विचार/लेख
-दिलीप कुमार पाठक
इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जो किसी भव्य इमारत की नींव में ईंट बनकर समा जाते हैं। लेकिन जब-जब आधुनिक भारत में न्याय और बराबरी की बात होगी, ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। फुले कोई पारंपरिक नेता नहीं थे, वे एक ऐसे दूरद्रष्टा शिक्षक थे जिन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अक्षर लिखने से पहले समाज की कड़वी सच्चाइयों और गरीबों के आंसू पढऩा सीखा था। आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और समाज का हर वर्ग तरक्की के सपने देख रहा है, उसकी पहली मजबूत ईंट 19वीं सदी में ज्योतिबा फुले ने ही रखी थी।वह एक ऐसा दौर था जब शिक्षा पर कुछ खास लोगों का एकाधिकार था और समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अज्ञानता के घने अंधेरे में कैद थी। ज्योतिबा ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि किसी को गुलाम बनाने के लिए लोहे की जंजीरें जरूरी नहीं होतीं, बल्कि उसे ‘अशिक्षा’ के पिंजरे में कैद रखना ही काफी होता है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाते हुए कहा था-‘शिक्षा के बिना इंसान की बुद्धि मर जाती है और बुद्धि के बिना उसका विकास और नैतिकता हमेशा के लिए रुक जाती है।’
ज्योतिबा फुले के जीवन का सबसे साहसी अध्याय उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले के साथ जुड़ा है। उन्होंने किसी बड़े मंच से केवल भाषण देने के बजाय, बदलाव की शुरुआत अपने घर से की। उस कट्टर समाज की कल्पना कीजिए, जहाँ औरतों का पढऩा एक महापाप माना जाता था, वहाँ ज्योतिबा अपनी पत्नी के हाथ में कलम और किताब थमा रहे थे। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने निकलती थीं और उन पर गोबर और कीचड़ फेंका जाता था, तो ज्योतिबा एक चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े रहते थे। यह उन दोनों का अटूट साहस और जिद ही थी, जिसने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत के पहले स्कूल का रास्ता खोला और सदियों पुराने बंद दरवाजे हमेशा के लिए तोड़ दिए। फुले के सुधार केवल स्कूलों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहे।
पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले विधानसभा चुनाव किसी के लिए सत्ता में बने रहने की लड़ाई है तो किसी के लिए कुर्सी हथियाने की और किसी के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा की.
इस बात पर अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इसमें कौन जीतेगा और कौन विपक्ष की भूमिका में रहेगा. राजनीति पर बहस करने वाले अक़सर कहते हैं कि चुनावी गणित हमेशा सीधा नहीं होता.
इसकी वजह यह है कि चुनाव कभी मुद्दों पर होते हैं और कभी नतीजा उम्मीदवारों पर निर्भर होता है. इसमें कई बार एकदम अलग समीकरण काम करते हैं.
पश्चिम बंगाल चुनाव के इस समीकरण में कई राजनेता अहम भूमिका निभा रहे हैं. इनमें से कोई चुनाव लड़ रहा है तो कोई दूसरों के समर्थन में प्रचार कर रहा है. कई लोग बंगाल के रहने वाले नहीं हैं- लेकिन ये लोग किसी न किसी तरीके से इस चुनाव के अहम किरदार के तौर पर उभरे हैं.
ये लोग कौन हैं और कौन सी बात उनके पक्ष या विरोध में जा सकती है, इस रिपोर्ट में इसी का ज़िक़्र किया गया है.
ममता बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने चुनाव अभियान के दौरान अक़सर कहती हैं कि राज्य की सभी 294 सीटों पर वही उम्मीदवार हैं. उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी उनको एकमात्र और अद्वितीय नेता बताते हैं.
संसदीय लोकतंत्र में ममता बनर्जी चार दशक से भी लंबे समय से सक्रिय हैं. उन्होंने वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर वाममोर्चा के 34 साल लंबे शासन का अंत किया था. राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद बीते 15 साल से वह लगातार सत्ता में हैं.
बीते कुछ साल के दौरान उनकी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगते रहे हैं. राज्य में विभिन्न मुद्दों पर आम लोगों की नाराज़गी भी सामने आती रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का एक गुट मानता है कि इन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह चुनावी लड़ाई उनकी पार्टी के लिए आसान नहीं होगी.
क्यों बढ़त हासिल है
ममता बनर्जी लंबे समय से आम लोगों के बीच मुख्यमंत्री के बजाय दीदी के तौर पर अपनी पहचान बनाने का प्रयास करती रही हैं. महिला मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल, जनसंपर्क औऱ लड़ाकू नेता की छवि ने आम लोगों में उनकी अलग पहचान बनाई है. वह बार-बार कहती रही हैं कि तृणमूल कांग्रेस संगठन की नींव मज़बूत करने के लिए वह कड़े फैसले लेने से भी नहीं हिचकेंगी.
उनकी पार्टी भाजपा के ख़िलाफ़ लगातार मुखर रही है. ममता बंगाल के प्रति केंद्र की उपेक्षा के मुद्दे पर सक्रिय रही हैं. इसके साथ ही वह लगातार आरोप लगाती रही हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सवाल पर भाजपा पर आरोप लगाने के साथ ही इस मुद्दे पर राज्य के लोगों के हित में दलील देने के लिए वह वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में बहस कर चुकी हैं. तृणमूल कांग्रेस ममता की इस तारणहार वाली भूमिका का भी बड़े पैमाने पर प्रचार कर रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी और हाल में शुरू की गई युवा साथी जैसी योजनाएं इस महीने होने वाले चुनाव पर असर डाल सकती हैं.
कई लोग मानते हैं कि बीते कई चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत में महिला और मुसलमान वोटरों की उल्लेखनीय भूमिका रही है. यह दोनों तबके इस चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
इन वजहों से दिक्कत हो सकती है
तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और जबरन चंदा उगाही जैसे कई आरोप लगे हैं. शिक्षा और नगर निगम में होने वाली बहालियों में भ्रष्टाचार के अलावा राशन घोटाले जैसे मामले सामने आए हैं. इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेता और मंत्री जेल भी जा चुके हैं.
दूसरी ओर, कोलकाता, दुर्गापुर और सिलीगुड़ी समेत राज्य के विभिन्न इलाक़ों में महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं पर राज्य में बड़े पैमाने पर आक्रोश का माहौल रहा है. कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या की घटना की जांच में अपनी भूमिका और राज्य में महिला सुरक्षा के सवाल पर राज्य सरकार कटघरे में खड़ी रही है.
कई लोग मानते हैं कि ये मुद्दे सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ जा सकते हैं. भ्रष्टाचार के अभियुक्त नेताओं को पार्टी में शामिल करने और उनको टिकट देने के मुद्दे पर विपक्ष तृणमूल के ख़िलाफ़ हमलावर रहा है.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी
पश्चिम बंगाल पर लंबे समय से भाजपा की निगाहें टिकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनाव के पहले से ही बंगाल का दौरा करते रहे हैं.
इस महीने के विधानसभा चुनाव से पहले भी तस्वीर ऐसी ही नज़र आ रही है. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल का सवाल हो या फिर वोटरों का दिल जीतने के लिए बंगाली अस्मिता के समर्थन का, पार्टी बार-बार आम लोगों को यह समझाने का प्रयास करती रही है कि बंगाल उसके लिए बेहद अहम है.
बढ़त कहां है
भाजपा प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की छवि को सामने रख कर चुनाव लड़ना चाहती है. यह एक बड़ा फैक्टर हो सकता है. दूसरी ओर, अमित शाह को भाजपा का मुख्य चुनावी रणनीतिकार माना जाता है.
यह दोनों नेता अपनी जनसभा और चुनावी रैलियों में केंद्र सरकार की विकास योजनाओं का ब्योरा देने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस पर केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के आम लोगों तक न पहुंचने देने के भी आरोप लगा रहे हैं.
भाजपा इसके साथ ही सीमा पार से घुसपैठ, भ्रष्टाचार और चंदा उगाही के आरोपों पर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधती रही है. इस चुनाव में भी पार्टी ने इसे ही अपना हथियार बनाया है.
आरोप और आलोचना
बीते कुछ वर्षों में बंगाल में भाजपा की नींव मज़बूत हुई है. लेकिन इसके बावजूद यह देखना ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी को सामने रखकर बंगाल में चुनाव जीतना पार्टी के लिए कितना आसान होगा.
दूसरी ओर, एसआईआर और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटने के मुद्दे पर उसकी आलोचना हो रही है.
तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल बंगालियों की सांस्कृतिक विरासत और मानसिकता के साथ भाजपा के मतभेदों के लिए उसकी आलोचना करती रही हैं. वह भाजपा के ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के भी आरोप लगाती रही है.
अभिषेक बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी दक्षिण 24-परगना जिले की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से सांसद हैं. वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. लेकिन इससे उनका महत्व ज़रा भी कम नहीं होता.
तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पार्टी की रणनीति, पैसों और चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों से लेकर पार्टी संगठन मज़बूत करने तक हर काम में उनकी अहम भूमिका है.
फ़ायदा
पार्टी के पुराने नेताओं की भीड़ में अभिषेक बनर्जी एक ऐसा युवा चेहरा हैं जो पहले ही संसदीय राजनीति में कामयाबी हासिल कर चुके हैं. उन्होंने पार्टी की नींव मज़बूत करने पर ख़ास ध्यान दिया है.
उनकी 'ब्वॉय नेक्स्ट डोर' वाली छवि ने जनसंपर्क में मदद की है. वह आम लोगों के बीच पार्टी की एक स्मार्ट औऱ साफ-सुथरी चमकती छवि पेश करने में भी कामयाब रहे हैं.
कई लोग उनको भविष्य का नेता मानते हैं.
नुक़सान
विपक्ष ने अभिषेक के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और आर्थिक गड़बड़ियों का आरोप लगाया है. इसके अलावा कांग्रेस की तरह ही तृणमूल कांग्रेस पर भी 'परिवारवाद' के आरोप लग रहे हैं.
कुछ विश्लेशकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ लगे आरोपों से पार्टी की छवि पर असर पड़ सकता है.
शुभेंदु अधिकारी
कभी ममता बनर्जी के नज़दीकी रहे और अब भाजपा के महत्वपूर्ण नेता शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता के तौर पर सक्रिय भूमिका में रहे हैं. भाजपा उनके सहारे नंदीग्राम जीतना चाहती है. वह उनका ही इलाक़ा है. इसके साथ ही ममता बनर्जी को सीधी चुनौती देते हुए इस बार कोलकाता की भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं.
बढ़त होने की वजह
शुभेंदु ने वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराया था.
बीते कुछ साल के दौरान विपक्ष के ताकतवर नेता के तौर भाजपा की ओर से वह सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहे हैं. पूर्व मेदिनीपुर और आसपास के इलाकों में उनका ख़ासा असर है.
आरोप
विपक्षी नेता उनके ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के आरोप लगा रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे का जमकर प्रचार कर रही है.
एसआईआर की पूरक सूची में नंदीग्राम से जिन वोटरों के नाम कटे हैं उनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं. यह मुद्दा राज्य में भाजपा के लिए परेशानी की वजह भी बन सकता है.
हुमायूं कबीर
चुनावी समीकरणों के लिहाज से वह भले केंद्रीय किरदार नहीं हों, सबकी निगाहें हुमायूं कबीर पर टिकी हैं.
कबीर को किसी दौर में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी का करीबी माना जाता था. लेकिन कांग्रेस के बाद वह पहले भाजपा और फिर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे. यानी वह कभी न कभी तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों में रह चुके हैं.
चुनाव से पहले उन्होंने 'आम जनता उन्नयन पार्टी' नाम के नए राजनीतिक दल का गठन किया है. विधानसभा चुनाव से पहले बाबरी मस्जिद की नकल पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनाने के फैसले और उसके शिलान्यास के ज़रिये उन्होंने राजनीतिक हलके में हलचल मचा दी थी.
इस चुनाव में उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ सीटों पर समझौता किया था. हालांकि शुक्रवार, 10 अप्रैल को ओवैसी की पार्टी ने इस गठबंधन से बाहर निकलने का फ़ैसला किया.
प्रभाव
कबीर फ़िलहाल मुर्शिदाबाद जिले के नौदा और रेजिनगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. उस इलाके में उनका ख़ासा असर है. माना जा रहा है कि चुनाव में इस इलाके के मुसलमान अहम भूमिका निभा सकते हैं. उनकी पार्टी कुल 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसमें नंदीग्राम और भवानीपुर सीटें भी शामिल हैं.
आलोचना
कई बार दल बदलने और विवास्पाद बयानों के कारण उनकी आलोचना होती रही है. भाजपा और तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि मुसलमान वोटों में सेंध लगा कर वह दूसरे दलों को फ़ायदा पहुंचाने का प्रयास करेंगे.
विशेषज्ञों का क्या कहना है
इन राजनेताओं और विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका के बारे में एक सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक के तौर पर ममता बनर्जी की काफ़ी अहमियत है. दूसरी ओर, मोदी और शाह भाजपा के कर्ता-धर्ता हैं. इस राज्य में मोदी और शाह के अलावा भाजपा के पास कोई अलग चेहरा नहीं है. नरेंद्र मोदी के नाम पर प्रचार होता है और अमित शाह प्रचार करवाते हैं. भाजपा पश्चिम बंगाल पर कब्ज़े के लिए बेताब है."
शुभेंदु अधिकारी के बारे में उनका कहना था, "वह खुद भाजपा के उत्पाद नहीं हैं. उल्टे भाजपा ने उनका अधिग्रहण किया है. उनकी एकमात्र योग्यता यह है कि उन्होंने पिछली बार नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया था."
शिखा मुखर्जी के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी ममता के बाद पार्टी में नंबर दो हैं. उन्होंने ज़मीन पर काफ़ी काम किया है. इसके साथ ही संगठन को मज़बूत करने के साथ ही रैलियां भी आयोजित की हैं.
लेकिन वह हुमायूं कबीर को ज़्यादा महत्व देने के लए तैयार नहीं हैं. शिखा कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि हुमायूं कबीर को इतनी अहमियत दी जानी चाहिए. वह कुछ दिन पहले भाजपा में थे उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और अब अपनी अलग पार्टी बना ली है. कल वह कहां होंगे, यह कहना मुश्किल है."
राजनीतिक विश्लेषक उज्ज्वल राय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर कहते हैं, "ये दोनों जब भी किसी चुनाव में जाते हैं तो उसका महत्व बढ़ जाता है. यह दोनों पहले भी बंगाल के दौरे पर आए थे. लेकिन चुनाव पर कोई असर नहीं डाल सके थे. इस बार भाजपा एसआईआर के मुद्दे पर काफ़ी उत्साहित है और वह इस बार चुनाव में कामयाबी हासिल करना चाहती है."
उनका कहना था, "ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त हैं और उनकी छवि लड़ाकू नेता की है. उनके साथ अभिषेक बनर्जी भी हैं. विपक्षी दल आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी की नाकामियों को ही अपना चुनावी मुद्दा बनाते हैं."
राय कहते हैं, "यह याद रखना होगा कि ममता का सबसे बड़ा करिश्मा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेता के तौर पर है. वह एसआईआर को राजनीतिक तौर पर इतना बड़ा मुद्दा बना रही हैं कि भाजपा को इस पर जवाब देना पड़ रहा है. दिलचस्प बात यह है कि एक सत्तारूढ़ पार्टी दूसरी सत्तारूढ़ पार्टी से सवाल कर रही है."
उनका कहना था कि एसआईआर का मुद्दा फिलहाल बाकी तमाम मुद्दों पर भारी पड़ रहा है.
वह कहते हैं, "रोटी, कपड़ा और मकान जैसे लोगों की मौलिक ज़रूरतें अब पृष्ठभूमि में चली गई हैं. अब एसआईआर पर ही सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है."
राय का कहना था, "तृणमूल कांग्रेस लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि एसआईआर की आड़ में अल्पसंख्यकों के नाम सूची से काटे जा रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा समझाना चाहती है कि अवैध वोटरों के नाम ही सूची से कटे हैं और इनमें से ज़्यादातर तृणमूल कांग्रेस का वोट बैंक थे. दोनों पार्टियां आक्रामक रणनीति के सहारे आगे बढ़ रही हैं."
वह शुभेंदु अधिकारी की भी अहमियत बताते हैं, "शुभेंदु अधिकारी की ख़ासियत यह है कि उनका चुनाव क्षेत्र नंदीग्राम है और वह एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री को हराया है. इस बार वह नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर से भी चुनाव लड़ रहे हैं."
राय के मुताबिक, शुभेंदु के ऐसा करने के दो कारण हैं. पहला यह कि वह यह संदेश देना चाहते हैं कि नंदीग्राम में ममता को हराने के बाद अब वह उनको उनके घर भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं.
दूसरा यह कि वह मुख्यमंत्री की चुनावी रणनीति में सेंध लगाते हुए उनके वोट तंत्र को ढहाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सोच यह है कि इससे ममता को भवानीपुर में ज़्यादा समय देना पड़ेगा और वह राज्य के दूसरे हिस्सों में ज़्यादा प्रचार करने का समय नहीं निकाल सकेंगी. इससे भाजपा को सहूलियत होगी.
राय की निगाह में हुमायूं कबीर बेहद दिलचस्प भूमिका में हैं.
वह कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस को मुसलमानों के ज़्यादा वोट मिलते हैं. इसलिए हुमायूं कबीर अहम हो गए हैं. उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई है. वह यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी पार्टी ही मुसलमानों की एकमात्र हितैषी है और तृणमूल कांग्रेस अब तक महज़ वोट बैंक के तौर पर उनका इस्तेमाल करती रही है. वह बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद भी बना रहे हैं."
राय का कहना था, "दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस उन पर मुस्लिम वोटों में सेंध लगा कर भाजपा को फायदा पहुंचाने के आरोप लगा रही है. लेकिन दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि वह दरअसल दूसरे तरीके से ममता बनर्जी की ही मदद कर रहे हैं. इससे खेल दिलचस्प हो गया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
दिल्ली स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ सालों से छात्र संगठनों की गतिविधियां सीमित करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं. जेएनयू और जेएमआई के बाद अब डीयू प्रशासन ने भी नए दिशानिर्देश जारी किए हैं.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट -
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) उच्च शैक्षिक संस्थान होने के साथ ही बहस, असहमति और राजनीतिक चेतना का मंच रहा है. आर्ट्स फैकल्टी, चाय की दुकानों के कोने और पोस्टरों से भरी दीवारें इसकी पहचान है. यहां छात्र राजनीति से अरुण जेटली, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, विजय गोयल और अजय माकन जैसे कई बड़े नेता निकले. वही विश्वविद्यालय परिसर अब बदल रहा है.
फरवरी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के दौरान यूट्यूबर रुचि तिवारी के साथ कथित तौर पर बदसलूकी हुई. इसके बाद डीयू प्रशासन ने छात्र सभाओं पर प्रतिबंध की घोषणा की. दिल्ली हाई कोर्ट ने आपत्ति जताई, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने पुराने फैसले में बदलाव किया.
23 मार्च को डीयू ने एक नोटिफिकेशन जारी कर नए दिशानिर्देश बताए. इसके मुताबिक कैंपस में किसी भी तरह का प्रोटेस्ट, सभा, मार्च, रैली या कार्यक्रम के लिए 72 घंटे पहले अनुमति लेना जरूरी है. इसके लिए आयोजकों को स्थानीय पुलिस और प्रॉक्टर को लिखित आवेदन देना होगा.
बिना अनुमति किसी भी आयोजन पर निलंबन या अन्य कार्रवाई हो सकती है. साथ ही, बाहरी लोगों के शामिल होने पर भी रोक लगाई गई है. छात्र संगठन इस नोटिफिकेशन को कैंपस की लोकतांत्रिक संस्कृति पर सीधा प्रहार बता रहे हैं.
कोविड के बाद से बदलने लगा 'प्रोटेस्ट कल्चर'
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के संयुक्त सचिव अमन, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पीएचडी कर रहे हैं. नए नियमों को वह एक पैटर्न का हिस्सा मानते हैं. अमन बताते हैं कि पहले, प्रदर्शन करने से पूर्व वह केवल मौरिस नगर पुलिस स्टेशन को सूचित करते थे. उनके मुताबिक कई ऐसे उदाहरण हैं जहां प्रदर्शन बीच में रोका गया, छात्रों पर हमले हुए और खासकर छात्र संघ चुनावों के दौरान हिंसा होती रही है.
नए नोटिफिकेशन के अनुसार अब सूचना देने की बजाय अनुमति लेनी पड़ेगी. अमन का आरोप है कि कोविड महामारी के बाद कॉलेज खुलने के साथ ही प्रशासन की सख्ती बढ़ गई. विरोध करने वाले छात्रों को निलंबित या निष्कासित किया जाने लगा है. वह कहते हैं, "छात्रों में डर बिठाया जा रहा है. कंपलसरी अटेंडेंस, एक्सट्रा क्लासेज और लंबे लेक्चर्स के माध्यम से छात्रों को जानबूझकर कक्षाओं में व्यस्त रखा जाता है, ताकि वे प्रदर्शन में शामिल होने न जाएं."
'पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं'
इस साल 12 फरवरी को इतिहासकार एस. इरफान हबीब पर नॉर्थ कैंपस स्थित आर्ट्स फैकल्टी के बाहर हमला हुआ. यह कार्यक्रम ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) ने आयोजित किया था. आईसा (डीयू) अध्यक्ष सावी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में पक्षपात का आरोप लगाया, "हम देख रहे हैं कि ये पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को लगभग हर आयोजन के लिए अनुमति मिल जाती है. कल ही मैंने एक पोस्टर देखा, जिसमें वे नॉर्थ कैंपस के गर्ल्स हॉस्टल में आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित कर रहा है. कुलपति (वीसी) मुख्य अतिथि हैं. हमें अक्सर साधारण स्टडी सर्कल करने की भी इजाजत नहीं मिलती. यह सत्ता का दुरुपयोग है."
सावी आगे बताती हैं, "पहले हम आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद स्टैचू के सामने प्रदर्शन करते थे. कोविड के बाद यह जगह सीमित कर दी गई. अब केवल गेट नंबर 4 पर ही प्रदर्शन की अनुमति है. जबकि आरएसएस आर्ट्स फैकल्टी के अंदर शाखा लगाता है. हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि अगर एक विचारधारा को अपनी बात रखने की आजादी दी जा रही है, तो हमें भी वही अधिकार मिलना चाहिए."
भगत सिंह की विचारधारा से प्रेरित 'दिशा छात्र संगठन' डीयू में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. नए नोटिफिकेशन के बावजूद 27 मार्च को उन्होंने 'शहीद दिवस' के अवसर पर एक सभा बुलाई, जिसे पुलिस ने बीच में रोक दिया. संगठन का आरोप है कि संबंधित नोटिफिकेशन इसलिए लाया गया ताकि छात्र, प्रशासन के खिलाफ आवाज न उठा सकें, फिर चाहे प्रशासन कोई भी गलत काम क्यों न कर रहा हो.
'दिशा छात्र संगठन' के सदस्य योगेश मीणा लॉ फैकल्टी में पढ़ाई करते हैं. वह कहते हैं, "दूसरी ओर प्रशासन फीस में बढोतरी जैसे किसी भी फैसले पर छात्रों से कोई राय नहीं लेता. फैसला सीधे उनके ऊपर थोप दिया जाता है. हमें अपने ही कैंपस में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए."
अनुशासन बनाए रखना जरुरी
वैचारिक रूप से आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन 'एबीवीपी' के दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि उनका संगठन डीयू प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ है और छात्रों के साथ खड़ा है.
वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के छात्र संगठन 'एनएसयूआई' के सदस्य और पूर्व डूसू अध्यक्ष रौनक खत्री कहते हैं, "शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को सीमित करने वाला कोई भी कदम खतरनाक है. लेकिन, कैंपस में व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है. इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो अनुशासन और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दोनों को बनाए रखे."
डीयू के प्रॉक्टर मनोज कुमार सिंह का तर्क है कि वे विरोध प्रदर्शन नहीं रोक रहे हैं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित किया जा रहा है. वर्तमान में डूसू की संयुक्त सचिव दीपिका झा ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम इस फैसले में डीयू प्रशासन के साथ हैं, क्योंकि कैंपस में सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है."
-अनिल माहेश्वरी
उद्योगपति मुकेश अंबानी के बेटे की शादी के बाद, मीडिया मुगल रजत शर्मा के बेटे की शादी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खूब सुर्खियाँ बटोरीं। इस समारोह में भारतीय समाज के नामी-गिरामी लोग शामिल थे।
लगभग 18 वर्ष पहले, टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े मीडिया उद्योगपति समीर जैन की बेटी त्रिशला ने अपने प्रेमी सत्येन गजनानी से अजमेर में विवाह किया था। लडक़ा-लडक़ी की इच्छा के अनुसार इस शादी में केवल 50 लोग शामिल हुए। यह शादी इतनी सादगीपूर्ण थी कि इसमें भारत के राष्ट्रपति भी शामिल हो सकते थे, फिर भी इसका मीडिया में कोई उल्लेख नहीं हुआ। कहीं कोई तस्वीर नहीं। आज गूगल पर खोजने पर भी इस विवाह का कोई जिक्र नहीं मिलता। निमंत्रण कार्ड की जगह समीर जैन ने ‘स्पीकिंग ट्री’ कॉलम के लेखों से युक्त एक पुस्तक भेजी थी।
नवभारत टाइम्स के संपादक एस.पी. सिंह की शादी में पाँच मुख्यमंत्रियों तक ने भाग लिया था। राज्य संवाददाताओं को वीआईपी मेहमानों को अशोका होटल में आयोजित इस विवाह समारोह तक लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। आनंद स्वरूप वर्मा ने इस पर ‘मैरेज ऑफ एन एडिटर’ शीर्षक से विस्तृत लेख लिखा था।
बिरला परिवार परंपरागत तरीकों का पालन करता रहा है। ‘तुम्हें बहुत अधिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी,’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उस संकोची युवती से कहा, जो अपने भावी पति के साथ उनसे मिलने आई थी। यह 1941 की सर्दियों का समय था और वे महाराष्ट्र के वर्धा के पास सेवाग्राम में थे। युवा जोड़े ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक समाप्त होने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और फिर बापू से आशीर्वाद लेने पहुँचे। बापू ने पूछा, ‘क्या तुम दोनों आपस में तालमेल बैठा पाओगे? क्यों न थोड़ा समय लेकर फिर से विचार करो?’ लेकिन लडक़ी अपने निर्णय पर अडिग थी, और लडक़ा भी।
मार्च 1942 में, पारंपरिक मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े किसी जोड़े का इस तरह, वह भी लडक़े के पिता की अनुपस्थिति में, सगाई करना असामान्य था। लेकिन बी.के. बिरला और सरला बिरला के साथ यही हुआ। देश के हृदय में स्थित एक सादे घर में, बापू, कस्तूरबा गांधी, सरदार पटेल और विशेष रूप से जमनालाल बजाज की उपस्थिति में, जिन्होंने इस जोड़े को मिलाया था। गांधीजी की सावधानी का कारण यह था कि सरला बिरला के पिता और कांग्रेस नेता ब्रिजलाल बियानी प्रगतिशील विचारों के थे और उन्होंने अपनी बेटी को पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज भेजा था, जबकि उस समय मारवाड़ी परिवारों की महिलाओं के लिए पढ़ाई वर्जित मानी जाती थी।
फरवरी 2025 में, अरबपति शादियों की परंपरा से हटते हुए, अडानी समूह के अध्यक्ष और दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक गौतम अडानी ने सादगी को अपनाया। उनके बेटे जीत अडानी ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया, और इस अवसर पर सामाजिक कार्यों के लिए 10,000 करोड़ का योगदान दिया गया।
-संदीप राय
ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल जंग में दो हफ़्ते के युद्धविराम का भारत ने स्वागत किया है। लेकिन उसने पाकिस्तान का नाम लेने या उसके प्रयासों का जि़क्र करने से परहेज किया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, ‘हम युद्धविराम के फैसले का स्वागत करते हैं। हमें उम्मीद है कि इससे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी। जैसा कि हम पहले भी कहते रहे हैं कि मौजूदा जंग को समाप्त करने के लिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीति ज़रूरी है।’
विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि जंग ने पहले ही काफी तबाही मचा दी है, ‘इसने वैश्विक तेल और ऊर्जा सप्लाई और व्यापार प्रणाली को बाधित कर दिया है। हम आशा करते हैं कि कमर्शियल और तेल के जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजऱ सकेंगे।’
ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत, जहाँ एक ओर दुनिया भर से कई नेता पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, वहीं भारत के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत को लेकर भी चुप्पी साधे रखी।
पाकिस्तान की प्रशंसा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस युद्धविराम के लिए पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना हो रही है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम की घोषणा करते हुए पाकिस्तान का जिक्र किया।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने यह निर्णय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ और सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अनुरोध पर लिया है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना की।
उन्होंने अपने बयान में कहा, ‘ईरान की ओर से, मैं अपने मित्र देश पाकिस्तान, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के प्रति क्षेत्र में जंग ख़त्म करने के लिए, उनके अथक प्रयासों की तारीफ़ करता हूँ।’
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने संघर्ष को कम करने में पाकिस्तान सहित मध्यस्थों की भूमिका की भी सराहना की ।
उन्होंने लिखा, ‘हम तनाव कम करने के प्रयासों के लिए पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब सहित सभी वार्ताकारों के प्रयासों का आभार व्यक्त करते हैं और उनका समर्थन करते हैं।’ यूरोपीय यूनियन कमिशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेन ने मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को धन्यवाद दिया है।
विदेश नीति पर सवाल
विपक्षी पार्टियों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान के ‘बढ़ते कद’ को लेकर भारतीय विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं।
विपक्षी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने युद्धविराम पर अपनी पार्टी की प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘पाकिस्तान ने जो किया है, वही भारत को करना चाहिए था। लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल को ‘फादरलैंड’ कहते हैं, तो वे युद्धविराम की चर्चा कैसे कर सकते हैं?’
प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने पीएम मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, ‘पाकिस्तान ने जो भूमिका निभाई और सीजफ़ायर करवाया, उससे मोदी जी की पर्सनल स्टाइल वाली डिप्लोमेसी को बड़ा झटका लगा है।’
‘28 फऱवरी ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था। ये घटनाएँ प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं। इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया।’
उन्होंने लिखा, ‘विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था। लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है।’
कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा, ‘बीजेपी सरकार की ग़लतियों के कारण पाकिस्तान को युद्धरत पक्षों के बीच मध्यस्थता में भूमिका निभाने का मौका मिला, जबकि भारत एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में बेहतर स्थिति में था।’
लेकिन शिवसेना-यूबीटी की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, ‘भारत को अमेरिका और ईरान के बीच किसी बातचीत की मेज़ पर क्यों होना चाहिए था? आलोचना समझ नहीं आती, क्योंकि यह हमारी लड़ाई नहीं थी। पाकिस्तान के लिए यह ऐसा है जैसे कोई कछुआ जो पैसे लेकर कहे कि वह संकट सुलझा देगा, जैसा कि भारत के विदेश मंत्री ने सर्वदलीय बैठक में अच्छे तरीके से बताया।’
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने एक्स पर लिखा, ‘युद्धविराम से होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खुल गया, वही होर्मुज़ स्ट्रेट जो युद्ध शुरू होने से पहले सबके लिए खुला और आसानी से इस्तेमाल करने लायक था। तो आखिर इस 39 दिन के युद्ध से अमेरिका ने क्या हासिल किया?’
पाकिस्तान: मध्यस्थ या संदेश वाहक?
ईरान जंग में पाकिस्तान को क्या डिप्लोमेसी में भारत की तुलना में बढ़त मिली है?
इसे लेकर विपक्षी दलों में तो आम राय है लेकिन विश्लेषकों और पत्रकारों की राय मिली-जुली है। अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत इसे ‘शार्ट टर्म कूटनीति’ कहते हैं।
-डॉ. संजीव खुदशाह
यदि किसी आदिवासी व्यक्ति को जंगली कहकर जलील करना हो या किसी दलित को घोड़ी पर चढऩे नहीं देना हो या मटका छूने पर जान से मारना हो, इंटरव्यू में नंबर काटना हो या किसी भी प्रकार का भेदभाव करना हो, तो जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन जब लाभ देना हो तो इसके लिए जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जाति प्रमाण पत्र हासिल करना आज के दिन में एक टेढ़ी खीर हो गई है। 1950 के बंदोबस्त का अभिलेख या स्कूल का रिकॉर्ड मांगा जाता है। जिसमें जाति का उल्लेख हो। अनुसूचित जाति जनजाति के ऐसे सदस्य जिनके पूर्वजों के पास में जमीन जायदाद थी अथवा शिक्षित थे। उनका तो जाति प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। लेकिन जिनके पूर्वजों के पास जमीन जायदाद नहीं थी, अशिक्षित, गरीबी के हाल में थे, शोषण के शिकार थे। तो उनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है क्योंकि उनके पास 1950 का दस्तावेज नहीं होता है। छत्तीसगढ़ में 13 फीसदी अनुसूचित जाति एवं 30 फीसदी अनुसूचित जनजाति की आबादी है। जाति प्रमाण पत्र पर काम करने वाले संतोष बोरकर जी कहते है कि एक अनुमान के मुताबिक लगभग आधी आबादी का जाति प्रमाण पत्र 1950 के दस्तावेज नहीं होने के कारण नहीं बन पाता है। इसके पीछे उनकी गरीबी, लाचारी, पूर्वजों की नासमझी भी कहीं जा सकती है। लेकिन यह आज भी वैसे ही भेदभाव के शिकार हो रहे हैं जैसे की और लोग होते हैं। इनकी कुल संख्या में वे लोग शामिल हैं जिनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है। यानी जनगणना में गणना, उनकी तो उस जाति के तौर पर हो रही है। इस गणना के हिसाब से योजनाएं बनाई जा रही है,आरक्षण दिए जा रहे हैं, लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाने के कारण वे सब, सरकारी योजनाओं से वंचित है। इस कारण एक बड़े तबके में असंतोष व्याप्त है।
छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र बनाने की समस्या को लेकर बरसों से मांग की जाती रही है और इसके लिए ज्ञापन पत्र व्यवहार आदि किया जाता रहा है। ऐसे ही पत्र व्यवहार के परिणाम स्वरूप केंद्र शासन ने व्यवहारिक परेशानी से सहमत होते हुए 10 जून 1925 को एक आदेश जारी किया। जिसमें यह स्पष्ट किया गया की जाति प्रमाण पत्र बनाने हेतु अभिलेख प्रस्तुत करने का नया कट ऑफ डेट 25 अगस्त 2000 होगा. यह नया कट ऑफ डेट ओबीसी के लिए भी मान्य होगा जो पहले 1984 था। यह आदेश शासन की वेबसाईट में उपल्बध है। इसको लेकर छत्तीसगढ़ में हलचल है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति के सचिव श्री संतोष बोरकर बताते है कि मुख्य सचिव ने अपने सभी कलेक्टरों को निर्देश पालन करने का पत्र जारी किया है लेकिन फिलहाल यह जमीनी स्तर पर लागू होते हुए नहीं दिख रहा है। इसका कारण है 2013 में शासन द्वारा जारी किए गए नियम। इस नियम में 1950 का दस्तावेज मांगा जाता है और यह नियम अभी भी लागू है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा सरकार से यह मांग की गई है कि 10 जून 2025 के आदेश के अनुसार इस नियम में भी परिवर्तन किया जाए और संबंधित जिम्मेदार पीठासीन अधिकारी को आदेशित किया जाए। तब कहीं जाकर इस आदेश को जमीन स्तर पर लागू किया जा सकेगा। गौरतलब है कि उत्तराखंड में इस आदेश को लागू कर दिया है। पीडि़त लोग अपने-अपने स्तर पर नेता, मंत्री, जनप्रतिनिधि एवं अफसरों से भेंट कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि यथाशीघ्र यह आदेश लागू किया जाए। ताकि जनता में असंतोष कम हो और राहत मिल सके।
हंगरी के पीएम ओरबान सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी हार के आसार हैं. ट्रंप ओरबान को जिताने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में जेडी वैंस हंगरी पहुंचे, ओरबान को अगला पीएम बताया. क्या यूएस हंगरी चुनाव में दखल दे रहा है?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा-
हंगरी के नागरिक 12 अप्रैल को संसदीय चुनाव के लिए मतदान करेंगे. साल 2010 से सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान लगातार पांचवां कार्यकाल पाने के लिए मुकाबले में हैं. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में विपक्षी नेता पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी जीतती नजर आ रही है.
हंगरी के पीएम ओरबान ने बनाया नया धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन
हंगरी को 'अनुदार लोकतंत्र' बनाने का श्रेय लेने वाले ओरबान ने इतने बरस की सत्ता में संविधान और चुनावी तंत्र को कुछ इस तरह तोड़ा-मरोड़ा है, जहां उनके और उनकी फिडेस पार्टी के हारने की ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती. बावजूद इसके यह उनका सबसे मुश्किल राजनीतिक मुकाबला बन गया है. स्वतंत्र सर्वेक्षणों की मानें, तो ओरबान के हारने की संभावना है.
...मानो अकेले ओरबान नहीं लड़ रहे हैं चुनाव
ओरबान धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा की राजनीति करते हैं. यूरोपीय संघ की राजनीति में भी वह फार-राइट खेमे के मुख्य चेहरों में हैं. उनके राजनीतिक सिद्धांतों की अपील, उनका जनाधार और भविष्य ऐसे विषय नहीं हैं जिनका असर हंगरी तक सीमित हो.
ओरबान की जीत या हार, अन्य यूरोपीय देशों की दक्षिणपंथी और धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों पर भी खासा असर डाल सकती है. 'ब्रैंड ओरबान' की जीत एक तरह का राजनीतिक बैरोमीटर बन गया है, जिससे फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में पहले ही मजबूत हो रही फार-राइट पार्टियों को भी मनमाफिक लय मिलने की उम्मीद है. इसीलिए, ओरबान की फिडेस पार्टी को यूरोप के दूसरे दक्षिणपंथी दलों से समर्थन मिल रहा है.
ओरबान के लिए चुनावी रैली करेंगे अमेरिकी उपराष्ट्रपति?
समर्थन या विरोध, बस यूरोपीय महाद्वीप तक सीमित नहीं है. ओरबान को डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन से भी खुला समर्थन मिल रहा है. अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वैंस खुद दो दिन की यात्रा पर हंगरी पहुंचे हैं. 7 अप्रैल को बुडापेस्ट में ओरबान के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में वैंस ने एलान किया, "विक्टर ओरबान हंगरी में अगला चुनाव जीतने जा रहे हैं."
वैंस ने कहा, "इस चुनावी मौसम में, मैं प्रधानमंत्री (ओरबान) की जितनी मदद कर सकता हूं, करना चाहता हूं. हालांकि, मैं यह अपेक्षा नहीं करता कि हंगरी के लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के उप राष्ट्रपति की बात सुनेंगे. लेकिन मैं हर किसी को एक संकेत देना चाहता हूं, खासतौर पर ब्रसेल्स में नौकरशाहों को, जिन्होंने हंगरी की जनता को कामयाब होने से रोकने के लिए वो सब किया जो वो कर सकते हैं, क्योंकि वो उस नेता (ओरबान) को पसंद नहीं करते जो वाकई हंगरी की जनता के लिए खड़ा हुआ."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति की राय में, ओरबान और ट्रंप प्रशासन का आपसी सहयोग "पश्चिमी सभ्यता की हिफाजत" करता है और "ईसाई मूल्यों" पर आधारित है, "बहुत कुछ है जो अमेरिका और हंगरी को एक करता है. दुर्भाग्य से, बहुत ही कम लोग हैं जो पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों के लिए खड़े होने को तैयार हैं."
वैंस की यात्रा पर एक ओर जहां हंगरी के विपक्षी नेता विदेशी हस्तक्षेप ना करने की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं वैंस ने ब्रसेल्स पर दखलंदाजी का आरोप लगाते हुए दावा किया कि यह चुनाव उनकी देखी मिसालों में "विदेश में चुनावी हस्तक्षेप से सबसे खराब उदाहरणों में है." वैंस के मुताबिक, "ब्रसेल्स में ब्यूरोक्रैट्स ने हंगरी की अर्थव्यवस्था को तबाह करने की कोशिश की" क्योंकि वे "इस शख्स (ओरबान) से नफरत करते हैं." खबरों के मुताबिक, वह एक चुनावी रैली में भी ओरबान के साथ नजर आएंगे.
सवाल उठ रहे हैं कि क्या वैंस के इस कदम को हंगरी के चुनाव में "विदेशी हस्तक्षेप" माना जा सकता है? ओरबान के मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी पीटर माग्यार ने सोशल मीडिया पर बाहरी दखलंदाजी के खिलाफ चेताते हुए लिखा, "कोई भी बाहरी देश हंगरी के चुनाव में दखल नहीं दे सकता है. यह हमारा देश है. हंगरी का इतिहास वॉशिंगटन, मॉस्को या ब्रसेल्स में नहीं लिखा गया है. यह लिखा गया है हंगरी की गलियों और चौराहों पर."
ट्रंप की राजनैतिक-वैचारिक शैली का छाता, कौन-कौन आएगा?
यूरोप और यहां की लिबरल पार्टियों-लीडरों के लिए ट्रंप का स्वर अक्सर शिकायती और तीखा रहता है. दिनोदिन यूरोप से 'नाराज' व 'असंतुष्ट' होते और यूरोपीय नेताओं पर कटाक्ष करते ट्रंप वैचारिक समानता वाले दक्षिणपंथी नेताओं को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं. यह कोशिश बस यूरोप में नहीं, बल्कि दक्षिण अमेरिका में भी नजर आती है. मसलन, ट्रंप ने अर्जेंटीना में जो किया.
नवंबर 2024 में जब ट्रंप दूसरे कार्यकाल के लिए चुने गए, तो अर्जेंटीना के राष्ट्रपति हावियर मिलेई उनसे मिलने फ्लोरिडा पहुंचे. वह ट्रंप की जीत के बाद उनसे मिलने आए पहले विदेशी लीडर थे. ट्रंप ने कहा मिलेई उनके "पसंदीदा राष्ट्रपति" हैं.
वहीं मिलेई, ट्रंप को अपना वैचारिक संदर्भ बिंदु बताते हैं. अक्टूबर 2025 में अर्जेंटीना में हुए चुनाव में ट्रंप ने मिलेई को समर्थन दिया. देश का आर्थिक संकट बड़ा मुद्दा था, तो मिलेई की संभावनाएं बढ़ाने के लिए बेलआउट पैकेज देकर ट्रंप ने बड़ी मदद भी की.
हंगरी चुनाव में ओरबान को जिताने में जुटे हैं ट्रंप
हंगरी में ट्रंप की दिलचस्पी का केंद्र हैं, ओरबान. ट्रंप और ओरबान, एक-दूसरे के समर्थक और प्रशंसक हैं. ट्रंप प्रशासन ने यह बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि उसके लिए हंगरी का चुनाव और ओरबान की जीत अहमियत रखती है. ट्रंप ने ओरबान को खुला सपोर्ट दिया और उन्हें "एक मजबूत और ताकतवर नेता" बताया.
फरवरी में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो हंगरी आए और उन्होंने ओरबान के लिए जीत की कामना की. एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में रुबियो ने कहा, "मैं पूरे यकीन के साथ आपसे कह सकता हूं कि राष्ट्रपति ट्रंप, आपकी सफलता के लिए गहराई से प्रतिबद्ध हैं क्योंकि आपकी कामयाबी हमारी कामयाबी है."
कैसा यूरोप चाहते हैं ट्रंप?
चुनाव से ऐन पहले वैंस का हंगरी आना और व्यक्तिगत रूप से ओरबान को चुनावी समर्थन देना, वैचारिक समानता और बयानबाजी से आगे की बात है. विश्लेषक इसे मुश्किल चुनाव में फंसे ओरबान को समर्थन देने की एक दुर्लभ चेष्टा के तौर पर देख रहे हैं.
जैसा कि पॉलिटिको मैगजीन ने वैंस की हंगरी यात्रा को "ऑपरेशन सेव ओरबान" का शीर्षक देते हुए लिखा, "ट्रंप प्रशासन यूरोप में अपने नंबर 1 सहयोगी को बचाने के लिए" पूरा जोर लगा रहा है.
यूरोप में मध्यममार्गी और प्रगतिशाली विचारधारा की सरकारों/ नीतियों को नापसंद करने और इनकी सख्त आलोचना करने के मामले में ट्रंप, वैंस और ओरबान तीनों एक स्वाभाविक गठबंधन बनाते हैं. ट्रंप 2.0 दबे-छिपे तरीके से नहीं, बल्कि सार्वजनिक तौर पर किसी और देश के चुनाव में वैचारिक और विदेश नीति की अपनी प्राथमिकताओं से मेल खाने वाले नेताओं को समर्थन देता दिख रहा है.
कौन हैं जॉर्ज सोरोस, जिन्हें कई लीडर कहते हैं "पपेट मास्टर"
अस्लाई डंतसबस, ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूट थिंक टैंक में एक विजिटिंग फैलो हैं. वैंस की यात्रा के संदर्भ में रॉयटर्स से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, "जेडी वैंस की यात्रा कोई सामान्य कूटनीति नहीं, बल्कि विक्टर ओरबान की जिंदगी के सबसे मुश्किल चुनाव के पहले स्पष्ट तौर पर उनका एंडॉर्समेंट है."
ट्रंप प्रशासन के लिए ओरबान की भूमिका रेखांकित करते हुए उन्होंने आगे कहा, "ट्रंप प्रशासन के लिए ओरबान केवल एक रूढ़िवादी साथी नहीं, बल्कि यूरोप के भीतर एक अनुदार धड़ा स्थापित करने की कोशिशों का मुख्य चेहरा हैं. अगर ओरबान हारते हैं, तो इस अभियान को नुकसान होगा."
हंगरी के चुनाव में दिलचस्पी बस अमेरिका की ही नहीं है
हंगरी के चुनाव में बस अमेरिका नहीं, रूस की भी रुचि बताई जा रही है. ओरबान, मॉस्को समर्थक हैं. बल्कि वह ईयू के सबसे बड़े पुतिन सपोर्टर हैं. यूक्रेन युद्ध से जुड़े मसलों पर ओरबान का रुख, रूसी हितों के ज्यादा करीब है.
दिलचस्पी ईयू की भी कम नहीं है, हालांकि ब्लॉक के लिए हंगरी एक अंदरूनी मसला है. एक तो ओरबान ईयू के विरोधी और तीखे आलोचक हैं. ऊपर से उनके वीटो ईयू के लिए बड़ी परेशानी बन गए हैं. सदस्य देशों की सर्वसम्मति की व्यवस्था में हंगरी का वीटो कई अहम मुद्दों पर ईयू के हाथ-पैर बांध देता है. स्थिति यह है कि ओरबान के वीटो के कारण ईयू के नियमों में सुधार की अपील की जा रही है.
हंगरी और ईयू का रिश्ता: इट्स टू कॉम्प्लिकेटेड
फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद से चाहे रूस पर प्रतिबंध लगाना हो या यूक्रेन की मदद करना हो, ओरबान ईयू के लिए गतिरोध खड़े करते आए हैं. न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया की आजादी, भ्रष्टाचार और निष्पक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे अहम विषयों पर ओरबान की नीतियां, ईयू मूल्यों से मेल नहीं खातीं.
विश्लेषकों के मुताबिक, यह चुनाव ईयू और हंगरी के रिश्ते में "आर या पार" साबित हो सकता है. हंगरी की कथित ब्लैकमेलिंग से ईयू में काफी झुंझलाहट है. मसलन, बीते दिनों जब यूक्रेन को 90 बिलियन यूरो के लोन देने की डील पर ओरबान मुकर गए तो यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा जाहिर तौर पर नाराज दिखे.
यूक्रेन की मदद के लिए 90 अरब यूरो कैसे जुटाएगा ईयू?
कोस्टा ने कहा, "यूरोपीय संघ की संस्थाओं को कोई भी ब्लैकमेल नहीं कर सकता." 'ब्लूमबर्ग' की खबर के अनुसार, ओरबान ने ईयू से कहा कि जब तक रूस से तेल की खरीद फिर नहीं शुरू की जाती, वह यूक्रेन को आर्थिक मदद देने की सहमति नहीं देंगे.
डानिएल फ्रॉइंड, यूरोपीय संसद में ग्रीन्स/ ईएएफ ग्रुप के सांसद और जर्मन नेता हैं. उन्होंने संसद की एक अंदरुनी रिपोर्ट के हवाले से बताया कि ईयू के अब तक के इतिहास में ओरबान से ज्यादा कभी किसी लीडर ने वीटो नहीं किया. समाचार एजेंसी एपी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह चौंकाने वाला है. कोई और करीब भी नहीं आया. ईयू के डिजाइन में यह सबसे बड़ा खोट है, जिसे उन्होंने (ओरबान) एक्सपोज कर दिया है."
यूक्रेन को फंड देने के तरीके पर क्या ईयू में बन पाएगी सहमति?
चीन भी चाहता है ओरबान जीतें?
ओरबान, चीन समर्थक भी हैं. इस मामले में भी वह ईयू में नंबर एक समझे जाते हैं. जैसा कि 'सेंटर फॉर यूरोपियन एनालिसिस' (सीईपीए) ने पिछले साल अपने एक विश्लेषण में लिखा कि हंगरी, यूरोप में सबसे ज्यादा प्रो-चाइना देश है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को जिस तरह चीन से मदद मिली, उसे ईयू में काफी संशय से देखा गया और कई देशों ने बीजिंग से दूरी बना ली. मगर, ओरबान के रिश्ते और गाढ़े हो गए.
बीजिंग सम्मेलन से पहले बढ़ा ईयू और चीन का व्यापारिक तनाव
साल 2023 में बीजिंग में आयोजित 'बेल्ट एंड रोड फोरम' में हिस्सा लेने पहुंचे वह ईयू के अकेले नेता थे. यहां पुतिन की उपस्थिति के कारण बाकी ईयू देशों ने हिस्सा नहीं लिया. फिर 2024 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हंगरी यात्रा पर आए. दोनों देशों ने एक विस्तृत साझेदारी पर भी दस्तखत किया. यह आशंका थी कि बीजिंग के साथ उनकी नजदीकी, ट्रंप के साथ दोस्ती में अड़चन बन सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
विश्लेषकों के अनुसार, विक्टर ओरबान की जीत में चीन की भी दिलचस्पी है. 6 अप्रैल को 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' ने एक आर्टिकल छापा, जिसका शीर्षक था- कगार पर ओरबान: क्या हंगरी का चुनाव यूरोप में चीन के प्रभाव पर चोट पहुंचाएगा?
आर्टिकल के मुताबिक चीन, रूस और ट्रंप का अमेरिका, तीनों के लिए ओरबान की हार एक ऐसे सहयोगी को राह से हटा देगी, जिसने ईयू के सामाजिक और ग्रीन अजेंडा के तहत बार-बार उनके खिलाफ उठाए गए कदमों को रोका.
रिकॉर्ड मतदान की उम्मीद
सरकार समर्थित सर्वेक्षणों में ओरबान की फिडेस पार्टी और केडीएनपी का गठबंधन जीतता दिख रहा है. वहीं, स्वतंत्र सर्वेक्षण संकेत दे रहे हैं पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी लैंडस्लाइड जीत हासिल करने वाली है. विश्लेषकों को उम्मीद है कि इसबार जमकर मतदान होगा, वोटर टर्नआउट 75 से 80 फीसदी तक जा सकता है.
ओरबान पर पहले ही सत्ता के जोर पर विपक्ष और आलोचकों को दबाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. इस बार रूसी दखलंदाजी, मतदाताओं को धमकाने व वोट खरीदने के आरोप और घरेलू खुफिया विभाग की मदद से विपक्षी तिसा पार्टी को नुकसान पहुंचने के इल्जाम भी लग रहे हैं. राजनीतिक और चुनावी संस्थाओं पर सरकार के प्रभाव को देखते हुए यह सवाल बना हुआ है कि हंगरी के चुनाव कितने निष्पक्ष हैं.
भारतीय इतिहास के पन्नों में जब ‘नवजागरण’ (Renaissance) की बात होती है, तो राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले या दयानंद सरस्वती के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। लेकिन इसी आकाश में एक ऐसा नक्षत्र भी था जिसकी चमक ने न केवल सवर्ण पितृसत्ता की आंखों में चकाचौंध पैदा कर दी, बल्कि ईसाई मिशनरियों के पुरुष-अहंकार को भी चुनौती दी। वह नाम था-पंडिता रमाबाई सरस्वती। आज उनकी 104वीं पुण्यतिथि (5 अप्रैल 1922–5 अप्रैल 2026) पर यह याद करना जरूरी है कि क्यों उन्हें इतिहास की मुख्यधारा से सुनियोजित तरीके से बाहर रखा गया।
1858 में जन्मीं रमाबाई का बचपन जंगलों और यात्राओं में बीता। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे एक लीक से हटकर चलने वाले ब्राह्मण थे, जिन्होंने समाज के कड़े विरोध के बावजूद अपनी पत्नी और बेटी (रमाबाई) को संस्कृत सिखाई। जब 1877 के भीषण अकाल में रमाबाई ने अपने माता-पिता को खो दिया, तो वे अपने भाई के साथ पैदल ही पूरे भारत की यात्रा पर निकल पड़ीं।
कलकत्ता पहुँचने पर उनकी अद्भुत संस्कृत विद्वत्ता ने वहां के बड़े-बड़े पंडितों को हैरान कर दिया। यह वह दौर था जब स्त्रियों के लिए ‘अक्षर-ज्ञान’ भी पाप माना जाता था। वहां के विद्वानों ने उन्हें ‘पंडिता’ और ‘सरस्वती’ की उपाधियों से नवाजा-वे आधुनिक भारत की पहली स्त्री थीं जिन्हें सार्वजनिक रूप से यह सम्मान मिला। लेकिन रमाबाई केवल श्लोक पढऩे वाली विदुषी नहीं थीं। उन्होंने शास्त्रों का गहरा अध्ययन किया और पाया कि जिसे ‘धर्म’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में स्त्रियों और अवर्णों (शूद्रों) को गुलाम बनाए रखने का एक व्यवस्थित तंत्र है।
उन्होंने जाति की सीमाओं को तोड़ते हुए एक गैर-ब्राह्मण (बिपिन बिहारी मेधवी) से विवाह किया। पति की असमय मृत्यु के बाद, एक छोटी बच्ची को गोद में लिए रमाबाई ने सवर्ण हिंदू विधवाओं की उस ‘नरक’ जैसी स्थिति को अपनी आंखों से देखा, जहाँ बाल-विधवाओं का मुंडन कर उन्हें अंधेरी कोठरियों में डाल दिया जाता था। यहीं से शुरू हुआ उनका वह संघर्ष, जिसने आगे चलकर तिलक और विवेकानंद जैसे दिग्गजों के माथे पर बल डाल दिए।
शारदा सदन और मुक्ति मिशन : जब विधवाओं को ‘इंसान’ बनाया गया
रमाबाई ने महसूस किया कि समाज सुधारक पुरुष केवल ‘विधवा विवाह’ की बात करते हैं, जैसे विवाह ही स्त्री के उद्धार का एकमात्र रास्ता हो। उन्होंने एक क्रांतिकारी विकल्प पेश किया—‘आत्मनिर्भरता।’ 1889 में उन्होंने पुणे में ‘शारदा सदन’ की स्थापना की। यह सिर्फ एक छत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी जगह थी जहाँ विधवाओं को शिक्षा, टाइपिंग, बढ़ईगिरी और बागवानी सिखाई जाती थी ताकि वे किसी पुरुष की दया पर निर्भर न रहें।
उन्होंने अपनी कालजयी पुस्तक ‘The High-Caste Hindu Woman’ (1887) के जरिए दुनिया को बताया कि हिंदू समाज की ‘कुलीनता’ वास्तव में स्त्रियों के शोषण की नींव पर खड़ी है। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया क्योंकि उन्हें लगा कि वहां ‘समानता’ है, लेकिन जल्द ही उन्होंने वहां भी पितृसत्ता से लोहा लिया और बाइबिल का अनुवाद सीधे हिब्रू से मराठी में किया, ताकि चर्च के पुरुषों द्वारा किए गए ‘स्त्री-विरोधी’ अनुवादों को ठीक किया जा सके।
तिलक का भाषाई प्रहार: ‘पंडिता’से ‘रेवरंडा’ की गाली तक
यही वह बिंदु था जहाँ से रमाबाई के खिलाफ ‘महारथियों’ का मोर्चा खुला। बाल गंगाधर तिलक के लिए ‘स्वराज’ का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति था। तिलक का राष्ट्रवाद सवर्ण पुरुष की संप्रभुता पर टिका था। जब रमाबाई की ख्याति और उनके स्वतंत्र विचार बढऩे लगे, तो तिलक ने अपने अखबार ‘मराठा’ और ‘केसरी’ में उन पर व्यक्तिगत हमले शुरू किए।
तिलक ने उन्हें ‘पंडिता’ कहना बंद कर ‘रेवरंडा’ कहना शुरू किया। यह केवल एक पदवी नहीं थी। ‘रेवरेंडा’ शब्द का प्रयोग तिलक ने इसलिए किया ताकि उसमें ‘रंडा’ (विधवा के लिए एक अत्यंत अपमानजनक गाली) की ध्वनि साफ सुनाई दे। तिलक की नजऱ में एक विधवा का स्वतंत्र होना और धर्म बदलना समाज के पतन का संकेत था। तिलक ने ‘केसरी’ (1887) में साफ़ लिखा था:
‘स्त्रियों की शिक्षा और उनकी स्वतंत्रता हिंदू समाज की जड़ों में तेल डालने जैसा है। जो स्त्रियाँ पुरुषों के समान अधिकारों की मांग करती हैं, वे वास्तव में धर्म का नाश कर रही हैं।’
‘एज ऑफ कंसेंट’और तिलक का ‘मर्दाना’ स्वराज
1891 में जब लड़कियों के लिए शादी की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल करने का कानून (Age of Consent Bill) आया, तो तिलक इसके सबसे उग्र विरोधी थे। रमाबाई इस कानून के पक्ष में थीं क्योंकि उन्होंने सवर्ण घरों में छोटी बच्चियों का यौन शोषण देखा था। तिलक ने इस सुधार को ‘हिंदू धर्म पर हमला’ बताया। उनका तर्क था:
‘हमें अपनी संतानों पर पूर्ण अधिकार है। सरकार को यह तय करने का कोई हक नहीं कि हम अपनी बच्चियों का विवाह किस उम्र में करें।’तिलक का स्वराज उस 10 साल की बच्ची के आंसुओं पर खड़ा था, जिसे धर्म के नाम पर बूढ़ों के बिस्तर पर धकेला जा रहा था।
दिलीप कुमार शर्मा
गुवाहाटी से, 7 अप्रैल। असम विधानसभा की 126 सीटों के लिए 9 अप्रैल को चुनाव होने वाले हैं लेकिन उससे ठीक पहले प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा काफी चर्चा में आ गई हैं.
वैसे तो 52 साल की रिनिकी की अब तक की छवि अराजनीतिक रही है और उनको एक उद्यमी महिला के तौर पर ही असम में जाना जाता है.
लेकिन कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने रविवार को आरोप लगाया कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास यूएई, मिस्र, एंटीगुआ और बारबुडा जैसे देशों के कई विदेशी पासपोर्ट हैं.
हालांकि, कांग्रेस नेता के इस आरोप को रिनिकी भुइयां और सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने ख़ारिज किया है.
कांग्रेस नेता ने अपने आरोपों में रिनिकी की स्वामित्व वाली एक कंपनी का बजट 3,467 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताया और दावा किया कि वह अमेरिका में होटल खोलने की योजना बना रही हैं.
दरअसल रिनिकी को लेकर कांग्रेस के कई नेता पहले भी कई आरोप लगा चुके है, जिसके जवाब में मानहानि मुकदमे तक हुए हैं. लेकिन चुनाव के ठीक चार दिन पहले रिनिकी पर लगे आरोपों ने तमाम मुद्दों को पीछे धकेलते हुए उनको सुर्खियों में ला दिया है.
सीएम हिमंत सरमा ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए ख़ारिज किया और कहा कि इस मामले में उनकी पत्नी ने एफ़आईआर दर्ज करवाई है.
हिमंत बिस्वा सरमा ने सोमवार को प्रेस वार्ता में कहा, "कल पवन खेड़ा और गौरव गोगोई ने दो प्रेस कॉन्फ़्रेंस कीं, एक दिल्ली में और एक गुवाहाटी में. जब आप किसी चुनाव के नतीजे या आउटकम को प्रभावित करने के लिए इन आरोपों का इस्तेमाल फ़र्ज़ी डॉक्यूमेंट्स के साथ करते हैं, तो उस पर ज़्यादा सज़ा का प्रोविज़न लगता है और उसकी सज़ा उम्रक़ैद है."
टेनिस की स्टेट खिलाड़ी से जानी-मानी उद्यमी तक
असम के सबसे बड़े मीडिया हाउसेस में से एक 'प्राइड ईस्ट एंटरटेनमेंट' की मैनेजिंग डायरेक्टर रिनिकी का जन्म 31 जुलाई, 1973 को गुवाहाटी में हुआ था.
उनके पिता जाधव चंद्र भुइयां असम के जाने-माने उद्योगपति थे. वह अपने पांच भाई-बहन में सबसे बड़ी हैं.
गुवाहाटी के सेंट मैरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद रिनिकी ने कॉटन कॉलेज से स्नातक (ग्रेजुएशन) और स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की पढ़ाई पूरी की. स्कूल और कॉलेज के दिनों में लोग उन्हें एक अच्छी टेनिस खिलाड़ी के तौर पर जानते थे.
इंटरनेशनल टेनिस फ़ेडरेशन से प्रशिक्षित तथा राज्य के जाने-माने टेनिस कोच कल्याण दास ने रिनिकी को स्कूल के दिनों से टेनिस की ट्रेनिंग दी थी.
कल्याण दास ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "रिनिकी जब 10 साल की थी तभी से उन्होंने टेनिस खेलना शुरू किया था. मुझे याद है 1987 का वो साल जब रिनिकी अपनी कई सहेलियों के साथ एक ग्रुप में टेनिस सीखने आती थी. वह बहुत अच्छी टेनिस खिलाड़ी थीं और स्टेट के लिए खेल चुकी हैं."
रिनिकी को लेकर मौजूदा विवाद पर कल्याण दास कहते हैं, "अब रिनिकी का ताल्लुक चूंकि राजनीति से जुड़े व्यक्ति से है, सीएम की पत्नी हैं, इसलिए उनको सॉफ्ट टारगेट बनाया जाता है. वह एक अच्छी इंसान हैं. जिस दौर में वह टेनिस खेलती थीं, उस समय कई तरह के अभाव थे लेकिन अब वह स्थानीय खिलाड़ियों की पूरी मदद करती हैं."
कॉटन कॉलेज में हिमंत से मुलाक़ात
रिनिकी की मुलाक़ात हिमंत बिस्व सरमा से उस दौरान हुई थी जब वे गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहीं थीं.
उस समय हिमंत कॉटन कॉलेज छात्र संघ के जनरल सेक्रेटरी थे.
अपने कई इंटरव्यू में रिनिकी ने हिमंत के साथ अपनी लव स्टोरी का ज़िक्र करते हुए कहा है, "10वीं की परीक्षा पास करने के बाद ही मेरी मुलाक़ात हिमंत से हुई थी. 1992 का साल था, जब हमने प्यार का इज़हार किया था."
अपने इसी इंटरव्यू में रिनिकी ने बताया था कि 1994 में जब उन्होंने मिस इंडिया प्रतियोगिता के लिए आवेदन किया तो उनका चयन हो गया था और उन्हें मुंबई बुलाया गया.
वह इसी इंटरव्यू में कहती हैं, "मैंने सोचा कि एक बॉयफ्रेंड के तौर पर शायद हिमंत इस ख़बर से काफी खुश होंगे. लेकिन उन्होंने मुझे तब समझाया था कि यह प्रतियोगिता अच्छी नहीं होती. इस तरह वह मुझे कई दिनों तक हर सुबह अपने साथ ले जाकर समझाते. दरअसल वह मुझे मुंबई जाने देना नहीं चाहते थे."
10 साल तक एक-दूसरे को जानने-समझने के बाद रिनिकी और हिमंत ने 2001 में शादी कर ली. इस दंपति के अब दो बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी.
जर्मन सरकार ने सैन्य क्षमताओं को बेहतर करने के लिए एक नया कानून बनाया. इस कानून के मुताबिक, 17 से 45 साल के पुरुषों को तीन महीने से ज्यादा समय तक जर्मनी छोड़ने से पहले अनुमति लेनी होगी.
डॉयचे वैले पर ओंकार सिंह जनौटी का लिखा-
जर्मनी की सेना हाल ही में अपडेट किए गए सैन्य सेवा कानून पर सफाई देने में जुटी है. असल में मामला, कानून की एक धारा से जुड़ा है, जिसके मुताबिक, 17 से 45 साल के पुरुषों को 3 महीने से अधिक समय के लिए जर्मनी छोड़ने से पहले अनुमति लेनी होगी.
यह कानून जनवरी 2026 में लागू हुआ. लेकिन इसकी यह शर्त लगभग अनदेखी रह गई. एक स्थानीय अखबार फ्रांकफुर्टर रुंडशाऊ की रिपोर्ट ने इसे शुक्रवार को इस शर्त पर रिपोर्टिंग की.
महाशक्तियों की नई दुनिया में ताकत का वर्चस्व: जर्मन चांसलर
रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जर्मनी में सैन्य सेवा स्वैच्छिक है. उन्होंने बताया कि मंत्रालय अब छूट देने के लिए स्पष्ट नियम तैयार कर रहा है. इसका मकसद, गैरजरूरी ब्यूरोक्रैसी से बचना है.
जर्मन मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि यह कानून एक मजबूत और भरोसेमंद सैन्य पंजीकरण प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए है. उन्होंने कहा, "किसी आपात स्थिति में हमें पता होना चाहिए कि कौन लंबे समय तक विदेश में रह रहा है." उन्होंने यह नहीं बताया कि यह प्रक्रिया आखिरकार कैसी दिखेगी.
सैन्य सेवा से जुड़े नए कानून पर राजनीतिक घमासान
जर्मनी 2035 तक सक्रिय सैनिकों की संख्या 2,60,000 तक पहुंचाना चाहता है. 2025 के अंत में यह संख्या 1,83,000 थी. जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स, सैन्य नेतृत्व से कह चुके हैं कि देश को जल्द से जल्द आत्मरक्षा में सक्षम होना होगा. और इसके लिए सैनिकों की जरूरत है.
वहीं जर्मनी की विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है. बीएसडब्ल्यू पार्टी की संस्थापक जारा वागेनक्नेष्ट ने इस नियम पर कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि विदेश यात्रा के लिए अनुमति लेने की शर्त आजादी के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. उनका आरोप है कि यह नियम भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी के समय की याद दिलाता है. वामपंथी नेता वागेनक्नेष्ट ने इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियुस के इस्तीफे की मांग भी की है.
उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि सरकार अनिवार्य सैन्य सेवा की ओर लौटना चाहती है. उनके मुताबिक इससे उन लोगों की चिंताएं बढ़ती हैं, जो मानते हैं कि जर्मनी एक बड़े युद्ध की तैयारी कर रहा है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यह कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं.
अमेरिका पर घटता भरोसा
विवादित सैन्य सेवा कानून पिछले साल पास हुआ था. इसका मकसद बुंडेसवेयर कही जाने वाली जर्मन सेना की ताकत बढ़ाना और नाटो के लक्ष्यों को पूरा करना है. जर्मनी में यह सोच बढ़ी है कि उसने लंबे समय तक रक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा किया लेकिन अब भूराजनीतिक हालात बदल रहे हैं, खासतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में. यूक्रेन युद्ध और वॉशिंगटन के बदलते रुख की वजह से भी यूरोप के देशों में अपनी सैन्य क्षमताएं मजबूत करने की पहल शुरू हो चुकी है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से विदेशी धरती पर जर्मनी की पहली स्थायी सैन्य तैनाती
ट्रंप अक्सर अपने यूरोपीय और नाटो साझेदारों पर तंज कसते आ रहे हैं. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इस्राएल के ईरान युद्ध छेड़ने के बाद से अमेरिका और अन्य नाटो देशों के बीच मतभेद अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुके हैं. ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाने में नाटो देशों से मदद मांगी, जिसे यूरोपीय साझेदारों ने ठुकरा दिया. यूरोपीय देशों को लग रहा है कि अमेरिका ने बिना साझेदारों से बात किए, इस्राएल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया.
नासा के आर्टेमिस 2 मिशन में चांद यात्रा पर निकले स्पेसक्राफ्ट के भीतर अंतरिक्ष यात्रियों की जिंदगी कैसी है?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा-
आर्टेमिस-2 के अंतरिक्षयात्रियों ने चंद्रमा के ऐसे नजारे देखे, जैसा पहले कभी इंसानी आंखों ने नहीं देखा था. 5 अप्रैल को तड़के जब एस्ट्रोनॉट्स के सोने का समय हुआ, तब तक उनका अंतरिक्षयान पृथ्वी से लगभग 321,869 किलोमीटर दूर जा चुका था.
नासा ने आर्टेमिस क्रू की खींची एक तस्वीर साझा की, जिसमें चांद ओरिएनताले बेसिन के साथ नजर आ रहा था. नासा ने लिखा, "यह मिशन पहला मौका है, जब पूरे बेसिन को इंसानी आंखों ने देखा है."
स्पेसक्राफ्ट के भीतर कैसा इंतजाम है?
अंतरिक्षयात्री स्मूदी पी रहे हैं. मैक एंड चीज खा रहे हैं. फोन से तस्वीरें खींच रहे हैं. टॉइलेट खराब हो जाए, तो उसे ठीक भी कर रहे हैं. यह कहना तो सही नहीं होगा कि नासा के आर्टेमिस-2 मिशन पर गए चारों एस्ट्रोनॉट बड़ा सामान्य वक्त बिता रहे हैं. लेकिन हां, अंतरिक्षयान के भीतर उनकी जिंदगी में रोजमर्रा की कई आम चीजें भी शामिल हैं.
मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टिना कॉख, डीप स्पेस में गईं पहली महिला हैं. उन्होंने बताया कि 10 की चांद यात्रा की तैयारी करना कुछ-कुछ कैंपिंग की तैयारी जैसा था. ओरायन अंतरिक्षयान में खाने-पीने की जो चीजें भेजी गई हैं उनमें 58 टॉर्टिला, कॉफी के 43 कप और पांच तरह के सॉस शामिल हैं
यह पहली बार है, जब डीप स्पेस में गए अंतरिक्षयात्रियों को एक असली टॉयलेट मिला है. इससे पहले 1960-70 के दशक के अपोलो अभियानों में अंतरिक्षयात्रियों को शौच के लिए खास 'वेस्ट कलेक्शन बैग' दिया गया था, जिसे वो चंद्रमा की जमीन पर छोड़ आए.
इस बार ओरायन में टॉयलेट है और इसमें योगदान है क्रिस्टिना कॉख का. पिछले हफ्ते अमेरिकी मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, "मुझे खुद को स्पेस प्ल्मर बुलाने पर गर्व हो रहा है." कॉख ने कहा, "मुझे यह कहना अच्छा लगता है कि यह शायद ऑन बोर्ड सबसे अहम उपकरण है. तो जब इसने ठीक काम किया, तो हम सबने राहत की सांस ली."
यह टॉयलेट एक छोटे से कक्ष में है, दिक्कत यह है कि उसमें बहुत शोर होता है. तो एस्ट्रोनॉट जब भी टॉयलेट जाते हैं, उन्हें कान सुरक्षित करने वाला उपकरण लगाना पड़ता है.
मिशन कमांडर का आउटलुक काम नहीं कर रहा था
ओरायान में एक और परेशानी आई, मिशन कमांडर का माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक काम नहीं कर रहा था. नासा के लाइवस्ट्रीम में मिशन कमांडर रीड वाइसमैन ने बताया, "मैंने यह भी देखा कि मेरे पास दो माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक हैं और दोनों में से कोई काम नहीं कर रहा है." फिर ह्यूस्टन में मिशन कंट्रोल ने ईमेल की दिक्कत सुलझाई.
अंतरिक्षयात्रियों के लिए जरूरी है कि वे अपने सोने का ध्यान रखें. उन्हें एक स्लीप रूटीन का पालन करना है ताकि वे चांद उपकरणों की जांच करने और निगरानी करने जैसे जरूरी काम कर पाएं. सोने के लिए उनके पास स्लीपिंग बैग हैं, जो दीवार से बांध दिए जाते हैं. जिससे कि सोते समय वे तैरते ना रहें. रीड वाइसमैन ने बताया कि क्रिस्टिना कॉख, वाहन के बीच में यूं सोती हैं कि उनका सिर नीचे की तरफ होता है. वाइसमैन ने इसे चमगादड़ की तरह बताते हुए कहा कि यह काफी आरामदेह है.
अंतरिक्षयात्रियों के दिनभर के काम में 30 मिनट एक्सरसाइज करना भी शामिल है. माइक्रोग्रैविटी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों पर असर पड़ता है. अगर सावधानी ना बरती जाए, तो खासा नुकसान हो सकता है. इसीलिए व्यायाम जरूरी है.
अफगानिस्तान में एक बार फिर भारी बारिश, बाढ़ और लैंडस्लाइड का जानलेवा मेल तबाही मचा रहा है. आखिर क्यों देश में बरसात जैसे मौसमी चक्र इतने घातक होते जा रहे हैं?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा की रिपोर्ट –
चरम मौसमी घटनाओं के लिहाज से यह साल भी अफगानिस्तान पर भारी गुजर रहा है. बीते 10 दिनों में, भारी बरसात और तूफान के कारण आई बाढ़, भूस्खलन और बिजली गिरने की घटनाओं में 77 लोगों की जान गई और 137 लोग घायल हुए. देश के आपदा प्रबंधन विभाग ने यह आंकड़ा दिया है. आने वाले दिनों में और बारिश की आशंका है. लोगों को बाढ़ की आशंका वाले इलाकों और नदी तटों से दूर रहने की सलाह दी गई है.
संपत्ति की भी खासी क्षति हुई है. सैकड़ों की संख्या में मकान क्षतिग्रस्त हुए, 793 घर पूरी तरह तबाह हो गए, 337 किलोमीटर की सड़क नष्ट हो गई. आपदा प्रबंधन विभाग ने नुकसान का जो ब्योरा दिया है उसके मुताबिक कारोबार, खेतिहर जमीन, कुओं और सिंचाई की नहरें भी क्षतिग्रस्त हुई हैं. कुल मिलाकर 5,800 से ज्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं.
जलवायु परिवर्तन की वजह से धंस रही धरती, बन रहे हैं विशालकाय सिंकहोल
समाचार एजेंसी एपी ने लोक निर्माण विभाग के प्रवक्ता अशरफ हकशिनास के हवाले से बताया कि राजधानी काबुल को अन्य प्रांतों से जोड़ने वाले कई राजमार्गों को भी नुकसान पहुंचा है. इनमें काबुल-जलालाबाद हाई-वे शामिल है, जो कि राजधानी को पाकिस्तानी सीमा और देश के पूर्वी प्रांतों से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है. बाढ़ के चलते सलांग दर्रा भी बंद हो गया है. हिंदू कुश पर्वत शृंखला का यह दर्रा काबिल को देश के उत्तरी हिस्से से जोड़ता है.
अफगानिस्तान में आपदाएं क्यों ज्यादा नियमित होती जा रही हैं?
पिछले कुछ सालों के दौरान अफगानिस्तान में चरम मौसम का संकट गंभीर होता गया है. सिपरी (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट) ने अपनी 2023 की फैक्टशीट में देश को जलवायु परिवर्तन के असर के प्रति बहुत संवेदनशील माना है. यहां चरम मौसम की घटनाएं ज्यादा नियमित होती जा रही हैं.
तापमान भी वैश्विक औसत के मुकाबले ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहा है. जलवायु के ये कारक जब चार दशक लंबे युद्ध की विरासत, आर्थिक संकट और बदहाल बुनियादी ढांचे के साथ मिलते हैं तो प्राकृतिक आपदाओं का असर कई गुना बढ़ जाता है. ऊपर से, आपदा की स्थिति में आपातकालीन मानवीय सहायता पहुंचाने की व्यवस्था भी जटिल है. ऐसे में, आपदाओं का सामना करने या उनके असर को कम करने के मामले में लोग ज्यादा असुरक्षित और असहाय हो जाते हैं.
सिपरी की रिपोर्ट बताती है कि बदल रहा तापमान, पिघलती बर्फ और बरसात जैसे कारक सूखा और बाढ़ जैसी मौसमी घटनाओं को प्रभावित करते हैं, लेकिन इनका असर एक जैसा नहीं है. देश के अलग-अलग ईकोलॉजिकल हिस्सों में अलग पैटर्न नजर आता है. चाहे धीमी गति से होने वाली मौसमी घटनाएं हों या औचक आईं आपदाएं, अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन इन्हें ना केवल ज्यादा नियमित बनाएगा बल्कि इनकी तीव्रता भी बढ़ाएगा.
जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा असुरक्षित देशों में है अफगानिस्तान
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के जिन देशों की हालत सबसे संवेदनशील है, उनमें अफगानिस्तान शीर्ष के देशों में है. जर्मन वॉच के 'क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021' में जलवायु से सबसे ज्यादा असुरक्षित देशों की सूची में अफगानिस्तान छठे नंबर पर था. तापमान में हो रही बढ़ोतरी को देखें, तो साल 1951 से 2020 के बीच हवा का औसत सालाना तापमान (मीन एनुएल टेम्परेंचर्स) 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है. जबकि इस अवधि में वैश्विक औसत 1.5 डिग्री सेल्सियस था.
मौसम ने प्रभावित की 24 करोड़ बच्चों की पढ़ाई
हालांकि, यह वृद्धि समूचे देश में एकसार नहीं है. ऊंचाई और भूभागीय बनावट के हिसाब से अंतर है. मसलन, हिंदू कुश इलाके में सबसे कम 0.6 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ. सबसे अधिक करीब 2.4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी पूर्वी हिस्सों में दर्ज की गई. साल 2021 में मीन एनुएल टेम्परेचर 14.3 डिग्री मापा गया. साल 1901 के बाद से यह सबसे ज्यादा आंकड़ा था.
सिपरी के मुताबिक, अनुमान है कि 2050 तक तापमान में 1.7–2.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो सकती है. यानी, अफगानिस्तान में तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ने की आशंका है. एक तरफ तापमान बढ़ रहा है, दूसरी तरफ बारिश घट रही है. 1997 के बाद से लगभग हर साल सूखा या सूखे जैसे हालात रहे हैं है. बीता साल, पिछले तीन दशकों में सबसे बदतर सूखा माना गया. उससे पहले 2022 को भी यही कहा गया था.
यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस फॉर दी कॉर्डिनेशन ऑफ ह्यूमैनिटेरियन अफेयर्स (ओसीएचए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कम-से-कम 60 फीसदी आबादी सिंचाई के लिए खेती पर निर्भर है. ऐसे में एक के बाद एक "सबसे सूखे साल" का रिकॉर्ड मानवीय संकट को गाढ़ा करता जा रहा है. ओसीएचए के मुताबिक, जमीन के रेगिस्तानीकरण यानी आमतौर पर सूखे के कारण उपजाऊ जमीन के मरुस्थल बनने की प्रक्रिया ने उत्तरी, पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में 75 फीसदी से ज्यादा भूमि को चपेट में ले लिया है. मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि पैदावार घटती जा रही है. नतीजा, गरीबी और विस्थापन में इजाफा.
अफगानिस्तान का मौसम, यहां की बदलती जलवायु, सूखे की बढ़ती अवधि फिलहाल भले ही बस अफगानिस्तान की समस्या लगे, लेकिन ये पड़ोसी देशों को भी चपेट में ले सकती है. अफगानिस्तान आसपास के इलाके के सबसे बड़े, ताजे पानी के नवीकरणीय स्रोत हिंदू कुश शृंखला के केंद्र में है. जर्मन थिंक टैंक 'हेनरिष बोल श्टिफटुंग' की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की 276 ट्रांस-बाउंड्री नदियों में से चार नदियों का हिस्सा है. जब नदी का पानी एक से ज्यादा देश साझा करते हैं, तो पानी की उपलब्धता और प्रबंधन काफी संवेदनशील मुद्दा बन जाता है.
जितने तरह का सूखा, उतनी तरह की समस्याएं
मसलन, हेलमंद नदी अफगानिस्तान में जन्म लेकर दक्षिणपश्चिम की ओर बढ़ते हुए ईरान के सिस्तान बेसिन जाती है. हेलमंद नदी के पानी के बंटवारे पर दोनों देशों में पुराना विवाद रहा है. वहीं पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच नौ नदियां बहती हैं, लेकिन पानी के साझा प्रबंधन या बंटवारे के लिए दोनों देशों में कोई आधिकारिक समझौता नहीं है. जैसे-जैसे जलवायु से जुड़ी समस्याएं और प्रचंड होती जाएंगी और मीठे पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन सिमटते जाएंगे, उनपर तनाव और संघर्ष बढ़ने की आशंका है.
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई। प्रेस क्लब ने इसे ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हुए ‘मनमाना और संविधान का उल्लंघन’ करने वाला बताया है।
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है। उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, ‘4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया। फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया। कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है। ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया।’
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर ‘पोस्टमैन’ को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं। योगेंद्र यादव ने कहा, ‘सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है। घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकडऩे की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे।’
‘डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार’
न्यूज प्लेटफॉर्म ‘मॉलिटिक्स’ ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा। उन्होंने आरोप लगाया, ‘सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।’
संदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध कियासंदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध किया
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है।
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया। उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, ‘मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है। ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए।’
‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है।’
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हए कहा कि यह ‘मनमानी और संविधान का उल्लंघन’ करने वाली है।
.St. Augustine of Hippo
"Faith is to believe what you do not see; the reward of this faith is to see what you believe."
."St. Augustine (born November 13, 354, Tagaste, Numidia [now Souk Ahras, Algeria]—died August 28, 430, Hippo Regius [now Annaba, Algeria]; feast day August 28) was the bishop of Hippo from 396 to 430, one of the Latin Fathers of the Church, and perhaps the most significant Christian thinker after St. Paul. Augustine’s adaptation of classical thought to Christian teaching created a theological system of great power and lasting influence. His numerous written works, the most important of which are Confessions (c. 400) and The City of God (c. 413–426), shaped the practice of biblical exegesis and helped lay the foundation for much of medieval and modern Christian thought. In Roman Catholicism he is formally recognized as a doctor of the church.
(Read Britannica’s biography of the first Augustinian pontiff, Pope Leo XIV.)
Augustine is remarkable for what he did and extraordinary for what he wrote. If none of his written works had survived, he would still have been a figure to be reckoned with, but his stature would have been more nearly that of some of his contemporaries. However, more than five million words of his writings survive, virtually all displaying the strength and sharpness of his mind (and some limitations of range and learning) and some possessing the rare power to attract and hold the attention of readers in both his day and ours. His distinctive theological style shaped Latin Christianity in a way surpassed only by Scripture itself. His work continues to hold contemporary relevance, in part because of his membership in a religious group that was dominant in the West in his time and remains so today..."
इरावती कर्वे भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के साथ-साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भी थीं। जर्मनी में पीएचडी करते हुए उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
डॉयचे वैले पर रितिका की रिपोर्ट-
इरावती कर्वे को भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के तौर पर जाना जाता है। हालांकि, बेहद कम लोगों को यह जानकारी है कि इरावती ने जर्मनी आकर अपनी पीएचडी पूरी की थी। 1920 के दशक में पीएचडी के दौरान ही उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर यूजीन फिशर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
इरावती का जन्म 15 दिसंबर 1905 बर्मा (अब म्यांमार) में हुआ था। उनके पिता गणेश करमरकर ने बर्मा की सबसे प्रमुख नदी ‘इरावडी’ के नाम पर बेटी को इरावती नाम दिया। वह बचपन से ही पढऩे-लिखने में बेहद होशियार थीं।
उस दौर में लगभग हर डिग्री के लिए उन्हें कोई-न-कोई स्कॉलरशिप जरूर मिली थी। साल 1926 में पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी ग्रैजुएशन पूरी की। इसके बाद मास्टर्स की डिग्री के लिए उन्हें बॉम्बे यूनिवर्सिटी से दक्षिणा फेलोशिप मिली।
आजाद खयाल थीं इरावती कर्वे
इरावती उस जमाने में भी अपने दौर से कहीं आगे की सोच रखती थीं। 1920 के दशक में एक भारतीय लडक़ी का स्कूटर चलाना, स्विमसूट पहनना या फिर अपनी मर्जी से शादी करना नामुमकिन सी बात लगती है। लेकिन इरावती ने ये सब करके दिखाया था।
उन्होंने दिनकर धोंडो कर्वे से शादी की। दिनकर एक प्रगतिशील और समाज सुधारकों के परिवार से आते थे। उन्होंने इरावती के हर फैसले में उनका साथ दिया था। इसलिए जब इरावती ने बर्लिन जाकर डॉक्टरेट करने का फैसला किया तो उनके पिता और ससुर दोनों नाराज हुए, लेकिन पति दिनकर ने साथ दिया। कर्वे ने खुद भी जर्मनी से पढ़ाई की थी, इसलिए उन्हें लगा कि इरावती की पीएचडी के लिए जर्मनी मुफीद जगह होगी।
इरावती कर्वे की नातिन और लेखिका उर्मिला देशपांडे बताती हैं, ‘वे उस जमाने में पीएचडी करने इसलिए आ पाईं क्योंकि उनके पति साथ खड़े थे। यह मुख्य वजह थी। और, ऐसा करने की उनकी अपनी इच्छाशक्ति भी इसके पीछे थी। मैंने अपनी किताब में भी लिखा है कि मैं सात साल की थी, जब उनकी मौत हुई तो एक व्यस्क के तौर पर मैं उन्हें नहीं जानती। लेकिन वो एक बेहद दृढ़ निश्चय वाली आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थीं।’
भारत से बर्लिन तक का सफर
साल 1927 में इरावती ने जर्मनी आकर पीएचडी करने का फैसला किया। तब भारत से जर्मनी की कोई सीधी फ्लाइट तो थी नहीं। पानी के जहाज में कई हफ्तों का सफर तय करके वह हैम्बर्ग पोर्ट पहुंचीं और वहां से बर्लिन की ट्रेन पकड़ी।
इरावती को ‘काइजर विलहेल्म इंस्टीट्यूट ऑफ एंथ्रोपॉलजी’ में रिसर्च के लिए दाखिला मिला था। उनके पीएचडी सुपरवाइजर थे, जर्मन वैज्ञानिक प्रोफेसर यूजीन फिशर। यह वही शख्स थे, जिन्होंने यह ‘थिअरी’ सामने रखी थी कि वाइट यूरोपियंस की खोपड़ी एसिमेट्रिकल होती है। उनके दिमाग का दाईं तरफ का हिस्सा ज्यादा बड़ा होता है, जो उनकी श्रेष्ठता का सबूत है।
फिशर ने इरावती को एक टास्क दिया, जिसमें उन्हें यूरोपीय नस्ल की खोपडिय़ों की तुलना दूसरी नस्लों की खोपडिय़ों से करनी थी। और, यह साबित करना था कि यूरोपीय नस्ल ज्यादा तार्किक और समझदार होती है। इसके लिए इरावती को 149 इंसानी खोपडिय़ों पर यह स्टडी करनी थी।
स्टडी में शामिल दूसरी नस्लों की खोपडिय़ां रवांडा, तंजानिया और मेलानेशिया से थीं। तब इनमें से कुछ इलाके जर्मनी की कॉलनी हुआ करते थे। उर्मिला देशपांडे ने अपनी किताब में लिखा है अपनी रिसर्च के दौरान इरावती इन खोपडिय़ों से माफी मांगती थीं।
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई. प्रेस क्लब ने इसे "ऑनलाइन सेंसरशिप" करार देते हुए "मनमाना और संविधान का उल्लंघन" करने वाला बताया है.
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा की रिपोर्ट –
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है. उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, "4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया. फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया. कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है. ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया."
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर "पोस्टमैन" को निशाना बनाने का आरोप लगाया है. यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं. योगेंद्र यादव ने कहा, "सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है. घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकड़ने की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे."
"डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार"
न्यूज प्लेटफॉर्म 'मॉलिटिक्स' ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया. इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा. उन्होंने आरोप लगाया, "सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है."
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है.
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया. उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, "मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है. ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए."
'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, "प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है."
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को "ऑनलाइन सेंसरशिप" करार देते हए कहा कि यह "मनमानी और संविधान का उल्लंघन" करने वाली है.
"बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया फेसबुक पेज"
न्यूज प्लेटफॉर्म 'मॉलिटिक्स' के फेसबुक अकाउंट को करीब 4,48,000 लोग फॉलो करते थे. मॉलिटिक्स की डिप्टी एडिटर निवेदिता शांडिल्य के मुताबिक, 28 मार्च को रात 2 बजे के बाद मेटा की ओर से नोटिफिकेशन आया, "सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 के सेक्शन 79(3)(बी) के तहत, भारत सरकार/कानून प्रवर्तन से मिले नोटिस के आधार पर भारत में आपके कंटेंट तक पहुंच को रोक दिया गया है."
निवेदिता ने डीडब्ल्यू हिंदी को बताया कि इससे पहले मॉलिटिक्स को सरकार या मेटा की ओर से कोई नोटिस नहीं मिला था और अचानक ही उनके अकाउंट को भारत में बैन कर दिया गया. निवेदिता के मुताबिक, पेज को बैन करने के पीछे कोई वजह भी नहीं बताई गई है. उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की टीम इस कार्रवाई के खिलाफ कानूनों विकल्पों पर विचार कर रही है और दिल्ली हाईकोर्ट जाने की योजना बना रही है.
12 साल पुराना फेसबुक पेज झटके में बंद हुआ
'नेशनल दस्तक' नाम का न्यूज प्लेटफॉर्म चलाने वाले शंभू कुमार सिंह बताते हैं कि उनका फेसबुक पेज करीब 12 साल पुराना था और सरकार के निर्देश पर उसे डाउन कर दिया गया. फेसबुक पर नेशनल दस्तक को करीब 14 लाख लोग फॉलो करते थे.
शंभू कुमार ने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि नेशनल दस्तक के जरिए हाशिये पर मौजूद समुदायों की आवाज उठाई जाती थी, जिनमें एससी-एसटी, ओबीसी वर्ग, महिलाएं और किसान शामिल हैं.
उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की तरह, उनका पेज भी अचानक भारत में बंद कर दिया गया और इस कार्रवाई से पहले उन्हें किसी भी तरह का कोई नोटिस नहीं भेजा गया था. उन्होंने कहा कि वे कोई संस्थागत मीडिया हाउस नहीं हैं, उनके लिए कोई कानूनी या आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं है, इसलिए वे फिलहाल कोर्ट जाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं बल्कि फेसबुक की शर्तों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं.
इस मामले पर सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है. डीडब्ल्यू हिंदी ने सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी के मुद्दे पर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से टिप्पणी का अनुरोध किया था, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला.
-ललित मौर्य
कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहां कुछ हजार सबसे अमीर लोगों के पास इतनी छिपी हुई दौलत है, जो दुनिया की आधी आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह सिर्फ असमानता की कहानी नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की कहानी है, जहां अमीरों के लिए नियम अलग और आम लोगों के लिए अलग हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों ने टैक्स से बचने के लिए विदेशों में इतनी संपत्ति छिपा रखी है, जो दुनिया की आधी गरीब आबादी (करीब 410 करोड़ लोगों) की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह खुलासा ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट में हुआ है, जो पनामा पेपर्स की 10वीं वर्षगांठ से पहले जारी की गई है।
दुनिया में गरीबी की बड़ी वजह ‘छिपा हुआ पैसा’
इसका मतलब कहीं न कहीं दुनिया में गरीबी की सबसे बड़ी वजह पैसे की कमी नहीं, बल्कि छिपा पैसा है। जब करोड़ों लोग बेहतर अस्पताल, स्कूल और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उसी समय दुनिया के सबसे अमीर लोग अपनी खरबों डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन में छिपा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में करीब 3.55 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन देशों और गुप्त खातों में छिपाई गई। यह रकम फ्रांस की पूरी अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है और दुनिया के 44 सबसे कमजोर देशों की कुल जीडीपी के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है।
ऑक्सफैम के मुताबिक, टैक्स से छिपाई गई इस कुल संपत्ति का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों के पास है, यानी करीब 2.84 ट्रिलियन डॉलर की रकम इन लोगों ने दबा रखी है। वहीं, इस समूह के अंदर भी सबसे अमीर सुपर रिच 0.01 फीसदी लोगों के पास ही करीब 1.77 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति छिपी हुई है।
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के टैक्स विशेषज्ञ क्रिश्चियन हॉलम का कहना है, ‘पनामा पेपर्स ने एक ऐसी छिपी दुनिया का पर्दाफाश किया था, जहां सबसे अमीर लोग अपनी संपत्ति टैक्स और जांच से बचाने के लिए विदेशों में छिपा देते हैं। दस साल बाद भी यह सिलसिला जारी है और सुपर-रिच लोग अब भी भारी मात्रा में संपत्ति टैक्स हेवन यानी विदेशों के गुप्त खातों में छिपा रहे हैं।’
सऊदी में कारोबार छोडक़र भारत लौटे अशरफ अब सोशल मीडिया पर अपने बेटे की प्रगति दुनिया तक पहुंचा रहे हैं। केरल के शाबिन के ऑटिज्म की यात्रा को हर कोने से मिल रहा है प्यार।
डॉयचे वैले पर जीशान तिरमिजी की रिपोर्ट –
केरल के पलक्कड में रहने वाले अशरफ और रसीना को अपने बेटे शाबिन के बारे में तब चिंता होने लगी, जब दो-ढाई साल की उम्र में भी वह कुछ नहीं बोल पा रहा था। लोग अलग-अलग राय देते थे। लेकिन माता-पिता का दिल जो ठहरा, रसीना और अशरफ को महसूस हुआ कि बात कुछ और है।
शाबिन साढ़े चार साल का था, जब डॉक्टर ने बताया कि उसे स्पीच थेरपी की जरूरत है। उस समय रसीना गर्भवती थीं और अस्पताल आना-जाना मुश्किल था। अशरफ भी तब सऊदी अरब में थे, तो एक दिन रसीना ने रोते हुए उन्हें फोन किया और भारत लौटने को कहा।
अशरफ सऊदी अरब में फोटोग्राफी का काम कर रहे थे, लेकिन परिवार के लिए सबकुछ छोडक़र वापस चले आए। भारत में एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक ने बताया कि शाबिन को ऑटिज्म है। यह पहली बार था, जब अशरफ ने यह शब्द सुना। बेंगलुरू के एक बड़े अस्पताल में ऑटिज्म से प्रभावित दूसरे बच्चों और उनके माता-पिता को देखकर अशरफ को पहली बार स्थिति की गंभीरता समझ आई।
थेरपी की सीमाएं और संघर्ष की शुरुआत
भारत लौटने के बाद स्पीच थेरपी, ऑक्यूपेशनल थेरपी और कई तरह के मूल्यांकन शुरू हुए। खर्च बढ़ता गया पर सुधार धीमा था। डेढ़ साल तक लगातार कोशिश करने के बावजूद शाबिन के बोलने में खास प्रगति नहीं हुई।
आर्थिक मोर्चे पर भी चुनौती खड़ी हो चुकी थी। अशरफ के मुताबिक, वह सऊदी में जिन्हें अपना कारोबार सौंपकर आए थे उन्होंने धोखे से वह भी खत्म कर दिया था। फिर भी अशरफ ने हिम्मत नहीं हारी और छोटे पैमाने पर रबर की खेती कर परिवार का गुजारा शुरू किया।
स्पेशल स्कूल भेजने पर भी उन्हें संतोष नहीं मिला। स्कूल में थेरपी तो थी, लेकिन ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी थी। न बोलने में प्रगति हुई, न बिना शब्दों के होने वाली अभिव्यक्ति में। अशरफ मानते हैं कि स्पेशल स्कूल, डाउन सिंड्रोम या अन्य स्थितियों वाले बच्चों के लिए ठीक हो सकता है, पर ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए नहीं।
फिर मां ने थामी पढ़ाई की कमान
रसीना ने अपने इलाके के एक वरिष्ठ डॉक्टर से कुछ दिन की ट्रेनिंग ली। वहां उन्हें सिखाया गया कि ऑटिज्म वाले बच्चों को जबरदस्ती नहीं, बल्कि धैर्य और दोहराव से सिखाया जाता है। फिर तो रसीना ने घर को ही स्कूल बना दिया।
वह शाबिन को रोजमर्रा के हर काम में अपने साथ रखती थीं। खाना बनाना, सफाई, कपड़े तह करना, पानी भरना हर काम में शाबिन उनके साथ होता। धीरे-धीरे शाबिन ने भी कई काम सीख लिए। परिवार बताता है कि वह खूब ऐक्टिव हैं और अचानक सडक़ की ओर भी चल देता थे। तब शाबिन के चाचा ने घर के बाहर लकड़ी का एक बैरियर लगाया। कुछ ही दिनों में शाबिन समझ गए कि बैरियर के पार नहीं जाना है।
सोशल मीडिया की ताकत और जागरूकता का नया रास्ता
एक दिन अखबार पढ़ते समय अशरफ ने नोटिस किया कि शाबिन एक घंटे तक शांत बैठा रहा। यह उनके लिए हैरान करने वाली बात थी। उन्होंने तस्वीर खींची और फेसबुक पर डाल दी। लोगों की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी। सवाल आने लगे कि यह बच्चा कौन है।
यहीं से रोजमर्रा के वीडियो पोस्ट करने की शुरुआत हुई- कपड़े तह करना, खाना, संगीत सुनना, साफ-सफाई में मदद करना। कुछ ही महीनों में दुनियाभर से कई लोग उनके साथ जुड़ गए। अशरफ बताते हैं कि उनकी ऑडियंस में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनकी उम्र 30 से 60 साल के बीच है। खासकर वे महिलाएं, जो स्पेशल बच्चों की परवरिश कर रही हैं।
आज फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लोग न सिर्फ शाबिन को देखते हैं बल्कि कमेंट और फोन के जरिये प्यार और हौसला भी देते हैं। सोशल मीडिया ने इस परिवार को आवाज दी है। साथ ही, शाबिन की यात्रा ने हजारों परिवारों के बीच नई जागरूकता भी जगाई है।
“जाम में फंसे आम आदमी को महंगाई, अशिक्षा, इलाज के नाम पर लूट, शिक्षा के नाम पर डकैती जैसी सांसारिक चीजें तुच्छ लगने लगेंगी”
सुल्तान का दरबार सजा हुआ था पर गजब की खामोशी थी। सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक अपने स्मार्टफोन पर रील पर रील स्क्रोल किए जा रहे थे। थोड़ी देर यूं ही चलता रहा। इससे पहले कि बाकी दरबारी भी रील देखना शुरू करते सुल्तान के चीफ वजीर ख्वाजा जहान उठे और अदब से सलाम करते हुए जेब से एक कागज निकाला और पढ़ने लगे, “सर जी! दरबार चलने का एक मिनट का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपए है। इस दर से एक दिन का खर्च लगभग 9 करोड़ रुपए से अधिक आता है। इसमें वजीरों के वेतन-भत्ते, यात्रा, सुरक्षा इत्यादि शामिल हैं। हर मिनट का यह खर्च टैक्सपेयर पर बोझ डालता है। सूत्रों ने आरटीआई लगाकर जानना चाहा है कि सुल्तान आखिर किस चिंता में डूबे हैं?”
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपनी आवाज में किसी दार्शनिक की खनक लाते हुए कहा, “ख्वाजा जहान, किसी ने सही कहा है कि कभी किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता। अब मुझे ही देख लो, मेरी मुद्रा नीति फेल हो गई है, विदेश नीति का हाल देख ही रहे हो। सोचा था दौलताबाद शिफ्ट कर जाऊंगा पर वह भी नहीं हुआ। देश में बेरोजगारी, महंगाई आसमान छू रही है। गैस को लेकर मारामारी हो रही है और सामने कई राज्यों में चुनावी युद्ध होने वाले हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करूं तो क्या करूं? ऐसे में मैं रील न देखूं तो क्या करूं?”
ख्वाजा जहान बोले, “मैं किसी फिल्मी सड़क की नहीं बल्कि अपने राज्य की सड़कों की बात कर रहा हूं। अब आप क्रोनोलॉजी समझिए। सबसे पहले हमें सड़कों का मुआयना करना होगा। देखा जाए तो एक भी सड़क, सड़क कहलाने लायक बची नहीं है पर जहां भी कोई ढंग की सड़क दिखेगी हम उसको जहां-तहां खोद देंगे। इस पवित्र कार्य में हमारे सरकारी विभाग हमारी मदद के लिए सदैव तत्पर हैं। कभी किसी सड़क को हमारा बिजली-विभाग खोदकर भाग जाएगा तो कभी किसी दूसरी सड़क को जल-विभाग। कहीं गहरे सीवर के नाम पर खोदेंगे तो कहीं पर गैस पाइपलाइन के नाम पर। कभी किसी सड़क को पुल बनाने के नाम पर खोद दिया जाएगा तो कभी किसी को मेट्रो लाइन बिछाने के नाम पर।”
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने मासूमियत से पूछा, “भला इससे महंगाई, गैस की कमी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान कैसे होगा?”
ख्वाजा जहान ने कहा, “इससे यातायात ठप्प हो जाएगा। रियाया इस पहेली में रहेगी कि आखिर क्यों “मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह।” जैसे आत्मा एक शरीर से निकलकर दूसरे में जा घुसती है, उसी तरह एक आम नागरिक एक ट्रैफिक जाम से निकल कर दूसरे में जा फंसेगा। जल्द ही वह लगभग आध्यात्मिक हो जाएगा और यह सोचने लगेगा कि कैसे इस ट्रैफिक जाम के चक्र से मुक्ति मिले? यही मोक्ष की अवस्था है। ऐसे में उसके सामने महंगाई, अशिक्षा, इलाज के नाम पर लूट, शिक्षा के नाम पर डकैती जैसी सांसारिक चीजें तुच्छ लगने लगेंगी। चुनावों से ठीक पहले हम सड़कों की मरम्मत कर देंगे। जनता खुश हो जाएगी और हम चुनाव जीत जाएंगे। एक बार चुनावों के हो जाने के बाद हम एक बार फिर से पूरी प्रक्रिया को शुरू कर देंगे।”
सुल्तान को प्लान इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे राज्य का राज-प्लान घोषित कर दिया और अगले हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते रहे। (hindi.downtoearth.org.in/)
-मनु जोसेफ
1980 के दशक में भारत ने कुछ समय के लिए एक किशोर लेग-स्पिनर, लक्ष्मण शिवरामकृष्णन, को लगभग विस्मय के साथ देखा। फिर वे धुंधले पड़ गए और बाद में कमेंटेटर के रूप में लौटे। हाल ही में वे फिर चर्चा में आए, जब उन्होंने कमेंट्री छोड़ते हुए कहा कि उन्हें उनकी गहरी त्वचा के कारण लगातार छोटा दिखाया जाता रहा। वे भारतीयों पर आरोप लगा रहे थे, और इसलिए उनकी बातों में एक असहज सच्चाई थी। उन्होंने कहा कि प्रभावशाली लोग उन्हें कैमरे से दूर रखने की कोशिश करते थे, टॉस के लिए बुलाने में हिचकिचाते थे, और उन्हें यह एहसास कराया जाता था कि वे ‘प्रस्तुत करने योग्य’ नहीं हैं।
जब उन्होंने यह सब सार्वजनिक रूप से कहा, तो यह भी बताया कि उनका पूरा जीवन लगभग ऐसा ही रहा, यहां तक कि तब भी जब वे एक उभरते हुए क्रिकेट सितारे थे। उन्हें अक्सर गरीब समझ लिया जाता था और उसी हिसाब से व्यवहार किया जाता था।
अनुभव कहता है कि शायद यह पूरी कहानी नहीं है कि उन्होंने कमेंट्री क्यों छोड़ी, लेकिन उनके साथ हुए व्यवहार पर आश्चर्य नहीं होता। भारतीय लंबे समय से अपने समाज की रंग-चेतना पर घृणा जताते आए हैं। लेकिन फिर प्रश्न उठता है, यह भेदभाव करता कौन है? उत्तर असुविधाजनक है: हम में से अधिकांश, यहां तक कि वे भी जो इस पर आक्रोश जताते हैं।
यह आक्रोश आत्म-सुधार नहीं है, बल्कि उस आत्म-जागरूकता की भरपाई है कि हम इस प्रवृत्ति को जारी रखेंगे, जहां त्वचा का रंग गरीबी से जोड़ा जाता है और जिन्हें ‘नीचा’ समझ लिया जाता है, उनके साथ सम्मान नहीं किया जाता। भारत के औसतपन की एक अनकही सच्चाई, चाहे वह दंत चिकित्सा हो या न्यूज़ एंकरिंग, यह है कि वह बहुत ‘प्रेज़ेंटेबल’ चेहरों से भरा हुआ है।
शिवरामकृष्णन इस मायने में भाग्यशाली थे कि उनकी प्रतिभा खेल में थी, कला में नहीं, जहां नैतिकता की बातें करने वाले लोग ही वर्ग के दरबान बने रहते हैं। खेल, कम-से-कम सिद्धांतत:, सबसे अधिक वस्तुनिष्ठ क्षेत्र है। फिर भी, विशेषाधिकार यहां भी निर्णायक होता है, विशेषकर 80 के दशक में। और अपने समय के हिसाब से शिवरामकृष्णन सही पृष्ठभूमि से आते थे, सही घर, सही क्लब।
यहीं उनकी पीड़ा का सबसे दिलचस्प पहलू उभरता है: एक उच्च जाति का व्यक्ति, जो अपने शुद्धिकरण के क्षण में वही भाषा बोल रहा है, जिसे हम आमतौर पर वंचितों से जोड़ते हैं, न कि विशेषाधिकार प्राप्त लोगों से।
कुछ लोग इसलिए उनकी पीड़ा से बहुत प्रभावित न हों। लेकिन सच यह है कि भारत में गहरे रंग और उच्च जाति का मेल एक विचित्र संकट पैदा करता है। इसका अर्थ है, ऐसा दिखना जैसे आप दबे-कुचले हैं, जबकि आप उस वर्ग से आते हैं जिसने परंपरागत रूप से दबे-कुचलों को दबाया है।
हाशिए पर पड़े लोगों के पास, तमाम अपमानों के बावजूद, एक सांत्वना होती है, वे अपने जैसे लोगों के बीच होते हैं। उनके आसपास हर कोई उसी अनुभव को साझा करता है। और बढ़ती असमानता के इस दौर में, ऊपरी और निचले वर्गों के बीच संपर्क भी घट गया है। लेकिन एक उच्च जाति का व्यक्ति अपने ही वर्ग में कैद रहता है। अगर वह अपने समूह जैसा नहीं दिखता, तो यह विसंगति एक स्थायी यातना बन जाती है।
दरअसल, शिवरामकृष्णन यह कह रहे हैं कि वे एक ऐसे विशेषाधिकार के वाहक हैं, जो ऐसी त्वचा में कैद है जिसे भारतीय किसी और वर्ग से जोड़ते हैं। जब वे 14 वर्ष के थे, चेपॉक स्टेडियम में भारतीय टीम को नेट्स में गेंदबाजी करने गए थे। एक खिलाड़ी ने, जिसका नाम उन्होंने नहीं लिया, उन्हें जूते साफ करने को कहा, यह समझकर कि वे सहायक स्टाफ हैं।
ऐसी घटनाएं भारतीयों के साथ पश्चिम में भी होती हैं। स्वयं मुझे कम-से-कम तीन बार ड्राइवर समझ लिया गया है, केवल इसलिए नहीं कि मैं सडक़ पर खड़ा रहता हूं, बल्कि इसलिए भी कि मैं कैसा दिखता हूं। लेकिन क्या यह त्रासदी है? अधिक से अधिक, यह थोड़ी झुंझलाहट पैदा करता है, खासकर यदि आप किसी को प्रभावित करना चाह रहे हों, पर पीछे मुडक़र देखें तो यह अक्सर हास्यास्पद लगता है।
जब क्कश्वहृ ने मुझे ‘रंग के लेखकों’ के लिए एक पुरस्कार दिया, तो मैंने अपने स्वीकृति भाषण में लिखा, जिसे समारोह में पढ़ा गया, कि उन्हें मेरा रंग पहले जान लेना चाहिए: ‘यह एक अच्छे कैप्पुचीनो का रंग है।’
-मनीष आजाद
नरसिंहमूर्ती की फिल्म ‘ए बिलियन कलर स्टोरी’ का प्रमुख पात्र 11 साल का हरी अजीज अपनी ‘हिन्दू’ मां पार्वती से कहता है कि उसे अपने पिता इमरान अजीज के लिए डर लगता है, क्योंकि उसके पिता ‘मुस्लिम’ हैं। पार्वती अपने बेटे से कहती है कि तुम तो जानते हो कि तुम्हारे पापा धर्म को नहीं मानते। इस पर बेटे का जवाब न सिर्फ मां को बल्कि दर्शकों को भी हैरान कर देता है। वह कहता है- ‘लेकिन ये बात उन्हें नहीं मालूम।’ नंदिता दास की फिल्म ‘मंटो’ में भी ऐसा ही एक दृश्य है। मंटो के दोस्त श्याम के ये कहने पर कि तुम तो शराब पीते हो, नमाज नहीं पढ़ते, तुम कहां के मुसलमान हुए। इस पर मंटो का जवाब हिला कर रख देता है। मंटो कहते हैं- इतना मुसलमान तो हूँ ही कि दंगे में मारा जा सकूं।
हमने ये कैसा भारत बना डाला, जहाँ एक 11 साल का बेटा अपने बाप के दंगे में मारे जाने की संभावना से भयभीत है। फिल्म में बेटे हरी अजीज के इसी भय से यह सवाल पैदा हुआ कि क्या हमने अपनी सारी कविताएं खो दी हैं।
हरी अजीज के ‘मुस्लिम’ पिता और ‘हिन्दू’ मां एक आदर्श वादी दंपति हैं जो एक ऐसी फिल्म बना रहे हैं जिसमे टाइम मशीन से पीछे जाकर प्रेम के माध्यम से भारत-पाकिस्तान विभाजन को रोक दिया गया है। इसमें यह संकेत साफ है कि आज की बहुत सी समस्याओं की जड़ विभाजन में ही हैं।
आज के नफरत भरे माहौल में ऐसी फिल्म बनाने के रास्ते में आने वाली दुश्वारियां और उनके खुद के जीवन मे इस ‘नए असहिष्णु भारत’ के कारण आने वाली मुसीबतों को एक 11 साल के बच्चे की नजर से देखने का प्रयास किया गया है।
फिल्म का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यानी बच्चे हरी अजीज की हत्या तक फिल्म ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ रहती है। चूंकि यहाँ तक फिल्म बच्चे की नजर से है और बच्चे रंगों में अर्थ नही तलाशते। रंगों से (और कपड़ो से) किसी को नही पहचानते। शायद इसीलिए यहां तक फि़ल्म ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ है। और उसके बाद रंगीन हो जाती है। इसकी दूसरी व्याख्या यह भी हो सकती है कि हरी अजीज की हत्या के कुछ पहले ही हरी अजीज के पिता इमरान अजीज का आदर्शवाद लगातार हो रही घटनाओं से चकनाचूर हो जाता है। वे फिल्म बनाने का प्लान कैंसिल करके ‘नार्मल’ जीवन में जाने की योजना बना लेते हैं।
लेकिन हरी अजीज ने मानो अपनी जान देकर अपने पिता के आदर्शवाद को फिर से जगा दिया। इसी आशा को दर्शाने के लिए अंत मे कलर का इस्तेमाल किया गया।
बहुत पहले एक फ्रेंच उपन्यास पढ़ा था- ‘तेराज रॉक’। उसका दर्शन ही यह था कि यदि हम नफरत के आधार पर बंटवारा करते हैं तो यह वहीं नहीं रुकता। यह परमाणु चेन रिएक्शन की तरह लगातार अन्य विभाजनों को भी जन्म देता है।
-सनियारा खान
द वॉयस ऑफ हिन्द रजब फि़ल्म को हमारे देश में दिखाना मना है। कम से कम अभी तक तो मना ही है। अगर इस खबर से आपको हैरानी हुई है तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि हमारे देश में ना जाने कितने बच्चे बच्चियों को पाशविक तरीके से रेप करने की खबरें करीब करीब प्रति दिन आती रहती हैं। क्या किसी को कोई खास फर्क पड़ता है? नहीं न? तो फिर एक दूसरे मुल्क ईरान की, और वह भी एक मुस्लिम बच्ची की मौत से हम क्यों दुखी हो! चाहे उसकी मौत कितनी ही दिल दहला देनेवाली ही क्यों न हो!
यह फि़ल्म गाजा के बच्चों और नागरिकों की दुर्दशा को लेकर विश्व भर के लोगों के ध्यान आकर्षण करने में कामयाब हुई है। यह कौथर बेन हानिया द्वारा निर्देशित एवं ऑस्कर के लिए नामांकित एक डॉक्यूमेंटरी फि़ल्म है। ट्यूनीशिया और फ्ऱांस दोनों देश इस फि़ल्म के निर्माण में सहयोगी हैं। ये फि़ल्म सन 2024 में गाजा में इसराइली हमले के दौरान मारी गई एक छ साल की फिलिस्तीनी बच्ची हिन्द रजब के बारे में है। मौत से पहले अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में वह किस तरह मदद के लिए गुहार लगाती रही उसी को इस फि़ल्म में दिखाया गया है। इस फि़ल्म को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में स्टैंडिंग ओवेशन के साथ ही ग्रैंड ज्यूरी पुरस्कार भी मिला और 98वें अकादमी पुरस्कारों (ऑस्कर) में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फि़ल्म के लिए नामांकित हुई है। इस फि़ल्म से जुड़े हुए लोगों को यह फिल्म बनाने से ट्रंप या न्येतनहू भी रोक नहीं पाए। ये फिल्म ट्यूनीशिया,ब्रिटेन , फ्रांस, इटली जैसे कई देशों में रिलीज हो चुकी है। और तो और, इजरायल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सभी लड़ाइयों में शामिल होने वाले देश अमेरिका में भी लोग बिना रोक टोक के ये फिल्म देख रहे हैं। इन देशों में शायद ट्रंप या न्येतनहू दोनों का डर नहीं है। शायद वहां अभी भी लोकतंत्र जि़ंदा है। खैर, अब हम हिन्द रजब के बारे में थोड़ा और जानने की कोशिश करते हैं। गाजा के पास तेल अल हया नामक एक जगह पर इजरायली हमले के बाद एक काले रंग की गाड़ी में कई लाशों के बीच फंसी हुई छोटी सी बच्ची जिसका नाम हिन्द रजब था ,लगातार पेलेस्टाइन रेड क्रसेंट सोसायटी (पी आर सी एस) नामक एक पेरा मेडिकल सेवा से अपनी जान बचाने के लिए विनती कर रही थी। करीब करीब तीन घंटे तक संघर्ष करने के बाद आखिर में वह अपने आप को नही बचा पाई।
-उमंग पोद्दार
पिछले कुछ दिनों में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो आदेश काफी चर्चा में रहे हैं। एक में हाई कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं है। साथ ही पुलिस ने दोनों लोगों को सुरक्षा देने को कहा।
लिव-इन रिलेशनशिप यानी वो संबंध जिसमें दो लोग बिना विवाह किए साथ में रहते हैं। इस मामले में लिव-इन में रह रहे लडक़े की किसी और लडक़ी से शादी हो रखी थी।
दूसरे फैसले में, हाई कोर्ट ने कहा कि बिना तलाक़ लिए लडक़ा-लडक़ी लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकते।
ये कहते हुए कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा देने से मना कर दिया। इस मामले में लडक़ा और लडक़ी दोनों की किसी दूसरे शख़्स से शादी हो रखी थी।
इन दोनों फैसलों से ये सवाल खड़ा होता है कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हुई हो तो क्या वो किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकता है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो फैसले
20 मार्च को हाई कोर्ट की एक जज की पीठ ने अपना फ़ैसला दिया। जस्टिस विवेक कुमार सिंह के सामने एक लडक़ा-लडक़ी थे जो साथ में रह रहे थे। उन्होंने कोर्ट में ये कहते हुए याचिका डाली थी कि उन्हें जान का खतरा है।
उनकी माँग थी कि कोर्ट लोगों को उनकी जि़ंदगी में दख़ल देने से रोके और साथ ही उन्हें सुरक्षा दे। इस मामले में दोनों लोगों की शादी अलग-अलग लोगों से हो रखी थी।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हो रखी है तो उन्हें किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए अपने पति या पत्नी से तलाक लेना होगा।
कोर्ट ने कहा कि वो सुरक्षा का आदेश तब दे सकते हैं जब उनके किसी क़ानूनी अधिकार को ठेस पहुँच रही हो। बल्कि, इस मामले में उन्होंने कहा कि अगर वो इस कपल को सुरक्षा दें, तो हो सकता है कि वो ‘द्विविवाह (बाइगेमी) के अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं।’
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों लोगों पर किसी तरह की हिंसा होती है तो वे पुलिस के पास जा सकते हैं, और पुलिस उनकी क़ानूनन मदद करेगी।
दूसरी ओर, 25 मार्च को इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ ने ऐसे ही एक मुद्दे पर अलग फ़ैसला दिया। कोर्ट के सामने एक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल आए थे। उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा मांगी थी।
इस मामले में लडक़ी की माँ ने पुलिस में शिकायत दर्ज की थी कि लडक़े ने बहला-फुसला के लडक़ी को अपने साथ रख लिया था। इस मामले में लडक़े की किसी और महिला से शादी हो रखी थी। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि नैतिकता और क़ानून दोनों अपनी जगह है। कोर्ट ने कहा कि एक शादीशुदा व्यक्ति भी किसी और के साथ उनकी मजऱ्ी से रह सकता है।
कोर्ट ने कहा कि लडक़ी बालिग़ है और लडक़े के साथ अपनी मजऱ्ी से रह रही है। सुरक्षा के लिए लडक़ा-लडक़ी पुलिस के पास भी गए थे, लेकिन पुलिस ने कोई क़दम नहीं उठाया था। साथ ही, लडक़ी के माँ-बाप और परिवार वाले इस रिश्ते के ख़िलाफ़ थे और दोनों को अपनी जान का ख़तरा था।
कोर्ट ने उनकी याचिका पर नोटिस जारी किया और कहा कि अभी लडक़ी के परिवार वाले दोनों को किसी तरह की चोट नहीं पहुचायेंगे, ना ही उनके घर में घुसेंगे या उनसे संपर्क बनाने की कोशिश करेंगे। ये भी कहा कि पुलिस की जि़म्मेदारी होगी की वो दोनों को सुरक्षा दे।
दोनों मामलों में कोर्ट के सामने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे लोगों की सुरक्षा का मुद्दा था। एक में कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा दी, और दूसरे में सुरक्षा देने से मना कर दिया।
हालांकि, किसी भी फ़ैसले में कोर्ट ने ये नहीं कहा की लिव-इन रिलेशनशिप ग़ैर-क़ानूनी है। केवल सुरक्षा के लिए अलग-अलग फैसले दिए।
-निक एरिकसन
संयुक्त राज्य अमेरिका और इसराइल ने एक महीने पहले ईरान के खिलाफ जो युद्ध छेड़ा था, वह अब अपनी ही अनिश्चितता में काफ़ी हद तक अनुमानित-सा लगने लगा है।
इसमें भी कोई अचरज नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोशल मीडिया पोस्ट उथल-पुथल को बढ़ा देती हैं और वैश्विक बाज़ारों को हिला देती हैं, भले ही उनका असर थोड़ी देर के लिए ही क्यों न रहे।
लेकिन सिफऱ् ट्रंप की टिप्पणियां ही इस युद्ध की दिशा तय करने में भूमिका नहीं निभा रहीं- इतिहास भी इसमें असर डालता दिखता है।
संघर्ष शुरू होने के बाद के हफ्तों में, विशेषज्ञ हालात को समझने और यह अंदाजा लगाने के लिए कि आगे क्या हो सकता है, लगातार अतीत की घटनाओं का सहारा ले रहे हैं।
कई ऐतिहासिक उदाहरणों में से तीन अहम घटनाएं ख़ास तौर पर सामने आती हैं।
स्वेज संकट
यमन में ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने शुक्रवार को इसराइल पर मिसाइलों की बौछार की- जो ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने के बाद पहली ऐसी कार्रवाई थी और इसके साथ ही इस संघर्ष में एक नया मोर्चा खुल गया। ईरान समर्थित इस ताक़तवर समूह की एंट्री ने दुनिया की अर्थव्यवस्था में और ज़्यादा रुकावटें पैदा करने की आशंका बढ़ा दी है, क्योंकि यह सशस्त्र समूह लाल सागर में जहाज़ों की आवाजाही पर हमला करने की क्षमता रखता है- ख़ास तौर पर स्वेज़ नहर के आस-पास।
यह समूह उस अहम जलमार्ग को पूरी तरह बंद नहीं कर सकता जिसके जरिये आम तौर पर दुनिया का करीब 30 फीसदी कंटेनर ट्रैफिक और सभी तरह के सामान के कुल वैश्विक व्यापार का लगभग 15 फीसदी हिस्सा गुजऱता है- यह सच है, लेकिन यह नहर तक पहुंच में गंभीर बाधा जरूर पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके साथ अगर ईरान की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य में मची उथल-पुथल को भी जोड़ दें, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर बहुत तबाही भरा हो सकता है।
इन हालातों की पृष्ठभूमि में, आज की मध्य-पूर्व जंग के दूरगामी नतीजों को समझने के लिए विश्लेषक 70 साल पहले हुए स्वेज़ संकट की ओर इशारा करते हैं।
1956 में जब मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्देल नासेर ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण किया था, तो उन्होंने दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक पर नियंत्रण हासिल कर लिया था। जवाब में फ्रांस, ब्रिटेन और इसराइल ने उसे वापस छीनने की नाकाम कोशिश की थी।
ट्रंप - और कभी उनके नजदीकी सहयोगी रहे इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के लिए- इतिहास कुछ कड़वी सीख देता है।
बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय संपादक जेरेमी बोवेन कहते हैं, ‘सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने यह दिखा दिया था कि एक वैश्विक ताक़त के रूप में ब्रिटेन का दौर लगभग ख़त्म हो चुका था। प्रथम विश्व युद्ध से मध्य पूर्व पर उसका साम्राज्यवादी दबदबा था, और वह घटना उसके अंत की शुरुआत थी।’
तेहरान और हूती जिस तरह की रणनीतियां आज़मा रहे हैं- यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था की अहम आर्थिक धमनियों तक पहुंच को सीमित करना- उसमें नासेर की प्रतिक्रिया की झलक साफ दिखाई देती है।
अमेरिकी इतिहासकार अल्फ्रेड डब्ल्यू मैक्कॉय बताते हैं कि जब तक एंग्लो फ्रेंच सेनाएं स्वेज़ नहर के उत्तरी सिरे पर उतरीं, नासेर दर्जनों जहाज़ डुबो चुके थे, जिससे नहर बंद हो गई थी और यूरोप को फ़ारस की खाड़ी के तेल क्षेत्रों से जोडऩे वाली जीवन रेखा जैसा रास्ता लगभग कट गया था।
सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध में एक और ख़तरनाक मोर्चा खुल जाने की चिंता के चलते तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइजऩहावर ने भी दख़ल दिया और ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
मैक्कॉय लिखते हैं, ‘उस समय तक ब्रिटेन पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लग चुके थे, उसकी मुद्रा ढहने के कगार पर थी, उसकी साम्राज्यवादी शक्ति का रुतबा हवा हो चुका था और उसका वैश्विक साम्राज्य ख़त्म होने की राह पर था।’
हालांकि, बोवेन कहते हैं कि आज के संघर्ष की उससे पूरी तरह तुलना नहीं की जा सकती, ‘मैं अमेरिका की मौजूदा ताकत की तुलना दूसरे विश्व युद्ध के बाद वाले ब्रिटेन से सीधे तौर पर नहीं कर रहा हूं। लेकिन मैं यह कह रहा हूं कि हर ताक़तवर देश का उत्थान भी होता है और पतन भी। और चीन के उभार का सामना कर रहे अमेरिका के संदर्भ में अगर भविष्य में लोग अमेरिकी गिरावट की बात करने लगें- तो इतिहासकार इस युद्ध को शायद उसी रास्ते का एक पड़ाव मानें; एक ऐसी जंग, जिसमें नतीजों पर ज़्यादा विचार किए बना कूदा गया था।’
संभावित नतीजों को समझने के लिए, पिछले 70 वर्षों में इतिहास ने जो और सबक दिए हैं, उन पर नजऱ डालना उपयोगी होगा।
-सिद्धार्थ ताबिश
सरकारें तुम्हें शादी करने और बच्चे पैदा करने के लिए उकसाती हैं। साहित्यकार तुम्हें प्रेम और परिवार के मायने समझाते हैं। तुम धड़ाधड़ शादी करके बच्चे पैदा करते हो क्योंकि तुम्हें ये समझाया गया है कि बिना बच्चों के जीवन बेकार है। बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं। और जो ये तुम्हें समझाते हैं वो बड़े बड़े अस्पताल खोलते हैं और तुम्हारा इंश्योरेंस करते हैं ताकि तुम्हें बेहतर इलाज मिले और अच्छी देखभाल हो.. फिर अगर उन्हें ही तुम्हारी देखभाल करनी थी तो बच्चे क्या तुमने सिर्फ तुम्हें अस्पताल भेजने के लिए पैदा किए थे?
अब घरों में तुम्हारे झाड़ू पोछा करने वाली नौकरानी आती है, खाना बनाने वाली भी आती है, तुम्हें देखकर भी समझ नहीं आता है कि तुम्हारे पास बस सिर्फ पैसा होना था और तुमने जो सारा जीवन बच्चों को पालने, पढ़ाने, शादी करने और उन्हें सेटल करने में बर्बाद किया और उनपर पैसा खर्च किया, उस से तुम्हारा बुढ़ापा दस नौकर रख के बिंदास कट सकता था?
मैं ये नहीं कहता कि तुम बच्चे न पैदा करो और शादी न करो मगर इस व्यवस्था को ‘अनिवार्य’ व्यवस्था क्यों समझ कर नशे में जिए जा रहे हो?
बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं इस मानसिकता से बाहर तो आओ कम से कम.. क्योंकि इन्हीं बच्चों के लिए एलपीजी और पेट्रोल की लाइन में तुम्हें लगना पड़ता है। तुम्हारा जीवन नर्क बना हुआ है बच्चों को पालने, पोसने, पढ़ाने और शादी करने में। तुम 18 छोड़ो 45 साल के बच्चे को भी अपने पास चिपकाए रखना चाहते हो तो ये परिवार की व्यवस्था तुम्हारे लिए है ही नहीं.. ये उनके लिए होती है जो अपने 18 साल के बच्चे को घर से लात मारकर भगा देते हैं और स्वयं जीते हैं और उसे जीने देते हैं। परिवार की अवधारणा तुम भारतीयों के लिए है ही नहीं क्योंकि तुम्हारी समझ ही इतनी विकसित नहीं हो पा रही है किस उम्र में तुम्हें क्या करना है
शादी की पक्की अवधारणा तुमने ब्रिटिश लोगों से सीखी.. दहेज लेने और देने की अवधारणा तुम्हें ब्रिटिश से सीखी। लडक़ा पैदा करने का चलन तुमने ब्रिटिश से सीखा.. मगर वो ये सब तुमको सिखा के आगे बढ़ गए, उनका समाज विकसित हो गया और तुम अभी भी कोर्ट में माई लॉर्ड माई लॉर्ड करते घूम रहे हो और अपने बच्चों को छुट्टी के एप्लीकेशन में भी ‘आई बेग टू से’ लिखवाते हो। शादी, कुंवारापन, बच्चे, और बच्चे बुढ़ापे का सहारा ये ब्रिटिश टाइम के विक्टोरियन ज़माने की चीज़ें हैं.. महारानी विक्टोरिया के समय शादी के बिना किसी स्त्री को छूना पाप था और शादी करना अनिवार्य था.. भारत में ये सब नहीं था.. तुम अंग्रेजों की हज़ारों साल पुरानी अवधारणा को कॉपी किए पड़े हो और इस से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हो
तुम इस्लामिक और ब्रिटिश अवधारणाओं और कानून के बीच फंसी एक अजीब सी विचित्र प्रजाति बन चुके हो.. अंग्रेजों ने आईएएस और पीसीएस बनाने के लिए इतना मुश्किल इम्तेहान जान कर बनाया था ताकि ये नौकरी भारतीयों को न मिले.. कोई एक पास कर जाता था तो इसे ये नौकरी देते थे और बाकी अपने अंग्रेजों को ये बिना किसी इम्तेहान के अधिकारी बनाते थे.. तुम आज भी अपने बच्चों को अंग्रेजों की तजऱ् पर वही मुश्किल एग्जाम पास करवाने के लिए मरे जा रहे हो और तुम्हें अभी भी ये लगता है कि किसी को अधिकारी बनने के लिय दुनिया की सारी किताबें रट कर एग्जाम पास करना चाहिए? कोई अधिकारी इतिहास की किताबें रट कर आया है तो वो एक जिले को चलाने के क़ाबिल हो गया है?


