विचार/लेख
भारत का विभाजन, गांधी की हत्या, नेहरू की मौत, इंदिरा और राजीव की हत्याएं, बच्ची निर्भया का दुर्भाग्य कांड, बांग्लादेश का निर्माण, वल्र्ड क्रिकेट में 1983 में भारत का विश्वकप, 1975 में इमरजेंसी, बाबरी विध्वंस, 1984 के सिक्ख नरसंहार, मंडल कमीशन की रपट, जेपी की अगुआई में 1974 का छात्र आंदोलन, 1962 में चीनी आक्रमण और कारगिल युद्ध जैसी घटनाएं भारतीय इतिहास में आसानी से भूलने लायक नहीं हैं। इनके समानांतर कई घटनाओं को इतिहास भूलने सा लगा है।
1971-80 के दशक की पांच घटनाएं चुनकर पत्रकार सुदीप ठाकुर ने करीब 200 पृष्ठों में एक वृत्तांत समेकित किया है। उनमें से उभरकर वस्तुपरक सच किसी तटस्थ लेकिन सक्रिय व्यक्ति को झिंझोड़ सकता है।
किताब को पिछले पृष्ठों से पढ़ेे ंतो खुद सुदीप के अनुसार 1971-80 के दशक में हुई कुछ घटनाएं मसलन गर्भपात को वैधता (1971), बांग्लादेश मुक्ति युद्ध (1971), चिपको आंदोलन (1973), पहला परमाणु परीक्षण (1974), सिक्किम का विलय (1965), आर्यभट्ट का प्रक्षेपण (1975), दूरदर्षन की स्थापना और असम आंदोलन (1979) पर विस्तार से नहीं लिखा गया है। यह लेखक की समझ है कि उसने गरीबी, प्रिवीपर्स समाप्ति, कोयला-कथा, परिवार-नियोजन और आपातकाल जैसे पांच विषयों को चुनकर उन्हें विस्तारित, व्याख्यायित और सिलसिलेवार तार्किक किया है। पांचों मुद्दे लोकतंत्र की बुनियाद में पैठ गए हैं।
इंदिरा गांधी ने 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। सुदीप ने लिखा कि शायद जयराम रमेश जैसे कांग्रेस नेता या अन्य तरह से जानकारी मिली कि यह सूत्र कांग्रेस के कद्दावर नेता सी. सुब्रमण्यम के सुझाव पर इंदिरा ने राजनीति-सुलभ किया था। इस पार्टी में रहने के कारण मुझे अच्छी तरह याद है कि महासचिव श्रीकांत वर्मा ने अपने दफ्तर में बैठकर रिहर्सल भी किया था कि इंदिरा गांधी को यह कहने ‘मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, और वे कहते हैं इंदिरा हटाओ’ के ध्वनि संयोजन की बारीकियों को भी वे शिद्दत के साथ तलाश रहे थे। भारत की गरीबी को लेकर सुदीप-कथा कांग्रेस पार्टी के पितामह कहे जाते दादा भाई नौरोजी की 1876 में लिखी किताब के हवाले से है।
सुदीप ने यह सब विस्तार में विष्लेषित नहीं किया। लेकिन जानकारियां, सूचनाएं, सांख्यिकी और कई विचार सूत्र बेहद तरतीब के साथ पेष कर दिए हैं। जो कह सकना चाहिए था, वह बिना कहे भी कह भी दिया है। आज ‘गरीबी हटाओ’ का नारा कितना विकृत होकर 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राषन की सरकारी भीख के रूप में तब्दील हो गया है।
कोयला भारतीय राजनीति और आर्थिक जीवन में एक तरह की भूमध्य रेखा की तरह संतुलन की तुला पर डंडी भी मारता है। वही कोयला इंदिरा गांधी के कार्यकाल मे कई गफलतें कर रहा था। कोयला उत्पादक बिहार के क्षेत्र में राजनीतिक गुंडागर्दी, अपराध और हेकड़बाजी को लेकर उजले कपड़ों वाले सियासतदां अपनी नीयत और दिल में लगातार कोयला मल रहे थे। कोयले का राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी के कारण एक बड़ी राष्ट्रीय घटना हुई। मनमोहन सरकार के समय कोयले की बंदरबांट और हेराफेरी या अन्य आरोप लगाकार महालेखाकार विनोद राय सरकारी पार्टी पर 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपयों के भ्रटाचार की रिपोर्ट उजागर करें, जो बाद में विवादित हो जाए। सुदीप ने माक्र्स को उद्धरित किया है ‘रेलवे भारत में औद्योगिक क्रांति ला देगा और पूरे देश को बदलकर रख देगा।’ तब कोयले से पैदा भाप ही रेलगाडिय़ों को चलाती थी। सुदीप ने यह भी इषारा किया है कि कोयले का निजीकरण हो जाने से इंदिरा सरकार को लगा कि कोयले का उत्खनन और दोहन बहुत अवैज्ञानिक तरीके से पूंजीवाद को प्रश्रय देने के लिए किया जा रहा है। मैं खुद भिलाई स्टील प्लांट का वकील रह चुका हूं। तब निमाई कुमार मित्रा प्लांट के डायरेक्टर थे। उन्होंने मेरी रुचि देखकर एक गवेषणात्मक किताब तीन खंडों की पढऩे के लिए दी थी। उसमें किसी विद्वान प्रो. लहरी ने कोयले के क्रूर उत्खनन को लेकर भारत सरकार को चेतावनी दी थी। बाद में तिस्कृत महसूस करने पर वे संभवत: अर्जेंटीना सरकार के कोयला सलाहकार बनकर चले भी गए थे।
सुदीप ने अपनी किताब में एक एक बारीक बात को अपने तर्कों के सूत्र में पिरोकर पूरा सार संक्षेप सिलसिलेवार लिखा है। उसे और संक्षेप नहीं किया जा सकता था। पूरी किताब सरसरी तौर पर पढऩे से भी एक तात्कालिक प्रतिक्रिया मांगती है। यादों की गुमशुदगी भी होती है। यह पुस्तक एक तरह से यादध्यानी या रिफ्रेंस की भी है। इसे गजेटियर की तरह भी पढ़ा जा सकता है। सुदीप ठाकुर ने इतनी ज्यादा किताबों, फाइलों और पत्रिकाओं को खंगाला है, जो परिशिष्ट में संदर्भित है। यह भी दिलचस्प है कि उन्होंंने नई तकनॉलॉजी का फायदा उठाते हुए कई नामचीन लोगों तक की खोज-खबर जज्ब की। ई मेल भेजे। टेलीफोन किया। रूबरू भी मिले और इस तरह अपनी किताब की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को लेकर लोगों से केवल विषेषणों की गिफ्ट नहीं मांगी।
डॉ. आर.के. पालीवाल
मणिपुर में हिंसा और उसमें भी निरीह महिलाओं पर क्रूरतम अत्याचार करते शैतानी झुंड साबित करते हैं कि जिस समाज से यह लोग आते हैं वह मनुष्य तो क्या पशुओं से भी कहीं बदतर आदिम और बर्बर समाज है। कहने के लिए इन लोगों ने ईसाई या हिंदू धर्म की रंगीन चादरें ओढ़ ली हैं और पश्चिमी सभ्य समाज के कपड़े पहन लिए हैं, लेकिन इनके अंतश में मनुष्यता का लेशमात्र भी मौजूद नहीं है। व्यक्ति के रुप में ऐसे लोग बड़े कायर होते हैं लेकिन भीड़ बनते ही इनकी पशुता शिखर पर पहुंच जाती है। मणिपुर में कभी महिलाओं ने सैनिक बलों की ज्यादती के खिलाफ सामूहिक नग्न प्रदर्शन किया था। उनका मानना था कि मणिपुर से सैन्य बलों को हटा लिया जाना चाहिए। ताजा घटनाओं को देखकर मणिपुर की महिलाएं इतनी डरी हैं कि जिन्हें वे अपना समझती थी उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। कल्पना कीजिए कि मणिपुर में इतने ज्यादा सैन्य बलों के बावजूद वहां इस तरह की जघन्य घटना घट रही हैं तो सैन्य बलों के अभाव में वहां क्या स्थिति होती।
आदिम और बर्बर युग में जिस राजा की शक्तिशाली फौज होती थी उसकी सेना जीतने के बाद सबसे ज्यादा अत्याचार विजित देश की महिलाओं और उनमें भी युवतियों पर करती थी। द्वितीय विश्व युद्ध तक ऐसा हुआ है और हमारे देश के बंटवारे के समय भी ऐसा हुआ था। लगता था कि आजादी के दंगों के गहरे जख्मों से हम कुछ सीखेंगे लेकिन गोधरा और गोधरा काण्ड के बाद बिल्किस बानो के साथ जो हुआ उसने हमे संकेत दिया था कि वहशी जानवर अभी भी हमारे समाज में छिपे हैं। मणिपुर की घटना ने इसे और ज्यादा पुख्ता कर दिया कि नफरत के बीज केवल हिंदू मुस्लिम में ही नहीं आदिवासी समाज में भी फल फूल रहे हैं। एक तरफ मणिपुर के मुख्य मंत्री दोषियों को फांसी की सजा देने की बात करते हैं और दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री और उनके साथी बिल्किस बानो के गुनाहगारों के प्रति नरमी बरतते हैं। संभव है कल नई सरकार मणिपुर के गुनाहगारों के साथ भी इसी तरह की नरमी बरतेगी। राजनीतिक दलों और उनके शीर्ष नेताओं पर इसीलिए जनता कतई विश्वास नहीं करती। महिला पहलवानों का मामला हमारे सामने है। कड़वी सच्चाई यही है कि जहां जितने ज्यादा वोट दिखाई देते हैं या आरोपी जितने ज्यादा शक्तिशाली होते हैं वहां राजनीतिक दल उतना ही गलीजपन प्रदर्शित करते हैं। यही कारण है कि अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, बृजभूषण शरण सिंह, राजा भैया, आनन्द मोहन और शहाबुद्दीन जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त लोग न केवल सालों साल कानून को ठेंगा दिखाते रहते हैं बल्कि जिताऊ होने के कारण राजनीतिक दलों की कृपा से माननीय सासंद और विधायक भी बन जाते हैं।
कुछ लोग महिलाओं के साथ घृणित कृत्य की आलोचना तो कर रहे हैं लेकिन किंतु परंतु के साथ। बर्बरता सभ्य समाज को शर्मसार करती है और जब यह महिलाओं, बच्चों और वृद्धों के साथ होती है तब तो यह क्रिया की प्रतिक्रिया के अक्सर याद किए जाने वाले सिद्धांत को भी शर्मसार करती है। क्रिया की प्रतिक्रिया बराबरी वालों के साथ थोडी बहुत सहानुभूति पा सकती है लेकिन कुकी दंगाईयों की सजा निर्दोष महिलाओं को दिए जाने का किसी भी दृष्टि से लेशमात्र भी समर्थन कोई हद दर्जे का राक्षस ही कर सकता है। जो लोग दबी जुबान ऐसा कर रहे हैं वे यह भूल जाते हैं कि कल कोई उद्दंड समूह उनके परिवार के निरीह लोगों के साथ भी ऐसा कर सकता है। पूरे घटनाक्रम में यही अच्छा है कि मणिपुर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को चेताया है कि वह तुरंत कार्यवाही करे अन्यथा न्यायालय इस मामले को देखेगा। सर्वोच्च न्यायालय की अपनी सीमाएं हैं फिर भी उसका यह कदम आम नागरिक के मन में थोडी आशा बरकरार रखने में सक्षम है।
प्रकाश दुबे
नोट बंदी के अगले सप्ताह बांग्लादेश के संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष ने कहा-आपने बहुत देर से नोट बंदी की। भारतीय होने के नाते चौंकने की बारी मेरी थी। उन्होंने बात साफ की-नकली नोट कई रास्तों से भारत में पहुंचते हैं। बांग्लादेश में भारतीय नकली मुद्रा की छपाई कहीं नहीं होती। कहा यही जाता है कि बांग्लादेश से भारी मात्रा में मुद्रा की तस्करी होती है। उसी रात कुछ घंटों बाद भारत में रह चुके बांग्लादेश के नामी पत्रकार ने उलाहना दिया -दोनों देशों के बीच विश्वास के अभाव के कई कारण है। आपने महात्मा गांधी को खोया। वे संत थे।
बांग्लादेश के संस्थापक प्रधानमंत्री के लगभग पूरे परिवार का खून कर दिया गया। हमारी सरकार धार्मिक कट्?टरवादियों से जूझती है। इसके बावजूद मानव तस्करी, पशु तस्करी सहित हर गड़बड़ी के लिए बांग्लादेश पर अंगुली उठाई जाती है। मैंने सहज भाव से पूछा-भारत से कितने लोग लुकाछिपी से बांग्लादेश आते हैं? उत्तेजित होने के बजाय उन्होंने प्रश्न का उत्तर प्रश्न में दिया-हमारे देश में बेरोजगारी है। बेहतर भविष्य की उम्मीद में लोग गैरकानूनी तरीके से प्रवेश करते हैं। आपके अर्ध सुरक्षा बल सीमा पर पहरेदारी करते हैं। इसके बावजूद भारी संख्या में अवैध तरीके से प्रवेश कैसे संभव होता है? न जानते हों, तो जाकर पूछिए कि इनमें महिलाओं की संख्या अधिक क्यों होती है?
सिले हुए कपड़ों और ऐसे ही अन्य रोजगार के कारण बांग्लादेश से गैरकानूनी आवाजाही पर अंकुश लगा है। कुछ प्रश्नों का उत्तर दोनों देशों की पुलिस और अर्धसैनिक सुरक्षा दल से मिल सकता है-जैसे अवैध निकासी कैसे होती है? लुकछिप कर आने वाली महिलाओं को क्या कीमत चुकानी पड़ती है? भारत में उन्हें क्या रोजगार मिलता है? म्यांमार में सैनिक तानाशाही आने के बाद सीमा पार कर नागालैंड, मणिपुर से लेकर मेघालय तक पहुंचने वाले रेलों को कहां ठौर मिला? गांजा-अफीम जैसे मादक पदार्थ उपजाने और उनकी तस्करी करने में उनकी, भारत की सीमा पर बसे जनजाति समूहों और देश भर में भेजकर कमाई करने वाले चेहरों की पहचान में किस प्रकार की दिक्कत है? मेरे भारत महान में सीमा की सुरक्षा की सौगंध खाना आसान है। कुछ महीने पहले केंद्रीय गृहमंत्री ने मणिपुर पहुंचकर मादक पदार्थों की तस्करी करने वालों को चेतावनी दी थी। भारी संख्या में तैनात केंद्रीय बल और पुलिस रोकने में असमर्थ क्यों है?
सीमा की हिफाजत का जिम्मा किसका है? कितनी निगरानी है? इस बात पर संसद में चर्चा होती है। अचरज इस बात का है कि जिस दिन संसद के नए भवन का गृह प्रवेश समारोह होता है उस दिन राजधानी में पहलवानी करने वाली, कुश्ती लडऩे वाली बेटियों की पिटाई होती है। नए सजे-संवरे भवन में जब पावस सत्र का शुभारंभ होता है तब खबर आती है कि यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह की अंतरिम जमानत को स्थायी जमानत में बदल दिया गया है। कुश्ती संघ की कमान भले छोडऩी पड़ी हो, उनकी लंगोटा फटकार हुंकार में कोई अंतर नहीं आया। मामले की जांच करने वाली पुलिस के वकील से पूछा गया-आप अभियुक्त को जमानत देने का विरोध करते हैं? भरी अदालत में उत्तर मिला-हम न जमानत देने का समर्थन करते हैं, न विरोध। अदालत जैसा ठीक समझे। अपराध की जांच करने वाली पुलिस के इस जवाब का मतलब अनपढ़ भी जानता है।
पुलिस, सुरक्षा बल, अदालतें आम आदमी की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध हैं। इसके बावजूद बर्बरता और नृशंसता से लदे फदे सैकड़ों हिंसक महिलाओं की पारदर्शिता नोंचते हैं। किसी मूर्ख ने नहीं, बल्कि एक मुख्यमंत्री ने बेझिझक कहा-हमने (4 मई की घटना पर 80 दिन बाद) स्वयमेव संज्ञान लेकर कार्रवाई की। किसे अपना रखवाला मानेंगे? केंद्र सरकार ने सीमावर्ती राज्यों में प्रदेश सीमा के अंदर भी पुलिस के अधिकार अर्धसैनिक बलों को सौंप दिए थे। उसे भी भनक नहीं लगी। जंजीर में जकड़ देने के बावजूद आशंकित होने पर श्वान भौंकता अवश्य है। रखवालों को रोबोट बना देने पर वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत के बावजूद सक्षम नहीं हो सकते। पराजित राज्य का महानिदेशक सीधे सीबीआई की कुर्सी पा जाता है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश समेत अनेक राज्यों में परिणाम भुगत चुके हैं। महिला और विशेषकर जनजातीय समुदायों के रखवालों की संख्या कम नहीं है। आदिवासी के मुख पर मूत्रदान करने वाले विधायक-निकटवर्ती के प्रदेश में गुजरात के अनुभवी आदिवासी राज्यपाल हैं । मणिपुर में लज्जा के चीरहरण कांड में पहरेदार की सक्रियता से देश की प्रथम नागरिक से लेकर संबंधित प्रदेश की आदिवासी राज्यपाल तक परिचित हुए। इस तरह के सांकेतिक प्रतिनिधित्व के नफा-नुकसान पर वोट देते समय विचार नहीं किया जाता है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
अंशुल सिंह
बीते गुरुवार को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने बीजेपी सांसद और कुश्ती महासंघ के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को पहलवानों से जुड़े यौन शोषण मामले में सशर्त जमानत दे दी है।
कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह के साथ सह-अभियुक्त और कुश्ती महासंघ के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को भी जमानत दी है।
अदालत ने दोनों को 25-25 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दी है।
जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा है कि अभियुक्त बिना किसी पूर्व सूचना के देश नहीं छोड़ेंगे और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शिकायतकर्ताओं या गवाहों को धमकी या लालच नहीं देंगे।
अदालत की तरफ से मामले में अगली सुनवाई 28 जुलाई तय की गई है।
अदालत में क्या दलीलें दी गईं?
राउज़ एवेन्यू कोर्ट में मामले की सुनवाई एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (एसीएमएम) हरजीत सिंह जसपाल ने की और इस दौरान बृजभूषण सिंह की जमानत याचिका को लेकर दिल्ली पुलिस दुविधा में दिखी।
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, जज ने जमानत की याचिका पर बार-बार पूछा कि याचिका पर जांच एजेंसी (दिल्ली पुलिस) का क्या रुख है?
जवाब में पुलिस की तरफ से पेश हुए सरकारी वकील ने अदालत से ‘कानून के अनुसार’ याचिका पर सुनवाई करने का आग्रह किया।
जस्टिस हरजीत सिंह ने सरकारी वकील अतुल श्रीवास्तव से पूछा, ‘आपका रुख क्या है? क्या आप याचिका का विरोध करते हैं?’
जवाब में वकील अतुल श्रीवास्तव ने कहा, ‘हां, माननीय। कृपया कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक आदेश पारित करें।’
इसके बाद जज ने पूछा, ‘आप (दिल्ली पुलिस) विरोध कर रहे हैं या नहीं?’
सरकारी वकील ने कहा, ‘दोनों में से कोई नहीं। मेरा निवेदन है कि कानून के अनुसार आदेश पारित करें।’
जज ने वकील अतुल श्रीवास्तव से फिर पूछा कि आपका उत्तर क्या है? हां या ना।
सरकारी वकील अतुल श्रीवास्तव ने कहा, ‘दोनों में से कोई नहीं।’
इसके बाद जज ने अदालती कर्मचारी को अपना फ़ैसला लिखवाया,‘सरकारी वकील का कहना है कि वह न तो जमानत याचिका का विरोध कर रहे हैं और न ही समर्थन कर रहे हैं। उनका केवल यह कहना है कि अदालत को कानून, नियमों, दिशा-निर्देशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुसार जमानत याचिका पर विचार करना चाहिए।’
कानून और अदालत संबंधी मामलों की जानकारी देने वाली वेबसाइट लाइव लॉ के मुताबिक शिकायतकर्ता के वकील हर्ष बोरा ने अदालत में कड़ी शर्तों के साथ जमानत देने की बात कही थी।
वकील हर्ष बोरा ने कहा, ‘यदि माननीय जज जमानत देने के इच्छुक हैं, तो कड़ी शर्तें लगाई जा सकती हैं।’
इस पर आरोपियों के वकील राजीव मोहन ने कहा कि उनकी तरफ से सभी शर्तों का पालन किया जाएगा।
‘जमानत मिलना पुलिस की चूक है’
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने जमानत का न तो समर्थन किया था और न ही विरोध। उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे विक्रम सिंह सरकारी वकील के इस फैसले पर असहमत दिखाई देते हैं।
विक्रम सिंह कहते हैं, ‘पुलिस और प्रशासन का ये कर्तव्य है कि पूरी शक्ति और सामथ्र्य के साथ अपराधियों को सलाखों के पीछे रखें और उनके भागने के तमाम रास्तों को बंद कर दें।’
‘जमानत निरस्त होने के कुछ आधार होते हैं, जैसे- कोई साक्ष्य को प्रभावित कर सकता है या गवाहों को तोड़ सकता है। बृजभूषण सिंह के मामले में सर्वविदित है कि वो जांच को प्रभावित करने का सामथ्र्य रखते हैं और इसकी प्रबल संभावना है कि वो साक्ष्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं और गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए ये पुलिस की जि़म्मेदारी थी कि इन परिस्थितियों के मद्देनजऱ ज़मानत का पुरजोर तरीके से विरोध करते। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। मैं समझता हूं ये पुलिस और सरकारी वकील की एक बड़ी चूक है।’
मामले में पूर्व डीजीपी सरकारी वकील की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं।
विक्रम सिंह कहते हैं, ‘जब वकील ने कोर्ट में कोई स्टैंड नहीं लिया तो आप केस क्यों लड़ रहे हो? पुलिस ने चार्जशीट फाइल की है तो हर सरकारी वकील चाहता है कि आरोपी की सहूलियत कम की जाएं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनकी जि़म्मेदारी है कि आरोपी की जमानत का विरोध करें।’
कानून क्या कहता है?
मामले का क़ानूनी पहलू समझने के लिए बीबीसी ने सुप्रीम कोर्ट में वकील विराग गुप्ता और नितिन मेश्राम से बात की।
विराग गुप्ता कहते हैं, ‘भारत के संविधान और कानूनी व्यवस्था के अनुसार अपराधियों को कठोर दंड मिले लेकिन कोई भी बेगुनाह जेल में नहीं रहे। इसके उलट शातिर अपराधी जेल से बाहर और छुटभैये आरोपी सलाखों के भीतर रहते हैं। सीआरपीसी कानून के अनुसार संज्ञेय और गैर-जमानती किस्म के गंभीर अपराध जैसे-हत्या, लूट, बलात्कार और ड्रग्स जैसे मामलों में मजिस्ट्रेट के वारंट के बगैर ही आरोपी को पुलिस गिरफ़्तार कर सकती है।’
‘दूसरी तरफ असंज्ञेय और जमानती किस्म के हल्के अपराध के मामलों में मजिस्ट्रेट के बगैर गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। एफ़आईआर दर्ज करने के बाद अगर आरोपी की गिरफ्तारी के बगैर पुलिस मजिस्ट्रेट के सामने चार्जशीट फाइल करती है तो फिर ट्रायल शुरु होने पर आरोपी को अदालत में सरेंडर करना होता है। जांच के दौरान यदि पुलिस ने आरोपी की गिरफ़्तारी नहीं की हो तो सामान्यत: ऐसे मामलों में अंतरिम और फिर नियमित जमानत मिल जाती है, जैसा कि बृजभूषण के मामले में हुआ है।’
वहीं वकील नितिन मेश्राम का कहना है कि मामले में अब तक बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी नहीं हुई है इसलिए जमानत पर रोक लगाने का प्रश्न ही नहीं उठता है।
नितिन मेश्राम कहते हैं, ‘चार्जशीट दायर करने से पहले और चार्जशीट दायर करने के बाद अब तक बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी नहीं हुई है। जब उन्हें (दिल्ली पुलिस) को गिरफ्तारी की जरूरत महसूस नहीं हुई तो फिर वो कोर्ट में क्या बोलेंगे?’
‘सामान्यत: चार्जशीट फाइल करने से पहले अगर पुलिस को हिरासत में लेकर पूछताछ करनी हो या फिर मामले से जुड़ी कोई रिकवरी करनी हो तो गिरफ़्तारी की जाती है। अब चार्जशीट फाइल करने के बाद तो हिरासत में लेने का कोई तुक नहीं है। बृजभूषण खुद संसद के सदस्य हैं ऐसे में उनके भाग जाने की संभावना न के बराबर है। ऐसी स्थिति में वो ज़मानत का विरोध क्यों करेंगे?’ लेकिन अगर सरकारी वकील ज़मानत का विरोध करते तो ऐसी स्थिति में क्या होता?
इस सवाल के जवाब में नितिन मेश्राम कहते हैं, ‘अगर सरकारी वकील जमानत का विरोध करते हुए कस्टडी की मांग करते तब भी बहुत हद तक संभव है कि जमानत मिल जाती। कारण है बृजभूषण सिंह की अब तक गिरफ्तारी न होना। जब गिरफ्तारी हुई ही नहीं तो न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत में क्यों ही रखा जाता?’
नितिन मेश्राम कहते हैं कि क़ानून किसी की प्रताडऩा के लिए नहीं होता है और अगर कोई चाहता है कि बृजभूषण जेल में रहें तो बेहतर है कि उन्हें सज़ा दिलाएं।
जमानत पर किसने क्या कहा?
कांग्रेस की सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की चेयरपर्सन सुप्रिया श्रीनेत ने ट्वीट कर लिखा,
अमित शाह की दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण सिंह की बेल पर कोर्ट में कहा, ''हम ज़मानत का ना तो विरोध कर रहे हैं, ना ही हम इसका समर्थन कर रहे हैं। हम न्यायालय के विवेक पर छोड़ते हैं।’
‘उसके बाद बृजभूषण सिंह को बेल मिल गई। ये वो पुलिस है जिसने चार्जशीट में यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे।’
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने सांसद बृजभूषण शरण सिंह की संसद में मौजूदगी की तस्वीर ट्वीट की और लिखा, ‘यौन उत्पीडऩ के आरोपी भाजपा सांसद ने यौन उत्पीडऩ और हमले के मामले में जमानत मिलने के बाद कल इस तरह से संसद में प्रवेश किया-विजयी और प्रसन्न। दिल्ली पुलिस ने ज़मानत का विरोध नहीं किया।’
चार्जशीट में कौन सी धाराएं लगाई गई हैं?
सरकारी वकील के अनुसार, राउज़ कोर्ट एवेन्यू में दी गई चार्जशीट के बारे में वरिष्ठ सरकारी अधिवक्ता ने बताया था कि राउज़ एवेन्यू कोर्ट में बृजभूषण सिंह के ख़िलाफ़ दायर की गई पहली चार्जशीट में भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 354-ए और 354-डी के तहत आरोप लगाए गए हैं।
वहीं इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मामले में एक और अभियुक्त विनोद तोमर के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 354 , 354-ए, 354-डी और 506(1) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
धारा 354 : स्त्री की शालीनता को ठेस पहुंचाने के इरादे से उसपर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग। एक से पांच वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान।
धारा 354 ए_ यौन उत्पीडऩ। तीन साल तक की सज़ा संभव।
धारा 354 डी: पीछा करना। पहली बार दोषी पाए जाने पर तीन वर्ष तक की सज़ा संभव।
धारा 506(1) आपराधिक धमकी। दो साल तक की सज़ा का प्रावधान।
इन धाराओं के अपराध में पुलिस अभियुक्त को बिना वारंट के गिरफ़्तार कर सकती है लेकिन इन सभी मामलों में ज़मानत अभियुक्त का अधिकार है। (bbc.com/hindi)
द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
वाराणसी में मेरी मुलाकात जब विख्यात कथाकार श्री काशीनाथ सिंह से हुई तो मैंने उनसे पूछा, ‘कभी आत्मकथ्य जैसा कुछ लिखने का मन नहीं हुआ आपका?’
वे बोले, ‘मैं अपने प्रेम के बारे में लिखना चाहता था लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। सोचता था, पत्नी पढ़ेगी, बेटियाँ पढ़ेगी इसलिए साहस नहीं जुटा पाया। अधिकतर बड़े लेखकों ने, जैसे तालस्तोय ने, जवानी में नहीं लिखा, बुढ़ापे में अपने प्रेम के बारे में बताया। मैंने चौंतीस-पैंतीस वर्षों तक अध्यापन किया है, यौवन गुजरा है। जैसा मैं अध्यापक था, जैसी मेरी छबि थी मेरा आकर्षण था, ऐसे अवसर न जाने कितने आए! लेकिन अभी तक लिखने का मन नहीं, नहीं हुआ। अब सोचता हूँ कि लिख डालूँ। परिवार जाने तो जाने। कारण यह है कि आपसे कोई भिन्न व्यक्ति नहीं हूँ।
आमतौर पर मध्यमवर्गीय व्यक्ति का जीवन जैसा होता है, वैसा मेरा रहा। नौकरी की, पढ़ाया, अपना और भाइयों का परिवार चलाया, प्रेम किया, वह सब जो आम तौर पर लोग करते हैं, कोई ऐसी खास बात नहीं रही कि मैं आत्मकथा लिखूँ।
वैसे मेरे पाठकों का ऐसा कुछ लिखने का बहुत दबाव रहा मुझ पर, खास तौर से प्रकाशकों का, किन्तु मुझे अपने जीवन में ऐसा कुछ अलग से नहीं दिखता कि मैं उसे लिखूँ।
‘आप बनारस के पर्यायवाची हैं सर, साहित्यिक अभिरुचि का जो व्यक्ति बनारस आता है वह आपसे मिलना चाहता है। आप बनारस के ‘लीजेंड’ हैं, यह बात आप नहीं जानते, हम जानते हैं। यदि आप आत्मकथा लिखेंगे तो ‘लीजेंड’ बनने के आपके संघर्ष को पढक़र नई पीढ़ी को दिशा मिल सकती है, सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह मेरा प्रश्न नहीं, आपसे आग्रह है।’ शैलेंद्र सिंह ने उनसे कहा।
‘आप मुझे इस रूप में देख रहे हैं, मुझे अच्छा लग रहा है। आत्मकथा लिखने का साहस मुझमें नहीं है। इसके लिए ईमानदारी चाहिए, मैं लिखूंगा तो कहीं-न-कहीं बेईमानी कर जाऊंगा। लेखन के साथ, खास तौर से अपने साथ मैं यह बेईमानी नहीं करना चाहता। मैंने अब तक जो कुछ लिखा है, वह ईमानदारी से लिखा है। मैंने बहुत सी आत्मकथाएं पढ़ी हैं, लेखक कई बातें छुपा ले जाते हैं। सजग पाठक समझ जाता है कि क्या छुपाया गया है? आत्मकथा लिखने के लिए जो ईमानदारी चाहिए, वह मुझमें नहीं है, ऐसा मुझे लगता है।’ काशीनाथ सिंह ने उत्तर दिया।
अज्ञेय जी ने कहा था-‘अगर मुझे झूठ लिखना हुआ तो आत्मकथा लिखूंगा।
अगर सच लिखना हुआ तो कहानी।’
‘मेरा कहना है- बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं जी। मैं एक साधारण लेखक हूँ। मैंने आत्मकथा लिखी है, एक-एक शब्द सच है। दूसरों के नाम का सहारा लेकर कहानी या उपन्यास लिखना डरपोक लेखकों का काम है। जो किया है तो सीना ठोक कर लिखो और बताओ, ‘यह रहा मेरा जीवन।’
डॉ. आर.के. पालीवाल
देश के राजनीतिक शिखर से कांग्रेस की फिसलन और उसकी जगह भारतीय जनता पार्टी के उठाव के समय केंद्रीय सत्ता में गठबंधन सरकारों का लंबा दौर रहा है। यह वह समय था जब किसी चमत्कारी नेता के अभाव में कांग्रेस लोकसभा में निरंतर कम सीट पाते पाते बहुमत से काफ़ी दूर हो गई थी और दूसरी तरफ़ कांग्रेस की खाली जमीन पर कब्जे जमाती हुई भारतीय जनता पार्टी इतनी सक्षम नहीं हुई थी कि अपने दम पर केंद्र में सरकार बना सके। गठबंधन सरकारों के कुछ लाभ भी हैं और कई बड़े दोष भी हैं। उदाहरण के तौर पर इसके चारित्रिक पतन की शुरुआत नरसिंह राव की सरकार में हो गई थी जिसे सत्ता बचाने के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा जैसे क्षेत्रीय सांसदों को घूस देनी पड़ी थी।
गठबंधन सरकारों में सबसे यादगार दौर अटल बिहारी बाजपेई की एन डी ए गठबन्धन सरकार का था। अटल बिहारी बाजपेई न केवल तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता थे बल्कि उनकी लोकप्रियता विरोधी दलों के बीच भी अच्छी खासी थी। यही कारण था कि उन्होंने अपनी उदारता, सर्व समावेशी व्यवहार और ऊंचे राजनैतिक कद के कारण गठबन्धन को शालीनता से संभाल लिया था। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में गठबंधन सरकार को अच्छे से चलाने के लिए अटल बिहारी बाजपेई जैसा कोई चेहरा नजऱ नहीं आ रहा।
कांग्रेस को फिलहाल बड़े गठबंधन की जरूरत है। उसने करीब छब्बीस दलों को इंडिया नाम के गठबन्धन में शामिल भी किया है।भारतीय जनता पार्टी अपनी जीत की हैट्रिक करने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहती। इसलिए उसने भी विरोधी खेमे के गठबन्धन से बचे अड़तीस छोटे दलों को इक_ा कर लिया है। ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि विरोधी दलों की एकता के सामने अगली सरकार वह भी अपने बूते नहीं बना सकती।
विरोधी दलों ने अपने गठबंधन के लिए इण्डिया नाम चुना है।राष्ट्रीयता का यह प्रतीक तो अच्छा है लेकिन इससे अंग्रेजियत की बू आती है। दूसरे कुछ साल पहले भारतीय जनता ने भाजपा के इंडिया शाइनिंग के अंग्रेजी नारे को अस्वीकार कर दिया था। इसके अलावा भी विरोधी दलों की एकता में अभी और भी कई पेंच हैं।बिहार की पहली बैठक विरोधी दलों की एकता के लिए यू पी एस सी की प्रारंभिक परीक्षा जैसी थी। पटना में नीतीश कुमार और लालू यादव का गृह प्रदेश और साझा सरकार होने के कारण उन्हीं का बोलबाला था लेकिन कर्नाटक आते आते विरोधी दलों की एकता पर कांग्रेस हावी दिखी। बैंगलुरु में नितीश कुमार के विरोध में कुछ पोस्टर लगने से नितीश कुमार नाराज बताए जा रहे हैं, हालांकि गठबन्धन ने इन पोस्टरों के पीछे भारतीय जनता पार्टी का षडयंत्र बताया है। अभी मुंबई में होने वाली तीसरी बैठक से भी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। संभव है कि मुंबई की तीसरी बैठक में अपनी टूटी फूटी पार्टी के साथ उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपने रंग में आएं और गठबंधन के सेहरे को अपने सिर पर रखने की कौशिश करें।
बैठकों के लंबे दौर के अलावा अभी तक विपक्ष ने जमीन पर कोई साझा तैयारी नहीं की है। अधिकांश सक्षम दलों के नेता, यथा शरद पवार, सोनिया गांधी और राहुल गांधी एवम नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव आदि के चार्टर्ड प्लेन से बैंगलुरु पहुंचने के समाचार हैं।इसी तरह भाजपा के नेतृत्व में राजग की बैठक भी पंच सितारा होटल में संपन्न हुई है। चार्टर्ड प्लेन, पंच सितारा होटल और नेताओं की घोषित और अघोषित संपत्तियों के आंकड़े देखकर यह बात तो साफ हो जाती है कि देश के निन्यानवे प्रतिशत नागरिकों का राजनीति में कोई स्थान नहीं रहा। वे सिर्फ मोहरे, एक वोट और एक संख्या बनकर रह गए । ऐसी परिस्थितियों में कभी इधर कभी उधर लुढक़ने वाले नेता और राजनीतिक दल गठबंधन कर आम जनता की भलाई के बजाय अपना ही स्वार्थ सिद्ध करेंगे।
अजीत साही
एक बाल्टी लीजिए। उसमें चौथाई लेवल तक मिट्टी डालिए। फिर उस पर कुछ इंच बालू डालिए। फिर ऊपर से एक जग पानी डालिए। कहाँ गया पानी? बालू से होते हुए मिट्टी के अंदर।
एक दूसरी बाल्टी लीजिए। उसमें चौथाई लेवल तक मिट्टी डालिए। फिर उस पर कुछ इंच गिट्टी डाल कर सीमेंट और बालू का मिक्स ऐसे लगाइए कि मिट्टी न दिखे। जब सीमेंट सूख जाए तो ऊपर से एक जग पानी डालिए। कहाँ गया पानी? कहीं नहीं। सीमेंट के ऊपर पानी ही पानी रहेगा।
जब आप हर ओर ज़मीन पर सीमेंट लगाकरconcrete का जंगल खड़ा कर देंगे तो बाढ़ तो आएगी ही। जितने मकान और बिल्डिंग बनाएँगे उतना बाढ़ का प्रकोप बढ़ेगा। क्योंकि पानी जमीन के अंदर जा ही नहीं पा रहा है तो आपके आँगन और आपकी सडक़ पर ही रहेगा। इसमें कोई भी सरकार क्या करेगी?
प्रकृति का नियम ये है कि बारिश का पानी जमीन में जाता है। इससे groundwater का स्तर उपर रहता है और जंगल हरा-भरा रहता है। साथ ही groundwater नदियों तक भी पहुंचता है तो नदियां भी जीवंत रहती हैं।
लेकिन concrete का जंगल खड़ा होने से ज़मीन में पानी जाना बंद हो गया। जंगल हम वैसे ही काटते जा रहे हैं। क्योंकि हमें मकान बनाने हैं। फैक्ट्रियां बनानी हैं। जब सालों-साल पानी जमीन के अंदर नहीं जाएगा तो groundwater भी खत्म होगा और नदियों तक भी नहीं पहुंचेगा। पिछले तीस-चालीस सालों में भारत भर में groundwater कई फीट नीचे जा चुका है। लोग जमीन खोदते जाते हैं और पानी दिखता तक नहीं है।
1960 के दशक मेंGreen Revolution शुरू हुआ। भारत भर में मशीनों के इस्तेमाल सेgroundwater जमीन से खींच कर खेत सींचे जाने लगे। बड़ी-बड़ी नहरें बनाई गईं। फसलें लहलहाने लगीं। देश में अनाज का संकट खत्म हुआ। लेकिन उस क्रांति का भुगतान आज की पीढ़ी कर रही है। क्योंकि सत्तर सालों में जिस मात्रा में जमीन के नीचे से मशीन से पानी खींच लिया गया है उस मात्रा में पानी वापस जमीन में पहुंचा ही नहीं है। यही वजह है कि भारत में हर ओर अब हर साल सूखा पडऩे लगा है।
बारिश हो तो बाढ़। बाकी वक्त सूखा।
और बारिश भी अब कम होने लगा है। हमारे बचपन में बरसात के मौसम में महीनों झमाझम बारिश होती थी। पानी जमीन के अंदर जाता था। जमीन से पेड़ों में जाता था। अगले साल जब गर्मी पड़ती थी तो जंगल के पेड़ों से पानी उड़ कर आसमान की ओर जाकर बादल बनता था और फिर बारिश होती थी। यही सिलसिला था। लेकिन अब जमीन में पानी है ही नहीं तो गर्मी में उड़ कर कहाँ से आसमान में जाएगा? बादल कैसे बनेंगे?
आज से पचास साल पहले भारत की आबादी पैंसठ करोड़ थी। आज एक सौ चालीस करोड़ से भी ज़्यादा है। लेकिन पानी की प्रति व्यक्ति खपत पचास साल पहले से कई गुना बढ़ गई है। पचास साल पहले मेरे भाई का और मेरा परिवार एक घर में रहते क्योंकि वो joint family का दौर था। आज I, me, myself का दौर है। Nuclear family का दौर है। मुझे भी 3xBHK चाहिए और मेरे भाई को भी। जितने घर बनेंगे पानी की उतनी खपत बढ़ेगी।
और घर बनाने में ही नहीं घर के अंदर भी पानी के बगैर कुछ नहीं हासिल होगा। आज gadgets का दौर है। गैस स्टोव। स्मार्टफोन। कार। कंप्यूटर। प्रिंटर। माइक्रोवेव। फ्रिज। वाशिंग मशीन, टीवी, एसी, ऐसा कोई सामान नहीं है जिसके निर्माण फैक्ट्रियों में न होता हो। फैक्टरी बिजली और पानी से चलती है। पूरे भारत में फैक्ट्रियां ताबड़तोड़ पानी बहा रही हैं। आप भारतीय उद्योग को लगातार बढ़ते देखते रहना चाहते हैं। आपकी इस लालसा की कीमत आपका पानी है।
यही वजह है कि पिछले चालीस सालों में भारत में कंस्ट्रक्शन बिजनेस चरम पर पहुँच गया है। इसकी कीमत हम पानी बरबाद करके चुका रहे हैं। बालू मिलाकर ही सीमेंट से इमारत बनती है। इसलिए दशकों से पूरे भारत में नदी किनारे से बालू कांच कांच कर बालू माफिया कंस्ट्रक्शन बिजऩेस को बेच रहा है। इस बालू माफिया को जिसने चुनौती दी वो मौत के घाट उतारा गया, क्या पत्रकार और क्या अधिकारी। छह महीने पहले ओडि़शा में बालू से लदी एक ट्रक को चेक करने वाले ढ्ढ्रस् अधिकारी पर ऐसा हमला हुआ कि उनको अस्पताल का रुख करना पड़ा। कर्नाटक में बालू माफिय़ा के खिलाफ एक्शन लेने वाले ढ्ढ्रस् अधिकारी डी के रवि 2015 में अपने घर में छत से लटके पाए गए। दस साल पहले यूपी में ढ्ढ्रस् अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को बालू माफिया के खिलाफ एक्शन लेने की वजह से सस्पेंड कर दिया गया था। पूरे देश में बालू माफिया के मालिक राजनीति में शहंशाह हैं। बालू के गैर-कानूनी व्यापार का अरबों रुपया राजनैतिक पार्टियों को जाता है।
कांच कांच कर बालू खत्म कर देने की वजह से क्या यूपी और क्या तमिलनाडु, हर जगह नदियाँ बरबाद हो गई हैं। पहले बालू पानी सोखता था। अब बालू ही नहीं बच रहा है। नदियों के किनारे किनारे concrete ·के riverfront खड़े हो गए हैं। लोग ताली पीटते हैं वाह मोदी जी वाह। लेकिन नदी को जिंदा रहने के लिए दोनों ओर concrete नहीं खुली जमीन और बालू चाहिए। नदियाँ साँस नहीं ले पा रही हैं इसलिए सूख रही हैं।
चंद्रशेखर राव और चंद्रबाबू नायडू
दिनेश आकुला
नई दिल्ली और बेंगलुरु में एक साथ उठे राजनीतिक तूफान के धूल के बाद, ध्यान इस तथ्य पर जाया कि कांग्रेस-नेतृत्त इंडिया और भाजपा-नेतृत्त एनडीए जैसे दो राष्ट्रीय गठबंधनों ने तेलुगु राज्य के दो प्रमुख नेताओं, चंद्रशेखर राव और चंद्रबाबू नायडू, को अनदेखा करने का फैसला किया है, जो राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाने के इच्छुक हैं।
भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के संस्थापक और मुख्य नेता के रूप में तेलंगाना राज्य के मुख्यमंत्री और पूर्व आंध्रप्रदेश मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम (टीडी) के सर्वोच्च नेता चंद्रबाबू नायडू ने दोनों महागठबंधनों से आमंत्रित होने की कोशिश की है।
तेलुगु राजनीति के इन दो ‘चंद्रों’ ने राष्ट्रीय स्तर पर महत्वाकांक्षी भूमिका निभाने का प्रयास किया है- जहां राव एक विरोध-मोदी महागठबंधन का हिस्सा बनना चाहते हैं, वहीं नायडू मोदी-नेतृत्त मुख्य दल का हिस्सा बनना चाहते हैं।
तेलंगाना राज्य में, राव की प्रशासनिक क्षमता सबसे कठिन चुनावी चुनौती का सामना कर रही है। तीसरे निरंतर कार्यकाल के लिए उनका प्रयास मजबूत और बढ़ती हुई विपक्षी भावनाओं के साथ आपात्तियों का सामना कर रहा है। इसके पश्चात, उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को राष्ट्रीय राजनीति में उपयोग करने के इरादे से उसे भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) में बदलने का निर्णय लिया था। हालांकि, यह रणनीति एक के बाद एक गलती साबित हुई है।
वर्तमान में, राव को अपनी जनसामान्य प्रतिष्ठा में सुधार की आवश्यकता है, चाहे वह राज्य स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर। वह अपनी पहलों के अयोग्यता के लिए ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि बाहरी कारक और निरंतर बदलती राज्य-स्तरीय गतिशीलता ने राष्ट्रीय मंच पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
2018 विधान सभा चुनावों में, भाजपा ने 119 सीटों में से केवल एक सीट जीती। राव की चतुर राजनीतिक चालों के परिणामस्वरूप, कांग्रेस प्रमुख परिपक्व विपक्षी बनी रही। इस परिणामस्वरूप, टीआरएस ने सदन में 100 सदस्यों की अधिकांशता हासिल की और राज्य में अपनी प्रभुत्वता को मजबूत किया।
फिर अचानक से, चार महीनों में 17 लोकसभा सीटों में भाजपा ने एक मोदी के साम्राज्य पर उठाई हुई लहर के साथ में से चार सीटें जीतीं। इसमें से एक निजामाबाद की जीत है, जहां अरविंद धर्मपुरी ने राव की बेटी कविता को हराया। इससे कई उपनिर्वाचन और जीएचएमसी चुनावों को गति मिली, जिसमें भाजपा ने स्थिर रूप से बढ़ोतरी की और उसे उसका एकमात्र विरोधी दिखाई दी, जिससे राष्ट्रीय आंदोलनों को मजबूती से विरोध-मोदी बनना पड़ा।
भाजपा ने मुनुगोडे उपचुनाव और कर्नाटक राज्य चुनावों के बाद राजनीतिक दंडोलन में कमजोरी की तरफ से घट कर दिया है। तेलंगाना में कांग्रेस अद्भुत रूप से सुधार हासिल कर रही है, जिससे यह स्पष्ट रूप से दिख रहा है।
वहीं, राव ने देशभर में यात्रा की, अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं से मिलने का प्रयास किया और कांग्रेस और भाजपा के अलावा एक गठबंधन बनाने की कोशिश की, लेकिन यह असफल रहा।
कांग्रेस और भाजपा दोनों उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जिसके कारण चंद्रशेखर राव को दोनों प्रचारमें से हटना पड़ा है, इच्छानुसार या अनिच्छानुसार। इसके अलावा, दिल्ली के शराब स्कैम में उनकी बेटी के खिलाफ श्वष्ठ और ष्टक्चढ्ढ के कार्रवाई पंडिंग होने के कारण, उनके हाथ अधिक तंगले में फंसे हुए हैं, जो एक विरोध-मोदी बाहुल्य में उन्हें डालता है।
किसी भी स्थिति में, वह राज्य चुनावों के बाद ही स्वतंत्र हाथ प्राप्त करेंगे। हालांकि, परिणाम के अलावा, राज्य और राष्ट्रीय चुनावों के बीच की छोटी अवधि मुख्य रूप से 2024 चुनाव से पहले बीआरएस द्वारा निभाई जा सकने वाली भूमिका का निर्धारण करेगी।
क्योंकि, तेलंगाना के अलावा, आंध्र प्रदेश में राज्य चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ आयोजित होंगे, और टीडी विपक्षी है, इसलिए चंद्रबाबू नायडू को राव की तरह उसी स्वतंत्रता और लचीलापन की सुविधा नहीं है।
जबकि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और यएसआरसी के अध्यक्ष वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने किसी भी गठबंधन में शामिल होने के खिलाफ सिद्धांतपूर्ण रुप से अपनी स्थिति बनाई रखी है, अपने वरिष्ठ और आसपासी सहकारी बीजेडी नेता नवीन पटनायक से सबक सीखते हुए, नायडू एनडीए में फिर से शामिल होना चाहते हैं।
लेकिन उनकी घर वापसी प्राप्त करने के सभी प्रयास व्यर्थ रहे हैं। उनकी आत्मसमर्थन की कोशिश के बावजूद, उन्हें निमंत्रण नहीं मिला, हालांकि टॉलीवुड सेलिब्रिटी और जनसेना के अध्यक्ष के पावन कल्याण को आमंत्रित किया गया था।
पवन कल्याण भाजपा, टीडीपी और जनसेना के बीच एक सुपर-गठबंधन बनाने के इच्छुक हैं, जिससे वह वाईएसआरसी का सामना कर सकें, लेकिन अटल भाजपा उच्च कमान ने नायडू को एक कोने में मजबूर कर दिया है।
यदि टीडी अगले चुनावों को हारती है, जैसा कि अनदेखा हो रहा है, तो नायडू को राज्य या राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना मुश्किल होगा। भाजपा के बिना या बदतर हालत में, अपरिणामी वोट में विभाजन के बिना, जगन मोहन रेड्डी फिर से जीत सकते हैं।
इन दोनों चंद्रों को राजनीतिक ग्रहण के बराबरी में खड़े होना पड़ता है और वे फिर से चमकने के लिए अपने आपको अपने राज्यों में जीतना चाहिए। अन्यथा, काली रात बहुत देर तक चलेगी।
विष्णु नागर
अनेक मित्रों -रिश्तेदारों के फोन आए कि हम लोग सुरक्षित हैं न। बाढ़ का प्रभाव आप पर तो नहीं पड़ा है? पत्नी और मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि हम पूरी तरह सुरक्षित हैं।
आज मैं घूमते-घामते नोएडा की ओर जाने वाली रोड पर निकल आया। वहां सडक़ किनारे पटरी पर बहुत से परिवार देखे, जो निचले इलाकों में रहते हैं, खेती और मजदूरी करते हैं। वे अपने पशुओं को लेकर इधर आ गए हैं। खाट पर बैठे ये ‘अच्छे दिन’ गुजार रहे हैं। कुछ को अच्छे टेंटों में जगह मिली है मगर ऐसे टैंट जरूरत की अपेक्षा बहुत कम हैं।
कहीं कपड़े सूख रहे हैं,कहीं बच्चों की किताबें। बच्चे अमूमन उसी तरह मस्त हैं,जैसे अपने झोपड़ों में भी होते। बड़ों ने भी दुख ओढ़ नहीं रखा है। यमुना पूर हो जाती है तो लाजमी तौर पर यह स्थिति आती है।
पहली बार देख कर यह अच्छा लगा कि यहां इंतजाम ठीक हैं। पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। डीटीसी की बीस या अधिक बसें तैनात हैं कि अगर स्थिति विकट होती है तो इन्हें बसों में कहीं और सुरक्षित जगह पर ले जाया जाए। वालंटियर्स मौजूद हैं। पुलिस तैनात है। एनडीआरएफ के लोग अनेक लोगों को सुरक्षित यहां ले आए हैं।
इधर मध्यवर्गीय मयूर विहार में जीवन यथावत है। बाढ़ की चर्चा करनेवाले भी केवल दो लोग ही दिखे।दो स्पष्ट दुनियाएं हैं। मैं तो कल रात से ही आश्वस्त था कि हमें कुछ नहीं होगा। हम मध्यवर्गीय हैं। नियोजित कालोनियों में रहते हैं। हमारे नाखून को भी गलती से चोट लग गई तो कल हमारे दुखों से अखबारों के पृष्ठ पर पृष्ठ रंग जाएंगे। टीवी वाले मेरे पास आएंगे कि सर आप तो लेखक हैं,आपको कैसा लग रहा है?मजा तो आ रहा होगा, इंजॉय तो कर रहे होंगे। लिखने के लिए आपको नई सामग्री मिली होगी। सर, इस बीच आपने कोई कविता जरूर लिखी होगी, सुनाइए न, एक बाढ़ पीडि़त कवि की कविताएं।
अवधेश गिरी
अपने देश में अमृतकाल में हुआ विकास सडक़ों पर बह रहा है। पाकिस्तान ने अपनी सबसे खतरनाक ‘एजेंट सीमा 007 को भारत भेजा ताकि वो हमारे देश मे हो रहे विकास की’ जानकारी जुटाकर पाकिस्तान को भेज सके ।
सबसे पहले सीमा ने नेपाल के रास्ते एंट्री की फिर वो कुछ दिन बाद मुम्बई से ‘बुलेट’ ट्रेन में सफर करके अहमदाबाद पहुची। सफर के दौरान उसने बुलेट ट्रेन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी एकत्रित करी।
उसके बाद सीमा ने एक एक करके भारत की सौ ‘स्मार्ट’ सिटी मे घूमना शुरू किया। वो सौ स्मार्ट सिटी देखकर अचंभित रह गई। बीच बीच मे उसने सांसदों द्वारा ‘गोद लिया’ गांव भी देखे और उन गांवों को देखकर उसने सोचा कि इतना तो पाकिस्तान में शहर भी विकसित नहीं है जितना कि ये ‘गोदी गाँव’ विकास से ओत प्रोत हैं।
फिर एक दिन सीमा एक प्तचाय की टपरी पर चाय पीने पहुंची। वहां उसने देखा चाय वाला पास के ‘नाले पर बर्तन को उल्टा रखकर गैस इक_ा कर रहा है और उस गैस से ही चाय बना रहा है।
सीमा ये सब देखकर समझ गई की भारत के विकास पुरुष द्वारा दिये गये फॉर्मूले ‘ए स्क्वायर प्लस बी स्क्वायर प्लस ‘टू’ ऐ’ बी’ में एक्स्ट्रा ‘2 ऐ बी’ कहा से आया। उसने इस कोड को डिकोड कर लिया था।
सीमा भारत का विकास देखकर बहुत प्रभावित थी। उसने सोचा काश वो भी भारत में रह पाती।
तभी चाय की दुकान पर बैठे-बैठे उसने देखा कि एक आदमी खून की ‘उल्टियां कर रहा था। सीमा उसकी मदद करने पहुची तो उस युवक ने बताया कि उसका नाम सचिन है और ये खून की उल्टी नहीं ‘राजश्री’ पान मसाले का कमाल है।
सचिन ने एक और ‘राजश्री पान मसाला’ निकाला और मुहं में डाल लिया। राजश्री पान मसाले का रैपर सचिन ने अपनी दो उंगलियो के बीच फसाकर हवा में उड़ा दिया ।
सचिन की ये ‘अदा देखकर सीमा उसे अपना’ दिल दे बैठी।
सचिन के गुलाबी होठ और लाल प्तदांत उसे आकर्षित कर रहे थे।
उसने सचिन से पूछा खर्चा कैसे चलता है, करते क्या हो ।
सचिन ने कहा कुछ नहीं करते हैं, ‘उज्ज्वला योजना से गैस मिल जाती है, 5 किलो राशन तो सरकार दे ही रही है । बीच-बीच में हमारे प्रधानमंत्री ‘बीस लाख करोड, दस लाख करोड़’ जनता को देते रहते है उसी से काम चल रहा है। सचिन ने ये भी बताया कि उसके एकाउंट में ‘15 लाख’ रुपये भी आने वाले हैं ।
सीमा बहुत प्रभावित हुई और सचिन के साथ जीने मरने का फैसला किया और उससे शादी करके भारत में ही रहने लगी ।
‘केसरिया तेरा इश्क है पिया’
डॉ. आर.के. पालीवाल
कभी कभी व्यक्ति या संस्थाओं की एक गलती इतनी बड़ी हो जाती है जिसका खामियाजा बहुत दूर तक भुगतना पड़ता है क्योंकि उसके कलंक के स्याह दाग को धोना असंभव हो जाता है। बिल्किस बानो मामला गुजरात का ऐसा ही मामला बन गया है जिसने न केवल गुजरात बल्कि आजादी के बाद देश का नाम भी बदनाम किया है। पहले तो बहुत साल तक यह मामला गुजरात पुलिस और सीबीआई की जांच में अटका रहा, फिर न्यायालयों की अनंत भूल-भुलैया में भटकता हुआ कई साल बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सुनवाई के लिए गुजरात राज्य के बाहर मुंबई के कोर्ट में स्थानांतरित होने के बाद ही अंतिम परिणति तक पहुंच पाया था। बहुत लंबे विलंब के बावजूद कई आरोपियों को सजा होने पर भारतीय न्याय व्यवस्था पर लोगों का थोड़ा विश्वास जमा था। यह मामला एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में सुना जा रहा है।
पिछले साल इस मामले का सच फिर एक बार शर्मिंदा हुआ था जब गंभीर आरोपों के सिद्ध होने के बावजूद अधिकांश सजायाफ्ता अपराधियों के प्रति गुजरात सरकार पंद्रह अगस्त को मेहरबान हो गई थी और जनहित में उन्हें समय के पहले जेल से आजादी दे दी थी। उस समय गुजरात सरकार पर वैसे ही आरोप लगे थे जैसे बिहार में आनंद मोहन सिंह की समय से पहले रिहाई पर लग रहे थे कि यह सब चुनावों की वोट बैंक राजनीति के मद्देनजर हो रहा है। हद तो तब हो गई थी जब रिहाई के बाद इन लोगों का फूल मालाओं से इस तरह स्वागत किया गया था मानों ये देश हित में कोई महान काम करके आए हैं।
पहले गुजरात सरकार सर्वोच्च न्यायालय में इन सजायाफ्ता अपराधियों की समय से पहले रिहाई की फाइल दिखाने में आनाकानी कर रही थी। यदि इन अपराधियों की रिहाई जनहित में की गई है तो जनहित में इसे सार्वजनिक भी किया जाना चाहिए। जनहित में किए गए कार्यों का एक तरफ केंद्र और राज्यों की सरकार बेतहाशा जन धन खर्च कर विज्ञापन करती हैं और दूसरी तरफ कुछ मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में भी प्रस्तुत करने से भी गुरेज करती हैं। इसी से यह आभास होता था कि दाल में काफी कुछ काला है। दैनिक भास्कर में छपी एक खोजी रिर्पोट मे कई ऐसे पहलू उद्घाटित हुए हैं जिनसे अब यह कयास सच लगता है कि यह रिहाई के लिए उचित मामला नहीं लगता।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने संगीन अपराध के सजायाफ्ता अपराधियों को छोडऩे के गुजरात और बिहार सरकार के दो बहुत संवेदनशील मामले लंबित है। यह भी एक संयोग ही है कि बिल्किस बानो का मामला केंद्र सरकार में सत्ताशीन भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार का है और दूसरा गोपालगंज के तत्कालीन जिला कलेक्टरजी कृष्णैया की हत्या के अपराधी आनंद मोहन सिंह की रिहाई का है, जहां विपक्षी दलों की गठबंधन सरकार है। इन दोनों मामलों की समानता और विशेषता यह है कि इनमें याचिकाकर्ता दो महिलाएं हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संगीन अपराधों का दंश झेला है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह आम नागरिकों की सरकारों के निर्णय से नाराजगी है जिन्हें हमारा समाज और कानून मानता है। यही कारण है कि आम जनता की सहानुभूति, जो सोसल मीडिया के माध्यम से मुखर हो पाई है, खुलकर सामने आ रही है। सर्वोच्च न्यायालय के सामने एक साथ आए इन दो मामलों में यह समान बात है कि अधिकांश राजनीतिक दल भले ही खुद को महिलाओं और आम लोगों के लिए समर्पित कहें लेकिन वे चुनावों में टिकट देकर, मंत्री बनाकर और सजा से मुक्ति देकर विविध रुप में आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगों की मदद करते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय से ही इन दोनों मामलों में न्याय की उम्मीद है। इन मामलों में जो भी निर्णय आएंगे वे ऐतिहासिक महत्व के होंगे क्योंकि उनमें वह मापदंड निश्चित होने की संभावना है जो देश भर में कैदियों की रिहाई के लिए दिशा निर्देश की तरह कार्य करेंगे और अपराधियों के प्रति प्रदेश सरकारों की मनमानी पर कुछ अंकुश लगाएंगे।
शुभ्रांशु चौधरी
पिछले लगभग तीन माह से हम लोग एक गोंडी शांति यात्रा पर निकले हैं। हम लगभग 15 लोग जगह जगह जाकर गोंडी के शब्द तलाशते हैं और साथ में लोगों से बस्तर में सुख और शांति कैसे आए इस पर बातचीत भी करने का प्रयास करते हैं। कहावत है चार कोस में पानी बदले, आठ कोस में बानी तो थोड़ी थोड़ी दूर में गोंडी भी हर भाषा की तरह बदल जाती है।पर दूरदराज के लोगों से बातचीत करने के लिए जैसे हम मानक हिंदी का प्रयोग करते हैं ( हिंदी की 49 बोलियाँ हैं जैसे भोजपुरी, बुंदेलखंडी, बघेलखंडी आदि)। गोंडी शब्द संग्रह के बाद एक मानक गोंडी शब्दकोश बनाने का प्रयास है जिससे कहीं के भी गोंडी बोलने वाले लोगों के साथ बातचीत हो सके।
मध्य भारत में माओवादियों की सम्पर्क भाषा गोंडी है। यदि उनसे बात करना है तो मानक गोंडी ज़रूरी है।जब भी मैंने माओवादियों के साथ समय बिताया लगभग हर बैठक में मैंने यह पूछा आपमें से कितने लोग हिंदी समझते हैं। अक्सर बहुत कम हाथ ही उठे।बस्तर में दो तरह के आदिवासी हैं एक सडक़ किनारे रहने वाले और हिंदी बोलने वाले और दूसरे जंगल में रहने और गोंडी बोलने वाले। अधिकतर इस दूसरी तरह के लोग माओवादियों के साथ जुड़े। माओवादियों में लगभग 50त्न लड़ाके लड़कियाँ हैं और उनमे से अधिकतर सिर्फ गोंडी जानती हैं। यदि इस समस्या को हल करना है तो इन सभी से बात करना बहुत ज़रूरी है।
इस यात्रा के दौरान हम लोगों ने सडक़ किनारे शहरों में ही लोगों से बात करने की कोशिश की यह जानने के लिए कि उनके अनुसार इस समस्या का समाधान कैसे हो सकता है। सभी ने एक सुर में कहा कि बातचीत के सिवाय और कोई तरीका नहीं है। हमें किसी तरह दोनों लड़ रहे पक्षों के बीच बातचीत शुरू करवानी पड़ेगी।लोगों ने इन बैठकों में प्रस्ताव भी पारित किए। उन्होंने छत्तीसगढ़ की सरकार को यह याद दिलाना चाहा है कि उन्होंने पिछले चुनाव के पहले ‘इस समस्या के समाधान के लिए बातचीत के गम्भीर प्रयास करने’ का वादा किया था। उन्होंने इन प्रस्तावों में माओवादियों से भी यह आग्रह किया है कि वे ‘आदिवासी अधिकार’ को लेकर बातचीत करें
लोगों का सोचना है कि भारतीय संविधान आदिवासियों के लिए काफ़ी है यदि उसके आदिवासी समर्थक कानून जैसे पेसा, पाँचवी अनुसूची आदि सही रूप से लागू हो जाएँ, जिसे माओवादी सरकार से बात कर वास्तविकता बना सकते हैं। नेपाल में जब बातचीत हुई थी तो माओवादियों ने नेपाली लोगों के लिए धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र हासिल किया था (इससे पहले नेपाल एक हिंदू राष्ट्र और राजतंत्र था) वैसे ही अगर यहाँ बदले में माओवादी हिंसा छोडऩे का वादा करें तो भारतीय संविधान में लिखे आदिवासी समर्थक क़ानून भी यहाँ वास्तविकता बन सकते हैं। लोगों का सोचना है कि पिछले 40 सालों में आदिवासी ने माओवादियों के साथ लड़ते हुए कुर्बानी दी है जिसके बदले में माओवादियों को आदिवासियों के लिए यह करना चाहिए।
पर थोड़े दिन पहले माओवादियों ने एक पर्चा निकालकर कहा है कि लोगों को चैकले मांदी (सुख शांति के लिए बैठकों) में नहीं जाना चाहिए।हममें असहमति हो सकती है जो सामान्य है। असहमतियों को बातचीत से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।इस बातचीत के दौर में हम उन लोगों के पास भी गए जो लम्बे लम्बे समय से जल, जंगल, जमीन और अन्य कई जायज़ माँगों को लेकर धरने में बैठे हैं। उनसे हमारी अच्छी बात हुई। लगभग विषयों पर हमारी सहमति भी है, कुछ विषयों पर असहमति है जिस पर हमने और बात करने का निर्णय लिया। वे लोग भी बस्तर में शांति चाहते हैं
माओवादियों ने हमेशा कहा है कि उनको वार्ता में सरकार से धोखा हुआ है पर वे हमेशा बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बीच में यह बयान भी दिया कि जेल में बंद वरिष्ठ माओवादी नेता बातचीत कर सकते हैं। पर वे लोगों को बातचीत से क्यों रोक रहे हैं यह समझ नहीं आया। क्या लोग इतने नादान हैं कि उनको बरगलाया जा सकता है? हमारी समझ के अनुसार माओवादी जगह जगह लोगों को धरने पर बैठाकर संयुक्त मोर्चा का प्रयोग कर रहे हैं जिसकी अगली कड़ी दोनों पक्षों के बीच आधिकारिक बातचीत होती है। सरकार को इसका सम्मान करना चाहिए। बातचीत शुरू करने के लिए सरकार की शर्तें वास्तविकता से परे लगती हैं।
बस्तर की जनता अब थक गयी है। वे कह रहे हैं कि हिंसा अब बहुत हो गई। दोनों पक्षों को जनता की बात सुननी चाहिए। तमाम असहमतियों के बीच विभिन्न तरह की बातचीत चाहे वह लम्बे समय से चल रहे धरना स्थलों पर हो या शहरों में, बातचीत चलती रहनी चाहिए। हमारी बंदूक़ें आपस में बात करें इससे हमेशा यह बेहतर है कि हम असहमति के बीच भी बात करने की कोशिश करें और समस्याओं का समाधान ढूँढने का प्रयास करें। चैकले मांदी बैठकों में बार-बार यही निकलकर आया कि बस्तर की जनता दोनों पक्षों से यही चाहती है। आशा है दोनों पक्ष उनकी इच्छा का सम्मान करेंगे।
( लेखक नई शांति प्रक्रिया के संयोजक हैं)
कनक तिवारी
(1) भारत की 26 विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने अपने जमावड़ेे के लिए एक नया शब्द ईजाद किया है इंडिया। उसे अंगरेजी में पढ़ते इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूजिव एलाइंस अर्थात इंडिया रखा गया है। भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से इंडिया षब्द के इस्तेमाल पर कड़ी टिप्पणी की गई है। उसे अंगरेजों की मानसिक गुलामी का प्रतीक कहा गया है। तुर्रा यह कि भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियों के नाम में अंगरेज़ी पुछिल्ला तो है। इंडियन नेशनल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल, यूनाइटेड नेषनलिस्ट कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस पार्टी, आम आदमी पार्टी आदि के नाम में अंगरेजी शब्द तो है।
हालांकि राष्ट्रीय जनता दल, लोकदल, बीजू जनता दल, अन्नाद्र्रविड़ मुनेत्र कषगम जैसे कई दलों में अंगरेज़ी षब्द नहीं दिखता। सवाल अंगरेज़ी षब्द के अस्तित्व में घुसे रहने या घुसते जाने भर का नहीं है। सवाल है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में अंगरेजिय़त इंजेक्ट होकर इतना विनाष कर चुकी है। और उससे बचा कैसे जाए। भारत के नाम पर इंडिया षब्द को अंगरेजी शासन काल में पहचान और मान्यता मिली थी। यही इतिहास का सच है। अंगरेज़ों से आजादी की लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा अंगरेजी भाषा से लकदक तो रहा है। आजादी के दौर मेंं सभी बड़े नेता ज्यादातर यूरोप और खासकर इंग्लैंड में ऊंची पढ़ाई करने गए तो थे। भारत का संविधान पूरी तौर पर अंगरेजी भाषा में ही बना। अंदरेजी दां लोगों की इसमें मुख्य भूमिका रही।
(2) अहिन्दी और अन्य भाषाओं तक के जो संविधान पढऩे मिलते हैं, उसमें यह अनुवाद है। आजादी के युद्ध के दौर में भारतीय जनता की ओर से खासतौर पर कांग्रेस के ज़रिए जो याचिकाएं और प्रतिवेदन पेश किए जाने थे। उसमें जो औपचारिक प्रस्ताव पारित होते थे। वे ज़्यादतर अंगेरेज़ी में ही होते थे। इंडिया शब्द के इस्तेमाल पर वर्षों तक कोई आपत्ति नहीं की गई। भारत का संविधान देश को इंडिया दैट इज़ भारत के नाम से मंजू कर चुका है। इस पृष्ठभूमि की तटस्थ होकर जांच करने की जरूरत है क्योंकि अब इंडिया नाम के शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों के द्वारा कई मकसदों के लिए किया जाने की संभावनाएं बुन दी गई हैं। अंगरेज़ों ने आधी से ज़्यादा दुनिया पर हुकूमत तो की है। उन्होंने हर देश के प्रचलित नामों को अपनी जुबान के उच्चारण के कारण बिगाड़ा या बदला भी है। भारत के लोग भी दुनिया के कई शहरों के नाम अंगरेजी जुबान में ही तो लेते हैं। भले ही उन देषों में इन शब्दों को अलग तरह से प्रचारित किया जाता होगा। वर्षों तक चीन में पीकिंग, रूस में मास्को जैसे शब्दों से लोगों का इत्तफाक रहा है। हालांकि स्थानीय स्तर पर उनका उच्चारण पूरी तौर पर अलग है। भारत में भी डेलही, बांबे, कैलकटा जैसे शब्दों का अब केवल पुरानी किताबों में उल्लेख है। सब नाम बदल दिए गए हैं।
(3)सुप्रीम कोर्ट में एक सांस्कृतिक राष्ट्रवादी याचिका दाखिल की गई थी कि संविधान के मुखड़े में ‘इंडिया’ लिखा गया है। उसे हटा दिया जाए क्योंकि यह शब्द अंग्रेजों की गुलामी का प्रतीक है। याचिकाकार दिल्ली का नागरिक मासूम व्यक्ति भर नहीं था। उसके साथ एक विचारधारा के आग्रहों का इतिहास भी है। संविधान अंगरेजी भाषा में लिखा गया। उसका शुरू में ही हिन्दी अनुवाद किया गया लेकिन अधिकारिक मान्यता नहीं मिली। 1987 में संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 394-क शामिल करते तय हुआ कि संविधान और प्रत्येक संशोधन का हिन्दी अनुवाद अधिकारिक पाठ समझा जाएगा। कई संविधान निर्माता बड़े बौद्धिक तथा स्वतंत्रता आंदोलन के लोकप्रिय और संघर्षशील नेता भी थे। भारत पाक विभाजन के भयानक हिंसक दौर में संविधान का पाठ तय किया जा रहा था।
जवाहरलाल नेहरू और डॉ. अम्बेडकर संविधान की आत्मा तराशकर उसे भारतीय जीवन में इंजेक्ट करने के सबसे बड़े आग्रही विचारक थे। गांधी भी चाहते थे भारत का सबसे गरीब तक संविधान को अपनी जिंदगी की अहम पोथी समझे। हिन्दू-मुस्लिम खूंरेजी, जिन्ना की अगुवाई में अलगाव तथा हिन्दू महासभा द्वारा विभाजनकारी मांग से सहयोग के ऐतिहासिक कारणों से संविधान सभा में भी तनाव पैदा हो गया था। नतीजतन प्रदेशों के बनिस्बत बहुत मजबूत केन्द्र बनाने की अवधारणा आ गई। अन्यथा देश के टूटने का खतरा था। देसी रियासतें सिर उठा रही थीं। नए भारतीय राज्य में उन्हें मिलाने सरदार पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका अदा की।
(4) ‘इंडिया’ शब्द को हटाकर केवल भारत रखने की याचिका को क्षेत्राधिकार के अभाव में सुप्रीम कोर्ट खारिज कर सकता था। कोर्ट ने उसे प्रतिवेदन की षक्ल में केन्द्र सरकार को देने इशारे कर दिए। ऐसा मांग पत्र सुप्रीम कोर्ट के संकेत ने सरकार तक पहुंचा ही दिया। सूत और कपास तो नहीं भी हो तो सांप्रदायिक ल_ तैयार रहता है कि मुद्दे मिलते ही अनुकूल धुनाई करें। एक भाजपाई नेता ने मांग भी की है कि संस्कृति और षिक्षा वगैरह के मामले में अल्पसंख्यकों को संविधान की रियायतों पर दोबारा विचार हो। वोट बैंक की राजनीति के लिए ऐसे आह्वान जरूरी हो जाते हैं। हिन्दू धर्म से ऊबकर छिटके बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म अल्पसंख्यकों की परिभाषा में हैं। लेकिन निजी कानूनों, राममंदिर आंदोलन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिन्दू हित, एक निशान एक प्रधान जैसे
जुमलों के फेविकोल से उन्हें एक साथ चिपकाकर हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने के लिए गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों से अलग कर नींद में गाफिल सुलाया जाता है। जुमले तो हैं, भले ही इंसानियत की इमला लोग भूल रहे हैं। हिन्दू मुस्लिम इत्तहाद की जान धर्मनिरपेक्षता के तोते की गर्दन में है। पता नहीं कब उसकी गर्दन कब टेंं बोलेगी।
(5) सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प हालात पैदा होते ही रहते हैं। अदालतें ठीक से अदावतें भी सुलझा नहीं पातीं। मूल कर्तव्य है ‘हर नागरिक राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करेगा और संविधान का पालन भी।’ संघ परिवार के हमदम कथित अखिल भारतीय संत समिति की पुस्तिका में राष्ट्रीयध्वज, अशोक चक्र और राष्ट्रगीत का खुलेआम अपमान किया गया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सरकारी सिपहसालारों ने उसका ख्ंाडन नहीं किया। संविधान को उसमें लोकद्रोही तक कहा गया है। ‘इंडियन’ शब्द को व्यंग्य के साथ लिखा गया है। आजादी की लड़ाई के वक्त उनके अनुसार वंदेमातरम् ही राष्ट्रीय गीत था। यहां तक लिखा है जिस राष्ट्रध्वज पर साम्राज्यवादी अशोक चक्र अंकित है तथा जॉर्ज पंचम की स्तुति में गाए गए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाया जाए, वहां नागरिकों के कर्तव्यों की बात करना बेमानी होगा। वर्षों पहले लिखी इस किताब में उठाए गए मुद्दे ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका के प्रेरक हैं और आते रहते कुछ मांग पत्रों के भी। ऐसे लोग अशोक से इसलिए परहेज करते हैं क्योंकि भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के कारण ‘हिन्दू अशोक’ ‘बौद्ध’ हो गया था। यही तो बाद में बाबा साहब अम्बेडकर के साथ हुआ।
डॉ. आर.के. पालीवाल
लोकतंत्र और में अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरकार की नीतियों और निर्णयों का शांतिप्रिय विरोध सभी नागरिकों को प्राप्त दो ऐसे अधिकार हैं जो लोकतंत्र के जीवित रहने और फलने फूलने के लिए बहुत जरूरी हैं। हमारा संविधान भी अभिव्यक्ति की आज़ादी को महत्त्वपूर्ण नागारिक अधिकार मानता है और समय समय पर सर्वोच्च न्यायालय भी अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में निर्णय देता रहा है।
इस सबके बावजूद अक्सर यह अहसास होता है कि सरकार का विरोध करने वालों को सत्ता पर काबिज लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी से वंचित करने के हर संभव प्रयास करते हैं।सरकारी मशीनरी सरकार का विरोध करने वालों को तरह तरह से प्रताडि़त करती है। आम आदमी के लिए तो यह संभव ही नहीं है क्योंकि सरकार का विरोध करने वाले खास लोगों के साथ भी सरकारी मशीनरी का रवैया दुश्मन सरीखा होता है। इसके उदाहरण जगह जगह आए दिन देखने को मिलते हैं।
हाल ही में प्रधानमन्त्री की अमेरिका यात्रा के दौरान भी कुछ लोगों ने यह मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री की यात्रा का विरोध किया था जिससे हमारे देश की छवि को नुक्सान हुआ था। कुछ दिन पहले हम सबने देखा था कि नए संसद भवन के उदघाटन वाले दिन अंतर्राष्ट्रीय पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों को संसद की तरफ बढऩे पर दिल्ली पुलिस ने किस तरह से घसीट कर रोका था जिसकी आलोचना उन्नीस सो तिरासी में क्रिकेट विश्व कप विजेता टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों ने भी की थी। जब देश की राजधानी में केन्द्र सरकार द्वारा नियंत्रित दिल्ली पुलिस का आचरण इस तरह का होगा तब प्रदेशों की पुलिस से कैसे बेहतर आचरण की उम्मीद की जा सकती है। विगत कुछ दशकों में पुलिस प्रशासन का इतना राजनीतिकरण हुआ है कि वह बेहद संवेदनहीन बन गया है। पुलिस का रवैया सत्ताधारी दल के छुटभैए नेताओं तक के प्रति जरूरत से अधिक विनम्र रहता है और विरोधी पक्ष के नेताओं,कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के प्रति बेहद क्रूर। इसका ताजा उदाहरण बिहार की राजधानी पटना में देखने को मिला है जहां प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले भारतीय जनता पार्टी के सांसदों तक पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया है जिसमें एक कार्यकर्ता की मृत्यु के समाचार प्रकाशित हुए हैं।
पुलिस का काम देश के अंदर अपराध नियंत्रण और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना है। जहां तक अपराध नियंत्रण का प्रश्न है उसमें कुछ सकारात्मक अपवादों को छोडक़र सामान्यत: पूरे देश की पुलिस का रवैया अच्छा नहीं है। शिकायत कर्ता की शिकायत पर एफ आई आर दर्ज करने के मामले में पुलिस अक्सर आलोचना का शिकार होती है। दूसरी तरफ बड़े नेताओं के कुत्ते,बिल्ली और गाय भैंस की चोरी और गुमसुदगी की खबर मिलने पर बुलेट ट्रेन की स्पीड से कार्यवाही करती है।
अभिव्यक्ति की आजादी रोकने में भी सरकारों की सबसे बड़ी मददगार पुलिस ही बनती है। जिस पुलिस का प्रमुख कार्य नागरिकों और उनके मूल अधिकारों की सुरक्षा का है उसी पुलिस का राजनीतिक दलों के शासकों की कठपुतली बन जाना अभिव्यक्ति की आज़ादी की सबसे बड़ी बाधा है। पुलिस के इसी रवैए के कारण एक तरफ सत्ताधारी दल के नेता और कार्यकर्ताओं को अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी मिलती है, यहां तक कि उनके उन भडक़ाऊ भाषणों पर भी कार्यवाही नहीं होती जिनसे सांप्रदायिक तनाव पैदा होता है । दूसरी तरफ़ विरोधी दलों को जरूरी मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से सभा करने और धरना प्रदर्शन करने पर भी तरह तरह से प्रताडि़त किया जाता है। इसी वजह से हाल में महाराष्ट्र की घटनाओं पर चिंता जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को बिना भेदभाव किए सभी भडक़ाऊ भाषणों के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश दिए थे।सर्वोच्च न्यायालय को अपने इन निर्देशों के अनुपालन की सतत मॉनिटरिंग भी करनी चाहिए तभी अभिव्यक्ति की आज़ादी के दोहरे मापदंड पर अंकुश लगेगा।
इमरान कुरैशी
कांग्रेस ने मंगलवार को बेंगलुरु में विपक्षी पार्टियों की बैठक का आयोजन किया और इस दौरान फैसला लिया गया कि उनके ‘महागठबंधन’ का नाम ‘इंडियन नेशनल डिवेलपमेंटल इन्क्लुसिव अलायंस’ यानी ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र होगा। बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी हृष्ठ्र के खिलाफ इसे ‘विपक्षी एकता’ का एक ठोस कदम माना जा रहा है। बेंगलुरु में 26 विपक्षी दलों के साथ आने के फैसले को राजनीतिक विश्लेषक एक सकारात्मक कदम मानते हैं। हालांकि उनका कहना है कि यह अच्छी शुरुआत है लेकिन अब भी ‘बहुत से जिन्न’ बाहर आने बाकी हैं जो 2024 के लोकसभा चुनाव शुरू होने से कुछ महीनों पहले होगा।
दिल्ली में रहने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आनंद सहाय बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ‘पटना के बाद बेंगलुरु में दूसरी बैठक के लिए साथ आते ही गठबंधन का नाम और को-ऑर्डिनेशन पैनल तय करना इस बात का संकेत है कि वे इसे लेकर खासे गंभीर है। ये उन्हें कितना एकजुट रखेगा अभी ये तो पता नहीं है। लेकिन एकजुटता की कोशिश साफ दिखती है। इसकी तुलना में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में बिखराव दिखता है। यही चीज ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र को मकसद वाला गठबंधन बनाती है।’
हालांकि कई राजनीतिक टिप्पणीकार इस बात से सहमत नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर संदीप शास्त्री बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ‘यह एक अच्छी शुरुआत है लेकिन इस पर कायम रहना काफ़ी महत्वपूर्ण है।’
एक अन्य वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार राधिका रामासेशन ने बीबीसी हिंदी को बताया, ‘अतीत में किसी भी समय लोकसभा चुनाव से पहले कोई नाम सामने नहीं रखा जाता था। राहुल गांधी ने बड़ी चतुराई से इंडिया और भारत को एक दूसरे के सामने रख दिया है और इंडिया और भारत के बीच उस विरोधाभास को दूर कर दिया है, जिस पर आरएसएस/बीजेपी हमेशा अभियान चलाते रहे हैं। लेकिन चर्चा के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।’
बेंगलुरु में विपक्षी दलों की दूसरी बैठक में 26 दल उपस्थिति रहे जबकि पिछले महीने पटना में 16 दलों ने हिस्सा लिया था। आम आदमी पार्टी ने पटना में संवाददाता सम्मेलन में शामिल नहीं हुई थी क्योंकि कांग्रेस ने दिल्ली से जुड़े विवादास्पद अध्यादेश का समर्थन नहीं किया था।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने दूसरे विपक्षी दलों की मौजदगी में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ‘कुछ मतभेद हैं लेकिन हमने उन्हें किनारे रखा है’ और हम मुंबई में एक समन्वय पैनल और दिल्ली में एक सचिवालय स्थापित करने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संयुक्त कैंपेन का भी सुझाव दिया।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की ओर से आयोजित डिनर में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के बीच की गर्मजोशी साफ दिखी।
दोनों एक दूसरे के आमने-सामने बैठकर बात कर रहे थे। दोनों के बीच यह बातचीत दो साल में पहली बार हो रही थी। यह गर्मजोशी तब और दिखी जब राहुल गांधी ने ये सुझाव दिया कि गठबंधन के नाम ‘इंडिया’ को ममता बनर्जी पेश करें।
इस बात को लेकर मतभेद भी था कि गठबंधन के नाम में ‘डेमोक्रेटिक’ (लोकतात्रिक) रखा जाए या ‘डेवलेपमेंटल’ (विकासपरस्त) रखा जाए।
वामपंथी दलों के नेताओं ने कुछ अलग सुझाव भी दिए और ये भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने सवाल उठाया था कि ‘इंडिया’ नाम रखना सही होगा या नहीं। हालांकि बिना किसी शोर-शराबे के इस नाम पर सहमति बन गई। ममता बनर्जी ने ये कहते हुए इसे पेश किया कि क्या ‘एनडीए इंडिया से भिड़ सकता है?’

खडग़े ने स्पष्ट करते हुए बात को आगे बढ़ाया कि कांग्रेस की दिलचस्पी सत्ता हासिल करने में नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और संविधान की सुरक्षा करने में है।
खडग़े के भाषण की झलक सम्मेलन के बाद पारित प्रस्ताव में भी दिखी जिसमें कहा गया कि गठबंधन जातीय जनगणना को लागू करेगा।
गठबंधन में सीटों का बँटवारा सबसे बड़ा मुद्दा है और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे उठाया। हालांकि इस पर और अधिक चर्चा नहीं हुई। राहुल गांधी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये वैचारिक लड़ाई है और ये माना जा रहा है कि इससे बैठक सहजता से हो गई।
प्रेस वार्ता को राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खडग़े, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने संबोधित किया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन इसमें शामिल नहीं हुए। कहा जा रहा है कि फ्लाइट पकडऩे के लिए उन्हें जल्दी निकलना पड़ा।
कई सवालों के जवाब मिलना बाकी

डॉक्टर शास्त्री कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि ‘इंडिया’ ने सही राजनीतिक हलचल पैदा की है, लेकिन इससे जुड़े कई सवाल बाक़ी हैं। आप सीटों के बँटवारे को लेकर अलग-अलग राज्यों में होने वाली प्रतिस्पर्धा को कैसे सुलझाएंगे? यह सबसे पहली जटिलता है। संयुक्त कैंपेन का ममता का सुझाव काफ़ी आकर्षक लग रहा है। लेकिन क्या जमीनी स्तर पर वे सभी के अहंकार से निपट सकते हैं।’
डॉ. शास्त्री राधिका रामासेशन से सहमत हैं कि ‘एक सामान्य एजेंडा बीजेपी का विरोध है।’ शास्त्री ने कहा कि प्रतिस्पर्धा नेतृत्व के बजाय प्राथमिकताओं और नीतियों पर होनी चाहिए।
रामासेशन कहती हैं बीजेपी स्पष्ट रूप से कह रही है कि वे चाहते हैं कि बहस नेतृत्व पर हो। लेकिन रामासेशन आश्चर्य जताती हैं कि क्या यह मोदी पर ध्यान केंद्रित करना विपक्षी दलों की ‘सोची-समझी रणनीति’ है।
क्या मोदी की लोकप्रियता
रामासेशन कहती हैं, ‘ये बात सही है कि मोदी की लोकप्रियता 2014 वाली नहीं है। लेकिन इस अभियान में फिर से मोदी को चुनौती नहीं माना जाएगा, अब समय आ गया है कि वे एक वैकल्पिक एजेंडे के बारे में सोचें कि पीने का पानी, शिक्षा आदि जैसी जीवन की बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने के बारे में गठबंधन क्या सोचता है।’
लेकिन सहाय का कहना है कि पहले के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि कैसे मोदी न तो पश्चिम बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सफल हो सके हैं और न ही कर्नाटक में।
वो कहते हैं, ‘इसलिए, स्वाभाविक रूप से वह अलग-अलग राज्यों में अलग प्रमुख खिलाड़ी हैं, जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश में कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ है। इसलिए, सीट बँटवारा इस आधार पर तय किया जाएगा कि प्रमुख खिलाड़ी कौन है। लेकिन बीजेपी की बैठकों पर नजर डालें तो अगर चार नेता हैं तो चार गुट भी हैं।’
सहाय के मुताबिक, ‘अमेरिका के जो बाइडन और फ्रांस के मैक्रों के नजरिये को छोड़ दें तो मोदी की लोकप्रियता भी कम हुई है। वे मोदी को नहीं बल्कि भारत को पसंद करते हैं क्योंकि भारत हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है। ’
मोदी का भ्रष्टाचार पर कैंपेन
रामाशेषन ने यह भी कहा कि विपक्षी दलों को ‘भ्रष्टाचार नामक जानवर से लडऩा होगा। विपक्ष के कई नेता आरोपों का सामना कर रहे हैं और कुछ जमानत पर हैं। विपक्ष को इस बात पर ध्यान देना होगा कि भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। एक नाम तय कर लेने से और गठबंधन बनाने का काम खत्म नहीं हो जाएगा।’
सहाय का कहना है कि मंगलवार की शुरुआत मोदी की राजनीतिक दलों की आलोचना से हुई, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी।
वह ऐसे लोगों से बात कर रहे थे जो जवाब देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने कोई नया मुद्दा नहीं उठाया।
‘इससे मुझे वह कहावत याद आ गई कि खिसियाई बिल्ली खंबा नोचती है। ये बौखलाहट की निशानी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह हमेशा कहते थे कि विपक्ष एक साथ नहीं आ सकता। अब जब उन्होंने यह कर लिया है, तो इस बात को मान लेनी होगी। बीजेपी बैकफुट पर है।’ (bbc.com/hindi)
-ध्रुव गुप्त
योग और अध्यात्म में रुचि रखने वाले मेरे एक फेसबुक मित्र ने कुछ दिनों पहले मेरी एक प्रेम कविता पर टिप्पणी की थी कि जीवन की इस चौथी अवस्था ने प्यार-मुहम्बत की बात मुझे शोभा नहीं देती। समय आ गया है कि अब मुझे धर्म, अध्यात्म, ध्यान और पारलौकिक चीजों के बारे में सोचना और लिखना चाहिए। मैंने तत्काल उनकी बात का जवाब नहीं दिया आज उन्हें और उनकी तरह सोचने वाले और मित्रों को भी कहना चाहता हूँ कि मेरी दृष्टि में प्रेम से बड़ा कोई धर्म या योग नहीं प्रेम ईश्वर की रचना है। धार्मिक कर्मकांड और अध्यात्म हम मनुष्यों के बनाए हुए हैं। वे उनके लिए है जिनके जीवन में प्रेम नहीं है। मुझे ईश्वर की रचना पर भरोसा है। इसीलिए मैं प्रेम ही करता हूं.. प्रेम ही सोचता हूं और प्रेम ही लिखता हूँ। आप धार्मिक और आध्यात्मिक लोग वर्षों और कभी कभी जीवन भर के पूजा-पाठ और ध्यान के बाद जो एकाग्रता हासिल नहीं कर पाते, यह एकायता प्रेम में पडऩे वाला व्यक्ति पल भर में हासिल कर लेता है। प्रेम संध्या है तो यह एक तरह की समाधि ही है। आपका धर्म और योग आत्मकल्याण के लिए है। प्रेम हम अपने आसपास की दुनिया से जोड़ता है। आप एक से प्रेम में पड़े तो आप सबके प्रेम में पड़ जाते हैं। समूची मानवता के प्रेम में जीव-जंतुओं के प्रेम में प्रकृति के प्रेम में पारलौकिक जीवन की अवधारणा बैठे-ठाले लोगों की कल्पना की उड़ान भर है वरना मरने के बाद क्या होता है यह किसी ने नहीं देखा है। और जो मर गए हैं वे तो बताने आएंगे नहीं।
मुझे तो इस जीवन को ही खूबसूरत बनाता है और मैं वही कर रहा हूँ। इसे खूबसूरत बनाने का प्रेम से बेहतर और कोई हरिया नहीं।
तो आप भी प्रेम करिए और प्रेम फैलाइए वरना यहां से खाली हाथ तो जाएंगे ही, मरने के बाद भी शायद कुछ हासिल न हो।
- सुदीप ठाकुर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले नौ सालों में इस देश को जो चीजें दी हैं, उनमें दो बातें साफ देखी जा सकती हैं। पहला, अधिकांश कार्यक्रमों और योजनाओं, चाहे वह नई हों या पुरानी, के नाम के आगे पीएम (प्रधानमंत्री) जुड़ गया है और दूसरा है, इन नामों का संक्षिप्त जिसे अंग्रेजी में Acronym कहते हैं। मसलन पीएम-किसान ( PM-Kisan) को ही देखें तो यह पीएम-किसान सम्मान निधि (PM-Kisan Samman Nidhi) को संक्षिप्त कर बनाया गया है।
लगता है, विपक्ष ने उन्हें इस खेल में उन्हीं के तरीके से चुनौती देने की कोशिश की है। बंगलुरू में हुई विपक्षी दलों की बहुचर्चित बैठक में विपक्षी गठबंधन ने अंततः अपने लिए एक नाम तलाश लिया है और यह है बड़ा दिलचस्प है। विपक्षी गठबंधन के पूरे नाम का अंग्रेजी में संक्षिप्त है... India यानी इंडिया! वैसे पूरा नाम है, Indian National Development Inclusive Alliance. इसका हिंदी में तर्जुमा कुछ इस तरह का होगा, भारतीय राष्ट्रीय विकासोन्मुखी समावेशी गठबंधन। और इसका संक्षिप्त होगा, भाराविसग। जाहिर है, विपक्षी गठबंधन खुद को अंग्रेजी के संक्षिप्त नाम इंडिया से जोड़ना चाहेगा और लगता तो यही है कि इसे ही ध्यान में रखकर यह नाम गढ़ा गया है। मगर यह भाजपा और राजग को कितना रास आएगा?
क्या विपक्षी गठबंधन का नाम देश के नाम पर होने के आधार पर इसे चुनाव आयोग और अदालतों में चुनौती तो नहींं दी जाएगी? यह तो कुछ दिनों में पता चल जाएगा, लेकिन इस नाम ने 2024 के आम चुनाव से पहले सियासी टकराव को दिलचस्प मोड़ दे दिया है।
ऐसा पहली बार हो रहा है, जब किसी राजनीतिक समूह को देश के नाम से जाना जाएगा। यों भारत, इंडिया और हिंदुस्तान से जुड़ी अनेक सियासी पार्टियां बन चुकी हैं और अब भी हैं, लेकिन उनके आगे पीछे भी कुछ शब्द या भाव जुड़े रहे हैं। मसलन कांग्रेस और भाजपा को ही देखें, तो कांग्रेस का पूरा नाम, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है। भाजपा का पूरा नाम भारतीय जनता पार्टी है।
देश की दोनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियां चुनाव आयोग में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में दर्ज हैं। इन्हें माकपा और भाकपा या सीपीएम या सीपीआई के रूप में जाना जाता है। हाल ही में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपनी पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति से बदल कर भारत राष्ट्र समिति कर दिया है।
2019 के आम चुनाव के दौरान चुनाव आयोग में पंजीबद्ध सात राष्ट्रीय पार्टियों में से पांच के नामों में इंडिया या भारत किसी न किसी रूप में आता है। इनमें आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस भी शामिल थी। इसी तरह से पंजीबद्ध 43 राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त दलों में से आधा दर्जन के नामों में भारत या इंडिया है। इनमें आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम और ऑल इंडिया मजलिस-ए- इत्तेहादुल मुस्लमीन जैसी पार्टियां भी शामिल हैं।
मैं इस आलेख को राजनीतिक दलों तक ही सीमित रखना चाहता हूं। अन्यथा प्रेस या मीडिया का विश्लेषण करें तो बहुत से नाम मिल जाएंगे। दरअसल विपक्ष के नए गठबंधन को लेकर जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, दिलचस्पी इसलिए है, क्योंकि इसे आम बोलचाल और राजनीतिक मंचों, टीवी चैनल की चर्चाओं में इंडिया ही कहा जाने वाला है।
असल में इस विमर्श का एक अहम पहलू यह भी है कि हमारे संविधान में देश का नाम इंडिया के रूप में दर्ज है। संविधान का अनुच्छेद एक कहता हैः
"संघ का नाम और राज्यक्षेत्र- (1) भारत, अर्थात, इंडिया, राज्यों का संघ होगा।"
संभवतः इसलिए इस पर सांविधानिक बहस भी छिड़ सकती है। विपक्षी गठबंधन में पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गज वकील शामिल हैं, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि उन्होंने इस नाम के सारे पहलुओं पर विचार जरूर किया होगा।
सामान्य तौर पर दो बातें साफ दिख रही हैं, एक तो यह कि विपक्षी गठबंधन हिंदी पट्टी में, जहां उसे भाजपा से सबसे बड़ी चुनौती है, कैसे अपने गठबंधन के नाम को निचले स्तर तक पहुंचाएगा। दूसरा यदि किसी तरह से यह मसला संविधान पीठ तक पहुंच गया तो क्या होगा। मगर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस इंडिया ने भाजपा और एनडीए के लिए इस टीवी बहस वाले दौर में मुश्किल खड़ी कर दी है, जहां विपक्ष को वे भ्रष्टाचारी कहने से गुरेज नहीं करते। क्या वह ऐसा इंडिया नाम के साथ कह पाएंगे ?
इंडिया का जिक्र पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भी किया था। इसमें नेहरू ने लिखा था, अक्सर जब मैं एक जलसे से दूसरे जलसे में जाने लगा ,तो इन जलसों में अपने श्रोताओं से अपने इस इंडिया, हिंदुस्तान और भारत के बारे में चर्चा करता, जो कि एक संस्कृत शब्द है और इस नस्ल के परंपरागत संस्थापकों के नाम से निकला है।" इसी तरह नेहरू ने इस देश की जनता को 'भारत माता' कहा था।
वैसे विपक्ष की चुनौती अपने गठबंधन का नाम जनता के बीच पहुंचाने से अधिक यह है कि वह भाजपा-एनडीए के बरक्स कोई नया नरैटिव यानी आख्यान पेश कर सके।
डॉ. आर.के. पालीवाल
यह वैज्ञानिक सत्य है कि पुरुष और महिलाओं का जेनेटिक मेक अप और उसके अनुरूप उनका हार्मोन तंत्र काफी समान होते हुए भी काफ़ी कुछ अलग होता है।
भारतीय संस्कृति में भी कई आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों के संदर्भ में महिलाओं को पुरुषों से कहीं बेहतर माना गया है।अलग जीन्स और हार्मोंस के प्रभाव से उनकी शारीरिक और मानसिक बनावट और बुनावट पुरुषों से अलग होती है। महिला और पुरुष भिन्नता के कुछ और भी कारण हो सकते हैं, मसलन महिलाओं में संकोच, शर्मो हया का नैसर्गिक गुण महिलाओं के लिए सदियों से चले आ रहे विशिष्ट सांस्कृतिक परिवेश की वजह से भी संभव है, लेकिन यह सच है कि महिलाएं पुरूषों की तुलना में अधिक सहनशील और मल्टी टास्कर होती हैं। इसी तरह से महिलाओं की छवि पुरुषों की तुलना में अधिक ईमानदार की होती है।
दुर्भाग्य से महिलाओं की ईमानदारी का भ्रम वर्तमान दौर में खंडित हो रहा है।हाल के केंद्रीय एजेंसियों, यथा सी बी आई और प्रवर्तन निदेशालय और विभिन्न राज्य सरकारों के लोकायुक्त और एंटी करप्शन ब्यूरो के छापों में महिलाओं के भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले मिले हैं जिनसे लगता है कि भ्रष्टाचार में महिलाओं की सहभागिता भी तेजी से बढ़ रही है। भ्रष्ट महिला अधिकारियों की सूची में कनिष्ठ अधिकारियों से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा की उच्च पदस्थ महिला अधिकारियों तक हर संवर्ग के नाम सामने आ रहे हैं।मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखण्ड से लेकर पश्चिम बंगाल तक विभिन्न जांच एजेंसियों के छापों में महिलाओं के नाम प्रमुखता से आना प्रमाणित करता है कि यह बदलाव किसी राज्य या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है।
राजस्थान में एक महिला ए एस पी द्वारा स्थानीय व्यापारी को आर्थिक अपराध के मामले में गिरफ्तार नहीं करने की एवज में एक करोड़ रूपए की घूस मांगने का मामला सामने आया है।हाल ही में मध्य प्रदेश पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन में संविदा पर नियुक्त महिला असिस्टेंट इंजीनियर के यहां लोकायुक्त की कार्यवाही में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
मात्र तीस हजार रूपए प्रतिमाह वेतन पाने वाली इस कर्मचारी के पास सात करोड़ की संपत्ति मिली है जिसमें तीस लाख़ का एल ई डी सिस्टम, एक विशाल बंगला, तीस चालीस कमरों का विशाल फार्म हाउस और कई चल-अचल संपत्ति शामिल हैं।पुलिस हाउसिंग कार्पोरेशन का नाम भ्रष्टाचार वाले विभागों की लिस्ट में संभवत: काफ़ी नीचे आता है। उसमें भी जिस पद पर उक्त महिला कार्यरत थी वह भी बड़ा पद नहीं है। संभव है कि उनके भ्रष्टाचार में ऊपर के अधिकारी भी शामिल हों क्योंकि इतना बड़ा भ्रष्टाचार अकेले करना संभव नहीं दिखता। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में भी महिला अधिकारियों द्वारा व्यापक भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए हैं।
हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति अधिसंख्य परिवारों में कमजोर है इसीलिए उनकी सुरक्षा के लिए दहेज विरोधी और यौन दुराचरण संबंधी विशेष कानूनी प्रावधान हैं। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान भी इन्हीं प्रयासों का अहम हिस्सा है। यह मान्यता है कि एक लडक़ा पढऩे से एक व्यक्ति शिक्षित होता है लेकिन एक लडक़ी की पढ़ाई से पूरा परिवार शिक्षित होता है। इसी परिपेक्ष्य में यह भी कह सकते हैं कि यदि किसी समाज में महिलाएं भी भ्रष्टाचार में अपने पुरुष समकक्षों की बराबरी करने लगेंगी तो परिवारों और समाज का तेजी से पतन सुनिश्चित है।
कुछ साल पहले मध्य प्रदेश में आयकर विभाग के छापों में एक वरिष्ठ आई ए एस दंपति के भ्रष्टाचार का मामला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बना था जिसके चलते इन दोनों अधिकारियों की बराबर संलिप्तता के कारण बर्खास्तगी हुई थी। इधर भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में कई राज्यों की महिलाओं की मुख्य आरोपी की भूमिका हमारे पूरे समाज के सडऩ की तरफ संकेत कर रही है। समय रहते भ्रष्टाचार के डायनासोर को नियंत्रित करने के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक जन जागरूकता अभियान की जरुरत है।
जगदीश्वर चतुर्वेदी
मैं सन् 2021 में जब कश्मीर में घूम रहा था, लोगों से मिल रहा था,बातें कर रहा था, तो एक बात साफ नजर आ रही थी कि कश्मीर तेजी से बदल रहा है। इस बदले हुए कश्मीर से कश्मीरी पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट बेहद परेशान थे। मैं पुराने श्रीनगर इलाके में कई बार गया, वहां विभिन्न किस्म के लोगों से मिला, उनसे लंबी बातचीत की, खासकर युवाओं का बदलता हुआ रूप करीब से देखने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय में भी गया वहां युवाओं की आपसी बातचीत के मसले देखे, उनके चेहरे पर एक खास किस्म का चैन देखा, युवाओं में पैदा हुए लिबरल भावों और उनकी आपसी संगतों में उठने वाले सवालों और विचार-विमर्श के विषयों को सुनकर लगा कि कश्मीर के युवाओं में पृथकतावाद-आतंकवाद या धार्मिक फंडामेंटलिज्म को लेकर एक सिरे से घृणा का भाव है।
कश्मीर विश्वविद्यालय में एक जगह दीवार पर पृथकतावादी नारा भी लिखा देखा, जिसमें लिखा था भारत कश्मीर छोड़ो, मेरी आंखों के सामने एक घटना घटी जिसने मुझे यह समझने में मदद की कि आखिर युवाओं में क्या चल रहा है। हुआ यह कि मैं जब साढ़े तीन बजे करीब हजरतबल मस्जिद से घूमते हुए कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचा तो देखा दो लड़कियां एक बैनर लिए कैंपस में प्रचार कर रही हैं, वे विभिन्न छात्र-छात्राओं के बीच में जाकर बता रही थीं कि एक जगह बलात्कार की घटना घटी है और उसमें कौन लोग शामिल हैं, मैं उनका बैनर नहीं पढ़ पाया क्योंकि वह कश्मीरी में लिखा था। लेकिन बैनर लेकर प्रचार कर रही दोनों लड़कियों की बात को कैंपस में विभिन्न स्थानों पर बैठे नौजवान सुनने को राजी नहीं थे,वे बिना सुने ही मुँह फेर ले रहे थे। इस घटना से मुझे आश्चर्य लगा, मैंने एक छात्र से पूछा कि बैनर लेकर चल रही लड़कियां किस संगठन की हैं, तो वो बोला, मैं सही-सही नहीं कह सकता लेकिन ये पृथकतावादी संगठनों के लोग हैं और आए दिन इसी तरह बैनर ले कैम्पस में घूमते रहते हैं, कोई इन संगठनों की बातें नहीं सुनता,क्योंकि कश्मीरी छात्र अमन-चैन चाहते हैं।
दिलचस्प बात यह थी मेरी आँखों के सामने तकरीबन 30 मिनट तक वे बैनर लेकर घूम-घूमकर छात्रों को बताने की कोशिश करते रहे लेकिन हर बार उनको छात्रों के छोटे छोटे समूहों में निराशा हाथ लग रही थी कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था,अंत में बैनर लिए युवाओं ने निराशा भरे शब्दों में अंग्रेजी में धिक्कारभरी भाषा में अपने गुस्से का इजहार किया। इस पर कुछ लड़कियों ने मुँह बनाकर उनको चिढ़ाने की कोशिश की, थोड़ी दूर चला तो देखा लडक़े-लड़कियां बड़े आनंद से एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए टहल रहे हैं, बाहर निकलकर मुख्य सडक़ से जब कार से घूमते हुए मैं पुराने शहर की ओर आया तो देखा कई युवा युगल मोटर साइकिल पर एक-दूसरे से चिपके हुए दौड़े चले जा रहे हैं,यह भी देखा कि बड़ी संख्या में मुसलिम लड़कियां और लडक़े आधुनिक सामान्य सुंदर ड्रेस पहने हुए घूम रहे हैं, बाजार में खरीददारी कर रहे हैं,मुख्य बाजार में अधिकतर मुसलिम औरतें बिना बुर्के के जमकर खरीददारी कर रही हैं। रात को 11बजे एक रेस्तरां में डिनर करने गया तो वहां पर पाया कि कश्मीरी प्रेमी युगल और युवाजन आराम से प्रेम भरी बातें कर रहे हैं, कहीं पर कोई आतंक का माहौल नहीं, किसी की भाषा में घृणा के शब्द नहीं, मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर और होटल के मालिक से पूछा इस समय कश्मीर में लड़कियां किस तरह शादी कर रही हैं ? सभी ने एक स्वर में कहा इस समय कश्मीरी लड़कियां गैर-परंपरागत ढ़ंग से,प्रेम विवाह कर रही हैं,वे स्वयं तय कर रही हैं, यह 1990-91 के बाद पैदा हुआ एकदम नया फिनोमिना है।
कश्मीरी युवाओं में उदातावादी रूझानों को देखकर मन को भय भी लग रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कश्मीर में फिर से अशांति लौट आए ?क्योंकि फंडामेंटलिस्ट ताकतें नहीं चाहतीं कि कश्मीर में उदारतावादी भावनाएं लौटें,मुझे यह भी लग रहा था कि जल्द ही टकराव हो सकता है। मैंने इस तनाव को बार बार वहां महसूस किया, मुझे लगा वहां आम जनता में उदारतावादी राजनीति और जीवन मूल्यों के प्रति जबर्दस्त आग्रह है और आतंकी-पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट नहीं चाहते कि कश्मीर में उदारतावाद की बयार बहे, वे हर हालत में आम जनता के मन में से उदारतावाद के मनोभावों को मिटाने की कोशिश करेंगे।मैंने कश्मीर से लौटकर वहां के उदार माहौल पर फेसबुक में लिखा भी था, दुर्भाग्यजनक है कि मेरे लिखे जाने के कुछ दिन बाद ही बुरहान वानी की हत्या होती है और अचानक कश्मीर में उदारतावादी माहौल को एक ही झटके में आतंकी-पृथकतावादी माहौल में तब्दील कर दिया गया।
जिसने भी बुरहान वानी की हत्या का फैसला लिया, वह एकदम बहुत ही सुलझा दिमाग है उसके मन में बुरहान वानी नहीं बल्कि कश्मीर का यह उदार माहौल था जिसकी उसने हत्या की है।ये वे लाखों कश्मीरी युवा हैं जिनके उदार मूल्यों में जीने की आकांक्षाओं को एक ही झटके में रौंद दिया गया। मैं इस तरह की आशंकाओं को लेकर लगातार सोच रहा था कि मोदीजी-महबूबा के सरकार में रहते कश्मीर में शांति का बने रहना संभव नहीं है,मैं जब सोच रहा था तो उस समय सतह पर शांति थी, लेकिन मैं आने वाले संकट को महसूस कर रहा था, अफसोस की बात है कि मोदी-महबूबा की मिलीभगत ने कश्मीर की जनता के अमन-चैन में खलल डाला, शांति से जी रहे कश्मीर को फिर से अशांत कर दिया, नए सिरे से आतंकियों और सेना की गिरफ्त में कश्मीर के युवाओं को कैद कर दिया।
मनीष सिंह
दुनिया में फिलॉसफी का सबसे शानदार दौर ईसा के चार सौ साल पहले का है। तब वेस्टर्न फिलॉसफी में ग्रीस विश्व गुरु बनकर उभरा। सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, थेल्स, डायोनिसिस, हेरोकलिट्स, पाइथागोरस.. इस दौर में हुए।
ये कुछ सौ साल, विचारकों के स्वर्ण युग थे। इनके विचार बहस मुबाहिसे का हिस्सा बने। काटे, जोड़े, इम्प्रूव किये गए। आज भी प्राचीन ग्रीस का दर्शन, पश्चिमी फिलॉसफी का बेडरॉक है।
ठीक इस समय, भारत में भी दर्शन आये। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व और उत्तर मीमांसा वैदिक दर्शन माने गए। इसके साथ जैन, बौद्ध और चार्वाक के भी दर्शन हुए। हम इन्हें आस्तिक और नास्तिक दर्शनों के रूप में विभाजित करते हैं।
इतने दर्शन भला इसी दौर में क्यों बने। इसके बाद क्यों नहीं आये। क्या मानव समाज की बुद्धि थम गई?
दरअसल इसका कारण, धर्म की सत्ता, ताकतवर होने से मिलता है।
जब पंथ छोटे थे, बहुतेरे थे, तो पुजारियों पण्डो का एकाधिकार नहीं था। आगे चलकर क्रिश्चिनिटी ताकतवर हो गयी। यानी चर्च की सत्ता सुप्रीम हो चली।
दर्शन का अर्थ है-देखना। आप किसी चीज को देखते कैसे हैं, आपका दृष्टिकोण क्या है, कैसे आप घटनाओं, रिश्तों, समाज और व्यक्ति के जीवन के अर्थ को समझते है। यह दर्शन हुआ।
फिलोसोफी का अर्थ तो और गहरा है। फीलो का मतलब है- प्रेम, सॉफी का अर्थ है-ज्ञान, या विज्डम !! यानी मोहब्बत को समझना फिलोसोफी है। और जो मोहब्बत को खोज रहा हो, फिलॉसफर है।
दृष्टिकोण, और मोहब्बत की खोज तब तक चली जब तक धर्म ने बन्दिशें न लगा दी। भारत में तो दर्शन को सीधे सीधे धर्म से जोड़ लिया गया। हिन्दू दर्शन, जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन.. ये सारे दर्शन, जो आजाद मनुष्य के विचार थे, एक एक पंथ के ‘कैप्टिव दर्शन’ हो गए।
दरअसल भारत में धर्म और दर्शन ऐसे लट्ट-पट्ट कर दिए गए हैं कि आधे से ज्यादा पाठकों को यह समझना कठिन है, कि धर्म और दर्शन अलहदा कैसे हो सकते हैं। यहाँ पर हिन्दू धर्म वैदिक दर्शन है, और बौद्ध धर्म ही बौद्ध दर्शन..
उधर पश्चिम में कुछ अलग हुआ।
वहाँ धर्म और दर्शन अलग अलग रहे।
चर्च का उदय हुआ। उसने अपनी एनसाइक्लोपीडिया लिखी- बाइबल। उसमे सारे सवालो के जवाब लिख दिए। अब इसके बाद सारे दर्शन खारिज। अब कोई सवाल नहीं, नजरिया नही। बाइबल के जवाबों पर शुब्हा न किया जाए। किया तो आप पापी, धर्मद्रोही, शैतान हो।
न मानने पर चर्च आपको मौत की सजा दे सकता था, जिंदा जलवा सकता था। तो पहली सदी के बाद ही सोच पर पहरे, बुद्धि पर ताला लगा दिया गया।
नए नजरिये से दर्शन पाप हुआ, तो दर्शन का विकास खत्म हो गया। इंसानी समाज मे प्यार की खोज, याने फिलॉसफी का स्पेस खत्म हो गया। विज्डम थमा तो डेढ़ हजार साल थमा रहा।
सोलहवीं सदी तक यूरोप में अंधकार का युग रहा। इसके बाद जो हुआ, उसे पुनर्जागरण कहते हैं।
मार्टिन लूथर ने शुरुआत की। बाइबिल की धारणाओं पर सवाल किए। कोपरनिकस और गैलीलियो ने किए। बताया धरती गोल है, चांद सितारे बेजान हैं। उन्होंने इसकी सज़ा भुगती। लेकिन धर्म के प्रति अंध श्रद्धा का दौर अब जा रहा था।
नवयुग आ रहा था। बाइबिल की जेनेसिस को ऑर्गेनिक इवोल्यूशन ने झुठलाया। धरती चांद सितारे, ईश्वर की मर्जी से नही, न्यूटन और आइंस्टीन के सिद्धातों पर चलने लगे। डार्विन ने बन्दर को मनुष्य का पूर्वज बना डाला।
हर चीज पर सवाल करना, डाउट करना, उसके कारण को खोजना- एक अभियान हो गया। विज्ञान हो गया।
जब यूरोप ने धर्म की जकडऩ को तोड़ा, तो विज्ञान का विकास हुआ। तब जाकर पिछले 300 सालों में नए अविष्कार हुए, जो 1500 साल में हो जाने चाहिए थे। विज्ञान दैनिक जीवन मे उपयोग शुरू किया। दवाइयां बनी, जिंदगियां बची, संचार आसान हुआ। कार बनी, विमान बने, टीवी रेडियो, बिजली... आधुनिक संसार का निर्माण हुआ।
और भारत- वह धर्म की जकडऩ से आज तक नही निकला।
क्या ही विडंबना है कि आजादी की पहली लड़ाई, पहला ग़दर, इस डर से हुआ कि कारतूसों की चर्बी हमारा धर्म भ्रस्ट कर देगी?
आज हम भले कहें, कि विमान से लेकर सर्जरी, एटॉमिक स्ट्रक्चर से लेकर परमाणु बम, सब हम वैदिक काल मे हासिल कर चुके थे, तो वह सिवाय आत्मप्रवंचना के कुछ नही।
आप वेद पढक़र लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नही बना सकते। वेंटिलेटर, या एक्सरे मशीन नही बना सकते। आप सिर्फ, मानव के - अपने खुद के समाज के बौद्धिक विकास पर ताला लगा सकते हैं। आगे जाती दुनिया से अलहदा राह पर, जहां पत्ता ईश्वर की मर्जी से खडक़ता है। जहां ब्राह्मण मुख और शूद्र, ब्रह्मा के पैरों से पैदा होता है।
हमारी लीडरशिप, हमारा समाज औऱ राजनीति, जब पंथ की स्थापना का बीड़ा उठाती है, तो उसी अंधकार युग मे ले जाती है, जिससे मुश्किल से हाथ पांव मारकर हम निकलकर आये हैं।
2000 साल के बाद तो समाज ऐसा बने, जो नए दर्शन को स्पेस दे। वर्तमान की धारणाओं को चैलेंज करने दे, शुब्हा करने दे, और नए जवाब खोजने की आजादी दे।
हम जिस दोराहे पर हैं, वहां जरूरत यही है, कि जिस प्रेम के विज्डम को खोजकर इंसान फिलॉसफर कहलाता है, उस मार्ग के कांटे हटाये जायें।
पंथ को, मंदिर, मस्जिद, चर्च को भले ही प्रणाम किया जाये,पर यात्रा वहां जाकर खत्म न जाये। वहां से शुरू की जाये।
प्रकाश दुबे
हिंदी के नामी कवि धूमिल को प्रश्न का उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने लिख मारा-मेरे देश की संसद मौन है। धूमिल के अनुभव से सबक लेते हुए हमें मणिपुर के बारे में न सवाल पूछना है और न कविता लिखनी है। इतनी जानकारी पर्याप्त है कि म्यांमार से तस्करी होती है। समझें कि हिंसा के लिए म्यानमार दोषी है। सबूत हम जुटा देते हैं। अंडमान में चार तस्कर इंजन वाली नौका से हिरासत में लिए गए।
बाकी चार तस्कर तैरकर दलदली झाडिय़ों में भागे। पुलिस ने जान पर खेलकर उन्हें भी खोज लिया। नौका से भारी मात्रा में सी कुकुंबर (समुद्री खीरे) बरामद किए। हंसिए मत। इस सागरी प्राणी का दाम प्रति किलो तीन हजार डालर है। भारतीय पुलिस सेवा की महिला अधिकारी गीतांजली खंडेलवाल की टीम ने यह कारनामा दिखाया। गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोच में पड़े होंगे। हमारे वीर बहादुर पुलिस और सैनिक कहां चूक गए। सीमावर्ती क्षेत्रों का अधिकार केंद्रीय दलों को देने के बावजूद तस्कर सैरसपाटे पर आते रहते हैं।
टमाटर पिलपिले हैं
रोबोट की फुर्ती से काम करने वाले प्रवर्तन निदेशालय के संजय कुमार मिश्र को उच्चतम न्यायालय ने तीन तीन बार सेवा विस्तार देने पर कड़ा रुख अपनाया। विक्रम ओर बैताल की तरह मिसर जी का ईडी कार्यकाल भी याद किया जाएगा। उनके नेतृत्व में काम करने वाले विभाग का एक और कारनामा सुप्रीम कोर्ट की नजऱ में आया। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन्मोहन रेड्?डी यूं तो संसद में सरकारी पक्ष का ध्यान रखते हैं, परंतु कुछ मुद्दों पर पारे की तरह फिसल जाते हैं। सबक सिखाने के लिए ईडी ने वाय एस भारती रेड्?डी नाम की महिला की अचल संपत्ति जब्त कर ली। भारती जगन्मोहन रेड्?डी के विरुद्ध मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज है। भारती कितना नकद और कितना फिक्स्ड डिपाजिट से जमा करने तैयार थीं, यह जानकर क्या करेंगे? कभी मुंबई उच्च न्यायालय में कार्यरत रहे न्यायमूर्ति अभय श्रीनिवास ओका और उनके सहयोगी संजय करोल के आसान सवाल पर ईडी निरुत्तर था। पिलपिले टमाटर सा। मुकदमे न लडऩे वाले वकील भी जानते हैं कि धन शोधन के लिए 2002 के अधिनियम में अचल संपत्ति जब्त करने का प्रावधान है?
टमाटर की निर्यात को मात
प्रधानमंत्री से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी कि परदेस गए थे, क्या लाए? ऐसी परमाणु पनडुब्बी मिलेगी जिसे राडार नहीं पकड़ सकते। रफाल नाम जाना पहचाना है। अमेरिका और फ्रांस के करारनामों के दरम्यान वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यात आंकड़ों की छानबीन की। रपट के मुताबिक पिछले साल की तुलना में हाल की जून छमाही में निर्यात में भारी गिरावट आई। पहली तिमाही की तुलना में दूसरी तिमाही ज्यादा खराब रही। 11 महीनों में 20 खरब की कमी, वह भी डियर डालर की मुद्रा में? मंत्रालय के महान विशेषज्ञों ने कारण तलाश किया। इतना तो माना कि अमेरिका और यूरोप में भारतीय माल की मांग कम तो हुई है, कारण अलग बताए। नंबर-1, अमेरिका यूरोप की विकास गति मंद है। दूसरे मुद्रास्फीति रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ा दी। भरोसमंद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के रहते हुए गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं है। आयात भी घटा है। इससे खर्च भी कम हुआ। टमाटर पहलवान महंगा है। दुनिया भर में सोना गिरा। विदेश में चारों खाने चित होने के बावजूद स्वर्ण आयात में 80 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई।
लाल टमाटर की चटनी
दक्षिण की पुरानी हिंदी फिल्मों ने सफलता का इतिहास रचा था। सफल फिल्मों के अंत में पुरा कुनबा परदे पर नजऱ आता था। सिनेमा शौकीन बेंगलूरु शहर के नामी होटल में प्रतिपक्ष के नेता ठहरेंगे। हम साथ साथ हैं, वाली मुद्रा में नेता होर्डिंग में नजऱ आते हैं-यूनाइटेड वी स्टेंड नारे के साथ साथ। क्षत- विक्षत मेहमानों में शरद पवार, उद्धव ठाकरे से लेकर घोसी का विधायक गंवाने के बाद अखिलेश यादव शामिल हैं।
पार्टियों की टूट-फूट और दलबदल कानून की धज्जियां उड़ाने में वैधानिक और संवैधानिक एजेंसियों की भूमिका का कार्यक्रम पत्रिका में उल्लेख हो न हो, चर्चा इसी बात पर होनी है। उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार मुख्य इंतजाम अली हैं। मुख्यमंत्री का बंगला होटल से लगकर है। इसके बावजूद वे और उपमुख्यमंत्री होटल में रुकेंगे। सोनिया गांधी के लिए सबसे अच्छा सुइट आरक्षित है। मेहमानों को सुर्ख लाल टमाटर की चटनी समेत खास व्यंजन परोसे जाएंगे। कर्नाटक अन्य राज्यों को टमाटर निर्यात करता है। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी के रात्रिभोज में शामिल होने की हामी नहीं भरी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
प्रकाश दुबे
हिंदी के नामी कवि धूमिल को प्रश्न का उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने लिख मारा-मेरे देश की संसद मौन है। धूमिल के अनुभव से सबक लेते हुए हमें मणिपुर के बारे में न सवाल पूछना है और न कविता लिखनी है। इतनी जानकारी पर्याप्त है कि म्यांमार से तस्करी होती है। समझें कि हिंसा के लिए म्यानमार दोषी है। सबूत हम जुटा देते हैं। अंडमान में चार तस्कर इंजन वाली नौका से हिरासत में लिए गए।
बाकी चार तस्कर तैरकर दलदली झाडिय़ों में भागे। पुलिस ने जान पर खेलकर उन्हें भी खोज लिया। नौका से भारी मात्रा में सी कुकुंबर (समुद्री खीरे) बरामद किए। हंसिए मत। इस सागरी प्राणी का दाम प्रति किलो तीन हजार डालर है। भारतीय पुलिस सेवा की महिला अधिकारी गीतांजली खंडेलवाल की टीम ने यह कारनामा दिखाया। गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोच में पड़े होंगे। हमारे वीर बहादुर पुलिस और सैनिक कहां चूक गए। सीमावर्ती क्षेत्रों का अधिकार केंद्रीय दलों को देने के बावजूद तस्कर सैरसपाटे पर आते रहते हैं।
टमाटर पिलपिले हैं
रोबोट की फुर्ती से काम करने वाले प्रवर्तन निदेशालय के संजय कुमार मिश्र को उच्चतम न्यायालय ने तीन तीन बार सेवा विस्तार देने पर कड़ा रुख अपनाया। विक्रम ओर बैताल की तरह मिसर जी का ईडी कार्यकाल भी याद किया जाएगा। उनके नेतृत्व में काम करने वाले विभाग का एक और कारनामा सुप्रीम कोर्ट की नजऱ में आया। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन्मोहन रेड्?डी यूं तो संसद में सरकारी पक्ष का ध्यान रखते हैं, परंतु कुछ मुद्दों पर पारे की तरह फिसल जाते हैं। सबक सिखाने के लिए ईडी ने वाय एस भारती रेड्?डी नाम की महिला की अचल संपत्ति जब्त कर ली। भारती जगन्मोहन रेड्?डी के विरुद्ध मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज है। भारती कितना नकद और कितना फिक्स्ड डिपाजिट से जमा करने तैयार थीं, यह जानकर क्या करेंगे? कभी मुंबई उच्च न्यायालय में कार्यरत रहे न्यायमूर्ति अभय श्रीनिवास ओका और उनके सहयोगी संजय करोल के आसान सवाल पर ईडी निरुत्तर था। पिलपिले टमाटर सा। मुकदमे न लडऩे वाले वकील भी जानते हैं कि धन शोधन के लिए 2002 के अधिनियम में अचल संपत्ति जब्त करने का प्रावधान है?
टमाटर की निर्यात को मात
प्रधानमंत्री से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी कि परदेस गए थे, क्या लाए? ऐसी परमाणु पनडुब्बी मिलेगी जिसे राडार नहीं पकड़ सकते। रफाल नाम जाना पहचाना है। अमेरिका और फ्रांस के करारनामों के दरम्यान वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यात आंकड़ों की छानबीन की। रपट के मुताबिक पिछले साल की तुलना में हाल की जून छमाही में निर्यात में भारी गिरावट आई। पहली तिमाही की तुलना में दूसरी तिमाही ज्यादा खराब रही। 11 महीनों में 20 खरब की कमी, वह भी डियर डालर की मुद्रा में? मंत्रालय के महान विशेषज्ञों ने कारण तलाश किया। इतना तो माना कि अमेरिका और यूरोप में भारतीय माल की मांग कम तो हुई है, कारण अलग बताए। नंबर-1, अमेरिका यूरोप की विकास गति मंद है। दूसरे मुद्रास्फीति रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ा दी। भरोसमंद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के रहते हुए गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं है। आयात भी घटा है। इससे खर्च भी कम हुआ। टमाटर पहलवान महंगा है। दुनिया भर में सोना गिरा। विदेश में चारों खाने चित होने के बावजूद स्वर्ण आयात में 80 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई।
लाल टमाटर की चटनी
दक्षिण की पुरानी हिंदी फिल्मों ने सफलता का इतिहास रचा था। सफल फिल्मों के अंत में पुरा कुनबा परदे पर नजऱ आता था। सिनेमा शौकीन बेंगलूरु शहर के नामी होटल में प्रतिपक्ष के नेता ठहरेंगे। हम साथ साथ हैं, वाली मुद्रा में नेता होर्डिंग में नजऱ आते हैं-यूनाइटेड वी स्टेंड नारे के साथ साथ। क्षत- विक्षत मेहमानों में शरद पवार, उद्धव ठाकरे से लेकर घोसी का विधायक गंवाने के बाद अखिलेश यादव शामिल हैं।
पार्टियों की टूट-फूट और दलबदल कानून की धज्जियां उड़ाने में वैधानिक और संवैधानिक एजेंसियों की भूमिका का कार्यक्रम पत्रिका में उल्लेख हो न हो, चर्चा इसी बात पर होनी है। उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार मुख्य इंतजाम अली हैं। मुख्यमंत्री का बंगला होटल से लगकर है। इसके बावजूद वे और उपमुख्यमंत्री होटल में रुकेंगे। सोनिया गांधी के लिए सबसे अच्छा सुइट आरक्षित है। मेहमानों को सुर्ख लाल टमाटर की चटनी समेत खास व्यंजन परोसे जाएंगे। कर्नाटक अन्य राज्यों को टमाटर निर्यात करता है। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी के रात्रिभोज में शामिल होने की हामी नहीं भरी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
रेहान फजल
सन् 1977 के चुनाव में जब अटल बिहारी वाजपेयी के दोस्त अप्पा घटाटे ने उनसे पूछा, ‘क्या आप मोरारजी देसाई के नाम पर लोगों से वोट माँगेंगे?’
वाजपेयी ने बिना एक सेकेंड गंवाए जवाब दिया था, ‘क्यों, मैं तो अपने नाम पर वोट लूँगा।’
उन्हें इस बात का पूरा अंदाजा था कि जनता पार्टी में जेपी के बाद उनको सुनने के लिए सबसे ज़्यादा लोग आते थे।
सात फरवरी 1977 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष के नेताओं की सफ़ेद एबेंसडर कारें धीरे-धीरे आकर रुकीं। वो ज़्यादातर बूढ़े लोग थे। वो धीरे-धीरे सीढिय़ाँ चढक़र मंच पर पहुँचे।
एक के बाद एक हर नेता ने जेल में उनके साथ हुई ज़्यादतियों के बारे में वहाँ मौजूद लोगों को बताया। सभी नेताओं के एक जैसे भाषणों के बावजूद लोग वहाँ जमे रहे।
करीब साढ़े नौ बजे के आसपास अटल बिहारी वाजपेयी की बारी आई।
उनको देखते ही सारी भीड़ खड़े होकर ताली बजाने लगी। वाजपेयी ने धीमी मुस्कान के साथ अपने दोनों हाथ उठाकर चुप हो जाने का इशारा किया।
इसके बाद उन्होंने अपनी आँखें बंद की और बेखयाली के अंदाज़ में एक मिसरा पढ़ा, ‘बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने।’ इसके बाद उन्होंने अपना चिरपरिचित पॉज़ लिया, भीड़ बेचैन हो गई।
फिर उन्होंने भीड़ को शांत होने का इशारा करते हुए मिसरा पूरा किया, ‘कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।’ इस बार तालियाँ और जोर से बजीं।
उन्होंने फिर आँखें बंद कीं और मिसरे की अंतिम लाइन पढ़ी, ‘खुली हवा में जरा साँस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने।’ भीड़ तब तक आपे से बाहर हो चुकी थी। वहाँ से आठ किलोमीटर दूर अपने 1 सफदरजंग रोड निवास में बैठी इंदिरा गाँधी को अंदाजा नहीं था कि वाजपेयी उनकी हार की बुनियाद रख चुके थे।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मुद्दा
सन 1966 में जब इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री का पद संभाला तो राममनोहर लोहिया ने ‘गूंगी गुडिय़ा’ कहकर उनका मज़ाक उड़ाया।
लेकिन एक साल के अंदर ही इंदिरा गाँधी ने इस छवि से छुटकारा पा लिया और वो विपक्ष के हमलों का जवाब उन्हीं के अंदाज में देने लगीं।
इंदिरा गाँधी की आर्थिक नीतियों ने जनसंघ के खेमे में मतभेद पैदा कर दिए।
भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक और जनसंघ के राज्यसभा सांसद दत्तोपंत थेंगड़ी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में प्रस्ताव पेश किया।
पार्टी के वरिष्ठ नेता बलराज मधोक ने उसका यह कहते हुए विरोध किया कि उनकी पार्टी के 1967 के चुनावी घोषणापत्र में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया गया है।
मधोक अपनी आत्मकथा ‘जिंदगी का सफर भाग -3’ में लिखते हैं, ‘लंच के दौरान वाजपेयी मुझे ये बताने आए कि बैंकों के बारे में थेंगड़ी के प्रस्ताव को आरएसएस का आशीर्वाद प्राप्त है।’
भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष
बलराज मधोक
हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘वाजपेयी द एस्सेंट ऑफ द हिंदू राइट 1924-1977’ के लेखक अभिषेक चौधरी लिखते हैं, ‘वाजपेयी ने संसद में पहले बैंक राष्ट्रीयकरण की जन-विरोधी कहकर आलोचना की थी लेकिन जल्द ही उन्हें इस कदम के लोकप्रिय होने का अंदाजा हो गया था।’
‘उत्तरी भारत में जनसंघ के समर्थक व्यापारी वर्ग को भी महसूस हुआ कि बैंकों की ऋण नीतियों में बदलाव से उनको भी फायदा होगा।’
जनसंघ के अखबार ऑर्गेनाइजर ने अपने 23 अगस्त, 1969 के अंक में लिखा, ‘वाजपेयी का मानना था कि इंदिरा गाँधी का बैंक राष्ट्रीयकरण का फैसला कतई आर्थिक न होकर पूरी तरह से राजनीतिक था।’
‘वो एक तरह से सत्ता में बने रहने का उनका हथियार था। वाजपेयी ने हवा के खिलाफ जाने को बुद्धिमानी नहीं समझा।’
प्रिवी पर्स के मुद्दे पर इंदिरा गांधी से टकराव
अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गाँधी के बीच पहला खुला टकराव पूर्व राजाओं को दिए जाने वाले प्रिवी पर्स (सरकारी भत्ता) के मुद्दे पर हुआ।
एक सितंबर, 1969 को लोकसभा ने दो-तिहाई बहुमत से राजाओं को प्रिवी पर्स न दिए जाने का बिल पास किया।
लेकिन तीन दिन बाद ये बिल राज्यसभा में मात्र एक वोट से गिर गया। इंदिरा गाँधी इस पर चुप नहीं बैठीं।
उन्होंने 5 सितंबर को एक अध्याधेश जारी करके राजाओं का प्रिवी पर्स समाप्त कर दिया।
अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे संसद और संविधान के अपमान की संज्ञा दी।
मैंने अभिषेक चौधरी से पूछा कि ये जानते हुए भी कि प्रिवी पर्स के मुद्दे पर इंदिरा गाँधी को जनसमर्थन हासिल है, वाजपेयी ने उसका विरोध क्यों किया?
इस पर चौधरी का जवाब था, ‘जनसंघ राजमाता सिंधिया और दूसरे राजाओं की वजह से प्रिवी पर्स हटाए जाने के विरोध में था। फरवरी, 1970 में ग्वालियर में हुए एक समारोह में जिसमें वाजपेयी भी उपस्थित थे, विजयराजे सिंधिया के बेटे माधवराव सिंधिया ने जनसंघ की सदस्यता ली थी।’
चौधरी बताते हैं कि इस फैसले का मध्य प्रदेश की राजनीति पर असर पडऩा लाजिमी था जहाँ ग्वालियर दरबार के राजनीतिक असर की अनदेखी नहीं की जा सकती थी।
प्रिवी पर्स पर राष्ट्रपति के अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिसंबर को सुनाए अपने फ़ैसले में अध्यादेश को असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया।
अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे सरकार के मुँह पर एक तमाचे की संज्ञा दी।
इंदिरा गाँधी पर शब्दबाण
सन 1971 के चुनाव प्रचार में वाजपेयी ने इंदिरा गाँधी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा, ‘प्रधानमंत्री भारतीय लोकतंत्र में जो कुछ भी पवित्र है, उसकी दुश्मन हैं।’
‘जब उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए उनके उम्मीदवार को स्वीकार नहीं किया तो उन्होंने पार्टी ही तोड़ दी। जब संसद ने प्रिवी पर्स समाप्त करने के बिल को पास नहीं किया तो उन्होंने अध्यादेश का सहारा लिया।’
‘जब सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश को अवैध करार दिया तो उन्होंने लोकसभा भंग कर दी। अगर ‘लेडी डिक्टेटर’ का बस चले तो वो शायद सुप्रीम कोर्ट को भी भंग कर देंगी।’
वाजपेयी ने इस बात की भी शिकायत की कि प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार के लिए वायुसेना के विमान का सहारा ले रही हैं, जबकि वाजपेयी को इंडियन एयरलाइंस के मामूली विमान में सीट बुक कराने तक में दिक्कत आ रही है और वो विमान भी रहस्यमय ढंग से घंटों की देरी से उड़ रहे हैं।
चुनाव प्रचार के ही दौरान जब वाजपेयी दिल्ली के बोट क्लब में सरकारी कर्मचारियों को संबोधित कर रहे थे, एक पीले रंग के दो सीटों वाले विमान ने ऊपर से चुनावी पर्चे गिराने शुरू कर दिए।
अभिषेक चौधरी लिखते हैं, ‘ये प्रधानमंत्री के बड़े बेटे राजीव गाँधी की योजना थी। पहले तो वाजपेयी ने इसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा, ‘ये पर्चे हवा में उडऩे दीजिए। मैं तो आपके वोट जमा करने आया हूँ।’’ लेकिन जब विमान ने वहाँ से हटने का नाम नहीं लिया और उसने वहाँ के कुल 23 चक्कर लगाए तो वाजपेयी ने इसे प्रजातंत्र की तौहीन बताया।
उन्होंने पर्चे बरसाते जहाज की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘क्या ये प्रजातंत्र है?’
1971 की लड़ाई में इंदिरा गाँधी को समर्थन
सन् 1971 के चुनाव परिणाम के बारे में वाजपेयी का आकलन बिल्कुल ग़लत निकला।
उन्हें उम्मीद थी कि उनकी सम्मानजनक हार होगी लेकिन उन्हें इस बात से बहुत धक्का लगा कि महागठबंधन को मात्र 49 सीटें मिलीं और जनसंघ की सीटों की संख्या 35 से घटकर सिर्फ 22 रह गई और उनमें से भी अधिकतर मध्य प्रदेश और राजस्थान के उन इलाकों से मिली जहाँ पूर्व राजाओं की पूछ अब भी थी।
बाकी के हिंदी भाषी इलाकों में पार्टी को मात्र 7 सीटों से संतोष करना पड़ा।
नवंबर,1971 में इंदिरा गाँधी ने तय किया कि भारत 4 दिसंबर को पाकिस्तान पर हमला करेगा, लेकिन पाकिस्तान ने इससे एक दिन पहले भारतीय हवाई ठिकानों पर हमला शुरू कर दिया।
अगले दो हफ्तों तक वाजपेयी ने संसद की कार्रवाई में भाग लेने और दिल्ली में जनसभाओं को संबोधित करने में अपना समय बिताया।
इस बीच उनकी तरफ से एक दिलचस्प वक्तव्य ये भी आया कि ‘इंदिराजी अब जनसंघ की नीतियों पर चल रही हैं।’
लेकिन साथ ही साथ उन्होंने ये ऐलान भी किया कि युद्ध की मुहिम में उनकी पार्टी का सरकार को पूरा समर्थन हासिल है। जब सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में युद्ध विराम के अमेरिकी प्रस्ताव को वीटो किया तो वाजपेयी ने यू-टर्न करते हुए सोवियत संघ को धन्यवाद दिया और कहा कि ‘जो भी देश हमारे संकट के दौरान हमारे साथ खड़ा है, हमारा दोस्त है। हम अपनी वैचारिक लड़ाई बाद में लड़ सकते हैं।’
वाजपेयी ने इंदिरा के समर्थन में बोलते हुए कहा, ‘मैं ख़ुश हूँ कि इंदिरा गाँधी याह्या खाँ को सबक सिखा रही हैं। हमारे पास एक ऐतिहासिक मौका है कि हम एक धर्मशासित देश को समाप्त कर दें या उसके जितना संभव हो उतने छोटे टुकड़े कर दें।’
इंदिरा को दुर्गा का अवतार कभी नहीं कहा
आम धारणा ये है कि जिस दिन ढाका में पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया वाजपेयी ने इंदिरा गाँधी को दुर्गा के अवतार की संज्ञा दी।
अभिषेक चौधरी इस धारणा को सिरे से नकारते हैं।
वो कहते हैं, ‘वास्तविकता ये है कि 16 दिसंबर के दिन वाजपेयी संसद में मौजूद नहीं थे। वो या तो कहीं की यात्रा कर रहे थे या बीमार थे। जब इंदिरा गाँधी ने युद्धविराम पर चर्चा करने के लिए विपक्ष की बैठक बुलाई थी तो वो उसमें मौजूद नहीं थे।’
‘अगले दिन जब इंदिरा गाँधी ने युद्ध विराम का समर्थन करने के लिए सभी दलों को धन्यवाद दिया तो वाजपेयी ने खड़े होकर कहा, ‘हम युद्धविराम नहीं चाहते हैं। हम हमेशा के लिए अपने प्रति शत्रुता को समाप्त करना चाहते हैं, इसके लिए जरूरी है कि पश्चिमी सेक्टर में लड़ाई जारी रखी जाए।’
तब के लोकसभा अध्यक्ष गुरदयाल सिंह ढिल्लों ने इस पर बहस की अनुमति नहीं दी और वाजपेयी को डाँटते हुए कहा, ‘इस शुभ मौके पर उन्हें इस तरह की असंवेदनशील बात नहीं करनी चाहिए।’
दो दिन बाद जब संसद के केंद्रीय हॉल में इंदिरा गाँधी को बधाई देने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक हुई तो वाजपेयी उसमें जानबूझकर शामिल नहीं हुए।
इंदिरा के लिए सौहार्द कड़वाहट में बदला
कुछ दिनों बाद वाजपेयी विजय रैली को संबोधित करने बंबई गए। वहाँ उन्होंने जनसभा में कहा, ‘देश ने कई शताब्दियों में इस तरह की जीत हासिल नहीं की है। इस जीत के असली जिम्मेदार भारतीय सैन्य बल हैं।’
उन्होंने इंदिरा गाँधी की भी ये कहकर तारीफ की कि उन्होंने दो सप्ताह की लड़ाई में ठंडे दिमाग से काम लिया और देश को आत्मविश्वास से भरा नेतृत्व प्रदान किया। लेकिन तीन महीने बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव आते-आते इंदिरा गाँधी के प्रति उनका सौहार्द करीब-करीब समाप्त हो चुका था। उनकी शिकायत थी कि इंदिरा गाँधी ने 1967 से 1972 के बीच जनसंघ की ओर से दिल्ली में स्वच्छ प्रशासन देने के मामले में कभी जनसंघ के लिए अच्छे शब्द नहीं कहे।
वाजपेयी ने कहा कि वो हर जगह ये ही कहती रहीं कि जनसंघ ने सडक़ों और कॉलोनियों के नाम बदलने के अलावा कुछ भी नहीं किया है। ऑर्गनाइजर ने 4 मार्च, 1972 के अपने अंक में वाजपेयी को ये कहते बताया, ‘इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान से लड़ाई शुरू करने में देर कर दी और युद्धविराम भी समय से पहले कर दिया।’
‘उन्होंने सोवियत दबाव में युद्धविराम किया वो भी सेनाध्यक्षों से सलाह मशविरा किए बगैर। अगर पाकिस्तान के साथ लड़ाई कुछ दिनों तक और चलती तो पाकिस्तानी सेना की कमर टूट जाती।’
वाजपेयी को इंदिरा गाँधी का जवाब
जुलाई, 1972 में पाकिस्तान के साथ हुए शिमला समझौते को वाजपेयी ने पसंद नहीं किया। उनकी शिकायत थी कि भारत ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर लिए बग़ैर पंजाब और सिंध में पाकिस्तान से जीती जमीन उन्हें वापस कर दी। इस दौरान उन्होंने राजस्थान सीमा पर पाकिस्तान से जीते हुए शहर गादरा जाने का फैसला किया।
अभिषेक चौधरी लिखते हैं, ‘वो अपने साथ 64 सत्याग्रहियों को लेकर गए। वो सब नारे लगा रहे थे, ‘देश न हारा, फौज न हारी, हारी है सरकार हमारी।’
चिलचिलाती धूप और आँधी का सामना करते हुए चार किलोमीटर का रास्ता तय कर वो गादरा शहर में दाखिल हुए। जीते गए इलाके के 180 मीटर अंदर आने पर वाजपेयी को उनके सभी साथियों के साथ गिरफ़्तार कर ट्रकों पर बैठाकर भारतीय क्षेत्र में ले आया गया। वहाँ से लौटने पर वाजपेयी ने बोट क्लब पर भीड़ को संबोधित करते हुए इंदिरा गाँधी से सवाल पूछा, ‘क्या आखिरी दिन क्रेमलिन से संदेश आने के बाद शिमला में गतिरोध टूटा था?’
अब तक इंदिरा गाँधी वाजपेयी के आरोपों की अनदेखी करती आई थीं। लेकिन इस बार उन्होंने वाजपेयी के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘सिर्फ हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति इस तरह के आरोप लगा सकता है। क्या हम अपने करोड़ों लोगों की आवाज़ सुनें या हर समय सियापा करने वाले चंद लोगों की? वाजपेयी ने पिछला पूरा साल मेरा मजाक उड़ाते हुए बिताया है। क्या वाजपेई इस बात का खंडन करेंगे कि बाँग्लादेश आज वास्तविकता है?’
मारुति और मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का मामला
दो सालों के अंदर ही वाजपेयी को इंदिरा गाँधी पर हमला करने का मौका मिला। जब उनके बेटे संजय गाँधी ने मारुति कार
फैक्ट्री लगाई तो वाजपेयी ने उस पर तंज कसते हुए कहा, ‘ये कंपनी मारुति लिमिटेड नहीं, करप्शन अनलिमिटेड है।’
जब इंदिरा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ जजों की अनदेखी करते हुए एएन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया तो वाजपेयी को इंदिरा पर हमला करने का एक और मौका मिल गया।
वाजपेयी ने कटाक्ष करते हुए कहा, ‘कल ये कहा जा सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और संघ लोक सेवा आयोग के प्रमुख का सामाजिक दर्शन भी सरकार के अनुरूप होना चाहिए। क्या ये नियम सशस्त्र सेनाओं पर भी लागू होगा? कानून जी-हजूरी करने वाले लोगों की मदद से नहीं बन सकता। इसके लिए आजाद न्यायपालिका का होना जरूरी है।’
सन् 1974 में जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया तो वाजपेई ने भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों की तारीफ तो की लेकिन प्रधानमंत्री को इसका श्रेय नहीं दिया।
जगजीवन राम को चाहते थे प्रधानमंत्री बनवाना
सन् 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत में भारतीय जनसंघ को सबसे अधिक 90 सीटें मिलीं। भारतीय लोक दल को 55 और सोशलिस्ट पार्टी को 51 सीटें मिलीं। सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते वाजपेयी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश कर सकते थे।
अभिषेक चौधरी कहते हैं, ‘इसका कारण ये था कि वाजपेयी की उम्र उस समय सिर्फ 52 वर्ष थी। मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चरण सिंह के मुकाबले उन्हें तब तक प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था।’
‘अगर नेतृत्व की दौड़ में वाजपेयी भी कूद पड़ते तो नई-नई बनी जनता पार्टी के लिए और मुसीबतें खड़ी हो जातीं। रणनीति का तकाजा था कि वाजपेयी इस बार पीछे रहें और अपनी बारी का इंतज़ार करते।’
वाजपेयी ने शुरू में प्रधानमंत्री पद के लिए जगजीवन राम को अपना समर्थन दिया था। संसद में विरोधी होते हुए भी जगजीवन राम से उनकी बनती थी।
मोरारजी देसाई जिद्दी थे और उनमें लचीलेपन की कमी थी। जगजीवन राम को समर्थन देने से दलितों के बीच संघ परिवार की छवि सुधरने वाली थी। लेकिन चरण सिंह ने सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया।
उन्होंने अस्पताल की अपनी पलंग से लिखे पत्र में जगजीवन राम की उम्मीदवारी को इस तर्क के साथ ख़ारिज कर दिया कि उन्होंने संसद में आपातकाल का प्रस्ताव पेश किया था।
वाजपेयी के पास मोरारजी देसाई का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।
जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने
चरण सिंह के रहते वाजपेयी को जनता सरकार में गृह मंत्रालय मिलने का सवाल नहीं था। मोराजी देसाई ने उनके सामने रक्षा या विदेश मंत्रालय में से एक विभाग को चुनने के लिए कहा। वाजपेयी को विदेश मंत्रालय चुनने में एक सेकेंड का भी समय नहीं लगा।
चुनाव के बाद रामलीला मैदान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गाँधी को निशाना बनाते हुए वो मशहूर वाक्य बोला, ‘जो लोग अपने को भारत का पर्यायवाची कहते थे, उन्हें जनता ने इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया।’
यह अलग बात है कि इंदिरा गाँधी ने वाजपेयी को गलत साबित किया और तीन साल बाद एक बार फिर सत्ता में वापसी की।
वाजपेयी की भी बारी आई और उन्होंने 1996 और फिर 1998 और 1999 में भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनकी सरकार पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया था। (bbc.com/hindi)
- चंदन कुमार जजवाड़े
बिहार की राजधानी पटना में विपक्षी एकता को लेकर जो उत्साह देखा गया था, वह अचानक गायब क्यों है? क्या आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल की शर्त ने इस एकता को बनने से पहले ही बिगाड़ दिया है? या विपक्षी दलों की अपनी समस्याओं ने इस एकता की संभावना को झटका दिया है?
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी और नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई महीनों से कोशिश में लगे हुए हैं। पिछले महीने 23 जून को पटना में 15 विपक्षी दलों की मीटिंग इस लिहाज से एक बड़ी सफलता मानी जा रही थी।
पटना की मीटिंग के बाद यह तय हुआ था कि 10 से 12 जुलाई के बीच शिमला में विपक्षी दलों की दूसरी मीटिंग होगी जिसमें राज्यों में लोकसभा सीटों के बंटवारे पर चर्चा की जाएगी। इस मीटिंग की जि़म्मेवारी कांग्रेस पार्टी पर सौंपी गई थी। पहले से तय शिमला की यह मीटिंग रद्द हो चुकी है और अब यह मीटिंग 17 और 18 जुलाई को बेंगलुरु में होगी। इस बीच आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव ने भी दावा किया है कि बेंगलुरु में 17 दल एक साथ आ रहे हैं। लालू यादव ने कहा, ‘वो (बीजेपी को) जो कहना है, कहते रहें, वो नहीं चाहते हैं कि इस पर चर्चा हो क्योंकि वो जा रहे हैं।’
दरअसल विपक्षी एकता को लेकर चर्चा के बंद होने से ही विपक्षी एकता पर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि, इस सवाल की शुरुआत पटना की मीटिंग के बाद ही हो गई थी। उस वक्त आम आदमी पार्टी ने बयान जारी कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।
पहली दरार
पिछले महीने की 23 तारीख को पटना में हुई मीटिंग के बाद अरविंद केजरीवाल ने यह शर्त रख दी थी कि जब तक कांग्रेस दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर अपना रुख़ सार्वजनिक नहीं करेगी तब तक आप ऐसी किसी भी मीटिंग का हिस्सा नहीं बनेगी जिसमें कांग्रेस भी मौजूद होगी। हालांकि, कांग्रेस ने पटना की मीटिंग में दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की बात कही थी। लेकिन आप का कहना है कि कांग्रेस सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा करे।अब बेंगलुरु की मीटिंग के पहले भी आम आदमी पार्टी ने इसी शर्त को दोहराया है।
आप की शर्त
आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने बीबीसी से कहा है, ‘हमारा रुख इस मामले में स्पष्ट है। कांग्रेस पहले दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर हमें समर्थन देने की बात सार्वजनिक तौर पर कहे। हम इंतज़ार कर रहे हैं कि कांग्रेस अपने समर्थन का घोषणा करे।’
संजय सिंह ने दावा किया है कि कांग्रेस ने पटना में सभी विपक्षी दलों के सामने कहा था कि वह संसद के मॉनसून सत्र के 15 दिन पहले ही दिल्ली सरकार को अपने समर्थन का एलान करेगी, लेकिन उसने अब तक ऐसा नहीं किया है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसमें कांग्रेस खुद असमंजस में नजर आती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है यह है कि राज्य स्तर पर कांग्रेस के कई नेता आम आदमी पार्टी को लेकर सतर्क हैं।
कांग्रेस की दुविधा
आम आदमी पार्टी से दिल्ली, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ है इसलिए कांग्रेस इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
अगर केजरीवाल विपक्षी एकता के गुट से अलग होते हैं तो इसका नुकसान कांग्रेस को दिल्ली, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गोवा में हो सकता है, जहां आप कांग्रेस के वोट बैंक को झटका दे सकती है।
कांग्रेस अगर अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी होती है तो भी उसे कम से कम दिल्ली और पंजाब में कई सीटों पर आप से समझौता करना पड़ सकता है। जबकि साल 2019 लोकसभा चुनावों के लिहाज़ से इन दोनों राज्यों में कांग्रेस आप से बेहतर स्थिति में नजर आ रही है।
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के अलावा भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिसने विपक्षी एकता की चर्चा अचानक गायब हो गई है।
इसमें सबसे बड़ी वजह महाराष्ट्र में एनसीपी में हुई टूट है। एनसीपी के विभाजन के बाद इसका विपक्षी दलों के एक बड़े नेता शरद पवार की ताक़त पर असर पड़ा है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, ‘अजित पवार ने एनसीपी से जो बगावत की है उससे असर पड़ा है और एक तरह का संशय पैदा हुआ है। एनसीपी में टूट से शरद पवार को बड़ा धक्का लगा है, इससे शरद पवार की आवाज भी कमजोर हुई है।’ हालांकि, विपक्षी गुट में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि एनसीपी में जैसी टूट हुई है वह पहली बार नहीं हुआ है।
पश्चिम बंगाल में मौजूद समस्याएं
इससे पहले मध्य प्रदेश में कांग्रेस को तोड़ा गया, यह सिलसिला पहले से चल रहा है। उमर अब्दुल्ला ने दावा किया है, ‘मैं नहीं मानता इससे शरद पवार कमजोर हुए हैं। वो इससे और मजबूत हुए हैं। इसका नतीजा तब सामने आएगा जब लोगों को वोट देने का मौका मिलेगा।’ वहीं ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के सांसद सौगत राय ने तो स्पष्ट तौर पर बयान दिया है कि टीएमसी अकेले दम पर राज्य में लोकसभा चुनाव लड़ सकती है, और हमें किसी विपक्षी एकता की जरूरत नहीं है। इस तरह के बयानों से भी विपक्षी एकता को झटका लगा है।
बिहार में कैसी हैं चुनौतियां
बिहार में भी विपक्षी एकता को लेकर आशंका के बादल मंडरा चुके हैं। इसकी बड़ी वजह लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहते हुए कथित ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाले में सीबीआई की ओर से अपनी चार्जशीट में तेजस्वी यादव का नाम शामिल किया जाना है। अब बीजेपी इस मुद्दे पर तेजस्वी यादव का इस्तीफ़ा मांग रही है जो फि़लहाल बिहार में उप मुख्यमंत्री के पद पर बैठे हैं।
बिहार में ऐसी भी अफवाहों का बाजार गर्म रहा कि इस मुद्दे पर नीतीश कुमार और आरजेडी के बीच दूरियां बढ़ सकती हैं और इस मुद्दे पर जेडीयू टूट सकती है। हालांकि, सोमवार को नीतीश और तेजस्वी दोनों एक साथ बिहार विधानसभा के मॉनसून सत्र में भाग लेने पहुंचे।
जेडीयू नेताओं ने इस बात का खंडन किया है कि महागठबंधन में किसी तरह का मतभेद है।
वहीं आरजेडी सांसद मनोज झा ने भी बयान जारी कर कहा है कि बिहार में कभी भी रिसॉर्ट पॉलिटिक्स नहीं हो सकती है, इसलिए लोग इसकी चिंता न करें। बिहार पूरी तरह सुरक्षित है।
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं कि इस तरह की अटकलें या खबरें बीजेपी को भी रास आती हैं, लेकिन नीतीश कुमार अगर आरजेडी से रिश्ता तोड़ते हैं तो उनके पास एकमात्र विकल्प बीजेपी के साथ जाने का रह जाता है जिसकी संभावना अब नहीं के बराबर नजर आती है।
वहीं समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विपक्षी नेताओं के समर्थन में कहा है, ‘क्या बीजेपी में सब एकमत हैं, वहां इंजन एक-दूसरे को टक्कर मार रहे हैं। राजनीति में कई लोगों के सुझाव और विचार आते हैं। हमारी कोशिश होगी कि ज़्यादा से ज़्यादा दल एक साथ आएं।’
बीजेपी की तैयारी
एक तरफ जहां विपक्षी दल बेंगलुरु में मीटिंग की तैयारी कर रहे हैं, वही बीजेपी भी अपनी ताक़त और सहयोगी बढ़ाने के मुहिम में लगी हुई है। बीजेपी बिहार में भी जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा को अपने साथ जोडऩे में कामयाब रही है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी के मुताबिक़ संभावना यह भी है कि एलजेपी के चिराग पासवान भी जल्द ही एनडीए में शामिल हो सकते हैं और उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाए जाने की ख़बरें भी सामने आ रही हैं। प्रमोद जोशी कहते हैं, ‘इस तरह से बीजेपी का भी उत्साह बढ़ा हुआ है और इससे महागठबंधन के मुकाबले वह भी तैयार हो रही है। दोनों पक्ष अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं, इसलिए भी विपक्षी एकता की चर्चा थोड़ी कमजोर हुई है।’
प्रमोद जोशी के मुताबिक, ‘कोई भी बात अचानक ख़त्म नहीं होती है। अगर हमारे पास खबरें नहीं आ रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि विपक्षी एकता को लेकर कुछ नहीं हो रहा है।’ ‘मैं नहीं मानता कि नेताओं के स्तर पर कुछ नहीं हो रहा है। जहां तक खबरों की बात है तो मीडिया के सामने कभी प्रधानमंत्री का विदेश दौरा तो कभी बाढ़ जैसी खबरें होती हैं इसलिए विपक्षी एकता की खबर कम दिखाई दे रही है।’
संभावना
संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है, जो 11 अगस्त तक चलेगा। यह सत्र तय कर सकता है कि आम आदमी पार्टी विपक्षी एकता के साथ जुड़ेगी या नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, ‘कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच एक बेरुखी पैदा हो गई है। हालांकि अभी इसकी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, हमें देखना होगा कि आप बेंगलुरु की मीटिंग में शामिल होती है या नहीं।’
आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के सामने जिस तरह की शर्त रख रही है उसमें कांग्रेस को दिल्ली से जुड़े अध्यादेश के मुद्दे पर दिल्ली सरकार को अपना समर्थन मॉनसून सत्र के पहले ही ज़ाहिर करना होगा। भले ही कांग्रेस ने बंगलुरु बैठक के लिए आम आदमी पार्टी को भी न्योता भेजा है। लेकिन कांग्रेस की तरफ से दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर अब किसी फैसले की सार्वजनिक घोषणा नही की गई है। ऐसे में थोड़े इंतजार के बाद ही कांग्रेस और फिर आम आदमी पार्टी का रुख साफ हो पाएगा। उसके बाद ही यह भी स्पष्ट होगा कि पटना में 15 विपक्षी दल मीटिंग में शामिल हुए थे, तो बेंगलुरु में यह संख्या 14 होगी या 17। (bbc.com/hindi)
दूसरी किस्त, कल के अंक से आगे
(5) नरेन्द्रनाथ की समझ में खानपान से धार्मिक अनुभूतियों का कोई रिश्ता नहीं था। यही उनकी तरुण समझ थी। श्रीरामकृष्णदेव के बाकी शिष्यों से अलग नरेन्द्र से उनका बेतकल्ल्लुुफ रिष्ता भी था। एक बार नरेन्द्र ने आकर कहा, ‘गुरुदेव मैंने आज वह सब खा लिया है जिसकी धार्मिक लोगों के लिए मनाही है। अद्भुत रहस्यमय, आध्यात्मिक गुरु ने ताड़ लिया कि शिष्य निष्कपट भाव से सांसारिकता के मकडज़ाल से ऊपर उठकर साफगोई बात कह रहा है। उन्होंने जवाब दिया कोई बात नहीं इससे तुमको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर में ध्यान केंद्रित रखकर गोमांस या सुअर का मांस भी खाता है, तो उसके लिए वह भोजन हविश्य अन्न की तरह पवित्र है। कोई अगर सांसारिकता की बुराइयों में डूबा रहे तो उसके लिए तो वही भोजन गोमांस या सुअर के मांस के बराबर है। यदि तुमको छोडक़र किसी अन्य षिष्य ने ऐसा किया होता, तो मैं बर्दाश्त नहीं करता कि वे मुझे छू भी लें। (दि लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानन्द बाइ हिज ईस्टर्न एण्ड वेस्टर्न डिसाइपल्स खण्ड 1, पृष्ठ 93)।
(6) विवेकानन्द के दिनों में खासतौर पर बंगाल में कायस्थों को शूद्र की श्रेणी में गिना जाता था। वहां के ब्राम्हण इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि एक कायस्थ विवेकानन्द किस हैसियत में धार्मिक कृत्यों में संलग्न है। और उपदेश भी कर रहे हैं। मुसलमानों, इसाइयों सहित निम्नतर हिन्दुओं के लिए म्लेच्छ षब्द का संबोधन किए जाने की भी ब्राम्हण परंपरा रही है। खासतौर पर पुरोहितों और ब्राम्हणों को जब पता लगा कि विवेकानन्द एक धर्मोपदेशक की भूमिका में अमेरिका गए हैं। तब उन्होंने अन्य बातों के अलावा इस बात पर भी आपत्ति की कि वे वहां पर जाति पांति, धर्म, कर्म का षासकीय अनुशासन का उल्लंघन करते किसी के भी हाथ का बना खाना खा रहे हैं। जिसमें मांसाहार भी शामिल है। इससे तो खासतौर पर हिन्दू धर्म की हेठी हो रही है। तब विवेकानन्द ने अपने शिष्यों को लिखा था कि जो लोग मेरी आलोचना कर रहे हैं। उनसे कहिए खानपान की कथित आदत के नाम पर वे मेरे लिए अमेरिका में किसी भारतीय या समकक्ष रसोइए का प्रबंध कर दें। तब मैं उसके हाथ का बना हुआ ही खाना खाने में प्रसन्नता का अनुभव करूंगा। लेकिन ऐसा ना होना था और ना हुआ। विवेकानन्द ने कहीं यह भी लिखा है कि प्राचीन धर्म ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि प्राचीन काल में एक ब्राहमण ब्राहमण नहीं कहलाता था। यदि वह गोमांस नहीं खाता था। यहां तक कि एक हिन्दू अच्छा हिन्दू नही माना जाता था यदि वह गोमांस नहीं खाता था। हालांकि अब वह एक अप्राकृतिक और अनैतिक काम भारत में माना जा रहा है। (वि. सा. 3/174.1 और 536.1)
विवेकानन्द ने यह भी कहा था:
13. जब तक मनुष्य को राजकीय अर्थात क्रियाशील जीवन जीना है जो मौजूदा हालातों में है तब कोई विकल्प नहीं सिवाय इसके कि उसे मांसाहार करना पड़े। (वि.सा. 4/86.3)
14.शिष्यों को ताकतवर बनाने के मकसद से उन्होंने कहा था खूब डटकर मांस और मछली खाओ मेरे बच्चों! (वि0सा0 5/402.3), (वि.सा. 5/4031)
15. रामायण और महाभारत के कथानक में ऐसी कई घटनाएं हैं। जब मदिरापान करना और मांस खाना राम और कृष्ण के लिए भी दिखाया गया है जिन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है। (वि.सा. 5/482.2)
16. मांस खाना निश्चित तौर पर क्रूरूरतापूर्ण है। इससे कौन इंकार कर सकता है। लेकिन जिन्हें अपनी जिंदगी को चलाने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है। उन्हें मजबूर होकर तो मांस खाना ही पड़ता है। (वि.सा. 5/485.2)
17. पश्चिम में गरीबों का मुख्य भोजन और अमीरों के इलाके में भी गरीबों का मुख्य भोजन डबलरोटी और आलू है। मांस कभी कभी ही खाया जाता है। (वि. सा. 5/492.3)
18. जब तक मिलिटरी की ताकत हुकूमत करेगी। मांसाहार चालू रहेगा। लेकिन विज्ञान के विकास के कारण संघर्ष घटेंगे तब षाकाहार बढ़ेगा। (वि.सा. 7/29.1)
19. मांसाहारी पशु मसलन शेर एक झपट्टा मारता है और फिर खामोश हो जाता है। लेकिन धैर्यवान शाकाहारी बैल पूरे दिन काम करते चलता रहता है। खाता भी है और सोता भी है (वि.सा. 7/28.4)
(बाकी पेज 5 पर)
20. उन्होंंने कभी प्रश्नोत्तर में कहा था कि फल और दूध योगियों के लिए सबसे अच्छा भोजन हैै। (वि.सा. 5/319.4)
21. भोजन के लिए चावल, दाल, चपाती, मछली, सब्जी और दूध मिले तो वह पर्याप्त है। (वि. सा. 5/487.1)
22. उन्होंने वार्तालाप में कहा था कि जब तुम सत्व की स्थिति में आ जाओगे। तब मछली और मांसाहार हर तरह से छोड़ देना। (वि.सा. 5/403.3)
23. सारी पसंदगी मछली और मांस के लिए हवा में उड़ जाती है। जब मनुष्य में सत्व का उदय और विकास होता है। और यह आत्मा के विकास का परिचय है। (वि.सा. 5/ 403.3)
24. आजकल सारे संसार में यह खाना है या वह खाना है का विवाद ही प्रचलित हो गया है। (वि. सा.3/339.3)
25. कोई भी खाद्य मन की पवत्रिता को भ्रष्ट नहीं कर सकता यदि अपने आप को पहचान लेता है। (वि.सा. 4/39501)
26. पुराने जीवन में और आजकल भी यह विवाद जारी है कि पषु मांस आधारित भोजन अच्छा है या बुरा है या केवल शाकाहार पर ही निर्भर रहा जाए। (वि.सा. 5/481.2) (निबन्ध: दी ईस्ट एंड दी वेस्ट)
27. मैंने कई तरह के भोजन बनाने की विधाओं को देखा है। लेकिन उनमें से कोई भी हमारे बंगाल की षानदार भोजन की थालियों का मुकाबला नहीं कर सकती। (वि.सा. 5/490.3) (इसके लिए पुनर्जन्म लेना भी अतिशयोक्ति नहीं है)
28. जैन और बौद्ध किसी भी हालत में मांस और मछली नहीं खाते। (वि.सा. 5/496.2)
सन्यासी अमोघ लीला दास पर इस्कॉन द्वारा एक माह के एकांतवास का बैन लगाना समझ नहीं आया। अमोघ लीला दास को भी अभिव्यक्ति की नागरिक आजादी है। उनसे यह तो कहा जा सकता था कि वे विवेकानन्द के कथित मांसाहार की आदत के चलते तत्कालीन, पारंपरिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और विवेकानन्द की यायावरी से उत्पन्न कठिनाइयों और परिस्थितियों का सम्यक परीक्षण कर वस्तुपरक आकलन करें और फिर अपना स्पष्टीकरण किसी कारण बताओ नोटिस के उत्तर में दे दें। यह इस्कॉन जैसी महत्वपूर्ण संस्था के लिए एक बौद्धिक उपक्रम होता। जिससे उन्होंने जानबूझकर पिंड छुड़ा लिया। महंगे रेशमी वस्त्र पहनकर सात सितारा संस्कृति भोगते अमीरी का धार्मिक प्रचार करते इस्कॉन संस्कृति के प्रवक्ता विश्व के लोकधर्मी यष को समझ भी पाते हैं। इसका भी मुझे भरोसा नहीं है।
बहरहाल खानपान बल्कि धूम्रपान सहित अपनी कई निजी आदतों को सामाजिक संदर्भ में रचकर भी खुद विवेकानन्द ने अपने आप का इतनी बार प्रतिपरीक्षण कर लिया है कि किसी अन्य व्यक्ति को इस संबंध में ज्यादा जांच-परख किए बिना टिप्पणी करना मुनासिब नहीं होगा।


