विचार/लेख
विवेक बाझल
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य की धार ऐसी है कि वक्त बीतने के साथ और तीखी हो रही है।
उनके अलग-अलग व्यंग्य लेखों से 20 लाइनें आपके समक्ष रखी हैं, मिर्ची से भी तीखी लगेंगी।
लडक़ों को, ईमानदार बाप निकम्मा लगता है।
दिवस कमजोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस। कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता।
व्यस्त आदमी को अपना काम करने में जितनी अक्ल की जरूरत पड़ती है, उससे ज्यादा अक्ल बेकार आदमी को समय काटने में लगती है।
जिनकी हैसियत है वे एक से भी ज्यादा बाप रखते हैं। एक घर में, एक दफ्तर में, एक-दो बाजार में, एक-एक हर राजनीतिक दल में।
आत्मविश्वास कई प्रकार का होता है, धन का, बल का, ज्ञान का। लेकिन मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि होता है।
सबसे निरर्थक आंदोलन भ्रष्टाचार के विरोध का आंदोलन होता है। एक प्रकार का यह मनोरंजन है जो राजनीतिक पार्टी कभी-कभी खेल लेती है, जैसे कबड्डी का मैच।
रोज विधानसभा के बाहर एक बोर्ड पर ‘आज का बाजार भाव’ लिखा रहे। साथ ही उन विधायकों की सूची चिपकी रहे जो बिकने को तैयार हैं। इससे खरीददार को भी सुविधा होगी और माल को भी।
हमारे लोकतंत्र की यह ट्रेजेडी और कॉमेडी है कि कई लोग जिन्हें आजन्म जेलखाने में रहना चाहिए वे जिन्दगी भर संसद या विधानसभा में बैठते हैं।
विचार जब लुप्त हो जाता है, या विचार प्रकट करने में बाधा होती है, या किसी के विरोध से भय लगने लगता है। तब तर्क का स्थान हुल्लड़ या गुंडागर्दी ले लेती है।
धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन महाजन कहा गया होगा, उस दिन ही मनुष्यता की हार हो गई ।
हम मानसिक रूप से दोगले नहीं तिगले हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूंजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं।
फासिस्ट संगठन की विशेषता होती है कि दिमाग सिर्फ नेता के पास होता है, बाकी सब कार्यकर्ताओं के पास सिर्फ शरीर होता है।
बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है।
दुनिया में भाषा, अभिव्यक्ति के काम आती है। इस देश में दंगे के काम आती है।
जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाए, तब समझो कि जनतंत्र बढिय़ा चल रहा है।
जो पानी छानकर पीते हैं, वो आदमी का खून बिना छाने पी जाते हैं।
सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।
नारी-मुक्ति के इतिहास में यह वाक्य अमर रहेगा कि ‘एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।’
एक बार कचहरी चढ़ जाने के बाद सबसे बड़ा काम है, अपने ही वकील से अपनी रक्षा करना।
दिनेश श्रीनेत
जीवन के सबसे खूबसूरत अध्याय वे होते हैं, जिनमें आप लंबे अंतराल बाद अपने पुराने साथियों से मिलते रहते हैं। वक्त उनकी शख्सियत पर अपने निशान छोड़ता जाता है। वे आपके लिए एक ही वक्त में नए भी होते हैं और पुराने भी। थोड़े अजनबी और थोड़े चिर-परिचित। आप दोनों के पास बार-बार याद करने के लिए कुछ साझा कहानियां होती हैं और बहुत कुछ एक-दूसरे को सुनने के लिए भी होता है।
ऐसे साथी, ऐसे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। जब मिलते हैं तो मन में आश्वस्ति होती है। हमें जीवन उतना एब्सर्ड नहीं लगता, जितना कि वह सचमुच में है। क्योंकि इस निरर्थक से जीवन में भी एक कहानी है। बीज से पुष्प बनने की भी एक कहानी है। हमें कहानियां संतोष देती हैं।
सामने बैठा शख्स सिर्फ इसलिए अहम नहीं है क्योंकि उसमें कुछ खास है, वह इसलिए भी अहम है क्योंकि उसके भीतर आप भी थोड़ा सा रह गए हैं। हमें उनसे दोबारा मिलना हमेशा सुखद लगता है जिनके भीतर हम रह जाते हैं। हम यानी वो जो समय के प्रवाह में कहीं पीछे छूट गया। जैसे अपनी ही 10-12 साल पुरानी लिखावट देखकर मन में खयाल आता है कि क्या ये हम ही थे, जिसने रोशनाई से सादे कागज पर ये शब्द उकेरे थे।
स्मृतियों के रूप में सहेजी गई चीजें यही सुकून देती हैं। छूट गई चीजें आपस में जुडक़र हमारी ही कहानी तो बयां करती हैं। छूट गए लोग अपनी कहानी में हमारी कहानी भी तो शामिल कर लेते हैं। तभी तो वे कह उठते हैं, ‘तुम जब पहली बार कोट पहनकर आए थे तो लगा था कि कोट को हैंगर में टांग दिया गया है...’ और ठहाका लगाते हैं।
वो बताते हैं कि दरअसल उनके भीतर आपकी वो छवि है जो समय की नदी में बहती हुई कहीं बहुत पीछे छूट गई है, मगर उनके भीतर उस नदी का पानी अभी भी मौजूद है। और बरसों पहले नदी की सतह पर हिलता हुआ आपका प्रतिबिंब खत्म नहीं हुआ है, छूटा नहीं है, खो नहीं गया...जिंदा है, उनके भीतर। और आप ये बात समझ जाते हैं कि भले वक्त आपको मिटा देगा और आप राख बनकर हवा और मिट्टी में खो जाएंगे, मगर जाने कितने लोगों के भीतर उनकी कहानी बनकर जीवित रहेंगे।
स्मृति-विहीन जीवन एक दु:स्वप्न है, और स्मृतियों के बोझ से दबा हुआ जीवन एक पीड़ा है। अच्छा ही हो कि जो नया है और जो अतीत बन गया है, दोनों की आवाजाही होती रहे। बर्गमैन की फिल्म ‘वाइल्ड स्ट्रॉबेरीज’ की तरह आप किसी खिडक़ी से झांकें और खुद को खाने की मेज पर देखें। अपने वर्तमान में अतीत की प्रतिध्वनियां सुन सकें।
अगली बार जब बहुत अरसा बीत जाने पर किसी दोस्त से मिलें तो गौर करें कि उसके व्यक्तित्व की कौन सी चीज आज भी समय की स्लेट से मिटी नहीं है। उसकी आँखें, उसके हँसने का तरीका या कोई बहुत छोटी सी बात। जैसे उसके चम्मच उठाने का अंदाज़। आप पाएंगे कि आज वह जो है उसकी शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी। कुदरत ने उसकी कहानी लिख रखी थी।
ठीक वैसे ही जैसे आपकी कहानी लिखी जा चुकी है। ठीक वैसे जैसे हम एक-दूसरे की कहानियों में शामिल हैं। और किसी अध्याय की तरह हमारी उनकी कहानियों की टकराहट होती है। पुराने प्रिय साथियों से मिलते रहें, उनसे मिलना खुद से मिलने जैसा है, नहीं तो ऐसे ही खो जाएंगे।
अपूर्व गर्ग
बंगाली दुर्गा पूजा में जब भोग बँटता है तो कतार लग जाती है। प्रसाद के तौर के अलावा लोग इसके स्वाद के भी दीवाने होते हैं।
ये भोग खिचड़ी का होता है। मेरे एक मित्र जो वेज खाने के शौकीन नहीं हैं वो सिर्फ प्रसाद के तौर पर लाइन में लगते हैं तो कई ऐसे हैं जो इसके स्वाद के भी दीवाने हैं।
शायद हजारों लोगों के लिए जिस ढंग से बनती है वो स्वाद घर की खिचड़ी के स्वाद से कहीं अलग होता है।
पूजा का माहौल ही अलग होता है। भोग खिचड़ी खाते -मिलते लोग जिस तरह ‘घी-खिचड़ी’ होते हैं, उसकी बात ही क्या।
हमारी एक ऑन्टी ऐसी शानदार खिचड़ी बनाती थीं कि मसाले और घी की महक के बाद लोग सीधे खाने को उतावले हो जाते।
देर होती तो सब चीखते क्या बीरबल की खिचड़ी पक रही और बनते ही जब लोग टूटते तो वो उस कहावत की याद
दिलातीं ‘खीरां आई खिचड़ी अर टिल्लो आयो टच्च यानि जब खिचड़ी पक गई तो टिल्ला खाने के लिए झट से आ गया’
खैर, खिचड़ी को लेकर बहुत बातें हैं , कहावतें हैं, विप्लव है। बल्कि ‘खिचड़ी विप्लव’ का इतिहास ही है!
वैसे बाबा नागार्जुन जब हमारे घर आये थे उससे पहले उनका ‘खिचड़ी विप्लव देखा मैंने’ आ चुका था, उन्हें जो पसंद था, वो खिलाया वो खिचड़ी नहीं थी।
कुछ खिचड़ी नापसंद भी होते हैं । खिचड़ी नाम सुनते ही उनका मुँह करेले सा हो जाता है और गला अंदर तक नीम।
सुनिए, राहुल सांकृत्यायन को खिचड़ी बचपन से ही पसंद न थी। बाल्यावस्था के बाद जब भी राहुल जी घर छोडक़र भागे तो शायद नापसंदगी के बावजूद खिचड़ी भी उनके साथ-साथ चलती रही।
जब वे हरिद्वार से सीधे बद्रीनाथ के रास्ते पर थे तो थक जाने पर उनके बचपन केसाठी यागेश कहते-‘भैया बना न लें।’ राहुल जी कहते सुनते ही मेरे तन -बदन में आग लग जाती। बालपन के शत्रुभोजनों में खिचड़ी का स्थान अभी ज्यों का त्यों था और वे यागेश को डाँट देते। कहते ‘यागेश मुझे चिढ़ाने के लिए वैसा नहीं कहते हैं। खिचड़ी बनने में कम मेहनत और जल्दी होती है-इसी ख्याल से उनका यह प्रस्ताव होता।’
ऐसे ही राहुल जी जब दक्षिण में तिरुमीशी के मठ में थे उनसे रात को कहा गया ‘चलो, गोष्ठी में, पुंगल प्रसाद ग्रहण करने।
राहुल जी लिखते हैं-‘गोष्ठी से तो मैंने अंदाज़ लगा लिया- कई आदमियों का एक जगह एकत्रित होना। किन्तु पुंगल सुनकर मुझे ख़्याल आया कोई महार्घ पकवान होगा।
खिडक़ी झरोखा न रहने के कारण दिन में भी अँधेरा रहता था।...मधुर स्वर में कोई मुरली बजा रहा था। पुजारी पीतल के बर्तनों से निकाल-निकालकर हाथ में चार-पांच आंवले के बराबर कोई चीज डालता जा रहा था।...मेरे हाथ में भी ‘पुंगल’ पड़ा । बड़े उत्साह के साथ मुँह में डाला, देखा तो खिचड़ी -हाँ वही खिचड़ी जिस खिचड़ी के खाने की बात कहने पर यागेश को कितनी ही बार बात सुननी पड़ती थी ।
मैंने धीरे से हरिनारायणचारी की ओर घूमकर कहा-‘खिचड़ी! यही पुंगल!!! वहां से लौटते वक्त हरिनारायण जी ने एक घटना सुनाई-
‘बलिया जिले के नए बने दो अचारी बाप-बेटे तीरथ करने दक्षिणापथ आये।
इसी तरह गोष्ठी में वो भी बड़े उत्साह के साथ पुंगलप्रसाद के लिए बैठे। आपकी तरह हाथ के पुंगल को मुँह में डाला, तो लडक़ा चिल्ला उठा -‘अरे खिचड़ी है, हे बाबूजी , ससुर ने पुंगल कह के जाति ले ली।’
-अपूर्व गर्ग
बंगाली दुर्गा पूजा में जब भोग बँटता है तो कतार लग जाती है. प्रसाद के तौर के अलावा लोग इसके स्वाद के भी दीवाने होते हैं .
ये भोग खिचड़ी का होता है . मेरे एक मित्र जो वेज खाने के शौक़ीन नहीं हैं वो सिर्फ़ प्रसाद के तौर पर लाइन में लगते हैं तो कई ऐसे हैं जो इसके स्वाद के भी दीवाने हैं .
शायद हज़ारों लोगों के लिए जिस ढंग से बनती है वो स्वाद घर की खिचड़ी के स्वाद से कहीं अलग होता है .
पूजा का माहौल ही अलग होता है . भोग खिचड़ी खाते -मिलते लोग जिस तरह 'घी -खिचड़ी' होते हैं , उसकी बात ही क्या .
हमारी एक ऑन्टी ऐसी शानदार खिचड़ी बनाती थीं कि मसाले और घी की महक़ के बाद लोग सीधे खाने को उतावले हो जाते .
देर होती तो सब चीखते क्या बीरबल की खिचड़ी पक रही और बनते ही जब लोग टूटते तो वो उस कहावत की याद
दिलातीं 'खीरां आई खिचड़ी अर टिल्लो आयो टच्च यानि जब खिचड़ी पक गयी तो टिल्ला खाने के लिए झट से आ गया '
ख़ैर , खिचड़ी को लेकर बहुत बातें हैं , कहावतें हैं , विप्लव है ..बल्कि 'खिचड़ी विप्लव ' का इतिहास ही है !
वैसे बाबा नागार्जुन जब हमारे घर आये थे उससे पहले उनका 'खिचड़ी विप्लव देखा मैंने ' आ चुका था , उन्हें जो पसंद था , वो खिलाया वो खिचड़ी नहीं थी ..
कुछ खिचड़ी नापसंद भी होते हैं . खिचड़ी नाम सुनते ही उनका मुँह करेले सा हो जाता है और गला अंदर तक नीम .
सुनिए , राहुल सांकृत्यायन को खिचड़ी बचपन से ही पसंद न थी . बाल्यावस्था के बाद जब भी राहुल जी घर छोड़ कर
भागे तो शायद नापसंदगी के बावजूद खिचड़ी भी उनके साथ -साथ चलती रही .
जब वे हरिद्वार से सीधे बद्रीनाथ के रास्ते पर थे तो थक जाने पर उनके बचपन केसाठी यागेश कहते -'' भैया बना न लें .'' राहुल जी कहते सुनते ही मेरे तन -बदन में आग लग जाती .बालपन के शत्रुभोजनों में खिचड़ी का स्थान अभी ज्यों का त्यों था और वे यागेश को डाँट देते .कहते ' यागेश मुझे चिढ़ाने के लिए वैसा नहीं कहते हैं .खिचड़ी बनने में कम मेहनत और जल्दी होती है -इसी ख्याल से उनका यह प्रस्ताव होता ..'
ऐसे ही राहुल जी जब दक्षिण में तिरुमीशी के मठ में थे उनसे रात को कहा गया 'चलो ,गोष्ठी में , पुंगल प्रसाद ग्रहण करने .
राहुल जी लिखते हैं -'' गोष्ठी से तो मैंने अंदाज़ लगा लिया - कई आदमियों का एक जगह एकत्रित होना . किन्तु पुंगल सुनकर मुझे ख़्याल आया कोई महार्घ पकवान होगा ...
खिड़की झरोखा न रहने के कारण दिन में भी अँधेरा रहता था ...मधुर स्वर में कोई मुरली बजा रहा था . पुजारी पीतल के बर्तनों से निकाल -निकाल कर हाथ में चार -पांच आंवले के बराबर कोई चीज डालता जा रहा था .....मेरे हाथ में भी 'पुंगल' पड़ा . बड़े उत्साह के साथ मुँह में डाला , देखा तो खिचड़ी -हाँ वही खिचड़ी जिस खिचड़ी के खाने की बात कहने पर यागेश को कितनी ही बार बात सुननी पड़ती थी.
मैंने धीरे से हरिनारायणचारी की ओर घूम कर कहा -'खिचड़ी ! यही पुंगल !!!वहां से लौटते वक़्त हरिनारायण जी ने एक घटना सुनाई -
'बलिया जिले के नए बने दो अचारी बाप-बेटे तीरथ करने दक्षिणापथ आये .
इसी तरह गोष्ठी में वो भी बड़े उत्साह के साथ पुंगलप्रसाद के लिए बैठे . आपकी तरह हाथ के पुंगल को मुँह में डाला , तो लड़का चिल्ला उठा -'अरे खिचड़ी है ,हे बाबूजी , ससुर ने पुंगल कह के जाति ले ली .''
डॉ. आर.के.पालीवाल
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में पिछ्ले सत्तर साल से हर साल नौ अगस्त को आज़ादी के आंदोलन के महत्त्वपूर्ण उदघोष ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ की स्मृति में शांति मार्च का आयोजन किया जाता है। इस शांति मार्च की शुरुआत 1952 में स्वाधीनता सेनानी डॉ जी जी पारेख और मधु दंडवते की अगुवाई में हुई थी जिसमें मुंबई और महाराष्ट्र के शांति और सौहार्द पसंद करने वाले सर्वोदय और समाजवाद में आस्थावान नागरिक शिरकत करते रहे हैं। इस वर्ष महाराष्ट्र सरकार ने कानून और व्यवस्था को खतरा बताकर शांति मार्च की अनुमति नहीं दी। सरकार और प्रशासन के इस अलोकतांत्रिक रवैए के विरोध में देश भर में प्रमुख मीडिया सहित गांधी की सत्य, अहिंसा और शांति आधारित सह अस्तित्व की विचार धारा में आस्था रखने वाले प्रबुद्ध समाज में आक्रोश है । इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की सोसल मीडिया सहित चौतरफा निंदा हो रही है। अपने समाजसेवी जीवन के सौवें वर्ष की दहलीज पर खड़े डॉ जी जी पारेख, महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी और सर्वोदय विचारधारा को मानने वाली विशिष्ट विभूतियों को पुलिस ने उनके घरों पर डिटेन कर इस आयोजन में शिरकत करने से रोक दिया था। शांति मार्च रोकने के पीछे यह कारण भी बताया जा रहा है कि जहां यह शांति मार्च समाप्त होना था वहां मुख्यमंत्री का कोई आयोजन होना था इसलिए शांति मार्च की अनुमति नहीं दी गई।
इस घटना से यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार और प्रशासन को शांति खतरनाक लगती है! क्या सरकार को गांधी की शांति, अहिंसा, सर्व धर्म समभाव और सांप्रदायिक सौहार्द की विचार धारा खतरनाक लगती है ! या प्रशासन को ऐसी विशिष्ट विभूतियों से खतरा लगता है जो इस देश में शांति के विश्व दूत महात्मा गांधी की विचारधारा को भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं!ऐसा लगता है कि सरकार और सरकार की कठपुतली बन चुका प्रशासन उपरोक्त तीनों से डरते हैं। शांति मार्च को अनुमति नहीं मिलना इस संदर्भ में और भी पीड़ादायक हो जाता है कि नूंह जैसे संवेदनशील इलाके में विश्व हिंदू परिषद द्वारा आहूत उस धार्मिक यात्रा की अनुमति बहुत आसानी से मिल जाती है जिसके लिए विवादित गौ रक्षक मोनू मानेसर सार्वजनिक अपील करता है, जिसकी वजह से पूरे इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैलता है और जिसकी अंतिम परिणति कई इंसानों की जान जाने और न जाने कितने निर्दोष लोगों की कितनी ही संपत्ति नष्ट होने में हुई है और जिसकी वजह से दो समुदायों के बीच मौजूद दरार बहुत बडी खाई के रुप में परिवर्तित हो गई है।
नौ अगस्त भारत की आज़ादी के उस इतिहास का अत्यन्त महत्वपूर्ण दिन है जिस आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष इन दिनों मनाया जा रहा है। हर वर्ष आयोजित होने वाले अमृत महोत्सव वर्ष में तो इसे और ज़ोर शोर से वैसे ही मनाया जाना चाहिए था जैसे योग महोत्सव मनाने में सरकार दिल खोलकर जुड़ती है।जिस आयोजन में शतायु के आसपास पहुंच रहे स्वाधीनता सेनानी और इस उम्र में भी पूरी सक्रियता से विविध रचनात्मक कार्यों में जुटे समाजसेवी श्रद्धेय डॉ जी जी पारेख शिरकत कर रहे थे, जिस शांति यात्रा में उस महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी शामिल हो रहे थे जिनकी स्मृतियों को ताजा रखने के लिए इस शांति यात्रा का आयोजन किया जा रहा था, उस शांति मार्च को रोकने का कोई औचित्य समझ के बाहर है।सरकार और सरकार की कठपुतली बन चुके पुलिस प्रशासन यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आम नागारिक और उनकी संस्थाएं उनके गैर कानूनी निर्णयों के खिलाफ उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जाने में सक्षम नहीं हैं इसलिए वे सरकार को खुश करने के लिए मनमाने अलोकतांत्रिक निर्णय करते हैं। आजाद देश में शांति मार्च से परहेज निश्चित रूप से बहुत निंदनीय है। यह तब और भी निंदनीय हो जाता है जब सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि सरकार नफरत फ़ैलाने वाले भाषणों और क्रियाकलापों को रोकने में विफल रही है।
पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था, कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें...
पढ़ाई का तनाव हमने पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था। पुस्तक के बीच पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास था।
कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था..
हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बांधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था..
माता-पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फि़क्र नहीं थी.. न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी.. सालों साल बीत जाते पर माता-पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।
एक दोस्त को साइकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापे हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं।
स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नहीं थे कि ईगो होता क्या है ?
पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,‘पीटने वाला और पिटने वाला दोनो खुश थे,’ पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे , पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुआ..
हम अपने माता-पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें ‘आई लव यू’ कहना नहीं आता था..
आज हम गिरते-सम्भलते , संघर्ष करते दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं , कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं..
हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनिया में थे..
कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे..
अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जी कर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं..
हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए..
‘एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे।’
क्या आप भी इन पुरानी यादों के साथ गुजरे हैं ?
(अज्ञात, फेसबुक से)
पुष्य मित्र
राकेश कुमार सिन्हा। यही इनका नाम है। एक अवकाश प्राप्त लाइब्रेरियन। जब मैं नवोदय विद्यालय पूर्णिया में पढ़ता था तो आप मेरे स्कूल में लाइब्रेरियन हुआ करते थे। मैं छठी कक्षा में था तो आपने मेरा परिचय प्रेमचंद से कराया। मैंने प्रेमचंद के सारे उपन्यास और मानसरोवर के सारे खंड पढ़ डाले। अपनी लाइब्रेरी के एक कोने में नेहरू की किताबें भारत एक खोज और डिस्कवरी ऑफ इंडिया दिखाई। मैने उन्हे पढ़ लिया। आपने कहा संस्कृति के चार अध्याय भी पढ़ लो।
मैं अक्सर क्लास के बाद लाइब्रेरी चला जाता। आप मेरे लिए किताबें छांटकर रखते। मैं उन्हें पढ़ लेता। किताबें पढऩे का मुझे शौक पहले भी था। मगर घर में एक स्टूडेंट के लिए कथा कहानी, उपन्यास वगैरह पढऩा ठीक नहीं माना जाता था। हम चोरी-छिपे पढ़ते थे। आपने पहली दफा यह बताया कि ऐसी किताबें पढऩा अपराध नहीं है, अच्छा काम है। फिर तो लत लग गई। बारहवीं के बाद नवोदय से निकला और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए दिल्ली भेजा गया था वहां की एक लाइब्रेरी में मेरे मामा ने नाम लिखा दिया। उन्होंने कहा, किताबें क्यों खरीदोगे, यहीं से ले आया करना।
मगर दिल्ली के इंदरपुरी के बोहरिया वाला थल्ला पुस्तकालय से मैंने फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ की किताबें कम, मंटो और जोगिंदर पाल और कृशन चंदर की किताबें अधिक इश्यू कराया। इंजीनियर बन नहीं पाया, पत्रकारिता विवि में जरूर पहुंच गया। खैर यह अलग कहानी है।
आज सर से मिलने इनके घर गया था। पटना के अनीसाबाद में इनका अपना घर है। हालांकि पटना में कम रहते हैं। ज्यादातर बेटों के पास रहते हैं। खबर मिली थी कि इन दिनों पटना में हैं, और आज अखबार में पढ़ा कि नेशनल लाइब्रेरियन डे भी है। तो सहज ही सर की याद आ गई।
वैसे, मैं इनका जो भी परिचय लिख रहा हूं, वह काफी कम है। इनके शिष्यों में आज कई जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक हैं। सबा करीम जैसे क्रिकेटर हैं। ये सभी लोग अक्सर इन्हें याद करते हैं और इनसे मिलने आते हैं।
मगर यह भी इनका असली परिचय नहीं है। इनका असली परिचय वे छात्र हैं जो आज सिर्फ इनकी वजह से अपने जीवन में कुछ कर पाए हैं। अगर सिन्हा सर नहीं होते तो उनमें से ज्यादातर कहीं मजदूरी या छोटी मोटी नौकरी कर रहे होते। नाम लेना उचित नहीं है, मगर इनकी एक छात्रा सिर्फ इनकी वजह से दसवीं से आगे पढ़ पाई और आज इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में बड़ी अफसर है। उस छात्रा के पिता दसवीं से पहले ही उसकी शादी कराने पर तुले थे।
एक छात्र जो आज एक कॉलेज में प्रोफेसर है, कभी एक घरेलू नौकर हुआ करता था। इन्होंने उसे सहारा दिया और रास्ता दिखाया। ऐसे दर्जनों लोग हैं जिनका कैरियर आज सिर्फ सिन्हा सर की वजह से है। सर के बेटे गौरव के साथ एक दफा मेरी बात भी हुई थी कि ऐसे तमाम लोगों के अनुभव को जुटाया जाए। और सबको बताया जाए कि एक शिक्षक कैसे अपने छात्रों का जीवन बदल देता है। वह काम अभी अटका हुआ है, मगर किया जाएगा।
बहरहाल, नेशनल लाइब्रेरियन डे पर इनके बारे में जानकर आपको जरूर अच्छा लगा होगा। यह उम्मीद मुझे है।
रितिका गरुड़, उत्तराखंड
21वीं सदी साइंस और टेक्नोलॉजी का दौर कहलाता है। लेकिन इसके बावजूद कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो आज भी मानव सभ्यता के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा रंगभेद का है। त्वचा और रंग के आधार पर इंसान का इंसान के साथ भेदभाव करने की संकीर्ण सोच से अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश भी मुक्त नहीं हो पाए हैं। भारत में भी यह सोच और भेदभाव देखने को मिल जाता है। विशेषकर देश के अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में जाति, समुदाय, रंग और त्वचा के आधार पर भेदभाव किया जाता है। हालांकि भारत के संविधान में इसके विरुद्ध सख्त नियम और कानून बनाये गए हैं, लेकिन इसके बावजूद रंग के आधार पर भेदभाव की प्रथा का अंत नहीं हुआ है। इसका सबसे नकारात्मक प्रभाव किशोरियों के जीवन पर पड़ता है, जिनके साथ पुरुषों की तुलना में दैनिक जीवन में कहीं अधिक भेदभाव किया जाता है।
इसका एक उदाहरण उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक का चोरसौ गांव है। जहां किशोरियां और महिलाएं रंगभेद के अत्याचार से परेशान हैं। इस गांव की कुल आबादी 3403 है। यहां सबसे अधिक अनुसूचित जाति समुदाय की संख्या है। रंगभेद से परेशान गांव की एक 15 वर्षीय किशोरी कुमारी विनीता आर्य, जो कक्षा 10 की छात्रा है, का कहना है कि सांवले रंग के लोगों को हमेशा घृणा की भावना से देखा जाता है। मुझे खुद ऐसा लगता है कि मेरा रंग सांवला होने के कारण लोगों ने जैसे मुझे इंसान मानना ही छोड़ दिया है। जबकि मैं भी एक इंसान हूं। मेरे अंदर भी दिल है, भावनाएं हैं। मुझे भी दुख होता है जब लोग मेरी प्रतिभा नहीं बल्कि मेरे रंग से मुझे पहचानते हैं। मुझे उस समय बहुत दुख होता है जब गोरे रंग की लड़कियों के साथ मेरी तुलना की जाती है। 9वीं कक्षा में पढऩे वाली एक अन्य किशोरी गुन्नू कहती है कि सांवला रंग हमारे जीवन में एक अभिशाप जैसा बन गया है क्योंकि मेरा रंग दूसरी लड़कियों के जैसा नहीं है और यहां पर सांवले रंग के लोगो को सुंदर नहीं माना जाता है। यदि वह अपनी पसंद का कोई कपड़ा भी पहनना चाहती है, तो सब उसे सांवले रंग के कारण टोकने और मज़ाक उड़ाने लगते हैं। इससे हम हीन भावना का शिकार होते हैं। हम मानसिक रूप से इतना परेशान हो जाते हैं कि हम अपनी योग्यता को पूर्ण रूप से जाहिर भी नहीं कर पाते हैं।
गांव की एक महिला 55 वर्षीय रोशनी देवी कहती हैं कि बचपन से मेरा रंग बहुत ही सांवला था। जिसकी वजह से मैं सबके बीच मज़ाक की पात्र बन चुकी थी। स्कूल से लेकर परिवारजनों के बीच तक मेरा मजाक उड़ाया जाता था। जिसकी वजह से मैं हमेशा मानसिक तनाव में रहती थी। 65 वर्षीय एक सेवानिवृत्त महिला विमला देवी कहती हैं कि मैंने अपने जीवन में ऐसे बहुत से बदलाव देखे हैं और बहुत करीब से महसूस भी किया है, जहां लड़कियों और विशेषकर बहुओं को रंगभेद के कारण कष्टों का सामना करना पड़ता है। अपनी नौकरी के दौरान मैंने कई ऐसे केस देखे हैं जहां माता पिता अपनी लडक़ी को शादी में बहुत दहेज केवल इसलिए देते हैं क्योंकि उनकी बेटी का रंग सांवला होता है। जबकि यदि एक लडक़ा का रंग इतना ही सांवला हो तो समाज को इससे कोई परेशानी नहीं होती है।
प्रश्न यह उठता है कि आखिर रंग के आधार पर लड़कियों को ही परेशान क्यों किया जाता है? भावना देवी कहती हैं कि आज भी ग्रामीण समाज में सांवले की अपेक्षा गोर रंग वालों को अधिक महत्व दिया जाता है। लोगों की यह मानसिकता बनी हुई है कि सांवलों की अपेक्षा गोरे रंग वाले न केवल सुंदर दिखते हैं बल्कि उनमें प्रतिभा भी अधिक होगी। जबकि यह पूरी तरह से निराधार है। वह बताती है कि सांवले रंग के कारण मेरी शादी में बहुत अड़चनें आई थी। शादी के बाद मुझे रंग के कारण ससुराल में काफी ताने सुनने को मिले हैं। आज मुझे यह डर सताता है कि मेरी बेटी के सांवली रंगत के कारण भविष्य में उसके साथ भी समाज में भेदभाव न हो।
इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता नीलम ग्रेंडी कहती हैं कि भारत के ग्रामीण समाज में रंगभेद आज भी एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है। यदि रंगभेद और लिंग भेद को जोडक़र देखा जाए तो दोनों ही समान हैं। इन दोनों का शिकार लड़कियों को ही होना पड़ता है। यदि लडक़े का रंग अत्यधिक सांवला भी हो तो घर और समाज किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है लेकिन यही बातें एक लडक़ी के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है। लोगों के बीच उसे मजाक का पात्र बनाया जाता है। यह समाज की संकीर्ण सोच को दर्शाता है, जिससे बाहर निकलने की जरूरत है। रंगभेद की यह नीति मानव संसाधनों को नुकसान पहुंचा कर एक समाज के रूप में हमें कमजोर करती हैं। आज आवश्यकता है कि हम इस सोच का त्याग करें ताकि भविष्य में एक ऐसे सभ्य और विकसित समाज का निर्माण कर सकें जहां रंग और लिंग भेद से परे केवल प्रतिभा को सम्मान दिया जाता हो। भारत की राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू और अमेरिका की उप राष्ट्रपति कमला हैरिस इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है। (चरखा फीचर)
डॉ. आर.के.पालीवाल
पुरानी कहावत है कि एक भैंस पूरे तालाब को गंदा कर सकती है। यदि ऐसी भैंसों की संख्या बढ़ती चली जाए तो तालाब के साथ झील नदी और समुद्र भी गंदे हो सकते हैं। सांप्रदायिक नफरत की दीवारों और आतंकवाद के साथ भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनती जा रही है। कुछ लोग अपने धर्म के विस्तार के लिए जिस तरह से कहीं चूहों की तरह छिप छिप कर और कहीं सरेआम अपने धर्म की तारीफ में और दूसरे धर्मों के प्रति नफऱत की अतिश्योक्ति पूर्ण तकरीर का प्रचार प्रसार कर रहे हैं उससे उनके उस धर्म को ही ज्यादा नुक्सान हो रहा जिसके वे खुद को बहुत बड़ा शुभचिंतक समझते हैं।
कश्मीर फाइल्स और द केरल स्टोरी जैसी फिल्में संभवत: यथार्थ के नाम पर फिल्म में दर्शाई गई स्थितियों को काफ़ी बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करती हैं लेकिन इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि जिन असामाजिक तत्वों द्वारा पैदा की जा रही समाज को तोडऩे वाली समस्याओं को इन फिल्मों में दर्शाया गया है वे हकीकत में हमारे बीच सीमित मात्रा में मौजूद हैं।
भोपाल, छिंदवाड़ा और हैदराबाद के जिन दर्जन से ज्यादा हिज्ब उत तहरीर के लोगों को हाल में मध्य प्रदेश पुलिस की आतंक रोधी सेल ने पकड़ा है , ऐसे लोग शिक्षित होकर भी गलत राह पर निकले नकारात्मक मानसिकता के नागरिक हैं जो कभी लालच और कभी धार्मिक भावनाओं के ज्वार में बहकर नफऱत के प्रचारक बन जाते हैं। हिज्ब उत तहरीक की शुरुआत 1952 में येरुशलम में हुई बताई जा रही है जिसका लंदन में हेड क्वार्टर है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में सक्रियता के बाद यह भारत में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। हाल में पकड़ाए गैंग की मध्य प्रदेश और तेलंगाना में प्रसार की योजनाएं थी। पढ़े लिखे लोगों द्वारा चलाए गए ये गैंग बहुत खुफिया तरीके से उग्र स्वभाव के भावना प्रधान युवाओं को अपने नेटवर्क में सम्मोहित करते हैं जो अपनी जान की भी ज्यादा परवाह नहीं करते। पता नहीं यह धर्म की कैसा विध्वंशक आकर्षण है जो न अपनी जान की चिंता करता है और न दूसरों की जान की परवाह। पकड़े गए समूह में 25 से 40 साल के पढ़े लिखे इंजीनियर, डॉक्टर, कोचिंग क्लास चलाने वाले और प्रोफेसर आदि शामिल हैं। यह उम्र का वह दौर है जिसमें मेहनत और राष्ट्र भक्ति से कोई युवा भगत सिंह, अब्दुल कलाम, अब्दुल हमीद और सुभाष चंद्र बोस और विवेकानंद या महात्मा गांधी भी बन सकता है।
भोपाल के आसपास रायसेन, सीहोर और होशंगाबाद के जंगलों में अक्सर भोपाल वासी पिकनिक के लिए जाते हैं। इन लोगों ने अपने संगठन के ट्रैनिंग कैंप रायसेन के जंगल में लगाए थे।यह दो तीन कारणों से संभव हुआ है। विगत कुछ वर्षों में इको टूरिज्म के नाम पर वन्यजीव अभयारण्य के आसपास के बफर जोन के जंगलों में शहर के लोगों की आवाजाही बढ़ी है। शहरी समाज को प्रकृति से जोडऩे वाले इस तरह के अभियान के निश्चित रूप से कुछ लाभ भी हैं लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं। भोपाल के पास कठोतिया में ऐसे ही जंगल कैंप शुरु हुए हैं जो बेतवा उदगम स्थल के पास है। वहां भी अक्सर देर शाम को असामाजिक तत्वों का जमावड़ा रहता है। इसी तरह होशंगाबाद रोड पर भीम बैठका से लगे वन क्षेत्र में बारिश के दिनों में छोटे छोटे झरनों और बरसाती नदियों के किनारे पर्यटन के नाम पर प्लास्टिक और पॉलिथीन का कचरा फैलाने वाली भीड़ जुटती में। यही हाल भोजपुर के आसपास की पहाडिय़ों और समरधा के भोपाल से सटे वन क्षेत्र का है। हिज्ब उत तहरीक जैसे संगठनों के अपराधी अक्सर इको टूरिस्ट बनकर यहां आ सकते हैं और गरीब स्थानीय लोगों को झांसे और लालच से अपने साथ मिलाकर वन्यजीवों के शिकार भी कर सकते हैं और आतंक के ट्रेनिंग कैंप भी चला सकते हैं।
यही कारण है कि वन विभाग को इन आतंकियों की भनक नहीं लगी। मध्य प्रदेश के वन विभाग और पुलिस को मिलकर इस तरह की गतिविधियां रोकने के सामूहिक प्रयास करने होंगे तभी इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है। जिस तरह से मणिपुर से लेकर नूंह तक धार्मिक और अंतरसांप्रदायिक नफरत के बाजार गर्म हो रहे हैं आतंक और हिंसा को रोकना दिन ब दिन बडी चुनौती बनता जा रहा है।
प्रेमचंद अपने दौर की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को हमेशा अपने लेखन का हिस्सा बनाते रहे। उन्होंने उन सभी विषयों पर अपनी कलम चलाई जिसे राजनीतिज्ञ अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे थे या आज भी कर रहे हैं।
भारत खेती का देश है और यहां गाय को जितना महत्व दिया जाए, उतना थोड़ा है। लेकिन आज कौल-कसम लिया जाए तो बहुत कम राजे-महराजे या विदेश में शिक्षा प्राप्त करनेवाले हिन्दू निकलेंगे जो गोमांस न खा चुके हों। और उनमें से कितने ही आज हमारे नेता हैं और हम उनके जयघोष करते हैं। अछूत जातियां भी गौमांस खाती हैं और आज हम उनके उत्थान के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। हमने उनके मंदिरों में प्रवेश के निमित्त कोई शर्त नहीं लगाई और न लगानी चाहिए।
हमें अख्तियार है, हम गऊ की पूजा करें लेकिन हमें यह अख्तियार नहीं है कि हम दूसरों को गऊ-पूजा के लिए बाध्य कर सकें। हम ज्यादा से ज्यादा यही कर सकते हैं कि गौमांस-भक्षियों की न्यायबुद्धि को स्पर्श करें। फिर मुसलमानों में अधिकतर गौमांस वही लोग खाते हैं, जो गरीब हैं और गरीब वही लोग हैं जो किसी जमाने में हिन्दुओं से तंग आकर मुसलमान हो गए थे।
वे हिन्दू-समाज से जले हुए थे और उसे जलाना और चिढ़ाना चाहते थे। वही प्रवृत्ति उनमें अब तक चली आती है। जो मुसलमान हिन्दुओं के पड़ोस में देहातों में रहते हैं, वे गौमांस से उतनी ही घृणा करते हैं जितनी साधारण हिन्दू। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि मुसलमान भी गौभक्त हों, तो उसका उपाय यही है कि हमारे और उनके बीच में घनिष्ठता हो, परस्पर ऐक्य हो। तभी वे हमारे धार्मिक मनोभावों का आदर करेंगे।
(हिन्दू-मुस्लिम एकता - नवम्बर 1931 का अंश)
क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?
यह तो हम पहले भी जानते थे और अब भी जानते हैं कि साधारण भारतवासी राष्ट्रीयता का अर्थ नहीं समझता और यह भावना जिस जागृति और मानसिक उदारता से उत्पन्न होती है, वह अभी हममें से बहुत थोड़े आदमियों में आई है। लेकिन इतना जरूर समझते थे कि जो पत्रों के संपादक हैं, राष्ट्रीयता पर लंबे-लंबे लेख लिखते हैं और राष्ट्रीयता की वेदी पर बलिदान होनेवालों की तारीफों के पुल बांधते हैं, उनमें जरूर यह जागृति आ गई है और वह जात-पांत की बेडिय़ों से मुक्त हो चुके हैं। लेकिन अभी हाल में ‘भारत’ में एक लेख देखकर हमारी आंखें खुल गईं और यह अप्रिय अनुभव हुआ कि हम अभी तक केवल मुंह से राष्ट्र-राष्ट्र का गुल मचाते हैं, हमारे दिलों में अभी वही जाति-भेद का अंधकार छाया हुआ है।
‘शिकायत है कि हमने अपनी तीन-चौथाई कहानियों में ब्राह्मणों को काले रंगों में चित्रित करके अपनी (बाकी पेज 5 पर)
संकीर्णता का परिचय दिया है जो हमारी रचनाओं पर अमिट कलंक है। हम कहते हैं कि अगर हममें इतनी शक्ति होती, तो हम अपना सारा जीवन हिन्दू-जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते। हिन्दू जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल है जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है।
राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में साम्य-भाव का दृढ़ होना। इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब तक यहां एक दल, समाज की भक्ति, श्रद्धा, अज्ञान और अंधविश्वास से अपना उल्लू सीधा करने के लिए बना रहेगा, तब तक हिन्दू समाज कभी सचेत न होगा। और यह दल दस-पांच लाख व्यक्तियों का नहीं है, असंख्य है। उसका उद्यम यही है कि वह हिन्दू जाति को अज्ञान की बेडिय़ों में जकड़े रखे जिसमें वह जरा भी चूं न कर सकें।
मानो आसुरी शक्तियों ने अंधकार और अज्ञान का प्रचार करने के लिए स्वयंसेवकों की यह अनगिनत सेना नियत कर रखी है। अगर हिन्दू समाज को पृथ्वी से मिट नहीं जाना है, तो उसे इस अंधकार-शासन को मिटाना होगा। हम नहीं समझते, आज कोई भी विचारवान हिन्दू ऐसा है जो इस टकेपंथी दल को चिरायु देखना चाहता हो, सिवाय उन लोगों के जो स्वयं उस दल में हैं और चखौतियां कर रहे हैं। (क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं? (navjivanindia.com/)
शीर्षक से प्रेमचंद के विचार- भाग 1 में संकलित)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देते हुए इंदिरा गांधी के दौर में हुई मिज़ोरम पर भारतीय वायु सेना की बमबारी का जिक्र किया। विपक्ष ने मणिपुर की हिंसा का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर पूर्वोत्तर भारत को नजऱअंदाज़ करने का आरोप लगाया था जिसके जवाब में प्रधानमंत्री ने मिज़ोरम का नाम लिया।
पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस की नीतियों का ज़िक्र करते हुए पीएम मोदी ने मिज़ोरम में इंडियन एयर फोर्स की बमबारी, साल 1962 में चीनी हमले के समय पूर्वोत्तर के लोगों को बिना मदद के छोडऩे वाले जवाहर लाल नेहरू के रेडियो संदेश जैसी घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा, पांच मार्च, 1966 को कांग्रेस ने मिज़ोरम के असहाय लोगों पर एयर फोर्स के जरिए हमला किया। मिज़ोरम के लोग आज भी उस भयानक दिन का दुख मनाते हैं। उन्होंने (कांग्रेस ने) कभी वहां के लोगों को सांत्वना देने की कोशिश नहीं की। कांग्रेस ने इस बात को देशवासियों से छुपाया। श्रीमति इंदिरा गांधी उस वक़्त देश की प्रधानमंत्री थीं। उन्होंने कहा, कांग्रेस और उसकी राजनीति पूर्वोत्तर भारत की सभी समस्याओं का मूल कारण है।
पीएम मोदी ने मिज़ोरम में कांग्रेस के शासन के दिनों का जिक्र करते हुए कहा कि एक वक़्त में वहां सभी संस्थान चरमपंथी संगठनों के आगे नतमस्तक रहा करते थे और सरकारी दफ़्तरों में महात्मा गांधी की तस्वीर लगाने पर पाबंदी थी। उन्होंने ये भी कहा कि मणिपुर के मोइरांग में स्थित ‘म्यूजियम ऑफ़ आज़ाद हिंद फौज’ में मौजूद नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर भी बमबारी की गई थी।
पांच मार्च, 1966 को क्या हुआ था
ऐसा माना जाता है कि मिजोरम में भारतीय वायु सेना की कार्रवाई देश के भीतर किसी नागरिक इलाके में एयर फोर्स का पहला हवाई हमला था।
दरअसल ये कार्रवाई मिज़ोरम के पृथकतावादी संगठन मिज़ो नेशनल फ्रंट के विरुद्ध थी।
गवर्नमेंट आइज़ोल नॉर्थ कॉलेज की प्रोफ़ेसर डॉक्टर लालज़ारमावी ने एक लेख में बताया है कि पांच मार्च, 1966 को भारतीय वायु सेना के कई लड़ाकू विमानों ने राज्य में अलग-अलग जगहों पर मिज़ो नेशनल फ्रंट के ठिकानों पर बम बरसाए थे। ये हवाई हमले अगले दिन यानी छह मार्च को भी जारी रहे। आइज़ोल शहर के बड़ा बाज़ार की लगभग सभी दुकानें जल कर ख़ाक हो गई थीं। हालात इतने बिगड़ गए थे कि पूरे आइज़ोल में लंबे समय तक इसका असर महसूस किया जाता रहा।
इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर जेवी हलुना ने फिल्म्स डिविजन की डॉक्युमेंट्री ‘एमएनएफ द मिज़ो अपराइजिंग’ के लिए अपने इंटरव्यू में बताया था, पांच और छह मार्च 1966 को आइज़ोल पर हवाई हमले हुए। दो तरह के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया। एक थे - तूफ़ानी और दूसरे हंटर। आइज़ोल के द्वारपूई, रिपब्लिक, खातला और तुईखुआलतलांग जैसे मोहल्ले जल रहे थे।
एमएनएफ के मिलिट्री विंग कहे जाने वाली मिज़ो नेशनल आर्मी से जुड़े रहे कर्नल लालरॉनियाना ने इसी डॉक्युमेंट्री में बताया था, हमारे खिलाफ़ जेट फ़ाइटरों का प्रयोग किया गया। भारतीय सैनिकों का व्यवहार भी ठीक नहीं था।
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘पद्म श्री’ सम्मान से सम्मानित हो चुकीं मिज़ो लेखिका खॉल कुंगी ने बताया था, जैसे ही हमने प्रार्थना ख़त्म की, हवाई हमले शुरू हो गए। मैं तो बिल्कुल चौंक गई। ये सब बड़ी तेज़ी से हुआ। हम सब उस स्थान के पास नहीं थे जहाँ बम गिरे इसलिए नुकसान के बारे में नहीं बता सकती। हम सब तो बस इधर-उधर भागने लगे।
हमसे कहा गया सब लोग ज़मीन पर लेट जाओ, ऐसा करने से आसमान से पायलट हमें देख नहीं पाएंगे। तो जैसे ही बम गिरने लगते हम लेट जाते। तब बिल्कुल पता नहीं चला कि बम कहाँ-कहाँ गिरे। हम सब डरे हुए थे। हम और कुछ नहीं सोच पा रहे थे।
खॉल कुंगी अब इस दुनिया में नहीं हैं। साल 2015 में उनका निधन हो गया था।
असम राइफल्स के सूबेदार हेमलाल जायशी तब मिज़ोरम में ही थे। उन्होंने इसी डॉक्युमेंट्री के लिए अपने इंटरव्यू में कहा था, एयर फोर्स के फायटरों ने आकर बमबारी कर दी। ज़मीन पर मिज़ो नेशनल आर्मी के 8 या 9 लाइट मशीन गन के पॉज़ीशन थे। बम गिरते ही वो सब भाग गए।
भारत सरकार ने उस वक्त इन हमलों से इनकार किया था।
फिल्म्स डिविजन की डॉक्युमेंट्री के अनुसार, 9 मार्च 1966 को छपी ख़बर में एक विदेशी पत्रकार के सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, एयर फोर्स के विमानों ने सैनिकों और साज़ो-सामान को पैरा ड्रॉप किया है।
मिजोरम के उस वक्त के हालात की टाइम लाइन
डॉक्टर लालज़ारमावी ने अपने लेख में उस वक्त के घटनाक्रम का ब्योरा विस्तार से लिखा है-
मिज़ो हिल्स के इलाके में बड़े पैमाने पर गड़बडिय़ां 28 फरवरी, 1966 को शुरू हुईं। मिज़ो नेशनल फ्रंट के सशस्त्र बलों ने आइज़ोल, लुंगलेई, वैरेंग्टे, चॉन्ग्टे, छिमुलांग और अन्य जगहों पर सरकारी प्रतिष्ठानों पर एक साथ धावा बोला। लुंगलेई के तहसील कार्यालय में पहला हमला हुआ।
एमएनएफ के लगभग एक हज़ार सशस्त्र लड़ाकों ने लुंगलेई में असम राइफल्स की चौकी पर हमला किया। 28 फरवरी और 1 मार्च, 1966 की दरमियानी रात को आइज़ोल के ट्रेजऱी ऑफिस पर हमला किया गया। एमएनएफ के लड़ाकों ने वहां मौजूद नकदी, हथियार, गोला-बारूद ज़ब्त कर लिए।
आइज़ोल जाने वाली सडक़ पर वैरेंग्टे के पास नाकाबंदी कर दी गई। वैरेंग्टे असम की तरफ़ से मिज़ो हिल्स का पहला गांव है। छोटे पुलों को उड़ा दिया गया और सडक़ों पर बड़े पेड़ काट कर गिरा दिए गए थे। पहली मार्च को एमएनएफ ने मिज़ोरम की आज़ादी का एलान कर दिया गया था। इस घोषणा पर लालडेंगा और साठ अन्य लोगों ने दस्तखत किए थे। एमएनएफ ने दुनिया भर के देशों से मिज़ोरम की आज़ादी को मान्यता देने की अपील की थी। मिज़ोरम के कई इलाकों पर विद्रोहियों का नियंत्रण स्थापित हो गया था लेकिन आइज़ोल में असम राइफल्स का हेडक्वॉर्टर विद्रोहियों के बार-बार हमले के बावजूद डटा हुआ था।
मार्च की दूसरी तारीख़ को असम सरकार ने मिज़ो हिल्स जिले को डिस्टर्ब एरिया (अशांत क्षेत्र) घोषित कर दिया। हालात संभालने के लिए सेना बुला ली गई। उसी दिन सिलचर से 61, माउंटेन ब्रिगेड की एक टुकड़ी आइज़ोल के लिए रवाना कर दी गई। 3 मार्च से भारतीय सैनिक आइज़ोल में हेलिकॉप्टरों की मदद से उतारे जाने लगे।
चार मार्च को आइज़ोल के लोगों ने शहर खाली करना शुरू कर दिया था। असम राइफल्स के मुख्यालय के अलावा पूरे शहर पर मिज़ो नेशनल फ्रंट का नियंत्रण था।
बीस साल बाद हो पाई शांति
इस बमबारी ने मिजो विद्रोह को उस समय भले ही कुचल दिया हो लेकिन मिजोरम में अगले दो दशकों तक अशांति छाई रही।
साल 1986 में नए प्रदेश के गठन के साथ ही मिजोरम में अशांति का अंत हुआ।
राजीव गांधी के साथ समझौते के बाद एमएनएफ के प्रमुख रहे लालडेंगा ने प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उन्होंने उसी स्थान पर भारतीय झंडा फहराया जहां 20 साल पहले एमएनएफ का झंडा फहराया गया था। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
राजनीति और धर्म से जुडे लोगों के लिए लिए तो दुर्भाग्य से हमारे देश में कोई आचरण नियमावली है ही नहीं। चुनावों के समय जरूर चुनाव आयोग और उससे संबद्ध मशीनरी को मिले विशेष अधिकारों के कारण नेताओं पर कुछ दिन के लिए थोडी बहुत लगाम कसी जाती है अन्यथा उनके लिए कोई लिखित या परंपरा के रुप में आचरण नियमावली नहीं बनाई गई।
इस मामले में सभी दल बराबर के दोषी हैं क्योंकि किसी भी राजनैतिक दल ने ऐसी पहल नहीं की। इसके बरक्स नौकरशाहों और न्यायालय के न्यायमूर्तियों के लिए न केवल विस्तृत आचरण नियमावली है बल्कि समय समय पर न्यायालयों द्वारा दिए गए दिशा निर्देश और सरकार द्वारा ज़ारी नियम भी उन पर लागू होते हैं। इसके बावजूद कभी कभी नौकरशाह और न्यायमूर्ति भी इस तरह का व्यवहार करते हैं जिससे बडी विचित्र स्थितियां पैदा हो जाती हैं। कुछ दिन पहले कुछ ऐसा ही कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायधीश अभिजीत गंगोपाध्याय के आचरण और आदेशों के बारे में हुआ है।
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने पश्चिम बंगाल के शिक्षक भर्ती घोटाले में सी बी आई जांच के आदेश दिए थे। इस जांच के बाद ही इस घोटाले की परतें खुलती चली गई थी जिनमें सैकड़ों करोड़ रुपए के काले धन की जब्ती हुई थी और तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेता और तत्कालीन शिक्षा मंत्री की गिरफ्तारी हुई थी। निश्चित रुप से यहां तक यह अत्यंत सराहनीय निर्णय था जिससे भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मामला जनता के सामने आया था।
न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय यहीं नहीं रुके। उन्होंने इस मामले पर मीडिया में बेबाक इंटरव्यू भी दे दिया। न्यायालय की यह परंपरा रही है कि न्यायमूर्ति उन मामलों पर मीडिया में इंटरव्यू नहीं देते जिनकी सुनवाई उनकी अदालत में चल रही है। यहीं से सर्वोच्च न्यायालय से उनके टकराव की शुरुआत हुई। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस ने न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शिक्षक भर्ती घोटाले से तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं का नाम जुडऩे से पार्टी वैसे ही इन न्यायमूर्ति महोदय से खुन्नस खाई हुई थी, उनके इंटरव्यू ने आग में घी डाल दिया जिससे पार्टी को उनके खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनके आचरण को उचित नहीं माना और उनके इंटरव्यू की ट्रांसक्रिप्ट जांच के लिए मांग ली। इसके पहले कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में किसी निर्णय पर पहुंचता न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारी को आधी रात तक उनके इंटरव्यू की ट्रांसक्रिप्ट भेजने का निर्देश जारी कर दिया। इस निर्देश ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी। इस स्थिती से निबटने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ को भी देर शाम अदालत लगानी पड़ी और न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के निर्देष को रद्द करना पड़ा।
प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय इन दिनों न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए कई प्रगतिशील और सकारात्मक परिवर्तनों की शुरुआत कर रहा है ताकि नागरिकों को सहज और त्वरित न्याय सुलभ हो और न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़े। ऐसे में न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के प्रकरण से न्यायिक व्यवस्था के बारे में जनता में गलत संदेश जाता है। इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायमूर्ति द्वारा ट्रेन यात्रा के दौरान हुई असुविधा के लिए रेल अधिकारियों का स्पष्टीकरण तलब कर लिया था। इसे भी सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश ने उचित नहीं माना और देश के सभी न्यायिक अधिकारियों से प्रोटोकॉल को लेकर उदारता का परिचय देने का अनुरोध किया है। उपरोक्त वर्णित न्यायमूर्तियों की तरह देश के विभिन्न हिस्सों से प्रशासनिक अधिकारियों के मातहतों और आम जनता से दुर्व्यवहार के किस्से भी समाचारों की सुर्खियां बनते रहते हैं। ऐसे अधिकारियों के कारण नौकरशाही के बारे में भी जनता में बहुत गलत संदेश जाता है। संबंधित सरकारों को ऐसे अधिकारियों से भी सख्ती से निबटना चाहिए।
सलमान रावी
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव ने दस्तक दे दी है, अगले कुछ दिनों के अंदर ही राज्य के दो प्रमुख दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी अपने उम्मीदवारों का चयन कर लेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 230 सीटों के लिए इस बार होने वाले ये चुनाव बेहद रोचक होंगे क्योंकि उन्हें कांटे की टक्कर नजऱ आ रही है।
इस प्रदेश में दो ही दलों का प्रभाव है इसलिए चुनावी लड़ाई आमने-सामने की ही है लेकिन प्रदेश के समाज का एक तबका ऐसा भी है जिसके अंदर चुनावों को लेकर ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है।
ये तबका है प्रदेश की आबादी के सात प्रतिशत मुसलमान।
चुनाव में नहीं दिख रही दिलचस्पी
मोहम्मद फिऱोज़, दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक, भोपाल की ‘ताजुल मस्जिद’ के प्रांगण में छोटी सी ‘कैंटीन’ चलाते हैं।
उनकी इस ‘कैंटीन’ में अक्सर नमाज़ पढऩे के बाद लोग चाय पीने के लिए जुटते हैं। चाय पर चर्चा भी होती है जो सियासत से लेकर समाज के दूसरे मुद्दों तक चली जाती है लेकिन आज यहाँ जमा लोग चुनावी मौसम की जगह देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रही बारिश और उससे हो रही तबाही की चर्चा कर रहे हैं।
बात करने पर फिऱोज़ पूछते हैं, ‘आपको कहीं से लग रहा है कि मध्य प्रदेश तीन महीनों के अंदर चुनाव होने वाले हैं?’
फिऱोज़ इसकी वजह बताते हैं, ‘मुसलमानों में चुनावों को लेकर अब उतना जोश नहीं रह गया है। पूरी विधानसभा में सिफऱ् दो मुसलमान विधायक हैं, एक आरिफ़ अक़ील और एक आरिफ़ मसूद। अक़ील साहब बेहद बीमार चल रहे हैं। दूसरे विधायक आरिफ़ मसूद साहब हैं। कितने ही मुद्दे उठाएँगे वो मुसलमानों के? सवाल तो ये है कि मुसलमानों को कितने टिकट मिलेंगे। कांग्रेस की मुसलमानों में कोई दिलचस्पी नहीं है और भारतीय जनता पार्टी का तो एजेंडा जगज़ाहिर है।’
फिऱोज़ अकेले नहीं हैं जो ऐसा सोचते हैं। भोपाल में रहने वाले मुसलमान युवा और पढ़े-लिखे तबके की यही चिंता है।
‘बरकतुल्लाह यूथ फ़ोरम’ के अनस अली मानते हैं कि मध्य प्रदेश में कम आबादी की वजह से मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टियाँ कभी गंभीर नहीं रही हैं। वो मानते हैं कि उनके समाज के ‘आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का ये सबसे बड़ा कारण है।’
नई बात नहीं
वर्ष 1993 में एक ऐसा समय भी आया था, जब कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह पहली बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय छत्तीसगढ़ नहीं बना था, अविभाजित मध्य प्रदेश की विधानसभा में 320 सीटें हुआ करती थीं।
उस साल को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ था जब उस समय भारत के ‘सबसे बड़े राज्य’ की विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक निर्वाचित नहीं हुआ था।
तब दिग्विजय सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में एक मुस्लिम चेहरे को जगह दी थी। उनका नाम था इब्राहिम कुरैशी लेकिन कुरैशी विधायक नहीं थे और छह महीनों के अंदर वो कोई चुनाव भी नहीं जीत सके थे इसलिए उन्हें पद से हटना पड़ा।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक गिरिजाशंकर के अनुसार, ‘दिग्विजय सिंह ने अपने पहले मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की दृष्टि से इब्राहिम कुरैशी को मंत्री बनाया, जो विधायक नहीं थे। मंत्री बनने के बाद छह माह के भीतर निर्वाचित नहीं हो पाने के कारण उनका इस्तीफ़ा ले लिया गया।’
इब्राहिम कुरैशी के पास वक्फ़, विज्ञान टेक्नोलॉजी और सार्वजनिक उपक्रम जैसे विभाग थे।
1993 के विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के छह मुसलमान उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था जबकि भारतीय जनता पार्टी ने भी अब्दुल गनी अंसारी को उम्मीदवार बनाया था। मगर इनमें से कोई भी चुनाव नहीं जीत सका था।
क्यों चले गए मुसलमान हाशिये पर?
दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में राजनीति शास्त्र के स्कॉलर मोहम्मद ओसामा ने मध्य प्रदेश में मुसलमानों के ‘राजनीतिक हाशिये पर जाने’ को लेकर शोध किया है। उनका शोध अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू’ में प्रकाशित भी हुआ है।
उन्होंने चुनाव आयोग के आंकड़ों के आधार पर मुसलमान प्रत्याशियों के तुलनात्मक प्रतिनिधित्व का आकलन किया है। अपने शोध में वो बताते हैं कि वर्ष 1980 के विधानसभा चुनावों में मुसलमान उम्मीदवार सबसे ज़्यादा थे और उनकी तादाद 35 थी।
इसके बाद के विधानसभा के चुनावों में ये तादाद घटती चली गई। पिछले विधानसभा के चुनावों में सिफऱ् 14 मुसलमान उम्मीदवार ही मैदान में थे। अब तक सबसे ज़्यादा मुसलमान विधायक 1962 के विधानसभा चुनावों में जीतकर आये थे और उनकी तादाद सात थी।
साढ़े सात करोड़ की आबादी वाले मध्य प्रदेश में मुसलमान सात प्रतिशत के आसपास हैं लेकिन कुछ ऐसी सीटें हैं जहाँ पर मुसलमानों के वोट निर्णायक हैं। इसके बावजूद प्रदेश की विधानसभा में समाज के इस तबक़े का प्रतिनिधित्व घटता ही चला जा रहा है और उनके मुद्दे दरकिनार होते जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 230 विधानसभा की सीटों में से 15 से 20 प्रतिशत ऐसी सीटें हैं जिन पर मुसलमान मतदाताओं का प्रभाव है।
वो सीटें जहाँ मुसलमान असर रखते हैं
ऐसा नहीं है कि राज्य में हर जगह मुसलमान हाशिये पर हैं, मध्य प्रदेश में कई ऐसी सीटें हैं जहाँ मुसलमानों का वोट ख़ासा अहमियत रखता है।
भोपाल का इतिहास भी काफ़ी रोचक रहा है, आजादी के समय भोपाल, सीहोर जि़ले की एक तहसील हुआ करता था। भारत में अंग्रेज़ों के शासनकाल के ठीक पहले भोपाल को नवाबों और बेगमों की रियासत कहा जाता था।
भोपाल, इंदौर और बुरहानपुर में मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 230 विधानसभा की सीटों में से 15 से 20 प्रतिशत ऐसी सीटें हैं जिन पर मुसलमान मतदाताओं का प्रभाव है।
भोपाल के पास नरेला विधानसभा की सीट के अलावा देवास की सीट, शाजापुर, ग्वालियर (दक्षिण), उज्जैन (उत्तर) रतलाम (सिटी), जबलपुर (पूर्व), सागऱ, रीवा, सतना, मंदसौर, देपालपुर, खरगोन और खंडवा की विधानसभा की सीटों पर मुसलमान वोटरों का ख़ासा प्रभाव है।
राजनीतिक दलों पर आरोप है कि भोपाल की दो या तीन सीटों के अलावा वो मुसलमान प्रत्याशियों को टिकट देने में आना-कानी करते हैं।
मध्य प्रदेश की विधानसभा में पिछले चार दशकों से मुसलमान विधायकों का प्रतिनिधित्व घटता ही चला जा रहा है। प्रदेश से आखिरी मुसलमान सांसद, हॉकी ओलंपियन असलम शेर खान ही रहे हैं और वो भी 80 के दशक में। उनके बाद फिर कभी कोई मुसलमान प्रत्याशी लोकसभा में मध्य प्रदेश से निर्वाचित नहीं हो पाया।
ग़ुम होती जा रही है आवाज़
समाज के लोगों का कहना है कि विधानसभा से लेकर संसद तक प्रदेश के मुसलमानों के मुद्दों को उठाने वाली आवाजें ख़त्म होती जा रही हैं।
यास्मीन अलीम, ‘बेगम्स ऑफ़ भोपाल’ नाम की संस्था की सचिव हैं जो सामजिक कार्यों और मुसलमान बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र काम करती है। यास्मीन कहतीं हैं कि कम प्रतिनिधित्व के बावजूद कुछ वर्षों पहले तक भी सरकार मुसलमानों के मुद्दों पर ध्यान देती थी। वो कहती हैं, ‘लेकिन अब सरकार का रवैया भी बदला-बदला-सा है।’
उनका कहना था कि गऱीब मुसलमान अपने बच्चों को सरकार से मिलने वाली छात्रवृति के सहारे पढ़ाते थे लेकिन पिछले साल से ही इसे बंद कर दिया गया है। वो कहती हैं कि उनका समाज का एक बड़ी आर्थिक तंगी से जूझ रहा है जो न तो अपने बच्चों के लिए फ़ीस का इंतज़ाम कर पा रहा है और ना ही किताबें।
यास्मीन कहती हैं, ‘सबसे ज़्यादा परेशानी मुसलमान महिलाएँ झेल रही हैं। घरेलू हिंसा से लेकर आर्थिक तंगी तक सारा बोझ मुसलमान महिलाओं के सिर पर है। हमारे लिए आवाज़ कौन उठाएगा? मुसलमान महिलाओं के लिए आवाज़ कौन उठाएगा? बड़ा दु:ख होता है। हम क्या कर रहे हैं। हम कुछ भी नहीं कर पा रहे क्योंकि हमारी आवाज़ तो हर तरह से दबाई जा रही है।’
मुसलमानों की अनदेखी का आरोप
मध्य प्रदेश राज्य के रूप में 1956 में अस्तित्व में आया। गठन के बाद से सबसे अधिक शासनकाल कांग्रेस का रहा इसलिए मुसलमानों के घटते राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर कांग्रेस पर ही सभी ज़्यादा उंगलियाँ उठ रही हैं।
अब संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर बोलना भी शुरू कर दिया है और कांग्रेस पार्टी के आला कमान पर ‘मुसलमानों की अनदेखी’ का आरोप लगाना शुरू कर दिया है। इन वरिष्ठ नेताओं ने प्रदेश के कई क्षेत्रों में समाज के लोगों से साथ बैठकें भी की हैं और पार्टी को इस बारे में चेताया भी है।
अज़ीज़ कुरैशी राज्यपाल भी रह चुके हैं और केन्द्रीय मंत्री भी। वर्ष 1972 से वो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी रहे हैं लेकिन इस बार उनका नाम केंद्रीय कमेटी की सूची में नहीं है।
कांग्रेस पार्टी से नाराज़ चल रहे वरिष्ठ नेताओं की अगुवाई वो ही कर रहे हैं।
बीबीसी से बात करते हुए कुरैशी कहते हैं, ‘आज मेरी ही पार्टी में मेरी कोई औकात नहीं रह गई है। सन 1972 से मैं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सदस्य रहा हूँ। इस बार मेरा नाम ग़ायब कर दिया गया है। कांग्रेस पार्टी सोचने लग गई है कि मध्य प्रदेश में मुसलमानों की औकात ही क्या है। झक मारकर हमारे पास आएँगे, और ये उनकी बहुत बड़ी ग़लतफहमी है। इनको ये एहसास दिलाना ज़रूरी है कि हम इनके ग़ुलाम नहीं हैं।’
कुरैशी का आरोप है कि पहले जो आवाजें मुसलमानों के अधिकारों के लिए उठा करतीं थीं, चाहे वो कांग्रेस पार्टी के अंदर से हों या समाजवादी सोच वाले नेताओं की हों, वो आवाजें अब धीमी पड़ गई हैं।
कुरैशी का कहना था, ‘कांग्रेस भी अब हिंदुत्व के रास्ते पर निकल पड़ी है ये सोचते हुए कि वो भारतीय जनता पार्टी का इसके ज़रिए मुक़ाबला कर सकती है। जो धर्मनिरपेक्षता के चैंपियन होने का दम भरते थे वो या तो डर गए हैं या फिर वोटों की ख़ातिर खामोश रहना पसंद कर रहे हैं।’
बग़ावत करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का ये भी आरोप है कि उनकी पार्टी भी अब मुसलमान नेताओं को मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों से टिकट देने में हिचकिचा रही है।
कांग्रेस भी नहीं चाहती मुसलमानों के वोट?
कांग्रेस के पूर्व सांसद और हॉकी ओलंपियन असलम शेर खान कहते हैं कि पहले भी कांग्रेस के नेतृत्व के लिए मुसलमानों को लेकर मध्य प्रदेश में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रही है। उनका आरोप है कि अब तो नौबत यहाँ तक आ पहुंची है कि मुसलमानों के सात प्रतिशत वोटों में भी कांग्रेस की दिलचस्पी नहीं रही।
कांग्रेस के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, ‘अब तो मुसलमानों के वोट मांगने भी नहीं जा रहे बड़े नेता। कांग्रेस के कई हिन्दू नेता भी मुस्लिम बहुल सीटों का टिकट चाहते हैं क्योंकि उनको वहाँ से जीतना बहुत आसान हो जाता है। अगर मुस्लिम बहुल सीटें हैं जहाँ 50, 60, 70 या 80 हज़ार मुसलमान मतदाता हैं तो वहाँ अगर कोई कांग्रेसी हिंदू टिकट ले ले तो उसका जीतना आसान हो जाता है।’
बीबीसी के साथ चर्चा के दौरान असलम शेर खान ने कांग्रेस के शासनकाल में शुरू किए गए परिसीमन पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, ‘जो हमारी सीटें थीं उनका इस तरह से परिसीमन किया जाता है कि जिससे मुसलमानों को बाँट दिया जाए क्योकि अगर परिसीमन नहीं करते तो मुसलमान उम्मीदवार निर्दलीय ही जीत जाएँगे। तो जैसे सीहोर है, भोपाल है, ये विधानसभा क्षेत्र को इधर से उधर ले जाते हैं। इसका मक़सद होता है कि मुसलमान एक जगह ज्यादा न हो जाएँ। अब ये किसकी पॉलिसी है। कांग्रेस की सरकारें भी रही हैं, भाजपा की भी रही हैं।’
वरिष्ठ नेताओं की बग़ावत और उनके आरोपों से कांग्रेस पार्टी में बेचैनी तो है मगर प्रदेश कमेटी के लिए ये ज़्यादा चिंता का विषय नहीं है। वैसे कांग्रेस पर आरोप लग रहे हैं कि वो भारतीय जनता पार्टी से टक्कर लेने के लिए खुलकर हिंदुत्व की पिच पर खेलकर ये विधानसभा के चुनाव लडऩा चाहते हैं।
कांग्रेस में मुसलमान दो गुटों में बँटे
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता अब्बास हफ़ीज़ से बीबीसी ने इस बाबत जब पूछा तो उन्होंने इन बागी नेताओं पर सवाल उठाए।
अब्बास हफ़ीज़ कहते हैं, ‘ये जो लोग हैं इन्होंने अपने वक़्त में क्या किया? इनको वरिष्ठ नेता कहते हैं हम लोग। पुराने कांग्रेस वाले थे। मुस्लिम लीडर्स। इनके पास मंत्रालय रहे। ये सांसद भी बने। विधायक बने। ये बड़े मंत्रालयों के मंत्री बने। राज्यपाल भी बने। इन्होंने क्या किया उस वक़्त? उस वक़्त अगर उन्होंने कुछ किया होता तो शायद ये हालात नहीं बनते।’
हफ़ीज़ मानते हैं कि मध्य प्रदेश में मुसलमान ‘राजनीतिक हाशिये’ पर जा रहे हैं। मगर वो इसके लिए बग़ावत करने वाले वरिष्ठ नेताओं को ही जि़म्मेदार ठहराते हैं।
चर्चा के दौरान उन्होंने बागी नेताओं की आलोचना करते हुए कहा, ‘तमाम मध्य प्रदेश के अन्दर माइनॉरिटी के नाम पर बैठकें करेंगे। कांग्रेस को कमज़ोर करने की कोशिश करेंगे। आज भी इनकी जितनी मांगें होंगी, वो टिकट बंटवारे तक होती हैं कि हमें टिकट दे दीजिए। टिकट किसको मिलेंगे? मतलब उनको ख़ुद को टिकट मिले या फिर उनके परिवार में जाए टिकट।’
मध्य प्रदेश में मुसलमानों के ‘राजनीतिक अस्तिव’ को लेकर हमेशा से ही बहस चलती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि कांग्रेस की सरकारों में भी जीत कर आए गिने-चुने मुसलमान विधायकों की उपेक्षा होती रही थी।
बाक़ी देश के हालात बहुत अलग नहीं
कांग्रेस पर नजऱ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई मानते हैं कि मुसलमानों का राजनीतिक हाशिये पर होना ‘केवल भाजपा या भाजपा शासित राज्यों तक सीमित’ नहीं है।
वो कहते हैं, ‘कांग्रेस या कांग्रेस शासित राज्यों में भी उनको पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है। मुसलमान नेता को केवल वो वक्फ़ बोर्ड या हज कमिटी में रख लिया जाता है। और अगर मुसलमान विधायक मंत्री भी बन जाता है तो उसके पास वक्फ़ बोर्ड या अल्पसंख्यक मामलों जैसे विभाग आते हैं। कोई उसे भारी भरकम विभाग जैसे गृह, वित्त या सामान्य प्रशासन या लोक निर्माण विभाग, इस तरह के विभागों से दूर ही रखा जाता है।’
इस चुनावी माहौल में भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस में चल रही बग़ावत का एक तरह से ‘मज़ा’ ले रही है। संगठन ने कांग्रेस के ‘मुसलमान वोट बैंक’ में सेंधमारी की पूरी रणनीति भी तैयार कर ली है।
हैदराबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पिछड़े मुसलमानों’ या पसमांदा मुसलमानों के ‘उत्थान’ के लिए पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा था।
हाल ही में उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को ‘मुसलमान महिलाओं से राखी बंधवाने’ की बात भी कही थी।
पसमांदा मुसलमानों पर बीजेपी की नजऱ
मध्य प्रदेश में ‘पिछड़े मुसलमानों’ के बीच काम करने की शुरुआत भी भाजपा ने नगर निकाय चुनावों से कर दी है। भाजपा ने नगर निकाय के चुनावों में मुसलमानों के बीच खुलकर टिकट बाँटे थे। इन चुनावों में कई मुसलमान उम्मीदवार भाजपा के टिकट पर जीत कर भी आए।
पिछले विधानसभा के चुनावों में भाजपा ने मुस्लिम महिला, फातिमा सिद्दीक़ी को टिकट दिया था।
भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश इकाई के प्रवक्ता हितेश वाजपेयी कहते हैं कि कांग्रेस ने हमेशा से ‘मुसलमानों का चुनावी शोषण’ किया है।
वाजपेयी के अनुसार, ‘कांग्रेस ने हमेशा मुसलमानों के बीच भारतीय जनता पार्टी को लेकर भ्रम फैलाया। हमें मुसलमानों का दुश्मन बताया। इसको प्रचारित करके मुसलमानों का चुनावी शोषण किया। ये मैं इसलिए कहूँगा कि कांग्रेस ने कभी अपनी अगड़ी पंक्ति के नेतृत्व में मुसलमानों को कोई जगह दी ही नहीं। मध्य प्रदेश को यदि आप उठाकर देखेंगे तो बड़ी संख्या में मध्य प्रदेश में ठाकुरों के और सवर्ण वर्गों का क़ब्ज़ा जैसा कांग्रेस पर रहा।’
वाजपेयी कहते हैं कि इस बार नगर निकाय चुनावों में उनकी पार्टी ने 400 के आसपास मुसलमान प्रत्याशियों को टिकट दिए जिनमें से 100 ऐसे हैं जिन्होंने हिन्दू उम्मीदवारों को हराया है।
बीबीसी से बात करते हुए वाजपेयी कहते हैं, ‘आप मानकर चलिए, हमारे लिए उत्साहजनक है कि हम बिना तुष्टीकरण के संतुष्टीकरण कैसे कर सकते हैं।’
बीजेपी मौके का फ़ायदा उठा रही है?
भोपाल (मध्य) की सीट से मौजूदा कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भारतीय जनता पार्टी के दावों पर पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा ने मुसलमान उम्मीदवारों को वहीं टिकट दिए जहाँ मुसलमानों की आबादी अच्छी-ख़ासी थी।
वो ये भी मानते हैं कि इन सीटों पर कांग्रेस ने मुसलमानों की जगह हिंदुओं को टिकट दिए थे जिसका भाजपा ने भरपूर फ़ायदा उठाया।
उनका कहना था, ‘ज़ाहिर है, मुसलमानों को अपनी नुमाइंदगी जाती हुई दिखी तो उन्होंने अपना वोट ‘शिफ्ट’ कर दिया। इसे मैं भाजपा की जीत नहीं मानूँगा। भाजपा को सिफऱ् परिस्थितियों का फ़ायदा मिला है। भाजपा को अगर मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देना होता तो अभी दे न। नगर निगम छोड़ें। अभी विधानसभा के चुनाव आने वाले हैं। भाजपा बताये कि किन सीटों पर टिकट दे रहे हैं मुसलमानों को और कितने टिकट दे रहे हैं?’
घटते प्रतिनिधित्व और मुसलमानों के हाशिये पर सिमट जाने की बहस के बीच देश के जाने-माने शायर मंजऱ भोपाली से जब बीबीसी ने मुलाक़ात की तो उन्होंने समाज को ही पिछड़ेपन का जि़म्मेदार ठहराया।
उनका कहना है कि शिक्षा को लेकर अब भी समाज काफ़ी पीछे इसलिए है क्योंकि लोग पढऩा ही नहीं चाहते।
उन्होंने मध्य प्रदेश और ख़ास तौर पर भोपाल के मुसलमानों की जीवनशैली में बड़े सुधार की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
वो कहते हैं, ‘अपनी नाकामी का इल्ज़ाम दूसरे किसी पर लगा देना सबसे आसान काम है जबकि हकीकत ये है कि मुसलमान शिक्षा की तरफ़ ध्यान नहीं देता है। समाज के युवाओं में महत्वकांक्षा ही नहीं दिखती कुछ बनने की।’ (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के.पालीवाल
मनोज तिवारी भारतीय जनता पार्टी के सासंद हैं, दिल्ली प्रदेश में भाजपा के अध्यक्ष की कुर्सी को भी सुशोभित कर चुके हैं। माननीय सासंद किसी दिन माननीय मंत्री बनकर देश का कोई मंत्रालय भी संभाल सकते हैं। विगत में जिन भोजपुरी फिल्मों के वे नायक रहे हैं वे फूहड़ता, अश्लीलता और द्विअर्थी गीत और आइटम सांग के मामले में संभवत: भारतीय सिनेमा में नंबर एक पर आती हैं। फिल्मों में शब्दों की गरिमा पर अश्लीलता बहुत भारी रहती है और उसे मनोरंजन के नाम पर दबी ढकी स्वीकार्यता भी मिल गई है। लेकिन राजनीति में जब अपने समकक्षों के लिए शब्दों की गरिमा तार तार होने लगती है तब हम यह कह सकते हैं कि हम भारत के नागरिक बहुत बड़े दोषी हैं जिन्होंने शब्दों की गरिमा तार तार करने वाले लोगों को अपना प्रतिनिधि चुना है।
एक वीडियो में मनोज तिवारी विपक्ष के सांसदों को बेशर्म और नामर्द कह रहे हैं। जिन विपक्षी सांसदों को मनोज तिवारी इन अपशब्दों से संबोधित कर रहे हैं उनमें कई उम्र और अनुभव में उनसे बहुत बड़े होंगे जिन्होंने राजनीति की गंगा में बहुत पानी प्रवाहित हुए देखा है। जिस राजनीतिक दल में स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई जैसे शब्दों के अप्रतिम चितेरे रहे हैं, मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवानी जैसे धुर विरोधियों के प्रति भी शालीन शब्दों का उपयोग करने वाले वरिष्ठ मार्गदर्शक अभी भी मौजूद हैं, उस दल में फिल्मों की प्रसिद्धि के कारण सासंद बने मनोज तिवारी जैसे सांसदों द्वारा विपक्षी सांसदों के प्रति अगर इतनी निकृष्ट भाषा का उपयोग किया जाता है तब इसकी सहज कल्पना कर सकते हैं कि उनका व्यवहार उस आम भारतीय नागरिक के प्रति क्या होगा जो उनकी विचारधारा और दल का विरोधी है।
जैसी भाषा किसी दल के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ करते हैं, उस दल के छुटभैये नेता और कार्यकर्ता भी उनका अनुसरण कर उनसे दो हाथ आगे बढ़ कर गाली गलौज की भाषा और मारपीट करने लगते हैं। कुछ दिन पहले देश के गृह मंत्री भोपाल आए थे। उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के दो कांग्रेस नेताओं को मिस्टर बंटाधार और करप्सन नाथ कहकर संबोधित किया था। गृह मंत्री यदि यह मानते हैं कि कांग्रेस का कोई बड़ा नेता करप्शन नाथ है तो केन्द्र और प्रदेश में उनके दल की सरकार होते हुए उस नेता को सजा क्यों नहीं मिली। केंद्र के पास करप्शन रोकने के लिए सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग हैं और प्रदेश सरकार के पास लोकायुक्त का भारी-भरकम अमला है, सीआईडी है और पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा है। यदि करप्शन रोकने की आपकी आधा दर्जन एजेंसी एक व्यक्ति का करप्शन रोकने में असमर्थ हैं तो यह आपकी सरकारों की अक्षमता है या आप गैर जिम्मेदार बयान देकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। दुखद यह है कि मुख्यधारा का मीडिया गृह मंत्री को इस बयान पर घेरने के बजाय इस खबर को नमक मिर्च मिलाकर चटखारे ले रहा है।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने मानहानि मामले में गुजरात की अदालत द्वारा राहुल गांधी को दी गई सजा पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें सार्वजनिक भाषणों में शालीनता बरतने को कहा है। इसके पहले गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखते हुए उन्हें सार्वजनिक भाषणों में शालीनता बरतने के लिए नसीहत दी थी। यह नसीहत गुजरात उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही राहुल गांधी को दी है लेकिन इसका व्यापक अर्थ है जो सभी नेताओं और नागरिकों पर लागू होता है। न्यायालय केवल उन मामलों में ही सुनवाई करते हैं जो उनके सामने पीडि़त पक्ष द्वारा लाए जाते हैं। आधिकांश लोग महंगी और बेहद लम्बी हो चुकी न्याय व्यवस्था का लाभ उठाने से कतराते हैं क्योंकि यह समय और संसाधन जाया करने जैसा है। इसी लचर व्यवस्था का लाभ बड़बोले नेता उठाते हैं।
दिनेश चौधरी
कमलेश्वर की कथा
सभी को मालूम है कि शेर बहुत सफाई पसंद होता है। एक बार हुआ यह कि किसी बात पर शेर और जंगली सुअर में झगड़ा हो गया। जंगल के लगभग सभी जानवर शेर से भयभीत रहते थे। उन्हें मौका मिल गया। उन्होंने सोचा, जंगली सुअर भी शेर से कम ताकतवर नहीं है। उसमें बस साहस की कमी है। वह अगर हिम्मत करके शेर से भिड़ जाए तो शेर को पछाड़ा जा सकता है। एक बार शेर हार गया तो उसकी बादशाहत हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। सबने मिलकर जंगली सुअर को चढ़ा दिया।
दोनों की तू-तू-मैं-मैं इस कदर बढ़ गई कि जंगली सुअर ने शेर को मुकाबले की चुनौती दे दी। सारे भयभीत जानवरों ने तालियाँ बजाकर जंगली सुअर की हौसला-अफजाई की। शेर को ताज्जुब तो हुआ पर वह मुकाबले की चुनौती से इनकार भी नहीं कर सकता था। उसने चुनौती मंजूर कर ली।
शेर के चुनौती मंजूर करते ही सुअर मन-ही-मन घबराने और पछताने लगा, पर वह अपने सपोर्टर्स के सामने अपनी घबराहट जाहिर भी नहीं कर सकता था। तभी शेर दहाड़ा-तो फिर आ जा मैदान में!
जंगली सुअर की पसलियाँ काँप उठीं। उस ने मौत को टालने के लिए फौरन एक तरकीब सोची। वह शेर से बोला- मुकाबला हो तो शानदार तरीके से हो। जंगल के जो जानवर मौजूद नहीं हैं, उन्हें हमारे मुकाबले की खबर होनी चाहिए।
लोमड़ी ने आगे बढक़र जंगली सुअर की हाँ में हाँ मिलाई। सुअर को थोड़ी राहत मिली। आखिर आम राय से मुकाबले की तारीख और वक्त एक हफ्ते बाद तय कर दिया गया। शेर चला गया।
जंगली सुअर ने शेर को जाते हुए देखा पर उसकी अपनी हालत पतली थी। तैश में आकर जो गलती वह कर बैठा था वह उसे भीतर ही भीतर साल रही थी। हफ्ते भर बाद उसे अपनी मौत सामने खड़ी दिखाई दे रही थी। वह सोच रहा था कि अब कदम पीछे हटाया और मुकाबले से मना किया तो सपोर्टर्स जिंदा नहीं छोड़ेंगे! पछताते हुए वह जाके एक गंदे नाले में लेट गया। वहाँ लेटे-लेटे उसे एक जुगत सूझी। सफाईपसन्दी तो शेर की आदत थी, जुगत यह थी कि सुअर अगर काफी मैला और गंदगी अपने बदन में लपेट ले तो सामने आते ही उसकी बदबू से शेर की हालत खराब हो जाएगी। उसकी आधी ताकत बरबाद हो जाएगी। तब शायद कोई दाँव लगा कर वह शेर को पछाडऩे में कामयाब भी हो सकता है।
इसी जुगत पर जंगली सुअर ने सातों दिन अमल किया। वह मैले और गंदगी में लेट-लेट कर उसे अपने बदन पर सुखाता रहा। गन्दगी और मैले की परतें उसके बदन पर चढ़ती रहीं।
आखिर मुकाबले का दिन और वक्त भी आया। जंगल के तय- शुदा मैदान में सारे जानवर इक_ा हो गए। लोमड़ी और कुछ गीदड़ मिलकर जंगली सुअर का हौसला बढ़ाते हुए उसे मैदान में लाए।
शेर अकेला आया। सामने आकर उसने जंगली सुअर को पहला हमला करने के लिए ललकारा। डरते-डरते सुअर ने दौडक़र हमले की कोशिश की। उसकी गंदगी की बदबू से बेहाल होते हुए शेर परेशान हुआ, उसने कुछ सोचा और ऐलान किया-हाजरीन! मैं जंगली सुअर की ताकत से तो लड़ सकता हूँ, इसकी गंदगी और बदबू से नहीं...
राघवेन्द्र राव
मणिपुर में पिछले तीन महीने से ज़्यादा समय से चल रही जातीय हिंसा के बीच राज्य में तैनात सुरक्षा बलों के बीच जमीनी स्तर पर हो रहे टकराव अब खुलकर सामने आ गए हैं।
ताजा घटनाक्रम में मणिपुर पुलिस ने असम राइफल्स के सैनिकों के खिलाफ काम में बाधा डालने, चोट पहुँचाने की धमकी देने और गलत तरीके से रोकने की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है।
असम राइफल्स की 9वीं बटालियन के सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ ये एफआईआर विष्णुपुर जिले के फोउगाकचाओ इखाई पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है।
एफआईआर में कहा गया है कि नौ असम राइफल्स के सैनिकों ने मणिपुर पुलिस के कर्मियों को अपना काम करने से रोका और कथित कुकी उग्रवादियों को सुरक्षित क्षेत्र में भागने का मौका दिया।
असम राइफल्स एक केंद्रीय अर्धसैनिक बल है, जो मुख्य रूप से भारत-म्यांमार सीमा पर तैनात है। असम राइफल्स भारतीय सेना के ऑपरेशनल नियंत्रण के तहत काम करता है।
असम राइफल्स की भूमिका पर उठते सवालों का भारतीय सेना ने खंडन किया है। भारतीय सेना का कहना है कि ‘ज़मीनी हालात की जटिल प्रकृति की वजह से विभिन्न सुरक्षा बलों के बीच सामरिक स्तर पर कभी-कभी मतभेद हो जाते हैं’ जिनका निपटारा सयुंक्त तंत्र के जरिये तुरंत कर लिया जाता है।
इस मामले को लेकर सेना का कहना है कि असम राइफल्स हिंसा रोकने के लिए कुकी और मैतेई क्षेत्रों के बीच बनाये गए बफर जोन को सुनिश्चित करने के लिए कमांड मुख्यालय द्वारा दिए गए कार्य को अंजाम दे रही थी।
क्या है मामला?
असम राइफ़ल्स के खिलाफ दर्ज एफआईआर में मणिपुर पुलिस ने कहा है कि पाँच अगस्त को सुबह साढ़े छह बजे राज्य पुलिस की टीमें क्वाक्ता वॉर्ड नंबर आठ के पास फोल्जांग रोड के इलाके में अभियुक्त कुकी विद्रोहियों का पता लगाने पहुँची।
कुछ ही घंटे पहले दिन में कऱीब साढ़े तीन बजे क्वाक्ता में हथियारबंद अपराधियों ने सो रहे तीन मैतेई लोगों की हत्या कर दी थी। मरने वालों में दो लोग पिता-पुत्र थे। मणिपुर पुलिस को ये शक था कि इस हत्याकांड में कुकी विद्रोहियों का हाथ है और शायद वो अब भी उसी इलाके में शरण लिए हुए हैं।
मणिपुर पुलिस के मुताबिक जब उनकी टीमें इलाके में कुतुब वाली मस्जिद पहुंचीं तो असम राइफल की 9वीं बटालियन के कर्मियों ने क्वाक्ता फोल्जांग रोड के बीच अपनी बख्तरबंद कैस्पर गाडिय़ां लगाकर उन्हें आगे जाने से रोका और इसी वजह से कुकी आतंकियों को किसी सुरक्षित जगह भाग जाने का मौका मिला।
इस घटना से जुड़ा एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो में मणिपुर पुलिस और असम राइफ़ल्स के जवानों के बीच तीखी बहस होते देखी जा सकती है। साथ ही मणिपुर पुलिस के एक जवान को असम राइफल्स पर हथियारबंद अपराधियों के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए देखा जा सकता है।
यह पहला टकराव नहीं
ये हालिया घटना पहला ऐसा मामला नहीं है, जब मणिपुर पुलिस और असम राइफ़ल्स के बीच होती तकरार साफ़ तौर पर देखी गई।
दो जून को एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें देखा जा सकता था कि असम राइफल्स की 37वीं बटालियन के कर्मियों ने सुगनु पुलिस स्टेशन के मेन गेट पर एक बख्तरबंद कैस्पर गाड़ी लगा कर उसका रास्ता रोक दिया था। साथ ही वीडियो में ये भी दिखा कि सुगनु पुलिस स्टेशन के सामने की सडक़ पर दोनों तरफ कैस्पर गाडिय़ां लगाकर पुलिस स्टेशन तक पहुँचने के रास्ता रोक दिया गया था।
इस घटना के वीडियो में भी मणिपुर पुलिस के जवानों को असम राइफल्स के सुरक्षाकर्मियों से तीखी बहस करते देखा जा सकता है।
जुलाई के महीने में जब बीबीसी सुगनु पुलिस स्टेशन पहुँचा तो वहाँ तैनात मणिपुर पुलिस के कर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्होनें असम राइफल्स की 37वीं बटालियन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।
एफ़आईआर दिखाते हुए एक अधिकारी ने बताया कि असम पुलिस पर कर्तव्य में बाधा डालने, चोट पहुँचाने की धमकी देने और ग़लत तरीक़े से रोकने की धाराओं के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है।
एफ़आईआर में ये साफ तौर पर लिखा गया था कि असम राइफल्स का इरादा पुलिस स्टेशन पर हमला करने का था।
हमने सुगनु पुलिस स्टेशन पर तैनात जवानों से जानना चाहा कि ये घटना क्यों हुई? उनमें से एक ने कहा, ‘हम नहीं जानते कि उनकी असली मंशा क्या थी। पर ये बहुत चौंकाने वाला था।’
भारतीय सेना असम राइफल्स के बचाव में
असम राइफल्स पर लग रहे आरोपों का भारतीय सेना ने खंडन किया है। ट्विटर पर जारी किए गए एक बयान में भारतीय सेना ने कहा कि कुछ विरोधी तत्वों ने तीन मई से मणिपुर में लोगों की जान बचाने और शांति बहाल करने की दिशा में लगातार काम कर रहे केंद्रीय सुरक्षा बलों विशेष रूप से असम राइफ़ल्स की भूमिका, इरादे और अखंडता पर सवाल उठाने के हताश और असफल प्रयास बार-बार किए हैं।
भारतीय सेना ने कहा, ‘यह समझने की जरूरत है कि मणिपुर में जमीनी हालात की जटिल प्रकृति के कारण विभिन्न सुरक्षा बलों के बीच सामरिक स्तर पर कभी-कभी मतभेद हो जाते हैं। हालाँकि कार्यात्मक स्तर पर ऐसी सभी गलतफहमियों को मणिपुर में शांति और सामान्य स्थिति की बहाली के प्रयासों में तालमेल बिठाने के लिए संयुक्त तंत्र के माध्यम से तुरंत संबोधित किया जाता है।’
भारतीय सेना ने कहा कि ‘असम राइफल्स को बदनाम करने के उद्देश्य से पिछले 24 घंटों में दो मामले सामने आए हैं।’
‘पहले मामले में असम राइफल्स बटालियन ने दो समुदायों के बीच हिंसा को रोकने के उद्देश्य से बफर जोन दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करने के एकीकृत मुख्यालय के आदेश के अनुसार सख़्ती से काम किया है। दूसरा मामला असम राइफ़ल्स को एक ऐसे क्षेत्र से बाहर ले जाने का है, जिससे उनका कोई संबंध भी नहीं है।’
जिस दूसरे मामले की बात यहाँ की गई है, वो भी एक वीडियो से जुड़ा हुआ है, जिसमें महिलाएं एक फौजी वर्दी पहने अधिकारी के पैरों पर गिरकर रोती-बिलखती नजर आ रही हैं।
इस वीडियो के जरिये ये दावा किया गया था कि ये महिलाएं कुकी-जो समुदायों से हैं जो अपने इलाके से असम राइफल्स को हटाकर किसी अन्य सुरक्षाबल को तैनात करने की योजना का विरोध कर रही हैं और रो-रोकर असम राइफल्स से वहाँ रुकने की गुहार लगा रही है।
भारतीय सेना ने अब कहा है कि मई में मणिपुर में संकट पैदा होने के बाद से सेना की एक इन्फैंट्री बटालियन उस क्षेत्र में तैनात है, जहाँ से असम राइफल्स को हटाने की कहानी बनाई गई है।
भारतीय सेना ने ये भी कहा है कि वो और असम राइफल्स मणिपुर के लोगों को आश्वस्त करते हैं कि वो पहले से ही अस्थिर माहौल में हिंसा को बढ़ावा देने वाले किसी भी प्रयास को रोकने के लिए अपने कार्यों में दृढ़ बने रहेंगे।
असम राइफल्स के खिलाफ बढ़ती नाराजगी
मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच चल रही जातीय हिंसा में अब तक 152 लोगों की मौत हो चुकी है। करीब 60,000 लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए हैं। इनमें से कुछ राज्य छोडकर चले गए हैं और हजारों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं।
हज़ारों की संख्या में भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों को मणिपुर में तैनात किया गया है। लेकिन असम राइफल्स एक ऐसा बल है जो पिछले कई वर्षों से मणिपुर के कई इलाकों, खासकर पहाड़ी और म्यांमार से लगती सीमा के इलाकों पर तैनात है। पहाड़ी और सीमा से लगते इलाक़े कुकी बाहुल्य वाले हैं और इसी बात को आधार बना कर बार-बार ये इल्जाम लगाया जाता रहा है कि असम राइफल्स और कुकी समुदाय में घनिष्ठता है।
11 जुलाई को मणिपुर के 31 विधायकों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखकर कहा कि असम राइफल्स की 9वीं, 22वीं और 37वीं को राज्य से हटा दिया जाए और ऐसे दूसरे केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की जाए जो राज्य की एकता को बढ़ावा देने की ओर ज़्यादा इच्छुक हैं।
इन विधायकों का ये भी कहना था कि असम राइफल्स की कुछ इकाइयों द्वारा निभाई गई भूमिकाओं को लेकर चिंताएं हैं जो वर्तमान में राज्य के भीतर एकता के लिए खतरा पैदा करती हैं।
सात अगस्त को मणिपुर की भारतीय जनता पार्टी इकाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे एक ज्ञापन में कहा कि राज्य में शांति बनाए रखने में असम राइफल्स की भूमिका की काफी आलोचना हो रही है और सार्वजनिक आक्रोश देखने को मिल रहा है।
इस ज्ञापन में कहा गया कि असम राइफल्स निष्पक्षता बनाये रखने में असफल रही और जनता ये आरोप लगा रही है कि उनकी भूमिका पक्षपातपूर्ण है जिसमें वो एक समुदाय का समर्थन कर रहे हैं।
मणिपुर भाजपा ने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है कि जनहित में असम राइफल्स को हटाकर किसी अन्य अर्धसैनिक बल को स्थाई रूप से मणिपुर में तैनात किया जाए। (bbc.com/hindi/)
-अपूर्व गर्ग
राहुल गाँधी अपनी ज़िंदगी जिस स्वाभाविक ढंग से प्यार से मोहब्बत से जीते हैं वही उनकी बॉडी लैंग्वेज है. उनकी ओर देखकर लोग हँसे और उन्होंने अपनी प्यारी मुस्कान के साथ स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया दी और राजस्थान रवाना हो गए.
जाने से पहले उन्होंने मणिपुर पर बेहद आक्रामक वक्तव्य रखा. वो सोलह मिनट बोले पर उन्हें चार मिनट कमरे पर दिखाया गया . क्या ये मुद्दा बना ? उन्होंने मणिपुर पर जो कहा वो बात क्या सुर्खियां बनी . ज़रा गूगल करके देखिये, सुर्खियां क्या हैं ?
INDIA ने जो लाइन अविश्वास प्रस्ताव पर रखी, वो कहाँ खो गयी, सोचिये ?
क्या राहुल गाँधी या गाँधी परिवार के किसी सदस्य ने बीजेपी के फैलाए जा रहे फ्लाइंग किस अजेंडे को गंभीरता से लिया? नहीं ...क्योंकि वे जानते हैं बीजेपी इसे उछाल-उछाल कर मूल मुद्दे से ध्यान बंटाना चाहती है.
फ्लाइंग किस छोड़िये ...जो लोग उनकी टी-शर्ट, जूतों को मुद्दा बनाते हैं, कल फ्लाइंग किस नहीं भी होता तो उनकी शर्मीली मुस्कान मुद्दा बन जाती !
समझिये, राहुल गाँधी का कल का वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण था.
मणिपुर पर अब तक सबसे मारक बात उन्होंने संसद में रखी.
बीजेपी को इसे हेड लाइन बनने से रोकना ही था.
किसी न किसी बहाने वो कोई न कोई हेड लाइन गढ़ते ही जैसा अब तक हमने देखा. बहरहाल, राहुल के मणिपुर पर आक्रामक भाषण को अपने जी हुज़ूर मीडिया के साथ उन्होंने भटकाने का बंदोबस्त कर लिया.
बीजेपी के आईटी सेल का फोकस भी इस पर रहा.
राहुल की सिर्फ मणिपुर पर बात नहीं बल्कि राजस्थान में विश्व आदिवासी दिवस पर उन्होंने आदिवासियों के बीच कॉर्पोरेट लूट पर जो कहा वो सब गायब हो गया.
सवाल बीजेपी से नहीं ..
सवाल इनके आईटी सेल से नहीं ..
सवाल उन लोगों से है जो INDIA के लिए लिख -बोल और सोच रहे हैं , उनकी क़लम क्यों बहक रही है ?
खंडित हो चुका, लुट चुका मरा मरा सा मणिपुर इस देश पर आस लगाए बैठा है और लोग अपना कीमती समय और स्पेस फ्लाइंग किस को दे रहे.
आप अगर राहुल गाँधी के समर्थन में खड़े हैं तो देखिये जब आप फ्लाइंग किस मुद्दे में उलझे हैं उस वक़्त वो राजस्थान के मानगढ़ धाम में जनसभा में आदिवासियों से कह रहे थे - :
"वो (भाजपा) क्या कहते हैं? वो कहते हैं आप आदिवासी नहीं हो, आप हिंदुस्तान के पहले निवासी नहीं थे, वो कहते हैं कि आप आदिवासी नहीं, वनवासी हो। मतलब आप इस देश के ओरिजनल मालिक नहीं हो, आप तो जंगल में रहते हो। ये आपका अपमान है, ये भारत माता का अपमान है, सिर्फ आदिवासियों का नहीं, पूरे देश का अपमान है।....वे (भाजपा) आपको वनवासी कहते हैं फिर आप के जंगल आप से ही छीनकर अडानीजी को पकड़ा देते हैं। ..''
मणिपुर, आदिवासियों पर हमले, रोजगार का सवाल, भयानक महंगाई, भ्रष्टाचार ..जैसे मुद्दों से देश जल रहा है उसे बीजेपी चुटकुलों की बारिश से बुझाना चाहती है.
आप लड़ाई की इस आग को अपने दिल में जलते रहने दीजिये.
चुटकुलों की दुनिया से बाहर आकर गंभीरता से INDIA इस सरकार पर जिस तरह से अविश्वास रख रही ,जिन मुद्दों को उठा रही उसे आप भी उठाइये.
प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी के हवाले से यह मार्मिक किस्सा सुनिए-
एक पुरानी घटना और मुझे याद आती है। प्रेस खुल गया था और आप स्वयं वहां काम करते थे। जाड़े के दिन थे। मुझे उनके सूती पुराने कपड़े भद्दे जंचे, और गर्म कपड़े बनाने के लिए अनुरोधपूर्वक दो बार 40 -40 रुपए दिए परंतु उन्होंने दोनों बार वे रुपए मजदूरों को दे दिए।घर पर जब मैंने पूछा- ‘कपड़े कहां हैं?’ तब आप हंसकर बोले-‘कैसे कपड़े? वे रुपए तो मैंने मजदूरों को दे दिए। शायद उन लोगों ने कपड़ा खरीद दिया होगा।’
इस पर मैं नाराज हो गई पर वह अपने सहज स्वर में बोले-‘रानी, जो दिन भर तुम्हारे प्रेस में मेहनत करें, वे भूखों मरें और मैं गर्म सूट पहनूं, यह तो शोभा नहीं देता।’ उनकी इस दलील पर मैं खीझ उठी और बोली, ‘मैंने कोई तुम्हारे प्रेस का ठेका नहीं लिया है !’ तब आप खिलखिला कर हंस पड़े और बोले-‘जब तुमने मेरा ठेका ले लिया है, तब मेरा रहा क्या, सब तुम्हारा ही तो है। फिर हम -तुम दोनों एक नाव के यात्री हैं। हमारा- तुम्हारा कर्तव्य जुदा नहीं हो सकता, जो मेरा है वह तुम्हारा भी है क्योंकि मैंने अपने आपको तुम्हारे हाथों में सौंप दिया है। ‘मैं निरुत्तर हो गई और बोली-
‘मैं तो ऐसा सोचना नहीं चाहती’ तब उन्होंने असीम प्यार के साथ कहा- ‘तुम पगली हो’।
जब मैंने देखा कि इस तरह वे जाड़े के कपड़े नहीं बनवाते हैं तब मैंने उनके भाई साहब को रुपए दिए और कहा कि उनके लिए आप कपड़े बनवा दें, तब बड़ी मुश्किल से अपने कपड़ा खरीदा। जब सूट बनकर आया, तब आप पहन कर मेरे पास आए और बोले: ‘मैं सलाम करता हूं। मैं तुम्हारा हुक्म बजा लाया हूं।’ मैंने भी हंसकर आशीर्वाद दिया और बोली-‘ईश्वर तुम्हें सुखी रखें और हर साल नए-नए कपड़े पहनो।’ कुछ रुक कर फिर मैंने कहा- ‘सलाम तो बड़ों को किया जाता है। मैं न तो उम्र में बड़ी हूं ,न रिश्ते में, न पदवी में। फिर आप मुझे सलाम क्यों करते हैं?’ तब उन्होंने उत्तर दिया-‘उम्र या रिश्ता या पदवी कोई चीज नहीं है। मैं तो हृदय देखता हूं और तुम्हारा हृदय मां का हृदय है। जिस प्रकार माता, अपने बच्चों को खिला-खिला कर खुश होती है, उसी प्रकार तुम भी मुझे देखकर प्रसन्न होती हो और इसीलिए अब मैं हमेशा तुम्हें सलाम किया करूंगा।’
हाय, मई, 1936 में उन्होंने स्नान करके नई बनियान पहनी थी और मुझे सलाम किया था- यही उनका अंतिम सलाम था।
(‘प्रेमचंद घर में’ का एक अंश )
डॉ. आर.के. पालीवाल
लोकतंत्र में किसी भी सरकार की प्राथमिकता जन कल्याण आधारित योजनाएं होनी चाहिए। लेकिन जब सरकार के अधिकांश मंत्रालय किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के शक्तिशाली समूह की चाटुकारिता करने लगते हैं तब स्थितियां बहुत विचित्र और हास्यास्पद होने लगती हैं। थोडी बहुत चाटुकारिता मानव जीवन में स्वाभाविक है, लेकिन जब यह मर्यादा की सीमा तोडऩे लगती है तब जन कल्याण का लक्ष्य कहीं पीछे छूट जाता है और सरकार का लगभग हर मंत्रालय और हर मंत्रालय का लगभग हर विभाग चाटुकारिता की दौड़ में एक दूसरे को पीछे छोड़ देने के लिए विवेक को खूंटी पर टांग देता है और यह कोशिश करता है कि चाटुकारिता की मैराथन में स्वर्ण पदक उसे ही मिलना चाहिए।
रेलवे इस मामले में इस समय सबसे आगे है। जितनी भी नई वंदे भारत ट्रेन शुरु की जा रही हैं उन्हें हरी झंडी दिखाने के लिए प्रधान मंत्री के कार्यक्रम का इन्तजार करना पड़ता है। ऐसा लगता है कि पूरा रेल अमला वंदे भारत पर ध्यान केंद्रित कर रहा है भले ही जनता और मीडिया कई रूट पर महंगे किराए वाली वंदे भारत चलाने पर रेलवे की आलोचना कर रहा है और ट्रेन दो तिहाई खाली जा रही हो। वंदे भारत प्रधान मंत्री का प्रिय प्रोजेक्ट है इसलिए रेल मंत्री उसे इतनी अहमियत दे रहे हैं।हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने गुजरात के उस स्कूल का कायाकल्प कर प्रेरणा स्थली के रुप में विकसित करने की योजना बनाई है जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राथमिक शिक्षा ली थी। इसके निमार्ण के बाद यहां अन्य स्कूलों के बच्चों के टूर लाकर स्कूली बच्चों को प्रेरणा दिए जाने की योजना है।निकट भविष्य में यह भी संभव है कि जिस स्टेशन पर प्रधानमंत्री चाय बेचते थे वहां भी चाय की मार्केटिंग के लिए कोई राष्ट्रीय चाय केंद्र बन सकता है जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों के चाय विक्रेताओं को मार्केटिंग के लिए प्रेरणा मिल सके।
इस मामले में केवल वर्तमान केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते।कांग्रेस का इतिहास भी काफी कलंकित रहा है। आपात काल और उससे दो साल पहले कांग्रेस में संजय गांधी की ऐसी असंवैधानिक चौकड़ी थी जिसके इशारों पर तमाम मंत्रालय कठपुतली की तरह नाचते थे।क्षेत्रीय दलों की प्रदेश सरकार भी इस मामले में राष्ट्रीय दलों से कतई पीछे नहीं रही हैं। उदाहरण स्वरूप उत्तर प्रदेश में यह काम काफ़ी पहले मुलायम सिंह यादव और मायावती भी कर चुके हैं जिन्होंने अपने अपने जन्मस्थलों को फाइव स्टार गांव बनाने के लिए जन संसाधन पानी की तरह बहाए थे। मायावती का अपने दल के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों का आकर्षण तो इतना ज्यादा था कि लखनऊ से लेकर नोएडा तक कई करोड़ की हाथी की मूर्तियां लगवा दी गई थी। बाद में चुनाव के समय चुनाव आयोग के निर्देश पर चुनाव पूरे होने तक इन मूर्तियों को ढकवाना पड़ा था।
वर्तमान केन्द्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश सरकारों के लिए नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं यथा शिक्षा, स्वास्थ, सडक़, बिजली और कानून व्यवस्था से ज्यादा देश के मंदिरों के आसपास देवताओं के नाम पर लोक बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। अकेले मध्य प्रदेश की बात करें तो उज्जैन में महाकाल लोक के बाद अब प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में आधा दर्जन धार्मिक लोक निर्माण की योजनाएं घोषित हुई हैं। दुर्भाग्य यह भी है कि हाल में किए गए महाकाल लोक जिसका उदघाटन बहुत जोर शोर से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से हुआ था, उसकी विशालकाय मूर्तियां थोडी सी आंधी में धरासाई हो गई। धार्मिक स्थलों के निर्माण में भी भ्रष्टाचार का प्रवेश हमारे सरकारी और गैर सरकारी समाज के सडऩे का जीवंत प्रतीक है। धार्मिक लोक के निर्माण में यह आक्षेप भी लग सकता है कि धर्म विशेष के पूजा स्थलों को प्राथमिकता देना संविधान सम्मत नहीं है लेकिन सत्ता केंद्रित राजनीति में कोई भी राजनीतिक दल बहुसंख्यक समाज के वोट बैंक के कारण यह प्रश्न उठाने का साहस नहीं कर सकता।
प्रकाश दुबे
फिरोज गांधी ने मूंदड़ा कांड का भांडा फोड़ा। उनके ससुर प्रधानमंत्री समेत अनेक महानुभाव अप्रसन्न थे। उन दिनों अपनी बात जनता तक बेरोकटोक जस की जस पहुंचाने का एकमात्र माध्यम समाचार पत्र थे। अखबारों पर खतरे की तलवार लटक रही थी। जिन कारोबारियों का घोटाला उजागर किया गया था, वे खबर छापने वाले समाचार पत्रों के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर कर सकते थे। संसद ने 4 मई 1956 में कानून पारित किया, जिसे फिरोज गांधी अधिनियम कहा जाता है। संसद के अंदर कही गई बातों को छापने पर न्यायालय में मानहानि का खतरा टला। आपात्काल में इस कानून को निरस्त कर दिया गया था। संसद के बाहर फब्ती कसने पर राहुल गांधी की सदस्यता गई। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को पलट दिया। न्यायपालिका की दखलंदाजी मानने वाले आलोचकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के पिता और बाबा की जन्म कुंडली खंगाली। यही सोचते कि न्यायपालिका अपने घर की सफाई में जुटी है।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात करने पर वकील प्रशांत भूषण पर एक रुपया जुर्माना ठोंका गया। क्यों कि उन्होंने माफी मांगने से इन्कार किया। देश के पूर्व केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री शांति भूषण ने बंद लिफाफा भेजा था। लिफाफा खुलने पर भ्रष्टाचार के छींटों की रंगत का पता लगता। भ्रष्टाचार मुक्त भारत संवारने में सहज ही आसानी होती। वकीलों के राष्ट्रीय संगठन की कमान संभाल चुके दुष्यंत दवे ने खुले आम पारदर्शिता की मांग करते हुए न्यायपालिका की सफाई की तत्काल जरूरत पर जोर दिया। अपनी कलम से अजब गजब फैसले लिखकर इतिहास रचने वालों की लंबी सूची है। दूसरी तरफ ऐसे न्यायाधीश हैं जिन्होंने पद छोडऩा बेहतर समझा। न्यायमूर्ति रोहित देव ने बांबे हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से मुक्ति पाने की भरी अदालत में घोषणा की। जवाहरलाल नेहरू विवि के प्रो साईंबाबा को जमानत मंजूरी और गौण खनिज शुल्क माफी के सरकारी आदेश को न्यायविरुद्ध ठहराने वाले उनके फैसलों पर हलचल मची थी। कारण छुपा नहीं है।
देश की सबसे बड़ी अदालत की कमान संभाल चुके राजन गोगोई, दीपक मिश्रा, शरद बोबड़े सहित अनेक न्याय प्रक्रिया के अनुभवी बेहतर बता सकते हैं कि एक सांसद को दो साल की सजा देने के पक्ष में फैसले में कारण जताने के बजाय आरोपकर्ता की दलीलें देकर न्यायपालिका का कितना हित किया? राजनीति घसीटने की जरूरत नहीं है। फर्जी जाति प्रमाणपत्र देने, महिला पहलवानों से अभद्रता के आरोप के बावजूद सरेआम ताल ठोंकते घूमने, दंगों और हत्याओं के आरोपी व्यक्तियों के बारे में कार्रवाई में कमी पर सरकार और संसद की तरफ अंगुली उठाने के बजाय न्यायपालिका अपने घर की सफाई करने में जुट गई। लोकतंत्र के बाकी अंग भी पहल से प्रभावित होकर मैले कुचैले दाग धोने के लिए चुल्लू भर पानी की तलाश करेंगे। भारत रूस नहीं है जहां प्रतिपक्ष के नेता अलेक्सेई नवनलनी साढ़े 11 वर्ष की जेल काट रहें हैं। दो दिन पहले एक अदालत ने 19 वर्ष की अतिरिक्त सजा भुगतने का फरमान सुनाया। न्यायपालिका मर्यादा पार करे तब हर नागरिक को सवाल पूछने का हक है। लोकतंत्र के खम्भे की मजबूती के लिए, न कि किसी आरोपित के बचाव के लिए। आपात्काल में उन दिनों के दो नौसिखिया वकील स्वराज कौशल और सुषमा स्वराज ने बड़ौदा बारूद कांड में कैदी जार्ज फर्नांडिस का मुकदमा लेने का साहस किया। मधुर नाम वाली उनकी बेटी बांसुरी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी-अदालत मणिपुर की तरफ ही देखेगी? इस तरह के मामले अन्यत्र भी हो रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने प्रश्न किया-आप कहना चाहती हैं कि जब तक बाकी किसी जगह कार्रवाई न हो, इतने गंभीर हादसे पर गौर नहीं किया जाए? राज्यपाल रह चुके पिता और कई जिम्मेदारियों और संघर्षों से जूझती मां की बेटी को समझ में आया कि कानून में भी पक्षपात और पारदर्शिता परस्पर विरोधी शब्द हैं।
न्यायपालिका के मंदिर में कहां फाइलों पर धूल चढ़ी है, किस कोने में विराजमान मठाधीश के कान किसी के फूंके मंत्र को सुनने में जुटे हैं? अपने परिसर की सफाई की पहल करने पर सब समझ में आता है। न्यायपालिका ने शुरुआत की। असर हुआ। सांसद रामशंकर कठेरिया को दो साल की सजा हुई।बलवा करने और मारपीट का मुकदमा 11 बरस से चल रहा था। पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने नूंह में बुलडोजर न्याय रुकवा दिया। यदि यह पहल अन्य राज्यों में पहले होती तब कानून के शासन पर भरोसा जारी रहता। कई बार एक साथ थानेदार और न्यायाधीश बनने का शौक पूरे समाज के लिए परेशानी पैदा करता है।राजनीतिक शक्तियों और न्यायायिक प्रक्रिया की होड़ ऐसे मुद्दों पर है जिनसे जनहित का कोई वासता नहीं है। राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के विवाद चौराहे पर हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री महीनों से बिजली नियामक आयोग के अध्यक्ष पद को लेकर एकराय नहीं बना सके। उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने चार अगस्त को न्यायमूर्ति जयंत नाथ की इस शर्त पर नियुक्ति की आम सहमति बनने तक वे काम देखें।
दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश नाथ की नियुक्ति का सबसे बड़ा सबक यह है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका में अबोलेपन की खाई गहरी हो चुकी है। सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता लाने के लिए शासन और न्यायपालिका के बीच सकारात्मक होड़ लाभदायी साबित होगी। संसद को आखिर किस बात की झिझक है? सरकार को डर किस बात का है?चुनावी चंदे को गुप्त रखने की मंशा को अदालत ने मान लिया। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग पर अदालत ने टिप्पणी की-राजनीतिक दलों का निर्णय करने का अपना तरीका है। पारदर्शिता के नाम पर उनसे हर बात सार्वजनिक करने के लिए नहीं कहा जा सकता। आपसी विश्वास के अभाव से अमृतकाल में टकराव का जहर फैलेगा। दो कदम तुम भी चलो वाली भावना से दोनों का भला होगा।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
आदर्श राठौर
‘परिवार का ऐसा कोई सदस्य नहीं है, जिससे उसने मारपीट न की हो। एक बार उसने अपनी मां को इतनी बुरी तरह पीटा कि उसकी बांह की हड्डी फ्रैक्चर हो गई। मैं रोकने लगा तो मेरे सिर पर डंडे से वार कर दिया।’
शिमला के पास एक गांव में रहने वाले धर्मवीर (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि उनका छोटा बेटा शराब पीकर अक्सर हिंसक हो उठता है।
धर्मवीर कहते हैं, ‘पहले वह ठीक था लेकिन कॉलेज जाने के बाद उसमें बदलाव आने लगा। अक्सर शराब पीकर घर लौटता और हम टोकते तो हंगामा करता। एक बार उसने अपनी मां से पैसे मांगे, उसने देने से इनकार किया तो धक्का देकर गिरा दिया। मुझे पता चला तो मैंने उसे घर से निकल जाने को कहा।’
मगर धर्मवीर ने दो दिन बाद ही एक रिश्तेदार के यहां ठहरे बेटे को वापस बुला लिया था।
वह बताते हैं, ‘मैंने सोचा था कि बेचारा कहां भटकेगा। कुछ महीनों तक सब ठीक चला मगर फिर हालात खऱाब हो गए। नशा करके वह हमें पीटने लगा। हम शर्म के मारे चुप रहे। न तो उसने पढ़ाई पूरी की और न ही कोई काम पकड़ा।’
‘बदनाम इतना हुआ कि उसकी शादी भी नहीं हुई। अब वह 45 साल का हो चुका है और मेरी पेंशन पर आश्रित है। उसके व्यवहार से तंग आकर बड़ा बेटा औह बहू अलग होकर रहने लगे थे।’
‘अब हमारी उम्र भी हो चली है। पता नहीं हमारे बाद उसका क्या होगा।’
धर्मवीर जैसे कई माता-पिता हैं जो अपने बच्चों से लगातार मिल रहे तनाव, प्रताडऩा और शोषण से मुक्ति चाहते हैं।
वे जानते हैं कि खतरनाक बन चुके इस रिश्ते को तोडऩा जरूरी है मगर चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहे।
‘अटूट’ बंधन
माता-पिता और बच्चों के रिश्ते को प्यार का ऐसा अटूट बंधन माना जाता है जो हर सुख-दुख में बना रहता है। मगर कुछ माता-पिता को इस रिश्ते को बनाए रखने में मुश्किलें आ सकती हैं।
कुछ के जीवन में ऐसा दौर भी आता है, जब वे भारी मन से इस नाते को तोडऩे का फ़ैसला कर लेते हैं।
बच्चों द्वारा अपने माता-पिता से बोलचाल बंद करने के मामलों की चर्चा आजकल आम होने लगी है। माता-पिता भी बच्चों से बोलचाल बंद करते हैं मगर कुछ शोध बताते हैं कि ऐसे मामले कम सामने आते हैं।
ब्रितानी सामाजिक संस्था ‘स्टैंड अलोन’ द्वारा 2015 में किए गए अध्ययन के मुताबिक़, बच्चों से अलग हो चुके माता-पिताओं में पांच फ़ीसदी ही ऐसे थे, जिन्होंने ख़ुद से अलग होने का फ़ैसला किया था।
और इन लोगों का कहना था कि इस तरह का फैसला लेना उनके लिए बहुत ही मुश्किल और कष्टदायक था। इस फैसले ने उन्हें अकेलेपन और शर्मिंदगी की तरफ भी धकेल दिया था।
लूसी ब्लेक यूनिवर्स्टी ऑफ दि वेस्ट इंग्लैंड, ब्रिस्टल में मनोविज्ञान की वरिष्ठ प्रवक्ता हैं और एस्ट्रेन्जमेंट यानी संबंध विच्छेदन की विशेषज्ञ हैं।
वह कहती हैं, ‘शोध और संस्कृतिक मुख्यधारा, दोनों में ही बच्चों से संबंध तोडऩे वाले माता-पिता कम देखने को मिलते हैं क्योंकि यह एक वर्जित विषय (टैबू) है और लोग आलोचनाओं के डर से इस तरह के अनुभव को साझा करने से बचते हैं।’
‘जिम्मेदारी’ का बोझ
माता-पिता द्वारा अपने बच्चों से रिश्ते तोडऩे के कारण अमूमन वही होते हैं, जिन कारणों से बच्चे अपने माता-पिता से संबंध तोड़ते हैं। जैसे कि पारिवारिक विवाद, नशे की लत, विचारधारा में फर्क और खराब व्यवहार वगैरह। लेकिन बच्चों के मुकाबले माता-पिता के लिए इस रिश्ते को तोडऩा आसान नहीं होता।
लखनऊ में कऱीब दो दशक से काउंसलिंग कर रहे मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे इसकी वजह बताते हैं कि सामाजिक तौर पर माता-पिता से उम्मीद की जाती है कि वे बच्चों को बिना शर्त प्यार करें और उनकी देखभाल करते रहें।
वह कहते हैं, ‘माता-पिता बच्चों को जन्म देते हैं, उनकी परवरिश करते हैं। मनोवैज्ञानिक तौर पर उन्हें लगता है कि बच्चे को आगे ले जाना पूरी तरह हमारी जि़म्मेदारी है। जबकि बच्चे के नजरिये से देखें तो उसे माता-पिता से हमेशा कुछ न कुछ मिला ही होता है, उसने दिया नहीं होता। ऐसे में वह उतना करीब नहीं हो पाता, जितना माता-पिता होते हैं।’
‘माता-पिता अपना भविष्य अपने बच्चे के अंदर देखते हैं। जबकि बच्चे जब अपना भविष्य देखते हैं तो उनकी प्राथमिकताएं अलग होती हैं, जैसे कि करियर, पैसा, कामयाबी। माता-पिता भी उनकी प्राथमिकताओं में होते हैं लेकिन वे पहले नंबर पर नहीं होते। लेकिन माता-पिता अक्सर बच्चे को ही सबसे ऊपर रखते हैं।’
संभवत: यही कारण है कि जब बच्चे परेशान कर रहे होते हैं, चोट पहुंचा रहे होते हैं, तब भी माता-पिता उन्हें नहीं छोड़ पाते।
धर्मवीर और उनकी पत्नी, बेटे के हिंसक व्यवहार के बावजूद उसके साथ रहते हैं। वह कहते हैं कि कई बार अलग होकर बड़े बेटे के पास जाने की योजना बनाई मगर यह सोचकर नहीं गए कि छोटे बेटे का क्या होगा।
ब्रिटेन की केंट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रवक्ता जेनिफऱ स्टोरी ने अन्य व्यक्तियों से की जाने वाली हिंसा के विषय का अध्ययन किया है।
वह कहती हैं, ‘मुझे एक भी मामला ऐसा याद नहीं आ रहा जहां कोई मां या पिता अपने बच्चे से रिश्ता तोडऩा चाहते हों। लगभग सभी चाहते हैं कि प्रताडऩा और शोषण बंद हो जाए मगर रिश्ता बना रहे।’ इस तरह के हालात में माता-पिता, बच्चों और उनके आसपास के लोगों के लिए भी हकीकत को स्वीकार करना आसान नहीं होता।
लूसी ब्लेक कहती हैं, ‘हम माता-पिता से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं रखते हैं। ठीक भगवान जैसी। हम चाहते हैं कि वे बिना शर्त प्यार करते रहें। लेकिन इससे कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। आप यह उम्मीद करने लगते हैं कि उन्हें हर तरह का व्यवहार स्वीकार करना चाहिए। मानसिक और आर्थिक शोषण भी।’
सामाजिक ढांचा
अमैंडा हॉल्ट ने किशोरों द्वारा माता-पिता को प्रताडि़त किए जाने पर ‘अडॉलसेंट टु पैरेंट अब्यूज़: करंट अंडरस्टैंडिंग इन रीसर्च, पॉलिसी एंड प्रैक्टिस’ नाम की कि़ताब लिखी है।
वह बताती हैं, ‘आमतौर पर यह माना जाता है कि माता-पिता ही शक्तिशाली होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, स्थिति बदलने लगती है। लोगों को इस बात का एहसास नहीं हो पाता कि बच्चे भी माता-पिता को प्रताडि़त कर सकते हैं या इस हद तक कर सकते हैं कि रिश्ता ही तोडऩा पड़े। यह भी एक कारण है कि माता-पिता नाता तोडऩे का फ़ैसला लेने से हिचकते हैं।’
अमैंडा हॉल्ट के मुताबिक़, बच्चों के साथ माता-पिता के जैविक, क़ानूनी और सामाजिक बंधन होते हैं। अगर आप बोलचाल बंद कर दें, तब भी ये बंधन बने रहते हैं। इन्हें तोडऩा बहुत मुश्किल होता है।
मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे कहते हैं, ‘भारत में शायद एक लाख में एक-दो पैरेंट्स ही ऐसे होंगे जो बच्चे से अलग हो पाए होंगे क्योंकि हमारी संस्कृति और समाज में इसे पाप की तरह देखा जाता है। हमारा सामाजिक ढांचा इसे स्वीकार नहीं करता।’
सकारात्मक माहौल ज़रूरी
अक्सर बच्चों की कामयाबी और नाकामयाबी को उनके माता-पिता से जोड़ा जाता है। ऐसे में अगर ऐसे बच्चे से रिश्ता तोडऩे की नौबत आ जाए, तब वे शर्म महसूस करते हैं और ख़ुद को क़ुसूरवार मानने लगते हैं। इससे वे अकेलेपन का शिकार हो सकते हैं और अपने मित्रों, यहां तक सगे संबंधियों से भी दूरी बना सकते हैं।
लूसी ब्लेक कहती हैं, ‘बच्चों से अलगाव उनके जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित कर सकता है। नाता तोडऩे की पहल करने वाले माता-पिता के पास ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो उनके प्रति समझ और सहानुभूति दिखा सकें। यह एक अलग तरह का कष्ट है क्योंकि उन्हें लग सकता है कि उनका जीवन ख़ाली और निरर्थक हो गया है। नतीजतन वह परिवार के अन्य सदस्यों और दोस्तों से भी नाता तोड़ सकते हैं।’
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे रिश्तों से बाहर निकलने वाले माता-पिताओं के लिए समाज में ऐसा वातावरण तैयार करना जरूरी है, जहां वे अकेला महसूस न करें। खासकर त्योहारों या जन्मदिन जैसे खास मौकों पर। ‘स्टैंड अलोन’ का शोध भी कहता है कि अलग रह रहे लोग इन दिनों ज़्यादा भावुक महसूस करते हैं। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के.पालीवाल
अंग्रेजी की बहु प्रचलित कहावत है कैरट एंड स्टिक पॉलिसी, जिसका मोटा मोटा सहज हिंदी अनुवाद गाजर और लाठी नीति बनता है। सरकार अपने अफसरों और अफसर अपने मातहद कर्मचारियों को नियंत्रण में रखने के लिए आदि काल से इस नीति का प्रयोग करते आए हैं। अंग्रेजी राज में इसका उपयोग देशी राजाओं, व्यापारियों और नौकरशाही पर शिकंजा कसने के लिए होता था। सरकार के पास प्रभावशाली लोगों को नियंत्रित करने के लिए तरह तरह की गाजर और लाठियां होती हैं। गाजर लालच देकर इंसान को पालतू पशु जैसा वफादार बनाने के लिए प्रयोग में आती हैं और लाठियां नियम कानून से चलने वालों को लाईन पर लाने के लिए दंड देने का काम करती हैं।
गाजर मलाईदार पद पर पोस्टिंग, कोई बड़ा पुरस्कार या सेवानिवृति के बाद एक्सटेंशन या कोई घोटाला होने के बाद भी जांच से बचाना आदि के रुप में मिलती हैं और लाठी किसी दूर स्थान पर लूप लाइन में डालना, सस्पेंड करने, सेवा से बर्खास्तगी और किसी तकनीकी गलती को अपराध बताकर जेल भेजना भी हो सकती है।
अंग्रेज यह सब खेल बहुत अच्छी तरह से खेलते थे। आज़ादी के आंदोलन में जब 1942 में निर्णायक घड़ी पास आ रही थी तब उन्होंने महात्मा गांधी से लेकर आज़ादी के आंदोलन के तमाम नेताओं को जेल में डाल दिया था लेकिन मुहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान बनाने के लिए हिंसक गतिविधियों की खुली छूट दे रखी थी और डॉ भीमराव अम्बेडकर को सरकार में मंत्री पद दे दिया था ताकि अंग्रेज सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय एकता का माहौल न बन सके। इसी तरह वे हर क्षेत्र के अग्रणी लोगों को अपना वफादार बनाने के लिए राय बहादुर आदि की उपाधियां बांटते थे ताकि अपने अपने इलाकों के ये असरदार लोग ब्रिटिश शासन को मजबूत बनाने के लिए तन मन धन से योगदान करें। आज़ादी के बाद नेताओं की जिस पीढ़ी ने सत्ता की बागडोर संभाली उनमें आधिकांश राजनीति को सेवा का सर्वोत्तम अवसर समझते थे इसलिए उन्होंने नौकरशाही से भी ऐसे लोगों को चुन चुन कर आगे बढ़ाया जिनकी योग्यता, क्षमता और कर्मठता उच्च स्तरीय थी और भावना लोक कल्याण से ओतप्रोत थी।
लाल बहादुर शास्त्री जी के कार्यकाल को देश की सत्ता में सेवाभाव के स्वर्ण काल का अंतिम अध्याय कहा जा सकता है। इंदिरा गांधी के शासन में नौकरशाहों पर गाजर और लाठी नीति की जबरदस्त शुरुआत हुई थी।आपात काल में अंग्रेजों की इस नीति को भारतीय लोकतंत्र ने नए आयाम दिए थे।उसके बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों ने इसे और ऊंचाई देते हुए ऐसे लोगों को भी प्रदेश की नौकरशाही का मुखिया बनाया जिन्हें आई ए एस एसोसिएशन ने महाभ्रष्ट अफसरों के रूप में चिन्हित किया था। गुजरात में भी नौकरशाही पर इस नीति को आजमाने के काफ़ी समाचार सामने आए हैं।वर्तमान दौर में केंद्र सरकार में भी नौकरशाही को लेकर कमोबेश ऐसी ही स्थितियां बनती जा रही हैं।नौकरशाही के सर्वोच्च पदों पर सरकार के इशारे समझने वाले और भ्रष्टतम अधिकारियों का चुना जाना न केवल ईमानदार और कर्मठ अधिकारियों का मनोबल तोड़ता है बल्कि ईमानदारी और भ्रष्टाचार के असमंजस में फंसे बहुत से अधिकारियों को भ्रष्टाचार की तरफ झुकने के लिए प्रेरित करता है।
सबसे पहले प्रमुख पदों के लिए जी श्रीमान कहने वालों का चुनाव कर गलती की जाती है फिर उन्हें बार बार एक्सटेंशन देकर गलती दोहराई जाती है। ऐसी परिस्थितियों में ही सर्वोच्च न्यायालय को इस तरह की कड़ी टिप्पणी करनी पड़ती है कि क्या सरकार अपने अन्य सभी अधिकारियों को नाकारा मानती है। चुनाव आयोग में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति करना जिसने व्यक्तिगत कारण बताकर कुछ दिन पहले सरकारी सेवा से ऐच्छिक निवृति ली हो सीधे सीधे सरकार और ऐसे अफसरों से मिलीभगत का प्रमाण है।वरिष्ठ आई ए एस और आई पी एस अधिकारियों को वी आर एस दिलाकर लोकसभा या विधानसभा चुनाव का टिकट देना भी इसी नीति के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
प्रभु झरवाल
मेवात के मेव समाज के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। मेवात में 9वीं-10वी शताब्दी के आसपास, राजपूतों के उदय से पहले। मेवाल गोत्र के राजाओं का शासन था। इसलिए इस क्षेत्र का नाम मेवात पड़ा। यहां के लोगों को मेव कहा जाता था। ये मेव शब्द उनको अपने अतीत से जोड़े रखता है। इसलिए मेव अपने आपको मुसलमान कहलाना पसंद नहीं करते, वे अपने आपको मेव कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। मुसलमान तो उनको हिंदुओं ने बनाया है, हिंदुओं ने मेवों को मुसलमानों की तरफ धकेला है।
मेव भारत का एक ऐसा समाज है जो हिंदू-मुस्लिम धर्म, संस्कृति दोनों को एक साथ जिया है, निभाया है। मेव समाज हिन्दू-मुस्लिम एकता, भाईचारे की कड़ी है। ये लगभग 1992 तक ईद के साथ साथ होली भी खेलते थे, दिवाली भी मनाते थे, हिंदुओं के लगभग सभी त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाते थे। शादी में निकाह भी पढ़ते थे, और फेरे भी लेते थे।
इनके पुरानी पीढ़ी के नाम भी मंगल खां, शेरू खां, कालू खां हिंदू मुस्लिम मिक्स नाम होते थे। दाढ़ी मूंछ हिंदुओं जैसे रखते थे। धोती-कुर्ता पहनते थे। 1992 के हिंदू मुस्लिम दंगों में इन्होंने महसूस किया की ना तो हिंदू अपना समझ रहे है और ना मुस्लिम अपना, दोनो की नफरत का शिकार कब तक होते रहेंगे। उनको लगा कि अब कहीं एक साइड हो जाना चाहिए।
हिंदू उनको अपना नहीं रहे थे, मुसलमानों में वे जाना नही चाह रहे थे। हिंदुओं ने इनके घर वापसी का कोई प्रयास किया नहीं, मुस्लिम संस्थाओं ने इनके लिए दरवाजे खोल दिए। 1992 के बाद से इनके पहनावे, नामकरण, रीति रिवाजों में तेजी से बदलाव आया। मेवात का मेव समाज मीना, जाट, गुर्जर, राजपूत और अन्य समाजों से बना हु़वा है। मेव समाज अभी भी अपने बच्चों की शादी मुसलमानों में नही करते, ये मेवों में ही करते है, चाचा, ताऊ के बच्चों के साथ शादी नहीं करते। ये तीन गोत्र टालते है। इन्होंने निश्चित कर रखा है की किन गोत्र में शादी करनी है, किनमें नहीं करनी।
मेवों का इतिहास बहुत ही शानदार और गौरवपूर्ण रहा है। मेवों को एक देशभक्त कौम के रूप में जाना जाता है। लेकिन विडंबना है कुटिल मानसिकता वाले लोग मेवों को भारत की प्राचीन संस्कृति और भाईचारे से पहले भी दूर धकेला है और अब भी धकेलते जा रहे है। मुस्लिम हो, अंग्रेज हो या कोई ओर, किसी भी बाहरी आक्रांता और आततायियों का मेवों ने मुंहतोड़ जवाब दिया है। आक्रांताओं से संघर्ष में इस समाज ने अपना बहुत कुछ खोया है।
दिल्ली से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर होते हुए भी विकास यहां से कोसो दूर है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, असुरक्षा की भावना चरम पर है। बेरोजगारी और अशिक्षा की वजह यहां के युवा अपराध की तरफ बढ़ गए। ना सरकार ने मेवात की तरफ ध्यान दिया, ना हिंदू मुसलमानों ने अपना समझकर इनका विकास करने में मदद की। निरंतर खतरा और असुरक्षा की भावना, गरीबी, बेरोजगारी निरंतर इनको अपराध की तरफ धकेल रही है। हिंदुस्तान के लोगों से निवेदन है कि मेवों को मेव ही रहने दो और मेवात को मेवात ही रहने दो, मिनी पाकिस्तान का ठप्पा लगाकर, अपने हिस्से को उपहार स्वरूप पाकिस्तान को भेंट ना करो।
दीपक मंडल
भारत सरकार ने लैपटॉप, पर्सनल कंप्यूटर और टैबलेट के आयात को प्रतिबंधित करने वाले फ़ैसले पर अमल पर फिलहाल रोक दिया है।
गुरुवार को एक अधिसूचना जारी कर इन आइटमों के आयात को तुरंत प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया गया था।
नई अधिसूचना में इन आइटमों के आयात के लिए लाइसेंस के लिए 31 अक्टूबर 2023 तक मोहलत दी गई है। विदेश व्यापार महानिदेशालय ने कहा है कि ये आदेश 1 नवंबर 2023 से लागू हो जाएगा।
दरअसल लैपटॉप,पर्सनल कंप्यूटर और टैबलेट समेत सात आइटमों के आयात को अचानक प्रतिबंधित कर देने के बाद उद्योग जगत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
आईटी हार्डवेयर से जुड़े सभी स्टेकहोल्डर्स का कहना है कि सरकार ने अचानक अधिसूचना जारी कर दी जबकि दिवाली के दौरान इन आइटमों की भारी मांग देखी जाती है। ऐसे में कंपनियों का बिजनेस बुरी तरह प्रभावित होगा।
मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ने विदेश व्यापार महानिदेशालय को ई-मेल भेज कर लाइसेंसिंग के लिए मोहलत देने की मांग की थी।
सरकार की अधिसूचना से घबरा कर कई ऑरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स ऐपल, सैमसंग और एचपी ने तुरंत प्रभाव से लैपटॉप और टैबलेट का आयात रोक दिया था।
इंडस्ट्री के सूत्रों को कहना है कि शायद इस फैसले की चौतरफा आलोचना की वजह से सरकार ने फिलहाल आदेश पर अमल रोक दिया है।
विदेशी व्यापार महानिदेशालय की पहली अधिसूचना में क्या कहा गया?
विदेश व्यापार महानिदेशालय ने गुरुवार को एक अधिसूचना जारी कर इनके आयात पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था। इसमें कहा गया था कि कंपनियों को अब इसके लिए लाइसेंस की ज़रूरत पड़ेगी।
इस फैसले पर अमल फिलहाल भले ही रुक गया है। लेकिन इससे ऐपल, डेल, लेनोवो, हेवलेट पैकर्ड और सैमसंग जैसी कंपनियों के कारोबार पर भारी असर पड़ सकता है।
उन्हें अब लोकल मैन्युफैक्चरिंग को रफ़्तार देनी होगी ताकि भारत में अपने उत्पादों की मांग पूरी कर सकें।
सरकार के इस कदम से घरेलू बाजार में इन आइटमों के दाम में भारी इजाफे की आशंका जताई जा रही है।
देश में पिछले तीन साल के दौरान (खास कर कोविड महामारी के दौरान) लैपटॉप, पर्सनल कंप्यूटर और टैबलेट जैसे आइटमों की मांग काफी बढ़ी है। लेकिन मांग बढऩे के साथ ही इनके दाम भी बढ़े हैं।
विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से जारी नोटिफिकेशन में इन आइटमों के आयात पर प्रतिबंधों की कोई वजह तो नहीं बताई गई थी। लेकिन कहा जा रहा है कि सरकार फिलहाल सुरक्षा कारणों का हवाला देकर इन आइटमों के आयात को रोकना चाहती है।
लैपटॉप, पर्सनल कंप्यूटर और टैबलेट समेत जिन सात आइटमों के आयात रोके गए हैं, उनका 58 फीसदी चीन से आता है।
वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान भारत में इनका आयात 8।8 अरब डॉलर का था। इनमें से अकेले चीन की हिस्सेदारी 5।1 अरब डॉलर की थी।
चीन का ख़तरा कितना बड़ा
मीडिया ख़बरों के मुताबिक सरकार के अंदरूनी सूत्रों ने इन आइटमों के आयात पर प्रतिबंधों के लिए सुरक्षा कारणों का हवाला दिया है क्योंकि ज्यादातार चीजें चीन से आयात हो रही थीं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है सरकार ने सिर्फ सुरक्षा कारणों से इन आइटमों के आयात पर प्रतिबंध नहीं लगाया है।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाले प्रमुख संगठन वीएलएसआई के अध्यक्ष सत्या गुप्ता ने बीबीसी से कहा, ‘सुरक्षा का मामला बहस का विषय है। इसलिए सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में इसका जिक्र नहीं है। ये साबित करना बहुत मुश्किल है कि चीनी प्रोडक्ट सुरक्षित नहीं हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘दरअसल लैपटॉप, टैबलेट या पर्सनल कंप्यूटर की सुरक्षा का पहलू प्रोसेसर से जुड़ा होता है। इन सारे आइटमों में सबसे ज्यादा इन्टेल, एएमडी और माइक्रोटेक के प्रोसेसर लगे होते हैं। ये चीनी प्रोसेसर नहीं हैं।’
‘हालांकि चीनी प्रोसेसर यूनिसर्फ वाले लैपटॉप बनने शुरू हो गए हैं। लेकिन अभी ये काफी शुरुआती दौर में हैं। लिहाज़ा ये कहना गलत है कि सरकार ने चीन के खतरे को देखते हुए पर्सनल कंप्यूटर और टैबलेट का आयात प्रतिबंधित किया है। ’’
सरकार का मक़सद क्या है?
मोदी सरकार भारत को इलैक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हब बनाना चाहती है। अपने इस मक़सद को हासिल करने के लिए इसने आईटी हार्डवेयर के लिए पीएलआई (प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव) स्कीम लागू की है।
सरकार ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देकर बड़े पैमाने पर रोजग़ार पैदा करना चाहती है इसलिए पीएलआई स्कीम पर इतना ज़ोर दिया जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल और फूड प्रोसेसिंग समेत दस से अधिक सेक्टरों के लिए पीएलआई स्कीम चलाई जा रही है।
देश में पेट्रोल और गोल्ड के बाद सबसे ज़्यादा आयात इलेक्ट्रॉनिक्स का होता है। फरवरी 2021 से अप्रैल 2022 के बीच इसके 550 अरब डॉलर के आयात बिल में अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम की हिस्सेदारी 62।7 अरब डॉलर की थी।
लिहाज़ा भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का मक़सद बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भी बचाना है।
2020 में शुरू की गई इस योजना के तहत विदेशी और घरेलू कंपनियों को देश में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने, उनका विस्तार करने और तैयार माल की बिक्री पर इन्सेंटिव दिया जाता है।
पीएलआई स्कीम के तहत अकेले आईटी हार्डवेयर सेक्टर के लिए ही 17 हज़ार करोड़ रुपये का इन्सेंटिव निर्धारित किया जा चुका है।
सरकार को उम्मीद है इसका फायदा उठाने के लिए ऐपल, डेल, एचपी और सैमसंग जैसी कंपनियां भारत में मैन्युफैक्चरिंग करेगी।
इन ग्राहकों को नए नियमों से छूट
अगर आप विदेश से एक लैपटॉप, पर्सनल कंप्यूटर, अल्ट्रा स्मॉल फॉर्म फैक्टर कंप्यूटर खरीदते हैं तो ये प्रतिबंध आप पर लागू नहीं होगा। ई-कॉमर्स पोर्टल से खरीदे गए या पोस्ट के कुरियर से ऐसे कंप्यूटर मंगाने पर भी ये प्रतिबंध लागू नहीं होगा। हालांकि इस पर ड्यूटी देनी होगी
आरएंडडी, बेंचमार्किंग,इवेल्यूशन, रिपेयरिंग या री-एक्सपोर्ट के लिए 20 आइटमों के आयात के लिए भी लाइसेंस नहीं लेना होगा।अगर लैपटॉप, टैबलेट, अल्ट्रा स्मॉल फॉर्म फैक्टर कंप्यूटर और सर्वर कैपिटल गुड्स के हिस्सा बन कर आयात किए गए तो ये भी इस प्रतिबंध के दायरे में नहीं आएंगे।
पीसी, लैपटॉप कंपनियों पर कितना असर
पर्सनल कंप्यूटर बेचने वाली कंपनियों का कहना है कि सरकार के इस कदम से फिलहाल इनका आयात रुक जाएगा। जबकि हकीकत ये है देश में बिकने वाले 90 फीसदी पर्सनल कंप्यूटर (डेस्क टॉप, लैप टॉप और टैबलेट) आयातित होते हैं।
इससे मार्केट में इन आइटमों की ज़बरदस्त किल्लत हो सकती है। नतीजतन इनके दाम बेतहाशा बढ़ सकते हैं।
सरकार ने 2020 में टेलीविजन सेट्स की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ऐसा ही कदम उठाया था। उस वक्त उसने टेलीविजन सेट्स के आयात पर रोक लगा दी थी। इससे टीएसएल, वीयू के अलावा सैमसंग, एलजी श्याओमी जैसी कंपनियों के हाई-एंड कलर टीवी की बिक्री पर काफी असर पड़ा था। जबकि सैमसंग, एलजी जैसी कंपनियां तो भारत में मैन्युफैक्चरिंग भी करती हैं।
सरकार के इस कदम से टीवी आयात के 7000 से 8000 करोड़ रुपये का बाजार प्रभावित हुआ था। लेकिन भारत में कुल टीवी सेल्स का ये एक छोटा हिस्सा था।
लेकिन पर्सनल कंप्यूटर के आयात पर प्रतिबंध का मामला इससे बिल्कुल है। इस कदम का काफी बड़ा असर होगा क्योंकि देश में ज्यादातर पर्सनल कंप्यूटर बाहर से मंगाए जाते हैं।
पर्सनल कंप्यूटर कंपनियों ने कहा है कि इस फैसले को लागू करने से पहले तीन महीने का ग्रेस पीरियड देना चाहिए था ताकि उपभोक्ताओं को अचानक बढऩे वाली कीमतों से बचाया जा सके।
रिलायंस जियोबुक की लॉन्चिंग और आयात प्रतिबंध का कनेक्शन
इसी सप्ताह मुकेश अंबानी की कंपनी जियो ने सिर्फ 16,499 रुपये में रिलायंस जियोबुक उतारा है। ये टैबलेट और लैपटॉप का मिलाजुला वर्जन है।
इसे बाज़ार का सबसे सस्ता ‘लैपटॉप’ बताया जा रहा है। इससे पहले तक एचपी और दूसरी कंपनियों के क्रोमबुक 20 हजार रुपये में बिक रहा है।
सोशल मीडिया पर जियोबुक की लॉन्चिंग और सरकार के नए नियमों की टाइमिंग पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि रिलायंस को फायदा देने के लिए सरकार ने ये कदम उठाया है। लेकिन विशेषज्ञों ने ऐसे आरोपों को ख़ारिज किया है।
सत्या गुप्ता कहते हैं,‘’ रिलायंस का जियोबुक मार्केट में मौजूद दूसरे उत्पादों को टक्कर नहीं दे सकता। ये लैपटॉप नहीं बल्कि हाई-एंड टैबलेट है। रिलायंस का प्रोडक्ट अभी काफी शुरुआती दौर में है। इस प्रतिबंध से रिलायंस के प्रोडक्ट भारत में छा जाएंगे, इसकी संभावना अभी दूर-दूर तक कहीं नहीं दिखती।’’
नई नीति से कंपनियों का क्या फायदा
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की इस नीति से विदेशी और घरेलू कंपनियों दोनों को फायदा होगा। लैपटॉप, टैबलेट बनाने के लिए असेंबलिंग लाइन लगाना या यूनिट शुरू करना आसान काम है।
कई कंपनियों की असेबलिंग लाइन चल रही है। सरकार का मकसद है कि विदेशी कंपनियां यहां अपनी यूनिट लगाएं और इसकी पीएलआई स्कीम का फायदा लें।
सत्या गुप्ता कहते हैं, ‘सरकार नई पीएलआई स्कीम के तहत 17 हजार करोड़ रुपये का इन्सेंंटिव दे रही है। इसके तहत चार से छह फीसदी का इन्सेंटिव मिल रहा है जो बहुत ज्यादा है। ’
लैपटॉप, टैबलेट या इस तरह के दूसरे उत्पादों पर दो-तीन से तीन फीसदी मार्जिन भी अच्छा माना जाता है। ऐसे में अगर छह फीसदी का मार्जिन कंपनियों के काफी फायदे का सौदा है।’’
इससे भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और यहां की छोटी और मझोली कंपनियां भी प्रोडक्ट डिजाइन, डेवलप और मैन्युक्चरिंग का काम कर सकेंगीं।
सत्या गुप्ता कहते हैं, ‘’वीवीडीएन, ऑप्टिमस जैसी कई छोटी कंपनियां हैं जो लैपटॉप, टैबलेट जैसे प्रोडक्ट बना रही हैं। सरकार की इस नीति से इन कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा। छोटी-छोटी कंपनियों के इको-सिस्टम से भी भारत में आईटी हार्डवेयर की बड़ी कंपनियां खड़ी हो सकेंगी।’’ (bbc.com/hindi)
कनुप्रिया
सरकार अनाज दे देती है, सिलेंडर भी दे देती है, झोपड़पट्टी डाल लेते हैं, खर्चा ही क्या है गरीब लोगों का। देश की जीडीपी देखिये, टमाटर ही तो थोड़ा महँगा हुआ है, बाकी कहाँ है महँगाई।
अक्सर ये तर्क मोदी समर्थकों से सुन लेती हूँ, वो लोग ये तर्क देते हैं जो खुद बढिय़ा सरकारी नौकरी में हैं, या पुश्तैनी बिजनेस है या अच्छी कॉरपोरेट जॉब है, बच्चे लाखों की फीस देकर बढिय़ा स्कूल-कॉलेज में हैं, अच्छे मकान और 2-4 प्रॉपर्टीज हैं, महँगी कारें खरीद सकते हैं और विदेश जाना not a big deal ।
गरीब और निम्न वर्गीय लोग शायद उनके लिये भेड़-बकरी हैं जिन्हें बस खाने को आटा और चावल चाहिये, हगने की सुविधा भी न हो तो चलेगा। कोई सरकार बिजली-पानी मुफ्त दे दे तो बड़े लोगों के पेट में ऐंठन होने लगती है कि देखो रेवडिय़ाँ बंट रही हैं। महिलाओं को फ्री मेट्रो टिकट देने पर अच्छे-अच्छे प्रगतिशील लोगों के माथे पर बल पड़ गए थे।
अच्छी शिक्षा की उन्हें जरूरत नहीं, सरकारी स्कूल खस्ताहाल हों तो हों। न अच्छी चिकित्सा की जरूरत है, राजस्थान सरकार right to health bill लाई तब भी उन्हीं लोगों ने सबसे अधिक विरोध किया जो महँगे अस्पताल अफोर्ड कर सकते हैं।
जो अपने घर गाँवों में रहते हैं उनके पास शायद पुश्तैनी छत हो वरना बड़े शहरों की खूबसूरती नष्ट करने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं कि कमाने तो वहीं जाना पड़ेगा, वरना महंगा किराया दो। कपड़े लत्ते तो फुटपाथ मार्केट से मिल जाते हैं मगर एक सुख जिव्हा का ही रह जाता है वो भी न रहे महँगाई के चलते तो बच्चे पैदा करने के सिवा क्या उपाय है।
कभी-कभी लगता है कि धीरे-धीरे दुनिया की आधी आबादी से right to live भी छीन लिया जाएगा, जो आज बोलते हैं कि ये लोग किसी लायक नहीं महज देश की जनसंख्या बढ़ाते हैं, वहीं कल इन पर बम गिरा देने के भी हिमायती होंगे।
जितना देश घूमा है, कह सकती हूँ कि इस देश को गरीब देश यूँ ही नही कहा जाता, वाकई बहुत गरीबी है। और जो लोग कहते हैं कि चुनावी मुद्दा महंगाई नहीं राम होना चाहिये, वो INDIA पर ऐतराज भले कर लें मगर रहते वहीं हैं, वो नहीं जानते कि असल भारत क्या है।


