विचार / लेख
डी पणकर
चांद पर एक मशीन उतार कर हम इतने खुश हो रहे हैं, होना भी चाहिए। लेकिन सोच कर देखिए आज के 50-55 साल पहले जब कम्प्यूटर्स में मोबाइल जितनी ताकत भी नहीं होती थी, जब इंटरनेट नहीं था, आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस नहीं था उस वक्त अमेरिका ने अपोलो-11 से अपोलो-17 तक के मिशन में टोटल 12 लोगों को चांद पर लैंड करवा डाला था।
वो 12 लोग चांद पर घूमे, टहले, वहां बर्फ वाली गाड़ी भी चलाई, एक ने तो वहीं चांद पर ही वहां की मिट्टी भी सूंघने की कोशिश कर ली थी। इसके बाद वहां से चंद्रयात्रियों ने क्विंटल के भाव चांद की मिट्टी लाकर अमेरिका में पटक दी।
नासा के भेजे वो 12 के 12 आदमी जमीन पर वापस भी आए। आज से 50 साल पहले चांद की यात्रा को नासा ने रोलर कोस्टर की राइड बना के रख दिया था। इस ताबड़तोड़ चांद तक पहुंचने की कार्यवाही के बाद नासा का बजट कोल्ड वार के कारण बढ़ते दबाव के चलते अचानक कम कर दिया जाता है।
नासा ने आदमियों को इतनी बार चांद पर भेज दिया कि लोगों का रोमांच ही कम हो गया, उन्हें ये पैसे की बर्बादी लगने लगा।
50 साल बाद हम भारतीय एक मशीन चांद पर भेजकर खूब खुश हो रहे हैं, होना भी चाहिए, क्योंकि जाति-पात, पाखंडवाद, ज्योतिष और अंधविश्वास के इस देश में जीवित रहते हमने ये उपलब्धि हासिल की है।
एक तरफ देश में दंगे हो रहे हैं, दूसरी तरफ हमारी बनाई मशीनें चांद पर पहुंच रही हैं।
इसलिए ये कमाल की बात तो है ही।
भारत में सुबह-सुबह तकरीबन हर टीवी न्यूज चैनल पर ज्योतिष प्रकट होते हैं और चांद के घूमने के कारण मनुष्यों पर पडऩे वाले प्रभावों की अवैज्ञानिक ढंग की बकवास तरीके से व्याख्या करते हैं।
शाम होते होते वही टीवी चैनल रॉकेट साइंस पर बात करने लगते हैं।
अंधविश्वास और पाखंड के बीच इतनी वैज्ञानिक प्रगति वाकई कमाल की है। सभी को बधाई।


