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एपस्टीन फाइल : बौद्धिक प्रभावशाली भी कमजोरों के शोषण में पीछे नहीं...
05-Feb-2026 10:04 PM
एपस्टीन फाइल : बौद्धिक प्रभावशाली  भी कमजोरों के शोषण में पीछे नहीं...

-अमिता नीरव

वो ग्लोबलाइजेशन के शुरुआती परिणामों के चमकीले साल थे। मीडिया में समाज के समृद्ध होने के किस्से तैरने लगे थे। ये बताते हुए माता-पिता खुश हुआ करते थे कि उन्हें रिटायरमेंट के समय जितना पीएफ मिला, उतना उनके बेटे की पहली नौकरी का एनुअल पैकेज है।

उन्हीं दिनों एक स्टोरी पढ़ी कि 30 से 35 साल की उम्र के प्रोफेशनल्स अपने करियर के पीक पर अध्यात्म की तरफ मुड़ गए। उनमें से एक दो तो शायद हिमालय में भटक रहे हैं। जाहिर है जिन भौतिक सुविधाओं को उनके माता-पिता रिटायरमेंट के बाद हासिल कर पाए उन्होंने तीस की उम्र तक आते आते पा लिया।

एक कार और एक घर... बस यही तो मध्यमवर्गीय परिवारों का सपना हुआ करता था। इसे हासिल कर लिया तो अब किस सपने का पीछा कर जिंदगी में लक्ष्य तय किया जाए? जब पाने को कुछ न बचा हो तो फिर दौड़ किस तरफ होगी? तब तक की समझ ये थी कि एक उम्र के बाद ही अध्यात्म की तरफ रुझान बढ़ता है।

उस वक्त पहली बार एक विचार आया कि समृद्धि के शिखर से एक रास्ता विरक्ति की तरफ और दूसरा विकृति की तरफ जाता है। तब पहली बार लगा कि समृद्धि से एक रास्ता विरक्ति की तरफ भी जा सकता है। क्योंकि इससे पहले अमीरों की अय्याशी के कई उदाहरण समाज में मौजूद थे।

कुछ सालों बाद एक स्टोरी और पढ़ी। पुणे, बेंगलुरु जैसे द्बह्ल हब में युवाओं में नशे का चलन बढ़ गया है। शराब से आगे अब ड्रग्स को उस वर्ग में मान्यता हासिल हो चली है और पार्टियों में इसका चलन बढ़ गया है। इन्हीं दिनों रेव पार्टी के बारे में भी सुना। तरह-तरह की पिल्स और पाउडर का खुलेआम उल्लेख था।

जब बिग बॉस का पहला सीजन आया तो लगा ये दूसरी तरह के रियलिटी शो की तरह का ही एक और शो होगा। फिर उसकी खबरें आने लगीं, उसके विवाद मीडिया में जगह पाने लगे। एक-के-बाद-एक उसके सीजन में कंटेस्टेंट के तौर पर उस वक्त के विवादास्पद लोग आने लगे। चकित हुई कि वो लोग भी उसे देखते हैं, जो अन्यथा बौद्धिक समझे जा सकते हैं।

ओटीटी की शुरुआत में जो सीरीज बहुत लोकप्रिय हुई, जिन पर सोशल मीडिया पर पोस्ट बनती, मीम बनते और जिसके डायलॉग मशहूर हुए, उन्हें देखने पर उबकाई आने लगी थी। इतनी गालियाँ, अश्लीलता, हिंसा और सेक्स सीन कि दिमाग चकराने लगा। उस पर तुर्रा ये कि उन सीरीज पर मध्यमवर्गीय तबके में सहज चर्चा हो रही है। इस बीच जानबूझकर विवाद पैदा करना और मीडिया में जगह पा लेने की ट्रिक से कई लोग रातों रात स्टार बन गए। कई लोगों ने इस ट्रिक को अपनाया और अब भी अपना रहे हैं। कभी मुस्तफा खाँ शेफ्ता का यह शेर ‘हम तालिब-ए-शोहरत हैं, हमें नंग से क्या काम बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा!’, को बस हँसी-मजाक में इस्तेमाल किया जाता था, अब उसे अमल में भी लाया जाने लगा।

हमारे महाप्रभु के उदय ने समाज में बेहूदगी, अभद्रता और चरित्र हनन को लीगलाइज किया और समाज में इन सारी चीजों को स्वीकार्यता मिली। कभी इस माँग के बारे में पढ़ा था कि भ्रष्टाचार को लीगल कर दिया जाना चाहिए। इसके पीछे का तर्क भी बड़ा सुंदर था, ऐसा करने से भ्रष्टाचार में कमी होगी?

उदारीकरण के बाद जिस तेजी से हमारे समाज में पैसे का प्रवाह हुआ और फिर जिस तरह से उसका केंद्रीयकरण होने लगा उसने हमारे सामाजिक मूल्यों को भी एडवर्सली प्रभावित किया। जीवन के हर क्षेत्र में बेहूदगी, तुरत-फुरत प्रसिद्धि के लिए अपनाए जाने वाले उल्टे-सीधे रास्ते और नैतिक-अनैतिक, वैधानिक-अवैधानिक तरीके से पाई जाने वाली सफलता को लेकर समाज में निषेध दिखाई देना बंद हो गया।

अनैतिक तरीकों से आने वाला पैसा, हमारे समाज की जड़ें हिला रहा है। ये पैसा कैसे इतिहास को बदलता है, इसे भी मार्क्स के सिद्धांतों से समझा जा सकता है। इसलिए मैं हर साम्राज्य को... चाहे वो धार्मिक हो, आर्थिक हो, ताकत से संचालित हो या तथाकथित ज्ञान से संचालित हो, शक की नजर से देखती हूँ।

कभी किसी बातचीत में मैंने कह दिया था कि ‘समृद्धि विकारों को जन्म देती है’ तो कई लोगों ने आपत्ति दर्ज की थी, ‘तो क्या दुनिया को विपन्न होना चाहिए?’ कई दिनों तक उलझी रही, फिर समझ आया, दुनिया में अधिकतम समानता होना चाहिए। तभी हर तरह के शोषण का प्रतिकार किया जा सकेगा।

कुछ साल पहले किसी ने कहा था कि रेप और मोलेस्टेशन भी वर्गीय मसला है। मैंने उसका कहा सहेज लिया था। धीरे-धीरे लगा कि कमोबेश ठीक बात है। वर्ग की समझ को जरा स्ट्रेच करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि ये लैंगिक से ज्यादा वर्गीय मामला है।

शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, रचनात्मक रूप से यहाँ से तक कि बौद्धिक रूप से प्रभावशाली लोग अपने से कमजोर लोगों का शोषण करते हैं। बलात्कार या यौन शोषण का कोई भी मामला उठाकर इस बात की तस्दीक की जा सकती है।

यकीन जानिए ये प्तएपस्टीन_फाइल्स उस पैसे के प्रवाह और उसके केंद्रीयकरण से पैदा विकृति का सिर्फ टिप ऑफ आइसबर्ग है। चूँकि ये मामला अंतरराष्ट्रीय है इसलिए हमें इसके बारे में ज्यादा जानकारी मिल रही है, नहीं तो आसाराम का मामला भी कुछ कम नहीं था।

दुनिया भर में ऐसे कई मामले हुए, हो रहे हैं और होते रहेंगे। जब तक कि पैसे का ये नापाक बहाव नहीं रुकेगा और इसका ये नेटवर्क नहीं टूटेगा।


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