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हर्ष मंदर ने क्यों कहा, ‘नफरती भाषा ही हिंसा में बदलती है, इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई जरूरी’
09-Feb-2026 10:23 PM
हर्ष मंदर ने क्यों कहा, ‘नफरती भाषा ही हिंसा में बदलती है, इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई जरूरी’

मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने हाल ही में दिल्ली पुलिस को दी एक शिकायत में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है।

हर्ष मंदर का आरोप है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा संवैधानिक पद पर होते हुए देश की अल्पसंख्यक मुसलमान आबादी के खिलाफ नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं।

हर्ष मंदर के इन आरोपों के बाद एक सार्वजनिक बयान में हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वह उनके खिलाफ सौ से अधिक एफ़आईआर दर्ज करवा देंगे।

हाल के सालों में भारत में नफऱत भरी भाषा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर बहस तेज हुई है।

सेंटर फॉर स्टडी ऑन हेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में देशभर में 1,318 नफरती भाषणों की घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2024 के मुकाबले 13 प्रतिशत ज़्यादा है और 2023 के मुकाबले लगभग दोगुनी हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल औसतन हर दिन चार नफरती भाषण हुए। इन घटनाओं का सबसे बड़ा निशाना धार्मिक अल्पसंख्यक, ख़ासतौर पर मुस्लिम और ईसाई समुदाय रहे।

रिपोर्ट यह दावा भी करती है कि नफरत अब सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक निरंतर और संगठित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘पॉपुलेशन जिहाद’ जैसे साजि़शी नैरेटिव्स, हिंसा के खुले आह्वान, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार और धार्मिक स्थलों को तोडऩे की मांगें, सार्वजनिक मंचों से सामान्य रूप से कही जा रही हैं।

खास बात यह है कि ऐसी 88 प्रतिशत घटनाएं उन राज्यों में दर्ज हुईं जहां बीजेपी या उसकी सहयोगी पार्टियां सत्ता में हैं, जबकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इन भाषणों को बड़े पैमाने पर फैलाने का माध्यम बने।

इसी बीच, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के कुछ बयानों को ‘नफरत भरा’ बताते हुए दिल्ली पुलिस को शिकायत दी है, जिस पर अभी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।

बीबीसी हिन्दी के संवाददाता दिलनवाज पाशा से हुई लंबी बातचीत में हर्ष मंदर ने न केवल इस शिकायत के पीछे के कारण बताए, बल्कि नफरत की राजनीति, प्रशासन की भूमिका, न्यायपालिका, मीडिया और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर भी तीखे सवाल उठाए।

‘नफरती भाषण अब अपराध जैसा नहीं रह गया’

हर्ष मंदर का कहना है कि पिछले एक दशक में नफरत भरे भाषण इतने सामान्य हो गए हैं कि वे रोजमर्रा की राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘ऐसा लगने लगा है कि नफरत कोई अपराध ही नहीं रहा। लेकिन इतिहास हमें चेतावनी देता है, नाजी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार गैस चैंबर से नहीं, बल्कि नफरती भाषण से शुरू हुआ था।’

हर्ष मंदर इस बात पर भी जोर देते हैं कि लिंचिंग या हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी है नफरत भरी भाषा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लडऩा।

मंदर कहते हैं, ‘लिंचिंग और हिंसा के खिलाफ हम लड़ते हैं, लेकिन उतनी ही शिद्दत से नफरती भाषण का भी सामना करना होगा, क्योंकि वही आगे चलकर नफऱती हिंसा में बदलता है।’

इसी संदर्भ में वे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयानों को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ मानते हुए कहते हैं, ‘अगर कोई मुख्यमंत्री यह कहे कि ‘मेरा काम एक समुदाय को परेशान करना है’, तो यह सिर्फ  बयान नहीं, बल्कि एक संदेश है, जो नीचे तक जाता है।’

‘धमकियों से मेरी आवाज नहीं रुकेगी’

हर्ष मंदर की पुलिस को दी गई शिकायत के बाद दिए एक बयान में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वह हर्ष मंदर के खिलाफ सौ एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं।

हालांकि, मंदर का कहना है कि उन्हें इस तरह के बयानों या पुलिस की कार्रवाई से डर नहीं लगता।

हर्ष मंदर कहते हैं, ‘अगर डिटेंशन सेंटरों में बंद लोगों की मदद करना अपराध है, अगर एनआरसी से प्रभावित लोगों के साथ खड़ा होना अपराध है, तो मैं यह अपराध करता रहूंगा।’

मंदर कहते हैं, सरकार पुलिस का डर दिखाकर मेरी आवाज दबाना चाहती है, मेरे हौसले को तोडऩा चाहती है लेकिन ‘मेरे हौसले, जमीर और काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।’

‘सत्ता, प्रशासन और नफरत की मशीनरी’

भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हर्ष मंदर लंबे समय तक प्रशासन का हिस्सा रहे।

साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद उन्होंने आईएएस की अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। हर्ष मंदर, जो ख़ुद कऱीब 20 साल तक प्रशासनिक सेवा में रहे, कहते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा अचानक नहीं होती।

वे तर्क देते हैं, ‘नफरत का उत्पादन होता है, दंगे ऐसे ही होते हैं जैसे कोई केमिकल रिएक्शन। हथियार, अफवाहें, भीड़, सब कुछ एक प्रक्रिया के तहत आता है। लेकिन इसके बावजूद हिंसा तब तक नहीं होती, जब तक सरकार उसे होने न दे।’ वे 2020 के दिल्ली दंगों का उदाहरण देते हैं। उनके अनुसार, देश की राजधानी में, जहां गृह मंत्रालय और तमाम सुरक्षा एजेंसियां मौजूद हैं, अगर चाहते तो हिंसा घंटों में रोकी जा सकती थी।

वे कहते हैं, ‘सरकार कहती है कि यह साजि़श थी। मैं मानता हूं कि साजिश थी। लेकिन वह साजिश प्रदर्शनकारियों की नहीं, सत्ता की थी।’

दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़े 758 एफआईआर दर्ज किए थे। खबरों के मुताबिक, पुलिस ने दो हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था।

‘यह आरोप गंभीर है, लेकिन अनुभव से निकला है’

जब उनसे पूछा गया कि क्या वे सीधे तौर पर सरकार को अपने नागरिकों के खिलाफ साजिश का दोषी ठहरा रहे हैं, तो हर्ष मंदर अपने प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हैं।

वे साल 1984 के सिख विरोधी दंगों और गुजरात दंगों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘हफ्तों तक चलने वाली हिंसा सरकार की सहमति के बिना संभव नहीं।’

इंदौर में 1984 के दौरान अपने अनुभव को साझा करते हुए वे बताते हैं कि कैसे एक जूनियर अफसर होने के बावजूद उन्होंने सेना बुलाकर कुछ ही घंटों में हिंसा रोकी।

हर्ष मंदर ने तब एसडीएम रहते हुए सेना को भीड़ पर गोली चलाने के आदेश दिए थे और कुछ ही घंटों के भीतर हिंसा पर काबू पा लिया गया था। वे कहते हैं, ‘अगर एक अफसर छह घंटे में दंगे रोक सकता है, तो पूरे राज्य में हफ्तों तक हिंसा कैसे चलती रही? इसका जवाब साफ है।’

बुलडोजर और ‘तुरंत इंसाफ’

मंदर का एक बड़ा सवाल ‘बुलडोजर न्याय’ पर भी है।

वे कहते हैं, ‘किसी पर आरोप लगा, और उसी दिन उसका घर तोड़ दिया गया। यह कौन तय कर रहा है कि वह अपराधी है? कानून की प्रक्रिया कहां गई?’

उनके मुताबिक, यह सब प्रशासन की मिलीभगत से हो रहा है। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘जो अफ़सर संविधान के उल्लंघन के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत कर सकते थे, वे चुप हैं।

हर्ष मंदर कहते हैं, ‘ये प्रशासनिक अधिकारी ही हैं जो लोगों के घर बुलडोजर लेकर पहुंच रहे हैं। इस संवैधानिक अपराध को न्याय बताया जा रहा है।’

 

‘आलोचना करना देशद्रोह नहीं है’

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) अलग से लिंचिंग या नफरत से प्रेरित हिंसा के मामलों का रिकॉर्ड नहीं रखता है। लेकिन ‘द सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज़्म’ (सीएसएसएस) की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 में लिंचिंग की चौदह घटनाएं हुईं जिनमें आठ लोगों की जानें गईं।

सीएसएसएस ने अपनी रिपोर्ट में जिन मामलों को शामिल किया उनमें मरने वाले सभी मुसलमान थे। इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2025 में देश में सांप्रदायिक हिंसा की 29 घटनाएं हुईं जबकि साल 2024 में ऐसी 59 घटनाएं हुई थीं जिनमें तेरह लोग मारे गए थे।

वहीं, साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन के डेटा के मुताबिक, साल 2025 में कम से कम 50 मुसलमानों की गैर कानूनी हत्याएं हुई।

साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन (एसएजेसी) ‘इंडिया परसेक्यूशन ट्रैकर’ संचालित करता है।

इसके डेटा के मुताबिक, 2025 में मुसलमानों की कम से कम 50 गैरकानूनी हत्याओं का दस्तावेजीकरण किया गया। इस डेटा में दावा किया गया है कि इनमें से 27 हत्याएं हिंदू चरमपंथी समूहों (गैर-राज्य तत्वों) ने कीं और 23 हत्याएं सुरक्षाकर्मियों ने की।

हालांकि, भारत में 140 करोड़ से अधिक की आबादी रहती है। भारत में हिंसक घटनाओं में मारे जाने वाले कुल लोगों में सांप्रदायिक हिंसा में मारे जाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है।

ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या मानवाधिकार कार्यकर्ता सिर्फ सांप्रदायिक हिंसा या लिंचिंग की घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करके सरकार की आलोचना करते हैं और इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खऱाब होती है।

सरकार की ओर से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर ‘देश को बदनाम करने’ का आरोप लगाए भी जाते हैं।

इससे जुड़े सवाल पर हर्ष मंदर कहते हैं, ‘मैं अपने देश से प्यार करता हूं इसलिए मैं उसकी आलोचना करता हूं।’

उनका मानना है कि मुसलमानों और ईसाइयों को बार-बार यह महसूस कराया जा रहा है कि वे इस देश के नागरिक नहीं हैं।

हर्ष मंदर कहते हैं, ‘नागरिकता सिर्फ कागज का सवाल नहीं, बल्कि अधिकारों का सवाल है। जब रोज नागरिकता पर सवाल उठे, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।’

जांच, छापे और दबाव

हर्ष मंदर के संस्थानों पर भारत की जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की थी। उनकी संस्था का एफ़सीआरए (विदेश से फंड लेने का लाइसेंस) भी रद्द कर दिया गया था।

क्या इस तरह की जांच और मुकदमों से विश्वसनीयता पर सवाल उठता है?

इस पर हर्ष मंदर कहते हैं, ‘मेरे खिलाफ यूएपीए, पीएमएलए, एफसीआरए जैसे कानूनों के तहत कार्रवाई हुई। चारों तरफ से घेरने की कोशिश हुई, संस्थाओं पर दबाव डाला गया, बदनाम किया गया। लेकिन मैंने तय किया है कि न मेरी आवाज रुकेगी, न मेरा काम।’

हर्ष मंदर ये जरूर मानते हैं कि एफआईआर या जाँच से उनका काम प्रभावित तो हो सकता है लेकिन रुकेगा नहीं।

जिम्मेदारी किसकी?

जब उनसे पूछा गया कि नफऱत के बढ़ते माहौल के लिए कौन ज़्यादा जिम्मेदार है- राजनीति, प्रशासन, न्यायपालिका या मीडिया तो उनका जवाब साफ़ है- ‘सब।’

उनके मुताबिक, प्रशासन और पुलिस पहली पंक्ति की जि़म्मेदारी निभाने में नाकाम रहे। विपक्ष ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा पर बोलने की हिम्मत नहीं दिखाई।

न्यायपालिका ने स्वत: संज्ञान नहीं लिया और मुख्यधारा का मीडिया सत्ता से सवाल पूछने के बजाय नफऱत का मंच बन गया।

वे कहते हैं, ‘इमरजेंसी के दौरान जब झुकने को कहा गया, तो मीडिया रेंगने लगा। आज तो जेल का डर भी नहीं, फिर भी रेंगना तो दूर मीडिया उससे भी आगे निकल गया है।’

हर्ष मंदर कहते हैं, ‘प्रशासनिक अधिकारी संविधान के तहत मिले अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने से डर रहे हैं, जबकि उनकी जिम्मेदारी संविधान के प्रति है न कि किसी पार्टी या सत्ता के केंद्र के प्रति।’

इस सवाल पर कि क्या समाज ही बदल गया है, हर्ष मंदर कहते हैं कि देश की बहुसंख्यक आबादी आज भी इस नफऱत से सहमत नहीं।

वे कहते हैं, ‘सत्ताधारी दल को 40 फीसदी वोट मिलते हैं, तो 60 फ़ीसदी वोट नहीं मिलते हैं। नैतिक केंद्र टूट रहा है, लेकिन पूरी तरह नहीं।’

हर्ष मंदर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि आज लोगों के दिलों में बंटवारा हो गया है।

वे कहते हैं, ‘दिलों के लाखों बंटवारे हो रहे हैं। लेकिन हर नागरिक को इन हालात से लडऩा होगा। कहानी सिर्फ नफरत की नहीं-मोहब्बत की भी है। और अंत में मोहब्बत ही जीतेगी।’

हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि इस दौर में उन्हें अकेलापन महसूस होता है।

वे कहते हैं, ‘कई साथी चुप हैं। अगर नाजी जर्मनी में आप कहते कि बाकी सब पर बोलूंगा, लेकिन यहूदियों पर हो रहे अत्याचार पर चुप रहूंगा, तो इतिहास आपको कैसे याद करता?’

(bbc.com/hindi)


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