विचार / लेख

औरतें राजनीति की मोहरे हैं, चेक नहीं
27-Jul-2023 8:05 PM
औरतें राजनीति की मोहरे हैं, चेक नहीं

-मनीषा तिवारी

यह एक प्रचलित तथ्य रहा है कि भारत के ऊतर पूर्वी राज्यों मे महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अधिक स्वावलंभी है, परिवार में उनका मान है और वो पुरुषों पर डॉमिनेटिंग प्रकृति की है, लेकिन इसका ये मतलब नही कि जब औरत के देह की बात हो तो पुरुष अपना घृणित पुरुषत्व भूल जाए, योद्धा अपनी जीत का पताका औरत को नग्न करके उसके शरीर पर ना फहराए, और विजयी भव का संतोष परिवार और समाज की औरतों के निजी अंगों को भेदे बिना ही पा लिया जाए। इस दुनिया में, चाहे वह सभ्य हो या असभ्य, ऐसा कब नहीं हुआ है भला ! 

वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, व प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाये तो मणिपुर मे औरतों को नग्न अवस्था मे परेड कराये जाने और भीड़ द्वारा उनके निजी अंगो के साथ खिलवाड़ करने की घटना प्रथमदृष्टया तो राज्य में लॉ एंड ऑर्डर के तहस-नहस हो जाने का मामला लगता है। थोड़ा और गहरे जाएँ तो यह घटना एक विशेष लिंग व जाति के प्रति नीच सोच और राजनीतिक दाँव-पेंच का मामला लगता है।  थोड़ा और गहरे जाकर विचारें तो यह कृत्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज भी औरतों की देह को उनके परिवार और समाज की इज्जत, मान और सम्मान ढोने वाला कैरियर ही समझा जा रहा है। यदि औरत तथाकथित नीची जाति के परिवार समाज से है तो वह इस लायक भी नहीं। 

प्रश्न है कि क्या बदल गया है पिछले हजार वर्षों में जब पांचाली को उनके ही पतियों ने चौसड़ के दांव पर लगा दिया था, जब एक आदिवासी स्त्री को अपने स्तन ढँकने के एवज में अपने स्तन कटवाने पड़े थे, या फिर एक तथाकथित निम्न जाति व गरीब परिवार की परंतु सुंदर दिखने वाली स्त्री को देवदासी के लिए चुन लिया जाता था ? कल भी देवी देवताओं, धर्म, जाति की आड़ मे औरतों पर तथाकथित सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों को उनके कर्तव्य और परिवार, समाज की इज्जत के रूप मे थोपा जाता रहा और आज भी हम उसी समाज के बीच खड़े हैं जंहा जाति, वर्ण और संप्रदाय की लड़ाई मे एक औरत की देह पर वर्चस्व दिखा कर हम अपने विरोधी की इज्जत पर धावा बोलने का हुंकार भरते हैं।  

वह देश जहां एक औरत को किसी पुरुष द्वारा उसकी मर्जी के बगैर घूरने भर से लैंगिक शोषण काअपराध कारित किया जाना माना जाता है एवं कानून में इस हेतु ऐसे अपराधी के लिए कठिन सजा का प्रावधान रखा जाता हैं वंहा मणिपुर मे घटी यौन हिंसा की यह घटना हमे सोचने पर मजबूर करती है कि हम वापस उसी युग मे चले गए हैं जहां से चले थे। आज हम अपनी औरतों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और भावनात्मक अधिकारो को सुरक्षित रखने के अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर क्या ही कर पाएंगे जब हम एक औरत को उसकी अपनी ही ‘देह पर अधिकार’ जैसी मूलभूत अधिकार के अनुभव से वंचित देख रहे हैं ? 

यदि हमारे देश मे मोनार्की नहीं है, लोकतन्त्र है, देश मे चुने हुए प्रधानमंत्री है और राज्य में चुने हुए मुख्यमंत्री हैं तो हम उनसे इतना पुछने का भी हक़ रखते है कि ऐसा क्यों है कि आप ऐसी घटनाओं को होने से रोक नहीं पाये? ऐसा क्यों है कि करोड़ों अरबों रुपये से आपके ही मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा तैयार महिला सशक्तिकरण की योजना ऐसे गंभीर प्रकरण को चिन्हित करने एवं समय पर कार्यवाही करने मे फेल हो गई? क्या कारण है कि सरकार द्वारा  विषेशरूप से महिला हिंसा को एड्रैस करने के लिए ही तैयार इन वृहद योजनाओं का लाभ वो औरत नहीं ले सकी जिसे लगभग । 9 दिन पूर्व मानसिक एवं शारीरिक रूप से लज्जित किया  गया जिसके छोटे भाई को उसके ही समक्ष भीड़ द्वारा जान से मार दिया गया जबकि पीडि़त के कुछ शुभचिंतक आपके राज्य शासन, प्रशासन से मदद की गुहार लगाते रहे।
 
वर्ष 2012 मे भारत सरकार महिला सशक्तिकरण के तहत अपनी प्रमुख योजनाएं लेकर आई, जिसे पूर्ण शक्ति केंद्र (पीएसके) कहा गया। जिसका उद्देश्य महिला हिंसा की घटनाओं को एड्रैस करना व पीडि़ता के लिए न्याय की व्यवस्था करने के साथ साथ जरूरतमन्द महिला को कल्याणकारी मामलों में पंजीक=त करना, पात्र योजनाओं में आवेदन करने में मदद करना और इन आवेदनों की प्रगति की निगरानी करना था। परंतु आने वाले समय मे सरकार पीएसके योजना गाइडलाइन के अनुसार सहायता प्रणाली (सार्वभौमिक महिला हेल्पलाइन) विकसित नहीं कर पाई और जिसके अभाव में यह योजना विफल रही और इसे बंद कर दिया गया।

वर्ष 2012 के निर्भया प्रकरण के पश्चात बनाई गई न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिश पर भारत सरकार ने नागरिक समाजों के परामर्श से ‘हिंसा प्रभावित महिलाओं को एकीकृत सहायता’ प्रदान करने के लिए सखी वन स्टॉप सेंटर (महिलाओं की शिकायत का प्रतिनिधित्व आपराधिक न्याय प्रणाली तक सुनिश्चितकरने के लिए एक भौतिक सुविधा) और महिला हेल्पलाइन 181 के सार्वभौमिकरण के नाम से दो वृहद योजनाओं का अत्यंत आधुनिक और अभिनव डिज़ाइन तैयार किया  । इन समेकित योजना को 8 विशेष अभिनव गुणो के साथ तैयार किया गया था। यह योजना महिला (शिकायतकर्ता) के रेफेरल की बात नहीं करती थी बल्कि महिला के प्रतिनिधित्व की बात करती थी।  इस योजना को डिजाइन ही इस प्रकार से किया गया था कि यह दर्ज शिकायत पर किसी को भी मैनुपूलेशन/ हेरा-फेरी का मौका नहीं देता था एवं साथ ही शिकायत से संबन्धित सभी स्टेकहोल्डर द्वारा किए गए कार्य का रियल टाइम डाटा संधारण करता था। इस योजना के डिज़ाइन में सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच टेक्नोलोजी इंटिग्रेशन की बात थी ताकि सभी संबंधित स्टैकहोडर्स समेकित रूप से एक केस फाइल के साथ पीडि़ता के साथ जुड़े रहे और संबंधित नियम व कानून के अंतर्गत अपनी जिम्मेदारी का अनुपालन करते रहे। इस डिजाइन मे मुख्यत: रिमोट मोनिटरिंग की बात भी थी, जिसके अंतर्गत केस/कम्प्लेंट मे संबंधित स्टेक होल्डर्स द्वारा आवश्यक कार्यवाही न किए जाने पर तत्काल मॉनिटरिंग सेक्शन मौके पर कोर्स करेक्शन हेतु सबंधित स्टेकहोल्डर को ताकीद कर सके। तत्पश्चात इस डिजाइन मे प्रत्येक केस फाइल और कम्प्लेंट को देश के सबसे वृहद लीगल फ्रेमवर्क  ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण’ और इसके राज्य, जिले व ताल्लुक स्तर के कार्यालयों  से टेक्नोलोजीकली जोड़े जाने की भी बात थी ताकि जरूरत पडऩे पर पीडि़ता को अलग से कानून का दरवाजा न खटखटाना पड़े बल्कि पीडि़ता की सहमति से उसकी शिकायत को इसी रास्ते न्याय प्राप्ति के अंतिम चरम दरवाजे तक सरलता से पहुंचाया जा सके और महिला नि: शुल्क विधिक सेवा का लाभ ले सके।  इस योजना के संचालन की जि़म्मेदारी किसी विशेसज्ञ बाह्य संस्था को सौंपा जाना था जबकि अनुश्रवण की जि़म्मेदारी सरकार की थी। यह योजना महिला हिंसा के विरूद्ध न्याय प्राप्ति की दिशा मे किए गए प्रयास मे मील का पत्थर के तौर देखी जा रही थी।

दुर्भाग्यवश यह योजना देशभर मे लागू करवा पाने मे सरकार पुन: असफल रही। उससे भी अधिक दुखद यह रहा कि जिन राज्यों (छत्तीसगढ़, असम, मेघालय, जम्मू कश्मीर) मे 2015-16 की योजना गाइडलाइन के अनुसार यह योजना संचालित की जा रही थी वंहा की सरकारे इस अति पारदर्शी, नियमबद्ध, त्वरित मॉनिटरिंग व्यवस्था से डरने लगी थी। फलस्वरूप उनके नौकरशाह अपने अपने स्तर पर इस योजना/व्यवस्था का विरोध करने लगे। विभिन्न विभागों के आला अधिकारी इस बात से डरने लगे कि यह कैसी व्यवस्था है जिसमे एक पीडि़त महिला सीधे तौर पर दर्ज कम्प्लेंट पर की गयी कार्यवाही के बाबत उनसे पूछताछ करती है जिसका मौके पर ही जवाब देने के लिए नौकरशाह बाध्य थे, जो स्वत: रियल टाइम डाटा सिस्टम  (वॉइस रेकॉर्ड सहित) संधारित द्वारा कर लिया जाता था।  इसका परिणाम यह हुआ कि  एक ओर जहां 2011 से ही भारत सरकार ने योजना के संचालन में तकनीकी और ईक्षाशक्ति की कमी का ऐलान करते हुए योजना को पुन: पारंपरिक कॉल सेंटर मे बदल दिया वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़, असम, मेघालय, एवं जम्मू एवं कश्मीर की सरकारो ने भारत सरकार को यह बताना भी आवश्यक नहीं समझा कि उनके राज्य मे यह योजना 2016 की ही योजना दिशा-निर्देश के अनुसार चल रही है और यह भी कि उनके राज्यों मे यह योजना पीडि़ता /महिलाओं की मुखर आवाज बनकर सामने आयी है और समाज के एक बहुत बड़े वर्ग मे सुरक्षा और संतोष का भाव भरने मे मील का पत्थर साबित हुई है। 

वर्ष 2011 से वर्ष 2022 तक भारत सरकार एवं नीति आयोग ने 2016 में लाई गई 181 महिला हेल्पलाइन और सखी वन स्टॉप सेंटर की एकीकृत इकाई के साथ आयी इस क्रांतिकारी योजना को यह कहते हुए कि, इस योजना के संचालन और अनुश्रवण मे समस्याएँ रही,  पूरी तरह से मटियामेट कर दिया। वर्ष 2016 की सभी अभिनव, आधुनिक संरचना को खत्म कर पुन: पुराने घिसे-पिटे पारंपरिक डिजाइन में तैयार कर मिशन शक्ति के नाम से आयी नई फैशनेबल योजना पुन: नौकरशाहों के हाथ संचालन के लिए सौंप दी गई है। अब संचालन भी सरकारी नौकरशाह करेंगे और संचालन का अनुश्रवण, मूल्यांकन भी नौकरशाह खुद ही करेंगे। 

कुल मिलाकर सच्चाई यही है कि सरकारे किसी की भी हों, महिलाओं के सम्मान की बहाली की इक्षाशक्ति किसी भी सरकार के पास नहीं है। औरतें आज भी शतरंज रूपी राजनीति की मोहरे हैं, चेक नहीं। यदि केंद्र में बैठी श्रीमती स्मृति ईरानी ने और वर्तमान भारत शासन द्वारा पोषित संस्थाओं और व्यवस्थाओं ने मणिपुर की महिलाओं को नहीं सुना तो यह कहना भी गलत नहीं होगा कि छत्तीसगढ़, असम, मेघालय और जम्मू-कश्मीर राज्यों ने मौन रहकर उनका साथ दिया। बहुत संभव है कि कल ऐसी ही घटना किसी अन्य राज्य में घटित हो जाये। क्या करेगी एक औरत, एक महिला, एक पीडि़ता यदि देश ने इन्हें अपनी शिकायत रखने  और उस पर सवाल करने की कोई व्यवस्था ही नहीं दी। ये बात दीगर है कि हमने कानून की किताबों मे बड़े-बड़े कानून छाप दिए परंतु उनके क्रियान्वयन के लिए इतने सारे विंडो तैयार कर दिये कि एक शिकायतकर्ता अपनी पूरी जिंदगी एक विंडो से दूसरे विंडो पर चक्कर लगाते रहे और अंत तक ये न समझ पाये कि उसे सचमुच कहाँ  जाना था। साँप भी मर जाये, लाठी भी ना टूटे।


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