विचार/लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्तर के एक साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में राष्ट्रपति भोपाल आई थी। उनके कार्यक्रम में शामिल होने के कारण सुबह 10.30 से शाम 5 बजे तक कुछ रास्ते दिन भर बंद रखने और कुछ अलग अलग समय पर बंद रहने के समाचार प्रकाशित हुए थे। इस मुद्दे पर भोपाल की एक संवेदनशील पत्रकार ने लिखा था कि जब आयोजन स्थल के रास्ते बंद रहेंगे तो इस आयोजन में दर्शक या साहित्यिक चर्चा सुनने का इच्छुक व्यक्ति आयोजन स्थल पर कैसे पहुँचेगा?एक अखबार में लिखा था आयोजन से लोगों को जोडऩे निकली यात्रा, तो जो इससे जुडऩा चाहे देखना चाहे वो तो पहुंच ही नहीं सकता। आयोजन का पास तो सबके पास नहीं होता। ऐसा लगता है कि इस तरह के आयोजन अब चंद पास धारकों के लिए रह गए हैं और आम नागरिकों के लिए ऐसे आयोजन ट्रेफिक डायवर्सन के कारण होने वाली परेशानी ही पैदा करते हैं। राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का किसी शहर में किसी भी कार्यक्रम में आना शहरवासियों के लिए बड़ी मुसीबत बन जाता है। जनता को परेशानी से निजात दिलाने के लिए यदि यह लोग ऐसे आयोजनों को राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास से वेबिनार के माध्यम से संबोधित कर दिया करें तो जनता पर बड़ा उपकार होगा।
अभी कुछ दिन पहले प्रधान मंत्री के भोपाल आगमन पर भी शहर के कई इलाकों में ट्रैफिक जाम से शहर वासियों का बुरा हाल हुआ था। भोपाल की प्रमुख सडक़ होशंगाबाद रोड पर वैसे ही कार्यालय के समय सुबह दस बजे के आसपास और शाम को छह बजे के आसपास ट्रैफिक जाम की स्थिति रहती है। ऐसे में सडक़ बंद होने से कई कई घंटों के जाम में मरीज और स्कूल जाने वाले बच्चे भी फंस जाते हैं। वह तो इंद्रदेव की कृपा से उस दिन बारिश होने से प्रधानमन्त्री का प्रस्तावित रोड शो नही हो पाया था अन्यथा ट्रैफिक जाम से और बदतर हालात बन जाते।वेबिनार के जमाने में प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति को दिल्ली रहकर काम निबटाने चाहिएं या आम साधारण नागरिक की तरह आना चाहिए।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए राजसी सुरक्षा तामझामो का कुछ लोग यह कहकर समर्थन कर सकते हैं कि देश के इन विशिष्ट लोगों के लिए इतनी कड़ी सुरक्षा जरूरी है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था अधिकांशत: ब्रिटिश परंपरा से आई है। उसके साथ हमारे संविधान में सभी विकसित देशों के संविधान से अच्छी परंपराएं लेने की कोशिश की गई है। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद हमने ब्रिटिश लोकतंत्र की अभिव्यक्ति की आज़ादी और जन प्रतिनिधियों की सादगी आदि को आत्मसात नहीं किया। वहां प्रधानमंत्री के लिए सुरक्षा के डरावने तामझाम नहीं होते। ऐसे में हम गरीब देश के लोगों पर विशिष्ट लोगों की भारी सुरक्षा के बंदोबस्त का बोझ किसी भी दृष्टि से तर्क संगत नहीं लगता। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के अवसर पर आयोजित समारोह में महात्मा गांधी ने तत्कालीन वायसराय की इसी तरह की कड़ी सुरक्षा को लेकर बहुत तीखा विरोध किया था। उनका आशय यही था कि वायसराय को अपनी जनता से इतना अधिक नहीं डरना चाहिए कि भारी सुरक्षा बंदोबस्त करना पड़े। गांधी ने कहा था कि वायसराय को खुद की सुरक्षा की इतनी चिंता है लेकिन देश के लोगों की सुरक्षा की चिंता नहीं है।
महात्मा गांधी की 1916 में तत्कालीन वायसराय के लिए कही गई बातें आज और भी ज्यादा प्रासंगिक हो रही हैं। वर्तमान परिदृश्य में आज के वायसराय और मंत्रियों के लिए तो सुरक्षा के इतने जबरदस्त तामझाम हैं और आम जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं है। मणिपुर में जिस तरह से हिंसक भीड़ ने दो निर्दोष आदिवासी महिलाओं की नग्न परेड कराई है और ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा के नाम पर घूमते आर पी एफ के जवान ने जिस तरह से बोगियों से खोज खोज कर धर्म विशेष के लोगों का नर संहार किया है ऐसे में गांधी के उदगार और ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं।
प्रकाश दुबे
आरोप गंभीर है-देशद्रोह और भारत के विरुद्ध युद्ध छेडऩे का। मणिपुर में जारी हिंसा के बीच उसने राज्य में कदम रखने की जुर्रत की। वह भी तफरीह के लिए सैलानी की तरह नहीं। तथ्यान्वेषण समिति में शामिल होकर। आरोपपत्र के हिसाब से उम्रकैद हो सकती है। करेला और नीम चढ़ा। उसके पास वकालत की सनद है। मणिपुर की पुलिस के हाल पर आम पाठक हंसे या रोए, अदालत ने फुर्ती दिखाते हुए आनन फानन में गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने वकील दीक्षा द्विवेदी की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाई।
अगली राहत के लिए मणिपुर उच्च न्यायालय की देहरी खटखटाने के लिए कहा। वकील के अंदेशे को भांपते हुए वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से चार सप्ताह के अंदर अपना पक्ष रखने कहा। आजादी का यह अमृतकाल वकील दीक्षा द्विवेदी के लिए 15 अगस्त तक जारी रहेगा या नहीं? हम आप काहे फिक्र करें? भारत के मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ की विचारशीलता से हैरान लोगों को इतनी दिलासा मिलेगी कि तलवार लटकी है।
दल बदल की फसल लहलहाई
ज्योतिषियों के कामकाज में हस्तक्षेप किए बगैर दावा कर सकता हूं कि केंद्रीय पर्यटन मंत्री जी किशन रेड्डी की भाग्य रेखा अभिनेत्री की भाग्य रेखा से हजार गुने अधिक मजबूत है।मात्र इसलिए नहीं, कि मंत्री रहते हुए तेलंगाना प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष बना दिए गए। ऊपर वालों की मेहरबानी के बाद राज्य का दौरा किया। इतिहास में दर्ज है कि बादशाह के कंधे पर बाज बैठाकरते थे। मंत्री सह प्रदेशाध्यक्ष का सेहरा लगाए राज्य में पहुंचे तो सत्कार के साथ कुछ दलबदलू कतार में खड़े मिले। इनमें जनजाति बहुल जिले के दो पूर्व विधायक शामिल हैं। किशन रेड्डी पूर्वोत्तर विकास मंत्री भी हैं।
मणिपुर जाकर क्या करते? बड़े बोल बोलने वाले चुप हैं। मणिपुर की राज्यपाल आदिवासी हैं। वे मुंह खोलें। बहरहाल आदिवासी हितैषी मंत्री ने एक आश्वासन अवश्य दे डाला। उनका कहना है कि जनसंख्या के अनुपात में तेलंगाना में जनजाति समुदाय का आरक्षण बढऩा चाहिए। क्रिकेट की तरह राजनीति में गुगली फेंकने में माहिर किशन रेड्डी के बयान से मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के माथे पर शिकन होनी चाहिए। इसे कहते हैं-हर्र लगे न फिटकरी-
कर्नाटक का नाटक गांव गांव में
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामैया को इतना कहने का हक है कि विरोधी अफवाहें फैलाकर सरकार को बदनाम करते हैं। विधायक असंतुष्ट हैं। मंत्री बनने की लालसा में कर्नाटक के पसंदीदा दलबदल नाटक में शामिल हो सकते हैं, आदि आदि। कामकाज ठीक से नहीं हो रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय में फाइलों का अंबार लगा है। अफवाह को हवा देने वालों में भाजपा, कुमारस्वामी और मंत्री पद लालची अपने विधायकों में से किस की तरफ निशाना है? यह साफ साफ नहीं बताया। ध्रुव सत्य मुख्यमंत्री जानते हैं और उनके उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार भी। कई पार्टी विधायक दो टूक कह चुके हैं कि मंत्री फंत्री का फैसला बाद में करते रहना। सबसे पहले हमारे विधानसभा क्षेत्र के तहसीलदार से लेकर थानेदार को बदलो। कारण? ये सब-सब पिछली सरकार में हमारी नाक में दम कर चुके हैं। दिल्ली बैठक में राष्ट्रीय नेताओं से विधायकों ने अनेक विभागों की जानकारी देते हुए मांग दोहराई। तबादलों के साथ दान-दक्षिणा का आरोप हवा में तैरने लगेगा। विपक्ष ताक में है। आपके सहानुभूति जताने से सिद्धरामैया की समस्या हल होने वाली नहीं है।
गड्डी ठीक से फेंटना जादूगर पुत्र
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को 90 बरस की वृद्धा ने आशीष दिया-फिर से मुख्यमंत्री बनो। मुख्यमंत्री का जवाब अप्रत्याशित था। मैं तो नहीं चाहता, लेकिन यह कुर्सी मुझे नहीं छोड़ रही है। अब आप यह मत सोचो कि सचिन पायलट को सुनकर कैसा लगा होगा? मिठबोले मुख्यमंत्री चुनावी जादू जानते हैं। एक दिन का किस्सा सुनकर ही सब समझ जाएंगे। तारीख 31 जुलाई 2023 और समय दिया बत्ती लग जाने के बाद का। 53 पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण की सूची से महकमे के कई चेहरों पर मुस्कान खिल गई। दिल थाम कर बैठिए।
सचिवालय में बहुत काम होता है। जिलों का का राजकाज संभालने वाले भी कान लगाए बैठे थे। उनका अनुमान सही था। एक और सूची जारी हुई। राजस्थान प्रशासनिक सेवा के 336 तबादला आदेश शामिल थे। ईडी फीडी अपना काम करता रहे। अशोक का जादू कितना काम करेगा? यह तो गहलोत भी नहीं जानते। हम यह अवश्य बता सकते हैं कि मुख्यमंत्री के पिता जोधपुर के जाने माने जादूगर थे।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-अरुण कान्त शुक्ला
हिरोशिमा दिवस 2023, और नागासाकी में हुईं परमाणु हत्याओं की 78वीं वर्षगांठ है। पुरे विश्व में हर साल 6 अगस्त को परमाणु बम के भयावह प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाने और शांति की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है। इस दिन 1945 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक जापानी शहर हिरोशिमा पर एक परमाणु बम गिराया था। परमाणु विस्फोट बड़े पैमाने पर हुआ और शहर के 90 प्रतिशत हिस्से को नष्ट कर दिया और हजारों लोग मारे गए। इसने लगभग 20,000 सैनिकों और 90,000 से 125,000 नागरिकों को मार डाला। तीन दिन बाद, 9 अगस्त 1945 को जापान के एक और शहर, नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया, जिसमें 80,000 से अधिक लोग लोग मारे गए। हिरोशिमा दिवस को हम उन हत्याओं की वर्षगांठ भी कह सकते हैं, जो विश्व युद्ध के लगभग समाप्त होने की कगार पर परमाणु बमों के द्वारा की गईं। आज परमाणु बमों का इतना जखीरा दुनिया के बड़े और शक्तिशाली से लेकर विकासशील देशों के पास जमा है कि विश्व के प्रत्येक शांतिकामी नागरिक को ये व्याकुलता स्वाभाविक रूप से होती है कि कहीं किसी भी देश का सत्तानशीं चाहे वह लोकतांत्रिक देश का हो अथवा अधिनायकवादी देश का सनक में आकर मानवता पर फिर वही वहशी अत्याचार को न कर बैठे, जो द्वितीय विश्वयुद्ध की लगभग समाप्ति पर अमेरिका के 33वें राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमेन ने किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के देशों के बीच अनगिनत युद्ध हो चुके हैं और शांतिकामी लोगों के मध्य परमाणु बम के इस्तेमाल को लेकर होने वाली व्याकुलता कभी कम नहीं रही।
अभी शायद हम बड़े देशों के बीच बढ़ती हुई अदावत और तनाव के मामले में सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि रूस और युक्रेन के मध्य चल रहे युद्ध में युक्रेन एक छद्म है और वास्तविक संघर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच है। सबसे ज्यादा त्रासदायी बात यह है कि डेढ़ वर्ष से अधिक के अत्यधिक विनाशकारी युद्ध के बाद भी कोई दिलासा देने वाली शांति प्रक्रिया किसी भी देश के द्वारा शुरू नहीं की गई है और यह हो भी कैसे जब दो विश्व महा शक्ति युद्ध पर ही आमादा हों तो शान्ति की पहल होगी ही कैसे?रही-सही कसर हाल के घटना विकास ने पूरा कर दिया है। ऐसा लग रहा है मानो संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच अब ताइवान मोहरा बन रहा है। अभी की परिस्थिति में शामिल तीनों देश परमाणु संपन्न हैं। आज परमाणु संपन्न देशों के पास 13000 से अधिक न्यूक्लियर हथियार हैं और इनमें से अधिकाँश की मारक क्षमता हिरोशिमा या नागासाकी पर गिराए गए बमों से कई गुना अधिक है।
जापान हमारे सामने परमाणु बम के विनाश के उदाहरण के रूप में मौजूद है, जहाँ न केवल दो लाख से अधिक लोग फौरी तौर पर मारे गए बल्कि उसके बाद वर्षों तक जलने-झुलसने और विकिरण के फलस्वरूप हजारों की संख्या में लोगों की मौत हुई। यहाँ तक कि उसके बाद के लगभग चार दशकों तक पैदा हुए बच्चे भी परमाणु विकिरण के शिकार रहे। आज जब फेट मेन और लिटिल ब्वाय, उन परमाणु बमों के नाम जो नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए थे, से ज्यादा शक्तिशाली न्यूक्लियर हथियार परमाणु संपन्न देशों के पास हैं, हम कल्पना कर सकते हैं कि लाखों लोगों को तुरंत मारने के अलावा, परमाणु हथियारों के युद्ध से अभूतपूर्व पर्यावरणीय तबाही भी हो सकती है जो जापान में मारे गए लोगों से भी बड़ी संख्या में लोगों को मार सकती है। इतना ही नहीं इसका विनाशकारी परिणाम जीव जगत के अन्य जीवन-रूपों को भी भोगना पडेगा और प्रकृति का विनाश होगा। आज परमाणु हथियारों का प्रयोग अकेले दो देशों के बीच का मामला हो ही नहीं सकता है, इसके दुष्परिणाम बिना किसी विवाद में शामिल हुए पड़ोसी देशों के लोगों को भी भुगतने होंगे।
यह कोरा मुगालता ही है कि सामरिक परमाणु हथियारों के रूप में परमाणु हथियारों की कम विनाशकारी भूमिका हो सकती है। यह किसी युद्धोन्मादी का ही दृष्टिकोण हो सकता है। यदि युद्धरत देशों के पास परमाणु हथियार हैं तो सामरिक हथियारों से शुरू हुआ परमाणु युद्ध आसानी से कभी भी एक पूर्ण परमाणु युद्ध में बदल सकता है। फिर, परमाणु हथियार सामरिक हों तो भी उनका उपयोग बहुत विनाशकारी हो सकता है, यहां तक कि उपयोग करने वाले देश के लिए भी उनका उपयोग विनाशकारी ही होगा!
इसके अलावा, जैसा कि न्यूक्लियर हथियारों के बारे में आम धारणा है कि इनके इस्तेमाल का अधिकार केवल राष्ट्र प्रमुखों के पास ही होता है7 पर, यही बात छोटे स्तर के सामरिक न्युक्लियर हथियारों के बारे में नहीं कही जा सकती7 क्योंकि, जब सामरिक परमाणु हथियारों को उपयोग के लिए तैयार करना होता है तो उनके नियंत्रण के अधिकार का अनेक लोगों के पास पहुंचना साधारण सी बात ही होगी। इससे यह संभावना बढ़ जाती है कि कट्टर या कट्टरपंथी झुकाव या आतंकवाद फैलाने वाले व्यक्ति या समूह भी इसके नियंत्रण तक पहुँच हासिल कर सकते हैं या उन हथियारों को ही हासिल कर सकते हैं।
इसलिए इस भ्रम में रहना एकदम गलत है कि छोटे स्तर के सामरिक न्युक्लियर हथियार परमाणु हथियारों का कोई सुरक्षित विकल्प प्रदान करते हैं। क्योंकि, ऐसा भ्रम लाखों-करोड़ों लोगों के लिए अत्यंत विनाशकारी हो सकता है।
हमारी प्यारी धरती, उस पर बसे जीवन और उस पर्यावरण तथा प्रकृति के लिए सबसे अच्छी बात यही है कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कभी नहीं होना चाहिए। वास्तव में, परमाणु हथियारों का उपयोग तो विनाशकारी है ही, परमाणु हथियारों से संबंधित दुर्घटनाएं भी बहुत विनाशकारी हो सकती हैं। इसलिए यदि हम पृथ्वी पर जीवन की परवाह करते हैं तो अंतत: एकमात्र सुरक्षित विकल्प यही है कि हम सभी परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के सभी हथियारों को हमेशा के लिए छोड़ दें।
दुर्भाग्यवश, एक समय शुरू हुआ निशस्त्रीकरण अभियान अपने उद्देश्य में सफल तो नहीं ही हो पाया, अब उस तरफ प्रयास भी बंद हो गए हैं। बड़े देश जो शस्त्रों के निर्माता हैं, वे न केवल अपने देशों के हथियार निर्माताओं के माफियाओं के चंगुल में फंसे हैं, उनकी अर्थव्यवस्था बहुत कुछ अपने से छोटे देशों को हथियारों को बेचने और उनके बीच के युद्ध पर ही टिकी है। हिरोशिमा दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम इस विषय पर ईमानदारी से विचार करें, हम किसी भी पक्ष के हों, हमारा एकमात्र ईमानदार निष्कर्ष यही होना चाहिए कि यदि पृथ्वी पर जीवन को बचाना है तो हमें परमाणु हथियारों से दूर रहना ही होगा, उन्हें नष्ट करना ही होगा और इसके लिए विश्व की शांतिकामी जमात को एकस्वर में आवाज उठानी ही होगी।
-श्रवण गर्ग
मणिपुर के पहले संसद में बहस शायद जयपुर-मुंबई सुपर फास्ट एक्सप्रेस में घटी त्रासदी पर होना चाहिए और प्रधानमंत्री से जवाब भी माँगा जाना चाहिए ! चलती ट्रेन में हुई त्रासदी और उसके मुख्य पात्र द्वारा उसकी ही गोली के शिकार हुए चार लोगों में से एक के शव पास खड़े होकर दी गई नफरती स्पीच पर अगर बहस हो जाए तो फिर मणिपुर, मोनू मानेसर और हरिद्वार पर भी अपने आप हो जाएगी !
चेतन सिंह अब किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं रहा। हो सकता है इस नाम का उस शख्सियत से कोई ताल्लुक़ ही स्थापित नहीं हो पाए जो उस दुर्भाग्यपूर्ण रात सूरत स्टेशन पर अपने बॉस और अन्य सहयोगियों के साथ एस्कॉर्ट ड्यूटी के लिए ट्रेन पर सवार हुआ था। एस्कॉर्ट ड्यूटी बोलें तो यात्रियों की सुरक्षा के लिए ट्रेन में चलने वाला रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) का अमला।
कांस्टेबल चेतन सिंह या तो ख़ुद ही भूल गया होगा कि उसने क्या अपराध किया है या उसके परिवार सहित जो ताक़तें उसे मानसिक रूप से विचलित, विक्षिप्त अथवा अवसाद-पीडि़त साबित करने में जुटी हैं वे उसकी याददाश्त का गुम हो जाना सिद्ध कर देंगी ! ‘गजनी’ फि़ल्म के नायक संजय सिंहानिया को ऐसी बीमारी होती है जिसमें वह पंद्रह मिनिट से ज़्यादा पुरानी बात भूल जाता है। व्यक्ति ही नहीं, हुकूमतें भी जब सत्ता की असुरक्षा या किन्हीं अन्य कारणों से अवसाद अथवा विक्षिप्तता की शिकार हो जाती हैं तो बड़े-बड़े हत्याकांडों, आगज़नियों और मानवीय चीत्कारों को पलक झपकते ही भूल जातीं हैं।
मीडिया की खबरों में बताया गया है कि कांस्टेबल को घटना के बाद जब मुंबई की एक अदालत में पेश किया गया तो घटना का प्रस्तुत विवरण उस जानकारी से कुछ भिन्न था जो जनता के बीच और मीडिया में प्रचारित है। मसलन, बताया गया है कि सांप्रदायिक नफरत से भरे उसके भाषण और उससे संबद्ध धाराओं का आरोपों के विवरण में कथित तौर पर उल्लेख नहीं किया गया। खबरों के मुताबिक, सुनवाई के दौरान मीडिया की उपस्थिति भी प्रतिबंधित थी।
चेतन सिंह अब किसी का भी नाम हो सकता है! जैसे हरिद्वार, हाशिमपुरा ,हाथरस, कश्मीर घाटी या मणिपुर। उसे किसी हुकूमत का नाम या प्रतीक भी माना जा सकता है। उसके द्वारा दी गई जिस ‘हेट स्पीच’ का उल्लेख बहुप्रचारित वीडियो में है उसमें नया कुछ भी नहीं है। हरिद्वार की ‘धर्म संसद’ में दो साल पहले दिये गये नफऱती भाषणों से उसके कहे का मिलान किया जा सकता है। प्रकाशित विवरणों के मुताबिक, आरपीएफ के कांस्टेबल द्वारा हत्याकांड के बाद कुछ इस प्रकार की स्पीच दी गई थी-’ अगर वोट देना है ,तो मैं कहता हूँ, मोदी और योगी ये दोनों हैं और आपके ठाकरे !’
हरिद्वार की ‘धर्म संसद’ में उपस्थित सैंकड़ों साधु-संतों के द्वारा हिंदू समुदाय का आह्वान किया गया था कि अल्पसंख्यकों की समाप्ति के लिए शस्त्र उठाना होगा। एक ऐसे समय जब हरियाणा के कुछ शहर सांप्रदायिक हिंसा से झुलस रहे थे, एक राष्ट्रीय चैनल का एंकर जर्मनी में हिटलर द्वारा किए गये यहूदियों के नरसंहार की तजऱ् पर ही ‘समस्या’ के ‘फाइनल सोल्यूशन’ की वकालत कर रहा था ! समस्या यानी ? देश के करोड़ों अल्पसंख्यक?
हरिद्वार की ‘धर्म संसद’ के तत्काल बाद एक बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों ,न्यायविदों, सेवानिवृत्त अफसरों, पूर्व सैन्य अधिकारियों ,आदि ने ऐसी चिंता व्यक्त करते हुए कि देश को गृह युद्ध की आग में धकेला जा रहा है अपील की थी कि पीएम को चुप्पी तोडऩा चाहिए । न तो पीएम ने चुप्पी तोड़ी और न ही संघ या भाजपा के किसी नेता ने देश में फैलाए जाने वाले सांप्रदायिक उन्माद की निंदा की। मणिपुर, हरियाणा और चलती ट्रेन में चुन-चुनकर यात्रियों की हत्या उसी मौन के नतीजे माने जा सकते हैं।
ट्रेन में हुए हत्याकांड को लेकर ‘द वायर’ द्वारा जारी एक खबर के अनुसार, सुपरफास्ट एक्सप्रेस के मुंबई पहुँचते ही एक भाजपा विधायक ने मीडिया से कहा कि घटना के कारणों की सघन तरीक़े से जाँच कर पता लगाया जाना चाहिए कि क्या आरपीएफ कांस्टेबल किसी तरह के अवसाद से पीडि़त या मानसिक रूप से विचलित था? घटना की पुलिस द्वारा जाँच किए जाने के पहले ही विधायक ने कांस्टेबल की मानसिक अस्थिरता को हत्याकांड के संभावित कारण के तौर पर प्रस्तुत कर दिया। खबरों के मुताबिक, कांस्टेबल के परिवार-जन दावा कर रहे हैं कि वह मानसिक बीमारी से पीडि़त है तथा पिछले छह महीनों से उसका उपचार चल रहा है।
सवाल पूछे जा सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक तौर पर अस्वस्थ है तो (1) उसे यात्रियों की सुरक्षा से संबंधित एक महत्वपूर्ण सेवा में क्यों तैनात किया गया? (2) क्या कांस्टेबल के उच्चाधिकारियों को उसकी मानसिक बीमारी की जानकारी नहीं थी?,(3) क्या मानसिक तौर पर विचलित/विक्षिप्त/बीमार व्यक्ति इस स्थिति में हो सकता है कि जिन यात्रियों को गोलियों का निशाना बनाना है उनका चयन वह चलती हुई ट्रेन की आठ बोगियों और पैंट्री कार में घूम कर कर सके ? क्या उसके हाथों मारे गये अल्पसंख्यक समुदाय के यात्री और तथा अंतिम व्यक्ति के शव के पास खड़े होकर दी गई ‘हेट स्पीच’ किसी संयोग अथवा मानसिक असंतुलन का परिणाम हो सकती है ?
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले सामूहिक हत्याकांडों/नरसंहारों के निष्कर्ष यही बताते हैं कि घटनाओं को अंजाम देने वाले हत्यारे निरपराध लोगों की भीड़ पर बेरहमी से गोलियाँ चलते हैं। हत्यारे न तो गोलियों का शिकार बनने वालों का उनके कपड़ों और शारीरिक प्रतीकों के आधार पर चुनाव करते हैं और न ही अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता दर्शाने वाली कोई ‘हेट स्पीच’ देते हैं !
किसी व्यक्ति अगर को उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराध में इस शंका का लाभ मिल सकता है कि वह ग़ुस्सेल प्रकृति का है, मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो फिर लगातार तनावों और असुरक्षा में जीने वाली हुकूमतों को भी नागरिक उत्पीडऩों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। मणिपुर की घटना को भी उसी तरह के अपराध में शामिल किया जा सकता है !
सवाल सिर्फ तत्कालीन हुकूमतों का ही नहीं है ! नागरिकों की एक बड़ी आबादी भी कुछ तो व्यवस्था-जनित कारणों और कुछ निजी तनावों के चलते गहरे अवसाद और मानसिक बीमारियों की शिकार होती जा रही है। समाज में अपराध और आत्महत्याएँ बढ़ रही हैं। क्या सामान्य नागरिक भी किसी एक मुकाम या अंग्रेजी में जिसे ‘ट्रिगर’ या ‘टिपिंग पॉइंट’ कहते हैं, पर पहुँचकर दूसरों की जानें लेना प्रारंभ कर देंगे या फिर उन इंतजामों पर यकीन करना बंद कर देंगे जिन्हें एक व्यवस्था के तहत सत्ताओं द्वारा सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता है? यह भी हो सकता है कि नागरिक घरों से बाहर निकालना ही बंद कर दें ! दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अपनी ही राजनीतिक सुरक्षा में मशगूल सरकार को नागरिकों की बढ़ती असुरक्षा की थोड़ी सी भी जानकारी नहीं है !
राहुल गांधी के खिलाफ एक फौजदारी मामला फिलवक्त बतंगड़ के लायक नहीं है। लेकिन उसका बतंगड़ कुछ लोग अब भी मनाते रहेंगे। मेरे इस लेख का आशय वह सब नहीं है, जिसकी जानकारी लोगों को मीडिया या सोशल मीडिया के कारण हो चुकी है। मैं कुछ उलझे हुए नये सवाल उठाना चाहता हूं। उनका प्रकाशन मेरी पसंद के अखबार ‘छत्तीसगढ़’ और संपादक सुनील कुमार के जरिए बेहतर हो सकता है।
लब्बोलुआब यह है कि 13 अप्रेल 2019 को कर्नाटक के कोलार की एक सभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हल्के-फुल्के मूड में राजनीतिक घटनाओं के जिक्र में देश के धनकबाडू भगोड़े ललित मोदी और नीरव मोदी के नामों का उल्लेख करते पूछ लिया कि क्या सभी मोदी चोर होते हैं? उस कटाक्ष को कुछ लोगों और खासकर भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री को केन्द्र में रखकर समझा। बात आई-गई हो गई। लेकिन कुछ अरसा बाद गुजरात के भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने सूरत में ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में मानहानि का फौजदारी मामला राहुल के खिलाफ दायर किया। पूर्णेश ने आरोप लगाया कि राहुल ने देष के सभी मोदियों को मानो चोर कहा है और उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल किए गए। बहरहाल इस मामले में 23 मार्च 2023 में राहुल को भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के तहत दोषी ठहराते अधिकतम प्रावधानित दो वर्ष की सजा सुनाई गई। सत्र न्यायाधीश और हाईकोर्ट में सजा को स्थगित करने की राहुल की कोशिश असफल रही। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने सजा ही नहीं दोषसिद्धि (कन्विक्षन) को भी स्थगित कर दिया। राहुल गांधी को मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई सजा को सेशन्स कोर्ट में लंबित अपील के निराकरण होने तक स्थगित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता की तीन सदस्यीय बेंच ने जो कहा, वह राहुल के इस मामले की भविष्यमूलक संभावना भी है। गवई आगे चलकर चीफ जस्टिस भी बन सकते हैं। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट और हाई कोर्ट दोनों का उल्लेख करते कहा कि फैसले में सैकड़ों पेज रंग दिए गए, लेकिन यह नहीं बताया जा सका कि राहुल को अधिकतम सजा किन न्यायिक सिद्धांतों पर दी गई। न्यायिक सिद्धांतों की तो एक पुष्ट और अनुभवजन्य परंपरा है। हाई कोर्ट जज ने तो स्थगन आवेदन का निपटारा करने में ही 66 दिन का समय बर्बाद किया। जजों को माननीय प्रधानमंत्री क्यों लिखना चाहिए। संविधान पहले माननीय और आखिर में जी जोडऩे का समर्थन नहीं देता। मजिस्ट्रेट की अदालत में इतनी कानूनी खामियां हुईं जिनका ब्यौरा देना फिलवक्त जरूरी नहीं। राहुल गांधी को सजा मिलने के बाद लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (3) के तहत लोकसभा सचिवालय के आदेश पर सांसदी खत्म कर दी गई। आनन फानन में उनका सरकारी मकान मोदी सरकार ने पूरी तरह से खाली करा लिया। ऐसा प्रायोजित प्रचार भी हुआ कि राहुल गांधी का संसदीय राजनीतिक जीवन संकट में है और आगे उसके खात्मे की शुरुआत की जाने की कोशिश भी हो रही है। अलबत्ता जस्टिस गवई ने यह भी कहा कि राहुल गांधी ने जो कहा वह ‘गुड टेस्ट‘ (भोलेपन) में नहीं था।
अंगरेजों के वक्त 1860 में ही भारतीय दंड संहिता बदनाम लेकिन जहीन कानूनज्ञ लॉर्ड मैकाले के हाथों लिखी गई। उसमें संशोधन होते रहे। उसकी धारा 499 एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह की मानहानि की सजा और परिभाषा के बाबत है। कोई व्यक्ति जानबूझकर नीयतन गलत बात कहता है जिससे दूसरे व्यक्ति की सार्वजनिक रूप से तौहीन होती हैऔर वह भी झूठे आधार पर। तब मानहानि का अपराध होता है। जहीन मैकॉले ने लेकिन उन दस अपवादात्मक परिस्थितियों को भी शामिल किया जिनके रहते अपराध करना लगने पर भी अपराध होना नहीं माना जाएगा। मसलन किसी सार्वजनिक प्रश्न के बाबत किसी व्यक्ति के आचरण और चरित्र के बारे में अगर कुछ कहा जाता है। तो लोकप्रश्न शामिल होने से ऐसा कहा जाना मानहानि नहीं करता। राहुल राजनीतिक व्यक्ति हैं। उन्होंने असहमत राजनीति के कुछ किरदारोंं द्वारा पोषित और पल्लवित ललित मोदी और नीरव मोदी जैसे विश्व प्रसिद्ध भारतीय धन कबाड़ू भगोड़ों के बारे में कुछ बात कही। तो सार्वजनिक मसलों पर देष की दौलत के लुटेरोंं के मोदी उपनाम का उल्लेख करते किसकी तौहीन हो गई? राहुल के वकीलों और खासतौर पर सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने पूर्णेश मोदी के आरोप पत्र को कई तरह से तार तार किया। उसकी नियामक समझ मजिस्ट्रेट हरीष हंसमुख भाई वर्मा मेंं होनी चाहिए थी लेकिन सिंघवी की बौद्धिकता या तो मजिस्ट्रेट के सिर के ऊपर से निकल गई या मजिस्ट्रेट ने अभियोगी पक्ष से प्रभावित होकर राहुल के खिलाफ कोई गांठ बांध ली होगी। खुद शिकायत कुनिदंा पूर्णेश ने कहा ही था कि देश में करोड़ों मोदी हैं। उनकी जनभावनाएं आहत हुई हैं। इसलिए मैं उनकी ओर से भी यह परिवाद पेश कर रहा हूं। राजनीति का फितूर यहां तक कह गया कि मोदी पिछड़ी जातियों का एक उपनाम है। वह नरेन्द्र मोदी का भी है। इसलिए राहुल का कथन पिछड़ी जातियों का खुला अपमान है। राजनीतिक मुद्दे इस तरह भी न्यायालय के लिए पैदा किए जाते हैं।
सचाई यह है कि मोदी उपनाम की कोई कानूनी मान्यता की पहचान नहीं है। खुद पूर्णेश ने अपना मोदी उपनाम इस्तेमाल करना पहले ही छोड़ रखा है। नरेन्द्र मोदी, ललित मोदी, नीरव मोदी, सैयद मोदी, पीलू मोदी वगैरह नाम एक ही धर्म, जाति या कुनबे के मोदी नहीं हैं। फिर भी मुकदमा तो किया ही जाना था और हो गया। चुनावी या अन्यथा जनसभाओं के माहौल में हल्की फुल्की बातें तमाम नेताओं द्वारा कहे जाने की रवायत रही है। राहुल के कटाक्ष के बाद सभा में या बाहर भृकुटियां नहीं तनीं। लोग हंसे होंगे मुस्कराए भी। तालियां भी बजीं और उस दिन मामला हवा में उड़ गया। ऐसे किस्से होते रहते हैं। उन्हेंं धारा 499 की बेडिय़ों में नहीं जकड़ा जाता रहा है। फ्रांसीसी विमान राफेल खरीदी विवाद में कई दिनों तक राहुल कहते रहे ‘चौकीदार ही चोर है।’ चौकीदारों के संगठनों ने मुकदमा दायर नहीं किया। उस चौकीदार ने भी नहीं, जिसकी ओर इषारा किया गया समझा गया होगा। चोरों के संगठन ने भी नहीं किया कि हमें चौकीदार क्यों कहा जा रहा है। राहुल के मुकदमे में मजिस्ट्रेटी फैसला आने के बाद गुजरात में ही मोदी समाज के नाम पर एक बड़ी सभा केन्द्र और गुुजरात सरकार के अप्रत्यक्ष इशारे या मदद के साथ की गई। पहले ऐसे कथित मोदी समाज का कोई सार्वजनिक सम्मेलन किया गया हो, ऐसा सुनाई नहीं पड़ता। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सम्मेलन में पूर्णेष मोदी का उल्लेख करते उनका अभिनंदन किया। इस तरह मजिस्ट्रेट के फैसले को भाजपा ने खुलेआम जुडक़र अपना राजनीतिक हथियार बना लिया। नरेन्द्र मोदी चुप रहे। उन्हें ‘आग लगाए जमालो दूर खड़ी‘ वाला मुहावरा मालूम रहा होगा।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने गुजरात हाई कोर्ट के आचरण पर भी चुप्पी नहीं बरती। जो कहना था सो कह दिया। गुजरात के ही निवासी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को कोर्ट से अनुरोध करना पड़ा कि गुजरात हाई कोर्ट के जज को लेकर और टिप्पणी नहीं की जाए। वरना उसका परिणाम कुछ और हो सकता है। तब भी बेंच ने कहा कि गुजरात से तरह तरह के फैसले आते हुए दिखाई तो पड़ रहे हैं। इससे ज़्यादा कोई क्या कहेगा? कोई चार पांच महीने तक राहुल गांधी को जिल्लत झेलनी पड़ी। सांसदी गई। राजनीतिक हैसियत का षासकीय मकान छीना गया। उनके खिलाफ तरह तरह के लांछन लगाए गए, जिनकी ज़रूरत नहीं थी। फिर भी राहुल गांधी ने हर स्तर पर कहा वे अपने कहे को लेकर माफी नहीं मांगेंगे। यह सिद्ध हुआ कि इस प्रकरण में माफी मांगने से अपने आत्मसम्मान का गुड़ गोबर कर देना होता। राहुल और उनकी कानूनी सलाहकार टीम को इत्मीनान रहा होगा कि नीचे चाहे जो हो। सुप्रीम कोर्ट में तो उनके साथ कानूनी नस्ल का न्याय होगा और वह हुआ।
मुख्य सवाल राहुल गांधी के मुकदमे के सफल होने का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों की रोषनी में सत्र न्यायालय में लम्बित अपील शिकायत कुनिंदा के लिए टांय टांय फिस्स होने वाली है। भाजपा नेताओं ने होम करने का सोचा था लेकिन उनकी प्रतिष्ठा के हाथ जल गए। अचरज है उनके बड़े विधिक सलाहकारों ने भी टीवी चैनलों पर आकर ऐसी थोकबन्द बुड़बक बयानी की जिससे उनके कानूनी ज्ञान पर ही संदेह होता है। उन्होंने स्तुति वाचक के रूप में अपना कायांतर कर लिया होगा। सवाल है कि एक मजिस्ट्रेट को एक सांसद या विधायक के मामले में इतने कानूनी अधिकार क्यों मिल गए हैं कि वह यदि मामले में आरोपी सांसद या विधायक को दो वर्ष की सजा दे तो उस राजनेता का भविष्य एक तरह से खात्मे की ओर धकेल दे। वह कम से कम छ: साल चुनाव नहीं लड़ पाएगा।
आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 से संविधान ही देश का बुनियादी कानूनी दस्तावेज है। संविधान के अनुच्छेद 19 में बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी मुख्य अधिकार है। लेकिन उस पर कुछ प्रतिबंध भी हैं। मानहानि भी एक प्रतिबंध है। व्यक्ति का मानहानि करना प्रतिबंधित संवैधानिक अधिकार होगा। भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के तहत मानहानि अंगरेजी हुकूमतशाही की उपज है। तब संविधान नहीं था। मानहानि का अपराध दंड संहिता में सबसे लचर, कमजोर और सरकार के हस्तक्षेप के अयोग्य अपराध है। यह तत्काल जमानत योग्य है। सरकार और पुलिस इसका संज्ञान नहीं ले सकते। आरोपी तथा षिकायतकुनिंदा किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना भी समझौता कर सकते हैं। इतना लाचार, मासूम, उपेक्षित और दो व्यक्तियों के बीच कोर्ट कचहरी करने के निजी इरादों में शामिल बेचारा अपराध एक मजिस्ट्रेट के हाथ पडक़र संविधान के सबसे दंडनीय हथियार के रूप में इस्तेमाल हो गया। भारत में हजारों मजिस्ट्रेट हैं। लाखों क्या करोड़ों राजनीतिक महत्वाकांक्षी उम्मीदवार हो सकते हैं। ऐसे किसी अपराध में कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति एक मजिस्ट्रेट को पटाकर (जो कठिन नहीं है)। अपने किसी विरोधी को दो बरस की सजा दिला दे। फिर तो षडय़ंत्र करने वाले व्यक्ति की पौ बारह है।
राहुल प्रकरण से एक चिंताजनक संवैधानिक स्थिति पैदा हुई है। सब जानते हैं देश में मजिस्ट्रेटों की बौद्धिक और नैतिक क्या हालत होती है। अदालतों से कैसे भी आदेश किसी के खिलाफ भी हो जाते हैं या ले लिए जाते हैं। फिर तो फैसले के कारण बवंडर मचेगा ही। राजनीतिक उथल पुथल होगी। किसी प्रतिनिधि का भाग्य या उसका भविष्य खराब हो सकता है। अब सजा को लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम से जोड़ दिया गया। तब कई फैसले जानबूझकर कराए जा सकते हैं। देश के नेताओं और बड़े अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय उर्फ ईडी, इन्कम टैक्स, सीबीआई सब का हंगामा है। अब किसी को भी 2 वर्ष की सजा दिलाना कठिन नहीं होगा। कई मुकदमों में हो चुका है। लालू यादव का मुकदमा सबको याद रखना चाहिए।
ऐसी हालत में लोक प्रतिनिधित्व कानून को समझना बहुत ज़रूरी है। सांसदों, विधायकों के भविष्य को मजिस्ट्रेटों के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता। मसलन अश्लीलता को लेकर दंड संहिता में धारा 292, 294 आदि हैं। वहां किसी भी लेखक की कृति, पुस्तक, कविता, उपन्यास, चित्रकला, नाटक की कब्जेदारी या प्रदर्षन को लेकर कोई भी रिपोर्ट कर सकता है कि यह रचना अश्लील है। उसमें पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है। थानेदार कविता में अश्लीलता कैसे ढूंढ सकता है? लेकिन ढूंढ लेता है। सजा हो गई तो उस निर्वाचित प्रतिनिधि का भविष्य थानेदार के विवेक की सलीब पर हो सकता है। यह अनुमति संविधान क्यों देता है? भारतीय अपराध व्यवस्था में बहुत झोल है। अब तो राजनेता इस तरह के हो गए हैं कि दूसरे की गर्दन मरोडऩे, गड्ढे में डालने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती। उनके अंदर ईमान और परस्पर सहानुभूति का तो दौर खत्म हो गया है। आगे और बुरा दौर आने वाला है। गुजरात के ही एक मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ जमानती वारंट षायद निकाल दिया था न?
आजादी के बाद संसद में लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 बनाया गया। उसकी धारा 8 (3) में लिखा है यदि किसी व्यक्ति को दो वर्ष के लिए सजा दे दी जाए। तो अगले 6 वर्ष तक चुनाव लडऩे के काबिल नहीं रहेगा। लेकिन धारा 8 (4) के मुताबिक ऐसा ही होने पर सांसदों विधायकों के लिए सुरक्षा है कि सजा के खिलाफ अपील या रिवीजन कर दें। जब तक उसका निपटारा नहीं होता, तब तक वे सांसद या विधायक बने रह सकते हैं और अगला चुनाव भी लड़ सकते हैं। यह संशोधन राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में 15/03/1989 को किया गया। यह बात कुछ समाज सेवकों को गैर मुनासिब लगी। 1999 में स्वैच्छिक संस्था असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीएफआर) ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दी कि उम्मीदवारों की पूरी कुंडली उनकी योग्यता, अपराध, आर्थिक स्थिति वगैरह के बारे में जनता को दिया जाना सुनिश्चित हो। अचरज है कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने याचिका का विरोध किया कि संविधान में इस बात का प्रावधान नहीं है। हाईकोर्ट ने शासन को सीधा निर्देष तो नहीं दिया लेकिन चुनाव आयोग से कहा कि मुनासिब कार्यवाही करें। इसके समानान्तर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरटीज (पीयूसीएल) ने सीधे सुप्रीम कोर्ट मे याचिका लगाई कि जनता के मूल अधिकारों को कानूनी जामा पहनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात मानते 2 मई 2002 को अनुकूल फैसला किया। सरकार नेे अधिनियम की धारा 33 (क) के तहत सूचनाएं देना तो मंजूर किया लेकिन धारा 33 (ख) के तहत कई प्रतिबंध लगा दिए। पीयूसीएल ने फिर याचिका लगाई कि धारा 33 (ख) को निरस्त किया जाए। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसले में कटाक्ष भी किया कि पहले कभी जमाना था। जब 60 बरस की उम्र का कोई डाकू किसी नवयुवती से जबरिया शादी कर लेता था। अब ऐसी सामाजिक हालत नहीं है क्योंकि ये डाकू वृत्ति राजनीतिक उम्मीदवारों के लिए कायम रहने दी गई। जनता के संवैधानिक अधिकार उम्मीदवारों के अधिनियमित अधिकारों से कहीं श्रेष्ठ हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त कथित धारा 33 (ख) 13 मार्च 2003 को रद्द कर दी। उसे अटल बिहारी की भाजपाई सरकार ने षामिल किया था कि देश की किसी भी अदालत या चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के चरित्र के संबंध में सवाल करने का अधिकार नहीं है। ऐसा अधिकार केवल संसद को है। कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे को कोसती भर हैं कि मेरी कमीज तेरी कमीज से ज़्यादा उजली है। बाकी कई पार्टियां स्वार्थ में सहायक भूूमिका में तालियां बताती हैं। लोकतंत्र में जनता गफलत, सांसत और हैरानी में रखी जाती है। अब युवजन अपनी मर्जी से भी जीवन साथी चुन सकते हैं। क्या ऐसी ही स्थिति उम्मीदवारों और मतदाताओं के संबंधों को लेकर नहीं होनी चाहिए? क्या एक गतिषील लोकतंत्र में मतदाता को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि जो प्रतिनिधि उसके शासक, विधायक बल्कि भाग्यनिर्माता बनेंगे उनका जीवन परिचय क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने 56 पिछले फैसलों की सिलसिलेवार व्याख्या की और पूर्वज न्यायिक वचनों में व्यक्त चिंताओं का दोबारा इज़हार किया। सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी लोकतंत्रों की पुष्ट परंपराओं पर भी प्रकाश डाला। न्यायमूर्ति एम.बी.शाह, पी. वेंकटरामा रेड्डी और देवदत्त माधव धर्माधिकारी की तीन सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मत फैसला किया कि पिछले फैसले में चुनाव आयोग को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के सभी निर्देष अन्तिम रूप से लागू रहेंगे। असंवैधानिक आधारों की कोख से निकली धारा 33 (ख) को सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया।
कांग्रेस मतदाताओं को यह कैसे समझा पाएगी कि लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) में सांसदों और विधायकों को संविधानेतर महामानव बनाने का कुचक्र कांग्रेस के ही शासन काल में क्यों रचा गया। इस प्रावधान के कारण देश में कितने दागी सांसदों और विधायकों को संवैधानिक लाभ मिल गया। जनता के अधिकारों का कितना मखौल उड़ाया गया। इस असंवैधानिक कृत्य की भरपाई कौन करेगा? कांग्रेस की बगलगीर दिखती भारतीय जनता पार्टी के नरेन्द्र मोदी भी क्या देश की जनता को बताएंगे कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उपहास करने की मुद्रा में उनकी पार्टी ने लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 33 (ख) क्यों जोड़ी? उसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2003 में नोचकर फेंक दिया। इस संशोधित धारा के अनुसार यह भाजपाई सरकार का विचार था कि देश की किसी भी अदालत या चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के चरित्र के संबंध में सवाल करने का अधिकार नहीं है। क्यों नहीं कांग्रेस और भाजपा मिलकर देश के सामने एक माफीनामा जारी करें कि चुनावी भ्रष्टाचार को लेकर दोनों की पार्टनरषिप रही है और अब भी है। सांसदों के वेतन भत्ते और सुविधाओं को बढ़ाने के नाम पर संसद की कार्यवाही कभी ठप्प नहीं होती। लेकिन जनता की समस्याओं को लेकर सभी पार्टियां मुखौटे लगाती हैं जिससे पीछे का घिनौना चेहरा जनता को दिखाई नहीं दे। उपरोक्त निर्णय के निर्देषों का आधा अधूरा पालन करने की आड़ में एन.डी.ए. सरकार ने लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 33 (क) और धारा 33 (ख) जोड़ते हुए पहले अध्यादेश और बाद में अधिनियम पारित किया। धारा 33 (क) के तहत उम्मीदवार को बताना होगा कि उसके खिलाफ गंभीर अपराधिक वृत्ति के मुकदमों का निर्णय हुआ या कायमी है जिनके तहत दो वर्ष से अधिक की सजा हुई है या हो सकती है। इसके अलावा यदि उम्मीदवारों को धारा 8 में वर्णित अन्य अपराधों की सजा मिली हो तो उनकी जानकारी भी शपथ पत्र पर दी जाए। लेकिन इस धारा में उम्मीदवारों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति के बारे में जान-बूझकर ओढ़ी हुई खामोशी बोलती रही। धारा 33 (ख) की भाषा तो फैसले का सीधा मज़ाक उड़ाती दिखी। उसमें कहा गया कि किसी भी अदालती निर्णय या चुनाव आयोग के निर्देष के रहते हुए भी उम्मीदवार उपरोक्त सूचनाएं चुनाव आयोग को तब तक नहीं देंगे, जब तक ऐसा संबंधित अधिनियमों अथवा नियमों में प्रावधानित नहीं किया गया हो। ज़ाहिर है यह उपधारा सुप्रीम कोर्ट तक को ठेंगा या आंखें दिखाने की वर्जिश थी।
लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (1) तथा (2) में कई नामजद अपराध हैं जिनमें दो वर्ष से भी कम सजा होने पर तत्काल प्रभाव से सदन की अयोग्यता प्रभावशीलहो जाती है। इनमें भारतीय दंड संहिता से अलग हटकर समुदायों के बीच सामाजिक विद्वेष, चुनाव संबंधी अपराध, बलात्कार, स्त्री के प्रति क्रूरता आदि सहित नागरिक अधिकार अधिनियम, कस्टम अधिनियम, गैर कानूनी गतिविधि प्रतिरोध अधिनियम, फेरा, मादक द्रव्य संबंधी अपराध, आतंककारी गतिविधियां, पूजा स्थल संबंधित अधिनियम के अपराध, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों का अपमान, सती प्रतिषेध अधिनियम, भ्रष्टाचार अधिनियम, मुनाफाखोरी तथा जमाखोरी तथा मिलावटखोरी के अपराध और दहेज संबंधी अपराध षामिल हैं।
संसद ने लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) के अनुसार 1989 से दो वर्ष या अधिक के लिए दोषसिद्ध होकर सजा प्राप्त सांसदों और विधायकों को तब तक के लिए अपनी कुर्सी पर बैठे रहने का अभयदान दे दिया कि जब तक उनके अपराधिक प्रकरणों से संबंधित अपीलों का अंतत: निपटारा नहीं हो जाता। इस संषोधित प्रावधान को सोलह वर्ष बाद ‘लोक प्रहरी’ नामक संस्था की ओर से एस. एन. शुक्ला तथा अधिवक्ता लिली थॉमस ने जनहित याचिकाओं के रूप में चुनौती दी। आठ वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित इन याचिकाओं को 10 जुलाई 2013 को न्यायमूर्तिद्वय ए. के. पटनायक और एस. जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने निराकृत करते हुए सांसदों, विधायकों को कन्सेषन देती धारा 8 (4) को असंवैधानिक करार दिया। सांसद और विधायक संविधान को अजीबोगरीब बीजक, रहस्य-पुस्तिका या बौद्धिक तंत्रशास्त्र भी बनाते रहे हैं। यह पोथी ईमानदार, देशभक्त लेकिन ज्यादातर पारंपरिक ब्रिटिश-बुद्धि का समर्थन करने वाले हस्ताक्षरों ने लिखी थी। उन्हें अन्दाज नहीं था कि अंगरेजी सल्तनत से लोहा लेने वाली पीढ़ी के वंशज लोकतंत्र और आईन के सामने इतनी पेचीदगियां पेष करेंगे कि संविधान को ही पसीना आ जाएगा।
बुद्धिजीवी वर्ग उम्मीद कर रहा था कि अब मनमोहन सरकार के पास दो ही विकल्प हैं। एक तो यह कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही पुनर्विचार याचिका दायर करे कि उसके फैसले से लोकतंत्र के संचालन में अनपेक्षित दिक्कतें आएंगी। स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाली सरकारों के दौर में संसद या विधानमंडलों को चलाना वैसे ही मुश्किल होता है। दूसरा विकल्प था संसद उपरोक्त धारा 8 (4) को ही संशोधित कर दे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव का सांप मर जाए और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा की लाठी भी नहीं टूटे। भाजपा सरकार ने एक के बाद एक दोनों काम किए। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की पुनर्विचार याचिका यह कहते ठुकरा दी कि उसके फैसले में कानून के नज़रिए से कोई तात्विक गलती नहीं है। अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया कि वह उस हिस्से पर पुनर्विचार करेगा जिसमें कहा गया है कि जनप्रतिनिधि जेल में रहते हुए चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने संसद को फिर विश्वास में लेकर उपरोक्त धारा 8 (4) को बदलकर अध्यादेष के अनुसार संशोधित कर दिया। सरकार ने तमाम राजनैतिक दलों को विष्वास में लेकर प्रस्तावित किया कि दो वर्ष या अधिक की सजा पाने के तत्काल बाद अपील या रिवीजऩ दायर करने भर की स्थिति में अपील न्यायालय से स्थगन पाने के बाद सजा का फैसला प्रभावशील नहीं होगा। जब तक अपील या रिवीजन का अंतिम फैसला नहीं आता। तब तक संबंधित सांसद या विधायक वेतन तथा भत्ते नहीं ले सकेंगे। तथा विधायिका की कार्यवाही में वोट भी नहीं दे सकेंगे।
उपरोक्त कानूनी और संवैधानिक स्थिति में राहुल गांधी ने अपनी ही मनमोहन सरकार के द्वारा प्रस्तावित वह अध्यादेश फाडक़र फेंक दिया था जिसमें सांसदों, विधायकों को वह सुरक्षा मिलनी थी कि वे पुन: सजायाफ्ता होने पर भी अपील और रिवीजन के न्यायालय में लंबित रहने तक अपने पद का पूरा फायदा उठा सकते हैं। राहुल सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से हम राय थे जिसमें कहा गया था कि लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (3) जो जनता के लिए लागू होती है उसके मुकाबले धारा 8 (4) जो सांसदों, विधायकों को अपराध सिद्ध होने के फैसले के बावजूद पद पर बने रहने की बल्कि अगला चुनाव लडऩे की भी रियायत देती है। वह बिल्कुल मंजूर करने लायक नहीं है। जब राहुल को सजा मिली तो कई लोगों ने मज़ाक उड़ाया कि अगर राहुल ने भरी प्रेस कांफ्रेंस में अपनी ही सरकार का प्रस्तावित अध्यादेष फाडक़र फूहड़ ढंग से नहीं फेंका होता। तो गुजरात के मजिस्ट्रेट द्वारा 2 वर्ष की सजा दिए जाने के बाद भी राहुल सांसद भले बने रह सकते थे लेकिन अगला चुनाव भी लड़ सकते थे। जब तक कि अपील या रिवीजन न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आ जाए। लोगों ने राहुल के नैतिक चरित्र को उनके राजनीतिक चरित्र के अंगूठे के नीचे दबा देखना चाहा। पूरी संसद में केवल राहुल हैं जिन्होंने ऐलानिया कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का अपने आचरण के जरिए इस्तकबाल करते हैं। जो कहता है देश के किसी भी नागरिक को चुनाव लडऩे संबंधी जितनेअधिकार और प्रतिबंध हैं। उनसे कहीं आगे बढक़र सांसदों, विधायकों को अधिकार नहीं मिलने चाहिए।
वर्ष 2024 खतरे की घंटी बजाता आ रहा है। मौजूदा केन्द्र सरकार के रहमोकरम पर देश की पूरी राजनीति और विपक्षी पार्टियों का नेतृत्व है। प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, इन्कम टैक्स तथा कई और पुलिसिया एजेंसियों पर केन्द्र सरकार का दबदबा है, यहां तक कि चुनाव आयोग तक पर। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में ऐसे कई विशिष्ट अधिनियमों के अपराध हैं उनमें दो वर्ष की सजा तो क्या केवल जुर्माना लग जाए या छह महीने से कम की भी सजा हो जाए। तो भी उनका सजा की तारीख से अगले छह वर्ष तक चुनाव लडऩा मूमानियत पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट के जज खानविलकर की बेंच की कृपा से ई.डी. को अतिरिक्त और अकूत अधिकार मिल गए हैं। इसलिए वह हर नेता की प्रतिष्ठा और राजनीति में घुसे रहना चाहती। कितने मामलों में कोई सुप्रीम कोर्ट जाएगा और कब और कैसे? देश के हाई कोर्ट के जज जान-पहचान, रिश्तेदारी, मद और तिकड़म के आधार पर भी बनते हैं। आधे से ज्यादा मजिस्ट्रेट को तो अपना कानूनी ज्ञान फिर से चुस्तदुरुस्त करना हो सकता है। राहुल गांधी का प्रकरण तो चावल के पतीले मेंं एक पका हुआ दाना है। जिनके हाथ में सत्ता है, उन्हें आगे की कोई चिंता नहीं है। क्या मजिस्ट्रेट और बाकी एजेेसियां विधायकों और सांसदों के भविष्य को अपनी कलम से तय करेंगी कि कितना लोकतंत्र बचेगा? चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर याचिका कोई लगाता है तो सीधे हाई कोर्ट में ट्रायल होता है। वहां मामले को सिद्ध करना टेढ़ी खीर होती है। मजिस्ट्रेट की अदालत से तो देश में जाने कितने फैसले हो सकते हैं। इस ओर राजनेताओं का ध्यान क्यों नहीं जाता? जब सबसे लचर और कमजोर निजी परिवाद पत्र पर जबरिया सजा दे दी जाती है और सुप्रीम कोर्ट अगर आड़े नहीं आए तो राहुल गांधी जैसे कद्दावर नेता का राजनीतिक भविष्य संदिग्ध हो ही सकता था। अब देश में कितने तिकड़मी होंगे जो शासन विरोधियों को मजिस्ट्रेट के इजलास में फांसकर सजा दिला दें। आजाद भारत में कई परिवार हैं जहां एक सदस्य मजिस्ट्रेट, दूसरा राजनीतिक नेता, तीसरा व्यापारी और चौथा समाजसेवक या अन्य अधिकारी हो सकता है। मजिस्ट्रेट से कोई सजा दिलाए और किसी का राजनीतिक कैरियर चौपट कर दे। यह तो कई राजनीतिक किरदारों की कहानी बन सकती है। लोकतंत्र में मूल अधिकारों का इतना भयावह शोषण समझ से परे है।
-अपूर्व गर्ग
दोस्ती में प्यार, पवत्रिता, सत्यता तो ठीक दोस्ती में उमंग, जोश और मजे भी ज़रूरी हैं. जिस दोस्ती में ज़िंदा दिली हो, कटाक्ष हों, दोस्तों के बीच व्यंग्य हो वो दोस्ती दोस्तों के जाने के बाद भी यादगार बन जाती है, गुदगुदाती है और दोस्तों ही नहीं सबके जीवन में रंग -तरंग पैदा करती है.
इस लिहाज़ से मुझे साहित्यकारों की दोस्ती ने सबसे ज़्यादा रोमांचित किया और आकर्षित किया. आज फ्रेंडशिप डे पर रटे-रटाये मुहावरे, उद्धरण, कविताओं की जगह मुझे याद आते हैं साहित्यकार दोस्तों के आपसी संवाद जो हर बार गुदगुदा जाते हैं मुस्कान छोड़ जाते हैं.
आज मित्रता दिवस पर इन साहित्यकार दोस्तों से सीखिए सेंस ऑफ़ ह्यूमर क्या है ? दोस्ती में तीखे कटाक्ष-व्यंग्य से कैसे दोस्तों के गाल गुलाबी होते रहे.
दोस्तों अति गंभीरता, रूखापन ,अवसादी और बीमार चेहरे के साथ क्या दोस्ती करेंगे. दोस्ती में हंसी मज़ाक, खींचतान होनी चाहिए ये अच्छे विटामिन साबित होंगे ... दोस्ती में बुरा मानना छोड़िये ..
ज़रा इधर नज़रें तो इनायत करिये ..
रवींद्र कालिया लिखते हैं, काशीनाथ जी के मन में देशी वस्तुओं के प्रति इतना लगाव है कि वे आज तक दातौन का त्याग नहीं कर पाए .आज जब समधी समेत उनकी पीढ़ी के तमाम रचनाकार टूथ ब्रुश का इस्तेमाल करने लगे हैं, काशीजी की चाल है, वे मंद -मंद दातौन करते रहते हैं, जब वो चिंतन करते हैं तो दातौन थाम लेते हैं. रात जब तक सो नहीं जाते दातौन करते रहते हैं ....जिस तरह लोग बगल में चश्मा उतारकर सो जाते हैं, काशीनाथजी दातौन रख कर सो जाते हैं ...काशीनाथजी जब परेशान होते हैं दातौन करते हैं, खुश होते हैं तो दातौन करते हैं ...
काशीनाथ जी ने लिखा है ' किस्सा-कहानी में नामी- गिरामी ! शराफत की लत के मारे बेचारे, इसके बावजूद परम हरामी !इन हरामियों में सिरमौर रवींद्र कालिया. मेरा ख़्याल है वह यदि हरामीपन में उतर आये तो राजेंद्र यादव तो मान लीजिये वह शरीफ आदमी हो चले हैं, लेकिन कमलेश्वर जैसे 'चूड़ामणि ' भी उसके आगे पानी भरें ...'
कमलेश्वर राजेंद्र यादव के लिए लिखते हैं : " जब भी साथ बैठते तो राजेंद्र ही हमारी मज़ाकों का निशाना बन जाता. ये मात्र स्थिति जन्य घटनाएं होतीं. इनके पीछे कोई इतिहास नहीं होता था ..मात्र आदतों या सहज कुंठाओं के कोण होते. अब जैसे यही कि मन्नू से ही, मज़ाक मज़ाक में हमें ये मालूम हुआ था कि राजेंद्र अपनी हर चीज़ ताले में बंद रखने की आदत से ग्रस्त था .........पूस रोड वाले उस घर में राजेंद्र उसी तालाबंदी वाले दौर में आया था. सुबह उठा तो उसने अपने कुछ एक ताले खोलकर ब्रुश और पेस्ट निकाला. मैंने गायत्री को आवाज़ लगाई और एक छोटा ताला मंगवाकर राजेंद्र के ब्रुश वाले छेद में लगा दिया. राजेंद्र पहले तो किलकारी मारकर हंसा, फिर बोला - स्साला ....
राकेश भी खड़ा हंस रहा था. तू हर छेद में ताला डालने के लिए उतावला रहता है, तो यह छेद ही क्यों खाली रह जाए.. ''
राजेंद्र यादव 'मेरा हमदम, मेरा दोस्त कमलेश्वर' यानी अपने इस मिस्चीवियस यार के लिए लिखते हैं : "लेकिन कमलेश्वर शक्ल से बदमाश नहीं शैतान और इंटेलीजेंट लगता है. हो सकता है दुष्यंत ने कमलेश्वर को 'कैदियों' वाली उस पोशाक में देखकर ऐसा कहा हो जिसे वह गर्व से 'नाईट ड्रेस' कहता है या इलाहाबाद में अश्कजी के यहाँ उमेश की शादी पर उसे बाक़ायदा साबुन और ब्रश लेकर मेरी और राकेश की हज़ामत बनाते देख लिया हो. लेकिन मूलतः कमलेश्वर बदमाश नहीं, दुष्ट -यानी मिस्चीवियस अधिक है.
शीन काफ़ से दुरुस्त तलफ़्फ़ुज़, साफ़ और तराशी हुई संतुलित आवाज़, बात को निहायत प्रभावकारी तरीके से कहने की कला, पतले-पतले होंठ, तीखे और फोटोजनिक नक्श, सांवला रंग और शातिर आँखें ...लगता है जैसे आप सचमुच किसी समझदार आदमी से बात कर रहे हैं. एक हाथ की उँगलियाँ खोल -खोल कर मेज़ पर हाथ पटक-पटककर वह आपको घंटों किसी ऐसी किताब, फ़िल्म, घटना , कहानी या चीज़ के बारे में सविस्तार, पूर्ण-आत्मविश्वास से बताता रहेगा, जिसे न उसने पढ़ा है, न देखा है ....और न उसके बारे में उसे जानकारी है ....मुँह से जब झूठ बोलता है तो एक अच्छी कंपनी होता है और क़लम से बोलता है तो एक सफल कहानीकार.''
मोहन राकेश लिखते हैं : " एक एक्सक्लेमेशन मार्क उर्फ़ ...
राजेंद्र यादव !
न जाने क्यों जब भी ये नाम मेरे ज़हन में उभरता है , तो इसके आगे एक एक्सक्लेमेशन मार्क लगा होता है - जैसे कि बिना इस मार्क के इस नाम के हिज्जे ही पूरे न होते हों ........
मगर आदमी निहायत अन्प्रिडिक्टबल है . कब क्या कहेगा ,क्या कर बैठेगा , इसका कोई ठिकाना नहीं घर की सुख सुविधा हो ,तो आज आपको लिखने के लिए अज्ञातवास चाहिए ....और अज्ञातवास में आपको आपको कनॉटप्लेस ,चौरंगी सब कुछ चाहिए. आदमी इससे कुछ कहे उसके लिए ज़रूरी है उसके पुट्ठे काफ़ी मज़बूत हों. क्योंकि बातों से बस नहीं चलेगा, तो यह कमर में एक घूँसा जमा देगा. उसे आप झेल जाएँ, तो गर्दन पर सवार हो लेगा .आप इसे नीचे पटक दें, तो हाथ पर हाथ मारकर हँसेगा और पाजामे से धूल झाड़ता हुआ उठकर कहेगा, ''मार दिया ''! मार दिया साले को ! साहित्य में भी तेरी यही दुर्गति करने वाला हूँ. अभी से अपना और अपने साहित्य का बीमा करवा ले. नहीं तो साले दोनों को कोई रोने वाला नहीं मिलेगा ..''
मोहन राकेश ने लिखा है :-- " साहित्यिक जीवन में दोस्ती अक्सर दो -चार साल से ज़्यादा नहीं चलती .इस बीच एक दूसरे के काफ़ी ..... 'घटियापन ' के सबूत जमा हो जाते हैं .....हमारी दोस्ती -दुश्मनी जो भी है , लड़ते -झगड़ते हुई थी , उसी तरह चल रही है, और चलती रहेगी ....''
कृष्ण बलदेव वैद अपने सपने पर लिखते हैं 'निर्मल किसी की पीठ पीछे छिपा बैठा है. चंपा मुझे और दूसरे लोगों को कुछ दे रही है खाने के लिए . मैं उससे कहता हूँ , निर्मल को भी एक बिस्कुट दे दो , एक डॉग बिस्कुट . निर्मल लोटपोट होने लगता है तो मेरी नींद खुल जाती है .''
कथाकार बलवंत सिंह लिखते हैं वो अपने मित्र सुप्रसिद्ध लेखक राजेंद्र सिंह बेदी के घर रुके हुए हैं. बेदी का छोटा भाई अखबार पढ़ रहा है .श्रीमती बेदी रसोई में हैं .-''ठीक इसी अवसर पर बेदी कच्छा पहने दूसरे कमरे से निकलता है और ........हमारी नज़रें मिलती हैं तो दिल के तार बज उठते हैं .वो भेड़ की नक़ल करते हुए बड़ी लय के साथ 'बे ' की आवाज़ निकालता है और मैं तुरंत उत्तर में ' दे ' की ध्वनि उच्चारित करता हूँ. दोनों ओर से ये आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगता है ...... इसके बाद बेदी ढेंचू - ढेंचू की ध्वनि निकलने लगता हैं ओर प्रत्युत्तर में मैं मुँह से बिल्लियां लड़ाने लगता हूँ ...इस पर एक कोलाहल मच जाता है ओर बच्चे, गृहणी हँसी से लोट -पोट ..
मंटो -इस्मत के संवाद भी सुनिए ;
“मुझे अपने पैरों से घिन आती है.” मंटो ने कहा.
“क्यों? इतने खूबसूरत हैं.” इस्मत चुगताई ने बहस की.
“मंटो-मेरे पैर बिल्कुल जनाने हैं.”
“इस्मत चुगताई -मगर जनानियों से तो इतनी दिलचस्पी है आपकी.”
“मंटो--आप तो उल्टी बहस करती हैं, मैं औरत को मर्द की हैसियत से प्यार करता हूँ.
इसका मतलब ये तो नहीं कि खुद औरत बन जाऊँ.”
यादों की बारात का ही एक रोचक प्रसंग याद आया ...
एक बार ऐसा हुआ जोश मलीहाबादी शिमला गए हुए थे .जोश मलीहाबादी को पता चला नेहरूजी भी शिमला में हैं. उन्होंने फ़ोन किया सेक्रेटरी मुलाकात न करवा सकी। जोश मलीहाबादी ने अपने जोश के मुताबिक नेहरूजी को कड़ा पत्र लिखा. दूसरे दिन इंदिरा गाँधी का फ़ोन आया आप आइये मेरे साथ चाय पीजिये . जोश ने कहा ,-''बेटी वहां तुम्हारे बाप मौजूद होंगे, मैं उनसे मिलना नहीं चाहता .'' इंदिरा ने कहा -''मैं पिताजी को अपने कमरे में बुलाऊंगी ही नहीं''
जोश जब पहुंचे तो पंडित नेहरू पीछे से जोश पकड़कर सीधे अपने कमरे में ले गए और इसके बाद पंडित नेहरू जोश से जिस दोस्ती से मिले जोश नेहरूजी के गले लग कर रोने लगे.
मनीष सिंह
अवध में बगावत की चिंगारियां फूट रही थी।
मंगल पांडे बैरकपुर छावनी में अपने साथियों के साथ धर्म बचाने की कोशिश में लगे थे। लार्ड कैनिंग ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल बनकर भारत आ चुके थे। उन्हें आने वाले तूफान का कोई अंदाजा नहीं था। इस वक्त न्यूयार्क में सेंट्रल पार्क की सीमायें बांधी जा रही थी।
मैनहटन एक दलदली आइलैंड पर बसा है। चारो तरफ मनुष्य की बढ़ती आबादी के बीच, जंगल कटते जा रहे थे, न्यूयॉर्क सिटी काउंसिल ने 1857 में एक पार्क बनाना तय किया।
पार्क क्या कहें जंगल कह लें।
कोई 800 एकड़ का रकबा, जिसमे झीलें भी है। ढाई, तीन सौ साल पुराने पेड़ हैं। अगर आप नए है, तो इस जंगलनुमा पार्क में रास्ता भूल सकते है।
तो जब बगावत के झंझावात से निकलकर, हिंदुस्तान में ब्रिटिश ने अपनी डोलती सत्ता को दोबारा स्थिर किया। कम्पनी को हटाकर क्राउन ने सत्ता अपने हाथ मे ली, उस वर्ष, यानी 1858 में न्यूयार्क सेंट्रल पार्क, आम जनता के लिए खोल दिया गया।
ये पार्क आयत के आकार का है। एक पार से दूसरे पार जाना हो, तो पार्क से होकर पैदल जाइये। या फिर आयत की बाहरी सडक़ों से पूरा गोल घूमकर जाइये। कोई फ्लाईओवर नही है।
भीतर कोई चर्च भी नही है। कन्वेंशन सेंटर है, सामुदायिक भवन कह लें, जिसमे कुछ आयोजन समय समय पर किये जाते हैं।
और ये बहुत विशाल पार्क नहीं है। न्यूयार्क में साइज के लिहाज से पांचवें नंबर का पार्क है। याने चार पार्क इससे बड़े हैं, छोटो की गिनती कठिन है।
आपके आसपास कौन सा पार्क है, सोचिये। किस आकार का है। सबसे पुराना पेड़ कितना पुराना है। जब बना था, तब से आज तक कितनी जमीन घटी है। कब्जेदार कौन लोग है??
पुराने बाग, अमूमन कम्पनी गार्डन कहलाते हैं।
अब उनके नाम महात्मा गांधी, कमला नेहरू या दीनदयाल पार्क हो गए होंगे। नए कितने बने? पुराने कितने नष्ट हुए? जरा सोचें।
दरअसल अर्बन प्लानिंग के नाम पर, हमने पिछले 200 साल कुछ किया नही है। सौ साल पुराने पेड़ काटकर सेंट्रल विस्टा बनाने वाली कौम जब अपनी राजधानी को नहीं छोड़ती, छोटे शहरों की कौन कहे।
सांस रोकते फ्लाइओवरों तले, रेंगते हुए हमारे अर्बन क्लास को, फिलहाल 2000 किलोमीटर दूर बने किसी मंदिर और सैंकड़ों करोड़ के धार्मिक कॉरिडोर का नशा है।
पर उसके घर के बच्चे एक अदद पार्क और थोड़ी हरियाली के बीच बेसाख्ता दौडऩे के लिए, छुट्टियों में किसी टूरिस्ट प्लेस पर जाने की बाट जोहते है।
फिर जवान होने पर वीजा की लाइन लगाते हैं। ताकि उनके बच्चे..
किसी सेंट्रल पार्क में टहल सकें।
डॉ. आर.के. पालीवाल
राहुल गांधी की सजा पर रोक लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणियां की हैं वे न केवल देश के सभी न्यायालयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं बल्कि लोकतंत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मानहानि के मुकदमे में अधिकतम सजा सुनाते हुए न्यायालय को यह बताना चाहिए था कि वे इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दे रहे हैं? निचली अदालत ने इस मामले में यह नहीं बताया है इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे उचित नहीं माना है। सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी का यह भी अर्थ निकलता है कि यदि किसी भी मामले में कोई न्यायालय किसी अभियुक्त को अधिकतम सजा देता है तो उसकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उन कारणों का भी खुलासा करे जिनकी वजह से अमुक मामले में अधिकतम सजा देना उचित है।
अक्सर यह देखने में आता है कि जब किसी संगीन अपराध में कोई न्यायालय अधिकतम सजा फांसी सुनाता है तो वह उन कारणों पर भी प्रकाश डालता है जिनकी वजह से अधिकतम सजा दी जाती है। इसी तरह टैक्स चोरी आदि के मामलो मे भी संबंधित अधिकारी जब अधिकतम जुर्माना लगाते हैं तब अपने आदेश में उन कारणों को इंगित करते हैं जिनकी वजह से उन्हें अधिकतम जुर्माना लगाने के लिए उपयुक्त समझा जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह भी बताया है कि राहुल गांधी लोकसभा के सासंद हैं, इस नाते उनकी सजा व्यक्तिगत होने के साथ साथ उस लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं से भी जुड़ी है जिनका वह संसद में प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा संभवत: सर्वोच्च न्यायालय ने इसलिए भी कहा है क्योंकि किसी सांसद की अयोग्यता घोषित होने का परिणाम उनके क्षेत्र के मतदाताओं पर भी पड़ता है इसलिए निचली अदालत को अधिकतम सजा सुनाते समय इस बात पर भी गौर करना चाहिए था। इस बात से कुछ लोग असहमत भी हो सकते हैं क्योंकि भविष्य में यह तर्क आपराधिक पृष्ठभूमि के सासंद अपने खिलाफ चल रहे हर अपराध के मामले में ले सकते हैं कि उन्हें अधिकतम सजा मिलने से उनके मतदाताओं को दिक्कत होगी।
सर्वोच्च न्यायालय के इस इस निर्णय पर राहुल गांधी के विरोधी अवश्य दुखी होंगे लेकिन कांग्रेस के नेताओं के लिए यह निर्णय जश्न की तरह है। प्रियंका वाड्रा से लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के उत्साह से भरे ट्वीट सोसल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।अधिकांश निष्पक्ष लोगों की भी इस निर्णय पर सकारात्मक प्रतिक्रिया आ रही हैं क्योंकि जनता को देश के तमाम बड़े नेताओं की एक से एक हल्की बयानबाजी आए दिन सुनने को मिलती है फिर भी अव्वल तो भारतीय न्यायालयों के निर्णय में लम्बे विलंब के कारण कोई कोई ही मानहानि का मुकदमा दायर करता है, उसमें भी निर्णय आने में लम्बा समय लगता है। दूसरी तरफ राहुल गांधी पर जिस व्यक्ति ने मुकदमा दायर किया उसके खिलाफ राहुल गांधी ने कुछ आपत्तिजनक नहीं कहा था। ऐसे में निचली अदालत द्वारा बहुत जल्दी अधिकतम सजा सुनाए जाने पर लोगों को आश्चर्य हुआ था।
सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने राहुल गांधी की सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें यह नसीहत भी दी है कि सार्वजनिक प्लेटफार्म पर बोलते हुए उन्हें भी अपने भाषण में संयम रखना चाहिए। एक तरह से सर्वोच्च न्यायालय की यह सलाह राहुल गांधी के साथ साथ सरकार, सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों के तमाम नेताओं पर भी लागू होती है जिनकी जुबान कैंची की तरह बेलगाम दौड़ती है।
अभी यह कहना मुश्किल है कि ज्यादातर नेता सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से अपनी भाषा और शब्दावली पर नियंत्रण रखेंगे या नहीं। जिस तरह से आगामी लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी दल और विपक्षी दल दो बड़े गठबंधनों के माध्यम से आरपार की लड़ाई लडऩे पर आमादा हैं उसमें भाषाई संयम के बांध टूटने की काफी संभावना है। बहरहाल इंडिया गठबंधन और उससे अधिक कांग्रेस के लिए यह निर्णय काफी राहत लेकर आया है।
ध्रुव गुप्त
‘यह फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल करने की तरह था
‘-कुलदीप नैयर
राहुल गाँधी का केस सामने है ।।कितना गंभीर है? अब ख़ुद सोचिये।
क्या ये सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला दे इतना गंभीर मामला था?
‘फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि वह जानना चाहता है कि इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दी गई...’
‘जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपराध के तहत अधिकतम सजा देने के लिए विशेष कारण नहीं बताए हैं।’
जिस तरह आज राहुल गाँधी को अधिकतम सज़ा दी गयी याद आता है इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला ।
जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को फैसला देते हुए इंदिरा गाँधी के लोकसभा के चुनाव को रद्द किया
और उन्हें छह वर्ष के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया था ।
ये फैसला जज साहब ने 1971 के चुनाव में राजनारायण की याचिका पर फैसला सुनाया था।
इंदिरा गाँधी पर आरोप ये था कि उनके ‘ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ यशपाल कपूर ने चुनाव की रैली में माइक और
पंडाल इत्यादि लगवाने में भूमिका निभाई थी। यह बात कही गई थी कि 29 दिसंबर 1970 को इंदिरा गाँधी ने अपने आप को एक उम्मीदवार घोषित कर दिया था जबकि 7 जनवरी 1971 को उनके ‘ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ यशपाल कपूर कि प्रचार में भूमिका सामने आयी ।
क्या ये उस दौर में भी अधिकतम सजा नहीं थी ?
इंदिरा गाँधी के कटु आलोचक और देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर जो इमरजेंसी के चपेट में भी आये थे, उन्होंने लिखा था-‘चुनाव से जुड़ा कानून कितना ही सख्त क्यों न हो, मेरा अपना खयाल था कि यह फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल करने की तरह था ।’
इस फैसले के बाद इमरजेंसी आयी जो कभी नहीं आनी चाहिए थी । कांग्रेस खुद इसे भूल मानती है ।
आज राहुल गाँधी पर जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कह रहा इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दी गई...
इसी तरह ये भी याद करिये कि इंदिरा गाँधी के ‘ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ माइक-पंडाल में भागीदारी के कारण।
क्या उन्हें भी राहुल की तरह अधिकतम सजा नहीं दी गई थी ?
नई पीढ़ी को इस फैसले को पढऩा चाहिए कि इंदिरा गाँधी को किस कारण, क्यों और कैसे अधिकतम सजा दी गई। सिर्फ पोता ही नहीं इतिहास में दादी भी अधिकतम सजा से गुजरी हैं।
पुष्य मित्र
कच्छ से पहला रिश्ता 2001 में बना जब वहां भूकंप आया था और भोपाल से कुछ युवाओं का समूह बस अपना शरीर लेकर लोगों की मदद करने चला गया। उस समूह में हम भी थे। संयोग ऐसा बना कि अहमदाबाद में एक ऐसी संस्था मिल गई जिसके पास बांटने के लिए बहुत सारा सामान था मगर लोग नहीं थे। फिर हम लोग एक दूसरे के पूरक बन गए।
वहां 15 दिन रहा। रोज शाम राहत सामग्रियों से लदे कई ट्रक खुलते थे और हर ट्रक पर दो स्वयंसेवक सवार होते थे। भीषण सर्द रात में ट्रक के ऊपर खुले में हम लोग पूरी रात सफर करते, जगह जगह ठहर कर ऊंटनी के दूध की चाय पीते हुए और पूरे दिन अलग अलग इलाकों में राहत बांटते और बाजरे की रोटी, छाछ, गुड़ और घी खाते। उन्हीं लोगों के घर जो भीषण भूकंप की वजह से बेघर हो गए थे।
वह सब एक बार फिर से याद आ गया अभिषेक श्रीवास्तव जी की किताब कच्छ कथा पढ़ते हुए। कच्छ की हमारी यात्रा 15 दिनों की थी आपदा के तत्काल बाद की। हम 29 या 30 जनवरी को वहां पहुंच गए थे, भूकंप 26 की सुबह आया था। हम जब भचाऊ शहर से होकर गुजरे थे तो पूरा शहर सपाट हो गया था और जगह जगह केरोसिन से लाशें जलाई जा रही थीं। और जब लौटे तो आपदा को लेकर लोगों में उमड़ी सहज सहृदयता राजनीति में और छल में बदल रही थी।
मगर अभिषेक भाई की यात्रा अलग दौर और अलग तरह की है। वे 2010 के बाद गए और कई दफा जाते रहे। मगर उनकी यात्रा किसी टाइम मशीन की तरह कच्छ के 5000 साल के इतिहास से होकर गुजरती रही। हमने कच्छ का मालवा देखा था और देखे थे वहां के जिंदा लोग जो अक्सर जरूरी न होने पर राहत लेने से भी इंकार कर देते थे। मगर उन्होंने कच्छ की खुदाई की, उसका एक्स रे किया। और यह समझ पैदा की कि अरब सागर से सटा यह रेतीला इलाका आज भले गुजरात राज्य का हिस्सा है, मगर इसकी बनावट गुजरात से बिल्कुल अलग है। इस पर अगर कोई असर है तो वो है सिंध का।
हड़प्पा काल के शहर धौलवीरा से लेकर नई बसी बस्ती गांधी धाम तक वे गुजरात के इस सबसे बड़े इलाके को अलग अलग जगह से टटोलते हैं और पाते हैं कि इस धरती की बुनियाद में एक मजहब का रिश्ता दूसरे से कितना गुंथा हुआ है। वह धरती जो बहुत पहले एक भूकंप की वजह से बनी, जिसका रिश्ता देश के भीतरी इलाकों से कम, बाहरी दुनिया से अधिक रहा। जहां नमक भी है और वीराना भी। जहां गोरखधाम के कनफटे साधुओं का एक पुराना मठ भी है। जहां शीशे की कलाकारी के शिल्पकार भी हैं। जो धरती पीर फकीरों की है और उसूल वाले राजाओं की भी।
यह किताब एक तरह से कच्छ नामक इलाके की बुनियाद को समझने की कोशिश करती है, जिसे अभिषेक भाई ने अपने फक्कड़ अंदाज में लिखा है। ऐसा नहीं है कि आप पढऩा शुरू करेंगे और लिखे हुए शब्द आपको पकड़ लेंगे, आप पर जादू करने लगेंगे। आपको इस किताब में खुद डूबना पड़ेगा। धैर्य के साथ शुरुआती पन्ने पढऩे होंगे। फिर धीरे धीरे किताब आपको जमने लगेगी।
इस किताब में कोई सिलसिला नहीं है, न ही कोई बना बनाया फॉर्मेट। यह बस एक मनमौजी किताब है। हां, अगर आप इतिहास, भूगोल और वृतांत के शौकीन हैं और बातचीत और रेफरेंस के जरिए कच्छ की आत्मा का पता ढूंढना चाहते हैं तो उतर सकते हैं इस किताब में। इसमें जितनी यात्राएं हैं, उतना ही शोध भी है।
रमेश अनुपम
मणिपुर, नूंह, गुरुग्राम और मुंबई जयपुर सुपर फ़ास्ट ट्रेन तक में भी नफरत की हवा बह रही हो, लाशें बिछ रही हों, तब भी क्या हमारे होंठ सिले रहेंगे और हमारे होंठों पर खामोशी की एक पट्टी बंधी रहेगी?
जैसे हमें अपने इस देश से कोई मतलब ही नहीं?
क्या हम ऐसा ही भारत बनाना चाहते हैं जहां केवल नफरत और हिंसा के लिए जगह हो?
क्या हम ऐसे कठिन और भयावह दौर में भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर अपने बासी गाने, कविता और बासी विचार ही परोसते रहेंगे और अपनी ही पीठ थपथपा कर गदगदायमान होते रहेंगे?
क्या देश के युवाओं के लिए किसी बजरंग दल के मोनू मनेसर को या किसी आर.पी.एफ. के कांस्टेबल चेतन सिंह को जो सिर से पांव तक सांप्रदायिकता और नफरत से भरा हुआ हो को कब तक नायक बनाते रहेंगे ? जैसे विनायक दामोदर सावरकर और नाथूराम गोडसे को हम बनाने में लगे हैं?
हरियाणा के नूंह में बीते सोमवार 31 जुलाई को ब्रज मंडल यात्रा के नाम पर बजरंग दल के लोगों ने जो यात्रा निकाली और इससे पहले मोनू मनेसर ने अपना एक वीडियो वायरल कर यह घोषणा की कि वे इस यात्रा में दल बल सहित शामिल हो रहे हैं।
ये मेवात बजरंग दल के वही मोनू मनेसर हैं जिन पर फरवरी 2023 में भरतपुर के दो मुस्लिम नवयुवकों नासिर और जुनैद को जिंदा जला दिए जाने का दोषी माना गया था और पुलिस को जिसकी तब से तलाश थी।
ऐसे अपराधी द्वारा वीडियो वायरल किए जाने के बाद भी प्रशासन नूंह में निकलने वाली ब्रज मंडल यात्रा को लेकर कतई गंभीर नहीं था, अगर ऐसा होता तो दो पुलिस कर्मियों सहित चार और लोगों की जाने नहीं जाती। पर मामला यहीं खत्म नहीं हुआ इस आग की लपटें 1 अगस्त को गुरुग्राम तक पहुंच गई। दंगाइयों ने रात में गुरुग्राम के मस्जिद पर धावा बोल दिया और 22 वर्षीय युवा मौलाना हाफिज साद की हत्या कर दी।
मौलाना हाफिज साद का एक वीडियो मैंने देखा है जिसमें वे हिंदू मुस्लिम एकता का स्वप्न देखते हुए बेहद सुरीली आवाज में एक गीत गा रहे हैं-
‘हिंदू मुस्लिम बैठ के खाए थाली में
ऐसा हिंदुस्तान बना दे या अल्लाह’
मौलाना हाफिज साद के इस हिंदुस्तान के स्थान पर जो हिंदुस्तान हम बनाने में लगे हैं वह हिंदुस्तान खून, चीखों और आंसुओं से भरा हुआ हिंदुस्तान होगा।
इस देश के सर्वोच्च न्यायालय और माननीय सीजेआई. डी.वाई.चंद्रचूडज़ी का आभारी होना चाहिए जिसके चलते इस देश की 140 करोड़ जनता के मन में न्याय की आस जगी है। मणिपुर, नूंह और अब कश्मीर में हटाए गए 370 मुद्दे को भी सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीरता से लिया है, जिसके चलते 2 अगस्त से इसकी सुनवाई भी शुरू हो गई है।
आजादी के 75 वर्षों की यात्रा करने वाले इस महादेश में जहां अभी हाल ही में धूमधाम से अमृत महोत्सव मनाया गया है। उस देश में हिंसा और नफरत की रोटी सेंकने वालों की राजनीति पर चुप्पी साध लेना क्या रेत में शुतुरमुर्ग की तरह अपना मुंह छुपा लेना नहीं है
लेकिन यह सब लिखकर मैं किसी भी कीमत में देश के गैर भाजपाई दलों को बख्शना नहीं चाहता।
छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और पश्चिम बंगाल में गैर भाजपाई सरकारों के पास क्या सांप्रदायिकता से लडऩे का कोई दीर्घकालीन एजेंडा है?
क्या स्कूल, कॉलेज के किशोरों और नौजवानों के लिए कि वे सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों को समझ सकें, अपने देश की महान विरासत को जान सकें, 1857 की क्रांति को, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहब पेशवा के बलिदान और देश के स्वाधीनता आंदोलन के बारे में भी उन्हें ज्ञान हो, भगत सिंह, महात्मा गांधी, पं.जवाहर लाल नेहरू के अवदान को वे जान सकें, इसके लिए उनके पास क्या कोई ठोस कार्यक्रम भी है? या बेरोजगारों के खाते में पैसा डालना ही उनका एकमात्र अभीष्ट है ?
हम लोगों ने स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी सबको साम्प्रदायिक ताकतों के हवाले कर दिया है, जबकि गैर भाजपाई राजनैतिक दलों को जहां-जहां उनकी सरकार है, इन शिक्षा संस्थानों को गंभीरता से लेना चाहिए था। एक सांस्कृतिक मुहिम को बढ़ावा देना चाहिए था।
रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों को बार-बार याद रखे जाने की भी जरूरत है-
‘जो तटस्थ है समय लिखेगा उनके भी अपराध’
जो चुप हैं, जो इस कठिन दौर में भी अपने घोंसलों में दुबके हुए हैं उनके लिए क्या कहा जाए पर अब समय आ गया है देश के सचेत बुद्धिजीवियों को, गैर भाजपाई राजनैतिक दलों को अब नए सिरे से सोचने और देश हित में नए कार्यक्रमों की योजना पर ध्यान देने की जरूरत है, खासकर नौजवानों के विषय में विचार किए जाने की जिन्हें न देश और दुनिया के इतिहास का ज्ञान है और न ही अपने स्वाधीनता आंदोलन का।
क्या छत्तीसगढ़ में आसीन कांग्रेस सरकार इस दिशा में भी कोई सार्थक कदम उठाएगी ?
-अपूर्व गर्ग
''यह फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल करने की तरह था
..''-कुलदीप नैयर
राहुल गाँधी का केस सामने है ..कितना गंभीर है ? अब ख़ुद सोचिये ..
क्या ये सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला दे इतना गंभीर मामला था ?
''फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि वह जानना चाहता है कि इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दी गई..।''
''जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपराध के तहत अधिकतम सजा देने के लिए विशेष कारण नहीं बताए हैं.'' जिस तरह आज राहुल गाँधी को अधिकतम सज़ा दी गयी याद आता है इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला.
जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को फैसला देते हुए इंदिरा गाँधी के लोकसभा के चुनाव को रद्द किया और उन्हें छह वर्ष के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया था. ये फैसला जज साहब ने 1971 के चुनाव में राजनारायण की याचिका पर फैसला सुनाया था.
इंदिरा गाँधी पर आरोप ये था कि उनके 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ' यशपाल कपूर ने चुनाव की रैली में माइक और पंडाल इत्यादि लगवाने में भूमिका निभाई थी . यह बात कही गयी थी कि 29 दिसंबर 1970 को इंदिरा गाँधी ने अपने आप को एक उम्मीदवार घोषित कर दिया था जबकि 7 जनवरी 1971 को उनके 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ' यशपाल कपूर कि प्रचार में भूमिका सामने आयी.
क्या ये उस दौर में भी अधिकतम सज़ा नहीं थी ?
इंदिरा गाँधी के कटु आलोचक और देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर जो इमरजेंसी के चपेट में भी आये थे, उन्होंने लिखा था- "चुनाव से जुड़ा कानून कितना ही सख़्त क्यों न हो, मेरा अपना ख़्याल था कि यह फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल करने की तरह था ..''
इस फैसले के बाद इमरजेंसी आयी जो कभी नहीं आनी चाहिए थी. कांग्रेस खुद इसे भूल मानती है.
आज राहुल गाँधी पर जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कह रहा इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दी गई...
इसी तरह ये भी याद करिये कि इंदिरा गाँधी के 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ' माइक -पंडाल में भागीदारी के कारण क्या उन्हें भी राहुल की तरह अधिकतम सज़ा नहीं दी गयी थी ?
नयी पीढ़ी को इस फैसले को पढ़ना चाहिए कि इंदिरा गाँधी को किस कारण, क्यों और कैसे अधिकतम सज़ा दी गयी .सिर्फ पोता ही नहीं इतिहास में दादी भी अधिकतम सज़ा से गुज़री हैं.
-डॉ.वीरेन्द्र बर्त्वाल
देहरादून
कोई 27 साल की युवती अपने पैरों पर खड़े होकर देहरादून जैसे शहर के कारगी चौक जैसे इलाके में रेस्टोरेंट खोलती है। वह इसका नाम रखती है-‘प्यारी पहाडऩ’ रेस्ट्रो।...
और कुछ कथित क्रांतिकारी इस नाम को पहाड़ को बदनाम करने वाला बताकर टूट पड़ते हैं इस व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर, जो एक रेस्टोरेंट ही नहीं, पहाड़ की एक विवश बाला के साहस, हिम्मत का प्रतीक है, बेरोजगारी के दौर में नई पीढी़ के लिए प्रेरणादायक है।
तनिक सोचें!
एक महिला जब पब्लिक प्लेस पर चाय, मिठाई, पान की दुकान चलाती है तो उसे किन-किन नजरों से स्वयं को बचाना पड़ता है। पेट पालने के लिए उसे ग्राहकों के ताने सुनने पड़ते हैं, धुआं, पुलिस, मौसम, समय न जाने कितनी चुनौतियों से जूझना होता है। वह अपने साहस को रक्षा कवच बनाते हुए कमरतोड़ मेहनत करती है और हम इस बात पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए कायरता वाली हरकत कर देते हैं कि रेस्टोरेंट का नाम सही नहीं है।
वैसे नाम किसी की अपनी निजी संपत्ति होती है, उस पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। माना जा सकता है कि किसी प्रतिष्ठान के नाम से किसी समुदाय की भावना आहत न होनी चाहिए, लेकिन ‘प्यारी पहाडऩ’ नाम से क्या भावना आहत हो रही है?
मास्टर की पत्नी को मास्टरनी, पंडित की पत्नी पंडिताइन, ठाकुर की पत्नी ठकुराइन, नेपाल की महिला को नेपालन कहलाने में जब आपको आपत्ति नहीं तो पहाडऩ नाम पर क्यों? पहाडऩ से पहले ‘प्यारी’ शब्द लगा देने से भी क्या पहाड़ टूट गया? गढ़वाली गीत तो सुने हो न? प्यारी सुवा, प्यारी बिमला, जाणू छौं प्यारी बिदेश, म्यरा मनै कि प्यारी। इन संबोधनों शब्दों पर आपको आपत्ति नहीं हुई? ‘प्यारी’ शब्द का आपने नकारात्मक अर्थ क्यों लगा दिया?
क्या आप प्यारी बिटिया, प्यारी मां, प्यारी भुली, प्यारी दीदी जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हो? क्या आपने कभी मुर्गी बांद जैसे शब्दों पर आंदोलन किया? क्या आपने कतिपय गढ़वाली गीतों के ‘ओंटडी़ करदी लप्प-लप्प’ जैसे बोलों पर आंदोलन किया? क्या आपने रिश्तों में ‘भ्रम’ उत्पन्न करने वाले गीतों जैसे- नंदू मामा की स्याली कमला गोलू रंग तेरो’ पर अपना विरोध जताया है?
प्रतिक्रिया से पहले शब्दों के अर्थ और उनकी व्याख्या समझो। नामकरण करने वाले की भावना और विवशता को आत्मसात करो।
जो लडक़ी सुबह 6 बजे से रात के 11 बजे तक उस रेस्टोरेंट में कर्मचारियों और ग्राहकों के साथ माथापच्ची करती होगी, उसकी परिस्थितियां समझो। तुम्हें तो ऐसी वीरबाला का हौसला बढ़ाना चाहिए। तुम्हारे देहरादून में सब्जी बेचने वाले, पंचर लगाने वाले, गन्ने के जूस वाले, दूध की डेयरी वाले, जूस कॉर्नर वाले कितने पहाडी़ हैं? इनकी न के बराबर की संख्या आप जैसी सोच के कारण है।
नाम पर सर मत पटको, काम पर भी ध्यान दो। राजनीति के लिए यह कोई मसला मुद्दा नहीं है। उत्तराखंड जैसे अभागे राज्य में मुद्दों के अलावा है ही क्या? गोठ की बकरी मारना आसान है, हिम्मत है तो जंगल में शेर का शिकार करके दिखाओ। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।
डॉ. आर.के. पालीवाल
पिछ्ले कुछ समय से जघन्य घटनाओं में इतनी तेजी आई है कि पिछली घटना के जख्म सूखने के पहले नया जघन्य कृत्य दिलोदिमाग के साथ आत्मा को लहूलुहान कर देता है। जघन्य घटनाओं की सीरीज सभी नागरिकों के साथ साथ देश की अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए भी बेहद चिंता का विषय है।अभी मणिपुर की हिंसा का मामला ठंडा नहीं पड़ा था जहां पुलिस पर हिंसक भीड़ से निरीह महिलाओं को बचाने के बजाय उन्हें भीड़ के हवाले करने के हृदय विदारक समाचारों ने न केवल पुलिस बल की संरक्षक छवि के लिए शर्मिंदगी का काम किया था बल्कि देश को भी शर्मसार किया था।
इस जघन्यतम घटना के बाद भी एफ आई आर करने में बहुत देरी और घटना को अंजाम देने की भीड की अगुवाई करने वालों को पकडऩे में हुए अत्यधिक विलंब से सर्वोच्च न्यायालय सहित देश के तमाम संवेदनशील नागरिकों का दिल छलनी हुआ है। पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों से किसी समुदाय, शांति प्रिय आम नागरिकों और अदालतों का विश्वास कम होना किसी भी समाज और देश के लिए बदनामी और बदहाली का सबब है चाहे वह भ्रष्टाचार के कारण हो या राजनीतिक दबाव के कारण अथवा नफरत की विचारधारा के सैन्य बलों के मन में प्रवेश के कारण हो।
इधर जयपुर एक्सप्रेस ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात रेलवे प्रोटेक्सन फोर्स के जवान चेतन सिंह द्वारा अपने वरिष्ठ ए एस आई और धर्म विशेष के तीन निर्दोष यात्रियों की निर्मम हत्या ने रेलवे में यात्रा करने वाले करोड़ों यात्रियों को गहरा सदमा पहुंचाया है। शुरूआती समाचारों के अनुसार इस जवान में भी समुदाय विशेष के प्रति नफरत की भावना थी जिसका भयंकर दुष्परिणाम चार लोगों की निर्मम हत्या के रुप में फलित हुआ है। कुछ दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने नफरती भाषणों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए देश भर के पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को दिशा निर्देश जारी किए थे कि नफरती भाषण देने वालों पर वे स्वत: संज्ञान लेकर कार्यवाही करेंगे। भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं लेकिन उसके बावजूद इस तरह के मामलों में पुलिस प्रशासन के लिए सत्ताधारी दल के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करना तब तक संभव नहीं है जब तक पुलिस प्रशासन पर सत्ताधारी नेताओं का सीधा नियंत्रण है। यही कारण है कि दिल्ली में केंद्र और राज्य सरकार प्रशासन के अधिकारियों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए आठ साल से लगातार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमेबाजी कर रहे हैं। जब तक पुलिस सहित सैन्य बलों को संविधान के अनुसार जन सेवा का अवसर नहीं दिया जाएगा तब तक वर्तमान स्थितियों में सुधार दूर की कौड़ी है।
चेतन सिंह नाम के जिस सिपाही ने अपनी सरकारी राइफल से चार लोगों की निर्मम हत्या की है उसके अंदर नफऱत का कितना जहर भरा था इसका हल्का सा अनुमान उन वीडियो से होता है जिसमें वह अपने अंदर भरे जहर को वैसे ही उगल रहा है जैसे थोड़े झीने परदे में लपेटकर बहुत से नेता सार्वजनिक भाषणों और कई पत्रकार और तथाकथित समाजशास्त्र के विशेषज्ञ आए दिन चैनलों और सोशल मीडिया पर परोसते हैं। चेतन सिंह का अवचेतन रातों रात परिवर्तित नहीं हुआ होगा और न वह अपने आप में अपवाद है। ऐसी नफऱत का जहर देश की बडी आबादी में फैल चुका है जिसकी परिणति मणिपुर और मेवात में बड़े पैमाने पर हुई है। चेतन सिंह को मानसिक रोगी बताकर अपवाद साबित करने की कोशिश भी शुरु हो गई है। यदि वह मानसिक रोगी था तो उसे खतरनाक हथियार के साथ रेल यात्रियों की सुरक्षा में क्यों तैनात किया गया था! यह यक्ष प्रश्न है। बहरहाल इस घटना के बाद रेल और हवाई यात्रा में सशस्त्र जवान देखकर यात्रियों के आश्वस्त होने के बजाय आशंकित होना स्वाभाविक है। यह बहुत खतरनाक स्थिति है।
ध्रुव गुप्त
अपने सार्वजनिक जीवन में बेहद चंचल, खिलंदड़े, शरारती और निजी जीवन में बहुत उदास और खंडित किशोर कुमार रूपहले परदे के सबसे अलबेले, रहस्यमय और विवादास्पद व्यक्तित्वों में एक रहे हैं।
बात अगर अभिनय की हो तो अपने समकालीन दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, अशोक कुमार, बलराज साहनी जैसे अभिनेताओं की तुलना में वे कहीं नहीं ठहरते, लेकिन वे ऐसे अदाकार जरूर थे जिनके पास अपने समकालीन अभिनेताओं के बरक्स मानवीय भावनाओं और विडंबनाओं को अभिव्यक्त करने का एक अलग अंदाज था। एक ऐसा नायक जिसने नायकत्व की स्थापित परिभाषाओं को बार-बार तोड़ा। ऐसा विदूषक जो जीवन की त्रासद से त्रासद परिस्थितियों को एक मासूम बच्चे की निगाह से देख सकता था। हाफ टिकट, चलती का नाम गाड़ी, रंगोली, मनमौजी, दूर गगन की छांव में, झुमरू, दूर का राही, पड़ोसन जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय के नए अंदाज, नए मुहाबरों से हमें परिचित कराया।
अभिनय से भी ज्यादा स्वीकार्यता उन्हें उनके गायन से मिली।
उनकी आवाज में शरारत भी थी, शोखी भी, चुलबुलापन भी, संजीदगी भी, उदासीनता भी और बेपनाह दर्द भी। मोहम्मद रफी के बाद वे अकेले गायक थे जिनकी विविधता सुनने वालों को हैरत में डाल देती है।
‘मैं हूं झूम-झूम-झूम-झूम झुमरू’ का उल्लास, ‘ओ मेरी प्यारी बिंदु’ की शोखी, ये दिल न होता बेचारा’ की शरारत, ‘जिन्दगी एक सफर है सुहाना’ की मस्ती, ‘ये रातें ये मौसम नदी का किनारा’ का रूमान , ‘रूप तेरा मस्ताना’ की कामुकता, ‘चिंगारी कोई भडक़े’ का वीतराग, ‘सवेरा का सूरज तुम्हारे लिए है’ की संजीदगी, ‘घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं’ की निराशा, ‘छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं’ की उम्मीद, ‘कोई हमदम न रहा’ की पीड़ा, ‘मेरे महबूब कयामत होगी’ की हताशा, ‘दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना’ का वैराग्य - भावनाओं की तमाम मन:स्थितियां एक ही गले में समाहित !
यह सचमुच अद्भुत था। उनके गाए सैकड़ों गीत हमारी संगीत विरासत का अनमोल हिस्सा हैं और बने रहेंगे।
आज जन्मदिन पर किशोर दा को श्रद्धांजलि!
नासिरुद्दीन
अपनी मृत्यु से एक दिन पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने गोलवलकर को कागज़ की एक चिट पकड़ाई.
इस वक्त हम हिंसा से घिरे हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में लंबे वक्त से हिंसा हो ही रही है।
इस हिंसा के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में जो हो रहा है, वह भी कम फिक्र करने वाला नहीं है। पिछले चंद दिनों की ही कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं।
दृश्य-एक-एक व्यक्ति ट्रेन के ऊपर वाली सीट पर नमाज़ पढ़ रहा है। नीचे की सीट पर कुछ नौजवान बैठे हैं। वे जोर-जोर से भजन गा रहे हैं। प्रतिक्रिया जानने की बेचैनी में वे बीच-बीच में ऊपर की ओर भी देखते हैं। किसी को भजन याद नहीं है। वे मोबाइल का सहारा ले रहे हैं। बेताल तालियाँ बजा रहे हैं। वे सभी फैलकर बैठे हैं। उनके सामने एक बुजुर्ग महिला ट्रेन के फर्श पर बैठी है।
दृश्य दो: एक व्यक्ति खून से लथपथ पड़ा है। उसके पास एक सिपाही खड़ा है। वह बता रहा है कि यह कौन लोग हैं और इनसे बचने के लिए किन्हें वोट देना चाहिए। सिपाही के ठीक पीछे कुछ लोग बैठे हैं। सामने लोग बैठे हैं।
इस सिपाही पर तीन अलग-अलग बोगियों में चार लोगों की हत्या का आरोप है। इनमें एक उसका वरिष्ठ अफ़सर है। तीन एक ही धर्म के मानने वाले लोग हैं। जैसा अब तक सामने आई ख़बरें बता रही हैं, वह इनकी पहचान उनकी वेशभूषा से करता है। तब मारता है।
दृश्य तीन-एक और वीडियो है। उस वीडियो में जो शख़्स है, उस पर एक ही मजहब के दो लोगों को जलाकर मारने का आरोप है। वह ‘गो-रक्षक’, ‘धर्म रक्षक’ के रूप में मशहूर है। वह पिछले कई महीने से दो राज्यों की पुलिस की पकड़ से दूर है।
वह एक जुलूस में शामिल होने की बात कर रहा है। जिस इलाके से जुलूस निकलना है, वहाँ ज़बर्दस्त तनाव है। जुलूस निकलता है। हिंसा होती है। उसके बाद वीडियो और अफवाहों का दौर शुरू होता है। हिंसा की आग दिल्ली के आसपास के कई इलाकों में फैल जाती है। कई लोग हताहत हैं।
क्या ये ‘छिटपुट’ घटनाएँ हैं?
ऐसी घटनाएँ हर कुछ दिनों पर हमारे सामने आ जा रही हैं। हमें लगता है कि ये ‘छिटपुट’ घटनाएँ हैं। ‘छिटपुट’ लोग शामिल हैं। इनका कोई ठोस वजूद नहीं हैं। या यह हल्ला मचाने वाली घटनाएँ नहीं हैं।
ऊपर गिनाई गई तीनों घटनाएँ भी अलग-अलग क्षेत्र की हैं। इसलिए लग सकता है कि यह अलग-अलग ही हो रही हैं। सच्चाई ऐसी नहीं है। इन तीनों में एक बात है। तीनों की जड़ में नफरत है। एक धर्म और उसके मानने वालों के प्रति नफरत है। एक-दूसरे को बर्दाश्त न करने की चाहत है। बल्कि दूसरे को खत्म करने या दोयम दर्जे का बना देने की हसरत है।
नहीं थोड़ा ढके-छिपे तौर पर हिंसा शामिल है। यह कोई सामान्य हिंसा नहीं है। यह नफरत से उपजी हिंसा है। नफरत का आधार बस एक धर्म का होना है। यह जहरीली मर्दानगी से भरी बेखौफ हिंसा है।
सवाल है, यह नफरत इस मुकाम पर कैसे पहुँच गई कि उसने खुलेआम हिंसा का रूप ले लिया है? इस हिंसा की बात करने में कोई लाज-लिहाज़ नहीं। कोई डर नहीं।
देश-समाज को इस हालत तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका ताकत की जगहों पर बैठे लोगों की है। इनमें लीडर और मीडिया का बड़ा तबका शामिल है। अगर यह बात कुछ अटपटी लग रही हो तो हम कुछ सवालों पर गौर कर सकते हैं।
जो नफरत बो रहे हैं, वे इतना बेखौफ कैसे हो गए कि हत्या का मुलजिम ख़ुलेआम वीडियो बनाकर लोगों को आह्वान करता है? कैसे एक सिपाही हत्याएँ करने के बाद उन लोगों के नाम लेता है, जो सत्ता में हैं?
कैसे एक व्यक्ति हाथ में गँड़ासा लिए हुए यह कहने की हिम्मत कर पा रहा है कि बदला लिया जाएगा? कैसे नौजवानों का एक समूह इबादत में बाधा पहुँचा रहा है? या कैसे सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर अलग-अलग लोग मारने और बदला लेने की बात कर रहे हैं?
इसीलिए यह कहना ज़्यादा सटीक होगा कि इस नफरत का सोता नीचे नहीं, ऊपर है। उसने हमारी पूरी सोच को दो खानों में बाँट दिया है। टीवी पर होने वाली बहसों का जोर है कि अब कुछ लोगों का ‘अंतिम उपाय’ किया जाना चाहिए। यह ‘अंतिम उपाय’ का विचार, नफरत का फैलाव नहीं है? हिंसा का उकसावा नहीं है? नफरत और हिंसा को जायज़ ठहराना नहीं है? मगर ऐसा खुलेआम हो रहा है।
क्या वह मानसिक रूप से सेहतमंद नहीं है?
जैसे ही वीडियो आया, ट्रेन में हत्याओं के अभियुक्त सिपाही के बारे में कहा जाने लगा कि वह मानसिक रूप से सेहतमंद नहीं है। ऐसा कहने वालों का मकसद साफ है, वे उसके अपराध को नफरती अपराध या सोचा-समझा अपराध मानने को तैयार नहीं है। वे उसे इस शक के बिना पर उसके पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर क्या वह वाकई सेहतमंद नहीं है?
जी, वह वाकई सेहतमंद नहीं है। मानसिक तौर पर और दिल से वह एक सामान्य इंसान जैसा नहीं बचा। वह नफरत से भरे हिंसक इंसान में बदल गया है।
हिंसक मर्दानगी, उसके गले का हार बन गई है। जहाँ उसे कुछ समुदाय के लोग दुश्मन नजर आने लगे हैं। उसकी जिम्मेदारी सबकी हिफाजत करने की है। मगर उसे लगता है कि कुछ लोगों को मारकर ही बाकियों की हिफाजत की जा सकती है। वह ऐसा कर देता है। बेझिझक।
वह वाकई दिमागी तौर पर सेहतमंद नहीं है। तब ही तो वह एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे और दूसरे से तीसरे डिब्बे में एक ही धर्म के लोगों की पहचान कर लेता है। उन पर गोलियाँ चलाता है। उनकी हत्याएँ करता है।
दिमागी रूप से सेहतमंद इंसान किसी की जान नहीं ले सकता है। वह धर्म या जाति या क्षेत्र देखकर नफरत नहीं कर सकता है। मगर ऐसा अस्वस्थ, वह अकेला सिपाही नहीं है। यहीं भूल की गुंजाइश है। वे नौजवान, जिन पर देश का भविष्य है, वे भी दिमागी रूप से सेहतमंद नहीं बचे। वे लोग जो सिपाही को गोली मारते देखते रहे। उसका भाषण सुनते रहे। अपने काम में लगे रहे। वे भी दिमागी तौर पर सेहतमंद कैसे कहे जा सकते हैं?
टीवी की बहसें तो हैं ही, व्हाट्सएप, फेसबुक जैसे ‘सामाजिक मंच’ ने समाज के बड़े तबके को ऐसा ही दिमागी तौर पर बीमार बना दिया है। वे ऐसे ही होते जा रहे हैं। नफरत के वाहक। नफरत के तमाशबीन। नफरत की घटनाओं में उनकी रजामंदी शामिल है।
चूँकि वे सीधे-सीधे किसी पर हमलावर नहीं हो पाते तो वे अपनी चुप्पी से ऐसे लोगों और उनके ख्य़ाल के साथ एकजुटता दिखाते हैं। वरना ट्रेन के एक डब्बे से दूसरे डब्बे और दूसरे से तीसरे डब्बे तक जाने की हिम्मत वह सिपाही नहीं जुटा पाता। या कोई उन नौजवानों को कह ही देता कि दो-तीन मिनट रुक जाइए, फिर पूरे रास्ते भजन गाइए।
सबसे खतरनाक है, वजूद पर खतरा महसूस करना
एक बात सबसे खतरनाक हो रही है।
समाज के एक तबके को लगने लगा है कि दूसरे का वजूद, उनके अस्तित्व के लिए ख़तरा है। अगर एक रहेगा तो दूसरा नहीं बचेगा। दिलचस्प है, अपने वजूद पर जिन्हें ख़तरा लग रहा है, वे संख्या में बहुत ज़्यादा हैं। लेकिन नफरत ने उन्हें यह मानने पर बेबस कर दिया है कि उनका सब कुछ ख़तरे में है। वे खतरे में हैं। उनका धर्म खतरे में है। उनका कारोबार खतरे में है। उनके घर की स्त्रियाँ खतरे में हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब इकतरफा ही हो रहा है। दूसरी तरफ भी ऐसी प्रक्रिया है। मगर क्या दोनों प्रक्रिया और दोनों का वजन तराजू के पलड़े पर एक जैसा ही है? इसका जवाब हमें ख़ुद ईमानदारी से देना होगा।
नफरत क्या करती है?
नफरत हमें उन बातों पर यकीन करना सिखा देती है, जो सच नहीं हैं। या जो आधा सच हैं। नफरत हमें दोस्त नहीं, दुश्मन तलाशने पर मजबूर करती है।
नफरत हमें लोगों को अपना नहीं, पराया बनाना सीखाती है। नफरत हमें जोड़ती नहीं, तोड़ती है। बाँटती है। वह हमें सभ्य नहीं, बर्बर बनाती है। नफरत हमारी तर्कबुद्धि छीन लेती है। सोचने-समझने की हमारी ताकत हर लेती है। हमें पता भी नहीं चलता, और हम इंसान से नफरती कठपुतली में बदल जाते हैं।
इस कठपुतली की डोर कहीं और होती है। और ये कठपुतली किसी और के इशारे पर नाचती है। यही नहीं, नफरत हमें इंसानी गुणों, जैसे- प्रेम, सद्भाव, सौहार्द्र, अहिंसा और बंधुता से बहुत दूर कर देती है। तो क्या नफरत सिर्फ नुकसान करती है? नहीं। जाहिर है, नफरत कुछ लोगों और समूहों के लिए फायदेमंद है तब ही वह सीना तानकर जहरीली मर्दानगी के साथ बेखौफ यहां-वहां नजर आ रही है। फायदा चाहे जितना हो, नुकसान उससे बहुत बड़ा है। वह जैसा घाव दे रहा है या देने जा रहा है’ उसका दर्द दशकों तक हमें झेलना है।
तय है कि अगर यह चलता रहा तो यह नफरत हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। पहले कुछ खास तरह के लोग मारे जाएँगे। फिर वह सबको मारेगी। इसलिए तय हम सबको करना है, हम सह-अस्तित्व या साझा जीवन चाहते हैं या खत्म हो जाना। (bbc.com/hindi/)
पुष्य मित्र
यह सरल व्याख्या है। सच यह है कि पशुपालक आर्य पश्चिम से आए, वे बहुत मुश्किल से बनारस तक ही फैल पाए। मनु कहते थे नारायणी यानी गंडक के पार व्रात्य प्रदेश है, यानी वर्जित इलाका। यानी बिहार, बंगाल, उड़ीसा, असम वगैरह। जहां बौद्ध, जैन, आजीवक, लोकायत जैसे लौकिक धर्म विकसित हुए। दक्षिण में विंध्याचल बाधा थी। उधर शिव थे, जिन्हें लेकर शंकराचार्य उत्तर आए।
गंडक के पूरब बाढ़ का इलाका था, तो मछलियां खानी ही पड़ती थी। दक्षिण में पठार थे, सिर्फ खेती से गुजारा मुश्किल था। यही सब व्यवहार बना। पश्चिम वाले वैष्णव, पूरब वाले शक्ति के उपासक, वो देवियां जो बलि मांगती थीं। और दक्षिण में शिव।
आज भी हिंदू धर्म इन्हीं तीन हिस्सों में बंटा है। दिलचस्प है सनातन की राजनीति करने वालों का असर सिर्फ पश्चिमी इलाकों में है। न पूरब में वे जड़ जमा पाए न दक्षिण में। क्योंकि उन्होंने न शक्ति को समझा, न शिव को। शाकाहार और वैष्णव संप्रदाय के आधार पर कोई कभी सभी हिन्दुओं का नेता नहीं बन सकता। मुश्किल है।
खासकर पूरब का इलाका जिसने हमेशा मनु को चुनौती दी। जहां बुद्ध, महावीर, पाश्र्वनाथ हुए। यहां तो बगावत की ढाई हजार साल की परंपरा है।
यह कहा जा सकता है कि बुद्ध, महावीर जैसे अहिंसक विचारकों के इलाके में मांसाहार क्यों? तो उसका जवाब यह है कि बाद के दिनों में बौद्ध ही वामाचारी हो गए। वामाचार में मांस, मदिरा सब स्वीकृत था। जैन विस्थापित हो गए।
1. मैं इस बात को लेकर बहुत कंविंस नहीं हूं कि दलितों और पिछड़ों पर जानबूझकर या किसी तरह का दबाव देकर उन्हें चूहा, घोघा, बीफ, पोर्क या चींटी खाने के लिए विवश किया।
2. मेरा अपना आग्रह यह है कि मुशहरों का चूहा खाना, मल्लाहों का घोघा और केकड़ा खाना, डोम जाति के लोगों का सूअर खाना काफी हद तक उनकी सामाजिक पसंद का मसला है और जब से हमारे इलाके में रामनामी परंपरा के लोगों ने कंठी का प्रचार किया और वे वैष्णव हुए, वे कमजोर हुए और उनकी पीढिय़ां कुपोषित हुईं। (बाकी पेज 8 पर)
मैंने अपने बचपन में किसी मल्लाह, मुशहर या डोम कमजोर या कुपोषित नहीं देखा था।
3. संसाधनों का तर्क भी मेरे गले नहीं उतर रहा। क्योंकि महज सौ साल पहले तक मेरे ही पूर्णिया जिले में जमींदार खेती के लिए किसानों को ढूंढ-ढूंढकर लाते थे और बसाते थे। जब ट्रैक्टर जैसे उपकरण नहीं होंगे तब हजार बीघा जमीन पर खेती करके अकेले खा लेना इतना आसान भी नहीं रहा होगा। मैंने अपने बचपन में देखा है कि खेतिहार मजदूरों को मजदूरी भी अनाज में मिलती थी. तब पैसों का इतना प्रचलन नहीं था।
4. हां जिन जातियों का पेशा बहुत सख्ती से तय कर दिया गया कि वे खेती नहीं करेंगे. चाहे वे निषाद हों, डोम हो, मुशहर हों, उनके साथ जरूर दिक्कतें हुई होंगी। और उन्होंने अपने पेशे के इर्द गिर्द पाये जाने वाले पशुओं को आहार बनाया होगा. मगर पशुपालक यादव, खेतिहार कुर्मी, कोइरी, धानुख आदि के लिए शाकाहार हमेशा उपलब्ध रहा।
मेरी व्याख्या सवर्णवादी हो सकती है। मगर अभी तक मुझे कोई ऐसा कंविंसिंग आलेख नहीं मिला या कोई ऐसा सूत्र जिससे मैं यह मान लूं कि ब्राह्मणों या सवर्णों ने खेती के संसाधनों पर कब्जा कर लिया, जिसके कारण मजबूरन दलितों-पिछड़ों को मांसाहार के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके इतर मैं यह मानता हूं कि ब्राह्मणों ने अन्य जाति के लोगों के दिमाग पर कब्जा किया और उन्हें अपनी मान्यताओं के आधार पर जीने के लिए मजबूर किया। उनके लिए तय किया कि वे इसी तरह का काम कर सकते हैं, यही भोजन उनके लिए उचित है, ग्राह्य है। ब्राह्मणों की अपनी ज्ञान परंपरा में भी वैसे पोषण से अधिक पवित्रता पर जोर है। इसलिए अभी तक यह मामला संसाधनों पर कब्जा वाला नहीं लगता। आगे कोई कंविंसिंग तथ्य मिला तो मैं अपनी धारणा बदलने के लिए तैयार हूं।
अणु शक्ति सिंह
मेरे विचार से मांसाहार और शाकाहार का विवाद केवल और केवल धर्म-राजनीति का षडय़ंत्र है।
कई वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि खान-पान की अभिरुचियों का सीधा संबंध व्यक्ति की स्थानीयता और उसके भौगोलिक-सामाजिक परिदृश्य/मूल से जुड़ा हुआ है।
समुद्री स्थानों पर जहाँ शाक-सब्जी की कमी है, जलीय भोजन मुख्य स्रोत है खाने का।
ठंडे प्रदेशों में वसा की आवश्यकता शरीर को गर्म रखने के लिए होती है, अत: रेड मीट उन इलाकों के खाने में स्वत: ही उतर आया। यूरोपीय या ठंडे भारतीय इलाकों के भोजन पर नजर डालिए।
अब एक उदाहरण बिहार से। उत्तर बिहार अमूमन बाढ़ प्रभावित इलाका रहा है। सावन यानी जुलाई-अगस्त में चढ़ता पानी आश्विन माने सितंबर-अक्तूबर तक ही उतरता है।
बाढ़ में सब्जियाँ तो नहीं मिलती, हाँ मछली की बहुतायत होती रही है। पानी में कटने वाला मोटा गरमा धान भी। जाहिर है उत्तर बिहार में लगभग हर वर्ग के लोग बिना किसी भेद के मछली-भात खाते हैं (ब्राह्मण भी)। यहाँ मछली ‘शगुन’ का भी हिस्सा है।
बचपन में किसी कहानी में पढ़ा था कि ध्रुवों पर सील फैट का ख़ूब इस्तेमाल होता है, रौशनी के साथ-साथ औषधि के लिए भी।
बहुत अच्छा है, आप शाकाहार करते हैं पर दूसरे की प्लेट देखकर नाक-भौं सिकोडऩे से आप अच्छे नहीं लगते हैं। सच कहूँ तो आप इस तरह काफी हिंसक नजऱ आते हैं।
धर्म का ही जिक्र करेंगे तो आपका सनातन ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत करता है जब मांसाहार को चुना गया। एक कथा के अनुसार कृष्ण ने स्वयं मांस का भोग स्वीकार किया है।
अंग्रेजी में एक कहावत है, डोंट लेट योर फूड गेट कोल्ड वरीइंग अबाउट व्हाट इज ऑन माय प्लेट।
अर्थात, मेरी थाली के भोज्य की चिंता में अपना खाना मत ठंडा कीजिए।
खाइए न आपको जो खाना है। लोगों की चिंता सरकार पर छोडि़ए। कुछेक पशु-पक्षियों के अतिरिक्त बाकी सभी शिकार पर क़ानूनन रोक है। इस देश में मांसाहार और शाकाहार का सारा वितंडा उत्तर भारत के मैदानी सवर्णों और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों का फैलाया हुआ है।
उत्तर भारत में उनके पास सबसे अधिक उपजाऊ ज़मीनें थीं। तमाम फसल और शाक-सब्जी उनके हवाले हुआ।
क्यों इस इलाके के दलित मांसाहारी हुए, यह बड़ा सवाल है। जातिवाद का असर क्या होता है, कैसे यह आहार श्रृंखला पर प्रभाव डालता है, आराम से नजर आ जाएगा।
इसी तरह दक्षिण भारत के ब्राह्मण के हवाले अधिकतम संसाधन आए। वे शाकाहारी बने रह सकते थे। अन्य जातियाँ नहीं।
शाकाहार की परम्परा को ठीक से परखा जाए तो जानवरों की जान बख़्शने की कीमत पर लगातार मनुष्यों को दबाये जाने की बात भी साफ नजर आ जाएगी।
कुछ लोग तमाम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर पूरे समाज के हिस्से का खाते रहे। अन्य वर्ग सूअर, चूहे, घोंघे से लेकर चीटियों तक में पोषक तत्व खोजते रहे।
जातिवाद इस देश में तब भी तगड़ा था। अब भी तगड़ा है। आहार तब भी प्रभावित था। अब भी प्रभावित है।
(उत्तर भारत से यहाँ सीधा अर्थ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब सरीखे गंगा के इलाक़े से है जिन्हें गंगेज़ प्लेट्यू भी कहा जाता है। बिहार बंगाल अपवाद हैं।)
(जरूरी है कि थोड़ा पढ़ा-समझा जाए मनुष्य और उसकी भौगोलिकता-सामाजिकता के बारे में)
कांग्रेस और भाजपा की सरकारें केन्द्र में एक पार्टी की सरकार होने पर भी मिलीजुली कुश्ती करती रहीं। केजरीवाल के तेवर खामोशी, समझौते, खुशामदखोरी या समर्पण के नहीं हैं। अपने पुराने वाले पृथक फैसले में भी समृद्ध पैतृक परंपरा तथा कुशाग्र बुद्धि के जज डी वाय चंद्रचूड़ ने कुछ अतिरिक्त बातों का समावेश किया था। उन्होंने साफ किया कि आखिरकार जनता है जिसके सबसे बड़े और अंतिम अधिकार हैं कि उसकी इच्छा से कोई लोकप्रिय सरकार कैसे चले। उनका एक तर्क यह भी था कि संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह होना पड़ता है, संविधान प्रमुख को नहीं।
दिल्ली विधानसभा, मंत्रिपरिषद, उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार को लेकर गैरजरूरी, पेचीदा, लोकतंत्र विरोधी और सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी करता मामला चखचख में है। दिल्ली विधानसभा को राज्यों की विधानसभाओं के मुकाबले कम अधिकार हैं। दिल्ली में आम आदमी की बार बार सरकार आने से पार्टी और इसके नेता अरविन्द केजरीवाल को कमतर स्थिति नागवार गुजरती लगी। उपराज्यपाल दिल्ली सरकार पर लगातार नकेल डालते रहे। चिढक़र आम आदमी पार्टी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 239 क-क की व्याख्या का अनुरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार के खिलाफ फैसला किया। इसके बावजूद मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग कहते केन्द्र सरकार और उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार को काम नहीं करने दिया। मामला फिर सुप्रीम कोर्ट गया। ताजा फैसले में कोर्ट ने लगभग पुराना फैसला (2018) दोहराते हुए उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार की खिंचाई करते कहा जितने भी अधिकार विधानसभा को दिए गए हैं। उनका उपयोग दिल्ली सरकार करेगी। उसमें रोड़ा अटकाने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में पिछले दिनों गर्मी की छुट्टी होने से आनन-फानन में केन्द्र सरकार ने संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि क्रमांक 41 को वृहत्त दिल्ली परिक्षेत्र में सेवारत षासकीय सेवकों को केन्द्र सरकार के पाले में कर लिया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी कर दी। मजबूर होकर आम आदमी सरकार को फिर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा है। वहां काफी समय लगने की संभावना है। मोदी सरकार ने ढिठाई के साथ संविधान का कचूमर निकालते, लोकतंत्र में फेडरल व्यवस्था का मजाक उड़ाते, सुप्रीम कोर्ट की हेठी करते अपना ढर्रा कायम रखा है। वह लोकतंत्र विरोधी और कॉरपोरेटी सामंतवाद का घिनौना उदाहरण है। अरविन्द केजरीवाल का मुख्य आरोप है कि जितने अधिकार पिछली कांग्रेसी और भाजपाई दिल्ली सरकारों के पास थे। वे भी एक के बाद एक आम आदमी पार्टी की सरकार से केन्द्र द्वारा छीन लिए गए।
दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की ओर देखता मौजूदा अनुच्छेद 239 क क संविधान के 74 वें संशोधन के जरिए आया। केन्द्रीय गृहमंत्री शंकरराव चव्हाण ने संशोधन प्रस्ताव रखते दो टूक कहा फिलहाल दिल्ली का प्रशासन दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन एक्ट 1966 के तहत चल रहा है। मेट्रोपोलिटन काउंसिल पशासक को केवल सलाह दे सकती थी। केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जज आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में 24 दिसम्बर 1987 को कमेटी गठित की। उसे एस बालाकृष्णन ने 14 दिसम्बर 1989 को पूूरा किया। उन्होंने कहा दुनिया के अन्य देशों की राष्ट्रीय राजधानियों के मद्देनजर ही दिल्ली की संवैधानिक स्वायत्ता पर फैसला मुनासिब होगा। विषेषज्ञ समितियों और कमेटियों ने संविधान के संघीय चरित्र को ध्यान में रखते आगाह किया है दिल्ली में सत्ता प्रबंधन और जनआकांक्षाओं के बीच समीकरण में केन्द्र की सक्रिय भूमिका बेदखल नहीं हो सकती।
संविधान में मंत्रिपरिषद और राष्ट्रपति के रिष्तों के लिए अनुच्छेद 74 खुलासा करता है। ‘‘राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार राज्यपाल और राज्य मंत्रिपरिषद के रिष्तों का विवरण वाला अनुच्छेद 163 कहता है ‘राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा। ‘डॉ. अंबेडकर ने जोर देकर कहा राष्ट्रपति की जगह गर्वनर के ऊपर भी मंत्रिपरिषद की सलाह पर फैसले लेने की बाध्यता होगी। इसी क्रम में अनुच्छेद 239 क क (4) दिल्ली के लिए कहता है-‘उप-राज्यपाल की, अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी। परन्तु उप-राज्यपाल और उसके मंत्रियों के बीच किसी विषय पर मतभेद की दशा में, उप राज्यपाल उसे राष्ट्रपति को भेजेगा और राष्ट्रपति द्वारा उस पर किए गए फैसले के अनुसार कार्य करेगा। ऐसा निश्चय होने तक किसी आवश्यक मामले में, ऐसी कार्रवाई करने या निर्देश देने के लिए, जो आवश्यक समझे, सक्षम होगा।‘‘
केजरीवाल भारतीय लोकतंत्र में दिल्ली जैसे राज्य की संभावनाओं को संविधानेतर ढंग से भी बुनना नहीं चाहते। केवल तीन बिन्दुओं पुलिस, विधि तथा व्यवस्था और राजस्व के महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार नहीं होने पर भी केन्द्र सरकार के लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथों विधानसभा, मंत्रिपरिषद और दिल्ली के नागरिकों की अश्वगति की ख्वाहिशों पर सईस की नकेल रही है। राजस्व उगाही के अरबों रुपयों का इस्तेमाल विरोधी पार्टी भाजपा के नुमाइंदे पुलिस, राजस्व उगाही और कानून तथा व्यवस्था के नाम पर अधिकारियों को भडक़ा फुसलाकर राज्य सरकार के खिलाफ काम ही नहीं करने दे रही थी। तो क्या संविधान टुकुर-टुकुर देखता रहता? नौकरशाह उपराज्यपाल को गफलत रहती कि विधानसभा कोई कानून बनाए। वे दखल दे सकते हैं। वे समझते होंगे कि वे फाउल की सीटी बजा देंगे और गेंद को अंपायर राष्ट्रपति के मैदान में ठेल देंगे। इस तरह 70 में से 67 सीटें जीतने वाली केजरीवाल सरकार का मुर्गमुसल्लम बनाया जा सकेगा। उपराज्यपाल चूक गए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने ठीक पकड़ा। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार संविधान की समझ के लिए लोकतंत्रीय भावना, सामूहिक नागरिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक चरित्र और सत्ता का विकेन्द्रीकरण को लेकर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। दिल्ली पर संसद की विधायी मर्यादाओं का दबाव भी है।
महत्वपूर्ण फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सैद्धान्तिक स्थापनाएं की हैं। संविधान की प्रस्तावना में शुरू में ही लिखा है कि हम भारत के लोग अपना संविधान खुद को दे रहे हैं। यही समीकरण सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया। उपराज्यपाल को असहमत होने के असीमित अधिकार मिल जाएंगे तो लोकतंत्र की मर्यादा ही नहीं रहेगी। सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र और राज्य सरकारों को परस्पर सहयोग से काम करने की हिदायत भी दी क्योंकि भारत एक संघीय राज्य है। कई ऐसे विषय हैं जो दिल्ली विधानसभा की शक्ति में रहते हुए भी संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से प्रभावित होंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत पहले आ जाता तो दिल्ली प्रशासन पर छाई धुंध नागरिक अधिकारों के लिए साफ की जा सकती थी।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली विधानसभा, राज्य सरकार और उप राज्यपाल के संवैधानिक रिश्तों को लेकर दूध का दूध और पानी का पानी पहले 2018 में भी कर दिया था। केजरीवाल सरकार ने अपने संवैधानिक अधिकारों की ठीक मीमांसा की है। उपराज्यपाल केन्द्र की कठपुतली हैं। कांग्रेस और भाजपा की सरकारें केन्द्र में एक पार्टी की सरकार होने पर भी मिलीजुली कुश्ती करती रहीं। केजरीवाल के तेवर खामोशी, समझौते, खुशामदखोरी या समर्पण के नहीं हैं। अपने पुराने वाले पृथक फैसले में भी समृद्ध पैतृक परंपरा तथा कुशाग्र बुद्धि के जज डी वाय चंद्रचूड़ ने कुछ अतिरिक्त बातों का समावेश किया था। उन्होंने साफ किया कि आखिरकार जनता है जिसके सबसे बड़े और अंतिम अधिकार हैं कि उसकी इच्छा से कोई लोकप्रिय सरकार कैसे चले। उनका एक तर्क यह भी था कि संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह होना पड़ता है, संविधान प्रमुख को नहीं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक महत्वपूर्ण वाक्य यह भी लिखा था कि राज्य मंत्रिपरिषद की षक्ति और दिल्ली विधानसभा की कार्यपालिक शक्ति एक दूसरे में अंतर्निहित हैं। उन्हें एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसे में विधानसभा और मंत्रिपरिषद की उपादेयता, अस्तित्व और लोकतांत्रिक भूमिका का क्या होगा? फिर भी अल्लाह जाने क्या होगा आगे! यदि राज्यसभा में सरकार का अध्यादेष वाला बिल गिरा देने की केजरीवाल की कोषिष रंग लाएगी तो ही लोकतंत्र की रक्षा हो सकती है। बाकी सुप्रीम कोर्ट जो कर पाए।
-कृष्ण कांत
मणिपुर का एक कुकी बहुल इलाका. जिला चूराचांदपुर. पूरे राज्य में हिंसा का दौर चल रहा था. एक कुकी बहुल इलाके में कुछ मैतेई लोग फंस गए. भीड़ उन पर हमला कर रही थी. तभी कुकी समुदाय की महिलाएं एकत्र होकर सामने आईं. उन्होंने ह्यूमन चेन बनाकर अपने ही समुदाय के लोगों को हमला करने से रोका और फंसे हुए मैतेइयों की जान बचाई.
इसी तरह की एक घटना मणिपुर यूनिवर्सिटी में सामने आई. भीड़ यूनिवर्सिटी में घुसकर यहां पढ़ने वाली कुकी लड़कियों को निशाना बनाने की कोशिश कर रही थी. उन्हें बचाने के लिए मैतेई लड़कियां सामने आईं. उन्होंने इकट्ठा होकर भीड़ का विरोध किया, उन्हें समझाया. उन्हें ऐसा करते देखकर स्थानीय लोगों ने भी उनका साथ दिया और कुकी लड़कियों की जान बच गई.
दंगे कभी खुद से नहीं होते. कराए जाते हैं. मसलन, हथियारबंद भीड़ को रैली की इजाजत दी जाती है ताकि वे इंसानियत का कत्ल कर सकें. हत्या के आरोपियों को, लिंच मॉब को, नफरत के सौदागरों को और भाड़े के जॉम्बियों को उतारा जाता है. पुलिस, कानून और पूरे तंत्र को पंगु बना दिया जाता है. कानून का शासन खत्म कर दिया जाता है. ताकि समाज को बांटा जा सके. समाज बंटेगा तो आधा उनकी तरफ होगा. उनकी सत्ता बची रहेगी.
लेकिन एक बात याद रखिए. जब-जब दंगा-फसाद करवाकर खून की होलियां खेली जाती हैं, इंसानियत कहीं तड़प रही होती है. सत्ता बहुत ताकतवर चीज है. दुखद है कि वह इंसानियत के साथ नहीं, कातिलों के साथ होती है इसलिए इंसानियत हार जाती है. अगर सरकार बचाने वालों के साथ होती तो मणिपुर में अमन होता.
मणिपुर हो या हरियाणा, हर जगह हमारा समाज सत्तालोभी और क्रूर हुक्मरानों की “बांटो और राज करो” नीति का भुक्तभोगी है. जागो! संगठित बनो! मणिपुर की इन महिलाओं से सीखो. मानवता को बचाओ! वरना ये खून के प्यासे लोग आपके बच्चों का भविष्य नष्ट कर देंगे.
डॉ. आर.के. पालीवाल
नफरत से उपजी हिंसा के रथ पर सवार होकर कोई देश विश्व गुरु तो दूर अपनी बडी आबादी को अच्छे और संस्कारी नागारिक नही बना सकता। हिंसा का सीमित बल समाज में मौजूद चंद दुष्टों के अस्थाई नियंत्रण के लिए कारगर साबित हो सकता है लेकिन स्थाई शांति के लिए अहिंसक समाज का निर्माण ही एकमात्र विकल्प है जिसकी परिकल्पना बुद्ध, महावीर और गांधी ने की है। भारत जैसे सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि जिस देश की बहुसंख्यक आबादी गरीब है वहां नफरत से उपजी हिंसा पहले से ही कम संसाधनों को और कम कर रोज कुंआ खोदकर जीवन चलाने वालों के लिए मुसीबतों के नए पहाड़ खड़े कर देती है।
जब कानून बनाने वाले और संविधान की रक्षा की सौगंध खाने वाले दिन रात हिंदू मुस्लिम, मैतेई कुकी,अगड़े पिछड़े और अशरफ पसमांदा करने लगते हैं तब धीरे धीरे समाज के अंदर एक दूसरे समुदाय के लिए वैमनस्य बढ़ता जाता है।अंदर ही अंदर जो नफरत काफ़ी दिनों तक सुलगती रहती है वह जरा सी हवा पाते ही मणिपुर और मेवात बन जाती है। नफरत का ज्वालामुखी फटने के दुष्परिणाम हमारा समाज 1947 के भीषण दंगों में भुगत चुका है। अब उस पीढ़ी के लोग बहुत कम बचे हैं लेकिन साहित्य और फिल्मों में उस दौर की भयानक कहानियां भविष्य में सीख के लिए मौजूद हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों से हमारे देश में वैचारिक मतभेद फिर से नफरत की सीमा पार करने लगे हैं, उसी के फल स्वरूप पिछ्ले तीन महीने से मणिपुर में हालात बद से बदतर होते गए हैं और अब मेवात में नफऱत फैलाने वाले तत्वों ने तांडव मचाया हुआ है।
मणिपुर मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है। सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल मणिपुर मामले की सुनवाई के लिए समय मांग रहे थे। इसका मतलब साफ था कि सरकार के पास न्यायालय के तीखे प्रश्नों का जवाब उपलब्ध नहीं है जबकि सरकार के पास पल पल का हिसाब उपलब्ध रहना चाहिए था और सर्वोच्च न्यायालय को पूरी स्थिति से अवगत कराया जाना चाहिए था।जब सरकार के उच्च पदाधिकारी साल भर चुनावी मोड़ में रहते हों तब उनका मणिपुर जैसे सुदूर राज्यों पर ध्यान केंद्रित रहना असंभव है। मणिपुर तो फिर भी केंद्र सरकार के मुख्यालय से काफ़ी दूर है लेकिन दिल्ली के पास मेवात हरियाणा का संवेदनशील इलाका है। वह न केवल हरियाणा की प्रगति के केन्द्र गुडग़ांव से सटा हुआ है देश की राजधानी दिल्ली से भी दूर नहीं है जहां विश्व के सभी देशों की एंबेसी और देश दुनिया के मीडिया हाउस मौजूद हैं। मणिपुर के चार मई के वीडियो को वायरल होने में भले ही दो महीने लगे थे मेवात की हिंसा के वीडियो को वायरल होने में दो घण्टे भी नहीं लगे। मेवात की हिंसा पहले से ही मणिपुर की हिंसा से खराब हुई हमारी छवि को और खराब करेगी। मणिपुर और हरियाणा दोनों में डबल इंजन सरकार है। इससे सरकार का यह दावा भी खुद खारिज हो जाता है कि डबल इंजन सरकार राज्यों के लिए ज्यादा हितकारी हैं।
मेवात दंगे में उस मोनू मानेसर का नाम आ रहा है जो राजस्थान के दो लोगों को जलाकर मारने के जघन्य अपराध में वांछित है। हरियाणा पुलिस इस कथित गौ रक्षक के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर पाई और यह बंदा मेवात में धार्मिक यात्रा निकालने में सोसल मीडिया पर आव्हान कर रहा है। कर्नाटक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी घोषित कर रही थी कि भाजपा नही जीती तो प्रदेश में तनाव होगा। क्या भारतीय जनता पार्टी आगामी चुनावों में अब भी यह कह सकती है कि उनकी सरकार बनने पर दंगे नहीं होंगे!
दंगे नहीं होने देना और दंगे होने पर उन्हें त्वरित कार्रवाई कर रोकना प्रदेश सरकार की सबसे महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस दृष्टि से मणिपुर सरकार बुरी तरह फेल रही है और हरियाणा सरकार की हालत भी खराब है।
मनीष सिंह
ये विक्टर ह्यूगो का मशहूर कोट है। पिछले 10 सालों में हमने 3 विचारों का वक्त आते, और जाते देखा है।
विचार की जन्म, उसके परिदृश्य के गर्भ से होता है। वो हमेशा अंधकार से रोशनी की ओर ले जाने का दावा करता है। पिछले दस सालों में विचार के तीन चेहरे हमने देखे हैं। मोदी, राहुल, केजरीवाल..
और शुरुआत राहुल की नकार से होती है। राहुल याने वंश परंपरा, ऐसे भ्रष्ट तंत्र का राजकुमार जिसके नाक तले अविश्वसनीय अंकों के भ्रष्टाचार होते हैं। इस नकार से दिल्ली में केजरीवाल पैदा हुए।
मगर इसी नकार ने देश भर में भाजपा की जमीन तैयार की। सपनो का नया राजकुमार आया। सफेद घोड़े पर बैठ वो तलवार चमकाता। भारत के हर जंजाल को काटने का उद्घोष कर रहा था।
उसका वक्त आ चुका था।
मोदी उसका चेहरा थे।
उस विचार को रोकना असम्भव था। सत्तर साल से भारत एक दूसरी विचारधारा को भी गर्भ में पालता आया था। 2014 में आखिरकार उसका प्रसव हुआ। देखते ही देखते दस बरस की उम्र पूरी कर ली।
और बूढ़ा भी हो गया।
नकार दरअसल उम्र घटाती है। कांग्रेस की नकार से शुरू हुई यात्रा, इतिहास की नकार, संस्कृति की नकार, नेहरू, गांधी, सत्य, अहिंसा, शिक्षा, विज्ञान, इंसानियत, सहजबुद्धि और हर उस शै की नकार को छूती रही, जो मूलत: भारत नामक लोकतन्त्र का विचार थी।
अब हालात यह है कि ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र को नकारने को आतुर हैं। दरअसल नकार ही इस संघटन की 90 सालों की यात्रा का मूल विचार था।
इसका दौर तो छोटा होना ही था।
केजरीवाल के पास सकारात्मक विचार थे। शुरुआत उस जमीन पर हुई, जो कांग्रेस की बनाई हुई थी। इस जमीन में एकता, शांति, भाईचारा की खाद थी। उस पर विकास, समृद्धि, संतुष्टि की फसल उगानी थी। उन्होंने शुरू किया।
लेकिन चारों ओर नफरत और नकार की सफलता देखकर ठिठक गए। मिश्रित फसलें बोने की कोशिश की। मगर नशा उगाने के लिए जहरीली खाद की जितनी जरूरत होती है, केजरीवाल में उसे डालने की बेशर्मी भी नही। वे छिपछिप कर, मिलावटी खाद डालने लगे।
न अफीम उगा सके, न अनाज
और परिदृश्य का गर्भ बदल चुका है। एक निरंकुश सरकार है, नफरत है, टूट है। धोखेबाजी और ताकत का जोर है। इसकी गर्भ से स्पार्टाकस, ग्वेरा या गांधी निकलते हैं।
और निगाहें घूमकर राहुल पर लौट आयी हैं। जो टिका है, बेदाग है, निडर है। जिसके कदम दक्षिण से उत्तर जोड़ चुके। जो पूरब से पश्चिम जोडऩे को निकल रहा है। जिसकी झोले से गांधी, बुद्ध, मार्क्स, ग्वेरा, झांक रहे हैं। जो नफरत के मॉल में पसरा बिछाकर मोहब्बत बेचने आया है।
इस राहुल की पहचान, किसी का बेटा या किसी का भाई होना नही। ये चेहरा वही है जिसे दुनिया ‘भारत’ कहकर सदियों से पहचानती आयी है।
वो अक्स, जिसे बदशक्ल भारत फिर से आईने में देखना चाहता है। इस चेहरे का, इस विचार का वक्त आ गया है।
और जिस विचार का वक्त आ गया हो, उसे कोई सेना नही रोक नहीं सकती।
डॉ. लखन चौधरी
देश में जुलाई महिने में खाने-पीने की चीजों की यानि खाद्य महंगाई अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच कर रिकॉर्ड बना रही है। दिल्ली में टमाटर 200-250 रू., हरी मिर्च और धनिया 200-250 रू., अदरक 350-400 रू. प्रति किग्रा. के पार पहुंच चुके हैं। रायपुर में टमाटर 150 से 200 रू., अदरक 200 से 250 रू. चल रहा है। महंगाई को लेकर रोना केवल सब्जियों तक सीमित नहीं है। आटा, दाल, दूध, मसाले सहित रोजमर्रा की तमाम जरूरी खाद्य सामग्रियों की कीमतें जुलाई महिने में अपने ’ऑल टाईम हाई’ लेबल पर खेल रहीं हैं। आम आदमी बेबस और लाचार है। सरकार मानने को तैयार नहीं है कि देश में महंगाई है ? इधर सरकार दावा कर रही है कि देश में थोक महंगाई दर पिछले 8 साल के निचले स्तर पर आ गई है। सरकार के आंकड़ें बता रहे हैं कि जून में थोक महंगाई दर मात्र 4.12 फीसदी रही है, और इसकी वजह खाने-पीने की चीजों का सस्ती होना है।
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले देश के लगभग 55-60 करोड़ लोगों की रसोई का सारा खेल बिगड़ चुका है। गरीबों और मध्यमवर्ग की थाली से टमाटर, हरी मिर्च और हरी धनिया की चटनी गायब है। देश की आधी आबादी यानि लगभग 70-72 करोड़ लोग खाद्य महंगाई की चपेट में आ चुके हैं, लेकिन सरकारी आंकड़ें इससे सहमत नहीं दिखते हैं। सरकारी आंकड़ें बता रहे हैं कि देश में लगातार तीसरे महीने थोक महंगाई दर में गिरावट दर्ज की गई है। जून महीने में थोक महंगाई दर यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स 4.12 फीसदी पर आ गई है। सरकार तर्क दे रही है कि जून में थोक महंगाई की दर में गिरावट मुख्य रूप से मिनरल ऑयल्स, खाने-पीने की चीजें, बेसिक मेटल्स, क्रूड पेट्रोलियम और नेचुरल गैस और कपड़ों की कीमतें कम होने के कारण आई है।
सवाल उठता है कि आखिरकार बाजार की वास्तविक महंगाई और महंगाई के सरकारी आंकड़ों को लेकर इस कदर विरोधाभास क्यों है ? तात्पर्य यह है कि यदि वास्तविकता में महंगाई दरें सामान्य हैं, तो फिर खानेपीने की चीजों की कीमतें आसमान क्यों छू रहीं हैं? रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें आमजन को रूला क्यों रहीं हैं ? दाल की कीमतें 200 रू. के पार हैं। आटा 50 रू. पार कर दिया है। ठीक तरह से खाने लायक चावल 50 रू. पार है। इस समय बाजार में कोई भी सब्जी 50 रू. के नीचे नहीं है। गरीब आदमी दाल-चावल और टमाटर-मिर्च की चटनी खाकर काम चला लेता था, आज तो वह भी मुमकिन नहीं दिखता है ? फिर भी सरकारी आंकड़ें महंगाई पर हकीकत बयान क्यों नहीं करते हैं ?
महंगाई को अक्सर आंकड़ों में दिखाने, प्रस्तुत करने, समझने की कोशिश की जाती है। ठीक है कि महंगाई की आंकड़ों की भाषा होती है, लेकिन इसके इतर आम जनजीवन पर महंगाई का व्यापक प्रभाव एवं असर होता है। महंगाई की वजह से आम आदमी के खान-पान, रहन-सहन एवं जीवन स्तर में गुणात्मक गिरावट आ जाती है। कमाई का सारा पैसा महंगाई की भेंट चढ़ जाता है, और दिनरात मेहनत करने एवं आमदनी बढऩे के बावजूद जीवनस्तर में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आ पाता है। महंगाई का असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। सामान्य महंगाई यानि मुद्रास्फीति से उत्पादकों को मुनाफा होता है, जिससे निवेश एवं रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, लेकिन दीर्घकाल में उपभोक्ताओं पर इसका बुरा या नकारात्मक प्रभाव पढ़ता है। उपभोक्ताओं की वास्तविक आय घट जाती है, और अंतत: बाजार में मांग सिकुडऩे लगती है। इसकी वजह से उत्पादक इकाईयां बंद होने लगती हैं। कुल मिलाकर सामान्य से अधिक महंगाई सबके लिए हानिकारक ही होती है।
सरकार के अनुसार जून में खुदरा यानि फुटकर महंगाई 4.81 फीसदी पर पहुंच गई है। मई में यह 25 महीने के निचले स्तर 4.25 फीसदी पर आ गई थी। सरकार का तर्क है कि जून में सब्जियों की ऊंची कीमतों के कारण महंगाई बढ़ी है। तेज गर्मी, असमय बारिश जैसी प्राकतिक घटनाओं ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है जिससे सब्जियों के दाम बढ़े हैं। चूंकि प्रचलित महंगाई दर के निर्धारण में लगभग आधी हिस्सेदारी खाने-पीने की चीजों की होती है, लिहाजा खुदरा महंगाई दर में मामूली बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जो अगस्त महिने के बाद सामान्य हो जायेगी।
वैसे तो जुलाई के महीने में सब्जियों की कीमतें हमेशा अधिक हो जाती हैं। आलू, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, हरी धनिया पत्ती, अदरक इत्यादि तमाम मौसमी सब्जियों की कमी की वजह से कीमतें बढ़ जाती हैं, और आम आदमी की रसोई का जायका बिगड़ ही जाता है; लेकिन इस बार आलू, प्याज को छोडक़र शेष सब्जियों ने जिस तरह से रिकॉर्ड तोड़ महंगाई पैदा की है, यह विचार-विमर्श का एक गंभीर मसला है। यद्यपि यह महंगाई बहुत कुछ प्राकृतिक कारणों की वजह से है, इसके बावजूद इस कमरतोड़ महंगाई के लिए कहीं न कहीं सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
दरअसल में इस महंगाई की सबसे बड़ी वजह उत्पादन की कमी है। देश की 142 करोड़ की आबादी के लिए जितनी खाद्य वस्तुओं यानि रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों की जरूरत है, उस तादाद में देश में उत्पादन नहीं हो रहा है। कई चीजों का यदि उत्पादन है, तो उंचीं कीमतों के लालच में बड़े पैमाने पर निर्यात कर दिया जा रहा है। तात्पर्य यह है कि खाद्य महंगाई की सबसे बड़ी वजह मांग-पूर्ति का असंतुलन है। प्राकृतिक कारणों से उत्पादन प्रभावित होने की वजह से आपूर्ति बुरी तरह घटती जा रही है। जिसकी वजह से साल के कुछ महिनों जैसे जून-जुलाई, अक्टूबर-नवम्बर, मार्च-अप्रैल आदि में जलवायु परिवर्तन जैसे कारणों से सब्जियों, फलों, दूध, दाल, तेल आदि रोजमर्रा की जरूरी जिंसों के दाम आसमान छूने लगते हैं।
सवाल यह भी उठता है कि यदि महंगाई दर नियंत्रित यानि सामान्य है तो फिर वह धरातल पर दिखलाई क्यों नहीं देती है? आमजन महंगाई को लेकर परेशान क्यों है? महंगाई को लेकर जो विरोधाभास है, उसकी वास्तविकता क्या है? महंगाई के कारण क्या हैं ? वास्तविक महंगाई की वजह क्या है ? इसके लिए सरकार को दीर्घकालिक कृषि नीति बनाने की जरूरत है, जिस दिशा में सरकार का ध्यान केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित है। इसके लिए कृषि को उद्योग का दर्जा देकर कृषि में भारी सरकारी निवेश की दरकार है, जिससे देश की विशालतम जनसंख्या के लिए जरूयरत के अनुसार उतपादन को बढ़ावा दिया जा सके। फलों, सब्जियों इत्यादि के भंडारण की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाने की वजह से इन मौसमों में होने वाली जमाखोरी और कालाबाजारी पर कठोर कार्रवाई करने की जरूरत है।
अब समय आ गया है कि धान उत्पादन के रकबा को हतोत्साहित करते हुए दलहन, तिलहन, दूध, फल, सब्जियों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए सब्सिडी बढ़ाई जाये। इनके भंडारण की समुचित सरकारी व्यवस्था करनी होगी, जिससे महंगाई पर रोक लगाई जा सकती है। देश में खाद्य वस्तुओं के भंडारण की व्यवस्था नहीं है?ऐसा नहीं है। देश में भंडारण की व्यवस्था असल में निजी हाथों में है, जो जमाखोरी एवं कालाबाजारी जैसी अनैतिक व्यवस्थाओं को जन्म देकर मुनाफा वसूली करती हैं, जिससे महंगाई बेलगाम हो जाती है। यानि सरकारी नीतियों की असफलता महंगाई के लिए न सिर्फ जिम्मेदार है, अपितु कृषि क्षेत्र को लेकर सरकार की उदासीनता और कृषि क्षेत्र को लेकर अदूरदर्शितापूर्णं नीतियां वर्तमान महंगाई की सबसे बड़ी वजह है।
- हरीश कुमार
बारिश की वजह से देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति ने हालात को पटरी से उतार दिया है. नदियां-नाले सब उफान पर थे. मानसून ने इस बार भारत में थोड़ी जल्दी दस्तक दे दी है. राजधानी दिल्ली भी बाढ़ जैसी आपदा से बच नहीं सकी. कुछ राज्यों में हालत बेहतर हुई है लेकिन उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य लगातार भारी बारिश का सामना कर रहे हैं. बारिश और बाढ़ का खतरा कम हुआ ही था कि अब इससे होने वाले संक्रमण और बिमारियों ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिया है. बाढ़ के बाद अब कई बीमारियां तेजी से बढ़ने लगती हैं. इनमें आंखों की समस्या (आई फ्लू) बड़ी तेजी से फैल रही है. जगह-जगह इससे पीड़ित लोगों ने काले चश्मे पहन रखे हैं. इस इंफेक्शन की वजह से लोगों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
यह आई फ्लू देश के कई राज्यों में तेजी से फैल रहा है. जिससे लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसे आँखों में लालिमा, दर्द, सूजन, खुजली आदि. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में भी आई फ्लू की समस्या तेजी से बढ़ रही है. जम्मू के ज़्यादातर अस्पताल चाहे वह शहरी क्षेत्र में हों अथवा ग्रामीण क्षेत्र, इस समय आंखों की समस्या से जूझ रहे मरीजों से भरे हुए हैं. प्रतिदिन अस्पतालों में आई फ़्लू के मरीजो का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इस संबंध में जम्मू बहु फोर्ट के रहने वाले 14 वर्षीय हरित कुमार का कहना है कि मुझे पहले एक आंख में हल्की हल्की लाली होने लगी और उसके बाद दर्द भी होने लगा. इसके बाद आंखें थोड़ी थोड़ी सूजने लगीं. इसके साथ ही आंखों में जलन भी होने लगी और आंखों से हल्का हल्का पानी निकलने लगा. एक-दो दिन बाद मेरी दूसरी आंख मे भी वैसे ही सब कुछ होने लगा. जब मैंने चेकअप करवाया तो मुझे पता लगा कि मैं भी आई फ्लू से संक्रमित हो चुका हूं. डॉक्टर ने मुझे कुछ सुझाव दिए हैं और कुछ आई ड्राप, जिसकी वजह से अब मुझे थोड़ा थोड़ा आराम मिलना शुरू हो गया है.
इस संबंध में जम्मू संभाग के सांबा जिला स्थित जिला अस्पताल की आई स्पेशलिस्ट डॉक्टर रश्मि का कहना है कि हमारे यहां इस समय 100 में 80 मरीज आई फ्लू की समस्या से पीड़ित आ रहे हैं. इसमें हर उम्र के लोग हैं. कहीं कहीं तो पूरी की पूरी फैमिली ही इस समस्या का शिकार हो चुकी है।.परंतु बच्चों में यह लक्षण ज्यादा इसलिए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि बच्चे अपनी हाइजीन मेंटेन नहीं रख पाते हैं. दूसरा बच्चों की इम्युनिटी बड़ों की अपेक्षा थोड़ी कम होती है. डॉ रश्मि सुझाव देते हुए कहती हैं कि इस समय जो भी बच्चे आंखों की समस्याओं से जूझ रहे हैं, माता पिता उन्हें स्कूल न भेजें ताकि न केवल बच्चे को और अधिक इंफेक्शन से बचाया जाए बल्कि इससे दूसरे बच्चों के भी संक्रमित होने का खतरा कम हो जाएगा. बच्चे का हाथ बार-बार धुलवाने की ज़रूरत है ताकि वह गंदे हाथों से आँखों को छू न ले. डॉ रश्मि बताती हैं कि इस समय यह बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि इससे जन्म के मात्र 20 से 25 दिन का बच्चा भी बच नहीं सका है जोकि आश्चर्य की बात है.
जम्मू मेडिकल हॉस्पिटल के डॉक्टर संदीप गुप्ता का कहना है कि पिछले चार-पांच दिन से देखने में आ रहा है कि आई फ़्लू के केस तेज़ी से बढ़ गए हैं. ऐसा नहीं है कि इस फ्लू में केवल बच्चे ही संक्रमित हो रहे हैं बल्कि यह किसी भी उम्र के लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है. छोटे बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक सभी इस आई फ्लू से प्रभावित हो रहे हैं. डॉक्टर संदीप गुप्ता का कहना है कि चूंकि यह सामान्य रूप से फ़ैल रहा है, ऐसे में इसके लिए कुछ सावधानियां बरतने की ज़रूरत है ताकि न केवल इससे बचा जा सके बल्कि फैलने से भी रोका जा सके क्योंकि यह एक वायरल इंफेक्शन है. डॉ गुप्ता का कहना है कि लगातार बारिश होने की वजह से वातावरण में नमी अधिक हो गई है. इससे इस वायरस को पनपने में मदद मिल रही है और यह तेजी से फैल रहा है.
डॉ गुप्ता कहते हैं कि इस फ्लू से घबराने की जरूरत नहीं है. बल्कि इसे समझने और इससे सावधानीपूर्वक बचने की जरूरत है. पहले तो आई फ्लू के लक्षण पता होने चाहिए. इसके लक्षणों पर चर्चा करते हुए डॉ गुप्ता बताते हैं कि पहले एक आंख में लाली आने लगती है और उसमें जलन होने लगती है. जिसके बाद आंखों से पानी ज्यादा आता है. पहले एक आंख में संक्रमण होता है. फिर दो-चार दिन में दूसरी आंख भी संक्रमित हो जाती है. आंखों के आसपास काफी स्वेलिंग आ जाती है जो बहुत पेनफुल होती है. उन्होंने इन अफवाहों को निराधार बताया कि इससे आंखों में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न हो जाता है या फिर रोशनी में कमी हो जाती है.
उन्होंने इन अफवाहों को भी निराधार बताया कि किसी संक्रमित को देख लेने से यह बीमारी फ़ैल जाती है बल्कि संक्रमित व्यक्ति को छूने से फैलती है. उन्होंने लोगों को सुझाव देते हुए कहा कि बिना हाथ धोए उंगलियों को अपनी आंखों से ना लगाएं. अधिक अधिक भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से परहेज़ करें. डॉ संदीप ने कहा कि यह संक्रमण 7 से 14 दिन में ठीक हो जाता है, इसलिए घबराने की ज़रूरत नहीं है. जब भी आंखों में ऐसी कोई समस्या दिखे तो तुरंत नजदीकी हॉस्पिटल में जाएं और आंखों का चेकअप करवा लें. उन्होंने बताया कि जैसे जैसे वातावरण में नमी कम होती जायेगी, वैसे वैसे इस संक्रमण का खतरा भी कम होता जाएगा.
जम्मू मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ डॉ अशोक शर्मा का कहना है कि वायरल कंजंक्टिवाइटिस के दौरान अधिकांश लोग खुद ही आंखों का इलाज करना शुरू कर देते हैं, जो कई बार नुकसानदायक होता है. यह वायरस हवा के माध्यम से फैलता है. इसीलिए शहरों के साथ साथ यह ग्रामीण क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रहा है. उन्होंने बताया कि शहरी क्षेत्रों में जहां भीड़भाड़ अधिक होने और कचरे का सही निस्तारण नहीं होने के कारण यह बीमारी तेज़ी से फ़ैल रही है तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता के अभाव में यह बीमारी अपने पैर पसार रही है. डॉ शर्मा ने कहा कि सावधानी और जागरूकता इस बीमारी से लड़ने और बचने का सबसे कारगर हथियार है. (चरखा फीचर)
डॉ. आर.के. पालीवाल
अपने-अपने राम हिंदी के लेखक भगवान सिंह की प्रसिद्ध किताब है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का व्यक्तित्व इतना विराट था कि उसे देश के विभिन्न क्षेत्रों और वर्तमान में एशिया के अलग हुए देशों के लोगों ने अपनी अपनी समझ के अनुसार आत्मसात किया है। डॉ. राम मनोहर लोहिया द्वारा संकलित किए राम के विविध चरित्रों को चित्रकूट में स्थापित एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया है जहां एक साथ भगवान राम से संबंधित राम लीलाओं की अद्भुत जानकारी मिलती है। जैसे लोक में राम के अलग अलग स्वरूप विद्यमान हैं वैसे ही साहित्य में भी है। बाल्मीकि रामायण के राम तुलसीदास की रामचरित मानस के राम से वैसे ही अलग हैं, जैसे महात्मा गांधी के राम बाल्मीकि और तुलसीदास के राम से अलग हैं।
अब हमारे यहां अलग अलग लोगों राम ही अलग अलग नहीं रहे बल्कि राम राज्य भी अलग अलग हो गए हैं। बाल्मीकि और तुलसीदास ने जिस राम राज्य का जिक्र किया है महात्मा गांधी के राम राज्य की परिकल्पना भी लगभग वैसी ही थी जिसमें शासकों की निर्भीकता, सत्य, ईमानदारी, दया, करुणा और अंत्योदय समाज की सेवा राज्य के प्रमुख तत्व थे। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरह से राम राज्य की परिकल्पना की है। उसमें राम का भव्य मंदिर सबसे ऊपर है और राम के आदर्श और मर्यादा उसके बाद आते हैं। भाजपा के राम राज्य में जय श्री राम, भारत माता की जय और वंदे मातरम् का नारा अनिवार्य है। इसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राष्ट्र का सबसे अहम सामाजिक सांस्कृतिक संगठन माना जाता है। बजरंग दल को राम के सेवक हनुमान उर्फ बजरंग बली का अधिकृत प्रतिनिधि मानते हैं और सभी नागरिकों को हिंदू कहा जाता है।
इसे भगवान राम की महिमा कहें या भारतीय जनता पार्टी की नकल हाल ही में कांग्रेस ने भी अपने राम राज्य की परिकल्पना कर ली है। उनके राम राज्य की कमान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने संभाली है। उन्होंने कांग्रेस और छत्तीसगढ़ के राम राज्य के एक पेज के विज्ञापन भी जारी कर दिए हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल बताया है इसलिए चंद्रखुरी में माता कौशल्या के प्राचीन मंदिर का भव्य विकास करने की घोषणा की है। भारतीय जनता पार्टी यदि भगवान राम के भव्य मंदिर का श्रेय लेगी तो कांग्रेस भगवान राम की माताश्री के भव्य मंदिर निर्माण का श्रेय लेगी। यही नहीं छत्तीसगढ़ सरकार 138 करोड़ रूपए खर्च कर राम वन गमन पथ का विकास कर रही है। सरकार के विज्ञापन में जुटाई गई जानकारी के मुताबिक भगवान राम ने अपने चौदह साल के वनवास के दस साल छत्तीसगढ़ में बिताए थे। सरकार के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में राम की नौ मूर्तियों की स्थापना की जानी है। श्री राम के नाम पर जितना काम छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार कर रही है उसका एक अंश भी रमन सिंह की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने नहीं किया था। भूपेश बघेल का मानना है कि राम के साथ छत्तीसगढ़ का मामा भांजे का नाता है और भांजे के साथ छत्तीसगढ़ में विशेष रिश्ता होता है। इस लिहाज से पड़ोसी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो आम जन के मामा हैं, छत्तीसगढ़ के नागरिक भगवान राम के मामा हुए।
कांग्रेस ने भी शायद तय कर लिया है कि भगवान राम और राम राज्य पर भारतीय जनता पार्टी का एकाधिकार नहीं होने देंगे। इसी कड़ी में उन्होंने भाजपा के सहायक संगठन बजरंग दल को भगवान राम के प्रधान सेवक बजरंग बली का इकलौता प्रतिनिधि मानने पर एतराज किया था। मध्य प्रदेश के कांग्रेस के आदिवासी विधायक ने हनुमान को वनों का निवासी आदिवासी बताया है और बजरंग दल और उसके समर्थकों को चेतावनी दी है कि वे आदिवासियों के इष्ट बजरंग बली के स्वयंभू प्रतिनिधि बनने की कोशिश न करें। अब देखना यह है कि अगले लोकसभा चुनाव में देश की जनता किसे भगवान राम का भक्त मानेगी और को किसके रामराज्य को बेहतर मानेगी !


