राजपथ - जनपथ

Date : 29-Apr-2019

हिंदुस्तान में लोगों को जितनी पुरानी याद है, उसमें अफवाहें फैलाने के लिए बीबीसी का नाम सबसे अधिक लिया जाता था क्योंकि रेडियो बीबीसी को सबसे भरोसेमंद माना जाता था। हिंदुस्तान में हाल के बरसों तक रेडियो पर सरकार का एकाधिकार था, और वैसे में भरोसेमंद खबरों के लिए लोग बीबीसी सुना करते थे। आज भी जब दर्जनों रेडियो-टीवी चैनल हो गए हैं, हजारों प्रमुख समाचार वेबसाईटें हो गई हैं, तब भी बीबीसी का नाम अफवाह फैलाने के लिए दिलचस्प तरीके से लिया जा रहा है। 

अभी वॉट्सऐप पर एक संदेश आया जिस पर बीबीसी का एक वेबसाईट लिंक भी दिया हुआ था, और नीचे लिखा गया था कि सीआईए का एक सर्वे बताता है कि भाजपा सीटें खोने जा रही हैं, और 2019 में सरकार नहीं बना सकेगी। इसमें एनडीए और यूपीए की सीटों के अलग-अलग आंकड़ों सहित तमाम पार्टियों के अंदाज भी लिखे गए हैं, और इस पोस्ट में ऊपर और नीचे दोनों तरफ बीबीसी का एक सच्चा लिंक भी पोस्ट किया गया है। 

जब इस लिंक पर जाएं तो बीबीसी का पेज खुलता भी है लेकिन जैसा कि किसी भी वेबसाईट के साथ होता है, उस पेज पर किसी खबर को ढूंढना उतना आसान नहीं होता। ऐसे में पहली नजर में आम लोग यह मान लेते हैं कि वेबसाईट तो सही खुल रही है, और जानकारी भी सही ही होगी। लेकिन उस वेबसाईट पर ऐसी कोई जानकारी नहीं है जो कि इस वॉट्सऐप मैसेज में इस लिंक के साथ लिखी गई है। तकरीबन तमाम लोग बिना लिंक खोले भी इस बात पर अपनी पसंद-नापसंद के मुताबिक भरोसा करेंगे, या नहीं करेंगे। जो गिनेचुने लोग लिंक खोलेंगे, वे भी लिंक को सही पाएंगे। आजादी को पौन सदी हो रही है, लेकिन इस देश में अफवाह और झूठ फैलाने के लिए बीबीसी का लेबल आज भी पहली पसंद बना हुआ है।


नेता से जनता ने पूछा 
नेता - हाँ. जी 
जनता - क्या आप देश को लूट खाओगे ?
नेता - बिल्कुल नहीं.
जनता - हमारे लिए काम करोगे ?
नेता - हाँ. बहुत.
जनता - महगांई बढ़ाओगे ?
नेता - इसके बारे में तो सोचो भी मत
जनता - आप हमें जॉब दिलाने में मदद करोगे ?
नेता - हाँ. बिल्कुल करेंगे.
जनता - क्या आप देश में घोटाला करोगे ?
नेता - पागल हो गए हो क्या बिलकुल नहीं.
जनता - क्या हम आप पर भरोसा कर सकते हैं ?
नेता - हाँ 
जनता - नेताजी ...
चुनाव जीतकर नेताजी वापस आये
अब आप, नीचे से ऊपर पढ़ो

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 28-Apr-2019

समुद्र सिंह के यहां छापेमारी से विशेषकर आबकारी अफसर-कर्मियों में खुशी की लहर है। समुद्र सिंह रिटायर होने के बाद 9 साल तक संविदा पर रहे। रमन सरकार में उनकी हैसियत विभागीय सचिव से कहीं ज्यादा रही है। वे अमर अग्रवाल के बेहद करीबी रहे हैं। समुद्र सिंह को फंड जुटाने में भी माहिर माना जाता रहा है। यही वजह है कि  हर कोई उनके आगे नतमस्तक रहा। 

सुनते हैं कि समुद्र सिंह के दबाव के चलते ही विभाग में एडिशनल कमिश्नर का पद स्वीकृत नहीं हो पाया था और कई अफसरों का प्रमोशन भी रूका था। अब जब उनके यहां छापेमारी हो रही है, तो उनसे प्रताडि़त अफसर काफी खुश हैं। चर्चा तो यह भी है कि विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के कई बड़े नेताओं को उनकी वजह से परेशानी का सामना करना पड़ा था। 

किस प्रत्याशी के यहां पेटी भेजना है, समुद्र सिंह ने रमन सरकार के रणनीतिकारों के साथ बैठक कर तय की थी। हाल यह रहा कि सत्तारूढ़ पार्टी के ही विरोधी खेमे के कई नेताओं को मतदाताओं को लुभाने के लिए अन्य स्त्रोतों से शराब का इंतजाम करना पड़ा। ईओडब्ल्यू की टीम ने समुद्र सिंह से जुड़ी फाइलें खंगालनी शुरू की है, तो देर सबेर अमर के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। अब एक दिक्कत यह भी है कि समुद्र सिंह के सबसे करीबी रहे एक अफसर जो कि पिछली सरकार में एक बड़ी कमाऊ जगह पर जमे रहे, और जिनका दावा सत्ता से एक रिश्तेदारी का था, वे आज एक बड़े ताकतवर मंत्री के ओएसडी बने बैठे हैं। उस जगह पर रहकर वे एसीबी के छोटे अफसरों को तो प्रभावित करने की हालत में हैं ही। यह भी हैरानी की बात है कि पिछली सरकार के सबसे चहेते और सबसे भ्रष्ट अफसरों में से कुछ किस तरह, कितनी आसानी से नई सरकार में कमाऊ जगहों पर टिके हुए हैं, या एक कमाऊ जगह से दूसरी कमाऊ जगह पर चले गए हैं।


Date : 27-Apr-2019

पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी दंतेवाड़ा में जमीन की अदला-बदली के पुराने प्रकरण में फंस गए हैं। प्रकरण की जांच पर ऐसा माना जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट से रोक लगी है। लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में लगाई गई एक विशेष याचिका पर अपने पिछले आदेश पर यह स्पष्टीकरण दिया है कि उसने जांच पर कभी रोक नहीं लगाई थी। प्रकरण कुछ इस तरह का है कि चौधरी ने दंतेवाड़ा कलेक्टर रहते कलेक्टोरेट के समीप करीब साढ़े तीन एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। इसके एवज में भू-स्वामियों को बाजार के समीप जमीन का आबंटन कर दिया गया। अदला-बदली के तहत सौंपी गई जमीन पर दंतेवाड़ा के व्यापारियों के लिए कॉम्पलेक्स का निर्माण प्रस्तावित था। इसकी शिकायत पर स्थानीय लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। जिस पर हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार की आशंका जताते संबंधित अफसरों के खिलाफ जांच के आदेश जारी किए थे। कोर्ट का फैसला आता तब तक कॉम्पलेक्स का निर्माण हो चुका था और कई व्यापारियों ने कॉम्पलेक्स में दुकानें खरीदी थीं। बाद में कुछ व्यापारी सुप्रीम कोर्ट चले गए और सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश 20 फरवरी 2017 को दिया था, उसे ऐसा मान लिया गया था कि मानो जांच पर सुप्रीम कोर्ट से रोक लग गई। दूसरी तरफ रमन सरकार के इस लाड़ले कलेक्टर को बचाने की कोशिश भी हुई। जांच के लिए पहले रिटायर्ड जज (अब लोकायुक्त) जस्टिस टी पी शर्मा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। कमेटी अपना प्रतिवेदन भी नहीं दे पाई थी कि सुप्रीम कोर्ट से रोक का हल्ला हो गया। नौकरी छोड़कर राजनीति में आ चुके ओपी चौधरी की आगे की राह आसान नहीं है क्योंकि सरकार बदल चुकी है। उनके खिलाफ कई और प्रकरण सामने आ रहे हैं। अब जब यह साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट से जांच पर रोक कभी लगी ही नहीं थी, तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती है। 


Date : 26-Apr-2019

निलंबित डीजी मुकेश गुप्ता के लिए गुरुवार का दिन अच्छा नहीं रहा। जिस दफ्तर के कभी मुखिया थे वहां आरोपी की हैसियत से पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ा। गुप्ता रमन सरकार में बेहद ताकतवर रहे, लेकिन सरकार बदलते ही उनके दुर्दिन शुरू हो गए। उनके खिलाफ प्रकरणों की जांच वे ही अफसर कर रहे हैं जो कि उनके करीबी थे। उन्हें पूछताछ के लिए टीआई स्तर के अफसर अलबर्ट कुजूर के सामने हाजिर होना पड़ा। 

पूछताछ के दौरान ईओडब्ल्यू के एसपी इंदिरा कल्याण एलेसेला की मौजूदगी पर मुकेश गुप्ता आपत्ति की, लेकिन उनकी आपत्ति अमान्य कर दी गई। चर्चा है कि उन्होंने ज्यादातर सवालों का जवाब नहीं में दिया। उन्होंने अफसर को कोर्ट में घसीटने तक की बात कह दी। इन सबके बावजूद जांच अफसरों पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। पूरे बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग भी हुई है। ताकि कोर्ट में यह बताया जा सके कि गुप्ता जांच में किस तरह सहयोग कर रहे हैं। खैर, जांच जैसे-जैसे बढ़ेगी, मुकेश गुप्ता की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 

अब सरकार में बैठे कुछ लोगों ने यह नियम खंगालना शुरू किया है कि क्या निलंबित अफसर को सुरक्षा कर्मचारी, सरकारी गाड़ी, और पुलिस का झंडा इस्तेमाल करने की पात्रता है? लोकतंत्र में सरकार ही अगर किसी के खिलाफ हो जाए, तो उसके पास बचने की गुंजाइश कम ही बचती है। फिर भी मुकेश गुप्ता को ऐसा लड़ाकू अफसर माना जाता है जो एसपी रहते हुए भी डीजीपी से झगड़ा मोल ले चुके थे। अविभाजित मध्यप्रदेश में वे उज्जैन के एसपी थे, और वहां प्रवास पर आए डीजीपी के बेटे ने जब एक डीएसपी से बदतमीजी की, तो मुकेश गुप्ता ने एक जूनियर एसपी रहते हुए भी डीजीपी के बेटे को थप्पड़ मारी थी। और उसी का नतीजा था कि उनके खिलाफ जांच कर जो सिलसिला उसी वक्त शुरू हुआ, तो वह आज तक कभी खत्म हुआ ही नहीं। वे एसपी से बढ़ते-बढ़ते इस्पेशल डीजी हो गए, लेकिन पूरी सरकारी नौकरी में एक भी दिन बिना जांच के नहीं गुजरा। इसलिए वे कल जब ईओडब्ल्यू पहुंचे, तो मीडिया के सामने पुराने तेवरों से ही बात की।

भाजपा बड़े भरोसे में है...
प्रदेश में आखिरी चरण के मतदान के रूझानों से भाजपा के रणनीतिकार काफी खुश हैं। पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि प्रदेश की 11 सीटों में से कम से कम 6 सीटों पर जीत हासिल होगी। यह सब तब हो रहा है जब पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में काफी कम खर्च किया। कार्यकर्ताओं ने भी बहुत ज्यादा मेहनत नहीं की, बावजूद इसके मोदी फैक्टर के चलते विशेषकर शहरी इलाकों में भाजपा के पक्ष में एकतरफा माहौल रहा।

दो दिन पहले पार्टी के बड़े नेताओं ने मतदान के बाद नतीजों की संभावनाओं  पर लंबी चर्चा की। बैठक में विधानसभा के पराजित प्रत्याशी भी थे। पराजित प्रत्याशियों का दर्द यह था कि विधानसभा चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए, पैसा पानी की तरह बहाया, फिर भी चुनाव हार गए।  लोकसभा चुनाव में किसी तरह का प्रबंधन नहीं किया गया। ज्यादातर प्रत्याशियों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। बावजूद इसके जीत के आसार दिख रहे हैं। पार्टी नेता इस बात को लेकर एकमत थे कि प्रबंधन के बूते पर चुनाव नहीं जीते जा सकते। 

अच्छे दिन आ ही गए...
फेसबुक पर आम हिन्दुस्तानियों को गोरी चमड़ी की एक विदेशी महिला की तरफ से दोस्ती की गुजारिश आए, तो लोग आंखें बंद करके उसे मंजूर करते चलते हैं। इसके साथ-साथ उसकी पोस्ट की हुई एकाध फोटो पर दनादन लाईक भी करते चलते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर एक फिरंगी नाम के साथ फेसबुक पर दिखी जिसने इस अखबारनवीस को फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजी थी। उसने अपने आपको छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के दिशा कॉलेज में पढ़ा हुआ बताया है, कांग्रेस से जुड़ा हुआ बताया है, और एक छोटे से शहर, या कस्बे में रहना बताया है।

ऐसे तमाम फर्जी फेसबुक अकाऊंट की तरह इस पर भी महज एक फोटो पोस्ट है, और लोग कूद-कूदकर उसे लाईक कर रहे हैं, उस पर गिने-चुने दो-चार शब्दों वाली अंग्रेजी लिख रहे हैं। मजे की बात यह है कि पहली नजर में ही फर्जी दिखने वाले इस फेसबुक अकाऊंट के 487 दोस्त भी हैं, और जाहिर है कि ये सारे के सारे पुरूष ही हैं। हिन्दुस्तानी आदमियों के बीच विदेशी गोरी महिला बनकर उनको रूझाना, फंसाना सबसे ही आसान है। एक अच्छा चेहरा अगर दोस्ती की गुजारिश भेजे, तो हर किस्म के लोग मान बैठते हैं कि उनके अच्छे दिन आ ही गए हैं...।

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 25-Apr-2019

अंतागढ़ टेपकांड की एसआईटी जांच चल रही है। टेपकांड के आरोपी राजेश मूणत, डॉ. पुनीत गुप्ता को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। चंडीगढ़ स्थित फोरेंसिक लैब ने इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर परीक्षण करने से इंकार करने पर एसआईटी को झटका लगा है। फोरेंसिक लैब ने अंतागढ़ टेपकांड में जिन 4 सीडी और 2 पेन ड्राइव समेत अन्य ऑडियो और वीडियो को परीक्षण के लिए भेजा गया है, वह डुप्लीकेट कॉपी है, इसलिए इन सीडी और पेन ड्राइव की जांच नहीं हो सकती। जांच कराने ओरिजनल ऑडियो-वीडियो देना होगा। खैर, एसआईटी प्रकरण को पुख्ता करने के लिए और सबूत जुटाने में लगी है। 

सुनते हैं कि प्रकरण पर बारीक नजर रखने वाले कई लोग जांच से संतुष्ट नहीं है। एक कांग्रेस नेता ने इस सिलसिले में पिछले दिनों सीएम से मुलाकात भी की थी और उन्हें बताया कि कुछ अदृश्य शक्तियां आरोपियों को बचाने में जुटी है। यही वजह है कि जांच किसी किनारे नहीं पहुंच पा रही है और एसआईटी को झटका लग रहा है। चूंकि अब प्रदेश में लोकसभा के चुनाव निपट गए हैं, ऐसे में इन मामलों पर सरकार बारीक नजर रहेगी। 

चुनाव और जोगी के लोग
जोगी पार्टी ने प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतारे थे। पार्टी के विधायकों ने अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार कांग्रेस या भाजपा को सपोर्ट किया। खुद जोगी मरवाही में तटस्थ रहे, लेकिन इसका फायदा कोरबा में कांग्रेस प्रत्याशी ज्योत्सना महंत को मिला। वैसे जोगी ने भाजपा प्रत्याशी को भी आशीर्वाद दिया था। अलबत्ता, डॉ. रेणु जोगी ने कोटा में अपने सभी समर्थकों को कांग्रेस के पक्ष में काम करने के लिए कहा। जबकि देव्रवत पहले भाजपा के साथ थे, बाद में वे बदल गए और कांग्रेस के पक्ष में काम किया। 

दूसरी तरफ, बलौदाबाजार के पार्टी विधायक प्रमोद शर्मा ने आखिरी दिनों में चुप्पी साध ली थी। इससे भाजपा को फायदा हुआ। इन सबसे अलग जोगी पार्टी के विधायक दल के नेता धरमजीत सिंह ने अलग तरीके से प्रचार किया। वे भाजपाईयों की भीड़ देखते ही भाजपा को वोट देने की अपील कर देते थे। कांग्रेसियों की भीड़ में कांग्रेस को सपोर्ट करने के लिए कह देते थे। उनकी नीति जिधर बम, उधर हम, वाली रही। 

रामविचार की मजबूरी
राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम ने सरगुजा में पार्टी प्रत्याशी रेणुका सिंह के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। वैसे तो सरगुजा जिले की राजनीति में रेणुका, रामविचार की विरोधी मानी जाती है। बावजूद इसके रामविचार की मेहनत को देखकर कई लोगों को आश्चर्य भी हुआ। 

सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद सामरी और रामानुजगंज से पार्टी के पराजित प्रत्याशियों ने पार्टी हाईकमान से मुलाकात की थी और उन्हें अपनी हार के लिए रामविचार नेताम को जिम्मेदार ठहराया। चूंकि विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में पार्टी की बुरी हार हुई। ऐसे में शिकायतों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन लोकसभा प्रत्याशी की घोषणा के बाद रामविचार को सरगुजा सीट जीताने के लिए जिम्मेदारी दी गई। अब रामविचार के पास पिछली गलतियों को सुधारने के साथ-साथ अपना कद बढ़ाने का भी मौका था। उन्होंने इसके लिए जमकर मेहनत की। अब परिणाम पक्ष में आ जाते हैं, तो रामविचार का कद बढऩा स्वाभाविक है। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 24-Apr-2019

लोकसभा की 7 सीटों पर मंगलवार को मतदान हुआ। मतदान के बाद जीत के अपने-अपने दावे हैं। पहले दो चरण के चुनाव में भाजपा के रणनीतिकारों के चेहरे मुरझाए हुए थे, लेकिन बाद की लोकसभा सीटों में मतदान के बाद भाजपाई खेमे में खुशी की लहर है। पार्टी के रणनीतिकारों को इस चुनाव में विधानसभा चुनाव से बेहतर नतीजे की उम्मीद है। टिकट घोषणा के बाद पहले मुकाबला एकतरफा कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा था, लेकिन तीसरे चरण के मतदान में शहरी इलाकों में मोदी-इफैक्ट साफ नजर आया। हाल यह रहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस दुर्ग सीट जीतने में कामयाब हो गई थी, लेकिन इस बार दुर्ग का किला बचा पाना मुश्किल दिख रहा है। 

दुर्ग में भाजपा पलड़ा भारी
दुर्ग के वैशाली नगर, भिलाई, दुर्ग शहर और ग्रामीण के कई इलाकों में भाजपा के पक्ष में वातावरण दिखा। विधानसभा चुनाव में नवागढ़ सीट से कांग्रेस को सर्वाधिक वोटों से जीत हासिल हुई थी, लेकिन लोकसभा में कांग्रेस को यहां से बढ़त मिलना मुश्किल दिख रहा है। भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल को पार्टी के भीतर पार्टी की राष्ट्रीय नेत्री सरोज पाण्डेय का धुर विरोधी माना जाता है। ऐसे में विजय को जीत दिलाने के लिए सरोज विरोधियों ने जमकर पसीना बहाया, पे्रम प्रकाश पाण्डेय कल शाम तक सड़क पर रहे। जबकि कांग्रेसी दिग्गज आपस में ही उलझे रहे। कुल मिलाकर भाजपा यहां उम्मीद से है।
बिलासपुर-रायपुर में नतीजे...
बिलासपुर और रायपुर सीट पर मोदी फैक्टर देखने मिला। मगर, बिलासपुर के कांग्रेस प्र्रत्याशी अटल श्रीवास्तव और रायपुर कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद दुबे प्रबंधन के मामले में भाजपा प्रत्याशियों से बेहतर नजर आए। बिलासपुर में अटल श्रीवास्तव को जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी के चुनाव मैदान में नहीं होने से फायदे की उम्मीद थी। जोगी कांग्रेस के कई नेता कांग्रेस में शामिल भी हो गए थे। एक तरह से जोगी कांग्रेस का कांग्रेस के लिए समर्थन दिख रहा था बाद में जोगी कांग्रेस के विधायक दल के नेता धरमजीत सिंह और अन्य से अपेक्षाकृत समर्थन नहीं मिला। जोगी समर्थक सीएम भूपेश बघेल के उस बयान से नाराज रहे जिसमें उन्होंने कह दिया था कि जोगी के लिए कांग्रेस के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। बिलासपुर शहर और आसपास के इलाकों में भाजपा के पक्ष में माहौल रहा। फिर भी यहां अनुसूचित जाति वोटों के सहारे कांग्रेस उम्मीद से है। 
राजधानी में मोदी, आसपास...
रायपुर में भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनी है। शहर की तीन सीटों और आसपास के इलाकों में मोदी फैक्टर मजबूत दिखा। जबकि रायपुर ग्रामीण, धरसींवा, अभनपुर और भाटापारा के ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के पक्ष में वातावरण नजर आया। अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा गिरे हैं। ऐसे में यहां भी कांग्रेस को कुछ उम्मीदें हैं। हालांकि भाजपा खेमे के एक पुराने जानकार ने इस पूरे चुनाव में काम करने के बाद बीती शाम दावा किया कि भाजपा की जीत यहां से एक लाख वोटों से होने जा रही है। अब लोकतंत्र में दावों का हक तो हर किसी का रहता है, मतगणना के दिन तक।
हमेशा की तरह त्रिकोणीय
जांजगीर-चांपा लोकसभा में हमेशा की तरह इस बार भी त्रिकोणीय मुकाबला रहा। कांग्रेस और बसपा के बीच अजा वोटों के बंटवारे से भाजपा को हमेशा फायदा मिलता रहा है। इस लोकसभा में बसपा के दो विधायक भी हैं। मगर कांग्रेस ने यहां काफी मेहनत की थी। भाजपा में खींचतान काफी देखने को मिली। यही वजह है कि इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस उम्मीदवार ज्यादा बेहतर स्थिति में नजर आए। 
सरगुजा में सत्ता बेअसर?
सरगुजा और रायगढ़ में मोटे तौर पर कांटे की टक्कर रही है। सरगुजा से पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पार्टी ने उनकी पसंद पर प्रेमनगर के विधायक खेलसाय सिंह को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में यहां की सभी सीटों पर जीत हासिल हुई थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में स्थिति कुछ हद तक अनुकूल नहीं रही है। वजह यह थी कि कांग्रेस के नेता अपेक्षाकृत ज्यादा सक्रिय नहीं थे। फिर भी सीतापुर, प्रतापपुर और अंबिकापुर के उदयपुर और लखनपुर में कांग्रेस के पक्ष में माहौल नजर आया। जबकि भाजपा प्रत्याशी की स्थिति प्रेम नगर, भटगांव और रामानुजगंज में ज्यादा बेहतर रही है। भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह को काफी हद तक मोदी फैक्टर का फायदा मिला है। यही वजह है कि यहां जीत-हार का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन प्रदेश की राजनीति के एक जानकार ने कल रात यह दावा किया है कि रेणुका सिंह एक लाख से अधिक लीड से सांसद बनने जा रही हैं। लोगों का कहना है कि सरगुजा में विधानसभा चुनाव में वोटर यह मानकर चल रहे थे कि कांगे्रस की सरकार बनेगी और टीएस सिंहदेव मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन वैसा हुआ नहीं और निराश जनता इस बार भाजपा की ओर गई है। दूसरी तरफ दुर्ग सीट के बारे में भी यही बात कही जा रही है कि वहां का साहू समुदाय ताम्रध्वज साहू के सीएम बनने की उम्मीद कर रहा था, और वह भी निराश हुआ है।
रायगढ़ का फैसला कम वोटों से?
दूसरी तरफ, रायगढ़ में जशपुर राजघराने ने भाजपा प्रत्याशी गोमती साय के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया। रायगढ़ शहर में तो काफी हद तक मोदी फैक्टर दिखा, तो ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को फायदा दिख रहा है। सारंगढ़, धरमजयगढ़, लैलूंगा और पत्थलगांव में कांग्रेस प्रत्याशी की स्थिति मजबूत नजर आई। जबकि जशपुर और कुनकुरी में भाजपा के पक्ष में माहौल नजर आया। कुल मिलाकर यहां भी हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। 
जोगी के मैदान में न रहने से...
कुछ जानकार लोगों का यह भी मानना है कि इस बार जोगी कांगे्रस मैदान से पूरी तरह बाहर ही नहीं थी, उनके बहुत से समर्थक-समुदाय इस असमंजस में भी है कि जोगी परिवार कांगे्रस में जाने को एक पैर पर खड़ा है। ऐसे में जोगी के समर्थक समुदायों ने कांगे्रस को वोट देना बेहतर समझा है। कल शाम एक टीवी चैनल, आईएनएच पर एक भूतपूर्व भाजपाई वीरेन्द्र पांडेय का यह अंदाज सामने आया कि भाजपा को प्रदेश में दो, या अधिक से अधिक तीन सीटें मिल सकती हैं, बाकी सारी सीटें कांगे्रस को मिलेंगी।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 23-Apr-2019


वैसे तो, रमन सिंह ने भाजपा के लिए सबसे ज्यादा प्रचार किया, लेकिन उनकी सभाओं में पहले जैसी भीड़ नहीं दिखी। पूर्व सीएम, नान-डीकेएस में भ्रष्टाचार के प्रकरणों पर खुद आगे आकर सफाई दे रहे थे या फिर पलटवार कर रहे थे, उससे भी पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता सहमत नहीं थे। उनका सोचना था कि रमन सिंह जैसे बड़े नेता का सीधा रिएक्शन अच्छा नहीं है और क्योंकि इससे मोदी फैक्टर कमजोर हो रहा था। रायपुर में तो बैनर-पोस्टर में उनकी तस्वीर गायब थी। इन सबके बावजूद उन्होंने सभी प्रत्याशियों के पक्ष में रोड शो किया। पार्टी प्रत्याशी जिन दो नेताओं से परहेज कर रहे थे, उनमें नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय भी थे। 

धरम कौशिक ने बिलासपुर में तो प्रचार किया, लेकिन वे अगल-बगल की सीट पर भी प्रचार के लिए जाना चाह रहे थे। सुनते हैं कि एक प्रत्याशी ने तो कंट्रोल रूम में फोन कर अपने क्षेत्र में उनका कोई कार्यक्रम नहीं रखने का आग्रह कर दिया। सरोज पाण्डेय भी यहां चुनावी सभा संबोधित करना चाह रही थीं, लेकिन किसी भी क्षेत्र से उनकी सभा कराने की मांग नहीं आई। वे दुर्ग के कुछ इलाके में ही सीमित रही। एक चर्चा यह भी है कि वे महाराष्ट्र की भाजपा प्रभारी हैं और वहीं पर अधिक दिलचस्पी ले रही हैं क्योंकि जब राज्यसभा में दुबारा जाने की नौबत आएगी, तो छत्तीसगढ़ भाजपा उन्हें नहीं भेज पाएगी, और महाराष्ट्र से संभावना निकल सकती है। कुल मिलाकर विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद पीएम नरेन्द्र मोदी की सभा से कुछ हद तक कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ और प्रदेश में मोदी फैक्टर से माहौल बना। अब जितनी भी सीटें मिलेंगी वह मोदी फैक्टर पर ही मिलेगी क्योंकि सभी प्रत्याशी नए थे और पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। 

कल से बाहर
लोकसभा चुनाव निपटने के बाद भाजपा-कांग्रेस के बड़े नेता दूसरे राज्यों में प्रचार के लिए जाएंगे। मप्र के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने बृजमोहन अग्रवाल को फोन कर भोपाल में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के प्रचार का न्यौता दिया है। पूर्व मंत्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय और अजय चंद्राकर पीएम नरेन्द्र मोदी के प्रचार के लिए वाराणसी जा सकते हैं। इसके अलावा राजेश मूणत अपने गृह जिले रतलाम में पार्टी प्रत्याशी के प्रचार के लिए जाएंगे। 

कांग्रेस से सबसे ज्यादा मांग सीएम भूपेश बघेल की है। भूपेश यूपी और बिहार में चुनाव प्रचार के लिए जाने वाले हैं। इसके अलावा पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव, रविन्द्र चौबे और मोहम्मद अकबर भी प्रचार के लिए मध्यप्रदेश जा सकते हैं। रविन्द्र चौबे अविभाजित मप्र में एक बार दिग्विजय सिंह के चुनाव संचालक भी रह चुके हैं। मोहम्मद अकबर का चुनाव प्रबंधन में कोई तोड़ नहीं है। यही वजह है कि इन नेताओं का पार्टी पूरा उपयोग करना चाह रही है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 22-Apr-2019

महासमुंद लोकसभा सीट में जीत को लेकर कांग्रेस और भाजपा के अपने-अपने दावे हैं। इन सबके बीच कांग्रेस में कुछ जगहों पर भीतरघात की शिकायतें भी आई है। सुनते हैं कि धमतरी में एक पूर्व विधायक ने कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ जमकर काम किया। पूर्व विधायक की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि कांग्रेस प्रत्याशी से जुड़े लोगों ने विधानसभा चुनाव में उनके खिलाफ काम किया था। इसका बदला उन्हें लेना था, सो ले लिया। कांग्रेस प्रत्याशी अभी खामोश हैं। क्योंकि भीतरघात के बावजूद नतीजे अपने पक्ष में आने की संभावना देख रहे हैं। यदि चुनाव परिणाम पक्ष में नहीं आए, तो पार्टी में गदर मच सकता है। फिलहाल, लोग चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। 
चुनावी नतीजे और मंत्रिमंडल?
लोकसभा चुनाव में सरकार के मंत्रियों की भी परीक्षा होगी। सुनते हैं कि दो मंत्रियों के खुद के विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी की स्थिति अच्छी नहीं है। एक ने तो मंत्री बनने के बाद अपने विधानसभा क्षेत्र से ही दूरियां बना ली थी। उन्होंने क्षेत्र में जाना ही छोड़ दिया था। अब जब वे पार्टी प्रत्याशी के प्रचार के लिए जा रहे हैं, तो प्रमुख कार्यकर्ता उनके साथ नहीं आ रहे हैं। दूसरे मंत्री को लेकर यह बात सामने आ रही है कि वे पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मेहनत नहीं कर रहे हैं। मेहनत क्यों नहीं कर रहे हैं, यह पार्टी के लोगों को समझ नहीं आ रहा है। जबकि प्रत्याशी भी उनकी अपनी पसंद का है। इन सब पर पार्टी हाईकमान की निगाह है। चर्चा है कि दो अन्य मंत्रियों के अपने क्षेत्र के बजाए दूसरे इलाके में ज्यादा समय देने पर पार्टी हाईकमान ने नाराजगी जताई थी। क्योंकि उनके अपने क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। हाईकमान की फटकार के बाद उन्होंने क्षेत्र में भाग-दौड़ शुरू की है। चर्चा तो यह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से आगामी मंत्रिमंडल में फेरबदल भी तय होगा। 

 


Date : 21-Apr-2019

पूर्व सीएम अजीत जोगी के विश्वस्त सहयोगियों ने साथ छोड़ दिया है। अनिल टाह जैसे नेता, जो उनके किचन कैबिनेट का हिस्सा थे उन्होंने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया। जोगी कह रहे है कि उनसे पूछकर ही पार्टी के नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। जोगी के भी कांग्रेस प्रवेश की अटकलें चल रही है, लेकिन सीएम भूपेश बघेल ने साफ शब्दों में कह दिया है कि जोगी के लिए कांग्रेस के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। खुद जोगी पिता-पुत्र ने बार-बार यह कहा है कि वे कांगे्रस में नहीं जाएंगे, लेकिन इस चुनाव में उनके घर बैठने को लेकर ऐसी अटकलें लग रही हैं कि वे कांगे्रस को नुकसान न पहुंचाकर अपनी संभावनाएं बना रहे हैं।


भूपेश के कथन के विपरीत कई लोग मानते हैं कि जोगी देर सबेर कांग्रेस का हिस्सा हो सकते हैं। जोगी कह चुके हैं कि कांग्रेस में जाना होगा, तो उन्हें सोनियाजी को सिर्फ एक फोन करने की जरूरत होगी। खैर, यह सब इतना आसान भी नहीं है क्योंकि चुनाव नतीजे आने के बाद डॉ. रेणु जोगी, सोनिया से मिल चुकी हैं। और यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि राहुल गांधी, जोगी को नापसंद करते हैं इसलिए उनका कांगे्रस प्रवेश नहीं हो पा रहा है। पर अंदर की खबर यह है कि लोकसभा चुनाव निपटने के बाद कांग्रेस हाईकमान जोगी परिवार को कांग्रेस में शामिल करने पर विचार कर सकता है। चर्चा है कि बसपा सुप्रीमो मायावती इसके लिए पहल कर सकती हैं। और जब मायावती, कुछ कहेंगी तो हाईकमान विचार जरूर करेगा। 

कवर्धा में फिर गड्ढा?
राजनांदगांव के सांसद अभिषेक सिंह सरल स्वभाव के हैं। उन्होंने टिकट नहीं मिलने के बाद भी पार्टी का प्रचार किया। राजनांदगांव में पार्टी प्रत्याशी संतोष पांडेय का चुनाव संचालन किया। ऊपरी तौर पर वे काफी मेहनत करते भी दिखे पर चर्चा यह है कि कवर्धा की दोनों सीटों पर जिस तरह काम करना था, पार्टी वैसा नहीं कर पाई। विधानसभा चुनाव में दोनों सीटों से ही करीब एक लाख वोट से भाजपा पीछे रही है। ऐसे में पार्टी के रणनीतिकारों को यहां विशेष ध्यान देने की जरूरत थी पर खबर छनकर आ रही है कि लोकसभा चुनाव में भी दोनों सीटों पर पार्टी के लिए अनुकूल स्थिति नहीं रही। जबकि रमन सिंह 15 साल सीएम रहे और कवर्धा उनका गृह जिला है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में भी पिछडऩे की संभावनाओं को चुनाव संचालन में कमियों के रूप में देखा जा रहा है।

 


Date : 20-Apr-2019

प्रदेश में दूसरे चरण की सीटों में जमकर पोलिंग हुई। सबसे अच्छी बात यह रही कि तीनों लोकसभा क्षेत्रों में कहीं भी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। शांतिपूर्वक मतदान को एक जिले में प्रशासन के आला अफसरों ने सेलीब्रेट भी किया। जिला प्रशासन के मुखिया और जिला पंचायत के सीईओ मतदान खत्म होने के बाद अपनी पत्नियों को साथ लेकर स्ट्राँग रूम पहुंचे और उन्हें पूरा इंतजाम समझाया। 

स्ट्राँग रूम में निर्वाचन से बाहर के लोगों का प्रवेश वर्जित रहता है। विधानसभा चुनाव में इसको लेकर बखेड़ा भी खड़ा हो गया था, लेकिन अफसरों ने इसका ध्यान नहीं रखा। इतना ही नहीं, ईवीएम जमा होने के बाद वहां खान-पान का दौर भी चला। एक तरह से मतदान के थकाऊ माहौल के बीच प्रशासनिक अफसरों ने पिकनिक मनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।  खैर, इसकी मौखिक शिकायत ऊपर तक पहुंच गई है। देखना है आगे क्या होता है। 

तर्क तो था, पर बड़ा बेहूदा...

भाजपा के प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने पिछले दिनों पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं के साथ बैठक कर रायपुर और दुर्ग के पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति की समीक्षा की। चर्चा में यह बात आई कि रायपुर के अभनपुर विधानसभा सेे पार्टी प्रत्याशी सुनील सोनी को सर्वाधिक बढ़त मिलेगी। अनिल जैन ने इसका कारण पूछा, तो उन्हें एक नेता ने बताया कि अभनपुर में पार्टी के दो बड़े नेता चंद्रशेखर साहू और अशोक बजाज जमकर मेहनत कर रहे हैं। दोनों को उम्मीद है कि अभनपुर विधानसभा के उपचुनाव होंगे और उन्हें चुनाव मैदान में उतरना पड़ सकता है। साहू और बजाज अपनी तैयारी कर रहे हैं। अनिल जैन ने जानना चाहा कि आखिर अभनपुर में विधानसभा के उपचुनाव क्यों होंगे? इस पर उन्हें बताया गया कि अभनपुर के कांग्रेस विधायक धनेंद्र साहू, महासमुंद लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उनके लोकसभा चुनाव जीतने के बाद स्वाभाविक तौर पर उन्हें विधानसभा की सीट छोडऩी पड़ेगी। ऐसे में यहां उपचुनाव होगा। इस पर अनिल जैन नाराज हो गए और कहा कि हम महासमुंद का चुनाव जीत रहे हैं। अभनपुर में विधानसभा उपचुनाव की नौबत नहीं आएगी। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 19-Apr-2019

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के समय हमने ग्यारह ऐसी सीटों की लिस्ट छापी थी जो कि राज्य में बार-बार सरकार चुनती हैं, और नतीजों ने फिर साबित किया कि इन ग्यारह में से नौ सीटों ने इस चुनाव में कांग्रेस को चुना था। अब देश भर में लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं, और चुनाव के गणितज्ञ एक बार फिर हिसाब लगा रहे हैं कि ऐसी बेलवैदर सीटें कौन-कौन सी हैं जो कि अधिकतर वक्त दिल्ली में सरकार बनाने वाली पार्टी को ही चुनती हैं? 

चुनावी नतीजों के आंकड़ों से इन सीटों को निकालना बड़ा मुश्किल भी नहीं है। 1977 से लेकर 2014 के बीच में कुछ सीटें ऐसी थीं जिन्होंने बार-बार सरकार चुनीं। इस दौर के तमाम ग्यारह लोकसभा चुनावों में जिन सीटों ने हर बार दिल्ली में सरकार बनाईं, ऐसी दो ही सीटें थीं। एक तो गुजरात की वलसाड, और दूसरी दिल्ली की पश्चिम दिल्ली। जिन सीटों ने ग्यारह चुनावों में दस बार सरकार बनाईं वे थीं महाराष्ट्र की बीड़, चंडीगढ़, हरियाणा की फरीदाबाद और गुडग़ांव, दिल्ली की उत्तर-पश्चिम दिल्ली, झारखंड की पलामू और रांची, मध्यप्रदेश की शहडोल सीटें। 

1977 से लेकर 2014 के बीच जिन सीटों ने ग्यारह चुनावों में से नौ बार सरकार बनाईं वे हैं- गुजरात की बनासकांठा, जामनगर, जूनागढ़, और पोरबंदर। राजस्थान की भीलवाड़ा, गंगानगर। पूर्वी दिल्ली, हरियाणा की करनाल, और कुरूक्षेत्र। मध्यप्रदेश की खंडवा और मंडला। उत्तरप्रदेश की कुशीनगर और वाराणसी। हिमाचल की मंडी। महाराष्ट्र की नासिक। बिहार की पश्चिम चम्पारण। ओडिशा की सुंदरगढ़ सीटें। 

अब ऐसी सीटों पर इस चुनाव में भी पार्टियों के आसार देखकर नतीजों का अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस सीट ने हर बार विजेता पार्टी को चुना है, ऐसी दो सीटों में से एक पश्चिम दिल्ली है, जो कि पूरी तरह शहरी सीट है, और दूसरी गुजरात की वलसाड है जो कि आदिवासी आरक्षित सीट है। एक तरफ पश्चिम दिल्ली देश के सबसे संपन्न लोगों की सीट है, तो दूसरी तरफ वलसाड ऐसी है जिसके दो प्रमुख जिलों में से एक डांग, देश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है। 

विधानसभा चुनावों के नतीजे आने पर ग्यारह दिसंबर को छत्तीसगढ़ में यह साफ हुआ था कि जो ग्यारह सीटें बार-बार राज्य सरकार चुनती हैं, उनमें से दस सीटों पर कांग्रेस जीती थी, और राज्य में उसी की सरकार बनी। ये ग्यारह सीटें थीं- जशपुर (पिछली तीन सरकारें), बिलासपुर (पिछली तीन सरकारें), अहिवारा (पिछली तीन सरकारें), बेलतरा (पिछली तीन सरकारें), कुनकुरी (पिछली चार सरकारें), धरसीवां (पिछली चार सरकारें), नारायणपुर (पिछली चार सरकारें), नवागढ़ (पिछली पांच सरकारें), डोंगरगढ़ (पिछली पांच सरकारें), बीजापुर (पिछली छह सरकारें), और जगदलपुर (पिछली नौ सरकारें), चुनने वाली सीटें थीं। इस बार के चुनाव में भी इनमें से कुल एक सीट बेलतरा ऐसी थी जिस पर भाजपा जीती, और ग्यारह में से बाकी तमाम दस सीटों ने राज्य के विजेता को चुनने की परंपरा को जारी रखा था। 

वोटों के बाद बस्तर का हिसाब
प्रदेश की चार लोकसभा सीटों पर मतदान हो चुका है। यहां मतदान के बाद नतीजों को लेकर दोनों ही मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस आशान्वित हैं। विधानसभा में बुरी हार के बाद भाजपा ने सभी सांसदों की टिकट काटकर सारे के सारे नए चेहरों पर दांव लगाया है। जिन चार सीटों, बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में मतदान हुआ है, वहां कांटे की टक्कर देखने को मिली है। 

बस्तर में दंतेवाड़ा विधायक भीमा मण्डावी की हत्या के बाद दंतेवाड़ा शहर, बचेली और आसपास सहानुभूति का माहौल था। चुनाव के शुरूआती दौर में भाजपा एकदम पिछड़ी दिख रही थी वह प्रचार खत्म होने तक कड़े मुकाबले तक ले आई। फिर भी यहां कांग्रेस बेहतर स्थिति में रही। कांकेर में भी भाजपा और कांग्रेस, दोनों के प्रत्याशियों की साख अच्छी है। ऐसे में मतदाताओं के लिए दोनों में से एक को चुनना काफी कठिन था। कांकेर लोकसभा के बालोद इलाके में पीएम की सभा भी हुई। यह इलाका कांग्रेस के लिए मजबूत रहा है। फिर भी  मुकाबला मतदान तक काफी कड़ा हो गया था। इन सबके बावजूद बस्तर संभाग की दोनों लोकसभा सीट पर कांग्रेस को बड़े फायदे की उम्मीद है। 

महासमुंद के साहू और साहू
महासमुंद लोकसभा में पूर्व विधायक चुन्नीलाल साहू को कांग्रेस दिग्गज धनेन्द्र साहू के मुकाबले काफी हल्का माना जा रहा था, लेकिन शहर-कस्बों में मोदी फैक्टर ने उन्हें मजबूत बना दिया। समाज के लोगों धनेन्द्र के मुकाबले उन्हें ज्यादा साथ मिला, लेकिन गैर साहू वोटरों में धनेन्द्र की पकड़ नजर आई। हाल यह रहा कि महासमुंद जिले में धनेन्द्र, तो धमतरी जिले में चुन्नीलाल के पक्ष में माहौल रहा। गरियाबंद जिले की सीटों पर बराबरी का मुकाबला देखने को मिला। यहां दोनों के बीच हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। 

नांदगांव में आखिर होगा क्या?
राजनांदगांव लोकसभा सीट से भाजपा ने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और उनके पुत्र मौजूदा सांसद अभिषेक को टिकट न देकर पार्टी ने आरएसएस की पसंद पर संतोष पाण्डेय को चुनाव मैदान में उतारा। जबकि कांग्रेस ने खुज्जी के दो बार के विधायक भोलाराम साहू पर दांव लगाया। आरएसएस के स्वयंसेवक नांदगांव में बड़ी संख्या में डटे रहे। विधानसभा चुनाव में राजनांदगांव शहर को छोड़कर बाकी सीटों पर भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन लोकसभा चुनाव में स्थिति बेहतर दिखाई दी। 

संतोष पाण्डेय के पक्ष में राजनांदगांव शहर, खुज्जी और खैरागढ़ में माहौल था। जबकि भोलाराम डोंगरगढ़, मानपुर मोहला और पंडरिया में मजबूत नजर आए। कवर्धा और डोंगरगांव में दोनों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। यहां भी हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। अब तक तो यह साफ हो चुका है कि पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस बेहतर स्थिति में रहेगी। क्योंकि पिछली बार मात्र एक सीट मिली थी, जबकि इस बार स्थिति पिछले चुनावों के मुकाबले काफी बेहतर रह सकती है। 

वोराजी से बौखलाए कांग्रेसी...
दुर्ग लोकसभा सीट में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। यह सीट कांग्रेस के लिए काफी प्रतिष्ठापूर्ण मानी जा रही है। खुद सीएम भूपेश बघेल यहां की पाटन सीट के विधायक हैं, तो गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू दुर्ग और बेमेतरा के प्रभारी मंत्री हैं। जबकि कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे भी बेमेतरा जिले के साजा से चुनकर आते हैं। इन सबसे वरिष्ठ पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री और राज्यसभा सदस्य मोतीलाल वोरा भी दुर्ग से आते हैं। इन दिग्गजों के मुकाबले भाजपा ने पूर्व संसदीय सचिव विजय बघेल को उतारा है, जो कि मोदी फैक्टर और व्यक्तिगत साख के चलते मजबूत दिख रहे हैं। 

कांग्रेस नेता हर हाल में सीट जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। जोगी पार्टी के कई नेता उनके साथ जुड़ गए हैं। न चाहते हुए भी कई को पार्टी में लेना भी पड़ा। ऐसे ही दुर्ग शहर के नेता प्रताप मध्यानी अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल होना चाह रहे थे, तो वोराजी ने पेंच अड़ा दिया। अब कांग्रेस नेता बुदबुदा रहे हैं कि एक-एक वोट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में वोराजी का रूख समझ से परे है। 

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Date : 18-Apr-2019

नान घोटाला प्रकरण में ईओडब्ल्यू ने चिंतामणी चंद्राकर से लंबी पूछताछ की। चिंतामणी नान का अफसर है। जब पहली बार मैडम सीएम का घोटाले में जिक्र हुआ था, तब प्रकरण में जांच की अगुवाई कर रहे मुकेश गुप्ता ने आगे बढ़कर सफाई दी थी कि मैडम सीएम का मतलब चिंतामणी चंद्राकर मैडम है। यह भी हल्ला उड़ा कि चिंतामणी चंद्राकर, भूपेश बघेल का रिश्तेदार है। मगर, एसआईटी ने बुधवार को उससे लंबी पूछताछ कर पसीने छुड़ा दिए।  

सुनते हैं कि चिंतामणी चंद्राकर को मुकेश गुप्ता का बेहद करीबी माना जाता है और वह एमजीएम अस्पताल का ट्रस्टी भी रहा है, जिस ट्रस्ट में बहुत बड़े-बड़े लोग ही ट्रस्टी हैं जो कि अनिवार्य रूप से मुकेश गुप्ता के करीबी भी हैं। ऐसे में एक अदना सा कर्मचारी इस ट्रस्ट में बराबरी का ट्रस्टी कैसे बन गया, यह हैरानी की बात है। ईओडब्ल्यू ने चिंतामणी चंद्राकर से घोटाले की रकम के बंदरबांट को लेकर भी पूछताछ की है। दिलचस्प बात यह है कि चिंतामणी चंद्राकर का नाम पहले भी कई बार आया, लेकिन उससे पूछताछ नहीं हुई और जब एसआईटी ने उन्हें (चिंतामणी) नोटिस जारी किया, तो बीमारी का हवाला देकर बचने की कोशिश की। आखिरकार, उन्हें पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ा। 

चर्चा है कि एसआईटी ने एमजीएम ट्रस्ट से उनके संबंधों को लेकर भी पूछताछ की है। हल्ला यह भी है कि वर्ष-2013 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नान से करोड़ों रूपए इधर-उधर किए गए थे। इसको लेकर भी कुरेद-कुरेद कर पूछा गया। इसका हिसाब-किताब नान डायरी के बाद में बरामद हुए 125 पन्नों में जिक्र है। खैर, चिंतामणी चंद्राकर से पूछताछ होना काफी मायने रखता है क्योंकि नान से लेकर एमजीएम ट्रस्ट तक उसकी दखल रही है। जांच में लगे हुए अफसरों का यह भी मानना है कि नागरिक आपूर्ति निगम से भ्रष्टाचार के करोड़ों रुपये निकलकर एमजीएम में गए हो सकते हैं, और कागजों पर ट्रस्ट का नाम न आए इसलिए उसे नान के ही एक कर्मचारी और एमजीएम के ट्रस्टी चिंतामणी के नाम पर दर्ज किया गया हो।

एक बार फिर सुर्खियों में
 भाजपा के ताकतवर नेता सौदान सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उन पर विदिशा जिले के पैतृक गांव कागपुर में तालाब गहरीकरण-सौंदर्यीकरण में अनियमितता के आरोप लगे हैं और मध्यप्रदेश ईओडब्ल्यू इसकी पड़ताल कर रही है। पहले भी उनके गृहग्राम की भव्य कोठी को लेकर भी पार्टी के भीतर तरह-तरह की चर्चा होती रही है। पार्टी में दिवंगत पूर्व सांसद ताराचंद साहू और वीरेन्द्र पाण्डेय तो उनकी कार्यशैली की शुरू से खिलाफत करते रहे हैं, लेकिन सौदान का ही प्रभाव था कि उन्हें पार्टी छोडऩी पड़ी। 


न सिर्फ सौदान सिंह बल्कि उनके पीए गौरव तिवारी की तड़क-भड़क जीवन शैली भी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय रही है। आम तौर पर संगठन मंत्री सिर्फ पार्टी संगठन तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन सौदान सिंह की रमन सरकार में पूरी दखल थी। उनके पिछली सरकार में ताकतवर रहे कई अफसरों से उनके बेहद करीबी संबंध रहे हैं, इसको लेकर भी पार्टी के भीतर उनकी आलोचना होती रही है। पहली बार विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनके खिलाफ कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूटा था। खैर, रमन सिंह  और उनके करीबी लोगों के खिलाफ अलग-अलग प्रकरणों में जांच हो रही है, ऐसे में किसी संगठन मंत्री का जांच के दायरे में आना भी कम चौंकाने वाला नहीं है। इससे कम से कम यह तो साबित होता है कि सरकार में न रहते हुए भी पार्टी के भीतर उनका विरोध है।

 


Date : 17-Apr-2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल छत्तीसगढ़ आकर साहू-कार्ड खेल गए, और ऐसा लगता है कि मतदान के पहले भाजपा इसी को तुरूप का इक्का मान रही है। अब कांगे्रस के जिम्मे यह बात तो आती ही है कि इसका कोई ऐसा जवाब दे जो कि साहू समाज को मोदी लहर में पडऩे से रोक सके। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा ने मोदी के भाषण के तुरंत बाद मिनटों में फेसबुक पर लिखा- 'मोदी ने फिर वही चाल चली जो वे 2002 से चलते आ रहे हैं। धर्म, जाति, और सम्प्रदाय के बीच जहर बोने की चाल। उन्होंने छत्तीसगढ़ के साहू समाज को पहले मोदी से जोड़ा, फिर पूरे समाज को चौकीदार से। फिर कहा कि जो लोग चौकीदार को चोर कह रहे हैं, वे पूरे समाज का अपमान कर रहे हैं। दरअसल भाजपा चाहती है कि एक पिछड़ी जाति कांग्रेस से नाराज हो जाए, और इसी बहाने चौकीदार भी बरी हो जाए। लेकिन वह शायद नहीं जानती कि साहू समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, और इस समाज की राजनीतिक चेतना राज्य में सबसे प्रखर है। वह किसी के बहकावे में यूं नहीं बहक जाएगा।'

दरअसल विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पांच साहू उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से चार जीते थे। और भाजपा ने 14 साहू उम्मीदवार बनाए थे जिनमें से 13 निपट गए थे। यह बात भाजपा के भूलने की नहीं थी, और इसलिए मोदी ने साहू समाज को खासकर छुआ।

कांग्रेस अब खोद-खोदकर जानकारी निकाल रही है कि भाजपा ने साहू नेताओं के साथ पहले क्या सुलूक किया था। एक नेता ने आज सुबह एक जानकारी भेजी कि राज्य के भाजपा के कुछ बिहारी नेताओं ने ताराचंद साहू को पार्टी छोडऩे के लिए मजबूर किया था। जब उन्हें प्रदेश भाजपाध्यक्ष पद से हटवाया गया, तब उस साजिश के वक्त मोदीजी कहां थे? कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया है कि जागेश्वर साहू को वैशालीनगर उपचुनाव में टिकट देने के बावजूद भाजपा के मंत्रियों ने साजिश करके हरवाया, 2014 में सरोज पाण्डेय ने दुर्ग सांसद रहते हुए साहू समाज के तहसील अध्यक्ष राम कुमार साहू को तीन झापड़ मारे थे, तब मोदीजी कहां थे? कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया है कि 26-11 के मुंबई हमले में जब मोदीजी के परमप्रिय मित्र नवाज शरीफ के भेजे गए पाकिस्तानी आतंकी मौत का खेल खेल रहे थे तब छत्तीसगढ़ के ही बहादुर जांबाज कमांडो दिनेश साहू ने आतंकवादियों की लाशें बिछा दी थीं।

कांग्रेस की तुरतबयानी बता रही है कि इतना बड़ा साहू-समर्थन वह  खोना नहीं चाह रही है। यह एक अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में मिली हुई टिकट कटने के बाद प्रतिमा चंद्राकर ने ताम्रध्वज साहू से रूबरू जो सलूक किया था, उसने आज दुर्ग को कांग्रेस के लिए खासी, खासी मुश्किल सीट बना दिया है। लेकिन दुर्ग से परे भी और जगहों पर कांग्रेस को एकजुट साहू वोटों का ख्याल तो रखना ही है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 16-Apr-2019

दुर्ग लोकसभा में चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो गया है। यहां कांग्रेस की प्रतिमा चंद्राकर और भाजपा के विजय बघेल के बीच कांटे की टक्कर है। विजय, सीएम भूपेश बघेल के भतीजे हैं। दोनों का कार्यक्षेत्र पाटन रहा है। भाजपा ने भूपेश और विजय की रिश्तेदारी को प्रचार में भुनाना शुरू कर दिया है। विशेषकर पाटन के मतदाताओं से कहा जा रहा है कि एक टिकट में दो पिक्चर देखें। यानी भूपेश को तो आपने सीएम बना दिया। अब विजय को सांसद बनाने के लिए वोट दें। चूंकि पाटन सीएम का विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त दिलाना उनके लिए जरूरी भी है, लेकिन भाजपा का नारा पाटन के लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। यह सुरसुरी प्रेमप्रकाश पांडेय ने दुर्ग के नामांकन के दिन छोड़ी थी, जब उन्होंने अपने भाषण में कहा कि एक पार्टी का विधायक तो है ही, दूसरी पार्टी का सांसद भी रख लो, चूंकि सीट मुख्यमंत्री की है इसलिए यहां तो काम हो ही जाएगा, दिल्ली में मोदी सरकार में विजय बघेल काम करवा पाएंगे। कुछ और लोगों ने अटकल को आगे बढ़ाते हुए फैलाया कि सांसद बनने जा रहे भाजपा उम्मीदवारों में विजय बघेल सबसे मजबूत रहेंगे इसलिए उन्हें मोदी सरकार में इस्पात एवं खान राज्यमंत्री बनाया जा सकता है, और इसलिए विजय बघेल को वोट दें। लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों के कुर्मी उम्मीदवारों के बीच दुर्ग जिले के एक और कुर्मी नेता प्रीतपाल बेलचंदन के पुराने मामलों पर अभी कार्रवाई की सुगबुगाहट क्यों शुरू हुई है, यह कई लोगों को समझ नहीं आ रहा है। लोगों का मानना है कि सहकारिता क्षेत्र में तो जिस नेता की फाईल खोलें, उसमें गड़बड़ी ही दिखेगी, इसलिए बेलचंदन की बारी अभी क्यों आई है यह दो कुर्मी नेताओं की चुनावी लड़ाई के बीच समझना थोड़ा सा मुश्किल है। 

विधायक तो है ही, सांसद भी-2

महासमुंद के कांग्रेस प्रत्याशी धनेन्द्र साहू के लिए उनके ही समाज के पदाधिकारियों ने मुश्किलें पैदा कर दी है। समाज के कुछ पदाधिकारियों ने यह अभियान चलाया है कि धनेन्द्र वर्तमान में विधायक हैं। जबकि भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल साहू अभी खाली है। ऐसे में चुन्नीलाल को वोट देना चाहिए, ताकि उनका भी राजनीतिक कद बढ़ सके। चुन्नीलाल एक बार विधायक रह चुके हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनकी टिकट काट दी गई थी। महासमुंद लोकसभा में साहू मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है और धनेन्द्र की पकड़ भी है। लेकिन सामाजिक रूप से चल रहे अभियान से चुन्नीलाल साहू वोटरों के बीच में धनेन्द्र से ज्यादा मजबूत दिख रहे हैं। हालांकि यहां आदिवासी और कुर्मी वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में अन्य जातियों के वोट किधर जाएंगे, यह कह पाना अभी मुश्किल है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Apr-2019

जांजगीर-चांपा के भाजपा प्रत्याशी गुहाराम अजगले ने पार्टी दफ्तर को ही ठिकाना बना लिया है। वे दिनभर प्रचार के बाद जिला पार्टी दफ्तर में ही रात्रि विश्राम करते हैं। प्रचार खत्म होने के बाद पार्टी दफ्तर में अपने कपड़े धोते हैं और सुबह तैयार होकर प्रचार के लिए निकल जाते हैं। एक बार सांसद रह चुके गुहाराम अजगले से नामांकन फार्म भरने के लिए पार्टी नेताओं ने उनसे इनकम टैक्स ब्यौरा मांगा तो उन्होंने कह दिया कि इनकम ही नहीं है, तो टैक्स कैसा? पूर्व सांसद के रूप में उन्हें कुल 20 हजार रूपए पेंशन मिलती है। और गांव में थोड़ी सी जमीन है, उसी से उनका गुजारा होता है। 

चुनाव संचालन कर रहे नेताओं ने उनसे अपनी तरफ से कुछ संसाधन जुटाने के लिए कहा, तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। अब हाल यह है कि उनके लिए पार्टी नेताओं को गाड़ी किराए पर लेनी पड़ी, जिसमें वे क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। पन्द्रह साल की सरकार में पार्टी के कई छोटे-बड़े नेता करोड़पति-अरबपति बन गए हैं, लेकिन गुहाराम फक्कड़ ही रहे। गुहाराम की सादगी और सरलता के कारण ही पार्टी के छोटे-बड़े नेता उनके पक्ष में प्रचार के लिए निकल पड़े हैं और उन्हें जिताने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं। 

जिम्मा फिर सौदान सिंह पर
लोकसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय सहमहामंत्री (संगठन) सौदान सिंह सक्रिय दिख रहे हैं। जबकि विधानसभा चुनाव में हार के बाद काफी दिनों तक गायब थे और पार्टी के भीतर हल्ला था कि उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रभार से अलग कर दिया गया है। प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन हरियाणा और मध्यप्रदेश में ज्यादा समय दे रहे हैं, तो यहां की जिम्मेदारी सौदान सिंह पर आ गई है। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में बुरी हार के लिए उन्हें ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। 

दुर्ग और कुछ और जगहों पर तो कार्यकर्ताओं ने सौदान के खिलाफ आग उगली थी। खैर, सौदान सिंह सभी लोकसभा क्षेत्रों में जाकर पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। पिछले दिनों वे हेलीकॉप्टर से अंबिकापुर पहुंचे और वहां प्रदेश के पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में उन्होंने यह कहा कि प्रदेश की सभी 11 सीटें जीत रहे हैं, तो एक-दो कार्यकर्ता मुंह दबाकर हँसने लगे। 

उन्होंने सरगुजा से भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह को फोन लगाया और कहा कि उनकी स्थिति अच्छी है। और वे चुनाव जीत रहीं हैं। फिर उन्होंने रेणुका को सभी के साथ समन्वय बनाकर काम करने की नसीहत देकर फोन काट दिया। सुनते हैं कि वे खुद टिकट वितरण से नाखुश हैं। वे राजनांदगांव से अभिषेक, रायगढ़ से विष्णुदेव साय को टिकट दिलाना चाहते थे, पर हाईकमान ने एक लाइन में सभी सांसदों की टिकट काटने का फैसला लेकर झटका दिया है। चूंकि वे संगठन मंत्री हैं तो बैठक में औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 14-Apr-2019

पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले मुख्य दलों के प्रत्याशी इस बार  खर्च कम कर रहे हैं। भाजपा चुनाव खर्चों को लेकर हमेशा उदार रही है। मगर प्रदेश में सरकार न होने की वजह से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही है। ऊपर से नए चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है, जो कि आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम भी नहीं हैं। पिछले पन्द्रह बरस में राज्य सरकार ने बैठे हुए लोग अरबपति बनने के बाद अब अगर चुनाव लड़ते, तो बात ही कुछ और होती। सुनते हैं कि पार्टी ने चुनाव संचालकों के हाथों में ही फंड थमा दिया है, जिससे कुछ प्रत्याशी नाराज बताए जा रहे हैं। एक भाजपा प्रत्याशी ने कुछ पार्टी नेताओं को अपनी व्यथा सुनाई है, कि वे अपने जेब से 15 लाख खर्च कर चुके हैं, लेकिन चुनाव संचालक ने अभी तक एक फूटी कौड़ी नहीं दी है। और तो और चुनाव संचालक फोन भी नहीं उठा रहे हैं। 

प्रदेश में कांग्रेस सरकार में होने के बावजूद प्रत्याशी कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। चर्चा है कि पार्टी हाईकमान ने यहां के जिम्मेदार नेताओं को अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के उम्मीदवारों को मदद करने के लिए कह दिया है, जिससे वे टेंशन में बताए जा रहे हैं। कुछ प्रत्याशियों ने टिकट से पहले खर्च को लेकर काफी कुछ वादे किए थे, लेकिन वे अब पार्टी का मुंह ताक रहे हैं। एक शिकायत पर प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया ने एक प्रत्याशी को फटकार भी लगाई। साथ ही चुनाव खर्च भी प्रत्याशी के बजाए चुनाव संचालक को देने के लिए कहा है। 

अमितेष लोकसभा चुनाव प्रचार में!
पूर्व मंत्री और राजिम के विधायक अमितेश शुक्ल लोकसभा चुनाव प्रचार में डटे हैं। वे सालों बाद लोकसभा का चुनाव प्रचार कर रहे हैं। आमतौर पर लोकसभा चुनाव के दौरान वे पारिवारिक कारण गिनाकर प्रदेश से बाहर चले जाते थे। उनकी जगह स्थानीय नेताओं को प्रचार की जिम्मेदारी दी जाती रही है। पूर्व सीएम अजीत जोगी दो बार महासमुंद से चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्होंने राजिम में अमितेश की जगह अन्य नेताओं को चुनाव संचालक बनाया था। इस बार अमितेश के पुत्र भवानी शंकर खुद टिकट के दावेदार थे। अमितेश अपने पुत्र को टिकट दिलाने के लिए मेहनत भी कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह धनेन्द्र साहू को प्रत्याशी बनाया। धनेन्द्र स्व. श्यामा चरण शुक्ल के कट्टर समर्थक  रहे हैं। ऐसे में अमितेश का चुनाव प्रचार छोड़कर जाने का कोई कारण नहीं बचा था। वे विधानसभा का चुनाव 55 हजार से अधिक मतों से जीते हैं और अभी तक धनेन्द्र के लिए पूरी मेहनत करते दिख भी रहे हैं।  दरअसल श्यामाचरण शुक्ल के वक्त से उनका परिवार साहू समाज की खास फिक्र रखते आया है क्योंकि राजिम में इस परिवार की जीत साहू वोटों की मर्जी के बिना नहीं हो सकती। इसलिए राजिम से किसी शुक्ल की टिकट पाते हुए श्यामाचरण-अमितेष यह कोशिश भी करते आए हैं कि अड़ोस-पड़ोस की सीटों पर किसी साहू को जरूर टिकट मिल जाए।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 13-Apr-2019

सरकार जाते ही भाजपा के कारोबारी नेता, कांग्रेस के लोगों से संबंध मधुर करने में लग गए हैं। ताकि कारोबार में किसी तरह की दिक्कत न आए। ऐसे ही एक भाजपा नेता पिछले दिनों सरकार के एक मंत्री के घर पहुंचे। और मंत्रीजी की तारीफों के पुल बांधने लगे। यह सुनकर असहज हो रहे मंत्रीजी के समर्थकों में से एक ने भाजपा नेता को टोक दिया और याद दिला दिया कि आप तो मंत्रीजी के खिलाफ अपनी पार्टी के प्रत्याशी का चुनाव संचालन कर रहे थे। 

यह सुनकर वाकपटु भाजपा नेता कुछ क्षण के लिए असहज हो गए, लेकिन तुरंत संभलकर कहा कि हां, मैं मंत्रीजी के खिलाफ चुनाव संचालन कर रहा था, पर मंत्रीजी के कुशल प्रबंधन का कोई तोड़ नहीं है। हमें बुरी तरह हरा दिया। भाजपा नेता और मंत्रीजी के समर्थकों के बीच चर्चा का दौर चल रहा था कि मंत्रीजी ने काम पूछ लिया। फिर क्या था, भाजपा नेता असल मुद्दे पर आ गए। उन्होंने गुजारिश की कि जिस बोर्ड के वे पदाधिकारी थे वहां काम कर रही सीए फर्म को न हटाया जाए, उसे काम करने दिया जाए। मंत्रीजी ने तुरंत फोन कर उनका काम कर दिया। तब कहीं जाकर भाजपा नेता वहां से निकले। 


छत्तीसगढ़ का हार्दिक पटेल

छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक 'हार्दिक पटेल' का उदय हो रहा है। सेनानी स्व. खूबचंद बघेल के गृहग्राम पथरी से तालुक रखने वाले अमित बघेल की तुलना कई उत्साही लोग गुजरात के हार्दिक पटेल से कर रहे हैं। अमित विधानसभा चुनाव के दौरान सुर्खियों में आए। उन्होंने कसडोल में गौरीशंकर अग्रवाल और धरसींवा के भाजपा प्रत्याशी देवजी पटेल व महासमुंद के डॉ. विमल चोपड़ा को टारगेट किया और उन्हें चुनाव में बुरी तरह हरवाने में अहम भूमिका निभाई। 

अमित भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश महामंत्री रहे हैं, लेकिन देवजी से अनबन के चलते उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बाद अमित ने श्रमिक नेता रामगुलाम सिंह ठाकुर के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ क्रांति सेना का गठन किया। जब सिलतरा के एक उद्योग से कुछ लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया, तो क्रांति सेना के बैनर तले अमित नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों के समर्थन में आंदोलन खड़ा किया। फिर क्या था, उन्हें जेल भेज दिया और रमन सरकार के प्रभावशाली लोगों ने तीन माह तक उनकी जमानत नहीं होने दी। जेल से निकलने के बाद उनकी हैसियत और बढ़ गई। उनके संगठन का विस्तार अब प्रदेशभर में हो चुका है। 

विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें भाजपा के लोगों ने अपने साथ लाने की कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। प्रदेश के गैर छत्तीसगढ़ी मूल के दिग्गज भाजपा नेताओं को चिन्हित कर उनके खिलाफ मुहिम चलाई और चुनाव में उनके खिलाफ माहौल बनवाने में सफल रहे। पूर्व सांसद सोहन पोटाई भी उनके साथ जुड़ गए हैं और छत्तीसगढ़ी समाज के हितों की बात कर रहे हैं। वे कांग्रेस और भाजपा के उद्योगपति-कारोबारी नेताओं के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। 

सुनते हैं कि कोरबा में सरकार के मंत्री जयसिंह अग्रवाल के खिलाफ अभियान चलाया, तो सीएम भूपेश बघेल को उन्हें फोन कर समझाना पड़ा। उनका मानना है कि राजस्थान-उत्तरप्रदेश, हरियाणा से आए भाजपा और कांग्रेस के नेता यहां जनप्रतिनिधि बन गए हैं और छत्तीसगढिय़ों का शोषण कर रहे हैं। उनके भाषण से प्रभावित बड़ी संख्या में युवा उनसे जुडऩे लगे हैं। कुछ लोग आर्थिक सहयोग भी कर रहे हैं। वे खूबचंद बघेल, गुरूघासीदास, शहीद वीर नारायण सिंह और संत पवन दीवान जैसे छत्तीसगढ़ के महापुरूषों को अपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं के सपनों के अनुरूप शोषण मुक्त छत्तीसगढिय़ा राज चाहते हैं। वैसे, छत्तीसगढिय़ा शोषण के नाम पर कई संगठन तैयार हुए और जल्द ही खत्म भी हो गए, लेकिन अब क्रांति सेना का आगे क्या होता है यह देखना है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 12-Apr-2019

सरगुजा में भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो गई है। सीतापुर इलाके में तो पार्टी पदाधिकारियों ने बकाया भुगतान न होने पर काम नहीं करने की धमकी दे दी है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए पार्टी के बड़े नेताओं के कहने पर स्थानीय कुछ नेताओं ने साहूकारों से कर्ज लेकर चुनाव में लगा दिया। उनसे कहा गया था कि चुनाव निपटते ही पैसा मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

हाल यह है कि जिन लोग ने कर्ज दिए थे वे स्थानीय जिम्मेदार नेताओं के पीछे पड़ गए हैं। अकेले पेट्रोल पंपों का ही लाखों का बिल बकाया है। विधानसभा प्रत्याशी की स्थिति यह है कि चुनाव में हारने के बाद उन्होंने स्थानीय नेताओं से दूरी बना ली। प्रदेश में सरकार नहीं है, तो कोई पूछने वाला नहीं है। अब लोकसभा चुनाव हैं, तो नेताओं ने कर्ज वापसी के लिए दवाब बनाया है। 

स्थानीय नेताओं ने प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन के सामने भी अपनी बात रखी है। साथ ही साथ चुनाव संचालक रामप्रताप सिंह को चेताया है। उन्हें भरोसा दिया गया है कि जल्द ही उन्हें पैसा लौटा दिया जाएगा। फिर भी दूध से जले नेता, इस वादे पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि बकाया रकम की वापसी के बाद ही काम करेंगे। 

खफा-खफा से हैं  महाराज
क्या पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव खफा हैं, यह सवाल पार्टी हल्कों में चर्चा का विषय है। दरअसल, सिंहदेव चुनाव प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन वे अपने क्षेत्र सरगुजा से दूर हैं। सरगुजा राजघराने के मुखिया सिंहदेव की पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि  विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सीटों पर प्रत्याशी उन्हीं की पसंद से तय किए गए थे और उन्होंने जिताया भी। सरगुजा लोकसभा प्रत्याशी खेलसाय सिंह भी सिंहदेव के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। 

सुनते हैं कि सिंहदेव ने सरगुजा लोकसभा में प्रचार की रणनीति बनाने सिर्फ एक बार बैठक ली है। जिसमें विधायकों के अलावा जिलाध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी भी थे। इसके बाद खेलसाय को स्थानीय नेताओं के भरोसे छोड़ दिया है। अब जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, भाजपा की स्थिति लगातार मजबूत दिख रही है। चर्चा है कि कुछ लोग सिंहदेव से मार्गदर्शन लेने गए, तो उन्होंने कह दिया कि जैसा करना है वैसा करें। सिंहदेव सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, तो ब्लॉक स्तर के नेता भी सुस्त पड़ गए हैं। वे अपने ही गढ़ में दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहे हैं, इसकी चर्चा भी हो रही है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि सरकार के कुछ नीतिगत फैसलों से वे सहमत नहीं हैं और यही वजह है कि ओडिशा में ज्यादा समय दे रहे हैं। पार्टी ने उन्हें ओडिशा में प्रचार का अतिरिक्त दायित्व भी दिया है। अब सरगुजा में प्रचार के लिए समय नहीं निकाल पाने का बहाना भी है।
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Date : 11-Apr-2019

नौकरशाह चिराग के जिन्न की तरह होते हैं। जिनके पास चिराग होता है नौकरशाह उसी का कहना मानते हैं। लेकिन 15 साल सरकार में रहने के बाद  कई भाजपा नेता इस जुमले को भूल चुके थे। सरकार बदलने के बाद नौकरशाहों के तेवर बदले, कुछ भाजपा नेताओं को झटका भी लगा है। ऐसे ही एक मामले में एक भाजपा नेता की रायपुर जिले के बड़े अफसर से नोंक-झोंक भी हो गई। बात देखने-दिखाने तक पहुंच गई। आखिरकार नेताजी को अपमानित होकर लौटना पड़ा। 

हुआ यूं कि भाजपा नेता चुनाव संबंधी शिकायत को लेकर कलेक्टोरेट पहुंचे थे। अफसर की भाजपा सरकार के एक मंत्री से निकटता रही है। वे मंत्रीजी के स्टॉपमें भी रहे हैं। अफसर के साथ नेताजी का उठना-बैठना था पर जब शिकायत लेकर पहुंचे तो अफसर ने कुछ कानूनी बातें बता दी। यह बात नेताजी को हजम नहीं हुई। उन्होंने अफसर पर नाराजगी जाहिर की, तो उन्हें ऐसी फटकार लगाई कि नेताजी सन्न रह गए। तुरंत नेताजी पूर्व मंत्री के पास पहुंचे और अफसर की शिकायत की। पूर्व मंत्री ने उन्हें प्यार से समझाया कि सरकार बदल चुकी है, तो अफसर के तेवर बदलना भी स्वाभाविक है। बेहतर होगा कि अनुनय-विनय कर किसी तरह अपना काम निकाला जाए। 

जोगी-नेताओं का बुरा हाल
जोगी पार्टी के कई नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। जोगी पार्टी के चुनाव अभियान प्रमुख रहे पूर्व मंत्री विधान मिश्रा, जोगी के कहने पर भूपेश बघेल को खूब गरियाते थे। अब वे क्षमा मांगकर वापस आना चाहते हैं, लेकिन भूपेश बघेल तो दूर,बाकी कांग्रेस नेता भी उन्हें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं। हाल यह है कि जो लोग आ गए हैं उनकी भी हालत कोई अच्छी नहीं है।

जोगी पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री रहे अब्दुल हमीद हयात को रायपुर लोकसभा के केंद्रीय कार्यालय में अहम जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन पिछले दिनों एक कांग्रेस नेत्री ने वहां पहुंचकर जोगी और उनके समर्थक रहे लोगों को इतना भला-बुरा कहा कि उन्होंने कार्यालय जाना ही बंद कर दिया। सुनते हैं कि खुद जोगी परिवार अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि कांग्रेस में उनके विरोधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 
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Date : 10-Apr-2019

बात दो दशक से भी ज्यादा पुरानी है। अविभाजित मध्यप्रदेश में लोकसभा के चुनाव थे। तब उस समय शरदचंद बेहार सीएस और शरदचंद सक्सेना डीजीपी थे। तब बस्तर में नक्सलवाद पांव-पसार रहा था। चुनाव में सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा के लिए जगदलपुर में उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक में आईजी-एसपी और वन अफसर विशेष रूप से मौजूद थे। चूंकि नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान कर रखा था, इसलिए मतदान के दौरान छिटपुट हिंसा की आशंका भी जताई जा रही थी। 

बस्तर और कांकेर लोकसभा में सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा हो रही थी कि एक नौजवान एडिशनल एसपी ने बड़े आत्मविश्वास से कह दिया कि चुनाव में नक्सल हिंसा नहीं होगी और सब कुछ शांतिपूर्वकनिपट जाएगा। यह सुनते ही डीजीपी शरदचंद सक्सेना,  एएसपी पर भड़क गए, तब सीएस शरदचंद बेहार ने उन्हें शांत किया और फिर एडिशनल एसपी की तरफ  मुखातिब होते हुए कहा कि चुनाव शांतिपूर्वक कैसे हो जाएगा, तब एएसपी ने अलग से चर्चा की इच्छा जताई।
 बैठक के बाद शरदचंद बेहार ने एएसपी को कलेक्टर के कक्ष में मिलने कहा। सुनते हंै कि एएसपी ने सीएस बेहार और डीजीपी सक्सेना को बताया कि एक राजनीतिक दल के प्रत्याशी ने नक्सल नेताओं को पैसा पहुंचा दिया है, इसके बाद अंदरूनी इलाकों में भी प्रचार की छूट दे दी गई है। अब चुनाव में हिंसा नहीं होगी। एएसपी की सूचना सही निकली और चुनाव शांतिपूर्वक निपट गया। पर जब अविभाजित मध्यप्रदेश में परिवहन मंत्री रहे लिखीराम कांवरे की नक्सलियों ने हत्या की थी, तब भी उस समय राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा रही कि कांवरे नक्सलियों को नियमित रूप से पैसा पहुंचाते थे, लेकिन बाद में नक्सलियों की तरफ से डिमांड ज्यादा आई और कांवरे ने मना कर दिया, तो नक्सलियों ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया। 

इससे अलग तरह का वाकया वर्ष-2008 के विधानसभा चुनाव के बाद राजनांदगांव जिले में हुआ था। तब नक्सलियों ने विधानसभा चुनाव निपटने के बाद एक नेता की गोली मारकर हत्या कर दी। चर्चा है कि नेताजी ने चुनाव के वक्त नक्सलियों को कुछ आश्वासन दिया था, जिसे पूरा नहीं किया। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। यह भी सुनने में आता है कि विशेषकर बस्तर संभाग में संपन्न तबके के दोनों ही प्रमुख दलों के नेता नक्सल हिंसा से बचने या समर्थन जुटाने के लिए नक्सलियों से मदद लेते आए हैं। ये अलग बात है कि दोनों ही दल एक-दूसरे पर नक्सलियों के साथ सांठ-गांठ का तोहमत लगाते हैं। 

अब जब दंतेवाड़ा विधायक भीमा मंडावी की नक्सलियों ने हत्या की है, तो कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। पुलिस कह रही है कि विधायक को दंतेवाड़ा के कुंआकोंडा इलाके के श्यामगिरी के पहाड़ी वाले रास्ते पर जाने से मना किया गया था, उन्हें नक्सल खतरों से भी अवगत कराया गया था। इस सबको नजरअंदाज कर प्रचार के लिए निकल पड़े। भीमा मंडावी और उनके साथ सभी चारों सुरक्षाकर्मी मौत के आगोश में समा गए, अब इस घटना ने कई सवाल पीछे छोड़ दिए हैं। इसका जवाब मिलना भी मुश्किल है। 
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