विचार / लेख
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-प्रकाश दुबे
बात है, 23 अगस्त की। चंद्र भूमि पर चंद्रयान के उतरने में उतना ही समय बचा था, जितना राजीव गांधी चौक यानी कनॉट प्लेस से बाधा विहीन यातायात के दौरान इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंचने में लगता है। देश के माथे पर वैज्ञानिक क्षमता का सेहरा बंधने ही वाला था। एयरोब्रिज के अभाव में बस के जहाज के निकट पहुंचने पर ठिठक गए। बस जहाज के द्वार के निकट नहीं पहुंच सकती थी। कई बसें आड़ी टेढ़ी खड़ी थीं।
मैंने चुटकी ली- बस अड्डे से भी अधिक गहमागहमी वाला नजारा है। ड्राइवर की मुस्कान पर झेंप हावी थी। सुरक्षा जांच में धक्के खाने और धकियाने के बाद यात्रियों में कवायद को दोहराने की होड़ लगी। यह जलपान का पड़ाव था। कंप्यूटर साहब को विक्रेता की कमाई और कुल्हड़ भर चाय के लिए सौ की कुछ पत्तियां हाजिर करने वाले यात्रियों की बेताबी की चिंता नहीं थी। किसी ने फब्ती कसी-चाय वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया। अब तो सुधार होना चाहिए। यात्री फब्ती-साहसी को देखने लगे। विक्रेता ने आवाज चढ़ाकर कहा-आर्डर के बाद भी दस मिनट और लगेंगे। ताजा चाय बनाकर देते हैं।
यह वही कुल्हड़ है, जिसके भरोसे देश भर में फैले कुम्हारों की किस्मत बदलने का वादा करने वालों की लंबी कतार में रेल मंत्री जार्ज फर्नांडिस, लालू प्रसाद, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार थे। वे सब असफल रहे। कारपोरेट कारोबारी पांच सितारा होटलों से लेकर हवाई अड्डों तक कमाई की उड़ान भर रहे हैं। कुम्हार के खाते में दस प्रतिशत नहीं आता होगा।
उड़ान भरने के लिए आतुर यात्री विमान तक पहुंचने के लिए कतार तोडऩे की जुगत में थे। बस में बैठकर ही जहाज तक पहुचना संभव था। बस तक पहुंचने के लिए छत से टपकते पानी की तेज धार में भीगने के सिवा कोई चारा नहीं था। ग्राउंड स्टाफ का कर्मचारी असहाय खड़ा खड़ा नजारा देखता था। उसके पास भी छतरी नहीं थी। द़निया के सबसे गहमागहमी वाले हवाई अड्डे को तैयार करने में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। विमानतल के अंदर और आसपास की खुदाई से दो बातों का पता लग जाता है। सर्वप्रथम यह कि विकास काम फुर्ती से जारी हैं। दूसरे यह, कि करोड़ों खर्च होने हैं।
चंद्रयान ने आहिस्ता चांद की चुम्मी ली। 6 से 10 सितंबर तक देश की राजधानी में जी-20 के जलसे का जलवा है। जी-20 की सभा के होर्डिंग लग चुके हैं। बाघ से लेकर हाथी सहित देशनायकों को अलग अलग धातुओं और होर्डिंग में उकेर कर बिठाया जा रहा है। जी-20 के प्रचार पत्रकों और होर्डिंग में प्रधानमंत्री के चेहरे के साथ सूचना की दमक यात्रियों को दर्शक गर्वित करती होगी। इस दमक को भुनाने में कोरोबारी सबसे आगे हैं। पूरी दिल्ली में आग की तरह खबर फैल चुकी है कि हवाई अड्डे से सटे एयरोसिटी के नामी होटल ने एक सुइट में रात रुकने के बीस लाख रुपए मांग लिए। नौ देशों के प्रतिनिधि हाजिर रहेंगे। जनपथ के होटल में अन्य देश से रात भर के लिए 15 लाख रुपए की मांग की गई। मुझे बताया गया-जिस कमरे में आप रुके हैं, उसका भाड़ा अब पांच गुने से अधिक होगा। आयोजन से जुड़ी टीम वाले जानते हैं कि इतनी अधिक कमाई किसी देश में जी-20 समारोहों में नहीं की गई।
दिल्ली के लोग चकित नहीं हैं। टेक्सी चालक से कहा- आपकी तो जबर्दस्त कमाई होगी। उसने असहमति जतलाते हुए कहा-रूट आवागमन के कई रास्ते बंद होंगे। तीन दिन स्कूल बंद। उसे दिलासा दी-विदेशी मेहमान मिलेंगे। चालक ने भेद खोला-दो बड़ी कंपनियों को प्रतिनिधि देशों के मेहमान ढोने का ठेका दिया जा चुका है।
दिल्ली में ही कारोबार कामयाब नहीं होता। साथी ने बताया- मिलिंद सोमण से दो केलों के 650 रुपए मांगे गए थे। वे चंडीगढ़ में उस समय संपादक थे। यह सब उस समय हो रहा है, जब जी-20 के अध्यक्ष पद के अवसान से पहले प्रधानमंत्री ब्रिक्स का कार्यक्षेत्र बढ़वाने की कामयाबी का श्रेय पा रहे हैं। ब्रिक्स का अध्यक्ष पद इस समय दक्षिण आफ्रीका के सिरिल रामफोसा हैं।
कुछ देशों को सदस्य बनाने से ब्रिक्स का नाम बदलने की फिक्र न करें। यदि जी-20 में विस्तार होता तो इसे भी जी-25 कहा जाता। यदि प्रधानमंत्री प्रयास कर रहें हों तो 2024 का इंतजार करें। विश्व के सबसे अधिक आवाजाही वाले दिल्ली हवाई अड्डे का हाल सुधरने की जानकारी कहीं और से पढ़ सकते हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


