विचार / लेख
डॉ. आर.के.पालीवाल
संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के पद की परिकल्पना करते समय यह नहीं सोचा होगा कि आजादी के बाद दिनों दिन विकृत होती राजनीति में इस महत्त्वपूर्ण पद की गरिमा, जिसे देश में राष्ट्रपति की तरह राज्य में प्रथम नागारिक का दर्जा दिया जाता है, इस तरह धूमिल होगी कि कभी सर्वोच्च न्यायालय उनके आचरण पर कड़ी टिप्पणी करेंगे, कभी मीडिया गलत कारणों से उनका जिक्र करेगा और अक्सर राज्य सरकारें उन पर राज्य में चुनी हुई सरकार को गिराने के षडयंत्र रचने और असंवैधानिक कृत्य के संगीन आरोप लगाएंगी।
अब यह आम धारणा हो गई है कि राजनीति सेवा की जगह अपने लिए मेवा और साधन सुविधाएं जुटाने का जरिया बन गई है। बहुत से नेता राजनीति में अपने उद्योग और व्यापारों की ढाल बनने के लिए आते हैं। राजनीति बहुत सारे अपराधियों के लिए सुरक्षित शरण स्थली बन गई है। इन्ही सब कारणों से अक्सर केन्द्र में सत्तारूढ़ दल राज्यों में अपने दल के विस्तार के लिए राज्यपालों का उपयोग करता है। खांटी राजनीतिज्ञों के राजभवन पहुंचने से राजभवन केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की जगह शह मात के खेल की गोट बन गए हैं। केंद्र सरकार के विरोधी दलों की राज्य सरकार राज्यपालों को कुछ कुछ उसी तरह की शंका से देखने लगी हैं जैसे आजादी के पहले देशी रियासतें ब्रिटिश रेजिडेंट्स को देखती थी। राज्यपालों की गरिमा का यह ह्रास बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
जहां-जहां केंद्र में सत्तारूढ़ दल के विरोधी दल की सरकार हैं वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री में तनातनी आम होती जा रही है। आजकल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू और पंजाब आदि राज्यों से राज्यपालों और प्रदेश सरकार के वाद विवाद चर्चा में हैं। राज्यपाल द्वारा महिलाओं के साथ हुए अपराधों को लेकर राज्य सरकार की कन्या श्री योजना पर की गई टिप्पणी की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आलोचना की है कि उन्हें किसी एक घटना से महिलाओं के हित की बड़ी योजना पर प्रश्नचिन्ह नहीं खडा करना चाहिए। हाल ही में पंजाब के राज्यपाल ने प्रदेश सरकार द्वारा राजभवन द्वारा राज्य में बढते नशे की स्थिति पर मांगी गई रिर्पोट नहीं मिलने पर नाराजगी जताते हुए कारवाही की चेतावनी दी है।
आम आदमी पार्टी ने राज्यपाल की चेतावनी की आलोचना की है कि वे चुनी हुई सरकार को परेशान कर रहे हैं। यह सच भी है कि विपक्षी दलों की सरकारों की छोटी छोटी कमियों को राज्यपाल बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं लेकिन डबल इंजन सरकार के मामले में बडी घटना पर भी चुप रहते हैं।मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासी के साथ मल मूत्र कांड हुआ, व्यापम जैसा बड़ा घोटाला हुआ, हाल ही में पटवारी परीक्षा घोटाला हुआ लेकिन यहां के राज्यपाल इस तरह की सक्रियता नहीं दिखाते जैसी विपक्षी दलों की राज्य सरकारों के लिए दिखाई जाती है।उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी बहुत से ऐसे संगीन अपराध होते हैं जिन पर किसी भी संवेदनशील नागरिक को पीड़ा होती है लेकिन अपने दल की सरकारों के प्रति राज्यपालों का नजरिया एकदम अलग होता है। उन्हें कार्यवाही की धमकी तो दूर उचित कार्यवाही के लिए कोई सलाह तक नहीं दी जाती।मणिपुर कई महीने से हिंसा की आग में झुलस रहा है लेकिन वहां के राज्यपाल ने प्रदेश सरकार को वैसी धमकी नहीं दी जैसी पंजाब के राज्यपाल दे रहे हैं।
कुछ माह पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल की प्रदेश की नई सरकार बनवाने में की गई भूमिका पर प्रतिकूल टिप्पणी की थी। इससे भी राज्यपालों की भूमिका पर प्रश्न उठते हैं। यदि राज्यपालों और विपक्षी दलों की प्रदेश सरकारों के बीच मतभेद इसी तरह बढते रहे तो महाराष्ट्र की तरह और प्रदेशों के विवाद भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पहुंच सकते हैं। कालांतर में यह मांग भी जोर पकड़ सकती है कि सी बी आई, ई डी और चुनाव आयुक्तों आदि की नियुक्तियों की तरह अब राज्यपालों की नियुक्तियों के लिए भी वैसे ही पैनल बनाए जाने की आवश्यकता है।


