विचार/लेख
शिखा वसु वैरागी
अभी मैं गूगल पर कुछ सर्च कर रही थी तभी मुझे एक बहुत इंटरेस्टिंग खबर पढऩे को मिली। वो ये कि हृ्रस््र की एक महिला वैज्ञानिक हैं क्रद्बह्लड्ड छ्व. ्यद्बठ्ठद्द, जिन्होंने 2011 में अमेरिका के वर्जीनिया राज्य के हैम्पटन में आयोजित हुए हृ्रस््र के एक कार्यक्रम ञ्जद्गस्रङ्गङ्घशह्वह्लद्धञ्चहृ्रस््र में एक चमकदार गोल्डन ड्रेस पहनी थी। जिसकी फोटो उन्होंने 2019 में लगभग 8 साल बाद अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया और शेयर करते हुए लिखा कि क्यों उन्होंने उस कार्यक्रम में इतनी चमकदार ड्रेस पहनी थी। उन्होंने लिखा, ‘अपनी अलमारी की सफाई करते हुए मैंने इस गाउन को देखा और उन लड़कियों को याद किया जिन्होंने मुझे एक पत्र भेजा था, जिसमें लिखा था कि मुझे नासा में बातचीत के दौरान कुछ चमकदार पहनना चाहिए, ताकि वे यकीन कर सकें कि वैज्ञानिक भी कुछ चमकदार पहन सकते हैं।’
रीटा जे किंग के इस ट्वीट को यूजर्स का जबरदस्त समर्थन मिला। कई यूजर्स ने उन्हें इसके लिए धन्यवाद दिया कि विज्ञान सभी के लिए होता है, उन लड़कियों के लिए भी जो चमकीले कपड़े पहनना पसंद करती हैं। इसके साथ ही कुछ लोगों ने उनकी इस बात के लिए भी तारीफ की कि उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। अब चूंकि वैज्ञानिकों को हमेशा उनकी सादगी और समाज से अलग हटकर रहने और सोचने के लिए जाना जाता है, उस पर ऐसा होना आश्चर्य और हर्ष दोनों का विषय था। और वहां के लोगों ने इसको खुशी से स्वीकार करने के साथ ही ऐसे पहनावे की प्रशंसा भी की।
एक हमारे यहां देख लो... इसरो की महिला वैज्ञानिकों की साड़ी, बिंदी, चूड़ी, मंगलसूत्र पहने वाली फोटो को वायरल कर अप्रत्यक्ष रूप से सभी महिलाओं को बताया समझाया जा रहा कि देखो, महिला वैज्ञानिक लोग अगर ऐसे रह सकती हैं, तो तुम लोग भी रहो।
मतलब इतनी बड़ी उपलब्धि पर चर्चा छोडक़र महिला वैज्ञानिकों के पहनावे पर चर्चा हो रही। इसरो वैज्ञानिकों ने चांद पर चंद्रयान भेज दिया खोज करने के लिए और यहां के धर्म, संस्कृति के ठेकेदार महिलाओं वैज्ञानिकों की चूड़ी,बिंदी, मंगलसूत्र खोज लाये।
मने हद्द है बलात्कार से लेकर वैज्ञानिक खोज तक कुछ भी हो जाए चर्चा सिर्फ महिलाओं के कपड़े की ही होगी। मतलब अगर ये वैज्ञानिक साड़ी, चूड़ी, बिंदी, मंगलसूत्र पहनकर काम नहीं करतीं तो चंद्रयान चांद पर नहीं पहुंचता क्या..!!
अच्छा ये हिंदू संस्कृति परंपरा का ठेका महिलाओं पर ही रहेगा कि पुरुष भी पहनावे में परिवर्तन कर कुछ ठेका लेंगे..!!
वैसे इसरो की अधिकतर महिला वैज्ञानिक दक्षिण भारत से हैं। जहां ऐसा ही पहनावा पहना जाता है। इसलिए वो सभी अपने कार्यस्थल पर भी वैसे ही रहती हैं, जैसे वो रहती आईं हैं।
पहनावे का बुद्धि या सोच से कोई संबंध नहीं है। वो महिला वैज्ञानिक भले साड़ी, बिंदी, चूड़ी, मंगलसूत्र पहनी हों, लेकिन उनकी सोच संकीर्ण, विक्षिप्त नहीं होगी तुम ठेकेदारों की तरह। और इसे परखने के लिए कहीं उनके पास चले ना जाना, वरना मुंहतोड़ जवाब भी दे देंगी तुम सबको वो।
तो... महिलाओं के कपड़े पर चर्चा महिलाओं को ही करने दो, तुम सब अपना थोड़ा वाला दिमाग का ज्यादा खर्चा करके अपनी पितृसत्ता सोच को दुरुस्त करने पर चर्चा कर लो। ठीक है..!!
विष्णु नागर
दुनिया का सबसे सुंदर फूल कौन सा है? कोई भी हो सकता है,वह भी जिसे हम रोज देखते-बटोरते हैं। जिसकी सुगंध हमारे दिल दिमाग में बसी हुई है।कायदे से तो वही फूल मेरे लिए सबसे खूबसूरत होना चाहिए मगर समस्या यह है कि उसी फूल को सबसे सुंदर मानना हमें आता नहीं! हम सोचते हैं, जो सर्वसुलभ है, जिसकी गंध हमारे अंदर बसी हुई है, वह खूबसूरत कैसे हो सकता है?
फिर दूसरी मुश्किल यह है कि आज तक देखे-सूँघे-बरते किसने सारे फूल? इसलिए हमें जो सबसे सुंदर लगे, वही सबसे सुंदर हुआ। जो आपके लिए सुंदर है, जरूरी नहीं, वही मेरे लिए सुंदर हो!
किसी के लिए उसकी सुंदरता का मतलब केवल दिखने की सुंदरता हो सकता है। किसी के लिए जब तक वह सुंदरता, सुवासित भी न हो, सुंदरता नहीं हो सकती ! इनमें से किसे गलत माना जाए? क्या उसे, जो केवल सुंदरता पर रीझा है या उसे, जिसके लिए सुंदर वह है,जो सुगंधित भी है या उसे जो मानता है कि सौंदर्य ही अपने आप में सुगंध है?
कौन बताएगा कि किसी को कि क्या सुंदर है? केवल वे बताएँगे, जिन्हें फूलों या किसी भी प्रकार की सुंदरता से साधारणतया प्रेम है और जो किसी फूल या किसी और की सुंदरता के बारे में अपना मत बदलने का साहस रखते हैं। सबमें यह साहस भी नहीं होता।
किसी सुंदर फूल ने दुनिया के किसी आदमी को कभी मना नहीं किया कि तुम मुझे देख नहीं सकते, तोड़ नहीं सकते। जब भी मना किया, मैंने मना किया, आपने मना किया।
सुंदर से सुंदर तितली ने कभी अपनी सुंदरता पर अभिमान नहीं किया। उसने यह सीखा ही नहीं। हममें से कोई उसे सिखाए-बताए,यह हमारी हैसियत नहीं।
यही फलों के साथ है।हमने कोई फल यह समझ कर तोड़ा या खरीदा कि यह काफी मीठा होगा पर मान लो, वह उतना मीठा नहीं निकला। कुछ फीका निकला मगर फल इस कारण कभी शर्मिंदा हुआ? सड़ गया हमारी उपेक्षा के कारण उसने हमें दोष दिया?या मीठा निकलने का अभिमान किया?
जिस पेड़ के पास जितनी छाया थी, उसने सबकी सब हमें दी। अपने पास किसी कल के लिए बचा कर नहीं रखी। न इसे उसने अपनी उदारता माना, न कोई कभी उससे यह मनवा पाया। न यह उसने कभी माना कि वह दाता है और हम भिखारी!
तो क्या सारी गड़बड़ हमारे साथ है?और क्या यह सच नहीं कि हममें से बहुत थोड़े लोग किसी तितली, किसी फूल, किसी छायादार पेड़ की तरह होते हैं? ऐसे लोग अपवाद होते हैं मगर कोई फूल, कोई तितली, कोई पेड़ अपवाद नहीं होता!
-दीपक मंडल
इस साल जनवरी में जब अमेरिकी शॉर्ट सेलर कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च ने अदानी ग्रुप पर शेयरों में मैनिपुलेशन का आरोप लगाया था तो इसके मालिक गौतम अदानी दुनिया के तीसरे सबसे अमीर शख्स थे।
लेकिन इस रिपोर्ट के आते ही उनकी संपत्ति 120 अरब डॉलर से घटकर 39।9 अरब डॉलर रह गई थी।
यानी रातों-रात उनकी संपत्ति घट कर एक तिहाई हो गई थी। हिंडनबर्ग रिसर्च ने अदानी ग्रुप पर अपनी कंपनियों के शेयरों की कीमतों में छेड़छाड़ करने और टैक्स हैवन्स देशों के जरिये फर्जीवाड़े को अंजाम देने का आरोप लगाया था।
हालांकि तब से लेकर अब तक अदानी ग्रुप की कुछ कंपनियों के शेयरों में काफी रिकवरी हो चुकी थी। लेकिन 31 अगस्त को ब्रिटिश अखबार ‘द गार्डियन’ और ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने ओसीसीआरपी के दस्तावेजों के आधार पर छपी रिपोर्ट ने इस ग्रुप को एक बार फिर परेशान कर दिया।
इस रिपोर्ट के आने के बाद अदानी ग्रुप की कंपनियों ने शेयर बाजार में अब तक लगभग 35,200 करोड़ रुपये गंवा दिए। ऑर्गनाइज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट यानी ओसीसीआरपी के दस्तावेज़ों में क्या है, जिसे मीडिया में छापा गया है?
‘द गार्डियन’ और ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने ओसीसीआरपी के जिन दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट छापी है, उसमें कहा गया है कि टैक्स हैवन्स देश मॉरीशस के दो फंड - इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड (ईआईएफएफ) और ईएम रीसर्जेंट फंड (ईएमआरएफ) ने 2013 से 2018 के बीच अदानी ग्रुप की चार कंपनियों में पैसा लगाया और इनके शेयरों की खरीद-फरोख्त भी की।
इन दोनों फंड्स के जरिये यूएई के निवेशक नासिर अली शाबाना अहली और ताइवान के निवेशक चांग चुंग लींग ने इन कंपनियों में पैसा लगाया था।
ये पैसा बरमूडा के इन्वेस्टमेंट फंड ग्लोबल अपॉच्युनिटीज के जरिये लाया गया। 2017 में नासिर अली और चांग चुंग लींग के इस निवेश की कीमत लगभग 43 करोड़ डॉलर थी। इस वक्त इसकी कीमत (मौजूदा एक्सचेंज रेट) 3550 करोड़ रुपये है।
जनवरी 2017 में इन दोनों निवेशकों की अदानी इंटरप्राइजेज, अदानी पावर और अदानी ट्रांसमिशन में क्रमश: 3.4, 4 और 3.6 फीसदी हिस्सेदारी थी।
ओसीसीआरपी के दस्तावेज़ों के मुताबिक गौतम अदानी के भाई और अदानी प्रमोटर ग्रुप के सदस्य विनोद अदानी की यूएई स्थित गुप्त कंपनियों एक्सेल इन्वेस्टमेंट और एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड को ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ की ओर से जून 2012 से अगस्त 2014 के बीच 14 लाख डॉलर दिए गए।
ओसीसीआरपी की पड़ताल में पाया कि ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ विनोदी अदानी के कहने पर अदानी ग्रुप की कंपनियों में पैसा लगा रहे थे।
इसका मतलब ये कि ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ जैसे फंड ऐसी मुखौटा कंपनियां थीं जिनके जरिये विनोद अदानी ने अदानी ग्रुप की कंपनियों में भारी पैसा लगाया था। इससे किसी रियल बिजऩेस के आधार पर नहीं बल्कि इस फंड के आधार पर कंपनी की वित्तीय स्थिति बहुत अच्छी लग रही थी।
इससे शेयर बाजार में कंपनी की स्थिति बहुत अच्छी लग रही थी। लिहाजा निवेशकों का ग्रुप की कंपनियों की ओर रुझान काफी बढ़ा हुआ था। कंपनी का कारोबार उतना अच्छा नहीं था, जितना शेयर बाज़ार में इसके शेयरों के प्रदर्शन से लग रहा था।
दरअसल विनोद अदानी के कहने पर नासिर अली और चांग चुंग लींग के फंड्स ने अदानी ग्रुप की कंपनियों में जो पैसा लगाया। उससे अदानी ग्रुप की कंपनियों की कंपनियों अदानी एंटरप्राइज़ेज़ और अदानी ट्रांसमिशन में प्रमोटर ग्रुप (जिसके विनोद अदानी सदस्य थे) की हिस्सेदारी 78 फीसदी से ज्यादा (जनवरी 2017) हो गई।
ये सिक्योरिटीज कांट्रेक्ट्स (रेगुलेशन) रूल्स 1957 के नियम 19ए का उल्लंघन था, जिसके मुताबिक शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों को 25 फीसदी पब्लिक होल्डिंग के नियम का पालन करना पड़ता है।
नियम 19ए क्या है?
सिक्योरटीज कांट्रेक्ट्स (रेगुलेशन) रूल्स 1957 का नियम 19ए , 4 जून 2010 को एक संशोधन के जरिये लाया गया था। इसके मुताबिक शेयर बाजार में सूचीबद्ध हर लिस्टेड कंपनी को 25 फीसदी की पब्लिक शेयर होल्डिंग के नियम का पालन करना होगा। यानी उसे अपने 25 फीसदी आम निवेशकों की खरोद-फरोख्त के लिए रखना होगा।
इस हिस्सेदारी में प्रमोटर या प्रमोटर ग्रुप में शामिल शख्स के पति या पत्नी, माता-पिता, भाई, बहन या बच्चों के अलावा ग्रुप की सब्सीडियरी कंपनियों और एसोसिएट कंपनियों की भागीदारी नहीं होगी।
कंपनी के शेयरों की प्राइस डिस्कवरी यानी शेयरों की कीमतें निर्धारित करने में ये अहम है। इस नियम का उल्लंघन ये संकेत देता है कि शेयरों की कीमतों में कृत्रिम रूप से छेड़छाड़ की गई है। इससे इनसाइडर ट्रेडिंग के संकेत भी मिलते हैं। इससे शेयर बाज़ार की विश्वसनीयता को भी झटका लगता है।
ओसीसीआरपी की वेबसाइट पर इस मामले से जुड़ी रिपोर्ट में भारतीय शेयर बाजार के विशेषज्ञ और पारदर्शिता आंदोलनकारी अरुण अग्रवाल से बात की गई है।
उन्होंने कहा कि किसी कंपनी के पास अपने 75 शेयर होना गैरकानूनी नहीं है लेकिन ऐसा करके वो बाज़ार में शेयरों की कृत्रिम कमी पैदा करती है। इससे कंपनी अपने शेयरों की वैल्यू बढ़ा लेती है।
शेयरों की कीमत बढऩे से मार्केट कैपिटलाइजेशन (बाज़ार में मौजूद शेयरों को उनकी कीमतों से गुना करने पर हासिल मूल्य) भी बढ़ जाती है। यानी शेयरों की कीमतों में छेड़छाड़ (मैनिपुलेशन) से कंपनी अपनी संपत्ति बढ़ा लेती है।
अदानी-हिंडनबर्ग मामले में सामने आई जांच कमेटी की रिपोर्ट, सेबी को लेकर क्या कहा?
अदानी ग्रुप ने इस रिपोर्ट पर क्या कहा?
अदानी ग्रुप ने पूरी रिपोर्ट को ये कहकर खारिज कर दिया है कि ये ‘री-साइकिल्ड’ है। यानी पुरानी रिपोर्ट को नए अंदाज में पेश किया गया है।
इसमें कहा गया है कि ये दिग्गज निवेशक जॉर्ज सोरोस से जुड़े लोगों की ओर से तोड़-मरोड़ कर पेश की गई रिपोर्ट है। इसे विदेशी मीडिया के एक हिस्से का भी समर्थन मिल रहा है।
ग्रुप ने कहा कि पत्रकारों ने जिस मॉरीशस फंड का नाम लिया है वो पहले भी हिंडनबर्ग रिपोर्ट में आ चुका है। अदानी ग्रुप पर लग रहे आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं।
इसमें हिंडनबर्ग के आरोपों को ही दोहराया गया है। मीडिया मे जारी बयान में अदानी ग्रुप ने कहा है इसकी कंपनियां पब्लिक शेयरहोल्डिंग संबंधित रेगुलटरी नियमों का पालन कर रही हैं।
ग्रुप ने कहा है कि ये सोरोस समर्थित संगठनों की हरकत लग रही है। विदेशी मीडिया का एक हिस्सा भी इसे हवा दे रहा है ताकि हिंडनबर्ग रिपोर्ट का हौवा एक बार फिर खड़ा किया जा सके। समूह ने कहा है कि ये दावे एक दशक पहले बंद मामलों पर आधारित हैं।
कंपनी ने कहा है कि तब डीआरआई ने ओवर इन्वॉइसिंग, विदेशों में फंड ट्रांसफर करने, रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शंस और एफपीआई के जरिए निवेश के आरोपों की जांच की थी। एक इंडिपेंडेंट एडजुकेटिंग अथॉरिटी और एक अपीलीय ट्रिब्यूनल ने इस बात की पुष्टि की थी कि कोई ओवर-वैल्यूएशन नहीं था और ट्रांजैक्शंस कानूनों के मुताबिक थे।
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला दिया था। इसलिए इन आरोपों का कोई आधार नहीं है।
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में सेबी की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि जिस दौरान अदानी ग्रुप में कथित तौर पर गैरकानूनी फंडिंग की गई उस दौरान बाजार नियामक सेबी के चीफ यू सी सिन्हा थे।
इस साल मार्च में उन्हें अदानी समूह के मीडिया वेंचर एनडीटीवी का नॉन एक्जीक्यूटिव चेयरमैन बनाया गया। हालांक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने जब यूसी सिन्हा से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उनका नाम रिपोर्ट में नहीं है।
अलबत्ता कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा, ‘2014 में अदानी ग्रुप के खिलाफ जांच हुई। इसमें सेबी को सुबूत दिए गए और सेबी ने अदानी को क्लीन चिट दे दी। जिस जेंटलमैन ने अदानी को क्लीन चिट दी उन्हें अब एनडीटीवी में डायरेक्टर बना दिया गया है। इसलिए ये साफ है कि कुछ बड़ा गलत हुआ है।’’
ओसीसीआरपी क्या है?
ओसीसीआरपी खोजी पत्रकारों की ओर से बनाया गया संगठन है। इसकी स्थापना 2006 में हुई थी। शुरू में इसे यूनाइटेड नेशन्स डेमोक्रेसी फंड ने फंडिंग की थी।
इस नेटवर्क का पहला दफ्तर साराजेवो में खोला गया था। ओसीसीआरपी में शुरू में छह पत्रकार थे लेकिन अब 30 देशों में इसके 150 से ज्यादा पत्रकार काम करते हैं।
इसका उद्देश्य पत्रकारों का एक ग्लोबल नेटवर्क बनाना है जो आसानी से आपस में जानकारी शेयर कर सकें ताकि भ्रष्टाचार और अपराध के ग्लोबल नेटवर्क को अच्छी तरह समझ कर उसका पर्दाफाश किया जा सके।
ओसीसीआरपी ने अब तक अपराध और भ्रष्टाचार के 398 मामलों की पड़ताल की है। इसकी वजह से 621 गिरफ्तारियां और सजा हो चुकी हैं। 131 लोगों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा है और 10 अरब डॉलर से ज्यादा का जुर्माना लगाया है और या इतनी राशि रिकवर हुई है।
जॉर्ज सोरोस का ओसीसीआरपी से क्या नाता है?
ओसीसीआरपी को दुनिया के कई बड़े संगठन वित्तीय मदद देते हैं। जॉर्ज सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन भी इसे वित्तीय मदद देता है।
ओपन सोसाइटी फाउंडेशन दुनिया के 120 देशों में काम करता है। इसे 1984 में बनाया गया था। जब अदानी ग्रुप पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आई थी तब जॉर्ज सोरोस ने कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विदेशी निवेशकों और देश की संसद के सवालों का जवाब देना होगा
जॉर्ज सोरोस हंगरी मूल के अमेरिकी कारोबारी और परोपकारी हैं। 2021 में उनकी कुल संपत्ति 8।6 अरब डॉलर थी। उन्होंने 32 अरब डॉलर की अपनी सपंत्ति ओपन सोसाइटी फाउंडेशन को दे दी थी। इनमें से 15 अरब डॉलर बांट दिए गए हैं। ओपन सोसाइटी फाउंडेशन की वेबसाइट के मुताबिक़ ये एक ऐसे जीवंत और समावेशी लोकतंत्र के लिए काम करता है जिसमें सरकारें अपने लोगों के लिए जवाबदेह हों।
हिंडनबर्ग मामले में अब तक क्या-क्या हुआ है?
25 जनवरी को अमेरिकी शॉर्ट सेलिंग कंपनी ‘हिंडनबर्ग’ ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें अदानी ग्रुप पर शेयरों के दामों में गड़बड़ी करने औैर टैक्स हैवन्स का गलत इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए।
इसमें कंपनी पर बहुत ज्यादा कर्ज होने का भी जिक्र था। अदानी ग्रुप ने इसका खंडन किया। लेकिन इसके बाद कंपनी की संपत्ति में काफी तेजी से गिरावट आई और ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदानी की संपत्ति 120 अरब डॉलर से घटकर 39.9 अरब डॉलर रह गई थी।
फिलहाल इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में जांच चल रही है। हालांकि इस मामले की जांच के लिए बनी एक्सपर्ट कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि जांच में अदानी ग्रुप की कमी सामने नहीं आई। वैसे हिंडनबर्ग रिपोर्ट से पहले कुछ संस्थाओं ने अदानी ग्रुप के शेयरों की शॉर्ट पोजिशन ले ली थी इसके शेयरों में गिरावट से मुनाफा कमाया।
सेबी ने इस मामले में 25 अगस्त को अपनी रिपोर्ट दाखिल की। सेबी ने बताया कि उसने कुल 24 पहलुओं की जांच की। इसमें से 22 की जांच पूरी हो चुकी है। दो जांच की रिपोर्ट अंतरिम है। सेबी ने बताया कि वह अपनी जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगा।
सेबी की विस्तृत जांच रिपोर्ट अभी सामने नहीं आ आ पाई है। 24 मामलों की जांच के दौरान उसने क्या-क्या कदम उठाए। जांच में मिला क्या, इसकी जानकारी फिलहाल नहीं दी गई है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के.पालीवाल
संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के पद की परिकल्पना करते समय यह नहीं सोचा होगा कि आजादी के बाद दिनों दिन विकृत होती राजनीति में इस महत्त्वपूर्ण पद की गरिमा, जिसे देश में राष्ट्रपति की तरह राज्य में प्रथम नागारिक का दर्जा दिया जाता है, इस तरह धूमिल होगी कि कभी सर्वोच्च न्यायालय उनके आचरण पर कड़ी टिप्पणी करेंगे, कभी मीडिया गलत कारणों से उनका जिक्र करेगा और अक्सर राज्य सरकारें उन पर राज्य में चुनी हुई सरकार को गिराने के षडयंत्र रचने और असंवैधानिक कृत्य के संगीन आरोप लगाएंगी।
अब यह आम धारणा हो गई है कि राजनीति सेवा की जगह अपने लिए मेवा और साधन सुविधाएं जुटाने का जरिया बन गई है। बहुत से नेता राजनीति में अपने उद्योग और व्यापारों की ढाल बनने के लिए आते हैं। राजनीति बहुत सारे अपराधियों के लिए सुरक्षित शरण स्थली बन गई है। इन्ही सब कारणों से अक्सर केन्द्र में सत्तारूढ़ दल राज्यों में अपने दल के विस्तार के लिए राज्यपालों का उपयोग करता है। खांटी राजनीतिज्ञों के राजभवन पहुंचने से राजभवन केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की जगह शह मात के खेल की गोट बन गए हैं। केंद्र सरकार के विरोधी दलों की राज्य सरकार राज्यपालों को कुछ कुछ उसी तरह की शंका से देखने लगी हैं जैसे आजादी के पहले देशी रियासतें ब्रिटिश रेजिडेंट्स को देखती थी। राज्यपालों की गरिमा का यह ह्रास बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
जहां-जहां केंद्र में सत्तारूढ़ दल के विरोधी दल की सरकार हैं वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री में तनातनी आम होती जा रही है। आजकल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू और पंजाब आदि राज्यों से राज्यपालों और प्रदेश सरकार के वाद विवाद चर्चा में हैं। राज्यपाल द्वारा महिलाओं के साथ हुए अपराधों को लेकर राज्य सरकार की कन्या श्री योजना पर की गई टिप्पणी की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आलोचना की है कि उन्हें किसी एक घटना से महिलाओं के हित की बड़ी योजना पर प्रश्नचिन्ह नहीं खडा करना चाहिए। हाल ही में पंजाब के राज्यपाल ने प्रदेश सरकार द्वारा राजभवन द्वारा राज्य में बढते नशे की स्थिति पर मांगी गई रिर्पोट नहीं मिलने पर नाराजगी जताते हुए कारवाही की चेतावनी दी है।
आम आदमी पार्टी ने राज्यपाल की चेतावनी की आलोचना की है कि वे चुनी हुई सरकार को परेशान कर रहे हैं। यह सच भी है कि विपक्षी दलों की सरकारों की छोटी छोटी कमियों को राज्यपाल बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं लेकिन डबल इंजन सरकार के मामले में बडी घटना पर भी चुप रहते हैं।मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासी के साथ मल मूत्र कांड हुआ, व्यापम जैसा बड़ा घोटाला हुआ, हाल ही में पटवारी परीक्षा घोटाला हुआ लेकिन यहां के राज्यपाल इस तरह की सक्रियता नहीं दिखाते जैसी विपक्षी दलों की राज्य सरकारों के लिए दिखाई जाती है।उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी बहुत से ऐसे संगीन अपराध होते हैं जिन पर किसी भी संवेदनशील नागरिक को पीड़ा होती है लेकिन अपने दल की सरकारों के प्रति राज्यपालों का नजरिया एकदम अलग होता है। उन्हें कार्यवाही की धमकी तो दूर उचित कार्यवाही के लिए कोई सलाह तक नहीं दी जाती।मणिपुर कई महीने से हिंसा की आग में झुलस रहा है लेकिन वहां के राज्यपाल ने प्रदेश सरकार को वैसी धमकी नहीं दी जैसी पंजाब के राज्यपाल दे रहे हैं।
कुछ माह पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल की प्रदेश की नई सरकार बनवाने में की गई भूमिका पर प्रतिकूल टिप्पणी की थी। इससे भी राज्यपालों की भूमिका पर प्रश्न उठते हैं। यदि राज्यपालों और विपक्षी दलों की प्रदेश सरकारों के बीच मतभेद इसी तरह बढते रहे तो महाराष्ट्र की तरह और प्रदेशों के विवाद भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पहुंच सकते हैं। कालांतर में यह मांग भी जोर पकड़ सकती है कि सी बी आई, ई डी और चुनाव आयुक्तों आदि की नियुक्तियों की तरह अब राज्यपालों की नियुक्तियों के लिए भी वैसे ही पैनल बनाए जाने की आवश्यकता है।
वीरेन्द्र यादव
आज (1 सितम्बर) राही मासूम रज़ा का जन्मदिन है। यह एक दिलचस्प लेकिन ध्यान देने की बात है कि राही उर्दू के मशहूर और मकबूल शायर थे, लेकिन उर्दू वाले उनके औपन्यासिक लेखन को बिल्कुल तरजीह नहीं देते थे।वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के अस्थायी अध्यापक थे। जब उनके स्थायीकरण के लिए कमेटी बैठी तब उन्हें खारिज करते हुए सर्वसम्मति से यह दलील दी गई कि उन्हें साहित्य की समझ नहीं है।इस चयन समिति के अध्यक्ष प्रो। आले अहमद सुरुर थे, जो उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी थे।
दरअसल उनका चयन न किए जाने का मुख्य कारण नवाब रामपुर के दामाद कर्नल यूनुस की पत्नी नय्यर जहाँ से उनका प्रेम विवाह था।इस कारण उर्दू साहित्य और मुस्लिम समाज के अरिस्टोक्रेट से लेकर तरक्कीपसंद तक सभी उनसे दुराव रखते थे। यहाँ तक कि ‘आधा गाँव’ उपन्यास, जो मूल रूप से फारसी लिपि में लिखा गया था उर्दू में न छपकर लिप्यांन्तरण होकर पहले हिंदी में छपा। उसके अंग्रेजी सहित कई अन्य भाषाओं में तो अनुवाद हुए, लेकिन उर्दू में वह बहुत बाद में वर्ष 2003 में कलकत्ता के एक प्रकाशन द्वारा हिंदी वालों के सहयोग से 38 वर्ष बाद ही प्रकाशित हो सका।
राही ने ‘आधा गाँव’ में जिस तरह मुस्लिम अभिजन समाज को निशाने पर लेते हुए एक इनसाइडर के रूप में क्रिटिक किया है, वह उर्दू के लिटरेरी इस्टैबलिशमेंट को स्वीकार नहीं था। इस बारे में मेरा भी एक दिलचस्प अनुभव है।मैंने वर्ष 2001 में ‘आधा गाँव’ पर एक विस्तृत आलोचनात्मक लेख लिखा था, जिसमें प्रसंगवश ‘आग का दरिया’, ‘उदास नस्लें’ और ‘छाको की वापसी’ की तुलना भी की गई थी। ‘तद्भव’-5’ में प्रकाशित उस लेख को साजिद रशीद (मरहूम) मुम्बई से प्रकाशित अपनी उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘नया वरक’ में अनुवाद करवा कर छापना चाहते थे।
हमारे लखनऊ के उर्दू साहित्य के मर्मज्ञ साथी वकार नासिरी इसके लिए खुशी- खुशी तैयार थे। े पहले भी मेरे ‘गोदान’ पर लेख का अनुवाद ‘नया वरक़’ के लिए कर चुके थे। वकार मुझसे ‘तद्भव’ की वह प्रति ले गए, लेकिन अगले ही दिन मेरे कार्यालय पहुंचने के पहले वे नमूदार हुए। काफी आक्रोश भरे स्वर में पत्रिका वापस करते हुए उन्होंने उलाहना दिया कि यह तो तकरीबन कुफ्र सरीखा है कि ‘आधा गाँव’ के समकक्ष ‘आग का दरिया’ रखकर उसकी तुलना की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि ‘आप हिंदी वालों के लिए राही बड़े नाविलनिगार होंगें, लेकिन उर्दू अदब में बहैसियत नावेलिस्ट उनका कोई मुकाम नहीं है।’
मैं यह सब सुनकर सकते में था। बाद में उस लेख को साजिद रसीद ने कानपुर के एक साथी से अनुवाद कराकर प्रकाशित किया। तभी मुझे यह भी याद आया था कि हिंदी वालों ने भी तो ‘आधा गाँव’ को जोधपुर और मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से अश्लीलता का आरोप लगाकर निकलवाया था और साहित्य अकादमी सम्मान की सूची से भी वे बहिष्कृत ही रहे थे। दरअसल राही को अपने स्वाभिमान और प्रतिबद्धता की कीमत आजीवन चुकानी पड़ी थी। आज उनकी जयंती के बहाने यह सब याद आ गया। सादर नमन।
पंकज श्रीवास्तव
खेल और सांस्कृतिक क्षेत्र पर भी सरकार पूरा ध्यान दे रही है। इसी के तहत 2022 में छत्तीसगढिय़ा ओलंपिक की परंपरा शुरू की गयी जिसमें 14 पारंपरिक खेलों की स्पर्धाएं होती हैं। साथ ही 2226 किलोमीटर की राम वन गमन परिपथ परियोजना को 137 करोड़ 45 लाख रुपये की लागत से विकसित किया जा रहा है। भगवान राम ने 14 साल के वनवास के 10 वर्ष छत्तीसगढ़ में ही बिताये थे। छत्तीसगढ़ पर्व सम्मान निधि के अंतर्गत गैर अनुसूचित क्षेत्रों की 6111 ग्राम पंचायतों में तीज त्यौहार मनाने के लिए 10 हजार रुपए की दो किस्तें दी जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कार्यकाल तमाम समस्याओं से ग्रस्त इस राज्य के इतिहास में कायाकल्प के रूप में दर्ज हो गया है। उन्होंने ज़मीनी अनुभव और दूरदृष्टि से देश को शासन-प्रशासन का ऐसा ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ दिया है जो किसी चमकम विज्ञापनी अभियान की वजह से चर्चा में नहीं आया बल्कि इसने सूबे के किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं से लेकर व्यापारियों तक की जि़ंदगी में रंग भरा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव किया है।
छत्तीसगढ़ एक कृषिप्रधान राज्य रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए न्याय योजनाओं के माध्यम से किसानों के साथ-साथ पशुपालकों और खेतिहर मज़दूरों को भी आर्थिक लाभ दिया गया। भूपेश बघेल सरकार ने 17 लाख 82 हजार किसानों का 9,270 करोड़ का कर्ज माफ किया। सिंचाई ऋण का 325 करोड़ माफ किया। यही नहीं, बस्तर में लोहांडीगुड़ा के 1707 किसानों की अधिग्रहण की गयी 4200 एकड़ भूमि उन्हें वापस लौटाई गयी। अधिग्रहीत भूमि को किसानों को वापस मिलना एक विरल घटना है।
भूपेश बघेल सरकार ने मत्स्य पालन और पशुपालन की अहमियत को समझा जिससे की बड़ी आबादी जुड़ी हुई है। इसके लिए क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ऋण सुविधा योजना लागू की गयी। मछली पालन को कृषि का दर्जा देने का असर ये हुआ कि छत्तीसगढ़ मत्स्य पालन में देश में छठवाँ और मछली बीज उत्पादन में पाँचवाँ स्थान प्राप्त कर चुका है। इसी के साथ लाख की खेती को भी कृषि का दर्जा दिया गया। लाख की खेती करने वाले 50 हजार किसान इस समय चार हजार टन लाख का उत्पादन करते हैं जिसका मूल्य लगभग सौ करोड़ रुपये है। बिजली के क्षेत्र में किसानों को लगभग 11 हजार करोड़ की राहत मुख्यमंत्री के पहले चार साल के कार्यकाल में दी गयी। राज्य में 400 यूनिट विद्युत खपत पर 50 फीसदी की छूट दी जा रही है। एससी, एसटी वर्ग के किसानों को सिंचाई हेतु निशुल्क बिजली दी जा रही है। खेत मज़दूरों के पास जमीन का मालिकाना नहीं होता लेकिन खेती की तरक्की में उनका योगदान बेहद अहम होता है। इसीलिए भूपेश बघेल सरकार उन्हें 7 हजार रुपये वार्षिक की सहायता दे रही है। करीब 5 लाख 63 हजार परिवार इस योजना का लाभ ले रहे हैं।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लागत मूल्य और बाज़ार मूल्य के दुष्चक्र को बड़े करीब से देखा है। इसलिए उन्होंने विभिन्न फसलों के समर्थन मूल्य में भारी इजाफा किया है। समर्थन मूल्य पर दलहनी फ़सलों की खरीद सुनिश्चित की है। धान खरीद केंद्रों की संख्या 2617 हो चुकी है। प्रति एकड़ 15 की जगह 20 क्विंटल धान खरीदी करने का ऐलान हो चुका है। बारदाने का मूल्य भी 18 से बढ़ाकर 25 रुपये कर दिया गया है। यह भी तय किया गया है कि जिस रकबे से किसान द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान विक्रय किया गया था, यदि वह धान के बदले कोदो, कुटकी, गन्ना, अरहर आदि या केला,पपीता की खेती या फिर वृक्षारोपण भी करता है तो उसे प्रति एकड़ दस हजार रुपये की इनपुट सब्सिडी दी जाएगी। साथ ही महुआ, इमली, चिरौंजी, शहद समेत 65 लघु वनोपज की सरकार उचित दाम पर खरीद कर रही है। लघु वनोपज प्रसंस्करण से जुड़ी महिला स्वयं सहायता समूहों की संख्या 4239 से बढक़र 17,424 हो गई है और राज्य में 3945 ग्राम स्तरीय संग्रहण केन्द्र संचालित हैं। ये तस्वीर सारी कहानी खुद कहती है।
छत्तीसगढ़ की गोधन न्याय योजना मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का एक ऐसा अभिनव प्रयोग है जिसकी सराहना पूरे देश में हो रही है। इस योजना ने गोबर को भी आय का स्रोत बना दिया। सरकार इस योजना के तहत 2 रुपये किलो की दर से गोबर और 4 रुपये लीटर की दर से गोमूत्र खरीद रही है। इस योजना के तहत 10,278 गौठान निर्मित किए गये और 3,63,127 पशुपालकों को इसका लाभ हुआ। इस योजना के तहत 542 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। इस योजना ने स्थानीय स्तर पर जैविक खाद उत्पादन को गति दी है, साथ ही आवारा पशुओं की समस्या को भी नियंत्रित किया है। यही नहीं गौठानों को महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगिक पार्क योजना (रीपा) के तहत विकसित किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ की सुराजी गाँव योजना गांधी जी के ग्राम स्वराज की याद दिलाता है। नरवा (बरसाती नाले), गरुवा (पशुधन), घुरवा (कम्पोस्ट खाद निर्माण) और बारी (सब्जी और फलोद्यान) के विकास ने पूरी तस्वीर बदल दी है। 30 हजार नरवा के विकास से सिंचाई रकबे में 11,564 हेक्टेयर की वृद्धि हुई है जो एक मिसाल है। गरवा कार्यक्रम के तहत लगभग छह हजार स्वालंबी गौठानें सक्रिय हैं जिन्होंने 212336 स्वसहायता सदस्यों को रोजगार उपलब्ध कराया है। घुरवा कार्यक्रम के तहत अप्रैल 2023 तक 32.72 लाख क्विंटल जैविक खाद का उत्पादन हुआ और बारी के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक बाडिय़ों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ। सहकारिता के क्षेत्र में भी लगातार तरक्की देखी जा रही है। सहकारी चीनी मिलों में इथेनॉल प्लांट की स्थापना हुई। बस्तर और सरगुजा में सुलभ बैंकिंग सुविधा शुरू हुई। कृषि साख सहकारी समितियों की संख्या बढक़र 2058 हो गयी।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने को लेकर काफी सचेत हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी और हिंदी माध्यम स्कूल खोले गये जिनमें 2 लाख 5 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है। इसी के साथ 10 महाविद्यालय खोलने की भी स्वीकृति दी गयी है। सरकार बेरोजगारों को हर महीने 2500 रुपये बेरोजगारी भत्ता दे रही है। युवाओं की रचनात्मकता को पंख देने के उद्देश्य से 13,242 राजीव मितान क्लब गठित किये गये हैं जिन्हें प्रति वर्ष एक लाख रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। इसके अलावा सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाओं की फीस माफ कर दी गयी है। रोजगार मिशन के तहत सरकार ने 15 रोजगार के अवसर सृजित करने का लक्ष्य रखा है जिसे लगातार पूरा किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ की मुख्यमंत्री हाट-बाजार क्लीनिक योजना ने स्वास्थ्य सेवाओं को दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँचाया है। इस योजना से 1.16 करोड़ लोग लाभान्वित हुए हैं। इसी तरह शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना के तहत 51 लाख और दाई-दीदी क्लीनिक से 1,52,361 लोगों को लाभ हुआ है। इसी तरह डॉ.खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के तहत अब तक 24 लाख लोग लाभान्वित हुए हैं। इसी के साथ मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के तहत 2643 मामलों में 80 करोड़ से ज़्यादा की सहायता दी गयी है। इसके तहत दुर्लभ बीमारियों में 20 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है। (बाकी पेज 8 पर)
राज्य में 10 मेडिकल कालेजों के बाद चार नये मेडिकल कालेजों भी स्वीकृत हुए हैं। राज्य में 195 श्री धन्वंतरी जेनेरिक मेडिकल स्टोर का संचालन हो रहा हैं जहाँ रियायती दर पर दवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
सरकार का महिला सशक्तिकरण पर पर विशेष ध्यान है। गरीब परिवारों की 10 लाख 61 हजार महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत 50 हजार रुपये का अनुदान दिया जा रहा है साथ ही सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में भी पाँच सौ रुपये दिये जा रहे हैं। महिलाओं को उद्योग स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है।
छत्तीसगढ़ में उद्योगों का भी तेजी से विकास हो रहा है। औद्योगिक नीति 2019-2024 में फूड, एथेनॉल, इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफेंस, दवा, सोलर जैसे नए उद्योगों को प्राथमिकता दी गई है। इसमें वनांचल उद्योग पैकेज के अंतर्गत स्थापित होने वाली इकाइयों अधिकतम 50 लाख प्रति वर्ष अनुदान देने का प्रावधान है। राज्य के 146 विकासखंड़ों में 200 फूड पार्कों की स्थापना की जा रही है। इस दौरान 2367 उद्योग स्थापित हुए, जिसमें 22 हजार 81 करोड़ रुपए की पूंजी का निवेश किया गया और 42,906 लोगों के लिए रोजगार का सृजन हुआ।
खेल और सांस्कृतिक क्षेत्र पर भी सरकार पूरा ध्यान दे रही है। इसी के तहत 2022 में छत्तीसगढिय़ा ओलंपिक की परंपरा शुरू की गयी जिसमें 14 पारंपरिक खेलों की स्पर्धाएं होती हैं। साथ ही 2226 किलोमीटर की राम वन गमन परिपथ परियोजना को 137 करोड़ 45 लाख रुपये की लागत से विकसित किया जा रहा है। भगवान राम ने 14 साल के वनवास के 10 वर्ष छत्तीसगढ़ में ही बिताये थे। छत्तीसगढ़ पर्व सम्मान निधि के अंतर्गत गैर अनुसूचित क्षेत्रों की 6111 ग्राम पंचायतों में तीज त्यौहार मनाने के लिए 10 हजार रुपए की दो किस्तें दी जा रही हैं।
भूपेश बघेल सरकार सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराकर समाज के विभिन्न वर्गों के विकास और पिछड़ेपन की सच्ची तस्वीर सामने लाने का प्रयास कर रही है। इससे विकास योजनाओं को बनाने और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी। (लेखक दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
-कीर्ति दुबे
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से बीजेपी के सांसद वरुण गांधी का एक वीडियो क्लिप वायरल हो रहा है, जिसमें वो एक जनसभा के दौरान मंच पर साधु से बात कर रहे हैं।
वीडियो में वरुण गांधी मंच से कार्यकर्ताओं को संबोधित करते दिखते हैं, तभी पास में खड़े साधु फोन पर बात करने लगते हैं। जब मंच पर खड़े बाकी लोग साधु को ऐसा करने पर टोकते हैं, तो वरुण गांधी कहते हैं- ‘अरे, उन्हें टोको मत, क्या पता कब महाराज सीएम बन जाएँ।’
वरुण गांधी भाषण बीच में रोक कर कहते हैं, ‘महाराज जी, ले लीजिए फोन, क्या फर्क पड़ता है, हो सकता है कोई जरूरी कॉल हो।’
इसके बाद मंच पर खड़े साधु को दूसरे कार्यकर्ता किनारे करने लगते हैं, जिस पर वरुण गांधी साधु को अपने पास बुलाते हैं और कार्यकर्ताओं से कहते हैं, ‘आप बिल्कुल इनके साथ ऐसा मत करो, कल को मुख्यमंत्री बन जाएँगे तो हमारा क्या होगा। समय की गति को समझा करो।’ इसके बाद वरुण गांधी साधु से कहते हैं- ‘महाराज जी मुझे लगता है कि समय अच्छा आ रहा है।’
बीजेपी सांसद वरुण गांधी कई बार अपनी पार्टी और सरकार के खिलाफ बयानों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। पार्टी में अलग-थलग पड़ चुके वरुण गांधी के इस बयान को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तंज माना जा रहा है।
वरुण गांधी के बग़ावती तेवर
वरुण गांधी अक्सर ऐसे बयान देते हैं, जो बीजेपी की पार्टी लाइन से बिल्कुल मेल नहीं खाता। हाल ही में द हिंदू अख़बार के लिए लिखे लेख में उन्होंने देश के 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने के मिशन पर कहा था कि देश को इससे पहले एक बेहतर लोक हितकारी व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
देश में 91 फीसदी लोग ऐसे सेक्टर में काम कर रहे हैं, जहाँ उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती।
वरुण गांधी का ये लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दावे पर निशाना था, जिसमें वो देश को 2025 तक 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने की बात करते है।
पहले भी कई मौकों पर वरुण गांधी के स्टैंड ने बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी की हैं। उन्होंने कृषि बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों का समर्थन किया था, वो किसान जो मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ सडक़ों पर उतरे थे।
कई रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि वरुण गांधी की बयानबाजी उन पर भारी पड़ सकती है। ये भी दावा किया जा रहा है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में पीलीभीत से वरुण गांधी का टिकट कट सकता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 से ही वरुण गांधी ने पार्टी से जुड़े आयोजनों में हिस्सा लेना बंद कर दिया है। वो अब ख़ुद की जनसभाएँ करते हैं। बीते दिनों जब मोदी सरकार के नौ साल पूरे होने पर बीजेपी ने ‘महासंपर्क अभियान’ चलाया था तो वरुण गांधी इसमें शामिल नहीं हुए थे। इससे बीजेपी हाईकमान उनसे नाराज है।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं कि बीजेपी में वरुण गांधी साइडलाइन कर दिए गए हैं और ये उन्हें भी पता है।
प्रधान बताते हैं, ‘आज से चार साल पहले मैंने वरुण गांधी से पूछा था कि वो पार्टी के लाइन से अलग राय रखते हैं, इसका उन्हें नुकसान हो सकता है तो उन्होंने कहा था मैं तो वो कहता हूँ जो मुझे लगता है। वरुण गांधी ऐसे नेता हैं जिनकी जनता के बीच तगड़ी पकड़ है और ऐसे नेता मौजूदा बीजेपी को खासे पसंद नहीं आते। वरुण गांधी स्मृति ईरानी, हरदीप सिंह पुरी, पीयूष गोयल जैसे नेता नहीं हैं। जनता के बीच उनकी पकड़ भी है तो वो अपनी बात तथ्य और आँकड़ों पर बात करते हैं।’ हाल ही में कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने वरुण गांधी को लेकर कहा था कि उन्हें लगता है कि बीजेपी में रह कर वरुण गांधी अपने स्तर को कमज़ोर कर रहे हैं, वरुण गांधी को निश्चित रूप से इसे लेकर सोचना चाहिए।
शरद प्रधान मानते कहते हैं, ‘कुछ सालों पहले तक कांग्रेस वरुण गांधी को पार्टी में शामिल करने के पक्ष में थी ही नहीं क्योंकि ये डर था कि वो राहुल गांधी पर भारी पड़ सकते हैं। लेकिन भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी का आत्मविश्वास तो बढ़ा ही है उनकी छवि भी काफ़ी मज़बूत हुई है, तो अब कांग्रेस उन्हें पार्टी में लेने को लेकर सोच सकती है लेकिन अगर वरुण गांधी को कांग्रेस में शामिल भी कर लिया जाए तो उन्हें कोई बहुत महत्वपूर्ण पद मिल जाए ऐसा नहीं लगता।’ हालंकि वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह मानते हैं कि वरुण गांधी कांग्रेस में आएँगे या नहीं ये फ़ैसला सिर्फ गांधी परिवार का ही होगा, और इसके आसार बहुत कम है कि सोनिया गांधी इसके लिए कभी रजामंद हों।
‘2024 में वरुण गांधी का टिकट कटना तय’
जानकार मानते हैं कि साल 2024 में वरुण गांधी को बीजेपी टिकट नहीं देने वाली है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘वरुण गांधी के भीतर अहंकार बहुत हैं, वो एनटाइटलमेंट से भरे हुए हैं। लेकिन उनकी समस्या ये है कि कांग्रेस उनको लेगी नहीं और बीजेपी से उनका टिकट कटना तय है। ऐसे में बहुत मुश्किल है कि 2024 के बाद वो संसद में पहुँच पाएँ।’
शरद प्रधान ये तो मानते हैं कि 2024 में बीजेपी वरुण गांधी को टिकट नहीं देगी लेकिन वो कहते हैं कि वरुण निर्दलीय चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि प्रदीप सिंह इस संभावना को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, ‘सुल्तानपुर से उन्हें जिताने में बीजेपी को पापड़ बेलने पड़े। उन्हें सुरक्षित सीट पीलीभीत दी गई ऐसे में वो अपने दम पर चुनाव जीत लेंगे ये होता नहीं दिखता।’
योगी और वरुण गांधी के बीच कैसे हैं रिश्ते
माना जाता है कि वरुण गांधी साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले ख़ुद को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानते थे। लेकिन जब बीजेपी को राज्य में बहुमत मिला, तो जो दो नाम सामने आए वो थे मनोज सिन्हा और योगी आदित्यनाथ। वरुण गांधी का नाम दावेदारी की लिस्ट में भी नहीं था।
प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘साल 2017 से पहले इलाहाबाद में बीजेपी की बैठक थी और इसमें वरुण गांधी सीएम पद का चेहरा हैं, इसके संकेत देते हुए पोस्टर लगाए गए। ये बात बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को पसंद नहीं आई। इसके बाद वरुण गांधी को जनरल सेक्रेटरी के पद से हाटाया गया, राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटाया गया। इसके बावजूद वरुण गांधी लगातार ऐसे बयान देते आ रहे हैं जो पार्टी की लाइन से अलग है। योगी आदित्यनाथ और वरुण गाँधी के बीच कोई व्यक्तिगत मसला तो नहीं है, लेकिन ये मनमुटाव सीएम पद की कुर्सी को लेकर है।’
शरद प्रधान कहते हैं कि आज तक योगी आदित्यनाथ और वरुण गांधी के बीच शिष्टाचार मुलाक़ात की कोई तस्वीर नहीं सामने नहीं आई है।
‘आम तौर पर राज्य के सीएम से सांसद मिलने जाते हैं लेकिन ऐसी कोई मुलाक़ात दोनों के बीच नहीं हुई। हालात ऐसे हैं कि वरुण गांधी बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से तो साइडलाइन कर ही दिए गए हैं, राज्य इकाई में भी उनकी कोई पूछ नहीं है ।’
एक कि़स्सा याद करते हुए प्रधान बताते हैं कि एक बार मैंने वरुण गांधी से पूछा था कि आपको बीजेपी जगह क्यों नहीं देती?
इस सवाल पर उन्होंने मुझसे कहा था- वो (बीजेपी नेतृत्व) नहीं चाहते कि उन्हें ये सुनना पड़े कि बीजेपी को गांधी का सहारा लेना पड़ा। (bbc.com/hindi)
फ्रांस की सरकार ने स्कूलों में अबाया पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया है. मुस्लिम महिलाओं के इस परिधान को लेकर देश में लंबे समय से बहस जारी थी.
(dw.com)
फ्रांस ने अरबी परिधान अबाया को स्कूलों में प्रतिबंधित करने का ऐलान किया है। देश के शिक्षा मंत्री ने कहा है कि आमतौर पर मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला यह लिबास लड़कियां सरकारी स्कूलों में नहीं पहन सकेंगी। उन्होंने कहा कि यह परिधान फ्रांस की शिक्षा में सख्त धर्मनिरपेक्ष कानूनों का उल्लंघन करता है।
टीएफ1 टेलीविजन चैनल से बातचीत में शिक्षा मंत्री गाब्रिएल अटाल ने कहा, ‘अब स्कूलों में अबाया पहनना संभव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि वह राष्ट्रीय स्तर स्कूलों के लिए पर स्पष्ट नियम जारी करेंगे कि 4 सितंबर को जब दोबारा स्कूल खुलेंगे तो अबाया मान्य नहीं होगा।
फ्रांस हिजाब पर पहले ही प्रतिबंध लगा चुका है। अबाया को लेकर भी पिछले कई महीनों से देश में बहस चल रही थी। देश के अति दक्षिणपंथी लोग इस पर प्रतिबंध का समर्थन कर रहे थे जबकि वामपंथियों की दलील थी कि यह प्रतिबंध नागरिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन होगा।
ऐसी खबरें आती रही हैं कि फ्रांस की मुस्लिम लड़कियों में स्कूलों में अबाया पहनने का चलन लगातार बढ़ रहा है। इस कारण अभिभावकों और शिक्षकों के बीच तनाव बढऩे की भी खबरें आई हैं।
अटाल ने कहा, ‘धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है स्कूल के जरिये खुद को मानवीय बनाने की आजादी। स्कूलों को एक धर्मनिरपेक्ष जगह होना चाहिए और अबाया एक धार्मिक पहचान है जो इस धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े करता है। आप जब किसी कक्षा में जाएं तो छात्रों को देखकर उनके धर्म की पहचान नहीं होनी चाहिए।’
अबाया पर बहस
मार्च 2004 में फ्रांस में एक कानून लाया गया था जिसके तहत स्कूलों में छात्रों की धार्मिक मान्यताओं को दिखाने वाले परिधान पहनने पर रोक लगा दी गयी थी। इनमें बड़े ईसाई क्रॉस, यहूदी किप्पा और इस्लामिक हिजाब शामिल थे। लेकिन अबाया को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पायी थी क्योंकि यह एक तरह का गाउन माना गया। हालांकि शिक्षा मंत्रालय ने पिछले साल नवंबर में इसे लेकर एक नोटिस जारी किया था।
नोटिस में कहा गया अबाया को ऐसी स्थिति में प्रतिबंधित किया जा सकता है जबकि इसे धार्मिक पहचान जाहिर करने के मकसद से पहना जाए। बंदाना और लंबी स्कर्ट भी इसी श्रेणी में रखे गये थे।
पिछली सरकार के समय में अबाया के मुद्दे को स्कूल प्राचार्यों की यूनियन ने शिक्षा मंत्री पैप नदीए के सामने उठाया था लेकिन उन्होंने कहा था कि वह ‘परिधानों की लंबाई को लेकर असीमित कैटालॉग जारी नहीं करना चाहते।’
स्वागत और विरोध
रविवार के ऐलान का स्कूल संघों के नेताओं में से एक ने स्वागत किया है। अटाल के ऐलान का स्वागत करते हुए स्कूल प्रमुखों की यूनियन एनपीडीईएन-यूएनएसए के महासचिव ब्रूनो बॉबकिविच ने कहा, ‘निर्देश स्पष्ट नहीं थे। अब वे स्पष्ट कर दिए गए हैं और हम इसका स्वागत करते हैं।’
विपक्षी दक्षिण-पंथी राजनीतिक दल रिपब्लिकन्स पार्टी के नेता एरिक चाओटो ने भी इस कदम का स्वागत किया है। उन्होंने कहा, ‘हम कई बार स्कूलों में अबाया पर प्रतिबंध की मांग कर चुके थे।’
लेकिन वामपंथी विपक्षी दल फ्रांस अनबाउड की क्लेमेंटीन ऑटाँ ने इस ऐलान की आलोचना करते हुए कहा कि यह कपड़ों पर पुलिसिंग है। उन्होंने कहा कि अटाल का ऐलान ‘असंवैधानिक’ है और फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है, जो ‘सरकार के मुसलमानों को खारिज करने का लक्षण है।’
ऑटाँ ने कहा कि राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों की सरकार अति-दक्षिणपंथी नेशनल रैली की नेता ला पेन के साथ मुकाबला कर रही है।
मुसलमानों ने क्या कहा
अबाया को लेकर बहस तब से ज्यादा तेज हो गयी थी जब एक चेचन शरणार्थी ने 2020 में पेरिस के एक स्कूल में सैमुअल पैटी नाम के एक शिक्षक का सिर काट कर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने छात्रों को पैगंबर मोहम्मद का एक स्केच दिखाया था। इस्लाम में पैगंबर की तस्वीर बनाना हराम माना जाता है।
कई मुस्लिम संस्थाओं के संगठन सीएफसीएम ने कहा है कि परिधान अपने आप में किसी धर्म का प्रतीक नहीं होते। 34 साल के अटाल को हाल ही में पदोन्नत कर शिक्षा मंत्रालय दिया गया था जबकि कई बड़े नेता यह पद चाहते थे। उन्हें फ्रांस की राजनीति में एक उभरते सितारे की तरह देखा जाता है और 2027 में माक्रों के पद से हटने के बाद वह बड़ी भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं। वीके/एए (रॉयटर्स, एएफपी)
-डॉ. आर.के.पालीवाल
हमारे लोकतंत्र में नई-नई अजीबोगरीब परंपराएं जन्म ले रही हैं । दुर्भाग्य से ये परंपराएं लोकतंत्र के विकास के बजाय उसकी विकृतियां बढ़ा रही हैं। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम समय के बाकी बचे डेढ़ महीने के लिए तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया है। किसी भी मंत्री को अपने विभाग की कार्यशैली समझने में ही दो तीन महीने लग जाते हैं। ऐसे में सरकार के इस फैसले की चारों तरफ आलोचना हो रही है कि जनता के संसाधनों का नए मंत्रियों के तामझाम पर खर्च का क्या औचित्य है! यह माना जा रहा है कि चंद असंतुष्ट नेताओं को खुश कर उनके क्षेत्र और जाति के लोगों के वोट बटोरना इस मुहिम का एक मात्र उद्देश्य है। इस स्वार्थी राजनीतिक कार्य से संभव है पार्टी के कुछ वोट बढ़ जाएं लेकिन हकीकत यह भी है कि अभी भी बहुत से नाराज विधायक हैं जो बहुत दिनों से मंत्रिमंडल विस्तार में अपना नाम खोज रहे थे। सरकार का यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। जो मंत्री नहीं बने हैं वे और उग्र विरोधी बन सकते हैं।
अंतिम दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार का यह एक नया प्रयोग है। भाजपा ने मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बदलकर गुजरात और कर्नाटक जैसे प्रयोग नहीं किए जिनकी अक्सर समाचार पत्रों में चर्चा होती रहती थी। इसका कारण शायद यही है कि यहां मुख्यमंत्री के कई दावेदार होने से यह रास्ता आसान नहीं था। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस विस्तार को भ्रष्टाचार की मित्र मंडली का विस्तार बताया है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसके पीछे कोई तर्क नहीं देते हुए अहंकार पूर्ण तरीके से कहा है कि अगले पांच साल भी हमारी सरकार रहेगी। यह लालकिले से प्रधान मंत्री मोदी द्वारा दिए अहंकार पूर्ण बयान जैसा ही है। मध्य प्रदेश सरकार में पहले से ही तीस मंत्री हैं। तीस पुराने मंत्री तीन साल में जो नहीं कर पाए तो तीन नए मंत्री डेढ़ महीने में आखिर कितना काम कर लेंगे यह समझना किसी निष्पक्ष व्यक्ति की समझ से बाहर है। यदि यह तीन नेता इतने प्रतिभाशाली थे तो मुख्यमंत्री को इनकी प्रतिभा पहचानने में इतनी देर क्यों लगी और पार्टी संगठन में उन्हें कोई बडी जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई।यह कुतर्क भी दिया जा सकता है कि मंत्रीमंडल विस्तार मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मीडिया और नागरिकों को अपने मुख्यमंत्री के निर्णयों की आलोचना और समीक्षा का अधिकार है। जिस तरह से इतने कम समय के लिए तीन मंत्रियों को शपथ दिलाई गई है ऐसी स्थिति में सरकार के इस निर्णय पर चारों तरफ प्रश्नचिन्ह खड़े होना सामान्य है। नए मंत्रियों में राहुल लोधी मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भतीजे हैं। भाई भतीजे वाद की प्रबल आलोचक रही भारतीय जनता पार्टी खुद भाई भतीजेवाद को क्यों बढ़ावा दे रही है इसका जवाब भारतीय जनता पार्टी को देना चाहिए।
मीडिया, विरोधी दलों, लोकतंत्र सुधार के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं और प्रबुद्ध नागरिकों को इन नए मंत्रियों के विभागों के काम काज पर लगातार नजर रखने की आवश्यकता है ताकि पता चल सके कि इनके मंत्री बनने से आम जनता को क्या लाभ हुआ है! नागरिकों को पता चलना चाहिए कि इस असामान्य परिर्वतन के पीछे सच में व्यापक जनहित की भावना थी या किन्हीं इतर कारणों से इन्हें मंत्री बनाया गया है जैसे कि आरोप लग रहे हैं।
यह जानकारी भी सामने आनी चाहिए कि इन नए मंत्रियों के बंगलों की मरम्मत और इनके कार्यालयों, वाहनों और स्टाफ आदि पर सरकार ने कितना खर्च किया है। लोकतंत्र की परिपक्वता और सही संचालन के लिए जनता की जागरूकता सर्वोपरि है। यदि लोकतंत्र के विकास के लिए कार्यरत संस्थाएं समय समय पर अपने अध्ययन और शोध से जनता को जागृत करती रहेंगी तो कोई दल सरकार बनने पर इस तरह की मनमानी नहीं कर सकेगा।
संयुक्त राष्ट्र बाल कल्याण संगठन (यूनिसेफ) का कहना है कि पाकिस्तान में विनाशकारी बाढ़ के एक साल बाद भी लाखों बच्चे अभी भी मदद का इंतजार कर रहे हैं। यूनिसेफ ने एक बयान में कहा कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 15 लाख बच्चों को जीवनरक्षक खाद्य सहायता की जरूरत है, जबकि लगभग 40 लाख बच्चों को स्वच्छ पेयजल तक पहुंच नहीं है।
राहत प्रयासों के लिए धन की कमी की चेतावनी देते हुए पाकिस्तान में यूनिसेफ के प्रतिनिधि अब्दुल्ला फाजिल के मुताबिक, "बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले कमजोर बच्चों ने एक भयानक साल का सामना किया है। पीडि़तों के पुनर्वास के लिए प्रयास जारी हैं लेकिन कई प्रभावित बच्चे पहुंच योग्य नहीं हैं और ऐसे में पाकिस्तान के इन बच्चों को भुला दिए जाने का डर सता रहा है।’
बाढ़ का एक साल
यूनिसेफ की ओर से यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अधिकारी सतलज नदी के बाढ़ प्रभावित इलाकों से लोगों को निकालने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। 1 अगस्त से अब तक कसूर और बहावलपुर जिलों में बाढ़ प्रभावित इलाकों से एक लाख से अधिक लोगों को निकाला गया है।
लगभग छह महीने पहले जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र प्रायोजित सम्मेलन में दर्जनों देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पाकिस्तान को पिछले साल की बाढ़ से उबरने और पुनर्निर्माण में मदद करने के लिए नौ अरब डॉलर से अधिक का वादा किया था। लेकिन अधिकांश प्रतिबद्धताएं परियोजनाओं के लिए ऋण के रूप में थीं, जो अभी भी योजना चरण में हैं।
यूनिसेफ ने बयान में कहा, ‘इस सीजन की मानसूनी बारिश बाढ़ से प्रभावित समुदायों के लिए पहले से ही कठिन स्थिति को और खराब कर रही है, जिसने दुखद रूप से देश भर में 87 बच्चों की जान ले ली है।’
पीने का साफ पानी नहीं उपलब्ध
यूनिसेफ का कहना है कि अनुमानित 80 लाख लोग, जिनमें से आधे बच्चे हैं, सुरक्षित पानी तक पहुंच के बिना बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं। अब्दुल्ला फाजिल का कहना है कि मौजूदा मानसून में बारिश की वापसी से एक और पर्यावरणीय आपदा की आशंका बढ़ गई है।
पिछले साल की बाढ़ से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को 30 अरब डॉलर से अधिक का नुकसानहुआ। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2022 की बाढ़ के कारण पाकिस्तान में 1700 लोगों की मौत हुई, जबकि देश का एक तिहाई से अधिक हिस्सा जलमग्न हो गया और लगभग 3।3 करोड़ लोग प्रभावित हुए।
बाढ़ ने 30,000 स्कूलों, 2,000 स्वास्थ्य सुविधाओं और 4,300 जल आपूर्ति प्रणालियों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। फाजिल के मुताबिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में एक तिहाई बच्चे पहले से ही स्कूल से बाहर थे, जबकि कुपोषण आपातकालीन स्तर तक पहुंच रहा है और स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता तक पहुंच चिंताजनक रूप से कम है।
बाढ़ के कारण शिक्षा से भी दूर हुए बच्चे
पिछले साल बाढ़ के कारण दक्षिण सिंध प्रांत सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था। लेकिन स्थानीय आपदा प्रबंधन एजेंसी के प्रवक्ता ने कहा कि अधिकारियों को बाढ़ प्रभावित जिलों से कोई शिकायत या मांग नहीं मिली है।
उन्होंने कहा कि जो लोग राहत शिविरों या सडक़ों के किनारे रह रहे थे वे अपने घरों को लौट गये हैं क्योंकि उन्हें नुकसान का मुआवजा मिल गया है। उन्होंने कहा, ‘मैं कह सकता हूं कि यहां स्थिति सामान्य है।’ उन्होंने कहा कि स्थानीय सहायता संगठन घरों, स्कूलों और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के पुनर्निर्माण और बहाली के लिए काम कर रहे हैं।
यूनिसेफ ने पाकिस्तान और सहायता एजेंसियों से बच्चों और परिवारों के लिए बुनियादी सामाजिक सेवाओं में निवेश बढ़ाने और उसे बनाए रखने का आह्वान किया। फाजिल ने कहा, ‘बाढ़ का पानी कम हो गया है लेकिन जलवायु परिवर्तन वाले इस क्षेत्र में उनकी समस्याएं बनी हुई हैं।’
विजय शंकर सिंह
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारत के अटॉर्नी जनरल से जम्मू-कश्मीर शिक्षा विभाग के उस लेक्चरर को निलंबित करने के फैसले पर गौर करने को कहा, जिसने पिछले हफ्ते संविधान पीठ के समक्ष अनुच्छेद 370 मामले में बहस की थी।
आज (28/08/23) सुबह जैसे ही भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ, अदालत में सुनवाई शुरू करने के लिए एकत्र हुई, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने, उक्त लेक्चरर, जहूर अहमद भट के निलंबन का उल्लेख किया। एडवोकेट सिब्बल ने कहा कि, जहूर अहमद भट ने, इस मामले में पेश होने के लिए दो दिन की छुट्टी ली थी और जब वह वापस गए तो उन्हें निलंबित कर दिया गया। सिब्बल ने कहा, ‘यह अनुचित है, मुझे यकीन है कि एजी इस पर गौर करेंगे।’
सीजेआई ने एजी आर वेंकटरमणी से कहा, ‘मिस्टर एजी, कृपया इसे देखें।’
इस मौके पर भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘मैंने अखबारों में पढऩे के बाद जांच की है। अखबारों में जो बताया गया है वह पूरा सच नहीं हो सकता है।’
इसके बाद सिब्बल ने तुरंत अदालत को बताया कि ‘25 अगस्त को पारित निलंबन आदेश, मामले में, सुप्रीम कोर्ट में, उनकी उपस्थिति का संदर्भ देता है।’
एसजी ने कहा, ‘वह विभिन्न अदालतों में पेश होते हैं और अन्य मुद्दे भी हैं। हम इसे अदालत के समक्ष रख सकते हैं।’
सिब्बल ने कहा, ‘तो फिर उन्हें पहले ही निलंबित कर दिया जाना चाहिए था, अब क्यों? यह उचित नहीं है। लोकतंत्र को इस तरह से काम नहीं करना चाहिए।’
इस मौके पर भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से पूछा कि ‘क्या हुआ है। जो कोई भी इस अदालत के समक्ष पेश हुआ है, उसे निलंबित कर दिया गया है...’।
एसजी तुषार मेहता ने कहा, ‘हम इस पर गौर करेंगे।’
सीजेआई ने एजी से कहा, ‘लेफ्टिनेंट जनरल से बात करें और देखें कि क्या हुआ है। अगर इसके अलावा कुछ है, तो यह अलग है। लेकिन इस मामले में उनके अदालत में अपीयर होने के बाद ऐसा क्यों हुआ?’
एजी न इस मुद्दे पर गौर करने के लिए हामी भरी।
कपिल सिब्बल ने कहा, ‘24 तारीख को वह पेश हुए और अगले दिन उन्हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन आदेश में इसका संदर्भ है। मुझे यकीन है कि अटॉर्नी जनरल इस पर ध्यान देंगे।’
एसजी ने कहा, ‘हर किसी को अदालत के सामने पेश होने का अधिकार है। यह प्रतिशोध के तौर पर नहीं किया जा सकता।’
‘मिस्टर सॉलिसिटर, आदेश और दलीलों के बीच निकटता है, इसे भी देखें!’, न्यायमूर्ति गवई ने, एसजी से कहा।
एसजी ने कहा, ‘निलंबन का यह समय उचित नहीं है। मैं सहमत हूं।’
न्यायमूर्ति कौल ने तब कहा कि यदि निलंबन पत्र में उनकी उपस्थिति का संदर्भ है, तो ‘यह एक समस्या होगी।’
विचाराधीन याचिका में, लेक्चरर, जफूर अहमद भट, 24 अगस्त को अदालत में, पार्टी-इन-पर्सन के रूप में उपस्थित हुए थे, और जिस तरह से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था, उस पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने अपने छात्रों को भारतीय संविधान और लोकतंत्र के सिद्धांतों को सिखाने की कोशिश करते समय आने वाली कठिनाई पर जोर दिया था और कहा था, ‘यह मेरे जैसे शिक्षकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है जब हम जम्मू-कश्मीर में अपने छात्रों को इस खूबसूरत संविधान के सिद्धांतों और लोकतंत्र के आदर्शों को पढ़ाते हैं। छात्र अक्सर एक कठिन सवाल पूछते हैं- क्या अगस्त 2019 की घटनाओं के बाद भी हम एक लोकतंत्र हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।’
संयुक्त राष्ट्र बाल कल्याण संगठन (यूनिसेफ) का कहना है कि पाकिस्तान में विनाशकारी बाढ़ के एक साल बाद भी लाखों बच्चे अभी भी मदद का इंतजार कर रहे हैं। यूनिसेफ ने एक बयान में कहा कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 15 लाख बच्चों को जीवनरक्षक खाद्य सहायता की जरूरत है, जबकि लगभग 40 लाख बच्चों को स्वच्छ पेयजल तक पहुंच नहीं है।
राहत प्रयासों के लिए धन की कमी की चेतावनी देते हुए पाकिस्तान में यूनिसेफ के प्रतिनिधि अब्दुल्ला फाजिल के मुताबिक, "बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले कमजोर बच्चों ने एक भयानक साल का सामना किया है। पीडि़तों के पुनर्वास के लिए प्रयास जारी हैं लेकिन कई प्रभावित बच्चे पहुंच योग्य नहीं हैं और ऐसे में पाकिस्तान के इन बच्चों को भुला दिए जाने का डर सता रहा है।’
बाढ़ का एक साल
यूनिसेफ की ओर से यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अधिकारी सतलज नदी के बाढ़ प्रभावित इलाकों से लोगों को निकालने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। 1 अगस्त से अब तक कसूर और बहावलपुर जिलों में बाढ़ प्रभावित इलाकों से एक लाख से अधिक लोगों को निकाला गया है।
लगभग छह महीने पहले जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र प्रायोजित सम्मेलन में दर्जनों देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पाकिस्तान को पिछले साल की बाढ़ से उबरने और पुनर्निर्माण में मदद करने के लिए नौ अरब डॉलर से अधिक का वादा किया था। लेकिन अधिकांश प्रतिबद्धताएं परियोजनाओं के लिए ऋण के रूप में थीं, जो अभी भी योजना चरण में हैं।
यूनिसेफ ने बयान में कहा, ‘इस सीजन की मानसूनी बारिश बाढ़ से प्रभावित समुदायों के लिए पहले से ही कठिन स्थिति को और खराब कर रही है, जिसने दुखद रूप से देश भर में 87 बच्चों की जान ले ली है।’
पीने का साफ पानी नहीं उपलब्ध
यूनिसेफ का कहना है कि अनुमानित 80 लाख लोग, जिनमें से आधे बच्चे हैं, सुरक्षित पानी तक पहुंच के बिना बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं। अब्दुल्ला फाजिल का कहना है कि मौजूदा मानसून में बारिश की वापसी से एक और पर्यावरणीय आपदा की आशंका बढ़ गई है।
पिछले साल की बाढ़ से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को 30 अरब डॉलर से अधिक का नुकसानहुआ। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2022 की बाढ़ के कारण पाकिस्तान में 1700 लोगों की मौत हुई, जबकि देश का एक तिहाई से अधिक हिस्सा जलमग्न हो गया और लगभग 3।3 करोड़ लोग प्रभावित हुए।
बाढ़ ने 30,000 स्कूलों, 2,000 स्वास्थ्य सुविधाओं और 4,300 जल आपूर्ति प्रणालियों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। फाजिल के मुताबिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में एक तिहाई बच्चे पहले से ही स्कूल से बाहर थे, जबकि कुपोषण आपातकालीन स्तर तक पहुंच रहा है और स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता तक पहुंच चिंताजनक रूप से कम है।
बाढ़ के कारण शिक्षा से भी दूर हुए बच्चे
पिछले साल बाढ़ के कारण दक्षिण सिंध प्रांत सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था। लेकिन स्थानीय आपदा प्रबंधन एजेंसी के प्रवक्ता ने कहा कि अधिकारियों को बाढ़ प्रभावित जिलों से कोई शिकायत या मांग नहीं मिली है।
उन्होंने कहा कि जो लोग राहत शिविरों या सडक़ों के किनारे रह रहे थे वे अपने घरों को लौट गये हैं क्योंकि उन्हें नुकसान का मुआवजा मिल गया है। उन्होंने कहा, ‘मैं कह सकता हूं कि यहां स्थिति सामान्य है।’ उन्होंने कहा कि स्थानीय सहायता संगठन घरों, स्कूलों और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के पुनर्निर्माण और बहाली के लिए काम कर रहे हैं।
यूनिसेफ ने पाकिस्तान और सहायता एजेंसियों से बच्चों और परिवारों के लिए बुनियादी सामाजिक सेवाओं में निवेश बढ़ाने और उसे बनाए रखने का आह्वान किया। फाजिल ने कहा, ‘बाढ़ का पानी कम हो गया है लेकिन जलवायु परिवर्तन वाले इस क्षेत्र में उनकी समस्याएं बनी हुई हैं।’
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने सोमवार को प्रेस रिलीज़ जारी करके अपने संगठन में लाए जा रहे नए और अहम बदलावों की जानकारी दी है।
इनमें रिलायंस समूह के मुखिया मुकेश अंबानी के तीनों बच्चों के रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के निदेशक मंडल में शामिल होने से लेकर नीता अंबानी के इससे बाहर जाने जैसी अहम जानकारियां शामिल हैं।
ये एलान एक ऐसे समय पर हुआ है जब रिलायंस ग्रुप की वार्षिक आम बैठक जारी है। इस दौरान उन तमाम योजनाओं के बारे में भी बताया जा रहा है जो आने वाले सालों में रिलायंस ग्रुप से जुड़ी तमाम कंपनियों का भविष्य तय करेंगी।
रिलायंस ग्रुप ने क्या बताया?
रिलायंस ग्रुप की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में बताया गया है कि सोमवार को शुरु हुई वार्षिक आम बैठक से पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के निदेशक मंडल की बैठक हुई।
इस बैठक में मुकेश अंबानी के तीनों बच्चों आकाश अंबानी, अनंत अंबानी और ईशा अंबानी को निदेशक मंडल में शामिल किए जाने पर विचार किया गया। इसके साथ ही शेयरधारकों से इन नियुक्तियों को स्वीकृति देने की पेशकश की गई है। इसी बैठक में मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी का निदेशक मंडल से इस्तीफ़ा स्वीकार किया गया है।
हालांकि, रिलायंस फाउंडेशन की चेयरपर्सन नीता अंबानी बोर्ड की परमानेंट इनवाइटी होने के नाते आरआईएल के निदेशक मंडल की सभी बैठकों में हिस्सा लेती रहेंगी।
रिलायंस ग्रुप के शेयरधारकों की ओर से स्वीकृति मिलने के साथ ही मुकेश अंबानी के तीनों बच्चों के निदेशक मंडल में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
कंपनी ने बताया है कि आकाश, अनंत और ईशा पहले ही इस समूह में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।
फिलहाल, मुकेश अंबानी के तीनों बच्चे रिलायंस ग्रुप के अलग-अलग क्षेत्रों में फैले व्यवसायों को संभाल रहे हैं।
मुकेश अंबानी के सबसे बड़े बेटे आकाश अंबानी के पास टेलिकॉम क्षेत्र की कमान है। उन्होंने साल 2014 में जियो इन्फोकॉम में काम करना शुरू किया था। इसके बाद साल 2022 में उन्हें इस कंपनी का चेयरमैन बनाया गया।
ब्राउन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में स्नातक करने वाले आकाश अंबानी उस टीम का हिस्सा था जो साल 2020 में जियो प्लेटफॉर्म की डिजि़टल यूनिट में फेसबुक के स्वामित्व वाली कंपनी मेटा से 5।7 अरब डॉलर का निवेश लेकर आई थी। इसके साथ ही आकाश अंबानी ने वैश्विक निवेशकों केकेआर और टीपीज़ी के साथ हुए सौदों में भी अहम भूमिका निभाई। इसके साथ ही आकाश अंबानी रिलायंस ग्रुप के स्वामित्व वाली आईपीएल क्रिकेट टीम का कामकाज भी करते हैं। साल 2019 में आकाश अंबानी की शादी एक मशहूर हीरा व्यापारी की बेटी श्लोका मेहता से हुई है।
आकाश अंबानी की जुड़वा बहन ईशा अंबानी रिलायंस समूह की रिटेल, ई-कॉमर्स और लग्जऱी बिजऩेस संभालती हैं।
रिलायंस ने हाल ही में बताया है कि उनका रिटेल व्यवसाय कमाई और लाभ के आधार पर भारत में सबसे आगे है। अमेरिका की प्रतिष्ठित स्टेनफॉर्ड यूनिवर्सिटी से प्रबंधन की पढ़ाई करने वालीं ईशा अंबानी ने येल यूनिवर्सिटी से साउथ एशियन स्टडीज़ और मनोविज्ञान में पढ़ाई की है।
ईशा अंबानी ने पिछले दिनों मुंबई में नीता मुकेश अंबानी क्लचरल सेंटर की लॉन्चिंग भी एक भूमिका निभाई है जो एक ब्रॉड-वे स्टाइल थिएटर और आर्ट्स सेंटर है।
मुकेश अंबानी के सबसे छोटे बेटे अनंत अंबानी ने भी ब्राउन यूनिवर्सिटी से स्नातक तक पढ़ाई की है। 27 वर्षीय अनंत साल 2020 के मार्च महीने से जियो के निदेशक मंडल में शामिल हैं। इसके साथ ही साल 2022 में वह रिलायंस रिटेल के निदेशक मंडल में भी शामिल हुए हैं। यही नहीं, अनंत रिलायंस समूह के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े व्यवसायों को देख रहे हैं जिसका मकसद साल 2035 तक कंपनी को नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन करने वाली कंपनी बनाना है।
रिलायंस ग्रुप की वार्षिक आम बैठक के दौरान भी कंपनी की ओर से लिए गए इन फ़ैसलों के बारे में जानकारी दी गई।
इस दौरान मुकेश अंबानी ने कहा, ‘आज मैं ईशा, आकाश और अनंत में अपनी और अपने पिता की झलक देख रहा हूं। मुझे तीनों में धीरूभाई अंबानी की चमक दिखाई पड़ती है।’ इसके साथ ही उन्होंने बताया है कि वह अपने तीनों बच्चों को नेतृत्व से जुड़ी जि़म्मेदारियां उठाने के लिए तैयार करते रहेंगे।
उन्होंने कहा, ‘मैं कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों और जि़म्मेदारियों को पांच और वर्षों तक उत्साह के साथ निभाना जारी रखूंगा।’
मुकेश अंबानी साल 2021 से उत्तराधिकार को लेकर खुलकर बात कर रहे हैं।
पिछले साल मुकेश अंबानी ने भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड की कंमान अपने बेटे आकाश अंबानी को सौंपी है। इसके साथ ही रिटेल बिजऩेस की कमान ईशा अंबानी को सौंपी है। और अनंत अंबानी के लिए ऊर्जा बिजऩेस में संभावनाएं तलाशी हैं।
जियो इन्फोकॉम कंपनी जियो प्लेटफॉर्म की सब्सिडियरी कंपनी है जिसके चेयरमैन अभी भी मुकेश अंबानी ही हैं। ये कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के तहत आती है। रिलायंस इस समय मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में व्यवसाय कर रही है जो तेल एवं पेट्रो कैमिकल, टेलिकॉम और रिटेल हैं।
मुकेश अंबानी ने अपने हर बच्चे को एक-एक क्षेत्र की जि़म्मेदारी सौंपी है। और इन तीनों क्षेत्रों में कार्यरत कंपनियों का वित्तीय आकार लगभग एक जैसा है।
रिलायंस ने हाल ही में वित्तीय सेवा क्षेत्र में कदम बढ़ाए हैं जिसमें ईशा अंबानी को बोर्ड मेंबर बनाया गया है।
मुकेश अंबानी की ओर से ये घोषणा किया जाना बताता है कि वह अपने व्यवसायिक समूह की कमान अपने बच्चों को देने की योजना बना रहे हैं।
साल 2002 में रिलायंस ग्रु के संस्थापक धीरूभाई अंबानी की असमय मौत होने पर उनके दोनों बेटों मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के बीच उत्तराधिकार को लेकर तीख़ा संघर्ष देखने को मिला था।
इस सार्वजनिक लड़ाई के बाद साल 2005 में मुकेश को तेल एवं पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में सक्रिय कंपनी मिली थी।
वहीं, अनिल अंबानी को टेलीकॉम, पावर, वित्तीय व्यवसाय समेत अन्य यूनिट्स मिली थीं। लेकिन दोनों भाइयों का भविष्य एक दूसरे से काफ़ी अलग रहा।
मुकेश अंबानी ने खुद को एशिया के सबसे अमीर शख़्स के रूप में स्थापित किया, वहीं अनिल अंबानी ने साल 2020 में लंदन की एक अदालत में अपनी कुल संपत्ति शून्य बताई। हालांकि, पिछले कुछ सालों में दोनों भाइयों के रिश्तों में कटुता कुछ कम हुई है।
साल 2019 में मुकेश अंबानी ने अनिल अंबानी को जेल जाने से बचाने के लिए 77 मिलियन डॉलर का पेमेंट करने में मदद की।
वहीं, दोनों भाइयों के बीच नॉन-कंपीट एग्रीमेंट भी खारिज किया गया जिसके चलते मुकेश टेलिकॉम बिजऩेस के साथ-साथ वित्तीय सेवा क्षेत्र में प्रवेश कर सके।
स्टेनफोर्ड में पढ़ाई अधूरी छोडऩे वाले मुकेश अंबानी ने अपने पिता के टेक्सटाइल से लेकर पेट्रोकेमिकल के क्षेत्र में फैले व्यवसाय को बढ़ाते हुए रिलायंस समूह को भारत का सबसे ताकतवर व्यवसायिक समूह बनाया। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर सिलेंडर के साथ प्राइवेट रेल कोच में यात्रा कर रहे तीर्थयात्रियों की किसी ने चैकिंग नहीं की। स्टेशन पर रेलवे के टी टी के अलावा आर पी एफ और जी आर पी के सशस्त्र गार्ड भी रहते हैं।संभव है कि इन्हे रामेश्वरम तीर्थाटन के लिए जाने वाले तीर्थ यात्री होने के कारण रेलवे कर्मचारियों ने नहीं रोका हो क्योंकि आजकल सरकार हिंदू धर्म के तीर्थस्थलों पर बहुत मेहरबान है। जहां जहां भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार हैं वहां खुद प्रधान मंत्री की अगुवाई में धार्मिक लोक बन रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने तो बुजुर्गों के लिए विशेष धार्मिक यात्राओं का आयोजन किया है और हवाई यात्रा से भी तीर्थाटन कराया जा रहा है। यही हालात रहे तो किसी दिन एयरपोर्ट पर भी इस तरह के तीर्थयात्री सिलेंडर ले जाने की कोशिश करेंगे।चाहे सार्वजनिक परिवहन की बसे हों या ट्रेन अथवा हवाई जहाज़, भीड़भाड़ वाली सब जगहों पर एक भी यात्री की लापरवाही से बहुत बड़ा हादसा घट सकता है। ऐसे लापरवाह और क़ानून का उल्लंघन करने वाले यात्रियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की आवश्यकता है। इसी के साथ रेलवे के उच्च अधिकारियों को संबंधित रेलवे स्टेशन और ट्रेन की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही करनी चाहिए जिनकी लापरवाही से इतनी जान गई हैं और रेलवे की संपत्ति को नुक्सान हुआ है।
रेलवे सुरक्षा को लेकर हाल ही में उड़ीसा में हुए भयंकर रेल हादसे के समय चारों तरफ खूब हायतौबा हुआ था और सी बी आई जांच के आदेश दिए गए थे। हर रेल हादसे के बाद जांच की खानापूर्ति होती है और एक जांच रिर्पोट आने से पहले और पहले की रिपोर्टों पर कार्यवाही होने के पहले नया हादसा सामने आ जाता है। ऐसी स्थिती से बचने के लिए हादसों में दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ की गई कार्यवाही का ब्योरा सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि जनता को पता चल सके कि रेलवे प्रशासन उनकी जान और माल के प्रति कितना चिंतित है। इस मामले में यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि यात्रियों का जो दल उत्तर प्रदेश से दक्षिण भारत के कई पर्यटक स्थल पर यात्रा के लिए निकला था उसने किन किन ट्रेनों और स्टेशनों पर उस गैस सिलेंडर के साथ यात्रा की थी जिसकी वज़ह से मदुरई में यह हादसा हुआ है। यदि यह यात्रा दल कई दिनों से इस तरह की लापरवाही बरत रहा था तब उन तमाम स्टेशनों और ट्रेनों के सुरक्षाकर्मी भी भयंकर लापरवाही के दोषी हैं। हम कल्पना कर सकते हैं कि इस यात्री दल ने रेलवे से यात्रा करने वाले न जाने कितने यात्रियों के लिए बड़ा जोखिम पैदा किया था।
इस हादसे से एक और प्रश्न रेलवे की सेवाओं के प्राइवेटाइजेशन से संबंधित भी खड़ा होता है। लखनऊ के पर्यटकों का हादसाग्रस्त दल किसी ट्रेवल एजेंसी के माध्यम से रेलवे का प्राइवेट कोच बुक कर यात्रा के लिए निकला था। हादसे की वजह बना गैस सिलेंडर ट्रैवल एजेंसी का स्टाफ ही अवैध रूप से इस्तेमाल के लिए लिए डिब्बे में लाया था। इसकी पूरी संभावना है कि वह पिछ्ले कई दिनों से इसका इस्तेमाल कर रहा होगा। इसमें यात्रियों की भी मिलीभगत रही होगी क्योंकि उन्हीं के लिए सुबह की चाय की व्यवस्था की जा रही थी,इसीलिए किसी यात्री ने इस पर ऐतराज नहीं किया। जब ट्रैवल एजेंसी के लोग चोरी छिपे या किसी रेलवे कर्मचारी की मिलीभगत और लापरवाही के चलते डिब्बे में सिलेंडर जैसी बडी और ज्वलनशील वस्तु आसानी से ले जा सकते हैं तब कोई आतंकी समूह और स्मगलर आदि भी रेल में किसी बडी दुर्घटना को अंजाम दे सकते हैं। रेलवे जन सामान्य की यात्रा का सबसे बड़ा साधन है इसलिए उसकी सुरक्षा सरकार की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उम्मीद है रेल मंत्री और प्रधानमन्त्री तडक़ भडक़ के साथ वंदे भारत ट्रेनों के उदघाटन समारोह आयोजित करने के साथ साथ रेलवे सुरक्षा पर भी वैसा ही ध्यान देंगे।
जगदीश्वर चतुर्वेदी
शनि को लेकर पोंगापंडितों ने तरह-तरह के मिथ बनाए हुए हैं और इन मिथों की रक्षा में वे तरह-तरह के तर्क देते रहते हैं। शनि से बचने के उपाय सुझाते रहते हैं। कुछ अप्सा पहले स्टार न्यूज के एक कार्यक्रम में एक ज्योतिषी ने कहा शनि का फल सबके लिए एक जैसा नहीं होता। कुंडली में अवस्था के अनुसार शनि का फल होता है।
शनि के सामाजिक और व्यक्तिगत प्रभाव के बारे में जितने भी दावे ज्योतिषियों के द्वारा किए जा रहे हैं वे सभी गलत हैं और सफेद झूठ है। ज्योतिष में ग्रहों के नाम पर फलादेश का सफेद झूठ तब पैदा हुआ जब हम विज्ञानसम्मत चेतना से दूर थे।आज हम विज्ञानसम्मत चेतना के करीब हैं । ऐसी अवस्था में ग्रहों के प्राचीन काल्पनिक प्रभाव से चिपके रहना गलत है ।
शनि इस ब्रह्माण्ड में एक स्वतंत्र ग्रह है,उसकी स्वायत्त कक्षा है । भारत के ज्योतिषी यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि शनि की पृथ्वी से कितनी दूरी है ? शनि का प्रभाव कैसे पड़ता है ? शनि के बारे में हमारी परंपरागत जानकारी अवैज्ञानिक है। हमें इस अवैज्ञानिक जानकारी से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।
शनि एक ग्रह है। यह सच है। लेकिन इसका पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों पर प्रभाव होता है यह धारणा गलत है। बुनियादी तौर पर किसी भी ग्रह का मनुष्य के भविष्य या भाग्य के साथ कोई संबंध नहीं है।
शनि काला है न गोरा है,राक्षस है न शैतान है, वह तो ग्रह है। उसकी कोई मूर्ति नहीं है। शनि के नाम पर जो शनिदेव प्रचलन में हैं वह पोंगापंथ की सृष्टि हैं। जिस दिन मनुष्य ने ग्रहों को देवता बनाया, उनकी पूजा आरंभ की,उनके बारे में तरह-तरह के मिथों की सृष्टि की उसी दिन से मनुष्य ने ग्रहों को अंधविश्वास, भविष्य निर्माण और विध्वंस के गोरखधंधे का हिस्सा बना दिया। उसके बाद से हमने ग्रहों के सत्य को जानना बंद कर दिया।
शनि का सत्य क्या है ? शनि इस ब्रह्माण्ड का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। शनि में अनेक वलय बने हैं। अनेक वलय या रिंग के कारण शनि दूर से देखने में बेहद खूबसूरत लगता है। शनि के अलावा गुरू, नेपच्यून, यूरेनस ग्रह में ही रिंग या वलय हैं। स्टार न्यूज़ ने बताया शनि की दूरी एक अरब 32 करोड़ किलोमीटर है। यह गलत है। नासा के अनुसार शनि की पृथ्वी से दूरी है 120,540 किलोमीटर। शनि , सूर्य की परिक्रमा करता रहता है। सूर्य से शनि की परिक्रमा करते हुए दूरी 1,514,500,000 किलोमीटर से लेकर 1,352,550,000 किलोमीटर के बीच में रहती है।
शनि के बारे में यह मिथ है कि उसकी गति धीमी है, सच यह है कि शनि तेज गति से सूर्य की परिक्रमा करता है, ग्रहों में शनि से ज्यादा तेज गति सिर्फ गुरू की है। ब्रह्माण्ड का शनि एक चक्कर 10 घंटे 39 मिनट में पूरा करता है। यानी इतने समय का उसका एक दिन होता है। जबकि पृथ्वी को चक्कर पूरा करने में 24 घंटे लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि शनि पर बड़े पैमाने पर गैस भंडार हैं। लेकिन उन्हें सतह पर देखना संभव नहीं है। इसके अलावा पानी, अमोनिया, लोहा, मिथाइन आदि के भंडार हैं। शनि पर हाइड्रोजन और हीलियम गैसें भी हैं।
वैज्ञानिकों को अभी तक शनि पर किसी भी किस्म के जीवन के संकेत नहीं मिले हैं। शनि पर मौसम में अनेक किस्म का अंतर मिलता है शनि की सर्वोच्च शिखर पर तापमान माइनस 175 डिग्री सेलसियस तक रहता है। शनि पर पृथ्वी की तुलना में वजन बढ़ जाता है, 100 पॉण्ड वजन बढक़र 107 पॉण्ड हो जाता है। शनि में कई रिंग या वलय हैं। सात बड़े रिंग हैं। ये वलय शनि से काफी दूर हैं। सात बड़े रिंग के अलावा सैंकड़ों छोटे वलय भी हैं। शनि पर वलय का पता 16वीं सदी में इटली के वैज्ञानिक गैलीलियों ने किया था।
शनि के प्रभाव के बारे में यदि ज्योतिषी बातें करते हैं तो शनि के उपग्रहों के प्रभाव के बारे में बातें क्यों नहीं करते? कभी ज्योतिषियों ने शनि के उपग्रहों का विस्तार से वर्णन क्यों नहीं किया? शनि की मैगनेटिक धरती हमारी पृथ्वी से10 गुना ज्यादा शक्तिशाली है। सन् 1973 में अमेरिका ने शनि और गुरू की वैज्ञानिक खोज का काम किया है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के किसी भी संस्कृत विश्वविद्यालय में आधुनिक वेधशाला नहीं है और नहीं आधुनिक अनुसंधान की किसी भी तरह की व्यवस्था है। किसी भी ज्योतिषी ने अभी तक कोई आधिकारिक रिसर्च ग्रहों पर नहीं की है। पुराने ज्योतिषी ग्रहों के बारे में अनुमान से जानते थे उनके सारे अनुमान गलत साबित हुए हैं। सिर्फ पृथ्वी से विभिन्न ग्रहों की दूरी को ही लें तो पता चल जाएगा कि पुराने ज्योतिषी सही हैं या आधुनिक विज्ञान सही है। आशा है इंटरनेट पर उपलब्ध ग्रहों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी को कृपया पढऩे की कृपा करेंगी। सिर्फ अंग्रेजी में नाममात्र लिख दें हजारों पन्नों की जानकारी घर बैठे मुफ्त में मिल जाएगी, आज जितनी जानकारी ग्रहों के बारे में विज्ञान की कृपा से उपलब्ध है उसकी तुलना में एक प्रतिशत जानकारी भी प्राचीन और आधुनिक ज्योतिषी उपलब्ध नहीं करा पाए हैं।
आज विज्ञान से हमें पता चला है कि किस ग्रह पर किस रास्ते से जाएं, जाने में कितना समय लगेगा,कितनी दूरी पर ग्रह स्थित है, जाने-आने में कितना खर्चा आएगा, वैज्ञानिक खोज रहे हैं कि ग्रहों पर जीवन है या नहीं, इस संदर्भ में क्या संभावनाएं हैं, ये बातें हम पहले नहीं जानते थे। विज्ञान यह भी बताता है कि ग्रहों को खोज निकालने का तरीका क्या है,ग्रहों का अनुसंधान क्यों किया जा रहा है। इन सारी चीजों को पारदर्शी ढ़ंग से विज्ञान के जानकारों से कोई भी व्यक्ति सहज ही जान सकता है।
भारत में ज्योतिषी ग्रहों के प्रभाव के जितने दावे करते रहते हैं वे सब गलत हैं। सवाल उठता है अंतरिक्ष अनुसंधान के यंत्रों के बिना ग्रहों को कैसे जान पाएंगे? ज्योतिष हमें ग्रहों फलादेश बताता है इसका अनुमान से संबंध है, इसका सत्य से कोई संबंध नहीं है। वह फलादेश है। फलादेश विज्ञान नहीं होता। विज्ञान को दृश्य से वैधता प्राप्त करनी होती है। जो चीज दिखती नहीं है वह प्रामाणिक नहीं है। विज्ञान नहीं है।
असल में ज्योतिषी लोग आधुनिक रिसर्च का अर्थ ही नहीं समझते। ऐसे में ज्योतिष और विज्ञान के बीच संवाद में व्यापक अंतराल बना हुआ है। ज्योतिषी लोग सैंकड़ों साल पहले रिसर्च करना बंद कर चुके थे। वे वैज्ञानिक सत्य को वराहमिहिर के जमाने में ही अस्वीकार करने की परंपरा बना दी गयी थी। तब से वैज्ञानिक ढ़ंग से ग्रहों को देखने का काम ज्योतिषी छोड़ चुके हैं। ज्योतिष के अधिकांश विद्वान बुनियादी वैज्ञानिक तथ्यों को भी नहीं मानते। मसलन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है या पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है,इस समस्या पर ज्योतिष और विज्ञान दो भिन्न धरातल पर हैं। ज्योतिषी ज़वाब दें वे किसके साथ हैं विज्ञान के या परंपरागत पोंगापंथ के? ज्योतिषी यह भी बताएं कि ग्रहों का प्रभाव होता है तो यह बात उन्होंने कैसे खोजी? इस खोज पर कितना खर्चा आया?पद्धति क्या थी? ग्रहों का प्रभाव होता है तो सभी ग्रहों का प्रभाव होता होगा? ऐसी अवस्था में सिर्फ नौ ग्रहों के प्रभाव की ही चर्चा क्यों? बाकी ग्रहों को फलादेश से बाहर क्यों रखा गया? अधिकांश टीवी चैनलों पर अंधविश्वास के प्रचार की आंधी चली हुई है। यहां एक नमूना पेश है।
‘स्टार न्यूज’ वाले अंधाधुंध अंधविश्वास का प्रचार करते रहे हैं। अंधविश्वास के प्रचार का नमूना है दीपक चौरसिया के द्वारा 11 जून 2010 को पेश किया गया कार्यक्रम। इस कार्यक्रम का शीर्षक था ‘शनि के नाम पर दुकानदारी’। इस कार्यक्रम में ज्योतिषी, तर्कशास्त्री, वैज्ञानिक सबको बुलाया गया, सतह पर यही लग सकता है कि ‘स्टार न्यूज’ वाले संतुलन से काम ले रहे हैं। लेकिन समस्त प्रस्तुति का झुकाव शनि और अंधविश्वास की ओर था।
सवाल किया जाना चाहिए क्या अंधविश्वास और विज्ञान के मानने वालों को समान आधार पर रखा जा सकता है ? क्या अंधविश्वास और विज्ञान को संतुलन के नाम पर समान आधार पर रखना सही होगा ? क्या इस तरह के कार्यक्रम अंधविश्वास की मार्केटिंग करते हैं ? क्या यह शनि के बहाने ‘स्टार न्यूज’ की दुकानदारी है ? क्या इस कार्यक्रम में शनि के बारे में तथ्यपूर्ण और वैज्ञानिक जानकारियों का प्रसारण हुआ ? क्या इस तरह के कार्यक्रम अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं ? आदि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।
‘स्टार न्यूज’ के इस कार्यक्रम में एंकर दीपक चौरसिया अतार्किक सवाल कर रहे थे। एंकर जब अतार्किक सवाल करता है तो वह कुतर्क को बढ़ावा देता है। बक-बक को बढ़ावा देता है। सही सवाल करने पर सही जवाब खोज सकते हैं। दीपक चौरसिया का प्रधान सवाल था ‘शनि के नाम पर दुकानदारी हो रही है या नहीं’,कार्यक्रम में भाग लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति से यह सवाल पूछा गया जाहिरा तौर पर जवाब होगा ‘हां’, अगला सवाल था शनि से डरना चाहिए या नहीं ? उत्तर था ‘नहीं’। पहले सवाल के जवाब में वक्ताओं ने शनि के नाम पर दुकानदारी का विरोध किया। दूसरे सवाल के जवाब में कहा शनि से नहीं डरना चाहिए।
कायदे से देखें तो इन दोनों सवालों में ‘स्टार न्यूज’ वालों की शनि भक्ति और आस्था छिपी है। ये दोनों सवाल यह मानकर चल रहे हैं शनि है, रहेगा और शनि को मानो। सिर्फ शनि के धंधेबाजों से बचो, शनि से डरो मत, शनि को मानो। पूरे कार्यक्रम में दीपक चौरसिया एक बार भी यह नहीं कहते कि शनि पूजा मत करो, शनि को मत मानो, शनि अंधविश्वास है, उनकी चिंता शनि के नाम पर हो रही दुकानदारी और भय को लेकर थी। एंकर द्वारा शनि की स्वीकृति अंधविश्वास का प्रचार है।
‘स्टार न्यूज’ ने कार्यक्रम के आरंभ में शनि की पूजा के विजुअल दिखाए गए । पूजा के विजुअल प्रेरक और फुसलाने का काम करते हैं। मोबलाईजेशन करते हैं। ये विजुअल शनि अमावस्या के पहले वाली रात को प्राइम टाइम में दिखाए गए हैं। इस कार्यक्रम में मौजूद ज्योतिषियों ने ज्योतिष के बारे में, शनि के बारे में जो कुछ भी कहा उसे अंधविश्वास की कोटि में ही रखा जाएगा।
मजेदार बात यह है कि ज्योतिषियों को अपनी पूरी बात कहने का अवसर दिया गया और वैज्ञानिकों को आधे-अधूरे ढ़ंग से बोलने दिया गया और कम समय दिया गया। एक वैज्ञानिक जब शनि के बारे में वैज्ञानिक तथ्य रखने की कोशिश कर रहा था तो उसे बीच में ही रोक दिया गया।
समूचे कार्यक्रम में एंकर की दिलचस्पी शनि के बारे में वैज्ञानिक जानकारियों को सामने लाने में नहीं थी। बल्कि वह तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि शनि के नाम पर जो दुकानदारी चल रही है, उसके बारे में वैज्ञानिकों की क्या राय है? वे कम से कम शब्दों में राय दें।
एंकर कोशिश करता रहा कि वैज्ञानिक विस्तार के साथ न बोल पाएं। एक वैज्ञानिक ने कहा शनि का समाज पर कोई प्रभाव नहीं होता,दूसरे ने कहा शनि पूजा के नाम पर भय पैदा किया जा रहा है,अंधविश्वास फैलाया जा रहा है। तीसरे वैज्ञानिक ने कहा शनिपूजा अपराध है। बालशोषण है। शनि के नाम पर बच्चों से भिक्षावृत्ति कराई जा रही है। यह अपराध है।
इस बहस का सबसे मजेदार पहलू था एक ज्योतिषी द्वारा शनि ग्रह पर अपनी किताब को दिखाना, इस किताब के कवर पेज पर जो चित्र था उसके बारे में ज्योतिष-लेखक ने कहा यह शनि का चित्र है, इसका तुरंत वैज्ञानिकों ने प्रतिवाद किया और कहा यह शनि ग्रह का फोटो नहीं है। ज्योतिषी एक क्षण के लिए बहस में उलझा लेकिन वैज्ञानिकों के खंडन के सामने उसके चेहरे की हवाइयां उडऩे लगीं।
असल बात यह कि ज्योतिषी यह तक नहीं जानता था कि शनि ग्रह देखने में कैसा है? शनि को इमेज मात्र से नहीं पहचानने वाले ज्योतिषी को शनि का कितना ज्ञान होगा आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं? इसके विपरीत पैनल में मौजूद वैज्ञानिकों को अपनी पूरी बात कहने का मौका ही नहीं दिया गया। दीपक चौरसिया का सवाल था शनि से डरना चाहिए या नहीं? एक ही जवाब था नहीं। सवाल डरने का नहीं है।
सवाल यह है कि शनि को विज्ञान के नजरिए से देखें या अंधविश्वास के नजरिए से देखें? विज्ञान के नजरिए से शनि एक ग्रह है, उसकी अपनी एक कक्षा है। स्वायत्त संसार है। वैज्ञानिकों के द्वारा सैकड़ों सालों के अनुसंधान के बाद शनि के बारे में मनुष्य जाति की जानकारी में जबरदस्त इजाफा हुआ है। इसके लाखों चित्र हमारे पास हैं। शनि में क्या हो रहा है उसके बारे में उपग्रह यान के द्वारा बहुत ही मूल्यवान और नई जानकारी हम तक पहुँची है।
इसके विपरीत ज्योतिषियों ने विगत दो-डेढ़ हजार साल पहले शनि के बारे में ज्योतिष ग्रंथों में जो अनुमान लगाए थे वे अभी तक वहीं पर ही अटके हुए हैं।
कार्यक्रम में शनि के बारे में नई जानकारियों को सामने लाने में एंकर की कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह बार-बार ज्योतिषियों से काल्पनिक बातें सुनवाता रहा। ज्योतिषियों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि उनके पास शनि के बारे में क्या नई प्रामाणिक जानकारियां हैं ?
मैंने ज्योतिष शास्त्र का औपचारिक तौर पर नियमित विद्यार्थी के रूप में संस्कृत के माध्यम से 13 साल प्रथमा से आचार्य तक अध्ययन किया है और ज्योतिष शास्त्र के तकरीबन सभी स्कूलों के गणित-फलित सिद्धान्तकारों को भारत के श्रेष्ठतम ज्योतिष प्रोफेसरों के जरिए पढ़ा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सैकड़ों सालों से ग्रहों के बारे में ज्योतिष में कोई नयी रिसर्च नहीं हुई है।
ज्योतिषियों की ग्रहों के नाम पर अवैज्ञानिक बातों के प्रचार में रूचि रही है लेकिन रिसर्च में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। जब सैंकड़ों सालों से फलित ज्योतिष से लेकर सिद्धान्त ज्योतिष के पंडितों ने ग्रहों को लेकर कोई अनुसंधान ही नहीं किया तो क्या यह ज्योतिषशास्त्र की असफलता और अवैज्ञानिकता का प्रमाण नहीं है ? हम जानना चाहेंगे कि जो ज्योतिषी ग्रहों के सामाजिक प्रभाव के बारे में तरह-तरह के दावे करते रहते हैं वे किसी भी ग्रह के बारे में किसी भी ज्योतिषाचार्य द्वारा मात्र विगत सौ सालों में की गई किसी नई रिसर्च का नाम बताएं ? क्या किसी ज्योतिषी ने कभी किसी ग्रह को देखा है ? ज्योतिष की किस पुरानी किताब में ग्रहों का आंखों देखा वर्णन लिखा है ? सवाल उठता है जब ग्रह को देखा ही नहीं,जाना ही नहीं,तो उसके सामाजिक प्रभाव के बारे में दावे के साथ कैसे कहा जा सकता है।
हिमांशु कुमार
गुरमीत सिंह के यहाँ दो सौ से ज्यादा कुंवारी लड़कियों को सेवा के लिए रखा जाता था, यानी वह रोज ही एक नई लडकी से बलात्कार करता था, और ऐसा वह सत्ताईस सालों से कर रहा था, वह अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों की हत्याएं करवाता था, वह धर्म के प्रवचन देता था, जो इंसान किसी दूसरे की भावना नहीं समझ सकता बल्कि सामने वाले को सिर्फ एक वस्तु समझता हो, वह कैसा इंसान होगा ?
डेरे के उसके अनुयायी जो कत्ल करते थे, हथियार इक_ा करते थे और इस इंसान के कहने से हत्या की योजना बनाते थे, वह लोग भी क्या गुरमीत सिंह को भगवान मानते होंगे ?
क्या पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं को यह सब पता नहीं होगा?
यह लोग यह सब जानकर भी इस गुरमीत सिंह के सामने झुककर प्रणाम करते थे, बलात्कार करने को कोई बड़ी बात ना मानने वाले यह नेता, पुलिस अधिकारी और अफसर लोग प्रदेश की लड़कियों के बारे में क्या सोच रखते होंगे?
हरियाणा में औसतन रोज एक दलित लडकी से बड़ी जाति के दबंगों द्वारा बलात्कार किया जाता है, इनमें से ज्यादातर लोग या तो पकड़े ही नहीं जाते या आराम से छूट जाते हैं, यह वही हरियाणा है जहां एक आदिवासी लडक़ी के साथ सीआरपीएफ के अफसरों द्वारा बलात्कार पर आधारित मह्श्वेता देवी के उपन्यास पर बने नाटक आयोजित करने वाली प्रोफेसर को नक्सली कहकर प्रताडि़त किया गया।
मैंने हरियाणा में खुद बलात्कार पीडि़त महिलाओं को लेकर पुलिस के पास लड़ाई करी है, एफआईआर होने के बाद जब मैं दोनों पीडि़त महिलाओं को लेकर एसपी से मिलने गये तो दोनों बलात्कारी सवर्ण पुरुष एसपी के रूम में बैठे मिले, जो समाज ज्यादा वीरता, ताकत, दम मर्दानगी की पूजा करता है वहाँ हमेशा औरतों, दलितों और कमजोरों के खिलाफ होता है, क्योंकि आपको अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए कोई कमजोर तो चाहिये ही।
पूरा राष्ट्रवाद का किला इसी नकली ताकत पर खड़ा किया जाता है, छप्पन इंच की छाती, उसी की भाषा में जवाब देना जुमले बोल कर नकली वीरता का आभास कराया जाता है।
आप यह सब अपने बच्चों को बचपन से ही सिखाते हैं,
आपके धार्मिक टीवी सीरियल में आपके बच्चे क्या देखते हैं ?
यही ना कि आपके देवता सबको मार रहे, आप देवता वाले हैं और हारने वाला राक्षस आपका दुश्मन है, या हमारी सेना दुश्मन को मार रही है या हम क्रिकेट में पाकिस्तान को हरा रहे हैं ?
आपके बच्चों का दिमाग ताकत की पूजा करने वाला बन जाता है, इसलिए इस समाज में जिसकी पास ताकत है सब उसे पूजने लगते हैं।
अलबत्ता आप कभी यह नहीं पूछते कि आपका ईश्वर बलात्कार पीडि़त लडक़ी की मदद कभी भी क्यों नहीं करता ?
आपको ताकतवर ईश्वर की किसी भी गलत बात पर सवाल उठाने से डरा दिया जाता है, और पूरा समाज सो जाता है, पहले बलात्कारी की मदद करने वाले ईश्वर को दफा कीजिये, फिर राष्ट्र को ताकतवर बनाने की बात करने वाली राजनीति को दफा कीजिये, फिर अपने बच्चों को ताकत नहीं कमजोर और न्याय का साथ देने के बारे में बताइये और ऐसा खुद करके भी दिखाइये।
मेरी बेटियाँ जब देखती हैं कि पापा ने आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए अपना सब कुछ खत्म कर दिया, तो मुझे अपनी बेटियों को यह बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि अन्याय के खिलाफ जरूर लडऩा चाहिए भले ही उसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़े।
मेरी नजर में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाली दोनों लड़कियां, आवाज उठाने वाला पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और फैसला देने वाला जज, इस समाज के लिए ज्यादा जरूरी हैं, बजाय कि एक बड़ा सा झंडा लेकर अपनी कार के आगे बाँध कर घूमते सेना की जय बोलते तथाकथित राष्ट्रवादियों से।
डॉ. आर.के. पालीवाल
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले को प्रकृति ने गंगा यमुना के दोआब की खूबसूरत और बेहद उर्वरक सौगात बख्शी है लेकिन अक्सर सांप्रदायिक तनाव, अपराधों और विवादों के कारण यह जिला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों मे आ जाता है। ताजा मामला जिले के खब्बूपुरा गांव के एक छोटे से प्राइवेट स्कूल का है जिनकी भरमार मुजफ्फरनगर ही नहीं लगभग पूरे भारत के गांवों में कुकुरमुत्तों की तरह हो गई है। इस स्कूल को चलाने वाली एक दिव्यांग महिला शिक्षिका द्वारा एक बच्चे को पिटवाने की वायरल हुई वीडियो पर सोसल मीडिया एवं तमाम अखबारों और चैनलों में सनसनीखेज खबरें प्रसारित हो रही हैं। यह आरोप है कि शिक्षिका ने अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र को बहुसंख्यक वर्ग के छात्रों से अल्प संख्यक वर्ग के प्रति दुर्भावनाग्रस्त मानसिकता के कारण पिटवाया है। एक अनाम से गांव के अनाम से प्राइवेट स्कूल की इस घटना पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और असदुद्दीन ओवैसी आदि के आक्रोषपूर्ण बयान प्रमुखता से प्रकाशित हुए हैं।
निश्चित रूप से शिक्षक द्वारा किसी बच्चे की उसके साथियों द्वारा निर्मम पिटाई उचित नहीं है, हालांकि हमारे यहां कुछ दशक पहले तक, जब हमारी पीढ़ी स्कूल में पढ़ती थी, बचपन में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों की पिटाई को अभिभावकों का भी समर्थन मिलता था लेकिन अब न कानून इसकी अनुमति देता है और न आधिकांश अभिभावक इसका समर्थन करते हैं। इसलिए इस मामले में संबंधित शिक्षिका का व्यवहार दुराचरण की श्रेणी में आता है। यदि जांच में यह साबित होता है कि शिक्षिका ने बच्चे की पिटाई किसी धर्म या जाति विशेष के प्रति दुर्भावना की मानसिकता से कराई है तब ऐसी शिक्षिका को शिक्षिका होने का हक नहीं है और उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहद कड़ी सजा होनी चाहिए।
मूल प्रश्न यह भी है कि हमारी सरकारी शिक्षा व्यवस्था इतनी लचर क्यों हो गई कि अधिसंख्य नागरिकों का उस पर विश्वास ही नहीं रहा। शिक्षा को इस हालत में पहुंचाने के लिए देश के तमाम दल थोड़े कम या अधिक लगभग बराबर के दोषी हैं। उत्तर प्रदेश में इस कुव्यवस्था के लिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव की कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी उतनी ही दोषी हैं जितनी भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राज्य सरकार दोषी है। यही कारण है कि आजादी के दो तीन दशक बाद से सरकारी प्राइमरी शिक्षा की हालत दिन ब दिन बदतर होती चली गई और गांव-गांव और गली गली अर्धशिक्षित शिक्षकों द्वारा संचालित ऐसे प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ गई जिसमें से एक मुजफ्फरनगर जिले का वह आधा अधूरा मान्यता समाप्त होने के बाद भी चल रहा स्कूल है जिसमें यह दुर्भाग्यजनक घटना घटी है जिसे ज्यादातर राजनीतिक दल बढ़ा चढ़ाकर अपने अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं और चुनावों तक करेंगे। इन राजनीतिक दलों को यह भी बताना चाहिए कि उनके शासन काल में उत्तर प्रदेश में शिक्षा में क्या गुणात्मक परिवर्तन किया गया था और यदि उन्हें फिर से सत्ता हासिल हुई तो वे किस तरह से शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाएंगे।
शिक्षा किसी देश और समाज के भविष्य के लिए नीव का काम करती है। ब्रिटिश राज में मैकाले ने भारत की नीव खोखली करने के लिए जिस शिक्षा व्यवस्था को हम पर लादा था कमोबेश वही शिक्षा पद्धति थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ आज़ादी के बाद भी बरकरार रही। साठ के दशक तक सरकारी शिक्षकों में विद्यार्थियों के प्रति आत्मीय लगाव के कारण सरकारी प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीकठाक था लेकिन वर्तमान दौर में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की स्थिति चिंताजनक है।
ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खतरनाक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना से सबक लेकर उत्तर प्रदेश सरकार सरकारी स्कूल शिक्षा का स्तर सुधारने की कोशिश करेगी।
योगिता आर्या
चोरसौ, उत्तराखंड
भारत में हर बच्चे का अधिकार है कि उसे, उसकी क्षमता के विकास का पूरा मौका मिले। लेकिन आज़ादी के सात दशक बाद भी देश में लैंगिक असमानता की धारणा विद्यमान है। इसके पीछे सदियों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियां मुख्य वजह रही हैं। जिसकी वजह से लड़कियों को मौके नहीं मिल पाते हैं। भारत में लड़कियों और लडक़ों के बीच न केवल उनके घरों और समुदायों में बल्कि हर जगह लैंगिक भेदभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
विशेषकर देश के दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों में यह असमानता मज़बूती से अपनी जड़ें जमाए हुए है। जिसकी वजह से लड़कियों को उनकी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन का अवसर नहीं मिल पाता है। हालांकि हरियाणा और उत्तर पूर्व के कुछ राज्य ऐसे ज़रूर हैं जहां के ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों को खेलों में जाने का अवसर मिला और उन्होंने इसका भरपूर लाभ उठा कर ओलंपिक जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में देश का नाम रौशन किया है। लेकिन देश के ज़्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में संकुचित सोच के कारण लड़कियों को ऐसा मौका नहीं मिल पाता है।
ऐसा ही एक उदाहरण पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक के चोरसौ गांव में देखने को मिलता है। अनुसूचित जाति बहुल वाले इस गांव की कुल जनसंख्या 3584 है और साक्षरता दर करीब 75 प्रतिशत है। लेकिन इसके बावजूद यहां की किशोरियों को लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में 10वीं की एक छात्रा विनीता आर्या का कहना है कि 'हम लड़कियों को जैसे-तैसे 12वीं तक पढ़ा तो दिया जाता है, लेकिन बराबरी के मौके नहीं मिलते हैं। यह शिक्षा उन्हें तब तक मिलती है जब तक उनकी शादी नहीं हो जाती है। लेकिन लडक़ों की बात जाए तो उनकी उच्च शिक्षा के लिए मां बाप अपनी जमीन तक बेचने के लिए तैयार हो जाते हैं। यही सोच कर लगता है कि कहां मिला बराबरी का हक?' वहीं गांव की एक 45 वर्षीय महिला रजनी देवी कहती हैं कि 'पहले की अपेक्षा गांव के लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है। कुछ शिक्षित और जागरूक माता पिता लडक़े और लड़कियों को बराबर शिक्षा दे रहे हैं। हालांकि जहां लडक़ों की शिक्षा के लिए शत प्रतिशत प्रयास करते हैं, वहीं लड़कियों के लिए उनका प्रयास अपेक्षाकृत कम होता है। हम यही सब बचपन से देखते आ रहे हैं। वह बताती हैं कि उनके दोनों भाईयों को 12वीं तक शिक्षा दिलाई गई, जबकि बहनों की आठवीं के बाद ही शादी कर दी गई।
वहीं 66 वर्षीय रुक्मणी भी कहती हैं कि 'अब समाज की सोच बदलने लगी है। पहले की अपेक्षा लडक़ा और लडक़ी में भेदभाव कम होने लगा है। इसमें सरकार द्वारा चलाई गई योजना 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का काफी असर हो रहा है। सरकार ने लड़कियों के आगे बढऩे के लिए जो योजनाएं और सुविधाएं दी हैं, उसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल रहा है। सरकार ने 12वीं तक किताबें भी मुफ्त कर दी हैं, ड्रेस के पैसे मिल रहे हैं। विभिन्न प्रकार की छात्रवृत्तियां प्रदान की जा रही हैं। जो लड़कियों को शिक्षित करने में सहायक सिद्ध हो रहा है। लेकिन फिर भी मुझे नहीं लगता है कि लड़कियों और महिलाओं को अभी भी पूर्ण रूप से बराबरी का हक मिल रहा है। महिला जहां दिन भर मजदूरी करती है तो उसे 300 रुपए मिलते हैं, वहीं पुरुष को उसी काम के लिए 500 रुपए दिए जाते हैं।
गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता 46 वर्षीय आमना कहती हैं कि 'जब से मैंने आंगनबाड़ी में नौकरी करनी शुरू की है, कई लोगों से मिलती रहती हूं। इस दौरान मैंने जाना कि वास्तव में लड़कियों के लिए भी समाज में बराबरी के हक होने चाहिए।' वह कहती हैं कि संविधान ने तो सभी को बराबरी का हक दिया है। सरकार ने भी लैंगिक असमानता को दूर करने और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बहुत सी योजनाएं चलाई हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी माता पिता 12वीं के बाद से ही लड़कियों की शादी की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। लेकिन लडक़ों के लिए 25 से 27 वर्ष में ही शादी की बात करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि कम उम्र में लडक़े घर की जि़म्मेदारी को उठाने में सक्षम नहीं होते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर 17 या 18 वर्ष की उम्र में कोई लडक़ी कैसे पूरे घर की जिम्मेदारी उठा सकती है?
इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता नीलम ग्रेंडी का कहना है कि ‘ये बात सही है कि शहरों की अपेक्षा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को बराबरी के मौके नहीं मिलते हैं। उन्हें बोझ समझ कर ढोया जाता है। दो के बाद यदि तीसरी भी बेटी हो तो फिर महिला का जीना मुश्किल कर दिया जाता है। लडक़ों की चाह में लड़कियों की लाइन लग जाती है। अगर वास्तव में लड़कियों को बराबरी का दर्जा मिला होता तो यह सारी चीजें बहुत पहले समाज में खत्म हो गई होती। लोग अपने आप को पढ़े लिखे आज़ाद ख्याल के कहते हुए भी लड़कियों को बोझ मानते हैं। अगर महिलाओं की बात करें तो शादी के बाद भी उसे अपने परिवार में बराबरी के मौके और हक नहीं मिल पाते हैं। परिवार की जिम्मेदारी उठाने के बाद भी उसे ताने सुनने पड़ते हैं। यदि लडक़ा दिन भर घर से गायब रहे तो उससे कोई सवाल नहीं करता, लेकिन यदि कोई लडक़ी नौकरी या पढ़ाई के कारण देर शाम घर लौटे तो भी सवालों की झाडिय़ां लग जाती है।
वास्तव में, लड़कियों को अभी भी बराबरी के वह मौके नहीं मिले हैं जिसकी वह हकदार है। अगर हमारे समाज में एक लडक़ी का बलात्कार होता है तो दुनिया उसी के चरित्र पर सवाल उठाती है। पीडि़ता का साथ देने की बजाये उसी को आरोपी बना दिया जाता है। उसका मानसिक उत्पीडऩ किया जाता है। जबकि बलात्कारी लडक़े को बचाने के लिए परिवार अपनी संपत्ति तक बेचने को तैयार हो जाता है। समाज भी उसी का साथ देने को तैयार रहता है। शादी के बाद जब एक लडक़ी मां बनती है तो बच्चे की सारी जिम्मेदारी, आदर्शों और संस्कारों की परवरिश सब कुछ अकेले उसके ऊपर डाल दी जाती है। तो ऐसे में बराबरी की बात बेमानी लगती है। दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों में लडक़ा और लडक़ी में भेदभाव और लैंगिक असमानता शिक्षा के साथ साथ जागरूकता के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है। (चरखा फीचर)
-प्रकाश दुबे
बात है, 23 अगस्त की। चंद्र भूमि पर चंद्रयान के उतरने में उतना ही समय बचा था, जितना राजीव गांधी चौक यानी कनॉट प्लेस से बाधा विहीन यातायात के दौरान इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंचने में लगता है। देश के माथे पर वैज्ञानिक क्षमता का सेहरा बंधने ही वाला था। एयरोब्रिज के अभाव में बस के जहाज के निकट पहुंचने पर ठिठक गए। बस जहाज के द्वार के निकट नहीं पहुंच सकती थी। कई बसें आड़ी टेढ़ी खड़ी थीं।
मैंने चुटकी ली- बस अड्डे से भी अधिक गहमागहमी वाला नजारा है। ड्राइवर की मुस्कान पर झेंप हावी थी। सुरक्षा जांच में धक्के खाने और धकियाने के बाद यात्रियों में कवायद को दोहराने की होड़ लगी। यह जलपान का पड़ाव था। कंप्यूटर साहब को विक्रेता की कमाई और कुल्हड़ भर चाय के लिए सौ की कुछ पत्तियां हाजिर करने वाले यात्रियों की बेताबी की चिंता नहीं थी। किसी ने फब्ती कसी-चाय वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया। अब तो सुधार होना चाहिए। यात्री फब्ती-साहसी को देखने लगे। विक्रेता ने आवाज चढ़ाकर कहा-आर्डर के बाद भी दस मिनट और लगेंगे। ताजा चाय बनाकर देते हैं।
यह वही कुल्हड़ है, जिसके भरोसे देश भर में फैले कुम्हारों की किस्मत बदलने का वादा करने वालों की लंबी कतार में रेल मंत्री जार्ज फर्नांडिस, लालू प्रसाद, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार थे। वे सब असफल रहे। कारपोरेट कारोबारी पांच सितारा होटलों से लेकर हवाई अड्डों तक कमाई की उड़ान भर रहे हैं। कुम्हार के खाते में दस प्रतिशत नहीं आता होगा।
उड़ान भरने के लिए आतुर यात्री विमान तक पहुंचने के लिए कतार तोडऩे की जुगत में थे। बस में बैठकर ही जहाज तक पहुचना संभव था। बस तक पहुंचने के लिए छत से टपकते पानी की तेज धार में भीगने के सिवा कोई चारा नहीं था। ग्राउंड स्टाफ का कर्मचारी असहाय खड़ा खड़ा नजारा देखता था। उसके पास भी छतरी नहीं थी। द़निया के सबसे गहमागहमी वाले हवाई अड्डे को तैयार करने में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। विमानतल के अंदर और आसपास की खुदाई से दो बातों का पता लग जाता है। सर्वप्रथम यह कि विकास काम फुर्ती से जारी हैं। दूसरे यह, कि करोड़ों खर्च होने हैं।
चंद्रयान ने आहिस्ता चांद की चुम्मी ली। 6 से 10 सितंबर तक देश की राजधानी में जी-20 के जलसे का जलवा है। जी-20 की सभा के होर्डिंग लग चुके हैं। बाघ से लेकर हाथी सहित देशनायकों को अलग अलग धातुओं और होर्डिंग में उकेर कर बिठाया जा रहा है। जी-20 के प्रचार पत्रकों और होर्डिंग में प्रधानमंत्री के चेहरे के साथ सूचना की दमक यात्रियों को दर्शक गर्वित करती होगी। इस दमक को भुनाने में कोरोबारी सबसे आगे हैं। पूरी दिल्ली में आग की तरह खबर फैल चुकी है कि हवाई अड्डे से सटे एयरोसिटी के नामी होटल ने एक सुइट में रात रुकने के बीस लाख रुपए मांग लिए। नौ देशों के प्रतिनिधि हाजिर रहेंगे। जनपथ के होटल में अन्य देश से रात भर के लिए 15 लाख रुपए की मांग की गई। मुझे बताया गया-जिस कमरे में आप रुके हैं, उसका भाड़ा अब पांच गुने से अधिक होगा। आयोजन से जुड़ी टीम वाले जानते हैं कि इतनी अधिक कमाई किसी देश में जी-20 समारोहों में नहीं की गई।
दिल्ली के लोग चकित नहीं हैं। टेक्सी चालक से कहा- आपकी तो जबर्दस्त कमाई होगी। उसने असहमति जतलाते हुए कहा-रूट आवागमन के कई रास्ते बंद होंगे। तीन दिन स्कूल बंद। उसे दिलासा दी-विदेशी मेहमान मिलेंगे। चालक ने भेद खोला-दो बड़ी कंपनियों को प्रतिनिधि देशों के मेहमान ढोने का ठेका दिया जा चुका है।
दिल्ली में ही कारोबार कामयाब नहीं होता। साथी ने बताया- मिलिंद सोमण से दो केलों के 650 रुपए मांगे गए थे। वे चंडीगढ़ में उस समय संपादक थे। यह सब उस समय हो रहा है, जब जी-20 के अध्यक्ष पद के अवसान से पहले प्रधानमंत्री ब्रिक्स का कार्यक्षेत्र बढ़वाने की कामयाबी का श्रेय पा रहे हैं। ब्रिक्स का अध्यक्ष पद इस समय दक्षिण आफ्रीका के सिरिल रामफोसा हैं।
कुछ देशों को सदस्य बनाने से ब्रिक्स का नाम बदलने की फिक्र न करें। यदि जी-20 में विस्तार होता तो इसे भी जी-25 कहा जाता। यदि प्रधानमंत्री प्रयास कर रहें हों तो 2024 का इंतजार करें। विश्व के सबसे अधिक आवाजाही वाले दिल्ली हवाई अड्डे का हाल सुधरने की जानकारी कहीं और से पढ़ सकते हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री, प्रदेश का प्रचार प्रसार विभाग और अधिकांश सरकारी मशीनरी सत्ता प्राप्ति की नई सीढ़ी बनती दिख रही मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी लाडली बहना योजना को प्रदेश के कोने कोने तक पहुंचाने में जुटे हैं। भले ही यह योजना गरीब वर्ग की महिलाओं के खाते में सीधे हर महीने एक हज़ार रूपए जमा करने की सीधी सरल योजना है लेकिन मुख्यमंत्री जिले जिले घूमकर, अखबारों में विज्ञापन देकर, चौराहों पर पोस्टर लगवाकर न केवल जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई हवा में उड़ा रहे हैं बल्कि जनता के तमाम जरूरी मुद्दे छोडक़र पूरी प्रशासनिक मशीनरी इस योजना के भव्य समारोहों के लिए महिलाओं की भीड जुटाने में लगी है।
सत्ता, जन धन और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का यह अपनी किस्म का अनूठा मामला है। इक्कीसवीं सदी में जब अधिकांश आर्थिक लेन देन नेट बैंकिंग से हो रहा है तब किसी योजना के प्रचार के लिए सिर्फ चुनाव जीतने के लिए सरकारी तंत्र का इतना फूहड़ प्रदर्शन लोकतंत्र के नैतिक मूल्यों के लिए चिंताजनक है।
ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादुई चमत्कार कर्नाटक विधानसभा में हार के बाद के बाद फीका पड़ गया है और भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा का नेतृत्व गृह प्रदेश हिमाचल प्रदेश में असफल होने के बाद विश्वसनीय नहीं रहा इसलिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी सत्ता बचाने के लिए लाड़ली बहना योजना को ढाल बनाकर चुनावी रणभूमि में उतरे हैं और तमाम आलोचनाओं से बेखबर होकर लाडली बहना योजना के विज्ञापन और प्रचार प्रसार पर पूरी ताकत झौंक रहे हैं।
उन्हें पूरा विश्वास है कि बहनों से राखी बंधवाकर वे भारतीय जनता पार्टी को जिताने का जो संकल्प ले रहे हैं वह उनकी जीत सुनिश्चित करेगा। भले ही कानूनी तौर पर इस तरह की योजना का बेहिसाब प्रचार जायज हो लेकिन चुनावी वर्ष में यह सीधे सीधे मतदाताओं के बड़े वर्ग के लिए सीधा प्रलोभन है। केन्द्रीय चुनाव आयोग के नेत्र भले ही चुनाव अधिसूचना जारी होने पर खुलते हैं लेकिन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में इस रेवड़ी कल्चर को सबसे ज्यादा उनके दल की मध्य प्रदेश सरकार ही बढ़ा रही है। जिस तरह प्रधान मंत्री की भव्य देशी विदेशी रैलियों के लिए बड़ा मंच सजाया जाता है इस योजना के लिए वैसा ही भव्य मंच शिवराज सिंह चौहान भी सजा रहे हैं।
कांग्रेस ने इस योजना को धराशायी करने के लिए पंद्रह सौ रुपए का शिगूफा छोडक़र पानी फेरने की तैयारी की थी। सरकार को लगा कि उसकी सारी मेहनत बेकार चली गई इसलिए रक्षाबंधन पर यह राशि बढ़ाकर बारह सो पचास रुपए कर दी और यह घोषणा भी कर दी कि भविष्य में समय समय पर ढाई सौ रुपए बढ़ाकर यह राशि तीन हजार रूपए प्रतिमाह तक बढ़ाई जाएगी। संभव है निकट भविष्य में कांग्रेस भी पंद्रह सौ में पांच पांच सौ का इजाफा कर इसे पांच हजार तक बढ़ाने का जुमला उछाल दे।
डॉ. आर.के. पालीवाल
पाकिस्तान की अपनी समस्याएं हिमालय से ज्यादा बडी हो चुकी हैं और घटने की बजाय बढ़ती ही जा रही हैं लेकिन कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत के प्रति नफरत वहां के नेताओं और सेना के हाथ में एक ऐसा भावनात्मक हथियार है जिसकी वजह से वहां जनता में इन दोनों के विरोध में कोई क्रांति नहीं होती। पाकिस्तान के जनक कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना के बाद पाकिस्तान में ऐसा कोई बड़ा नेता नही हुआ जिसका नाम जनता बहुत इज्जत के साथ लेती हो।
जहां तक पाकिस्तान की सेना और सत्ता का प्रश्न है उसने मुहम्मद अली जिन्ना को भी अंतिम समय में वैसा सम्मान नहीं दिया जैसा भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मिला था। हालांकि आजकल भारत में भी एक तबका ऐसा है जिसे गांधी और पाकिस्तान से नफरत है लेकिन बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर और गांधी की शांति, अहिंसा और सांप्रदायिक सौहार्द एवम सह अस्तित्व की विचारधारा के कारण भारत की आधिकांश आबादी गांधी और पाकिस्तान के प्रति नफरत का भाव नहीं रखती। यही कारण है कि गांधी से विरोध रखने वाले नेताओं को भी सार्वजनिक रुप से गांधी की मूर्ति के सामने नत मस्तक होना पड़ता है।
समय के साथ कश्मीर को लेकर भारत के प्रति नफरत प्रदर्शन का भाव पाकिस्तान की सरकार, सेना और आई एस आई की त्रिमूर्ति के हाथ में ऐसा ब्रह्मास्त्र बन गया है जिसके थोड़े से वार से पाकिस्तानी अवाम का ध्यान पाकिस्तान की अंदरूनी बदहाली से हट जाता है। वर्तमान दौर में भी पाकिस्तान के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री ने अक्सर भारत विरोधी बयान देने वाली मुशाल हुसैन मलिक को अपना विशेष सलाहकार नियुक्त किया है।
मुशाल हुसैन मलिक जेल में बंद कश्मीरी आतंकवाद के समर्थक यासीन मलिक की पत्नी हैं और वे अपने पति और कश्मीर की आजादी के लिए जब तब बयान देती रहती हैं। कार्यवाहक प्रधान मंत्री सामान्यत: किसी ऐसे व्यक्ति को बनाया जाता है जिसकी खुद की छवि निष्पक्ष हो और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे निष्पक्ष छवि के व्यक्ति को अपने सलाहकार नियुक्त करेंगे। लेकिन पाकिस्तानी सत्ता नैतिकता कभी की त्याग चुकी है।
पाकिस्तान में इन दिनों चुनावी माहौल है, लेकिन राजनीतिक दलों और सेना के बीच तनाव के साथ साथ सेना के अंदर भी नेतृत्व को लेकर दरार काफ़ी बढ़ गई है। जब से सेना और सरकार ने इमरान खान को आगामी चुनाव से बाहर करने के लिए मोर्चा खोला है तब से पाकिस्तान के अंदरूनी हालात और आंतरिक शक्ति संतुलन निरंतर गड़बड़ाते जा रहे हैं। इमरान खान की पहली गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान की जनता में जिस तरह का उबाल देखने को मिला था, दोबारा गिरफ्तारी के समय वैसा सार्वजनिक उपद्रव तो नहीं हुआ लेकिन जानकारों के अनुसार लोगों में अंदर ही अंदर तत्कालीन सरकार और सेना की मिलीभगत से हुई गिरफ्तारी के खिलाफ काफ़ी रोष है। इमरान खान को जेल में बंद करने पर उनके समर्थक ठगे से महसूस कर रहे हैं। इमरान खान को चुनावों से बाहर करने के बाद निवर्तमान प्रधान मंत्री शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख के बीच भी मतभेद की खबरें आ रही हैं। पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधान मंत्री को सेना का पक्का समर्थक बताया जा रहा है इसलिए ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद नहीं कर सकता।
इमरान ख़ान की गिरफ्तारी और अपनी पसंद के कार्यवाहक प्रधान मंत्री नियुक्त करने के बाद के बाद सेना प्रमुख को उम्मीद थी कि देश की सत्ता उनके इशारे पर चलेगी लेकिन पाकिस्तान के हालात सेना प्रमुख के भी पक्ष में नहीं हैं। सेना में इमरान समर्थक भी भारी तादाद में हैं। उधर कार्यवाहक प्रधान मंत्री की नियुक्ति को लेकर भी सेना प्रमुख पर उंगली उठ रही हैं। ऐसे में सेना प्रमुख सत्ता की बागडोर आसानी से अपने हाथ में नहीं ले सकते।यासीन मलिक की पत्नी को प्रधान मंत्री की विशेष सलाहकार बनाने से भारत विरोध को और हवा मिली है। इन हालात में निष्पक्ष चुनाव और हालात में सुधार असंभव लगते हैं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का प्रसिद्ध निबंध है ंबुद्ध और कार्ल माक्र्स, इसमें आम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों के बहाने धर्म की 25 सूत्रों में व्याख्या पेश की है। ये सूत्र अब तक विचार विमर्श के केन्द्र में नहीं आए हैं, इन सूत्रों पर वाद-विवाद-संवाद होना चाहिए।
ये 25 सूत्र हैं-1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है। 2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता। 3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए। 4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है। 5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है। 6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है। 7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं। 8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है। 9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अत: इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए। 10. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं। 11. कि संसार में दु:ख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है। 12. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाती है और दूसरे वर्ग को दु:ख मिलता है। 13. कि समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि इस दु:ख का निदान इसके कारण का निरोध करके किया जाए। 14. सभी मानव प्राणी समान हैं। 15. मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं। 16. जो चीज महत्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म। 17. सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए। 18. प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की। 19. अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है। 20. कोई भी चीज भ्रमातीत व अचूक नहीं होती। कोई भी चीज सर्वदा बाध्यकारी नहीं होती। प्रत्येक वस्तु छानबीन तथा परीक्षा के अध्यधीन होती है। 21. कोई वस्तु सुनिश्चित तथा अंतिम नहीं होती। 22. प्रत्येक वस्तु कारण-कार्य संबंध के नियम के अधीन होती है। 23. कोई भी वस्तु स्थाई या सनातन नहीं है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील होती है। सदैव वस्तुओं में होने का क्रम चलता रहता है। 24. युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है। 25. पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।ंं
यानी हर धर्म स्वीकार करने योग्य नहीं होता। धर्म को चुनते समय क्या देखें यह आम्बेडकर ने उपरोक्त 25 सूत्रों में रेखांकित किया है। धर्म कोई बनी-बनायी व्यवस्था नहीं है,बल्कि उसे हर बार नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है। धर्म को अर्जित करने के लिए धार्मिक होने की जरूरत नहीं है,बल्कि धर्म को देखने का वैज्ञानिक नजरिया अर्जित करने की जरूरत है। आम्बेडकर ने धर्म के जिन 25 सूत्रों का जिक्र किया है उनमें धर्म को शाश्वत न मानने वाली बात बेहद रोचक है। धर्म के जितने भी रूप प्रचलन में हैं वे धर्म को शाश्वत मानकर चलते हैं। जबकि धर्म शाश्वत नहीं बल्कि परिवर्तनशील है। धर्म को परिवर्तनशील मानना अपने आपमें भौतिक जगत की सत्ता को महत्व देना है। धर्म का प्रमुख काम है मनुष्य को प्रसन्न रखना और स्वतंत्र रखना। जो धर्म यह काम करे वह स्वीकार्य है जो यह काम न करे वह अस्वीकार्य है। इन दिनों धर्म के नाम पर प्रतिस्पर्धा और घृणा का जमकर प्रचार हो रहा है। आम्बेडकर ने धर्म की इस भूमिका का निषेध किया है और रेखांकित किया है धर्म का मुख्य कार्य है मैत्री स्थापित करना।
धर्म पूजा या उपासना की चीज नहीं है बल्कि आचरण की चीज है। जो लोग धर्म को पूजा-उपासना की चीज मानते हैं उनके जीवन में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती, वे धर्म को प्रचार प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं। धर्म, प्रचार की नहीं, आचरण की चीज है। धर्म आचरण में मिलता है। आचरण में ढालने का अर्थ है कि धर्म का कायाकल्प करना।
यह सवाल भी उठा है धर्म के केन्द्र में कौन है? इन दिनों धर्म के केन्द्र में उपदेश हैं, राजनीति है, हिंसा है, अंधविश्वास हैं, मुनाफेखोरी है, संपत्ति संचय करने की प्रवृत्ति है, इन सभी चीजों का धर्म से कोई संबंध नहीं है। धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रहना चाहिए। मनुष्य को केन्द्र में रखे बिना धर्म बेहद खतरनाक भूमिका अदा करता है।धर्म के बर्बर होने के चांस बढ़ जाते हैं। धर्मनिरपेक्षता की भी यही मांग है कि धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रखा जाय। धर्म को मानवीय रूप दिया जाय। धर्म का ईश्वर या उपासना से कोई संबंध नहीं है। धर्म का मूलाधार तो मनुष्य है, लेकिन अधिकांश लोग धर्म का आधार ईश्वर को मानते हैं। ईश्वर दासता की मनोदशा में बांधता है, जबकि मनुष्य दासता की मनोदशा से मुक्त करता है।धर्म को मानो लेकिन मनुष्य को उसके केन्द्र में प्रतिष्ठित करो। ईश्वर को केन्द्र से अपदस्थ करो। धर्म के केन्द्र में ईश्वर का होना बंधन है। मानसिक गुलामी है। जबकि मनुष्य को धर्म के केन्द्र में रखेंगे तो धर्म की भूमिका और चरित्र बदल जाएगा, धर्म मुक्ति और स्वतंत्रता का रूप ग्रहण कर लेगा।
डॉ. आर.के. पालीवाल
चंद्रयान 3 की चांद के दक्षिण ध्रुव पर सफल लैंडिंग बहुत दिनों के बाद देश में घटी ऐसी विलक्षण घटना है जिस पर पूरे देश में असीम उत्साह की लहर है। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है कि देश से जुड़ी किसी सम्मान दायक घटना पर चाहे वह अंतरिक्ष में बडी सफलता हो या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी खिलाड़ी द्वारा विश्व चैंपियन बनना हो, हम सब भारत के तमाम नागरिक एक स्वर में मिले सुर मेरा तुम्हारा गीत की तर्ज पर खुशी मनाते हैं। चंद्रयान तीन की सफल लैंडिग इस मामले में भी खास है क्योंकि इसके पहले हमारा यह अभियान फेल हो गया था और अभी हाल ही में रूस का ऐसा ही अभियान विफल हो गया है। हमारे चंद्रयान अभियान की सफलता से भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक यान भेजने वाला अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बन गया और दक्षिण ध्रुव पर चंद्रयान भेजने वाला पहला देश बना है। आजादी के अमृतलाल में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की यह राष्ट्र को भेंट की गई अमूल्य धरोहर है।
चंद्रयान 3 की सफलता का सबसे ज्यादा श्रेय निश्चित रुप से उन वैज्ञानिकों की टीम को जाता है जिन्होंने मीडिया के ग्लैमर से दूर रहकर लंबी तपस्या सरीखी दिन रात कड़ी मेहनत के साथ इस सफलता को देशवासियों को समर्पित किया है। इसी के साथ नरेंद्र मोदी सरकार को भी श्रेय दिया जाएगा कि इस मिशन को मिशनरी मोड़ में संपन्न करने के लिए केन्द्र सरकार ने चंद्रयान अभियान से जुड़े वैज्ञानिकों की टीम को सब सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ अब्दुल कलाम ने 2004 में इस अभियान की परिकल्पना की थी। पंडित जवाहरलाल नेहरु की दूरदर्शिता को भी सलाम जिन्होंने इसरो की स्थापना कर अपने बाद की पीढ़ी के प्रधानमंत्रियों को इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि अपने समकालीन नेताओं में पंडित नेहरू की वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील दूरगामी दृष्टि अतुलनीय थी।
उनके बाद इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सोच भी वैसी ही थी। इस मामले में अटल बिहारी वाजपेई और मनमोहन सिंह के कार्यकाल को भी याद किया जाना चाहिए जिन्होने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को निरंतर आगे बढ़ाने की हर संभव कोशिश की थी। इसी तरह इसरो के सूत्रधार क्रिम अंबालाल साराभाई को भी अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए मजबूत नीव रखने का श्रेय जाता है। एक कृतज्ञ राष्ट्र और प्रगतिशील समाज वही होता है जो अपनी ऐतिहासिक विभूतियों को याद करते हुए उनके द्वारा प्रारंभ किए रचनात्मक कार्यों को तीव्र गति प्रदान कर निरंतर आगे बढ़ाता है।
पिछले तीन-चार महीने से देश में कई निराशाजनक घटनाओं के कारण हताशा का माहौल था, जिनमें महिला पहलवानों के यौन शोषण का मामला, मणिपुर की जघन्य हिंसा और मेवात के सांप्रदायिक दंगों की काली छाया प्रमुख थी। चंद्रयान अभियान की सफलता ने ऐसे अंधियारे समय में राष्ट्र को ऐसी ही खुशी दी है जैसे कृष्ण पक्ष के बाद शुक्ल पक्ष में मिलती है। इस अभियान की सफलता के लिए जहां एक तरफ धार्मिक लोग अपने अपने धर्म की प्रार्थनाएं कर सफलता की कामना कर रहे थे, वहीं वैज्ञानिक सोच वाले लोग वैज्ञानिकों की मेहनत पर भरोसा कर रहे थे कि पिछली गलती से सीखकर इस बार अवश्य सफलता प्राप्त होगी। दुर्भाग्य से कुछ लोग धार्मिक लोगों की पूजा-अर्चना पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं और कुछ लोग इसे सिर्फ मोदी सरकार या पंडित नेहरू की दूरदृष्टि का प्रतिफल बताकर अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहे हैं। ऐतिहासिक सफलता के अवसर पर इस तरह की हल्की सोच से बाहर निकल कर हम सब भारतीय नागरिकों को उत्साह के साथ इस सफलता का सामूहिक आनंदोत्सव मनाना चाहिए।
-अपूर्व गर्ग
माफ़ कीजियेगा चंद्रयान की सफलता की बधाई देने के बाद आपको उन पहाड़ों में ले जाना चाहूंगा जहाँ बसे न जाने कितने घर बारिश मिट्टी में मिलकर ज़मींदोज़ हो गए।
हो सकता है , इस वक्त ये सुनकर पीड़ा हो... माफ़ी चाहता हूँ...
जो पहाड़ चांदनी में नहाकर चमकते हैं और चाँद जिन पहाडिय़ों से सबसे गोरा सुंदर नजऱ आता है उस पर संकट के बादल छाए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल में अब तक 330 जानें जा चुकी हैं और 12,000 घर तबाह हो चुके हैं। तकरीबन 13 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
बहुत भयानक मंजर है। जान जा रही, लोग बेघर हो रहे और कारोबार ठप्प। जबकि अभी लॉकडाउन से मिले ज़ख्म अभी भरे नहीं हैं।
फटते बादल निगलने को तैयार हैं। तेज बारिश में कब सडक़ बहे, घर बह जाए कहा नहीं जा सकता!
ऐसा पिछले 50 बरसों में नहीं हुआ। दोस्त ने बताया आस-पास क्या दूर-दूर तक लोग जागते रहे कोई सो नहीं रहा।
नींद कैसे आए? जरा सोचिए... जो पहाड़ इस दुनिया को तरोताजा कर भेजते हैं, क्या इस बारिश में हम उनके आंसुओं का सैलाब देख पा रहे?
इस मौके पर मुझे एक भी राजनीतिक टिप्पणी नहीं करनी।
वहां जो बर्बाद हुए, तबाह हुए वो सभी विचारों के लोग हैं। प्रकृति का प्रकोप बराबरी से है। सभी राजनीतिक दलों को बराबरी से हिमाचल को प्राथमिकता पर रखते हुए अपना पूरा ध्यान और फोकस यहीं करना चाहिए।
पहाड़ की बर्बादी की कीमत मैदानों को भी चुकानी होगी।
पहाड़ पुकार रहे हैं, आपने सुना?
हिमाचल की चीख क्या दिल्ली ने सुनी?
क्या उन तमाम लोगों ने सुनी जिनके मोबाइल हिमाचल की सुंदर तस्वीरों से भरे हैं ?
पिछले 50 सालों में पहली बार ऐसी भयानक तस्वीर उभरी है जो इस देश की तस्वीर ही है।
आहत हिमाचल नहीं हम सब हैं । ये हम सब पर आपदा है।
ये राष्ट्रीय आपदा है।
देश भर के 75,000 पर्यटकों और 17,000 फंसी गाडिय़ों को तो हिमाचल ने 48 घंटे में सुरक्षित निकाल लिया।
पर अब बारी और जिम्मेदारी हमारी है हिमाचल को इस आपदा से बाहर निकलने की। ये तभी बेहतर सम्भव होगा जब तत्काल राष्ट्रीय आपदा घोषित कर हिमाचल प्रदेश को राष्ट्रीय आपदा के तहत मिलने वाला राहत पैकेज देना चाहिए।
आइए हम भी आगे बढ़ें हाथ बढ़ाएं। चाँद जिस तरह नि:स्वार्थ अपनी चांदनी बिखेरता है इसी तरह हम भी अपनी इंसानियत बिखेरें।
इसरो ने कितनी ख़ूबसूरती से मेहनत से अपना काम किया।
आइए हम भी ऐसी मेहनत से जज़्बे से प्यारे पहाड़ी भाइयों के साथ खड़े होकर इस ख़ूबसूरत दुनिया को बचाएं।
डी पणकर
चांद पर एक मशीन उतार कर हम इतने खुश हो रहे हैं, होना भी चाहिए। लेकिन सोच कर देखिए आज के 50-55 साल पहले जब कम्प्यूटर्स में मोबाइल जितनी ताकत भी नहीं होती थी, जब इंटरनेट नहीं था, आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस नहीं था उस वक्त अमेरिका ने अपोलो-11 से अपोलो-17 तक के मिशन में टोटल 12 लोगों को चांद पर लैंड करवा डाला था।
वो 12 लोग चांद पर घूमे, टहले, वहां बर्फ वाली गाड़ी भी चलाई, एक ने तो वहीं चांद पर ही वहां की मिट्टी भी सूंघने की कोशिश कर ली थी। इसके बाद वहां से चंद्रयात्रियों ने क्विंटल के भाव चांद की मिट्टी लाकर अमेरिका में पटक दी।
नासा के भेजे वो 12 के 12 आदमी जमीन पर वापस भी आए। आज से 50 साल पहले चांद की यात्रा को नासा ने रोलर कोस्टर की राइड बना के रख दिया था। इस ताबड़तोड़ चांद तक पहुंचने की कार्यवाही के बाद नासा का बजट कोल्ड वार के कारण बढ़ते दबाव के चलते अचानक कम कर दिया जाता है।
नासा ने आदमियों को इतनी बार चांद पर भेज दिया कि लोगों का रोमांच ही कम हो गया, उन्हें ये पैसे की बर्बादी लगने लगा।
50 साल बाद हम भारतीय एक मशीन चांद पर भेजकर खूब खुश हो रहे हैं, होना भी चाहिए, क्योंकि जाति-पात, पाखंडवाद, ज्योतिष और अंधविश्वास के इस देश में जीवित रहते हमने ये उपलब्धि हासिल की है।
एक तरफ देश में दंगे हो रहे हैं, दूसरी तरफ हमारी बनाई मशीनें चांद पर पहुंच रही हैं।
इसलिए ये कमाल की बात तो है ही।
भारत में सुबह-सुबह तकरीबन हर टीवी न्यूज चैनल पर ज्योतिष प्रकट होते हैं और चांद के घूमने के कारण मनुष्यों पर पडऩे वाले प्रभावों की अवैज्ञानिक ढंग की बकवास तरीके से व्याख्या करते हैं।
शाम होते होते वही टीवी चैनल रॉकेट साइंस पर बात करने लगते हैं।
अंधविश्वास और पाखंड के बीच इतनी वैज्ञानिक प्रगति वाकई कमाल की है। सभी को बधाई।


