विचार / लेख

कनक तिवारी लिखते हैं-शब्द इंडिया का मर्म भारत
29-Jul-2023 4:46 PM
कनक तिवारी लिखते हैं-शब्द इंडिया का मर्म भारत

देश के सबसे बड़े संयुक्त इंसानी उद्यम की यह भारत कथा है। देश का संविधान लगभग तीन सौ प्रतिनिधियों के तीन साल के लगातार परिश्रम का उत्पाद है। यह पहली और एकमात्र समावेशी राष्ट्रीय किताब है। आगे भी ऐसी किताब के लिखे जाने की संभावना नहीं दिखती। महान विचार के देश में सैकड़ों हजारों विश्वस्तरीय बुद्धिजीवी हुए हैं। उनके लिखे की रोशनी से दुनिया जगमग है। तब लेकिन देश में राजशाही रही है। कई नामचीन हस्ताक्षर राजदरबारों के आश्रय में रहे तो उनसे भी असाधारण कालजयी स्वतंत्र विचारक सूर्य की रोशनी की तरह जिज्ञासा और जिजीविशा के आकाश में सुरक्षित हैं। सदियों की राजनीतिक गुलामी के बाद देश 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ। लोकतांत्रिक सहकारी समाज को चलाने उसे संविधान लिखने की जरूरत महसूस हुई। अब संविधान ही केन्द्रीय किताब है, प्रतिनिधि है और प्रामाणिक है। उसके अनुसार ही देश को हर क्षण चलना है। राज्यसत्ता और नागरिक उसके संगत ही जिरह और बहस कर सकते हैं। उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते।

इक्कीसवीं सदी भारतीय राजनीति के लिए बेहद मुश्किल, परेशानदिमागी की भी है। राजनेता उन पूर्वजों के मुकाबले बौने और बंद दिमाग हैं जिन्होंने देश को आजाद करने अपना निजी और पारिवारिक जीवन बरबाद भी कर दिया। आज राजनीति नेताओं का अधिकारनामा हो गई है। सीढ़ी दर सीढ़ी सत्ता में पहुंचने वाले लोग नीचे गिर गए हैं कि संविधान तक को अपनी हिफाजत करने में तरह तरह की परेशानियां हो रही हैं। राजनीति ने सबसे अच्छे इंसानी मूल्यों को ही तहस-नहस कर दिया है। जनता किसी तरह संविधान के छाते के नीचे खड़ी होकर खुद को सुरक्षित करने के जतन कर रही है। राजनीतिक पार्टियां और हर तरह के नुमाइंदे सेवा, चरित्र और सभ्यता से महरूम होकर ऐसे करतब कर रहे हैं कि लोकतंत्र के भविष्य को ही दहशत हो रही होगी। इंसान की बुनियादी समस्याओं को हल करने के बदले गाल बजाते नेताओं की प्रतियोगिताएं लोग देख रहे हैं। शब्द अपने में गहरे अर्थ समेटे होते हैं। राजनेता अपने कर्तव्य से मुंह चुराकर बस शब्द का कचूमर निकाल रहे हैं। उससे कई तरह की विषमताएं और पेचीदगियां पैदा होती हैं।

फिलवक्त देश के केन्द्र में खुद को संसार की सबसे बड़ी पार्टी कहती दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है। उसके साथ दो तीन दर्जन छोटी मोटी पार्टियां अपने कारणों से गठबंधन में हैं। केन्द्र के निजाम से मुकाबला करने 26 राजनीतिक पार्टियों का जमावड़ा मैदान में एकजुट होकर आया है। सभी पार्टियां 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम को निर्णायक और मुकम्मिल तौर पर अपने पक्ष में कर लेना चाहती हैं। भाजपा की अगुवाई में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस, (राष्ट्रीय गणतांत्रिक गठबंधन) और कांग्रेस की अगुआई में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (अर्थात संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सत्ता में रहा है। कांग्रेसनीत गठबंधन के बदले कांग्रेस सहित 26 पार्टियों का नया गठबंधन ‘इंडिया’ नाम से सामने आया है। अंगरेजी के ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र। शब्द के पहले अक्षरों को मिलाकर ‘इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इंडियन एलायंस’ नामकरण हुआ है। इस चुनौती के कारण सुरक्षित लगते प्रधानमंत्री मोदी ने ‘इंडिया’ शब्द पर ही फिकरा कसा है। मानो दांत में कोई कंकड़ अटक रहा है। भारत पर कभी हुकूमत कर चुकी ईस्ट इंडिया कंपनी और राजनीतिक और आतंकी जमावड़ों जैसे इंडिया मुजाहिदीन के नामों वगैरह के संदर्भों में कटाक्ष करने की कोशिश की गई है। इंडिया नामधारी गठबंधन ने कटाक्ष की उपेक्षा करते कहा है कि हम अपनी राह चलें। हमें मालूम है कि हमारे नाम का अर्थ क्या है।

अंगरेज भारत पर हुकूमत गवर्नमेंट ऑफ  इंडिया एक्ट, 1935 के मुताबिक करते थे। तब ‘इंडिया’ शब्द की परिभाषा अंगरेजी में इस तरह थी"India means British India together with all territories of any Indian Ruler under the suzerainty of His Majesty, all territories under the suzerainty of such an Indian Ruler, the tribal areas, and any other territories, which His Majesty in Council may, from time to time, after ascertaining the views of the Federal Government and the Federal Legislature, declare to be part of India. Again, 'British India' was defined in the same clause as- "British India" means all territories for the time being comprised within the Governors' Provinces and the Chief Commissioners' Provinces.  

 

रतीय संविधान के लिए कई समितियां और उपसमितियां बनाई गईं। उनकी अलग-अलग जिम्मेदारियां थीं। संविधान के अनुच्छेद 1 में भारतीय संघ का नाम और राज्यक्षेत्र का ब्यौरा विचारण में आया। संविधान की उद्देषिका में भी अंगरेजी में ‘इंडिया’और हिन्दी में भारत नाम का अनुवादित शब्द उपयोग में आया। नामकरण वाले अनुच्छेद के लिए डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में बनी प्रारूप समिति की सिफारिश रही कि उसे हिन्दी में लिखा जाए ‘इंडिया अर्थात भारत राज्यों का संघ होगा।’ उसे अंगरेजी में कहा गया ‘इंडिया दैट इज भारत।’ निर्दोष दिखने वाला यह वाक्य लंबी बहस के लिए संविधान सभा की तकरीर में आया। डॉ. अम्बेडकर ने 17 सितम्बर 1949 को अंतिम रूप से नाम को लेकर अपना प्रस्ताव रखा। अगले दिन 18 सितम्बर को उस पर बहस मुबाहिसा होकर नामकरण हो भी गया। बहस शुरू होते ही हरिविष्णु कामथ ने प्रस्ताव किया कि देश को ‘भारत अथवा अंग्रेजी भाषा मेंं इंडिया राज्यों का संघ होगा‘ कहा जाए या ‘हिंद अथवा अंग्रेजी में इण्डिया राज्यों का संघ होगा’ कहा जाए।

कामथ ने अलबत्ता कहा ‘‘भारत में नये गणराज्य को नवजात शिशु समझा जाए। परंपरा है नवजात शिशु का नाम रखा जाता है। जनता का विचार है कि उसका नाम भारत, हिन्दुस्तान, हिन्द, भरतभूमि, भारत वर्ष या ऐसा ही कुछ रखा जाए। ‘संविधान सभा देश के चुनिंदा लगभग 300 प्रतिनिधियों की उच्च अधिकारिता प्राप्त संस्था रही। उसे जातियों और लोगों में चल रही बहस वगैरह के आधार पर अधिकृत तौर पर सुझाव लेने की जरूरत नहीं रही है। इस संबंध में इतिहास में भारत नाम को उल्लेखित करते हरिविष्णु कामथ को भारसाधक सदस्य डॉ. अम्बेडकर ने एक तरह से झिडक़ा। कहा ‘‘क्या इन सब बातों की खोज करना जरूरी है? मैं समझ नहीं पाता कि इसका क्या मकसद है। भले ही वह किसी अन्य संदर्भ में रुचिकर हो सकता है। मुझे तो लगता है कि भारत नाम का शब्द विकल्प के बतौर रखा गया है। ‘कामथ ने उलट जवाब दिया ’1937 में आयरलैन्ड के पारित आयरलैन्ड के संविधान के नामकरण का अनुच्छेद कहता है- ‘राज्य का नाम आयर अथवा अंगरेजी भाषा में आयरलैंड है।’ इस तरह का आंकलन हम क्यों नहीं कर सकते? वैसे भी उदाहरण के लिए जर्मनी के लोग हमारे देश को इंडियेन कहते हैं और यूरोप के कई देश अब भी हिन्दुस्तान कहते हैं। इंडिया अर्थात भारत एक भद्दी पदावली है।

 मैं नहीं समझ पाता हूं कि मसौदा समिति ने ऐसी रचना क्यों की। यह तो मुझे एक संवैधानिक भूल दिखाई देती है।

ऐसे राष्ट्रधर्मी मौके को आदत के अनुरूप हिन्दी के बड़े योद्धा सेठ  गोविन्ददास ने लपका। उन्होंने संवैधानिक जिरह के बदले इतिहास में डूबकर भारत शब्द की महिमा बताने से परहेज नहीं किया। कह दिया कि कुछ लोगों को भ्रम हो गया है कि इंडिया इस देश का सबसे पुराना नाम है, जबकि यह गलत है। सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने तुनककर कहा ‘यह किसने कहा कि इंडिया सबसे पुराना नाम है?’ गोविन्ददास ने कहा कि एक पर्चा निकला है जिसमें यही सिद्ध करने की कोशिश की गई है। महावीर त्यागी ने टोका क्या इंडिया शब्द अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का है? तो गोविन्ददास ने कहा ‘‘यह यूनानियों के कारण है। वे जब भारत आए तो सिंधु नदी की सरहद पर उन्होंने उसका नाम इंडस रखा और सिंधु के पार के क्षेत्र को इंडिया कहा। उन्होंने बताया यह बात एनसाइक्लोपीडिया ऑफ  ब्रिटेनिका में भी लिखी है। चीनी यात्री हुएनत्सांग ने भी भारत विवरण में भारत शब्द लिखा है। ‘सिकंदर तो ईसा मसीह के तीन सौ बरस पहले आया था। वह भारत फतह तो नहीं कर पाया लेकिन यूनानियों के शब्द-उच्चारण ने भारत का ‘इंडिया’ नामकरण कर दिया। ऐसा लोग मानते हैं। विवेकानन्द ने भी इस थ्योरी का समर्थन किया है। राष्ट्रभक्ति में उन्मादित होकर गोविन्ददास बोलने लगे ‘हमें अपने देष के इतिहास और संस्कृति के अनुरूप ही देश का नाम रखना चाहिए। आजादी की लड़ाई महात्मा गांधी की अगुआई में हमने लड़ी। तब भी हमने भारत माता की जय के नारे लगाए थे। ‘वैसे यह बात अलग है कि महात्मा गांधी ने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान जैसे शब्दों का ठीक ठीक और सार्थक संदर्भो में इस्तेमाल किया है। गांधी तो भारत शब्द का इस्तेमाल कभी-कभार करते थे। हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, हिन्दुस्तानी सभा, हिन्दुस्तान सेवादल, हिन्दुस्तानी तमिल संघ, हिन्दुस्तान मजदूर सेवक संघ वगैरह गांधी से जुड़ते हैं। गोविन्ददास ने दार्शनिक अंदाज में कहा ‘मुझे विश्वास है जब हमारा संविधान हमारी राष्ट्रभाषा में बनेगा, उस समय यही भारत नाम यथार्थ स्थान प्राप्त करेगा।‘ संविधान में लेकिन राष्ट्रभाषा का जन्म तक नहीं हो पाया। 

मद्रास के प्रतिनिधि कल्लूरी सुब्बाराव भारत शब्द विवाद को लेकर ऋग्वेद तक पहुंचे। उन्होंने माना कि यूनानियों के कारण सिंधु को इंडस कहा गया। इसलिए यह भी कहा हम अब पाकिस्तान को हिन्दुस्तान कह सकते हैं क्योंकि सिंधु नदी तो अब वहां पर है। अम्बेडकर ऐसी बहस से बार-बार उकता रहे थे। उन्होंने कहा अभी तक तय नहीं हुआ है कि देश का नाम क्या हो। पहली बार यहां वाद-विवाद हो रहा है। देशी राज्यों के प्रतिनिधि रामसहाय ने कहा हमारे ग्वालियर, इंदौर और मालवा की तमाम रियासतों ने मिलाकर अप्रेल 1948 में अपनी यूनियन का नाम मध्यभारत रख लिया है। खुशी की बात है कि पूरे देश का नाम भारत रखा जा रहा है। फिर वे भी इतिहास की परतें खोलने लगे और खासतौर पर धार्मिक किताबों की। जाहिर है वहां बार-बार भारत शब्द का इस्तेमाल अलग संदर्भ में हुआ है। संविधान सभा में कई कांग्रेसी सदस्य अपने बोलचाल, डीलडौल और पोषाक को लेकर पांडित्यपूर्ण लगते रहे। उनमें कमलापति त्रिपाठी भी हैं। उन्होंने तर्क किया ‘जब कोई देश पराधीन होता है। तब वह अपना सब कुछ खो देता है। एक हजार वर्ष की पराधीनता में भारत ने भी संस्कृति, इतिहास, सम्मान, मनुष्यता, गौरव, आत्मा और शायद अपना स्वरूप और नाम भी खो दिया है। आजाद होने के कारण यह देश यह सब हासिल करेगा।’ उन्होंने कई उल्लेख वेदों, उपनिषदों, कृष्ण और राम के संदर्भ में भी किए जिनका संविधान की जिरह से लेना देना भले ना रहा हो, लेकिन एक राष्ट्रवादी माहौल तैयार करने में ऐसे नामों और विशेषणों का उल्लेख करने की परंपरा विकसित होती रही है। अम्बेडकर फिर झल्लाए और उन्होंने पूछा कि क्या यह सब कहना जरूरी है? उत्तरप्रदेश के हरगोविन्द पंत ने सबसे ज्यादा सपाट और सीधी बात की। उन्होंने भारत षब्द को विकल्पहीन कहते सलाह दी कि क्यों नहीं इस देश के नाम के लिए भारत षब्द को ही ग्रहण कर लिया जाता। उन्होंने कहा इंडिया नाम के शब्द से न जाने क्यों हमारी ममता हो गई है। यह नाम तो हमें विदेशियों ने दिया है। वे हमारे देश का वैभव सुनकर हम पर हमला करने आए थे। विदेशियों ने यह नाम हमारे ऊपर थोपा है।

संविधान सभा में नाम को लेकर खासा विवाद हुआ है। अब दिखता है कि उस वक्त के कद्दावर काठी के नेता नामकरण विवाद से खुद को अलग रख चुके थे। बहस में जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, के. एम. मुंशी, अलादि कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आयंगर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मौलाना आजाद, जगजीवन राम, पुरुषोत्तमदास टंडन, गोविन्द वल्लभ पंत वगैरह की कोई भूमिका नहीं रही। बी. एम. गुप्ते ने द्विअर्थी बात कह दी कि मैं भारत नाम का तो समर्थन करता हूं लेकिन उसे स्वीकार करने से तमाम तरह की पेचीदगियां और विषममताएं भी पैदा होंगी। डॉ. अम्बेडकर ने फिर स्पष्ट किया कि सरकारी प्रस्ताव यही है कि देश का नाम इंडिया अर्थात भारत होगा। भारत शब्द को इंडिया के साथ संलग्न कर रखा जाए अथवा नहीं? उसके बरक्स प्रस्ताव से अलग जाकर भारत शब्द की शाब्दिक, फलित, ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक महत्ताओं पर विस्तृत शोध की जरूरत नहीं है।

संविधान सभा में एक बात खास रही। वह अब भी भारतीय राजनीति में मुख्य है। कैसी भी तकरीर हो। उसे सत्ताधारी दल खारिज करना चाहता है, तो उसमें कोई रोक टोक नहीं है। अम्बेडकर गैरकांग्रेसी सदस्य थे। मुख्यत: गांधीजी की सलाह के कारण नेहरू और पटेल ने उन्हें न केवल निर्वाचित किया बल्कि सबसे महत्वपूर्ण प्रारूप समिति का अध्यक्ष भी बनाया। अम्बेडकर उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। उन्होंंने संविधान को मुकम्मिल तौर पर बनाने के लिए बहुत परिश्रम किया है। कुछ महत्वपूर्ण सदस्यों की राय से अम्बेडकर का इत्तफाक नहीं होता था। उन्होंने अमूमन ऐसे प्रस्तावों को नेहरू के कारण कांग्रेसी बहुमत उपलब्ध होने से बार-बार खारिज कराया। उसका खमियाजा देश आज भुगत रहा है। इन विपरीत हालातों में भी समाजवादी तेवर के हरिविष्णु कामथ ने मत विभाजन की मांग की। अन्यथा प्रस्ताव मौखिक रूप से ही खारिज हो जाता। ऐसा राज्यसभा के मौजूदा उपसभापति हरिवंष ने लगभग पराजित होते एक सरकारी प्रस्ताव को ध्वनि मत से पारित करने का ऐलान तो किया है। उससे देश की राजनीति में भूचाल आ गया। कामथ का प्रस्ताव संविधान सभा की कार्यवाही में किसी गैर सरकारी प्रस्ताव में सबसे अधिक समर्थन जुटा पाया। वह 38 के मुकाबले 51 मतों से खारिज किया गया।

उल्लेखनीय है कि उपेन्द्रनाथ बर्मन नाम के सदस्य ने संविधान की उद्देशिका पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जरूर कहा था कि संविधान के पूरे ड्राफ्ट में जहां जहां इंडिया शब्द आया है। वहां-वहां उसको हटाकर भारत वर्ष लिखा जाए। हालंाकि यह बात नहीं मानी गई। यह भी है कि नामकरण संबंधी मूल प्रस्ताव जब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा की बहस के लिए 15 नवंबर 1948 को पेश किया था। तब सबसे पहले अनंत शयनम आयंगर ने कहा था कि इंडिया के बदले भारत, भारत वर्ष या हिन्दुस्तान शब्द रखा जाए। लेकिन संविधान सभा में अंतिम बहस होने के दिन आयंगर बिल्कुल नहीं बोले।

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नामकरण संवाद को लेकर चुप्पी साधे रहे। लेकिन पंचायती राज को लेकर उन्होंने अध्यक्ष की हैसियत में संविधान सभा के सलाहकार बी.एन. राव को आग्रह का पत्र तो लिखा था। लोकतंत्र में एक विशेष लक्षण कई बार मुनासिब फैसले करने से रोक देता है। वह है बहुमत का सिद्धांत। अम्बेडकर  को इसका बहुत फायदा मिला। उन्होंने अपने आखिरी भाषण में 25 नवंबर 1949 को कहा था कि कांग्रेसी सदस्यों के बहुमत के कारण वे असुविधाजनक स्थिति में नहीं होते थे क्योंकि बहुमत उनके साथ होता था। नामकरण विषय भी 15 नवंबर 1948 को विचारण में आया। तब गोविन्दवल्लभ पंत ने उस पर वाद-विवाद को मुल्तवी करने का आग्रह किया जिससे सदस्य एक राय हो सकें। लेकिन हुआ कहां। 18 सितंबर 1949 को एक राय होने के बदले मत विभाजन में अम्बेडकर के प्रस्ताव के ही खिलाफ  काफी वोट पड़े। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 545 के सदन में करीब 415 सदस्यों का समर्थन था। फिर भी उन्होंने कई प्रस्तावों मसलन दलबदल विरोधी विधेयक तक को सर्वसम्मति से पास कराया। लोकतंत्र में बहुमत कई बार नैतिक मूल्यों को पराजित भी करता है। इस जुगत में तो नरेन्द्र मोदी माहिर हैं। कई बार उनका साथ सुप्रीम कोर्ट भी देता है। दोनों स्थितियों में लोकतंत्र की पराजय होती है। नरेन्द्र मोदी तो संवैधानिक संस्थाओं की ही पराजय कर रहे हैं। उनके लिए संसद खुशामदखोरी का जमावड़ा हो जाए। तो वे भारत के इतिहास में अमर हो जाएंगे। इंडिया षब्द के मौजूदा विपक्षी पार्टियों के साथ जुडऩे का एक पक्ष और है। संविधान के अनुच्छेद 51 क से सभी राजनीतिक दल सहमत हैं। इसके बरक्स भाजपा संघ और समर्थक जमावड़े को भारत की सामासिक संस्कृति, सर्वधर्म समभाव और वैज्ञानिक भाव बोध से गहरा परहेज है। अंगरेजी का इंडिया षब्द अपनाने से दक्षिण भारत के अहिन्दी भाषी राज्यों में विपक्षी पार्टियों को समर्थन मिलने की बेहतर उम्मीद होगी। यह भी संघ भाजपा युति को तकलीफदेह अनुभव हो रहा होगा क्योंकि दक्षिण में उनकी पैठ नहीं बन पाती है। 


अन्य पोस्ट