विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
भाजपा में इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कद सबसे ऊंचे हैं। इसी हिसाब से घर-घर मोदी, मोदी है तो मुमकिन है और भाजपा कार्यकर्ताओं की भीड जगह-जगह मोदी मोदी चिल्लाती है। इंदिरा गांधी के समय में जिस तरह कांग्रेस का मतलब इंदिरा गांधी हो गया था वर्तमान भाजपा की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही हो गई है। जहां तक अमित शाह का प्रश्न है वे मोदी जी के बाल सखा की तरह हैं। जहां मोदी जी जन सभाओं का दायित्व संभालते हैं वहां अमित शाह चुनावी राज्यों में स्थानीय नेताओं को दिशा-निर्देश देते हैं। राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र के लिए भले ही ऐसी स्थिती उचित नहीं कही जा सकती लेकिन दल की विजय के लिए यह सैनिको के अनुशासन की तरह सफल साबित हो रहा है।
प्रधानमंत्री ने इधर कई बार भारतीय जनता पार्टी को विस्तारित करने के लिए पसमांदा मुस्लिम समाज को साथ जोडऩे का आव्हान किया है। कुछ समय पहले पांचजन्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरफ से भारतीय जनता पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए केवल प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और हिन्दुत्व के भरोसे नहीं रहने की सलाह दी गई थी। पांचजन्य की भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निर्भरता कम करने की सलाह मानना तो भाजपा के वर्तमान परिदृश्य में असंभव है लेकिन शायद हिंदुत्व के बाहर निकलकर पार्टी के विस्तार की सलाह मान ली गई है। पसमांदा मुस्लिम समाज मुस्लिम जमात का वह वर्ग है जिसमें बुनकर समाज के अंसारी आदि गरीब मुसलमान आते हैं। इनमें काफी बड़ी आबादी उस गरीब वर्ग की है जिसने इतर कारणों से धर्मांतरण कर मुस्लिम धर्म स्वीकार किया था लेकिन इसके बाद भी उनकी आर्थिक और सामाजिक हैसियत में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इस समाज की स्थिति आजादी के पहले भी खराब थी और आजादी के बाद भी उसमें ज्यादा परिर्वतन नहीं हुआ है। यही कारण है कि आजादी के आंदोलन के समय भी इस समाज के कई नेता मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ नहीं जुडक़र या तो आजादी के आंदोलन में कांग्रेस के साथ थे या अपनी अलग संस्था मोमिन कांफ्रेंस से संबद्ध थे।
उत्तरप्रदेश और बिहार में पसमांदा मुस्लिम समाज की काफी संख्या है। कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में उनका अच्छा खासा वोट बैंक है। उत्तर प्रदेश में यह वोट बैंक शुरूआती दौर में कांग्रेस के साथ हुआ करता था लेकिन कांग्रेस की स्थिती कमजोर पडऩे पर यह कभी समाजवादी पार्टी और कभी बहुजन समाज पार्टी की तरफ लुढक़ता रहा है। इसी तरह बिहार में कांग्रेस की कमजोरी के कारण यह समूह राष्ट्रीय जनता दल की तरफ आ गया था।
भारतीय जनता पार्टी से यह समूह अभी तक दूर रहा है। असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी एआई एम आई एम ने भी उत्तर भारत में इस वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की काफी कोशिश की है लेकिन उन्हें बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली। यह समाज किसी एक दल की बपौती नहीं बना है शायद इसीलिए प्रधानमंत्री की नजऱ इस वर्ग पर पड़ी है। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने 27 जुलाई से पसमांदा मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोडऩे के लिए स्नेह यात्रा अभियान शुरू किया है। यह यात्रा विशेष रूप से उन्हीं क्षेत्रों में होकर गुजरनी है जहां पसमांदा मुस्लिम समुदाय की अच्छी खासी संख्या है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय जनता पार्टी की स्नेह यात्रा में इस समाज के कितने लोग जुड़ेंगे। एक तरह से राम मंदिर के लिए रथ यात्रा से लेकर अब तक भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व के मुद्दे से बाहर निकलकर इस तरह का कोई विशेष अभियान उत्तर भारत में नहीं चलाया है जिससे उसका उदार और समावेशी चेहरा सामने आए। यदि यह बदलाव हाथी दांत की तरह दिखावा न होकर असली साबित हुआ तो निश्चित रूप से यह स्वागत योग्य कदम है।


