विचार / लेख
-दिपाली अग्रवाल
जगजीत सिंह जालंधर के डीएवी कॉलेज के साइंस के छात्र थे। उस कॉलेज में रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश, उपेन्द्रनाथ अश्क, सुदर्शन फाकिर जैसे कितने ही प्रसिद्ध और कमाल के लोग भी पढ़े। रवीन्द्र कालिया ने अपनी आत्मकथा ग़ालिब छुटी शराब में जगजीत सिंह का जिक्र किया है, चूंकि वे उनके दो-तीन साल सीनियर थे इसलिए कॉलेज के दिनों का जिक्र कम है। मगर एक मजे की बात बताती हूं कि उसी कॉलेज में प्रसिद्ध पल्प लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक भी पढ़े हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में-कॉलेज के दिनों को याद करते हुए जगजीत सिंह पर पूरे दस पन्ने लिखे हैं। कल ही उस किताब को पढ़ा, आज जगजीत सिंह का जन्मदिन भी है। कुछेक किस्से जो बताते हैं कि कैसे पूत के पांव पालने में पलते हैं और कैसे एक कलाकार बचपन से ही उस एक कला की मिट्टी के साथ पैदा तो होता है लेकिन अपनी मेहनत से उसे लगातार आकार में ढालता रहता है कि वह कहीं बिखर न जाए।
पाठक लिखते हैं कि कॉलेज के बच्चों को कमरे चुनने की सुविधा होती थी लेकिन कोई भी तीन कमरे नहीं चाहता था, सीढिय़ों के पास वाला (शोर के कारण), वॉशरूम के पास वाला (बदबू के कारण), जगजीत सिंह के बगल वाला (उनके 5 बजे उठकर रियाज के कारण)। जगजीत सिंह ने एक बार सुरेन्द्र मोहन पाठक को भी गाते सुना और कहा कि उनकी आवाज अच्छी है, उन्हें और गाना चाहिए और बाकी का रियाज वो खुद उन्हें करवा देंगे, रियाज का समय जब सुबह 5 बजे का पता चला तो पाठक जी ने मना कर दिया। फिर वो लिखते हैं कि उस इंकार का जगजीत ने न ही बुरा माना और न ही दोबारा पेशकश दी। वह एक खुशमिजाज लडक़े थे।
जगजीत सिंह को बच्चे अपने कमरे में बुलाकर फरमाइशी कार्यक्रम करते थे और वे ख़ूब मनोयोग से उन्हें गीत सुनाते थे। कभी उनका इतना गाने का मूड होता कि बरामदे में खड़े लडक़े को गाना सुनाने लग जाते थे और तब वो खीज कर कहता कि तुझे तो पास होना नहीं है, हमें तो पढऩे दे। इस पर जगजीत कहते कि नाशुकरों, एक दिन टिकट खरीदकर मेरे गाना सुनोगे (और ये बात आने वाले दिनों में सच हुई, रवीन्द्र कालिया को तो बड़े पापड़ बेलने पड़े थे)।
एक कमाल का हुनर जो शायद जगजीत सिंह के चाहने वालों को नहीं ही पता होंगी कि फिजिक्स की क्लास में रेजोनेन्स एक्सपेरिमेंट के दौरान दो तारों को एक ही फ्रीक्वेंसी पर झंकृत करना होता था, ये काम ट्यूनिंग फोर्क करता था लेकिन जगजीत सिंह बिना ट्यूनिंग फोर्क के वो सेट कर देते थे, जब परीक्षक चेक करता तो वो एकदम रेजोनेट होती थीं और वो विस्मय से भर जाता था जबकि जगजीत ख़ुद भी नहीं समझ पाते थे कि वो ये कैसे कर लेते थे।
जगजीत सिंह कॉलेज में रिसेस के समय पर पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर गाने लगते थे। पच्चीस मिनट के उस ब्रेक के दौरान वह सोचते थे कि हर स्टूडेंट उनके गाने को इंजॉय कर रहा है। बकौल सुरेन्द्र मोहन पाठक ऐसा होता तो नहीं था लेकिन फिर भी जगजीत पूरी मौज से ही गाना गाते थे। जगजीत बहुत ही ज़हीन, मस्तीखोर, गुणवान थे कि सब उनकी तारीफ करते, गाने सुनाते और किसी को निराश नहीं करते थे। लेकिन कई बार जब गाने के मूड नहीं होता था तो सारे लिरिक्स बिना किसी रिक्त स्थान के इक_े कर एक ही सांस में सुनाने लगते थे और फिर जब सांस चुकने लगती तो ठहर कर कहते - और सुनावां? लेकिन लडक़े पहले ही इतने हाहाकारी मोड में आ चुके होते थे कि कोई हामी न भरता।
उसी कॉलेज में पुरुषोत्तम जोशी नाम का लडक़ा था जो क्लासिकी में जगजीत सिंह को हरा देता था। पाठक लिखते हैं कि नतीजतन जगजीत सिंह को कॉम्प्लेक्स हुआ और उन्होंने क्लासिक में प्रतियोगिता की जगह सुगम संगीत में रुचि लेनी शुरु कर दी। उसके बाद हर प्रतियोगिता में झंडे गाड़े और कॉलेज के समय में ही नाम कमा लिया। ये सब इसलिए कि पुरुषोत्तम जोशी के आगे जगजीत सिंह की पेश न चली। हैरानी की बात है कि अब पुरुषोत्तम जोशी को कोई नहीं जानता और जगजीत सिंह का ज़माना दीवाना है।


