विचार / लेख

गांधी जीवित होते तो क्या करते !
25-Jul-2023 5:13 PM
गांधी जीवित होते तो क्या करते !

 डॉ. आर.के. पालीवाल

यदि हमने गांधीजी के विविध विषयों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेखों और विभिन्न अवसरों पर दिए गए महत्त्वपूर्ण भाषणों को गहराई से पढ़ा और समझा है तो यह कयास लगाना संभव है कि यदि गांधीजी आज जीवित होते तो भारत और विश्व की वर्तमान परिस्थितियों और प्रमुख समस्याओं से निबटने के लिए वे क्या करते। दूसरे शब्दों में कहें तो गांधी विचार का ठीक से चिंतन मनन करने वाले व्यक्तियों में गांधी की दृष्टि से यह समझ विकसित हो जानी चाहिए कि उन्हें वर्तमान परिदृश्य में किन किन रचनात्मक कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत में गांधी के लिए आज सबसे महत्त्वपूर्ण मणिपुर होता। वे उन इलाकों में नंगे पैर घूमते जहां दंगाईयों की भीड ने दूसरे समुदाय की संपत्ति नष्ट की है और महिलाओं के साथ जघन्यतम हिंसा की है।

गांधी ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि समय और परिस्थितियों के अनुसार मनुष्य के विचार बदलते हैं। यह बदलाव प्रकृति का भी नियम है और मनुष्य जीवन का भी नियम है। उम्र और अनुभव के आधार पर भी हमारे विचार बदलते हैं। गांधीजी के जीवन और विचारों में भी समय के साथ कई अभूतपूर्व बदलाव हुए हैं। इन्हीं बदलावों का परिणाम था कि युवावस्था में अंग्रेजों की तरह पश्चिमी जीवन शैली को अपनाने वाले सूट बूट पहनने और चम्मच छुरी से खाना खाने वाले इंग्लिश जेंटलमैन बैरिस्टर मोहन दास से वे लंगोटी वाला फकीरी जीवन अपनाकर महात्मा गांधी बन गए थे। यह अपने आप में गांधी के व्यक्तित्व और विचारों में अभूतपूर्व बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है।

मुझे भी पूरा विश्वास है कि गांधी आज की ज्वलंत मुद्दों और समस्याओं के समाधान के लिए अपने रचनात्मक कार्यों की प्राथमिकता में भी परिर्वतन करते और समय के अनुसार कुछ नए रचनात्मक कार्यों को भी अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल करते। उदाहरण स्वरूप गांधी के समय हमारे प्राकृतिक परिवेश ज्यादा प्रदूषित नहीं हुए थे,आबो हवा जहरीली नहीं हुई थी , प्रकृति और पर्यावरण में वैसा असंतुलन नहीं था जिसकी वजह से भारत सहित पूरा विश्व मौसम परिर्वतन की दिनोदिन गंभीर होती समस्या से जूझ रहा है। इस दौरान खेती में अंधाधुंध रसायनिक खाद, कीटनाशकों और हर्बिसाइड एवम प्रिजर्वेटिव्स के उपयोग से हमारा तीन समय का भोजन बेहद जहरीला हो गया है। प्राकृतिक असंतुलन एवम जहरीली आबो हवा और भोजन ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हर व्यक्ति प्रभावित हो रहा है और मनुष्य सहित पूरी प्रकृति के स्वास्थय पर गम्भीर खतरा मंडरा रहा है। घर घर में गम्भीर बीमारियों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

जिन दिनों महात्मा गांधी ने खादी को अपने रचनात्मक कार्यों में प्राथमिकता प्रदान की थी उन दिनों देश में कपड़े का भारी संकट था, अधिसंख्य आबादी को कपड़ा नसीब नहीं था। आज हमारे यहां कपड़ा इफरात में है और हम विदेशों को कपड़ा निर्यात कर रहे हैं। आज कपड़े से ज्यादा शुद्ध हवा और शुद्ध पानी की किल्लत है और शुद्ध सात्विक स्वास्थ्य वर्धक भोजन तो दुर्लभ हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ साथ हमारी कचरा संस्कृति के कारण नदियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। एक तरह से हमारा समृद्ध मध्यम वर्ग और प्रबुद्घ समाज भी साफ आबोहवा और शुद्ध जैविक भोजन के लिए तरस रहा है।

जहरीली होती आबो हवा, नाला बनती नदियां, ज़हरीला होता भोजन और बंजर एवम जहरीली होती कृषि भूमि और इन सबके कारण बीमार होती अधिसंख्य आबादी निश्चित रूप से गांधी का सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करती। संभवत: वे खादी से अधिक जोर प्रकृति और पर्यावरण एवम सबके स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए केंद्र में रखते और सरकार को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए बाध्य करते। गांधी विचार और गांधी के रचनात्मक कार्यों में विश्वास करने वाले हम लोगों का यह कर्तव्य बनता है कि गांधी की अनुपस्थिति में हम देश में अमन चैन बनाए रखें और जैविक खेती को केंद्र बिंदु बनाकर ग्राम विकास और राष्ट्र निर्माण में अपना यथा संभव यथाशक्ति योगदान करें।


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