विचार/लेख
चंदन कुमार जजवाड़े
साल 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों के गठबंधन में सीटों के बँटवारे पर चर्चा शुरू हो चुकी है।
इसके लिए इंडिया गठबंधन को दिल्ली जैसे राज्य में भी सीटों का बँटवारा करना है, जहाँ यह काम महज दो दलों के बीच होगा।
वहीं बिहार जैसे राज्य में भी विपक्ष को साझेदारी के लिए सीटों का बँटवारा करना होगा, जहाँ राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की ‘महागठंबंधन’ की सरकार पिछले करीब एक साल से सत्ता में है।
बिहार में बना महागठबंधन ही वह बुनियाद है, जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी विरोधी दलों का ‘इंडिया’ गठबंधन बना है।
माना जाता है कि जिस राज्य में विपक्षी गठबंधन में जितने ज़्यादा सहयोगी दल होंगे, वहां सीटों की साझेदारी में उतनी ही मुश्किलें आ सकती हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव करीब एक साल से विपक्ष की एकता बनाने के मुहिम में लगे हुए थे।
बाद में लालू प्रसाद यादव के बीमार पडऩे और सिंगापुर जाने के बाद इस मोर्चे को नीतीश और लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने संभाला था।
अब लालू और नीतीश कुमार पर ही बिहार की लोकसभा की 40 सीटों के बँटवारे की जिम्मेदारी भी है। ख़ास बात यह है कि बिहार में सीटों पर समझौते से देश भर में ‘इंडिया’ के सहयोगी दलों को एक रास्ता मिल सकता है।
कांग्रेस और वाम दलों की मांग
बिहार में सीटों के बँटवारे का काम बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
अगले साल के लोकसभा चुनाव में सीटों के बँटवारे पर कांग्रेस अपनी उम्मीदें कई बार ज़ाहिर कर चुकी है।
बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह कहते हैं, ‘कांग्रेस की अपेक्षा यही होगी कि जहाँ हमारा मज़बूत जनाधार है, जहाँ से बड़े नेता चुनाव लड़ते रहे हैं, वो सारी सीटें नीतीश जी और लालू जी कांग्रेस के लिए छोड़ें। कांग्रेस ‘इंडिया’ गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी है और हमें उचित जगह मिलनी चाहिए।’
माना जाता है कि कांग्रेस अगले साल के लोकसभा चुनावों में साझेदारी के तहत बिहार में कऱीब 9 सीटें चाहती है। साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने इतनी ही सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।
इसी तरह सीटों के बँटवारे को लेकर सीपीआईएमएल ने आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव को अपना प्रस्ताव भेज दिया है।
सीपीआईएमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने बीबीसी को बताया है, ‘मुंबई की बैठक में इस बात की भी चर्चा थी कि केंद्र सरकार लोकसभा के चुनाव समय से पहले करा सकती है। ऐसे में हमें सीटों के बँटवारे पर भी काम शुरू कर देना है।’
दीपांकर भट्टाचार्य का मानना है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव पूरे विपक्ष के लिए खऱाब रहे थे, उन चुनावों में बिहार की 40 में से 39 लोकसभा सीटें एनडीए ने जीती थीं।
इसलिए उस आधार पर सीटों का बँटवारा नहीं हो सकता। बल्कि सीटों का बँटवारा साल 2020 के विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर हो सकता है।
सीपीआईएमएल ने सीटों के बँटवारे को लेकर अपना प्रस्ताव आरजेडी के पास भेज दिया है। इसमें उसने अपने लिए कितनी सीटों की मांग की है, इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन दीपांकर भट्टाचार्य इशारों में इसका संकेत दिया है।
उनका कहना है कि साल 2020 के विधानसभा चुनावों में मगध, शाहाबाद, सिवान, गोपलगंज और छपरा जैसे इलाक़े में ‘महागठबंधन’ का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा था।
उस वक्त जेडीयू महागठबंधन में नहीं थी और हमारा स्ट्राइक रेट अच्छा था। इसी के आधार पर सीपीआईएमएल ने अपना प्रस्ताव आरजेडी को भेजा है।
बात बिगडऩे की आशंका
राजनीतिक मामलों के जानकार और पटना के एएन सिंहा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘पहले लगता था कि सीटों का बँटवारा मुश्किल होगा, लेकिन अब ऐसा नहीं है। विपक्षी गठबंधन में सीटों के बँटवारे का सिद्धांत तय हो गया है और सभी दलों में समझदारी आई है।’
डीएम दिवाकर के मुताबिक जिस पार्टी की जहाँ मौजूदगी है, वहाँ से उसके उम्मीदवार मैदान में होगें, इसके अलावा पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाली विपक्षी पार्टी को इस बार उस सीट से टिकट मिलना चाहिए।
ये बातें सैद्धांतिक तौर पर तो सही दिखती हैं लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के परिणाम पर गौर करें तो मामला बहुत सरल नहीं दिखता है।
उन चुनावों में बीजेपी ने 18 और एलजेपी ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा था। जाहिर है, इसमें जेडीयू दूसरे नंबर पर कहीं नहीं थी। इसलिए उन सीटों पर समझौते में थोड़ी सहूलियत हो सकती है।
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, ‘इस वक्त सभी विपक्षी दलों का लक्ष्य एक है और सबको उसे भेदना है। साल 2015 के विधानसभा चुनावों में भी यही सवाल उठा था कि सीटों का बँटवारा किस तरह से होगा, लेकिन यह बहुत आसानी से हो गया था। मुझे लगता है कि सीटों के बँटवारे में अभी भी कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि सभी विपक्षी परेशान हैं और सबको पता है कि यही मौक़ा है।’
कन्हैया भेलारी का मानना है कि मांग चाहे जो जितनी सीटों की कर ले, मांग करने से कोई किसी को रोक नहीं सकता। लेकिन यह तय है कि गठबंधन के तौर पर एक सीट पर विपक्ष का एक ही उम्मीदवार होगा।
जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार का भी मानना है कि इस वक्त सभी विपक्षी दलों को अहसास है कि उन्हें साल 2024 में बीजेपी को हराना है, इसलिए सीटों के बंटवारे में कोई परेशानी नहीं होगी और सीटों के बँटवारे में कोई परेशानी नहीं होगी।
नीरज कुमार कहते हैं, ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता सक्षम हैं। सीटों के बँटवारे के मामले में बिहार रोल मॉडल बनेगा। सबको अपने सांगठनिक और राजनीतिक परिस्थिति में एक-दूसरे की भावना का सम्मान करना ही है और बिहार के मुख्यमंत्री इसके पक्ष में रहे हैं कि सबका सम्मान हो।’
बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह भी दावा करते हैं कि सीटों के बँटवारे में कोई मुश्किल नहीं होगी, सभी पार्टियों के नेता समझदार हैं, अभी यह शुरुआती दौर है और एकाध महीने में यह काम हो जाएगा।
कहाँ फँस सकता है मामला
दरअसल, सीटों के बँटवारे के लिहाज से साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम में कई पेच फंसे हुए हैं।
पिछले लोकसभा चुनावों में किशनगंज की एक मात्र सीट कांग्रेस के खाते में गई थी जबकि बीजेपी ने 17, जेडीयू 16 और एलजेपी ने 6 सीटों पर कब्जा किया था।
साल 2020 के विधानसभा चुनावों में महागठबंधन में जेडीयू शामिल नहीं थी और इसमें वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन बेहतर रहा था। उन चुनावों में सीपीआईएमएल ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इसमें 12 सीटों पर उसकी जीत हुई थी।
जबकि कांग्रेस ने साल 2020 के विधानसभा चुनावों में 70 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें 19 की जीत हुई थी। इस लिहाज से सीपीआईएमएल का दावा कांग्रेस के लगभग बराबर ही बैठता है।
डीएम दिवाकर का मानना है कि सीटों के बँटवारे को लेकर सभी पार्टियों को अपना अहम छोडऩा होगा। लगातार दो बार लोकसभा चुनाव हारने के बाद विपक्षी दलों को इसका अहसास है कि अगर अब हारेंगे तो परेशानी और भी ज़्यादा बढ़ेगी। इसलिए सबको यथार्थवादी रवैया अपनाना होगा।
साल 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 16 पर जीत दर्ज की थी। उस वक़्त बीजेपी के साथ समझौते का भी जेडीयू को फ़ायदा हुआ था। ऐसे में उन सीटों पर दूसरे नंबर पर रहने वाले ‘इंडिया’ के सहयोगी दल भी अब अपना दावा पेश कर सकते हैं।
साल 2019 लोकसभा चुनाव
कांग्रेस की एक सीट पर जीत, 8 सीटों पर दूसरे नंबर पर
इनमें 5 सीटों पर फिलहाल जेडीयू का कब्जा
7 सीटों पर जेडीयू पहले और आरजेडी दूसरे नंबर पर थी
जहानाबाद सीट को जेडीयू करीब 1100 वोट से ही जीती थी
जहानाबाद में आरजेडी दूसरे नंबर पर रही थी
आरा में सीपीआईएमएल दूसरे नंबर पर जबकि बेगूसराय में सीपीआई दूसरे नंबर पर
मुश्किल सीटें
दीपांकर भट्टाचार्य ने बीबीसी को बताया है कि जेडीयू फिलहाल चाहती है कि पहले पुराने ‘महागठबंधन’ में सीटों को लेकर बात तय हो जाए क्योंकि उसमें जेडीयू शामिल नहीं थी, उसके बाद इस पर जेडीयू के साथ चर्चा होगी और इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।
लेकिन आरजेडी, जेडीयू और वामपंथी दलों के लिए सीटों के बँटवारे को अपने स्तर पर अंतिम रूप देना आसान नहीं दिखता है।
मसलन कोसी-सीमांचल की सुपौल लोकसभा सीट पर साल 2019 में जेडीयू ने 56त्न वोट के साथ जीत दर्ज की थी।
इस सीट पर कांग्रेस की रंजीता रंजन ने करीब 30त्न वोट हासिल किए थे। रंजीत रंजन इलाके की बड़ी नेताओं में मानी जाती हैं।
रंजीता रंजन कांग्रेस की राज्यसभा सांसद हैं और पहले लोकसभा सांसद रह चुकी हैं। ऐसे में साझेदारी के तहत सुपौल सीट पर किस पार्टी को चुनाव लडऩे का मौक़ा मिलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
इसी इलाके की कटिहार सीट पर साल 2019 में जेडीयू ने 50त्न वोट के साथ कब्जा किया था, लेकिन यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने भी 44त्न वोट हासिल किए थे।
जाहिर है उस वक्त जेडीयू को बीजेपी के साथ होने का फायदा मिला था। ऐसे में कटिहार सीट पर किसके दावे को मजबूत माना जाएगा?
इसी इलाके की पूर्णिया लोकसभा सीट भी जेडीयू ने 54त्न वोट से साथ जीती थी, जबकि कांग्रेस यहां 32त्न वोट के साथ दूसरे नंबर पर थी।
इस मामले में आरजेडी और जेडीयू के बीच भी पिछले लोकसभा चुनाव की लड़ाई काफी दिलचस्प थी। उन चुनावों में जहानाबाद लोकसभा सीट पर जेडीयू ने कब्जा किया था, लेकिन आरजेडी उस वकत करीब 1100 वोट से हारी थी।
यही हाल सीतामढ़ी, मधेपुरा, गोपालगंज, सिवान, भागलपुर और बांका लोकसभा सीटों का है, जहां साल 2019 में जेडीयू की जीत हुई थी, जबकि आरजेडी दूसरे नंबर पर थी।
साल 2019 में शत्रुघ्न सिंहा कांग्रेस से चुनाव लडक़र दूसरे नंबर पर रहे थे, अब वो कांग्रेस छोड़ चुके हैं। दूसरी तरफ पटना साहिब और बेगूसराय जैसी लोकसभा सीटें भी हैं, जिसे बीजेपी ने जीता था। पटना साहिब से कांग्रेस के शत्रुघ्न सिन्हा दूसरे नंबर थे, जो अब कांग्रेस छोड़ टीएमसी में शामिल हो गए हैं।
वहीं बेगूसराय सीट पर सीपीआई के टिकट पर कन्हैया कुमार दूसरे नंबर पर थे, जो अब कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।
पिछले दिनों मुंबई में हुई विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक के बाद लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि अपना कुछ नुक़सान करके भी वो ‘इंडिया’ को जिताएंगे।
इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनावों में आरजेडी को किसी सीट पर जीत नहीं मिली थी, इसलिए फिलहाल उसे समझौते में अपनी जीती हुई कोई सीट नहीं छोडऩी पड़ेगी।
सीटों के इस समझौते के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर सबकी नजऱ रहेगी।
नीतीश विपक्षी एकता की कोशिश में लगे हुए थे और अब हो सकता है कि इसके लिए उन्हें अपनी कुछ सीटों की क़ुर्बानी देनी पड़े और इसकी राजनीतिकि प्रतिक्रिया भी दिलचस्प हो सकती है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
एक तरफ जी 20 शिखर सम्मेलन में आने वाले कई देशों के राष्ट्रध्यक्ष को प्रभावित करने के लिए दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाया गया था और दूसरी तरफ भारत की वैश्विक पहचान महात्मा गांधी के विचारों को गणमान्य अतिथियों को परोसने के लिए गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के परिसर में गांधी प्रतिमा और गांधी वाटिका का निर्माण किया गया है। दुनिया के ताकतवर नेताओं को दिखाने के लिए गांधी की मूर्ति हमारी सरकार का हाथी दांत की तरह बेहद आकर्षक विज्ञापन है, जबकि सच्चाई यह है कि हाल ही में गांधी विचार के प्रचार प्रसार की सबसे बड़ी संस्था सर्व सेवा संघ वाराणसी, जिसे गांधी के अनन्य अनुयाई लाल बहादुर शास्त्री, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण की त्रिमूर्ति ने पल्लवित पुष्पित किया था उसके परिसर पर केंद्र सरकार द्वारा बुलडोजर चलाकर गांधी विचार का गला घोंटने का जघन्य कृत्य हुआ है, जिसकी देश विदेश के तमाम गांधी विचारक न केवल आलोचना कर रहे हैं बल्कि इस कृत्य के खिलाफ शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन और तरह तरह से सत्याग्रह कर महीने भर से निरंतर विरोध दर्ज कर रहे हैं।
गांधी स्मृति एवम दर्शन समिति के आयोजन में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने गांधी प्रतिमा का लोकार्पण करते हुए उम्मीद जताई थी कि जी 20 में आने वाले अतिथि यहां भी आएंगे। ऐसा लगता है कि उन्हें दिखाने के लिए और सर्व सेवा संघ के ध्वस्तीकरण को छिपाने के लिए ही सरकार के सरंक्षण में यह कार्य गांधी दर्शन समिति के तत्वावधान में ऐसे समय संपन्न हुआ है। राष्ट्रपति महोदया ने अपने लोकार्पण भाषण में गांधी दर्शन समिति के अध्यक्ष प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को भी गांधी विचार को मानने वाला बताया है। शायद राष्ट्रपति जी वाराणसी के सर्व सेवा संघ परिसर की घटना से अनभिज्ञ हैं, हालाकि ऐसा होना नही चाहिए क्योंकि इस घटना को अखबारों और चैनलों ने भी खूब प्रचारित प्रसारित किया है।
गांधी मूर्ति पूजा पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। उनका जोर मनुष्य की आत्मा और व्यक्तित्व के विकास और नैतिक आचरण पर था। वर्तमान दौर महान विभूतियों की बड़ी-बड़ी आकर्षक मूर्तियों की स्थापना और विचारों और आदर्शों से दूरी का दौर है इसीलिए कहीं सरदार पटेल, कहीं परशुराम, कहीं शंकराचार्य और कहीं रविदास की ऊंची ऊंची विशालकाय मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं, और अब इसी कड़ी में जी 20 शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर गांधी की मूर्ति भी स्थापित की गई है। इसी दौर में गांधी के रचनात्मक कार्यों और सत्य, अहिंसा, सह अस्तित्व, सांप्रदायिक सौहार्द और सादगी के सिद्धांतों को जन जन में जन की भाषा में प्रचारित प्रसारित करने वाले सर्व सेवा संघ परिसर को बुल्डोजर से ध्वस्त किया गया है। यह सरकार की कथनी और करनी में गहराती खाई, चुनावी घोषणा पत्रों और सरकार के कृत्यों में गंभीर विरोधाभासों का खतरनाक दौर है। गांधीगिरी के लिए भी यह अजीब दौर है जब गांधी की सादगी को त्यागकर डिजाइनर ड्रेस पहनने वालों, असत्य और हिंसा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन करने वालों, अनैतिक आचरण वालों को भी कभी भगवान राम, कभी स्वामी विवेकानंद और कभी महात्मा गांधी के अनुयाई के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
वर्तमान दौर में समाचारों को पूरी तरह रोकना असंभव है। कॉरपोरेट मीडिया को भले ही भारी भरकम विज्ञापनों के दम पर पाला जा सकता है लेकिन इंटरनेट के युग में सत्य पर आधारित खबरें भी सोशल मीडिया के माध्यम से दूर दूर तक आसानी से पहुंच जाती हैं। सरकार भले ही उन रिपोर्ट और सूचनाओं को भ्रम पैदा करने वाली या राष्ट्रदोही बताकर खारिज करने की कोशिश करे लेकिन धीमी गति से सत्य भी लोगों तक पहुंच जाता है। महात्मा गांधी को लेकर भी हमारे देश में एक वर्ग तरह तरह के दुष्प्रचार में लीन रहता है, ऐसे तत्वों पर सरकार और उसकी जांच एजेंसियों की कोई कार्यवाही नहीं होती जबकि जब जब कोई राष्ट्रध्यक्ष भारत आता है उनके सामने गांधी की प्रतिमाओं और आश्रमों को देश के मुखपत्र की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
डब्ल्यूटीओ विवाद सुलझाने पर सहमति, भारतीय किसानों को झटका
पूरा देश और दुनिया जब जी-20 सम्मेलन की उपलब्धियों और सफलता पर अपनी निगाह टिकाए थी, उसी समय भारत ने अमेरिकी कृषि और पॉल्ट्री उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने का फैसला ले लिया। इस फैसले के चलते अमेरिकी किसान रियायती आयात शुल्क के तहत अपने कृषि और पॉल्ट्री उत्पाद भारत के बाजार में निर्यात कर सकेंगे। अमेरिकी ट्रेड रिप्रजेंटेटिव (यूएसटीआर) कैथरीन ताइ के दो दिन पहले अमेरिका में जारी वक्तव्य के जरिये यह बात सामने आई है। हालांकि अभी भारत ने इस बारे में कोई सूचना जारी नहीं की है।
यूएसटीआर ने कहा है कि भारत और अमेरिका विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में कई साल से जारी अपने विवाद सुलझाने में कामयाब हो गये हैं। इस समझौते के तहत भारत अमेरिकी उत्पादों फ्रोजन टर्की, फ्रोजन डक, फ्रैश ब्लूबैरी और क्रेनबैरी, फ्रोजन ब्लूबैरी और कैनबैरी, ड्राई ब्लूबैरी और क्रेनबैरी और प्रसंस्कृत ब्यूबैरी और क्रैैनबैरी के आयात पर शुल्क कम करने के लिए सहमत हो गया है। भारत द्वारा इन उत्पादों पर आयात शुल्क दरों को कम करने से अमेरिकी उत्पादों के लिए भारत के महत्वपूर्ण बाजार में मौकों में बढ़ोतरी होगी।
भारत द्वारा अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात के लिए राह आसान करने वाले इस समझौते पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) के डब्ल्यूटीओ सेंटर के पूर्व प्रमुख व इंटरनेशनल ट्रेड मामलों के प्रतिष्ठित एक्सपर्ट प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने रूरल वॉयस के साथ एक बातचीत में कहा कि यह समझौता घरेलू पॉल्ट्री किसानों और दूसरे किसानों के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूटीओ में जारी विवाद में भारत के जीतने की संभावना बहुत कम थी, लेकिन हमें कुछ रास्ता निकालने की जरूरत थी। यह समझौता अमेरिकी किसानों और अमेरिकी कंपनियों के लिए फायदेमंद रहेगा।
यूएसटीआर के वक्तव्य में कहा गया है कि दिल्ली में जी-20 बैठक के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक के अवसर पर यह घोषणा की जा रही है। इसके पहले भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और यूएसटीआई ताइ के बीच जी-20 ट्रेड एवं इनवेस्टमेंट मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत और अमेरिका के बीच डब्ल्यूटीओ में जारी विवाद को जल्दी हल करने पर सहमति जताई गई थी।
यूएसटीआर ने कहा है कि डब्ल्यूटीओ विवाद का हल होना भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में एक मील के पत्थर की तरह है। भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने से अमेरिकी कृषि उत्पादकों के लिए भारत के महत्वपूर्ण बाजार में पहुंच आसान हो जाएगी। यह घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जून में हुई अमेरिका यात्रा और अमेरिकी राष्ट्रपति की इस सप्ताह की भारत यात्रा के साथ जुड़ी हुई है और दोनों देशें के बीच परस्पर व्यापार भागीदारी को मजबूत करती है। मैं भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच आर्थिक संभावनाओं के बेहतर परिणामों पर काम करती रहूंगी।
जून में भारत और अमेरिका डब्ल्यूटीओ में जारी छह विवादों को समाप्त करने पर सहमत हो गये थे। इस समझौते के तहत भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों चना, मसूर दाल, बादाम, अखरोट, सेब, बोरिक एसिड और डायगनोस्टिक रीजेंट्स पर सीमा शुल्क घटाने पर सहमत हो गया था। आज के समझौते के साथ भारत बकाया विवादों को सुलझाने पर सहमत हो गया है जो भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय सहयोग का एक नया अध्याय और दोनों देशकों बीच व्यापार संबंधों को मजबूत करेगा। (ruralvoice)
सनियारा ख़ान
.....मैं जिंदा हूं, लेकिन
दूसरों के समय में
मेरे खाने में भी है
दूसरों की उंगलियों के छाप
मेरे पानी में है
दूसरों के विचारों के जीवाणु
मेरी सोच में है
दूसरों के प्रदूषण
मैं जन्म ले कर
बड़ा हो रहा हूं, लेकिन
दूसरों के समय में.....(हुमायून आजाद)
हुमायून आजाद बांग्लादेश के कवि, लेखक, उपन्यासिक, शोधकर्ता होने के साथ साथ एक प्रखर आलोचक भी थे। वे हमेशा परंपरागत समाज की नकारात्मक मानसिकता के खिलाफ लिखना पसंद करते थे। 28 अगस्त सन 1947 को ढाका के पास मुंशीगंज में उनका जन्म हुआ था। समाज की हर गैरजरूरी प्रथा की आलोचना करते करते वे बहुतों को अपना दुश्मन बना चुके थे। शोषक समाज को ले कर उन्होने कहा था :
....बांग्लादेश में तनख्वाह को एक राष्ट्रीय प्रतारणा के रूप में देखा जाना चाहिए। महीने भर काम करवा कर पांच दिन का पारिश्रमिक दिया जाता है। इस देश में कवि गण झोपड़ी में रहते है और सिनेमा के सभी सुदर्शन गधे शीत ताप नियंत्रित महलों में....
रूढि़वादी समाज, धर्म के नाम पर होनेवाले बर्बरता और सैनिक शासन के खिलाफ तो वे लिखते ही थे, साथ में लोगों में व्याप्त कुप्रथाओं को लेकर भी वे कविता लिखते रहते थे। उनकी कविताओं में ज्यादातर हताशा, प्रेम, घृणा और मानसिक द्वंद होते थे, जैसे कि तथाकथित समाज को ले कर उनके अंदर बहुत ज़्यादा गुस्सा भरा हुआ था। इस गुस्से में लिखी कलम से कविता का रूप मिलता था। उनको शायद मालूम था कि किसी भी समय कोई कट्टर मानसिकता के हाथों उनकी हत्या हो सकती है। तभी उन्होने लिखा था :
.... बहुत ही छोटी सी
किसी बात के लिए
मुझे मरना होगा।
घास के छोटे छोटे
फूलों के लिए
या ओस के लिए?
चैत्र की हवा में ही
क्या मैं मर जाऊंगा?
किसी फूल की
सिर्फ एक पंखुड़ी के लिए
या फिर बारिश की
चंद बूंदों के लिए!....
जन्म के समय उनका नाम था हुमायुन कबीर। लेकिन सन 1988 में उन्होंने कानूनी रूप से अपना नाम हुमायुन आजाद कर लिए था। क्रांति को अपना लक्ष्य मान कर वे समाज और धर्म से जुड़े बेकार रस्मों से खुद को आजाद करना चाहते थे। उनके पिता एक शिक्षक और माता एक आम सी घरेलू महिला थी। बांग्ला साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद वे एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में पी एच डी भी किए। देश लौट कर अलग अलग कई स्थानों पर पढ़ाने का काम करते हुए आखिर में ढाका विश्वविद्यालय में बांग्ला साहित्य के प्रोफेसर बन गए। उन्होने करीब करीब सत्तर पुस्तक लिखी थी। बांग्ला भाषा में विशेष अवदान के लिए बांग्लादेश सरकार ने उन्हें बांग्ला अकादमी साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया।
सामाजिक समस्याओं को लेकर वे कई अखबारों में स्तंभ लिखते थे। लोग कहते हैं कि उनकी भाषा और लेखन शैली में पश्चिम बंगाल के बुद्धदेव भट्टाचार्य का प्रभाव देखा जाता है। लेकिन एक बहुआयामी, उत्कृष्ट और स्पष्ट भाषी लेखक के रूप में उनकी अपनी एक अलग पहचान थी, जिसे हम नकार नहीं सकते हैं। धर्मांध समाज की लगातार समालोचना से गुस्साए हुए कुछ कट्टर सोच के लोगों ने सन 2004 में ढाका विश्वविद्यालय में आयोजित एक पुस्तक मेले से घर लौटते समय हुमायुन आजाद पर कातिलाना हमला कर दिया। इस हमले से वे शारीरिक रूप से कुछ हद तक अक्षम हो गए थे।
इस बीच उनकी लिखी हुई तीन पुस्तकों से उस समय के समाज में विवाद की आंधी भी शुरू हो गई। बांग्लादेश सरकार इन तीनों पुस्तकों को प्रतिबंधित करने के लिए मजबूर हो गए। ये पुस्तकें थी :
1. नारी
2. द्वितीय लिंग
3. पाक सर ज़मीन साद वाद
फिर कानूनी लड़ाई हारने के बाद सरकार को इन पुस्तकों पर से प्रतिबंध हटाना पड़ा। इसके बाद उन्नीसवीं शताब्दी की प्रख्यात जर्मन कवि हेनरिक हेन को लेकर शोध करने के लिए हुमायुन आजाद को जर्मनी बुलाया गया। वहां साथ साथ उनका ईलाज भी होना था। लेकिन वहां पहुंचने के एक सप्ताह के अंदर ही, उन्हीं के अपार्टमेंट में वे मृत पाए गए थे। विवाद के साथ उनका हमेशा गहरा संबंध रहा। और हम सभी ये जानते हैं कि धर्म और आजादी के बीच बहुत ज़्यादा फासला रहता है। ये एक कटु सत्य है। हुमायुन आजाद ने नए प्रजन्म के लिए लिखा था :
......किताब के पन्नों पर
दीप जलते हैं
किताब के पन्नों पर
सपने छुपे होते हैं
जिस किताब में
सूरज निकलता है
जिस किताब में
गुलाब खिलता है
उस किताब को पढऩा.....
उनकी हत्या के अठारह साल बाद अब सन 2022 में बांग्लादेश की एक स्थानीय अदालत ने उनकी हत्या के लिए एक प्रतिबंधित इस्लामिक दल के चार उग्रवादियों को दोषी ठहरा कर फांसी देने की आदेश जारी किया। आखिर में, हेनरिक हेन की एक कविता (जिसे हुमायुन आजाद ने अनुवाद किया था) पाठकों के लिए :
..... अगर फूलों को
ये मालूम होता कि
मेरे दिल में
इतनी सारी चोट
छुपी हुई हैं तो
मेरी सारी तकलीफों को
अपना मान कर
वे हमेशा रोते रहते....
एक सवाल हमेशा उठता है कि क्या किसी भी समाज में सभी को बराबरी से आवाज उठाने का अधिकार नहीं होना चाहिए? बांग्लादेश सरकार ने हुमायुन आज़ाद की मौत के बाद बांग्ला साहित्य में उनके योगदान के लिए एकुशे पदक नामक एक और सम्मान से सम्मानित किया। शायद हर समाज में साफ-साफ लिखने वाले बहुत से ऐसे लेखक या कवि होंगे, जिनको जीते जी गाली दे कर, मरने के बाद सम्मान देने की रीत सालों से चली आ रही है।
गुट्टा रोहित
तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू को शनिवार सुबह गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी आंध्र प्रदेश पुलिस की सीआईडी ने कथित स्किल डिवेलपमेंट घोटाले में की है।
आरोप है कि यह घोटाला नायडू के 2014 से 2019 के बीच मुख्यमंत्री रहते हुए हुआ था। नायडू की गिरफ्तारी आंध्र प्रदेश में प्रतिशोध की राजनीति के बदलते हुए परिदृश्य को सामने लाई है।
कुछ लोगों का कहना है कि चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 का उल्लंघन है। उनका तर्क है कि गिरफ्तारी से पहले न तो राज्यपाल की मंजूरी ली गई और न ही उन्हें कोई नोटिस दिया गया।
पिछले पाँच साल में यह पहली बार नहीं है कि उन्हें निशाना बनाया गया है। टीडीपी की 2019 के विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार के बाद से अब तक उनके खिलाफ 10 मामले दर्ज किए गए हैं। वहीं इसी दौरान उनके बेटे नारा लोकेश के खिलाफ 16 अन्य मामले दर्ज किए गए हैं।
आंध्र प्रदेश में बदले की राजनीति का इतिहास
साल 2019 की हार के बाद अमरावति में चंद्रबाबू नायडू के दफ्तर को बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया था। वाईएसआर कांग्रेस के नेताओं ने इस कार्रवाई पर जश्न मनाया था। वाईएसआर कांग्रेस का कहना था कि अतिक्रमण की वजह से यह कार्रवाई की गई।
इसी तरह की कार्रवाई टीडीपी मुख्यालय पर भी हुई थी। इस तरह राज्य में प्रतिशोध की राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। यही नहीं राज्य की विधानसभा में नायडू के परिवार के खिलाफ व्यक्तिगत हमले किए गए। यह इतना तगड़ा था कि नायडू विधानसभा में ही रो पड़े।
उन्होंने कसम खाई कि अब मुख्यमंत्री बनने के बाद ही वो विधानसभा में आएंगे।
यह वाईएसआर कांग्रेस की ओर से शुरू किया गया कोई नवाचार नहीं था। चंद्रबाबू नायडू लोकतंत्र के संरक्षक भी नहीं हैं।
जगन मोहन रेड्डी जब विपक्ष में थे तो टीडीपी के सदस्यों ने उन पर ताने मारे थे और आरोप लगाए थे। इसके बाद जगन मोहन रेड्डी विधानसभा से बाहर चले गए थे। वो मुख्यमंत्री बनने के बाद ही विधानसभा लौटे थे।
चुनाव नजदीक आते ही राज्य में बदले की राजनीति अब अपने चरम पर पहुँच रही है। टीडीपी को उम्मीद है कि नायडू की गिरफ्तारी से उन्हें सहानुभूति मिलेगी।
पार्टी का कहना है कि जब जगन को जेल हुई थी तो उन्हें सहानुभूति मिली थी। अब जिस तरह से नायडू की गिरफ्तारी हुई है, उससे टीडीपी को कुछ सहानुभूति मिल सकती है। लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ है।
सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर हरगोपाल कहते हैं कि इस तरह की बदले की राजनीति न तो 2019 में शुरू हुई और न ही जगन मोहन रेड्डी प्रतिशोध की राजनीति के पहले शिकार हैं।
नायडू को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपने शासनकाल में विपक्षी आंदोलनों के प्रति अलोकतांत्रिक रवैये के लिए जाने जाते हैं।
साल 1995-2004 के बीच अपने मुख्यमंत्री काल में नायडू के नव-उदारवादी एजेंडे के किसी भी विरोध के प्रति उनकी अत्याधिक शत्रुता के कई उदाहरण हैं।
साल 2019 के बाद न केवल नायडू और उनके बेटे को इसका खमियाजा भुगतना पड़ा, बल्कि टीडीपी के अन्य नेताओं को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।
टीडीपी की औद्योगिक नीति पर सवाल
टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस के बीच जारी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता केवल राजनेताओं तक सीमित नहीं है।
बिजनेस हाउस भी इसकी चपेट में आए हैं। ऐमरान बैटरी बनाने वाले आमरा राजा ग्रुप के मालिक टीडीपी सांसद गाला जयदेव हैं। आंध्र प्रदेश में इस ग्रुप का कारखाना बहुत पहले से है।
इस समूह ने अभी हाल ही में अपनी विस्तारित परियोजनाएं तेलंगाना में लगाने की घोषणा की हैं। माना जा रहा है कि प्रदेश सरकार के उत्पीडऩ से तंग आकर यह फैसला लिया है।
वहीं बिजनेस इनसाइडरों के मुताबिक टीडीपी से जुड़े ग्रेनाइट खनन क्षेत्र के कारोबारियों को या तो अपनी योजनाएं रोकनी पड़ी हैं या अपनी वफादारी सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ करनी पड़ी है।
आरोप तो यह भी लगाए जा रहे हैं कि आंध्र प्रदेश में अपनी यूनिट लगाने की घोषणा करने वाली कंपनियों ने अपनी योजनाएं रद्द कर दी हैं। पिछली और वर्तमान सरकार में आयोजित वैश्विक निवेश शिखर सम्मेलन भव्य फोटो-ऑप कायक्रमों से ज्यादा कुछ नहीं हैं।
टीडीपी समर्थक व्यापारिक समुदाय में निराशा है। आंध्र प्रदेश के आर्थिक परिदृश्य में अडानी के एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरे है। उन्हें कथित तौर पर वाईएसआर कांग्रेस का गुप्त समर्थन हासिल है। इसने स्थिति को और उलझा दिया है।
जाति के आधार पर हमला
वाईएसआर कांग्रेस ने 2019 में सत्ता में आने के बाद जो सबसे बड़े फ़ैसले लिए उनमें से एक था अमरावती के निर्माण पर रोक लगाना।
एक बार बन जाने के बाद अमरावति 50 हजार एकड़ की देश की सबसे बड़ी ग्रीनफिल्ड राजधानी होती। इसके आर्थिक रूप से व्यवहार न होने को लेकर यह तर्क दिया गया कि यह ‘अमरावती’ नहीं बल्कि ‘कम्मारावती’ है। (कम्मारावति कामा और अमरावति से मिलककर बना है, कामा एक जाति है, जिससे टीडीपी के संस्थापक और चंद्रबाबू नायडू आते हैं)।
इसे ऐसे समझ सकते हैं कि राज्य सरकार के मंज्ञी बोत्सा सत्यनारायण ने कई बार कहा कि अमरावती एक रियल-एस्टेट प्रोजेक्ट है। यह केवल नायडू की जाति को लाभ पहुंचाने वाली जाति की राजधानी के अलावा कुछ नहीं है।
इसके बाद नायडू और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं के खिलाफ कम से कम तीन मामले दर्ज किए गए। उन पर कथित अमरावती घोटाले का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया गया।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि राजधानी बदली नहीं जानी चाहिए। उसने सरकार को जल्द से जल्द अमरावति में निर्माण कार्यों को पूरा करवाने का आदेश दिया। लेकिन वाईएसआर कांग्रेस सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी।
तेलगू सिनेमा के लोकप्रिय कलाकार पवन कल्याण के राजनीति में प्रवेश के साथ ही आंध्र प्रदेश की जाति आधारित राजनीति में एक नया मोड़ आ गया।
पवन का आधार कप्पू जाति में है। जिसकी आंध्र प्रदेश में बड़ी आबादी है। कोस्टल आंध्र प्रदेश में कम्मा और कप्पू में तनाव था। जगन की इन दोनों ताक़तों को एकजुट करने की ताक़त अब स्पष्ट है।
पवन ने जनसेना और टीडीपी के एकजुट होकर चुनाव लडऩे की घोषणा की है। टीडीपी में निराशा है क्योंकि चंद्रबाबू नायूड अब बूढ़े हो रहे हैं और जगन ने उनके वित्तीय स्रोतों को निचोड़ लिया है।
ऐसे में एक बार फिर हार टीडीपी के लिए घातक झटका हो सकती है। (बाकी पेज 8 पर)
यह खेल आंध्र प्रदेश की राजधानी में हो रहा है। ऐसे में पैदा हुई हताशा कई बुरी चीजों को बढ़ावा देती हैं।
आंध्र प्रदेश की राजनीति का इतिहास
आंध्र प्रदेश में 1903 के चुनाव में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले प्रोग्रेसिव डेमोक्रेेटिक फ्रंट (पीडीएफ) ने कांग्रेस के हाथ से सत्ता करीब-करीब छीन ली थी।
हालांकि इसके बाद कांग्रेस ने चुनावी इतिहास में अपना एकाधिकार कर लिया, फिल्म स्टार एनटी के नेतृत्व में तेलुगु देशम पार्टी के उदय ने 1982 में कांग्रेस के सत्ता केंद्र को उखाड़ फेंका।
इस पर रेड्डी और ब्राह्मण जातियों का वर्चस्व था। टीडीपी के उदय ने पिछड़ी जातियों को कुछ राजनीतिक स्पेस दिया। अन्य पिछड़ी जातियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण मिला।
उसके बाद से ही टीडीपी कम्माओं के नेतृत्व वाली पार्टी बनी हुई है। पिछड़ी जातियों का एक वर्ग उनका प्रमुख समर्थन आधार है।
अनुसूचित जाति में शामिल मडिगा का भी उसे समर्थन मिला है। कुछ मडिगा नेता टीडीपी के साथ-साथ राज्य के बड़े नेता बनकर उभरे हैं। टीडीपी की बागडोर विवादास्पद रूप से एनटीआर के दामाद चंद्रबाबू नायडू के हाथ में चली गई। 2004 तक टीडीपी सत्ता में रही।
टीडीपी को 2004 के चुनाव करारी हार का सामना करना पड़ा। वाईएस राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस ने एक बार फिर सत्ता में वापसी की।
राजशेखर रेड्डी ने नायडू के बेलगाम और हिंसक नव-उदारवादी शासन के विरोध में लोकलुभावन घोषणाओं और योजनाओं के दम पर सत्ता में वापसी की।
एक हवाई हादसे में राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद जगन मोहन रेड्डी की राजनीति में एंट्री हुई। वो मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस आलाकमान की योजना अलग थी।
उसने जगन की मांग पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद जगन ने कांग्रेस छोडक़र वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नाम से अपनी पार्टी बनाई और कांग्रेस के खिलाफ लामबंदी की।
आंध्र प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की जगह कहाँ है?
कांग्रेस सरकार ने इसे अच्छा नहीं माना। इसके बाद जगन को करीब 16 महीने जेल में बिताने पड़े। उनके साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता, नौकरशाह और कुछ उद्योगपतियों को भी जेल में रहना पड़ा।
जगन के खिलाफ यह मामला अभी भी अदालत में विचाराधीन है। दरअसल, इस मामले में जो याचिककर्ता थे, उनमें से एक टीडीपी सांसद येरम नायडू भी थे।
साल 2014 में आंध्र प्रदेश का बँटवारा हो गया। इसने कांग्रेस को राज्य की राजनीति से पूरी तरह से बाहर कर दिया।
साल 2014 के चुनाव में टीडीपी ने जीत दर्ज की। इससे पहले टीडीपी की सरकारों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी हुआ करती थी। लेकिन यह जगह अब वाईएसआरसीपी ने ले ली।
अपनी सरकार के दौरान टीडीपी जगन के कथित आर्थिक अपराधों का जिक्र करना नहीं छोड़ती थी। वह लगातार उन्हें ्र1 के नाम से पुकारती रही(जगन कई मामलों में अभियुक्त नंबर एक बनाए गए थे। इन दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में हिंसक झड़पें भी हुईं।
इसी समय, पिछड़ा वर्ग के टीडीपी से दूर जाने लगा। वो वाईएसआरसीपी की ओर देखने लगा। ऐसे में जातिगत समीकरण भी बदलने लगे।
वाईएसआरसीपी ने 2019 में राज्य की सत्ता संभाली। सत्ता संभालने के बाद जगनमोहन रेड्डी ने अमरावती जैसी परियोजनाओं को रद्द करना शुरू किया और टीडीपी सरकार में शुरू हुई परियोजनाओं की जांच शुरू करवाई।
आंध्र प्रदेश की तीन राजनीतिक शक्तियाँ
एन जयप्रकाश नारायण एक पूर्व नौकरशाह और लोक सत्ता पार्टी के प्रमुख हैं। उन्होंने एक ब्लॉग में राज्य के वर्तमान राजनीतिक हालात पर लिखा है, ‘पिछले कुछ समय से हम राज्य में जो कुछ देख रहे हैं, वह चयनात्मक अभियोजन का मामला है। सत्ता में चाहे जो पार्टी हो, कानून का शासन पूरी तरह से सत्ता के अधीन हो गया है। ऐसा कैसे होता है कि कोई भी सत्ताधारी दल कभी भी अपने किसी भी सदस्य को भ्रष्टाचार में शामिल नहीं पाता है।’
राज्य की दोनों अहम पार्टियां बीजेपी से करीबी बढ़ाना चाहती है।
टीडीपी बीच-बीच में बीजेपी का समर्थन करती रहती है। लेकिन बीजेपी के एजेंडे में कोई बड़ा अंतर नहीं दिख रहा है।
चंद्रबाबू नायडू कुछ समय के लिए बीजेपी के साथ जुडऩे की पुरजोर कोशिश करते रहे। वहीं राज्य में तेजी से उभर रही तीसरी पार्टी जयसेना भी बीजेपी का समर्थन लेने के मामले में ज्यादा मुखर है। तीनों प्रमुख राजनीतिक दल बीजेपी के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक दिलचस्प तथ्य है। (bbc.com/hindi/)
दीपक मंडल
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को जी-20 में हिस्सा ले रहे देशों के सुझावों, प्रस्तावों और विचारों पर चर्चा करने के लिए नवंबर से पहले एक वर्चुअल सेशन की पेशकश के साथ सम्मेलन के समापन का एलान कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ब्राजील के औपचारिक रूप से जी-20 देशों की अध्यक्षता लेने से पहले भारत के पास ढाई महीने का समय है और इसमें इन सुझावों पर विचार किया जा सकता है।
उन्होंने ‘वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर’ के रोडमैप के सुखद होने की कामना के साथ सम्मेलन में हिस्सा ले रहे देशों को धन्यवाद दिया। इस दौरान उन्होंने संस्कृत का एक श्लोक भी कहा, जिसका संबंध दुनिया में शांति और खुशी की कामना से है।
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन समेत दुनिया भर से जुटे कई नेताओं ने भारत की अध्यक्षता की सराहना की। सम्मेलन में कुल तीन सत्र हुए। दो सत्र (वन अर्थ और वन फैमिली) शनिवार को और एक सत्र (वन फ्यूचर) का आयोजन रविवार को हुआ।
सम्मेलन में जी-20 लीडर्स डिक्लेरेशन (घोषणा पत्र) पर पहले ही दिन (शनिवार) को सहमति बन गई और पीएम मोदी ने इसके ‘एडॉप्ट’ होने का एलान किया। ये सम्मेलन अफ्रीकन यूनियन को स्थायी सदस्यता दिए जाने के लिए भी याद किया जाएगा।
सम्मेलन में हिस्सा लेने आए अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने द्विपक्षीय वार्ता के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया।
‘वन फ्यूचर’ सेशन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का सवाल
जी20 शिखर सम्मेलन के ‘वन फ्यूचर’ सत्र में मोदी ने कहा, ‘दुनिया के अच्छे भविष्य के लिए वैश्विक निकायों को आज की वास्तविकताओं को ध्यान में रखन जरूरी होगा।’
उन्होंने कहा कि जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 51 संस्थापक सदस्यों के साथ हुई थी तब दुनिया बिल्कुल अलग थी क्योंकि लेकिन ये संख्या लगभग 200 हो गई है। ‘इसके बावजूद, यूएनएससी में स्थायी सदस्यों की संख्या वही बनी हुई है।’ ‘तब से दुनिया काफी बदल गई है चाहे परिवहन हो, संचार हो, स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो, हर क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है।’
पीएम मोदी ने साइबर सुरक्षा और क्रिप्टो करेंसी को दुनिया के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने वाले ज्वलंत मुद्दों में से एक बताया।
उन्होंने एक उदाहरण के रूप में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का हवाला दिया और कहा कि जी20 देशों को 2019 में ब्लॉक की ओर से अपनाए गए ‘एआई सिद्धांतों’ से आगे जाने की जरूरत है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और सम्मेलन का घोषणापत्र
जी-20 सम्मेलन के घोषणापत्र पर आम सहमति को भारत और पीएम नरेंद्र मोदी की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है कि रूस- यूक्रेन मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं था। घोषणापत्र पर सहमति कायम करने में ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की इसमें अहम भूमिका रही।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया है कि जी-20 सम्मेलन ने भारत और उसके नेतृत्व को ‘लोकतांत्रिक मूल्यों के मिलन बिंदु’ के तौर पर पेश किया।
घोषणापत्र में यूक्रेन के मुद्दे पर रूस का नाम न लेना और जी-20 देशों के नरम रुख को लेकर काफी चर्चा है।
इस सम्मेलन को कवर करने आए ‘द ट्रिब्यून’ के एसोसिएट एडिटर संदीप दीक्षित ने बीबीसी संवाददाता जुबैर अहमद को बताया कि ये पहली बार था जब जी20 सम्मेलन में पश्चिमी देशों का दबदबा नहीं दिखा।
उनके मुताबिक अमूमन जी-20 में जी-7 यानी अमीर पश्चिमी देश हावी रहते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। भारत और विकासशील देशों ने ये पहले ही जता दिया था कि रूस-यूक्रेन के मुद्दे को इस पर हावी नहीं होने दिया जाएगा। जबकि इंडोनेशिया में हुए पिछले जी-20 सम्मेलन में अमेरिका और यूरोप जैसे देशों के दबदबे की वजह से यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेडऩे के लिए रूस की निंदा की गई थी।
उन्होंने कहा, ‘बड़ी बात ये थी कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा जैसे देशों ने इस यथार्थ को मंजूर किया और उन्होंने इस पर बहुत जोर नहीं दिया। ये उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की उपलब्धि कही जाएगी।’
यूक्रेन की नाराजगी पर भारत ने क्या कहा?
संदीप दीक्षित ने कहा, ‘इससे यूक्रेन नाराज हुआ और उसका ऐसा होना लाजिमी था। यूक्रेन पूरा जोर लगा रहा था कि इस सम्मेलन में रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया जाए या फिर उसके राष्ट्रपति वोलोदोमीर जेलेंस्की को इसे वीडियो लिंक के जरिये संबोधित करने का मौका मिल जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यूक्रेन का मुद्दा नहीं चला।’
इस मामले का जिक्र करते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि इंडोनेशिया के बाली में यूक्रेन मुद्दे पर प्रस्ताव से इसकी तुलना नहीं की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा,‘बाली सम्मेलन एक साल पहले हुआ था। तब हालात अलग थे। तब से अब तक बहुत कुछ हो चुका है।’
विशेषज्ञों का कहना कि भारत ने जी-20 सम्मेलन में रूस-यूक्रेन का मुद्दा हावी नहीं होने दिया।
इसके बजाय इसमें कोविड के बाद की दुनिया में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, क्रिप्टोकरेंसी पर रेगुलेशन और वैश्विक फाइनेंशियल फ्रेमवर्क जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई, जो आज की आर्थिक चुनौतियों से भरी दुनिया के लिए बिल्कुल मुफीद मुद्दे थे।
किन देशों के साथ हुई द्विपक्षीय बातचीत
सम्मेलन के इतर भारत की 15 देशों के साथ द्विपक्षीय बातचीत हुई। अमेरिका ने बातचीत के दौरान 31 ड्रोन खरीदने के लिए भारत की ओर से अनुरोध पत्र जारी करने का स्वागत किया।
मोदी और बाइडन ने कहा कि दोनों सरकारें स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप पर काम करती रहेंगी और सेमी कंडक्टर सप्लाई चेन के लिए काम करेंगे।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और पीएम मोदी के साथ बातचीत में मुक्त व्यापार समझौते के साथ ही दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार और निवेश में तेजी लाने की प्रतिबद्धता जताई गई। वहीं बांग्लादेश से सुरक्षा सहयोग, सीमा प्रबंधन, व्यापार और कनेक्टिविटी, जल संसाधन, बिजली और ऊर्जा सहयोग पर चर्चा हुई।
पीएम मोदी ने शुक्रवार को बाइडेन, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनौथ के साथ द्विपक्षीय बैठक की।
शनिवार को ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, इटली से द्विपक्षीय वार्ता हुई। 10 सितंबर यानी रविवार को पीएम मोदी ने कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो से बात की और वहां खालिस्तानी अलगाववादियों को लेकर भारत की चिंता से अवगत कराया।
पीएम मोदी तुर्की के राष्ट्रपति से भी मिले।
जबकि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान 11 सितंबर को नरेंद्र मोदी से बातचीत करेंगे।
बाइडन ने कहा, जी-20 ने उम्मीदें बढ़ाईं
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी जी-सम्मेलन में चर्चा के दौरान शामिल किए गए मुद्दों पर सहमति जताई।
उन्होंने कहा कि इस साल के जी-20 सम्मेलन ने ये साबित कर दिया कि ये संगठन दुनिया की बड़ी समस्याओं के हल की दिशा में काम कर सकता है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, ‘ऐसे वक्त में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, अपनी कमजोरियों और संघर्षों से जूझ रही है तो ऐसे समय में इस साल के जी-20 सम्मेलन ने साबित किया है कि इसके पास दुनिया की बड़ी समस्याओं का हल है।’
शनिवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 50 मिनट की बातचीत में बाइडन ने अमेरिका और भारत के बीच रिश्तों को और मजबूत और बहुआयामी करने की प्रतिबद्धता जताई।
पीएम नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के समापन के दौरान ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस ईनास्यू लूला डा सिल्वा को जी20 समूह की अध्यक्षता सौंप दी। इसके प्रतीक के तौर पर उन्हें पीएम मोदी ने गैवल (हथौड़ा) पेश किया।
पीएम मोदी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, ‘भारत ने ब्राजील को गैवल दी। हमें अटूट विश्वास है कि वे समर्पण और दूरदर्शिता के साथ नेतृत्व करेंगे।’’
ब्राजील के राष्ट्रपति लूला ने क्या कहा?
ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस ईनास्यू लूला डा सिल्वा ने इस मौके पर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के हितों से जुड़े मुद्दों को आवाज देने के लिए भारत की तारीफ की। जी-20 शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में पीएम मोदी ने ब्राजील को इस समूह की अध्यक्षता के लिए शुभकामनाएं भी दी।
ब्राजील आधिकारिक रूप से इस साल एक दिसंबर को जी20 समूह के अध्यक्ष का कार्यभार संभालेगा।
लूला डी सिल्वा ने कहा कि जी-20 सामाजिक समावेश, भूख के ख़िलाफ़ लड़ाई, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देगा। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अपनी राजनीतिक ताकत बरकरार रखने के लिए स्थायी और गैर-स्थायी सदस्यों के रूप में नए विकासशील देशों की जरूरत पड़ेगी।
उन्होंने कहा,‘‘हम विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं।’’
ब्रिटेन ने चीन के सामने उठाया जासूसी का मामला
सम्मलेन में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने रविवार को जी-20 शिखर सम्मेलन में अपने देश के संसदीय लोकतंत्र में कथित चीनी हस्तक्षेप से पैदा चिंताओं का जिक्र किया।
ब्रिटेन की एक मीडिया रिपोर्ट में दो व्यक्तियों के खिलाफ जासूसी के आरोपों का खुलासा होने के बाद उन्होंने अपने देश की इस चिंता का जिक्र किया।
‘द संडे टाइम्स’ के मुताबिक ब्रिटेन में एक पार्लियामेंट्री रिसर्चर के दावों के बाद सरकारी गोपनीयता कानून के तहत जासूसी के आरोप में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
इस ख़बर के आने के बाद सुनक ने जी-20 सम्मेलन में चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात की। उन्होंने ने इस मुलाकात के दौरान ब्रिटेन की चिंता के बारे में उन्हें जानकारी दी।
10 डाउनिंग स्ट्रीट के प्रवक्ता ने कहा, ‘प्रधानमंत्री ने चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात की और ब्रिटेन के संसदीय लोकतंत्र में चीनी हस्तक्षेप के बारे में अपनी अहम चिंताओं से अवगत कराया।’
महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि
जी-20 सम्मेलन के आखिरी दिन पीएम मोदी और इसमें शामिल होने आए दुनिया भर के नेता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने राजघाट पहुंचे। इस दौरान पृष्ठभूमि में ‘बापू कुटी’ का चित्र दिख रहा था। वर्धा के पास सेवाग्राम आश्रम में स्थित ‘बापू कुटी’ 1936 से लेकर 1948 में महात्मा गांधी के निधन तक उनका निवास स्थान था। प्रधानमंत्री जी20 नेताओं को ‘बापू कुटी’ के महत्व के बारे में समझाते नजर आ रहे थे। महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के बाद जी20 नेताओं ने ‘लीडर्स लाउंज’ में ‘शांति दीवार’ पर हस्ताक्षर भी किए। (bbc.com/hindi/)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
हाल में केन्द्र सरकार ने दो ऐसे राजनीतिक विवादों को जन्म दिया है जिनसे देश के राष्ट्रपति का नाम और गरिमा जुड़ी है। अभी निवर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द को सरकार द्वारा गठित वन नेशन वन इलेक्सन समिति का अध्यक्ष बनाए जाने का विवाद थमा नहीं था कि जी 20 शिखर सम्मेलन में वर्तमान राष्ट्रपति के रात्रिभोज के आमंत्रण पर प्रेजिडेंट ऑफ इंडिया की जगह प्रेजिडेंट ऑफ भारत लिखने से नया विवाद छिड़ गया है।
इस विवाद की जड़ में भी विपक्षी गठबंधन का नाम इंडिया होना माना जा रहा है। अभी तक सभी कार्यक्रमों और दस्तावेजों में प्रेजिडेंट ऑफ इंडिया के नाम से ही आमंत्रण और उच्च सरकारी पदों पर नियुक्तियां आदि जारी हुआ करती थी। यह पहला मौका है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित समारोह के निमंत्रण पत्र में अचानक इंडिया की जगह भारत लिखा गया है। निश्चित रूप से सरकार को यह अंदेशा रहा होगा कि अचानक इस बदलाव पर लोग चौंकेंगे और काफी लोग सरकार की आलोचना भी करेंगे क्योंकि सरकार ने ऐसा कदम अचानक उठाया है।
विपक्षी दलों के गठबंधन के नेता सरकार के इस कदम को गठबंधन से नफरत और उसके इंडिया नाम से डर के रूप में प्रचारित कर रहे हैं जो किसी हद तक उचित भी लगता है। आखिर सरकार को अचानक ऐसा करने की क्या आवश्यकता महसूस हुई। नोटबंदी की तरह इस बदलाव को बगैर किसी चर्चा के अचानक करने के पीछे क्या मंशा थी। सरकारें जब तब अपनी पीठ थपथपाने के लिए सडक़ों और शहरों आदि के नाम बदलती रहती हैं। वर्तमान सरकार और भारतीय जनता पार्टी इस मामले में काफी आगे है।
मध्यप्रदेश की बात करें तो इसी साल हबीबगंज स्टेशन का नाम रानी कमलापति स्टेशन किया गया है। नाम परिवर्तनों के पीछे वोट बैंक की राजनीति होती है लेकिन इस तरह अचानक देश का ही नाम बदलना निश्चित रूप से अकल्पनीय है! बेहतर होता सरकार ऐसा करने से पहले व्यापक चर्चा करती। सभी देशों की एंबेसिज और संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय आदि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को भी सूचित किया जाना चाहिए था कि अमुक दिन से इंडिया को भारत कहा जाएगा ताकि नाम परिर्वतन को लेकर अनावश्यक भ्रम की हास्यास्पद स्थिति से बचा जा सके।
अक्सर यह कहा जाता है कि हमारे देश में दो वर्ग हैं एक अंग्रेजीदा अमीर महानगरीय वर्ग है जो विकसित इंडिया का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा भारत है जो गरीब पिछड़े गांव देहात और बदहाल झुग्गी बस्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। सरकार शायद पूरे भारत को एक नजरिए से देखने के लिए कृत संकल्पित है इसलिए उसने इंडिया शब्द को सरकारी फाइलों से मुक्त करने का मन बनाया है। संभव है अब हर जगह से इंडिया हटाकर भारत लिखे जाने का सरकारी फरमान जारी हो। उदाहरण के तौर पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की जगह रिजर्व बैंक ऑफ भारत और स्टेट बैंक ऑफ भारत हो जाए। यह भी संभव है कि इंडिया से जुड़े अन्य शब्द ,यथा इंडो आदि भी बदले जाएं इंडियन करेंसी भारतीय करेंसी इंडियन एंबेसी भारतीय एंबेसी या भारत एंबेसी कहलाए आदि आदि।
सरकार के इस कदम से लगता है कि लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया को भारत कहकर वह एक तीर से दो शिकार करना चाहती है। एक तरफ विपक्ष को यह कहकर घेरना चाहती है कि उन्होंने अपने गठबंधन का अंग्रेजीदा नाम रखा है और दूसरी तरफ खुद को भारतीय संस्कृति और हिंदी का पैरोकार साबित कर हिन्दी पट्टी में भावनात्मक जुड़ाव महसूस कराना चाहती है।
हालांकि अचानक ऐसा कर सरकार ने विपक्षी गठबंधन को अपना मजाक उड़ाने का मौका भी दिया है क्योंकि अटल बिहारी बाजपेई के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार ने अंग्रेजीदा शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था और हाल में खुद प्रधानमंत्री ने मेड इन इंडिया पर काफी जोर दिया है। इसलिए विपक्ष का यह तर्क सही लगता है कि सरकार ने विपक्षी गठबंधन के इंडिया नाम से घबराकर हड़बड़ी में यह कदम उठाया है। अभी रक्षाबंधन पर अचानक केन्द्र सरकार ने गैस सिलेंडर पर दो सौ रुपए कम किए थे उसे भी ममता बनर्जी जैसे ने इसे विपक्षी गठबंधन का असर बताया था। इंडिया की जगह अचानक भारत लिखने से विपक्ष का दावा और पुख्ता होता है।
- जगदीश्वर चतुर्वेदी
हिन्दी में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला पर जब भी बातें होती हैं तो उनकी पत्नी की भूमिका का कभी जिक्र नहीं होता। सच यह है निराला को हिन्दी सेवा के लिए प्रेरित उनकी पत्नी ने किया। निराला की ंकुल्लीभाटंरचना बेहद दिलचस्प है। रामविलास शर्मा ने ंनिराला की साहित्य साधनांमें बहुत ही रोचक ढ़ंग से समूचे प्रसंग को उद्घाटित किया है। निराला की पत्नी के कथासूत्र को ंकुल्लीभाटं में देखें तो चीजों को बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं। मनोहरा देवी की समझ में निराला उस समय हिन्दी के पूरे गँवार थे, बिल्कुल ठोस मूर्खं। हिन्दी को लेकर पति-पत्नी की बातचीत इस प्रकार हुई है-
पति-तुम हिन्दी- हिन्दी करती हो, हिन्दी में क्या है?
पत्नी-जब तुम्हें आती ही नहीं, तब कुछ नहीं है।
पति-मुझे हिन्दी नहीं आती?
पत्नी-वह तो तुम्हारी जबान बतलाती है। बैसवाड़ी बोल लेते हो, तुलसीकृत रामायण पढ़ी है, बस तुम खड़ी बोली का क्या जानते हो?
संवाद के बाद पूरी बात बतलाते हुए निराला ने लिखा है कि उनकी पत्नी ने खड़ी बोली के बहुत-से महारथियों के नाम गिना दिये।पर मनोहरादेवी ने भजन गाया तो तुलसीदास का। उस समय मनोहरादेवी की उम्र 13-14साल रही होगी। उपरोक्त संवाद में यह देखें कि निराला की पत्नी की कितनी विकसित चेतना थी कि वह खड़ी बोली हिन्दी के पक्ष में बोल रही थीं, लेकिन उस समय निराला के पास वह चेतना नहीं थी। उनकी पत्नी गांव में रहते हुए भी खड़ी बोली हिन्दी के नए कवियों से वाकिफ थीं, निराला नहीं। निराला ने जब अपनी पत्नी से यह सवाल किया कि हिन्दी में क्या है ? तो वे नहीं जानते थे कि उनको सटीक उत्तर भी मिलेगा।यह संवाद जिस समय हो रहा था निराला 16 साल के रहे होंगे। निराला का मुँह बंद करने के लिए मनोहरादेवी ने उसी समय निराला को खड़ी बोली हिन्दी के दो गीत गाकर सुनाए। यह उस समय गांव में रहने वाली 13-14 साल की लडक़ी की चेतना थी। निराला के अनुसार जो दो गीत सुनाए वे हैं-
पहला- अगर है चाह मिलने की तो हरदम लौ लगाता जा।
दूसरा- सासुजी का छोकड़ा ,मेरी ठोड़ी पर रख दिया हाथ।
बहुत गम खा गई नहीं चाँटे लगाती दो-चार। रामविलास शर्मा ने इस समूचे प्रसंग पर लिखा है ंनिराला को जिस बात ने प्रभावित किया,वह था मनोहरा देवी का मधुर कण्ठ-स्वर। श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन-सुनकर पहली बार निराला के ज्ञान नेत्र खुले; उन्हें संगीत के साथ काव्य के अमित प्रकाश का ज्ञान हुआ। यह भजन निराला जीवन भर गाते रहे; इससे अधिक उनके हृदय को प्रभावित करने वाला दूसरा गीत संसार में न था। मनोहरा देवी गढ़ाकोला में रामायण पढ़ा करती थीं। निराला के चाचा दरवाजे पर बैठे सुनते थे। मनोहरा देवी ने निराला का परिचय खड़ीबोली से नहीं, तुलसीदास से कराया। तुलसीदास को ज्ञान मिला,पत्नी के उपदेश से; निराला को हिन्दी सेवा के लिए प्रवृत्त किया मनोहरादेवी ने!
डॉ. आर.के. पालीवाल
जी 20 समूह वर्तमान ग्लोबल दौर में सबसे शक्तिशाली समूह है जिसमें आबादी के लिहाज से विश्व के दो सबसे बड़े देश भारत और चीन शामिल हैं। विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका शामिल है, समाजवादी विचारधारा के सिरमौर रहे चीन और रूस हैं, ब्रिटेन, फ्ऱांस और यूरोपियन यूनियन हैं, आस्ट्रेलिया और कनाडा हैं और जापान और दक्षिण कोरिया सरीखी एशिया की अग्रणी औद्योगिक शक्तियां हैं। इन तमाम शक्तिशाली राष्ट्रों के समूह के राष्ट्रध्यक्षों का एक साथ भारत में आना निश्चित रूप से हमारे देश के लिए गौरव की बात है।
हालांकि इतर कारणों से रूस और चीन के राष्ट्रपतियों का इस शिखर सम्मेलन में अनुपस्थित रहना थोडी सी रिक्तता भी पैदा कर रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध के कारण रूसी राष्ट्रपति इधर अपने ही देश में विभिन्न समस्याओं से घिरे हुए हैं इसलिए उनकी अनुपस्थिति को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है लेकिन चीन के राष्ट्रपति के नहीं आने से भारत सहित अमेरिका जैसे देश भी निराश हैं।
जहां तक रूस के राष्ट्रपति की अनुपस्थिति का प्रश्न है उसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि सम्मेलन में शामिल हो रहे अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश नाटो संगठन के माध्यम से रूस यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन के साथ खड़े हैं और उसे रूस का मुकाबला करने के लिए आधुनिक हथियार और हर तरह की मदद मुहैया करा रहे हैं। वे यह भी चाहते हैं कि शिखर सम्मेलन में आए राष्ट्रध्यक्षों की वार्ताओं में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएं। ऐसे में हमेशा विश्व शांति का समर्थक रहा भारत भी शांति के प्रयास से सहमत होगा। इस स्थिति में रूसी राष्ट्रपति के लिए अजीब सी स्थिति पैदा हो सकती थी इसलिए मेजबान भारत के लिए भी उनकी अनुपस्थिति ठीक ही है। चीनी राष्ट्रपति की अनुपस्थिति की प्रमुख वजह यह आंकी जा रही है कि वे भारत में हो रहे इस वैश्विक आयोजन के साक्षी बनना नहीं चाहते। यह हमारी विवशता है कि पाकिस्तान और चीन के रुप में हमारे दो पड़ोसी देश हमारी सफलताओं से कभी खुश नहीं होते उल्टे उसमें हर संभव विघ्न डालने की कोशिश करते हैं।
जहां तक इस सम्मेलन के भारत के लिए महत्व का प्रश्न है उसमें सबसे अहम यह है कि इसमें अमेरिका, फ्रांस , ब्रिटेन और जापान आदि देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की मौजूदगी भारत के साथ लोकतांत्रिक और विकसित देशों से मजबूत होते रिश्तों की पहचान बनेगी। किसी भी देश के लिए इतने राष्ट्र प्रमुखों की एक साथ उपस्थिति गौरवपूर्ण है क्योंकि ऐसे आयोजनों की खबरें पूरे विश्व में प्रवाहित होती हैं। अधिकांश राष्ट्रों के अध्यक्षों के साथ भारत के प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय वार्ताएं भी होंगी क्योंकि कुछ अतिथि सम्मेलन के पहले पहुंचे हैं और कुछ सम्मेलन के बाद भी वार्ताओं के लिए रुकेंगे।
शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन की शुरुआत सुबह सवेरे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट से हो रही है। महात्मा गांधी हमारी ऐसी विलक्षण विभूति है जिसकी मूर्ति के सामने विश्व के सर्वाधिक शाक्तिशाली शासकों का सर स्वत: सम्मान से झुक जाता है। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों से भी ज्यादा बेहतर तरीके से महात्मा गांधी के नाम का प्रयोग किया है चाहे उनका नाम स्वच्छता अभियान से जोडक़र देश भर में फैलाया हो या राजघाट, साबरमती और संयुक्त राष्ट्र संघ में उनके सामने नतमस्तक होकर विदेशियों से गर्व से उनका जिक्र किया हो। इसे हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस समय शिखर सम्मेलन के तमाम प्रमुख अतिथि अपने भारी भरकम दल बल के साथ राजघाट पर नत मस्तक होकर हमारे राष्ट्रपिता की समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे होंगे तब हमारी सरकार द्वारा उसी गांधी के विचारों के प्रचार प्रसार में जुटी संस्था सर्व सेवा संघ वाराणसी को ध्वस्त करने के विरोध मे कुछ गांधी जन प्रार्थना सत्याग्रह कर रहे होंगे। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि गांधी के प्रति सबका सर झुकवाने वाले हम भारत के शासक और नागरिक खुद भी गांधी विचार को आत्मसात करने का सच्चा प्रयास करेंगे।
अनुराधा रमन
एक साथ चुनाव कराना उस स्वायत्ता के लिए झटका होगा जो राज्यों को संविधान के तहत मिला है। फिर, इसके लिए राज्य विधानसभाओं को स्वेच्छा से खुद को भंग करना होगा। बेशक बीजेपी शासित राज्य इसके लिए तैयार हो जाएं लेकिन विपक्ष शासित राज्य ऐसा क्यों करेंगे?
जून, 2019 की गर्मियां थीं। भारी चुनावी जनादेश की खुशी से सराबोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोचा होगा कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का गुब्बारा एक बार फिर उड़ाने के लिए यह सही समय है। यह पहली बार नहीं था जब बीजेपी इस बारे में बात कर रही थी। हालांकि, मोदी को संभवत: लग रहा था कि संघ परिवार जिस सपने को लंबे समय से आंखों में संजोए रखा था, अब उसे साकार करने का समय आ गया है। उन्होंने इस पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई। स्वाभाविक ही, उनके प्रस्ताव को विपक्षी दलों ने ‘लोकतंत्र विरोधी’, ‘संघीय संरचना विरोधी’ और राष्ट्रपति शासन का संभावित आरंभिक स्वरूप करार देते हुए खारिज कर दिया।
महज एक साल पहले विधि आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें कहा गया कि संविधान के मौजूदा ढांचे में एक साथ चुनाव कराना अव्यवहारिक है। उससे एक साल पहले नीति आयोग ने भी एक अध्ययन पत्र में एक साथ चुनाव की व्यवहारिकता पर चर्चा की थी। वर्ष 2020 में कानून और न्याय से संबंधित संसदीय समिति ने इस पर सभी हितधारकों की राय मांगी थी। इस तरह पीछे जाकर कडिय़ों को मिलाने का मकसद इस विचार को आगे बढ़ाने की मोदी सरकार की मंशा को बताना है।
जब लोकतंत्र में एक निर्वाचित सरकार ‘बहुत अधिक चुनावों’ का राग अलापने लगे, तो उसकी मंशा संदिग्ध ही होती है। फिर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मामले में तो यह नौ साल पुरानी ‘खुजली’ है। बेशक, यह विचार मोदी के दिमाग की उपज न हो लेकिन उन्होंने इस विचार की क्षमता को अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में बेहतर समझा। एक साथ चुनाव का विचार बीजेपी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और हमेशा पीएम-इन-वेटिंग रहे लालकृष्ण आडवाणी ने जोर-शोर से आगे बढ़ाया था और हाल के समय में यह बीजेपी के घोषणापत्रों में प्रमुखता से शामिल रहा है।
बीजेपी नेता अक्सर कहते हैं कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव 1969 तक एक साथ ही होते थे, जब कम बहुमत, निर्वाचित सदस्यों के दलबदल और इससे आई राजनीतिक अस्थिरता में कई राज्य विधानसभाओं को भंग करके मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा।
दरअसल, 1977 में चुनी गई लोकसभा भी केवल तीन साल चली। इसके बाद 1989 में चुनी गई लोकसभा दो साल चली। 1996 में 11वीं लोकसभा 18 महीने चली और 1998 में चुनी गई अगली लोकसभा 13 महीने बाद गिर गई। हालांकि, तब से, चुनावों ने हमें स्थिर गठबंधन और बहुमत वाली सरकारें तो दी ही हैं। इसके अलावा, संविधान के तहत, राज्य सरकारों के पास राज्य विधानसभा को भंग करने की सिफारिश करने और मध्यावधि चुनाव कराने की ताकत है।
क्या उन्हें इस अधिकार से एकतरफा वंचित किया जा सकता है? अगर आप लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य से पूछें, तो जवाब होगा- नहीं। आचार्य कहते हैं कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ राज्यों की स्वायत्तता पर हमला होगा। इससे एक और समस्या पैदा होगी: एक साथ चुनाव कराने के लिए विधानसभाओं को स्वेच्छा से खुद को भंग करना होगा। बीजेपी शासित राज्यों में तो यह संभव भी है लेकिन भला विपक्ष शासित राज्य ऐसा क्यों करेंगे?’
केन्द्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति राज्य सरकारों को बर्खास्त कर सकते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी मनमानी बर्खास्तगी पर रोक लगा दी है। डीएमके के तिरुचि शिवा ने 2019 में इस पर चर्चा के दौरान पूछा था, ‘क्या कोई आश्वासन देगा कि अनुच्छेद 356 को हटा दिया जाएगा?’
एक साथ चुनाव कराने के लिए कम-से-कम पांच संविधान संशोधनों- अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356- की जरूरत होगी और इसके लिए कम-से-कम 50 फीसद राज्यों को संशोधनों की पुष्टि करनी होगी क्योंकि अनुच्छेद 174 राज्य विधानसभाओं के विघटन से संबंधित है और अनुच्छेद 356 राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के बारे में।
क्या पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित आठ सदस्यीय समिति यह सुझाव दे सकेगी कि इस बारूदी सुरंग के पार कैसे जाया जाए? जहां तक 1969 तक एक साथ चुनाव कराने की बात है, राजनीतिक वैज्ञानिक सुहास पल्शिकर कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह यह थी कि 1960 के दशक के मध्य तक मतदाताओं ने स्थिर जनादेश दिया।
अलग-अलग चुनावों पर होने वाले भारी-भरकम खर्चे पर मचाए जा रहे हाय-तौबा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सरकार चुनाव कराने पर अपने बजट का एक छोटा-सा हिस्सा ही खर्च करती है। 2014 से 2019 तक के पांच वर्षों में चुनावों पर 10,000 करोड़ रुपये खर्च हुए जबकि केन्द्र सरकार का अकेले इस साल का बजट 45 लाख करोड़ रुपये है।
यह सच है कि अपारदर्शी चुनावी बांडों ने सत्तारूढ़ दलों के हाथों में भारी धनराशि दे दी है। व्यापार, उद्योग और कॉर्पोरेट निकाय अब गुमनाम बांड के बदले सत्ता में पार्टियों के साथ कानूनी तौर पर सौदेबाजी कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग जिसने 2019 तक इस योजना का विरोध किया था, हथियार डाल दिए हैं क्योंकि उसने 2021 में सुप्रीम कोर्ट में इसका समर्थन कर दिया। हालांकि, कानूनी तौर पर मामला अभी अदालत में लंबित है।
चुनावों में काला धन राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा पैदा किया जाता है, सरकार द्वारा नहीं। हालांकि, कोई भी नेता या राजनीतिक दल काले धन के इस्तेमाल या यहां तक कि अधिक खर्च की बात भी स्वीकार नहीं करता है। गौरतलब है कि 2019 में छह हजार से अधिक उम्मीदवारों में से केवल चार या पांच ने अपने रिटर्न में स्वीकार किया कि उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित व्यय सीमा से अधिक खर्च किया।
2014 के बाद से राजनीतिक दलों, खासकर बीजेपी का चुनाव खर्च जरूर जाहिरा तौर पर आसमान छू गया है। बढ़ता विज्ञापन-खर्च, सलाहकारों और रणनीतिकारों की नियुक्ति, सर्वेक्षण और प्रचार, निजी जेट और हेलीकॉप्टरों का उपयोग, मतदाताओं को रिश्वत देना जैसे चंद उदाहरण हैं जो बताते हैं कि पैसा कहां जा रहा है। चुनावों में होने वाले काले धन के इस्तेमाल का सरकार के चुनावी खर्चे यानी करदाताओं के पैसे से कोई मतलब नहीं। धन-बल पर अंकुश लगाने और चुनावों में समान अवसर सुनिश्चित करने में चुनाव आयोग की विफलता को एक साथ चुनाव कराकर ठीक नहीं किया जा सकता है।
इसके विपरीत, राजनीतिक टिप्पणीकार लोकसभा और विधानसभाओं के लिए अलग-अलग चुनाव कराने के फायदे बताते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि राजनीतिक दलों को बार-बार मतदाताओं के पास जाना पड़ता है, इसलिए अब भी कुछ जवाबदेही बची हुई है। राजनीतिक दल और नेता अगले चुनाव को देखते हुए सतर्क रहते हैं। अगर पांच साल तक कोई भी चुनाव न हुआ, तो न केवल नेताओं के गैर-जिम्मेदार बनने की आशंका अधिक होगी बल्कि मतदाता भी पांच साल के लिए अपने वोट की ताकत खो देंगे और कुछ भी नहीं कर पाएंगे।
मौजूदा व्यवस्था किसी खास लहर में चुनाव न होने देने की भी एक गारंटी है। उदाहरण के लिए, दिसंबर, 1984 में लोकसभा चुनाव श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ एक असामान्य चुनाव था। राजीव गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 404 सीटें जीतकर सत्ता में आई। यह कांग्रेस के पक्ष में एक जबर्दस्त ‘लहर’ थी, जैसे 1977 में उत्तर भारत में इसके खिलाफ लहर थी। इन दोनों ही मौकों पर अगर सभी राज्यों की विधानसभाओं में लोकसभा के साथ ही चुनाव हुए होते, तो परिणाम कितने ‘निष्पक्ष’ होते?
वास्तव में मतदाताओं ने हाल के वर्षों में विधानसभा के चुनावों में क्षेत्रीय दलों और आम चुनावों में बीजेपी को वोट दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े बताते हैं कि एक परिदृश्य के बारे में सोचना चाहिए जब लोकसभा चुनाव के लिए मोदी विरोधी लहर हो, लेकिन राज्यों में लोगों का मूड बीजेपी के पक्ष में हो। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि मतदाता हमेशा एक तरह के नतीजे लेकर आएंगे।
हालांकि, द हिंदू में एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के जगदीप एस छोकर के एक लेख से पता चलता है कि 1989 के आम चुनाव के बाद से 31 बार विधानसभाओं के चुनाव के साथ संसद के लिए चुनाव या उपचुनाव हुए और इनमें से 24 मामलों में एक ही पार्टी को विधानसभा और संसद के लिए चुना गया।
इसलिए अगर एक साथ चुनाव हुए, तो यह क्षेत्रीय और छोटे दलों के खिलाफ होगा जो जमीन से जुड़े हुए हैं और राज्य और स्थानीय मुद्दों को बेहतर ढंग से उठाने की काबलियत रखते हैं। जैसा कि हेगड़े बताते हैं, ‘सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र में सबसे बड़े सुरक्षा उपाय यानी स्वस्थ और मजबूत विपक्ष के खत्म हो जाने का है।’
कहने का यह मतलब नहीं कि मौजूदा समय में चुनाव आदर्श तरीके से होते हैं। चुनाव सुधार की जरूरत है, इससे कोई नाइत्तेफाकी नहीं हो सकती। लेकिन क्या एक साथ चुनाव इसका जवाब है? क्या ऐसे ‘सुधार’ की फौरन जरूरत है? चुनावों के दौरान संचार साधनों के दुरुपयोग पर चुनाव आयोग की निगरानी अब तक निराशाजनक रही है। टीवी चैनलों, इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्फोटक विस्तार से पहले की आदर्श आचार संहिता अब अप्रासंगिक लगने लगी है। लेकिन एक साथ चुनाव कराने से इसमें भला कैसे मदद मिलेगी?
प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले साल से नौवें साल के बीच मोदी ने एक राष्ट्र, एक चुनाव पर थोड़ा बचकर बोला। टीवी चैनल ‘टाइम्स नाउ’ से इस बारे में बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनावी सुधार को आगे बढ़ाना चुनाव आयोग पर निर्भर करता है। वैसे, व्यवहार में, मोदी सरकार ने 2014 से 2019 के बीच चुनाव आयोग द्वारा की गई ज्यादातर सिफारिशों को नजरअंदाज ही किया। चुनाव आयोग बजटीय अनुदान, कार्यबल और सुधारों की मंजूरी के लिए केन्द्र सरकार पर निर्भर है। 30-40 बूथों में दर्ज वोटों को एक साथ मिलाने और गिनने के लिए ‘टोटलाइजर’ मशीन के इस्तेमाल के आयोग के सुझाव को खारिज कर दिया गया। आयोग कुछ मायनों में स्वायत्तता चाहता था लेकिन इस दलील को भी अनसुना कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल के शुरू में कहा था कि चुनाव आयोग अपने आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में भी कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त नहीं है जबकि संविधान निर्माताओं ने एक स्वतंत्र आयोग की परिकल्पना की थी। बाद की सरकारें और लोकसभाएं चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून बनाने में विफल रहीं। तब शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि कानून बनने तक नियुक्तियां प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएंगी। हालांकि, सरकार ने संसद के मानसून सत्र में विधेयक पेशकर शीर्ष अदालत के आदेश को बदल दिया। विधेयक में प्रावधान किया गया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाएगी जिसमें प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक केन्द्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता होंगे।
ऐसे में, जब यह सरकार चुनावों की ‘अखंडता’ की बात करती है, तो किसी को उसकी बात को कितनी गंभीरता से लेना चाहिए?
पीडीटी आचार्य का कहना है कि कहीं इस कदम का इस बात से कोई लेना-देना तो नहीं है कि बीजेपी के पास केवल एक स्टार प्रचारक है। वह कहते हैं, ‘केवल एक ही आदमी है जो हर जगह प्रचार करता है और उसे एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाया जाता है।’ वह उस कार्टून की बात दोहराते हुए चुटकी लेते हैं जिसमें अमित शाह को थके हुए नरेन्द्र मोदी की ओर इशारा करते हुए ‘एक-राष्ट्र, एक चुनाव’ की वकालत करते दिखाया गया है।
मिड-डे में अपने कॉलम में एजाज अशरफ लिखते हैं, ‘मोदी शासन के तहत किसी भी संभावना को खारिज करना बेवकूफी होगी।’ इससे राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ चुनाव कराने के विषय पर चर्चा जरूर शुरू हो सकती है। अशरफ कहते हैं, ‘अपनी निस्वार्थता साबित करने के लिए, वह दिसंबर में पांच राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम- में होने वाले चुनावों के साथ ही लोकसभा के चुनाव भी करा सकते हैं और उसके बाद यह कह सकते हैं कि देश के भले के लिए उन्होंने अपना ही कार्यकाल छोटा कर लिया।’
प्रधानमंत्री मोदी के इस दुस्साहसिक प्रयास की अटकलों के बीच तमाम लोगों का मानना है कि यह भारत के ‘राज्यों के संघ’ के विचार और इसकी संघीय संरचना के लिए खतरा है। इसका जो भी होगा, बहुत जल्द होगा। या तो इसे कसौटी पर कसा जाएगा या फिर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
-डॉ. आर.के. पालीवाल
सनातन धर्म का सनातन नाम इसीलिए है कि उसकी उम्र बहुत लंबी है। वह चिर युवा है, आदिकाल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा।इधर कुछ साल से हमारे इस अद्वितीय धर्म के स्वयंभू रखवाले बने मुट्ठीभर लोग बहुत डरे हुए रहते हैं। जरा सा किसी ने कुछ फुसफुसाया नहीं कि उनके कान खड़े हो जाते हैं और सनातन धर्म पर बड़ा खतरा है यह चिल्लाने लगते हैं। सनातन धर्म पर सबसे बड़ा खतरा ये स्वयंभू रक्षक ही हैं। इन्हें सनातन का ककहरा ठीक से नहीं आता। इनसे सनातन धर्म की आत्मा उपनिषदों के नाम पूछ लेंगे तो बगलें झांकने लगेंगे। सनातनी भाषा संस्कृत के पांच प्रमुख श्लोक बोलने के लिए कह दोगे तो इनका सिर झुक जाएगा। इन्हें दस प्रमुख सनातन ग्रंथों के बारे में जानकारी नहीं है। इनकी हालत ऐसी ही है जैसी अधिकांश गौ रक्षकों की है। उन्हें रोज सडक़ों पर पॉलिथीन खाकर ट्रकों के नीचे आकर मरती हजारों गायों की कोई चिंता नहीं है लेकिन यदि किसी अल्पसंख्यक के हाथ में गाय की रस्सी दिख जाएगी तो उसे नेस्तनाबूद करने के लिए सिकंदर बन जाएंगे चाहे उसकी मंशा दूध के लिए गाय पालने की ही क्यों न हो।
ताजा मामला तमिलनाडु के सत्ताधारी दल के बडबोले नेता उदयनिधि स्टालिन के बयान का है जिन्हें दादा की राजनीतिक विरासत मिलने और मुख्यमंत्री पिता की कृपा बरसने से माननीय मंत्री बनने का मौका मिला है। बगैर मेहनत मशक्कत किए रेवड़ी की तरह मिले उच्च पद से कोई व्यक्ति संस्कारवान नहीं होता वही हालत उदयनिधी की है जिसने जिम्मेदार पद पर रहते हुए निहायत गैर जरूरी, गैर जिम्मेदार और हेट स्पीच की हद में आने वाला बयान दिया है। तमिलनाडु में उनकी और उनके पिता की सरकार है इसलिए वहां की पुलिस से सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश के बावजूद उनके खिलाफ किसी कार्यवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती।अमित शाह आदि भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेताओं ने उदयनिधि स्टालिन के बहाने पूरे विपक्षी गठबंधन को ही सनातन धर्म और संस्कृति के खिलाफ बताकर इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की है। खुद को आहत महसूस कर कुछ सनातनियों ने उदयनिधि के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई है। संभव है भाजपा शासित राज्यों में उन पर आई पी सी की विभिन्न संगीन धाराओं में एफ आई आर भी दर्ज हो जाएं। ऐसे भी समाचार हैं कि किसी सिरफिरे साधू टाइप के व्यक्ति ने दस कदम आगे बढ़ कर उदयनिधि के सिर काटने वाले को दस करोड़ का ईनाम भी घोषित कर दिया।अभी तक इस तरह के फतवे कुछ आतंकी इस्लामिक संगठन से जुड़े लोग ही किया करते थे लेकिन अब खुद को सबसे श्रेष्ठ, शांतिप्रिय और सर्व समावेशी मानने वाले सनातन धर्म में भी ऐसे कट्टरपंथियों की संख्या बढ़ रही है।
पुरानी कहावत है कि कभी कभी लापरवाही के कारण बाड खेत की रक्षा करने की बजाय खेत खाने लगती है। यह तब होता है जब बाड़ का खरपतवार अनियंत्रित होकर खेत में घुसने लगता है और फ़सल को नष्ट करने लगता है। कुछ ऐसा ही हाल सनातन धर्म के तथाकथित स्वयंभू रक्षकों का हो गया। अब वे ख़ुद सनातन धर्म के लिए खतरा बन रहे हैं। अपनी ऊल जलूल हरकतों और भडक़ाऊ बयानबाजी से युवाओं को बरगला रहे हैं। ऐसे लोग न ख़ुद सनातन धर्म के नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को मानते हैं और न युवा पीढ़ी को संस्कारवान होने दे रहे हैं। आत्मा की आवाज सुनने वाले सनातन धर्म को पाखंडों और आडंबरों के शोर शराबे में दफन कर रहे हैं। इनका मकसद भी वैसा ही राजनीतिक हंगामा खड़ा करना है जैसा उदयनिधि जैसों का है। उदयनिधि भी वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं और भाजपा के नेताओं का भी वही मकसद है। देश और सनातन धर्म की सूरत बदलना दोनों का मकसद नहीं है। प्रबुद्ध नागरिकों का कर्तव्य है कि वे जनता को इनके मकसद से आगाह करें। सनातन धर्म की यही सबसे बडी सेवा होगी।
दीपक मंडल
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन की ‘सनातन धर्म’ पर टिप्पणी पर विवाद लगातार जारी है।
डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने दो सितंबर को तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई 'सामाजिक बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए इसे समाज से खत्म करने की बात कही थी।
उन्होंने कहा था, ‘सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटने वाला विचार है, इसे खत्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है।’
उन्होंने ये भी कहा था,‘जिस तरह हम मच्छर,डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है। इसे समाज से पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए।’
इस बयान पर आरएसएस, बीजेपी और दक्षिणपंथी खेमे से काफी तीखी प्रतिक्रिया आई है।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, ‘ये हमारे धर्म पर हमला है।’
वहीं बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) पर लिखा, ‘उदयनिधि ने सनातन धर्म को मलेरिया और डेंगू से जोड़ा। उनका मानना है कि न सिर्फ इसका विरोध किया जाए बल्कि इसे खत्म कर दिया जाए। संक्षेप में कहें तो ये भारत के 80 फीसदी लोगोंं के कत्ल का आह्वान है क्योंकि वे सनातन धर्म का पालन करते हैं।’ लेकिन उदयनिधि ने कहा कि उन्होंने समाज के सताए हुए और हाशिये पर डाल दिए गए लोगों की आवाज उठाई है, जो सनातन धर्म की वजह से तकलीफ झेल रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘हम अपनी बात पर कायम हैं और किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाले।’
सनातन पर उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी से उत्तर भारत में सियासी बवाल लेकिन दक्षिण भारत में कैसी प्रतिक्रिया है?
संघ नेताओं की सनातन धर्म की व्याख्या
लोग ये भी सवाल उठा रहे हैं कि उदयनिधि ने सनातन धर्म को कई सामाजिक बुराइयों का जिम्मेदार क्यों ठहराया?
क्या सनातन धर्म से उनका मतलब हिंदू धर्म से था?
क्या हिंदू धर्म की तरह सनातन धर्म भी वर्णाश्रम यानि जाति व्यवस्था और पितृसत्ता का समर्थन करता है?
क्या हिंदू धर्म ‘ब्राह्मणवाद’का पर्याय है?
उदयनिधि के इस बयान के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ नेताओं ने अखबारों से बातचीत में कहा है कि सनातन धर्म दर्शन से जुड़ा पहलू है। ये भारतीय सभ्यता के मूल्यों से जुड़ी शाश्वत जीवनशैली है। साथ ही, संघ ने सनातन को कई बार इसे हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से जोड़ा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं का कहना है कि सनातन धर्म शाश्वत है और चिरकाल से चला आ रहा है। जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है वह इसका एक रूप है। जो लोग इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ रहे हैं उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं है।
अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए संघ से जुड़े एक नेता ने कहा कि ‘ब्राह्रणवाद’ भी अपने आप में एक काल्पनिक अवधारणा है। जो लोग इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ कर देख रहे हैं वो अपनी अज्ञानता और स्वार्थ में ऐसा कर रहे हैं।
संघ नेताओं का कहना है कि भारत में जन्म लेने वाले धर्मों और और उनकी पंरपराएं लोगों के बीच समानता और सह-अस्तित्व की बात करती है जबकि बाहर से आने वाले धर्म भेदभाव और अलगाव की बात करते हैं।
संघ से जुड़े नेताओं का कहना है कि सनातन धर्म में भेदभाव की कोई बात नहीं है।
जबकि उदयनिधि स्टालिन ने अपने भाषण में इस भेदभाव का जिक्र किया है। इसी वजह से वो सनातन धर्म को खत्म किए जाने की बात कर रहे हैं।
हालांकि उन्होंने इस विवाद के बाद अपना रुख नरम करते हुए कहा, ‘मैं ये साफ कर दूं कि मैंने हिंदुत्व और हिंदुओं के खिलाफ कुछ नहीं कहा। मैं उन बुरी प्रथाओं और गैरबराबरी की निंदा करता हूं,जिन्हें सनातन धर्म बढ़ावा देता है। अगर ये शैतानी ताकतें मुझे अपने खिलाफ न बोलने की धमकी देती हैं तो ये नहीं होने वाला। मैं सनातन धर्म पर बार-बार बोलता रहूंगा।’
विशेषज्ञों की राय में सनातन धर्म
फिलहाल इस विवाद को समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि सनातन धर्म क्या है? क्या इसमें भेदभाव जैसी बुराइयां हैं?
पौराणिक कथाओं के विश्लेषक और लेखक देवदत्त पटनायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो जारी कर इसका अर्थ समझाया है।
पटनायक कहते हैं, ‘19वीं सदी में समाज सभी जातियों और महिलाओं में शिक्षा के प्रसार में लगा था। लेकिन खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले रुढि़वादियों ने इसका विरोध किया। ये वो लोग थे जो उन प्राचीन परंपराओं का पालन कर रहे थे जो जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को बढ़ावा दे रही थीं।’
वो बताते हैं, ‘सनातन धर्म का पहला उल्लेख श्रीमदभगवत गीता में मिलता है। इसका मतलब आत्मा के ज्ञान से है,जो शाश्वत है। ये पुनर्जन्म की भी बात करता है और इसे शाश्वत कहता है। सनातन शब्द का इस्तेमाल जैन और बौद्ध धर्म में भी होता है, क्योंकि ये धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। जबकि इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्मों के अर्थ में सनातन का जिक्र नहीं होता है क्योंकि ये पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते। ये याद रखा जाना चाहिए कि सनातन शब्द वेदों से नहीं आया है।’
बीबीसी हिंदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक केशव बलिराम हेडगेवार के जीवनीकार और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा से पूछा कि उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को जाति व्यवस्था समेत कई सामाजिक बुराइयों का जिम्मेदार ठहराया है, इस पर आपकी क्या राय है?
उन्होंने कहा, ‘सनातन प्रगतिशील प्रक्रिया का नाम है। समानता, समरसता और विविधता सनातन धर्म के मूल आयाम हैं। अगर विविधता आयाम नहीं होती तो फिर उपनिषदों में ‘नेति-नेति’ यानी ‘ये भी नहीं, वो भी नहीं’ की बात ही नहीं आती। अगर सनातन धर्म में समानता की प्रवृति नहीं होती तो व्यवस्था से प्रतिकार की बात ही नहीं आती। ‘नेति-नेति’ का सवाल ही नहीं उठता।’
वो कहते हैं,‘समाज में संप्रदायों, जीवन पद्धतियों और विविधताओं का निरंतर प्रवाह चलता रहता है और इसे कोई असहज रूप से नहीं देखता इसलिए सनातन और हिंदू धर्म के बीच भेद करना भी गलत है। क्योंकि हिंदू धर्म की जो मूल आत्मा है वो सनातन धर्म ही है।’
राकेश सिन्हा कहते हैं, ‘गांधी और सनातन धर्म के बीच कोई भेद नहीं थे, गांधी हरिजनों के बीच काम करते थे, हरिजन नाम की पत्रिका निकालते थे, और उनके इन कामों को हिंदू समाज की व्यापक चेतना का समर्थन हासिल था।’
क्या सनातन धर्म भेद-भाव करता है?
राकेश सिन्हा कहते हैं, ‘सनातन धर्म को मलेरिया, डेंगू कहने वाले उदयनिधि स्टालिन को ये पता ही नहीं है सनातन धर्म ही तमिल संस्कृति और भाषा का आधार है।’
वो कहते हैं,’’स्थापित आध्यात्मिक मान्यता है कि तमिल भाषा भगवान शंकर ने अगस्त्य मुनि को सिखाई थी। और ये अगस्त्य मुनि ही थे जिन्होंने तमिल संस्कृति और भाषा के प्रचार के साथ उत्तर और दक्षिण भारत की एकता के लिए काम किया। उदयनिधि जैसे लोग तमिल संस्कृति और भाषा का आधार नहीं जानते। इसलिए इसका विरोध करके भारतीय आत्मा के मूल पर प्रहार कर रहे हैं।’’
लेकिन इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय कहते हैं कि सनातन मतलब आदिकाल से चले आने वाला है। बौद्ध और जैन धर्म भी खुद को सनातन कहते हैं। वेदों में सनातन शब्द नहीं है।
वो कहते हैं, ‘असल में 19वीं और 20वीं सदी में जब हिंदू धर्म के भीतर सुधारवादी आंदोलन चले। इस पर उच्च जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों के समूह ने खुद को ‘सनातनी हिंदू’ कहना शुरू किया। ध्यान दीजिए, यहाँ सनातनी हिंदू का पर्यायवाची नहीं है बल्कि हिन्दू धर्म के भीतर एक समूह है।’
अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले ये लोग सबसे पहले जाति प्रथा का समर्थन करने वाले थे। जब महर्षि दयानंद ने वेदों की ओर लौटो का नारा देकर अंधविश्वासों और कुछ हद तक जातिवाद का विरोध किया तो सनातनी लोगों ने उनका तीखा विरोध किया।’
वो कहते हैं, ‘जब महात्मा गांधी ने छुआछूत विरोधी अभियान चलाया तो उन पर पहले हमले सनातनी लोगों ने किए, जबकि हिंदू समाज का बड़ा हिस्सा इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ खड़ा हुआ था।’
वो कहते हैं ‘सनातनियों ने कई जगहों पर छुआछूत विरोधी आंदोलन का विरोध किया और इस अभियान को चला रहे लोगों पर हमला किया। ध्यान रखिए, महात्मा गांधी के साथ अभियान चला रहे सभी लोग हिंदू थे। हाँ, वे जातिगत भेदभाव का विरोध करने वाले हिंदू थे इसलिए सनातनी उनसे नाराज़ थे।’
आरएसएस और सनातनी
अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘संघ ऐसे ही सनातनी विचारधारा का संगठन रहा है, जिसके उच्च पदों पर लगातार परिवर्तन और सुधारवाद विरोधी ब्राह्मण आसीन रहे, यही वजह रही कि संघ ने संविधान की जगह मनुस्मृति लागू करने की मांग की थी। हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था और आरक्षण की वजह से डॉ। अंबेडकर के खिलाफ भी अभियान चलाया था।’
सनातनी विचारों पर द्रविड़ों-दलितों की राय
दलित मामलों के विशेषज्ञ और द्रविड़ आंदोलन के जानकार चंद्रभान प्रसाद कहते हैं कि सनातन धर्म के बारे में उदयनिधि स्टालिन ने जो कहा है कि वो सौ फीसदी सही है।
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘भगवत गीता में धर्म की व्याख्या जाति अनुक्रम के आधार पर की गई है, हर जाति के धर्म की बात की गई है। इसमें कहा गया कि सभी जातियों को अपने लिए निर्धारित धर्म का पालन करना चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि उन्हें युद्ध इसलिए नहीं लडऩा चाहिए कि ये युद्ध है। उन्हें युद्ध इसलिए लडऩा चाहिए कि क्योंकि वो क्षत्रिय हैं।’
चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, ‘1909 में पहली बार प्रकाशित श्रीमद भगवत गीता के परिचय में स्वामी स्वरूपानंद लिखते हैं कि गीता का सार यही है कि अपने-अपने स्वधर्म या कर्तव्य का पालन करते हुए मुक्ति प्राप्त करना चाहिए।
रामकृष्ण मिशन इसी भगवत गीता का प्रचार करता है। इसमें श्रीकृष्ण ने स्वधर्म की जो बात की है उसे ही आधुनिक हिंदू सनातन धर्म कहते हैं। यानी जाति के आधार पर जो काम बता दिए गए हैं उन्हें ही निभाते हुए मोक्ष प्राप्त किया जाए।’
चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, ‘गीता में वर्णाश्रम व्यवस्था में शामिल सभी वर्णों की बात की गई है। उनकी विशेषता बताई गई है लेकिन शूद्रों के बारे में अपमानजनक लहजे में बात की गई है।’
क्या उदयनिधि ने सनातनियों के नरसंहार की बात कही?
अब तक उदयनिधि के खिलाफ देश के कई हिस्सों में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है। दूसरी ओर, उन्होंंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बार फिर साफ किया है कि उन्होंने कभी भी सनातनियों के नरसंहार की बात नहीं की। उन्होंने ‘सिर्फ ये कहा कि सनातन धर्म एक ऐसा विचार है जो लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटता है। सनातन धर्म को खत्म करने का मतलब मानवता और लोगों के बीच बराबरी का समर्थन करना है।’
सनातन पर उदयनिधि स्टालिन के बयान के बाद दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े लोगों को इस विवाद से राजनीतिक बढ़त बनाने का मौका दिख रहा है। लिहाजा स्टालिन के इस बयान पर सरगर्मियां जारी हैं। माना जा रहा है कि बीजेपी इस मुद्दे को अभी जल्दी ठंडा नहीं होने देगी।
बीजेपी और आरएसएस सनातन धर्म के खिलाफ दिए गए बयान को अपने हक में कैसे इस्तेमाल करती है, इसका उदाहरण दिया विदुथलई चिरुथईगल कच्चि (वीसीके) के संस्थापक थोल थिरुमावलवन ने। वीसीके यानी लिबरेशन पैंथर पार्टी पहले दलित पैंथर्स ऑफ इंडिया के नाम से जानी जाती थी।
‘द हिंदू’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि वो पिछले 30 साल से सनातन धर्म के खिलाफ बोलते रहे हैं।
चेन्नई में उन्होंने कहा, ‘हिंदुत्व और संघ परिवार की राजनीति पर हमले करते वक्त उन्होंने जानबूझ कर सनातन धर्म का इस्तेमाल किया, ताकि संघ परिवार उन्हें हिंदू विरोधी कह कर राजनीतिक फायदा न ले सके।’
उन्होंने कहा, ‘हिंदुत्व, हिंदूवाद और सनातन धर्म के अलग-अलग मायने हैं। सनातन धर्म आर्यों के धर्म (आज के संदर्भ में हिंदू धर्म) का मूल है और गैर-बराबरी इसका आधार है। इसमें भेदभाव है और इसमें सामाजिक स्थिति इस बात से तय होती है कि आप किस वर्ण या जाति में पैदा हुए हैं।’
बहरहाल, अब यह पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा बन गया है जिसका इस्तेमाल बीजेपी इंडिया गठबंधन को घेरने के लिए कर रही है। (bbc.com/hindi)
जर्मनी में बहुत से लोग काम करने की इच्छा नहीं रखते. इसकी वजह है सरकार की तरफ से मिलने आर्थिक सहायता में बढ़ोत्तरी. यह नतीजे एक सर्वे में सामने आए हैं.
जर्मन सरकार ने कहा है कि वह लोगों को मिलने वाली मदद बढ़ाने जा रही है ताकि बच्चों में गरीबी दूर की जा सके और लोगों को महंगाई से राहत मिले। हालांकि सरकार ने यह भी कहा है कि वह नहीं चाहती कि लोग इसकी वजह से काम करना बिल्कुल छोड़ दें। इस तरह की आर्थिक मदद का प्रावधान 2005 में लागू किया गया था। सिटिजन मनी कही जाने वाली यह सहायता जर्मनी के 55 लाख से ज्यादा बेरोजगारों को दी जाती है। फिलहाल यह प्रति व्यक्ति 502 यूरो (करीब 45,000) रुपये है जिसे अगले साल बढ़ाकर 563 यूरो (करीब 50,000) कर दिया जाएगा। जिन्हें यह सहायता मिलती है उन लोगों का रहने का किराया और स्वास्थ्य बीमा भी सरकार के जिम्मे है।
परिवारों को सहायता
सरकारी मदद को बढ़ाने इस फैसले के साथ ही, कम आय वाले परिवारों को साल 2025 से ज्यादा वित्तीय सहायता मुहैया कराए जाने का निर्णय भी हो चुका है। परिवारों को पहले बच्चे के पैदा होने के बाद 636 यूरो हर महीने मिलेंगे और उसके बाद हर बच्चे की पैदाइश पर 530 यूरो (करीब 47000 रुपये) दिए जाएंगे। फिलहाल परिवार में हर बच्चे को 250 यूरो प्रतिमाह दिए जाते हैं।
सर्वे करने वाली कंपनी आईएनएसए के मुताबिक, 12।4 यूरो प्रति घंटे की न्यूनतम आय या 1450 यूरो प्रतिमाह तक कमाने वाले 52 फीसदी जर्मन नागरिक मानते हैं कि काम करने की कोई जरूरत नहीं है। इसकी वजह यह है कि न्यूनतम आय पर फुलटाइम काम करने वाले लोगों की आय और सरकारी सहायता पाने वालों से कोई खास ज्यादा नहीं है। यह सर्वे बिल्ड अखबार में छपा है।
सरकारी मदद पर सवाल
1005 लोगों पर किए गए इस सर्वे में लोगों की राय इस बात पर बंटी हुई है कि सरकार को जन कल्याण के नाम पर पैसे देने चाहिए या नहीं। 45 फीसदी लोग इसके समर्थक हैं जबकि 44 फीसदी इसके विरोधी हैं। वित्त मंत्री क्रिस्टियान लिंडनर ने बच्चों को मिलने वाले भत्ते पर एक प्रेजेंटेशन देते हुए कहा कि सरकारी मदद काम ना करने की वजह नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘हमारी चिंता है कि काम करने का प्रोत्साहन बना रहे।’ उनका यह भी कहना था कि कुछ भत्ते पाने के लिए रोजगार जरूरी होगा क्योंकि माता-पिता का काम ना करना बच्चों में गरीबी की एक बड़ी वजह है।’
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जी20 सम्मेलन में शामिल नहीं हो रहे हैं। भारत ने इस बात को ज्यादा तूल नहीं दिया और कहा है कि उसके और चीन के संबंध पूरी तरह सामान्य हैं। लेकिन कई विशेषज्ञ इस बात के अलग मायने निकाल रहे हैं।
चीन में काम कर रहे विदेशी कूटनीतिज्ञों ने कहा है कि चीन की यह रणनीति पश्चिमी देशों और उनके सहयोगियों से दूरी बनाने का संकेत है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कम से कम दस विदेशी राजनयिकों ने कहा है कि चीन उन्हें संवाद का सीधा रास्ता नहीं दे रहा है और स्थानीय अधिकारियों से सूचनाएं हासिल करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है।
एक चलन का प्रतीक
नाम प्रकाशित ना करने की शर्त पर इन राजनयिकों का कहना है कि 2023 में यह चलन और ज्यादा बढक़र सामने आया है, जब कोविड महामारी के दौरान लगा दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन खत्म करके चीन ने अपने बाजार और अर्थव्यवस्था को दूसरे देशों के लिए खोलने का ऐलान किया था। लॉकडाउन के दौरान चीन ने राजनयिक गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण बरता था।
हालांकि चीनी विदेश मंत्रालय ने इस बारे में टिप्पणी नहीं की लेकिन विदेश नीति विश्लेषक रायन नीलम कहते हैं कि शी के सख्त शासन के दौरान चीनी अधिकारी विदेशियों से संवाद और संपर्क करने को लेकर अत्यधिक सचेत हो गये हैं।
हांग कांग में ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिध रह चुके नील फिलहाल विदेश नीति पर काम करने वाले ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट के साथ काम कर रहे हैं। वह कहते हैं, ‘इस (सख्ती) का असर ऊपर से नीचे तक हुआ है और निचले स्तर के अधिकारी, ब्यूरोक्रैट और राजनयिक भी लिखित नियमों से इधर-उधर जाने के कम इच्छुक हो गये हैं। अगर सब कुछ इस तरह औपचारिक रूप से प्रबंधित हो जाता है तो अनौपचारिक संवाद की गुंजाइश कम हो जाती है। अगर आपको व्यवस्था के वरिष्ठ नीति निर्माताओं तक कम पहुंच मिलती है तो समझौते और समानता के रास्ते खोजने के मौके भी कम हो जाते हैं।’
लगातार बढ़ता तनाव
चीन और पश्चिमी देशों के बीच हाल के सालों में संबंध लगातार तनावपूर्ण होते गये हैं। यूक्रेन युद्ध को लेकर चीन का रूस के साथ खड़ा होना इसकी एक बड़ी वजह रहा है। इसके अलावा ताइवान मुद्दे पर पश्चिमी देशों की सरगर्मी और संवेदनशील तकनीकों को लेकर होने वाले व्यापार पर प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर चीन की आलोचना करने के कारण संबंधों में तनाव बढ़ा है।
शी भारत क्यों नहीं जा रहे हैं, इसकी चीन ने ने कोई वजह नहीं बतायी है। दस साल पहले चीन का राष्ट्रपति बनने के बाद शी अब तक हर जी20 बैठक में शामिल हुए हैं। यह पहली बार है जब उन्होंने जी20 की बैठक में हिस्सा लेने से इनकार किया है। उसने बस इतना कहा है कि 9-10 सितंबर को होने वाली बैठक में चीन के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व राष्ट्रपति शी नहीं बल्कि प्रधानंत्री ली कियांग करेंगे।
इसकी एक वजह भारत के साथ चीन के संबंधों में तनाव को भी माना जा रहा है। 2019 में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़पें होने के बाद से दोनों देश लगातार एक दूसरे के खिलाफ कूटनीतिक और व्यापारिक कार्रवाइयां करते रहे हैं। हालांकि भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हो चकी है लेकिन अब तक किसी भी तरह का समझौता नहीं हो पाया है। इस बीच भारत ने चीनी कंपनियों पर अपने यहां कड़े प्रतिबंध लगाये हैं और छापेमारी जैसी कार्रवाइयां भी की हैं। दोनों देशों ने एक दूसरे के पत्रकारों का वीजा रद्द करने जैसे सख्त कदम भी उठाये हैं।
इस साल कम किए दौरे
कई विश्लेषक मानते हैं कि चीन ने इस साल अंतरराष्ट्रीय दौरों को काफी कम किया है और राष्ट्रपति शी उन्हीं देशों में गये हैं जिनके साथ चीन के संबंध दोस्ताना हैं। इस साल शी सिर्फ दो बार देश से बाहर गये हैं। एक बार वह रूस में व्लादिमीर पुतिन से मिलने रूस गये थे और दूसरी बार पिछले महीने ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दक्षिण अफ्रीका गये थे।
इसकी तुलना में 2022 में चीनी राष्ट्रपति का कार्यक्रम खूब व्यस्त रहा था। जबकि चीन और बाकी दुनिया में भी कोविड के कारण कई तरह के यात्रा प्रतिबंध लगे हुए थे, तब भी चीनी राष्ट्रपति ने पांच देशों का दौरा किया था। इससे पहले 2019 में कोविड के आने से पहले शी ने एक दर्जन देशों की यात्रा की थी।
वॉशिंगटन स्थित थिंकटैंक स्टिम्सन सेंटर में चाइना प्रोग्राम के निदेशक युन सुन कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में ना जाने को चीन उन देशों के खिलाफ लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है, जिनके साथ उसके संबंध अच्छे नहीं है।
युन सुन कहती हैं, ‘संपर्क और संवाद को चीन असहमति रखने वाले देशों का व्यवहार बदलने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। मैंने यह भी सुना है कि चीन में पश्चिमी राजनयिकों को पहुंच देने पर भी काफी सख्ती बढ़ायी गई है।’
पायल भुयन
क्या खाना आपके मूड को प्रभावित करता है? क्या खाना आपके सोचने के तरीके में बदलाव ला सकता है? हमारे आहार और हमारे मानसिक स्वास्थ्य के बीच का रिश्ता समझना थोड़ा मुश्किल है।
अब तक इस विषय पर हुए शोध कहते हैं कि हम क्या खाते हैं और कैसा महसूस करते हैं, इन दोनों के बीच गहरा संबंध है।
खाना आपकी अच्छी सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है। आज कल सेलिब्रिटी भी अपने अपने डायट प्लान लेकर आते हैं। एक अनुमान के मुताबिक डायट खाने का लगातार बढ़ता बाज़ार करीब 250 बिलयन डॉलर का उद्दयोग बन चुका है।
वजऩ कम करने की कोशिश कर रहे दो हजार लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाता चला कि इनमें से जिन लोगों ने अपना वजन थोड़ा भी घटाया, उनमें से 80 फीसदी लोग में डिप्रेशन के लक्षण पाए गाए।
लेकिन ऐसा क्यों हुआ? क्या इसका कारण डायट के दौरान लिए जाना वाल भोजन है।
भूख का हमारे दिमाग पर असर
भूखे रहना हमारे दिमाग पर असर डाल सकता है। भूख से कई बार गुस्सा भी आता है। यानी आपको भूख भी लग रही होती है जिससे आपको गुस्सा आता है। अंग्रेजी में इसे ‘हैंग्री’ कहते हैं।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि पर्याप्त पोषक तत्वों और कैलोरी के बिना हमारे मस्तिष्क को विकसित होने और ठीक से काम करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन क्या रोजमर्रा के जीवन में कुछ समय के लिए भूखा रहना हमारे सोचने के तरीके, हमारे मूड को प्रभावित कर सकता है?
कॉरपोरेट जॉब करने वालों और मार्केटिंग प्रोफेशनल रविकांत कहते हैं, ‘अगर मुझे जोरों की भूख लगी हो तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूं। मैं कभी व्रत रख नहीं सकता क्योंकि मुझे बहुत भूख लगती है और मेरा मूड खराब हो जाता है। अगर मैं अपनी एक भी मील भूल जाऊं तो मैं अपने आसपास सब पर गुस्सा होने लगता हूं। जब मैं 10वी-12वीं कक्षा में था तब मुझे इस बात का इल्म होने लगा कि अगर मेरा पेट नहीं भरा है तो मुझे गुस्सा आता है।’
खाने का इमोशन्स पर असर
हमारी सोच पर हमारे इमोशन्स पर हावी रहते हैं। ख़ासकर तब जब हम अपनी भावनाओं को समझते और स्वीकारते नहीं हैं। अगर हमें पता हो कि हमारी भावनाएं क्यों और किस वजह से आ रही हैं तो हम उन्हें नियंत्रण में कर सकते हैं।
मनोवैज्ञानिक और सीनियर कंसल्टेंट निशा खन्ना बताती हैं, ‘इंसान की तीन बुनियादी जरूरतें होती हैं, भूख/प्यास, सोना और शारीरिक जरूरतें होती हैं। अगर इन तीनों में से कोई एक भी पूरी नहीं होती तो ये हमारे मेंटल हेल्थ पर असर डाल सकती हैं। हम कितने घंटे भूखे रहते हैं इसका सीधा असर हमारे दिमाग से है। रिसर्च कहती है कि नाश्ता बहुत जरूरी है, क्योंकि सुबह जिस ऊर्जा की हमें जरूरत होती है, वो इससे पूरी हो जाती है। खाना हमारे फैसले लेने की शक्ति, याददाश्त, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर असर डालता है।’
खाना हमारे मूड को कैसे प्रभावित करता है?
साल 2022 में की गई एक स्टडी बताती है कि खराब मूड अक्सर हमें निराशावादी बना देता है, जो हमारी सोच को और ज़्यादा नकारात्मक बना सकता है। अगर आपको इस चीज़ का इल्म ना हो कि आपका मूड कितना खऱाब है तो आपके गलत फैसले लेने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन इसका इस बात से क्या लेना-देना कि आपने हाल में क्या खाया है?
बायोलॉजिकल केमेस्ट्री
मुंबई में रहने वाली 35 साल की शिल्पा एक गृहणी हैं। वो प्री-डायबटिक हैं, लेकिन माहवारी के दौरान होने वाल दर्द कम करने और मूड ठीक रखने के लिए वो आइसक्रीम और डार्क चॉकलेट खाती हैं।
शिल्पा कहती है, ‘जिस पल में आइसक्रीम या फिर डार्क चॉकलेट खाती हूं, उस समय मैं अचानक से बहुत खुश हो जाती हूं। जैसे सब कुछ अच्छा हो रहा है। पीरियड्स के शुरुआती दिनों में मुझे बहुत दर्द होता है , पर ये दोनो चीज़े मुझे वो दर्द भूलने में मदद करती हैं। ये जानते हुए भी कि मैं प्री-डायबटिक हूं, मैं आइस्क्रीम और चॉकलेट नहीं छोड़ सकती, हां मैं इन्हें खाने के बाद वॉकिंग ज़रूर कर लेती हूं।’
जानी मानी डायटिशियन और वन हेल्थ कंपनी की फाउंडर डॉक्टर शिखा शर्मा खाने और हमारे मूड के बीच एक गहरा रिश्ता बताती हैं।
वो कहती हैं, ‘खाना एक बायोलॉजिकल केमेस्ट्री है। खाना हमारे हॉर्मोन्स को ट्रिगर करता है। कई लोगों में ट्रिगर ईटिंग हैबिट्स होती हैं। आप खुश, गुस्सा, उदास हैं या फिर घबराहट हो रही है तो इस ट्रिगर की वजह से आप बार-बार वो चीज खाते हैं जो आपको पसंद है। चीनी, चीज, शराब, मशरूम, दूध ये अलग अलग हॉर्मोन्स को ट्रिगर करते हैं।’
साल 2022 में मनोवैज्ञानिक निएंके जॉन्कर और उनके साथियों ने नीदरलैंड के ग्रोनिगेन विश्वविद्यालय में 129 महिलाओं पर एक अध्ययन किया था।
इनमें से आधी महिलाओं को 14 घंटो के लिए उपवास पर रहने के लिए कहा गया। इसके बाद इन सारी महिलाओं को कितनी भूख लगी, मनोदशा, खाने की आदतों के बारे में सवाल पूछे गए।
उन्होंने पाया कि जिन महिलाओं ने खाना नहीं खाया था, उन्होंने अधिक नकारात्मक जवाब दिए, उनमें तनाव, क्रोध, थकान और भ्रम की स्थिति भी ज़्यादा थी। उनमें जोश की भी कमी थी।
जॉन्कर कहते हैं, ‘ये कोई मामूली बात नहीं है। भूखी महिलाओं ने औसतन उन लोगों की तुलना में अपने अंदर दोगुना गुस्सा महसूस किया, जिन्हें भूख नहीं लगी थी।’
जंक फूड और ‘स्ट्रेस ईटिंग’
डॉयटिशियन डॉक्टर शिखा शर्मा के मुताबिक़, हमारे क्रोध और भूख का केंद्र मस्तिष्क में पास-पास है। जब एक पर प्रभाव पड़ता है तो दूसरा खुद ब खुद एक्टिव हो जाता है।
ब्रैंकिंग प्रोफ़ेशनल और दिल्ली की रहने वाली प्रियंका कहती हैं कि वो ‘स्ट्रेस ईटिंग’ करती हैं, ‘जब मुझे तनाव होता है तो खाना मुझे सुकून देता है। दफ्तर में कई बार मैंने महसूस किया कि काम ज़्यादा होने पर मेरा जंक खाना बढ़ जाता है। जिससे अब मेरा वजन बहुत ज़्यादा बढ़ रहा है। अब ये उलटे मेरा मेंटल हेल्थ पर असर डाल रहा है।’
मनोवैज्ञानिक अरुणा ब्रूटा का मानना है कि मन और तन का रिश्ता बहुत जुड़ा हुआ है, और इन दोनों को जोड़ कर जो रख सके वो आपका खाना है।
वो कहती हैं, ‘जब आप लंबे समय तक खाना नहीं खाते हैं तब आपका बल्ड शुगर लेवल लो हो जाता है, आपकी क्रिएटिविटी ख़त्म होने लगती है, आपकी सोच में क्रोध, घबराहट ज़्यादा होता है। सब्र भी खत्म होने लगता है। शरीर में सोडियम की मात्रा का भी संतुलन जरूरी है। जिन लोगों का सोडियम ज्यादा होता है उन्हें उच्च रक्तचाप की शिकायत रहती है, उन्हें गुस्सा जल्दी आता है, जिनका शुगर लो होता है उन्हें भी गुस्सा जल्दी आता है।’
दिल्ली में रहने वाले रविकांत कहते हैं कि जब उन्हें भूख लगी होती है तब वो कोई भी फैसला लेने से बचते हैं। वो कहते हैं, ‘मैं उस समय कोई बड़े फैसले नहीं लेता, मेल्स का रिप्लाई नहीं करता। मीटिंग में जाने से पहले भी मेरी कोशिश रहती है कि मैं खाना खा कर जाऊं, क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं भूखे रहने से बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ा हो जाता हूं।’
डॉक्टर शिखा शर्मा कहती हैं, ‘अगर आपको भूख लगी है तो बहुत मुमकिन है कि आप सही फैसले नहीं ले पाएं, जो काम कर रहे हैं उस पर ध्यान ना लगा पाएं। आप काम जल्द ख़त्म करने की कोशिश करेंगे ताकि आप जल्द से जल्द कुछ खा सकें। जब हम भूख, गैस, एसिडिटी की गिरफ़्त में आ जाते हैं या फिर शराब के नशे में होते हैं तो हमारी समझने की क्षमता बहुत हद तक कम हो जाती है।’
कैसे रखें खाने और स्वास्थ्य में लय
पौष्टिक खाना खाने से आप तंदुरुस्त महसूस करेंगे। इसके लिए आपको बहुत बदलाव की ज़रूरत नहीं है।
न्यूट्रिशयनिस्ट और डाइटिशियन डॉक्टर शिखा शर्मा कहती हैं, शरीर के सर्कैडियन रिदम को पहचाने और उसके हिसाब से खाना खाएं।
दो मील के बीच ज्यादा गैप ना दें।
पर्याप्त पानी पीएं
मौसम और उम्र के हिसाब से खाना खाएं।
व्यायाम को दिनचर्या का एक नियम बना लें।
इंटरमिटेंट फास्टिंग और मेंटल हेल्थ
डॉक्टर शिखा शर्मा कहती हैं, ‘शरीर की एक सर्कैडियन लय होती है। जिसके हिसाब से आपका शरीर काम करता हैं। दिन के वक्त इंसान का शरीर खाना पचाता है और बाकी बचे समय में को खुद को रिपेयर करता है। शरीर का सर्कैडियन रिदम सूरज की रोशनी के हिसाब से काम करता है। सूर्य अस्त के बाद खाना नहीं खाना आयुर्वेद में भी अच्छा माना गया है। लेकिन एक उदाहरण के तौर पर मान लीजिए की अगर सूर्य उदय सुबह 530 बजे हो रहा है तो आपके शरीर का सर्कैडियन रिदम सबह 8 से 830 बजे के बीच शुरू हो जाएगा। इसका पीक दोपहर के 12 बजे आएगा और इसमें शाम 6 बजे के बाद कमी आ जाएगी।’
‘आजकल लोग बिना शरीर और भोजन के पीछे का विज्ञान समझे, दिन में 2 बजे तक नहीं खाते हैं। ऐसा करने से आप अपने शरीर का नुकसान कर रहे हैं। ज़्यादा देर तक नहीं खाने से एसिड आपके पेट की लाइनिंग को नुकसान पहुंचाना शुरू करती है, आपको गैस की समस्या हो सकती है, आप चिड़चिड़े हो सकते हैं। आपको ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है। मैं कहूंगी कि अगर आप इंटरमिटेंट फास्टिंग कर भी रहे हैं तो सुबह 11-11.30 तक कुछ खा लीजिए।’ (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के.पालीवाल
गांधी से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तो क्या आधुनिक भारत की किसी और शख्शियत से भी उनकी तुलना असंभव है क्योंकि गांधी की तरह किसी अन्य भारतीय ने बिना विश्व भ्रमण किए पूरी दुनिया और संयुक्त राष्ट्र संघ में जो अहमियत पाई है वैसे किसी दूसरी शख्शियत का उनके आसपास पहुंचना निकट भविष्य में भी यदि असंभव नहीं तो अत्यंत मुश्किल है। इसलिए इस लेख का उद्देश्य गांधी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना नहीं अपितु महात्मा गांधी के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अनुराग जानने समझने की कोशिश करना है। गांधी और सर्वोदय विचार के अनुयाइयों में कुछ लोग यह मानते हैं कि गुजरात से आने के कारण प्रधानमंत्री गुजरात के शिखर पुरुष गांधी को सम्मान देते हैं, हालांकि अधिकांश गांधी विचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जब तब की गई गांधी की प्रशंसा को नाटक मानते हैं। ऐसे गांधी विचारकों की संख्या पिछ्ले एक महीने में तेजी से बढ़ी है जब से प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में केन्द्र सरकार के रेल मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के सक्रिय सहयोग से गांधी और सर्वोदय विचार के प्रचार प्रसार की शीर्ष संस्था सर्व सेवा संघ परिसर को बुल्डोजर से उसी तरह ध्वस्त किया है जैसे बड़े अपराधियों के मामलों में किया जा रहा है।
महात्मा गांधी के प्रति सम्मान का भाव प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा तब दिखाया था जब उन्होंने राष्ट्रव्यापी स्वच्छता अभियान शुरु करते समय गांधी का जिक्र किया था। उसके बाद कुछ और महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उन्होंने देश विदेश में महात्मा गांधी की सकारात्मक चर्चा की है।संयुक्त राष्ट्र संघ में गांधी की मूर्ति को भी उन्होंने योग दिवस कार्यक्रम की शुरुआत पर नमन किया था। चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान उनको साबरमती आश्रम में व्यक्तिगत स्तर पर भ्रमण कराना भी एक तरह से गांधी के प्रति श्रद्धा का प्रर्दशन था। हालांकि यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री का रहन सहन सादगीपूर्ण नहीं है। उनकी भाषा शैली में गांधी जैसी विनम्रता नहीं है। उनके विचारों और आचरण में सर्व धर्म समभाव और सांप्रदायिक सौहार्द्र के वैसे पवित्र तरल भाव नहीं दिखते जो गांधी के व्यक्तित्व में अंदर तक रचे बसे थे और उनकी कथनी और करनी में भी अक्सर बहुत अंतर रहता है।
प्रधानमंत्री के अनन्य शुभचिंतकों की बात करें तो ऐसा लगता है कि उनमें बहुतेरों के मन में गांधी के प्रति भयंकर नफरत है जो गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति भक्ति की हद तक प्रकट होती है। विश्व के हर मामले में ट्वीट के जरिए अपने अथाह ज्ञान का पल पल परिचय देने वाले प्रधानमंत्री अपने प्रशंसकों की इस नफरत से परिचित नहीं हैं यह मानने का कोई कारण नजर नहीं आता लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी कड़े शब्दों में ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी तक नहीं दी।
इससे यह आभास होता है कि उनके मन में गांधी के प्रति वैसी श्रद्धा नहीं है जैसी गांधी के के प्रति जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, मोरारजी देसाई, अब्दुल कलाम, खान अब्दुल गफ्फार खान, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग और आंग सांग सूकी जैसी विभूतियों में थी और है। इसका एक प्रमाण यह भी है कि प्रधानमंत्री ने गुजरात में जो सम्मान स्टेचू ऑफ यूनिटी के माध्यम से सरदार पटेल को दिया है वैसा कुछ स्टेचू ऑफ ट्रूथ या स्टेचू ऑफ नॉन वायलेंस के माध्यम से गांधी को नहीं दिया जबकि उनकी सरकार के पास राष्ट्रपिता को समर्पित करने के लिए गांधी 150 और अमृत काल सरीखे दो दो बड़े ऐतिहासिक अवसर आए थे। इन दोनों ऐतिहासिक अवसरों पर मोदी सरकार ने कोई ऐतिहासिक महत्व का कार्य न कर एक तरह से कागजी खानापूर्ति ही की है। बनारस में सर्व सेवा संघ की साठ साल पुरानी गांधी, विनोबा और जे पी की साझी सर्वोदय विरासत पर बुलडोजर चलाने ने प्रधान मंत्री के मन में गांधी के प्रति सतही भावना को सरेआम साफ कर दिया है।
संजय श्रमण
जिद्दू कृष्णमूर्ति ने जोर देकर कहा है कि मनुष्यता का मनोवैज्ञानिक क्रमविकास अर्थात इवोल्यूशन हुआ ही नहीं है। इसी तरह की एक और बात अभी के एक जि़ंदा अमरीकी दार्शनिक केन विल्बर्स भी करते हैं।
हाल ही में मकबूल हो रहे युवाल नोवा हरारी भी कह रहे हैं कि टेक्नोलोजी जितनी तेजी से बदल रही है उसके हिसाब से मनुष्य की मानवीय क्षमताएं, संवेदनाएं और शक्तियां नहीं बढ़ रही हैं। जीवन के अधिकाँश प्राचीन तौर तरीके अब आउट डेटेड हुए जा रहे हैं। लेकिन इंसानों के बीच की आदिम घृणा और असुरक्षाएं कम होने की बजाय नए नये कलेवरों में सामने आ रही हैं।
टेक्नोलोजी के साथ मनोविज्ञान और धर्म का पर्याप्त विकास नहीं हो रहा है इसीलिये अब नये ‘टेक्नोरिलीजन’ मैदान संभालने वाले हैं जो अगले कुछ दशकों में नीति, नैतिकता और सौन्दर्यबोध आदि की सारी परिभाषाएं बदल डालेंगे।
इस बदलाव से तीसरी दुनिया के लोग अर्थात लातिन अमेरिका और दक्षिण एशिया के अधिकाँश गरीब देश वैश्विक विकास और सभ्यता की दौड़ में अचानक से बहुत पीछे छुट जायेंगे।
केन विल्बर्स कृष्णमूर्ति की बात को एक दूसरे ढंग से भी रखते हैं। वे कहते हैं कि अधिकाँश समाज और संस्कृतियाँ सिर्फ तकनीक और विज्ञान के सहारे उन सुविधाओं का उपभोग करने लगी हैं जो कुछ सभ्य और लोकतांत्रिक (तुलनात्मक रूप से) देश उपभोग करते आये हैं। लेकिन चूँकि इन समाजों ने अपनी जमीन पर सामाजिक, राजीनीतिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक पुनर्जागरण की लड़ाई नहीं लड़ी इसलिए ऊपर ऊपर से वे सभ्य नजर आते हैं लेकिन अंदर से वे एकदम बर्बर और आदिम हैं।
सीरिया, अफगानिस्तान का पिछले कुछ सालों का उदाहरण हमारे सामने है। सीरिया, अफगानिस्तान से पलायन करते लोगों को मालदार अरब मुल्क मिलकर संभाल सकते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे। वे रात भर की अय्याशी में लाखों डालर उड़ा देंगे लेकिन अपने ही धर्म के लोगों को बचाने के लिए सामने नहीं आयेंगे।
हालाँकि ठीक यही सवाल उन तथाकथित सभ्य और लोकतांत्रिक यूरोपीय या अमरीकी समाजों पर भी लागू होता है जिन्होंने पूरे अरब सहित लेबनान, अफगानिस्तान और सीरिया में आग लगाईं हुई है, लेकिन शरणार्थियों की दुर्दशा के सन्दर्भ में यूरोप की तुलना में अरब समाज की बेरुखी बहुत पीडि़त करती है।
भारत में भी इसी तरह की बर्बादी का इंतज़ाम कश्मीर, आसाम और बंगाल में शुरू हो गया है। मनुष्यों को एकदूसरे की चिंताओं और तकलीफों का जऱा भी एहसास नहीं है। दो चार शब्दों के इधर उधर हो जाने से कोई राष्ट्रवादी हो जाता है कोई विदेशी हो जाता है कोई घुसपैठिया हो जाता है।
इन शब्दों के खेल में मीडिया ने पूरा चिडिय़ाघर खोला हुआ है। हर तरह का मनोरंजन मौजूद है देश के जेहन को बर्बाद करने में सरकार, कारपोरेट और धर्म तीनों ने गजब का निवेश किया हुआ है।इस निवेश की सफलता के चिन्ह भी नजऱ आने लगे हैं। ऐसे में हरारी, केन विल्बर्स और कृष्णमूर्ति शेष मनुष्यता के लिए न सही तो कम से कम भारत के लिए बिलकुल सही साबित होते हैं।
भारत को तत्काल नए धर्म नयी सभ्यता और नयी नैतिकता की जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य से नयी नैतिकता की बजाय पुराने श्मशानों में से वेदान्त का भूत फिर से जि़ंदा किया जा रहा है।
चंदन कुमार जजवाड़े
लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के पीछे कई तरह के तर्क दिए जाते रहे हैं। दावा किया जाता है कि इससे देश के विकास कार्यों में तेजी आएगी।
चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होते ही सरकार कोई नई योजना लागू नहीं कर सकती है। आचार संहिता के दौरान नए प्रोजेक्ट की शुरुआत, नई नौकरी या नई नीतियों की घोषणा भी नहीं की जा सकती है और इससे विकास के काम पर असर पड़ता है।
यह भी तर्क दिया जाता है कि एक चुनाव होने से चुनावों पर होने वाले खर्च भी कम होगा। इससे सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ट्यूटी से भी छुटकारा मिलेगा।
भारत में साल 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव एक साथ ही होते थे। साल 1947 में आजादी के बाद भारत में नए संविधान के तहत देश में पहला आम चुनाव साल 1952 में हुआ था।
उस समय राज्य विधानसभाओं के लिए भी चुनाव साथ ही कराए गए थे, क्योंकि आजादी के बाद विधानसभा के लिए भी पहली बार चुनाव हो रहे थे। उसके बाद साल 1957, 1962 और 1967 में भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ ही हुए थे।
यह क्रम पहली बार उस वक्त टूटा था जब केरल में साल 1957 के चुनाव में ईएमएस नंबूदरीबाद की वामपंथी सरकार बनी।
इस सरकार को उस वक्त की केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लगाकर हटा दिया था। केरल में दोबारा साल 1960 में विधानसभा चुनाव कराए गए थे।
संविधान में क्या संशोधन जरूरी होगा
साल 2018 में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त रहे ओपी रावत के मुताबिक साल 1967 के बाद कुछ राज्यों की विधानसभा जल्दी भंग हो गई और वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, इसके अलावा साल 1972 में होनेवाले लोकसभा चुनाव भा समय से पहले कराए गए थे।
साल 1967 के चुनावों में कांग्रेस को कई राज्यों में विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा (उस वक्त उड़ीसा) जैसे कई राज्यों में विरोधी दलों या गठबंधन की सरकार बनी थी। इनमें से कई सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं और विधानसभा समय से पहले भंग हो गई थी।
इस तरह से साल 1967 के बाद बड़े पैमाने पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने का सिललिला टूट गया। भारत की मौजूदा केंद्र सरकार इसे दोबारा एक साथ कराना चाहती है।
इसमें समस्या यह है कि अब भारत में कांग्रेस जैसी कोई एक पार्टी नहीं है, जिसकी केंद्र के साथ ही ज़्यादातर राज्यों में अपनी सरकार हो। ऐसे में केंद्र और राज्य से बीच सामंजस्य आसान नहीं होगा।
ओपी रावत साल 2015 में चुनाव आयोग में ही नियुक्त थे। उनके मुताबिक उसी दौरान केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग से पूछा था कि क्या लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना व्यावहारिक है और इसके लिए क्या कदम उठाए जाने जरूरी हैं?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का क्या कहना है?
ओपी रावत का कहना है, ‘चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को बताया था कि दोनों चुनाव साथ कराना संभव है। इसके लिए सरकार को चार काम करना होगा। इसके लिए सबसे पहले संविधान के 5 अनुच्छेदों में संशोधन जरूरी होगा। इसमें विधानसभाओं के कार्यकाल और राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रावधानों को बदलना होगा।’
इसके अलावा निर्वाचन आयोग ने बताया था कि जन प्रतिनिधित्व कानून और सदन में अविश्वास प्रस्ताव को लाने के नियमों को बदलना होगा। इसके लिए ‘अविश्वास प्रस्ताव’ की जगह ‘रचनात्मक विश्वास प्रस्ताव’ की व्यवस्था करनी होगी।
यानी अविश्वास प्रस्ताव के साथ यह भी बताना होगा कि किसी सरकार को हटाकर कौन सी नई सरकार बनाई जाए, जिसमें सदन को विश्वास हो, ताकि पुरानी सराकर गिरने के बाद भी नई सरकार के साथ विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल पांच साल तक चल सके।
निर्वाचन आयोग ने इस तरह के चुनाव के लिए कुल 35 लाख ईवीएम की जरूरत बताई थी और इसके लिए नए ईवीएम की खरीदारी की जरूरी है।
भारत में इस्तेमाल होने वाले एक ईवीएम की कीमत करीब 17 हज़ार और एक वीवीपीएटी की भी कीमत करीब इतनी ही है। ऐसे में ‘एक देश एक चुनाव के लिए’ करीब 15 लाख नए ईवीएम और वीवीपीएटी की जरूरत होगी।
ओपी रावत के मुताबिक अगर चुनाव आयोग को आज के हिसाब से करीब बारह लाख़ अतिरिक्त ईवीएम और वीवीपीएटी की जरूरत होगी तो इसे बनवाने में एक साल से ज्यादा का समय लग सकता है।
भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने बीबीसी को बताया है कि अगर लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाएं तो इसके लिए मौजूदा संख्या से तीन गुना ज्यादा ईवीएम की जरूरत पड़ेगी।
केंद्र और राज्य के बीच किस तरह का
टकराव हो सकता है?
लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान के जानकार पीडीटी आचारी के मुताबिक एक देश एक चुनाव का मुद्दा व्यवहारिक है ही नहीं। इसके लिए एक आधार यह होना चाहिए कि देश की सारी विधानसभाएं एक साथ भंग हों, जो कि संभव नहीं है।
पीडीटी आचारी कहते हैं, ‘राज्य की विधानसभा समय से पहले भंग करने का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है, केंद्र के पास नहीं। केंद्र ऐसा तभी कर सकता है, जब किसी वजह से किस राज्य में अशांति हो या ऐसी वजह मौजूद हो कि राज्य की विधानसभा को केंद्र भंग कर सके और ऐसा सभी राज्यों में एक साथ नहीं हो सकता।’
उनका कहना है कि किसी भी राज्य की विधानसभा को कार्यकाल पूरा किए बिना भंग करने से एक संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा। यह संघीय ढांचे के खिलाफ होगा। यह संविधान के मूलभूत ढांचे के खिलाफ होगा, जिसे छेडऩे का अधिकार संसद के पास नहीं है।
भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का मानना है कि चुनाव एक साथ कराने का मतलब है कि आपको स्थानीय निकायों के चुनाव भी एक साथ कराने होंगे। ऐसे में जनता एक बार में एक बटन दबाए या तीन दबाए, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है।
उनका कहना है कि सभी चुनावों में मतदाता, मतदान केंद्र, ईवीएम, सुरक्षा जैसी चीजें तो समान होती हैं, लेकिन ग्राम पंचायत या नगरपालिका/नगर निगम के चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का काम है, जो केंद्र से बिल्कुल अलग है।
ऐसी स्थिति में भी केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों को लेकर बहस छिड़ सकती है और यह भी एक संवैधानिक संकट खड़ा कर सकता है। इस तरह से संविधान संशोधन के मुद्दे पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव हो सकता है।
इसके अलावा किसी राज्य में चुनाव के बाद किसी एक दल या गठबंधन को बहुमत न मिले तो ऐसी स्थिति राजनीतिक अस्थिरता खड़ी कर सकती है।
भारत में चुनाव कराना कितना महंगा है?
‘एक देश एक चुनाव’ के पीछे बड़े चुनावी खर्च की दलील भी कई बार दी जाती है। लेकिन इसकी सच्चाई आम धारणा से थोड़ी अलग है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के मुताबिक भारत का चुनाव दुनियाभर में सबसे सस्ता चुनाव है। भारत में चुनावों में एक अमेरिकी डॉलर प्रति वोटर के हिसाब से खर्च होता है। इसमें चुनाव की व्यवस्था, सुरक्षा, कर्मचारियों का तैनाती, ईवीएम सब कुछ शामिल है।
वहीं जिन देशों के चुनावी खर्च के आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें कीनिया में यह खर्च 25 डॉलर प्रति वोटर होता है, जो दुनिया में सबसे महंगे चुनाव में से शामिल है। भारत के ही पड़ोसी देश पाकिस्तान में पिछले आम चुनाव में करीब 1.75 डॉलर प्रति वोटर खर्च हुआ था।
भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी कहते हैं, ‘भारत में चुनाव कराने में करीब चार हजार करोड़ का खर्च होता है, जो कि बहुत बड़ा नहीं है। जहाँ तक राजनीतिक दलों के करीब 60 हजार करोड़ के खर्च की बात है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। इससे नेताओं और राजनीतिक दलों के पैसे गरीबों के पास पहुंचते हैं।’
कितना बड़ा हो सकता है राजनीतिक विरोध
चुनावों के दौरान बैनर-पोस्टर और प्रचार सामग्री बनाने, चिपकाने वालों से लेकर ऑटो और रिक्शेवाले तक को काम मिलता है। कुरैशी के मुताबिक यह एक मात्र मौका होता है जब आम लोगों को महत्व दिया जाता है और नेता, जनता के पास जाते हैं। इससे आम लोगों को भी अच्छा लगता है और वो तो चाहेंगे कि ऐसा बार-बार हो।
एसवाई कुरैशी याद करते हैं, ‘एक बार मैं किसी कार्यक्रम में गया था वहाँ किसी ने एक नारा लगाया ‘जब-जब चुनाव आता है, गरीब के पेट में पुलाव आता है’। यह गरीबों के लिए चुनाव के महत्व को बताता है।’
चुनाव आचार संहिता के दौरान आमतौर पर करीब डेढ़ महीने तक सरकार कुछ भी नया नहीं कर सकती है। हालांकि पहले से चल रही योजना पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है। वहीं राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान चुनावी राज्यों को छोडक़र बाकी राज्यों के काम पर आचार संहिता का कोई असर नहीं होता है।
भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव को दोबारा एक साथ कराने का मुद्दा साल 1983 में भी उठा था, लेकिन उस वक्त केंद्र की इंदिरा गांधी की सरकार ने इसे कोई महत्व नहीं दिया था।
उसके बाद साल 1999 में भारत में ‘लॉ कमीशन’ ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दिया था। उस वक्त केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार चल रही थी।
साल 2014 में बीजेपी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल किया था। अब केंद्र सरकार ने इसके लिए पहल की है, लेकिन विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हैं।
केंद्र सरकार की कमिटी में शामिल किए गए लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कमिटी से अपना नाम वापस ले लिया है। वहीं राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता ग़ुलाम नबी आजाद को कमिटी में जगह देने और मौजूदा नेता मल्लिकार्जुन खडग़े का नाम न होने पर विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि एक साथ चुनाव होने पर अगर किसी राज्य में किसी दल या गठबंधन को बहुमत न मिले तो क्या होगा?
विपक्षी दलों के नेता इस तरह के कई सवालों को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं। इसमें भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिमी राज्यों तक के नेता शामिल हैं।
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा है, ‘भारत राज्यों का एक संघ है। ‘एक देश एक चुनाव’ का विचार संघ और इसके सभी राज्यों पर हमला है।’
बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का आरोप है कि आज एक चुनाव की बात हो रही है; उसके बाद ‘एक नेता’, ‘एक दल’ और ‘एक धर्म’ जैसी बात की जाएगी। तेजस्वी यादव का कहना है कि पहले ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ की जगह ‘वन नेशन वन इंकम’ की बात होनी चाहिए। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि बीजेपी वालों ने नया शिगुफा छोड़ा है, वन नेशन वल इलेक्शन से आम लोगों को क्या मिलेगा। देश में ‘वन नेशन वन एजुकेशन’ और ‘वन नेशन वन इलाज’ होना चाहिए।
मौजूदा केंद्र सरकार के पास लोकसभा में बड़ा बहुमत है। इसके अलावा उसने दिल्ली सर्विस बिल को भी राज्यसभा में आसानी से पास करा लिया था। लेकिन ‘वन नेशल वन इलेक्शन’ पूरी तरह से अलग मुद्दा है। दूसरी तरफ संविधान के जानकारों के मुताबिक यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है और सरकार के लिए ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ की राह आसान नहीं होगी। (bbc.com/hindi)
- डॉ. आर.के.पालीवाल
अभी तक किसी पूर्व राष्ट्रपति को सरकार द्वारा गठित किसी समिति का अध्यक्ष नियुक्त करने की परिपाटी नहीं थी। पहले की किसी सरकार ने राष्ट्र के किसी भूतपूर्व प्रथम नागरिक को कोई ऐसी जिम्मेदारी सौंपने की कोशिश भी नहीं की थी जो राष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। किसी पूर्व राष्ट्रपति ने पदमुक्त होने के बाद राजनीतिक सक्रियता भी नहीं दिखाई थी। इस मामले में कुछ साल पहले निवृतमान राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहब ने पदमुक्त होकर स्कूल, कॉलेज और तकनीकी संस्थाओं आदि के विद्यार्थियों से संवाद की एक अत्यन्त शालीन परंपरा की शुरुआत की थी। उसके बरक्स पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने सरकार द्वारा गठित वन नेशन वन इलेक्शन समिति का अध्यक्ष पद स्वीकार कर एक नई परिपाटी शुरु की है जिसकी बौद्धिक जगत में आलोचना हो रही है। जो राष्ट्रपति केंद्र सरकार और सरकार के मंत्रियों को नियुक्त करता है उसे निवृतमान होने के बाद सरकार नियुक्त करे यह तथ्य ही राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद से मुक्त हुई विभूति की गरिमा के अनुरूप नहीं लगता। इसका एक कारण यह भी है कि यह सरकार की एकतरफा कार्यवाही है जिस पर राजनीतिक विवाद अवश्यंभावी था और जो अधीर रंजन चौधरी के इस समिति की सदस्यता ग्रहण करने से इंकार करने से शुरु भी हो गया है । इस दृष्टि से पूर्व राष्ट्रपति का राजनीतिक विवाद में फंसना उचित नहीं लगता। यदि लोकसभा और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले सभी राजनीतिक दलों द्वारा सर्व सहमति से पूर्व राष्ट्रपति का नाम सुझाया जाता तब एकबारगी यह कहा जा सकता था कि यह पूर्व राष्ट्रपति की गरिमा के अनुरूप है लेकिन वर्तमान सरकार भले ही सबका साथ सबका विकास का नारा देती है लेकिन इधर सर्वसहमति जैसी आदर्श परंपराएं उसकी डिक्शनरी में दिखाई नहीं देती।
आनन-फानन में बिना गंभीर विचार-विमर्श किए बनाई गई इस उच्च स्तरीय समिति की सबसे बडी कमी इसमें किसी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को शामिल नहीं किया जाना है। बेहतर होता यदि एक से अधिक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्तों को इस समिती में शामिल किया जाता तो उनके सघन अनुभवों का लाभ समिति को मिलता। पूर्व चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य करने वालों को एक साथ चुनाव कराने के लाभ और चुनौतियों का सबसे अच्छा अनुभव होता है। सरकार से समिति के गठन में यह बड़ी चूक लगती है जिसे तत्काल सुधारा जाना चाहिए। यह कार्य समिति को यह अधिकार देकर भी किया जा सकता है कि समिति सर्व सहमति से कुछ सदस्य समिति में शामिल कर सकती है।
वर्तमान सरकार की यह आदत सी हो गई है कि वह परंपराओं को तोडक़र नए नए प्रयोग करती है। नए प्रयोग करना अच्छी बात है लेकिन यह तभी सही है जब हमारे प्रयोगों की दिशा और प्रयोजन सकारात्मक हों और प्रयोग स्वस्थ मानसिकता से व्यापक विचार-विमर्श के बाद शरू हुए हों। जहां तक पूरे देश में एक साथ चुनाव का मसला है यह बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए इस पर व्यापक चर्चा करना उचित है लेकिन जिस तरह से सरकार ने आनन फानन में पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में समिति गठित की है उसकी आलोचना स्वाभाविक है। बेहतर होता इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद के पिछले सत्र में लंबी चर्चा होती और सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के विचार जानने के बाद कोई उच्च स्तरीय समिति गठित की जाती। इसके विपरीत इस समिति के गठन की घोषणा भी अचानक नोटबंदी की घोषणा की तरह हुई है। किसी को यह उम्मीद भी नहीं थी कि इसके अध्यक्ष निवर्तमान राष्ट्रपति को बनाया जाएगा! ऐसे में सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह खड़े होना स्वाभाविक है।
-कविता रावल
भारतीय समाज जटिलताओं से भरा हुआ है। जहां रीति और रिवाज के नाम पर कई प्रकार की कुरीतियां भी शामिल हो गई हैं। इसका सबसे अधिक खामियाजा महिलाओं को भुगतनी पड़ती है। पितृसत्तात्मक समाज में लडक़ा और लडक़ी में जहां अंतर देखा जा सकता है वहीं बेटी और बहू के मामले में भी समाज का संकुचित नजरिया साफ़ तौर पर झलकता है। कई ऐसे अवसर देखने को मिलते हैं जहां बेटी के रूप में लडक़ी को कुछ आजादी मिल जाती है लेकिन वही दायरा बहू रुपी लडक़ी के लिए सीमित कर दिया जाता है। समाज की यह छोटी सोच शहरों और पढ़े लिखे समाज में कम देखने को मिलती है लेकिन देश के दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी सोच और मान्यता न केवल आज भी कायम है बल्कि बहुओं को इसे मानने के लिए मजबूर भी किया जाता है।
इसकी एक मिसाल उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक का गनीगांव भी है। जहां बहू और बेटी में फर्क देखने को साफ मिल जाता है। इस गांव की कुल जनसंख्या लगभग 800 है। शिक्षा के क्षेत्र में भी यह गांव बहुत अधिक समृद्ध नहीं है। यही कारण है कि यहां लडक़ा और लडक़ी में ही नहीं, बल्कि बहू और बेटी के बीच भी भेदभाव किया जाता है। इस संबंध में, गांव की एक 40 वर्षीय महिला देवकी देवी कहती हैं कि ‘इस गांव में पीढिय़ों से बहू और बेटी के बीच भेदभाव किया जा रहा है। हमने बचपन से जो देखा है, वही सीखते आए हैं और वही परंपरा निभा रहे हैं। अगर हम बदलाव करना भी चाहते हैं तो हमारे गांव, घर और समाज में यह संभव नहीं है। बेटी अगर सूट पहन रही है, तो बहू भी इसे क्यों नहीं पहन सकती है? लेकिन हमें समाज के साथ चलना है इसलिए हम चाह कर भी बहुओं को ऐसा करने को नहीं कह सकते हैं। हमें भी समाज के हिसाब से जीना पड़ता है। सच यह है कि इस गांव में बेटी और बहू के बीच भेदभाव किया जाता है।
गांव की 18 वर्षीय किशोरी कुमारी जानकी दोसाद का कहना है कि ‘हमारे गांव घरों में वास्तव में बहू और बेटी में बहुत ज़्यादा फर्क किया जाता है। अगर बेटी 19 वर्ष की हो और उसी घर में 19 साल की कोई लडक़ी बहू बनकर आए तो उससे 30 साल की लडक़ी के जैसी काम और व्यवहार की उम्मीद की जाती है। आखिर ऐसा क्यों है कि कोई लडक़ी अपनी पसंद के कपड़े तो पहन सकती है, लेकिन बहू नहीं? बेटियों को घर से बाहर जाने की इजाजत होती है, लेकिन बहू को नहीं? बेटियां गलती भी करें तो माफी हो जाती है और बहू गलती करे तो उसे दिन भर पानी तक नहीं दिया जाता है। 25 वर्षीय नवविवाहिता संगीता देवी कहती हैं कि ‘शादी से पहले हम घर में जो भी काम करते थे उससे हमारे मम्मी पापा खुश रहते थे, लेकिन शादी के बाद चाहे हम कुछ भी कम कर लें, हमारे सास ससुर खुश नहीं होते हैं। उनको खुश करने के लिए चाहे हमारा मन उस काम को करने के लिए तैयार न भी हो, फिर भी हमें उनके हिसाब से चलना पड़ता है। बेटी का मन अगर काम करने को न हो तो कुछ नहीं कहते लेकिन बहू के साथ बहुत भेदभाव होता है।’
गांव की एक 44 वर्षीय महिला पार्वती देवी कहती हैं कि ‘हम बेटी और बहू में कोई भी फर्क नहीं करते हैं पर सदियों से जो प्रचलन चला आ रहा है, उसे निभाने की हमारी मजबूरी है। हम गांव में ही रहते हैं तो इस वजह से उसे पर चलना ही पड़ता है। अन्यथा समाज में लोग बातें बनाते हैं। हालांकि पहले की अपेक्षा समाज की सोच में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। हम भी अपने आप को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।’ वहीं 44 वर्षीय मदन सिंह भी स्वीकार करते हैं कि गांव में बहू और बेटियों में बहुत फर्क किया जाता है। वह कहते हैं कि ग्रामीणों की सोच अभी भी वही पुरानी है। लोग एक दूसरे को देखकर बदलना भी चाहते हैं लेकिन बदल नहीं पाते हैं। बेटियों की तकलीफ को गहराई से महसूस किया जाता है, लेकिन बहू की तकलीफ को नजरअंदाज किया जाता है। बेटी के लिए बचपन माना जाता है, लेकिन उसी उम्र की बहू को जि़म्मेदारियों के तले दबा दिया जाता है। जो समाज की गलत सोच का परिणाम है।
समाजिक कार्यकर्ता नीलम ग्रेंडी का कहना है कि आज के बदलते दौर में कोई कितना भी कहे कि बहू और बेटी में कोई फर्क नहीं करते हैं, पर यह मात्र मिथ्या है। हर घर की यही कहानी है। बहू को बहू और बेटी को बेटी समझा जाता है। जिस दिन हर घर में बहू की बातों को अनसुना किया जाएगा, उनकी बातों का कोई बुरा नहीं मानेगा उसी दिन परिवार में बहू और बेटी में समानता आ जाएगी। अगर बहू कभी कोई बात बोल देती है तो सुनना तो दूर की बात, उसे बर्दाश्त तक नहीं किया जाता है। लेकिन बेटी कुछ बोलती है तो हंस कर टाल दिया जाता है। यही बेटी और बहू में फर्क नजर आता है।
अगर खुद की बेटी ससुराल से मायके आती है तो मायके वाले खुश होते हैं। लेकिन जब बहू की बारी आती है कि उसे उसके मायके भेजने में सभी को समस्याएं नजर आने लगती हैं। सबको घर के जरूरी काम याद आने लगते हैं। यह नहीं सोचते कि जैसे हमारी बेटी मायके आने के लिए तरसती है, वैसे ही हमारी बहू भी किसी की बेटी है। उसे भी अपने मायके जाने का हक है। दामाद अगर बेटी की सेवा करें तो खुशी मिलती है, अपना बेटा अगर बहू को आराम दे तो दुख होता है। यहीं पर दिखता है बेटी और बहू में फर्क। सिर्फ एक कदम आगे बढऩे से परिवार में खुशहाली नहीं आएगी, अगर दोनों तरफ से कदम आगे बढ़ाई जाए तो घर खुशियों का भंडार हो जाएगा और जिस दिन ऐसा होगा उस दिन बहू और बेटी में भेदभाव खत्म हो जाएगा। ज़रूरत है समाज को स्वयं आगे बढक़र इस कुरीतियों को खत्म करने की। (चरखा फीचर)
- मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म पर दिए गए बयान से विवाद की आँच उत्तर भारत तक पहुँच गई है.
दरअसल, बीते शुक्रवार यानी एक सितंबर को मार्क्सवादी पार्टी से जुड़ा संगठन तमिलनाडु प्रगतिशील लेखक और कलाकार संघ की ओर से चेन्नई के कामराजार एरिना में सनातन उन्मूलन सम्मेलन का आयोजन किया गया था.
इसमें भाग लेते हुए उदयनिधि स्टालिन ने भारतीय मुक्ति संग्राम में आरएसएस का योगदान शीर्षक से व्यंग्यचित्रों वाली एक पुस्तक का विमोचन किया. उन्होंने सनातन धर्म और बीजेपी को लेकर भी भाषण दिया था.
उदयनिधि स्टालिन ने अपने संबोधन में कहा था, "इस सम्मेलन का शीर्षक बहुत अच्छा है. आपने 'सनातन विरोधी सम्मेलन' के बजाय 'सनातन उन्मूलन सम्मेलन' का आयोजन किया है. इसके लिए मेरी बधाई. हमें कुछ चीज़ों को ख़त्म करना होगा.''
''हम उसका विरोध नहीं कर सकते. हमें मच्छर, डेंगू बुखार, मलेरिया, कोरोना वायरस इत्यादि का विरोध नहीं करना चाहिए."
"हमें इसका उन्मूलन करना चाहिए. सनातन धर्म भी ऐसा ही है. तो पहली चीज़ यही है कि हमें इसका विरोध नहीं करना है बल्कि इसका उन्मूलन करना है. सनातन समानता और सामाजिक न्याय के ख़िलाफ़ है. इसलिए आपलोगों ने सम्मलेन का शीर्षक अच्छा रखा है. मैं इसकी सराहना करता हूँ."
"फासीवादी ताक़तें हमारे बच्चों को पढ़ने से रोकने के लिए कई योजनाएं लेकर आ रही हैं. सनातन की नीति यही है कि सबको नहीं पढ़ना चाहिए. एनईईटी परीक्षा इसका एक उदाहरण है."
उनकी इन्हीं बातों को सनातन धर्म के विरोध और उसे ख़त्म करने के संबोधन के तौर पर पूरे देश में बताया जा रहा है. इसकी शुरुआत भारतीय जनता पार्टी के आईटी विंग के प्रमुख अमित मालवीय ने दो सितंबर को की.
उन्होंने दो सितंबर उदयनिधि स्टालिन के भाषण का एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि 'उदयनिधि ने "भारत में सनातन धर्म का पालन करने वाले 80 प्रतिशत लोगों को ख़त्म करने" का आह्वान किया था.'
विरोध में आगे आई बीजेपी
इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस बयान को लेकर कई बयान सामने आए. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी उदयनिधि के भाषण की निंदा की.
राजस्थान के डूंगरपुर में एक जनसभा में अमित शाह ने कहा, "भारतीय गठबंधन की दो सबसे बड़ी पार्टियों डीएमके और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बेटे सनातन धर्म को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं. क्या आप सनातन धर्म को ख़त्म करने के लिए तैयार हैं?"
देश भर के हिंदू संगठनों के तमाम नेताओं और सदस्यों ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर उदयनिधि के बयान की निंदा की.
तमिलनाडु में बीजेपी के मौजूदा राज्य सचिव ए. अश्वत्थामन ने राज्यपाल आरएन रवि से उदयनिधि के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की अनुमति मांगी. वहीं दिल्ली में विनीत जिंदल ने उदयनिधि के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस में चार धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराई है.
वहीं कई मीडिया आउटलेट्स ने उदयनिधि के संबोधन की आलोचना करते हुए लिखा है कि इससे आने वाले दिनों संयुक्त विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन को नुकसान हो सकता है.
कई टीवी चैनलों पर इस तरह के डिबेट प्रोग्राम भी प्रसारित हुए हैं. लेकिन यह सब केवल उत्तर भारत में देखने को मिला है.
जहाँ तक तमिलनाडु की बात है तो वहाँ लंबे समय से सनातन विरोधी राजनीति चली आ रही है. उदयनिधि के इस भाषण को उसी के एक हिस्से के तौर पर देखा गया है.
द्रविड़ कषगम के संस्थापक नेता पेरियार ने हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ कड़े विचार व्यक्त किए थे. वे जीवन भर हिंदू धर्म के उन्मूलन, रामायण के विरोध और मंदिरों के उन्मूलन पर लेख लिखते रहे.
उनके बाद द्रविड़ कषगम और पेरियार के अनुयायी समय-समय पर ऐसे विचार व्यक्त करते आए हैं.
तमिलनाडु में सनातन विरोध
तमिलनाडु की दलित राजनीतिक पार्टी, विड़ूदलाई चिरुतैगल कच्ची (वीसीके) के मौजूदा अध्यक्ष तोल थिरुमावलवन लगातार सनातन विरोध की बात करते रहे हैं.
उन्होंने सनातन के ख़िलाफ़ कई बड़े सम्मेलन आयोजित किए हैं. 2018 में पेरियार के स्मृति दिवस पर, थिरुमावलवन ने कहा था, "सामाजिक न्याय की जीत होगी और हम उस दिन सनातन को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे".
उसके बाद, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले, थिरुमावलवन ने जनवरी में त्रिची में देसम कप्पोम नामक एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया और कहा, "सनातन ख़त्म होने पर ही भाईचारा कायम रहेगा. सनातनी ताक़तों द्वारा इस देश को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करना हमारा कर्तव्य है."
"सनातन सिद्धांत और लोकतांत्रिक सिद्धांत के बीच दो हज़ार साल पुराना संघर्ष है. वे वर्षों पहले मौजूद सनातन सिद्धांत को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर सनातन सत्ता में वापस आते हैं, तो वर्णाश्रम और जातिगत भेदभाव फिर से अपना सिर उठाएगा."
इसी सम्मेलन में उस समय विपक्ष में रहे डीएमके के नेता एमके स्टालिन ने भी भाग लिया और भाषण दिया.
थिरुमावलवन ने 2021 विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में नारा दिया था, "आओ सनातन को जड़ से उखाड़ें, चलो लोकतंत्र की रक्षा करें." कई अन्य अवसरों पर उन्होंने पार्टी स्वयंसेवकों से वादा किया है कि वे स्वयंसेवकों के साथ मिलकर सनातन को उखाड़ फेंकेंगे.
पिछले साल भी विड़ूदलाई चिरुतैगल कच्ची (वीसीके), डीएमके और कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा थी. उस वक्त बीजेपी ने कहा था कि कांग्रेस गठबंधन की एक पार्टी सनातन धर्म के विरोध की बात कर रही है. लेकिन थिरुमावलवन के भाषणों पर कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिली थी.
उदयनिधि के बयान इतना विवाद क्यों?
उदयनिधि के बयान को लेकर देशव्यापी स्तर पर विरोध देखने को मिल रहा है, ऐसा क्यो हैं, यह पूछे जाने पर विड़ूदलाई चिरुतैगल कच्ची (वीसीके) के सांसद डी रविकुमार कहते हैं, "क्योंकि लोगों की बीजेपी से शिकायतें बढ़ रही हैं, उनकी सरकार पर प्रशासनिक अक्षमता के आरोप लग रहे हैं, इसलिए यह सारा विरोध लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है."
"शुरुआत में तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इंडिया अलायंस इस तरह एकजुट रहेगा. उन्हें लगा कि ऐसा नहीं होगा. लेकिन गठबंधन बना और लगातार आगे बढ़ रहा है और यह उनके लिए बड़ा ख़तरा है. लिहाजा लोगों का ध्यान भटकाने के लिए उन्होंने इस मुद्दे को अपने हाथ में लिया है."
जब उत्तर भारत में हर कोई उदयनिधि के बयान का विरोध कर रहा है तब डी रविकुमार कहते हैं, ''सनातन का अर्थ क्या है और इसका अर्थ क्या है, इस पर बहस उत्तर भारत में भी होने दीजिए.''
रविकुमार का यह भी मानना है कि इससे वोट बैंक की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
उन्होंने कहा, "उन्होंने कर्नाटक राज्य को हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में आजमाया. लेकिन वे अगले चुनाव में ही हार गए. जब क़ीमतें तेज़ी से बढ़ रही हैं तो इस बात को बहस का रूप देने से कोई फ़ायदा नहीं होगा. इससे चुनाव में विपक्षी दलों को कोई नुक़सान नहीं होगा."
वैसे चुनाव नज़दीक होने के चलते भी यह तो स्वाभाविक है कि विपक्षी इंडिया गठबंधन को इससे संबंधित सवालों का सामना करना होगा. जहाँ तक कांग्रेस की बात है तो तमिलनाडु कांग्रेस के नेता उदयनिधि स्टालिन के विचारों का समर्थन करते हैं.
सांसद कार्तिक चिदंबरम ने कहा, "सनातन धर्म तमिलनाडु में एक जाति संरचना है. इसके अलावा, इसका कोई अन्य दार्शनिक अर्थ नहीं है. उदयनिधि ने जो कहा, उसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. उन्होंने किसी जातीय समूह के विनाश का आह्वान नहीं किया."
कांग्रेस ने दिया जवाब
इस बारे में पूछे जाने पर कर्नाटक के राज्य मंत्री और कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे ने जवाब दिया, "कोई भी धर्म जो समानता को बढ़ावा नहीं देता है, जो मानव गरिमा सुनिश्चित नहीं करता है, वह एक बीमारी की तरह ही है."
कांग्रेस पार्टी ने इस पर अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिक्रिया दी है. पार्टी के महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने कहा, ''सर्वधर्म समाज को लेकर कांग्रेस पार्टी में सर्वसम्मति है. हमारे गठबंधन में सभी दलों को अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अधिकार है."
उन्होंने विवाद को दरकिनार करते हुए कहा, ''हम सभी धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हैं, हम सभी की आस्थाओं का सम्मान करते हैं.''
जहां तक उत्तर भारत के कांग्रेस नेताओं की बात है तो वे इस विवाद में नहीं फंसना चाहते. उदयनिधि की राय के बारे में पूछे जाने पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा, "यह उनकी राय है. लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं."
ऐसे में ज़ाहिर है कि कमलनाथ और प्रियांक खड़गे के बयान के बीच का अंतर, स्पष्टता के साथ भारतीय राजनीति में उत्तर-दक्षिण विभाजन की ओर इशारा करता है.
दक्षिण भारतीय राजनीति में, विशेषकर तमिलनाडु की राजनीति में, धर्म के आधार पर लोगों को इकट्ठा करना और उनका वोट हासिल करना एक असंभव चुनौती है.
लेकिन मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में हिंदुत्व पर हमला करके वोट हासिल करना नामुमकिन है. इसीलिए कमलनाथ के भाषण में चेतावनी छिपी हुई है.
वरिष्ठ पत्रकार आरके राधाकृष्णन कहते हैं, "द्रमुक के लोगों को पहले यह तय करना चाहिए कि वे नीतिगत राजनीति करेंगे या चुनावी राजनीति. इसका कारण यह है कि देश की मौजूदा स्थिति पूरी तरह से अलग है. पहले, यह धर्मनिरपेक्ष बनाम हिंदू था. अब यह अच्छे हिंदू बनाम बुरा हिंदू बन गया है. हिंदू धर्म ऐसा ही है. केंद्र में इसको लेकर राजनीति होने लगी है. उदयनिधि के लिए इस समय इस पर बात करना अनावश्यक है.''
पूरे मामले पर केंद्र सरकार का रुख़
वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ पत्रकार कुबेंद्रन का कहना है कि इस मामले में राष्ट्रीय मीडिया ने जिस तरह का व्यवहार किया है वह बहुत ही ख़राब रहा है.
उन्होंने कहा, "वे पहले की तरह संदेश फैला रहे हैं कि तमिलनाडु में उत्तर भारत के लोगों पर हमला किया जा रहा है. उदयनिधि ने जो कहा वह वीडियो में है. लेकिन बीजेपी वाले झूठ फैला रहे हैं कि वह सनातनियों को ख़त्म करने आह्वान कर रहे हैं. यह स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. हाल ही में कैग ने सत्तारूढ़ सरकार पर आरोप लगाए थे, अब केंद्र सरकार लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इस मुद्दे को उछाल रही है."
पहले जब विड़ूदलाई चिरुतैगल कच्ची (वीसीके) के लोग बोलते थे तो बीजेपी उसे नहीं उछालती थी, लेकिन अभी इस मुद्दे को उछालने की वजहें उनके पास मौजूद हैं.
वरिष्ठ पत्रकार आरके राधाकृष्णन. कहते हैं, "द्रमुक हिंदू धर्म की वैकल्पिक विचारधारा के रूप में द्रविड़वाद की विचारधारा को बढ़ावा दे रही है. यही कारण है कि वे द्रमुक को निशाना बना रहे हैं."
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार कुबेंद्रन के मुताबिक़ इस मामले ने अब तक राष्ट्रीय स्तर पर उदयनिधि के लिए काफ़ी प्रचार बटोर लिया है और इससे उन्हें भविष्य में काफ़ी राजनीतिक मदद मिलेगी. (bbc.com/hindi)
-डॉ. आर.के.पालीवाल
जैसे-जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव पास आ रहे हैं वैसे-वैसे विपक्षी दलों के गठबंधन का कारवां धीरे-धीरे मंद गति से बढ़ रहा है। विपक्षी दलों के कारवां को आगे बढ़ाने के लिए जितनी मेहनत नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल,राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे और तेजस्वी यादव जैसे महत्वाकांक्षी नेता कर रहे हैं उससे ज्यादा गति उसे केंद्र सरकार के कुछ निर्णय और नीतियां तथा जांच एजेंसियों की विपक्षियों पर ताबड़तोड़ कार्यवाही दे रही हैं। इन दोनों कारणों से विपक्षी दलों को मजबूत गठबंधन के अलावा केन्द्र की सत्ता के आसपास पहुंचने और राज्यों में अपनी सत्ता बरकरार रखने का कोई अन्य विकल्प नजर नहीं आ रहा है।
गठबंधन में शामिल अधिकांश विपक्षी दलों की स्थिति भी अजीब है। केन्द्र में सरकार बनाने के लिए वे सामूहिक चक्रव्यूह की रचना कर रहे हैं लेकिन अधिकांश राजनीतिक दल राज्यों में एक दूसरे के विरोधी हैं , इसलिए उनके लिए आपसी तालमेल को मंजिल तक पहुंचाना टेढी खीर साबित हो रहा है। यही कारण है कि गठबंधन के प्रमुख नेताओं की शुरूआती कई अनौपचारिक मुलाकातों के बाद पटना, बैंगलोर और मुंबई में तीन बडी बैठकों में भी कोई बहुत बड़ा निर्णय सामने नहीं आया है।
ऐसा लगता है कि नौ साल केंद्र की सत्ता से दूर रहने के बाद कांग्रेस और क्षेत्रीय क्षत्रप अपने राज्यों की सरकार भी ठीक से नहीं चला पा रहे हैं। कहीं उन्हें राज्यपालों और लेफ्टिनेंट गवर्नर की सक्रियता से परेशानी हो रही है और कहीं केंद्र के सहयोग से चलने वाली योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा आ रही है। इन्हीं वजहों से वे येन केन प्रकारेण केंद्र में सहयोगी सरकार चाहते हैं अत: बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। गठबंधन के शुरुआती दौर में सभी दलों के नेता बड़बोलेपन से गठबंधन को लडख़ड़ाने से बचाने की कोशिश कर संतुलित बयान दे रहे हैं। मुंबई में संपन्न बैठक में भी गठबंधन के संयोजक का नाम तय नहीं हो पाया। एक चौदह सदस्यीय कोऑर्डिनेशन समिती जरूर बनी है जिसमें गठबंधन के बड़े दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। बैठक में तीन प्रमुख मुद्दों पर भी सहमति बनी है, मसलन विभिन्न दलों के मध्य सीटों के बंटवारे पर सहमति बनाने की कोशिश होगी। यह ऐसा मुद्दा है जिस पर चुनाव से पहले ही दरारें आने की प्रबल संभावना है और हर दल अपने अपने तर्कों के साथ अपने दल के लिए अधिक से अधिक टिकट आरक्षित कराने के लिए प्रयासरत रहेगा। बहुत सी जगह टिकट नहीं मिलने से नेता बगावत भी करेंगे और बड़े पैमाने पर दल बदल भी होगी।
दूसरा आसान निर्णय यह भी हुआ है कि विपक्षी दल अपने अपने प्रभाव के क्षेत्रों में देश भर में रैलियां करेंगे। विपक्षी एकता का टेंपो बरकरार रखने के लिए यह बहुत जरूरी कदम है । इन रैलियों के माध्यम से केंद्र सरकार की गलत नीतियों और निर्णयों पर जन जागरूकता से जब सरकार के प्रति स्वाभाविक रूप से पनपने वाले एंटी इनकंबेंसी फैक्टर में वृद्धि होगी तभी विपक्ष मजबूत हो सकेगा और सत्ता के नजदीक पहुंच सकेगा। तीसरा प्रमुख निर्णय विपक्ष की मीडिया रणनीति बनाने का है। विपक्ष को लगता है कि मीडिया का बड़ा वर्ग जिसे सरकार समर्थक गोदी मीडिया के नाम से पुकारा जाता है वह विपक्ष की सही छवि प्रस्तुत नहीं करता। यह काफी हद तक सही भी है क्योंकि बड़े अखबारों और चैनलों की आय का बड़ा स्रोत केन्द्र और भाजपा की राज्य सरकारों से आता है इसलिए उनके लिए विपक्ष को महत्व देना घाटे का सौदा है। इसी तरह जिन मीडिया घरानों के विविध औद्योगिक एवं व्यापारिक हित हैं उन्हें केंद्र और राज्य सरकारों की जांच एजेंसियों से भी दंडात्मक कार्रवाई का भय रहता है। ऐसे में विपक्ष को सोशल मीडिया सहित निष्पक्ष मीडिया की छोटी छोटी इकाइयों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इस बैठक में कॉर्डिनेसन कमेटी बनने से आगे की रणनीती बनाना भी आसान होगा। यह कमेटी भविष्य की बैठकों को सही दिशा में ले जाने के लिए जमीनी तैयारी कर सकेगी।
भारतीय स्कूलों में पिछले दिनों समुदाय विशेष के खिलाफ जिस तरह की घटनाएं सामने आईं, उसकी हर ओर निंदा हो रही है. साथ ही यह भी रेखांकित हुआ कि समाज कितना जहरीला होता जा रहा है.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित एक निजी स्कूल में टीचर का बच्चे को सहपाठियों के हाथों पिटवाने वाला वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. यह वीडियो देखने वाले कई लोगों के मन में उस क्रूर हरकत को लेकर सवाल उठे कि क्या कोई टीचर बच्चों के बीच धर्म के आधार पर इस तरह से लकीर खींच सकती है.
मुजफ्फरनगर के नेहा पब्लिक स्कूल की टीचर तृप्ता त्यागी को यूपी अल्पसंख्यक आयोग ने नोटिस जारी किया है. यूपी पुलिस ने भी तृप्ता त्यागी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है. जिस बच्चे को तृप्ता त्यागी ने पिटवाया, उसकी गलती बस इतनी थी कि उसने पहाड़ा याद नहीं किया था.
तृप्ता त्यागी ने अपने बचाव में कहा है कि वीडियो को कांट-छांटकर सोशल मीडिया पर डाला गया है. तृप्ता त्यागी अपने बचाव में जो भी कहें, लेकिन वीडियो में साफ दिख रहा है कि वह वास्तव में सांप्रदायिक शब्दावली का इस्तेमाल कर रही थीं और बच्चों से हेट क्राइम करने को कह रही थी.
हालांकि प्रशासन ने स्कूल पर कार्रवाई करते हुए स्कूल को सील कर दिया गया है. पीड़ित बच्चे के पिता ने उसका दाखिला किसी अन्य स्कूल में करा दिया है. लेकिन इस प्रकरण के मद्देनजर और कई अन्य मामलों के संदर्भ में देखें, तो कई लोगों का कहना है कि स्कूलों में भी मुसलमानों के खिलाफ नफरत बढ़ती दिख रही है.
स्कूलों से फैलती नफरत!
मुजफ्फरनगर के स्कूल में जैसी घटना हुई है, उससे मिलती-जुलती एक और घटना दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में हुई. पूर्वी दिल्ली के गांधी नगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले चार छात्रों ने टीचर के खिलाफ धार्मिक टिप्पणी का आरोप लगाया है. टीचर पर यह भी आरोप लगा कि उसने बच्चों से कहा कि उनका परिवार बंटवारे के दौरान पाकिस्तान क्यों नहीं चला गया.
ये छात्र 9वीं कक्षा में पढ़ते हैं. इनके परिवारों ने दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. शिकायत मिलने के बाद दिल्ली पुलिस ने गांधी नगर के सरकारी सर्वोदय बाल विद्यालय की टीचर हेमा गुलाटी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. पुलिस ने कहा कि वह आरोपों की जांच कर रही है. वहीं एक अभिभावक ने कहा कि अगर टीचर के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है, तो अन्य लोगों का हौसला बढ़ेगा.
धर्म के आधार पर बढ़ता भेदभाव
धर्म के आधार पर स्कूलों में भेदभाव के ये दो मामले पहले नहीं हैं. कई बार तो ऐसे मामलों की रिपोर्ट भी नहीं होती है. गुजरात के मेहसाणा जिले के लुनवा गांव में एक स्कूल है, श्री केटी पटेल स्मृति विद्यालय. इसमें पढ़ने वाली एक टॉपर मुस्लिम लड़की के पिता सनवर खान ने स्कूल पर भेदभाव का आरोप लगाया है.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अर्नाजबानू 87 प्रतिशत अंकों के साथ स्कूल की 10वीं क्लास की टॉपर थी. लेकिन 15 अगस्त को हुए सम्मान समारोह में उन्हें सम्मानित नहीं किया गया. उनकी जगह दूसरे स्थान पर आने वाले छात्र को सम्मानित किया गया. जब अर्नाजबानू के पिता सनवर खान ने स्कूल प्रशासन और शिक्षकों से सफाई मांगी, तो उन्हें बताया गया कि अर्नाजबानू को 26 जनवरी को सम्मानित किया जाएगा.
स्कूल प्रशासन का कहना है कि स्कूल किसी भी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ सख्त नीति रखता है. छात्रा को 26 जनवरी को पुरस्कार मिलेगा. स्कूल का दावा है कि पुरस्कार समारोह वाले दिन छात्रा गैर-हाजिर थी. हालांकि छात्रा के पिता सनवर खान ने कहा कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और उससे जांच कर पता किया जा सकता है कि वह स्कूल में मौजूद थी या नहीं.
जानकार कहते हैं कि स्कूलों में बच्चों के बीच इस्लामोफोबिया बढ़ रहा है. उनका कहना है कि छोटे बच्चे अपने मुसलमान दोस्तों का मजाक उड़ाते हैं और उनका अपमान करते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि इस तरह की घटनाएं पीढ़ियों से हो रही हैं, लेकिन हालिया वक्त में बहुत बढ़ गई हैं. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहा कि इस मामले में दूसरा पहलू यह है कि शिक्षकों के भीतर कैजुअल इस्लामोफोबिया है, जो अलग-अलग ढंग से व्यक्त होता रहता है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद मुजफ्फरनगर और दिल्ली की घटना को कैजुअल इस्लामोफोबिया बताते हैं. वह कहते हैं इस्लामोफोबिया पिछले 10 साल में बढ़ा है और यह ढिठाई के साथ अब अभिव्यक्त किया जा रहा है.
भारत के स्कूलों का सच!
2017 में आई नाजिया इरम की किताब "मदरिंग ए मुस्लिम" में कई मुस्लिम मांओं और बच्चों का इंटरव्यू है. इस किताब के जरिए उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे मुस्लिम छात्र, स्कूलों में सांप्रदायिक टिप्पणी सुनते हैं और धर्म के आधार पर उन्हें आपत्तिजनक बातें सुनने को मिलती हैं.
लेखिका नाजिया इरम ने किताब को लिखने के लिए तीन साल की रिसर्च की और देशभर के 12 राज्यों के 125 मुस्लिम परिवारों से बात की. उन्होंने कहा 85 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि उन्हें धर्म के आधार पर परेशान किया गया, उनके साथ मारपीट हुई और उन्हें गलत नाम से पुकारा गया. डीडब्ल्यू से बात करते हुए नाजिया इरम ने बताया, "साफ पैटर्न उभरकर आया कि जैसे मीडिया में मुस्लिमों को दिखाया जाता है, वही बातचीत हमारे स्कूलों और प्लेग्राउंड में दोहराई जाती है."
नाजिया इरम ने इस किताब के लिए पांच साल से लेकर 20 साल के बच्चों के मुस्लिम परिवार का इंटरव्यू लिया. इन परिवारों के बच्चे दक्षिणी दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा के पॉश स्कूलों में पढ़ चुके हैं या पढ़ रहे हैं. नाजिया ने अपनी किताब में लिखा कि इंटरव्यू में बच्चों ने बताया कि कभी-न-कभी ऐसा हुआ कि सहपाठियों ने उन्हें "पाकिस्तानी" या "आतंकवादी" कहकर बुलाया है.
नाजिया इरम कहती हैं, "पांच साल तक के छोटे बच्चों के साथ ऐसी घटनाएं होती हैं और कई बार वे अपने माता-पिता से सवाल करते हैं क्या हम पाकिस्तानी हैं? शुरू में अभिभावक और टीचर इस तरह के मामले को दबाने की कोशिश करते हैं और जब बच्चे बड़े होते हैं, तो वे अपने तरीके से ऐसे मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करते हैं."
नाजिया कहती हैं कि कई बार माता-पिता सामाजिक वजहों से इस तरह के मुद्दों को उठाने से हिचकते हैं. वह बताती हैं, "क्योंकि हमारा समाज ही ऐसा है कि वे (माता-पिता) समझते हैं कि इन मुद्दों पर बात ना करना ही बेहतर है. हमारा समाज ऐसा है कि हम कई बार मुश्किल विषयों पर बात नहीं करते हैं."
नाजिया बताती हैं, "कई बार टीचर्स ही समस्या का हिस्सा होते हैं, क्योंकि टीचर्स उसी समाज में रहते हैं जहां एक समुदाय विशेष के खिलाफ दुष्प्रचार और गलत सूचना फैलाई जाती है. कैसे एक समुदाय को नकारात्मक रूप से पेश किया जाता है, यह हमारी दिनचर्या का हिस्सा हो गया है."
न्यूज चैनल, अखबार, सोशल मीडिया भी समस्या का हिस्सा!
नाजिया उदाहरण देती हैं, "अगर दुनिया में कोई भी आतंकवादी हमला होता है, तो अगले दिन मुस्लिम बच्चे से कहा जाता है कि ये तुमने क्या किया. ऐसा लगता है कि हमले के लिए वही जिम्मेदार हो. जिन शब्दों का इस्तेमाल मुस्लिम बच्चों के खिलाफ किया जाता है, वे अक्सर समाचारों में इस्तेमाल हुए होते हैं. रात 10 बजे के बुलेटिन में जो कहा जाता है, वही बच्चे क्लासरूम में सुबह 9 बजे उगल रहे होते हैं."
नाजिया और अपूर्वानंद दोनों ही मानते हैं कि मुसलमानों के खिलाफ एक ही तरह का अजेंडा चलाया जा रहा है और अब इसे रोक पाना बहुत ही मुश्किल है. नाजिया कहती हैं, "आप दुष्प्रचार और गलत सूचना से कब तक अपने आपको बचाए रख पाते हैं, क्योंकि जब टीवी बंद करेंगे तो अखबार है, अखबार बंद करेंगे तो सोशल मीडिया है. करीब 10 साल से एक ही अजेंडा चल रहा है कि मुसलमान बुरा है."
वहीं अपूर्वानंद कहते हैं कि इस्लामोफोबिया मौजूदा सरकार की आधिकारिक विचारधारा का हिस्सा है और इसे देश के तमाम स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों द्वारा अपनाया जा रहा है. वह कहते हैं, "जब तक यह शासन रहेगा, तब तक यह इसी तरह से चलता रहेगा."
अपूर्वानंद का मानना है कि पहले यह शासन बदलना जरूरी है, ताकि लोगों को पता चले कि यह समाज में स्वीकार्य नहीं है. (dw.com)
-नासिरुद्दीन
होंठों पर चूमा ही तो है। कुछ और तो नहीं किया। इस पर इतना हंगामा क्यों बरपा है? भारत और दूसरे कई मुल्कों के मर्दाना समाज और ख़ासकर मर्दों को यह समझ में नहीं आ रहा है। समझ में आ ही जाता तो जो हो रहा है, वह न होता। या ऐसी बात कोई न कहता।ठीक उसी तरह जैसे कोई कह सकता है, पीठ ही तो थपथपाया/ सहलाया है, कुछ और तो नहीं किया। वैसे, यहाँ बात अपने देश की नहीं हो रही है।
रुबियालेस ने क्या किया?
जी, होठों पर चूमने की एक घटना पर इन दिनों एक दूर देश में हंगामा बरपा है।
विश्व कप महिला फुटबॉल प्रतियोगिता का ख़िताब पहली बार जीतने वाली स्पेन की टीम की एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं, जेनी हर्मोसो।
जीत के जश्न के दौरान स्पेन फ़ुटबॉल संघ के तत्कालीन अध्यक्ष लुईस रुबियालेस ने हर्मोसो को बाँहों में भरा। उनका सिर पकड़ा और होंठों को चूम लिया। होंठ चूमने की तस्वीर और वीडियो वायरल होने लगी। रुबियालेस की आलोचना हुई कि उन्होंने ज़बरदस्ती चूमा। यह यौनिक व्यवहार है। ग़लत है। उन्हें माफ़ी माँगनी चाहिए। अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए।
रुबियालेस और स्पेन के फुटबॉल संघ ने पहले इस आरोप को नकारा। इनका कहना था कि यह सब सहमति से हुआ। वे फज़ऱ्ी नारीवादियों के सामने नहीं झुकेंगे।
और रुबियालेस को निलंबित किया गया लेकिन स्पेन की सरकार ने भी उनके इस बर्ताव की आलोचना की। फिर स्पेन की जनता सडक़ों पर उतर आई। तब रुबियालेस के ख़िलाफ़ जाँच का एलान हुआ।
हंगामे के बाद स्पेन के फुटबॉल संघ को भी झुकना पड़ा और उसे अपने अध्यक्ष को इस्तीफ़े के लिए कहना पड़ा। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल महासंघ (फ़ीफ़ा) ने लुईस रुबियालेस को उनके पद से निलंबित कर दिया।
जब हर्मोसो ने चुप्पी तोड़ी
जब यह सब शुरू हुआ तो हर्मोसो चुप थीं। लेकिन जब रुबियालेस की तरफ़ से यह बात बार-बार आई कि यह सब सहमति से हुआ था और उन्होंने चूमने से पहले पूछा था, तब हर्मोसो ने अपनी चुप्पी तोड़ी।
ट्विटर (एक्स) पर उनकी तरफ़ से लम्बा बयान आया। उन पर इस बात का काफ़ी दबाव था कि वे कह दें कि यह सब सहमति से हुआ था। वे झुकी नहीं।
हर्मोसो के बयान का लब्बोलुबाब है- ‘वे पूरी तरह झूठ बोल रहे हैं। बातों को तोड़मरोड़ कर अपने पक्ष में पेश कर रहे हैं। वे जिस बातचीत का हवाला दे रहे हैं, वह कभी हुई ही नहीं। वह घटना मुझे पसंद नहीं आई। मैं उस वक़्त कुछ कर पाने की हालत में नहीं थी। मैं यौनिक व्यवहार का शिकार हुई।’
‘मेरी तरफ़ से इस तरह की कोई सहमति नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की संस्कृति काफ़ी लंबे समय से चल रही है। अब बहुत हुआ। यह मेरी इच्छा के खिलाफ़ हुआ। मेरी सहमति से नहीं हुआ। यह मेरे सम्मान के ख़िलाफ़ है। मुझे चूमना अच्छा नहीं लगा। यह नाक़ाबिले बर्दाश्त है।’
यही नहीं, हर्मोसो समेत 81 खिलाडिय़ों ने यह भी कहा कि अगर रुबियालेस पद पर बने रहेंगे तो वे राष्ट्रीय टीम के साथ नहीं खेलेंगी। इतना सब होने के बाद रुबियालेस ने अपनी हरकत के लिए माफ़ी माँगी है। उन्होंने कहा कि जीत के जश्न में यह हो गया। लेकिन रुबियालेस के इस व्यवहार ने जिस मुद्दे की तरफ़ हमारा ध्यान खींचा है, वह है स्त्री-पुरुष रिश्ते या जेंडर सम्बंधों में सहमति का मुद्दा और मर्दों का व्यवहार।
सहमति या रज़ामंदी क्या है?
दो जेंडर के बीच आपसी और यौनिक रिश्ते में सहमति या रज़ामंदी या कंसेंट एक बहुत अहम और नाज़ुक शब्द है। या यूं कहा जाए कि रिश्ते की बुनियाद ही इस शब्द पर टिकी है।
किसी बात से सहमत होना, किसी बात के लिए स्वीकृति या इजाज़त देना, अनुमति देना, जिस बात से प्रसन्नता हो या ख़ुशी से मानी गई हो, किसी बात के लिए तैयार होना- यह सब सहमति या कंसेंट है।
अगर सहमति में ख़ुशी नहीं है तो वह सहमति नहीं है। यानी सहमति के लिए तैयार होना और तैयार करना- दो चीज़ें हैं। सहमति में आज़ादी है। ख़ुद फ़ैसला लेने की ताक़त शामिल है। बिना किसी दबाव के स्वीकृति देना शामिल है। यही नहीं, उस व्यक्ति में सहमति देने की सलाहियत हो। वह बिना किसी दबाव के सहमति देने की हालत में हो।
इसमें ख़ुद की इच्छा शामिल है। सहमति हासिल करने के लिए किसी भी तरह के पद या हैसियत की सत्ता का इस्तेमाल शामिल नहीं हो। अगर माना जा रहा है कि सहमति है और इन सबके बिना है, तो वह सहमति नहीं है। फ़ैसला वही ले सकता है, जो हर तरह से आज़ाद है। ख़ासतौर से दिमाग़ से आज़ाद है। किसी भी तरह की सत्ता के क़ाबू में नहीं है। प्रेम की सत्ता के क़ाबू में भी नहीं है।
सहमति या रज़ामंदी क्यों ज़रूरी है?
इसका जवाब एक सवाल से ही दिया जा सकता है। हमें सहमति की परवाह कब नहीं रहती है? जब हम किसी से ख़ुद को श्रेष्ठ मानते हैं। बड़ा मानते हैं। ताक़तवर मानते हैं। अपने सामने वाले को कुछ नहीं मानते-समझते। अपने पास अनेक तरह की सत्ता महसूस करते हैं। तब हमें लगता है कि हम जो कर रहे हैं, वह हमारा हक़ है। यही सहमति है। इसके लिए हमें किसी से पूछने की क्या ज़रूरत है। यह सत्ता लिंग की हो सकती है। धर्म की हो सकती है। जाति की हो सकती है। वर्ग या पैसे की हो सकती है। जेंडर की हो सकती है।
हम एक ऐसे समाज में रहते हैं, जहाँ हम हर तरह के भेदभाव और ग़ैर-बराबरी ख़त्म करने की बात करते हैं। वहाँ हर क्षण सहमति या रज़ामंदी की ज़रूरत है। सहमति किसी के वजूद को मानना है। किसी को इंसान मानना है। उस इंसान को ख़ुद के बराबर का इंसान मानना है। यानी उसकी इच्छा और सहमति के बिना कुछ नहीं, यानी कुछ नहीं करना है। रुबियालेस ने हार्मोस के साथ जो किया वह ऐसा नहीं था।
सहमति की संस्कृति और दायरा
कुछ सहमति हम मान लेते हैं। इसका रिश्ता बहुत हद तक स्थानीय संस्कृति से भी है। स्पेन में गाल पर चूमना वहाँ की संस्कृति का हिस्सा हो सकती है। भारत में नहीं है। लेकिन गाल पर चूमना और होंठों पर चूमना एक ही बात नहीं है। यहाँ उस दायरे का उल्लंघन है, जो वहाँ की संस्कृति से तय है।
हमारे यहाँ होली के मौक़े पर सांस्कृतिक तौर पर हँसी-मज़ाक और शरीर से खेलने का रिवाज है। अक्सर इसकी आड़ में बिना सहमति के दायरे का इसी तरह उल्लंघन होता है।
इसलिए सहमति में दायरा समझना निहायत ज़रूरी है।
मर्दों को यह सहमति आसानी से क्यों नहीं समझ में आती?
मर्दों को यह सहमति आसानी से समझ में नहीं आती। उन्हें बताया गया है कि वे लड़कियों और स्त्रियों से श्रेष्ठ हैं। वे ख़ुद को मान भी लेते हैं। यही नहीं, वे यह भी सीखते हैं कि लड़कियाँ या स्त्रियाँ उनके लिए हैं। यानी उनकी सेवा के लिए हैं।
यानी वे उनके मन बहालने का ज़रिया हैं। उनका वजूद ही इसलिए है कि वे लडक़ों/ मर्दों की ख़्वाहिश पूरी करें। जब संस्कार ऐसे दिए जाएँगे तो सहमति का हाल क्या होगा? सहमति की परवाह ही नहीं की जाएगी। जैसे रुबियालेस ने नहीं की। जैसे कुछ और लोगों ने नहीं किया।
किसी लडक़ी से सट कर खड़े होते वक़्त, उसके कंधे या पीठ पर हाथ रखने या गले या कमर में हाथ डालने से पहले कितने लडक़े पूछते हैं या इजाज़त लेते हैं या इजाज़त का इंतज़ार करते हैं? या बस झट से हाथ यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ रख देते हैं? या गले पड़ जाते हैं? ये मर्दाना व्यवहार हैं। ग़लत हैं।
यह कहने से काम नहीं चल सकता है कि हमारी नीयत साफ़ थी। नीयत महत्वपूर्ण है। लेकिन उससे काफ़ी महत्वपूर्ण है, सामने वाला हमारे व्यवहार को कैसे समझता या लेता है। कई बार हम हम अनजाने में भी दायरे का उल्लंघन करते हैं। इसलिए व्यवहार में लगातार सचेत रहना बेहद ज़रूरी है।
एक और बात है। मर्दवादी नज़रिया है कि लड़कियों/ महिलाओं में ख़ुद सोचने-समझने की ताक़त नहीं होती। इसलिए उनमें सहमति देने की भी सलाहियत नहीं होती। इसीलिए उनकी सहमति लेना अहम नहीं है। यही नहीं, कुछ ख़ास तरह के व्यवहार को ही सहमति मान लिया जाता है। सहमति का मतलब साफ़ सहमति ही होनी चाहिए।
लड़कियों को भी खुलकर ‘न’ कहना सीखना होगा
पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों को भी अपने लिहाज़ से सिखाता है। ढालता है। सिखाता है कि वे ‘हाँ’ की स्थिति में भी ‘न’ कहें। क्योंकि एक ‘अच्छी लडक़ी’ कभी ‘हाँ’ नहीं कहती है। उसे न तो कभी ‘हाँ’ कहना चाहिए और न ही कभी पहल करनी चाहिए। ऐसा करने वाली लड़कियाँ बुरी होती हैं। इसी के बरअक्स सीख लडक़ों और मर्दों को दी जाती है। यानी अगर कोई लडक़ी ‘न’ कहे तो उसे ‘हाँ’ ही मानो। लडक़ी कभी ‘हाँ’ नहीं कहती है/ कहेगी। लडक़ी कभी पहल नहीं करती, इसलिए तुम पहल करो। आक्रामक पहल करो।
मर्द ऐसा ही करते हैं। लडक़ों और मर्दों के दिमाग़ में भी बैठाया गया है, ‘हाँ’ कहने और पहल करने वाली लड़कियाँ अच्छी नहीं होतीं। ये सीख लडक़ों के बड़े काम की है। लड़कियाँ सचमुच में ‘न’ कहती रहती हैं, वे उसे ‘हाँ’ समझते रहते हैं। लड़कियाँ जितनी शिद्दत से ‘न’ कहती हैं, वे उतनी शिद्दत से उसे ‘हाँ’ मानकर आक्रामक बढ़त लेते हैं। हमला करते हैं।
सहमति या रज़ामंदी एक बार ही काफ़ी नहीं है
सहमति के साथ एक और बहुत गंभीर बात है। सहमति अभी है। इसका क़तई मतलब नहीं कि सहमति ताउम्र के लिए है। सुबह किसी चीज़ के लिए सहमति है तो शाम में नहीं हो सकती है।
स्त्री की तरफ़ से इच्छा और सहमति बार-बार और हर बार पता चलनी ज़रूरी है। यही नहीं, कोई रिश्ता किसी स्त्री से ताउम्र सहमति हासिल कर लेने का सर्टिफिक़ेट भी नहीं है। चाहे वह रिश्ता दोस्ती का हो या प्रेमी-प्रेमिका का या फिर पति-पत्नी या पार्टनर का। ‘न’ इन सब रिश्ते में भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना किसी और जगह या रिश्ते में। ‘न’ का मतलब हमेशा ‘न’ ही माना जाए। ‘हाँ’ मानने की परम्परा तोड़ी और छोड़ी जाए। किसी के लिए भी किसी के ‘न’ का सम्मान और अपनी ‘हाँ’ पर नियंत्रण निहायत ज़रूरी है।
रूबियालेस और हर्मोसो के बीच जो हुआ, वह सम्मानजनक नहीं था। कुछ दिनों पहले हमारे देश में भी अनेक महिला खिलाड़ी सडक़ पर थीं। उस वक्त भी सवाल कुछ ऐसे ही थे। हर्मोसो के साथ वहाँ की जनता और सरकार खड़ी है।
हमलोग यहाँ का हाल देख चुके हैं। एक सभ्य समाज आपसी रिश्ते में सहमति और इच्छा पर ही टिका रह सकता है।जहाँ दूसरों पर अपनी इच्छा और मर्जी थोपी जाए यानी किसी न किसी रूप में ज़बरदस्ती की जाए, उस समाज का सभ्य होना अभी बाक़ी है।
(bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के.पालीवाल
पहले कार्यकाल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी देश के अधिकांश नागरिकों के लिए अबूझ पहेली की तरह थे। गुजरात में उन्होंने बहुत लंबा और उतना ही विवादित प्रशासन चलाया था। वहां की अधिसंख्य आबादी में उनकी लोकप्रियता भी चरम पर थी जिसका लाभ उन्हें पहले भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष पुरुष बनने में हुआ और फिर उनकी संसद की धरती को चूमने वाली, कभी खुद को चौकीदार, फकीर और चाय बेचने वाला आदि प्रचारित करने वाली मनमोहक अदाओं ने गुजरात के बाहर भी देश की बडी आबादी को सम्मोहित कर लिया था।प्रधानमन्त्री के रुप में उनका दूसरा कार्यकाल उतना सम्मोहन भरा नहीं रहा जैसे पहला था जिसमें बिना खास तैयारी किए नोटबंदी जैसे जल्दबाजी में उठाए गए और देश की अर्थ व्यवस्था को बहुत सुस्त कर देने वाले गलत कदम को भी जनता ने हंसी खुशी यह मानकर स्वीकार कर लिया था कि इससे आतंकवादियों और भ्रष्टाचारियों का काला धन नष्ट हो जाएगा हालांकि ऐसा हुआ नहीं।
दूसरे कार्यकाल में उनके कीमती और फैशनेबल कपड़ों ने उनकी फकीरी और चाय बेचने वाली गरीबी की धज्जियां उड़ा दी हैं। बहुत महंगे सूट से लेकर त्रासदी के समय में भी डिजाइनर ड्रेसों ने उनकी शालीन और संवेदनशील छवि को धूमिल किया है। सबसे ज्यादा अडानी समूह से आत्मीय संबंधों को लेकर उनकी चौकीदार वाली छवि भी काफ़ी हद तक तार तार हुई है। इसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ा है।उनके कार्यकाल में हुए जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने और राम मंदिर विवाद सुलझने के बाद उसके निर्माण को गति प्रदान करने आदि कई कामों ने उनकी लोकप्रियता को अभी भी काफ़ी हद तक बचाकर रखा है लेकिन वह अब पहले जैसे उच्च शिखर पर नहीं है।
कुछ-कुछ इसी तरह की स्थिति यू पी ए सरकार में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी हुई थी। लम्बे समय तक एक दल के शासन में सरकार के खिलाफ जन आक्रोश उभरना स्वाभाविक भी है। जिस तरह से तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सीधे मनमोहन सिंह पर कोयला घोटाले की जिम्मेदारी डाल रही थी उसी तरह विपक्षी दलों ने भी अब सीधे प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधना शुरु कर दिया है। संसद से सडक़ और सार्वजनिक सभाओं में उनकी कार्यशैली पर बारंबार उंगलियां उठ रही हैं। चाहे मणिपुर की लंबी हिंसा और महिलाओं के साथ आज़ादी के बाद के जघन्यतम अपराधों पर उनकी लंबी चुप्पी हो या प्रवर्तन निदेशालय, सी बी आई और इनकम टैक्स विभाग की विरोधियों पर ताबड़तोड़ कार्यवाही हों या हिंडनवर्ग रिर्पोट में अडानी समूह पर आर्थिक अपराध के आरोपों पर समुचित कार्यवाही नहीं करने के आरोप हों उन्हें उसी तरह से विपक्ष कठघरे में खड़ा कर रहा है जैसे कभी वे ख़ुद और भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेता तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके दूसरे कार्यकाल में कठघरे में खड़ा किया करते थे।
इतिहास खुद को बार बार दोहराता है। जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले आर्थिक घोटालों, गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल के बढते दामों, महंगाई और बेरोजगारी पर यू पी ए सरकार को घेरा जा रहा था वैसी ही स्थिति में दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घिरते नजर आ रहे हैं। उन्हें घेरने के लिए पिछ्ले दो तीन महीने से कई विपक्षी दल निरंतर लामबंद हो रहे हैं। पटना के बाद बैंगलोर में दो लम्बी बैठकों के दौर के बाद तीसरे दौर की बैठक हाल ही में मुंबई में हुई है।2019 में विपक्ष बुरी तरह बिखरा हुआ था जिसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला था। इस बार विपक्ष भी करो या मरो की स्थिति से गुजर रहा है इसलिए पूरी आक्रामकता के साथ सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कटघरे मे खड़ा कर रहा है। इस बार 2024 का लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उनके जीवन की अब तक की सबसे कड़ी अग्नि परीक्षा साबित हो सकता है।


