माद फैलाना या उसका हिस्सा होना हीरो होना है? या फिर वह किसी विलन के पंटर की तरह गुमनाम, दुत्कारे जाने वाले जीवन की ओर ले जाता है? यह सोचकर देखिए।
और एक बात ये कि विलन या विलन के पंटर बनने से कहीं आसान है हीरो बनना। किसी सच्चे हीरो को किसी दूसरे व्यक्ति से इस बात की आस नहीं होती कि दूसरे लोग उसे हीरो मानें। दरअसल, जब हम ख़ुद को हीरो मानते हैं, तभी हम सच्चे हीरो होते हैं और तभी हम सबसे ज़्यादा सशक्त होते हैं। और ख़ुद को हीरो मानना आसान नहीं होता। आपका कॉन्शस आपको ख़ुद को तब तक हीरो मानने देता, जब तक कि उसे भरोसा न हो जाए कि आप जहां हैं, वहां अपना बेहतरीन योगदान इस तरह दे रहे हैं, जिससे दूसरे लोगों का सचमुच भला हो रहा है। आज की बेरोजगार युवा पीढ़ी, जो सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाले ग्रुप्स से जुड़ रही है, उसके सदस्यों को मैं बताना चाहती हूं कि एक सामान्य नागरिक बनकर, जो अपना काम सही तरीक़े से करे आप अपने देश के सबसे बड़े हीरो बन सकते हैं।
जो व्यक्ति अपने देश को आगे ले जाने के लिए अपने काम को, भले ही वह काम कुछ भी हो, आपकी नौकरी, बिजनेस, दुकान, ठेला वगैरह, सही तरीक़े से करता है वही इस देश का सच्चा हीरो होता है, न कि उन्माद फैलाने वाला। एक बार किसी एकांत में जाकर, आंखें बंद कर के ख़ुद से पूछिए आप जिस राह चल निकले हैं वह हीरो बनने की राह है या विलन या फिर विलन का पंटर बनने की? आपको सही जवाब मिल जाएगा, क्योंकि हमारा अंतर्मन हमें हमेशा सही राह दिखाता है। और यदि आपका मन कहता है कि आप विलन या उसके पंटर वाली राह पर चल निकले हैं तो याद रखिए-आप जहां भी हैं, वहीं से एक नई हीरोइक शुरुआत की जा सकती है और आप चाहेंगे तो ऐसा करने का रास्ता आपको मिल ही जाएगा। (oyeafltoon)
अपूर्व गर्ग
आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 को एक आवाज गूंजी ‘आज हम एक आज़ाद लोग हैं , एक आजाद मुल्क हैं। मैं आज जो आपसे बोल रहा हूँ एक हैसियत, एक सरकारी हैसियत मुझे मिली है , जिसका असली नाम ये होना चाहिए कि मैं हिन्दुस्तान की जनता का प्रथम सेवक हूँ। जिस हैसियत से मैं आपसे बोल रहा हूँ, ये हैसियत मुझे किसी बाहरी शख़्स ने नहीं दी, आपने दी है।’
ये विनम्र संबोधन था, देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरूजी का अपनी जनता से, जो आकाशवाणी से प्रसारित हुआ था। सनद रहे, जहाँ तक लाल किले से नेहरूजी के भाषण का सवाल है लालकिले का वो पहला संबोधन 15 अगस्त को नहीं 16 अगस्त 1947 को हुआ था।
14 अगस्त 1947 की आधी रात को नेहरूजी ने भारत की स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर संसद भवन में भारतीय संविधान सभा में ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी ‘जो भाषण दिया था वो दुनिया के महानतम भाषणों में शुमार है। ये पूरा भाषण-
हमेशा पढ़ा जाना चाहिए ... दो पंक्तियाँ देखिये-
‘हम सभी, चाहे हम किसी भी धर्म के हों, समान अधिकारों, विशेषाधिकारों और दायित्वों के साथ समान रूप से भारत की संतान हैं। हम सांप्रदायिकता या संकीर्णता को प्रोत्साहित नहीं कर सकते, क्योंकि कोई भी राष्ट्र महान नहीं हो सकता जिसके लोग विचार या कार्य में संकीर्ण हों।’ ‘हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की महत्वाकांक्षा हर आंख से हर आंसू पोंछने की रही है। यह हमारे से परे हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू और पीड़ा है, तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा।’
सुप्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह 14 अगस्त 1947 की उस रात संसद भवन में थे।
उन्होंने लिखा है -‘हम जैसे तैसे संसद भवन रात 11 बजे पहुँच गए। ठसाठस भीड़ थी पर अनुशासित और उत्साह से भरी हुई . बीच -बीच में जोर से नारे फूट पड़ते थे, ‘महात्मा गाँधी की जय, इंकलाब जिंदाबाद।’ रात के 12 बजने से एक मिनट पहले भीड़ पर पूरी तरह सन्नाटा छा गया। ‘वन्दे मातरम्’ के सुरो में गाती हुई लाउड स्पीकरों से सुचेता कृपलानी की आवाज सुनाई पड़ी। इसके ठीक बाद पंडित नेहरू ने अपना स्मरणीय भाषण दिया ‘बहुत साल पहले हमने नियति से मुलाकात की थी। अब उस धरोहर को वापस लेने का वक्त आ गया है।’
जैसे ही उनका भाषण समाप्त हुआ भीड़ ख़ुशी से पागल हो गयी और चिल्ला-चिल्लाकर नारे लगाने लगी।’
आजाद हिन्दुस्तान में तिरंगा फहरते हुए देखने और अपने प्रिय नेता नेहरूजी को तिरंगा फहराते देखने -सुनने के लिए मानों पूरा देश 15 अगस्त के दिन उमड़ पड़ा था।
इतिहास के पन्नों के साथ दर्ज ऐतिहासिक किस्सों को भी पढि़ए तो पता चलेगा कि सरकारी अनुमान था कि 15 अगस्त 1947 के दिन आजादी के उस समारोह में तीस हज़ार लोगों के शामिल होने का अनुमान था पर आये इस देश की तीस करोड़ आबादी में से पांच लाख से भी कहीं ज़्यादा लोग।
दिल्ली जन समुद्र में बदल चुकी थी .लोग लहरों के साथ अपने आप बढ़ते जा रहे थे।
‘15 अगस्त को गवर्नर जनरल इंडिया गेट के पास उस मंच तक नहीं पहुंच सके, जहां से तिरंगा फहराया जाना था। तभी माउंटबेटन ने नेहरू को तेज आवाज लगाकर कहा कि वो तिरंगा फहरा दें. माउंटबेटन ने अपनी बग्घी पर खड़े होकर ही तिरंगे को अपनी सलामी दी।’
वैसे एक दिलचस्प बात भी दर्ज है जैसे ही तिरंगा झंडा फहराया गया उस वक्त आकाश में इद्रधनुष चमकने लगा था।
ज़ाहिर है अगस्त का महीना था बारिश-धूप के बाद प्रकृतिक तौर पर बनता रहता है। पर उस दिन धार्मिक मान्यताओं को मानने वालों ने इसे दैवीय- चमत्कार माना था।
ख़ैर , 15 अगस्त 1947 को नेहरू जी ने अपने उद्बोधन जो आकशवाणी से प्रसारित हुआ था ये भी कहा कि -
‘आजादी महज एक सियासी चीज नहीं है . आजादी तभी एक ठीक पोशाक पहनती है जब उससे जनता को फायदा हो।’
डॉ. आर.के.पालीवाल
अखबारों में भले ही आए दिन लोकायुक्त, सी बी आई, ई डी, एंटी करप्सन ब्यूरो और आयकर विभाग के छापों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं और जूनियर इंजीनियर, स्टोर कीपर,पटवारी और पंचायत सचिव आदि के यहां भ्रष्टाचार से अर्जित करोड़ों की काली कमाई की सूचनाएं अखबारों की सुर्खियां बनती हैं , लेकिन अब आम नागरिक सरकार के साए में होने वाले भ्रष्टाचार के बारे में मुंह खोलने या सोशल मीडिया आदि पर लिखने से पहले हजार बार सोचेंगे। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार पर बोलने से कांग्रेस के बड़े राष्ट्रीय नेताओं पर ताबड़तोड़ एफ आई आर दर्ज होने के बाद लोग सकते में हैं। कांग्रेस के बड़े नेता, यथा प्रियंका वाड्रा, कमलनाथ और अन्य बड़े नेता तो पार्टी के बड़े वकीलों के माध्यम से हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर आसानी से पुलिस प्रशासन के शिकंजे से बच जाएंगे लेकिन आम नागरिक के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना चांद पर जाने जितना कठिन है इसलिए उनके लिए चुप्पी ही एकमात्र विकल्प बचता है।
कुछ दिन पहले प्रधान मंत्री ने भी एन सी पी पर भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा आरोप लगाया था जिसका जिक्र एन सी पी की नेता सुप्रिया सुले ने संसद में भी किया था। यदि महाराष्ट्र में कांग्रेस और एन सी पी गठबंधन की सरकार होती तो मध्य प्रदेश की घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप संभवत: प्रधान मंत्री के खिलाफ भी वैसी ही कार्यवाही हो सकती थी जैसी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ हुई है। हाल ही में भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने पश्चिम बंगाल में अब तक की तमाम सरकारों पर सूबे को भ्रष्टाचार में डुबाने का आरोप लगाया है। संभव है वहां की सरकार उन पर भी भी उसी तरह एफ आई आर करवा दे जैसे मध्यप्रदेश में हुई हैं।
यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और दिशा निर्देश के बावजूद अभी भी देश के अधिकांश थानों में आम आदमी को एफ आई आर के लिए कितना भटकना पड़ता है। इसकी पीड़ा वही जानते हैं जिन्होंने मजबूरी में थाने कचहरियों के चक्कर काटे हैं। दूसरी तरफ आम आदमी पर कोई खास व्यक्ति आसानी से एफ आई आर करवा देता है, फिर उसके लिए जमानत पाना जीवन मृत्यु का सबब बन जाता है। कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों के सम्मेलन में महामहिम राष्ट्रपति महोदया ने बहुत भारी मन से ऐसे गरीब लोगों को त्वरित न्याय की अपील की थी जो सजा पाए बगैर सालों से जमानत के इंतजाम नहीं होने के कारण जेलों में बंद हैं।
सरकार के अधीन काम करने वाली पुलिस के पास एफ आई आर एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो आम आदमी को अधमरा कर सकता है। यह लगभग हर प्रदेश की पुलिस का चरित्र बन गया है कि सत्ता धारी दल से जुडे लोगों की शिकायत पर आनन फानन में एफ आई आर की कार्यवाही सम्पन्न हो जाती है ताकि संबंधित पुलिस अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं की आंखों में ऊपर चढ़ सकें।
इसके विपरीत सत्ताधारी दल के लोगों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कराने में प्रतिष्ठित नागरिकों के भी पसीने छूट जाते हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता महिला पहलवानों की शिकायत पर तभी एफ आई आर दर्ज की थी जब देश भर से महिला पहलवानों के समर्थन की आवाज उठने पर सर्वोच्च न्यायालय में मामला पहुंचा था।
इसके बरक्स आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज करने में दिल्ली पुलिस बहुत तेजी दिखाती है। पुलिस प्रशासन के इस व्यवहार की वजह से ही केन्द्र और दिल्ली सरकार प्रशासनिक अधिकारियों के नियंत्रण के लिए कई साल से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेताओं के खिलाफ त्वरित कार्रवाई भी इसी परिपेक्ष्य में हुई है क्योंकि इस मामले में वहां के गृह मंत्री का बयान आया था कि हम मध्य प्रदेश में कांग्रेस द्वारा लगाए गए पचास प्रतिशत कमीशन के भ्रष्टाचार के आरोप पर कार्यवाही कर सकते हैं।
राहुल कुमार सिंह
‘मुर्गा मुर्गी प्यार से देखे नन्हा चूजा खेल करे‘ गीत आपने सुना है? स्वतंत्रता दिवस के साथ मुझे यह गीत एक बार याद आता ही है।
हमारे स्कूल में तब रिकॉर्ड प्लेयर पर 78 आरपीएम वाले तवा-रिकॉर्ड बजते थे। मुख्यत: प्रेरक, देश-प्रेम वाले और बच्चों वाले गीत होते थे। इसी में एक फिल्म ‘दो कलियां‘ का रिकॉर्ड था, जिसका गीत ‘बच्चे मन के सच्चे, सारी दुनिया के आंख के तारे‘ बजाया जाता था। रिकॉर्ड बजाने की जिम्मेदारी प्रयोगशाला सहायक शंभू साहू जी की होती थी। रिकॉर्ड बजते देखना भी रोमांचकारी होता था।
साहू जी का बुलावा आया, गीत ‘बच्चे मन के सच्चे‘ आधा बज चुका था, साहू जी ने हम रिकॉर्ड प्लेयर दर्शक साथियों से कहा कि गीत पूरा हो तो सुई उठा कर रख दें, ऐसी जिम्मेदारी पा कर हम मित्र मंडली में उत्साह की लहर फैल गई।
गाना पूरा हुआ, सुई उठा कर रख दी गई। शांति छा गई, यह ठीक नहीं लगा तो रिकॉर्ड दूसरी तरफ पलट कर रिकॉर्ड पर सुई टिका दी गई। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि रिकॉर्ड के बीच वाले हिस्से पर कागज चिपका था- ‘बजाना मना है‘ और गीत बजने लगा ‘मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे‘। तब ‘प्यार‘ शब्द का सार्वजनिक खुलेआम उचार, वह भी स्कूल में कठोरता से निषिद्ध होता था, (संस्कार ऐसे कि प्यार शब्द, कान में खडख़ड़ाता था, जबान लडख़ड़ाती थी। )
साहू जी भागते हुए आए, गीत रोका, मगर तब तक यह प्रिंसिपल साहब चंदेल सर के कान में पड़ चुका था। पहले साहू जी, फिर हम सबकी पेशी हुई, मगर अनुशासन के पक्के प्रिसिपल साहब ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सजा तजवीज नहीं की, चेतावनी दे कर छोड़ दिया।
अब इस दिन, खास कर खबर पढ़ते कि अच्छे चाल-चलन के कारण कैदियों की सजा में राहत-रिहाई हुई, 1973 की अपनी पेशी याद आती है।
डॉ. संजय शुक्ला
बीते सोमवार को हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में 48 लोगों की मौत बादल फटने के बाद हुई तेज बारिश और भूस्खलन के बाद मलबे में दबने से हुई है। दरअसल यह पहली आपदा नहीं है जिसमें कुदरत ने कहर ढाया हो बल्कि इस बारिश के दौरान पहाड़ी राज्यों में भारी बारिश, बाढ तथा भूस्खलन के चलते चट्टानों में दबने से जान-माल का काफी नुकसान हुआ है। दरअसल इन हादसों के लिए सरकार और आम नागरिक ही जबाबदेह हैं तथा यह कुदरती नहीं बल्कि मानवीय कहर है। पहाड़ी राज्यों में बढ़ते हादसों के मद्देनजर अहम सवाल यह भी है कि सरकार और समाज प्रकृति के प्रति अपनी प्रवृत्ति कब बदलेगा? दरअसल सरकारों के आधुनिक विकास की भूख हमारी परंपरा, संस्कृति और प्रकृति को लगातार निगल रही है जिससे पहाड़ भी अछूता नहीं है। पहाड़ों और मनुष्य का सहजीवन सदियों से रहा है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले अनेक पहाड़ों का अपना धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है जहां अनेक तीर्थस्थल स्थापित हैं। इसके अलावा पहाड़ों संबंध का पानी, जलवायु, जैवविविधता और प्राकृतिक संपदाओं से भी है।
इसी साल नववर्ष की छुट्टियों के दौरान हिमाचल प्रदेश से खबर आई थी कि वहां पहाड़ों पर बसे मनाली सहित अन्य पर्यटक शहरों में सैलानियों और चारपहिया वाहनों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी जिससे घंटों यातायात अवरूद्ध रहा। वैश्विक महामारी कोरोना की पाबंदियां खत्म होने के बाद देश के विभिन्न तीर्थस्थलों और पर्यटक स्थलों में सैलानियों तथा श्रद्धालुओं की भीड़ काफी बढ़ी है। इन स्थलों में सैलानियों और वाहनों की भीड़ बढऩे के बाद वहां के प्रकृति में लगातार असंतुलन दिखाई दे रहा है यह असंतुलन पर्यावरणीय, जैवविविधता और भूगर्भीय है। पहाड़ों पर बसे तीर्थस्थलों और पर्यटन स्थलों पर क्षमता से ज्यादा वाहनों और यात्रियों का बोझ पहाड़ों को लगातार कमजोर कर रही है। सरकार इन स्थलों में तीर्थयात्रियों और सैलानियों के बढ़ते आकर्षण के कारण यहां व्यवसायिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है। सरकार द्वारा पर्यटकों को लुभाने के लिए जमीन बेची जा रही है जहाँ पर्यावरणीय सिफारिश को ताक में रखकर पहाड़ों को काटकर सडक़ें बनाई जा रही है अथवा चौड़ी की जा रही है।
पर्वतीय क्षेत्रों में अंधाधुंध बहुमंजिला होटल और रिजार्ट, रोपवे बन रहे हैं फलस्वरुप पहाड़ों पर मानव बसाहट बढ़ रही है। यातायात और जनसंख्या के दबाव से भी पहाड़ का परिस्थिकीय तंत्र बिगड़ रहा है। दैत्याकार क्रेन और भारी निर्माण उपकरण पहाड़ों को खोद रहे हैं, पहाड़ों के चट्टानी सीने को बारुद के विस्फोटों से तोड़ा जा रहा है। नदियों मेंं बेतहाशा रेत खनन हो रहा है, नदियों के मुहाने पर क्रशर प्लांट लगा दिया गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है फलस्वरूप पहाड़ों की मिट्टी बांधकर रखने की क्षमता कमजोर हो रही है। सरकार का नजरिया केवल पर्यटन उद्योगों को ही बढ़ावा देने का नहीं है बल्कि वह औद्योगिक और शहरी विकास के लिए जरूरी बिजली उत्पादन के लिए पहाड़ों को बंजर कर रही है व नदियों के अविरलता को बांध रही है।
सरकार के इन फैसलों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण संगठन लगातार अदालतों का दरवाजा खटखटा रहीं हैं लेकिन अदालती आदेशों और पर्यावरणीय कानूनों को धता बताकर पहाड़ों और नदियों पर पनबिजली परियोजनाओं का लगातार निर्माण कर रही है। इसके अलावा सरकार, कार्पोरेट घरानों, ठेकेदारों और प्रशासनिक अमले की गिद्ध नजर पहाड़ों में समेटे बेशकीमती खनिज संपदाओं की ओर भी जिसके चलते यह नापाक गठजोड़ पहाड़ों की सीना छलनी कर रही है। सरकार और कारपोरेट के इस गठजोड़ के खिलाफ आदिवासियों और प्रशासन के बीच संघर्ष की खबरें भी यदाकदा प्रकाश में आती है। साल 2019 में बस्तर के दंतेवाड़ा में बैलाडीला के नंदीराज पर्वत जिसे आदिवासी अपना देवस्थान मानते हैं में अडानी समूह द्वारा किए जा रहे लौह अयस्क खनन के खिलाफ आदिवासियों ने जम कर आंदोलन किया था।इसके अलावा हसदेव अरण्य क्षेत्र में भी वहां के आदिवासी और सामाजिक कार्यकर्ता कोयला खनन के खिलाफ हैं।
बिलाशक आधुनिक विकास की सनक पहाड़ों को खोखला कर रही है, नदियों की अविरलता खत्म कर रही है वहीं पेड़ों के कटने के कारण जंगल बांझ दिखाई देने लगे हैं। यह कहना गैर मुनासिब नहीं होगा कि आधुनिक सभ्यता ने सबसे ज्यादा उस प्रकृति के प्रति दिखाई है जिसके गोद में वह विकसित हुआ है। विकास का सपना शुरू में बड़ा लुभावना लगता है लेकिन जब यह विनाश बनकर प्रकट होता है तो वह प्रलयंकारी और भयावह होता है।देश की सरकारें विकास के नाम पर जिस तरह से प्रकृति और संस्कृति को रौंद रही उसकी त्रासदी मनुष्य को ही भोगना पड़ रहा है। साल 2013 में केदारनाथ के जल तांडव और 2021 में चमोली के जलप्रलय से सरकार और समाज ने कोई सीख नहीं लिया है। इस सीख की अनदेखी का परिणाम है कि अब पहाड़ मनुष्य से बदला ले रहे हैं।
गौरतलब है कि पहाड़ों पर हो रहे अंधाधुंध और बेतरतीब निर्माण के चलते पहाड़ जहां कमजोर हो रहे हैं वहीं इसका दुष्प्रभाव जलवायु पर भी पड़ रहा है। पहाड़ों का संबंध पानी से है क्योंकि पानी चट्टानों के बीच होती है जो प्राकृतिक रूप से रिसती रहती है जो आगे चलकर नदियों और नालों का स्वरूप लेती है। पहाड़ों के ये जलस्रोत जहां भूजल स्तर को बढ़ाते हैं वहीं इससे निकलने वाली नदियां और नालों से लोगों की आजीविका और जरूरतें पूरी होती है। पहाड़ों पर चलने वाले क्रशर उद्योगों के कारण चट्टान खिसकने और टूटने लगे हैं फलस्वरूप पानी का प्राकृतिक स्त्रोत खत्म हो रहा है वहीं पहाड़ के मलबों को नदियों और जंगलों में डालने के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में बताया है कि पहाड़ों की क्षमता की अनदेखी के कारण भूस्खलन का खतरा लगातार बढ़ा है।
पहाड़ों, जंगलों और नदियों पर बढ़ रहे अनुदारता का ही परिणाम है कि पहाड़ी इलाकों में बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं साल दर साल बढ़ रही है। पहाड़ों के साथ हो रहे निर्ममता के कारण देश और दुनिया में जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या विकराल रूप ले रही है। ग्लेशियर का पिघलना, बाढ़, सूखा और तूफान जैसे आपदाओं का संबंध पहाड़ और पर्यावरण से है लिहाजा पहाड़ों के प्रति सरकार और समाज को गंभीर होना ही होगा। पहाड़ों पर औषधि महत्व के दुर्लभ जड़ी- बूटियों और जीव जंतुओं का अस्तित्व खतरे में है।
अलबत्ता पहाड़ों के प्रति अनुदारता के लिए आम नागरिक भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। पर्वतीय इलाकों में पर्यटकों के वाहनों के धुएं और हार्न उस इलाके में वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहे हैं फलस्वरूप पर्यावरण और ईकोसिस्टम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पहाड़ों पर पर्यटकों और पर्वतारोहियों द्वारा हर महीने हजारों टन प्लास्टिक कचरा जिसमें प्लास्टिक बोतल, पॉलिथीन बैग, शीतल पेय के केन, स्ट्रा, चिप्स एवं अन्य खाद्य पदार्थों के पैकेट और अन्य डिस्पोजेबल सामान पहाड़ों, जंगलों या नदियों में फेंक दिए जाते हैं। एक एनजीओ ‘हीलिंग हिमालय’ के प्रदीप सांगवान बताते हैं कि हिमालयन क्षेत्र के पर्यटन स्थलों से वे रोज 1.5 टन गैर बायोडिग्रेडेबल कचरा इक_ा करते हैं। गौरतलब है कि ये प्लास्टिक कचरे हिमालय के तापक्रम को बढ़ाते हैं जिससे ग्लेशियर पिघलता है फलस्वरूप झील बनते हैं जो जलप्रलय जैसे बाढ़ लाते हैं।
बहरहाल इसमें दो राय नहीं कि आर्थिक विकास के लिए सरकार को बिजली और पर्यटन उद्योग दोनों की जरूरत है आखिरकार इससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता है लेकिन सरकार और समाज की जवाबदेही है कि विकास के साथ - साथ पहाड़ों, जंगल और नदियों की जैवविविधता और पर्यावरण संरक्षण को भी विमर्श में लाना होगा ही होगा। क्या हम ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जहां पहाड़ न हो, नदियां न हों, जंगल न हो? निश्चित तौर पर इसका उत्तर ‘नहीं’ ही होगा।
मनीष सिंह
भारत का संविधान किसी नागरिक को धर्मनिरपेक्ष होने का आदेश या उपदेश नही देता।
आम धारणा बनाई गई है कि धर्मनिरपेक्षता हिन्दुओ पर थोप दी गयी है। मुसलमानों को खुल्ली छूट मिल रखी है। जो लोग व्हाट्सऐप फार्वर्ड की मदद से, कॉन्स्टिट्यूशन में पीएचडी करते आये हैं, उनके लिए यह समझना जरूरी है।
संविधान मुख्यत:, गणराज्य के लिए निर्देशावली है। याने ‘सरकार’ उसके बिहाफ में क्या करे, क्या न करे। करे, तो किस तरह से, किन दायरों, प्रक्रियाओं के तहत करे।
तो धर्मनिरपेक्ष सरकार को होना है।
उसे किसी धर्म को फेवर नही करना है, डिस फेवर नही करना है। सरकार का काम व्यापार है, चाकरी है। याने टैक्स लेना है, सेवा देनी है।
सबसे टैक्स लेना है, सबको सेवा देनी है।
भारत गणराज्य, याने सरकार इसके कोष से मंदिर नहीं बनवा सकता। सरकार तीर्थाटन नहीं करा सकती। वो मस्जिद भी नहीं बनवा सकती, हज भी नहीं करा सकती। हां, वह श्मशान और कब्रिस्तान बनवा सकती है। यह एक सेवा है।
जनता मंदिर बनवाये, मस्जिद बनवाये, हज करे या गोआ जाए, संविधान आपको बाध्य नहीं रोकेगा, अनलेस किसी अन्य कानून (जैसे किसी की भूमि पर कब्जा करके बनाना) का उल्लंघन न हो।
सत्ता किसी साधना पद्धति को इंसेटिवाइज नहीं करेगी, विशेष महत्व नहीं देगी। यही वो धर्मनिरपेक्षता है, जो सम्विधान मे लिखित है।
किसी लोकतंत्र की गुणवत्ता, वहां के अल्पसंख्यकों की वेल बीइंग से नापी जाती है। उन्हें अपनी मान्यताओं, रवायतों के साथ जीने की कितनी छूट है, यह दुनिया देखती है।
अल्पसंख्यक आपके लोकतंत्र का थर्मामीटर है, शोकेस हैं। शोकेस अक्सर गोदाम से ज्यादा चमकाया और सजाया जाता है।
यूँ तो भारत मे शोकेस की हालत, गोदाम से ज्यादा खराब है। यह सच्चाई सरकारे जानती थी, इसलिए उनके हालात सुधारने को बड़ी-बड़ी बातें करती थी है। विघ्नसंतोषी, इसी से चिढ़ते हैं।
ईष्र्यावश, खतरे में आ जाते हैं।
तब, पहले से जर्जर शोकेस को दंगाई बन तोडऩे पर उतारू हो जाते हैं। और जब ऐसे दंगाइयों के हाथ मे सत्ता आ जाये, तो शोकेस पर बुलडोजर चलता है।
बहरहाल, संदेश यह, कि हमारे संविधान के अंतर्गत धर्मनिरपेक्षता पोलिटिकल टम्र्स में है, इंडिविजुअल नहीं। नागरिक के लिए नहीं।
तो किसी नागरिक को धर्मनिरपेक्ष होने की जरूरत नहीं है। यह जिम्मेदारी और बाध्यता, सरकार की है। आप तो आराम से, अपना धर्म मानें।
दूसरे धर्म वालो को डिस्टर्ब न करें। उनको ज्ञान न ठेलें। ज्ञान अपने बच्चों को दें। अपनी संस्कृति का, अपनी साधना पद्धति का, अपने धर्म का। और उन्हें बतायें, समझायें...
कि उनका सबसे बड़ा धर्म, इंसान होना है।
प्रबुद्ध होना है।
डॉ. आर.के.पालीवाल
हमारी राजनीति में पिछ्ले बीस साल में जो सबसे बड़ा परिर्वतन हुआ है वह बहुत तेजी के साथ कांग्रेस का बी जे पी करण और बी जे पी का कांग्रेसीकरण है। इसमें दुर्भाग्य यह रहा है कि दोनों दलों ने एक दूसरे की अच्छाइयों के बजाय एक दूसरे की विकृतियों और बुराइयों को अधिक आत्मसात किया है। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस की सबसे बड़ी विशेषता देश की विविधता को साधने की रही है और भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता सामूहिक नेतृत्व की थी, लेकिन इन दो बड़े गुणों को उन्होने एक दूसरे से नहीं सीखा।कांग्रेस की सबसे बडी बुराई व्यक्ति और परिवारवाद भारतीय जनता पार्टी में भी बहुत तेजी से आगे बढ़ी हैं। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की सबसे बडी अच्छाई उसका सामूहिक नेतृत्व थी ,जिसमें एक मजबूत पाया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का था और दूसरा भाजपा के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले कई कद्दावर नेताओं, यथा अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, वैकेया नायडू, नितिन गडकरी,सुषमा स्वराज, कल्याण सिंह और येदियुरप्पा आदि का था। भाजपा के इस गुण को कांग्रेस आत्मसात नहीं कर सकी। हालांकि आज भाजपा में भी ऐसी स्थिति नहीं है। न राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भारतीय जनता पार्टी पर वैसा प्रभाव रहा है और न प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के अलावा भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष जे पी नड्डा सहित किसी अन्य नेता का पार्टी में खास दबदबा है। इसी तरह भाजपा ने कांग्रेस के सह अस्तित्व के सिद्धांत को आत्मसात नहीं किया।
कांग्रेस और भाजपा में हुए नकारात्मक परिवर्तनों का सबसे बड़ा कारण सत्ता प्राप्ति के लिए एक दूसरे के नाराज चल रहे जिताऊ नेताओं की सेंधमारी है। जब कोई नेता कई दशक एक दल में गुजारकर दूसरे दल में प्रवेश करता है तो उसके साथ पुराने दल की कार्य प्रणाली भी दूसरे दल में वैसे ही प्रवेश करती है जैसे किसी देश से दूसरे देश में खाद्यान्न लाने पर उस देश के खरपतवार भी साथ आकर नए देश में प्रवेश कर जाते हैं। जब एक दल से दूसरे दल में आवाजाही व्यापक पैमाने पर होती है, जैसे मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से निकलकर दर्जनों विधायक और हजारों कार्यकर्ता भाजपा में घुसे थे तब पुराने दल की बडी विकृतियां भी दूसरे दल में उतनी ही ज्यादा मात्रा में घुसती हैं।
मध्य प्रदेश में एक दल द्वारा दूसरे दल में सेंधमारी का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि आजकल कांग्रेस भी भाजपा में असंतुष्ट नेताओं को खोज खोज कर उसी तरह सेंधमारी की कोशिश कर रही है जिस तरह की सेंधमारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने करके कांग्रेस की बहुमत की कमलनाथ सरकार को गिराकर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में अपनी वर्तमान सरकार बनाई थी। जब राजनीतिक दलों में विस्तारीकरण के लिए नए नेता विकसित करने के बजाय दूसरे दलों के असंतुष्ट नेताओं पर डोरे डालना प्रमुख अस्त्र बन जाता है तब उस दल के चाल, चरित्र और चेहरे में आमूल चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है। वैसे तो वर्तमान राजनीतिक दौर में दल बदल इतना सामान्य हो गया है कि दलों की विचारधारा पूरी तरह गौण हो गई है। बहुत से नेता इतनी बार दल बदल चुके हैं कि हर दल के घाट का पानी पी कर उनकी अपनी कोई विचारधारा ही नहीं बची है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीन ऐसे राज्य हैं जिनमें विधान सभा और लोकसभा चुनावों के बीच एक साल से भी कम समय का अंतर रहता है। इन तीन राज्यों की दूसरी समान राजनीतिक विशेषता यह भी है कि इनमें भाजपा और कांग्रेस ही दो प्रमुख राजनीतिक दल हैं। एक साल में दो चुनाव होने के कारण यहां बहुत लंबा चुनावी दौर चलता है क्योंकि इसका असर दो दो चुनावों पर पड़ता है। अगला एक साल इन तीनों राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन तीनों राज्यों की राजनीति का असर कांग्रेस और भाजपा के लिए इन प्रदेशों के साथ साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी दोनों दलों की रणनीति को प्रभावित करेगा।


