विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
पाकिस्तान की अपनी समस्याएं हिमालय से ज्यादा बडी हो चुकी हैं और घटने की बजाय बढ़ती ही जा रही हैं लेकिन कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत के प्रति नफरत वहां के नेताओं और सेना के हाथ में एक ऐसा भावनात्मक हथियार है जिसकी वजह से वहां जनता में इन दोनों के विरोध में कोई क्रांति नहीं होती। पाकिस्तान के जनक कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना के बाद पाकिस्तान में ऐसा कोई बड़ा नेता नही हुआ जिसका नाम जनता बहुत इज्जत के साथ लेती हो।
जहां तक पाकिस्तान की सेना और सत्ता का प्रश्न है उसने मुहम्मद अली जिन्ना को भी अंतिम समय में वैसा सम्मान नहीं दिया जैसा भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मिला था। हालांकि आजकल भारत में भी एक तबका ऐसा है जिसे गांधी और पाकिस्तान से नफरत है लेकिन बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर और गांधी की शांति, अहिंसा और सांप्रदायिक सौहार्द एवम सह अस्तित्व की विचारधारा के कारण भारत की आधिकांश आबादी गांधी और पाकिस्तान के प्रति नफरत का भाव नहीं रखती। यही कारण है कि गांधी से विरोध रखने वाले नेताओं को भी सार्वजनिक रुप से गांधी की मूर्ति के सामने नत मस्तक होना पड़ता है।
समय के साथ कश्मीर को लेकर भारत के प्रति नफरत प्रदर्शन का भाव पाकिस्तान की सरकार, सेना और आई एस आई की त्रिमूर्ति के हाथ में ऐसा ब्रह्मास्त्र बन गया है जिसके थोड़े से वार से पाकिस्तानी अवाम का ध्यान पाकिस्तान की अंदरूनी बदहाली से हट जाता है। वर्तमान दौर में भी पाकिस्तान के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री ने अक्सर भारत विरोधी बयान देने वाली मुशाल हुसैन मलिक को अपना विशेष सलाहकार नियुक्त किया है।
मुशाल हुसैन मलिक जेल में बंद कश्मीरी आतंकवाद के समर्थक यासीन मलिक की पत्नी हैं और वे अपने पति और कश्मीर की आजादी के लिए जब तब बयान देती रहती हैं। कार्यवाहक प्रधान मंत्री सामान्यत: किसी ऐसे व्यक्ति को बनाया जाता है जिसकी खुद की छवि निष्पक्ष हो और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे निष्पक्ष छवि के व्यक्ति को अपने सलाहकार नियुक्त करेंगे। लेकिन पाकिस्तानी सत्ता नैतिकता कभी की त्याग चुकी है।
पाकिस्तान में इन दिनों चुनावी माहौल है, लेकिन राजनीतिक दलों और सेना के बीच तनाव के साथ साथ सेना के अंदर भी नेतृत्व को लेकर दरार काफ़ी बढ़ गई है। जब से सेना और सरकार ने इमरान खान को आगामी चुनाव से बाहर करने के लिए मोर्चा खोला है तब से पाकिस्तान के अंदरूनी हालात और आंतरिक शक्ति संतुलन निरंतर गड़बड़ाते जा रहे हैं। इमरान खान की पहली गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान की जनता में जिस तरह का उबाल देखने को मिला था, दोबारा गिरफ्तारी के समय वैसा सार्वजनिक उपद्रव तो नहीं हुआ लेकिन जानकारों के अनुसार लोगों में अंदर ही अंदर तत्कालीन सरकार और सेना की मिलीभगत से हुई गिरफ्तारी के खिलाफ काफ़ी रोष है। इमरान खान को जेल में बंद करने पर उनके समर्थक ठगे से महसूस कर रहे हैं। इमरान खान को चुनावों से बाहर करने के बाद निवर्तमान प्रधान मंत्री शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख के बीच भी मतभेद की खबरें आ रही हैं। पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधान मंत्री को सेना का पक्का समर्थक बताया जा रहा है इसलिए ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद नहीं कर सकता।
इमरान ख़ान की गिरफ्तारी और अपनी पसंद के कार्यवाहक प्रधान मंत्री नियुक्त करने के बाद के बाद सेना प्रमुख को उम्मीद थी कि देश की सत्ता उनके इशारे पर चलेगी लेकिन पाकिस्तान के हालात सेना प्रमुख के भी पक्ष में नहीं हैं। सेना में इमरान समर्थक भी भारी तादाद में हैं। उधर कार्यवाहक प्रधान मंत्री की नियुक्ति को लेकर भी सेना प्रमुख पर उंगली उठ रही हैं। ऐसे में सेना प्रमुख सत्ता की बागडोर आसानी से अपने हाथ में नहीं ले सकते।यासीन मलिक की पत्नी को प्रधान मंत्री की विशेष सलाहकार बनाने से भारत विरोध को और हवा मिली है। इन हालात में निष्पक्ष चुनाव और हालात में सुधार असंभव लगते हैं।


