विचार/लेख
डॉ. सुरेश गर्ग
राज्य में कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी पुलिस की होती है, जिसके लिए उसका एवं उससे जुड़ी जाँच ऐजेंसियों का निरंतर सक्रिय एवं प्रभावशाली बने रहना जरूरी होता है। बिन भय होय न प्रीत! बिना इस व्यवस्था के राज्य का मुखिया सत्ता सिंहासन पर बैठे दूर-दूर तक राज नहीं कर सकता! इसे ही धर्मशास्त्र में ‘राजदण्ड’ व्यवस्था कहा गया है और राजा को ‘दण्ड’!
सामंती या प्रजातांत्रिक हर व्यवस्था में मुखिया का पहला ‘राजधर्म’ अपने राज्य की सीमा की सुरक्षा करते हुए आंतरिक स्तर पर कानून- व्यवस्था बनाये रखना होता है; और यह सब प्रारंभिक रूप से पुलिस और जाँच ऐजेंसियों का अपने अनुसार उपयोग किये बिना संभव नहीं है! एक समय दुनिया में स्कॉटलैंड पुलिस का नाम हुआ करता था और हिंदुस्तान में बंबई (अब वह मुंबई है)पुलिस का। उस राज्य की जनता के बीच पुलिस और अन्य ऐजेंसियों की साख और विश्वसनीयता पर ही राज्यमुखिया का सर्वशक्तिशाली दण्डाधिकारी का रुतबा कायम रहता है। मात्र उसके इशारे पर ये संस्थाएं अपनी संपूर्ण क्षमता से सक्रिय होकर उसकी आज्ञा का पालन करती हैं। वरना इसके विपरीत बिना जनसमर्थन की व्यवस्था एकाधिकारवाद की परिचायक होती है! प्रत्येक प्रशासनिक व्यवस्था का यह मूल एवं स्थायी तत्व है कि अपने से ऊपर के अधिकारी के आदेश का बिना प्रश्न किये पालन करना उसके मातहत का पहला कर्तव्य है! यदि उसे वह आदेश राज्य व्यवस्था नीति के हित में अनुचित लगता है तो वह अपना विरोध प्रकट कर सकता है , फिर भी वह उसको क्रियान्वय करने के लिए बाध्य है,जिसकी जिम्मेदारी संबधित आदेशकर्ता की होगी! यदि मातहत की अंतरात्मा वह कार्य करने में असमर्थ लगे तो वह विरोध करते हुए उस व्यवस्था से बाहर होकर अपने को अलग कर सकता है! जिसके लिए वह जिम्मेदार होगा! यदि इतना कठोर अनुशासन न हो तो प्रशासनिक व्यवस्था अराजक हो जाये! जंगलराज बन जाये! इस कठोर व्यवस्था के कारण ही राजा द्वारा मात्र आँखें तरेरने भर से संपूर्ण राज्य में उसका संदेश पहुँच जाता है, रुतबा कायम रहता है। यह व्यवस्था हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया में सैंकड़ों बरसों से चली आ रही है। अंग्रेजों की सेना और पुलिस में अधिकांश हिंदुस्तानी हुआ करते थे, परन्तु उन्हें अपने बरिष्ठ का आदेश मानकर जानते हुए भी अपने भाई-बहिनों के विरुद्ध अमानवीय कार्यवाही करनी पड़ती थी। जलियांवाला कांड में बरिष्ठ अधिकारी भी हिंदुस्तानी थे और पुलिस कर्मी भी...! भारतीय शास्त्रों में इसे राजशास्त्र, नृपशास्त्र , दण्डनीति आदि नाम दिये गये हैं। इसके लिए शान्तिपर्व (59/79) में कहा गया है-‘यह विश्व- दण्ड के द्वारा अच्छे मार्ग पर लाया जाता है, या यह शास्त्र दण्ड देने की व्यवस्था करता है, इसी से इसे दण्डनीति की संज्ञा मिली है और यह तीनों लोकों में छाया हुआ है।’
वर्तमान राजनीति में कुशल सफल राजनेता को चाणक्य नाम के संबोधन से अलंकृत किया जाता है, उसी कौटिल्य के अनुसार-‘दण्ड वह साधन है जिसके द्वारा आन्वीक्षिकी, त्रयी (तीन वेद) एवं वार्ता का स्थायित्व, रक्षण अथवा योगक्षेम होता है, जिसमें दण्ड-नियमों की व्याख्या होती है, वह दण्डनीति है; जिसके द्वारा अलब्ध की प्राप्ति होती है,लब्ध का परिरक्षण होता है, रक्षित का विवर्धन होता है और विवर्धित का सुपात्रों में बँटवारा होता है।’
इस व्यवस्था के लिए तुलसीदास जी कह गये हैं-‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं!’ मतलब जिसकी लाठी उसकी भैंस! राजा के लिये कौन रक्षित है, कौन सुपात्र है और कौन विवर्धित (संपन्न को और अधिक संपन्न बनाना) है, यह राजा और राज्य की तात्कालीन जरूरत पर निर्भर करता है! इसीलिए राजनीति में साम दाम दण्ड भेद नीति अपनाने की वकालत की गई है। इसके बावजूद साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे सबसे उत्तम नीति मानी गई है। इस नीति पर खरा उतरने का उदाहरण महिला पहलवान प्रकरण में दिल्ली पुलिस ने बहुत होशियारी से दिया है। यही नहीं उसने दुनिया को दिखा दिया कि हिंदुस्तान पुलिस की ‘आत्मा’ अभी भी वही है! जब पूरा विपक्ष दिल्ली पुलिस पर उंगली उठा रहा था, ना ना प्रकार के लांछन लगा रहा था, तब वह अपना काम बिना किसी प्रतिक्रिया दिया अपनी तरह से कानूनी व्यवस्था के अंदर रह कर ही करती रही। यह बात अलग है कि उसने इस प्रकरण में जो तरीका अपनाया वह सामान्य पद्धति से अलग था! लेकिन उसने ऐसा करके मुखिया एवं राजतंत्र का धर्मसंकट टाल दिया।
मतलब सत्तातंत्र के इशारे का भी मान रख दिया और सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से अतिप्रभावशाली तथाकथित आरोपी पर सामान्य नागरिक की तरह कार्यवाही न करके उसके अहं को कोई नुकसान न पहँचाते हुए ऐसी चार्जशीट बनायी कि फरियादियों एवं जन भावनाओं का पूरा ख्याल रखा हो गया। उनके साथ भी अन्याय नहीं हुआ! वरना यह प्रकरण देश की राजनीति एवं सामाजिक व्यवस्था में भूचाल ला सकता था। अब गेंद माननीय न्यायालय के हाथ में है, जहाँ का निर्णय कोई माने या न माने, पर अकाट्य होता है। अंतिम होता है। भारतीय संस्कृति में यह माना जाता है कि अंत में विजय सत्य की होती है। प्रजातंत्र में सत्य यह है कि जैसी प्रजा वैसा राज्य! यदि हम वोट रूपी बीज बबूल का डालेंगे तो आम कहाँ से पैदा होंगे? जैसी करनी वैसी भरनी!
कुमार प्रशांत
मिलान कुंडेरा नहीं रहे ! मैंने तुरंत देखा कि वे कहां थे जब उनकी मृत्यु हुई ? इसलिए नहीं कि मुझे यह पता नहीं था कि वे पिछले कई वर्षों से फ्रांस की राजधानी पेरिस में रह रहे थे बल्कि इसलिए कि वे जहां रह रहे होते थे, वहां होते नहीं थे। मुझे इसी मिलान कुंडेरा का अपार आकर्षण रहा है। वह साहित्यकार भी क्या साहित्य रचेगा जो धरती पर कहीं भी अपना संसार नहीं रच सके।
आप सोच कर देखिए कि मैं एक ऐसे लेखक की बात कर रहा हूं जिसे मैं जानता तो नहीं ही हूं, उसकी भाषा भी नहीं जानता। उसका देश भी मैंने कभी देखा नहीं। यह कहना भी जरूरी है कि उनकी हर रचना मैंने पढ़ी हो, ऐसा भी नहीं है। उनका अधिकांश साहित्य चेक भाषा में है; जब चेक में लिखना उन्होंने घोषणापूर्वक छोड़ दिया, तब के बाद से उनके साहित्य की भाषा फ्रेंच हो गई।
मुझे इन दोनों में से एक भाषा भी नहीं आती है। हममें से अधिकांश लोग मिलान कुंडेरा को अंग्रेजी माध्यम से जानते हैं - अंग्रेजी, जिस भाषा में उन्होंने कभी लिखा नहीं। तो फिर आप ही बताइए, ऐसे लेखक को मुझ जैसा कोई जानेगा भी तो कैसे व कितना! लेकिन मैं आपसे कह सकता हूं कि मैं मिलान कुंडेरा को लगातार अपने आसपास पाता रहा हूं- एक दोस्त लेखक की तरह नहीं, एक सहयात्री की तरह!
यह भी कहना जरूरी है कि यदि निर्मल वर्मा न होते तो मेरे पास मिलान कुंडेरा भी नहीं होते। निर्मल वर्मा ने ही मिलान कुंडेरा से, उनके लेखन से मेरा परिचय करवाया था। वह दुबचैक का चेकोस्लोवाकिया था जिसे रूसी टैंकों ने घेर कर मार डाला था- बहुत कुछ उसी तरह जिस तरह आज वे ही रूसी टैंक यूक्रेन को घेर कर मारते जा रहे हैं।
तब भी ऐसा ही था, आज भी ऐसा ही है कि सारी दुनिया तमाशबीन बनी हुई थी। निर्मल वर्मा तब चेकोस्लोवाकिया में थे और चुप नहीं थे; यहां भारत में जयप्रकाश नारायण थे और चुप नहीं थे। जब भारत में कोई सोवियत खेमे के खिलाफ बोलने की हिमाकत नहीं करता था, जयप्रकाश चेक लोगों की स्वतंत्रता के पक्ष में खुलकर सामने आए थे, एक दबाव खड़ा करने की कोशिश भी की थी।
मानवीय गरिमा के हनन पर जो साहित्य चुप रहे तो वह साहित्य नहीं है; जो गांधीवाला चुप रहे, वह गांधीवाला नहीं है, मेरी यह समझ उसी दौर में बनी। उसी दौर में मिलान कुंडेरा का साहित्य भी बना। विचार न हो तो आदमी होना शक्य नहीं है; प्रतिबद्धता न हो तो कलम उठाने से अर्थहीन काम दूसरा नहीं है।
प्रतिबद्धता और ढोलबाजी में जो फर्क है, उसका विवेक खोये नहीं, यह जरूरी है। मुझे कुंडेरा इसलिए ही पसंद थे, अपने-से लगते थे। वे बला की प्रतिबद्धता से लिखते रहे लेकिन उनके समस्त लेखन में कोई ढोलबाजी नहीं थी।
वे साम्यवादी देश चेकोस्लोवाकिया में पैदा हुए थे। तब का साम्यवाद वह नहीं था जो आज का है- पूंजीवादी घोड़े की दुम पकड़ कर, साम्यवादी नारेबाजी करने वाला विदूषक! वह दुबचैक का दौर था जब वे अपने चेकोस्लोवाकिया में, रूस की तनी भृकुटि के बावजूद साम्यवाद का ‘मानवीय चेहरा’ बनाने में लगे थे।
युवा कुंडेरा उन दुबचैक के साथ खड़े हुए। इसके बाद का पूरा इतिहास रूसी साम्यवादी शासन के पतन का इतिहास है जिसमें कितनी ही मूर्तियां टूटीं, कितनी आस्थाएं बिखरीं तथा कितने ही लोग मिटा दिए गए। दुबचैक खुद ही किसी गतालखाने में डाल दिए गए।
कुंडेरा ने स्वप्नों के बिखरने के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की। फिर वही हुआ जो सबसे सहज था- जिस साम्यवादी पार्टी के वे सदस्य ही नहीं थे बल्कि जिसकी पैरवी करने में वे कुछ भी उठा नहीं रखते थे, उसी पार्टी ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। जितनी आजादी हम दें, उसमें खुश रह कर दिखा वाले साम्यवाद के साथ कुंडेरा का बनना नहीं था; नहीं बना।
पार्टी छोड़ी, फिर देश छोड़ा! रूसी सोल्झेनित्सिन को भी सोवियत संघ छोडऩा पड़ा था और वे जा बसे थे अमरीका में। उनसे देश तो छूटा लेकिन वे कभी देश छोड़ नहीं सके। कुंडेरा ने अपना प्यारा देश छोड़ा, तो ऐसे छोड़ा कि छोड़ ही दिया। पेरिस में आ बसे तो वहीं के हो कर रह गए। भाषा भी छोड़ दी। फ्रेंच में लिखने लगे।
लेखक किसी देश का नहीं, मूल्यों का होता है। अगर मूल्यों की पहचान साफ है और उनके प्रति प्रतिबद्धता पूरी है तो कहीं भी रहो, लिखोगे वही जो लिखना है; और जो लिखना जरूरी है। कुंडेरा ऐसी मान्यता को जीते थे। इसलिए फ्रांस में रहते हुए उन्होंने आजादी, अभिव्यक्ति और अस्मिता तीनों पर लगातार काम किया।
आप कुंडेरा को बोलते कम ही सुनते थे क्योंकि वे मानते थे कि लेखक को नहीं, उसकी रचना को बोलना चाहिए। 1968 में उनकी पहली किताब आई ‘ जोक्स’ यानी हंसी-मजाक लेकिन सत्ता समझ गई कि यह हंसी-मजाक नहीं है, तेजाब है। हंसी-मजाक का आलम यह है मिलान कुंडेरा के यहां कि किताबों के नाम भी उसी की बात करते हैं- लाफेबल लव्स, द बुक ऑफ लाफ्टर; लेकिन आप हंसी-मजाक में इसे उठा लेंगे तो फंस जाएंगे। उनकी आखिरी किताब आई ‘द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’ - अस्तित्व ऐसा कि हवा में तिरता पंख हो; प्रतिबद्धता ऐसी ही कि जैसे पहाड़ उठा रखा हो, इसका द्वंद्व है यह उपन्यास।
साम्यवादी दर्शन व संचालन में दमन व हिंसा का अतिरेक ही कुंडेरा को परेशान नहीं करता है, वे उसकी व्यर्थता को पहचानते भी हैं और हमें दिखाते भी हैं। हैरान भी होते हैं कि ऐसी व्यर्थ हिंसा से हासिल क्या होता है!
गांधीजी ने भी हिंसा की क्रूरता से अधिक, उसकी निरर्थकता को बार-बार उभारा है। कुंडेरा भी उसे पहचानते हैं। यह उपन्यास लिखने के बाद कुंडेरा ने लिखना करीब-करीब बंद ही कर दिया। फिर आई ‘ ए किडनैप्ड वेस्ट : द ट्रेजडी ऑफ सेंट्रल यूरोप।’ इसके साथ कुंडेरा का जीवन भी समाप्त हुआ।
कुंडेरा बार-बार लिखते रहे कि हम कितनी बड़ी संभावनाओं तक पहुंच सकते थे लेकिन हम कितनी बुरी तरह चूकते रहे हैं। साम्यवाद को वे इसी नजरिये से विश्लेषित करते हैं। हम भारत में पहचानें तो पाएंगे कि सांप्रदायिकता का जो तूफान आज खड़ा किया गया है और जो जहर इसकी नसों में उतारा जा रहा है, वह कितना अर्थहीन है।
हम जैसे खुद अपना ही कार्टून बना रहे हैं। दूसरों के लिए हम जो कब्र खोद रहे हैं, उसमें दफन हम ही होंगे। यह आत्महत्या नहीं, आत्म विद्रूपण है जिसमें से ग्लानि से सिवा दूसरा कुछ हाथ नहीं आएगा। मानव मात्र को यही ग्लानि मिली है हर उस सत्ता व सत्ताधीश से जो हिंसा व घृणा को उकसाता है। कुंडेरा बार-बार यही समझाते हैं।
94 वर्ष की उम्र में अब वे थक कर सो गए हैं। उन्होंने खुद को कभी विस्थापित या शरणार्थी नहीं माना। हमेशा लेखक की भूमिका में रहे और कहते रहे कि हम कभी जान ही नहीं सकते हैं कि हम क्या चाहते हैं; क्योंकि हमारे हाथ तो यही एक जिंदगी है जिसकी पहले वाली जिंदगी से तुलना करने का कोई उपाय हमारे पास नहीं है; न भावी जिंदगी संवारने की कोई नई तस्वीर हमारे पास है।
हां, मिलान कुंडेरा! हम नई-पुरानी तो नहीं जानते लेकिन सपनों की वह तस्वीर हमारे पास है, जो आपने उकेरी है। आपका आभार कि आप हमें उस दहलीज तक ले गए।
-अमिता नीरव
बहुत साल पहले एक कहानी पढ़ी थी। एज यूजवल न कहानी का शीर्षक याद है और न ही कहानी का लेखक, कहानी भी तफ्सील से याद नहीं है। बस उसका मर्म ठहर गया है यादों में। वह एक भारतीय लडक़ी और अमेरिकन सोल्जर के प्रेम और फिर अलगाव की कहानी थी।
शायद वो लडक़ा अश्वेत था, इसलिए लडक़ी उसे कृष यानी कृष्ण कहा करती थी। लडक़ा बहुत लविंग और केयरिंग रहता है। दोनों में प्रेम होता है और शादी कर लेते हैं। कुछ वक्त बाद लडक़े को युद्ध लडऩे के लिए इराक भेजा जाता है। दो साल बाद वह इराक से लौटता है। दोनों बहुत खुश होते हैं।
लव मेकिंग के दौरान लडक़ा बहुत हिंसक हो जाता है। इससे दोनों ही हतप्रभ रह जाते हैं। लडक़ा गहरे अपराध बोध में रहता है और अगली सुबह ही वह अपनी पत्नी से कहता है कि उसे उससे तलाक चाहिए। कहानी ने बहुत लंबे समय तक मुझे एंगेज रखा था।
हमारी दूसरी ऊटी यात्रा में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्मिक सेंटर के साइंटिस्ट दोस्त ने एक बहुत बारीक बात कही। उन्होंने कहा कि कॉल सेंटर में काम करने वाले लोग या डोर-टू-डोर सेल्स का काम करने वाले लोग दिन भर बहुत ह्युमिलिएट होते हैं। वो अपने परिवार के प्रति कैसे सॉफ्ट और लविंग रह सकते हैं!
कुछ साल पहले एक दोपहर कश्मीर से एक अनजान नंबर से कॉल आया। अपना परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि वे इंडियन आर्मी में कर्नल हैं और अनंतनाग में पोस्टेड हैं। मेरा नंबर उन्हें हिंदी समय से मिला। वहीं उन्होंने मेरी कहानियाँ पढ़ी औऱ उन्हें इतनी अच्छी लगी कि वे खुद को रोक नहीं पाए और कॉल किया।
बाय करने से पहले उन्होंने कहा कि ‘आप जैसे लोगों की वजह से हम अपने इंसान होने को बचा पाते हैं।’ मैंने कहा, ‘अरे ये क्या बात हुई!’ तो उन्होंने कहा कि ‘हम जिस तरह की परिस्थितियों में रहते हैं, उसमें हमारे इंसान बने रहने की गुंजाइश बहुत कम होती है। इस रिमोट एरिया में कला और साहित्य ही हमें खत्म होने से बचाता है।’
उस वक्त मैंने इस बात को अपने लिखे की तारीफ की तरह ही लिया। फिर धीरे-धीरे आसपास नजर दौड़ाना शुरू किया। पाया कि हर इंसान प्रोफेशनल फ्रंट पर कई तरह की तल्खियाँ, बेरूखी, राजनीति, प्रतिस्पर्धा, कड़वाहट, निराशा और हताशा सहता है।
फिर विचार आया कि जिस तरह से हम अपनी व्यावसायिक जिंदगी में अपने व्यक्तित्व से बदलाव लाते हैं तो क्या ऐसा नहीं होता होगा कि हमारी व्यावसायिक जिम्मेदारियाँ भी हमें बदल देती हो! हो सकता है इस सिलसिले में शोध हुए और होते रहें हों कि हमारे प्रोफेशन हमें बदलते हैं या नहीं या बदलते हैं तो कैसे बदलते हैं!
हर दिन उदास, निराश, बीमार और हारे हुए लोगों के चेहरों से घिरा डॉक्टर अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता को बरकरार रख पाता होगा, इस बात पर मुझे संदेह है। इसी तरह पुलिस में काम करते लोग अपने इर्दगिर्द अपराध, हिंसा, क्रूरता और चालाकी के बीच अपनी नर्मी बचाए रख पाते होंगे?
इसी तरह हर दिन तरह-तरह का हुमिलिएशन बर्दाश्त करते लोग क्या अपने परिवार और करीबियों के साथ प्यार और नर्मी का बर्ताव कर पाते होंगे? मनोविज्ञान तो इससे इत्तेफाक नहीं रखता है।
अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ऐसा होना संभव नहीं लगता है कि हमें जो मिलता है हम उससे उलट व्यवहार कर पाते हैं।
एक साथी है, जो लगातार प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करते हुए भी हमेशा कूल बना रहता है। जब इस सिलसिले में उससे बात हुई तो वो बताने लगा कि प्रतिकूलताओं के बीच संगीत ने मुझे संतुलित बनाए रखा है। मैं खुद को संगीत और साहित्य के माध्यम से संतुलन में रखने की कोशिश करती हूँ।
धीरे-धीरे महसूस हुआ कि गलाकाट प्रतिस्पर्धा और तमाम गणित, खींचतान और अस्तित्व के प्रश्नों से दो-चार करती व्यावसायिक जिंदगी हमें हमारी भौतिक जरूरत को पूरा करने में मदद तो करती है, लेकिन वह लगातार हमसे हमारा स्वाभाविक व्यक्तित्व छीन रही है।
कलाएँ हमारी भावनात्मक जरूरतों को, हमारे भावपक्ष को संभाले रखती हैं। वह हमारी स्वाभाविकता को बनाए रखने में मदद करती हैं। कलाओं को मैं सभ्यताओं का सेफ्टी वॉल्व समझती हूँ, लेकिन इसी तरह से कला वो टूल भी है जो आपको तल्खियों से, प्रतिकूलताओं से लडऩे और उबरने में मदद करती है।
व्यावसायिक जिंदगियाँ हमारी मजबूरी हैं और उससे हमें हर हाल में निभाना ही है, लेकिन बहुत कम लोग होंगे, जिन्हें इससे शिकायतें नहीं होंगी, कम से कम हमारे जैसे देशों में तो। मैं अपने संपर्क में आने वाले हर इंसान से कहती हूँ कि यदि खुद को बचाना है तो किसी न किसी कला से रिश्ता बनाएँ।
उसे सीखें, इसलिए नहीं कि उसमें आपको यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि या पैसा मिले, बल्कि इसलिए कि वह आपको अपनी परिस्थितियों से लडऩे में मदद करे, हमारी संवेदनाओं का विस्तार करे। हमारा मूल स्वभाव बचाने में हमारी मदद करें।
कला और प्रकृति इस दुनिया को रहने लायक बनाए रखती है।
- डॉ. आर.के. पालीवाल
संविधान में राज्यपाल के प्रतिष्ठित पद की अवधारणा बहु दलीय लोकतंत्र में केंद्र और राज्यों में अलग अलग विचारधाराओं के राजनीतिक दलों की सरकारों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने वाले निष्पक्ष सेतु के रुप में की गई थी। दुर्भाग्य से सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों के किसी भी हद तक गिरने की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा फजीहत राज्यपाल के प्रतिष्ठित पद की हुई है।
वर्तमान दौर में अधिकांश राज्यपाल ब्रिटिश दौर के ब्रिटिश रेजिडेंट बनकर रह गए हैं जिनका काम राज्यों में विरोधी दलों की सरकारों को कमजोर कर केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को मजबूत करना हो गया है। ताजा मामला तमिलनाडू के राज्यपाल आर एन रवि के खिलाफ मुख्यमंत्री एम के स्टालिन का राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को लिखा पत्र है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि राज्यपाल बार-बार संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। वे प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहे हैं। अपने आरोप के समर्थन में उन्होंने यह तर्क भी दिया है कि विगत में जब वे नागालैंड के राज्यपाल थे तब वहां के मुख्यमंत्री भी उनकी कार्यशैली से असंतुष्ट थे।
पिछले कुछ वर्षों में यह भी देखने में आया है कि जिन राज्यपालो ने संबंधित राज्य में विरोधी दल की राज्य सरकार को जितना ज्यादा परेशान किया है उन्हें निकट भविष्य में उतनी ही तरक्की मिली है और जिन राज्यपालों ने केन्द्र सरकार की कठपुतली बनने में आनाकानी की है उन्हें विविध रुप में सजा मिली है। राज्यपालों की तरक्की के लिए जो महत्वपूर्ण रास्ते बन गए हैं, उनमें एक बेहतर माने जाने वाले राज्य में राज्यपाल बनाया जाना और दूसरा उप राष्ट्रपति या राष्ट्रपति बनाना हैं। सजा के तौर पर राज्यपालों की सेवा को एक्सटेंशन नहीं दिया जाना और छोटे एवम सुदूर राज्यों में ट्रांसफर के रूप में सामने आया है। ऐसा लगता है कि नौकरशाही की तरह राज्यपालों पर भी केन्द्र सरकार की कैरट एंड स्टिक नीति लागू होती है।
यदि वर्तमान दौर के राज्यपालों के व्यक्तित्व और कार्यशैली की तुलना आज़ादी के तुरंत बाद के राज्यपालों से करें तो साफ पता चलता है कि विगत चार-पांच दशक से राज्यपालों के चुनाव में बहुत गिरावट आई है।अब अधिकांशत: या तो केन्द्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के ऐसे खांटी राजनीतिक लोगों को यह पद दिया जाता है जो दल बदल आदि में सहयोग कर डबल इंजन सरकार बनवाने में केन्द्रीय भूमिका निभा सकें या फिर जिन नेताओं को सक्रिय राजनीति से अलग किया जाता है उन्हें इस पद पर बैठाकर किनारे लगाया जाता है। दोनों ही स्थिति में राज्यपाल केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य सौहार्द्र और सामंजस्य सेतु नहीं बन पा रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए भी दुखद स्थिति है और संविधान निर्माताओं की परिकल्पना के अनुकूल भी नहीं है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच विवाद समय के साथ गहराता ही जा रहा है। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने शिवसेना की याचिका पर सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल सरकार के साथ पिछले राज्यपाल के संबध सौहार्द्रपूर्ण नहीं थे। बहु दलीय लोकतंत्र की हमारी व्यवस्था में अधिकांश राज्यों में एक ही दल की सरकार नहीं होने से केंद्र और राज्यों में मधुर संबंध स्थापित करने के लिए राज्यपाल ही एक मात्र सबसे प्रभावी कड़ी है। यदि वही कड़ी कमजोर होगी तो वह किसी भी दृष्टि से राष्ट्रहित में नहीं है। यह सभी दलों के लिए चिंता का विषय है इसलिए इस पर सभी को मिल बैठकर विमर्श करना चाहिए। यदि यही हालात रहे तो निकट भविष्य में मजबूरी में सर्वोच्च न्यायालय को ही इस दिशा में मापदंड निर्धारित करने पड़ेंगे।
दूसरी किस्त, कल के अंक में
इस्कॉन इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस ने बताया है कि उन्होंने अपने एक संन्यासी अमोघ लीला दास पर एक महीने के लिए बैन लगा दिया है। अमोघ लीला दास ने मछली खाने को लेकर स्वामी विवेकानन्द की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि एक नेक आदमी कभी किसी जीव को नुकसान पहुंचाने के बारे में नहीं सोच सकता। इसके अलावा अमोघ लीला दास ने रामकृष्ण परमहंस पर भी कटाक्ष किया था।
अमोघ लीला दास ने अपने बयान के लिए माफी मांगी है और उन्हें एहसास हो रहा है कि उन्होंने कितना भारी नुकसान कर दिया। इस्कॉन ने बताया है कि अमोघ लीला दास ने प्रायश्चित करने का संकल्प लिया है। इसके लिए वो तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक जीवन से अलग होकर गोवर्धन पर्वत पर एकांतवास में चले गए हैं।
सोशल मीडिया में स्वामी विवेकानन्द के कथित तौर पर मांस और मछली खाने के आहार को लेकर एक बावेला मचाने की कोशिश की गई है। विवेकानन्द को गए 121 वर्ष हो गए हैं। उन पर आरोप या यदि कोई तोहमत लगाता है तो उसे विवेकानन्द के जीवन पर शोध भी करना चाहिए। यह आमफहम है कि जन्मजात और सांस्कृतिक बंगाली रहे विवेकानन्द अपने बचपन से परिवार और परिवेष में मांस, मछली का उपभोग तो करते रहे होंगे। बंगाल में कई तीज त्यौहार और जष्न मछली के बिना पूरे होते नहीं समझे जाते हैं। विवेकानन्द का सर्वधर्म समभाव के सबसे बड़े प्रवक्ताओं में शुमार होकर वे लगभग सबसे ऊपर हैं। उनकी अंतरराष्ट्रीय समझ और छवि भारत के लिए गर्व का विषय है। लगभग साढ़े तीन वर्ष विवेकानन्द अमेरिका और यूरोप में रहे। उन्होंने वेदांत का भी सघन प्रचार किया। छत्तीसगढ़ के रायपुर को सौभाग्य है कि यहां विवेेकानन्द अपनी किशोर अवस्था में दो वर्षों से ज़्यादा रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ की मछलियां भी खाई होंगी।
(3) विवेकानन्द के निजी जीवन को लेकर कई महत्वपूर्ण किताबी कुंजियां हैं। विवेकानन्द का लेखन ही वह कम से कम दस खंडों में वर्षों से प्रकाशित है। वहां उनकी खाने पीने की आदतों का भी जिक्र है। इसके अतिरिक्त रेमेनीसेंसेस ऑफ स्वामी विवेकानन्द बाई हिज ईस्टर्न एण्ड वेस्टर्न एडमायरर्स; दी मास्टर ऐज आई सॉ हिम (सिस्टर निवेदिता) स्वामी विवेकानन्द इन दी वेस्ट: न्यू डिस्कवरीज-मेरी लुइस बर्क और उनके छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त द्वारा लिखी गई दुर्लभ किताब का सहारा लिया जा सकता है।
विवेकानन्द आधुनिक ऋषियों में सबसे वैज्ञानिक, तार्किक और भविष्यमूलक समझ के बड़े शोधकर्ता भी हैं। कट्टर हिन्दुत्व के कई लोग विवेकानन्द की कई शिक्षाओं से खुद को एक राय और हमकदम नहीं बना पाते हैं। उन्हें केवल उतना विवेकानन्द अपना लगता है जो हिन्दुत्व के प्रचारक के रूप में भगवा वस्त्र पहनकर ओजमयी भाषा में समाज का आह्वान करता है। ऐसे लोग चाहते हैं और लिखते बोलते भी हैं कि विवेकानन्द हिन्दुत्व के संकीर्ण बाड़े में कैद रहें। उन्हें अन्य धर्मों के विचार, आहार और प्रचार से वंचित रखा जाए।
(4) एक बंगाली नौजवान द्वारा साधु बनने के पहले और बाद में मछली, मांस खाना सार्वजनिक जीवन का विवाद बन ही नहीं सकता। विवाद पर वस्तुपरक ढंग से विचार करने की ज़रूरत है। अन्यथा कई पुरातनपंथी संकीर्ण तत्वों को इससे रोजी रोटी कमाने का मौका मिल सकता है। यह गलतफहमी है कि सन्यासी बनकर भी विवेकानन्द आदतन मांसाहार करने की परम्परा के पक्षधर रहे हैं। विवेकानन्द भोजनप्रेमी रहे हैं। उनके भाई भी बताते कि वे बचपन से रसोई में घुसकर मां की सहायता किया करते, बल्कि भोजन पकाने को लेकर कई तरह के प्रयोग भी करते थे। यह आदत सन्यास लेने के बाद बेलूर मठ में भी कायम रही। मांसाहारी भोजन को लेकर विवेकानन्द के लेखन और उद्बोधन में कई उल्लेख हैं। उन्हेंं एकजाई कर समझे बिना विवेकानन्द के लिए चलताऊ और सतही कटाक्ष करते एक महत्वपूर्ण मुद्दे को लेकर अपने हाथ अपनी पीठ ठोकने का जतन करना गैर मुनासिब होगा।
विवेकानन्द ने कहा समय समय पर कहा है:
1.जब तक मनुष्य प्रजाति के लिए पर्याप्त वैज्ञाानिक शोध सहित रसायनशास्त्र में भी इस तरह के प्रयोग नहीं किए जाएं कि इंसान को षाकाहारी भोजन ठीक से मिल सके। तब तक मांसाहार को रोक देने का विकल्प कैसे उपलब्ध हो सकता है। (24/04/1897) (वि0 सा./4/486.4)
2. आप चाहे गंगा में स्नान करें या केवल शाकाहारी भोजन करते रहें। लेकिन जब तक आप अपनी आत्मा का शुद्धिकरण नहीं करते। तब तक इसका कोई अर्थ नहीं हैं। (वार्तालाप 1901) (वि. सा./7/210.4)
3. गरीबों का तो सारे संसार में भोजन मसालायुक्त मक्का है। वनस्पतियां, सब्जियां और मांस मछली तो उनके लिए लग्जरी होने से चटनी की तरह होते हैं। (आलेख दी ईस्ट ऐंड दी वेस्ट) (वि.सा. 5/491.3)
4.वे देश जो मांसाहार करते हैं। व्यापक तौर पर बहादुर, साहसी और वैचारिक भी समझे जाते रहे हैं। (वि.सा. 5/484.2) (निबंध: दी ईस्ट एंड दी वेस्ट)
5.मांसाहारी देश लगातार यह प्रतिपादित करते हैं कि उन दिनों में जब यज्ञ वा धुंआ आकाश तक उठता था हिन्दू मांसाहार करते थे। तब उनमें महान धार्मिक और बौद्धिक लोग भी पैदा हुए हैं। (वि.सा. 5/484.2)
6.बातचीत मेंं उन्होंने कहा था कि पूर्वी बंगाल के रहवासी काफी मछली मांस और कछुआ खाते हैं और वे बाकी बंगाल के लोगों से ज्यादा स्वस्थ हैं। (वि.सा. 5/402.3)
7. मैं अपने आप से कई बार सवाल पूछता हूं कि क्या मैं मांसाहार छोड़ दूं? मेरे गुरु ने कहा तुम क्यों छोड़ते हो? वह वस्तु ही तुमको छोड़ देगी। कुदरत की किसी वस्तु को छोड़ देने की बात मत करो। उसे कुदरत के लिए इतना गर्म कर दो कि कुदरत ही उसे छोड़ दे। कभी तो वह वक्त आएगा जब तुम मांसाहार संभवत: नहीं कर पाओगे। उसे देखते ही तुम्हेें कोफ्त होगी। (वि.सा. 1/519.4)
8.व्यावहारिक वेदांत के व्याख्यान में उन्होंने कहा कि जब मैं मांसाहार करता हूं तब जानता हूं कि यह गलत है। मुझे परिस्थितिवश यदि खाना भी पड़ता है तब भी मैं जानता हूं कि यह कू्ररता है। (वि.सा. 2/298.1)
9.यह बेहतर होता जो मांस खाए, वह पशु को मार देता। लेकिन इसके बदले समाज ने पशुओं को मारने वालों का वर्ग बना दिया। और उनसे इस बाबत घृणा भी करता है। मांसाहार करना केवल उनके लिए अनुकूल है जो कड़ी मेहनत करते हैं और जो भक्त बनने वाले नहीं हैं। लेकिन यदि तुम भक्त बनने की राह पर हो तो तुम्हें मांस खाना टाल देना चाहिए। (वि.सा. 4/5.1)
10.शिकागो में 3 मार्च 1894 को उन्होंने कहा था कि हम प्रत्येक व्यक्ति को हक देते हैं कि जानने, चुनाव करने और किसी बात को लागू करने के लिए अपने आपमें आजाद है। मसलन मांस खाना किसी को अटपटा लग सकता है। तो किसी को फल खाना। लेकिन दूसरे की आलोचना करने का अधिकार नहीं है क्योंकि यह फिर छींटाकशी परस्पर होती जाएगी। (वि.सा. 4/357.3)
11.तुम क्षत्रियों के मांस खाने की बात करते हो। मांस खाना हो या नहीं हो हिन्दू धर्म के सभी आदर्षों और बेहतर तत्वों को लेकर क्षत्रिय ही पितातुल्य हैं। राम, कृष्ण और बुद्ध जैन तीर्थंकर कौन थे? (वि. सा. 4/359.3)
12.क्या ईश्वर तुम्हारी तरह कोई घबराया हुआ मूर्ख है? कि करुणा की सरिता एक टुकड़ा मांस से प्रदूषित हो जाएगी? यदि वह ऐसा है तो उसका मूल्य एक पाई के बराबर भी नहीं है। (वि.सा. 4/359.3)
उपेन्द्र शंकर
अपनी बेहतरीन फुटबॉल टीम के कारण दुनिया भर में पहचाना जाने वाला दक्षिण-अमेरिका का साढे चौंतीस लाख आबादी वाला छोटा सा देश उरुग्वे अब पानी के भीषण संकट से दो-चार है। पानी की यह बदहाली उस देश में हो रही है जहां अभी दो दशक पहले बाकायदा कानून बनाकर पानी के निजीकरण को रोका और उसे मौलिक मानवाधिकार बनाया गया था। कैसे हुआ यह उलटफेर? प्रस्तुत है, इसी विषय पर उपेन्द्र शंकर का यह लेख। -संपादक
दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी-पूर्वी हिस्से में स्थित देश उरुग्वे के राष्ट्रपति लुइस लैकले पोउ ने पिछले तीन साल, खासकर सात महीने के भीषण सूखे के बाद अभी 19 जून को राजधानी मोंटेवीडियो और महानगरीय क्षेत्र में जल-आपातकाल की घोषणा की है। लंबे समय से सूखे के कारण पानी की आपूर्ति करने वाले विभाग को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा था। यह सब तब हुआ जबकि उरुग्वे दुनिया के सबसे स्वच्छ, सबसे प्रचुर जलस्रोतों वाले देशों में से एक है। वर्ष 2004 में उरुग्वे ने पानी को निजीकरण से बचाने के लिए संविधान में संशोधन किया था और देश में पानी एक मौलिक मानव अधिकार के रूप में चिन्हित किया गया था।
पत्रकारों से बातचीत में राष्ट्रपति लैकले पोउ ने बताया कि स्थिति को सुधारने और राजधानी के लिए पीने के पानी का एक नया स्रोत प्रदान करने के लिए सैन-जोस नदी पर एक जलाशय के निर्माण की घोषणा की गई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि जलाशय और इसके पाइपलाइन नेटवर्क पर 20 जून से काम शुरू होगा और यह अधिकतम 30 दिनों में पूरा हो जाएगा।
राष्ट्रपति के मुताबिक ‘राज्य स्वच्छता वर्क्स’ (सरकारी जलापूर्ति विभाग) द्वारा मई में पानी की कमी दूर करने के लिए ला-प्लाटा नदी (जो अटलांटिक महासागर से जुड़ा एक मुहाना है) से खारा पानी मिलाकर सप्लाई शुरू की गई थी। इस पानी की विशेष आपूर्ति अस्पतालों, ‘बाल एवं किशोर संस्थान’ और ‘परिवार देखभाल केंद्रों’ में की गई थी। घरों में पानी की सामान्य आपूर्ति के बारे में राष्ट्रपति ने कहा कि यह पहले की तरह जारी रहेगा, लेकिन चेतावनी दी कि इसकी गुणवत्ता और भी खराब हो सकती है जिसके बारे में लोगों को प्रतिदिन सूचित किया जाएगा। इसके अलावा राष्ट्रपति ने आश्वासन दिया कि सरकार लगभग 21,000 कमजोर परिवारों को दो लीटर पानी की आपूर्ति मुफ्त करेगी।
इसके पहले, ‘स्वास्थ्य मंत्रालय’ ने ‘भोजन में नमक का उपयोग कम’ करने के लिए लोगों से कहा था। उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों, गुर्दे के बीमारों, शिशुओं और गर्भवती महिलाओं को सलाह दी गई थी कि वे सावधानी बरतें और बोतलबंद पानी का सेवन करें। सरकार ने आयातित बोतलबंद पानी पर टैक्सों को निलंबित करके कमजोर लोगों को संकट में राहत के लिहाज से सब्सिडी प्रदान की थी, लेकिन कुछ दिनों बाद बोतलबंद पानी की बिक्री तीन गुना हो गई और इसकी कीमत पांच गुना बढ़ गई। राजधानी के निवासियों को बोतलबंद पानी पर हर दिन औसतन 300 पेसो या 8 अमरीकी डालर खर्च करने के लिए मजबूर होना पडा।
इस सबने आबादी में व्यापक असंतोष भडकाया। मई के मध्य में ‘पानी की रक्षा में’ के बैनर तले, सैकड़ों लोगों ने ट्रेड-यूनियन्स के साथ मिलकर राजधानी मोंटेवीडियो में सूखे के संकट का सामना करने के लिए अधिक आर्थिक, सामाजिक उपायों की मांग की। उन्होंने ‘यह सूखा नहीं, लूट है’ और ‘पानी नहीं बिकना चाहिये’ जैसे नारे लगाए।
इस आपातकाल से पहले भी फरवरी 2022 में जलापूर्ति विभाग ने पीने के पानी के बाहरी उपयोग, जैसे-बगीचे में पानी देना, वाहन धोना, स्विमिंग पूल आदि के लिए उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था और अक्टूबर 2022 में सरकार ने पशुधन, कृषि और मत्स्य-पालन मंत्रालय के माध्यम से पूरे देश में 90 दिनों की अवधि के लिए कृषि आपातकाल की घोषणा की थी। जनवरी 2023 में आपातकाल की स्थिति को अप्रैल तक बढ़ाकर पशुधन, डेयरी, फल और बागवानी, कृषि, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन और वानिकी आदि को शामिल कर दिया।
उरुग्वे पिछले साढ़े तीन साल से सदी के सबसे बुरे सूखे से जूझ रहा है। उरुग्वे में बारिश आमतौर पर सर्दियों में ठंडी हवाओं और गर्मियों में बार-बार आने वाले तूफानों का परिणाम होती है, पर इस गर्मी (दिसंबर 2022 से फरवरी 2023) में बहुत कम बारिश हुई। ‘राष्ट्रीय मौसम विज्ञान संस्थान’ द्वारा जारी जानकारी के अनुसार गर्मी के दौरान औसत वर्षा 126.4 मिमी थी जो औसत वर्षा से 225.4 मिमी कम थी। पिछले 42 वर्षों में वर्तमान गर्मी रिकॉर्ड पर सबसे शुष्क रही है जो बताती है कि पूरा देश सूखे से प्रभावित क्यों है। करीब 36,23,300 हेक्टेयर इलाका अत्यधिक सूखे के अधीन क्यों है?
नेस्टर माज़ेओ और मारियाना मीरहॉफ़ जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि संकट सिर्फ कम बारिश का नहीं है, वह स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिए कारणों, ग्लोबल-वार्मिंग, जलवायु संकट की तुलना में अधिक जटिल है। उनका कहना है कि मेट्रोपॉलिटन मोंटेवीडियो (जहां देश की 60 प्रतिशत आबादी रहती है) अपना पीने का पानी विशेष रूप से सांता-लूसिया नदी पर बने बांध ‘पासो सेवेरिनो’ से प्राप्त करता है। यह बांध 6 करोड 70 लाख क्यूबिक-मीटर पानी का भंडारण करता है, लेकिन अप्रैल-मई 2023 में इसमें केवल 37 लाख क्यूबिक-मीटर पानी रह गया था।
‘सांता लूसिया’ बांध केवल व्यक्तिगत उपभोग के लिए पानी की आपूर्ति नहीं करता। देश के डेयरी और कृषि उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा मोंटेवीडियो के आसपास के इलाकों में बसा है। पहले अधिकांश कृषि स्वतंत्र रूप से घूमने वाले मवेशियों के इर्द-गिर्द होती थी, लेकिन पिछले 15-20 वर्षों में सोया की मोनोकल्चर और पेपर-पल्प के उत्पादन के लिए वानिकी सहित फसलों के भारी उत्पादन ने अधिक-से-अधिक पानी की मांग की। कुछ अनुमानों के अनुसार उरुग्वे में पीने योग्य पानी के 80 प्रतिशत तक का उपयोग निर्यात आधारित कृषि के लिए किया जा रहा है।
जानकार विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में परस्पर विरोधी हितों के चलते समन्वय की गंभीर कमी को भी एक कारण के रूप में देखते हैं। परेशान करने वाली यह बात भी बताई जाती है कि उरुग्वे में कुल पीने योग्य पानी का 50 प्रतिशत से अधिक पाइपों की लीकेज के माध्यम से बर्बाद हो जाता है, लेकिन सरकार ने काफी सालों से पानी के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्चा कम कर रखा है।
कुछ विशेषज्ञों के अनुसार मोंटेवीडियो और उसके महानगरीय क्षेत्र में भूजल निकासी का उचित प्रबंधन राजधानी के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति के संकट को दूर कर सकता है, पर यहां यह बात ध्यान देने लायक है कि अनियंत्रित भूजल निकासी से जलस्रोतों का अत्यधिक दोहन हो सकता है और वे प्रदूषित हो सकते हैं। कैनेलोन्स और माल्डोनाडो जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक दोहन के कारण तटीय जलस्रोतों में समुद्री जल का प्रवेश हो गया है और मीठा जल प्रदूषित हो गया है।
याद रखना चाहिये कि उरुग्वे के 2004 के संवैधानिक सुधार ने पानी और स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण को उलट दिया था। इस सुधार ने जल और स्वच्छता प्रशासन में सार्वजनिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का संकेत दिया था। 2010 में सरकार ने संवैधानिक सुधार को लागू करने के लिए ‘राष्ट्रीय जल योजना’ शुरू की। डिज़ाइन के अनुसार इस योजना में समाज के विभिन्न क्षेत्रों के दृष्टिकोण, चिंताओं और प्रस्तावों को शामिल किया गया था। 15 जून 2023 को प्रसिद्ध अख़बार ‘द गार्जियन’ ने टिम स्मेदलेव का एक लेख ‘सूखा अगली महामारी बनने की कगार पर’ शीर्षक से छापा था, यानि सूखा भविष्य में कई सालों तक बना रह सकता है और बार-बार पड़ सकता है। कई शोध भी बताते हैं कि भविष्य में दुनिया भर में सूखे वर्ष ज्यादा शुष्क होंगे। उरुग्वे में पानी का संकट दुनिया के अधिकांश लोगों, नीति-निर्धारकों, नेताओं के लिए एक चेतावनी है कि वे पानी से जुड़ी सुरक्षा, खपत और उत्पादन नीतियों में परवर्तन कर बदलते मौसम के साथ अनुकूलन का प्रयास करें। (सप्रेस)
श्री उपेन्द्र शंकर सामाजिक कार्यकर्ता हैं। व पानी के लिए कार्य करते हैं।
डॉ. आर.के. पालीवाल
केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच बहुत लंबा विवाद रहा है जिसके कारण दिल्ली में एक के बाद एक पदस्थापित किए गए केंद्रीय प्रतिनिधि लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालय और दिल्ली सरकार के बीच छत्तीस का आंकड़ा लगातार बढ़ते बढते बार बार सर्वोच्च न्यायालय की देहरी पर पहुंच रहा है।दिल्ली में एक के बाद एक लेफ्टिनेंट गवर्नर तो बदलते रहे हैं लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री पिछ्ले लगभग एक दशक से अरविंद केजरीवाल ही हैं, और यही बात केंद्र सरकार को रास नहीं आ रही कि उसकी नाक के नीचे दो बार आप सरकार बहुत भारी बहुमत से बनती रही है। तमाम कोशिश के बाद भी दिल्ली में केंद्र की डबल इंजन सरकार नहीं बन पाई। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बावजूद केंद्र सरकार दिल्ली सरकार को अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग के अधिकार देने में अड़ंगा लगा रही है।
दिल्ली में दो सरकारों के बीच यह रिकॉर्ड नौ साल से चल रहे लंबे टेस्ट मैच की तरह है, जिसमें केंद्र सरकार के फास्ट, मीडियम पेसर और गुगली फेंकने वाले कई स्पिनर्स लगे हैं लेकिन केजरीवाल सरकार आउट नहीं हो रही। पांच साल बाद नए चुनाव के रुप में नई बाल भी आई थी लेकिन अरविंद केजरीवाल राहुल द्रविड की तरह वाल बनकर डटे रहे। उनके डेप्युटी और साथी जेल की पवेलियन पहुंच गए लेकिन दिल्ली की टीम अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में अंगद के पैर की तरह जस की तस जमी है।
भारतीय जनता पार्टी और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी के लिए यह बहुत बडी चुनौती रही है कि उनकी ऐन नाक के नीचे देश की राजधानी दिल्ली में उनकी तमाम चाणक्य नीति, हिंदुत्व से लेकर बूथ मैनेजमेंट की रणनीति बार बार ध्वस्त होती गई हैं। जिन मोदी जी के लिए सब मुमकिन है कहा जाता है उनका विजयरथ दिल्ली में दो कदम आगे बढऩे की बजाय पीछे हटता जा रहा है।
केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के शीत युद्ध में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय ने युद्ध विराम की आदर्श स्थिति पैदा करने की कोशिश की थी। साथ ही इस निर्णय में हमारे संविधान में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए सह अस्तित्व की भावना को स्पष्ट किया गया था। विशेष रूप से केंद्र सरकार के लिए यह एक सबक था कि संविधान हमारे देश में संघीय ढांचे और लोकतंत्र को अहमियत देता है। भले ही देश की राजधानी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है जिसकी वजह से केंद्र दिल्ली सरकार को अहमियत नहीं देता था, फिर भी दिल्ली के मतदाताओं द्वारा चुनी हुई आम आदमी पार्टी की सरकार को सर्वोच्च न्यायालय ने काफ़ी अहमियत दी है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह केंद्र सरकार को अन्य राज्यों में भी ज्यादा दखलंदाजी करने से रोकने वाला निर्णय है।
सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के फैसले के बाद आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार और अरविंद केजरीवाल निश्चित रूप से राहत की सांस ली थी और केंद्र और दिल्ली सरकार की लड़ाई बंद होने की उम्मीद जगी थी कि अब उनके बीच रिकॉर्ड लंबा चला टेस्ट मैच ड्रा हो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। चंद दिनों में ही यह मामला फिर से सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया। केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को विफल कर दिया है और सर्वोच्च न्यायालय में रिव्यू पिटीशन लगाई है कि आम आदमी पार्टी की सरकार को अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। उधर आम आदमी पार्टी ने भी याचिका दायर की है कि केंद्र सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप काम नहीं कर रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय त्वरित सुनवाई सुनिश्चित कर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के कार्यक्षेत्र के बारे में शीघ्र निर्णय करेगा।
तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोवान एक दिन में दो बार पश्चिम को चौंकाने में सफल रहे। पहले उन्होंने स्वीडन की नाटो में एंट्री के लिए एक और एक्स्ट्रा शर्त रख दी। और फिर आखिरी लम्हे में अपना रुख बदल दिया।
सोमवार को नाटो महासचिव येंस श्टोल्टेनबर्ग ने एलान किया कि तुर्की नाटो में स्वीडन की एंट्री पर सहमत हो गया है। लेकिन तब तक एर्दोवान ने ऐसा कोई एलान नहीं किया था। तुर्क राष्ट्रपति ने इस बयान के जबाव में तुर्की को यूरोपीय संघ में शामिल करने की मांग कर दी। लिथुएनिया की राजधानी विलिनुस के लिए रवाना होने से पहले इस्तांबुल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एर्दोवान कहा कि उनका देश 50 साल से भी ज्यादा समय से यूरोपीय संघ के दरवाजे पर इंतजार कर रहा है। ब्रसेल्स को संबोधित करते हुए तुर्क राष्ट्रपति ने कहा, ‘यूरोपीय संघ में तुर्की के लिए रास्ता बनाइए, और फिर हम स्वीडन के लिए रास्ता बनाएंगे, उसी तरह जैसे हमने फिनलैंड के लिए बनाया।’
तुर्की की इस मांग से ब्रसेल्स परेशान हो गया। उसने तुरंत एर्दोवान की मांग खारिज करते हुए कहा कि नाटो और यूरोपीय संघ दो अलग अलग प्रक्रियाएं हैं। हालांकि नाटो के एग्रीमेंट पर सहमति के बाद जारी एक साझा बयान में स्वीडन ने कहा कि वह तुर्की को यूरोपीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया का सक्रिय समर्थन करेगा।
पश्चिम की तरफ लौटता तुर्की?
तुर्की की राजधानी अंकारा में जर्मन मार्शल फंड के निदेशक उजगुर उनलुहिसारिक्ली कहते हैं, ‘चुनाव के बाद से एर्दोवान, अमेरिका और यूरोप के साथ ज्यादा सकारात्मक संबंध तलाश रहे हैं और वह स्वीकार्यता चाहते हैं।’
तुर्क राष्ट्रपति के बयान को विश्लेषण करते हुए उनलुहिसारिक्ली कहते हैं, ‘उदाहरण के लिए, उनकी ईयू में रास्ता बनाने की बात को लीजिए। वह जानते हैं कि इस मामले में कुछ नहीं होगा। लेकिन वह यह कहना चाह रहे हैं कि, 'मुझे अलग मत रखो।’
कुछ लोग मानते हैं कि बेतहाशा महंगाई और गोते खाती मुद्रा लीरा की वजह से तुर्की को रूस और पश्चिम के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। इसकी मुख्य वजह आर्थिक परिस्थितियां हैं। यूरोपीय संघ और तुर्की के रिश्तों को सुधारकर अंकारा को आर्थिक फायदा मिल सकता है। तुर्की के कृषि उत्पादों, सर्विस सेक्टर और सरकारी भंडारण सेवाओं का दायरा फैल सकता है।
यूरोपीय संघ और तुर्की के बीच खटपट के कारण
तुर्की को यूरोपीय संघ में शामिल करने पर बातचीत 2005 में ब्रसेल्स में शुरू हुई। लेकिन इसमें बहुत उत्साहजनक प्रगति कभी नहीं हुई। जुलाई 2016 में तुर्की में सैन्य तख्तापलट की कोशिश के बाद तो ये बातचीत पूरी तरह ठंडे बस्ते में चली गई। नाकाम तख्तापलट के बाद अंकारा ने आतंकवाद विरोधी कदम उठाए, जो मानवाधिकार उल्लंघन तक पहुंच गए।
यूरोपीय समीक्षकों का तर्क है कि तुर्की-ईयू संबंधों में जान फूंकने से पहले अंकारा को काउंसिल ऑफ यूरोप (सीओई) के साथ रिश्ते सामान्य करने होंगे। इस अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना यूरोप में मानवाधिकारों, लोकतंत्र और कानून के राज की हिफाजत के लिए की गई है। यह यूरोपीय संघ ,से अलग और आजाद है। लेकिन आज तक कोई भी देश काउंसिल ऑफ यूरोप से जुड़े बिना, सीधे यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं बना है।
तुर्की सीओई का सदस्य जरूर है लेकिन हाल के बरसों में काउंसिल के साथ उसके रिश्ते बहुत तल्ख रहे हैं। सीओई की जानी मानी शाखा, यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स के फैसलों को अंकारा ने नजरअंदाज किया है। तुर्की में 2016 और 2017 से कुछ अहम कुर्द नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में हैं। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स के तुरंत रिहाई के आदेश के बावजूद अंकारा ने उन्हें नहीं छोड़ा है।
2017 से जेल में बंद तुर्क कार्यकर्ता और दानदाता ओसमान कवाला के मामले में अगर कोई प्रगति नहीं हुई तो हो सकता है कि आने वाले कुछ महीनों में काउंसिल तुर्की पर प्रतिबंध लगाए। इस लिहाज से देखें तो अंकारा को यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए अभी एक लंबा रास्ता तय करना है।
मिलेंगे अमेरिकी जेट
स्वीडन की नाटो में एंट्री पर हामी भरने से तुर्की को अमेरिकी लड़ाकू विमान स्न-16 मिलने का रास्ता कुछ हद तक साफ हुआ है। अमेरिका और तुर्की लगातार कह रहे हैं कि लड़ाकू विमानों का नाटो डील से कोई लेना देना नहीं है।
तुर्की लंबे समय से हॉकहीड मार्टिन के 40 नए एफ-16 खरीदने की इच्छा जता रहा था। साथ ही उसे अपने बेड़े में मौजूद लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण के लिए 80 किट्स भी चाहिए। अमेरिका में ऐसे रक्षा सौदों को संसद मंजूरी देती है।
राष्ट्रपति जो बाइडेन के समर्थन के बावजूद कांग्रेस के कुछ सदस्य तुर्की को यह सैन्य सामग्री देने का विरोध कर रहे हैं।
स्वीडन की नाटो में एंट्री के समझौते के बाद, अमेरिकी सीनेट की विदेशी नीति समिति के चैयरमैन बॉब मैनेनडेज ने तुर्की को राहत भरा मैसेज दिया। मैनेनडेज आने वाले दिनों में एफ-16 की डिलिवरी को लेकर जो बाइडेन से बातचीत करेंगे। (डॉयचे वैले)
रिपोर्ट-सिनेम ओजदेमीर, गुलशन सोलाकेर, कायहान काराका
-प्रकाश दुबे
राजनीति का नशा खराब होता है। बीती बातें याद नहीं रहतीं। राष्ट्र और महाराष्ट्र की राजनीतिक उठापटक में भटकने वालो, हम दो महान कलाकारों की बात कर रहे हैं। कामेडी सर्कस की डाल से चुनावी राजनीति में कूदने के बाद नवजोतसिंह सिद्धू के हिस्से जेल आई। लुढक़ते पुडक़ते आम आदमी की गोद में जा गिरे भगवंत मान मुख्यमंत्री बने। पुरानी यारी भूलकर आपस में चोंच लड़ाते हैं। मुख्यमंत्री ने कुर्सी के नशे में ऊंची उड़ान भरी- सरकारी खजाने को भर देंगे। बालू, दारू, जमीन, परिवहन आदि की बदौलत 50 हजार करोड़ रु मिल जाएंगे। सिद्धू इसे बहकावा मानते हैं। कहते हैं-मान न मान, मान के राज में आर्थिक आपात्काल नजदीक मान। दोनों की कामेडी के बीच तीसरे को कूदने की जरूरत नहीं थी। फिर भी पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल चीमा को चैन नहीं पड़ी। कमाई के आंकड़े बतलाते हुए बोले-अकेले जून महीने में आबकारी से 660 करोड़ से ज्यादा कमाए। आबकारी का मतलब?
आया सावन झूम के
वक्त वक्त की बात है। राजीव गांधी पर निगरानी रखने के लिए हरियाणा पुलिस के हवलदारों की तैनाती की शिकायत पर चंद्रशेखर की सरकार चली गई। पता नहीं, हवलदारों को तब कैसे पहचाना गया। आज ऐसा होता तो कह देते कि उनकी तोंद निकली हुई थी। हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने इस तरह की बदनामी टालने के लिए मोटू पुलिस वालों की सूची मांगी। महीने भर में पुलिस रपट नहीं दे सकी। मुख्य सचिव से लेकर गृह मंत्री तक का फरमान काम नहीं आया। शाम तक जानकारी हासिल करने की मंत्री विज की पुलिसिया घुडक़ी बेकार गई। काम ज्यादा है। 73 हजार से अधिक कर्मियों वाले पुलिस बल में फुर्ती और फुर्सत की कमी है। महीने भर में छह हजार हवलदार और दो हजार एसपीओ-विशेष पुलिस अधिकारी की भर्ती कर बेरोजगारी खत्म करेंगे। लड़ते भिड़ते पुलिस वाले फिटफाट रहते हैं। ऐतिहासिक लड़ाइयों और अब पराठों वाले पानीपत में दो महिलाओं समेत 34 तोंदिल पुलिस वाले लाइन हाजिर किए गए। श्रावण में उपवास और वर्जिश करेंगे।
खजाने का दूध अभिषेक
50 लाख रुपए की धनराशि न तो पटियाला राजघराने के वारिस और मुख्यमंत्री रह चुके व्यक्ति के लिए बड़ी रकम है, और न पांच बार विधायक रहे मुख्तार अंसारी के लिए। अंसारी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में ही दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं। आजादी की लड़ाई में शामिल और कांग्रेस के 1927 में अध्यक्ष रहे मुख्तार अहमद अंसारी के पोते की पंजाब में कानूनी लड़ाई का खर्च कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने किया था। कुर्सी छिनने से कुपित कैप्टन कांग्रेस छोडक़र भारतीय जनता पार्टी से जुड़ चुके हैं।
कांग्रेस ने कैप्टन को मुख्यमंत्री और पत्नी को सांसद बनाया। भाजपा से उपराष्ट्रपति, राज्यपाल जैसा ईनाम नहीं मिला। साथी सुनील जाखड़ को जरूर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बनाया। अंसारी के मुकदमे का खर्च वसूल करने की आम आदमी पार्टी की धमकी पर अमरिंदर और अंसारी खेमा चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि कांग्रेस ने फोक्की (फुकट) मशहूरियत वाली सरकार कहकर पोल खोल आंदोलन करने की चेतावनी दी है। श्रावण मास में शिव पर दूध चढ़ाने वाले भक्त दूध नहीं पीते। मिरच और दगाबाजी एक छोर से दूसरे छोर तक तड़पाती है।
चल कांवडिय़े
बड़े नाम वालों का यही अंजाम है। पड़दादी दो-दो पार्टियों की महारानी और लाखों की राजमाता रहीं। दादा केंद्रीय मंत्री रहे। एक बुआ मुख्यमंत्री थी, दूसरी मंत्री है। पिता दो-दो पार्टियों से केंद्रीय मंत्री और इस सबके बावजूद महा आर्यमन ज्योतिरादित्य सिंधिया सब्जी-भाजी के कारोबार से जुडक़र किसान बन रहे हैं। चुनाव यात्रा के कांवडिय़ों को सब करना पड़ता है। पिता ने दो रोज पहले ढाबे पर जाकर रसोइए से पाक कला के बारे में बात की। कुछ लोगों ने चुटकी ली। कहा-पुराने दोस्त राहुल ने वाशिंगटन से न्यूयार्क और दिल्ली से अंबाला तक ट्रक ड्राइवरों से गपशप का आनंद लिया। यह रोग सिर्फ राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक नहीं है। भाजपा से लेकर ममता तक से न्यौता ठुकराकर सौरव गांगुली ने खानपान के धंधे को चमकाने पर ध्यान दिया। बंगाल के भद्र लोक में चर्चा है कि दादा जस्ट माइ रूट नाम की कंपनी के भागीदार हैं। सौरव की पसंदीदा मिठाइयां खास तौर पर परोसी जाएंगीं। सच्ची बात यह है कि सौरव कंपनी के ब्रांड एम्बेसडर बने हैं। आर्यमन ग्वालियर जिला क्रिकेट के उपाध्यक्ष हैं। दादा किकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
- डॉ. आर.के. पालीवाल
अगर किसी मुहावरे की संक्षिप्त भाषा में कहा जाए तो एनसीपी के आदि पुरुष शरद पवार की स्थिति घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने जैसी हो गई है।एनसीपी के संकट की जड़ में इसके प्रमुख नेताओं की महत्वाकांक्षा है। कभी राष्ट्रीय रहे लेकिन हाल ही में प्रादेशिक हुए इस दल के मुखिया शरद पवार तिरासी साल के हो गए , वे गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं लेकिन उनकी महाराष्ट्र के साथ साथ देश में किंग नहीं तो किंग मेकर बनने की महत्वाकांक्षा अभी भी बाकी है। उनके भतीजे अजित पवार भी पार्टी की कमान संभालने की महत्वाकांक्षा पालते हुए इंतजार करते करते तिरसठ साल के वरिष्ठ नागरिक हो गए।
अब जब उन्हें साफ दिखने लगा कि चाचा शरद पवार उन्हें अपने जीवन में कभी पार्टी की कमान नहीं सौंपेंगे तो उनके पास बगावत के अलावा कोई विकल्प नहीं था। शरद पवार ने अजित पवार को पूरी तरह नकारकर पुत्री सुप्रिया सुले और प्रहलाद पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर यह साफ कर दिया था कि एन सी पी में अजित पवार की वैसी ही हैसियत है जैसी अन्य क्षेत्रीय दलों में नाभिकीय परिवार से इतर रिश्तेदारों की होती है। महाराष्ट्र में ही बाला साहब ठाकरे काफी पहले राज ठाकरे के लिए यह कर चुके हैं और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में यही हुआ है।
एनसीपी में अजित पवार की बगावत के बाद इस वक्त सबसे ज्यादा किरकिरी शरद पवार की हो रही है। उन पर तिहरा संकट है। एक तरफ उम्र के इस पड़ाव पर दो फाड़ हुई पार्टी को तिनका तिनका बिखरने से बचाना मुश्किल काम है, दूसरी तरफ महाराष्ट्र की राजनीति में खुद की प्रासंगिकता बरकरार रखनी है और तीसरे राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में भाजपा विरोधी गठबंधन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका बचाए रखनी है। जहां तक पहली चुनौती पार्टी की अपनी शाखा और शाख बचाने की बात है वह फिलवक्त सबसे कठिन है।
अजित पवार के सत्ताधारी गठबंधन की डबल इंजन सरकार में शामिल होने से पार्टी के अधिकांश विधायक और सांसद सत्ता की नजदीकी के लोभ में शरद पवार का साथ छोड़ रहे हैं। इसी तरह संगठन के महाराष्ट्र के पदाधिकारी भी अजित पवार के साथ रहकर ही स्वार्थ साध सकते हैं। हालांकि शरद पवार कह रहे हैं कि देश के अन्य प्रदेशों के पदाधिकारी उनके साथ हैं लेकिन उनका पार्टी में कोई महत्व नहीं है क्योंकि वर्तमान समय में महाराष्ट्र के अलावा किसी अन्य प्रदेश में पार्टी बेहद कमजोर है।
जब किसी व्यक्ति या संगठन की स्थिति अपने घर, गृह नगर और गृह प्रदेश में कमजोर होती है तब बाहर भी उनकी इज्जत और महत्व पर ग्रहण लग जाता है। शरद पवार में अब इतनी शक्ति नहीं है कि उम्र के इस पड़ाव पर कई कई मोर्चों पर एक साथ लड़ सकें। उन्होंने अजित पवार को एक तरफ करने के लिए और अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को पार्टी की विरासत सौंपने के लिए अपने सबसे विश्वस्त प्रफुल्ल पटेल को बैसाखी और ढाल के रुप में इस्तेमाल किया था। प्रफुल्ल पटेल को सुप्रिया सुले के साथ पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया था कि वे पूरी कमान पुत्री को नहीं सौंप रहे। प्रफुल्ल पटेल उनके इस झांसे में नहीं आए। वे यह समझ गए कि एक दिन उन्हें भी अजित पवार की तरह बाहर निकलना पड़ेगा। शायद इसीलिए वे भी अजित पवार के साथ सत्ता सुख की लालसा में शरद पवार से अलग हो गए।
शरद पवार कभी भी किसी विचारधारा से संबद्ध नहीं रहे। उनके साथ अवसरवादिता और सत्ता की महत्वकांक्षा उनके कद से बडी रही है। चाहे बिना क्रिकेट खेले क्रिकेट बोर्ड ऑफ इंडिया की अध्यक्षता हो या बिना राष्ट्रीय लोकाप्रियता के प्रधानमंत्री पद की महत्वकांक्षा हो शरद पवार हमेशा ऊंचे अवसर की तलाश में रहे। उम्र के इस पड़ाव पर उनके भतीजे अजित पवार और पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल आदि ने भी उनसे सीखकर उनका दांव उन्हीं पर चला है।
-सुशीला सिंह
सोशल मीडिया पर इन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार की अधिकारी एसडीएम ज्योति मौर्य और उनके पति आलोक मौर्य का मामला छाया हुआ है।
सोशल मीडिया पर आलोक मौर्य ने आरोप लगाया था कि एसडीएम बनने के बाद उनकी पत्नी ज्योति मौर्य ने उन्हें छोड़ दिया।
आलोक मौर्य ने सोशल मीडिया पर उन्होंने अपनी पत्नी से चैट का एक वीडियो भी पोस्ट किया था। वीडियो सामने आने के बाद इस मामले पर लोग सोशल मीडिया पर अलग-अलग विचार रख रहे हैं। सोशल मीडिया इस सारे विवाद पर दो हिस्सों में बंटा हुआ नजऱ आ रहा है।
एक पक्ष का कहना है कि ये ज्योति मौर्य और आलोक मौर्य का निजी मामला है और मीडिया या जनता को इस मामले में फ़ैसले लेने का कोई अधिकार नहीं है। दूसरा पक्ष ऐसे वीडियो डाल कर ये दावा कर रहा है इस घटना के बाद कई पतियों ने अपनी पत्नी की आगे की पढ़ाई पर रोक लगा दी है। इस साल जून महीने में आलोक मौर्य का कुछ पत्रकारों से बातचीत का वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने रोते हुए ज्योति मौर्य पर धोखा देने और अपने बच्चों से मिलने न देने का आरोप लगाया।
अलोक मौर्य ने बताया था कि वे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में पंचायतीराज विभाग में क्लास-4 के कर्मचारी हैं और उनकी शादी ज्योति से साल 2010 में हुई थी। आलोक का दावा है कि शादी के बाद ज्योति मौर्य की पढ़ाई के लिए कजऱ् भी लिया। साल 2015 में दंपति को जुड़वा बेटियां हुईं। इसके बाद ज्योति ने उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास कर ली। लेकिन इसके बाद मामले में नया मोड़ आया और आलोक मौर्य ने ज्योति मौर्य पर आरोप लगाए। और शुरू हो गया आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला।
ज्योति ने दावा किया कि आलोक ने कहा था कि वे ग्राम पंचायत में अधिकारी हैं। लेकिन शादी के बाद पता चला कि वे सफ़ाईकर्मी का काम करते थे।
इस मामले से महिलाओं पर असर
इस सारे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के दो वकीलों सत्यम सिंह और दीक्षा दादू ने राष्ट्रीय महिला आयोग को एक खुली चिट्टी लिख कर कार्रवाई की मांग की है।
सत्यम सिंह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद में लीगल सेल के महासचिव हैं। सत्यम का दावा है कि इस मामले के सामने आने के बाद कई परिवारों से बहुओं की पढ़ाई बंद करवा दी है।
एक एनजीओ चलाने वाले सत्यम सिंह कहते हैं, ‘ये मामला केवल ज्योति मौर्य तक सीमित नहीं रह गया, इसका असर उन लड़कियों या शादीशुदा महिलाओं पड़ा है जो पढऩा चाह रही हैं। उन्हें अब रोका जा रहा है। इसने पितृसत्तात्मक सोच को और मज़बूत कर दिया है।’
सत्यम ने बताया कि महिलाओं की पढ़ाई के प्रति हाल में कुछ बदलाव आया था और कई परिवारों ने बहुओं को पढऩे के लिए प्रेरित भी किया था लेकिन ऐसे मामले सामने आने से इन प्रयासों को झटका लगेगा।
पब्लिक ट्रायल नहीं होनी चाहिए
पंजाब यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ़ विमेन स्टडीज़ में डॉक्टर अमीर सुल्ताना एक अन्य पहलू की बात करती हैं। वे कहती हैं, ‘भारतीय संविधान में सभी को समानता का अधिकार दिया गया है तो इससे किसी महिला को कैसे महरूम रखा जा सकता है।’
डॉ सुल्ताना ने बीबीसी को बताया, ‘भारत में कितने मामले मिल जाएंगे जहां महिलाएं घर में अकेले कमाने वाली होती हैं और पति, परिवार बैठकर खा रहे होते हैं। वो घरेलू हिंसा बर्दाशत कर रही होती हैं लेकिन ऐसे मामलों पर तो सोशल मीडिया पर चर्चा नहीं होती।’
‘इस मामले में सोशल मीडिया ट्रायल की कोई आलोचना नहीं करता जबकि ये निजता का मामला है और इस मामले में दोनों पक्ष क़ानूनी सहारा लेकर अपनी लड़ाई लड़ सकते हैं।’
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दिल्ली स्थित आंबेडकर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्री और जेंडर मुद्दों पर काम कर रहीं डॉ दीपा सिन्हा कहती हैं कि ये साफ़तौर पर ज्योति मौर्य और आलोक मौर्य का निजी मामला है जिसपर किसी को कुछ बोलने का मतलब नहीं है। ‘लेकिन सोशल मीडिया पर अक्सर ये देखा गया है कि जब भी कोई मामला सामने आता है तो लोग वहीं न्याय करने लग जाते हैं।।।लोग महिला की छवि और चरित्र पर सवाल उठने लगते हैं।’
उनके अनुसार, ‘एक महिला को घर में रहना चाहिए, बच्चे और परिवार को देखना चाहिए, इन सभी भेदभावों को और बढ़ावा दिया है। ये समाज की महिलाओं के प्रति सोच को दिखाता है।’
दीपा सिन्हा तेलंगाना में स्कूलों में किए गए एक शोध का उदाहरण देती हैं।
वे कहती हैं कि कोई लडक़ा अगर किसी स्कूल में लडक़ी का नाम दीवार लिख देता था तो अभिभावक एक के बाद एक अपनी लड़कियों का नाम कटवा लेते थे क्योंकि सारी चीज़ इज़्ज़त से जुड़ जाती हैं।
दीपा सिन्हा कहती हैं कि महिलाओं और सियासतदानों को ऐसी महिलाओं के हक़ में खड़ा होना चाहिए। वकील सत्यम सिंह कहते हैं कि सोशल मीडिया पर भी लगाम लगाई कसी जानी चाहिए। उनका कहना है कि नकारात्मक विचारों को रोकने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग या महिलाओं से जुड़ी संस्थाओं को ऐसे मामलों में संज्ञान लेना। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
आजादी के दौरान और आज़ादी के बाद सर्वोदय विचार के तीन सबसे बड़े स्तंभों महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण का भारतीय समाज में हुए सकारात्मक परिर्वतन में अदभुत योगदान है। विगत कुछ वर्षों से सर्वोदय से जुड़ी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं के प्रति शासन के एक वर्ग का रवैया उपेक्षा भाव का रहा है। इसका ताजा उदाहरण सर्व सेवा संघ वाराणसी परिसर पर रेलवे और स्थानीय प्रशासन द्वारा की जा रही तोड़ फोड़ की अप्रत्याशित कार्यवाही के रूप में सामने आया है।
सर्व सेवा संघ का दावा है कि इस परिसर की भूमि रेलवे विभाग से १९६० - ६१ और १९७० में खरीदी गई थी। सर्व सेवा संघ की स्थापना में लाल बहादुर शास्त्री, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण की विशिष्ट भूमिका रही है। पिछ्ले साठ साल से यहां गांधी और सर्वोदय विचार से जुडे विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं लेकिन विगत कुछ दिनों से अचानक रेलवे विभाग और स्थानीय प्रशासन ने इस परिसर के एक भाग को तोडऩे की त्वरित कार्रवाई का नोटिस दिया है। केंद्र सरकार के रेलवे विभाग और उत्तर प्रदेश प्रशासन की इस कार्यवाही के खिलाफ देश भर के गांधी और सर्वोदय विचारक आक्रोशित हैं।
जहां तक वर्तमान केन्द्र सरकार का प्रश्न है उसकी दृष्टि इस सर्वोदय त्रयी की तीनों विभूतियों के प्रति अलग अलग दिखाई देती है। गांधी को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान सबसे ज्यादा पशोपेश में है। भारतीय जनता पार्टी, आर एस एस और इनसे जुड़े कुछ अन्य हिंदू संगठनों के कट्टरपंथी तत्व गांधी के बारे में तरह तरह की अफवाहें फैलाकर उनका चरित्र हनन कर गोडसे को देशभक्त बनाने का प्रयास करते रहते हैं। इन संगठनों के उदारवादी तत्व गांधी के बारे में अक्सर मौन रहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री और कुछ मंत्री मौके की नजाकत के अनुसार गांधी के नाम पर साफ सफाई अभियान आदि की शुरुआत भी करते हैं और विदेश में गांधी का गुणगान भी करते हैं। कुछ साल पहले गांधी १५० एक ऐसा अवसर था जिसका उपयोग सरकार न केवल अपने देश में सांप्रदायिक सद्भाव और शांति के लिए कर सकती थी अपितु जिस तरह से योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई है वैसे ही गांधी के शांति और अहिंसा के विचारों को विश्व में प्रचारित प्रसारित कर वाहवाही बटोर सकती थी लेकिन वह अवसर गवां दिया।
विनोबा भावे के प्रति सरकार का उदासीनता का भाव रहता है। जयप्रकाश नारायण के प्रति आपात काल के विरोध के कारण सरकार का रुख कुछ नरम दिखता है जो हाथी दांत की तरह बाहरी दिखावा अधिक लगता है। यदि सरकार जयप्रकाश नारायण और सर्वोदय के प्रति संवेदनशील होती तब रेलवे विभाग और उत्तर प्रदेश सरकार जयप्रकाश नारायण द्वारा पोषित सर्व सेवा संघ के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते थे। यदि रेलवे विभाग और उत्तर प्रदेश सरकार के सामने दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, वीर सावरकर या किसी अन्य दक्षिण पंथी विभूति की विरासत होती तो उस पर बुलडोजर चलाने की कोशिश असंभव थी। ऐसी परिस्थिति में डबल इंजन सरकार के प्रशासन इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते थे।
अब सर्व सेवा संघ का मामला सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के सामने आ गया है। उन्होंने इस मामले में सर्व सेवा संघ को प्रारंभिक राहत देते हुए मामले को तुरंत सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र और प्रदेश सरकार भी इस मामले के शांतिपूर्ण समाधान के लिए हर संभव प्रयास करेंगी। गांधी और सर्वोदय से जुड़े संस्थान हमारे देश की अनमोल विरासत हैं। हिंसा और अशांति के वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में पूरे विश्व में गांधी और उनके विचार की प्रासंगिकता बढ़ रही है।
ऐसे में अपने देश में उनके विचारों के प्रचार प्रसार में जुटे शीर्ष संस्थानों के साथ प्रशासन का संवेदनहीन व्यवहार सर्वथा अनुचित है। गांधी संस्थानों के पदाधिकारियों को भी इस मामले को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए और सत्याग्रह के बल पर केंद्र और राज्य सरकारों को सही निर्णय के लिए बाध्य करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या दिवस ११ जुलाई पर विशेष
डॉ. लखन चौधरी
हमारे देश की विशालतम जनसंख्या हमारी सबसे बड़ी समस्या एवं चिंता बनी हुई है, बल्कि इस समय हमारे देश की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा दायित्व भी है। अब तो हम चीन को भी पार कर चुके हैं। १४२ करोड़ से अधिक की विशालतम आबादी के लिए जीवनयापन की तमाम बुनियादि सुविधाएं उपलब्ध कराना, करवाना सरकारों के लिए भी आसान एवं सरल नहीं है। भोजन, पानी, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार-आजीविका आदि जीवन की आधारभूत और बुनियादि जरूरतों की उपलब्धता सुनिश्चित करना ही बहुत बड़ी चुनौती है। इसलिए भारत की विशालतम जनसंख्या को अक्सर दायित्व के रूप में देखा एवं परिभाषित किया जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह अवधारणा बदलने लगी है, बदली है और लगातार बदल रही है।
अब हमारी विशालतम जनसंख्या दायित्व ही नहीं बल्कि हमारी आतंरिक एवं बाहरी दोनों स्तर पर बाजारों की ताकत बनकर उभरी और लगातार उभर रही है। देश की विशालतम आबादी हमारी संघीय राज्यों के अर्थव्यवस्थाओं की संभावनाएं बन रही है, बल्कि बन चुकी है। देश की विशालतम जनसंख्या हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अब दायित्व नहीं अपितु हमारी ताकत एवं हमारी एसेट्स बनकर अर्थव्यवस्था के विकास में महती भूमिका अदा कर रही है। देश की विशालतम जनसंख्या हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अब बाजार पैदा कर रही है।
आज जब दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती और मंदी का वातावरण है। दुनिया की तमाम विकसित अर्थव्यवस्थाएं विकास दर में स्थिरता का रोना रो रहे हैं, ऐसे समय में भी हमारी अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मांग एवं खपत बनी हुई है। यह इसलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि हमारी विशालतम जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार में उत्पादन भरपूर मात्रा में हो रहा है या किया जा रहा है। चूंकि बाजार में पर्याप्त मांग एवं खपत बनी हुई है, इसलिए हमारी अर्थव्यवस्था में मांग एवं खपत की कमी नहीं है, जो निवेश को लगातार आकर्षित कर रहे हैं।
इस समय देश की विशालतम आबादी को संसाधन के रूप में तब्दील करने की जरूरत है, जिससे हमारी जनसंख्या समस्या एवं दायित्व न होकर संपत्ति एवं संसाधन बन जाए। चीन ने यही किया है, जिसके कारण आज चीन अमेरिका को आंखे दिखा रहा है। चीन ने अपनी विशालतम जनसंख्या को संसाधन के रूप में तब्दील करते हुए आर्थिक विकास का एक ऐसा आंतरिक ढ़ांचा खड़ा कर लिया है, जिसे आज दुनिया का कोई भी देश चुनौती नहीं दे सकता है। इस विशालतम आबादी का चीन को यह फायदा हुआ कि उसने दुनिया की सबसे सस्ती चीजें, वस्तुएं बनाने में विशेषज्ञता, दक्षता हासिल कर ली। घर-घर में कुटीर उद्योधंधों की तरह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगधंधे एवं कारोबार का विकास एवं विस्तार कर लिया।
घरेलु एवं स्थानीय उद्यमिता, उद्यमशीलता के विकास का भरपूर विदोहन करते हुए चीन ने अपनी आर्थिक ताकत इतनी बढ़ा ली है कि आज यूरोप-अमेरिका का कोई भी देश उसका मुकाबला नहीं कर सकता है। इसी कारण आज पूरी दुनिया चीन की हरकतों से परेशान होते हुए भी उसका कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आने वाले दशक में भी दुनिया का कोई मुल्क चीन का मुकाबला कर सकेगा ? फिलहाल असंभव ही लगता है, क्योंकि चीन की विशालतम जनसंख्या की उद्यमशीलता का मुकाबला करने के लिए भारत को छोडक़र दुनिया में किसी के पास उतनी बड़ी आबादी नहीं है। इस वक्त हमारा यही दुर्भाग्य है कि हम संभावनायुक्त होने के बावजूद बेबस, बेकार एवं लाचार पड़े हैं। हमारी विशालतम आबादी संभावनायुक्त होते हुए दायित्व मात्र बनकर समस्याओं की जड़ बनी हुई है। (बाकी पेज ५ पर)
सरकार ने योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया, लेकिन नीति आयोग की नीतियां, योजनाएं, कार्यक्रम एवं उपलब्धियां धरातल पर कहीं नजर नहीं आती हैं। वास्तविकता यह है आज क्रय शक्ति समता के आधार पर सुदृढ़ एवं सम्पन्न होने के बावजूद देश की जनता गुणात्मक शिक्षा, उत्तम स्वास्थ्य एवं रोजगार-आजीविका के मामले पर पिछड़ी हुई है। दुनिया की ५वीं सबसे बड़ी, शक्तिशाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद गरीबी, बेकारी, आय एवं धन के वितरण में असमानता जैसी सामाजिक-आर्थिक विषमताएं एवं समस्याएं गंभीर एवं विकराल बनी हुई हैं।
आज दुनिया का शायद कोई देश होगा जहां का आम जनमानस घोर संकटों, समस्याओं, कठिनाईयों से घिरा होने के बावजूद अपने राजनीतिक अधिकारों का इस्तेमाल अपनी चिंताओं, परेशानियों, चुनौतियों से निपटने के बजाय अपने अधिकारों का प्रयोग नितांत विवेकशून्यता से भावुकता के लिए करता होगा। यह सब इसलिए क्योंकि हमारी सरकारों ने हमारी बहुसंख्यक जनसंख्या को कभी भी संसाधन एवं सभावनाओं के तौर पर शिक्षित, प्रशिक्षित एवं विकसित करने का प्रयास ही नहीं किया। इसका नतीजा यह रहा है कि हमारी विशालतम आबादी देश के लिए हमेशा बोझ बनी रही। इसलिए प्रगति एवं विकास की अपार संभावनाओं के बावजूद हमारा देश आज तक विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ सका है।
वैसे किसी देश के लिए ७५ साल का वक्त तरक्की, प्रगति, उन्नति के हिसाब से बहुत अधिक नहीं माना जाता है या नहीं हेाता है, लेकिन जब वह देश अर्थव्यवस्थाओं के आकार, क्षमता एवं संभावनाओं की दृष्टि से दुनिया का ५वां बड़ा देश हो तो उम्मीदें तो अवश्य ही बढ़ ही जाती हैं, और बढऩी चाहिए। जब अर्थव्यवस्थाओं के आकार, क्षमता एवं संभावनाओं के अनुसार इतनी बड़ी दुनिया के केवल चार विकसित देश शीर्ष पर हों, तो उम्मीदें बढऩा स्वाभाविक है। सरकार से सवाल-जवाब क्यों नहीं हो कि इतने सालों में इतनी संभावनाओं के बावजूद आमजन की आकांक्षाएं पूरी क्यों नहीं हो रही हैं ? देश के साधनों, संसाधनों का इस्तेमाल कहां, कैसे हो रहा है? ये सवाल तो आमजन को पूछना चाहिए। यदि जनमानस से यह सवाल नहीं उठ रहा है तो भी उसके लिए क्या, कौन जिम्मेदार है? यह भी एक स्वाभाविक सवाल है।
बात देश की इतनी बड़ी जनसंख्या की जो लगातार बेहिसाब बढ़ती जा रही है, और देश के लिए बोझ बनते-बनते, दायित्व निभाते-निभाते अब समस्या बन चुकी है। ऐसी समस्या जिसके कारण देश को अन्य कई तरह की जैसे गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, अज्ञानता, असमानता, गंदगी, बीमारी, अस्वच्छता जैसी अनगिनत समस्याएं घेरे हुए हैं, और विकास का सारा प्रयास एवं उपक्रम इन्हीं निरर्थक प्रयासों में व्यर्थ चला जाता हो, चला जा रहा हो। तब स्वााभाविक तौर पर लगता है लेकिन अब भारत की यही जनसंख्या बोझ, चिंता, चुनौती एवं दायित्व नहीं अपितु संपत्ति, संसाधन, परिसंपत्तियां के रूप में विकास का, आर्थिक सुधारों का वाहक एवं सूत्रधार बन रही है। आज जब पूरी दुनिया आर्थिक सुस्ती एवं मंदी की मार से त्रस्त हैं, तब भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसकी आंच नगण्य है, इसलिए आज पूरी दुनिया की नजरें भारत की ओर टिकने लगीं हैं।
भारत अब केवल एक देश नहीं दुनिया के नजरों में एक बड़ा बाजार है। आज हर भारतवासी एक ग्राहक, एक खरीदार, एक उपभोक्ता है, जिससे सभी दोस्ती चाहते हैं। दुनिया का हर विकसित देश अब भारतीयों को अपना सामान बेचना चाहता है। अब भारतीय अर्थव्यवस्था में इतनी अपार संभावनाएं आ चुकीं हैं कि दुनिया का हर विकसित देश भारत को अपने व्यापार और कारोबार का साझेदार एवं भागीदार बनाना चाहता है, क्योंकि अब हमारी विशालतम जनसंख्या केवल दायित्व नहीं दुनियाभर के बाजारों के लिए बहुत बड़ी ताकत बन चुकी है, और लगातार बनती जा रही है।
देवेंदर शर्मा
कुछ साल पहले की बात है। हरियाणा के एक किसान ने अंडरग्राउंड पाइप डालने के लिए छह लाख रुपये का लोन लिया था जिसे वह चुका नहीं पा रहा था। मामला अदालत पहुंचा और उसे दो साल की कैद और ९.८३ लाख जुर्माने की सजा सुनाई गई।
सिर्फ हरियाणा में ही नहीं, हाल के सालों में देश भर में बैंकों की छोटी-मोटी बकाया राशि नहीं चुकाने की वजह से बड़ी संख्या में किसानों को जेल में डाल दिया गया है। अगर जेल नहीं भेजा गया तो बैंक पहले तो किसानों की ट्रैक्टर जैसी चल संपत्ति जब्त कर लेते हैं और उसके बाद भी बकाया नहीं मिला तो खेत जब्त कर लिए जाते हैं।
ऐसे में, इन छोटे-छोटे डिफॉल्टरों, जो ज्यादातर मामलों में फसलों के खराब हो जाने या फिर कीमतों के जमीन सूंघने की वजह से लोन वापस नहीं कर पाते, के बचाव में आने के बजाय भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अमीर बदमाशों, धोखेबाजों और जानबूझकर लोन न चुकाने वालों के लिए च्रक्षा कवचज् की सुविधा उपलब्ध कराने का फैसला किया। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए, इसने राष्ट्रीयकृत बैंकों को जानबूझकर चूक करने वालों के तौर पर पहचाने गए खातों के लिए समझौता निपटान या फिर लोन राशि को बट्टे खाते में डालने की इजाजत दे दी है। १२ महीने की कूलिंग अवधि के बाद, ये डिफॉल्टर जिनके पास भुगतान करने की क्षमता है लेकिन वे ऐसा नहीं करते हैं, नए लोन तक ले सकते हैं।
अगर यह वैध समाधान तंत्र है, जैसा कि आरबीआई कहता है, तो सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि यही फॉर्मूला किसानों, एमएसएमई क्षेत्र और मध्यम वर्ग पर क्यों लागू नहीं किया गया है जो घर या कार लोन लेने के लिए नियमों का पालन करते हुए कर चुका कर अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे लगाते हैं? अन्यथा मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और माइक्रो-फाइनेंस संस्थानों (एमएफआई) के किराये के गुंडे आए दिन डिफॉल्टरों की चल संपत्ति को जब्त करने के लिए जोर-जबरदस्ती की रणनीति क्यों अपनाएंगे?
हाल ही में एक टोल नाके पर रिकवरी एजेंटों (गुंडों) ने एक डिफॉल्टर की कार जब्त कर ली। वहीं, एक एनबीएफसी प्रमुख ने झारखंड में कर्ज न चुकाने वाले एक किसान की गर्भवती बेटी की मौत के लिए माफी मांगी थी। उसे तब कुचल दिया गया था जब रिकवरी एजेंट ट्रैक्टर के साथ भागने की कोशिश कर रहे थे जिसके लिए किसान ने लोन ले रखा था। लेकिन आरबीआई की नजरें तो दूसरी तरफ हैं।
मैं इस बात से स्तब्ध हूं कि आरबीआई ने बैंकों को जान-बूझकर कर्ज न चुकाने वालों के साथ समझौता करने की इजाजत देने वाला पत्र भला कैसे जारी कर दिया? ऐसे लोगों को तो कायदे से अब तक जेल में होना चाहिए था। और फिर जब आरबीआई के इस पत्र पर हंगामा मचा तो मामले को ठंडा करने के लिए जो च्नरमज् स्पष्टीकरण दिए गए, उससे और भी सवाल खड़े हो गए। इससे केवल यही बात जाहिर होती है कि आरबीआई की सारी उदारता अमीर डिफॉल्टरों के लिए है। ऐसे डिफॉल्टर जो बैंकिंग नियामक के नियम-कायदों की कतई परवाह नहीं करते।
अन्यथा मुझे कोई और कारण नहीं दिखता कि जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जाती। पिछले दो वर्षों में इनकी संख्या में ४१ प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। इनकी संख्या बढक़र १६,०४४ हो गई है और इन पर बैंकों का कुल मिलाकर ३.४६ लाख करोड़ रुपये बकाया है। इसके अलावा, मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि पिछले सात वर्षों में बैंक धोखाधड़ी और घोटालों में हर दिन १०० करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। जो भी हो, कई जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों जिनमें विजय माल्या, मेहुल चोकसी और ललित मोदी जैसे लोग शामिल हैं, जो देश छोडक़र भाग गए हैं, को अब आरबीआई के इस रुख से राहत मिलेगी कि बैंक उनके साथ समझौता कर सकेंगे। इनमें से कई को बकाए की बड़ी राशि के बट्टे-खाते में जाने का फायदा होगा और उसके बाद भी वे आगे फिर से लोन लेने के पात्र होंगे।
क्या यह ऐसी व्यवस्था नहीं जो वास्तव में इस तरह की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार है!
मुझे हैरानी है कि आरबीआई ने छोटी राशि के बकाएदारों जिनमें किसान भी शामिल हैं, के प्रति कभी इतनी उदारता क्यों नहीं दिखाई? छोटे किसानों को जेल की सजा क्यों भुगतनी पड़ती है जबकि व्यापार में अमीर बदमाशों को नियमित रूप से जमानत मिल जाती है और उनके लिए लोन की राशि में भी भारी कटौती कर दी जाती है और इसलिए उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं होता है। वे जन्मदिन मनाना, महंगी छुट्टियां मनाना और शानदार जीवनशैली जारी रखते हैं। आरबीआई के हालिया सर्कुलर से उन्हें बड़ी राहत का रास्ता साफ हो गया है और अब इस धंधे से जुड़े धोखेबाजों को डरने की कोई जरूरत नहीं है। उन्हें बस इतना अमीर होना है कि वे उस श्रेणी में आ सकें जिसके चारों ओर बैंक ने एक सुरक्षात्मक घेरा तैयार कर दिया है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि बैंकिंग व्यवस्था ही बढ़ती असमानता का मूल कारण है। आखिरकार, अगर बैंक बैंकिंग प्रणाली को धोखा देने वाले उधारकर्ताओं के साथ इस तरह का व्यवहार जारी रखते हैं, तो यह केवल उस गेम प्लान को उजागर करता है जो अमीरों को धन इक_ा करने में मदद करता है। इसलिए नहीं कि वे प्रतिभाशाली हैं बल्कि इसलिए कि बैंक जनता के पैसे से उन्हें उबारते रहते हैं। पहले से ही, बैंकों ने पिछले १० वर्षों में १३ लाख करोड़ रुपये से अधिक की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को बट्टे खाते में डाल दिया है और जान-बूझकर कर्ज न चुकाने वालों के लिए समझौता फार्मूला तैयार करने का बैंकों को दिया गया विवेक उनके लिए सोने पर सुहागा जैसा काम करेगा।
जबकि अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ और अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ आरबीआई नीति के आलोचक रहे हैं, अधिकतर बिजनेस मीडिया इसके समर्थक रहे हैं। इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह है कि जब भी कॉरपोरेट्स को लाभ पहुंचाने का कोई मुद्दा सामने आता है, तो कॉरपोरेट अर्थशास्त्रियों की एक टीम अचानक सामने आकर उसका बचाव करने की कोशिशों में जुट जाती है, भले ही वह निर्णय कितना भी गलत क्यों न हो।
यह तब हुआ, जब ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने विकराल होती असमानताओं को कम करने के लिए संपत्ति कर लगाने के लिए कहा। भारत में कुछ अर्थशास्त्रियों ने तब कहा था कि अमीरों के एक छोटे वर्ग के ऊपर संपत्ति कर बढ़ाना सही नहीं होगा। यह भी उतना ही हैरान करने वाला है कि कैसे कुछ अर्थशास्त्री, आरबीआई के निर्देश को सही ठहराने की कोशिश करते हुए, यहां तक कह देते हैं कि ऋण की वसूली करते समय बैंक को इस बात में कोई अंतर नहीं करना चाहिए कि डिफॉल्ट जानबूझकर किया गया, या अनजाने में या फिर किसी भी और इरादे से।
यदि ऐसा है, तो मुझे आश्चर्य है कि मध्यम वर्ग के निवेशकों और किसानों के लिए इस अपवाद की अनुमति क्यों नहीं है? यदि किसानों और मध्यम वर्ग के डिफॉल्टरों को समान विशेषाधिकार मिलते हैं तो आप उन्हीं अर्थशास्त्रियों को इस नीति पर सवाल उठाते हुए देखेंगे। उदाहरण के लिए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि मीडिया में वे विशेषज्ञ और अन्य लोग जिन्होंने कर्नाटक में रोडवेज बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे राज्य सरकार को प्रति वर्ष ४,००० करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जब सवाल पूछा जाता है तो वे स्पष्ट रूप से चुप हो जाते हैं। ३.४६ लाख करोड़ रुपये के बट्टे खाते में डाले जाने की उम्मीद है और वह भी जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले एक वर्ग के लिए। उन्हें इस उदारता से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन वे हमेशा गरीबों के लिए घोषित प्रोत्साहनों पर सवाल उठाते हैं।
मैंने सोचा कि आरबीआई कम से कम गरीब मजदूरों के खिलाफ इस अंतर्निहित पूर्वाग्रह से दूर रहेगा। इसके विपरीत, विवादास्पद परिपत्र जो बैंकिंग प्रणाली के बदमाशों और धोखेबाजों के लिए एक सुरक्षात्मक जीवनरेखा प्रदान करता है, स्पष्ट रूप से दिखाता है कि आरबीआई को बहुत कुछ सीखना है और शायद च्दोहरे मानकज् को रोकने के लिए एक ठोस प्रयास करना है जो हर स्थिति में अमीरों का पक्ष लेता है- तरह-तरह के आर्थिक लाभ, और राष्ट्रीय बैलेंस शीट को बिगाडऩे और नैतिक खतरा बनने के लिए गरीबों की निंदा करना। (navjivanindia.com)
(देविंदर शर्मा जाने-माने कृषि नीति विशेषज्ञ हैं)
-श्रवण गर्ग
ऐतिहासिक बन चुके 5 जुलाई 2023 के दिन अजीत दादा पवार या ‘दादा’ अजित पवार को मुंबई के बांद्रा स्थित मुंबई एजुकेशनट्रस्ट परिसर में बोलते हुए टीवी पर सुना या देखा था क्या ? ‘दादा’ जब अपने ‘काका’ शरद पवार को चैलेंज कर रहे थे तब देखकर कैसा महसूस हो रहा था? ‘दादा’ अपनी बात मराठी में ‘सांग’ रहे थे यानी बोल रहे थे। मराठी समझ नहीं आती हो तो भी जो चल रहा था सब साफ था।
अब अजीत दादा के उस दिन के चेहरे को याद कीजिये जब शरद पवार अत्यंत नाटकीय अन्दाज में पार्टी-अध्यक्ष पद से पूर्व में दिये अपने इस्तीफे को वापस लेने के बाद बेटी सुप्रिया सुले और ‘तब’ अत्यंत ‘विश्वस्त’ प्रफुल्ल पटेल को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की सारी जिम्मेदारी सौंप रहे थे! अजित पवार को कुछ नहीं मिला था। अजित पवार की बांद्रा बैठक की तैयारी उसी क्षण से प्रारंभ हो गई थी।
(कतिपय विश्लेषक अपनी इस बात पर कायम हैं कि पाँच जुलाई का सारा ‘ड्रामा’ शरद पवार के दिमाग की ही उपज थी। अगर यह सही है तो दाद दी जा सकती है कि तिरासी साल की उम्र में भी एक ‘काका’ इस तरह का नाटक कर सकता है जबकि किसी समय इतनी ही उम्र के एक दूसरे ‘काका’ को उसकी पार्टी ने घर बैठा दिया था और वह चुपचाप बैठ भी गए थे! वे आज भी बताई गई मुद्रा में ही बैठे हुए हैं! )
यह समझने से पहले कि ‘दादा’ अपने सगे काका को किस भाषा में क्या उपदेश दे रहे थे इस सवाल पर आते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे मंझे हुए गुजराती नेता अजित दादा जैसे तेज-तर्रार और अति महत्वाकांक्षी मराठी मानुस को महाराष्ट्र की राजनीति में किस सीमा तक आगे बढऩे देना चाहेंगे? ऊपरी तौर पर तो दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध शीघ्रातिशीघ्र बन जाने चाहिए क्योंकि आगे बढऩे के लिए जो राजनीति अजित दादा अपनी ही पार्टी के स्थापित शिखरों के साथ कर रहे हैं और जिन सीढिय़ों पर पैर रखकर मोदी गांधीनगर से नई दिल्ली पहुँचे हैं दोनों के बीच समानताओं के कई बिंदु तलाश किए जा सकते हैं।
अजित पवार ने शरद पवार को क्या-क्या नहीं सुनाया! उन्होंने अपने ‘काका’ को समझाया कि आईएएस अफ़सर साठ की उम्र में सेवा-निवृत हो जाता है। भाजपा में नेता पचहत्तर में रिटायर हो जाते हैं। आडवाणी और एमएम जोशी के नाम गिनाते हुए अजित पवार ने कहा कि हर आदमी के लिए समय निर्धारित होता है। पच्चीस से पचहत्तर के बीच का समय ही सबसे अधिक योगदान का है। ‘दादा’ ने फिर पूछा- आप 83 के हो गये हो ! आप क्या अब भी रुकने वाले नहीं हो? शरद पवार ने इसका दिल्ली पहुँचकर जवाब दिया कि वे अब भी प्रभावी हैं, चाहे 82 के हों या 92 के।
अजित पवार अभी तिरसठ साल के हैं। उनके पास रिटायर होने के लिए काफी वक्त है। उनसे यह सुनने के लिये तीन साल प्रतीक्षा करना पड़ेगी कि पचहत्तर की उम्र में रिटायरमेंट का जो उपदेश बांद्रा के कुरुक्षेत्र में काका को दिया था मोदी को भी कहते हुए देने वाले हैं कि अब उन्हें घर बैठकर नए लोगों को आगे बढऩे का मौका देना चाहिए! इसके लिए अजित पवार को तीन साल तक भाजपा के साथ बने रहना पड़ेगा जिसकी कि संभावना कम नजऱ आती है !
अजित पवार अगर अपने काका से कह सकते हैं कि वे अब मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तो वे आगे चलकर किसी और बड़े पद की माँग मोदी से भी कर सकते हैं! यह भी कि अगर अजित पवार ने तय कर ही लिया है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकता तो फिर एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडनवीस क्या करने वाले हैं? अजित पवार की कार्यशैली से भाजपा के धुरंधरों को इसलिए डरना चाहिए कि उन्होंने 2019 के विद्रोह में हुई चूक की तरह की कोई गलती इस ऑपरेशन में नहीं की। बांद्रा सम्मेलन के दो दिन पहले ही पार्टी की गुप्त बैठक बुलाकर अपने आप को एनसीपी का प्रमुख भी चुनवा लिया और किसी को भी खबर तक नहीं होने दी। राजनीति के हर सफल तख्ता-पलट की पीठ के पीछे की कहानी ऐसी ही मिलेगी !
पूरे ‘पवार परिवार’ प्रसंग में जिस एक व्यक्ति की भूमिका पर चर्चा करना जरूरी है वह प्रफुल पटेल हैं। मेरे जैसे कई लोग होंगे जो यूपीए सरकार के दस साल के कार्यकाल पर तब पूरी नजर रखते थे और केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में पटेल के कामकाज और उनके मंत्रालय को लेकर उठने वाले विवादों से परिचित रहे हैं। उस सबकी चर्चा फिर किसी समय। अभी बात सिर्फ बांद्रा की। अजित दादा के साथ-साथ शानदार मराठी में भाषण करते हुए पटेल के वीडियो के उस अंश को जब उनके राजनीतिक ‘मेंटर’ शरद पवार ने देखा होगा जिसमें वे पटना में हुई विपक्ष की बैठक का जिक्र कर रहे थे तब उनके दिल पर क्या गुजरी होगी कल्पना करना मुश्किल है। शरद पवार पटना की बैठक में अपने सबसे नज़दीकी सहयोगी के रूप में पटेल को साथ ले गये थे।
अजित पवार के साथ मंच की भागीदारी करते हुए पटेल ने वर्णन किया कि पटना-बैठक का नज़ारा देखकर उनका मन हँसने का कर रहा था। उन्होंने वहाँ देखा कि बैठक में उपस्थित सत्रह पार्टियों में सात का लोकसभा में सिफऱ् एक-एक ही सांसद है। एक पार्टी के पास तो एक भी सांसद नहीं है। ये (विपक्षी) दावा करते हैं कि सबकुछ बदल डालेंगे! पटेल ने पवार से पूछा कि जब एनसीपी महाराष्ट्र विकास अगाड़ी(एमवीए) में शामिल होकर शिव सेना की विचारधारा को स्वीकार कर सकती है तो उसके (अजित पवार गुट के) भाजपा के साथ जाने पर आपत्ति क्यों होना चाहिए ?
महाराष्ट्र के घटनाक्रम से भारतीय जनता पार्टी को राज्य में अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान प्राप्त हो गया है या जो कुछ चल रहा है वह अरब सागर से मुंबई के तटों पर उठने वाली किसी राजनीतिक सूनामी के संकेत हैं जानने के लिये शायद ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़े ! सत्ता प्राप्ति के लिये जिस राजनीति की शुरुआत भाजपा के नेतृत्व में हुई है उसका पटाक्षेप भी प्रधानमंत्री की आँखों के सामने ही होना चाहिए । आकलन सही भी साबित हो सकता है कि सूनामी के बाद सबसे ज़्यादा बचाव कार्यों की जरूरत भाजपा-शिविरों को ही पड़ेगी।
शरद पवार एक अनुभवी नेता हैं। उन्होंने भतीजे को आगाह किया था कि मोदी द्वारा एनसीपी को एक भ्रष्ट पार्टी बताए जाने के बावजूद वे गैर-भरोसे वाली भाजपा के साथ जा रहे हैं पर अजित पवार माने नहीं। महाराष्ट्र की जनता पहचानती है कि एनसीपी का चुनाव चिन्ह ‘घड़ी’ है। ‘घड़ी’ नामका एक चर्चित डिटर्जेंट पाउडर भी है। भाजपा एक बड़ी विशाल पेट वाली वाशिंग मशीन है जिसमें ठीक से धो दिए जाने के बाद सारे मेल दूर हो जाते हैं।
महाराष्ट्र ऑपरेशन के बाद भाजपा बिहार सहित अन्य राज्यों से राजनेताओं से उनके मेले कपड़े उतरवाने में जुट गई है। देखना यही बाक़ी रहेगा कि 2024 के चुनावों के बाद कितने कपड़े उजले होकर वाशिंग मशीन से बाहर निकलते हैं और कितने चिथड़े होकर !
मणिपुर जल रहा है। आजादी के बाद इससे भयंकर, वीभत्स और लगातार चल रहा संविधान विरोधी नरसंहार नहीं हुआ है। आजादी के पहले और बाद में भारत में विलय के संबंध में कश्मीर में पाकिस्तानी हमले के कारण बहुत हिंसक गतिविधि हुई है। छुटपुट घटनाएं हैदराबाद, नागालैंड तथा अन्य कई स्थानों सहित अन्य इलाकों में र्हुइंं। तब भारत सरकार के खिलाफ बाहरी तत्व संविधान की गैरमौजूदगी में हिंसा को लेकर अपनी हैसियत और हद तलाशने में लगे रहे थे।
मणिपुर का किस्सा बिल्कुल अलग है। आज़ादी और संविधान के करीब 75 वर्ष बाद संविधान स्वीकृत राज्य में केन्द्र और राज्य सरकारों की गफलत के कारण हिंसा परवान चढ़ी है। मणिपुर में मुख्य आदिवासी जातियां, कुकी और मैती सीधे आपसी संघर्ष में उलझ गई हैं बल्कि उन्हेंं उलझाया जा रहा है। संविधान के अनुच्छेद 1 और 4 के तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र पूर्वोत्तर अधिनियम 1971 के तहत मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा है। संविधान बनने के बाद विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की जिम्मेदारियों का सीधा और सुस्पष्ट बंटवारा हुआ है। केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है और उनके नाम से लागू होती है।
केन्द्र सरकार की हुकूमत का अर्थ केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की हुकूमत से नहीं है। संविधान कहता है राष्ट्रपति इसका प्रयोग संविधान के अनुसार खुद या अपने मातहत अधिकारियों द्वारा करेगा। संविधान की भाषा बहुत साफ, चुस्त, प्रत्यक्ष और परिमाणात्मक है। राष्ट्रपति का संवैधानिक दायित्व और कर्तव्य हैै कि कार्यपालिका शक्ति का इस्तेमाल खुद या मातहत अधिकारियों के द्वारा करे लेकिन चुप नहीं बैठे और उदासीनता नहीं दिखाए। राष्ट्रपति को विवेक नहीं है कि जब चाहे कार्यपालिका षक्ति का अपनी समझ और हैसियत में इस्तेमाल कर सके। जब चाहे चुप बैठ जाए। देष, इतिहास और समय चुप नहीं बैठते। राष्ट्रपति को अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करना ही होगा। कर्तव्यों से उसे कोई छुट्टी, अनदेखी या गफलत नहीं मिल सकती।
संविधान में स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के मातहत जो अधिकारी हैं उनमें केन्द्रीय मंत्रिपरिषद अनुच्छेद 74 के अनुसार बाध्य है कि राष्ट्रपति के निर्देषों के अनुसार संवैधानिक कृत्य करे। मंत्रिपरिषद को राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने का अधिकार है। राष्ट्रपति पर संवैधानिक बाध्यता है कि मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेगा। संविधान में नहीं लिखा है कि मंत्रिपरिषद चाहे तो सलाह दे, चाहे तो नहीं दे। अगर सलाह नहीं दी जाएगी तो राष्ट्रपति क्या करेगा? संविधान निर्माताओं ने ऐसा सोचा ही नहीं था कि जब चाहे राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों से छुट्टी ले लें और सरकार से जानकारी लेने से इंकार कर दें। यह भी नहीं लिखा है कि मंत्रिपरिषद चाहे तो सलाह दे या सलाह देने में अपनी मर्जी के अनुसार कोताही कर दे। राष्ट्रपति और मंत्री जनता के लोकसेवक हैं।
जनता अर्थात देश नींद, गफलत या उन्माद में नहीं जीते। इसीलिए संविधान के अनुच्छेद 77 में लिखा है कि भारत सरकार की सभी कार्यपालिका शक्ति कार्यवाही राष्ट्रपति के नाम से की हुई कही जाएगी। राष्ट्रपति भारत सरकार का कार्य अधिक सुविाधापूर्वक किए जाने के लिए और मंत्रियों में उक्त कार्य के आवंटन के लिए नियम बनाएगा।
मणिपुर की सरकारी नादिरशाही के खिलाफ के सबसे उल्लेखनीय प्रावधान अनुच्छेद 78 में साफ लिखा है यह प्रधानमंत्री का कर्तव्य होगा कि वह (क) संघ के कार्यकलाप के प्रषासन संबंधी और विधान सम्बन्धी प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करे, (ख) संघ के कार्यकलाप के प्रशासन संबधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी जो जानकारी राष्ट्रपति मांगे, वह दे, और मणिपुर के संदर्भ में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के दो कर्तव्य हैं।
पहला तो यह कि प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि प्रषासन संबंधी और विधायिका द्वारा पारित अधिनियमों और नियमों आदि की नियमित जानकारी राष्ट्रपति को दे। यदि ऐसा नहीं किया जाएगा तो प्रशासन का कोई आदेश और विधायिका की कोई अंतिम कार्यवाही राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना प्रमाणित और अधिसूचित नहीं की जा सकती।
यहां सवाल उठता है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री किसके प्रतिनिधि हैं। मणिपुर को लेकर जो हो रहा है, क्या वह संविधान के अनुच्छेद 78 के परे की कोई कार्यवाही है। मणिपुर में भीषण नरसंहार हो रहा है। सरकारी और निजी संपत्ति नष्ट हो रही है। सैकड़ों, हजारों लोग घर छोडक़र भागने मजबूर हैं। आगजनी हो रही है। हिंसा और तरह तरह के गुटों के संघर्ष को लेकर बल्कि पुलिस और सेना की भी हिंसात्मक गतिविधि के चलते मणिपुर में षांति स्थापित नहीं हो रही है। जीवन सामान्य नहीं है। लगता है, जो सही है, कि वहां कोई सरकार ही नहीं चल रही। संविधान की मषीनरी ठप्प है। जनता की निगाह में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री खुट्टी किए बैठे हैं। कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है कि प्रधानमंत्री अपने कर्तव्य का पालन कर भी रहे हैं। यदि नहीं तो राष्ट्रपति मौन व्रत में क्यों हैं। अनुच्छेद 78 के तहत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच संवाद या पत्र व्यवहार, षासकीय सूचनाओं का आदान प्रदान गोपनीय नस्ल का नहीं हो सकता। जनता की मौत या हत्याएं प्रषासन की गोपनीय गतिविधि में षामिल नहीं होतीं।
यह एक तरह का संवैधानिक संकट है। इसमें मौन व्रत धारण करने के कारण चुुनौती और चोट तो संविधान को ही दी जा रही है। राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद से जानकारियां हासिल की जाती हैं। उन्हें लेकर संविधान का अनुच्छेद 74 (2) बचाव करता है कि इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राष्ट्रपति को कोई सलाह दी और यदि दी तो क्या दी। यह एक सुरक्षा कवच है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों के लिए। मणिपुर की बिगड़ चुकी हालत में यदि प्रधानमंत्री राज्य की जनता के संदर्भ में कोई जानकारी राष्ट्रपति को देते हैं। तो उसका संज्ञान कोई अदालत नहीं ले सकती कि क्या सलाह दी गई है। इतनी सुरक्षा और इतने सारे प्रावधानों के रहते भारत के संविधान निर्माताओं ने आज जैसे हालात की कल्पना भी नहीं की। संविधान सभा के तीन साल चले वाद विवाद में उक्त वाक्य नहीं बदला है। किसी सदस्य को शक नहीं हुआ हो कि कभी स्थिति आएगी कि राष्ट्रपति को मौन रहना अच्छा लगेगा और प्रधानमंत्री को तो राष्ट्रपति को कुछ बताना नागवार गुजरेगा।
अफवाह तो यहां तक है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अपने शासकीय आवास में किससे मिलेंगी। इसकी सूची प्रधानमंत्री कार्यालय तय करता है। देश ने देखा है कि संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संसद के अविभाज्य अंग होने के बावजूद संसद भवन के उद्घाटन समारोह का श्रेय प्रधानमंत्री कार्यालय ने नदारद कर दिया था। संविधान में तो यह भी है कि यदि संविधान के अतिक्रमण के लिए स्थिति है तो राष्ट्रपति पर महाभियोग भी चलाया जा सकता है। संविधान में तो यह भी है यदि राष्ट्रपति का किसी राज्यपाल से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है। तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा प्रशासन संचालन की शक्तियां अपने हाथ में ले सकेंगे।
ये सब प्रावधान हमारे पुरखों ने बहुत सोच समझकर और दुनिया के बड़े और पुुराने संविधानों के प्रावधानों पर दिनों दिनों तक बहस के बाद निर्धारित किए। संविधान में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और राज्यपाल सबके लिए षपथ लेने के प्रारूप में भी है कि मैं संविधान द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रक्खूंगा। मैं भारत की प्रभुता और अखंडता, अक्षुण्ण रक्खूंगा। आज मणिपुर की जनता अर्थात संविधान पर हत्यारों का सीधा हमला हो रहा है। लगातार हो रहा है। भारत की अखंडता और सार्वभौमिकता भूगोल, धरती, कुदरत और पशु-पक्षियों में नहीं है।
भारत में कोई सार्वभौम नहीं है, न राष्ट्रपति, न प्रधानमंत्री, न राज्यपाल, न मुख्यमंत्री और न ही खुद संविधान। सार्वभौम केवल भारत की जनता है अर्थात मणिपुर के लोग हैं। वे संविधान और सरकार के निर्माता हैं। उन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति और राज्यपाल को चुना है। राष्ट्रपति, राज्यपाल और मंत्रिपरिषद की जवाबदेही संविधान के इलाके, भाषा और जिम्मेदारियों के लिए सीधे तौर पर है। वे चुप हैं, मौन हैं और अपनी जिम्मेदारियों को जनता की समझ में ठीक से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मणिपुर के राज्यपाल और केंद्रीय और राज्य मंत्रिपरिषद की पहल पर निर्भर नहीं हैं।
अतीत में कई अवसर आए होंगे जब राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद और कभी राज्यपाल से किसी भी घटना को लेकर सीधी रिपोर्ट मांगी होगी और सभी मातहत संवैधानिक अधिकारी राष्ट्रपति को ऐसी जानकारी देने के लिए पूरी तौर पर बाध्य हैं। अगर संविधान के प्रावधानों पर अमल नहीं होगा तो सरकारी कार्य का संचालन हो ही नहीं सकता। यह इतिहास का काला परिच्छेद होगा यदि मणिपुर की जनता और भारत के संविधान को संवैधानिक अधिकारियों की चुप्पी का अभिशाप झेलना पड़़ेगा। संविधान को सरकारी तौर पर जिबह कैसे किया जा सकता है?
डॉ. सुरेश गर्ग
1 जुलाई देश भर में डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया गया। यह हिंदुस्तान ही है जहाँ डॉक्टर्स को इतना प्यार एवं सम्मान दिया गया है। इसका कारण है कि भारतीय सनातन संस्कृति में चिकित्सा क्षेत्र एवं चिकित्सकों का विशेष महत्व रहा है- श्री धन्वंतरि जी को आयुर्वेद चिकित्सा का जनक ही नहीं ‘देव’ तुल्य माना जाता है। ‘अश्विनी कुमार’ देवलोक के सर्जन चिकित्सक माने जाते हैं। असुरों के संकटमोचक महर्षि शुक्राचार्य हुआ करते थे। वे मरे असुर को भी जिंदा कर देने का ज्ञान जानते थे। ‘ययाति’ को सैंकड़ों वर्ष (हजार वर्ष) तक अपने बेटे की जवानी लेकर ‘ग्रहस्थ जीवन’ का आनन्द लेने का मौका मिला। ऋषि च्यवन के नाम का च्यवनप्राश आज भी लोगों को जवानी देने के नाम पर बेचा जा रहा है। ‘सुश्रुत संहिता’ वैदिक-पौराणिक काल में होती रही सर्जरी का अद्वितीय दस्तावेज़ आज उपलब्ध है।
मतलब भारतीय संस्कृति में चिकित्सा विज्ञान और चिकित्सकों का महत्व आदिकाल से चला आ रहा है। चिकित्सक की जरूरत सुर-असुरों को ही नहीं भगवान राम को भी पड़ गई थी, जब लक्ष्मणजी को शक्ति लगी थी। इसीलिए हिंदुस्तान में एक समय तक डॉक्टर को दूसरा भगवान या भगवान के बाद का दर्जा समाज में दिया जाता रहा है। यह बात अलग है कि ‘बाजारवाद और भूमंडलीकरण’ के जमाने में आज चिकित्सा क्षेत्र एवं चिकित्सक इसके विपरीत नजरिये से देखे जाते हैं ! यह बात अलग है कि कभी-कभी कहीं-कहीं जब कोई मरीज गंभीर बीमारी से ठीक होने के बाद जाते समय भावुकता में शिष्टाचारवश कृतज्ञता प्रगट करते हुए उसे भगवान बता जाता है! प्रदर्शित करता है। वरना घर पहुँचने पर जब उसे यह पता चलता है कि उस पर कितना खर्च हुआ है और परिजनों को क्या-क्या सहना पड़ा है , तब उसकी मानसिकता बदल जाती है।इसलिए चिकित्सा क्षेत्र की सनातन गरिमा पुनर्स्थापित करने के लिए डॉक्टर्स डे पर इन कारणों पर विचार-विमर्श करना जरूरी है!
डॉक्टर्स डे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिक्षाविद एवं गांधीजी के निजी चिकित्सक और लम्बे समय तक पश्चिम बंगाल के सफलतम मुख्यमंत्री रहे डॉ. बिधान चन्द्र रॉय के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है। आजादी की लड़ाई और आज़ादी के बाद ऐसे एक नहीं अनेक चिकित्सकों ने अपनी जान की परवाह न करके देश एवं समाज के लिए अनेक प्रेरणादायी कार्य किये हैं; उनमें से एक डॉ. मणिधर प्रसाद व्यास को डॉक्टर्स डे पर विशेष रूप से याद करना समसामयिक लगता है। क्योंकि इस वर्ष की ‘थीम’ कोराना काल में चिकित्सकों के योगदान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना रही है।
डॉ. मणिधर का जन्म 3अगस्त 1886 को अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता भी डॉक्टर थे इसलिए उन्हें बचपन से ही चिकित्सा क्षेत्र में सेवाधर्म आत्मसात करने का मौका मिला। जैसे ही उन्होंने चिकित्सा शिक्षा पूरी की शासकीय नौकरी में आ गये। उस समय वहाँ प्लेग जोरों से फैल हुआ था। बीमार का इलाज और मृतकों की बॉडी का पोस्टमार्टम करना जरूरी होता था। यह काम आज भी स्थानीय शासकीय चिकित्सक को ही करना पड़ता है। नौकरी में आते ही डॉ.मणिधर एवं उनके दो साथियों को यह काम करना पड़ा। परिवार और समाज के लोगों ने उन्हें इसके खतरे बताते हुए उससे बचने की सलाह दी। परन्तु वे और उनके साथी राष्ट्रभक्ति और चिकित्सा क्षेत्र की श्रेष्ठता बनाये रखने के लिए यह काम अपना प्रथम कर्तव्य मान कर करते रहे! दुर्भाग्य से उनके दोनों साथी उस बीमारी से पीडि़त होकर कम उम्र में ‘शहीद’ हो गये। ये भाग्य से बच गये और फिर पूरी जिंदगी निस्वार्थ भावना से चर्मरोगियों एवं कुष्ठरोग मरीजों के बीच मिशनरी भावना से कार्य करते रहे।यही नहीं , वे निरंतर गांधीजी के आंदोलन से जुड़े रहे। नतीजतन अंग्रेज सरकार के कोपभाजन के शिकार बने। एक तरफ आज भी डॉ. मणिधर एवं उनके साथियों जैसे डॉक्टर हैं जो कोरोना काल में अपना कर्तव्य पूरी इमानदारी से निबाहते रहे और दूसरी तरफ वे हैं जो छिप कर घर में बैठ गये! यही नहीं, इस विपदा में भी बिना कुछ किए से बटोरते रहे!
विडंबना यह है कि डॉक्टर्स डे पर उन विज्ञापनी व्यापारी चिकित्सकों के बड़े पैमाने पर अखबारी विज्ञापनों के साथ प्रायोजित सम्मान होते रहे, और वहीं जो डॉक्टर्स अपनी जान की बाजी लगाकर कोरोना काल में कार्य करते रहे, उन्हें शायद ही कहीं उस तरह से सम्मानित किया गया!
वर्तमान में चिकित्सा क्षेत्र में व्याप्त बाजारवाद, कट, कमीशन, दवा कंपनियों एवं विक्रेताओं से सांठगांठ को देख और भोग कर ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया को तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है, कहीं वैसा ही ‘गोदी चिकित्सा’ क्षेत्र तो नहीं बनता जा रहा ?
तसलीम खान
सरसरी तौर पर यही लग रहा है कि शिवसेना के बाद बीजेपी ने एनसीपी को तोडक़र उसे भारी नुकसान पहुंचाया है लेकिन हकीकत यह नहीं। ये दोनों दल मजबूत हुए हैं और इनका यह साथ जनता की सहानुभूति भी ले जाएगा।
शरद पवार को बखूबी अंदाजा था कि क्या होने जा रहा है। उनके भतीजे अजित पवार लंबे अरसे से यही चाह रहे थे लेकिन अपने चाचा की उदासीनता से आजिज आ चुके थे। शरद पवार उन्हें या पार्टी के युवा लोगों के लिए जमीन छोडऩे को तैयार नहीं थे और अजित उन पर दबाव बना रहे थे और वह काफी हद तक इसमें कामयाब भी हो गए जब इस साल मई में सीनियर पवार ने संन्यास की घोषणा कर दी थी। लेकिन यह दौर बहुत छोटा रहा और अजित इसका जश्न मना पाते, इससे पहले ही अंकल समर्थकों की ‘इच्छा’ का सम्मान करते हुए वापस आ गए।
शरद पवार राजनीतिक दांव-पेंच के ऐसे माहिर खिलाड़ी हैं जिसकी काट मुश्किल है। महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषक यह मानने को तैयार नहीं हैं कि शरद पवार ने अजित पवार से उनके अगले कदम के लिए तोलमोल नहीं किया होगा। अजित पवार अंकल के भरोसेमंदों को तोडऩे की कोशिशों में जुटे थे। एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी) की टूट की औपचारिकताओं के पूरी होने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में पवार सीनियर खुश नजर आ रहे थे और निश्चिंत भी।
शरद पवार की बायोग्राफी ‘ऑन माई टर्म्स’ के अदृश्य लेखक आनंद अगाशे कहते हैं, ‘(पार्टी की टूट की वजह से) वह हतोत्साहित तो बिल्कुल नहीं हैं।’ पवार ने खुद भी कहा कि उन्होंने 1980 में इससे भी बुरा वक्त देखा जब उस समय की कांग्रेस (सोशलिस्ट) पार्टी के 58 में से छह विधायकों को छोडक़र सभी ने कांग्रेस (आई) का हाथ थाम लिया था। वह कहते हैं, ‘तब मैंने पार्टी को फिर से खड़ा किया और अगले चुनाव में पार्टी छोडऩे वाले विधायकों में से 2-3 को छोडक़र सभी को हार का सामना करना पड़ा।’
मीडिया एनसीपी के विभाजन को शरद पवार खेमे के लिए एक ऐसे नुकसान के तौर पर देखता है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। सीनियर पवार के पास अजित गुट की तुलना में कम विधायकों का समर्थन है। लेकिन मीडिया शायद इस बात को नजरअंदाज कर रहा है कि यह विधानसभा अगले साल भंग हो जाएगी और उससे पहले ही लोकसभा के चुनाव होंगे और जब साल के अंत में विधानसभा के चुनाव का समय आएगा, काफी-कुछ बदल भी सकता है।
विधानसभा चुनाव के समय यही विधायक टिकट के लिए होड़ करेंगे और तब अपनी संभावनाओं का पुनर्मूल्यांकन करेंगे। जैसा कि एक अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षक अभय देशपांडे कहते हैं, फिलहाल के लिए तो अजित और उनके समर्थकों ‘जिन्होंने कम-से-कम तीन पीढिय़ों के लिए खासी कमाई कर रखी है’, ने जेल से बाहर रहने के लिए सौदेबाजी कर ली है। लेकिन देशपांडे का कहना है कि अब मतदाताओं या यहां तक कि एनसीपी समर्थकों द्वारा उन्हें दोबारा स्वीकार किए जाने की संभावना नहीं है।
बेशक पवार सीनियर वास्तव में विभाजन से ‘बेखौफ’ हों, जैसा कि उनके जीवनी लेखक को लगता है, क्योंकि इतना तो वह जानते हैं कि जब वोट के लिए लोगों के पास जाने का समय आता है, तो उनके पास बेहतर कार्ड होते हैं। शरद पवार जानते हैं कि लोग उन्हें वोट देते हैं, न कि एनसीपी के किसी भी उम्मीदवार को।
उदाहरण के लिए, जब चार बार के एनसीपी सांसद उदयनराजे भोसले जो छत्रपति शिवाजी महाराज के 14वें वंशज थे, ने सतारा से लोकसभा चुनाव जीतने के कुछ सप्ताह बाद ही बीजेपी में शामिल होने के लिए इस्तीफा दे दिया तो अक्तूबर, 2019 में उपचुनाव तय हुआ और भोसले को टक्कर देने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार की तलाश में पवार को खासी माथापच्ची करनी पड़ी। आखिरकार उन्होंने एक सेवानिवृत्त नौकरशाह का नाम फाइनल किया जिसका कोई राजनीतिक आधार नहीं था। फिर भी उस नौकरशाह ने भारी बहुमत से जीत हासिल की। प्रजा ने अपने प्रिय योद्धा राजा के वंशज की जगह शरद पवार को चुना।
अब सवाल उठता है कि एनसीपी में आंतरिक कलह और उसके बाद उसे तोडऩे से बीजेपी को क्या हासिल कर लेने की उम्मीद है? जाने-माने मराठी पत्रकार प्रताप आसबे को लगता है कि अजित अपने लिए नहीं बल्कि बीजेपी के लिए बोल रहे हैं जो सीनियर पवार को महाराष्ट्र में अपने लिए सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखती है। देशपांडे कहते हैं, ‘उन्होंने राज्य में सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे की पूरी-पूरी कोशिश की लेकिन वोटरों के ध्रुवीकरण की कोशिशें उनकी योजना के मुताबिक नहीं हो सकीं। शिवसेना के टूटने के बाद भी एमवीए (महा विकास अघाड़ी) गठबंधन तब भी मजबूत दिख रहा था और बीजेपी बीजेपी के कई आंतरिक सर्वेक्षणों में पाया गया था कि शिंदे के साथ गठबंधन करने की वजह से पार्टी अपनी जमीन खोती जा रही है।
जब उन्हें अंदाजा हो गया कि शिंदे उनके लिए बोझ बनते जा रहे हैं, तो उन्हें एमवीए को अस्थिर करने के लिए कुछ तो करना ही था। लेकिन भाजपाबीजेपी यह नहीं देख पाती है कि महाराष्ट्र के लोग एमवीए की ओर इसलिए नहीं झुक रहे हैं कि वह क्या कर रही है बल्कि इसलिए क्योंकि वे बीजेपी की चालों से तंग आ चुके हैं जिसने 2019 के बाद से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हर तरह के हथकंडे अपनाए हैं।’
सूत्र बताते हैं कि बीजेपी के आंतरिक सर्वेक्षणों ने चार फोकस राज्यों के तौर पर बंगाल, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र की पहचान की है जहां से उनके पास लगभग 135-140 लोकसभा सीटें हैं। महाराष्ट्र अकेला ऐसा राज्य है जहां वे अपनी लोकसभा सीटें बरकरार रखने की उम्मीद कर सकते हैं। दक्षिण भारत में उनकी संभावनाएं सही मायने में कम हैं और मध्य और उत्तर भारत में मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों की जो स्थिति है, वे किसी भी दिशा में जा सकते हैं। आरामदायक बहुमत जुटाने के लिए, बीजेपी को इन राज्यों में बड़ी जीत हासिल करनी होगी, इसी वजह से यह हताशा भरा खेल है। 2019 में बीजेपी-शिवसेना ने 48 में से 42 सीटें जीती थीं जिनमें सेना की सीटों की संख्या 18 थी। अखबारी रिपोर्टों की छोडि़ए, ऐसा लगता है कि बीजेपी मानने लगी है कि शिंदे उन्हें पांच से ज्यादा सीटें नहीं जिता सकते।
देशपांडे कहते हैं, ‘इंतजार कीजिए और देखिए। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, अजित पवार के भी बीजेपी के लिए बोझ बन जाने की संभावना है।’ वह कहते हैं कि एनसीपी का वोट बैंक सेकुलर है और पहले भी शिवसेना समेत भगवा खेमे से जब भी नजदीकियां बनीं, उसका नुकसान एनसीपी को हुआ।
इसके अलावा राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाडऩे की बीजेपी की कोशिशों का भी उलटा असर हुआ है। ध्रुवीकरण का असर यह हुआ कि मुस्लिम वोट आम तौर पर एमवीए के पक्ष में एकजुट होते दिख रहे हैं, खास तौर पर उद्धव की शिवसेना के पक्ष में। जाहिर तौर पर, अपनी पार्टी को एक सहिष्णु हिन्दुत्व की ओर ले जाने के बारे में उद्धव के सार्वजनिक बयानों ने मुसलमानों के संशयों को काफी हद तक दूर किया है। मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने विधानसभा में इस बात के लिए माफी मांगी कि उन्होंने धर्म को राजनीति से मिलाया और फिर रमजान के दौरान मुसलमानों को परेशान करने की बीजेपी की कोशिशों का पूरी ताकत से मुकाबला किया और इस तरह ‘हिन्दुत्व का गद्दार’ करार दिए जाने तक का भी जोखिम उठाया।
पिछली जनगणना के अनुसार, राज्य में मुस्लिमों की आबादी 12 फीसदी है और यह वोट निश्चित रूप से बीजेपी के खिलाफ जा रहा है। दलित 20 फीसदी हैं और उनकी आबादी ज्यादातर विदर्भ और मराठवाड़ा में केन्द्रित हैं। आम तौर पर कांग्रेस और एनसीपी के साथ रहने वाले मराठा लगभग 30-32 फीसदी हैं।
बीजेपी की राजनीतिक चालों का विश्लेषण करते हुए देशपांडे कहते हैं- ‘उन्हें इस वोट बैंक में सेंध मारनी होगी लेकिन इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया होने की संभावना है।’ राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई का मानना है कि इन तमाम हथकंडों के बाद भी एमवीए वोट बरकरार रहेगा।
पहली नजर में, उद्धव की शिव सेना और शरद पवार की एनसीपी दोनों संकट में हैं और राजनीतिक इकाई के रूप में कमजोर दिख रही हैं लेकिन एमवीए गठबंधन के पक्ष में वोट स्विंग कराने की उनकी क्षमता को निश्चित ही नई बढ़त मिली है। उनके पास अब साथ रहने के बेहतर कारण हैं और यदि वे ऐसा करते हैं, तो संभवत: उन्हें मतदाताओं की सहानुभूति का भी लाभ मिलेगा। (navjivanindia.com)
-ध्रुव गुप्त
दो साल पहले आज ही के दिन दिलीप कुमार के जाने के साथ हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की आखिरी कड़ी भी टूट गई थी। उनके जाने से साथ उनके अभिनय के कई-कई आयाम देख चुके कई-कई पीढ़ियों के लोग भावनात्मक तौर पर दरिद्र हुए। पिछली सदी के चौथे दशक में उनका उदय भारतीय सिनेमा की ऐसी घटना थी जिसने सिनेमा की दिशा ही बदल दी थी। अति नाटकीयता के उस दौर में वे पहले अभिनेता थे जिन्होंने साबित किया कि बगैर शारीरिक हावभाव और संवादों के सिर्फ चेहरे की भंगिमाओं, आंखों और यहां तक कि ख़ामोशी से भी अभिनय किया जा सकता है।
अभिनय का वह अंदाज़ शोर में आहिस्ता,-आहिस्ता उठता एक मर्मभेदी मौन जैसा था जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को अपने साथ बहा ले गया।अपनी छह दशक लंबी अभिनय-यात्रा में उन्होंने अभिनय की जिन ऊंचाईयों और गहराईयों को छुआ वह समूचे भारतीय सिनेमा के लिए असाधारण बात थी। हिंदी सिनेमा के शुरुआती तीन महानायकों में जहां राज कपूर को प्रेम के भोलेपन के लिए और देव आनंद को प्रेम की शरारतों के लिए जाना जाता है, दिलीप कुमार के हिस्से में प्रेम की व्यथा आई थी। इस व्यथा की अभिव्यक्ति का उनका अंदाज़ कुछ ऐसा था कि दर्शकों को उस व्यथा में भी एक ग्लैमर नज़र आने लगा था। इस अर्थ में दिलीप कुमार पहले अभिनेता थे जिन्होंने प्रेम की असफलता की पीड़ा को स्वीकार्यता दिलाई। 'देवदास' उस पीड़ा का शिखर था।
आज भी उदासी जैसे मर्ज़ की थेरेपी लेनी हो तो दिलीप साहब की फिल्मों से बेहतर कोई और नर्सिंग होम नहीं। खिराज़-ए-अक़ीदत।
- डॉ.आर.के. पालीवाल
मानव विकास के क्रम में धर्म की कल्पना तब की गई थी जब मनुष्य धरती के अन्य जानवरों से अलग एक बेहतर जीवन जीने की कोशिश में अपने अर्द्ध जंगली कबीलों को विकसित कर रहा था ताकि वह अपने जीवन को खाने, सोने और प्रजनन के अलावा थोड़ा सुखमय, शान्तिमय और सार्थक बना सके। इसी पृष्ठभूमि में धरती के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग धर्मों की शुरुआत हुई। यही कारण है कि बाहरी कर्मकांड अलग अलग होते हुए भी सभी धर्मों के आंतरिक तत्व एक जैसे ही हैं जिन्हें हम धर्मों के मूल तत्व, नैतिक मूल्य या आध्यात्मिक सिद्धांतों के नाम से जानते हैं।
मानव जीवन और मानव समाज की बेहतरी के लिए शुरू हुई धर्म की लम्बी यात्रा हमारे समय तक पहुंचते पहुंचते अजीब सी पाशविक बीहड़ता में प्रवेश कर गई है। कालांतर में धर्म के आवरण में छिपे कुछ स्वार्थी तत्वों और सत्ता के लालची राजनीतिज्ञों के नापाक गठबंधनों के कारण धर्म समय समय पर अपने मूल रूप से विकृत होता रहा है। विभिन्न धर्मों की विकृतियों के कारण ही कई विभूतियों ने विभिन्न धर्म की विकृतियों को दूर करने के लिए नए नए धर्मों की शुरुआत की है। भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू धर्म की जड़ों से निकले बौद्ध, जैन और सिख धर्म और इस्लामिक मूल से निकले पारसी और ईसाई आदि धर्म विकसित हुए थे। अमूमन हर धर्म में एक शाखा उदारवाद की प्रवर्तक रही है और दूसरी कट्टरता की। भारतीय उपमहाद्वीप की ही बात करें तो इस्लाम की सूफी परंपरा धर्मों और संस्कृतियों के संगम की वकालत करती है तो देवबंदी सुन्नी परंपरा से तालिबान अपना नाता जोड़ते हैं। हिंदू धर्म में भी एक वक्त शैव और वैष्णव संप्रदाय एक दूसरे के आमने सामने युद्धरत अवस्था में रहते थे जिन्हें आदि शंकराचार्य ने एक दूसरे के साथ सह अस्तित्व की सीख दी थी।
आजकल हमारे देश में फिर से धर्म के अम्ल में राजनीति घोली जा रही है। कर्नाटक चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए धर्म सबसे सशक्त नैया बन गया था। वहां राजनीति का घृणित चेहरा सामने आया है । भाजपा का तो धर्म पहला और आखिरी हथियार है ,उनकी रणनीति के बरक्स कांग्रेस भी इस खेल में शामिल हो गई जो कांग्रेस के दिवालियेपन का ही प्रमाण है । राजीव गांधी के शाहबानो मामले में हस्तक्षेप और राम जन्मभूमि पर पूजा शुरू कराने से कांग्रेस को कोई लाभ नहीं हुआ न भविष्य में होगा । बेहतर है वह राजनीति में धर्म से दूरी के सिद्धांत पर दृढ़ रहे। देश का बड़ा वर्ग धर्म को व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रखना चाहता है , उसका उसे समर्थन रहेगा । यह देश का दुर्भाग्य है कि भाजपा के धार्मिक उदघोषों का उत्तर उसी तरह देने का प्रयास दूसरे दल भी करते हैं ।कभी राहुल गांधी शिवभक्त और जनेऊधारी ब्राह्मण बन जाते हैं और कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार प्रदेश में अनेक हनुमान मंदिर बनवाने का वायदा करते हैं । इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार श्री राम वन गमन पथ के विकास की घोषणा करती है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी जय श्री राम की टक्कर में जय बजरंग बली कहकर बुज़ुर्गों को मुफ़्त तीर्थयात्रा कराती है। बंगाल में ममता बनर्जी दुर्गा सप्तशती पाठ का जप करने लगती हैं । उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव परशुराम को याद करते हैं। सब राजनीतिक दल एक दूसरे से दो कदम ज्यादा धार्मिक हो रहे हैं।
धार्मिक कट्टरता के सहारे भारत जैसा धार्मिक विविधता वाला देश नहीं विकास नहीं कर सकता, यह बात देश के तमाम दलों और सामान्य नागरिकों को समझनी होगी ।भाजपा यदि धर्म की आड़ में अन्य मुद्दों को दबाने की कोशिश करती है तो विपक्ष को उस चक्रव्यूह में उलझने की जगह बड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो सबको प्रभावित कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने भी तय कर लिया है कि भारतीय जनता पार्टी को अकेले अस्सी प्रतिशत हिंदुओं का प्रतिनिधि नहीं बनने देंगे। जैसे भाजपा ने कांग्रेस से सरदार पटेल छीन लिया, लगता है अब कांग्रेस भाजपा से हिंदुत्व छीनने की मुद्रा में है ।उसी का अनुसरण समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और आप कर रही हैं। यह माहौल विभिन्न दलों को कुछ सीट ज्यादा दिला सकता है लेकिन यह माहौल राष्ट्रहित के लिए उचित नहीं है।
कनाडा में खालिस्तान समर्थकों के विरोध प्रदर्शनों और राजनयिकों के खिलाफ हिंसा की धमकियों के बाद दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों में तल्खी के संकेत मिलने लगे हैं।
भारत के खिलाफ प्रदर्शनों और राजनयिकों को हिंसा का शिकार बनाने की अपील करने वालों से जुड़े सवालों पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने कहा कि उनकी सरकार ने हमेशा से हिंसा और धमकियों को बेहद गंभीरता से लिया है।
उनका कहना था कि कनाडा ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ गंभीर कार्रवाई की है।
गुरुवार को ट्रुडो भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के उस बयान पर टिप्पणी कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि कनाडा में खालिस्तानियों की हरकतें इसलिए बढ़ रही हैं, क्योंकि वो वोट बैंक की सियासत का हिस्सा हैं।
कनाडा में पिछले कुछ महीनों के दौरान खालिस्तान समर्थक तत्वों ने भारत विरोधी कई प्रदर्शन किए हैं। पिछले दिनों भारत ने अपने खिलाफ ऐसे तत्वों के पोस्टर, प्रॉपेगैंडा सामग्रियों और भारतीय राजनयिकों को धमकी के बाद नई दिल्ली में कनाडा के हाई कमिश्नर को समन किया था।
कनाडाई प्रधानमंत्री ने क्या कहा?
इस बीच, 8 जुलाई को खालिस्तान समर्थकों के संभावित प्रदर्शन से पहले भारत ने कहा है कि कनाडा में चरमपंथ और आतंकवाद को सही ठहराने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग हो रहा है।
गुरुवार (6 जुलाई 2023) को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भारतीय राजनयिकों को खालिस्तान समर्थकों की ओर से दी जा रही धमकी पर नाराजग़ी जताई और कनाडा सरकार से इन पर लगाम लगाने की अपील की है।
खालिस्तान समर्थकों ने एक पोस्टर जारी कर कनाडा में भारतीय राजनयिकों संजय कुमार वर्मा और अपूर्व श्रीवास्तव पर खालिस्तान टाइगर फोर्स के चीफ हरदीप सिंह निज्जर को मरवाने का आरोप लगाया था। खालिस्तान समर्थक, निज्जर की याद में 8 जुलाई को कनाडा में रैली कर रहे हैं।
कनाडा में इस रैली को लेकर खालिस्तान समर्थकों की सक्रियता को देखते हुए भारतीय विदेश मंंत्रालय ने अपने बयान में कहा, ‘’ये पोस्टर विदेश में हमारे राजनयिकों और दूतावासों पर हमला करने को उकसा रहे हैं। ये हमें किसी भी हाल में मंज़ूर नहीं है। ये मामला भारत और कनाडा दोनों जगह मौजूद कनाडाई अधिकारियों के सामने उठाया गया है। हमने कनाडा सरकार से भारत के राजनयिकों और राजनयिक मिशनों को सुरक्षा देने की अपील की है। ‘
हालांकि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने इस मामले में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘वे गलत हैं। हमारा देश काफी विविधता भरा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हम काफी महत्व देते हैं। लेकिन हम हमेशा ये सुनिश्चित करेंगे कि हिंसा और हर तरह के अतिवाद के खिलाफ कार्रवाई हो।’
‘अभिव्यक्ति की आजादी’ को लेकर आमने-सामने
ट्रुडो ने खालिस्तान समर्थकों के प्रदर्शनों के संबंध में अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा जो बयान दिया है वो भारत को रास नहीं आया है।
अरिंदम बागची ने गुरुवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘ये अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल नहीं है। इसका इस्तेमाल हिंसा, अलगाववाद और आतंकवाद को सही ठहराने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने इसके लिए अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तान समर्थक तत्वों को दिए जा रहे कथित समर्थन का मुद्दा भी उठाया।’
ब्रिटेन ने भारत को दिया सुरक्षा का भरोसा
हालांकि, गुरुवार को ही ब्रिटेन के विदेश मंत्री जेम्स क्लेवरली ने भारत के राजनयिक मिशनों पर हमलों के सिलसिले में सुरक्षा का आश्वासन दिया है।
शनिवार को यहाँ के प्रमुख शहरों में आयोजित होने वाली खालिस्तान समर्थकों के रैलियों के दौरान भी उन्होंने भारत को सुरक्षा का आश्वासन दिया।
उन्होंने कहा, ‘’लंदन में भारतीय हाई कमीशन पर कोई भी सीधा हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हमने हाई कमिश्नर विक्रम दोरईस्वामी और भारत सरकार को साफ कहा है कि हाई कमीशन की सुरक्षा सर्वोपरि है।’’
लंदन में खालिस्तान समर्थकों ने 19 मार्च को भारतीय मिशन से जुड़ी एक बिल्डिंग में लहरा रहे तिरंगे को नीचे गिरा दिया था। उस दौरान मिशन के कांच के दरवाजे को भी तोड़ दिया गया था जो अभी तक टूटा ही हुआ है।
इस हमले के बाद भारत सरकार ने कहा था कि ब्रिटेन भारतीय मिशनों की सुरक्षा को लेकर उसकी चिंताओं पर ध्यान नहीं दे रहा है।
भारत ने इसके जवाब में नई दिल्ली में ब्रिटिश हाई कमिश्नर एलेक्स एलिस की सुरक्षा घटा दी थी।
भारत की चिंता क्यों बढ़ती जा रही है?
कनाडा में खालिस्तान समर्थकों के भारत विरोधी रुख को देखते हुए रॉयल कैनिडियन माउंटेड पुलिस ने भारतीय राजनयिकों और राजनयिक मिशनों को सुरक्षा मुहैया कराई है।
लेकिन कनाडा में अलगाववादी सिखों की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। कनाडा में बड़ी तादाद में सिख मौजूदा ट्रुडो सरकार के समर्थक हैं। कहा जाता है कि इसिलिए सरकार अब तक सिख चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने से बचती रही है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी इसी की ओर इशारा कर रहे हैं।
ट्रुडो के हालिया बयान से पहले तक कनाडा के विदेश और रक्षा मंत्री खालिस्तान समर्थकों को भारत विरोधी प्रदर्शन और हिंसा पर औपचारिक बयान ही जारी करते रहे हैं।
ट्रुडो और यहाँ तक कि कनाडा के कंजर्वेटिव विपक्षी दल के नेता ने भी भारतीय राजनयिकों को निशान बनाए जाने की खुली धमकी पर कुछ नहीं बोला है।
कनाडा में भारतीय मूल के 24 लाख लोग हैं। इनमें से सात लाख सिख हैं। ये लोग ज्यादातर ग्रेटर टोरंटो, ग्रेटर बैंकुवर, एडमोंटन और कैलगरी में बसे हुए हैं। इन्हें एक बड़े वोट बैंक के तौर पर देखा जा रहा है।
हाल के दिनों में कनाडा में भारत के ख़िलाफ प्रदर्शनों, इसके राजयनिकों को दी जा रही धमकी और मिशनों पर हमले ने भारत को चिंतित कर दिया है।
पिछले दिनों हुए कुछ प्रदर्शनों के बाद अब एक बार फिर सिख फोर जस्टिस के संयोजक जी एस पन्नु ने 19 जून को मारे गए चरमपंथी हरदीप सिंह निज्जर के समर्थन में टोरंटो और बैंकुवर में भारतीय मिशनों के खिलाफ प्रदर्शन की अपील की है।
सिख फोर जस्टिस 16 जुलाई ग्रेटर टोरंटो और सितंबर में ग्रेटर बैंकुवर में खालिस्तान समर्थक रेफरेंडम कराने की योजना बना रहा है।
हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक बैंकुवर में निज्जर और ब्रिटेन में अवतार सिंह खांडा की गैंग-वॉर में मौत के बाद पन्नु की सक्रियता बढ़ गई है।
कहा जा रहा है कि वो 8 जुलाई की रैली में दिख सकते हैं। पहले ये ख़बर आई थी कि पन्नु की बुधवार को अमेरिका के सडक़ हादसे में मौत हो गई है। हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल इस खबर की पुष्टि नहीं हो पाई है।
कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी में भारत विरोध प्रदर्शन करने वाले खालिस्तान समर्थक संगठनों ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार उनके नेताओं को मरवा रही है। कहा जा रहा है कि इन संगठनों को पाकिस्तान का समर्थन मिल रहा है।
कनाडा में सिखों का बढ़ता राजनीतिक असर
कनाडा में सिखों की लगातार बढ़ती आबादी के बाद वे अब प्रमुख वोट बैंक के तौर पर उभरे हैं। स्थानीय परिषदों और कनाडाई संसद दोनों जगह अब कई सिख सांसद हैं।
लेकिन लंबे समय से यहां खालिस्तान समर्थक सिख अलगाववादियों की सक्रियता काफी बढ़ गई है। इसकी जड़ें यहां पहले से रही हैं। 1985 में खालिस्तान समर्थक चरमपंथियों ने ने एयर इंडिया के एक विमान को बम से उड़ा दिया था। विस्फोट में इसमें सवार 268 कनाडाई नागिरक समेत सभी 329 लोग मारे गए थे।
पिछले दिनों जिस तरह से यहां भारत विरोधी प्रदर्शन हुए उससे कनाडा और भारत के राजनयिक रिश्ते तल्ख होते जा रहे हैं।
कनाडा की आबादी धर्म और नस्ल के आधार पर काफ़ी विविध है। जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 2016 में कनाडा की कुल आबादी में अल्पसंख्यक 22.3 फीसदी हो गए थे।
वहीं 1981 में अल्पसंख्यक कनाडा की कुल आबादी में महज 4.7 फीसदी थे। इस रिपोर्ट के अनुसार 2036 तक कनाडा की कुल आबादी में अल्पसंख्यक 33 फ़ीसदी हो जाएंगे।
‘वॉशिगंटन पोस्ट’ से कॉफ्रेंस बोर्ड ऑफ कनाडा के सीनियर रिसर्च मैनेजर करीम ईल-असल ने कहा था, ‘किसी भी प्रवासी के लिए कनाडा सबसे बेहतर देश है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह मुल्क प्रवासियों को भी अवसर की सीढ़ी प्रदान करता है और लोग इससे कामयाबी की ऊंचाई हासिल करते हैं।’
कनाडा खालिस्तान समर्थक जनमत सर्वेक्षणों से यहाँ रहने वाले सिखों और हिंदुओं को बीच अलगाव भी बढ़ रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस वजह से यहां ब्रिटेन के लिसेस्टर में हिंदू और मुस्लिमों के बीच हिंसक संघर्ष की तरह हिंदू और चरमपंथी सिखोंं के बीच संघर्ष देखने को मिल सकता है।
छह जून को ऑपरेशन ब्लू स्टार की 39 वीं बरसी से कुछ दिनों पहले कनाडा के ब्रैंपटन शहर में पांच किलोमीटर लंबी एक यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा के दौरान एक चलती हुई गाड़ी पर इंदिरा गांधी की हत्या का दृश्य दिखाया गया।
गौरतलब है कि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्तूबर 1984 को उनके दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।
भारत के विदेश मंत्री एस। जयशंकर ने कनाडा में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या का जश्न मनाए जाने पर कड़ी टिप्पणी की थी।
पहली बार सिख कनाडा कब और कैसे पहुंचे?
1897 में महारानी विक्टोरिया ने ब्रिटिश भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी को डायमंड जुबली सेलिब्रेशन में शामिल होने के लिए लंदन आमंत्रित किया था। तब घुड़सवार सैनिकों का एक दल भारत की महारानी के साथ ब्रिटिश कोलंबिया के रास्ते में था। इन्हीं सैनिकों में से एक थे रिसालेदार मेजर केसर सिंह। रिसालेदार कनाडा में शिफ्ट होने वाले पहले सिख थे।
सिंह के साथ कुछ और सैनिकों ने कनाडा में रहने का फैसला किया था। इन्होंने ब्रिटिश कोलंबिया को अपना घर बनाया। बाकी के सैनिक भारत लौटे तो उनके पास एक कहानी थी। उन्होंने भारत लौटने के बाद बताया कि ब्रिटिश सरकार उन्हें बसाना चाहती है। अब मामला पसंद का था। भारत से सिखों के कनाडा जाने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ था। तब कुछ ही सालों में ब्रिटिश कोलंबिया 5000 भारतीय पहुंच गए, जिनमें से 90 फीसदी सिख थे।
हालांकि सिखों का कनाडा में बसना और बढऩा इतना आसान नहीं रहा है। इनका आना और नौकरियों में जाना कनाडा के गोरों को रास नहीं आया। भारतीयों को लेकर विरोध शुरू हो गया था। (bbc.com/hindi)
डॉ.आर.के. पालीवाल
हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने और अपनी ही पीठ थपथपाने वाली जमात बनते जा रहे हैं। हमसे अपना देश संभल नहीं रहा और सपने विश्व गुरु बनने के पाल रहे हैं जो उन्हीं असंभव सी परिस्थितियों में संभव हो सकता है जब विश्व में अधिकतर मापदंडों में हमसे ज्यादा आगे चल रहे देश हमसे भी बुरी आदतों को आत्मसात कर लें। हमारे आजादी के आंदोलन के तमाम बड़े नायक, मसलन महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरु आदि पश्चिम के लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी, समानता और बंधुता के विचार से काफ़ी प्रभावित थे। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी विशेष रूप से फ्रांस की क्रांति के बड़े समर्थक थे और वैसी ही समानता और बंधुता की कामना आजाद भारत के लिए करते थे।
दुर्भाग्य से हमने जिन यूरोपीय देशों से संविधान में लोकतान्त्रिक व्यवस्था ली है, कालांतर में हम उन पश्चिमी देशों की प्रगतिशील परंपराओं को आत्मसात नहीं कर पाए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जब घर से ऑफिस आते जाते हैं तो उनके लिए गाडिय़ों का काफिला नहीं चलता और रास्तों का ट्रैफिक नहीं रोका जाता। उनकी सरकारी कार खराब होने पर वे पास की मेट्रो पकडक़र अपने गंतव्य पर पहुंच जाते हैं। वहां प्रधानमंत्री के बेटे का चालान काटते हुए एक पुलिस कांस्टेबल के हाथ जरा भी नहीं थरथराते। इसके बरक्स जब हम अपने प्रधानमंत्री का काफिला देखते हैं तो शर्म आती है कि अस्सी करोड़ लोगों के गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले देश के प्रधानमंत्री किस तरह पुराने राजे महाराजों की शान से चलते हैं। हमारे देश में प्रधानमन्त्री तो दूर सत्ताधारी दल के सासंद के खिलाफ कार्रवाई करने में कैसे पुलिस बल हिम्मत नही जुटा पाता।
फ्रांस की ही बात करें तो वहां के राष्ट्रपति अपने देश में हिंसक वारदात होने पर महत्त्वपूर्ण विदेशी दौरा बीच में छोडक़र अपने देश आ जाते हैं और अपनी आगामी विदेश यात्रा स्थगित कर देते हैं। हमारे यहां मणिपुर प्रदेश हिंसा की आग में जल रहा है लेकिन प्रधानमंत्री न अमेरिका और मिस्र का दौरा स्थगित करते हैं और न मणिपुर के लोगों के घावों पर मरहम लगाने वहां जाते हैं। इस दौरान वे मध्य प्रदेश में पांच दिन में दो दौरे करते हैं। उनके लिए अपनी पार्टी के विधानसभा चुनाव की शुरुआत के लिए अपने बूथ कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में शामिल होना पहली प्राथमिकता है। मणिपुर में आंदोलन के केंद्र में आदिवासी हैं। वहां मैतेई समुदाय आदिवासी दर्जा मांग रहा है और आदिवासी दर्जा प्राप्त कुकी और नगा उन्हें आदिवासी दर्जा देने का विरोध कर रहे हैं। वहां जाकर आदिवासी समस्या को सुलझाने की बजाय प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश के आदिवासियों के वोटों के लिए अपने दल को आदिवासियों का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं। प्रधानमंत्री की कथनी और करनी में इतना अंतर नहीं होना चाहिए।
मणिपुर के हालात बहुत चिंताजनक हैं लेकिन प्रधानमन्त्री वहां जाने के बजाय मध्य प्रदेश के आदिवासियों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। मध्य प्रदेश में जल्द चुनाव होने हैं। इन चुनावों का असर यहां की कई लोकसभा सीटों के चुनाव पर भी पड़ेगा। इसीलिए मणिपुर के आदिवासियों की तुलना में मध्य प्रदेश के आदिवासी ज्यादा महत्वपूर्ण बन गए हैं। जब हम संविधान के सर्व धर्म समभाव की भावना को ताक पर रखकर किसी धर्म विशेष की राजनीति करने लगते हैं तब आदिवासी समुदाय को देखने का पैमाना भी बदलने लगता है। मणिपुर और पूर्वोत्तर के काफ़ी आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है। इस लिहाज से वे धार्मिक चश्में से गैर ईसाई आदिवासियों से अलग हो जाते हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, और केन्द्रीय मंत्रियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे किसी खास धर्म,जाति, क्षेत्र, विचारधारा और वर्ग के बजाय पूरे देश का नेतृत्व करते हैं, तभी मध्य प्रदेश और मणिपुर एक समान दिखाई दे सकते हैं।
हिमांशु कुमार
शीबा नकवी फेसबुक पर मेरा भी लिखा हुआ पढ़ती हैं, शीबा मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पढ़ाती हैं, शीबा बेहद मीठा बोलने वाली शांत सी महिला हैं, उन्होंने एक बहुत मजेदार किस्सा सुनाया, उन्होंने बताया कि एक बार उनकी कालोनी में लाऊडस्पीकर से आवाज आई।
एक बच्चा गुम हो गया था उसकी सूचना दी जा रही थी, रात का समय था, शीबा ने अपने बच्चों से कहा आओ हम सब दुआ करें कि मौला उस बच्चे को अपने माँ बाप से मिला दे, शीबा की बेटी ने कहा मम्मी आपने सुना नहीं वो बच्चा हिन्दू है मौला उसकी मदद कैसे करेंगे ?
शीबा ने अचरज से अपने बच्चों से पूछा कि क्यों मौला उसकी मदद क्यों नहीं करेंगे ?
शीबा की बेटी ने कहा उसकी मदद तो हनुमान जी करेंगे, शीबा ने कहा कोई बात नहीं मौला भी हिन्दू बच्चे की मदद कर सकते हैं,
शीबा की बेटी ने पूछा क्या हनुमान जी हमारी मदद करेंगे ?
शीबा ने कहा हाँ कर सकते हैं, सुनाते समय शीबा की आँखों में एक रोशनी थी, और मैं नास्तिक होते हुए भी नमी भरी आँखों से यह किस्सा सुन रहा था, शीबा चली गईं, लेकिन मेरे दिल में मुसलमानों की छवि और बेहतर कर गईं, मैं एक समाजसेवी बहन से मिला, उन्होंने एक मजेदार किस्सा बताया, दोस्तों का एक दल ऋषिकेश घूमने गया था, गंगा के किनारे नंगे पांव घूमते समय रवि नाम के युवक के पांव में गंगा के किनारे फेकी गयी बियर की बोतल का कांच का टुकड़ा घुस गया, पाँव में से खून बहने लगा, साथ में आये हुए दोस्तों ने मदद करने की कोशिश करी, लेकिन कोई साधन मौजूद नहीं था इसलिए खून का बहना नहीं रोक पा रहे थे, तभी लम्बे कुरते और ऊंचे पजामे और लम्बी दाढ़ी वाले एक मुस्लिम सज्जन वहाँ आ गए, वह मुस्लिम सज्जन अपने गले में पड़े हुए चारखाने वाले स्कार्फ को उतार कर गंगा जल में गीला कर के रवि के पांव में लपेट कर खून रोकने की कोशिश करने लगे, लेकिन खून बहता ही जा रहा था,वह मुस्लिम सज्जन लगातार कोशिश करते रहे, उस मुसलमान व्यक्ति ने रवि का खून रोकने की कोशिश करते हुए कहा कि आप हनुमान चालीसा पढ़ते रहिये आपको आराम आएगा।
रवि ने पूछा आप हनुमान चालीसा पढने के लिए क्यों कह रहे हैं ? अल्लाह का नाम ना लूं ?
उन मुस्लिम सज्जन ने रवि से कहा, आपका विश्वास ऊपर वाले के जिस नाम में है आपको वही नाम आराम पहुंचाएगा, हम पुकारने वाले बंदे अलग अलग हैं लेकिन सुनने वाला तो एक ही है, रवि भाजपा का कार्यकर्ता है।
ऋषिकेश से वापिस आते समय कार में रवि के दोस्त उससे मज़ाक कर रहे थे कि बेटा तू तो मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बोलता था अब बता ?
अब रवि एक बदले हुए इंसान के रूप में ऋषिकेश से वापिस लौटा है, इसी के साथ मुझे बिहार की वो घटना याद आयी जिसमें हमारे दोस्त अतहरुद्दीन के परिवार को धमका कर बजरंग दल ने जय श्री राम के नारे लगवाए और हिन्दू धर्म को बदनाम किया।
आप अपने कामों से अपने धर्म को अच्छा नाम भी दिलवा सकते हैं और उसे बदनाम भी कर सकते हैं,
फैसला आप को करना है कि आप अपने धर्म को गुंडागर्दी के द्वारा नष्ट करेंगे,
या उदारता के व्यवहार द्वारा अपने धर्म के लिए इज्जत और प्यार कमायेंगे ?
प्रेरणा
बीते दो मई को शरद पवार ने अचानक एक कार्यक्रम में एनसीपी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी थी। उनके इस्तीफे की घोषणा के बाद कई तरह के कयास लगाए जाने लगे। पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल से सवाल किया गया कि क्या शरद पवार ने ये फ़ैसला पार्टी में चल रही आतंरिक राजनीति के कारण लिया है?
जवाब में प्रफुल्ल ने कहा था, ‘पार्टी एकजुट है। हम सभी शरद पवार के नेतृत्व में साथ हैं।’ लेकिन अब न तो पार्टी एकजुट है और न ही शरद पवार का नेतृत्व बरकरार है। बदली परिस्थितियों में प्रफुल्ल पटेल ये भी कह चुके हैं कि शरद पवार के फ़ैसले अब पार्टी के फैसले नहीं हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति को करीब से देखने और समझने वालों के लिए प्रफुल्ल पटेल का यह बदला रुख किसी धक्के से कम नहीं है।
अजित पवार, जिनके नेतृत्व में प्रफुल्ल पटेल ने शरद पवार की छत्रछाया छोडऩे का निर्णय लिया, उनकी एक महत्वकांक्षी नेता की छवि जरूर रही है। पर प्रफुल्ल पटेल शरद पवार का दामन छोड़ेंगे, इसका अंदेशा किसी को नहीं था। शायद, शरद पवार को भी नहीं।
हालांकि प्रफुल्ल पटेल ने अब भी शरद पवार को अपना गुरु बताया है। उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा था, ‘शरद पवार मेरे गुरु हैं। वो हमारे मार्गदर्शक हैं।।।हम हमेशा उनका और उनके पद का आदर और सम्मान करेंगे, वह हम सभी के लिए एक पिता तुल्य हैं।’
लेकिन इतनी करीबी होते हुए भी प्रफुल्ल ने शरद पवार से अपने रास्ते अलग क्यों कर लिए?
वफादारी से बगावत तक
वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी इसके पीछे की वजह समझाते हैं।
वह कहते हैं, ‘प्रफुल्ल पर ईडी और दूसरी सरकारी एजेंसियों ने बीते दिनों कार्रवाई शुरू कर दी थी। पिछले दिनों ईडी ने वर्ली स्थित उनकी कुछ संपत्तियों को भी ज़ब्त किया था। आज की तारीख़ में प्रफुल्ल पटेल के पास मुंबई की सबसे रेंटेड जगह का मालिकाना हक है।’
‘वर्ली में उनकी कई संपत्तियां हैं और मुंबई के ये सबसे महंगे इलाकों में एक है। ऐसे में लग रहा था कि शरद पवार अपने रसूखों के बूते प्रफुल्ल पटेल को इस तक़लीफ़ से निकाल लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था और प्रफुल्ल पटेल की दिक्कतें बढ़ती जा रही थीं।’
‘भोपाल में पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने जब अपने एक बयान में कहा कि वो एनसीपी के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करेंगे, तब इनका डर और बढ़ गया और उन्होंने अजित पवार के साथ महाविकास अघाड़ी को छोडऩे का फैसला कर लिया।’
बीबीसी के सीनियर एडिटर आशीष दीक्षित भी ईडी के बढ़ते शिकंजे को इसकी एक बड़ी वजह मानते हैं।
आशीष कहते हैं, ‘भले ही शरद पवार ने कुछ दिनों पहले प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया था, लेकिन जिन प्रदेशों की जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी, जैसे- हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि...अगर उन पर आप गौर करें तो समझ आएगा कि उन राज्यों में तो पार्टी का कोई वजूद ही नहीं है। तो, प्रफुल्ल पटेल क्या करते? यहां इनको क्या मिलता?’
‘जवाब है- कुछ भी नहीं’।
अजित पवार के साथ जाने से क्या फायदा?
बगावत के बाद अजित पवार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बन गए हैं और प्रफुल्ल पटेल ने सुनील तटकरे को पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।
लेकिन प्रफुल्ल पटेल को क्या मिला? उनकी क्या भूमिका होगी? इस सवाल के जवाब में बीबीसी के सीनियर एडिटर आशीष दीक्षित तीन संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं।
संभव है कि प्रफुल्ल पटेल को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिल जाए। मोदी कैबिनेट में फेरबदल पहले से तय हैं, ऐसे में ये संभावना है कि उनकी इस कैबिनेट में एंट्री हो।
प्रफुल्ल पटेल पर ईडी के जो भी मामले चल रहे हैं, जो कार्रवाइयां हो रही हैं, वो रुक जाए और सरकारी एजेंसियों के शिकंजे से वो बच जाएं।
आशीष कहते हैं, ‘हमने पहले भी देखा है कि कोई भी विपक्ष का नेता अगर बीजेपी में शामिल होता है तो उसे ऐसे मामलों में राहत मिल जाती है।’
‘तीसरा फायदा जो प्रफुल्ल पटेल को दिखा होगा, वो यह कि वह एक बिजनेसमैन हैं। उन्हें अपना बिजनेस चलाना है और व्यापार की रफ्तार को बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि वो सरकार में शामिल रहें। ताकि उनका कोई भी काम न रुके। एनसीपी के ज्यादातर नेता बिजनेस बैकग्राउंड से आते हैं, इसलिए टूट की एक वजह ये भी हो सकती है कि ये सभी सरकार का हिस्सा रहना चाहते हैं, विपक्ष का नहीं।’
शरद पवार को कितना नुकसान?
आशीष दीक्षित बताते हैं, ‘प्रफुल्ल पटेल एनसीपी के राष्ट्रीय चेहरा थे, उनकी महाराष्ट्र की राजनीति में कोई खास पकड़ नहीं है। इसे आप ऐसे समझें कि एनसीपी मराठाओं की पार्टी है और प्रफुल्ल पटेल तो महाराष्ट्र के हैं भी नहीं। साथ ही वो गोंदिया में रहते हैं, जो छत्तीसगढ़ से सटा इलाका है। इस इलाके में एनसीपी की राजनीतिक ज़मीन कुछ खास मजबूत भी नहीं है। इसलिए प्रदेश की राजनीति में प्रफुल्ल पटेल की भूमिका सीमित ही रही है।’
यही कारण है कि उनके जाने का पार्टी के वोट बैंक या वोटरों पर कोई सीधा असर होता नहीं दिखता, लेकिन हां, अगर आप इसे शरद पवार के संदर्भ में देखें, तो असल नुक़सान उनका है।
‘प्रफुल्ल पटेल को हमेशा शरद पवार का सबसे करीबी समझा गया। किसी भी पार्टी से, किसी भी मौके पर, एनसीपी की तरफ से जब भी बात करनी हो, प्रफुल्ल पटेल फ्रंट में होते थे। प्रफुल्ल पटेल जो कहते, उसे शरद पवार का कथन समझकर मान लिया जाता। वो पवार की परछाई की तरह थे।’
‘ऐसे कई मौक़े आए जब नेताओं ने पार्टी छोड़ी, एनसीपी कमज़ोर हुई पर हर बार प्रफुल्ल पटेल खड़े रहे। भले ही वो एनसीपी के मास लीडर नहीं थे, पर वो पार्टी को मैनेज कर रहे थे।’
आशीष कहते हैं, ‘अभी एक एनसीपी के नेता कह रहे थे कि जो विधायक एनसीपी छोडक़र गए हैं, उनके जैसे सैकड़ों विधायक शरद पवार पैदा कर सकते हैं। मैं उनकी इस बात से एक हद तक इत्तेफाक रखता हूं। शरद पवार एक रसूख वाले नेता हैं, वो बेशक ऐसे कई विधायक खड़े कर सकते हैं लेकिन एक दूसरा प्रफुल्ल पटेल खड़ा करना, जिसके दिल्ली में इतने कनेक्शन हों, सारी पार्टियों से अच्छे संबंध हों...बहुत मुश्किल है। उनके पास फि़लहाल प्रफुल्ल पटेल का कोई विकल्प नहीं है।
तभी जब पार्टी में दो फाड़ हुई तो शरद पवार ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में यही कहा कि मेरी नाराजग़ी केवल प्रफुल्ल पटेल और ताटकरे से है, और किसी से नहीं।
शरद पवार से करीबी की कहानी
प्रफुल्ल पटेल शरद पवार को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं और शरद पवार महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री रह चुके यशवंत राव चव्हाण को। यशवंत राव प्रफुल्ल पटेल के पिता मनोहर भाई के बेहद करीबी माने जाते थे।
राजनीतिक बैठकों में ये सभी एक साथ उठते-बैठते थे। ऐसे में शरद तक प्रफुल्ल की पहुंच आसान हो गई। पिता की मौत के बाद प्रफुल्ल ने न केवल पारिवारिक बिजनेस संभाला, उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और शरद उनके पॉलिटिकल गुरु बन गए।
वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी बताते हैं कि शरद पवार का हमेशा से रुझान बिजऩेस बैकग्राउंड से आने वाले नेताओं के प्रति रहा है।
एनसीपी में कई ऐसे नेता आपको मिल जाएंगे जिनके बड़े स्थापित बिजऩेस हैं, जैसे- छग्गन भुजबल। शरद पवार के इन शुभचिंतकों ने उन्हें आगे बढऩे में ख़ूब मदद की। प्रफुल्ल पटेल की परिवारिक पृष्ठभूमि ख़ुद व्यावसायिक रही है, इसलिए व्यावसायिक दृष्टिकोण के कारण प्रफुल्ल और शरद नज़दीक आए।
अजित पवार से रिश्ते
प्रफुल्ल हमेशा से शरद पवार के नजदीकी रहे हैं। अजित पवार से उनके न तो खराब और न ही बेहद अच्छे रिश्ते रहे। बदले घटनाक्रम में अब ये देखना होगा कि शरद के वफ़ादार अजित के कितने करीब बने रहते हैं।
राजनीतिक करियर
दिलचस्प है कि महाराष्ट्र और देश की राजनीति में एक सफल पारी खेलने वाले प्रफुल्ल पटेल का जन्म कोलकाता में हुआ, लेकिन उनका परिवार मूलत: गुजरात से है।
उन्होंने मुंबई के कैंपियन स्कूल से पढ़ाई की और फिर सिडेनहैम कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएट हुए।
आगे की पढ़ाई के लिए प्रफुल्ल हार्वर्ड जाना चाहते थे लेकिन मात्र 13 साल की उम्र में पिता के निधन के बाद और इकलौती संतान होने के कारण, उन्हें अपना पारिवारिक बिजनेस संभालना पड़ा। उनका बीड़ी और तंबाकू का बड़ा बिजऩेस है।
प्रफुल्ल पटेल के पिता मनोहरभाई पटेल एक बिजऩेसमैन होने के साथ ही साथ समाज सेवक और महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे।
महाराष्ट्र का गोंदिया भंडारा जिला उनकी राजनीति का केंद्र रहा।
पिता के दिखाए रास्ते पर ही चलते हुए प्रफुल्ल ने भी राजनीति में कदम रखा और साल 1985 में महाराष्ट्र के गोंदिया म्यूनिसिपल काउंसिल के प्रेसिडेंट बने।
फिर साल 1991, मात्र 33 साल की उम्र में कांग्रेस की टिकट पर गोंदिया-भंडारा सीट से लोकसभा के सांसद चुने गए।
साल 1991-1996 तक देश के केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री रहे।
साल 1996 और साल 1998 में भी कांग्रेस की टिकट पर भंडारा से लोकसभा सांसद चुनकर आए।
एनसीपी के गठन के बाद साल 2000 में प्रफुल्ल पटेल राज्यसभा सांसद चुने गए।
साल 2004 में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय का स्वतंत्र कार्यभार संभाला और साल 2006 में पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजा।
2009 में एनसीपी के टिकट से लोकसभा चुनाव लड़े, जीते और फिर केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री का पद संभाला।
2011 में उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्री बने।
साल 2014 में बीजेपी के नाना पटोले ने लोकसभा चुनाव में उन्हें कड़ी शिकस्त दी। जिसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा।
प्रफुल्ल पटेल 2022 में भी राज्यसभा के लिए चुने गए। इसके इतर साल 2009 में वो ऑल इंडिया पुटबॉल फेडरेशन (्रढ्ढस्नस्न) के अध्यक्ष भी चुने गए और साल 2022 में जब तक सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद से हटा नहीं दिया तब तक वे अध्यक्ष बने रहे।
किन मामलों में जांच का सामना कर रहे हैं प्रफुल्ल?
पटेल अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के कऱीबी गैंगस्टर इकबाल मिर्ची से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ईडी की जांच के दायरे में है। उन पर कार्रवाई भी हुई है। ईडी ने उनके सैकड़ों करोड़ रुपये से ज़्यादा की संपत्ति को जब्त भी किया है।
वहीं उनके खिलाफ एविएशन स्कैम मामले में भी जांच चल रही है। (bbc.com/hindi)
डॉ.आर.के. पालीवाल
दिल्ली पुलिस महिला पहलवानों के मामले में निश्चित रूप से भयंकर दबाव में रही है। इस दबाव का कितना प्रतिशत वह ख़ुद महसूस कर रही है और कितना प्रतिशत सरकार की तरफ़ से है यह तो कोई खोजी पत्रकार ही खोज सकता है या जांच दल के सदस्य और ईश्वर ही जानते हैं लेकिन आम आदमी के मन मस्तिष्क में दिल्ली पुलिस की जो उज्जवल छवि विज्ञापनों में प्रचारित की जाती है उसका आचरण उसके धुर विपरीत दिखाई देता है।इंडिया टी वी, जिसे सामान्यत: सरकार समर्थक चैनल्स में गिना जाता है, के चीफ रजत शर्मा ने भी रेशलिंग रेफरी जगवीर सिंह का इंटरव्यू दिखाया है जिसमें उन्होंने महिला पहलवानों के साथ 2013 और 2022 के दो शर्मनाक वाक्ये बयान किए हैं जो क्रमश: थाईलैंड के फुकेट और उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहरों में घटित हुए हैं।संगीता फोगाट को जांच के नाम पर बृजभूषण शरण सिंह के घर ले जाने पर भी खिलाडिय़ों द्वारा आपत्ति जताई जा रही है। एक तरफ बृजभूषण शरण सिंह को सत्ताधारी दल का सासंद होने के कारण वी वी आई पी ट्रीटमेंट मिल रहा है और दूसरी तरफ़ शिकायतकर्ताओं को दर दर भटकना पड़ रहा है। यदि अंतर्राष्ट्रीय पदक प्राप्त खिलाडिय़ों द्वारा यह शिकायत किसी रेफरी या कोच या आम आदमी और विपक्षी दल के सासंद के खिलाफ होती तो दिल्ली पुलिस का व्यवहार और कार्यशैली एकदम अलग तरह की होती।
जिस गति से यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है और जिस तरह से इस मामले में नित नए खुलासे हो रहे हैं उससे यह तो निश्चित है कि बृजभूषण शरण सिंह का आजीवन कार्यवाही से बचना मुश्किल है। सामान्यत: शक्ति संपन्न लोगों के खिलाफ़ इसीलिए तत्काल कार्यवाही की मांग की जाती है क्योंकि वे अपने रसूख, पैसे और धमकियों आदि के बल पर शिकायत कर्ता और गवाहों पर तरह तरह के दबाव बनाकर संभावित सबूतों को नष्ट कर मामले को कमजोर कर सकते हैं। इस मामले में एक नाबालिग पहलवान के परिजनों के विरोधाभासी बयानों से यह लगता है कि वह परिवार भी काफ़ी दबाव में है।
जगबीर सिंह के खुलासे की यह बात चौंकाने वाली है कि बृजभूषण शरण सिंह 2013 से 2023 तक पिछ्ले दस साल से इस तरह की आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहा है।उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत करने में महिला पहलवानों को भी इतना समय लगा है। संभव है कि बहुत सी महिला पहलवान अपने करियर और प्रतिष्ठा दांव पर लगाने का साहस नहीं कर पाई होंगी। जब अंतर्राष्ट्रीय पदक विजेता प्रतिष्ठित और रसूखदार पहलवानों की शिकायत पर पुलिस कड़ी कार्यवाही करने में संकोच कर रही है तब आम अनाम खिलाड़ी कैसे इतने शक्तिशाली व्यक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। वैसे भी महिलाओं के लिए इस तरह की शिकायत करना आसान नहीं है क्योंकि सबसे पहले उनके घरवाले ही उन्हें ऐसी परिस्थितियों में घर बैठने की सलाह दे देते हैं। पिछ्ले दो दशक में इस दौरान केन्द्र में उसी पार्टी की सरकार रही है जिसके ब्रजभूषण शरण सिंह सांसद हैं। इसलिए सरकार की भूमिका पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े होते हैं। वैसे भी हमारे देश में खेलों का स्तर कई एशियाई देशों से बदतर है और आबादी के हिसाब से तो बहुत ही निम्न स्तर का है। उसमें भी महिलाओं की भागीदारी और भी कम है।
निश्चित रूप से यह मामला भविष्य में बहुत सी महिला खिलाडिय़ों को खेलों में भाग लेने से रोकेगा और महिला खिलाडिय़ों के परिजनों की चिंताएं बढ़ाएगा। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि खराब करेगा। बेटी बचाओ के नारे को भी यह मामला खोखला करता है। यह चिंताजनक है कि कई दर्जन आपराधिक मामलों के आरोपी को लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय दल टिकट देते हैं और जनता उन्हें जिताती है और वे खेल संघों के लम्बे समय तक अध्यक्ष भी बने रहते हैं। एक तरह से हमारा पूरा समाज ही कटघरे में खडा दिखाई देता है।



