विचार / लेख
प्रकाश दुबे
छलांग मारकर इस नतीजे पर पहुंचने से पहले, कि कार्यपालिका की बात न्यायपालिका को माननी पड़ी, उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश भूषण गवई क कथन याद करें। उलाहने से उभरे सवाल याद करें-1-क्या निदेशालय के बाकी अधिकारी अपने को अक्षम साबित होते महसूस नहीं करेंगे? 2- एक ही व्यक्ति के भरोसे काम चल रहा है? कल मैं यहां नहीं रहूंगा, तो देश की शीर्ष अदालत बैठ जाएगी? वरिष्ठता क्रम के मुताबिक न्यायमूर्ति गवई आगामी बरसों में देश के मुख्य न्यायाधीश पद के निर्विवाद दावेदार हैं। उनकी तीखी टिप्पणी के बावजूद संजय कुमार मिश्रा को 45 दिन तक प्रवर्तन निदेशालय का मुखिया बनाए रखने की मांग पर सरकार कायम रही। प्रधानमंत्री के दृढ़निश्चय, दूरदर्शिता तथा अर्जुन की तरह एक ही लक्ष्य पर आधारित संकल्प की जीत है। ईडी में संजय नज़रिए के रुतबे का संकेत तो है ही।
साहसी न्यायाधीश के तीखे बोल के बाद सर्वोच्च अदालत ने व्यापक जनहित में फैसले पर पुनर्विचार किया। बदल दिया। यह भी संकेत मिला कि इस्पाती ढांचा कहलाने वाली नौकरशाही अपनी दावेदारी और नियमों का हवाला देने में हिचकती है। हिचक के पीछे नैतिक कारण हैं, या भय? इस बहस से बचते हुए मूल मुद्दे पर विचार करें।श्री मिश्र1984 में राजस्व सेवा में आए। दो साल की नियुक्ति और सेवा विस्तारों को मिलाकर पांच बरस से आर्थिक मामलों की जांच और रोक के लिए बने प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक पद पर विराजमान हैं। केंद्र सरकार ने दलील दी कि अंतरराष्ट्रीय संगठन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की आगामी रणनीति में हिस्सेदारी के लिए देश को उनकी जरूरत है। अदालत ने मान लिया।
इन दिनों जी-20 का डंका बजता है। 1989 में विकासशील देशों के जी-7 की पेरिस में हुई बैठक में मनीलांडरिंग पर काबू पाने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स का गठन हुआ था। ट्विन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने विषय सूची में आतंकी गतिविधियों पर निगहबानी का मुद्दा जुड़वाया। साल भर के अंदर अप्रैल 1990 में आई एफएटीएफ की पहली रपट में 40 सिफारिशें की गई थीं। 2004 में विशेष तौर पर नौ और सिफारिशें जुड़ीं। भारत 2010 में पूर्णकालिक सदस्य बना। अब तक कितनी सिफारिशों पर भारत में अमल हुआ? सेवाविस्तार पाने में यशस्वी निदेशक से यह पूछना गलत लग सकता है। टास्क फोर्स की साल में तीन बैठकें होती हैं। फरवरी, जून और अक्टूबर। जून 2023 में बैठक हुई। आम नागरिक को जानकारी नहीं मिलती।
सुप्रीम कोर्ट को दस्तावेज खंगालते हुए पूछने का अधिकार है कि भारत के हिस्से में क्या आया? आतंकी गतिविधियों पर भारत सहित दुनिया के कई देशों की नजऱ है। तीन देश काली सूची में शामिल हैं। तीनों देशों से भारत के कूटनय संबंध है। इनमें म्यांमार शामिल है जिसका उल्लेख मणिपुर के संदर्भ में बार बार होता है। रक्षा मंत्री ने तीन दिन पहले पाकिस्तान को हडक़ाते हुए कहा-जरूरत पडऩे पर हमला किया जा सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान को एफएटीएफ ने काली सूची से हटा दया।
भारत ने सहमति कब और क्यों दी? निदेशक की उपलब्धियों में इस तथ्य को शामिल किया गया होगा। एफएटीएफ में पर्यवेक्षक हैसियत से शामिल इंटरपोल का भी भारत सदस्य है। दर्जनों खुफिया एजेंसियां हैं। वित्त मंत्री और दो राज्यमंत्रियों के अलावा वित्त सचिव स्तर के आधा दर्जन से अधिक अधिकारी हैं। उन्होंने पूछताछ की होगी। भारत ने बार बार पाकिस्तान को आतंकी देश कहा है। जनता को पता लगे कि किस विवशता में भारत ने फैसले का समर्थन किया? परिचित कराने का काम ईडी का है। 2014-15 से वर्ष 21-22 के बीचईडी की उपलब्धि है-888 मामले दर्ज किए गए। अनेक नामी गिरामी लोगों को घेरा। दबोचा। इनमें से मात्र 23 मामले ही दोषसिद्ध हो सके। ऐसा क्यों? आम नागरिक अदालत का मुंह ताके या ईडी से सवाल करे?
भ्रष्टाचार मुक्त भारत का प्रधानमंत्री का सपना लोगों को भाया। हालिया अदालती निर्णय से मिला संकेत उनके प्रशंसकों को पसंद नहीं आया होगा-140 करोड़ के देश के पास नौकरशाही के अदना से पुरजे का विकल्प नहीं है। न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने रायबरेली से इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया। इमरजेंसी लागू करने के अगले दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल की बैठक में नहीं पहुंचीं।
वरिष्ठतम मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने बैठक में कहा- इंदिराजी का कोई विकल्प नहीं है। पार्टी के अध्यक्ष भोले असमिया देबकांत बरुआ ने भक्तिभाव से इंदिरा इज इंडिया का नारा दिया। इंडिया शब्द को इन दिनों मुहाजदीन की कतार में बिठाया जा रहा है। इस पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी के प्रदेश में जन्मे संजय दृष्टि वाले ईडी विशेषज्ञ के प्रकरण से इंदिरा इज़ इंडिया नारा गंगा नहा गया। नारे को बुरा मानने वाले अब भी हैं। वे बुरा कहते रहेंगे।गलत नहीं कह सकते। संबंधित अधिकारी के लिए महा कृपा प्रसाद मिलने के बाद तो बिल्कुल नहीं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


