विचार/लेख
समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर जहाँ विपक्ष पार्टियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेरोज़गारी, मंहगाई जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा रही हैं, वहीं उत्तर-पूर्व में भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी राजनीतिक दल इसके विरोध में हैं.
मेघालय में बीजेपी के सहयोगी दल नेशनल पीपल्स पार्टी ने इसे भारत के विचार के ख़िलाफ़ बताया है, वहीं मणिपुर सरकार में शामिल पार्टनर नगा पीपल्स फ्रंट ने चेतावनी दी है कि इसे थोपने का परिणाम प्रतिकूल हो सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 जून को भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान यूसीसी अर्थात यूनिफॉर्म सिविल कोड पर कहा था कि एक घर में परिवार के दो सदस्यों के लिए अगर दो तरह का क़ानून होगा तो वो घर नहीं चल सकता है.
उन्होंने ये भी कहा था कि ये याद रखा जाना चाहिए कि क़ानून समानता की बात करता है.
नरेंद्र मोदी के बयान पर विपक्षी पार्टियों का कहना था कि प्रधानमंत्री मोदी ने बेरोज़गारी, महंगाई जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यूसीसी का मुद्दा उछाला है.
मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनरॉड संगमा का क्या है रुख?

कॉनरॉड संगमा
कॉनराड संगमा एनपीपी अध्यक्ष हैं. साल 2016 में बीजेपी असम की सत्ता में आने के बाद गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस नाम से जो राजनीतिक फ्रंट बनाया गया था, जिसमें सातों पूर्वोत्तर राज्यों की प्रमुख क्षेत्रीय दलों शामिल किए गए थे.
इनमें से ज़्यादातर क्षेत्रीय दलों की यहाँ के सूबों में सरकार में शामिल हैं.
मेघालय में इस समय नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) की सरकार है, जिसमें बीजेपी भी शामिल है.
एनपीपी प्रमुख संगमा ने कहा कि पूर्वोत्तर को एक अनूठी संस्कृति और समाज मिला है और वह ऐसे ही रहना चाहेंगे.
अपने राज्य का उदाहरण देते हुए संगमा बताते है, "हमारा मातृसत्तात्मक समाज है और यही हमारी ताक़त है. यही हमारी संस्कृति रही है. अब इसे बदला नहीं जा सकता है."
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यूसीसी ड्राफ्ट को देखे बिना किसी विवरण में जाना मुश्किल काम है. लेकिन वो इस मामले पर बीजेपी के साथ नहीं हैं.
मणिपुर-नगालैंड में भी बीजेपी के सहयोगियों का विरोध
बीजेपी के सहयोगी दल एनपीएफ अर्थात नगा पीपुल्स फ्रंट ने चेतावनी दी है कि देश भर के विविध समुदायों पर प्रस्तावित समान नागरिक संहिता को थोपने का कोई भी प्रयास निरर्थक और प्रतिकूल होगा.
मणिपुर में बीजेपी दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में है. लेकिन पार्टी ने अपने कुछ पुराने क्षेत्रीय दलों को सरकार में पार्टनर बना रखा है.
यूसीसी पर अपनी पार्टी का रुख़ रखते हुए एनपीएफ़ नेता कुझोलुज़ो निएनु ने एक बयान जारी कर कहा, "यूसीसी लागू करने का मतलब हमारी संस्कृति को आदिम, असभ्य और अमानवीय कहकर ख़ारिज करना है."
नगा नेता ने कहा, "यूसीसी लागू करने का प्रयास अल्पसंख्यकों को विशेषकर आदिवासी समुदायों की आशा और विश्वास को धोखा दे रहा है.
असल में अनुच्छेद 371 (ए) या छठी अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधान हमारे रीति-रिवाजों, मूल्यों और प्रथाओं की रक्षा और बढ़ावा देने के लिए प्रदान किए गए हैं."
नगालैंड में बीजेपी की अन्य सहयोगी सत्तारूढ़ नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) ने शनिवार को घोषणा की कि "यूसीसी को लागू करने से भारत के अल्पसंख्यक समुदायों और आदिवासी लोगों की स्वतंत्रता और अधिकारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा".
नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो की पीर्टी एनडीपीपी ने गुरुवार को दो पन्ने को बयान जारी कर कहा कि भारत के संविधान में अनुच्छेद 371 ए द्वारा नगाओं की प्रथागत प्रथाओं और परंपराओं की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है.
मिज़ोरम: यूसीसी के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित

मिज़ोरम विधानसभा ने इसी साल 14 फ़रवरी को सर्वसम्मति से यूसीसी को लागू करने के किसी भी क़दम का विरोध करते हुए एक आधिकारिक प्रस्ताव पारित किया था.
मिज़ोरम की सत्तारूढ पार्टी मिज़ो नेशनल फ्रंट बीजेपी के साथ एनडीए में शामिल है.
यूसीसी को लेकर छिड़ी बहस के बाद मिजोरम के गृह मंत्री लालचामलियाना ने शुक्रवार को पत्रकारों से कहा कि यूसीसी को भले ही संसद द्वारा क़ानून बना दिया जाए.
लेकिन मिज़ोरम में तब तक लागू नहीं किया जाएगा जब तक कि राज्य विधायिका एक प्रस्ताव द्वारा ऐसा कोई निर्णय नहीं ले लेती.
पूर्वोत्तर में मिज़ोरम एक ऐसा राज्य है जहां सबसे अधिक जनजातीय आबादी है. लिहाज़ा किसी भी सरकार के लिए यूसीसी को यहां लागू करना बहुत बड़ी चुनौती होगी.
असम-त्रिपुरा में बीजेपी के सहयोगी क्या सोच रहे हैं?

पूर्वोत्तर में मिज़ोरम एक ऐसा राज्य है जहां सबसे अधिक जनजातीय आबादी है. (सांकेतिक तस्वीर)
असम में बीजेपी की सहयोगी असम गण परिषद और त्रिपुरा में बीजेपी की पार्टनर इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने अभी यूसीसी को लेकर अपने रुख़ पर कोई चर्चा नहीं की है.
त्रिपुरा सरकार में जनजातीय कल्याण विभाग के मंत्री तथा आईपीएफटी के सचिव प्रेम कुमार रिआंग ने बीबीसी से कहा,"चूंकि यूसीसी को लेकर अभी तक कोई ड्राफ़्ट सामने नहीं आया है, इसलिए हमारी पार्टी के रूख़ पर अभी कोई बात नहीं हुई है."
हालांकि मंत्री रिआंग ने कहा, ''त्रिपुरा में 19 जनजातियां है जिनके समक्ष बहुत चुनौतियां है. हमारे पास ख़ुद की राजनीतिक ताक़त भी नहीं है. ''
''संविधान पर विश्वास करते हुए हमें अपनी जनजाति की पहचान और अधिकारों के लिए लड़ते रहना होगा.''
समान नागरिक संहिता यानी शादी, तलाक़, विरासत, गोद लेने समेत कई चीज़ों पर देश के सभी नागरिकों के लिए एक ही क़ानून होगा.
लेकिन यूसीसी को लेकर कहा जा रहा है कि इससे क़रीब 220 आदिवासी समुदायों के अधिकार और आज़ादी कम होने का ख़तरा है.
'यूनिफॉर्म सिविल कोड को किसी पर थोप नहीं सकते'

प्रेम कुमार रियांग (बाएं से दूसरे)
भारत की क़रीब 12 फ़ीसदी आदिवासी आबादी पूर्वोत्तर के राज्यों में बसती है. 2011 की जनगणना के अनुसार, मिज़ोरम में 94.4 फ़ीसदी, नागालैंड में 86.5 फ़ीसदी और मेघालय में 86.1 प्रतिशत आदिवासी आबादी बसी है.
पूर्वोत्तर के जनजातीय इलाक़ों में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर 'द शिलांग टाइम्स' की संपादक पैट्रिशिया मुखिम कहती हैं,"भारत में विभिन्न जाति-प्रजाति के लोग रहते है. यहां तिब्बती-बर्मन लोग बसे है. यहां ऑस्ट्रो एशियाटिक जाति के लोग रहते है. इसलिए आप किसी पर यूसीसी थोप नहीं सकते."
वो कहती हैं, "इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में छठी अनुसूची के अंतर्गत जिला स्वायत्तशासी परिषद है जो जनजातीय लोगों के रीति-रिवाज और परंपराओं को बचाए रखा है. ऐसे में अगर यूसीसी को लाया जाएगा तो छठी अनुसूची पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी.''

पैट्रिशिया मुखिम
'' यूसीसी को लेकर जारी बहस मात्र से ही यहां की जनजातियां नाराज़गी ज़ाहिर कर रही हैं. बीजेपी का जो मक़सद है कि एक धर्म, एक भाषा सबकुछ एक जैसा ऐसा भारत में नहीं हो कता है." (bbc.com/hindi)
-रुचिर गर्ग
आज एक वॉट्सएप ग्रुप में many times forwarded मैसेज पढ़ने को मिला।
बेकाबू महंगाई को सही ठहराने के संदेश के साथ शुरू हुई इस सामग्री में कहा गया था पिछले तीन वर्षों में एम्स में 231 अंग दान करने वालों में एक भी मुस्लिम नहीं है जबकि अंग प्राप्त करने वालों में 39 मुस्लिम हैं।
उसमें इस बात का खास जिक्र था
"मैं अंध मोदी प्रेमी नहीं हूं"
यहां उस many times forwarded मैसेज का विश्लेषण नहीं कर रहा हूं बस इतना बता रहा हूं कि अगर आप गूगल पर सर्च करेंगे तो एक ताजा खबर नजर आएगी कि कैसे हरियाणा के एक गरीब मजदूर मुस्लिम परिवार ने अपने बच्चे के अंग दान किए जिससे दो लोगों को नई जिंदगी मिली। इस बच्चे की एक दुर्घटना में बात मृत्यु हो गई थी।
जो आंकड़े इस forwarded मैसेज में दिए गए थे जाहिर है वो पूरी तरह से फर्जी ही थे क्योंकि अंगदान से जुड़े आंकड़े तो मिल जाएंगे लेकिन उसमें प्राप्तकर्ता हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, बौद्ध कौन है यह शायद नहीं मिलेगा।
हिंदू की आंखें मुसलमान को लगीं या मुसलमान की किडनी ईसाई को अगर इस नजरिए से देखना हो तो ज़िंदगी की क्या अहमियत है और मानवीय मूल्यों को तो कूड़ेदान में डाल देना चाहिए !
लेकिन सवाल अलग है।
सवाल यह है कि ऐसे मैसेज बनते कहां हैं?
इन्हें फैलाने वाला नेटवर्क किसके पास है?
कौन हैं जो इस देश में मानवीय मूल्यों को तबाह कर उन्मादी राष्ट्र बनाने में लगे हैं ?
किन्हें इस देश में इंसानियत की भाषा खटक रही है,सद्भाव खटक रहा है और वो कौन हैं जो देश को नफरत में डुबोने की साजिश रचते हुए कहते हैं, "मैं अंध मोदी भक्त नहीं हूं !"
संयोग यह है कि इसी रात मैंने फिल्म "अफवाह" देखी।
जरूर देखिए।
डायरेक्टर सुधीर मिश्रा और प्रोड्यूसर वही शानदार अनुभव सिन्हा!
इस फिल्म की कहानी सोशल मीडिया की अफवाहों पर ही नेंद्रित है।
फिल्म की चर्चा कम होनी थी क्योंकि यह अफवाहबाजों को आइना दिखाती है, क्योंकि यह बेनकाब करती है कि इस देश में कौन लोग हैं जो अफवाहबाजी को एक घातक राजनीतिक औजार बनाए हुए हैं, क्योंकि फिल्म यह समझाती है कि अफवाहबाजी का किसी खास राजनीतिक समूह से क्या नाता है!
इसलिए ऐसी फिल्म को हमारा समाज क्यों देखना पसंद करेगा ?
बात एक अफवाह भरे वॉट्सएप मैसेज से शुरू हो कर फिल्म अफवाह तक आती है।
क्या हम देश को अफवाहों की आग में जलने देना चाहते हैं?
क्या हम भी इस आग का हिस्सा बनना चाहते हैं?
अगर हां तो अपने बच्चों को जोर शोर से लगाइए इस काम में !
छुड़ाइए उनकी पढ़ाई,रोजगार और बनाइए उन्हें एक उन्मादी राष्ट्र का निर्माता!
क्योंकि उनके बच्चे तो विदेशों में या देश के बड़े शिक्षा संस्थानों में ऊंची तालीम पाने में व्यस्त हैं!
आपके बच्चे अफवाह फैलाएंगे तभी तो उन्हें सत्ता मिलेगी,उनकी औलादों की जिंदगी जन्नत बनेगी!
एक स्मार्ट फोन का खर्चा,थोड़ा पेट्रोल ..इतना ही तो चाहिए उन्मादी राष्ट्र बनाने के लिए!
नहीं तो बस इतना कीजिए कि आप जिस भी वाट्सएप ग्रुप में हों उसमें आने वाले ऐसे मैसेज की हकीकत की पड़ताल कर लीजिए और दो लाइन वहीं लिख दीजिए।
गूगल सर्च कर लीजिए,भेजने वाले से ऐसे आंकड़ों का स्त्रोत पूछ लीजिए,वो स्त्रोत गलत बताएंगे, आप उसे वेरिफाई कर लीजिए।
कुछ नहीं तो संबंधित विषय के जानकार या आधिकारिक लोगों से पूछ लेना चाहिए।
हमारे आपके हाथों में भी स्मार्ट फोन है।
अगर कोई इस देश को नफरत और उन्माद की आग में धकेलना चाहता है तो हमको आपको कम से कम एक छोटे से प्रयास से इस आग को फैलने से रोकना चाहिए।
आज इस देश को सीमा से ज्यादा भीतर ही ऐसे सिपाही चाहिए जो इंसानियत को बचाना चाहते हैं।
एक नागरिक के तौर पर हमको आपको इतना तो करना ही चाहिए।
(लेखक एक भूतपूर्व पत्रकार, और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के वर्तमान मीडिया सलाहकार हैं।)
-डॉ.आर.के. पालीवाल
आजकल हिंदू देवी देवताओं और महान विभूतियों के नाम का कई संगठन जमकर दुरुपयोग कर रहे हैं। एक तरफ इस तरह के दलों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और दूसरी तरफ़ उन्हें राजनीतिक दलों का संरक्षण प्राप्त हो रहा है। श्रीराम सेना, करणी सेना और बजरंग दल आदि इसी तरह के संगठन हैं। इन सबमें आजकल बजरंग दल सबसे ज्यादा रंग दिखा रहा है। इसका ज्यादा श्रेय भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को जाता है।
हाल ही में कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस ने बजरंग दल को प्रतिबंधित करने की घोषणा कर इस संगठन को अनावश्यक सुर्खियां प्रदान की थी। इस घोषणा के विरोध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो कदम आगे बढ़ कर जरुरत से ज्यादा कड़ी प्रतिक्रिया कर बजरंग दल पर प्रतिबंध को बजरंग बली का अपमान बताकर इस संगठन को एक तरह से हनुमान जी का प्रतिनिधि मान लिया था। कांग्रेस और भाजपा द्वारा कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जरूरत से ज्यादा भाव दिए जाने से बजरंग दल के बाजार भाव सातवें आसमान पर पहुंच गए थे।
कर्नाटक चुनाव में बजरंग दल मुद्दे पर कोई राजनीतिक दल सांप्रदायिक आधार पर वोटो का लाभ नहीं ले पाया। इसीलिए इसके बाद मध्य प्रदेश में बजरंग दल को भारतीय जनता पार्टी की सरकार से ज्यादा भाव नहीं मिले तो इन्होने कांग्रेस के कमलनाथ की शरण ली।
अभी तक मध्य प्रदेश में बजरंग दल पर सरकार की नजर टेढ़ी नही थी लेकिन जब से वह खुलकर कांग्रेस के साथ आया है तब से मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार की भृकुटि टेढ़ी होना लाजमी था। कोई भी सरकार इतनी उदार नही होती कि खुलेआम चुनौती देने वाले व्यक्ति या संगठन को अपनी ताकत का प्रभाव न दिखाए। यही कारण रहा कि इंदौर में बजरंगियों के उद्दंड पर सरेआम पुलिस का डंडा चला। आजकल पुलिस अपनी मर्जी से कोई महत्वपूर्ण कार्य बहुत कम करती है लेकिन आकाओं की भृकुटि के इशारे को पलक झपकते समझ लेती है।
उत्तर प्रदेश में भी बजरंग दल के कार्यकर्ता बौखलाए हुए हैं। जालौन में कांग्रेस कार्यालय के पास उपद्रव करने आए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर वहां भी पुलिस ने कार्यवाही की है।बजरंग दल जैसे संगठनों के कार्यकर्ताओं के नाम किसी प्रदेश में कोई महत्त्वपूर्ण रचनात्मक कार्य दर्ज नहीं है। ये लोग चर्चा में रहने के लिए खुद को हिंदू धर्म और संस्कृति के रखवाले समझकर यहां वहां हिंदू समाज के आराध्य के नाम पर विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। इसी तरह करणी सेना के पदाधिकारी भी जब तब हिंदू धर्म और संस्कृति, और उसमें भी विशेष रूप से राजपूतों से जुड़ी विभूतियों के नाम पर धमकियां देते रहते हैं। उनकी ताजा धमकी आदि पुरुष फिल्म निर्माताओं के लिए है। उनके किसी पदाधिकारी ने फिल्म के निर्माता निर्देशक को खोजकर मारने की घोषणा की है।
महात्मा गांधी हर तरह की हिंसा की मुखालफत करते हुए अक्सर कहते थे कि हिंसा की लत बडी भयानक होती है जो अपने लिए नए नए दुश्मन खोजती रहती है। वे कहते थे कि जो लोग आज अंग्रेजों को दुश्मन मानकर उनके खिलाफ हिंसा कर रहे हैं कल देश आजाद होने पर वे अपने देश के उन लोगों से हिंसक व्यवहार करने लगेंगे जिन्हें वे अपना विरोधी मानते हैं। उनका इशारा सांप्रदायिक और अंतरजातीय हिंसा की तरफ था। वर्तमान परिदृश्य में गांधी की अहिंसा का सिद्धांत इसीलिए और ज्यादा प्रासंगिक लगता है। चाहे मणिपुर की भयावह हिंसा हो या बजरंग दल और करणी सेना की विध्वंसक गतिविधियां हों या पीएफआई, आई एस आई एस और सिमी जैसे आतंकी संगठन यह सब कहीं न कहीं अपने ही देश के नागरिकों के साथ हिंसा कर रहे हैं। जब इन हिंसक तत्वों को राजनीतिक दलों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है तब यह संगठन और ज्यादा घातक हो जाते हैं।
दो जुलाई को महाराष्ट्र में एक नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के तहत अजित पवार सहित एनसीपी के नौ विधायक बीजेपी-शिव सेना (शिंदे) गुट की सरकार में शामिल हुए। दिलचस्प यह है कि बीजेपी ने अजित पवार सहित इन विधायकों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। लेकिन अजित पवार अब राज्य के उपमुख्यमंत्री बने हैं, साथ ही उन्होंने अन्य विधायकों को भी मंत्री बनवाया है। हालांकि इनमें से कुछ नेताओं के पीछे जांच एजेंसियां लगी हुई थीं।
शरद पवार से पाला बदल कर सरकार में शामिल हुए इन नेताओं पर क्या-क्या आरोप लग रहे थे। देखिए पूरी सूची।
अजित पवार पर क्या-क्या थे मामले
अजित पवार अब एकनाथ शिंदे की सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने वाले और अजित दादा चक्की पीसिंग जैसे बयान देने वाले देवेंद्र फडणवीस, उनके बराबर ही उपमुख्यमंत्री के तौर पर सरकार में शामिल हैं। हालांकि बीजेपी की ओर से उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए थे जबकि चीनी मिलों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच में ईडी का शिकंजा उन पर कसने लगा था। पिछले साल मार्च महीने में आयकर विभाग ने उपमुख्यमंत्री अजित पवार के रिश्तेदारों के घर पर छापा मारा था। इतना ही नहीं आयकर विभाग ने कुछ संपत्तियों पर ज़ब्ती भी की थी।
अजित पवार से संबंधित जरंदेश्वर चीनी मिल पर जब्ती की कार्रवाई की गई थी। इस मामले में अजित पवार पर बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने आरोप लगाए थे। सोमैया ने कहा था कि अजित पवार का वित्तीय कारोबार अद्भुत है। किरीट सोमैया ने आरोप लगाया था कि बिल्डरों के पास उनके और उनके रिश्तेदारों के खातों में सौ करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति है।
राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने सिंचाई घोटाला मामले में अजित पवार को क्लीन चिट दे दी थी। लेकिन, मई 2020 में प्रवर्तन निदेशालय ने विदर्भ सिंचाई घोटाला मामले की नए सिरे से जांच शुरू की थी।
अजित पवार के साथ बेटे भी थे घेरे में
इन सबके साथ अजित पवार के बेटे पार्थ पवार की कंपनी पर भी आयकर विभाग ने छापा मारा था। आयकर विभाग ने यह दावा किया था कि अजित पवार के रिश्तेदारों पर हुई इस छापेमारी में 184 करोड़ रुपये का बेनामी वित्तीय लेनदेन का पता चला है। अप्रैल, 2023 में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सहकारी बैंक घोटाले के सिलसिले में ईडी ने अजित पवार और सुनेत्रा पवार से जुड़ी एक कंपनी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया। लेकिन इसमें अजित पवार और सुनेत्रा पवार का नाम शामिल नहीं था। इसके बाद से ही एनसीपी में बगावत की चर्चा शुरू हो गई थी। इस खबर के सामने आने के बाद अजित पवार ने सार्वजनिक तौर पर अपनी सफाई भी दी थी।
छगन भुजबल को दो साल तक नहीं मिली थी जमानत
छगन भुजबल पर 2014 के बाद से ही जांच एजेंसियों का शिकंजा कस रहा था। मार्च, 2016 में उन्हें नई दिल्ली में महाराष्ट्र सदन निर्माण में कथित गबन और बेहिसाब संपत्ति जमा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें मुंबई की आर्थर रोड जेल भेज दिया गया। काफी कोशिशों के बावजूद अगले दो साल तक उन्हें जमानत नहीं मिली। हालांकि, सितंबर 2021 में छगन भुजबल को महाराष्ट्र सदन के कथित गबन के मामले में बरी कर दिया गया था।
बॉम्बे सेशन कोर्ट ने छगन भुजबल समेत छह आरोपियों को बरी किया था। हालांकि एंटी करप्शन ब्यूरो ने कथित महाराष्ट्र सदन गबन मामले में भुजबल और उनके परिवार के खिलाफ सबूत होने का दावा किया है।
इस मामले के अलावा छगन भुजबल और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज हैं और उनकी सुनवाई लंबित है।
इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अलग मामला भी दर्ज किया था। इस साल जनवरी में, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने 2021 के अदालती आदेश के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील दायर की, जिस पर सुनवाई लंबित है। भुजबल के खिलाफ मुंबई विश्वविद्यालय से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो का एक मामला विशेष अदालत में लंबित है।
हसन मुश्रीफ
जनवरी 2023 में ईडी ने कोल्हापुर में एनसीपी नेता हसन मुश्रीफ के आवास और फैक्ट्री पर छापा मारा था। विधायक हसन मुश्रीफ पर कोल्हापुर के कागल में एक शुगर फैक्ट्री को अवैध रूप से चलाने का आरोप था।
बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने आरोप लगाया था कि हसन मुश्रीफ के दामाद और खुद मुश्रीफ ने इस फैक्ट्री के जरिए 100 करोड़ रुपये का घोटाला किया है। मार्च 2023 में, हसन मुश्रीफ और उनके सीए को ईडी ने कार्यालय में बुला कर पूछताछ की।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मुश्रीफ की गिरफ्तारी पूर्व जमानत याचिका अप्रैल में एक विशेष अदालत ने खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। कोर्ट ने उन्हें अंतरिम राहत दी थी, जिसकी समय सीमा पिछले हफ्ते बढ़ाकर 11 जुलाई कर दिया गया था। उनके तीनों बेटों की गिरफ़्तारी पूर्व ज़मानत की अपील विशेष अदालत में लंबित है।
अदिति तटकरे
अदिति तटकरे एनसीपी नेता सुनील तटकरे की बेटी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंचाई घोटाले में एंटी करप्शन ब्यूरो, अजित पवार के साथ सुनील तटकरे की भी जांच कर रही थी। 2017 में एसीबी द्वारा दायर आरोपपत्र में तटकरे के नाम का उल्लेख किया गया था। हालांकि उस समय उनका जिक्रअभियुक्त के तौर पर नहीं किया गया था। अधिकारियों ने कहा था कि इसके बाद अलग से आरोप पत्र दाखिल किया जाएगा।
इसी मामले में ईडी ने 2022 में तटकरे के खिलाफ प्रारंभिक जांच शुरू की थी।
धनंजय मुंडे
2021 में एक महिला ने धनंजय मुंडे के खिलाफ रेप का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन इसके बाद उन्होंने ये शिकायत वापस ले ली थी।
प्रफुल्ल पटेल
प्रफुल्ल पटेल ने दो जुलाई को शपथ नहीं ली, लेकिन वह शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद थे। यूपीए की केंद्र सरकार के दौरान प्रफुल्ल पटेल केंद्रीय उड्डयन मंत्री थे। उनके मंत्री रहने के दौरान ही 2008-09 में एविएशन लॉबिस्ट दीपक तलवार विदेशी एयरलाइंस की मदद कर रहे थे। उन्होंने तीन अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों के लिए कुछ ज्यादा कमाई वाले हवाई मार्ग सुरक्षित किए। उसके लिए दीपक तलवार को 272 करोड़ रुपये मिले थे। इससे एयर इंडिया को काफी नुकसान उठाना पड़ा था।
ईडी ने आरोप लगाया था कि ये सभी लेनदेन प्रफुल्ल पटेल के केंद्रीय मंत्री रहने के दौरान हुए थे। इसके साथ ही 70 हजार करोड़ रुपये के 111 विमानों की खरीद और एयर इंडिया एवं इंडियन एयरलाइंस के विलय के मामले की जांच ईडी कर रही थी। इस मामले में ईडी ने जून, 2019 में प्रफुल्ल पटेल को नोटिस जारी किया था। उन्हें पूछताछ के लिए भी बुलाया गया था।
शिंदे के साथ गए शिव सेना विधायकों पर भी था जांच एजेंसियों का शिकंजा
2022 में महाविकास अघाड़ी से बाहर होने के लिए एकनाथ शिंदे ने जब बगावत की थी तो उनके साथ भी ऐसे विधायक शामिल थे, जिन पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कस रहा था। एक नजर उन नेताओं पर भी जो जांच एजेंसियों के शिंकजे से बचने के लिए शिंदे के साथ गए थे।
प्रताप सरनाईक
सरनाईक नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएससीएल) के कथित घोटाले के सिलसिले में ईडी के रडार पर थे। उनकी संपत्ति ईडी ने जब्त कर ली थी। इस मामले में आस्था ग्रुप ने विहंग आस्था हाउसिंग को 21.74 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए थे।
ईडी ने दावा किया कि विहंग एंटरप्राइजेज और विहंग इम्फ्रा को 11.35 करोड़ रुपये दिए गए। इन दोनों कंपनियों का नियंत्रण प्रताप सरनाईक के पास है। ईडी की कार्रवाई के बाद सरनाईक ने उद्धव ठाकरे को पत्र लिखा था। इसमें सरनाईक ने कहा था, ‘अगर कांग्रेस-राष्ट्रवादी सत्ता में साथ रहकर अपने ही कार्यकर्ताओं को तोड़ रहे हैं और अपनी पार्टी को कमजोर कर रहे हैं, तो यह मेरी निजी राय है कि हमें एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जुड़ जाना चाहिए।’
यामिनी जाधव
शिवसेना विधायक यामिनी जाधव के पति यशवंत जाधव मुंबई नगर निगम की स्थायी समिति के अध्यक्ष थे। वित्तीय घोटाला मामले में यशवंत जाधव भी ईडी के रडार पर हैं। कुछ महीने पहले आयकर विभाग ने जाधव पर छापा मारा था। इसमें 40 संपत्तियां जब्त की गईं। इसके बाद ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच के लिए जाधव को नोटिस जारी किया। हालांकि, इंडिया टुडे की एक ख़बर के मुताबिक शिकायत के बाद अभी तक यशवंत जाधव के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है।
भावना गवली
शिव सेना सांसद भावना गवली ने शिंदे समूह का साथ दिया था। उन्होंने उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र में कहा था, ‘पार्टी के कार्यकर्ता आपसे हिंदुत्व के मुद्दे पर फैसला लेने का अनुरोध कर रहे हैं।’ भावना गवली भी ईडी के रडार पर थीं, उन्हें ईडी ने पूछताछ के लिए बुलाया था। गवली के महिला उत्कर्ष प्रतिष्ठान ट्रस्ट में गड़बड़ी के मामले में ईडी ने नवंबर 2022 में चार्जशीट दाखिल की थी। इस कथित गबन के मामले में भावना गवली के कऱीबी रिश्तेदार सईद खान ईडी की हिरासत में थे। हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी। ईडी ने उनकी 3.5 करोड़ रुपये की संपत्ति को अस्थायी रूप से जब्त कर लिया था।
ईडी के दावे के मुताबिक ट्रस्ट से पैसा निकालने के लिए महिला उत्कर्ष प्रतिष्ठान ट्रस्ट को एक कंपनी में बदलने की साजिश रची गई थी। (बीबीसी)
-श्रवण गर्ग
दुनिया के सबसे बड़े सम्मान नोबेल शांति पुरस्कार से पुरस्कृत और अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा को बारह हज़ार किलोमीटर की दूरी पर बैठकर भारत के हिंदू-मुस्लिम मामले में पड़ने से बचना चाहिए। अमेरिका के किसी अन्य तत्कालीन अथवा पूर्व राष्ट्रपति ने इस संवेदनशील मुद्दे पर वैसा हस्तक्षेप नहीं किया जैसा ‘फ्रेंड ओबामा’ 2014 के बाद से कर रहे हैं। वे भारत की यात्रा पर आते हैं तब भी नहीं चूकते और अपने देश में बैठे-बैठे भी उन्हें चैन नहीं मिलता।
भारत का हिंदू-मुस्लिम मामला उतना गंभीर नहीं है जितना ओबामा बनाना चाहते हैं या अमेरिका में डॉनल्ड ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी ने वहाँ के गोर-सवर्णों और तमाम अश्वेतों ,जिनमें कि मुस्लिम भी शामिल हैं, के बीच बना रखा है। ट्रम्प समर्थक सवर्ण तो अब अपनी ही संसद पर हमले भी कर रहे हैं और ओबामा उन्हें रोक नहीं पा रहे हैं ! ओबामा जानते होंगे कि जितनी आबादी ( 24 करोड़) उनके देश में गोरे सवर्णों की है लगभग उतने भारत में मुसलमान हैं।
भारत की हिन्दू-मुस्लिम समस्या अमेरिका की तरह का कोई स्थायी विभाजन नहीं है। एक कट्टर हिंदूवादी पार्टी के पिछले नौ सालों से सत्ता में होने के बावजूद ऐसा संभव नहीं हो पाया है। मौजूदा सरकार की दिल्ली से बिदाई के साथ सारा हिंदू-मुस्लिम तूफ़ान शांत भी हो जाएगा। यह काम देश की जनता बिना ओबामा की मदद के संपन्न कर लेगी। उसे पता है कि 2014 के पहले यह समस्या इतनी चिंताजनक कभी नहीं रही। गुजरात के 2002 के दुर्भाग्यपूर्ण एपिसोड को छोड़ दें तो अटलजी जी के नेतृत्व वाली एनडीए की (1999 से 2004 ) हुकूमत के दौरान भारत के अल्पसंख्यक अपने आप को कांग्रेस के ज़माने से ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते थे।
ओबामा को समझाया जाना चाहिए कि मोदी-शाह-योगी भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा नहीं हैं। भारत की मूल आत्मा सर्वधर्म समभाव की है और यही राष्ट्र का स्थायी चरित्र है। ऐसा नहीं होता तो सवा दो सौ सालों (1526-1761) में मुग़ल शासक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र, अंग्रेज लगभग सौ सालों (1858-1947) में ईसाई राष्ट्र और संघ पिछले सौ सालों (1925-2023) में हिंदू राष्ट्र बनाने में कामयाब हो जाता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए हिंदू राष्ट्र की स्थापना की कल्पना हिंदू बहुसंख्यकवाद की ताक़त के बल पर अपने आप को सत्ता में बनाये रखने का एक साधन मात्र है।संघ का साध्य भिन्न है।
ओबामा अगर हिंदू राष्ट्रवाद के कारण भारत के टूटने के भय से परेशान हैं तो उन्हें सबसे पहले 2024 के अमेरिकी चुनावों में ट्रम्प की सत्ता में वापसी को रोककर दिखाना चाहिए। ओबामा जानते हैं कि 2017 में राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तत्काल बाद किस तरह ट्रम्प ने कुछ मुस्लिम मुल्कों के नागरिकों के अमेरिका प्रवेश पर रोक लगाई थी। ट्रम्प फिर से सत्ता में आ गए तो मुस्लिमों ही नहीं सभी ग़ैर-सवर्णों का अमेरिका में जीना दूभर कर देंगे।
एक ऐसे समय जब मोदी अपनी पहली राजकीय यात्रा पर उनके देश में थे और उनकी ही पार्टी के नेता-राष्ट्रपति और किसी समय उनके ही उपराष्ट्रपति रह चुके बाइडन के साथ चर्चा में भारत की लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर कर रहे थे, ओबामा की टेलीविज़न-साक्षात्कार टिप्पणी भारतीय प्रधानमंत्री के साथ एक अन्यायपूर्ण कृत्य था।
ओबामा ने बजाय ऐसा करने कि वे बाइडन के साथ हुई संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल पर मोदी द्वारा दिए गए जवाब की तारीफ़ करते, उन्होंने जो कुछ कहा उसे अमेरिका में रहने वाले पचास लाख भारतीय मूल के नागरिकों ने सम्मान के साथ स्वीकार नहीं किया होगा।
अमेरिकी चैनल सीएनएन के साथ इंटरव्यू में ओबामा ने कहा :’अगर मैं प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत करता, जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, तो उनसे कहता कि अगर वे भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं करेंगे तो ऐसी आशंका है कि किसी बिंदु पर आकर भारत टूट सकता है। बाइडन और मोदी की मुलाक़ात में भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बात होना चाहिए। हमने देखा है कि जब आंतरिक संघर्ष बढ़ेगा तो वह न भारत के मुसलमानों के हित में होगा और न भारत के हिंदुओं के हित में।’
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर ओबामा ने पहली बार कुछ कहा हो ऐसा नहीं है। पद पर रहते हुए जब वे 2015 में जब वे भारत यात्रा पर आये थे तब भी स्वदेश रवाना होने से ठीक पहले और राष्ट्रपति का पद छोड़ने के बाद 2017 में जब एक मीडिया प्रतिष्ठान के कॉनक्लेव में भाग लेने आये थे तब भी भारत में धार्मिक आज़ादी को लेकर उन्होंने चौकनेवाली टिप्पणियाँ कीं थीं।
ओबामा के कार्यकाल (2009-2017) के दौरान मोदी ने अमेरिका की तीन बार यात्राएँ कीं थीं। पहली सितंबर 2014 में और दो साल 2016 में। अमेरिकी प्रशासन ने उन्हें एक बार भी राजकीय अतिथि बनने का सम्मान नहीं प्रदान किया।इसके उलट ,2009 में सत्ता में आते ही उन्होंने डॉ मनमोहन सिंह को अपना पहला राजकीय अतिथि बनाया था। मैं डॉ सिंह के साथ तब अमेरिका यात्रा पर गए मीडिया दल का एक सदस्य था। व्हाइट हाउस में उपस्थिति के दौरान हमने देखा था कि किस उत्साह और आत्मीयता के साथ ओबामा दंपति ने डॉ सिंह के स्वागत में वार्ताओं और विशाल भोज का आयोजन किया था। अमेरिका और भारत की तमाम बड़ी हस्तियाँ व्हाइट हाउस में उपस्थित थीं।ओबामा ने तब भी और 2010 में की गई अपनी आधिकारिक भारत यात्रा के दौरान भी भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर कभी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की।
मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान संयुक्त पत्रकार वार्ता में वॉल स्ट्रीट जर्नल की पत्रकार सबरीना सिद्दीक़ी ने तयशुदा तरीक़े से उनसे अप्रिय सवाल किया, ओबामा ने अपने टीवी साक्षात्कार में सर्वथा ग़ैर-ज़रूरी टिप्पणी की और इस सबकी प्रतिक्रिया में पहले असम के मुख्यमंत्री ने अत्यंत विवादास्पद ट्वीट किया और फिर केंद्रीय वित्त मंत्री ने अपनी संपूर्ण कटुता के साथ पूर्व राष्ट्रपति के कार्यकाल में मुस्लिम देशों पर गिराए गए बमों की गिनती सुना दी। सवाल किया जा सकता है कि इस सबसे भारत में रहने वाले करोड़ों अल्पसंख्यकों की मनःस्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा होगा !
ओबामा को प्रतिष्ठित ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ उनके द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय जगत में कूटनीति को सुदृढ़ करने और समुदायों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने’ के सम्मानस्वरूप प्रदान किया गया था।कहना कठिन है कि ओबामा उसी दिशा में कार्य कर रहे हैं। नोबेल शांति पुरस्कार महात्मा गांधी को प्राप्त नहीं हो पाया था जबकि हिंदू-मुस्लिम सद्भाव क़ायम करने के लिए उन्हें अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ा था। ओबामा को सिर्फ़ मुस्लिम-हितों के रक्षक की छवि से समझौता कर लेने के बजाय उस गांधी के नायकत्व की भूमिका निभाना चाहिए जिनके नाम का उल्लेख उन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त करते समय अत्यंत ही गर्व के साथ किया था।
प्रकाश दुबे
एकलव्य की निशानेबाजी से घबराकर आचार्य द्रोण ने अंगूठा मांग लिया था। गुरु पूर्णिमा से एक दिन पहले चेले-चपाटों ने शरद पवार का उद्धवीकरण कर दिया। अंतर इतना सा है कि उद्धव को राजनीतिक पार्टी विरासत में मिली। मातोश्री की बदौलत सत्ता और संपत्ति का वरदान पाने सैनिक उन्हें नया बता गए। युवा शरद ने अपनी हिकमत, होशियारी और पारे की तरह मु_ी से फिसलने और पानी की तरह दूध में घुल-मिल जाने की अदा से पार्टी तैयार की। चचा को छोडक़र फिर एक बार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अजीत पवार बरसों से मुख्यमंत्री बनने की हसरत पाले हैं। दस साल पहले उनसे पूछा- आपके शिवसेना में जाने की चर्चा है? सबेरे नौ बजे नहा-धोकर ताजा दम अजीत ने दादागीरी वाले लहजे में कहा - कल जाने तैयार हूं। वे मुख्यमंत्री बनाने का वादा तो करें। तब बाला साहेब ठाकरे जीवित थे।
फायदा : भाजपा के साथ पिछली मर्तबा गए तो सिंचाई घोटाले के कुछ मामले मंत्रिमंडल की पहली बैठक में अदालत से वापस लिए गए। बाकी के अब वापस लेने की वेला आ गई है।
2. सत्ता के सहयोग से एनसीपी के एकनाथ बनने की उम्मीद।
छगन भुजबल: बाल ठाकरे की दहशत के पंजे से छीनकर शरद पवार ने अपने साथ लिया। उपमुख्यमंत्री सहित कई जिम्मेदारियां दीं। बिहार समेत देश में पिछड़ों का चेहरा बनाकर पेश करना चाहा। अजीत दादा और पिछड़े समुदाय से संबंध के बावजूद महाराष्ट्र संगठन की कमान पहुंच से दूर रही।
फायदा: भ्रष्टाचार की जांच और कार्यवाही की तलवार से मुक्त होने की आस।
हसन मुश्रीफ: नवाब मलिक और अनिल देशमुख के बचाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की असफलता की घबराहट के कारण यही एकमात्र रास्ता बचा था।
फायदा: मुस्लिम होने के कारण कुछ कटृर धार्मिक संगठनों के हमले से राहत मिलेगी।
दिलीप वलसे पाटील: युवा कांग्रेस नेता के रूप में शरदराव के निजी सचिव से लेकर मंत्री, महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष तक कुशल प्रशासक और ईमानदारी की छाप छोड़ी। अजीत, जयंत, दिलीप तिकड़ी में साहेब का सबसे मजबूत मोहरा। कल जहां बस दुर्घटना में 25 प्राण गए, उसके पास ही सासुरवाड़ी।
फायदा: लालबत्ती? दिल के दु:ख के बाद आराम की जिंदगी? वे जानें?
प्रफुल्ल भाई: आपकी क्या राय है? सब कुछ सारू छे? बडो प्रधान का अपनापन या जांच एजेंसियों से हैरानी?
और अंत में -
कस्में, वादे, प्यार, वफा पर भारी चुनाव संग्राम।
सही कहे नरिंदर भाई, अभी अमित हैं काम।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
ध्रुव गुप्त
मुंबई के माहिम थाने के कडक़ थानेदार से फिल्मों में स्टारडम तक का अभिनेता राज कुमार का सफर एक सपने जैसा रहा था। एक बार उनके पुलिस स्टेशन में किसी काम के लिए पहुंच फिल्म निर्माता बलदेव दुबे ने उनकी बातचीत के अंदाज से प्रभावित होकर अपनी फिल्म ‘शाही बाजार’ में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की। उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर फिल्म स्वीकार कर ली। उनकी आरंभिक कई फिल्मों की असफलता ने उन्हें यह सोचने पर विवश किया था कि उनका चेहरा फिल्मों के लायक नहीं है।
1957 में महबूब खान की नरगिस पर केंद्रित फिल्म ‘मदर इंडिया’ की अपनी बहुत छोटी-सी भूमिका में वे पहली बार अपनी क्षमताओं का अहसास करा सके। उसके बाद जो कुछ हुआ वह इतिहास है। अपने व्यक्तिगत जीवन में बेहद आत्मकेंद्रित और रहस्यमय राज कुमार के अभिनय, मैनरिज्म, संवाद अदायगी की एक विलक्षण शैली थी जो उनके किसी पूर्ववर्ती या समकालीन अभिनेता से मेल नहीं खाती थी। अपनी ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने जिस अक्खड़, बेफिक्र और अहंकार की सीमाएं छूते आत्मविश्वासी व्यक्ति का चरित्र जिया, वह सिर्फ उन्हीं के बूते की बात थी। राज कुमार का अपना एक अलग दर्शक वर्ग रहा है जिसके लिए उनकी एक-एक अदा अपने समय का मिथक बनी। कहते हैं कि उनके समकालीन कई अभिनेता तुलना के डर से उनके साथ फिल्म करने से बचते थे। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के साथ उनकी दो फिल्मों-पैग़ाम और सौदागर में दोनों की अभिनय क्षमताओं की लंबे वक्त तक तुलनाएं होती रही थीं।
यह सच है कि उनकी रूढ़ अभिनय शैली में विविधता का अभाव था, लेकिन उनका दुर्भाग्य यह रहा कि जब भी उन्होंने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने की कोशिश की, दर्शकों ने उसे पसंद नहीं किया। गोदान जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं। उनके बाद अभिनेता नाना पाटेकर ने उनकी इस अक्खड़ अभिनय शैली को पुनर्जीवित करने में बहुत हद तक सफलता पाई। आज इस विलक्षण अभिनेता की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि, मेरे एक शेर के साथ !
वो आग था किसी बारिश का बुझा लगता था
अजीब शख्स था खुद से भी जुदा लगता था !
नामदेव काटकर
नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार रविवार (02 जुलाई 2023) को अपने कई साथियों के साथ महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे सरकार में शामिल हो गए।
अजित पवार ने प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली है।
प्रदेश में फिलहाल बीजेपी और शिव सेना (एकनाथ शिंदे गुट) के गठबंधन की सरकार है जिसमें देवेंद्र फडणवीस पहले ही उपमुख्यमंत्री पद पर हैं।
शपथ लेने के बाद अजित पवार ने कहा कि उन्होंने ‘एनसीपी पार्टी के तौर पर सरकार में शामिल होने का फ़ैसला लिया है और अगले चुनाव में वो पार्टी के चिन्ह और नाम के साथ ही मैदान में उतरेंगे।’
इधर उनके चाचा शरद पवार ने कहा है, ‘एनसीपी किसकी है इसका फ़ैसला लोग करेंगे।’
एनसीपी के मुख्य प्रवक्ता महेश भारत तपासे ने स्पष्ट किया है, ‘ये बगावत है जिसे एनसीपी का कोई समर्थन नहीं है।’
बदलता घटनाक्रम
बीते कुछ महीनों से महाराष्ट्र के अखबारों में ‘अजित पवार नॉट रिचेबल’ और ‘अजित पवार बगावत करेंगे’ जैसी सुर्खियां देखने को मिल रही थीं।
कुछ सप्ताह पहले शरद पवार के पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देने की बात मीडिया में छाई हुई थी। उस वक्त अटकलें लगाई जा रही थीं कि पार्टी की कमान अजित पवार को मिलेगी। लेकिन शरद पवार ने इस्तीफा वापस ले लिया जिसके बाद इस तरह के कयास लगना बंद हुए।
अजित पवार को जल्दबाजी से काम करने वाले और खुलेआम नाराजगी जताकर पार्टी को एक्शन लेने पर मजबूर करने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है।
उन्हें बेहद महत्वाकांक्षी नेता भी माना जाता है। वो पांच बार प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बने लेकिन मुख्यमंत्री बनते-बनते चूक गए।
लेकिन इसके बाद भी प्रदेश में कई लोगों की पसंद अजित पवार नहीं है। लेकिन क्या इन बातों का मूल अजित पवार के राजनीतिक सफर में खोजा जा सकता है।
अजित पवार बने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री, बोले- पीएम मोदी को समर्थन, शरद पवार ने कहा- एनसीपी किसकी तय करेंगे लोग
अनंतराव पवार से अजित पवार तक
सतारा से बारामती आकर बसे पवार परिवार के पास किसान मजदूर पार्टी की विरासत थी।
शरद पवार की मां शारदाबाई पवार शेकाप से तीन बार लोकल बोर्ड की सदस्य रहीं थीं। उनके पिता गोविंदराव पवार स्थानीय किसान संघ का नेतृत्व करते थे।
हालांकि शरद पवार ने 1958 में कांग्रेस का हाथ थाम लिया। 27 साल की उम्र में 1967 में वो बारामती से विधानसभा चुनाव में उतरे। उस वक्त उनके बड़े भाई अनंतराव पवार ने उनकी जीत के लिए कड़ी मेहनत की। शरद पवार पहली बार चुनाव जीतकर महाराष्ट्र विधानसभा पहुंचे।
इसके बाद वो राज्य मंत्री बने, फिर कैबिनेट मंत्री और फिर 1978 में मुख्यमंत्री बने। 1969 में जब कांग्रेस दोफाड़ हुई तो शरद पवार और उनके राजनीतिक गुरु यशवंतराव चव्हाण इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस गुट में शामिल हुए।
1977 में जब कांग्रेस में एक बार फिर बंटने की कगार पर पहुंची तो शरद पवार और चव्हाण ने कांग्रेस यूनाईटेड का दामन थामा जबकि इंदिरा गांधी कांग्रेस (इंदिरा) का नेतृत्व कर रही थीं। साल भर बाद वो कांग्रेस यूनाईटेड का साथ छोड़ जनता पार्टी के साथ गठबंधन में आए और महज 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने।
शरद पवार की पीढ़ी से किसी और ने राजनीति में कदम नहीं रखा। अगर पवार के बाद इस परिवार से कोई राजनीति में आया, तो वो हैं अनंतराव के बेटे अजित पवार।
हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि उनकी एंट्री के दशकों बाद शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले की एंट्री के बाद पार्टी में हालात बदलने लगे।
1982 में राजनीति में रखा कदम
1959 में देओलाली में जन्मे अजित पवार ने 1982 में राजनीति में कदम रखा। वो कोऑपरेटिव चीनी मिल के बोर्ड में चुने गए जिसके बाद वो पुणे जिला कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन रहे।
1991 में बारामती लोकसभा सीट से वो चुनाव जीते लेकिन फिर उन्होंने इसे शरद पवार के लिए खाली कर दिया। इसके बाद उन्होंने बारामती से विधानसभा चुनाव जीता। 1991 से लेकर 2019 तक वो लगतार सात बार इस सीट से जीतते रहे हैं। (1967 से 1990 तक शरद पवार यहां से विधायक रहे)
संसदीय चुनाव जीत कर अजित पवार ने नए फलक पर दस्तक दी लेकिन वो इससे सालों पहले यहां की स्थानीय राजनीति का अहम चेहरा बन चुके थे।
1978 में कांग्रेस छोडऩे वाले शरद पवार 1987 में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में लौट आए।
1990 का दशक आते-आते देश की राजनीति में उथल-पुथल शुरू हो गई। वीपी सिंह और चन्द्रशेखर की सरकार एक के बाद एक गिर चुकी थी और राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। केंद्र में सत्ता का नेतृत्व पीवी नरसिम्हा राव के कंधों पर था। 1991 में उन्होंने शरद पवार को रक्षा मंत्री का पद देकर केंद्र में आमंत्रित किया। उस वक्त केंद्र में जाने के लिए शरद पवार का सांसद होना जरूरी था। शरद पवार के लिए सुरक्षित माने जाने वाले बारामती विधानसभा क्षेत्र से तीन-चार महीने पहले ही अजित पवार वहां से चुने गए थे। लेकिन अजित पवार ने अपने चाचा के लिए इस्तीफा दे दिया।
इसी साल अजित पवार ने बारामती सीट से महाराष्ट्र विधानसभा की सीढिय़ां चढ़ीं। वो 1991 से लेकर आज तक 32 साल से अधिक समय तक बारामती से विधायक हैं।
वरिष्ठ पत्रकार उद्धव भड़सालकर ने बारामती में अजित पवार के शुरुआती दौर को करीब से देखा है।
वो कहते हैं, ‘उस समय कांग्रेस के पुराने नेता-कार्यकर्ता यहां थे। अजित पवार ने पार्टी को युवा बनाने की शुरुआत की। उन्होंने पिंपरी-चिंचवड़ और बारामती इलाकों में युवा नेताओं का रैंक बनाना शुरू किया। वो वह छोटे से छोटे कार्यक्रम में भी शामिल होते थे।’
कब-कब बने उपमुख्यमंत्री
02 जुलाई 2023 में शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और बीजेपी के साथ हाथ मिलाया।
दिसंबर 2019 से जून 2022 में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेतृत्व वाली महाविकासअघाड़ी सरकार में शामिल रहे।
नवंबर 2019 में तीन दिन के लिए बीजेपी के देवेंन्द्र फडणवीस सरकार में शामिल रहे।
नवंबर 2012 से सितंबर 2012 तक और फिर अक्तूबर 2012 से सितंबर 2014 तक कांग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण सरकार में रहे।
शरद पवार का स्टाइल सीखा
शरद पवार के लिए सांसदी छोडऩे के बाद अजित पवार प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुए।
1991 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाइक की सरकार में वो कृषि राज्यमंत्री रहे।
इसके बाद के दौर में एक तरफ उत्तर प्रदेश में बाबरी विध्वंस हुआ तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र में सांप्रदायिक दंगे और एक के बाद एक बम धमाकों ने मुंबई-महाराष्ट्र को हिलाकर रख दिया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने अनुभवी शरद पवार को राज्य का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा। उन्होंने शपथ लेते ही नई कैबिनेट की घोषणा की और इसमें अजित पवार को ऊर्जा राज्य मंत्री का प्रभार दिया।
1995 में महाराष्ट्र में कांग्रेस हार गई और शिवसेना-भाजपा गठबंधन सत्ता में आई। इसके बाद शरद पवार सांसद बने और वापस दिल्ली चले गये। लेकिन अजित पवार ने राज्य की राजनीति को चुना।
इंडिया टुडे में ‘क्यों नाराज अजित पवार ने पाला बदला’ लेख में वरिष्ठ पत्रकार किरण तारे कहते हैं कि ‘शरद पवार के दिल्ली चले जाने के बाद अजित पवार ने न सिर्फ बारामती पर कब्ज़ा किया, बल्कि यहां कांग्रेस का प्रभाव भी बढ़ाया। उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाते हुए परोक्ष रूप से यह भी दिखा दिया कि वे ही शरद पवार के उत्तराधिकारी होंगे।’
1999 में वरिष्ठ कांग्रेस नेता विलासराव देशमुख के प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद अजित पवार को सिंचाई विभाग की जि़म्मेदारी दी गई। इसे बाद में जल संसाधन मंत्रालय में मिला दिया गया। ये मंत्रालय 2010 तक उनके पास रहा।
2004 में कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा। कांग्रेस को 69 और एनसीपी को 71 सीटें मिलीं। ऐसे में जब एनसीपी को मुख्यमंत्री पद मिलने की उम्मीद थी तो कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने।
अगर एनसीपी को उस समय मुख्यमंत्री पद मिला होता तो अजित पवार सीएम बन सकते थे। लेकिन कहा जाता है कि शरद पवार के कुछ राजनीतिक समझौतों और रणनीति के कारण, एनसीपी को मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला। अजित पवार ने इन कथित ‘हथकंडों’ पर परोक्ष रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की है।
लोकमत के विदर्भ संस्करण के कार्यकारी संपादक श्रीमंत माने कहते हैं, ‘अजित पवार 2004 में मुख्यमंत्री बन सकते थे। कांग्रेस और राष्ट्रवादी पार्टी के बीच के फॉर्मूले के मुताबिक़ मुख्यमंत्री का पद एनसीपी को जाना तय था। लेकिन उस समय के समीकरणों के कारण ऐसा नहीं हुआ।’
वरिष्ठ पत्रकार अभय देशपांडे कहते हैं, ‘एनसीपी के मुख्यमंत्री पद न लेने का एक कारण यह था कि पार्टी में दावेदार अधिक थे। अगर वह पद लेते तो पार्टी को नुकसान होता। जब एक पद के लिए चार दावेदार हों तो पार्टी में मतभेद सामने नहीं आने चाहिए।’
2004 में एनसीपी के पास कई युवा नेता थे जो लगभग एक ही उम्र के थे, इनमें आरआर पाटिल, सुनील तटकरे, जयंत पाटिल, दिलीप वलसेपाटिल, अजित पवार और राजेश टोपे शामिल हैं।
लोकमत अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में अजित पवार ने इस पर टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था ‘अभी ये बात कहने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन 2004 में एनसीपी को मुख्यमंत्री पद नहीं छोडऩा चाहिए था। कई लोग मुख्यमंत्री बन सकते थे। आरआर पाटिल, भुजबल साहेब या कोई और सीएम बन सकता था।’
सुप्रिया सुले की एंट्री
2006 में पवार परिवार की एक और शख्सियत सुप्रिया सुले ने राजनीति में कदम रखा। राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद सुप्रिया सुले ने राजनीति में प्रवेश किया।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे कहते हैं, ‘2004 में अजित पवार और सुप्रिया सुले के बीच ज्यादा कंपीटिशन नहीं था। हालांकि, बाद में सुप्रिया सुले ने युवा राष्ट्रवादी के तौर पर काम शुरू किया और उनका नेतृत्व और अधिक दिखाई देने लगा। वहीं, अजित पवार का पार्टी में वर्चस्व भी बढ़ा। इसलिए अब दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।’
सुप्रिया सुले को 2009 में बारामती से लोकसभा टिकट मिला, इसी क्षेत्र से अजित पवार ने काम करना शुरू किया था। लेकिन इसके बाद मीडिया में इस तरह के सवालों का विश्लेषण शुरू हो गया कि क्या अजित पवार और सुप्रिया सुले के बीच प्रतिस्पर्धा है।
खुद अजित पवार और सुप्रिया सुले समय-समय पर ऐसी किसी प्रतिद्वंद्विता से इनकार करते रहे हैं। लेकिन शरद पवार का राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन, इस सवाल के जवाब की तलाश राजनीतिक विश्लेषक इन दोनों में से किसी एक के नाम पर रुक जाते हैं।
इसलिए सुप्रिया सुले की राजनीति में एंट्री जितना एनसीपी के लिए नहीं, उससे कहीं अधिक अजित पवार के राजनीतिक सफर में एक अहम घटना मानी जाती है।
दो घोटाले जिनमें अजित पवार
का नाम आया
सिंचाई घोटाला-1999 और 2009 के बीच बांधों और सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण में कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया। इस दौरान अजित पवार जल संसाधन मंत्री थे, जाहिर है कि विपक्षी दलों ने इसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सिंचाई परियोजनाओं के ठेकों के आवंटन और उन्हें पूरा करने में अनियमितताएं देखी गई हैं।
2012 में गठबंधन सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया और अजित पवार को क्लीन चीट दे दी। लेकिन बीजेपी के सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने इसकी जांच का आदेश दिया।
राज्य सहकारी बैंक घोटाला
राज्य सहकारी बैंक ने 2005 से 2010 के बीच बड़ी मात्रा में सहकारी चीनी मिलों, सहकारी धागा मिलों, कारखानों और अन्य कंपनियों को लोन दिए थे। ये सभी लोन डिफॉल्ट हो गए थे।
2011 में रिजर्व बैंक ने राज्य सहकारी बैंक के निदेशक मंडल को बर्खास्त कर दिया था। साथ ही सितंबर 2019 में पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार समेत 70 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
इस मामले की जांच के दौरान पता चला कि बिना कोलैटरल या को-ऑपरेटिव गारंटी लिए 14 फैक्ट्रियों को लोन देने, दस्तावेजों की जांच न करने, रिश्तेदारों को लोन देने से बैंक को हजारों करोड़ का नुक़सान हुआ। (bbc.com/hindi/)
-मनीष सिंह
धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश की अदालतों पर धर्म आधारित रुख अपनाने के आरोप लग रहे हैं। फिल्म ‘आदिपुरुष’ पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ‘कुरान’ पर फिल्म बना कर देखिये क्या होता है।
फिल्म ‘आदिपुरुष’ पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ‘कुरान’ पर फिल्म बना कर देखिये क्या होता है।
मामला फिल्म ‘आदिपुरुष’ पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली दो याचिकाओं का है, जिन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। 28 जून को सुनवाई के दौरान अदालत ने सेंसर बोर्ड से फिल्म को प्रमाण पत्र देने पर अचरज जताया और कहा कि यह एक ‘भारी गलती’ थी।
अदालत के मुताबिक इस फिल्म ने व्यापक रूप से लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है। अदालत ने सेंसर बोर्ड के साथ ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इन याचिकाओं पर जवाब देते हुए निजी हलफनामे दायर करने के लिए कहा।
धार्मिक समुदायों की तुलना
अदालत की कार्रवाई सिर्फ नोटिस भेजने तक ही सीमित नहीं है। वेबसाइट लाइव लॉ डॉट इन के मुताबिक न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और श्रीप्रकाश सिंह की पीठ ने कहा, ‘मान लीजिये कुरान पर एक छोटी सी डॉक्यूमेंटरी बनी होती, गलत चीजें दिखाते हुए, तो आप देखते कि फिर क्या होता है।’
समाचार चैनल एनडीटीवी के मुताबिक पीठ ने इस मामले में आगे कहा, ‘फिल्म बनाने वालों की भारी गलती के बावजूद, हिंदुओं की सहिष्णुता की वजह से हालात खराब नहीं हुए।’ हालांकि पीठ ने आगे यह भी कहा कि अदालत का कोई धार्मिक झुकाव नहीं है और अगर उसके सामने कुरान या बाइबल पर ऐसा कोई मसला आया होता तो भी अदालत का रुख यही होता।
बार एंड बेंच डॉट कॉम के मुताबिक पीठ ने सेंसर बोर्ड के सदस्यों पर भी टिप्पणी की और कहा, ‘आप कह रहे हैं कि संस्कार वाले लोगों ने इस मूवी को सर्टिफाई किया है जहां रामायण के बारे में ऐसा दिखाया गया है तो वो लोग ‘धन्य’ हैं।’
इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी की कई जानकारों ने आलोचना की है। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति आर एस सोढ़ी का कहना है कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच इस तरह तुलना करना ठीक नहीं है और हाई कोर्ट का यह बयान सोच की अपरिपक्वता को दिखाता है।
डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने यह भी कहा, ‘दुनिया के बड़े धर्म इस अपरिपक्वता से ऊपर उठ चुके हैं कि वो इस बात की परवाह करें कि कोई उनके भगवानों के बारे में क्या कह रहा है।’
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने एक ट्वीट में अदालत की भाषा को लेकर आलोचना की है।
कुछ विश्लेषकों ने अदालत की टिप्पणी को धार्मिक मामलों में पक्षपात से भी जोड़ा है। बर्लिन की ‘फ्री यूनिवर्सिटी’ के फेलो अनुज भुवानिया ने एक ट्वीट में कहा, ‘ऐसा लग रहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस पीठ ने फैसला कर लिया है कि वो हिंदू राष्ट्र की संवैधानिक अदालत की तरह पेश आएगी।’
पहले भी हो चुका है ऐसा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इससे पहले भी कई मामलों में ऐसे बयान दिये हैं जो भारत की धर्मनिरपेक्षता के ताने बाने में फिट नहीं बैठते। सितंबर 2021 में अदालत ने गोकशी के आरोप का सामना कर रहे एक व्यक्ति से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान कहा था कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देना चाहिए और ‘गाय की सुरक्षा को हिंदू समाज का मूलभूत अधिकार बना देना चाहिए क्योंकि हम जानते हैं कि जब एक देश की संस्कृति और विश्वास को ठेस पहुंचती है तो देश कमजोर होता है।’
इसी तरह फरवरी 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ही वेब सीरीज ‘तांडव’ के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोपों से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए एमेजॉन प्राइम के कार्यक्रमों की भारत में प्रमुख अपर्णा पुरोहित की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी थी।
ऐसा करते हुए अदालत ने पुरोहित को ‘देश के बहुसंख्यक नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ एक फिल्म को स्ट्रीम करने की अनुमति देने में सतर्कता नहीं बरतने’ का दोषी ठहराया था।
अदालत ने यह भी कहा था, ‘पश्चिमी देशों में फिल्में बनाने वाले तो ईशा मसीह और पैगंबर मोहम्मद का मजाक नहीं उड़ाते, लेकिन हिंदी फिल्मकार धड़ल्ले से बार बार हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाते हैं।’
अदालत का कहना था कि यह हिंदी फिल्म उद्योग की एक आदत बन चुकी है और इसे समय रहते रोकना होगा।
-पुष्य मित्र
1990 में फिल्म ‘आवारगी’ आयी थी, मगर बहुत चली नहीं। आज भी इस फिल्म की कहीं चर्चा नहीं होती। हालांकि समीक्षकों ने इस फिल्म की कहानी, उसकी प्रस्तुति, निर्देशक महेश भट्ट के निर्देशन और इसके कलाकारों के अभिनय की काफी तारीफ की। खास तौर पर यह भी कहा गया कि यह अनिल कपूर और मीनाक्षी शेषाद्री का अब तक का सबसे बेहतर अभिनय प्रदर्शन है। मुझे यह फिल्म बेहतरीन कहानी और बेहतरीन अभिनय के अलावा गुलाम अली के गाये गीत चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला के लिए भी खास तौर पर हमेशा याद रहती है।
एक दो दिन से इस फिल्म की याद इसलिए भी है, क्योंकि इन दिनों सोशल मीडिया पर यूपी की एक महिला पीसीएस अधिकारी की खूब चर्चा है। बताया जा रहा है कि उसके चपरासी पति ने उसे पीसीएस बनाया, मगर पीसीएस बनने के बाद वह अपने पति से अलग होना चाहती है। वह किसी और के साथ प्रेम करने लगी है।
इस फिल्म में अनिल कपूर एक अपराधी की किरदार में हैं। वह अपराधी एक वेश्यालय से मीनाक्षी शेषाद्री के किरदार को छुड़ाकर बाहर निकालता है और उसे एक सिंगर बनने में मदद करता है। वह मन ही मन मीनाक्षी शेषाद्री के किरदार से प्रेम करता है। मीनाक्षी शेषाद्री का किरदार अनिल कपूर के किरदार के एहसान के तले तो दबा रहता है, मगर वह उसे प्रेम नहीं करता।
उसे प्रेम अपने सहगायक गोविंदा के किरदार से होता है। इस बीच अनिल कपूर भी अपना प्रेम जाहिर करता है। इसके बाद शुरू होता है उस जुनूनी कशमकश का दौर। पहले तो मीनाक्षी शेषाद्री को लगता है कि अनिल कपूर के उस पर इतने एहसान हैं कि उसका किसी और से प्रेम करना गलत है। वह गोविंदा से दूर होने की कोशिश करती है। मगर यह हो नहीं पाता।
अनिल कपूर किसी भी सूरत में मीनाक्षी शेषाद्री को पाना चाहता है। कभी उसके साथ हिंसा करता है, तो कभी उसे दुलारता पुचकारता है। मगर मीनाक्षी के मन में अनिल कपूर एक प्रेमी के तौर पर है ही नहीं और कभी नहीं आता है। वह उसके एहसान के तले जरूर दबी है। अपने जीवन में उसके किये का महत्व भी समझती है, मगर वह एहसान प्रेम में नहीं बदलता।
इस कहानी के जरिये निर्देशक महेश भट्ट बताना चाहते हैं कि एहसान, मदद और उपकार अलग बात है और प्रेम अलग। अगर किसी के मन में किसी के प्रति प्रेम नहीं है तो वह नहीं है। प्रेम मन की चीज है। वह मन में स्वाभाविक तौर पर उपजती है। उसे जोर जबरदस्ती पैदा नहीं किया जा सकता।
हम अक्सर प्रेम को समझने में गलती करते हैं। हमारा समाज हमेशा प्रेम को रेगुलेट करने की कोशिश करता है। मगर प्रेम एक वैयक्तिक चीज है।
अनिल कपूर ने इस तरह की दो फिल्में की हैं। एक वो सात दिन, जिसके आधार पर बाद में हम दिल दे चुके सनम बनी। दूसरी यह आवारगी। वो सात दिन जिस एंड पर कहानी को ले जाती है, वह समाज को पसंद आने वाला है। वह प्रेम के आगे शादी के रिश्ते को प्रधानता देता है। उसमें एक भावुक रिजल्ट दिया जाता है, जो सबको पसंद आ जाये। मगर आवारगी फिल्म हकीकत के करीब है और वह सच्चाई को बहुत नजदीक से छूती है। उसके नतीजे समाज को पसंद नहीं आ सकते। इसलिए वो सात दिन और हम दिल दे चुके सनम फिल्म सुपर हिट हो जाती है औऱ आवारगी फ्लॉप होकर कहीं गुम हो जाती है।
मगर प्रेम की हकीकत को आवारगी फिल्म ही बयां करती है। प्रेम आप उसी से कर सकते हैं, जिसके लिए आपके मन में प्रेम उमड़ता है। आप नैतिकता के नाम पर अपने प्रेम को दबा तो सकते हैं, मगर किसी ऐसे व्यक्ति के लिए आप अपने मन में प्रेम पैदा नहीं कर सकते, जिससे आपको प्रेम नहीं है। समाज समझौते करना सिखाता है, मगर प्रेम सिर्फ मन से होता है।
अभी हमारा समाज इतना मैच्योर नहीं हुआ है कि वह प्रेम को समझ सके, उसे स्वीकार कर सके। दो प्रेम करने वालों को एक दूसरे के साथ खुश रहने दे। और यह समझे कि अरे प्रेम तो प्रेम है, यह उसी से होता है, जिससे होता है। यह न शादी करने से होता है, न एहसान करने से, न किसी और बाहरी वजह से।
नोट-यूपी वाली कहानी में सच्चाई क्या है, यह मैं नहीं जानता। क्योंकि यह तीन किरदारों के बीच घटी घटना है। उसकी तफ्तीश मैंने नहीं की है। मगर उस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह के बेवकूफाना चुटकुले शेयर हो रहे हैं। मीम बन रहे हैं और फालतू तर्क दिये जा रहे हैं। इसी वजह से मुझे यह लिखना जरूरी लगा। मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि कोई किसी को पीसीएस बनाये या सिंगर बनाये या
ओलिंपिक चैंपियन, मगर इस वजह से किसी को किसी से प्रेम नहीं हो सकता। न किसी को इस वजह से प्रेम का दावा करना चाहिए। प्रेम होने की अपनी ही अलग वजहें हैं।
-कात्या एडलर
फ्रांस में जब इमैनुएल मैक्रों ने कारें कम करने के लिए पेट्रोल के दाम बढ़ाने की कोशिश की तो उन्हें येलो वेस्ट प्रदर्शन का सामना करना पड़ा जिसमें कई दक्षिणपंथी समूह शामिल थे।वहीं जर्मनी में अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों की चिंता और नाराजगी ने सरकार में बैठी ग्रीन पार्टी को पर्यावरण सुधार के अपने वायदे को पूरा करने से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
फ्रांस इस समय भीषण हिंसा की चपेट में है। इसी हफ्ते फ्रांसीसी अल्जीरियाई मूल के एक 17 साल के युवक को पुलिस ने पेरिस के पास ननात्रे में गोली मार दी। इसके बाद आम तौर पर शांत रहने वाले इस शहर के बाहरी इलाकों में हिंसा फूट पड़ी और ये पूरे आग तेजी से देश के दूसरे हिस्सों में फैल गई। हालांकि इस तरह के दंगे फ्रांस के लिए नए नहीं हैं। लेकिन 2005 के बाद से देश में इतने बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई थी। एक तरफ राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों हालात पर काबू पाने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनके लिए संघर्ष मुश्किल दिख रहा है। उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी धुर-दक्षिणपंथी मरीन ले पेन को सुरक्षा पर कड़ा रुख अपनाने और अप्रवासी विरोधी संदेश देने से चुनावों में फायदा हो सकता है।
अगर आप यूरोप पर एक नजर घुमाकर देखें, चाहे वो उत्तर, दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम-आप अलग-अलग किस्म की धुर-दक्षिणपंथी पार्टियां देख सकते हैं जो नव फासीवादी पृष्ठभूमि के साथ अतीतजीवी, लोकप्रियतावादी, धुर रुढि़वादी राष्ट्रवादी पार्टियां हैं जिनका हाल के सालों में अच्छा खासा उभार हुआ है।
20वीं सदी में नाजियों और फासीवादी इटली के खिलाफ यूरोप के विनाशकारी युद्ध के ज़माने से ही ये धारणा रही है कि धुर-दक्षिणपंथ को कभी वोट नहीं देना चाहिए और मुख्य धारा की पार्टियां भी धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों से गठबंधन करने से इनकार करती थीं लेकिन अब इस पीढ़ी की संख्या धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। साल 2000 में मैं वियना में रह रही थी, जब दक्षिणपंथ की ओर झुकाव वाली मध्यमार्गी पार्टी ने पहली बार धुर-दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी से गठबंधन किया। पूरी दुनिया में ये खबर सुर्खी बनी। यहां तक कि यूरोपीय संघ (ईयू) ने वियना पर राजनयिक प्रतिबंध लगा दिए। अब, यूरोपीय संघ की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इटली की लीडर हैं जियार्जिया मेलोनी जिनका जुड़ाव नव फासीवादी से है। वहीं तीन महीने की वार्ता के बाद फिनलैंड में धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी पार्टी ‘द फिन्स’ हाल ही में गठबंधन सरकार में शामिल हुई है।
स्वीडन, ग्रीस, स्पेन... लंबी फेहरिश्त
स्वीडन में प्रवासियों और बहु संस्कृतिवाद की घोर विरोधी ‘स्वीडेन डेमोक्रेट’ पार्टी संसद में सबसे बड़ी पार्टी है जो वहां दक्षिणपंथी गठबंधन के साथ सरकार बनाने की कोशिश कर रही है। अभी पिछले रविवार ही ग्रीस की तीन धुर दक्षिणपंथी पार्टियों ने संसद में प्रवेश लायक सीटें हासिल कर लीं। जबकि स्पेन में विवादास्पद राष्ट्रवादी ‘वॉक्स पार्टी’ ने हाल ही में हुए स्थानीय चुनावों में उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया।
फासीवादी तानाशाह फ्रांसिस्को फ्रैंको की 1975 में मौत के बाद वॉक्स पार्टी पहली सफल धुर-दक्षिणपंथी पार्टी है। अगले महीने स्पेन में आम चुनाव होने वाले हैं और ये पार्टी दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाने की संभावना पर चर्चा कर रही है।
पोलैंड और हंगरी में तो धुर-दक्षिणपंथी और एकाधिकारवादी झुकाव वाली सरकारें हैं ही। ये फेहरिश्त लंबी है। यहां तक कि जर्मनी को भी इस सूची में समझ सकते हैं हालांकि वो अपने फासीवादी अतीत को लेकर अभी भी संवदेनशील है। यहां हुई रायशुमारी बताती है कि धुर-दक्षिणपंथी पार्टी (एएफडी), चांसलर शोल्त्ज की सोशल डेमोक्रेट (एसपीडी) पार्टी से आगे या बराबरी पर है। पिछले सप्ताहांत एएफडी के एक उम्मीदवार ने पहली बार स्थानीय नेतृत्व का चुनाव जीता। एसपीडी ने इसे राजनीतिक रूप से ‘विनाशकारी’ बताया है।
यूरोप में क्या हो रहा है?
ऐसे में सवाल ये है कि क्या लाखों लाख यूरोपीय वोटर वाकई धुर-दक्षिणपंथ की ओर जा रहे हैं? या ये सिर्फ विरोध में पडऩे वाले वोट हैं? या ये शहरी उदारवादी वोटरों और बाकी रुढि़वादी वोटरों के बीच हो रहा ध्रुवीकरण है?
एक सवाल ये भी है कि जब हम पार्टियों को ‘धुर-दक्षिणपंथी’ कहते हैं तो इससे हमारा क्या आशय होता है?
चुनाव के समय प्रवासी मुद्दे पर मुख्यधारा के राजनेता जिस तरह कड़ा रुख़ अपनाते हैं उसकी बानगी हैं दक्षिणपंथी रुझान वाले मध्यमार्गी डच प्रधानमंत्री मार्क रूटे या स्वघोषित मध्यमार्गी इमैनुएल मैक्रों।
यूरोपियन काउंसिल में विदेशी मामलों के डायरेक्टर मार्क लियोनार्ड कहते हैं कि हम एक बड़े विरोधाभासी समय में हैं।
एक तरफ तो मुख्यधारा के कई राजनेताओं ने हाल के सालों में दक्षिणपंथ के कई नारे या मुद्दे हथिया लिए हैं ताकि दक्षिणपंथी समर्थकों को उनसे दूर किया जा सके। लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने धुर-दक्षिणपंथ को और मुख्यधारा में आने में मदद ही की है। जबकि दूसरी तरफ यूरोप में धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों की एक अच्छी खासी संख्या उदारवादी वोटरों को लुभाने के लिए जानबूझ कर मध्यमार्गी राजनीति की ओर जा रही है।
रूस के प्रति रवैये को ही लें। इटली में द लीग, फ्रांस में मरीन ले पेन और ऑस्ट्रेलिया की ‘फ्रीडम पार्टी फार’ जैसी कई धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों का रूस के साथ पारंपरिक रूप से करीबी रिश्ता रहा है। लेकिन व्लादिमीर पुतिन ने जब यूक्रेन पर चौतरफा हमला बोल दिया तो उनके संबंध असहज हो गए, जिससे इन पार्टियों के नेताओं को रूस के लिए अपनी भाषा बदलनी पड़ी।
मार्क लियोनार्ड, यूरोपीय संघ के साथ धुर-दक्षिणपंथ के रिश्ते को ‘उनके मध्यमार्गी’ होने का ही उदाहरण बताते हैं।
यूरोपीय संसद में भी धुर-दक्षिणपंथियों की संभावना
लोगों को शायद याद हो, 2016 में ब्रिटेन में ब्रेक्सिट वोट के बाद ब्रसेल्स ने आशंका जताई थी कि इसके बाद फ्रेक्जिट (फ्रांस के ईयू छोडऩे), डेक्जिट (डेनमार्क के बाहर जाने), इटैलेक्जिट (इटली के ईयू छोडऩे) जैसी मांग हो सकती है। अधिकांश यूरोपीय देशों में लोकप्रियतावादी पार्टियां थीं जिनका उस समय प्रदर्शन अच्छा था लेकिन बाद में इन पार्टियों ने यूरोपीय संघ से निकलने या यूरो मुद्रा से हटने का विरोध करना बंद कर दिया।
बहुत सारे यूरोपीय वोटरों को ये कुछ ज़्यादा ही उग्र सुधारवादी कदम लगा था। उन्होंने ब्रिटेन में हुए ब्रेक्जिट के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नतीजों को देखा, कइयों को लगा कि पहले से ही संकटग्रस्त दुनिया में ईयू से निकलना और खतरनाक साबित होगा। कोविड महामारी, रूस की आक्रामकता, चीन को लेकर चिंता, आसमान छूती महंगाई के अलावा 2008 के आर्थिक संकट के बाद के प्रभावों से जूझ रहे करोड़ों यूरोपीय परिवारों को देखते हुए ये थोड़ा मुश्किल ही लगता है।
ओपिनियन पोल्स दिखाते हैं कि यूरोपीय लोगों के बीच यूरोपीय संघ की लोकप्रियता सबसे अधिक है। अभी तक दक्षिणपंथी पार्टियां ईयू को छोडऩे की बजाय इसमें सुधार को लेकर बोल रही हैं। और अगले साल यूरोपीय संसद के चुनाव में उनके अच्छे प्रदर्शन का अनुमान लगाया जा रहा है।
पेरिस में इंस्टीट्यूट मोंटेगनेज यूरोप प्रोग्राम की डायरेक्टर जॉर्जिना राइट मानती हैं कि धुर-दक्षिणपंथ का यूरोप में पुनर्जागरण का मुख्य कारण मुख्यधारा की राजनीति से लोगों की नाराजग़ी है।
इस समय जर्मनी में पांच में से एक वोटर का कहना है कि वो गठबंधन सरकार से नाखुश है।
जॉर्जिना राइट का कहना है कि यूरोप में अधिकांश वोटर दक्षिणपंथी पार्टियों की बेबाकी से आकर्षित होते हैं और पारंपरिक राजनेताओं से इसलिए निराश हैं कि उनके पास इन तीन सावालों के जवाब नहीं हैं-
1- पहचान से जुड़े मुद्दे : खुली सीमा का डर और राष्ट्रीय पहचान और पारंपरिक मूल्यों में गिरावट।
2- आर्थिक: वैश्विकरण का विरोध और बेहतर भविष्य की गारंटी न होने का सवाल।
3- सामाजिक न्याय: एक ऐसा एहसास कि राष्ट्रीय सरकारों का नागरिकों की जिंदगी बेहतर करने वाले नियमों पर कोई नियंत्रण नहीं बचा है।
देखा जा सकता है कि यूरोप में ग्रीन एनर्जी को लेकर होने वाली बहसों में ये मुद्दे आते रहते हैं।
इस साल नीदरलैंड्स में प्रांतीय चुनावों के बाद उच्च सदन में सबसे अधिक सीटें दक्षिणपंथी लोकप्रियतावादी पार्टी ‘फार्मर सिटिजेन मूवमेंट’ ने हासिल की थीं, तब ये खबर सुर्खी बनी थी।
फ्रांस में जब इमैनुएल मैक्रों ने कारें कम करने के लिए पेट्रोल के दाम बढ़ाने की कोशिश की तो उन्हें येलो वेस्ट प्रदर्शन का सामना करना पड़ा जिसमें कई दक्षिणपंथी समूह शामिल थे।
वहीं जर्मनी में अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों की चिंता और नाराजगी ने सरकार में बैठी ग्रीन पार्टी को पर्यावरण सुधार के अपने वायदे को पूरा करने से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
(bbc.com/hindi)
तमिल नाडु के राज्यपाल आरएन रवि का राज्य सरकार के एक मंत्री को बर्खास्त करना एक अभूतपूर्व कदम है. आखिर कई राज्यों में सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव की स्थिति और गंभीर क्यों होती जा रही है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
मंत्री वी सेंथिल बालाजी की मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में हुई गिरफ्तारी के करीब 15 दिन बाद राज्यपाल रवि ने उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। फिर पांच घंटों के अंदर उन्होंने उस बर्खास्तगी को रोक तो दिया लेकिन तब तक एक अभूतपूर्व विवाद जन्म ले चुका था।
राज्यों में किसी मंत्री को बर्खास्त करने का फैसला मुख्यमंत्री का होता है और मुख्यमंत्री बर्खास्तगी की अनुशंसा राजयपाल को भेजते हैं। इस मामले में राज्यपाल ने मुख्यमंत्री और मंत्री परिषद से सलाह लिए बिना मंत्री को बर्खास्त कर दिया।
क्या है मामला
बालाजी को प्रवर्तन निदेशालय ने 14 जून को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया था। आरोप 2014 के थे जब वो एआईएडीएमके पार्टी में और उस समय की सरकार में यातायात मंत्री थे। राज्यपाल चाह रहे थे कि मुख्यमंत्री स्टालिन बालाजी की गिरफ्तारी के बाद उन्हें मंत्री पद से हटा दें लेकिन स्टालिन ने अभी तक यह फैसला नहीं लिया था।
इसी बीच राज्यपाल ने गुरूवार 29 जून को स्टालिन पर बालाजी के प्रति पक्षपात का आरोपलगाते हुए बालाजी को बर्खास्त करने के आदेश दे दिए। मामले ने और ज्यादा नाटकीय मोड़ तब लिया जब राज्यपाल ने पांच घंटों के अंदर ही स्टालिन को पत्र लिख कर बालाजी की बर्खास्तगी रोक देने का आदेश दिया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने स्टालिन को लिखा कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें कहा है कि इस मामले में अटॉर्नी जनरल की सलाह भी ले लेनी चाहिए। उनकी सलाह मिलने तक बर्खास्तगी के आदेश को रोक दिया जाए।
मुख्यमंत्री स्टालिन राज्यपाल के कदम से नाराज थे और उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि वो बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। राज्यपाल की ताजा चिट्ठी के बाद स्टालिन ने अभी तक अपने अगले कदम के बारे में घोषणा नहीं की है।
कई राज्यों में टकराव
संविधान की धारा 164 (1) के मुताबिक राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करते हैं और फिर मुख्यमंत्री की सलाह पर दूसरे मंत्रियों को नियुक्त करते हैं। सभी मंत्री तब तक अपने पदों पर बने रह सकते हैं जब तक राज्यपाल चाहें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को हमेशा मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना होता है।
यह पहली बार नहीं है जब मुख्यमंत्री स्टालिन और राज्यपाल रवि आपस में भिड़ गए हैं। इससे पहले रवि ने राज्य की विधान सभा द्वारा पारित कई बिलों पर अपनी सहमति देने से इंकार कर दिया था, जिसके बाद डीएमके ने उनके खिलाफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को चिट्ठी लिखकर शिकायत की थी। इस बार विपक्षी पार्टियां रवि को बर्खास्त करने की मांग कर रही हैं।
विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच टकराव पहले भी होता था, लेकिन बीते कुछ सालों में यह काफी बढ़ गया है। दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल जैसे राज्यों में अक्सर यह टकराव देखने को मिल रहा है। केरल में तो स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि राज्य सरकार राज्यपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है। (dw.com)
मोदी सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर अपना राजनीतिक अभियान तक तेज कर दिया है। लेकिन 21वे विधि आयोग ने साफ कहा था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड ना जरूरी है और ना वांछनीय।
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
22वें विधि आयोग द्वारा यूनिफॉर्म सिविल कोड पर लोगों की राय इकठ्ठा करने की प्रक्रिया चल रही है। आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ऋतुराज अवस्थी का कहना है कि दो हफ्तों में 8.5 लाख व्यक्ति और संस्थान अपनी अपनी राय भेज चुके हैं।
इनमें से कई संस्थानों ने आयोग को चिट्ठी लिखकर यह याद दिलाया है कि 21वें विधि आयोग ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को ठुकरा दिया था। 21वें विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बी एस चौहान थे और आयोग ने दो साल के शोध और चर्चा के बाद 2018 में रिफॉर्म ऑफ फैमिली विषय पर एक परामर्श पत्र जारी किया था।
ना जरूरी, ना वांछनीय
इस पेपर में आयोग ने लिखा था कि यह एक बहुत बड़ा विषय है और देश में इसके संभावित परिणाम अनपेक्षित हैं। आयोग के मुताबिक देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर सर्वसम्मति नहीं है और ऐसे में सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि निजी कानूनों की विविधता का संरक्षण किया जाए लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाए कि निजी कानून संविधान द्वारा दिए गए मूलभूत अधिकारों का खंडन ना करें.
इसी आधार पर आयोग ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड ना तो जरूरी है और ना वांछनीय। आयोग ने यह भी जोड़ा कि अधिकांश देश अब असमानताओं को सम्मान देने की तरफ बढ़ रहे हैं क्योंकि असमानताओं का मतलब भेद-भाव नहीं होता है, बल्कि वे तो एक मजबूत लोकतंत्र का सूचक होती हैं।
सीपीएम और मुसलमानों की संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत जैसे संगठनों ने 22वें आयोग से अपने संवाद में 21वें आयोग के इसी विमर्श पत्र का हवाला दिया है।
लेकिन 22वें आयोग की घोषणा में उसके पूर्ववर्ती आयोग के निष्कर्षों को छोड़ देने के संकेत मिल रहे हैं। 14 जून को जारी एक बयान में आयोग ने कहा था कथित विमर्श पत्र को जारी हुए तीन साल से भी ज्यादा समय चुका है, इसलिए इस विषय पर नए सिरे से विचार-विमर्श करने की जरूरत है।
बीजेपी का पुराना एजेंडा
यूनिफॉर्म सिविल कोड एक बेहद विवादास्पद विषय है और यह पिछले कई दशकों से बीजेपी के चुनावी घोषणापत्रों के तीन प्रमुख बिंदुओं में से एक रहा है। इन तीन बिंदुओं में राम मंदिर और धारा 370 भी शामिल हैं। 2019 में भी लोक सभा चुनावों में बीजेपी ने संहिता लागू करने का वादा किया था।
धर्म, रीति-रिवाज और प्रथाओं पर आधारित निजी कानूनों (पर्सनल लॉ) को हटाने और उनकी जगह सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून को लाने की अवधारणा को यूनिफॉर्म सिविल कोड का नाम दिया गया है। इसके तहत शादी, तलाक, संपत्ति, गोद लेना आदि गतिविधियों से जुड़े कानून आते हैं।
उत्तराखंड, असम, गुजरात आदि जैसे बीजेपी की सरकार वाले राज्य इसे अपने अपने स्तर पर लागू करने की घोषणा कर चुके हैं, हालांकि इसे अभी तक कहीं लागू नहीं किया गया है। 27 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भाषण में यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन किया और कहा कि आज इसके नाम पर लोगों को भडक़ाया जा रहा है।
उन्होंने ने कहा, देश दो कानूनों पर कैसे चल सकता है? संविधान भी बराबर अधिकारों की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए कहा है। (dw.com)
कुछ शब्द बहुत नामचीन बनने की कोशिश करते हैं, जबकि शब्दकोष में उनका महत्व नहीं होता। ये शब्द अपनी जिच और जिद नहीं छोड़ते। हिन्दी तर्जुमा किए बिना इन्हें अंगरेजी में ‘वाइस’ ‘डेपुटी’ ‘असिस्टेंट’ या ‘एडिशनल’ वगैरह कहना मुनासिब होगा। ये भूमिकाएं दो नंबरी होती हैं। जब तक मुख्य भूमिका वाला व्यक्ति या ओहदा इन्हें जगह नहीं दे, इन बेचारों को तब तक प्रतीक्षारत रहना होता है। बिहार में अनुग्रह नारायण सिंह दबंग नेता हुए। वे मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद दूसरे नंबर पर वित्त मंत्री थे। बहुत कोशिश करने पर भी उपमुख्यमंत्री नहीं बन पाए, भले ही राजनीतिक ठसक मुख्यमंत्री के बराबर रही। यही भूमिका सी.पी. और बरार में कलह विशेषज्ञ द्वारिका प्रसाद मिश्र की रही। तमाम वरिष्ठता के बावजूद दो प्रधानमंत्रियों की मृत्यु के बाद कार्यकारी प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा दो नंबर पर ही रहे। चरित्रवान नेता प्रधानमंत्री के ओहदे पर परवान नहीं चढ़ सका। दूसरे नंबर की कुर्सी दरअसल तलवार की धार की तरह होती है।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी कोलकाता से दिल्ली हवाई जहाज में आ रहे थे। दादा प्रणव मुखर्जी ने अस्फुट स्वरों में सुझाया कि दो नंबर में होने के कारण उन्हें ही एक्टिंग प्राइम मिनिस्टर बनना होगा। राजीव मंडली ने पर ऐसे कतरे कि प्रणव मुखर्जी वहीं रह गए। कांग्रेस में दो नंबर की कुर्सी लेकिन कोषाध्यक्ष की मानी जाती है। उस पर सीताराम केसरी और मोतीलाल वोरा भी विराजमान रहे। दिग्विजय सिंह को अर्जुन सिंह डेपुटी समझकर लाए। समधी अपने दामाद के पिता पर भारी पड़ गया।
दो नंबरी का सांस्कृतिक शोषित बेचारा तबला है। अधिकतर लोग डीलडौल के कारण डग्गा को ही तबला समझते हैं। माओ त्से तुंग का दो नंबरी लिन पिआओ दुश्मन उन्मूलन नीति का जनक था। तोहमत माओ के माथे पर लगती थी। अमेरिकी लोकप्रिय राष्ट्रपति केनेडी की हत्या के पीछे अफवाह वाइस प्रेसिडेन्ट जॉनसन के खिलाफ उड़ी थी। मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम और लालकृष्ण आडवाणी ने मुस्कें ही कस ली थीं कि हर हाल में डेपुटी प्राइम मिनिस्टर बनाया जाए। भारत के एक बड़े ओहदेदार अपने पद वाइस प्रेसीडेन्ट को लेकर कहते वाइस का अंगरेजी अर्थ बुराई से होता है। मजाक में पूछते ‘क्या मैं प्रेसीडेन्ट की वाइस हूं?’ रूस वाले स्टालिन ने दो नंबर के नेता बेरिया को विश्वासघात के आरोप में दस हजार आदमियों के साथ कटवा दिया था।
हिन्दी में ‘कुलपति’ शब्द है। उसका अंगरेजी अनुवाद लेकिन ‘वाइस चांसलर’ हो जाता है। अंगरेजी में उन्हें चांसलर का वाइस क्यों बनाया जाता है? वाइस रहने के बाद बड़ी कुर्सी पर योग्यता के आधार पर धमक के साथ तो डॉ. राधाकृष्णन बैठे थे। उन पर प्रधानमंत्री नेहरू इतने फिदा थे कि राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को दूसरी पारी देने के पक्ष में नहीं थे। राजेन्द्र बाबू की जिद से ही दोबारा राष्ट्रपति बनना संभव हुआ। कद्दावर काठी और कांग्रेस कार्य समिति में बहुमत के बावजूद सरदार पटेल को डेपुटी प्रधानमंत्री बनना पड़ा। संविधान अद्भुत फलसफा है। राज्यपाल का पद लिखा है। फिर भी कई बेचारों को उप राज्यपाल शब्द से समझौता करना पड़ता है। वाइस प्रेसिडेन्ट के पद को कमतर महसूस करते उन्हें पदेन राज्यसभा का सभापति बना दिया ताकि वे कुछ काम तो करें। वैश्वीकरण के कारण व्यापारिक कंपनियों में वाइस प्रेसीडेन्ट का खूब चलन बढ़ा। यह ओहदेदार मालिक का नौकर होता है और अमूमन किसी सरकारी कंपनी के बड़े मुलाजिम रहते निजी उद्योगपति को सब तरह की मदद कर चुके होते हैं। असली वाइस चेयरमैन तो होता था योजना आयोग में। मोन्टेक सिंह अहलूवालिया की जितनी चलती उतनी तो किसी मंत्री की भी नहीं चलती थी। कांग्रेस संविधान में उपाध्यक्ष पद नहीं था। फिर भी अर्जुन सिंह के लिए भी एक बार ईजाद किया गया और उन्हें भावी प्रधानमंत्री तक प्रचारित किया जाता रहा।
दो नंबर के एक शिकार छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अधिकारी बी.के.एस.रे बार-बार कहते रहे मैं मुख्य सचिव के ठीक बाद हूं। लेकिन दो बार सुपरसीड कर दिए गए। अच्छा हुआ नगर पालिक निगमोंं में डेपुटी मेयर पद समाप्त कर दिया गया। उसके बदले सभापति पद ईजाद हुआ है। वाइस या डेपुटी की जगह एक्जीक्यूटिव अध्यक्ष बनाकर दो नंबर के अधिकारी के चेहरे पर तेज लाने के लिए नए विषेषण का रंग रोगन मल दिया जाता है। जैसे बूढ़ी होती हुई फिल्म अभिनेत्रियां करती हैं। विधानसभा में उपाध्यक्ष का पद हॉस्टल के वॉर्डन जैसा होता है। वहां अध्यक्ष नामक प्रिंसिपल ही सब कुछ होता है। बद्रीधर दीवान ने मंत्री नहीं बन पाने से निष्क्रिय उपाध्यक्ष पद पर आराम फरमाना मुनासिब समझा। गंगा प्रसाद उपाध्याय कवर्धा के प्रभावशाली नेता और विधायक मेरे पिता के मित्र थे। बचपन में उन्हें चिढ़ाता चाचाजी आपके सरनेम का अंगरेजी अनुवाद डेपुटी चेप्टर कहा जाएगा। वे ठहाका लगाते। एक मित्र उपासने हैं और दूसरे उपरीत। जो लोग उपमन्यु गोत्र में पैदा हुए हैं, उन सबकी शुरुआत क्या प्रथम पंक्ति का नेता बनने के लिए नहीं हुई है?
एडिशनल शब्द की बड़ी महिमा है। जैसे एडिशनल सालिसिटर जनरल या एडिशनल एडवोकेट जनरल। ये संविधान की रक्षा के लिए हैं जबकि इनके पद नाम संविधान में हैं ही नहीं। मेरे मित्र दुर्ग के एडिशनल कलेक्टर विजय सिंह ने वरिष्ठ धाकड़ कलेक्टर वी.एन. कौल को लिखकर दिया था कि मैं आपात काल में किसी व्यक्ति को आंतरिक सुरक्षा के नाम पर गिरफ्तार नहीं करूंगा क्योंकि मैं तो खुद ही कलेक्टर का एडिशनल हूं। अच्छा हुआ संविधान ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के बाद डेपुटी या एडिशनल शब्द का उल्लेख नहीं किया। वहां प्रशासनिक न्यायाधीश का नामकरण कर लिया गया है। ‘उप’ नाम का संबोधन दो जगह बड़ी मशक्कत वाला है। समाचार पत्रों में बेचारा डेपुटी एडिटर दिन रात मेहनत करता है और श्रेय संपादक लूट लेते हैं। जैसे रसोई देवरानी पकाए और जेठानी परोस दे। यही हाल बेचारे वाइस प्रिंसिपल का स्कूलों कॉलेजों में होता है। लेकिन दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव में मेघनाथ कनोजे ने उप-प्राचार्य पद को एक संस्था के रूप में विकसित किया। जैसे रणवीर सिंह शास्त्री ने दुर्गा महाविद्यालय में। सचिवालय में ऐसी झंझटों से निपटने ‘असिस्टेन्ट‘‘डेपुटी’ और ‘एडिशनल’ के साथ संयुक्त याने ‘ज्वाइंट’ नामक शब्द भी है। भ्रष्टाचार में बहुत से सचिव संयुक्त हो जाते हैं। भ्रष्टाचार तो मंत्रिपरिषद में भी हो रहा है। राज्य और डेपुटी शब्दों के साथ लेकिन ‘असिस्टेंट’ और ‘ज्वाइंट’ शब्दों में वह महिमा नहीं है, जो ‘वाइस‘ ‘डेपुटी‘ या ‘एडिशनल’ में है। दो नंबर की सम्भावित या डेपुटी चीफ मिनिस्टर बनने की असली लड़ाई मंत्रिपरिषदों में तो होती रहती है। यह भी है कि उप मुख्यमंत्री उसे भी बनाया गया जिसके पास विधायकों का बहुमत रहा और मुख्यमंत्री उसे जिसके पास विधायकों का अल्पमत। संदर्भ शिव भानु सोलंकी और अर्जुन सिंह। इसके लिए लेकिन समर्थन की डंडी खोजनी होती है। मध्यप्रदेश में अपने वोट अर्जुन सिंह को देकर वह डंडी कमलनाथ ने मारी थी। आगे भी हर मुख्यमंत्री को किसी उभरते उप मुख्यमंत्री से ज्यादा सरोकार डंडी मारने वाले को खोजने से ही होता रहेगा।
-सुदीप ठाकुर
भारतीय संविधान में न तो उपप्रधानमंत्री और न ही उपमुख्यमंत्री पद के बारे में कोई जिक्र है, लेकिन इन पदों का एक राजनीतिक संदेश होता है। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले भूपेश बघेल की अगुआई वाली सरकार में टीएस बाबा को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 मंत्रिपरिषद के गठन से संबंधित हैं। अंग्रेजी राज से मुक्ति के बाद देश में लोकतांत्रिक शासन की जिस वेस्टमिंस्टर प्रणाली को अपनाया गया उसमें प्रधानमंत्री पद को स्नद्बह्म्ह्यह्ल ्रद्वशठ्ठद्द श्वह्नह्वड्डद्य माना गया है। यानी सारे मंत्री बराबर हैं और प्रधानमंत्री उनमें सबसे आगे हैं। यही बात राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लेकर है। यह अलग बात है कि मजबूत बहुमत वाली सरकारों में, चाहे फिर वह केंद्र की हो या राज्यों की, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री शक्तिशाली होता है और सारे मंत्री राष्ट्रपति या राज्यपाल के नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के विश्वास कायम रहने तक पद पर बने रह सकते हैं।
अनुच्छेद 74 (1) के मुताबिक, ‘राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा...।'इसी तरह से अनुच्छेद 75 (1) के मुताबिक 'प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा...।’
इन दोनों अनुच्छेदों में कहीं भी उपप्रधानमंत्री पद का जिक्र नहीं है। इसके बावजूद 15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की अगुआई वाली देश की पहली सरकार के समय से उपप्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति होती रही है। सरदार वल्लभ भाई पटेल के रूप में देश को पहला उपप्रधानमंत्री मिला था। विभाजन के बाद एक नए बन रहे देश की विषम परिस्थितियों में यह सूझबूझ भरा फैसला था और अपने मतभेदों के बावजूद नेहरू और पटेल ने सत्ता संतुलन कायम करते हुए अपनी जिम्मेदारियां निभाई थीं।
पटेल के बाद 1967 में इंदिरा गांधी की सरकार में मोरारजी देसाई भी उपप्रधानमंत्री रहे। 1977 में मोरारजी देसाई की अगुआई वाली जनता पार्टी में चरण सिंह और जगजीवन राम के रूप में दो उपप्रधानमंत्री हुए। उनके बाद यशवंत राव चव्हाण, देवीलाल और लालकृष्ण आडवाणी भी उपप्रधानमंत्री रह चुके हैं।
यह सबको पता है कि प्रथम उपप्रधानमंत्री पटेल को छोडक़र बाकी के सारे उपप्रधानमंत्री राजनीतिक संतुलन के साथ ही निजी महत्वाकांक्षाओं के टकराव को साधने के लिए बनाए गए थे।
जहां तक राज्यों में उपमुख्यमंत्री पद की बात है, तो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 में इसका कोई जिक्र नहीं है। लेकिन अब तक विभिन्न राज्यों में दर्जनों उपमुख्यमंत्री बनाए जा चुके हैं।
इसी समय आंध्रप्रदेश, अरुणाचल, बिहार, हरियाणा, हिमाचल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मेघालय, नगालैंड, उत्तर प्रदेश और अब छत्तीसगढ़ सहित 11 राज्यों में उपमुख्यमंत्री काम कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प मामला आंध्र प्रदेश का है, जहां मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के लिए पांच उपमुख्यमंत्री बना रखे हैं!
गठबंधन की राजनीति में उपमुख्यमंत्री पद सत्ता संतुलन कायम करने में मददगार तो साबित हो ही रहा है, एक दलीय सरकार में भी नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और जातीय अस्मिताओं के तुष्टीकरण के लिए भी इसका सहारा लिया जा रहा है। सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के दो उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक दो प्रभावशाली जातीय समूहों ओबीसी और ब्राह्मण का प्रतिनिधित्व करते हैं और कहने की जरूरत नहीं कि उनकी नियुक्तियां इसे ध्यान में रखकर ही की गई हैं।
महाराष्ट्र की शिंदे-भाजपा सरकार में देवेंद्र फडऩवीस भले ही उपमुख्यमंत्री हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से वह यह जतलाने में गुरेज नहीं करते कि सरकार की ड्राइविंग सीट पर भले ही एकनाथ शिंदे बैठे हैं, लेकिन स्टेयरिंग उनके हाथ में है!
बिहार में नीतीश कुमार की अगुआई वाली सरकार में तेजस्वी यादव को उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल चीफ मिनिस्टर इन वेटिंग के रूप में देख रही है। संभव है कि विपक्षी दलों को एकजुट करने के मुहिम में जुटे नीतीश कुमार आने वाले समय में तेजस्वी के लिए पद छोड़ दें। अलबत्ता हरियाणा का मामला कुछ अलग है, जहां मनोहर लाल की अगुआई वाली भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला का पद पर बने रहना उनकी अपनी पार्टी के अस्तित्व के लिए भी जरूरी है।
नगालैंड जैसे छोटे राज्य में भाजपा-एनडीपीपी सरकार में दो-दो उपमुख्यमंत्री का होना प्रशासनिक सुगमता को नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन को ही अधिक दिखाता है।
देश की दो प्रमुख पार्टियां भाजपा और कांग्रेस के लिए अब उपमुख्यमंत्री पद आजमाया हुआ फॉर्मूला है। कांग्रेस ने हाल ही में हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव जीते हैं, और इन दोनों ही जगहों पर उसने उपमुख्यमंत्री नियुक्त किए हैं। हालांकि कर्नाटक का मामला हिमाचल से एकदम अलग है। बल्कि कर्नाटक अपने क्षत्रपों को साधने के लिए कांग्रेस का नया टैम्पलेट बन गया है। इसका श्रेय कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के साथ ही कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया जा सकता है। यही वजह है कि कर्नाटक में पूरे चुनाव के दौरान सिद्धरमैया और डीके शिवकुमार के बीच आमतौर पर टकराव की स्थिति नहीं बनी। नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री पद पर दोनों की दावेदारी थी, लेकिन अंतत: शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री पद से संतुष्ट किया गया।
लेकिन छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले इस फॉर्मूले को आजमाने की क्या वजह हो सकती है? वास्तव में टीएस बाबा ने सचिन पायलट के उलट कांग्रेस आलाकमान से टकराने की कभी कोशिश भी नहीं की थी। बाबा को छत्तीसगढ़ की सियासत में एक सौम्य और मृदुभाषी नेता के तौर पर ही जाना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत का श्रेय भूपेश के साथ ही बाबा को भी जाता है।
संभव है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद राहुल गांधी के समक्ष भूपेश और बाबा के बीच जिस ढाई-ढाई साल वाले कथित समझौते की बात की गई थी, उसकी यह भरपाई हो। इससे कांग्रेस को नुकसान कुछ नहीं है। छत्तीसगढ़ के बारे में लिए गए इस फैसले का एक बड़ा संदेश यही है कि कांग्रेस साहसिक फैसले लेने से गुरेज नहीं कर रही है।
वास्तव में टीएस बाबा को उपमुख्यमंत्री नियुक्त कर कांग्रेस ने भाजपा को ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में प्रचलित ‘फूल छाप’ कांग्रेसियों को भी चौंका दिया है!
- हितेंद्र पटेल
अक्षय मुकुल की गीता प्रेस पर लिखी किताब बहुत मेहनत से लिखी गई है लेकिन भ्रामक है। इसमें तथ्य हैं लेकिन तत्त्व को ठीक से समझा नहीं गया है। हनुमान पोद्दार बहुत ही जटिल व्यक्ति हैं। उनको इस तरह सांप्रदायिक सिद्ध करके अंतत: एक प्रतिक्रियावादी सोच को ही बढ़ावा मिलता है, जिससे भारतीय भाषाओं के पढ़े लिखे लोग आपस में लड़ते हैं और चालाक एलीट पढ़े लिखे लोग मलाई खाते हैं। (यह एक भद्दा भाषिक प्रयोग लगे, लेकिन थोड़ी तल्खी जरूरी है। जिन विद्वानों की अनुशंसा इस पुस्तक को प्राप्त है उनको उत्तर भारत के साहित्य, इतिहास और समाज की कितनी समझ है? क्या कोई वासुदेव शरण अग्रवाल, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे विद्वान इस तरह से देखते जैसे ये दोनों अनुशंसा करने वाले देखते हैं?)
आप ध्यान रखें कि पोद्दार इस तरह के भक्त थे कि अपने को निमित्त मात्र मानते थे। जब उनको भारत रत्न देने की पेशकश की गई तो उन्होंने इंकार कर दिया!
हिंदू और मुसलमान की लड़ाई और भारतीय राष्ट्रवाद की कहानियां इतने सीधे रूप में चित्रित नहीं की जा सकती कि 1870 से 1947 तक की कहानी को इस तरह कहा जा सके कि एक तरफ हिंदू हिन्दी हिंदुस्तान वाले लोग थे और दूसरी तरफ लिबरल, इन्क्लूसिव और लोकतांत्रिक लोग थे। इस बाइनरी ने बड़ा अहित किया है।
एक समय था जब गीता के महत्त्व को भी ठीक से नहीं समझा जाता था। तिलक, गांधी और सहजानंद को गीता के महत्त्व को समझने के लिए ध्यान में रखना जरूरी है।
हनुमान प्रसाद पोद्दार, गोयन्दका जैसे लोगों को जिस तरह से अक्षय मुकुल ने देखा है वह उनके प्रति चरम अन्याय है। असहमतियां हैं और उसे कहा जाना चाहिए, लेकिन उनके उद्देश्य को इस तरह नकारात्मक तरीके से देखना ठीक नहीं।
भक्त साम्प्रदायिक नहीं होता। ये लोग भक्ति में विश्वास करने वाले लोग थे, उनको सांप्रदायिक लेबल के साथ पेश करना बहुत ही खराब दृष्टि है।
निश्चित रूप से गीता प्रेस ने हिंदू जीवन दर्शन से चीजों को देखा। इसमें छपी चीजें भिन्न भिन्न प्रकार की हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के लोग लिखते थे, इसका ध्यान रहे। एक खास तरीके से देखने के कारण भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर गांधी तक सभी साम्प्रदायिक मान लिए गए थे। यहां तक कि प्रेमचंद में भी सांप्रदायिकता के तत्वों को खोजने की एक जबरदस्त मुहिम भी चली थी।
यह घातक इतिहास दृष्टि है, जिसको सुनियोजित ढंग से भारतीय भाषा के विद्वानों के माध्यम से भी फैलाया गया है। अब इसपर विचार करके एक सम्यक दृष्टि से विचार करना होगा।
राष्ट्रवादी दृष्टि और सांप्रदायिक दृष्टि एक दूसरे से गुंथी हुई थी। कालांतर में एक भारतीय दृष्टि का निर्माण हुआ। इस भारतीय दृष्टि में एक हिंदू राष्ट्रवादी दृष्टि भी रही और एक राष्ट्रवादी मुसलमान दृष्टि भी रही। बहुत ही पेचीदा मामला है। ऐसे में बहुत शोध की जरूरत है।
शोध का एक धर्म है। नीर
क्षीर का विवेक होना चाहिए। अपने आर्गुमेंट को भी बार बार परिष्कृत करना पड़ता है।
सरकार जो कर रही है और जिन जिन को पुरस्कृत कर रही है उसकी आलोचना जरूरी है। एम जी रामचंद्रन को दे दिया था। सचिन तेंदुलकर को दिया। उनकी मर्जी, आखिर सरकार है उनकी। उसकी जिम्मेवारी सरकार की है। उसके पक्ष और विपक्ष में बंटकर बौद्धिक क्यों चले। उसका मूल्यांकन कार्य अलग तरीके से होना चाहिए। कोई भी सरकार क्या किसी को महान बना सकी है?
क्या अशोक बौद्ध धर्म को या अकबर दीन ए इलाही को बढ़ा सके ?
सत्ता की अपनी भूमिका होती है, उसपर आलोचना करना उचित है। यह हमारा धर्म भी है। पर गीता प्रेस के इतिहास को इस तरह नकारात्मक ढंग से देखना क्या उचित होगा ? उसके अंतर्निहित मूल्यों की आलोचना करें लेकिन उसके अवदान को भी स्मरण में रखें।
-गुरमन
चूडिय़ाँ पहनने की संस्कृति दक्षिणी एशिया के देशों के बहुत बड़े हिस्से में मौजूद है। भारत सहित पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, और बंगलादेश के बहुत बड़े हिस्से में यह गहना औरतों द्वारा पहना जाता है। हड़प्पा मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान मिली ‘नाचती हुई लडक़ी’ (डांसिंग गर्ल) की मूर्ति इस संस्कृति के पाँच हजार साल पुराना होने की पुष्टि करती है। ‘नाचती हुई लडक़ी’ का बायाँ हाथ चूडिय़ों से भरा देखा जा सकता है।
इस लेख में हम बात करेंगे चूडिय़ाँ बनाने वाले मजदूरों के जीवन हालातों की। उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद में चूडिय़ाँ बनाने वाले लगभग 200 कारखाने हैं। इन कारखानों में लगभग 50 हजार मजदूर काम करते हैं। मर्द, औरतों के अलावा यहाँ 20 हजार बच्चे भी काम करते हैं। इस शहर की 90 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चूडय़िों के कारोबार पर निर्भर है। बाज़ार में जो एक चूड़ी आती है, वो औसतन 40 लोगों के हाथों से होकर गुजरती है। फिरोजाबाद के चूड़ी बनाने वाले ये मजदूर बेहद गर्मी में लगातार 12-12 घंटे भट्ठी के आगे बैठकर काम करते हैं। भट्ठियों का तापमान औसतन 1200 डिग्री होता है। काँच की चूडिय़ाँ बनाने का काम ‘सिलिका सैंड’, जिसे सफेद रेत कहते हैं, की ढलाई से शुरू होता है। वैसे सफेद रेत 2800 डिग्री तापमान पर जाकर पिघलती है, लेकिन फिरोजाबाद के कारख़ानों की भट्ठियों का ज्यादा-से-ज्यादा तापमान 1200 डिग्री है। इसलिए सिलिका रेत में सोडियम नाइट्रेट मिलाकर सिलिका रेत के गलनांक को 1200 डिग्री तक लाया जाता है। गलनांक को कम करने के लिए संखिया और सुहागे का भी इस्तेमाल किया जाता है। काँच को मजबूती देने के लिए इसमें नमक भी मिलाया जाता है। इतने अधिक तापमान में काम करने पर भी मजदूरों को सुरक्षा कपड़े भी नहीं दिए जाते। मजदूरों का कहना है कि उन्हें दिए जाने वाले दस्ताने और मास्क आरामदायक नहीं हैं और इन्हें पहनकर काम करना बहुत मुश्किल है। भट्ठी के आगे गर्मी और पिघले हुए काँच से जलने की दुर्घटनाएँ आम हैं।
2012 में संसद के एक पैनल ने काँच और चूडिय़ाँ बनाने वाले चार लाख मजदूरों के हालातों के बारे में रिपोर्ट पेश की। इसमें कहा गया कि मजदूर जिस वातावरण में काम करते हैं, उसमें गर्मी और आवाज का स्तर इंसानी शरीर के सहने-लायक स्तर से कहीं ज्यादा है। चूडिय़ाँ बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे रसायन गर्मी और काँच का मिश्रण मजदूरों की हालतों को और भी बदत्तर बना देता है। यहाँ के एक डॉक्टर के अनुसार उसके बहुत से मरीज छाती और फेफड़ों से संबंधित रोगों से ग्रस्त है। श्वास नली में सूजन और टी.बी का रोग बड़े स्तर पर है। फिरोजाबाद में रहने वाले बहुत सारे लोग उम्र से पहले ही अपनी नजर गँवा लेते हैं। चूडिय़ों को विभिन्न रंग देने के लिए कॉपर ऑक्साइड, क्रोमियम बाइकार्बोनेट, कैडमियम सल्फाइड और सेलेनियम ऑक्साइड को विभिन्न तरह के मिश्रण में मिलाया जाता है। कारखाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों जैसे कि सिक्का कैडमियम और पारा आदि से निकलीं जहरीली गैसें मजदूरों के स्वास्थ्य पर और बुरा असर डालती हैं।
भारत की सर्वोच्च अदालत ने कारख़ानों में चिमनी की लंबाई कम-से-कम 60 मीटर करने का निर्देश दिया था, लेकिन उसे भी कारखाना मालिकों द्वारा अनदेखा किया जा रहा है। लेकिन कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार मजदूरों की देखभाल के लिए एक भी सरकारी अस्पताल मौजूद नहीं है। उन्हें अपने इलाज के लिए 40 किलोमीटर दूर आगरा शहर में जाना पड़ता है। ‘व्यापारिक और कारोबार संघ’ के अनुसार इस शहर का उद्योग 150 अरब रुपए का है। भले ही इस शहर को 1989 में जिला घोषित किया गया था, लेकिन आज तक भी यहाँ कोई सरकारी अस्पताल मौजूद नहीं है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के बिना एक और बहुत बड़ा मुद्दा बाल मजदूरी का है। अखबारों की कुछ रिपोर्टों के अनुसार 20 हजार से ज्यादा बाल मजदूर चूडिय़ाँ बनाने के काम में लगे हुए हैं। साल 2011 की जनगणना के अनुसार 80 प्रतिशत बच्चे जिनकी उम्र 14 साल से कम है, बाल मजदूरी में लगे हुए हैं। बाल मजदूरी के खात्मे के लिए भारत सरकार कई कानून लाई, जैसे कि फैक्टरी एक्ट 1948, द माइनर्स एक्ट 1952, द चाइल्ड लेबर एक्ट, 1986, द जुवेनाइल जस्टिस ऑफ चिल्डर्न एक्ट 2000। लेकिन इन सभी कानूनों के बावजूद भी बाल मजदूरी रुक नहीं रही। फिरोजाबाद की बाल मजदूरी का बड़ा कारण शायद ‘बाल मजदूरी कानून 2017’ घर में उद्योग से संबंधित कामों में बच्चों के काम करने के बारे में बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार फिरोजाबाद के 40 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं। लडक़ों के मुकाबले स्कूल छोडऩे की दर लड़कियों की ज़्यादा है। गरीबी के कारण बच्चे इस काम में ज़्यादा आते हैं। एक मजदूर के अनुसार बच्चों के हाथ छोटे होने के कारण वो चूडिय़ाँ बनाने के काम के लिए ज़्यादा कारगर हैं। कुछ गैर-सरकारी संस्थाओं के दबाव में रजिस्टर्ड कारखानों में बाल मजदूरों की कमी आई है, लेकिन घर के अंदर काम करने वाले बच्चों की दर में कोई कमी नहीं आई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, एक बच्चा एक दिन में 16 हजार चूडिय़ों को परखता है। गुणवत्ता परखने के लिए हर चूड़ी को एक पत्थर पर मारकर छनकाया जाता है। लेकिन इतने ज़्यादा महीन काम के लिए सिर्फ 90-100 रुपए दिहाड़ी दी जाती है।
उपरोक्त दो मुद्दों के अलावा मजदूरों को मिल रहा वेतन भी एक बड़ा विषय है। इस समय में मजदूरों के वेतन बढ़ती महँगाई के सामने बहुत कम हैं। कोरोना काल की पाबंदियों के बाद मजदूरों का जीवन स्तर बहुत नीचे गिरा है। कुछ समय पहले जिन्हें अपनी दिहाड़ी में सिर्फ पाँच रुपए प्रति तोड़ा (एक तोड़ा=296 चूडिय़ाँँ) मजदूरी बढ़वाने के लिए बड़ा धरना लगाना पड़ा। रूस और यूक्रेन युद्ध के कारण इन कारखानों के निर्यात को बारह सौ करोड़ का घाटा पड़ा है। जिसका स्पष्ट असर मजदूरों के वेतनों पर पड़ा है। चीन से मिलने वाले सस्ते माल ने भी फिरोजाबाद के उद्योग को करारी चोट दी है। एक अंदाजे के अनुसार, भारतीय बाजार में काँच से बनी चीज़ों का 80 प्रतिशत चीन से आता है। इस उद्योग पर एक और बड़ा ख़तरा ताज ट्रेपीजयिम जोन का घेरा है, जो कि ताजमहल के इर्द-गिर्द आने वाला इलाका है। जहाँ के प्रदूषण के कारण ताजमहल की ख़ूबसूरती को नुकसान पहुँचता है। इसके कारण बहुत सारे कारखाने बंद होने का ख़तरा है। अंत में इस सबकी मार मजदूर आबादी पर पडऩी लाजिमी है। इसके विरोध में मजदूरों की बड़ी एकता की सख़्त जरूरत है।
(मुक्ति संग्रामबुलेटिन 31 जून 2023 में प्रकाशित)
-मनीष सिंह
पटना मीटिंग एक जरुरी किस्म का गैरजरूरी एक्सरसाइज है। कर लिया, तो ठीके है।
तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र की 100 सीट में कांग्रेस का ऑलरेडी गठबंधन है। जो होना है, वो पहले ही तय है। पटना कोई नया रंग नहीं देगा।
राजस्थान, सीजी, एमपी, कर्नाटक, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, गोआ, पंजाब में उसे किसी की जरूरत नही। लड़े, और जीते या हारे.. उसका अपना दम है।
दो सौ सीट यहां हो गई। केरल, आंध्र, तेलंगाना में भाजपा का कोई नामलेवा नही। तो वहां भाजपा को हराने के लिए किसी से गठबंधन करना, जबरन विपक्ष का स्पेस भाजपा को देना है।
रह गयी दिल्ली, उड़ीसा, यूपी, कश्मीर, और बंगाल। यहां सामने वाली पार्टी कुछ दे, तो ठीक, न दे तो भी ठीक। मुझे ज्यादा लाभ या हानि तो दिखती नही। गठबंधन न किया तो क्षेत्रीय दल साफ हो जाएंगे।
दरअसल एकदम स्पस्ट है। पैन इंडिया कांग्रेस ही लड़ रही है। क्षेत्रीय दल एकदम बौने साबित हुए है। हारे तो समाप्त, जीतकर भी शांति से सरकार नहीं चला पा रहे। तो कांग्रेस सेंटर में लौटे, उनको पीस ऑफ माइंड ज्यादा रहेगा। दो चार सीट से ज्यादा, उन्हें अपने सर्वाइवल की सोचनी चाहिए।
कांग्रेस मुक्त भारत तो फेल हो गया। मगर क्षेत्रीय दल मुक्त भारत, एक हद तक संभावनाशील है।
पटना बैठक से लाभ सिर्फ नीतीश कुमार को है। उनका हक भी बनता है। मेहनत कर रहे हैं। बन जाएं पीएम, सम्हालें निटी-ग्रिटी राजनीति..
कायदे से राहुल को उनको यूपीए का कन्वेनर बना देना चाहिए। इस शर्त के साथ कि कांग्रेस 350 सीट लड़ेगी। और वहां कोई दूसरा फुटकर टाइप दल अपना कैंडिडेट नही खड़ा करेगा।
राजनीतिक दांव पेंच और सीटवार चवन्नी अठन्नी नीतीश और खडग़े सम्हाल लेंगे। और बखूबी सम्हाल लेंगे। खुद निकलें भारत जोड़ो 2 पर।
शुरू नोआखाली से कर सके तो ठीक, अन्यथा मणिपुर से करें। असम, वेस्ट बंगाल, बिहार, यूपी, एमपी, होते गुजरात मे पोरबंदर पर समापन। यह काम उन्हें आता है, यही फबता है, यहीं कांग्रेस को लडऩा, जीतना है। तो चलना शुरू करें। और जल्दी करें। उनको चुनाव के पहले जेल भी जाना है। कब बुलावा आ जाये,
भला कौन जानता है..
-डॉ. आर.के.पालीवाल
खुद को प्रधानमंत्री की जगह प्रधान सेवक कहने, फकीर बताने और लाल-नीली बत्तियों की संस्कृति समाप्त करने की घोषणाओं से ऐसा लगा था कि प्रधानमंत्री सच में वीवीआईपी संस्कृति खत्म करना चाहते हैं। लेकिन उनकी ये घोषणाएं जुमले ही साबित हुई हैं। अब अदने से नेता, तमाम जन प्रतिनिधि और अफसर अपने वाहनों पर कान फोड़ू हूटर लगाए घूमते हैं जो लाल नीली बत्तियों से भी खतरनाक हैं। उनकी कर्कश आवाज का ध्वनि प्रदूषण आदमी के साथ कुत्ते, बिल्ली और अन्य पशु पक्षियों के लिए भी खतरनाक है। प्रधानमंत्री पर यह कहावत चरितार्थ होती है कि अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से कोई लाभ नहीं। बात तो तब है जब दुनिया हमारी प्रशंसा करे।
प्रधानमंत्री आज भोपाल में थे। भोपाल के हजारों लोगों के लिए आज प्रधान सेवक (प्रधान मंत्री) प्रधान उत्पीडक़ बन गए। उनके आगमन पर कई जगह सडक़ बंद की गई थी। ट्रैफिक पुलिस का अता-पता नहीं था। तमाम पुलिस प्रधान सेवक की सेवा में लगी होगी! घंटों ट्रैफिक जाम और बारिश में मरीज, बच्चे और बुजुर्ग सडक़ों पर वाहनों के जहरीले धुंए के बीच फंसे थे। क्या प्रधानमंत्री को इतनी भी जमीनी हकीकत मालूम नहीं कि किसी शहर में उनके आगमन से आम अवाम को कितनी परेशानी होती है।
लोकतंत्र की तमाम विकृतियों की शुरुआत के श्रेय की तरह प्रमुख पदों पर बैठे लोगों की सुरक्षा को कड़ा करने की अमेरिकी संस्कृति की शुरुआत का श्रेय भी कांग्रेस को ही जाता है। वर्तमान दौर में उसमें लगातार बढ़ोतरी ही हुई है। मोदी जी अन्य प्रधानमंत्रियों की तुलना में निरंतर चुनावी मोड़ में रहने के कारण दौरे भी बहुत ज्यादा करते हैं।
भोपाल में वे भाजपा कार्यकर्ता सम्मेलन और वंदे भारत को हरी झंडी दिखाने आए थे। ये काम क्रमश: भाजपा अध्यक्ष और रेल मंत्री कर सकते थे। मोदी जी हर चीज का श्रेय खुद लेना चाहते हैं। अति सर्वत्र वर्जयेत की पुरानी कहावत संभवत: भारतीय संस्कृति के स्नेही प्रधानमंत्री ने भी सुनी होगी लेकिन वे इस पर अमल नहीं करते। यदि अमल करते तो वे जगह-जगह वंदे भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने नहीं पहुंचते।
मध्यप्रदेश शासन ने प्रधानमंत्री के दौरे पर एक पेज का विज्ञापन जारी कर प्रधानमंत्री को धन्यवाद दिया है। सरकार अपने प्रधानमंत्री को धन्यवाद देने के लिए भी जनता का धन बर्बाद करती है। उसे यह अहसास नहीं होता कि प्रधानमंत्री के भोपाल दौरे से भोपाल के लोगों को कितनी परेशानी होती है। डबल इंजन सरकार में शासन के लोग भी प्रधानमंत्री की आवभगत में जुट जाते हैं क्योंकि उनके मुख्यमंत्री खुद सब काम छोडक़र अपने प्रधानमंत्री को खुश करने में लगे रहते हैं। बेहतर है जिस दिन प्रधानमंत्री किसी शहर में आएं, वहां स्कूलों, बाजारों और दफ्तरों के लिए सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया जाए ताकि घंटों जाम में फंसे वाहनों के जहरीले धुंए से नागरिकों, प्रकृति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचा जा सके। जनता को जाम में फंसकर एक सौ बीस रुपए लीटर पेट्रोल न फूंकना पड़े। सडक़ों पर भीड़ कम होने से बीमार लोग अस्पतालों तक तो पहुंच सकेंगे।
प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक के साथ-साथ फकीर भी कहते हैं। फकीरों की सबसे बड़ी पहचान निर्भयता होती है। अति वरिष्ठ जैन मुनि विद्यासागर जी सुबह होने के पहले अकेले किसी भी निर्जन स्थान की तरफ निकल जाते हैं। 1916 में महात्मा गांधी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के अवसर पर तत्कालीन वायसराय को भारी-भरकम सुरक्षा के साथ बनारस आने पर आड़े हाथ लिया था जिसकी सराहना तत्कालीन मीडिया में हुई थी। दुर्भाग्य से वर्तमान दौर में मीडिया का बड़ा हिस्सा इस तरह का साहस नहीं रखता कि वह गांधी जैसे निर्भय फकीर की मिसाल प्रधानमंत्री के सामने आईने के रुप में रख सके। प्रधानमंत्री अक्सर अपनी विदेश यात्राओं में महात्मा गांधी का जिक्र करते हैं। यदि उन्हें सच में लोगों का दिल जीतना है तो उन्हें गांधी से सादगी, सेवा और निर्भयता के कुछ गुर भी सीखने चाहिएं!
-ध्रुव गुप्त
सावन आने ही वाला है। सावन की आहट के साथ मुझे बरसों पहले देखी-सुनी एक घटना की यादें ताजा हो जाती है। तब एक जिले में मैं एक ग्रामीण थाने के निरीक्षण में था। दोपहर का वक्त था और बाहर बूंदाबांदी हो रही थी। पास के एक टोले से स्त्रियों की सामूहिक कजरी की मधुर आवाजें आ रही थी। बीच-बीच में उनके हंसने-खिलखिलाने की आवाज भी। मुझे अच्छा लगा और मैं काम रोककर कुछ देर कजरी के आनंद में डूबा रहा। शाम को काम पूरा कर लौटने को ही था कि उन्हीं घरों से कई स्त्रियों के सामूहिक विलाप की मर्मभेदी आवाजें उठने लगीं। मुझे किसी अनहोनी की आशंका हुई और मैंने एक अफसर को वहां जाकर देखने को कहा। उसने बताया कि हंसी और रुदन का यह सिलसिला सावन भर चलता है। वह टोला एक कथित बड़ी जाति के लोगों का है।
पिछले कुछ सालों में दूसरे ग्रामीणों के साथ अथवा अपने ही भाईयों के साथ भूमि विवाद और सशस्त्र संघर्ष में उन घरों के ज्यादातर मर्द या तो मारे जा चुके हैं या जेलों में लंबी सज़ा काट रहे हैं। सावन में दोपहर होते ही घर के काम निबटाकर विधवाओं सहित टोले की स्त्रियां पेड़ों पर लगे झूले पर झूलती हैं, गाती हैं, हंसी-ठठ्ठा करती हैं। शाम होते ही उनके घरों से विलाप के स्वर उठने लगते हैं। थोड़ी देर बाद वे सब शांत हो जाएंगी और चूल्हे-चौके में लग जाएंगी। मैं भीतर तक हिल गया। मर्दों के आपसी विवाद और उनकी हिंसक मनोवृत्ति की सज़ा हर युग में समाज की औरतों को ही भुगतना पड़ता है। मेरा मन हुआ कि उनके पास जाकर उन्हें सांत्वना दूं, लेकिन गांव के सामंती माहौल में यह संभव नहीं था।
मैं अपनी उदासी पर काबू पाने की कोशिश कर ही रहा था कि गांव के बारे में एक दूसरी बात सुनकर भौंचक रह गया। मुझे बताया गया कि इन कथित बड़ी जातियों के घर में जब बेटों का जन्म होता है तो पास के दलितों के टोले में शोक की लहर दौड़ जाती है। उस दिन किसी दलित के घर में चूल्हा नहीं जलता। इस शोक की वजह समझना मुश्किल नहीं है। हां, बेटियों का जन्म हो तो उस खुशी में दलित परिवार भी शामिल होते हैं।
मैंने उस रात वहीं रुकने का फैसला कर उस टोले के सभी मर्दों को बुला भेजा। मैंने उनसे आपसी या दूसरी जातियों के साथ चल रहे भूमि विवाद या झगड़ों के बारे में जानकारी ली और सुझाव दिया कि भविष्य में किसी विवाद में हिंसा का सहारा लेने के बजाय वे बातचीत से मसले सुलझाएं। अगर यह संभव न हो तो वे मुझे अपने बीच बुला सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि मेरी कोशिश का असर नहीं हुआ और कुछ ही दिनों बाद मूंछ की लड़ाई में दलित टोले के एक व्यक्ति की हत्या हुई और इस टोले के चार और लोग जेल गए। मुझे विधवाओं और अकेली रह गई औरतों के उस विलाप की याद आई और यह सोचकर मन भर आया कि टोले की अकेली स्त्रियों के विलाप में अबतक कुछ और आवाजें भी शामिल हो चुकी होंगी।
समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन गांवों में सामंती मानसिकता और जातीय अहंकार के अवशेष अभी भी बाकी हैं। वर्षों बाद मेरा दुख भी कुछ कम नहीं हुआ है। वह अनुभव याद आता है तो सावन उदास कर जाता है मुझे।
-स्वेच्छा राउत
रमेश (बदला हुआ नाम ) नेपाल से रूस स्टूडेंट वीजा पर आए थे। उन्हें एक बेहतर जि़ंदगी की तलाश थी।
नेपाल में बेहद गऱीबी में जी रहे रमेश किसी भी तरह इससे निजात पाना चाहते थे। लेकिन रूस में अपनी पढ़ाई ख़त्म करने के बाद भी उनकी मुसीबतें कम नहीं हुई थीं। या तो वो नेपाल लौट जाते और कोई मामूली नौकरी में लग जाते या रूस में कोई बेहतर काम तलाशते। लेकिन ये इतना आसान नहीं था।
रमेश ने बीबीसी नेपाली से ऑनलाइन बातचीत में बताया, ''मेरी तरह रूस आने वाला वो हर छात्र परेशानी में था। उन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिल रही थी।’’
टिकटॉक वीडियो में बता रहे हैं रूसी सेना में भर्ती होने का तरीका
इधर, रमेश और नेपाल से रूस आए उनके कई दोस्त इस दुविधा से जूझ रहे थे, उधर रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जंग का एलान कर दिया।
यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना को भी खासा नुकसान हुआ है। शुरुआती युद्ध में हजारों रूसी सैनिकों की मौत हुई। इसे देखते हुए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नियमों में बदलाव किए ताकि विदेशियों के लिए रूसी सेना में शामिल होना आसान और आकर्षक हो जाए। अच्छा-ख़ासा वेतन से लेकर रूसी नागरिक बनने की प्रक्रिया आसान बनाने तक, कई नए नियम लाए गए, जिससे विदेशियों का सेना में शामिल होना आसान हो जाएगा। अपनी सेना को मज़बूत करने के लिए रूस बाहरी लोगों को दिल खोल कर स्वागत कर रहा है।
रमेश कहते हैं कि उन्होंने रूसी सेना में शामिल होने की ये शानदार पेशकश मंजूर कर ली। उन्होंने कहा वो लिखित परीक्षा और मेडिकल परीक्षण के बाद रूसी सेना में चयनित हो गए। वो बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने एक लाख नेपाली रुपये खर्च किए। हालांकि उन्होंंने ये नहीं बताया कि ये पैसे उन्होंने किसे दिए।
उन्होंने कहा कि भर्ती का काम भरोसे पर होता है। रमेश अपने टिकटॉक अकाउंट पर रूसी सेना में भर्ती होने की इस ख़बर को फैला दिया।
अपने कई वीडियो में उन्होंने बताया ये उनके लिए कितना मुश्किल फ़ैसला था। एक वीडियो में उन्होंने मैसेज लिखा, ‘’एक सैनिक का काम है, करो या मरो। अगर आप ये करना चाहते हैं तो सेना में भर्ती हो जाइए।’’
‘जानकारियों’ से लैस बताए गए एक वीडियो में उन्होंने कहा, ‘‘यहां कई चुनौतियां हैं। चीज़ें जैसी होनी चाहिए वैसी नहीं हैं। मेरा मानना है कि ये जि़ंदगी का एक मुश्किल दौर है। क्योंकि ये देश फि़लहाल यूक्रेन के साथ युद्ध लड़ रहा है।’’
रूसी सेना में भर्ती होने के लिए ‘काउंसिलिंग सर्विस’
आखिरी बार जब बीबीसी ने रमेश से संपर्क किया था तो उनके पास बिल्कुल भी वक्त नहीं था। उन्होंने बताया कि उन्हें ट्रेनिंग के लिए बेलारूस ले जाया जा रहा है। इसके बाद बीबीसी उनसे संपर्क करने में कामयाब नहीं हो सका। इसके बाद बीबीसी ने अपने हफ्तों की पड़ताल में पाया कि सिर्फ रमेश ही एक मात्र नेपाली शख्स नहीं हैं, जो रूस की सेना में शामिल हुए हैं।
राज भी एक छात्र हैं, जो उच्च शिक्षा के लिए रूस पहुँचे थे। लेकिन जब रूस ने अप्रैल 2022 में अपनी सेना में विदेशियों की भर्ती का एलान किया है, तो बहुत कम रूसी जानने वाले नेपालियों ने उन्हें मदद के लिए फोन करना शुरू किया। वो उनसे रूसी भाषा में मिल रहे फॉर्म भरने के लिए मदद मांग रहे थे।
राज ने बीबीसी नेपाली को बताया, ‘मैंने अपने कई परिचित नेपालियों को आवेदन पत्र भरने में मदद की। यही लोग अब उन लोगों का मेरा नंबर दे रहे हैं जो रूसी सेना में भर्ती होना चाहते हैं।’
राज नेपाल में पढ़ाई के लिए रूस जाने की इच्छा रखने वाले छात्रों की काउसिंलिंग किया करते थे। अब नेपाल के कई पूर्व सैनिक और छात्र उनसे रूसी सेना में भर्ती होने के लिए मदद मांग रहे हैं।
राज को दिन में एक बार 40-50 फोन कॉल आ जाते हैं। उनसे लोग यही पूछते हैं कि रूसी सेना में कैसे भर्ती हुआ जा सकता है। रूसी सेना में भर्ती होने का वीडियो पोस्ट करने वाले कुछ नेपाली युवकों ने ही बीबीसी को राज का पता दिया था।
राज कहते हैं कि उन्हें ये पता नहीं है कि नेपालियों के लिए रूसी सेना में भर्ती होना गैर-कानूनी है या नहीं। वो कहते हैं कि अपनी सलाह के लिए कोई पैसा नहीं लेते। लेकिन उनकी सेवा लेने वाले कुछ नेपालियों ने दावा किया उन्होंने राज को दस हजार नेपाली रुपये दिए।
नेपाल सरकार के नियम क्या कहते हैं?
नेपाल सरकार ने पश्चिमी देशों की तरह यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा की है। लेकिन उसका कहना है कि उसे इस बात का पता नहीं है कि उसके नागरिक रूसी सेना में भर्ती हो रहे हैं।
नेपाल के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता सेवा लामसाल ने बीबीसी नेपाली से कहा, ‘’ये हमारी नीतियों से मेल नहीं खाता।‘’
नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच 1947 में एक त्रिपक्षीय संधि हुई थी। इसके तहत नेपाली नागरिक विदेशी सेना में भर्ती हो सकते थे। इस संधि में ये साफ लिखा था कि नेपाली नागरिक भारत और ब्रिटेन की सेना में भर्ती किए जाएंगे। इसमें साफ लिखा है कि इन सेनाओं में शामिल होने वाले नेपाली ‘भाड़े के सैनिक’ नहीं माने जाएंगे। ये संधि सिर्फ भारत और ब्रिटेन के साथ हुई थी। किसी और देश की सेना में नेपालियों को भर्ती को लेकर ऐसी कोई नीति नहीं है।
बीबीसी ने नेपाली ने इस मामले पर बात करने के लिए रूस में नेपाल के राजदूत मिलनराज तुलाधार से संपर्क किया।
तुलाधर ने बताया, ‘‘जो नेपाली नागरिक रूस में पढऩे या घूमने आते हैं, वो कोई दूसरा काम नहीं कर सकते। नेपाल के नागरिक सिफऱ् भारत और ब्रिटेन की सेना में भर्ती हो सकते हैं। ये तीनों देशों के संधियों की वजह से है। रूस के साथ नेपाल की ऐसी कोई संधि नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि रूस की सेना में भर्ती होने वाले नेपाली लोग टिकटॉक पर जो वीडियो अपलोड कर रहे हैं उनकी असलियत का पता नहीं लगाया जा सकता।
बीबीसी की पड़ताल में क्या मिला
हालांकि बीबीसी ने इस तरह के कुछ वीडियो की पड़ताल की है और पाया है कि ये उन इलाकों से पोस्ट किए गए हैं, जहाँ रूस के मिलिट्री कैंप हैं। कुछ अकाउंट्स से पोस्ट किए गए दस्तावेजों को बीबीसी की रूसी सर्विस ने वेरिफाई किया है। बीबीसी रूसी सेवा के पत्रकार आंद्रे कोजेन्को ने कम से कम ऐसे दो अकाउंट को चेक किया है, जिससे रूसी सेना के दस्तावेजों की तस्वीरें पोस्ट की गई हैं।
कोज़ेन्को कहते हैं, ‘‘हमारे पास मौजूद दोनों दस्तावेज बताते हैं कि जिन दो लोगों ने ये दस्तावेज पोस्ट किए हैं वो रूसी सेना में काम कर रहे हैं।’’ इनमें इन लोगों की मिलिट्री रैंक, पूरा नाम और अभिभावकों के नाम दर्ज हैं। इनमें उन मिलिट्री यूनिटों का भी जिक्र है, जहां वो काम कर रहे हैं। इस मामले पर बात करने के लिए बीबीसी रूस के रक्षा और विदेश मंत्रालय से ई-मेल के जरिये संपर्क किया। इसके साथ ही नेपाल में रूसी दूतावास से भी संपर्क किया गया। हालांकि ये स्टोरी प्रकाशित होने के समय तक उनका कोई जवाब नहीं आया था।
नेपाली युवक रूसी सेना में क्यों भर्ती हो रहे हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में अच्छे अवसरों की कमी है। यही वजह है कि नेपाल के युवा विदेशी सेनाओं में भर्ती होने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री टीकाराम गौतम कहते हैं, ‘‘नेपाल के लोग भले ही काम करने या घूमने के लिए विदेश जाएं लेकिन उनका असली मकसद वहाँ जाकर काम करना और पैसे कमाना है। हो सकता है कि नेपाली युवाओं ने इसलिए रूसी सेना की ओर आकर्षित हुए हैं जो पैसा उन्हें वहां कुछ महीनों में मिलेगा उसे कमाने में यहां वर्षों लग जाएंगे।’’
नेपाल सरकार के आँकड़े बताते हैं कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अलग-अलग मक़सद के लिए 1729 नेपाली नागरिक रूस गए हैं। नेपाल सरकार के आव्रजन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पढ़ाई के लिए 749 नेपाली रूस गए हैं जबकि रोजग़ार के लिए 356 लोग गए हैं। राज की मदद से जो नेपाली सेना में भर्ती हुए थे, उनसे हमने बात की। उन्होंने वही बात बताई जो राज ने बताई थी।
रूसी सेना में काम करने का दावा करते हुए टिकटॉक वीडियो पोस्ट करने वाले एक शख्स ने बीबीसी नेपाली सेवा से कहा,‘‘ हम यहां पैसों के लिए आए हैं, जो कमाई हम यहां करते हैं वो नेपाल में नहीं कर पाते। दूसरे देशों में इतनी कमाई नहीं होगी। कोई भी ऐसा शख्स जिसे दिल की बीमारी न हो यहां आ सकता है।’’ एक और युवक ने कहा, ‘‘अगर हम अपनी जान की परवाह करते नेपाल लौट जाएं तो वहां हमें क्या काम मिलेगा।’’
नेपालियों को रूस में कितना वेतन मिल रहा है?
रूस की सरकार उन लोगों को ज़्यादा वेतन देने का वादा करती है जो यूक्रेन में उनकी ओर लड़ेंगे। राज ने बताया कि ट्रेनिंग के दौरान नेपालियों को 60 हजार नेपाली रुपये के बराबर वेतन मिलता है। रूसी मिलिट्री कैंप में ट्रेनिंग ले रहे एक शख़्स ने बताया कि उनके कॉन्ट्रैक्ट में लिखा गया गया है कि ट्रेनिंग के बाद उन्हें हर महीने 1,95,000 रूबल मिलेंगे।
राज ने बताया, ‘‘ये वेतन तीन लाख नेपाली रुपये के बराबर है। कॉन्ट्रैक्ट में ये भी कहा गया है कि एक साल पूरा होने पर पर सैनिकों को रूसी पासपोर्ट मिलेगा और इसके बाद वो अपने परिवार के सदस्यों को रूस भी ला सकेंगे। इस स्टोरी में रूस गए नेपाली लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उनकी तस्वीरें और पहचान छुपाई गई है। (बीबीसी)
महाराष्ट्र में गोमांस के नाम पर लोगों की पीट पीट कर हत्या कर देने के एक महीने में दो मामले सामने आये हैं. इन घटनाओं को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में दिशा निर्देश जारी किये थे, लेकिन मॉब लिंचिंग रुक नहीं रही है.
पढ़ें डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
महाराष्ट्र में गोमांस ले जाने के शक में किसी की पीट पीट कर हत्या कर देना का एक और मामला सामने आया है. यह राज्य में एक ही महीने में इस तरह से की जाने वाली दूसरी हत्या है.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक शनिवार 24 जून को 32 वर्षीय अफान अब्दुल माजिद अंसारी अपने एक दोस्त नासिर हुसैन शेख के साथ एक गाड़ी में मांस लेकर मुंबई जा रहे थे. रास्ते में नाशिक ग्रामीण जिले में करीब 15 लोगों के समूह ने उन्हें रोका और फिर डंडों और लोहे की छड़ों से उनकी पिटाई की.
एक इलाका, दो घटनाएं
घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस जब वहां पहुंची तो अंसारी और शेख बुरी तरह घायल थे, लेकिन बाद में अस्पताल में अंसारी की मौत हो गई. शेख की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है.
शेख की ही शिकायत पर पुलिस ने हत्या और दंगा करने का मामला दर्ज कर लिया है. सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल लोकेशन के आधार पर 10 लोगों को हिरासत में ले लिया गया है, लेकिन पुलिस ने अभी तक उनके बारे में कोई जानकारी नहीं दी है.
यह इसी इलाके में एक महीने में होने वाली दूसरी घटना है. इससे पहले इसी जगह से करीब 25 किलोमीटर दूर ठाणे जिले में इसी तरह एक समूह ने मवेशी ले जा रहे दो मुस्लिम युवकों को पीटा था, जिसमें से एक की लाश दो दिनों बाद बरामद हुई थी.
23 साल के उस मृतक का नाम लुकमान अंसारी था. पुलिस ने उस मामले में छह लोगों को गिरफ्तार किया था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस ने सभी मुल्जिमों को राष्ट्रीय बजरंग दल का सदस्य बताया था. पिछले कुछ सालों में देश के कई राज्यों में गोमांस के नाम पर इसी तरह लोगों को मार दिए जाने की कई घटनाएं सामने आई हैं.
सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश
2018 में इस तरह की हिंसा को रोकने के लिए दायर की गई एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए थे.
इनमें इस तरह के मामलों पर तेज गति से अदालतों में सुनवाई, हर जिले में पुलिस के एक विशेष दस्ते का गठन, ज्यादा मामलों वाले इलाकों की पहचान, भीड़-हिंसा के खिलाफ रेडियो, टीवी और दूसरे मंचों पर जागरूकता कार्यक्रम जैसे कदम शामिल हैं.
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने संसद से अपील भी की थी कि वो इस तरह की हिंसा के खिलाफ एक नया कानून लेकर आए, लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से अभी तक ऐसी कोई पहल नहीं की गई है.
इसके पहले पिछले कुछ सालों में झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर जैसे कई राज्यों में इस तरह की हत्याएं हो चुकी हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 4 जुलाई 2022 को मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के एक कार्यक्रम में कहा था, "इसलिए हम कहते हैं, हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है. गौ माता पूज्य है लेकिन लिंचिंग करने वाले लोग हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे हैं." (dw.com)
-ध्रुव गुप्त
अपने पुलिस जीवन के मेरे कुछ अनुभव ऐसे रहे जो आज रिटायरमेंट के वर्षों बाद भी सोचने पर व्यथित करते हैं। आज जाने क्यों उस दौर का मेरा सबसे दुखद अनुभव बहुत याद आ रहा है। बात 1981 की है जब मैं जिला ट्रेनिंग में छपरा में पदस्थापित था। तब छपरा-पटना हाईवे पर डोरीगंज का क्षेत्र सडक़ डकैतों से बुरी तरह आक्रांत था। एक रात गश्ती चेकिंग के सिलसिले में डोरीगंज के गंगा घाट पर रात के सन्नाटे में नदी के कोलाहल का आनंद ले रहा था मैं। कुछ अधिकारी और सशस्त्र बल के जवान मेरे आसपास मौजूद थे। आधी रात के बाद एक चौकीदार ने आकर सूचना दी कि पास के हाईवे से पांच-छह गाडिय़ां लूटने के बाद डकैत गंगा दियारे की ओर भाग निकले हैं। मैं घटनास्थल पर पहुंचा तो वहां यात्रियों की चीख-पुकार मची थी। एक अधिकारी को यात्रियों के बयान लेने के लिए छोडक़र मैं पुलिस बल के साथ गंगा के दियारे में प्रवेश कर गया। नदी के किनारे खड़ी एक नाव से नदी पार कर सात-आठ किलोमीटर पैदल चलकर सीमावर्ती भोजपुर जिले के दियारे में अपराधियों के लिए कुख्यात एक गांव में पहुंचा। वहां दर्जनों घरों की तलाशी में डकैती में लूटी गई लगभग तमाम संपत्ति बरामद हो गई और तीन अपराधी भी पकड़े गए। सुबह हुई तो अपराधियों और बरामद संपत्ति के साथ अधिकारी और कुछ जवानों को थाने लौट जाने को कहा। मैं खुद दो जवानों के साथ वहां एकत्र ग्रामीणों से पूछताछ में लगा रहा।
जब तक मैं नदी पार करने के लिए गंगा के उस किनारे पहुंचा तब तक सूरज सर पर आ गया था। जून का महीना था। भूख और प्यास के मारे बुरा हाल हो चला था। आसपास कहीं कोई गांव नहीं। चापाकल का तो सवाल ही नहीं। नदी के किनारे थोड़ी दूरी पर फूस और फटे कपड़ों से बनी एक अस्थायी झोपड़ी देखी तो भागकर वहां पहुंचा। झोपड़ी में लगभग साठ साल का एक दुबला-पतला बूढ़ा व्यक्ति मौजूद था। शायद थोड़ी-बहुत मछलियां पकड़ र आसपास के गांवों में बेचने के लिए वहां टिका था। मैंने उससे पूछा कि क्या वह हम तीन लोगों को कुछ खिला सकता है? उसके पास गमछे में लगभग आधा किलो मोटा चावल उपलब्ध था। हमें घड़े का पानी पिलाने के बाद वह थोड़ी-बहुत छोटी मछलियां पकडक़र ले आया।ईंट के चूल्हे पर पतीले में चावल डाला और नीचे आग में मछलियां। भात तैयार हुआ तो आग से मछलियां निकाल कर उसमें थोड़ा तेल, लहसुन और नमक डालकर मछली का तेज-तेज चोखा बनाया। हम भोजन पर टूट पड़े। भात थोड़ा कच्चा था और मछलियां कुछ अधपकी। बावजूद इसके वह मेरे जीवन का सबसे स्वादिष्ट भोजन था जिसका स्वाद में आज भी नहीं भूल पाया हूं। चलते समय मैंने उसे कुछ रुपए देने चाहे लेकिन उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया। मैंने जबर्दस्ती उसकी जेब में सौ रुपए डाले और लौट आया।
कुछ महीनों बाद छपरा से मेरा ट्रांसफर हुआ तो मुझे उस बूढ़े मछुआरे की याद आई। मैं उससे मिलने एक बार फिर गंगा पार के दियारे में गया। वहां झोपड़ी गायब थी। कुछ दूरी पर स्थित एक गांव के लोगों ने बताया कि पुलिस को खाना खिलाने के अगले दिन से ही वह बूढ़ा और उसकी झोपड़ी दोनों गायब हैं। लोगों में चर्चा थी कि पुलिस मुखबिर होने के संदेह में डकैतों ने उसे मारकर गंगा में उसकी लाश बहा दी थी। उसके घर का पता किसी को मालूम नहीं था। मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैं उस उजड़ी हुई झोपड़ी के पास देर तक उदास बैठा रहा। भारी कदमों से छपरा लौटा। उसका मासूम चेहरा और उसके भोजन का स्वाद मुझे आज भी नहीं भूला है। उस घटना के बाद कई बार मैंने मोटे चावल का भात और छोटी मछलियों का चोखा बनवाकर खाने की कोशिश की, लेकिन हर बार पहला कौर उठाते ही अपना हाथ मुझे खून से सना हुआ नजर आने लगता है और क्षमा की याचना में मेरे हाथ आकाश की ओर उठ जाते हैं।
-डॉ आर. के. पालीवाल
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विपक्ष का महत्व सत्ता पक्ष जैसा ही है। सत्ताधारी दल की सरकार संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत देश के नागरिकों के कल्याण के लिए जो कानून का राज्य स्थापित करती है उसका ऑडिट करने की जिम्मेदारी विपक्ष की ही है। इसीलिए लोकतंत्र को तानाशाही की तरफ बढऩे से रोकने के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी माना जाता है। विपक्ष की भूमिका तब और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाती है जब सत्ताधारी दल पूर्ण बहुमत के कारण मनमानी कर किसी खास वर्ग, विचारधारा या क्षेत्र के प्रति ज्यादा राग या द्वेष के वशीभूत होकर भेदभाव करने लगता है। आपातकाल से पहले कांग्रेस सरकार ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कुछ इसी तरह की प्रवृत्तियां पैदा हो गई थी जब विरोधियों की प्रताडऩा की जाने लगी थी। इसी पृष्ठभूमि में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ जोरदार आन्दोलन शुरू हुआ था जिसमें अधिकांश विपक्षी दल शामिल हुए थे। वर्तमान केन्द्र सरकार के खिलाफ भी कुछ महीनों से इसी तरह का माहौल बन रहा है जिसकी एक महत्त्वपूर्ण कड़ी पटना में विपक्षी दलों की बैठक है।
पटना में विपक्षी दलों की बैठक से जिस तरह की जानकारियां बाहर आ रही हैं उससे एक बात तो साफ है कि इसका प्रमुख उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन न होकर सत्ता परिवर्तन है इसलिए आम अवाम को इससे लाभ की कोई खास उम्मीद नहीं है। लगातार दो बार केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार को हटाना विपक्षी दलों की सबसे पहली इच्छा है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चारा कांड में सजा पाए लालू यादव से न केवल शिष्टाचार भेंट करती हैं बल्कि उन्हें सम्मानित कर पैर छूकर उनका आशीर्वाद मांगती हैं। केंद्र में सत्ता पाने के लिए विपक्ष में इस वक्त पांच दल के उम्मीदवार औरों से आगे हैं। प्राथमिकता के आधार पर नीतीश कुमार सबसे आगे हैं जो मोदी को सत्ता से बाहर करने के लिए दिल्ली से कलकत्ता तक सबसे ज्यादा भागदौड़ कर रहे हैं। उनके बाद दूसरे नंबर पर ममता बनर्जी हैं। नीतीश कुमार और ममता बनर्जी की बाज़ नजऱ किंग मेकर बनते लालू प्रसाद यादव पर है। यही विपक्षी एकता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि लालू प्रसाद यादव जैसे भ्रष्टाचार में सजा पाए और परिवारवाद को आगे बढ़ाने वाले नेता किंग मेकर बन रहे हैं। जिस आंदोलन की बागडोर लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में होगी उससे व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद तो नहीं की जा सकती।
1977 के सत्ता परिवर्तन आंदोलन का नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पास था। उनका कद स्वाधीनता सेनानी होने, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए आजीवन देश सेवा करने के व्रत और हमेशा सत्ता के आकर्षण से दूर रहने के कारण तत्कालीन नेताओं में सबसे ऊपर था। उनके बरक्स लालू प्रसाद यादव की छवि एकदम उलट है। उनको बिहार के मुख्यमंत्री रहने के दौरान चारा घोटाले में लिप्तता प्रमाणित होने के बाद लंबी सजा हुई है। बिहार की वर्तमान बदहाली में उनकी सरकारों का बड़ा योगदान है। उनके रेलमंत्री के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यवाही चल रही है। ऐसे व्यक्ति के मार्गदर्शन में होने वाले सत्ता परिवर्तन के आन्दोलन की क्या गति होगी उसकी सहज परिकल्पना संभव है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन की भी यही सबसे बड़ी कमी रही थी कि उसमें शामिल नेताओं का एकमात्र लक्ष्य इंदिरा गांधी की सत्ता छीनकर खुद की सत्ता स्थापित करना था। इसीलिए सत्ता परिवर्तन के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी को जो प्रचंड बहुमत हासिल हुआ था वह ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाया था। लालू प्रसाद यादव के मार्गदर्शन में होने वाले सत्ता परिवर्तन आंदोलन का सकारात्मक परिणाम किसी भी दृष्टि से संभव नहीं लगता।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बेहद करीबी माने जाने वाले वागनर ग्रुप के प्रमुख येवगेनी प्रिगोजिन ने कदम पीछे खींच लिए हैं। पहले उन्होंने रूसी शहर रोस्तोव-ऑन-डॉन पर कब्जा करने का दावा किया था।
बगावती तेवर लिए प्रिगोजिन ने इससे पहले कहा था कि वो अपनी प्राइवेट आर्मी के लड़ाकों के साथ मॉस्को की तरफ मार्च करेंगे। उनका कहना था कि वो देश के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु और रूसी सेना के चीफ ऑफ स्टाफ वालेरी गेरासिमोव से रूबरू मुलाकात करना चाहते हैं। प्रिगोजिन की इस चेतावनी के बाद मॉस्को में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई थी। कई अन्य शहरों में आम नागरिकों की आवाजाही को लेकर भी पाबंदियां लगाई गई थी। लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भरोसेमंद मित्र बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लूकाशेंको के हस्तक्षेप के बाद अब प्रिगोजिन ने मॉस्कों की तरफ मार्च करने का अपना इरादा बदल दिया है। अपनी प्राइवेट आर्मी के लड़ाकों को लेकर अब वो बेलारूस की तरफ जा रहे हैं।
विद्रोह से पुतिन की छवि को नुकसान?
बीबीसी रूसी सेवा की संवाददाता ओल्गा इवशिना मानती हैं कि प्रोगोजिन के विद्रोह ने रूसी राष्ट्रपति छवि को नुकसान पहुंचाया है। वो कहती हैं कि पुतिन और रूस का मीडिया सालों से देश के भीतर एकता और स्थिरता की एक छवि बनाने की कोशिश करते रहे हैं, जिसे इस विद्रोह ने एक तरह से चुनौती दे दी है। रोस्तोव-ऑन-डॉन पर नियंत्रण के प्रोगोजिन के दावे के बाद कई राजनेताओं में डर फैल गया। फ्लाइट रडार सेवाओं के अनुसार इस दौरान कई निजी जेट विमानों को मॉस्को से बाहर जाते देखा गया है। एक के बाद एक प्रांतीय गवर्नर मीडया के सामने आए और उन्होंने रूसी राष्ट्रपति के प्रति अपनी वफादारी की बात दोहराई।
ओल्गा कहती हैं, ‘इससे पहले 1991 में रूस में एक और सशस्त्र सैन्य विद्रोह की कोशिश हुई थी। उस वक्त प्रांतीय गवर्नरों ने विद्रोहियों का साथ दिया था। शुक्रवार और शनिवार को रूस में जो कुछ हुआ उसमें ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया। हालांकि ये जरूर कहा जा सकता है कि इस विद्रोह ने रूसी राष्ट्रपति की छवि में दाग जरूर लगा दिया है।’
बेलारूस की पत्रकार और शोधकर्ता हान्ना ल्यूबाकोवा कहती हैं कि प्रोगाजिन और लूकाशेंको के बीच हुई ये डील बताती है, ‘लूकाशेंको पुतिन के हाथों की कठपुतली हैं।’ वो कहती हैं कि लूकाशेंको के हाथों में ‘इतनी ताकत नहीं है कि वो प्रिगोजिऩ को फिर से इस तरह का कदम उठाने से रोक सकें।’ वो कहती हैं, ‘आपको ये नहीं भूलना चाहिए कि केवल एक दिन में प्रिगोजिन लगभग मॉस्को की सरहद तक पहुंच गए थे। मुझे नहीं लगता कि इस तरह का बेहद महत्वाकांक्षी व्यक्ति जो इस तरह का बड़ा जोखिम लेने की काबिलियत रखता है लूकाशेंको की बात सुनेगा।’ वो कहती हैं, ‘प्रिगोजिन के विद्रोह का बेलारूस के भीतर भी कुछ हद तक असर होगा क्योंकि उनके विद्रोह की ये घटना पुतिन की कमजोरियों को सामने ले आई है।’
रूसी राष्ट्रपति के आलोचक रहे एलेक्जेंडर लित्विनेन्को की पत्नी मारिया ने बीबीसी संवाददाता लॉरा कॉन्सेनबर्ग को बताया कि इस पूरे घटनाक्रम ने पुतिन की कमजोरी दुनिया को दिखा दी है। वो कहती हैं, ‘एक बर्बर नेता वाली पुतिन की छवि केवल लोगों के दिनों में खौफ पैदा करने के लिए है।’ मारिया के पति एलेक्जेंडर लित्विनेन्को की हत्या साल 2006 में हो गई थी। मारिया कहती हैं, ‘ये विद्रोह पुतिन की सत्ता के बारे में एक खास संदेश देता है। पुतिन ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो किसी भी चीज पर नियंत्रण रख पाते हैं।’
बीबीसी संवाददाता स्टीव रोजनबर्ग कहते हैं कि प्रिगोजिन की बगावत के बाद जब पुतिन ने शनिवार को टेलीविजन पर लोगों को संबोधित किया तो कड़े शब्दों का इस्तेमाल जरूर किया लेकिन वो मजबूत नहीं दिखे।
वो कहते हैं, ‘अपने संदेश में सबसे पहले कहा, ‘देश की पीठ पर छुरा भोंका गया है’। उन्होंने प्रिगोजन को गद्दार कहा। लेकिन शाम होते-होते लूकाशेंको के शांति प्रस्ताव पर प्रिगोजिन सहमत हो गए और रूस ने उनके खिलाफ लगाए सारे आरोप हटा लिए।’ वो कहते हैं, ‘वागनर और क्रेमलिन के बीच क्या समझौता हुआ है उसके बारे में अभी विस्तृत जानकारी नहीं है, इसलिए इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है।’ वो कहते हैं कि हो सकता है कि आने वाले दिनों में इस बारे में और जानकारी सामने आएगी लेकिन ये कहा जा सकता है कि पुतिन इस घटनाक्रम के बाद अधिक ताकतवर नहीं दिख रहे।
आगे पुतिन क्या करेंगे?
पोलैंड के सासंद राडोस्लॉ सिकोर्स्की कहते हैं कि इस विद्रोह ने जहां एक तरफ पुतिन की कमजोरी दिखाई है वहीं उन्हें और ताकतवर भी बना दिया है। वो कहते है, ‘आप सोचिए कि हथियारबंद लड़ाकों का पूरा दस्ता रूस के भीतर सैंकड़ों किलोमीटर आगे तक चला आया लेकिन कहीं किसी ने उन्हें न तो रोकने की कोशिश की और न ही उन्हें किस ने चुनौती दी। ये पुतिन की कमजोरी दिखाता है।’ ‘लेकिन फिर आगे पुतिन शायद उन लोगों को नहीं बख्शेंगे जिन्होंने वागनर को समर्थन दिया और उनका विरोध नहीं किया। वो अब आगे क्या करेंगे ये आने वाला वक्त बताएगा लेकिन उनकी सत्ता अब और निरंकुश और बर्बर हो जाएगी।’
बीबीसी संवाददाता ओल्गा इवशिना कहती हैं कि पुतिन ताकत के इस्तेमाल में यकीन रखते हैं और हो सकता है कि हमेशा की तरह वो अब अधिक ताकत का इस्तेमाल करें। वो कहती हैं कि पुतिन देश के भीतर अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगा सकते हैं, जाने-माने टेलीग्राम चैनलों समेत मीडिया पर अधिक पाबंदी लगा सकते हैं। ये भी हो सकता है कि वो यूक्रेन पर हमले बढ़ा दें। वो कहती हैं, ‘एक बात तो स्पष्ट है, अगर अगले सप्ताह यूक्रेन को कहीं पर युद्ध में कुछ बढ़त मिल जाती है तो रूस इसके लिए सीधे तौर पर वागनर और उसकी बगावत को जिम्मेदार ठहराएगा।’
हालांकि बीबीसी की पूर्वी यूरोप संवाददाता सारा रीन्सफोर्ड कहती हैं कि मामला इतना सीधा नहीं लगता। वो कहती हैं, ‘पहले गद्दारी करने का आरोप लगाना और फिर आपराधिक मामले हटाकर अपने कदम पीछे हटा लेना, ये पुतिन की शख्सियत का हिस्सा नहीं लगता।’ वो कहती हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े कई सारे सवाल अभी बाकी हैं, जिनका अब तक कोई जवाब नहीं मिल सका है। वो कहती हैं, ‘प्रिगोजिन ऐसे व्यक्ति तो हैं नहीं जो यहां से जाकर ट्रैक्टर चलाने या आलू की खेती करें। रही पुतिन की बात करें तो वो अब और निरंकुश हो जाएंगे और विद्रोह से जुड़े लोगों का दमन करेंगे।’
बेलारूस के साथ डील और प्रिगोजिन का यू-टर्न
लूकाशेंको से बातचीत के बाद रोस्तोव-ऑन-डॉन से मॉस्को की तरफ आने वाले वागनर ने मॉस्को से 200 किलोमीटर पहले ही अपना मार्च रोक दिया। ये लड़ाके रोस्तोव से आगे वोरोनेज पहुंच चुके थे जहां उन्होंने वहां के सैन्य मुख्यालय पर कब्जा करने का दावा किया। लेकिन रविवार को प्रिगोजिन एक कार में रोस्तोव शहर से बाहर जाते नजर आए। रोस्तोव से मॉस्को की तरफ निकलें तो वोरोनेज ठीक आधे रास्ते में पड़ता है। लेकिन सवाल ये है कि वागनर और प्रिगोजिन को इससे क्या हासिल हुआ?
शनिवार शाम को पुतिन के मित्र और बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लूकाशेंको के साथ प्रिगोजिन का समझौता हो गया। क्रेमलिन ने कहा कि प्रिगोजिन बेलारूस जाएंगे और इसके बदले उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को हटा लिया जाएगा। वहीं उनके लड़ाकों को भी क्षमादान दिया जाएगा।
बीबीसी मॉनिटरिंग के विटाली शेवचेन्को कहते हैं कि प्रिगोजिन के बेलारूस जाने की खबर बस एक सूत्र के हवाले से है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इसके बारे में जानकारी दी थी। लेकिन इस मामले में अब तक प्रिगोजिन ने कोई टिप्पणी नहीं की है। उन्होंने अब तक केवल मार्च बंद करने की ही बात की है।
शेवचेन्को कहते हैं ‘प्रिगोजिन के लिए ये नुकसान का सौदा है। अगर क्रेमलिन की बात सही है तो उन्हें निर्वासन में बेलारूस भेजा गया है। रही बात वागनर ग्रुप की तो क्रेमलिन चाहता है कि उसके लड़ाके सेना के साथ अनुबंध करें और सेना का हिस्सा बन जाएं। यानी ये एक तरह के वागनर का अंत है।’
क्या कह रहे हैं रूसी नागरिक?
प्रिगोजिन की बगावत के बाद पुतिन के राष्ट्र को संबोधित करने के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने स्थिति को गंभीरता से लिया और उन्हें लगा कि उन्हें खुद जनता के सामने आने की जरूरत है।
रूस की एक जानीमानी विश्लेषक तातियाना स्टैनोवाया ने टेलीग्राम पर लिखा, ‘रूस के संभ्रांत वर्ग के कई लोग निजी तौर पर इसके लिए पुतिन को जि़म्मेदार ठहराएंगे कि मामला इस हद तक बढ़ गया और सरकार की तरफ से सही समय पर कोई उचित प्रतिक्रिया नहीं आई।’ उन्होंने लिखा ‘इसलिए, यह पूरा घटनाक्रम केवल पुतिन के लिए नहीं बल्कि पुतिन के आला अधिकारियों के लिए भी एक का झटका है।’ इस पूरे मामले पर रूसी नागरिकों की प्रतिक्रिया के बारे में कोई भी निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। हालांकि मीडिया में वागनर लड़ाकों और टैंकों के साथ आई रूसी नागरिकों की तस्वीरों ने नेताओं को चिंता में जरूर डाल दिया होगा।
वागनर के लड़ाकों ने रोस्तोव शहर पर कब्ज़ा करने का दावा किया था। लेकिन जब वो शहर से बाहर जाने लगे तो कई लोगों ने उनका अभिवादन किया, लोगों ने उनके लिए तालियां बजाई और उनके साथ तस्वीरें लीं। हालांकि ये भी महत्वपूर्ण है कि वागनर के लड़ाकों के शहर में आने के बाद कुछ लोग शनिवार को शहर छोड़ते हुए भी नजर आए थे। (bbc.com/hindi)


