विचार / लेख
-सुदीप ठाकुर
जॉर्ज फर्नांडीस को गए अब चार दिन हो गए। उनके निधन के बाद काफी कुछ लिखा जा चुका है। उनके जीवन का शायद ही कोई पहलू हो, जो अब सार्वजनिक न हो। वह करीब एक दशक से सार्वजनिक जीवन में अनुपस्थित थे। मीडिया ने उनमें दिलचस्पी लेनी बंद कर दी थी। मौत ही वह कारण बनी, जब मीडिया का उन पर ध्यान गया।
इतना कुछ लिखा जा चुका है, इसके बावजूद कई दिनों के असमंजस के बाद मैं यह पोस्ट लिखने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। बहुत टालने की कोशिश की। शायद इसलिए कि जॉर्ज फर्नांडीस पर लिखने के लिए खुद को अधिकृत नहीं मानता।
जॉर्ज ने कभी सोचा नहीं होगा कि उन्हें इतने लंबे वक्त तक सार्वजनिक जीवन से अलग रहना पड़ेगा और फिर एक दिन चुपचाप विदा होना पड़ेगा। स्मृति खोने से पहले तकरीबन छह दशकों तक उन्होंने जैसा सार्वजनिक जीवन जिया, वैसे उदाहरण कम ही हैं। वह नेपथ्य में कभी नहीं रहे।
कमाल यह है कि अपने तमाम विरोधाभासों के बावजूद उन्होंने पूरी पारदर्शिता से अपना जीवन जिया। यह जरूर अचरज होता है कि आखिर किन वजहों से जार्ज ने उन सिद्धांतों और विचारों से समझौता किया, जिन्होंने उन्हें जॉर्ज साहब या साथी जार्ज बनाया था। क्या यह सिर्फ सत्ता में बने रहने की मजबूरियां थीं या फिर उनका परिस्थितियों से मोहभंग हो गया था? आखिर मुंबई के ट्रेड यूनियन नेता और खांटी सोशलिस्ट जॉर्ज दिल्ली के सत्ता के गलियारे में बंधक क्यों बन गए? क्या जॉर्ज को देखने का यह एक नजरिया भर है और इसका सच जॉर्ज के साथ अब दफन हो चुका है?
ऐसा लगता है कि विरोधाभास उनके जन्म से ही जुड़ गया था। 3 जून, 1930 को पैदा हुए जॉर्ज की मां ने उनका नाम जॉर्ज पंचम के नाम पर रखा था। लेकिन यही जॉर्ज साम्राज्यवाद के विरोध का प्रतीक बन गए।
किशोर अवस्था में वह ब्रिटिश नेवी में शामिल होना चाहते थे। लेकिन उनके पिता ने इसकी इजाजत नहीं दी और उन्हें मिशनरी बनने के लिए भेज दिया। उन्हें यह रास नहीं आया और फिर वह मुंबई आ गए। बरसों बाद 1999 को उन्हें संसद में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरीज ग्राहम स्टेंस और उनके बेटों को जिंदा जला देने की घटना के आरोपियों का बचाव करते देखा गया!
1974 में जब इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते देश ने पहली बार परमाणु परीक्षण किया था, तब जॉर्ज दो रात तक सो नहीं सके थे और उन्होंने इसका विरोध किया था। इसके दो बरस बाद इन्हीं जॉर्ज को बड़ौदा डायनामाइट कांड में मुख्य आरोपी बनाया जाता है। इसके तकरीबन पच्चीस बरस बाद जब वह देश के रक्षा मंत्री बनते हैं, तो उनकी सरकार दूसरी बार परमाणु परीक्षण करती है! संभवत: दुनिया के वह अकेले रक्षा मंत्री थे, जिनके दफ्तर में हीरोशिमा की तस्वीर लगी हुई थी।
मुंबई से उनकी जो कहानी शुरू हुई थी, तो वह किसी फिल्म से कम नहीं रही। जिस मुंबई में उन्हें फुटपाथ पर सोने को मजबूर होना पड़ा, वहीं महज एक दशक के भीतर 1960 के दशक में उनकी ऐसी हैसियत हो गई थी कि उनके एक इशारे पर मुंबई थम जाती थी! 1967 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जब एक मजदूर नेता की हैसियत से दक्षिण मुंबई जैसे अमीरों के इलाके में एस के पाटील जैसे दिग्गज को हराया था, तो यह उस वक्त की सबसे दमदार पटकथा हो सकती थी, जिस पर कोई फिल्म बन सकती थी। लेकिन यही जॉर्ज 1971 का चुनाव बुरी तरह हार गए थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। जॉर्ज के आह्वान पर हुई 1974 की रेल हड़ताल के असर के बारे में नई पीढ़ी को अंदाजा भी नहीं होगा। इसी सिलसिले में जॉर्ज की गिरफ्तारी भी हुई थी।
जॉर्ज में गजब का आकर्षण था, जो अपने तुड़े-मुड़े कुर्ते, बिखरे बाल और चप्पल पहने हुए भी लोगों को अपनी ओर खींच लेते थे। नुक्कड़ सभाओं से लेकर संसद तक उनके भाषणों के लोग कायल थे। दरअसल 1967 के चुनाव में उन्हें आम लोगों का तो समर्थन मिला ही था, कॉलेज में पढऩे वाले छात्र-छात्राएं और युवा उनके दीवाने हो गए थे।
करीब पैंतीस बरस पहले मैंने उन्हें पहली बार राजनांदगांव में एक चुनावी सभा में सुना था। मुश्किल से ढाई सौ लोगों की उस छोटी सभा में जॉर्ज जोर शोर से कह रहे थे... जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं!
जॉर्ज में एक तरह की रूमानियत थी। उनका एक जादू था। इसी जादू की वजह से करीब दो दशक पहले मेरे मन में उन पर एक किताब लिखने का फितूर सवार हो गया। यह किताब कभी पूरी नहीं हो सकी। किताब पर रिसर्च के सिलसिले में 2003 में मैं मुंबई तक हो आया और वहां मैंने उनके पुराने साथी हिम्मत भाई झावेरी, मृणाल गोरे, कृष्णा जादव और शरद राव से मुलाकात की। लेकिन यह वक्त था, जब जॉर्ज बदल चुके थे। जॉर्ज ने जब जेल के भीतर से मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ा था, उस दौरान हिम्मत भाई झावेरी ने धर्मयुग में एक आलेख लिखा था, जेल का दरवाजा टूटेगा जार्ज फर्नांडीज छूटेगा...।
यह शायद कम लोगों को पता हो कि 1950-60 के दशक में जॉर्ज मुंबई में हिम्मत भाई झावेरी और उनकी पत्नी ममता झावेरी के साथ उनके फ्लैट में रहते थे। कई बार दर्ज हो चुका यह किस्सा खुद हिम्मत भाई ने मुझे बताया था कि कैसे एक बार जब वह और ममता अपने काम पर गए थे और जॉर्ज घर में अकेले थे और दादर में एक मीटिंग अटेंड करने के लिए लोकल ट्रेन की टिकट के लिए उन्होंने घर में रखी रद्दी बेच दी थी।
लेकिन 2003 की उस तपती दोपहर में अंधेरी के अपने फ्लैट में हिम्मत भाई जॉर्ज को लेकर मानो निरापद से हो गए थे। उन्होंने कहा था, यह वह जॉर्ज नहीं है, जो वह हुआ करता था! वह मुझे विदा करने के लिए फ्लैट से उतरकर नीचे बस स्टॉप तक आए थे।
मृणाल गोरे को जॉर्ज पर पूरा भरोसा था कि वह भ्रष्ट नहीं हो सकते। वह याद कर रही थीं कि कैसे जॉर्ज ने 1958 में एक बहुत पुरानी एबेंसडर खरीदी थी और यूनियन के अपने साथियों के बच्चों को लेकर घूमने जाया करते थे। उनमें गजब की ऊर्जा थी। इतनी कि वह एक दिन में एक दर्जन सभाओं में भाषण कर सकते थे।
उनके पुराने साथियों को 2002 के दंगों में भाजपा और उसकी सरकार को बचाने के कारण भारी तकलीफ हुई थी। उन्हीं दिनों समाजवादियों की एक पत्रिका ‘चौखंभा’ ने जॉर्ज पर एक विशेषांक निकाला था। इसकी कवर स्टोरी थी, ‘एक था जॉर्ज’! यह कवर स्टोरी मेरी लिखी हुई थी।
जॉर्ज साहब को सलाम...
(सुदीप ठाकुर ने इस लेख में जॉर्ज फर्नांडीज का नाम जार्ज फर्नांडीज लिखा थाा। उनका कहना है कि वे खुद अपना नाम जार्ज ही लिखते थे। कुछ पुराने समाजवादियों से हमने इस बात को समझा, तो पता लगा कि जार्ज अपना नाम जार्ज ही लिखते थे, लेकिन अंग्रेजी के शब्द और नाम के प्रचलित हिज्जों के चलते हुए दूसरे लोग सभी जगहों पर उनका नाम जॉर्ज कर देते थे। इस बारे में ‘भास्कर’ नागपुर के संपादक प्रकाश दुबे से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि लोहिया और जार्ज जैसे समाजवादी अंग्रेजी शब्दों के सरल भारतीयकरण के पक्ष में थे, और इसी के तहत जार्ज ने अपने नाम को कभी भी जॉर्ज नहीं लिखा था। यहां पर हम इस लेख में चूंकि कई जगहों पर उनका प्रचलित नाम बदल चुके थे, और लोगों को कोई दुविधा न हो, इसलिए लेख में उनका नाम जॉर्ज ही जा रहा है, और अधिक जानकार लोगों के लिए यह स्पष्टीकरण है।-संपादक)


