विचार / लेख

जिनका हो जितना ज़्यादा असर, उन पर जिम्मेदारी उतनी अधिक
06-Feb-2026 10:05 PM
जिनका हो जितना ज़्यादा असर, उन पर जिम्मेदारी उतनी अधिक

जिस वक्त मैंने अखबार में काम करना शुरू किया था, उसी वक्त के आसपास मीडिया में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था। हमारा अखबार जो फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन तक नही छापता था, भाषा की शुद्धता और शिष्टता का खासा खयाल रखा जाता था, उस पर इस बात के आरोप लगने लगे थे कि इस अखबार की भाषा बहुत मुश्किल है।

उस वक्त मार्केटिंग टीम बार-बार ये फीडबैक लेकर आती थी कि यूथ अखबार की भाषा से कनेक्ट नहीं हो पा रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं क्लिष्ट भाषा की समर्थक हूँ, मगर मुझे लगता है कि अखबार की जिम्मेदारी सिर्फ खबरें परोसना ही नहीं, जनमत तैयार करना, सामाजिक मूल्यों की सृष्टि और भाषा के संस्कार देना भी है।

मगर वो तेज आँधी थी, जिसने हिंदी अखबार की भाषा को हिंग्लिश नामक एक नई भाषा दी। भाषा से शुरू होने वाली ये प्रक्रिया बाद में पत्रकारिता और सामाजिक मूल्यों में बदलाव तक पहुँची। आज हम पत्रकारिता में देख रहे हैं कि पत्रकार किस तरह से हमारे समाज को पथभ्रष्ट करने की योजना में प्राणपण से जुटे हुए हैं।

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जिस वक्त स्मिता पाटील ने मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया, उसी वक्त से वे इन फिल्मों को लेकर बहुत सहज नहीं थीं। बताया जाता है कि नमकहलाल फिल्म के गाने "आज रपट जाए तो" की शूटिंग के बाद वे बहुत डिस्टर्ब रहीं और रात भर रोती रहीं। अमिताभ ने उनसे इस सिलसिले में बात की औऱ भी साथी कलाकारों से बात करने के बाद वे सैटल हो पाईं।
किसी इंटरव्यू में लता मंगेशकर से जब ये सवाल किया गया कि उन्हें किसी गाने के लेकर अफसोस हुआ कभी, तो उन्होंने बताया कि "मैं का करूं राम मुझे बुडढा मिल गया" गाने को लेकर आज तक अफसोस है, ये गाना मुझे नहीं गाना चाहिए था।

अमोल पालेकर अपनी आत्मकथा में फिल्म "तीसरा कौन" का किस्सा बताते हैं। फिल्म में एक साधारण सा लगने वाला व्यक्ति अंत में खलनायक के रूप में उभरता है, वे लिखते हैं कि ‘इसलिए इस भूमिका के लिए मैंने अपनी रजामंदी दे दी कि मैं अभिनय के विभिन्न पहलू दिखा सकूं। इस बारे नहीं सोचा था कि इसमें खलनायक की किस तरह की प्रवृत्ति दिखानी होगी।‘
शूटिंग के अंत में जब यह पता चला कि इस भूमिका को बेटी का यौन शोषण करने वाले बाप के रूप में भी समझा जा सकता है। इस पर मैं बहुत बेचैन हो गया। निर्माता ने दलील दी कि किसी प्रकार का दुष्कृत्य होते हुए नहीं दिखाया गया था और अंत में केवल डायलॉग्स से ही वह बात सामने आई थी। हर तरह की दलील के बावजूद, वे उस भूमिका को नहीं करने पर अड़े रहे।

 

 

मगर शूटिंग पूरी हो जाने और निर्माता का बहुत नुकसान हो जाने की आशंका के चलते उन्होंने ये फिल्म इस शर्त पर पूरी की कि 'सगी बेटी' की जगह उसमें 'सौतेली बेटी' का उल्लेख जाए। फिर भी वे कहते हैं, ‘आज सोचता हूँ तो लगता है कि मुझे वह समझौता नहीं करना चाहिए था। नुक़सान की भरपाई अपने पैसे से कर देनी चाहिए थी।इसके बाद मैंने ऐसे किरदार स्वीकार करने बंद कर दिए जिनमें स्त्रियों के प्रति रूढ़िवादी, अनचाही तथा नकारात्मक पुरुष-प्रधान मानसिकता को दर्शाना होता था। मेरा मानना है कि एक संवेदनशील विचारवान कलाकार होने के नाते कुछ नियमों का पालन करना चाहिए।‘

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फिल्म होमबाउंड के निर्देशक नीरज घेवान से जब बीबीसी संवाददाता पूछती हैं कि आपने अपनी फिल्म के इतने गंभीर मैसेज देने के लिए मेनस्ट्रीम के कलाकारों को क्यों चुना? यदि आप थियेटर के अल्पज्ञात लोगों को चुनते तो शायद आपका मैसेज ज्यादा पावरफुल होता। तो उन्होंने कहा कि इन लोगों की वजह से मेरी बात ज्यादा दूर तक जाएगी और सुनी जाएगी।

शायद पहले भी लिख चुकी हूँ कि बहुत साल पहले किसी ने इनबॉक्स में किसी मसले पर पोस्ट न लिखने पर मुझसे सवाल किया था। मैं भड़क गई थी कि "मैं क्या लिखूँगी औऱ किस मसले पर लिखूँगी, कब लिखूँगी ये मैं तय करूँगी, आप मुझे नहीं डिक्टेट नहीं करेंगे।" तब सवाल पूछने वाले/वाली ने उत्तर दिया कि असल में इस मसले पर मुझे राय बनाने में दिक्कत आ रही है, और आपका वर्जन जानना चाहता/चाहती हूँ।

पहली बार मुझे इस बात का अर्थ समझ आया कि लिखना भी जिम्मेदारी है। औऱ ये भी कि हम क्यों लेखक, कलाकारों, अभिनेता, खिलाड़ियों या हर उस व्यक्ति से एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह बर्ताव करने की उम्मीद करते हैं, जिनका समाज पर किसी भी तरह का प्रभाव होता हो? क्योंकि उनका कहा बहुत दूर तक जाता है।

मेरी इस राय को चुनौती मुझे मेरे घर पर ही मिलती है कि लेखकों, कलाकारों, खिलाड़ियों या अन्य सेलिब्रिटीज की जिम्मेदारी समाज को परिष्कृत करना भी है। राजेश का कहना है कि लेखक या कलाकार या खिलाड़ी या और कोई हो, उसका अपनी विधा पर अधिकार होना चाहिए, उसकी कोई सामाजिक जिम्मेदारी नहीं है। वह एक प्रतिभाशाली इंसान है और उसके पास सामाजिक समझ हो ये उम्मीद उसके साथ नाइंसाफी है।

असहमत तो नहीं होती, मगर फिर लगता है कि उसकी प्रसिद्धि औऱ यश के चलते उसके कहे, किए का जो समाज पर असर होता है, उसे कैसे नियंत्रित किया जाए? इसीलिए ये जरूरी है कि जिन लोगों का समाज पर व्यापक प्रभाव है उन्हें आवश्यक रूप से सामाजिक जिम्मेदारी निभानी ही होगी, क्योंकि इतिहास गवाह है कि मूल्यों का प्रवाह ऊपर से नीचे होता है। इसलिए मूल्यों के सृजन की जिम्मेदारी हर तरह के प्रभावशाली लोगों को उठानी ही होगी।

क्योंकि नायकत्व उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व है।


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