विचार / लेख
-रामजी तिवारी
मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ एक मस्ट रीड किताब है।
यह किताब आज से 40 वर्ष पहले मराठी में प्रकाशित हो चुकी थी। सुखद यह कि हिंदी के पाठकों को अब जाकर इसका अनुवाद हासिल हुआ है। मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ का हिंदी अनुवाद सुनीता डागा ने किया है। और बहुत अच्छा अनुवाद किया है। एकदम सरल और प्रवाहमय।
मलिका अमर शेख हालाँकि चाहती हैं कि उनका परिचय उनके नाम से दिया जाए लेकिन फिर भी उनका नाम आते ही मराठी के प्रसिद्ध कवि और दलित पैंथर के संस्थापक नामदेव ढसाल का जिक्र जरूर आ जाता है, जिनसे मलिका की शादी हुई थी। कहें तो जिनसे मलिका ने प्रेम विवाह किया था।
किताब कई सवालों को सामने रखती है। मसलन कि जिस नामदेव ढसाल को हम एक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ता और मानिंद कवि के रूप में जानते हैं, वे अपने व्यक्तिगत जीवन में क्यों इतने अराजक, नशेबाज, वेश्यागामी और हिंसक थे? उन्होंने न सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मारपीट की, बल्कि किताब में इस बात का भी जिक्र आता है कि उन्होंने अपनी माँ पर भी हाथ उठाया था।
इस किताब से पता चलता है कि उन क्रांतिकारी लोगों के दलित पैंथर आंदोलन की भीतरी परतें बेहद अराजक और घिनौनी थी। निजी जीवन भी नामदेव ढसाल की तरह ही अराजक और दुहरा था, जो समाज बदलने के नारे के साथ इस आंदोलन में उतरे थे।
क्रांतिकारी और कवि होने के बरक्स यह किताब उनके आचरण को छील कर हमारे सामने रख देती है कि तुम जिनकी कविताओं और आंदोलनों पर मुग्ध हुए जाते हो, उनका एक चेहरा यह भी है। जरा इसे भी ठहर कर देखते जाओ।
मलिका ने अपनी इस आपबीती में विवाह संस्था को भी बहुत निर्ममता से प्रश्नांकित किया है। और कुल मिलाकर उसे स्त्री के विरुद्ध बताया है। साथ ही इस बात पर जोर दिया है कि स्त्री को अपने पैरों पर जरूर खड़ा होना चाहिए।
किताब का एक अंश देखिए...
‘नामदेव झुंझलाता था कि मैं अपने बेटे को ब्राहमनी संस्कार देकर लल्लू पंजू बना रही हूँ। निहायत दब्बू।
मैं कहती- ‘अगर वह ब्राह्मणी संस्कार लेकर दब्बू बनता है तो बने। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। पर मैं नही चाहती हूँ कि तुम्हारी एक भी बुरी आदत उसमें आए। गाली गलौज करते हुए लोगों पर दबंगई करने से बेहतर है कि मेरा बेटा पूर्णत: मध्यवर्गीय बने। भ्रष्ट क्रांतिकारी बनने की बनिस्बत वह मिडिल क्लास में बैठे तो मुझे आपत्ति नहीं। मैं चाहती हूँ कि मेरा बेटा खुश रहे। सुसंस्कृत बने।’
किताब राधाकृष्ण प्रकाशन से छपी है। और मस्ट रीड की श्रेणी में आती है। पढ़ जाइए।


