विचार / लेख
बहुत सार संक्षेप में अपनी बात कहने की कोशिश के बावजूद भारत का संविधान दुनिया में सबसे भारी-भरकम है। इसलिए वहां सूत्र रूप में जो कहा गया। केवल उसकी जांच की जाए, तो मौजूदा निजाम की संविधान विरोधी हरकतों का आसानी से खुलासा हो जाता है।
संविधान की उद्देशिका में अधिकारपूर्वक कहना है कि ‘हम भारत के लोग‘ संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य बनाने और हर व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने का ऐलान करते हैं। अनुच्छेद 1 में राज्यों और प्रदेषों की सूची है जो संविधान की पहली सूची में दर्ज हैं। राज्यों की सूची में 28 नामों में 18 वें नंबर पर मणिपुर का उल्लेख है। अनुच्छेद 5 के अनुसार संविधान के लागू होने पर हर व्यक्ति भारत का नागरिक होगा जो खुद या जिसके माता या पिता में से कोई भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा हो। लिहाजा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मणिपुर की राज्यपाल अनुसूइया उइके और मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भारतीय नागरिक हैं। संवैधानिक पदों के पदाधिकारी होने से वे नागरिकोंं से ज्यादा हैसियत नहीं रखते।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में संविधान का 42 वां संशोधन 3 जनवरी 1977 को लागू किया गया। उसमें अनुच्छेद 51 क में मूल कर्तव्यों की फेहरिश्त है जिसमें 11 मूल कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया है। संवैधानिक पदाधिकारी सहित हर नागरिक का फर्ज है कि मूल कर्तव्यों का पालन करे ही। इनमें है कि स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे। कहीं नहीं है कि अंगरेज हुक्काम को चि_ी और प्रतिवेदन लिखकर दो कि आजादी के आंदोलनकारियों से हमारा बैर है और अंगरेज सरकार उन्हें प्रताडि़त करो। कछ लोगों ने ऐसा किया है। उस विचारधारा के लोगों को भी आंदोलन के आदर्शों को अपनाना होगा। मूल कर्तव्य हैं कि देश की रक्षा करो और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करो। जाहिर है मणिपुर की रक्षा करना इस वाक्य में षामिल है। पूरा देश चीत्कार कर रहा है।
संसद और विधानसभाओं में मांग उठ रही है। सडक़ों पर आंदोलन हो रहा है लेकिन देश की रक्षा और राष्ट्रीय सेवा नागरिक की हैसियत में भी संवैधानिक पदाधिकारियों द्वारा नहीं की जा रही है। प्रावधान कहता है भारत के सभी लोगों में समरसता और समान बिरादराना भाव कायम करो। जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो। ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के खिलाफ है। मणिपुर में माताएं, बहनें सडक़ों पर बलात्कार और हत्याएं भोग रही हैं। कुकी, नागा, मैतेयी आदि समूहों के संघर्ष में सरकार की ढिलाई या शह पर कत्लेआम मचा हुआ है। सरकारी गोदामों से हथियार दिए या छीने जा रहे हैं। कैसा है नागरिक कर्तव्य जिससे देष का हर संवैधानिक अधिकारी बंधा हुआ है।
51 क (झ) में कर्तव्य कहते हैं सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें। करोड़ों-अरबों रुपयों की निजी और सरकारी संपत्ति लूटी जा रही है। आग के हवाले कर दी जा रही है। हिंसा का तांडव नाच रहा है। तो क्या मूल कर्तव्यों की सूची फ्रेम में जकडक़र घरों या दीवारों में महज लटकाने के लिए है? मणिपुर में शांति और सहयोग कायम करने की ज्यादा जिम्मेदारी केन्द्रीय और प्रदेश की सरकारों पर है।
राष्ट्रपति का दायित्व है वे मंत्रिपरिषद को सलाह दें और उससे सलाह लें कि किस तरह देष को हाहाकार के इस बदनाम समय से बाहर निकाला जा सकता है। साफ कहता है अनुच्छेद 75 (3) कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार होगी। लेकिन संसद में मणिपुर पर बहस करने से कतरा रहे हैं। अनुच्छेद 78 कहता है प्रधानमंत्री का कर्तव्य होगा कि संघ के क्रियाकलाप के पशासन संबंधी सभी विनिश्चय स्वयं राष्ट्रपति को दें या मांगे जाने पर जरूरी जानकारी दें। कहां कर रहे हैं मौन प्रधानमंत्री?
इतना कहकर बहाना नहीं किया जा सकता कि मणिपुर की समस्या राज्य की समस्या है।
संविधान पूर्वज मानते थे कि कभी किसी राज्य में बड़ी गड़बड़ी के कारण जनता को सम्मानपूर्ण जीने की हालत यदि नहीं होगी। तो राज्यपाल और राज्य की मंत्रिपरिषद के साथ साथ केन्द्र को भी जिम्मेदारी देनी पड़ेगी। सोच समझकर डॉ. अम्बेडकर की अगुवाई में नेहरू के समर्थन के कारण अनुच्छेद 355 शामिल किया गया। उसमें लिखा है केन्द्र का कर्तव्य होगा कि वह बाहरी आक्रमण और अंदरूनी अषांति से हर राज्य की सुरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का संविधान के प्रावधानों के मुताबिक चलाया जाना सुनिश्चित करे। कहां चल रही है ऐसी सरकार मणिपुर में? क्या खूंरेजी, बलात्कार, हत्या, लूटपाट और दहशतगर्दी से चलने वाली सरकार को कोई संवैधानिक सरकार कहेगा? तीसरी अनुसूची के तहत केन्द्रीय मंत्रियों को शपथ लेनी पड़ती है कि वे संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे। भारत की प्रभुता और अखंडता को बरकरार रखेंगे। मंत्री के रूप में कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और साफ मन से निर्वाह करेंगे। भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और कानून के अनुसार इंसाफ करेंगे। ऐसी ही षपथ राज्य के राज्यपाल और मंत्री भी लेते हैं। दुनिया जानती है मणिपुर में कुछ भी संवैधानिक नहीं चल रहा है। तब फिर केन्द्र और राज्य का निजाम कैसे कह सकता है कि हम अपनी जवाबदेही का पालन कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी बीच-बीच में कुछ टिप्पणी कर तो देता है। हालांकि उन टिप्पणियों से सरकार को कोई तकलीफ नहीं होती। एक दिन पीडि़त जनता को खुश होने का वहम हो जाता है कि शायद कुछ अच्छा हो। अच्छा होता नहीं है। सरकार और विपक्षी दलों में तो केवल यही सिर फुटौव्वल बची है कि लोकसभा की कार्यवाही किस नियम के तहत हो। एक नियम में सीमित बहस होगी। दूसरे नियम में असीमित बहस की गुंजाइश है। एक मेंं वोटिंग होगी। दूसरी बिना किसी वोटिंग ध्वनि मत से मुद्दे को किसी किनारे किया जा सकता है। ऐसा ही तो राज्यसभा की कार्यवाही में उपसभापति हरिवंश ने एक बार खुलेआम कर दिया है।
दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है की तर्ज पर संविधान में मूल कर्तव्य षामिल तो हो गए हैं लेकिन इनसे कहीं ज्यादा कारगर गांधी के विचार थे। उन्होंने संविधान बनने की प्रक्रिया के वक्त सुझाव दिया था कि नागरिक कर्तव्यों को इस आधार पर शामिल किया जाए कि जो नागरिक कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा। उसे मूल अधिकार नहीं मिलेंगे। उसमें सबसे महत्वपूर्ण था कि हर नागरिक देश के कल्याण के लिए अपनी काबिलियत के मुताबिक नकद रुपयों अन्य तरह की सेवा या श्रम के जरिए अपने कर्तव्य करेगा। हर नागरिक पूरी कोशिश या प्रतिरोध भी करेगा कि मनुष्य के द्वारा मनुष्य का षोषण नहीं किया जाए।
कांग्रेस नेतृत्व ने संविधान सभा में गांधी को पूरी तौर पर खारिज कर दिया। देश को मुश्किल हालात में गौतम अडानी, मुकेश अंबानी, रतन टाटा जैसे तमाम लोगों से कहा जा सकता था कि अपनी इच्छा या लोगों के आह्वान पर अनुरूप देष के लिए तय किया हुआ आर्थिक योगदान तो करें ही। आज वे देश की दौलत लूटने में इस कदर गाफिल हैं कि संविधान की किताब की गांधी की सुझाई आयतों को अगर छू लेगें। तो उन्हें बिजली का धक्का जैसा लगेगा। कहता है संविधान का अनुच्छेद 51 क (घ) में कि जरूरी होने पर आह्वान किया जाने पर हर नागरिक देश की सेवा करे। उसकी रक्षा करे। करोड़ों हैं जो सरकार और प्रधानमंत्री को आह्वान कर ही रहे हैं कि वे देष की रक्षा करें। सेवा करें। लेकिन वे देख रहे हैं इसके बावजूद प्रधानमंत्री को मणिपुर जाने की कोई नीयत ही नहीं है। मणिपुर जल रहा है याने भारत जल रहा है। सरकारी तंत्र उस आग को आश्वासन की पिचकारी से बुझाने की कोशिश कर रहा है।
ये सब तर्क राजनीति के नहीं है। ये संविधान की धरती से उगे हैं। संविधान में और कई प्रावधान हैं जो मणिपुर की समस्या को हल करने बेचैन हो रहे होंगे। अनुच्छेद 356 भी कहता है कि राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दषा में वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। लेकिन मणिपुर के राज्यपाल से उनकी असफलता की रिपोर्ट कोई कैसे मांगें। आरोप तो केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों के ऊपर लग रहे हैं। आज केन्द्र और राज्य मेंं कहीं भी अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होतीं तो राज्य सरकार भंग हो जाती। यह डबल एंजिन की सरकार केवल एक्सीडेन्ट कर रही है। इससे कम खराब हालत में कई प्रदेश सरकारें पहले भंग हो ही चुकी हैं।


