विचार/लेख
-डॉ. आर.के. पालीवाल
अखबारी विज्ञापनों में भले ही मध्य प्रदेश सरकार के कितने ही चमकीले दावे हों, बीस साल सत्ता की रिर्पोट कार्ड पुस्तिका में चाहें उसने कितने ही सेहरे अपने नाम बांधे हों लेकिन मध्य प्रदेश सरकार के लिए आने वाले विधान सभा चुनाव में जमीनी स्थितियां काफी कठिन हैं। पिछ्ले तीन साल में कई कारणों से एंटी इनकंबेंसी फैक्टर काफ़ी ऊंचा उठा है। एक तो मध्य प्रदेश में भाजपा द्वारा नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को दरकिनार करते हुए जनता द्वारा कांग्रेस को सौंपी गई सत्ता का अपहरण किया गया था और दूसरे भाजपा के अंदर भी सत्ता में भागीदारी को लेकर पहले से ही कई खेमों के साथ ज्योतिरादित्य के साथ भाजपा में प्रवेश पाए कांग्रेसियों का एक और नया वर्ग बन गया है। इन विषम परिस्थितियों में भाजपा के डूबते जहाज के लिए महत्वाकांक्षी लाडली बहना योजना तिनके का सहारा बन सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या लाडली बहना योजना के प्रभाव से महिलाएं अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति भाजपा को वोट के रुप में दिखा पाएंगी। यह विश्लेषण भी किया जाना चाहिए कि क्या तीन तलाक कानून के बाद मुस्लिम समुदाय की महिलाओं ने केन्द्र में मोदी सरकार को परिवार के पुरुषों से अलग होकर वोट दिया है! और क्या उज्जवला योजना के कारण हुई सुविधा की बदौलत महिलाओं ने धर्म और जाति से आगे बढक़र भाजपा को वोट दिया है! क्या महिला सशक्तिकरण के नाम पर एक तिहाई महिला सरपंचों ने अपने पतियों को किनारे खड़े कर स्वतंत्र रूप से पंचायतों के काम संभाल लिए हैं! यदि इन सब प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं तब शिवराज सिंह चौहान का गरीब महिलाओं को वोट के लिए लुभाने का लाडली बहना योजना दांव उल्टा पड़ सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि किसानों को केन्द्र से आर्थिक सहायता मिलने के बावजूद ज्यादा किसानों का वोट भाजपा को नहीं मिला अन्यथा भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के गृह प्रदेश हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में भाजपा को सत्ता से बेदखल नही होना पड़ता क्योंकि दोनों राज्यों में किसानों की काफी बडी आबादी है। मध्य प्रदेश में सडक़ों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। नेशनल हाईवे के अलावा अधिकांश स्टेट हाईवे और ग्रामीण सडक़ों की कई साल से मरम्मत नहीं हुई है। भोपाल नगर निगम क्षेत्र की भोजपुर और जैन मंदिर जाने वाली प्रमुख सडक़ तक जर्जर है। सरकारी कर्मचारियों की उन्नतालिस सूत्रीय मांगों के लिए सामूहिक अवकाश पर जाना लोकसेवकों की नाराजगी का पुख्ता सबूत है। व्यापम की छाया अभी खत्म नहीं हुई और पटवारी भर्ती परीक्षा को गम्भीर धांधली के आरोपों के बाद स्थगित करना इस बात को इंगित करता है कि मध्य प्रदेश में नकल माफिया और घोटालेबाज काफी सक्रिय हैं।
प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के मामले में भी एनजीटी द्वारा प्रदेश के मुख्य सचिव को लगाई फटकार और प्रदेश सरकार पर लगाए पांच लाख रुपए के ऐतिहासिक जुर्माने से पता चलता है कि प्रदेश के प्रशासन की स्थिति चिंताजनक है।
यदि लाडली बहना योजना के कारण मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की वापसी होगी तो इसके मध्य प्रदेश और देश की राजनीति पर व्यापक असर होगें जिसका प्रभाव 2024 के लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। महिलाओं की आधी आबादी चुनावों को प्रभावित करने वाले एक बड़े वर्ग के रुप में उभरेगी जो निकट भविष्य में किसी धर्म,जाति, क्षेत्र और विशेष विचारधारा के वोट बैंक से भी अधिक प्रभावी हो सकता है। इसी तरह भविष्य में रेवड़ी कल्चर भारतीय लोकतंत्र का सबसे प्रभावी मुद्दा बन सकता है जो राष्ट्र के लिए निश्चित रूप से नुकसानदायक साबित होगा लेकिन सत्ता लोलुप राजनीतिक दलों के लिए सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के लिए सबसे सुगम और आकर्षक पगडंडी बन सकता है।
-डॉ. आर.के. पालीवाल
चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें, वर्तमान राजनीतिक दौर में बहुत कम नेता ऐसे बचे हैं जिनके काम और उससे भी ज्यादा उनका आचरण और सिद्धांत जनता को प्रभावित करते हैं। इसीलिए चुनावों के वक्त प्रधानमन्त्री से लेकर मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों तक का आत्म विश्वास डगमगाने लगता है। सत्ता का स्वाद चख चुके नेताओं को सुविधाओं और रूतबे की ऐसी लत लग जाती है कि वे आजीवन सत्ता से चिपकने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहते हैं। यही वजह है कि वे कभी विज्ञापनों के जरिए, कभी रैलियों के जरिए अपने छोटे छोटे कामों को बढ़ा चढ़ाकर और विरोधियों की छोटी छोटी गलतियों और खामियों को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत कर तरह तरह से जनता को भ्रमित कर वोट बटोरने की कोशिश करते हैं।केंद्र में सत्ता के लिए लालायित राष्ट्रीय दल हर चुनाव में कभी गरीबी हटाओ, कभी भ्रष्टाचार हटाओ और कभी राम जन्मभूमि जैसे धार्मिक मुद्दों को हथियार बनाकर सत्ता प्राप्त करते रहे हैं।
ऐसा लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव सनातन के मुद्दे पर केंद्रित करने के लिए प्रधानमन्त्री और उनके मंत्रिमंडल की तैयारी हो गई है। प्रधानमन्त्री ने इसकी शुरुआत भी मध्य प्रदेश के बीना शहर से कर दी है। उन्होंने शुरुआत भी बहुत सोच समझ कर इस तरह की है कि इसका मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों पर असर पड़ेगा। इस आयोजन में प्रधानमन्त्री के रथ पर एक तरफ मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान विराजमान थे और दूसरी तरफ़ मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष वी डी शर्मा मौजूद थे। मतलब साफ है कि जब प्रधानमन्त्री सरकार और संगठन के मुखियाओं की उपस्थिति में सनातन मुद्दे पर शंखनाद कर रहे हैं तो यह संदेश सरकार के मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों से होते हुए बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं तक जाना है।
चुनाव को धर्म पर आधारित करने की भारतीय जनता पार्टी की हसरत को पूरा करने के साधू संतों के एक बड़े वर्ग ने भी एक व्यापक कार्यक्रम बनाया है। इसमें एक हजार संत काशी से एक यात्रा शुरु करने की योजना बना रहे हैं जो हिंदू बहुल पांच लाख़ गांवों में पहुंचकर राम मंदिर की योजना का खाका जनता को बताएंगे। चुनावी वर्ष में इस यात्रा का लाभ भाजपा को ही मिलेगा क्योंकि वह खुद भी जोर शोर से सनातन धर्म के मुद्दे को इतना तूल दे रही है।हाल ही में केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी एवम प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की अनन्य प्रशंसक स्मृति ईरानी ने भी कहा है कि आगामी चुनाव धर्म और अधर्म के बीच होगा। इसे भी प्रधानमन्त्री के सनातन धर्म वाले बयानों से जोडक़र देखा जाए तो वे शायद यही कहना चाहती हैं कि यह चुनाव सनातन धर्म के रक्षकों अर्थात भारतीय जनता पार्टी और उनके गठबंधन एन डी ए के साथियों और सनातन धर्म के विरोधियों के मध्य है।
इंडिया गठबंधन के लिए सनातन धर्म का मुद्दा गले की हड्डी बन गया है। सनातन धर्म के उन्मूलन की सार्वजनिक वकालत करने वाले तमिलनाडू सरकार के मंत्री उदयनिधी स्टालिन अपने बयान पर कायम हैं और उनके मुख्यमंत्री पिता के समर्थन के कारण उनके दल के दूसरे बड़े नेता भी उनके साथ खड़े हैं। ऐसे में कांग्रेस सहित गठबंधन के उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना आदि दलों के सामने विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और विशेष रूप से प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने इसीलिए सनातन धर्म के मुद्दे को इतना अहम बनाया है जिसके सहारे एंटी इनकंबेंसी फैक्टर, महंगाई, बेरोजगारी, अमीर गरीब के बीच बढ़ती खाई और अडानी समूह के कथित भ्रष्टाचार के मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाकर चुनावी नैया पार की जा सके। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के साथी राजनीतिक दल निकट भविष्य में इस मुद्दे से कैसे छुटकारा पाते हैं और धर्म की जगह कैसे अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दों को चुनाव के केंद्र में लाते हैं यह गठबंधन की आगामी बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा।
एशिया कप के फाइनल मुकाबले में मोहम्मद सिराज की धारदार गेंदबाजी की चर्चा पड़ोसी मुल्कों में भी ख़ूब हो रही है।
रविवार को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के आर प्रेमदासा स्टेडियम में मोहम्मद सिराज ने सात ओवर में 21 रन देकर छह विकेट लिए थे।
सिराज की इसी गेंदबाजी की बदौलत श्रीलंका के सभी खिलाड़ी महज 50 रन बनाकर ही आउट हो गए थे।
सिराज ने चार विकेट तो केवल एक ओवर में गिरा दिए थे।
भारत ने फाइनल मुकाबला 10 विकेट से जीत लिया।
सिराज की सनसनी और भारत की इस जीत की चर्चा पाकिस्तान में भी ख़ूब हो रही है।
‘मैच जीता, इनाम की रकम
ग्राउंड स्टाफ को दे दी’
पाकिस्तान के तेज गेंदबाज रहे शोएब अख्तर ने तो यहाँ तक कह दिया कि वर्ल्ड कप में भारत सबसे खतरनाक टीम हो सकता है।
शोएब अख्तर ने अपने यूट्यूब चैनल पर कहा, ‘मोहम्मद सिराज ने मैच जिताया और उन्हें जो इनाम में रकम मिली, उसे ग्राउंड स्टाफ को दे दिया।’
‘आपने कमाल की गेंदबाज़ी की। हार्दिया पांड्या ने तीन विकेट लिए और भारत ने क्या खेल दिखाया। भारत आत्मविश्वास के साथ वल्र्ड कप में जा रहा है। अभी ऑस्ट्रेलिया के साथ तीन वनडे भी हैं। अगर इनमें भी भारत को जीत मिलती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत की टीम में कितना आत्मविश्वास होगा।’
शोएब अख़्तर ने कहा, ‘भारत ने एक बेहतरीन टीम के सारे बॉक्स टिक कर दिए हैं। रोहित शर्मा भी बेहतरीन फैसले लिए हैं। मुझे लगता है कि भारत की टीम वल्र्ड कप के लिए खतरनाक हो गई है।’
पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के पूर्व चेयरमैन रमीज राजा ने भी भारत और मोहम्मद सिराज की जमकर तारीफ की।
रमीज राजा ने अपने यूट्यूब चैनल पर कहा, ‘मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा कि होम टीम को इस तरह से मार पड़ी हो क्योंकि होम पिच को लेकर अंदाज़ा रहता है। वर्ल्ड कप से पहले श्रीलंका 50 रन पर ऑलआउट होने की कोई वजह नहीं दे सकता है।’
‘टॉस भी आपने जीता और बल्लेबाज़ी का भी फ़ैसला आपने अपनी मजऱ्ी से किया। मैदान भी आप ही का था। मेरे हिसाब से श्रीलंका वाले कुछ कहने के लायक नहीं रहे हैं।’
रमीज़ राजा ने कहा, ‘श्रीलंका के बल्लेबाज़ों ने बेकार खेल दिखाया। गेंदबाजी का इतना बड़ा खेल बहुत लंबे समय देखने को मिला है। भारत के गेंदबाजों ने पिच का बेहतरीन इस्तेमाल किया। श्रीलंका को सोचने की जरूरत है, उसे इस मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर निकलने में वक्त लगेगा।’
‘मोहम्मद सिराज की गेंदबाजी में क्या स्पीड और स्विंग दिखी। हर चीज उसकी गेंदबाजी में थी। गेंदबाजी एक्शन भी कमाल का था। अच्छी बात यह है कि भारत के गेंदबाज एक-दूसरे के प्रदर्शन को इंजॉय करते हैं। यहाँ एक दूसरे से ईर्ष्या नहीं करते हैं।’
रमीज़ राजा ने कहा, ‘भारत इससे अच्छी स्थिति में नहीं हो सकता है। एशिया ब्लॉक क्रिकेट के मामले में बहुत स्किलफुल है। मोहम्मद सिराज ने साबित कर दिया है कि उनकी गुणवत्ता क्या है। दुनिया के क्रिकेट में उन्हें अब बहुत खतरनाक माना जाएगा।’
वहीं पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर राशिद लतीफ ने कहा, ‘कई बार होता है कि गेंद पीछे नहीं जाती। मतलब, जाएगी तो बल्ले पर लग कर जाएगी और अंदर जाएगी तो पैड से लगकर जाएगी। मोहम्मद सिराज ने रविवार को ऐसा ही किया। वल्र्ड कप से पहले भारत को बहुत बड़ी बढ़त मिली है। राहुल द्रविड़ और रोहित शर्मा की बड़ी कामयाबी है। एशिया कप से पहले ऐसा नहीं लग रहा था।’
उन्होंने कहा, ‘जिस टीम के छह और सात नंबर भी तगड़े हों, वो टीम और मजबूत हो जाती है। भारत के साथ ऐसा ही है। भारत का प्लेइंग 11 शानदार है। मैं नहीं मानता हूँ कि श्रीलंका की टीम फालतू है। कभी-कभार ऐसा हो जाता है। श्रीलंका के साथ ऐसा ही हुआ है।’
सुनील गावस्कर ने भी मोहम्मद सिराज की गेंदबाजी की पाकिस्तान की न्यू बॉल अटैक से अलग बताया है।
सुनील गावस्कर ने इंडिया टुडे से कहा, ‘ईमानदारी से कहूँ तो मैं याद नहीं कर पा रहा हूँ कि ऐसा कब हुआ था। लेकिन यह बता सकता है कि न्यू बॉल अटैक की धार भारत के पास आ गई है। कई लोग पाकिस्तान की न्यू बॉल अटैक की बात कर रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यह इंडियन न्यू बॉल अटैक है। बुमराह को भले ज़्यादा विकेट नहीं मिले लेकिन दबाव बनाने में कामयाब रहे हैं।’
पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी ने मोहम्मद सिराज की तारीफ़ करते हुए कहा, ‘ऐसा लग रहा था टेस्ट मैच की गेंदबाजी हो रही है।
नई गेंद का इस्तेमाल सिराज ने बहुत ही बेहतरीन तरीक़े से किया है। हमें पहले से ही लग रहा था कि मैच एकतरफ़ा होगा।’
मोहम्मद सिराज को लेकर एक पाकिस्तानी एंकर ने टीम इंडिया के हिस्सा रहे और जाने-माने क्रिकेटर सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर से पूछा कि सिराज जब भी अच्छा करते हैं तो विराट कोहली बहुत ख़ुश होते हैं और मुस्कुराने लगते हैं।
इस सवाल के जवाब में रोहन ने कहा, ‘विराट और सिराज के बीच बहुत ही तगड़ी बॉन्डिंग हैं। न केवल खेल के मैदान में बल्कि उससे बाहर भी। मुझे लगता है कि इसमें राहुल द्रविड़ का भी योगदान है। वह टीम का माहौल पर ख़ुशनुमा बनाकर रखते हैं।’ (bbc.com/hindi)
- जगदीश रत्नानी
किंग खान या एसआरके के नाम से भी जाने जाने वाले शाह रुख खान ‘जवान’ फिल्म के साथ बॉक्स ऑफिस पर छाए हुए हैं। फिल्म ने पहले तीन दिनों में ही 350 करोड़ कमा लिए। बॉलीवुड मूवी के खयाल से यह सबसे बड़ा ओपनिंग रिकॉर्ड है। माना जा रहा था कि शाह रुख का कॅरियर ढलान पर है लेकिन यह धूमधड़ाके के साथ उनकी वापसी है।
शाह रुख का जादू इस बार दक्षिणी राज्यों में अपने काम के बल पर जानी जाने वाली नयनतारा और तमिल सिनेमा के विजय सेतुपति और निर्देशक एटली कुमार के साथ काम कर रहा है। उत्तर और दक्षिण की संयुक्त प्रतिभा का यह पैकेज है जिसे राष्ट्रीय दर्शकों का प्यार मिल रहा है। लगभग पौने तीन घंटे की इस मूवी के बारे में प्रोड्यूसर कंपनी- रेड चिलीज इंटरटेनमेंट इन शब्दों में बताती है: बिल्कुल आग भडक़ा देने वाला एक्शन थ्रिलर जो ऐसे आदमी की भावनात्मक यात्रा को दर्शाता है जो समाज में हो रही गड़बडिय़ों को सुधारने निकला है।
यह कहने की जरूरत नहीं कि इसमें बहुत कुछ खास किस्म का बॉलीवुड मसाला है। लेकिन यह फिल्म ‘समाज में गड़बडिय़ों’ को जिस तरह सामने लाती है, वह बहुत वास्तविक है। ‘जवान’ खास राजनीतिक उलटबांसियों के साथ दमदार प्रस्तुति है जिसे काफी लोग इस खास राजनीतिक माहौल में गहरे जोखिम के तौर पर देखते हैं।
मूवी में सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडरों की कमी की वजह से रोगियों की मौत, किसान आत्महत्याएं, हमारे सैनिकों को नुकसान पहुंचाने वाले घटिया हथियारों के लिए होने वाले सौदों, पानी और हवा को प्रदूषित करने वाले कारखानों या कुछ खास चलते-पुरजे व्यवसायियों को सुरक्षा देने की बातें हैं जो आज की तारीख में वास्तविक या कुछ खास हैं।
ऐसे में, यह मूवी समाज में होने वाली गड़बडिय़ों के खिलाफ आम अभियान से बहुत आगे जाती है जहां आवारा दलालों, भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, या अपने हक के लिए रोजाना संघर्ष करने वाले आम आदमी की पीड़ाओं का आम तौर पर स्टीरियोटाइप चित्रण होता है।
‘जवान’ में निश्चित तौर पर बहुत कुछ जातिवाचक संज्ञाएं हैं लेकिन हवा में व्यक्तिवाचक संज्ञाएं हैं। उस अर्थ में, एसआरके और टीम ने ऐसे ज्वलंत राजनीतिक सवालों को उठाने के लिए बच निकलने वाले मसालों का उपयोग करते हुए अवास्तविक घटनाओं की चाशनी में वास्तविक मुद्दों को बेधडक़ सामने रखा है जिसे लोग देख सकते हैं, इससे अधिक लोग महसूस कर सकते हैं लेकिन बॉलीवुड में कुछ ही आज के राजनीतिक माहौल में पूछने का साहस कर सकेंगे।
काफी पहले यह माना जाता था कि बॉलीवुड इसलिए काम करता है क्योंकि वह करोड़ों लोगों के जीवन-यापन की रोजाना की पीड़ाओं से दूर खाली-पीली नाच-गाने वाली चीजें पेश करता है। पिछले दशकों में स्थितियां बदली हैं- शुरुआती रोमांस की कहानियों और अमीर-गरीब पर टीका-टिप्पणी के बाद एंग्री यंग मैन, दिलेर रोमांस वगैरह का दौर आया और फिर, उत्तर-उदारीकरण की वजह से कम कीमत वाले प्रोडक्शन शुरू हुए जिसने नए थीम के प्रयोग किए।
बदलते समय ने बड़े परदे पर आज के मुद्दों को सामने उठाना शुरु कर दिया है, जैसे लिव-इन संबंध, एलजीबीटीक्यू+ अधिकार और संबंध, जाति संघर्ष, ‘मुठभेड़’ में की जाने वाली हत्याएं, ग्रामीण-शहरी विभाजन, ऑटिज्म, अकेलापन, मानसिक स्वास्थ्य, वगैरह। कुछ सालों में कई फिल्मों में राजनीतिक संदेश थे और, एक तरीके से, बॉलीवुड सब दिन राजनीतिक था लेकिन परोक्ष तरीके से। यह सुरक्षित इलाके में काम करता था- ज्यादातर लोग आंखों में आंखें डालकर सत्ता को नहीं देखते थे।
यह एक ऐसी जगह मानी जाती थी जहां नाच-गाना प्रमुख था और कुल मिलाकर सब कुछ मनोरंजन और ग्लैमर वाला था। उद्योग रचनात्मक खोज के लिए फॉर्मूले को बेहतर मानता है, खासतौर से अच्छी-खासी फीस वाले रॉकिंग स्टार द्वारा की गई लोकप्रिय बिग बजट वाली फिल्में।
क्या ‘जवान’ की सफलता के साथ यह परिदृश्य बदल जाएगा? बॉलीवुड के लिए हमारे पास नया रास्ता है, ऐसा रास्ता जो अपने किस्म के खास संदेशों के लिए अपने बड़े और बेमिसाल सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल कर सकता है। इस मायने में, इस मूवी ने सबको संदेश दिया है और नई कल्पनाओं और संभावनाओं के ऐसे दरवाजे खोले हैं जिन्हें बॉलीवुड कर सकता है।
इस मूवी की एक खास बात इसका एक भाषण है जो दिखाता है कि एसआरके नागरिकों को यह चुनने को कहते हैं कि सही सवाल उठाने के बाद वे वोट करेंगे: उम्मीदवार महोदय, आप अगले पांच साल में क्या करेंगे? अगर परिवार में कोई बीमार होता है, तो आप उनके लिए क्या करेंगे? हमें रोजगार दिलाने के लिए आप क्या करेंगे? संदेश स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के क्षेत्रों में सेवा देने की मांग और धर्म, नस्ल या जाति के नाम पर न भटकने को लेकर है।
लेकिन ये ही वे सवाल और मुद्दे हैं जो आज की तारीख में भारत में केंद्र में नहीं हैं और जिन्हें आम जनता के सामने सफल मसाला फॉर्मेट के तौर पर रखा जा सकता है। इन सेवाओं को देना सुनिश्चित करने की बात इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के परिप्रेक्ष्य में है जो 2024 चुनावों के ज्वलंत संदर्भ में है। इनमें से कोई भी परिष्कृत काम या हमारे वक्त की विषम राजनीतिक मुद्दों की आलेचनात्मक परीक्षा नहीं है।
हिन्दी फिल्म उद्योग ऐसी जगह है जहां वास्तविक बात काम की गुणवत्ता और दर्शकों द्वारा स्वीकार्यता है, इससे कोई सरोकार नहीं जो कुछ स्वर्गीय सुशांत सिंह राजपूत के नाम पर पर कहा गया।
दर्शकों को सपनीली दुनिया में ले जाने के लिए हिन्दू, मुसलमान और अन्य धर्मों के लोग मिल-जुलकर यहां काम करते हैं। यह प्रभावी व्यवसाय और अच्छे से चलने वाली मशीनरी है लेकिन अपने कुछ बहुत ही कुटिल चाणक्यों से अधिक ही यह जनसाधारण की नब्ज पर हाथ रखने के लिए जाना जाता है।
एसआरके के ‘जवान’ ने लोकप्रिय रहते हुए बोलने का दायरा बढ़ा दिया है। इस बात की प्रशंसा की जानी चाहिए, इसकी सुरक्षा की जानी चाहिए और इसे बढ़ाना चाहिए। इस मायने में, फिल्म की सफलता अच्छी खबर है। (navjivanindia.com/) (जगदीश रतनानी पत्रकार और एसपीजेआईएमआर में फैकल्टी सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)
-अरुण दीक्षित
एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पेश हुआ है। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 1996 से लेकर अब तक की यह छठी कोशिश है। लेकिन यह पहली बार है जब किसी प्रधानमंत्री ने इतने विश्वास के साथ अचानक इसे पेश किया है। इस विश्वास की मूल वजह संसद सदस्यों का वह आंकड़ा है जो यह बता रहा है कि भले ही इस विधेयक पर विचार विमर्श नहीं किया गया है लेकिन संख्या बल इसे पारित करा सकता है।
शायद यही वजह है कि अतिआत्मविश्वास से लबरेज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में यह कहते सुने गए कि- यह सपना अधूरा था! ईश्वर ने इसके लिए मुझे चुना!अब यह तो ईश्वर ही जानते होंगे कि उन्होंने मोदी को चुना है या फिर मोदी ने विधान सभा और लोकसभा चुनाओं को ध्यान में रख कर इस विधेयक को संसद में लाने के लिए यह समय चुना है। क्योंकि यह साफ है कि अभी संसद में पारित हो जाने के बाद भी यह विधेयक लागू नही हो पाएगा। अगर सब कुछ ठीक रहा तो 2029 में इसका असर दिखाई देगा। अभी यह सिर्फ चुनावी सभाओं में श्रेय लेने के काम आएगा। 5 राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को यदि छोड़ भी दें तो यह 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह लागू नहीं हो पाएगा।
उनकी मंशा और रणनीति पर बात करने से पहले एक नजर महिला आरक्षण को लेकर इससे पहले हुई कोशिशों पर डाल लेते हैं।
संसद के इतिहास पर नजर डालने से पता चलता है कि चर्चा भले ही चलती रही हो पर पहली ठोस कोशिश केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार की अगुवाई कर रहे एच डी देवेगौड़ा ने की थी। करीब 27 साल पहले 12 सितंबर 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया था। लेकिन उसका सबसे मुखर विरोध उनकी सरकार में शामिल लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव ने किया था। इन तीनों नेताओं ने तब इस विधेयक पर क्या कहा था, संसद की कार्यवाही में दर्ज है। तब क्या क्या नहीं बोला गया था इस विधेयक के खिलाफ! और तो और खुद बीजेपी भी इसके पक्ष में नही थी। इसलिए इस विधेयक की अकाल मौत हो गई थी।
इसके बाद अटलबिहारी वाजपेई के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी।जानकारी के मुताबिक तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले अटल जी ने महिला आरक्षण विधेयक को पास कराने की तीन गंभीर कोशिशें की। चूंकि उनकी सरकार भी बैसाखियों पर टिकी थी इसलिए वे भी अपनी कोशिश में सफल नहीं हो पाए।
इसके बाद 2010 में यूपीए सरकार की अगुवाई कर डाक्टर मनमोहन सिंह ने इस दिशा में प्रयास किया। तब यह विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया था। लेकिन लोकसभा में पारित नही हो पाया था। मनमोहन सरकार भी सहयोगियों की बैशाखी के सहारे थी। इसलिए वे और उनकी पार्टी कांग्रेस भी कुछ ज्यादा नही कर पाई।
महिला आरक्षण को लेकर एक तथ्य यह भी है कि इस दिशा में सबसे पहली कोशिश पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी। उन्होंने 1989 में ग्राम पंचायतों, नगर पालिकाओं और नगर निगमों में महिलाओं को आरक्षण देने की बात की थी। उनके निधन के बाद 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की सरकार ने इस संबंध में कानून बनाया था।
यह तो था महिलाओं को आरक्षण देने की कोशिशों का इतिहास! अब बात करते हैं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। पिछले दस साल में यह साफ हो चुका है कि मोदी को मनमाने फैसले लेने की आदत है। जो उनके मन में आ जाए वे कर गुजरते हैं। नोटबंदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वैसे तो ऐसे फैसलों की सूची बहुत लंबी है। लेकिन अब संघ और बीजेपी सहित सभी समझ चुके हैं कि मोदी जो करना चाहते हैं, वह करते हैं। लोकसभा में संख्या बल उनके पास है।राज्यसभा में उनकी टीम कुशल प्रबंधन के जरिए बहुमत जुटा लेती है।
अतः लोकसभा चुनाव के 6 महीने पहले अचानक महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में "नारी शक्ति वंदन" की संज्ञा के साथ पेश किए जाने पर किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ। क्योंकि लोकतंत्र में चर्चा की जो जगह रही है उसे फिलहाल उन्होंने हाशिए पर धकेल रखा है। अपनी पार्टी के भीतर तो क्या वे जरूरी मुद्दों पर विपक्ष से भी चर्चा करना जरूरी नहीं समझते हैं। यही उनकी "लोकतांत्रिक कार्यशैली" है।
महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद प्रधानमंत्री ने भगवान की आड़ ली। उन्होंने कहा - यह अधूरा सपना था।ईश्वर ने इसके लिए मुझे चुना! अब ईश्वर से तो यह पूछ नहीं सकते कि आपने चुना या ये इकतरफा ऐलान आपके नाम पर किया गया है!लेकिन एक बात पूरी तरह साफ है कि मोदी इस विधेयक के जरिए एक बार फिर खुद को "चुनवाना" चाहते हैं। ईश्वर की आड़ उन्होंने स्थाई रूप से ले रखी है।
संसद में जो विधेयक पेश हुआ है उसके पारित होने में कोई संदेह नहीं है।संख्या बल उनके पास है। साथ ही आज जो हालात हैं उन्हें देखते हुए कोई भी राजनीतिक दल इसका विरोध करने की स्थिति में नहीं है।मतलब मैदान साफ है। नारी शक्ति वंदन का श्रेय सिर्फ और सिर्फ मोदी को ही मिलेगा। समर्थन करने या न करने वालों की कोई गिनती ही नहीं होगी।
अब यह सवाल कि आखिर महिला आरक्षण कब से लागू हो पाएगा। विधेयक का जो मसौदा संसद के सामने रखा गया है उसके मुताबिक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाने के बाद भी इसका लाभ महिलाओं को अगले लोकसभा चुनाव में नही मिलेगा। कानून बनने के बाद जनगणना होने और फिर उसके आधार पर लोकसभा सीटों का परिसीमन हो जाने के बाद ही महिलाओं के लिए आरक्षित होने वाली सीटें तय होंगी। राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों में यह आरक्षण लागू नहीं होगा।
यह स्पष्ट है कि 2026 से पहले महिला आरक्षण कानून बन जाने के बाद भी कागजों तक ही सीमित रहेगा। वर्तमान प्रारूप के मुताबिक अगर सब कुछ ठीक रहा तो 2027 में 8 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो पाएगा।
महिलाओं को आरक्षण देने के लिए संविधान में 128 बाँ संशोधन किया जा रहा है। अनुच्छेद 368 के मुताबिक संसद में पारित हो जाने के बाद भी संविधान संशोधन के लिए देश के आधे राज्यों की सहमति आवश्यक है। आज जो स्थिति है उसके हिसाब से राज्यों का जरूरी समर्थन आसानी से मिल जायेगा।
लेकिन इस काम में समय लगेगा। अगर सरकार चाहती तो यह काम तत्काल कर सकती थी।अगर ऐसा होता तो 2024 में लोकसभा में 181 महिला सांसद दिखाई देतीं! साथ ही यदि सरकार चाहे तो वह अब भी यह कानून तो बना ही सकती है कि सभी राजनीतिक दल 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देंगे। इसमें न किसी परिसीमन की जरूरत होती और न ही संसद में संशोधन विधेयक पारित कराने की।
अब होगा यह कि संसद में विधेयक पारित हो जाने के बाद भी महिलाओं को आरक्षण के लिए सालों तक इंतजार करना होगा।जनगणना और परिसीमन का काम कब तक हो पाएगा, यह आज बताने की स्थिति में खुद मोदी भी नहीं हैं।
हां एक बात जरूर है- मंगलवार से ही मोदी की "महिला मसीहा" के रूप में "प्राणप्रतिष्ठा" शुरू हो गई है। संघ और बीजेपी के साथ साथ गोदी मीडिया भी इस काम में जुट गया है। मोदी तो हर मंच पर सीना ठोंक कर और ताली बजाकर इसका श्रेय लेंगे ही।
सबसे पहले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में इस आरक्षण को भुनाया जायेगा।आमतौर पर महिलाएं भावुक होती हैं। 5 किलो अनाज मुफ्त में पाने वाली गरीब महिलाएं हों या लाडली लक्ष्मी के रूप में 1250 रुपए हर महीने पाने वाली!राजनीति में भाग्य आजमाने वाली हों या सरकारी नौकरी करने वाली!सभी को 33 प्रतिशत खाली सीटें दिखाई जाएंगी। उन्हें भावनाओं में बहाने के लिए लच्छेदार भाषण तो भगवान के नाम पर शुरू हो ही गए हैं।
मोदी इसका पूरा लाभ लेंगे! लेकिन जिनके नाम पर यह सब होगा उन्हें अभी अपने एक तिहाई हक के लिए इंतजार करना होगा। तब तक उन्हें सिर्फ "वोट बैंक" की भूमिका में रह कर मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के सपने को पूरा करवाना होगा। यह भी संभव है कि चौथी पारी के लिए भी महिलाओं का ही सहारा लिया जाए!
अब महिलाओं का अपना हक पाने का अधूरा सपना पूरा हो या न हो ..देश पर 20 साल राज करने का मोदी का सपना तो मजबूत होगा ही!
-अपूर्वा
वो भवन की सजावट का काम नहीं करते. कंगूरे नहीं लगाते बल्कि बुनियाद खड़ी करते हैं. ऐसी मजबूत बुनियाद जिस पर बुलंद इमारतें खड़ी हो सकें.
वो गीली-कच्ची मिट्टियों पर पसीना बहकर सुंदर-सुंदर मूर्तियां बनाते हैं.
वो देश का भविष्य गढ़ते हैं. वो शिक्षक हैं और इन शिक्षकों में लाखों ऐसे शिक्षक भी हैं जो निजी स्कूलों में मोमबत्ती की तरह जलकर प्रकाश दे रहे.
अब तो हिंदी निजी स्कूल विलुप्त हो रहे. अंग्रेजी माध्यम के स्कूल हैं ज़्यादातर . इन स्कूलों से निकलकर बच्चे एक के बाद एक कमाल कर रहे हैं.
बच्चे ऊंचाइयों को छू रहे. पालक गर्व कर रहे . स्कूल श्रेय ले रहा ...कितनी सुंदर तस्वीर हैं..
इस सुंदर तस्वीर को बनाने वाले कहाँ हैं? किस हाल में है? उन पर क्या गुज़र रही है? उनकी कैसे गुज़र -बसर हो रही? इस सवाल का उत्तर क्या कोई जानना चाहता है? ये सवाल कोई पूछना भी चाहता है?
किसे परवाह है निजी स्कूल के मामूली शिक्षकों की? क्या किसी ने कभी जानने की कोशिश की, कि उन्हें न्यूनतम वेतन भी मिलता है?
क्या उन्हें कभी पेंशन मिलेगी?
क्या उन्हें न्यूनतम छुट्टियां भी मिलती हैं?
आठ से दस घंटों के कड़े परिश्रम के दौरान उन्हें कितनी देर बैठने की इज़ाज़त है, ये किसी ने पूछा ?
स्कूल पालकों से कहता है हम 'एजुकेशन बोर्ड' ..जो भी नाम हो ...के अनुसार फीस ले रहे ...इसलिए बढ़ाई..
क्या कभी ये सवाल पूछा गया कि उसी 'एजुकेशन बोर्ड' के नियमानुसार क्या आप अपने शिक्षक को वेतन देते हैं ?
क्या कभी शिक्षा के बड़े -बड़े अधिकारी स्कूल से ये सवाल करते हैं कि अपने शिक्षकों को देश के श्रम कानूनों के हिसाब से अवकाश देते हैं या नहीं ?
ऐसे बहुत से खराब सवाल हैं जो बच्चों की पढ़ाई और स्कूल की छवि पर गर्व करने वालों के मुँह का जायका बिगाड़ सकते हैं.
दरअसल, निजी अंग्रेजी स्कूल में काम करने वाले शिक्षकों का हाल-बेहाल है.
सबसे कम वेतन, सबसे कम छुट्टियां, सबसे कम आराम और सबसे ज़्यादा काम. सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी.
स्कूल के बच्चों को संवारने से बेहतर कोई काम नहीं तो इससे बढ़कर मेहनत और ज़िम्मेदारी का भी कोई काम नहीं.
पर क्या नीव की मजबूती में जुटे इन कलम -चाक के मज़दूरों की कोई सुध लेता है ?
किसी राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्र में इनका ज़िक्र सुना. इनसे तो कोई कोरा-झूठा वायदा तक नहीं करता !
कोई सामाजिक -राजनीतिक संगठन इनकी चर्चा नहीं करता.
कोई अखबार इनकी पीड़ा पर नहीं लिखता.
सब संगठित हो सकते हैं. पेरेंट्स का संगठन है, स्कूल प्रबंधकों का संगठन है, छात्रों के तो कई प्रकार के होते हैं पर यदि निजी स्कूल के शिक्षक अपना संगठन बना लें तो उससे बढ़कर कोई जुर्म नहीं !!
इस शहर का इतिहास ही गवाह है निजी स्कूल के शिक्षकों ने जब संगठित होने की कोशिश की, कुचले गए.
निजी स्कूल के शिक्षकों को संगठित होने का अधिकार नहीं है ..
निजी स्कूल के शिक्षकों को 'एजुकेशन बोर्ड' द्वारा निर्धारित वेतन मांगने का अधिकार नहीं है ..
निजी स्कूल के शिक्षकों को श्रम कानूनों के अनुसार अवकाश मांगने का अधिकार नहीं है..
निजी स्कूल के शिक्षकों के लिए पेंशन तो एक सपना है. सरकारी शिक्षक के वेतन का आधा भी पाना उसके नसीब में नहीं है.
वेतन तय नहीं, काम के घंटे तय नहीं, Leave rules यानी छुट्टियां कितनी तय नहीं,
भविष्य क्या ...तय नहीं ... मेडिकल सुविधाएँ तो दूर की कौड़ी !
ये सवाल एक शहर का नहीं, प्रदेश का नहीं इस देश का है.
आखिर इस देश में निजी स्कूल के शिक्षकों की जगह कहाँ है ?
अगली बार पेरेंट्स टीचर्स मीटिंग में जाएँ तो उनसे कहिये अपने स्कूल के शिक्षकों के वेतन अपनी वेबसाइट में डालें.
उनसे कहिये यदि शिक्षकों को आराम नहीं मिलेगा तो गुणवत्ता का असर पढ़ाई पर और बच्चों पर आएगा.
-सिद्धार्थ ताबिश
अच्छी पढ़ाई मतलब जानते हैं आप भारत में? अंग्रेजी बोलना.. आपके बच्चे का अंग्रेजी में बात करना मतलब बहुत अच्छी शिक्षा मिल रही है उसे। इसके अलावा जो कोर्स सरकारी पाठ्यक्रम में होता है वही हर जगह होता है। बस प्राइवेट वाले दस किताब और साथ में जोड़ देते हैं ये दिखाने के लिए कि वो आपसे इतना पैसा ले रहे हैं तो आपके बच्चे को पढ़ा भी खूब रहे हैं।
आप सोचकर देखिए कि कक्षा चार में पढ़ रहे आपके बच्चे को अगर भारत की सारी नदियों और राजधानी का नाम पता है तो वो किस काम की जानकारी है उस दस साल के बच्चे के लिए? उसे अगर ये पता है कि कौन सी नदी कहां से बहती है तो उसका क्या काम है उसके लिए? वो जानकारी आपको अच्छी लगेगी, आपको बड़ा गर्व होगा मगर वो जानकारी बस रटने वाली जानकारी है उस बच्चे के लिए। उस जानकारी का उसके जीवन में कोई स्थान नहीं है। उसे नदियों में नाव लेकर नहीं जाना है और न ही नदियों के द्वारा उसे कोई रास्ता तय करना है।
स्कूल वाले बस यही करते हैं, ऐसी बेकार की जानकारी आपके बच्चे को रटाते हैं जिसकी इस उम्र में कोई जरूरत नहीं होती है उसे हमारे और आपके बच्चे, जिन्हें इस तरह की तमाम जानकारियां इस छोटी सी उम्र में होती है, वो जीवन के किसी भी प्राकृतिक माहौल में सर्वाइव नहीं कर सकते हैं। हमारे इन बच्चों को आप रोड पर छोड़ दीजिए, किसी गांव में छोड़ दीजिए, ये कुछ नहीं कर पाएंगे, आपके घर तक नहीं जा पाएंगे। रोएंगे और मम्मी पापा को याद करेंगे जबकि वो बच्चे जो गांव या किसी भी प्राकृतिक माहौल में पले-बढ़े होते हैं उन्हें आप कहीं भी छोड़ दीजिए, वो अपने घर पहुंच जाएंगे। हमारे आपके बच्चे जिन्हें ये सब पता है कि कौन सी नदी कहां से बहती है और किस शहर की राजधानी क्या है, जो बा बा ब्लैक शीप अच्छे से सुना लेते हैं वो घर का रास्ता नहीं ढूंढ पाएंगे। आपके ये प्राइवेट स्कूल आपके बच्चों को ‘अपाहिज’ बनाते हैं।
जब भी कोई मुझसे अपने बच्चे के प्राइवेट स्कूल की बड़ी तारीफ करता है तो मैं समझ जाता हूं कि इनका बच्चा बड़ी अच्छी अंग्रेजी बोल लेता होगा, उसके स्कूल वाले उस बच्चे को गर्मी और सर्दी की छुट्टी में भी एक टन होमवर्क देकर घर भेजते होंगे, उसके स्कूल वाले बच्चे के मां और बाप को हर हफ्ते स्कूल के ही किसी ‘चोंचले’ में स्कूल बुलाते होंगे और इन मां-बाप को ऐसा महसूस करवाते होंगे कि हम तो पढ़ा रहे हैं।
तुम्हारे बच्चे को मगर तुम भी ‘पढ़ाओ’ इसके साथ.. मां बाप को वो स्कूल उनके बच्चे के साथ-साथ दिन भर उसी के काम में व्यस्त रखता होगा। इनको एक सेकंड की फुर्सत नहीं मिलती होगी। अपने कक्षा 4 के बच्चे के होमवर्क, प्रोजेक्ट, एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज की वजह से। इसीलिए ये स्कूल बेस्ट होगा। इनके लिए जैसे हम इंसानों ने रिश्ते वगैरह बना के अपने समाज और जीवन की ऐसी तैसी कर रखी है वैसे ही हम ही ने ये स्कूल, स्कूल के शेड्यूल, स्कूल में सिखाई जाने वाली दो कौड़ी की जानकारियां और तमाम अन्य स्कूली रस्मों को खुद ही बनवाया है और फिर बस मेरी पोस्ट पर आकर यही लोग अफसोस ऐसा जताते हैं जैसे किसी और ने मंगल ग्रह से आकर कुछ गड़बड़ कर दिया है यहां और उनके बच्चों को पीडि़त कर दिया है।
मैं अपने बच्चे के स्कूल में जब गया था और प्रिंसिपल से अनुरोध किया था कि ‘कृपया गर्मी की छुट्टी का टाइम और बढ़ाइए और स्कूल कम से कम दस बजे ही खोला कीजिए और होमवर्क देना बंद कीजिए’.. तो वो आश्चर्यचकित होकर बड़ी देर तक मेरा मुंह देखती रहीं.. कहने लगीं कि अपने 35 साल के स्कूल के कार्यकाल में आप पहले ऐसे इंसान मिले हैं जो इस तरह की डिमांड कर रहे हैं। यहां 99% अभिभावकों की तरफ से हम लोगों पर ये दबाव होता है कि स्कूल में गर्मियों की छुट्टियों में एक्स्ट्रा क्लासेज चलाई जाएं क्योंकि उन्हें लगता है कि गर्मी की छुट्टी की जो वो फीस दे रहे हैं वो ‘बेकार’ जा रही है।
-डॉ. आर.के. पालीवाल
पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान में जब तब कुछ विशेष मुद्दों पर सकारात्मक बोलना शुरू किया है। हालांकि उनकी नीतियों, उद्देश्यों और कार्यकलापों में समग्र गांधी विचार और दर्शन की झलक नगण्य ही दिखती है। इसीलिए काफ़ी प्रबुद्ध जनों का मानना है कि यह गांधी का महिमा मंडन न होकर कुछ मुद्दों पर गांधी के नाम का सहारा लेने की चालाकी है। एक तरफ चुनाव का माहौल है और दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के पास जी 20 की अध्यक्षता के वर्ष में अपनी वैश्विक छवि चमकाने के लिए गांधी से बेहतर कोई दूसरी भारतीय विभूति नहीं है इसलिए ऐसा हो रहा है। यह इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि हाल ही में केन्द्र सरकार के रेलवे विभाग ने उत्तरप्रदेश सरकार की मदद से गांधी विचार के प्रचार-प्रसार के सबसे बड़े संगठन सर्व सेवा संघ वाराणसी के परिसर में बुलडोजर चलाकर देश भर के गांधीवादियों को नाराज किया है। सरकार से गांधीवादियों की नाराजगी इंटरनेट युग में धीरे धीरे देश के बाहर भी पहुंच रही है। इसकी काट के लिए यह जरूरी है कि सरकार द्वारा ऊपरी तोर पर ही सही गांधी को याद किया जाए।
प्रधानमंत्री गांधी स्मृति और दर्शन समिति के अध्यक्ष हैं इस नाते समिति परिसर में गांधी प्रतिमा एवम वाटिका निर्माण का लोकार्पण हाल ही में राष्ट्रपति के करकमलों से हुआ है। शायद यह भी उस कलंक की छाया से बाहर आने का प्रयास है जो प्रधानमंत्री के अति प्रिय रेल मंत्रालय और उत्तर प्रदेश की डबल इंजन सरकार ने मिलकर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सर्व सेवा संघ के परिसर पर भारी पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोजर चलाकर उनके माथे पर लगाया है। प्रधानमन्त्री इस कलंक से नहीं बच सकते क्योंकि यदि वे यह कहकर पल्ला झाड़ते हैं कि वे इस कार्यवाही से अनभिज्ञ थे तो एक सासंद के रुप में वे अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में असफल होते हैं। सर्व सेवा संघ के पदाधिकारियों ने ध्वस्तीकरण के बाद प्रधानमंत्री को विशेष रूप से इसकी जानकारी भेजी है। उस पर भी उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की है। वे अपने ट्विटर अकाउंट पर केवल उन्हीं मुद्दों पर चर्चा करते हैं जिनसे उनकी छवि उज्ज्वल होती है। यही कारण रहा कि हिंसा की आग में जलते हुए मणिपुर पर उनकी चुप्पी ढाई महीने बाद तब टूटी थी जब उनकी चारों तरफ आलोचना हो रही थी और विपक्षी दलों ने संसद की कार्यवाही तब तक ठप्प करने की धमकी दी थी जब तक मणिपुर मुद्दे पर वे अविश्वास प्रस्ताव पर अपना वक्तव्य नहीं देते। प्रधानमंत्री को मीडिया और विपक्ष से इस तरह का परहेज लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
अब प्रधानमंत्री गांधी के नाम पर सनातन की राजनीति कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के बीना में पेट्रोकेमिकल प्लांट के उद्घाटन पर वे जिस रथ में सवार हुए उसमें उनके साथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के अलावा मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी थे। इस सरकारी आयोजन में भी उन्होंने सनातन धर्म के मुद्दे पर गांधी का नाम लेकर पूरे विपक्षी गठबंधन को घसीट लिया। उन्होंने कहा कि गांधी आजीवन सनातनी रहे और अंतिम समय में उन्होंने हे राम कहा और अब इंडिया गठबंधन उसी सनातन धर्म को तोड़ रहा है। प्रधानमंत्री शायद यह याद करना नहीं चाहते कि महात्मा गांधी जिस सनातन धर्म को मानते थे वह सर्व समावेशी धर्म था जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि दुनिया के सब धर्म बराबर सम्मान के साथ शामिल थे। गांधी का सनातन धर्म वह हिंदू धर्म नहीं था जिसके नाम पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी राजनीति करते हैं। अगर विपक्षी गठबंधन में शामिल एक दल के युवा नेता द्वारा सनातन धर्म के उन्मूलन की बात कही है तो इसका यह मतलब नहीं कि पूरा गठबंधन ऐसा मानता है। इसलिए प्रधानमंत्री से ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते कि वे किसी ऐसे मुद्दे को राई का पहाड़ बनाएं और पहाड़ जैसे बड़े मुद्दों पर चुप्पी साध लें।
मौजूदा संसद भवन अब पुरानी संसद बन गया है। इस ऐतिहासिक इमारत में सोमवार को शुरू हुआ विशेष सत्र दिन भर चली चर्चा के बाद स्थगित कर दिया गया।
मंगलवार को अब संसद की कार्यवाही नई इमारत में शुरू होगी। केंद्र सरकार ने 18 से 22 सितंबर के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया है।
विशेष सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुराने संसद भवन में अपना आखिरी भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने पूर्व पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक का जिक्र किया।
सदन में जाने से पहले पीएम ने मोदी कहा, ‘संसद का ये सत्र छोटा है लेकिन ये बहुत मूल्यवान है।’ पुरानी संसद से विदाई पर कई राजनेता अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
पीएम ने बताया भावुक पल
प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि कल (मंगलवार) गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर हम नई संसद में जाएंगे। ये सत्र छोटा है लेकिन बहुत मूल्यवान है।
पीएम मोदी ने चंद्रयान-3 अभियान की सफलता, भारत की अध्यक्षता में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन और पीएम विश्वकर्मा मिशन की शुरुआत को भी रेखांकित किया।
पुरानी संसद में आखिरी दिन पर पीएम मोदी ने कहा, ‘पुराने सदन से विदाई लेना, यह एक बहुत ही भावुक पल है। परिवार भी अगर पुराना घर छोडक़र नए घर जाता है, तो बहुत सारी यादें, कुछ पल के लिए उसको झकझोर देती हैं। हम जब इस सदन को छोडक़र जा रहे हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क भी उन यादों से भरा हुआ है।’
‘खट्टे-मीठे अनुभव भी रहे हैं। नोकझोंक भी रही। कभी संघर्ष का तो कभी इसी सदन में उत्सव और उमंग का माहौल भी रहा है। ये सारी स्मृतियां हमारी साझी हैं। ये साझी विरासत है और इसका गौरव भी हम सबका साझा है।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय इतिहास में योगदान के लिए जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ। मनमोहन सिंह तक का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, ‘इन 75 सालों में हमारी संसद, जन-भावनाओं की अभिव्यक्ति का भवन भी बनी है। हम देखते हैं कि राजेंद्र बाबू से लेकर डॉक्टर कलाम, रामनाथ कोविंद जी और अभी द्रौपदी मुर्मू जी। इन सबके संबोधन का लाभ हमारे सदनों को मिला है।’
‘उनका मार्गदर्शन मिला है। आदरणीय अध्यक्ष जी, पंडित नेहरू जी, शास्त्री जी, वहां से लेकर अटल जी, मनमोहन सिंह जी तक, एक बहुत बड़ी श्रंखला, जिसने इस सदन का नेतृत्व किया है और सदन के माध्यम से देश को दिशा दी है। देश को नए रंग रुप में ढालने के लिए परिश्रम किया है। आज उन सबका गौरवगान करने का भी अवसर है।’
उन्होंने कहा, ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल, लोहिया जी, चंद्रशेखर जी, आडवाणी जी, न जाने अनगिनत नाम, जिन्होंने हमारे इस सदन को समृद्ध करने में, चर्चाओं को समृद्ध करने में, देश के सामान्य से सामान्य व्यक्ति की आवाज को ताकत देने का काम, इस सदन में किया है।’
पीएम मोदी ने कहा, ‘उमंग, उत्साह के पल के बीच कभी सदन की आंख से आंसू भी बहे। ये सदन दर्द से भर गया, जब देश को तीन प्रधानमंत्रियों को उनको कार्यकाल में ही खोने की नौबत आई, जिसमें नेहरू जी, शास्त्री जी और इंदिरा जी थीं। तब इस सदन ने आंसूभरी आंखों से उन्हें विदाई दी।’
प्रधानमंत्री के भाषण में अनुच्छेद 370 का जिक्र
पीएम ने कहा, ‘इसी सदन ने मनमोहन सिंह जी की सरकार में कैश फॉर वोट कांड को भी देखा है। सबका साथ सबका विकास के मंत्र ने अनेक ऐतिहासिक निर्णय, दशकों से लंबित विषयों का स्थायी समाधान भी इसी सदन में हुआ है। अनुच्छेद 370 को लेकर सदन हमेशा गर्व के साथ कहेगा कि यह इस काल में हुआ। वन नेशन, वन टैक्स, जीएसटी का निर्णय भी इसी सदन ने किया। वन रैंक, वन पेंशन भी इसी सदन ने देखा। गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण बिना किसी विवाद के पहली बार इस देश में किया गया।’
पीएम मोदी ने उस पल को भी याद किया जब वे पहली बार सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे थे।
उन्होंने कहा, ‘मैं पहली बार जब संसद का सदस्य बना और पहली बार सांसद के रूप में मैंने इस भवन में प्रवेश किया तो सहज रूप से मैंने संसद के दरवाजे पर अपना शीश झुकाकर इस लोकतंत्र के मंदिर को श्रद्धाभाव से नमन करते हुए पैर रखा था।’
‘वो पल मेरे लिए भावनाओं से भरा हुआ था। मैं कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन भारत के लोकतंत्र की ताकत है, भारत के सामान्य मानव की लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा का प्रतिबिंब है कि रेलवे प्लेटफॉर्म पर गुजारा करने वाला एक गरीब बच्चा संसद पहुंच गया। मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी कि देश मुझे इतना सम्मान देगा, इतना आर्शीवाद देगा, इतना प्यार देगा। सोचा नहीं था।’
लोकसभा अध्यक्ष बोले- ये सदन संवाद का प्रतीक रहा
संसद के विशेष सत्र के पहले दिन लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने सदन को संबोधित करते हुआ कहा कि आज के बाद से संसद की कार्यवाही नए भवन से संचालित होगी।
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने कहा, ‘अब तक सदन को 15 प्रधानमंत्रियों का नेतृत्व प्राप्त हुआ। जिन्होंने इस देश की दशा और दिशा तय की है। ये सदन संवाद का प्रतीक रहा है। पिछले 75 सालों में यहां देश हित में सामूहिकता से निर्णय लिए गए।’
‘विचार विमर्श की पद्धति से यहां आम जनता को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए कानून बनाए गए। संकट के समय सदन ने एकजुटता से सामना किया। आज इस सदन में कार्यवाही का अंतिम दिन है। आज के बाद सदन की कार्यवाही नए भवन में संचालित होगी।’
कांग्रेस चीफ खडग़े का तंज
संसद की पुरानी इमारत में आखिरी कार्यवाही के मौके पर राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि बदलना है तो देश के हालात बदलो, ऐसे नाम बदलने से क्या होता है।
राज्यसभा में भाषण देते हुए खडग़े ने कहा, ‘इन 75 साल में हमने बहुत कुछ देखा और सीखा। मैंने 52 साल यहां बिताएं हैं। ये भवन आज़ाद भारत के सभी बड़े फैसलों का गवाह है। इस भवन में संविधान सभा 165 दिन बैठी। संविधान बनाया जो 26 जनवरी 1950 में लागू हुआ।’
खडग़े ने कहा, ‘26 नवंबर को 1949 को संविधान सभा की बहस को सुनने के लिए करीब 53 हजार लोग आए थे। संविधान सभा के 11 दौर की बैठकों के व्यवधान रहित संचालन को आदर्श संचालन माना गया था। वो ऐसा एक वक्त था जब सबको लेकर चला जाता था। आप लोगों ने भी उसे आदर्श संचालन माना था, उस समय देश के प्रधानमंत्री नेहरू जी थे।’
‘मैं अपनी बात रखने के लिए थोड़े शब्दों में कुछ कहना चाहता हूं- ‘बदलना है तो अब हालात बदलो, ऐसे नाम बदलने से क्या होता है? देना है तो युवाओं को रोजगार दो, सबको बेरोजगार करके क्या होता है? दिल को थोड़ा बड़ा करके देखो, लोगों को मारने से क्या होता है? कुछ कर नहीं सकते तो कुर्सी छोड़ दो, बात-बात पर डराने से क्या होता है? अपनी हुक्मरानी पर तुम्हें गुरूर है, लोगों को डराने-धमकाने से क्या होता है?’
वहीं, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि पुरानी इमारत यादों और इतिहास से भरी हुई है।
उन्होंने कहा, ‘ये एक दुखद पल है। उम्मीद करते हैं कि नई इमारत में बेहतर सुविधाएं, नई तकनीकी और सदस्यों के लिए ज़्यादा सहूलियतें होंगी। अब ये साफ़ हो गया है कि सरकार पुरानी से नई इमारत में जाने के पल को ख़ास बनाना चाहती थी। उन्होंने ये अलग अंदाज़ में करना चाहा। हम यहां उनका मकसद समझ सकते हैं।’
ओवैसी बोले- कहीं नई संसद भी हिटलर की संसद न साबित हो जाए
उन्होंने कहा कि यह संसद एक इमारत नहीं है, यह देश का दिल है, जो गरीब लोगों की तकलीफ को महसूस करती है।
ओवैसी ने कहा, ‘मैं आपके सामने 15 मिसालें पेश करूंगा, जब संसद ने अपनी नाकामी के सबूत पेश किए। एक जब दिल्ली की सडक़ों पर सिखों का कत्ल किया जा रहा था। एक उस वक्त जब 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद की शहादत हुई।’
‘भागलपुर, जिसमें रेशम के कारोबार को खत्म किया गया और मुसलमानों को जहां दफना दिया गया, वहां पर फूल गोभी उगना शुरू हो गई। एक उस वक्त नाकामी साबित हुई, जब मुजफ्फरनगर और गुजरात में नस्लकशी की गई।’
उन्होंने कहा, ‘हम देखते हैं कि मुंबई की सडक़ों पर इंसानियत का नंगा नाच हुआ। एक उस वक्त जब संसद में टाडा, पोटा, जैसा काला कानून बनाया गया। यूएपीए का कानून बनाया गया। अफस्पा का कानून बनाया गया, जिसको 1958 में एक साल के लिए बनाया गया था और हम 2023 में आ गए।’
ओवैसी ने कहा, ‘ये भारत का दिल है। आज गरीबों, मजलूमों, मुसलमानों, कश्मीर के लोगों, दलितों और आदिवासियों में इस संसद के लिए मोहब्बत और विश्वास खत्म हो रहा है, कम हो रहा है। इसलिए जनता सडक़ों पर आकर विरोध कर रही है। क्योंकि उन्हें लगता है कि यह संसद हमारा दिल नहीं है।’
ओवैसी ने कहा, ‘एक बहुत बड़े शायर ने कहा था, अभी चिरागे-सरे-रह को कुछ खबर ही नहीं, अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई, निजाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई, चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई।’
‘पिच बदलने से गेम नहीं बदलता, गेम को बदलना पड़ेगा। आप पिच बदल रहे हैं। वरना आप याद रखिए, जब हम लोकतंत्र के नियमों पर, संविधान पर अटूट अमल नहीं करेंगे, तो कहीं यह नई इमारत भी हिटलर की राइकस्टाग (जर्मन संसद) वाली इमारत न साबित हो जाए।’ (bbc.com/hindi)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया द्वारा कुछ चैनलों के चौदह पत्रकारों के बहिष्कार की घटना पत्रकारिता, लोकतंत्र और राजनीतिक दलों के लिए एक खतरनाक संकेत है। इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति से चोली दामन का साथ रखने वाली पत्रकारिता में आजादी के बाद से राजनीति की तरह ही निरंतर गिरावट आई है जिस पर काफी दिनों से गोदी मीडिया और प्रायोजित मीडिया के नाम पर खूब बहस हो रही थी लेकिन इस गिरावट की परिणति इस हद तक पहुंचेगी इसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।
कुछ पत्रकारों, संपादकों, अखबार और चैनल मालिकों से सत्ता धारी दलों और कुछ नेताओं के आत्मीय संबंध और गहरे मनमुटाव पहले भी होते रहे हैं। आपातकाल में अधिकांश मीडिया दो वर्गों में विभाजित हो गया था। एक बड़ा वर्ग सरकार के साम दाम दण्ड भेद के सामने नतमस्तक हो गया था और दूसरा भाग तरह तरह की प्रताडऩा का शिकार बना था।यह पहली बार हुआ है कि अ_ाईस राजनीतिक दलों के इण्डिया गठबन्धन ने बाकायदा प्रेस रिलीज कर चौदह पत्रकारों की सूची जारी कर उनके बहिष्कार की घोषणा की है।
इस विषय पर पर सोशल मीडिया में तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया ख़ुद मीडिया जगत से आ रही हैं। कुछ लोग इस सूची को अपूर्ण मान रहे हैं और इसमें कुछ और पत्रकारों का नाम शामिल करने की अपील कर रहे हैं। संभव है कि इस सूची में उन्हीं पत्रकारों के नाम शामिल हुए हैं जिन पर इण्डिया गठबंधन के घटक दलों में सर्व सहमति बनी हो। यह भी संभव है कि इस सूची को जान बूझकर सीमित किया गया हो ताकि इस पर प्रतिक्रिया देखने के बाद दूसरी सूची भी जारी हो।
कुछ लोगों का मानना है कि बहिष्कार केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पत्रकारों को शरण देने वाले चैनलों का भी बहिष्कार किया जाना चाहिए। गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों की राज्य सरकारों को ऐसे मीडिया हाउसों को विज्ञापन आदि के लिए भी ब्लैक लिस्ट किया जाना चाहिए। एक मत यह भी है कि केवल टी वी चैनल के पत्रकारों पर ही यह तोहमत क्यों लगी है, अखबारों के पत्रकारों और संपादकों को क्यों बख्शा गया है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि अखबार में अभी भी काफी संपादक और वरिष्ठ पत्रकार पुरानी पीढ़ी के हैं जिन्होंने बड़े पत्रकारों और संपादकों की संगत में पत्रकारिता सीखी है इसलिए वहां उस तरह की एकतरफा खबरें तुलनात्मक रूप से काफी कम हैं। एक कारण यह भी है कि टेलीविजन में नई उम्र के पत्रकारों को उनके ज्ञान से अधिक बोलने के लहजे और दिखने की अदाओं और भाव भंगिमा के आधार पर नियुक्त किया जाता है और वहां लाइव कार्यक्रम में एडिटिंग के लिए भी समय नहीं मिलता, इसलिए ज्यादा तीखा हो जाता है। तीसरा कारण यह भी है कि देखे गए समाचार का असर पढ़े गए से अधिक गहरा और ज्यादा समय तक प्रभावी रहता है इसलिए उससे किसी राजनीतिक दल को होने वाला नुक्सान भी व्यापक होता है। इसीलिए कुछ लोग कह रहे हैं कि गठबंधन के नेता इन पत्रकारों की बेबाक पत्रकारिता और तीखे तेवरों से भय खाते हैं इसलिए उनका सामना करने की हिम्मत नहीं करते।
सरकारी तंत्र के डर और सरकारी विज्ञापनों के लालच के कारण प्रेस स्वतंत्रता के मामले में हमारे मीडिया घरानों की स्थिति बदतर होती जा रही है।
प्रेस की स्वतंत्रता की वैश्विक रैंकिंग में 2002 में हम 80 वें स्थान से खिसकते हुए वर्तमान में 161वें स्थान पर पहुंच गए हैं जो बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है।
प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी संभवत: प्रेस से परहेज करने वाले प्रधानमंत्रियों की सूची में नंबर वन पर आते हैं। उन्होंने पिछ्ले नौ साल में एक भी ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेस नहीं की जहां राष्ट्रीय मीडिया के वरिष्ठ पत्रकारों को प्रश्न पूछने के लिए खुला मंच दिया हो।
जाहिर है वे अपने मंत्रियों का भी मीडिया से खुलकर बात करना शायद ही पसंद करते हैं।ऐसी विपरीत परिस्थितियों में कुछ पत्रकारों को विपक्ष द्वारा बहिष्कृत किया जाना भी देश की प्रेस और लोकतंत्र के लिए एक काले अध्याय जैसा ही है।
-मयूरेश कोण्णूर
मध्य प्रदेश की एक जनसभा में गुरुवार को सनातन धर्म के विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी के बारे में कहा कि, ‘जिस सनातन ने उन्हें अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए प्रेरित किया।’
प्रधानमंत्री मोदी का ये दावा करना कि सनातन धर्म ने महात्मा गांधी को छुआछूत प्रथा के खिलाफ लडऩे की प्रेरणा दी, सनातन को लेकर उस तर्क के ठीक उलट है, जो डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने दिया था।
सनातन धर्म के विवाद को गांधी से जोडक़र प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को सियासी तौर पर और धारदार बना दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या सनातन धर्म ने जाति के पूर्वाग्रहों को बढ़ावा दिया था? या फिर, सनातन धर्म ने सामाजिक सुधारों की प्रेरणा दी थी?
हाल ही में आई किताब ‘कास्ट प्राइड : बैटल्स फ़ॉर इक्वॉलिटी इन हिंदू इंडिया’ के लेखक, मनोज मिट्टा कहते हैं कि वैसे तो महात्मा गांधी ने ‘रूढि़वादिता से मुकाबला करने के लिए खुद को सोच समझकर एक सनातनी के तौर पर पेश किया था।’ लेकिन, इस दावे पर सवाल जरूर उठ सकते हैं कि छुआछूत के खिलाफ मुहिम चलाने की प्रेरणा उनको सनातन धर्म से मिली थी।
मनोज मिट्टा बताते हैं कि 1920 में जब कांग्रेस ने अपने नागपुर अधिवेशन में अस्पृश्यता के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था, तो इसमें महात्मा गांधी की बड़ी भूमिका रही थी।
‘गांधी ने समाज के एक तबक़े को अछूत बनाने के पीछे पुरातन पंथियों को कठघरे में खड़ा किया था।’
छुआछूत के खिलाफ कांग्रेस का वो ऐतिहासिक प्रस्ताव इन शब्दों के साथ शुरू हुआ था कि, ‘हिंदू समाज की अगुवाई करने वालों से अपील है कि ‘वो हिंदू धर्म को अछूत प्रथा से निजात दिलाने के लिए विशेष तौर से प्रयास करें।’
उस समय प्रचलित जातिगत भेदभाव की भयावह तस्वीर पेश करते हुए, वो प्रस्ताव इन शब्दों के साथ खत्म हुआ था कि कांग्रेस, ‘पूरे सम्मान के साथ धार्मिक गुरुओं से अपील करती है कि वो समाज के दबे कुचले वर्गों के साथ होने वाले बर्ताव में सुधार की बढ़ती ख्वाहिश को पूरा करने में मदद करें।’
भले ही अस्पृश्यता को लेकर महात्मा गांधी की सोच बिल्कुल साफ रही हो। लेकिन, मनोज मिट्टा सुबूतों के साथ बताते हैं कि गांधी अपने सियासी करियर के एक बड़े हिस्से तक जाति व्यवस्था के मूल यानी वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते रहे थे।
गांधी ने 1924-25 के वायकोम विद्रोह को सिर्फ इसलिए समर्थन दिया था कि उसमें अछूतों के लिए मंदिर की तरफ जाने वाली सडक़ें खोलने की मांग की गई थी, न कि मंदिर में प्रवेश की मांग की गई थी।
गांधी और मालवीय की तीखी तकरार
मनोज मिट्टा की नजर में, ‘मंदिरों में दलितों को प्रवेश करने का अधिकार देने को लेकर गांधी के विचार तब बदले, जब 1932 में उन्होंने पूना का समझौता किया था। इस समझौते के तहत अछूतों ने अलग निर्वाचन व्यवस्था का अधिकार छोड़ दिया था। जबकि ये अधिकार उन्होंने लंबी लड़ाई के बाद हासिल किया था। इसके बाद ही गांधी को लगा कि बदले में उन्हें भी अछूतों के लिए कुछ करना चाहिए।’
तब भी गांधी ने अछूतों के लिए धीरे-धीरे ही आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि दलितों के लिए मंदिरों के दरवाजे खोलने का प्रस्ताव अलग अलग मंदिरों के हिसाब से लागू किया जाना चाहिए। और, इसका फैसला स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच जनमत संग्रह के बाद किया जाना चाहिए, न कि इसे दलितों को अधिकार देने का मामला माना जाए।
मनोज मिट्टा कहते हैं कि जब गांधी ने दलितों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार देने के विधायी सुधार का समर्थन किया, तो उनकी मदन मोहन मालवीय से तीखी तकरार हुई थी।
मदन मोहन मालवीय मंदिर में प्रवेश के मामले में किसी भी तरह की सरकारी दखलंदाजी के खिलाफ थे।
वैसे तो गांधी के समर्थन वाले विधेयक में आखिरी फैसला तब भी सवर्ण हिंदुओं के हाथ में ही छोड़ा गया था। लेकिन, मदन मोहन मालवीय ने 23 जनवरी 1933 को वाराणसी में ‘सनातन धर्म महासभा’ बुलाकर इस विधेयक के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया था।
उदयनिधि स्टालिन के बयान से छिड़ी बहस
सनातन धर्म को लेकर हालिया बहस उस वक़्त शुरू हुई, जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री, एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि सनातन धर्म सामाजिक न्याय और समानता का विरोधी है। उन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया से की थी।
उदयनिधि के इस बयान को लेकर बीजेपी और विपक्षी नेताओं के बीच सियासी बयानबाज़ी शुरू हो गई। सवाल ये है कि क्या सनातन धर्म जाति व्यवस्था में विश्वास रखता है, और वो समानता के खिलाफ है?
सनातन धर्म को लेकर चल रहे विवाद के बारे में वरिष्ठ भाषा वैज्ञानिक और मानवशास्त्री डॉक्टर गणेश नारायणदास देवी (जी।एन। देवी) का कहना है कि समय के साथ, सनातन धर्म की परिकल्पना बदलती रही है।
वो इसे समझाते हुए बताते हैं, ‘18वीं सदी की शुरुआत में बंगाल क्षेत्र में एक बहस की शुरुआत हुई। इस बहस के दो पक्ष थे। एक तरफ तो ‘नूतन’ वर्ग था और दूसरी ओर ‘सनातन’ समर्थक थे। नूतन वर्ग की तमाम मांगों में अंग्रेजी में पढ़ाई कराने, सती प्रथा और बाल विवाह की प्रथाएं खत्म करने की मांगें भी शामिल थीं। वहीं ‘सनातन’समर्थकों का कहना था कि इन सभी सुधारों से समाज दूषित हो जाएगा।’
वे कहते हैं, ‘बंगाल में ये बहस करीब तीन दशक तक चलती रही थी, जिसके बाद बंगाल में पुनर्जागरण के युग की शुरुआत हुई। तो, 18वीं सदी में जहां सनातन शब्द का इस्तेमाल प्राचीन परंपराओं के लिए किया जाता था वहीं उसके बाद के दौर में इसमें तरह तरह की परंपराएं शामिल हो गईं। इनमें वेद, उपनिषद, धर्मग्रंथ और धर्म से जुड़े तमाम तरह के रिवाज शामिल हो गए।’
जी एन देवी कहते हैं कि सनातन की परंपराएं करीब डेढ़ हजार साल पुरानी हैं। लेकिन, सनातन किसी एक परंपरा या व्याख्या में यकीन रखने वाला विचार नहीं था। लेकिन, 18वीं सदी में इनमें से एक परंपरा यानी जाति व्यवस्था को पकडक़र उसे पूरी मजबूती से सनातन से जोड़ दिया गया।
सनातन धर्म, जाति व्यवस्था और 19वीं-20वीं सदी में उथल-पुथल
सनातन धर्म को लेकर छिड़ी बहस के केंद्र में उदयनिधि स्टालिन का वो बयान है, जिसमें उन्होंने सनातन को सामाजिक न्याय और बराबरी के अधिकार का विरोधी करार दिया था।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के दौरान जब समाज सुधार के आंदोलनों ने जोर पकड़ा, तो कुछ समुदायों के बीच से ऐसे समूह उभरे, जो ख़ुद को सनातन या फिर सुधारक कहते थे। डॉक्टर गणेश देवी के विश्लेषण से पता चलता है कि आधुनिक युग की इन परिचर्चाओं का एक प्रमुख मुद्दा जाति व्यवस्था और इसकी वजह से पैदा होने वाली गैर-बराबरी थी। अलग अलग इलाकों में इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिशें भी अलग-अलग तरह की रहीं।
चेन्नई की सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका वी। गीता सामाजिक आंदोलनों के ऐतिहासिक संदर्भों पर रिसर्च की विशेषज्ञ हैं। वो कहती हैं कि सनातन धर्म असल में जाति आधारित व्यवस्था है। ये कोई ऐसा धर्म या आस्था नहीं है, जिसका अस्तित्व जाति व्यवस्था के बगैर भी बना रहे। ऐसा भी नहीं है कि सनातन धर्म का जाति व्यवस्था से कोई संबंध ही नहीं है।
वी. गीता इसी बात को बढ़ाते हुए कहती हैं, ‘सनातन शब्द ही अपनी सच्चाई खुद-ब-खुद बयान कर देता है। सनातन का मतलब है, शाश्वत, स्थायी। उन्नीसवीं सदी में सनातन की परिकल्पना को उस वक्त नई ताकत मिली, जब पुरानी हिंदू परंपराओं में लोगों की दिलचस्पी काफी जग गई थी। पूरे देश में सनातन धर्म सभाओं की स्थापना की गई थी।’
‘ये सारे संगठन पुराने और रुढि़वादी नजरिए के समर्थक थे और जाति आधारित असमानता को वाजिब ठहराकर किसी न किसी रूप में जाति व्यवस्था का समर्थन किया करते थे। ये सनातन सभाएं हिदू धर्म की एक ही छवि पेश करती थीं। जिसका मतलब था कि वो ख़ुद को दूसरे धर्मों के बरक्स खड़ा करते थे, खासतौर से उत्तर भारत में इस्लाम के खिलाफ। लेकिन, दक्षिणी भारत में सनातन शब्द कुछ बौद्धिक ब्राह्मणों के बीच ही लोकप्रिय था।’
डॉक्टर गणेश देवी कहते हैं कि वैदिक युग में सनातन धर्म में वर्ण आश्रम व्यवस्था स्थापित की गई थी। ये वर्ण व्यवस्था आज की जाति व्यवस्था से अलग थी। जाति व्यवस्था तो बाद में मध्यकाल में विकसित हुई थी।
डॉक्टर देवी कहते हैं, ‘जाति और वर्ण की परिकल्पनाएं बिल्कुल अलग हैं। सनातन युग में लिखे गए प्राचीन ग्रंथों में वर्ण को स्वीकार किया गया था। वर्ण का मतलब वर्ग है, जाति नहीं। वर्णाश्रम व्यवस्था एक छद्म आध्यात्मिक आधार पर सामाजिक वर्गीकरण की कोशिश थी, जो पुनरावतार की परिकल्पना पर आधारित थी। हालांकि जाति व्यवस्था पेशे पर आधारित थी, और इसका कोई आध्यात्मिक आधार नहीं था। इसे कोई दैवीय, वैदिक या उपनिषद से मान्यता नहीं मिली थी।’
जैसे-जैसे जाति व्यवस्था विकसित हुई, इसमें जड़ता आती गई और इससे समाज में बहुत असमानताएं फैल गईं। इसका विरोध किया जाने लगा, क्योंकि, इस व्यवस्था में कुछ जातियों ने खुद को समाज में ऊंचा दर्जा दे दिया था और दूसरों पर जुल्म ढाने लगे थे।
जाति आधारित व्यवस्था के खिलाफ समानता का हक़ मांगने के आंदोलन देश के हर क्षेत्र में उभरे थे। मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र में वराकरी परंपरा ने आध्यात्मिक क्षेत्र में समानता स्थापित करने की कोशिश की। उन्नीसवीं सदी से जाति व्यवस्था के विरोध ने सामाजिक आंदोलन का स्वरूप ले लिया। महात्मा ज्योतिबा फुले ने जाति पर आधारित गैर-बराबरी के विरोध में मजबूती से आवाज़ उठाई और, ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ को इसके विकल्प के तौर पर पेश किया। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी।
वैसे तो जाति व्यवस्था और जाति के आधार पर भेदभाव का ज़ोरदार तरीके से विरोध किया जाता रहा है। लेकिन, सवाल ये भी है कि सनातन धर्म जाति व्यवस्था का समर्थन करता है, इस दावे को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का क्या कहना है।
राज्यसभा सांसद और आरएसएस के संस्थापक डॉक्टर केबी हेडगेवार की जीवनी लिखने वाले डॉक्टर राकेश सिन्हा इस दावे को ग़लत बताते हैं कि सनातन धर्म, जाति व्यवस्था का समर्थन करता रहा है। वो कहते हैं कि, ‘सनातन तो सतत प्रगतिवादी प्रक्रिया है। समानता, सौहार्द और विविधता, सनातन धर्म के मूलभूत तत्व हैं।’
राकेश सिन्हा कहते हैं, ‘समाज के भीतर तमाम संप्रदाय, जीवन शैलियां और विविधताएं लगातार विकसित होती रहती हैं। और कोई भी इसका विरोध नहीं करता। इसलिए, सनातन और हिंदू धर्म के बीच अंतर करना बुनियादी तौर पर गलत है। क्योंकि, हिंदू धर्म का मूल तत्व सनातन धर्म ही है।’
आरएसएस का रुख क्या है?
हालांकि, राकेश सिन्हा भले ये कह रहे हों कि सनातन धर्म में समानता का विचार निहित है। लेकिन, ऐसा लगता है कि आरएसएस ने ‘सनातन धर्म’ की अपनी व्याख्या और इसको लेकर उठे हालिया विवाद के बीच जाति की सच्चाई को स्वीकार कर लिया है।
जब सनातन धर्म पर उदयनिधि के बयान को लेकर हंगामा बरपा हुआ था, तब सरसंघ चालक मोहन भागवत ने सात सितंबर को नागपुर में अपने एक भाषण में कहा था, ‘हमने अपने साथी मनुष्यों को दो हज़ार वर्षों तक दबाकर रखा था। जिस समाज के कुछ वर्गों ने दो हजार वर्षों तक अन्याय को झेला हो, वहां पर हम दूसरों को उनके लिए दो सौ वर्षों तक थोड़ा कष्ट सहन करने के लिए क्यों नहीं कह सकते हैं।’
राजनीति वैज्ञानिक सुहास पलशिकर, मोहन भागवत के बयान को विरोधाभास के तौर पर देखते हैं। इसे समझाते हुए वो कहते हैं, ‘जो लोग बहुत बढ़-चढक़र सनातन धर्म के बारे में बोलते हैं, उनको उस समय बहुत परेशानी हुई जब उदयनिधि ने सनातन धर्म का कड़ा विरोध किया। वो सनातन धर्म के पक्ष में तो बोलते हैं। लेकिन वो जाति व्यवस्था की वजह से समाज पर थोपी गई असमानता को भी स्वीकार करते हैं। उनके पास मौजूदा जाति व्यवस्था का कोई समाधान है नहीं। यही वजह है कि मोहन भागवत, एक तरफ तो जाति के आधार पर आरक्षण की वकालत करते हैं। वहीं दूसरी ओर वो सनातन धर्म का भी समर्थन करते हैं।’
सनातन धर्म को लेकर छिड़ी ये बहस, निश्चित रूप से तीन राज्यों में होने वाले चुनावों में बीजेपी और विपक्षी दलों के बीच सियासी तकरार का बड़ा मुद्दा बनेगी। अब प्रधानमंत्री मोदी ने भी मध्यप्रदेश के चुनावों से पहले इस मुद्दे को हवा दे दी है। इससे ये तय हो गया है कि अब चुनावी रैलियों और भाषणों में ये मुद्दा छाया रहने वाला है। (bbc.com/hindi)
-विजय शंकर सिंह
एक संगठित गिरोह के झूठे प्रचार, आधुनिक कला के व्याकरण की समझ से विरत मूढ समाज, भारतीय पौराणिक संदर्भों, तात्त्विकता से अनभिज्ञ लोग और नाम से मुसलमान होने के कारण नफ़रत का आसान लक्ष्य बने मक़बूल फ़िदा हुसैन जैसे विश्व प्रसिद्ध कलाकार को हमने अपने व उसके ही देश से निकाल कर जघन्य अपराध किया। भारत में पिछले साठ बरसों में आधुनिक एवं समकालीन चित्रकारी को दुनिया की नज़र में लाकर बाज़ार में बिकने योग्य जिस कलाकार का एकमात्र योगदान है उसके लिये ऐसा सुलूक !
हुसैन अकेले ऐसे समकालीन चित्रकार हुए जिन्होने डॉ० लोहिया की प्रेरणा और उनके धनाढ्य अनुयायी बदरी विशाल पित्ती की मदद से हैदराबाद में रह कर सैंकड़ों चित्र रामायण और महाभारत पर बनाये । रामायण और महाभारत के अध्ययन के बग़ैर यह कैसे संभव हो सकता था और निजी चर्चा में लोहिया से रामायण महाभारत पर नई दृष्टि के साथ। बैलगाड़ियों पर लाद लाद कर गाँवों में रामलीला के मंचों को अपने चित्रों से सजाने के लिए ले जाते थे। जब दुनिया की नज़र हुसैन पर पड़ी तो हाथ में कूची लिये नंगे पांव भटकने वाला फ़क़ीर रातों रात एक चित्र को करोड़ों रु में बेचने लायक़ हो गया। वैश्विक नीलामी घर हुसैन के एक एक चित्र को लेने के लालायित हो गये।
कनॉट प्लेस की पहली मंज़िल पर एक असाध्य सुंदर युवती आर्ट गैलरी चलाती थी नीचे भूतल पर दक्षिण भारतीय रेस्तराँ खुला और नंगे पाँव हुसैन इडली खाने पहुँच गये, देखा कि दीवारें सफ़ेद पुती हैं और नंगी हैं। पास की दुकान से काला रंग लेने चले गये। तब तक भीड़ और रेस्तराँ मालिक पहचान चुका था। हुसैन ने पूछा कि दीवारें रंग दूँ ?
मालिक ने हां कही और बस इडली खाने के बाद एक घंटे से कम समय में पूरी दीवारें हुसैन से भरपूर हो गयी और वो रेस्तराँ कभी ख़ाली नहीं रहा । हुसैन की फ़ीस एक प्लेट इडली रही। ऐसे हज़ारों क़िस्से हुसैन की दिलदारी के लोगों की जुबान पर हैं। इस रेस्तराँ मे लोग हुसैन की कलाकारी को देखने भी आते और इडली दोसा भी खाते।
अमीरजादों से पूरा वसूलना भी किया हुसैन ने । सैकड़ों करोड़ रु में कतर के एक महलनुमा भवन की छत पर चित्र बना दिये लेकिन हुसैन सब पैसा लुटा देते थे। बचाते कभी नहीं थे। जब करोडों आया तो मेहमानों को लाने के लिये भी बुगाटी कार जाती थी, एक वो खुद चलाते थे लेकिन यह सब निर्वासन में किया। हुसैन को आख़िर में भारत की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई।
रामायण महाभारत पर पौराणिक और भारतीय समाज पर चित्र बनाने वाले अप्रतिम अद्भुत फ़क़ीर पर दुर्भाग्यशाली ( समय साबित करेगा कि दुर्भाग्यशाली वास्तव में कौन रहा ? ) चित्रकार हुसैन की आज जन्मतिथि है। कोई नहीं मनाता ! वे कायर भी नहीं जिनके पूर्वजों पर हुसैन ने चित्र बनाकर कैनवास पर अमर कर दिया था। वे भी नहीं जो हुसैन के कारण आज अरबपति बने बैठें हैं और वे भी नहीं जो पचास साल राज कर आज पंथनिरपेक्षता की खोखली बातें करते हैं , जिनके अखंड राज में हुसैन निर्वासित कर दिये गये।
-अमिता नीरव
अखबार में काम करते हुए अपनी रूचि से इतर भी कई तरह की चीजें पढऩे को मिलती है, पढऩा पड़ती है। ऐसे पढऩा भी अपनी समझ में अलग तरह से विस्तार करती है। उन्हीं दिनों कहीं पढ़ा था कि दुनिया में सबसे ज्यादा खाना ब्रिटिश लोग फेंकते हैं। खाने की पूरी भरी हुई प्लेट वे डस्टबिन में उलट देते हैं।
हमने तो परंपरा से अन्न को ईश्वर माना है, लेकिन वहाँ लोग खाना फेंकते हुए किसी तरह के गिल्ट में नहीं रहते हैं। इसी तरह कहीं पढ़ा था कि क्रिसमस वीक (क्रिसमस और न्यू ईयर के बीच) में अमेरिका और योरोप में दिए जाने वाले गिफ्ट्स की पैकिंग में इतना कागज लगता है, जिससे पूरी धरती को तीन बार रैप किया जा सके।
हमारे शहर में कई लोगों को खाने का इतना शौक है कि वे उज्जैन की एक खास दुकान पर पुरी-सब्जी खाने इंदौर से खासतौर पर जाते हैं। कुछ इससे भी ज्यादा रईस हैं तो वे होटल ताज में सिर्फ कॉफी पीने के लिए फ्लाइट से मुंबई जाते हैं। क्योंकि वे इसे अफोर्ड कर सकते हैं।
हमारी एक साथी थी, वो हद दर्जे की जागरूक...। एक दिन उसने कहा कि, ‘लोग बिना बेस्ट बिफोर देखकर बिस्कुट या चॉकलेट खऱीद लेते हैं!’, ‘मतलब बिस्कुट या चॉकलेट की भी एक्सपायरी होती है?’, मेरे जैसे गाफिल इंसान के लिए यह एक सूचना थी।
‘हाँ... यहाँ तक कि सेनेटरी नैपकिंस की भी एक्सपायरी होती है।’, उसने बताया। यह मेरे लिए शर्म से डूब मरने वाली बात थी कि मुझे इतना भी नहीं पता है। मेरी अपनी समझ में तो बस दवाइयों की ही एक्सपायरी होती है। क्योंकि उसे हम अन्यथा नहीं जान पाते हैं।
हमारी पीढ़ी ने घर में ग्रॉसरी का सामान अखबारी कागज में आते देखा है। जिस पर बेस्ट बिफोर होने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है। हमने अपनी पारंपरिक पद्धति से जाना है कि खाने का सामान खऱाब होने को हम देखकर, सूँघकर या फिर चखकर जान सकते हैं।
देखते-देखते हमारे यहाँ अनाज, दालें सहित सारा ग्रॉसरी का सामान पॉलिथीन पैक आ रहा है। उस पर बेस्ट बिफोर भी लिखा होता है। मैं सोचती थी कि शायद कुछ ऐसे रईस भी होते होंगे जो बेस्ट बिफोर देखकर ही सामान इस्तेमाल करते होंगे। खराब न होने की स्थिति में भी फेंक दिया करते होंगे।
सदी के पहले दशक में जब अमेरिका में मंदी का दौर चल रहा था, तब एक इसी सिलसिले की खबर पढ़ी तो चौंक गई। खबर थी कि वहाँ एक्सपायरी सामान के स्टोर्स पर भारी भीड़ होने लगी है। इससे एक औऱ चीज समझ आई कि वहाँ एक्सपायरी सामान के स्टोर्स भी होते हैं। मतलब वहाँ का गरीब तबका एक्सपायरी सामान खरीदता है।
इसका सीधा-सा मतलब यह हुआ कि बेस्ट बिफोर के बाद भी सामान खराब तो नहीं ही होता है। उसी साथी ने बताया कि मिठाई यदि जिस दिन खरीदी उसी दिन खत्म नहीं हुई तो अगले दिन हम उसे फेंक देते हैं। मैं चौंकी थी। जिन दिनों फ्रिज की सुविधा नहीं थी, उन दिनों तो यह ठीक है, लेकिन फ्रिज के होते हुए भी।
एक दोस्त है जो लंदन के पास कहीं रहती है। पिछले कुछ सालों में पर्यावरण को लेकर वह बेहद संवेदनशील हो गई है। इस साल जुलाई-अगस्त में उससे बात हो रही थी। तो मैंने उससे कहा कि अमीर देशों की पर्यावरण को लेकर चिंता गरीब देशों को दबाने का उनका टूल है, असल में अमीर देश पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं।
उसने सहमति जताई और बताया कि फिलहाल हमारे यहाँ तापमान 40 के आसपास पहुंच गया है, लेकिन यहाँ के लोगों को यह ग्लोबल वार्मिंग नहीं लग रहा है। उन्हें लग रहा है कि मौसम कितना खूबसूरत हो गया है। इसी तरह हल्की-फुल्की दाग लगी सब्जियाँ, फल यहाँ कूड़े में फेंक दिए जाते है।
जाहिर है कि वे ऐसा करने की लग्जरी कर सकते हैं। गरीब देश ऐसा करने की लग्जरी नहीं कर सकते हैं। जबकि फल-सब्जियाँ उगाने में लगे श्रम के साथ-साथ संसाधन और उपभोक्ता तक पहुँचाने के लिए हुए उपायों तक सब कुछ किसी न किसी स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है।
तेज गर्मी के दिनों में जबकि पूरा शहर जलसंकट से जूझ रहा होता है, अपने इर्द गिर्द लोगों को हर दिन गाड़ी धोते, पोर्च धोते और अंधाधुंध पानी बहाते देखती हूँ। हम जैसे-जैसे अमीर होते जाते हैं, वैसे-वैसे चीजों के प्रति लापरवाह होते जाते हैं, क्योंकि हमने यह जान लिया है कि पैसा खर्च करेंगे तो किसी चीज की कमी नहीं होगी।
हिंदुओं की यह आम शिकायत रहती है कि उनके त्योहारों पर खासतौर पर दशहरा-दीपावली के दिनों में पावर कट होता है। कभी ईद पर नहीं किया जाता है। ऐसी ही शिकायत एक दिन भाई ने भी की थी। मैंने पूछा था, ‘कब से लाइट जला रहे हो तुम लोग?’
‘गणपति चतुर्थी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक घर-बाजार सबको झकाझक रखे हुए हो, लाइट क्या पेड़ पर उगती है? जितनी बनेगी, उतने में ही बँटेगी... कोई बिजली को सेव तो किया नहीं जा सकता है! चूँकि आप बिजली का बिल भर सकते हैं तो आप बिजली की कमी की चिंता नहीं करते हैं।’
अपने इर्द गिर्द के समृद्ध लोगों में एक खास किस्म की गैर-जिम्मेदारी, एक खास किस्म की फिजूलखर्ची और लापरवाही देखती हूँ। हमारे देखते-देखते यूज एंड थ्रो का दौर आ पहुँचा है। पहली बार जब यूज एंड थ्रो बॉल पेन देखा तो भीतर कुछ तडक़ा था।
यह विचार बड़ा असुविधाजनक लगा था कि इसे बस एक ही बार इस्तेमाल करके फेंक देना होगा। इसमें रीफिल नहीं होगी। धीरे-धीरे हमारी जीवन शैली में यूज एंड थ्रो चीजों की भरमार होने लगी है। अब रिपेयर करने का काम ही नहीं होता है।
बचपन में जब स्लीपर टूट जाती थी तो उसकी बद्दी लाकर बदल दी जाती थी और वो फिर से नई हो जाती थी। चप्पलें टूटती थी और उसे ठीक करवाकर काम में ले लिया जाता था। उदारवाद के बाद आए पैसे ने चीजों को रिपेयर करवाने को गरीब होने की निशानी बना दिया है।
यही चीज वैचारिकता में चली आई है। पढ़ा-लिखा, खाता-कमाता मध्यम, उच्च मध्यम और उच्च वर्ग की चिंता बस अपने जीवन की लग्जरी तक ही होती है। देखिए पैकेज में कमाते आईटी प्रोफेशनल्स, डॉक्टर्स, इंजीनियर, प्रोफेसर, व्यापारी और उद्योगपतियों को।
सामाजिक जिम्मेदारी नामक कोई चीज उनके पास भी नहीं फटकती है। चूँकि पैसे ने सब कुछ हासिल करना आसान कर दिया है तो उन चीजों के प्रति भी लापरवाही आ गई है, जो अर्न नहीं की जाती, प्रोड्यूस नहीं की जा सकती जैसे हवा, पानी, धूप। बाकी तो सब उनको उपलब्ध हो ही जाना है।
आर्थिक समृद्धि अपने साथ गैर-जिम्मेदारी लाती है।
नोट- यहाँ समृद्धि का इस्तेमाल तुलनात्मक रूप से किया गया है।
-दिलीप मंडल
ओबीसी अधिकारों पर पिछले कई वर्षों का देश में ये सबसे बड़ा हमला है। आश्चर्य ये है कि ये काम उस सरकार ने किया है जिसका दावा सामाजिक न्याय का है और जिसे कांग्रेस, आरजेडी और कम्युनिस्ट पार्टियाँ समर्थन कर रही हैं। बीजेपी की सरकारें ये हिम्मत नहीं कर पाईं। इन्होंने कर दिया। झारखंड की जेएमएम के नेतृत्व वाली सरकार ने ट्रांसजेंडर जिसे लोग कई लोग किन्नर या थर्ड जेंडर कहते हैं, को ओबीसी में शामिल कर लिया है। यानी सवर्ण परिवार के किन्नर जो अब तक ईडब्ल्यूएस होते थे, अब ओबीसी की सीट खाएँगे। झारखंड की सेक्युलर सरकार ने चोर को रास्ता दिखा दिया है। बाक़ी राज्य ही क्यों पीछे रहेंगे? रोकना है तो यहीं रोकना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए ओबीसी को सेक्युलर-कम्यूनल से ऊपर उठना पड़ेगा। मिसाल के लिए समझिए कि झारखंड पब्लिक सर्विस की 100 वैकेंसी निकलती हैं। वहाँ 52त्न ओबीसी के लिए 14त्न आरक्षण है तो 14 सीटें ओबीसी को जाएँगी। अब सवर्ण परिवारों में घर घर से ट्रांस जेंडर निकलेगा और ओबीसी अपना माथा पीटेगा। सरकार का इरादा नेक होता और ट्रांस का भला करना होता तो उन्हें अपनी अपनी कैटेगरी में कोटा मिलता। इसे Horizontal quota कहते हैं जो PH कैटेगरी में लगता है।
जेएमएम सरकार अपनी ओबीसी -विरोधी छवि बना रही है। उसे लगता है कि ST के एक हिस्से, ईसाई और मुसलमान से काम चल जाएगा। मेरा अब तक अनुमान था कि 2024 लोकसभा में झारखंड में बीजेपी-एनडीए 14 में 9 सीट जीतेगी और सेक्युलर दलों को 5 सीटें मिलेंगी। बीजेपी की नौ यानी धनबाद, गिरीडीह, हज़ारीबाग़, पलामू, चतरा, राँची, जमशेदपुर, गोड्डा, कोडरमा विपक्ष के हिस्से राजमहल, दुमका, लोहरदगा, सिंहभूम, खूंटी अब मेरा अनुमान है 2024 में झारखंड में बीजेपी-आजसू 14 में 13 निकालेगी। सिर्फ राजमहल में जेएमएम जीतेगी। मेरा हेमंत सोरेन से अनुरोध है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद उन अफसरों से बात करें जो ओबीसी मैटर पर उनको सलाह दे रहे थे।
झारखंड में ओबीसी आरक्षण देश में न्यूनतम है। उनके लिए कोई ढंग की योजना नहीं है। हेमंत जी ये भी निवेदन है अपने कार्यकाल में कोई मेडिकल कॉलेज तो खोलें। यूपी तक में हर जिले में मेडिकल कॉलेज है। झारखंड तो अमीर राज्य है। धोती-साड़ी से बात आगे जानी चाहिए।
-बादल सरोज
शुरुआत एक कहानी से-1983-84 की बात है। ईएमएस नम्बूदिरीपाद भोपाल आए थे। कार्यक्रम के बाद रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में वापसी ट्रेन के इंतजार में थे। हम उस वक़्त का अपना नौजवान सभा का पाक्षिक अखबार ‘नौजवान’ लेकर उन्हें दिखाने पहुंचे । उन्होंने उसे देखा, अल्टा-पल्टा और कहा कि हिंदी आधुनिक भाषा है, इसमें शार्ट फॉर्म्स के लिए भी शब्द हैं जैसे माकपा, भाजपा, बसपा। मलयालम में ऐसा नहीं है । उसके बाद ईएमएस ने, प्यार से, हिंदी के व्याकरण पर हमारा एक शॉर्ट रिफ्रेशर कोर्स ले लिया । लौटते में प्लेटफार्म के बाहर एक हाथ मे समोवारी चाय और दूसरे में चारमीनार पकड़े हमसे कामरेड शैली ने पूछा ; तुम मलयालम के कितने शब्द जानते हो ? हमने कहा वडक्कम। उन्होंने कह-चलो घर । ये तमिल है। मलयालम में ‘नमस्कारम’ या ‘अभिवादनम’ कहते हैं। और मुस्कुराकर बोले : तुम्हें पता है मलयालम शंकराचार्य की मातृभाषा है।
निस्संदेह हिंदी एक आधुनिक भाषा है जो, सैकड़ों वर्षों में, अनेक सहयोगी भाषाओं/बोलियों के जीवंत मिलन से बनी है । जब तक इसका यह अजस्र स्रोत बरकरार है, जब तक इसकी बांहें जो भी श्रेष्ठ और उपयोगी है का आलिंगन करने के लिए खुली हैं, जब तक इसकी सम्मिश्रण उत्सुकता बनी है तब तक इसका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता। हिंदी को तीन ओर से होने वाले हमलों से खुद को बचाना होगा।
एक
पहला उन स्वयंभू हिंदीदांओं से जो उसे अतिशुध्द बनाने, उसका संस्कृतिकरण करने के जुनून में उसे इतनी क्लिष्ट और हास्यास्पद बना देते हैं कि वह किसी की समझ मे नही आती । अधिकांश मामलों में खुद उनकी भी समझ में नहीं आती।
दो
दूसरा उन मनोरोगियों से है जो निज भाषा से प्यार और मान का मतलब बाकी भाषाओं का धिक्कार और तिरस्कार मानते हैं। हिंदी एक उत्कृष्ट भाषा है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी भाषाएँ निकृष्ट हैं। श्रेष्ठता बोध दूसरे को निकृष्ट मानकर रखना एक तरह की हीन ग्रंथि है - मनोरोग है। हर भाषा का अपना उद्गम है, सौंदर्य है, आकर्षण है, उनकी मौलिक अंतर्निहित शक्ति है। बाकी को कमतर समझने की यह आत्ममुग्धता दास भाव भी जगाती है।
अपने अंतिम निष्कर्ष में यह तिरस्कारवादी रुख , संकीर्ण और अंधभक्त सोच यहां लाकर खड़ा कर देता है कि पूर्व प्रभुओं की भाषा अंग्रेजी की घुसपैठ तो माथे का चन्दन बन जाती है मगर तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, असमी, कश्मीरी, खासी-गारो-गोंडी-कोरकू, भीली, मुण्डा, निमाड़ी, आदि इत्यादि अस्पृश्य बना दी जाती है। इन्ही का एक रूप विस्तारवादी है जो ब्रज, भोजपुरी, अवधी, बघेली, मैथिली, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, कन्नौजी, मगही, मारवाड़ी, मालवी को भाषा ही नही मानते, हिंदी की उपशाखा मानकर फूले फूले फिरते रहते हैं। अब भला ये हिंदी की शाखा या उपशाखा कैसे हो गयीं जबकि हिंदी आधुनिक है और ये उसकी परदादी और परनानी की भे परदादी और पर नानियाँ हैं।
तीन
तीसरा बड़ा खतरा उनसे है जो हिंदी में ' ई ' की जगह ' ऊ ' की मात्रा लगाने पर आमादा हैं । हिंदी - या और किसी भी भाषा को - किसी धर्म विशेष से बांधना उसके धृतराष्ट्र-आलिंगन के सिवाय और कुछ नहीँ । ऐसे तत्वों की एक सार्वत्रिक विशेषता है ; वे न हिंदी ठीक तरह से जानते है न हिंदी के बारे में कुछ जानते हैं।
उन्हें नही पता कि हिंदी की पहली कहानी ‘रानी केतकी’ लिखने वाले मुंशी इल्ला खां थे। पहली कविता ‘संदेश रासक’ लिखने वाले कवि अब्दुर्रहमान - पहले लोकप्रिय कवि अमीर खुसरो, पहला महाकाव्य लिखने वाले मलिक मोहम्मद जायसी थे । (इन्ही की कृति थी ; पद्मावत, जिस पर बनी फिल्म पर इन ‘ऊ’ की मात्रा वाले उऊओं ने रार पेल दी थी ।) ये सब भारतेंदु हरिश्चंद्र युग से पहले की बात है।
हिंदी में पहला शोधग्रंथ -पीएचडी- फादर कामिल बुल्के का था/की थी, वे ही जिन्होंने हिंदी शब्दकोष तैयार किया था।
प्रथम महिला कहानी लेखिका बंग भाषी राजेन्द्र बाला घोष थी जिन्होंने ‘दुलाई वाली’ कहानी लिखी और कई ग्रंथों के हिंदी अनुवाद के माध्यम बने राममोहन राय बंगाली भी थे और ब्रह्मोसमाजी भी। भाषा जीवित मनुष्यता की निरंतर प्रवाहमान, अनवरत विकासमान मेधा और बुद्धिमत्ता है । जिसे हर कण गति और कलकलता प्रदान करता है।
-अवय शुक्ला
इन दिनों मेरे पास हिमाचल के अपने गांव में करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। हर जगह एक जैसा ही दृश्य है- ढलानों से फिसलकर नीचे आ गई सडक़, टूटे-फूटे घर, धराशायी पेड़, मलबे से झांकती कार और कोटकपूरा से कभी-कभार भटकते हुए आ जाने वाले बेपरवाह पर्यटक। यह सब नीरस होता जा रहा है लेकिन इसका यह फायदा जरूर है कि मुझे हमारी मौजूदा राजनीतिक चालबाजियों, खास तौर पर ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के नए मंत्र पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय मिला जो हमारे समाचार चैनलों के लिए नया गरमागरम मुद्दा बन गया है।
मुझे यह विचार ही प्रतिगामी लगता है क्योंकि यह हमें पचास साल पीछे ले जाता है और तब से हमने जो भी बौद्धिक और भौतिक प्रगति हासिल की है, उसे खत्म कर देता है। तब (मैं पचास, साठ और सत्तर के दशक की बात कर रहा हूं) यह एक राष्ट्र था बल्कि सबकुछ एक ही था: एक राष्ट्र, एक राजनीतिक दल (कांग्रेस); एक राष्ट्र, एक प्रधानमंत्री (नेहरू); एक राष्ट्र, एक कार (अम्बैसेडर); एक राष्ट्र, एक घी (डालडा); एक राष्ट्र, एक साबुन (लाइफबॉय); एक राष्ट्र, एक टीवी चैनल (दूरदर्शन); एक राष्ट्र, एक जूता (बाटा); एक राष्ट्र, एक ओलंपिक पदक (हॉकी)।
दूसरी ओर, आज हमारे पास ऊपर जिक्र किए गए हर चीज के लाखों अलग-अलग विकल्प, उपलब्धियां, उत्पाद और रुचियां हैं और देश इस मामले में कहीं बेहतर स्थिति में है।
मुझे उम्मीद है कि आप बात समझ गए होंगे: कोई राष्ट्र तब समृद्ध होता है जब उसके पास विचारों, उत्पादों, व्यक्तियों, प्रक्रियाओं में से चुनने के लिए बहुत सारे विकल्प होते हैं। गांधीजी ने इसी बात का जिक्र किया था जब उन्होंने कई खिड़कियों वाले घर की बात की थी जिसमें हर तरफ से आते हवा के झोंके विविधता, तालमेल और सौहार्द का अद्भुत माहौल तैयार करते थे और इसी से एक प्रगतिशील राष्ट्र परिभाषित होता था। लेकिन आज की बात लगभग हर मायने में एकरूपता की है- एक भाषा; एक धर्म; एक नेता; एक पाठ्यक्रम; एक विचारधारा; एक नागरिक संहिता; एक संस्कृति; एक इतिहास-हमारी सारी ऊर्जा, बुद्धि, आकांक्षाओं, विविधता का कुरूप स्वरूप है जो हमें विचारहीन मूर्ख बना रहा है। यह एक विशेष राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप हो सकता है लेकिन यह किसी देश की आत्मा को नष्ट कर देता है। एक राष्ट्र, एक चुनाव का सिद्धांत हमें उसी दिशा में और आगे ले जाने वाला है।
एक देश एक चुनाव के मामले में गठित समिति का नेतृत्व करने के लिए एक पूर्व राष्ट्रपति को नियुक्त करने से देश में उच्च बेरोजगारी दर की हकीकत की ही पुष्टि होती है। हम ‘बेरोजगारी के दावन’ को अनदेखा करने के लिए पूर्व न्यायाधीशों, नौकरशाहों और नेताओं को फिर से नियुक्त करने के आदी तो हो ही गए हैं, लेकिन फिर भी मलाई तो पूर्व राष्ट्रपति के हिस्से में ही आई है।
उनकी रिपोर्ट (अगर इसे वही लिखते हैं, यानी एन के सिंह या हरीश साल्वे नहीं) की अब एक अवर सचिव द्वारा जांच की जाएगी और उस पर टिप्पणी की जाएगी, एक सचिव उसका अनुमोदन करेगा और एक मंत्री द्वारा उसे स्वीकार किया जाएगा- ये सभी काबिल लोग जिन्हें संभवत: उन्होंने ही नियुक्त किया होगा! मैं इससे अधिक हास्यास्पद स्थिति की कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन समझ सकता हूं कि ये सभी मूर्खतापूर्ण विचार कहां से आ रहे हैं।
जब सरकार व्यावहारिक रूप से फिर से नियुक्त किए गए व्यक्तियों के झुंड द्वारा चलाई जा रही हो तो कोई और भला क्या उम्मीद कर सकता है? यह तो वैसी ही बात हुई जैसे अपने तमाम अनुचित फैसलों के कारण विवादों से घिरी रहने वाली फ्रांस की रानी मैरी एंटोनेट ने अपनी किसी सनक में फरमान जारी कर दिया हो कि अगर आप उन्हें रोजगार नहीं दे सकते, तो पुन: रोजगार ही दे दें।
जहां तक एक चुनाव कराकर पैसे बचाने (कथित तौर पर 2019 में चुनावों पर 60,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए) की बात है, वह पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है; इसके अलावा यह गरीब विरोधी भी है। भारत में चुनाव गरीबों को धन देने का का एकमात्र प्रभावी साधन है क्योंकि सरकार किसी भी अन्य माध्यम से ऐसा करने में बुरी तरह विफल रही है।
एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स) के मुताबिक, मौजूदा लोकसभा में 521 सांसदों में से 430 करोड़पति हैं और उनके राजनीतिक दलों के पास हजारों करोड़ रुपये हैं। चुनाव यह सुनिश्चित करते हैं कि इनमें से कुछ धनराशि उन लोगों को वापस मिल जाए जिनसे वे उचित-अनुचित तरीके से हड़प लिए गए थे। यह पुनर्वितरण एक अच्छी बात है और इसलिए जितने अधिक चुनाव होंगे, आम आदमी के लिए उतना ही अच्छा होगा! अकेले इसी आधार पर, इस एक राष्ट्र, एक चुनाव की बकवास को तुरंत खत्म करने की जरूरत है।
हालांकि मुझे बीजेपी की तारीफ करनी चाहिए कि वह एक ऐसे विचार के लिए अड़ी हुई है जिसका समय अभी नहीं आया है। मुझे लगता है कि पार्टी का कोई व्यक्ति जो अब भी किताबें पढऩे में सक्षम है, उसने राजा ब्रूस और मकड़ी की कहानी पढ़ ली होगी कि कैसे तमाम बाधाओं और बार-बार विफल होने के बावजूद अपना जाल बनाने के प्रति मकड़ी की लगन को देखकर स्कॉटिश राजा को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लडऩे की प्रेरणा मिलती है और छह बार हारने के बाद सातवीं कोशिश में उसे जीत हासिल होती है।
जब पार्टी के प्रतिष्ठित लोगों को यह कहानी बताई गई होगी तो उसने इसी से प्रेरणा लेते हुए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति का गठन कर दिया होगा। इससे पहले ही ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ मुद्दे को कम-से-कम चार बार जांचकर- दो विधि आयोगों, नीति आयोग और संसद की एक स्थायी समिति द्वारा- ठंडे बस्ते में डाला जा चुका था। तब, इस पर अडऩे की क्या जरूरत थी? केवल यह दिखाने के लिए कि अगर मकड़ी यह कर सकती है, तो मैं भी कर सकता हूं?
हालांकि इस पागलपन में एक पैटर्न दिखता है। अपने तरीके से संविधान में संशोधन करने के लिए जरूरी संख्या न होने के कारण सरकार की रणनीति तमाम कार्यकारी कदमों के माध्यम से ऐसा करने की दिखती है- अनुच्छेद 370, बोलने और असहमति पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानून, अदालत के फैसलों की अवहेलना, बुलडोजर न्याय, खास समुदाय को अलग-थलग करना, एक देश एक चुनाव, देश का नाम बदलना वगैरह।
संविधान पर धीरे-धीरे तब तक हमला करते रहो जब तक उसमें से प्राण न निकल जाए और संशोधन के लिए कुछ भी न बचे। यह तो शैतानी भरी चालाकी है, है ना? हमने शून्य का आविष्कार किया, अब हम ‘एक’ की अवधारणा का पुन: आविष्कार कर रहे हैं। हम जो कभी थे, उससे एकदम अलग- एक राष्ट्र, अनेक भारत।
-बादल सरोज
हम एक हिन्दुस्तानी होने के नाते इसे किसी धार्मिक सम्प्रदाय के नाम करने के लिए कतई राजी नहीं हैं बंदापरवर!!
यह ठेठ हिन्दुस्तानी है जो रेख्ता, उर्दू जैसे नामों के साथ धरती के इसी हिस्से पर जन्मी, पली, जवान हुई !!
यूं भी
भाषा किसी धर्म, संप्रदाय, जाति की नहीं होती। वह कई मर्तबा इलाकाई होती है जैसे बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि भाषाएं हैं!! मगर उस तरह हिन्दी-उर्दू नहीं हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में जहां जहां हिंदी है वहां वहां उर्दू है और जहां जहां उर्दू है वहां उसकी हमजोली हिन्दी है। इसलिए इनके संगम को सदा गंगा-जमुनी कहा और माना गया है। दिलचस्प है कि दोनों का नाभि-नाल संबंध अमीर खुसरो से है और दोनों का पालना बृज और अवधी का रहा है। ठीक इसलिए हिंदी दिवस पर उर्दू की याद जरूरी है।
उर्दू प्रेमचंद, आनंद नारायण मुल्ला, पंडित ब्रज नारायण चकबस्त, रघुपति सहाय फिराक, सरदार भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, राजिंदर सिंह बेदी, सरदार रतन सिंह, जगन्नाथ आजाद, प्रोफेसर ज्ञानचंद जैन, बलबीर सिंह रंग और गोपीचंद नारंग की भाषा है। (नाम सिर्फ लिखते-लिखते याद आये नाम हैं ; फेहरिस्त लम्बी है।) क्या इनके अदब को कोई चिरकुट अज्ञानी अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक खानों में बांट सकता है?
क्या विख्यात कवियों शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन शास्त्री द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू शब्दकोश के लिए दी गई खिदमात को नकारा जा सकता है। शमशेर जी ने तो अपने समय की प्रखर पत्रिका दिनमान में ‘उर्दू कैसे सीखें’ जैसे कॉलम चलाए जिससे प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग उर्दू में आए। क्या प्रकाश पंडित के योगदान को भुलाया जा सकता है जिन्होंने सारे प्रमुख शायरों की रचनाओं को संपादित कर सस्ती किताबों के रुप में हिन्दी जगत को सौंपा और कई पीढिय़ों को उर्दू के प्रति जागरूक बनाया।
यह आकस्मिक नहीं है कि हमारे समय में कृष्ण बिहारी नूर और शीन काफ निजाम (मूल नाम श्रीकृष्ण) जैसे नाम शीर्षस्थ उर्दू शायरों में शुमार है।
(हमारे हमवतन-हमनवा अतुल अजनबी भी इसमें जोड़े जाएँ )
जानकी प्रसाद शर्मा उर्दू अदब को जिस तरह हिंदी पाठकों के सामने ला रहे है और जिस तरह हिन्दी उर्दू के बीच नए पुल बना रहे है उसे हिन्दी साहित्य तो जानता है, हमारी खुद को समझदार समझने वाली मध्यप्रदेश सरकार नहीं जानती जबकि जानकी सर मध्यप्रदेश के ही साहित्यकार है। अगर मध्यप्रदेश के आला पुलिस अफसर वीरमणि उर्दू में डाक्ट्रेट करते है और राजेश जोशी की बेटी पुरबा, डॉ.सविता भार्गव का बेटा अमन और श्याम मुंशी का बेटा यमन और बेटी आरोही उर्दू भाषा स्कूलों में सीखती और व्यवहार में लाती है तो जाहिर है कि उर्दू सबकी है सिर्फ मुसलमानों की नहीं। उसे अल्पसंख्यकों की भाषा बनाकर उसका प्रभाव व आयतन कम करना एक साम्प्रदायिक किस्म की हरकत है।
उर्दू सारे धर्म, जातियों की चहेती भाषा है। मूलत: धरती के इस हिस्से पर जन्मी भारत की भाषा है। स्वतंत्रता संग्राम की भाषा है। कौमी तरानों की भाषा है। साम्प्रदायिक एकता, भाईचारे और सद्भाव की भाषा है।
काजी अब्दुल सत्तार, डॉ.मोहम्मद हसन, प्रो.नईम, प्रो.आफाक अहमद, जनवादी लेखक संघ को हिन्दी-उर्दू लेखकों का संगठन बनाने में अहम भूमिका निभाते है।
जनवादी लेखक संघ के भोपाल में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में उर्दू को लेकर पारित किए गए प्रस्तावों की सारे उर्दू जगत में सराहना हुई। यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि सम्मेलन में अस्सी फीसद से ज्यादा हिन्दी लेखकों की शिरकत थी जिन्होंने उर्दू के फरोग, संवर्धन, रक्षा और सम्मान की शपथ ली थी।
जनवादी लेखक संघ मप्र के अध्यक्ष रहे (अब मरहूम) प्रो.आफाक अहमद ने कराची के उर्दू अधिवेशन में गर्व से जाकर कहा कि पाकिस्तान के उर्दू लेखक समझ लें कि उर्दू हिन्दुस्तान का मुकद्दर बन चुकी है। वह इसलिए नहीं कि उसे मुसलमान बोलते है बल्कि इसलिए कि बहुसंख्यक हिन्दू उससे बेपनाह मोहब्बत करते है। जिन्हें अमीर खुसरो, जायसी, गालिब और इकबाल उतने ही प्यारे हैं जितने कि कालिदास,तुलसी, सूर, मीरा या निराला।
भोपाल के पंडित ईशनारायण जोशी ‘गौहरजंत्री’ संपादित करते हैं और देवीसरन जब भी लिखते है उर्दू और सिर्फ उर्दू में ही लिखते है। काश .. चिरकुटों को ये पता होता।
हिन्दी ही नहीं उर्दू साहित्य के इतिहास में भी उर्दू को कभी अल्पसंख्यकों या मुसलमानों की भाषा नहीं बताया गया और न किसी स्कूल या कालेज में ऐसा पढ़ाया गया। यह विभेद उन बुनियादपरस्तों का षडय़ंत्र है जो भाषाई साम्प्रदायिकता इसलिए फैलाते है कि उर्दू एक सेक्यूलर, धर्म और पंथ निरपेक्ष भाषा है।
उर्दू हमारे उस्ताद वकार सिद्दीकी साहब और हमारे घर के स्थायी सदस्य निदा फाजली, शमीम फरहत और रऊफ जावेद साहब ही नहीं हमारे सियासी गुरु कामरेड मोतीलाल शर्माजी की भी भाषा है !!
हमारे प्रिय शायर वसीम बरेलवी साहब ने ठीक कहा है कि ;’
‘तेरी नफरतों को प्यार की खुशबू बना देता
मेरे बस में अगर होता तुझे उर्दू सीखा देता !!’
कृपया ध्यान दें
स्टूपिडो शब्द हमारी ईजाद है यह स्टुपिड का बहुवचन है !! हिंदी में इसका अर्थ बेवकूफ और मूर्ख होता है; उर्दू में इसका मायना सबसे प्यारा है; चुगद !!
-डॉ. आर.के. पालीवाल
चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद कोई राजनीतिक दल या प्रत्याशी अथवा उनके प्रतिनिधि और कार्यकर्ता यदि वोट के बदले मतदाताओं को धन या कोई कीमती वस्तु देते पकड़े जाते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई होती है। दूसरी तरफ चुनाव अधिसूचना जारी होने के पहले सत्तारूढ़ दल विभिन्न वर्ग के मतदाताओं को तरह तरह के लाभ देकर सार्वजनिक मंचों से अपील करते हैं कि हमने आपको यह दिया है आप हमें वोट देने का संकल्प लीजिए। चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह कम से कम इस तरह की सार्वजनिक अपीलों के खिलाफ आवाज उठाए और सरकार एवम राजनीतिक दलों को सलाह दे कि चुनाव से एक साल पहले किसी खास वर्ग के वोट लुभाने के लिए कोई ऐसी घोषणा नहीं की जानी चाहिए जो राजनीतिक दल के घोषणा पत्र में नहीं थी। यदि जन कल्याण की कोई घोषणा करनी है तो उसे वोट के संकल्प से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
आयोग को सरकार से इस संबंध में चुनाव अधिनियम में समुचित संशोधन की अपील भी करनी चाहिए। प्रबुद्ध नागरिकों, चुनावों पर नजऱ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों और चुनाव सुधार एवम लोकतंत्र की जन जागृति में जुटी सामाजिक संस्थाओं का भी यह दायित्व है कि वे केंद्र और राज्य सरकारों की उन घोषणाओं पर जनता को सतर्क करते रहें जिनकी घोषणा सरकार ने अपने शासन काल के अंतिम दिनों में केवल चुनाव जीतने के लिए जनता के किसी एक वर्ग को जन धन और संसाधनों से आर्थिक लाभ देकर की है।
रक्षा बंधन त्यौहार के नाम पर केंद्र सरकार का रसोई गैस के दामों में दो सौ रुपए कम करने का ऐलान इसी श्रेणी में आता है। इसी तरह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा रक्षाबंधन पर लाडली बहना योजना में ढाई सो रुपए की वृद्धि भी धर्म विशेष के त्यौहार पर घोषणा कर वोट बैंक के लिए किया गया प्रयास है। धर्म निरपेक्ष देश की सरकार को या तो किसी भी धर्म के त्यौहार पर ऐसी घोषणाओं से बचना चाहिए या सभी धर्म के प्रमुख त्योहारों पर ऐसी घोषणाएं करनी चाहिए।
इस मामले में किसी एक राजनीतिक दल को कटघरे में खडा नहीं कर सकते। जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी चुनाव के पहले और शासन के अंतिम वर्ष में वोट बटोरने के लिए लोक लुभावन योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित कर रही है वैसे ही राजस्थान की कांग्रेस सरकार भी पांच सौ रुपए में गैस सिलेंडर को राष्ट्रीय मीडिया में विज्ञापन दे देकर भुना रही है।
आज़ादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में जिस तरह से रचनात्मक कार्यों के माध्यम से जन जागरण और आत्म सम्मानी समाज निमार्ण का राष्ट्रव्यापी कार्य शुरू हुआ था वह गांधी के युवा सहयोगियों, यथा विनोबा भावे, डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण आदि के माध्यम से आजादी के बाद तीन चार दशक तक जारी रहा था। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद निस्वार्थ भाव से सत्ता से दूर रहकर समाज निर्माण में जुटी इस त्रिमूर्ति के बाद कोई अन्य ऐसी प्रभावशाली विभूति नहीं हुई जिसके प्रभाव से प्रगतिशील और जागरूक आत्म सम्मानी समाज निर्माण का कार्य हो। राजनीतिज्ञों की जमात में भी लाल बहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह, गुलजारी लाल नंदा, कर्पूरी ठाकुर, बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे राजनेता वर्तमान दौर में मौजूद नहीं हैं जिन्होंने राजनीति को सेवा और सकारात्मक सामाजिक परिर्वतन का माध्यम समझा हो। ऐसी स्थिति में केवल कड़े कानून ही लोकतंत्र की शुचिता बचा सकते हैं।
जिस तरह से मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधान सभा चुनावों के कारण और केन्द्र सरकार ने लोकसभा चुनाव के कारण गैस सिलेंडर जैसी रोजमर्रा की जरूरी चीजों के दाम में कमी की है ऐसी राहत अगले कुछ महीनों में और भी चीजों पर दी जा सकती है। चुनाव पूर्व का वर्ष मतदाताओं के लिए पंचवर्षीय चुनाव योजना में सबसे ज्यादा आनंद का होता है। केन्द्र और राज्य सरकारें अपनी छवि चमकाने के लिए मतदाताओं को तरह तरह से आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। राजनीतिक दलों के इन चुनावी चौंचलों को मतदाताओं को भी समझने की आवश्यकता है।
- हेमंत कुमार झा
कश्मीर में भारतीय सेना के कर्नल और मेजर और पुलिस के एक डीएसपी की शहादत पर भारत का मिडिल क्लास क्या सोच रहा है?
वह कुछ नहीं सोच रहा है।
वह भावुक हो रहा है उन अफसरों की जवान शहादत पर, फिर गर्व से भर जा रहा है।
एंकर उन अफसरों की जांबाजी के किस्से और राष्ट्र के प्रति बलिदान की महिमा बता रहे हैं, अपने गद्देदार सोफे या मुलायम बिस्तरों पर अधलेटे मिडिल क्लास की रगों में देशप्रेम ज्वार मारने लगता है। उधर एंकरानी उन शहीदों के मासूम बच्चों और परिवारों के बारे में रिपोर्ट देती भावुकता की धारा बहा दे रही है।
बलिदानों पर भावुक होकर और फिर गर्व कर लेने के बाद सब अपने सुख-दु:ख में बिजी हो जा रहे हैं और कल के अखबारों में कश्मीर या फिर उन शहादतों के बारे में छपे किसी नए अपडेट पर ध्यान तक देने की उन्हें फुरसत नहीं होगी।
दरअसल, वे इस पर सोचते ही नहीं कि आखिर ऐसा क्या मामला है कि उनके जन्म के भी पहले से चला आ रहा, हजारों जवानों की कुर्बानी ले चुका यह विवाद सुलझने का नाम ही नहीं ले रहा।
वे इस पर नहीं सोचते, जरा भी नहीं सोचते।
हां, ‘कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’ जैसे डायलॉग उन्हें जोश से भर देते हैं।
उनके लिए कश्मीर एक पर्व है...बलिदानों पर गर्व का, भावुकता का, रगों में देशप्रेम की लहर का।
देश में उनकी आबादी चालीस-पैंतालीस करोड़ के करीब है, लेकिन एक सौ पैंतालीस करोड़ लोगों के इस देश की राजनीति में उनका निर्णायक वर्चस्व है।
कश्मीर पर निर्णय कश्मीर के लिए नहीं, बाकी देश के मानस को देख कर लिए जाते रहे हैं। भाजपा सरकार ने इस मानस को अपनी वैचारिकी के अनुकूल मोडऩे में बहुत हद तक सफलता हासिल की और फिर ऐतिहासिक निर्णय लिए गए।
लेकिन, शांति हासिल नहीं हुई।
अशांत कश्मीर है, देश का मिडिल क्लास अशांत नहीं। वह अपने काम धंधे में लगा है। कश्मीर की अशांति का वह अभ्यस्त हो गया है। उसके पिता भी कश्मीर विवाद की खबरें पढ़ते-सुनते बूढ़े होकर एक दिन मर गए, बचपन से वह भी इन खबरों से गुजरते बूढ़ा होने को आया, कल उसके बच्चे भी जवान शहादतों पर भावुक होंगे, फिर गर्व करेंगे, फिर अपनी दुकान पर तीन का तेरह करने में लग जाएंगे।
मध्य वर्ग युद्धों से नफरत करता है, इनसे उसकी सहज कामकाजी जिंदगी में असहजता आती है। लेकिन, जब राष्ट्र-राष्ट्र की रट लगती है, सारा आलम प्रोपेगेंडा के धुंध से भर जाता है तो इनकी रगों में भी उबाल आ जाता है।
इन्हीं उबालों की तो जरूरत है। राजनीति के लिए यह जरूरी है।
उधर, पाकिस्तान में तो राजनीति की धुरी ही कश्मीर समस्या है। कश्मीर पर जनता के बीच उबाल वहां के राजनीतिज्ञों के लिए जरूरत है जबकि वहां की सेना के लिए यह सबसे बड़ा हथियार है।
इधर, भारत में भाजपा की बड़ी सफलता रही कि उसने इस राजनीतिक हथियार को नई चमक और धार दे दी। धर्म का भी एंगल जो है।
राष्ट्र और धर्म के घालमेल में जब सेना को भी सान दिया जाए तो बलिदानों पर भावुकता अपने अतिरेक को छूने लगती है, गर्व सीने में बेकाबू धौंकनी बन कर सोचने विचारने की शक्ति का हरण कर लेता है...और तब, कोई संगठन, कोई नेता राष्ट्र, धर्म और सेना के साथ खुद को एकाकार दर्शाता एक नया राजनीतिक परिदृश्य रचता है, देश को नया परिवेश देता है।
कश्मीर का ताजा सूरते हाल इसी नए राजनीतिक परिदृश्य, नए परिवेश के निर्माण की कोशिशों का एक नया नतीजा है।
कश्मीर अशांति के अंतहीन अंधेरों की गिरफ्त में है लेकिन वहां के आम लोगों की जिंदगी की दुश्वारियों को बयान करती किसी रिपोर्ट को पढऩे या जानने की कोई जिज्ञासा मिडिल क्लास में नहीं।
भारत का मध्य वर्ग कई संदर्भों में एक महान अध्याय है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की निर्णायक शक्ति, दुनिया का सबसे बड़ा बाजार।
दुनिया में देश की बढ़ती प्रतिष्ठा का समानुपातिक संबंध भारतीय मध्य वर्ग की बढ़ती समृद्धि से है।
यही कारण है कि भारतीय राजनीति के केंद्र में नीचे के पचास करोड़ लोग नहीं, ऊपर के पचास करोड़ लोग हैं।
मध्यवर्ग की इस बढ़ती समृद्धि में विशाल वंचित आबादी के अमानवीय शोषण की बड़ी भूमिका है।
यही कारण है कि राजसत्ता और बाजार के द्वारा नीचे के पचास करोड़ लोगों के शोषण में मध्यवर्ग की बराबर की भागीदारी है। अपने उदय काल से बीती शताब्दी के अंत तक मध्य वर्ग का निम्न वर्ग से इतना विषम संबंध कभी नहीं रहा जितना अब है। यही बीते ढाई-तीन दशकों की राजनीतिक आर्थिकी का सामाजिक निष्कर्ष है।
इस सामाजिक निष्कर्ष ने, आर्थिक उदारवाद के सहजात उपभोक्तावाद की तीव्र आंधी ने मध्य वर्ग को अति स्वार्थी होने की हद तक आत्मनिष्ठ बना दिया। उसकी उपभोक्तावादी आत्मनिष्ठ सोच में कश्मीर या मणिपुर जैसी घटनाएं ऐसी संवेदनशीलता नहीं जगा पातीं कि वह राजनीतिक षडयंत्रों को समझने की जहमत मोल ले।
वह प्रोपेगेंडा से जन्मे प्रचलित और लोकप्रिय नैरेटिव्स से सहज ही प्रभावित होता है और इन्हीं के अनुसार उसकी राजनीतिक सोच भी ढलती है। यहीं आकर राजनीति का कुचक्र और मध्य वर्ग का मानस एक धरातल पर आ कर मिल जाते हैं और पीछे रह जाते हैं राजनीति के शिकार अशांत क्षेत्रों के लोग, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर वनाच्छादित इलाकों के आदिवासी, जीने की जद्दोजहद से जूझती हाशिए की आबादी।
कभी समाज को दिशा देने वाला मिडिल क्लास आज वैचारिक स्तरों पर खुद दिशाहीन है और उन आर्थिक-राजनीतिक षडयंत्रों से घिरा भी, जो उससे अधिक उसके बच्चों की पीढ़ी के लिए घातक साबित होने वाले हैं।
बावजूद इसके कि भारत की राजनीति पर मिडिल क्लास का वर्चस्व है, इसके पास वह दृष्टि नहीं जो कश्मीर के समाधान पर कुछ सार्थक सोच सके, अस्तित्व के अधिकारों के लिए संघर्ष करते आदिवासी समूहों के साथ कोई सामंजस्य बिठा सके, हाशिए की पचास करोड़ आबादी को मनुष्य होने की गरिमा पाने में सहयोगी हो सके।
सुबह में जो लोग टीवी पर या मोबाइल पर कश्मीर की शहादतों पर भावुक हो रहे थे, गर्व फील कर रहे थे, दोपहर में वे शाहरुख के ‘जवान’ के हिट होने की चर्चा कर रहे होंगे और शाम होते होते एशिया कप के फाइनल में भारत की संभावना पर विमर्श में लीन हो गए होंगे।
यह अलग विमर्श का विषय है कि भारत का मिडिल क्लास मनुष्यता के प्रति इतना निरपेक्ष कैसे होता गया कि वह मनुष्यता विरोधी लगने लगा है।
18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र क्यों बुलाया गया है, सरकार ने इस सवाल का जवाब अब दे दिया है। लोकसभा सचिवालय के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से बताया गया है कि बाक़ी कार्यवाही से अलग सत्र के पहले दिन 18 सितंबर को दोनों सदनों में संसद के 75 साल के सफऱ पर चर्चा की जाएगी। इसके तहत संविधान सभा से लेकर संसद की उपलब्धियों, अनुभवों और यादों की चर्चा की जाएगी। लोकसभा और राज्यसभा के जारी बुलेटिन में भी इस बारे में जानकारी दी गई है।
द हिंदू की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार का एजेंडा इस ओर इशारा करता है कि संसद का विशेष सत्र पुरानी से नई संसद में जाने के लिए बुलाया गया है। नई संसद का पीएम नरेंद्र मोदी ने 28 मई को उद्घाटन किया था। लेकिन मॉनसून सत्र संसद की पुरानी इमारत में ही हुआ था। नई संसद को 970 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है। ये सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
मॉनसून सत्र नई बिल्डिंग में क्यों नहीं बुलाया गया, इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई थी।
केंद्र सरकार भारत की आजादी के 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव (अमृत काल) मना रही है। आज़ादी के 50 साल पूरे होने पर भी 15 अगस्त 1997 को संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था।
किन बिल पर होगी चर्चा?
राज्यसभा के बुलेटिन के मुताबिक़, संसद के विशेष सत्र में तीन बिल पर चर्चा होगी। लोकसभा में भी दो बिल पर चर्चा होगी। पोस्ट ऑफिस विधेयक 2023 मुख्य चुनाव आयुक्त एवं चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवाओं और कार्यकाल से संबंधित विधेयक
निरसन एवं संशोधन विधेयक 2023
अधिवक्ता संशोधन विधेयक 2023
प्रेस एवं पत्र पत्रिका पंजीकरण विधेयक 2023
इन बिलों में सबसे चर्चित है मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़ा विधेयक। कहा जा रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को हटाने का सरकार का इरादा है और इसीलिए ये बिल लाया जा रहा है। अभी तक मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनने वाली कमिटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश होते हैं। नए विधेयक में मुख्य न्यायाधीश की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल किए जाने की बात कही गई है।
17 सितंबर को विशेष सत्र से एक दिन पहले संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस दिन पीएम नरेंद्र मोदी का जन्मदिन भी होता है। संसद का विशेष सत्र जब बुलाया गया था तो उसके फौरन बाद केंद्र सरकार ने ‘एक देश एक चुनाव’ पर कमिटी बनाई थी। इस कमिटी को बनाए जाने के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा कहा जा रहा था कि संसद के विशेष सत्र में सरकार ‘एक देश एक चुनाव’ से जुड़ा बिल ला सकती है। हालांकि बुधवार को संसद की ओर से जारी बुलेटिन में एक देश एक चुनाव का कोई जि़क्र नहीं है। विपक्ष इसे संदेह की निगाह से देख रहा है।
विपक्ष ने की आलोचना
कुछ दिन पहले कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर संसद के विशेष सत्र बुलाए जाने का एजेंडा पूछा था। इसी चिट्ठी का जि़क्र करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया है। जयराम रमेश ने लिखा, ‘सोनिया गांधी के पीएम को चिट्ठी लिखने के बाद पड़े दबाव के कारण आखिरकार मोदी सरकार ने 5 दिन के विशेष संसदीय सत्र के एजेंडे की घोषणा की है। इस वक़्त जो एजेंडा प्रकाशित किया गया है, उसमें कुछ नहीं है। इसके लिए नवंबर में होने वाले शीतकालीन सत्र तक रुका जा सकता था।’ जयराम रमेश ने लिखा, ‘मुझे यकीन है कि विधायी हथगोलों को छिपाया जा रहा और हमेशा की तरह उसे अचानक आखऱि में सामने लाएंगे। पर्दे के पीछे कुछ और है।’ कांग्रेस नेता ने बताया कि इंडिया गठबंधन से जुड़ी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त विधेयक का विरोध करेंगी।
विशेष सत्र बुलाए जाने की वजहों से जुड़े कयास
संसद का विशेष सत्र जैसे ही बुलाया गया था, वैसे ही ये कयास शुरू हो गए थे कि इसका मकसद क्या है।प्रह्लाद जोशी ने सत्र बुलाए जाने की जानकारी देते हुए दोनों संसद भवन की एक तस्वीर साझा की थी। तब मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि ये पुरानी संसद से नई संसद में जाने के लिए सत्र बुलाया गया है।
नई और पुरानी संसद
हालांकि आधिकारिक तौर पर सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं बताया था। बुधवार को समाचार एजेंसी एएनआई ने नई संसद में कर्मचारियों की नई यूनिफॉर्म की तस्वीरों को साझा किया था। कहा जा रहा है कि नई संसद में इसी यूनिफॉर्म में कर्मचारी दिखेंगे। सत्र बुलाने के एलान के बाद केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में ‘एक देश एक चुनाव’ पर कमिटी बनाई थी। इस कमेटी के बनाए जाने के बाद मीडिया में कहा गया कि विशेष सत्र में इसी पर चर्चा होगी। संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा था, ‘अभी तो कमिटी बनाई है। इतना घबराने की क्या जरूरत है? कमेटी बनाई है, फिर इसकी रिपोर्ट आएगी। कल से ही हो जाएगा, ऐसा तो हमने नहीं कहा है।’
भारत में साल 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव एक साथ ही होते थे। साल 1947 में आज़ादी के बाद भारत में नए संविधान के तहत देश में पहला आम चुनाव साल 1952 में हुआ था। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी कहा गया था कि सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड पर भी बिल ला सकती है। इसके अलावा जी-20 समारोह के दौरान राष्ट्रपति की ओर से दिए जाने वाले भोज के निमंत्रण पत्र में इंडिया की बजाय भारत लिखे होने के बाद भी ये चर्चा छिड़ी थी कि विशेष सत्र में देश का नाम सिर्फ भारत कर दिया जाएगा। हालांकि केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने इससे इनकार किया था और कहा था कि जी-20 की ब्रैंडिंग में इंडिया भी है और भारत भी। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया से डर गई है और इसलिए नाम बदलने जैसी चर्चाओं को छेड़ रही है। (bbc.com/hindi)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
आजादी के अमृत महोत्सव काल में देश में भले ही कोई ऐसा बड़ा अभियान नही चला हो जिससे आज़ादी में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सेनानियों की आत्मा को शांति मिले लेकिन आजकल दल बदलुओं के लिए जरूर अमृत काल है। आगामी कुछ महीनों बाद एक तरफ लोकसभा चुनाव हैं और उसी के आसपास मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों के विधान सभा चुनाव हैं। दल बदल करने वालों के लिए इससे बड़ा अवसर कभी नहीं आता जब उन्हें एक साल के अंदर दो चुनाव में दल बदलने का मौका मिलता है।
दल बदलू नेता चुनाव के काफ़ी पहले जंगली हिरणों की तरह हवा का रुख काफ़ी दूर से सूंघ लेते हैं। जिस राजनीतिक दल का जहाज डगमगाकर डूबने वाला दिखने लगता है दल बदलू उगते सूरज वाले दल की तरफ दौड़ लगाने लगते हैं। इसी दौर में अपने अपने दलों से नाराज चल रहे नेताओं की घुटन बर्दाश्त के बाहर पहुंच जाती है। काफ़ी समय से सोई उनकी आत्मा मुर्गे की बांग की तरह बहुत जोर जोर से आवाज लगाने लगती है।जो राजनीतिक दल पहले कौरव सेना की तरह दिखता था वह अचानक पांडवों की तरह दिखने लगता है और उसके सेनापति, जिसमें रावण की छवि दिखती थी, उसमें सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर के दर्शन होने लगते हैं।
देश के लिए अमृत काल साल भर से चल रहा है लेकिन दल बदलूओं के लिए अमृत काल अभी शुरु हुआ है और विधान सभाओं और लोकसभा चुनावों के टिकट वितरण तक चलेगा। मध्य प्रदेश में इन दिनों काफ़ी दल बदल चल रहा है। कुछ बहुत पुराने जनसंघ काल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुडे परिवारों के लोग अपनी लंबी विचारधारा की केंचुली त्यागकर नए ठिकाने खोज रहे हैं।
कांग्रेस और भाजपा में एक तरह की प्रतिस्पर्धा सी है कि किधर से ज्यादा इधर उधर होंगे। पुराने चावलों की बात करें तो मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक दिवंगत मुख्यमंत्री के सुपुत्र भारतीय जनता पार्टी छोडक़र दल बल के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। पिछली विधान सभा में भाजपा के विधानसभा अध्यक्ष के अग्रज ने भी उम्र के इस पड़ाव पर भारतीय जनता पार्टी को अलविदा कह दिया। भाजपा के काफ़ी नेता मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने के कारण नाराज़ चल रहे थे। उनमें से तीन को हाल ही में डेढ़ महीने के लिए मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। अभी कांग्रेस और भाजपा में काफ़ी लोग टिकट वितरण तक पपीहे की तरह टकटकी लगाकर इंतजार करेंगे और टिकट हाथ से फिसलता देख घुटन महसूस करेंगे और तुरंत आत्मा की आवाज सुनकर दल बदलेंगे।
जहां तक मध्य प्रदेश का प्रश्न है यहां वर्तमान विधानसभा में कांग्रेस की बहुमत की सरकार बनी थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की महत्वाकांक्षा के कारण कांग्रेस को सत्ता से हटाकर भारतीय जनता पार्टी ने जोड़ तोड़ की सरकार बना ली थी। ग्वालियर के आसपास के क्षेत्रों में जहां अभी भी सिंधिया परिवार का दबदबा है वहां भाजपा के लिए ज्यादा परेशानी सामने आने की संभावना है। ज्योतिरादित्य सिंधिया पूरी जोर आजमाइश करेंगे कि उनके साथ दल बदल की जोखिम उठाने वाले उनके साथियों को टिकट वितरण में प्राथमिकता मिले और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा में अपना जीवन खपाने वाले नेताओं की कोशिश होगी कि उनके सब्र का और अधिक इम्तेहान न लिया जाए। अपने बड़े नेताओं की तरह अब मध्यम श्रेणी के नेता और कार्यकर्ता भी सत्ता की सुविधाओं में अपनी क्षमता के अनुसार भागीदारी चाहते हैं। वे भी अपने पारिवारिक सदस्यों और व्यापार आदि को फलते फूलते देखने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। उन्हें दोष नहीं दे सकते।उनकी महत्वाकांक्षा के लिए उनके बड़े आका ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने राजनीति को सेवा के क्षेत्र से मेवा का क्षेत्र बना दिया है।
-दिनेश राय द्विवेदी
मेरी मातृभाषा हिन्दी नहीं, राजस्थानी (हाड़ौती) है। लेकिन मैं ने पहल देवनागरी लिपि सीखी। पुस्तक में सभी पाठ हिन्दी के थे। घर में तमाम किताबें हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी में थीं। तीसरी कक्षा में स्कूल में भरती हुआ तो वहाँ हिन्दी, गणित, विज्ञान, और सामाजिक ज्ञान पढ़ाए जाते थे। पाँचवीं क्लास में अंग्रेजी का वर्णमाला अभ्यास कराया गया। छठी से अंग्रेजी, संस्कृत भी आ मिले। अंग्रेजी के अध्यापक ऐसा पढ़ाते थे कि बस पास हो जाएँ।
छठी कक्षा में एक दिन मेरा सेक्शन दूसरे सेक्शन के साथ मिला दिया। वहाँ के अध्यापक अंग्रेजी बढिय़ा पढ़ाते थे। अगले दिन से मेरा सेक्शन अलग हो कर बैठने लग गया। लेकिन मैं उसी सेक्शन में बैठने लगा अंग्रेजी पढऩे की खातिर। एक माह बाद मैं पकड़ा गया कि मेरा नाम उस सेक्शन में नहीं है जिस में बैठ रहा हूँ। अंग्रेजी वाले मास्टर साहब ने पता किया तो अपने सेक्शन में मेरा नाम अनुपस्थिति के कारण कट गया था। अंग्रेजी वाले मास्टर साहब मुझे हेड मास्टर जी के पास ले गए। उन्होंने पूछा कि तुम अपने सेक्शन में क्यों बैठे? मैंने कहा इस सेक्शन में अंग्रेजी अच्छी पढ़ाते हैं। अंग्रेजी वाले मास्टर जी ने कहा, मेरी क्लास से तो लडक़े भागते हैं मैं मारता बहुत हूँ, तुम पता नहीं कैसे रुक गए।
खैर, हेडमास्टर जी पिताजी के मित्र थे। मुझे वापस अपनी क्लास में भेज दिया गया। लेकिन अंग्रेजी कमजोर रह गई। मुझे उसका नुकसान उठाना पड़ा। बीएससी में दो साल खराब हो गए।
मुझे अपनी भाषा बोली पर कोई गर्व नहीं है। वे भी वैसी ही भाषाएँ हैं जैसी दूसरी हैं। लेकिन मैें उन्हें प्रेम करता हूँ वैसे ही जैसे मैं अपनी माँ को प्रेम करता हूँ। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं किसी दूसरी भाषा को कमतर मानता हूँ। मुझे सभी भाषाओं से वैसा ही प्रेेम है जैसा अपनी बोली भाषा से।
हिन्दी अभी बहुत कमतर भाषा है, उसका विकास होना शेष है। अभी उच्च शिक्षा उसमें नहीं पढ़ाई जा सकती। चाहते हुए भी वह अदालतों की भाषा नहीं हो सकती। जहाँ है वहाँ भी कानून की व्याख्या के लिए अंग्रेजी मान्य है। उसका कारण है कि अभी हिन्दी शब्दों की व्याख्याएँ नहीं हैं। अभी बहुत बरस लगेंगे हमारी प्यारी हिन्दी को उस स्थिति तक पहुँचने में।
आज के हिन्दी दिवस के कोई मायने नहीं यदि हम उसके विकास के लिए काम न करें। हम चाहते हैं हिन्दी वैसे ही विकसित हो जैसे अन्य भाषाएँ जिनमें दुनिया के सारे काम होते हैं। उसमें हम हिन्दी वालों को बहुत मेहनत करनी होगी। यह पूर्वाग्रह छोडऩा होगा कि हम संस्कृत या भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में समाहित करेंगे अन्य को नहीं। दूसरी भाषाओँ के शब्दों को अपनी भाषा में समाहित करना हमें अंग्रेजी से सीखना चाहिए। इस तरह आज अंग्रेजी का शब्द विशाल हो गया है और बढ़ता ही जा रहा है। यही उदारता हमें दिखानी होगी वर्ना हमारी प्यारी हिन्दी ऐसी ही रह जाएगी। हमें दुनिया की हर भाषा से शब्दों को अपनाना होगा।
भारत सरकार ने कहा है कि इलॉन मस्क की कंपनी एक्स ऐसी कंपनी है जो “आदतन उल्लंघन करने वाला” प्लैटफॉर्म है, जिसने बीते सालों के दौरान कई बार सामग्री को अपने प्लैटफॉर्म से हटाने के आदेशों का पालन नहीं किया है.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट-
भारत और ट्विटर के बीच की तनातनी नये स्तर पर पहुंच गयी है. अदालत में भारत सरकार ने कहा है कि इलॉन मस्क की कंपनी एक्स ऐसी कंपनी है जो "आदतन उल्लंघन करने वाला” प्लैटफॉर्म है, जिसने बीते सालों के दौरान कई बार सामग्री को अपने प्लैटफॉर्म से हटाने के आदेशों का पालन नहीं किया है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक उसने भारत सरकार के वकीलों द्वारा दायर हलफनामा पढ़ा है जो 24 अगस्त को आईटी मंत्रालय ने कर्नाटक हाई कोर्ट में दाखिल किया है. आने वाले दिनों में अदालत इस मामले की सुनवाई शुरू करने वाली है. हालांकि फिलहाल एक्स या भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर मीडिया में कोई टिप्पणी नहीं की है.
ट्विटर पर जुर्माना
एक्स जिसे इलॉन मस्क द्वारा खरीदे जाने से पहले ट्विटर के रूप में जाना जाता था, भारत सरकार के साथ लंबे समय से कानूनी लड़ाई में उलझी हुई है. भारत ने आरोप लगाया था कि ट्विटर उसके आदेशों का पालन नहीं कर रहा है. जून में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक्स पर 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था और कहा था कि कंपनी ने सरकार द्वारा सामग्री हटाने के कई आदेशों का उल्लंघन किया और उसके लिए कोई जायज सफाई भी नहीं दी.
ट्विटर ने उस फैसले को कोर्ट की बेंच के सामने चुनौती दी थी. उसकी दलील थी कि अगर सरकार के ये आदेश माने जाते हैं तो भविष्य में वह और ज्यादा सामग्री हटवा सकती है जिससे अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगने का खतरा है. साथ ही उसने जुर्माना हटाने की भी अपील की है.
भारत के आईटी मंत्रालय का कहना है कि एक्स की अपील बेमतलब है और उसे कूड़े में फेंक दिया जाना चाहिए. मंत्रालय ने कहा कि कंपनी ने ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की भूमिका को नजरअंदाज किया है' और कुछ ऐसे खातों को बिना बताये भी दोबारा चालू कर दिया जिन्हें सरकार ने ब्लॉक करवाया था.
कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सरकार ने कहा, "सरकार के अनुरोधों को मानने की एक्स की दर बहुत कम रही है. यह सरकार का फर्ज है कि सुनिश्चित हो कि ये प्लैटफॉर्म कानून के दायरे में व्यापार करें.”
एक्स और भारत के रिश्ते
भारत और एक्स के रिश्ते पिछले कुछ सालों में लगातार खराब होते गये हैं. यह विवाद सबसे ज्यादा तब बढ़ा जब 2021 में भारत के किसान सरकार के कुछ प्रस्तावों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. नवंबर 2021 में केंद्र की मोदी सरकार ने तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी. मोदी सरकार को किसानों के आंदोलन के कारण इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था. लेकिन उससे पहले महीनों तक चले आंदोलन के दौरान सरकार ने कई ट्विटर हैंडलों को ब्लॉक करवाया था.
ट्विटर ने इस बारे में सिर्फ इतनी जानकारी सार्वजनिक दी थी कि भारत में एक कानूनी मांग के तहत @Kisanektamorcha और @Tractor2twitr खातों पर रोक लगा दी गई. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) के मुताबिक ट्विटर को इन दोनों खातों के अलावा और भी कई खातों पर भारत के इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कानून के तहत रोक लगाने के अनुरोध मिले थे. आईएफएफ ने यह जानकारी इंटरनेट सेंसरशिप पर नजर रखने वाली अमेरिकी संस्था 'लुमेन डेटाबेस' से हासिल की है. लुमेन के मुताबिक हाल ही में भारत सरकार ने ट्विटर को कम से कम दो कानूनी अनुरोध भेजे थे. हर अनुरोध में कई ट्विटर खाते शामिल थे. आईएफएफ द्वारा जारी की गई इन खातों की सूची में कम से कम 75 खाते थे.
भारत में पाबंदियां
अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मुताबिक भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सरकार ने सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा लगाम कसी हुई है. ट्विटर के पूर्व सीईओ जैक डोर्सी ने 2022 में एक इंटरव्यू कहा था कि भारत सरकार ने उन पर काफी दबाव बनाया था. जैक डोर्सी ने एक इंटरव्यू में कहा कि ट्विटर को भारत से कई "अनुरोध" मिले थे, जिनमें सरकार की आलोचना करने वाले हैंडलों और किसान आंदोलन पर रिपोर्टिंग करने वालों के खातों पर पाबंदी लगाने को कहा गया था. जैक डोर्सी ने यह भी आरोप लगाया कि भारत सरकार ने ट्विटर को भारत में बंद करने की धमकी दी थी.
यूट्यूब पॉडकास्ट 'ब्रेकिंग पॉइंट' को दिए इंटरव्यू में जैक डोर्सी से एक सवाल किया गया था. सवाल "ताकतवर लोगों" की मांगों के संबंध में था. उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने विदेशी सरकार की तरफ से किसी तरह के दबाव का सामना किया था. सवाल में भारत का जिक्र नहीं था. अपने जवाब में डोर्सी ने कहा, "भारत ने प्लेटफॉर्म पर दबाव बनाया."
भारत पर आरोप
जब जैक डोर्सी से उनके कार्यकाल में विदेशी सरकारों के दबाव के कुछ उदाहरण देने के लिए कहा गया, तो उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा, "भारत एक ऐसा देश है, जहां से किसान आंदोलन के दौरान हमारे पास बहुत सी मांगें आ रही थीं. कुछ खास पत्रकार जो सरकार के आलोचक थे, उनके बारे में. एक तरह से हमसे कहा गया कि हम भारत में ट्विटर को बंद कर देंगे. भारत हमारे लिए बड़ा बाजार है."
उन्होंने कहा, "हम आपके कर्मचारियों के घरों पर छापेमारी करेंगे, जो उन्होंने किया. अगर आप नियमों का पालन नहीं करते, तो आपके दफ्तरों को बंद कर देंगे. और यह भारत है, एक लोकतांत्रिक देश."
नये मालिक इलॉन मस्क के प्रबंधन में ट्विटर यानी एक्स भारत सरकार के साथ कानूनी लड़ाई को लगातार जारी रखे हुए है. अपने ताजा हलफनामे में भारत सरकार ने कहा है कि सरकारी आदेशों को चुनौती देकर एक्स एक ‘खतरनाक चलन की पैरवी‘ कर रहा है.
एक्स और सरकार के बीच यह कानूनी लड़ाई ऐसे वक्त में चल रही है जबकि इलॉन मस्क भारत में टेस्ला कार के निर्माण के लिए फैक्ट्री लगाने की कोशिशों में लगे हैं और सरकार से बातचीत कर रहे हैं. (रॉयटर्स)
डॉ. आर.के. पालीवाल
भाजपा की यह यात्रा लोकसभा चुनाव के लिए निकल रही है या मध्य प्रदेश चुनाव के लिए या दोनों के लिए! यह निश्चित नहीं है क्योंकि एक देश एक चुनाव के लिए उच्च स्तरीय समिती बन चुकी है जिसकी रिर्पोट यदि संसद का विशेष सत्र बुलाकर लागू कर दी गई तो एक साथ चुनाव संभव हैं। भारतीय जनता पार्टी और उनके समर्थक मानते हैं कि मोदी हैं तो सब मुमकिन है। यदि उन्होंने तय कर लिया है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने हैं तो उन्हें रोकना किसी के वश में नहीं है वह पत्थर की लकीर की तरह है होकर ही रहेगा।
जन आशीर्वाद यात्रा को दिशा देने जे पी नड्डा,अमित शाह, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी आ रहे हैं और समापन पर प्रधानमंत्री खुद कार्यकर्ताओं के महाकुंभ को संबोधित करने आएंगे। कद्दावर केंद्रीय मंत्रियों की अगुवाई में होने वाली इस यात्रा में उनकी बडी हैसियत के अनुसार रथों को सजाया जा रहा है, प्रादेशिक नेता कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी द्वारा पूरे पेज के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। नोटबंदी और कोरोना की दोहरी मार से पूरी तरह नहीं उभरी जनता भले ही सरकारी राशन के बूते जैसे तैसे अपना पेट भर रही है लेकिन अमीरी के मामले में भारतीय जनता पार्टी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है। राजनीतिक दलों का हिसाब किताब जनता को दिखाने वाली संस्था ए डी आर की ताजा रिर्पोट के अनुसार जितना कुल धन सब बडी पार्टियों के पास नहीं है उतना धन अकेले भारतीय जनता पार्टी के पास है। कांग्रेस के पास हजार करोड़ भी नहीं है और भाजपा के पास सात हजार करोड़ के आसपास है। ऐसे में वह एक पेज तो क्या पूरे अख़बार को विज्ञापन से पाट सकती है। मोदी जी ने किसानों की आय भले ही दुगुनी नहीं की लेकिन भाजपा की आय अपने शासनकाल में तकरीबन दस गुनी बढ़ा दी।
भाजपा ने जन आशीर्वाद यात्रा का सही समय नहीं चुना। मध्य प्रदेश में सडक़ों की हालत बरसात के गड्ढों ने बेहद खस्ता कर रखी है। बिजली संकट को मुख्यमंत्री ने खुद स्वीकार किया है। अगस्त के सूखे ने सोयाबीन और धान की फसल की हालत खराब कर किसानों की कमरतोड़ रखी है। दुखी लोग इतने कष्ट में रहकर कैसे आशीर्वाद दे सकते हैं। उमा भारती नाराज बताई जा रही हैं क्योंकि उनका नाम न यात्रा के कार्यक्रम में है और न मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा जारी किए गए विज्ञापन में है। उनकी तरह हाशिए पर चल रहे और भी काफ़ी नेता हैं जिनमें से कुछ कमल का साथ छोड़ कमलनाथ की शरण में आ चुके हैं और कुछ को मंत्री बनाकर फिलहाल खुश कर लिया है लेकिन काफी अभी भी नाराज़ चल रहे हैं। इसी बीच यात्रा पर पथराव हो गया। भारतीय जनता पार्टी इसे कांग्रेस का षडय़ंत्र बता रही है और कांग्रेस इसे भाजपा के नाराज लोगों का विरोध कह रही है। मीडिया इसे वन विभाग से परेशान ग्रामीणों के आक्रोश का नतीजा बता रही है। जनता की नाराजगी कई मुद्दों पर है। बिजली के बारे में खुद मुख्यमंत्री मान रहे हैं कि किल्लत है। सडक़ों की हालत बहुत ही दयनीय है। पूरा प्रशासन लाडली बहना योजना में लगाया गया है इसलिए बाकी तमाम काम पीछे खिसक गए हैं।
भारतीय जनता सात दशक से अपने मताधिकार का प्रयोग कर रही है इसलिए उसे कोई राजनीतिक दल चुनावी चौंचलो से मूर्ख नहीं बना सकता। इस दौरान मतदान के क्रम में एक और परिर्वतन आया है। मतदाताओं की बहुत बडी संख्या अपने मत के बारे में खुलकर बात नहीं करते। वे अपने मत को उसी तरह गुप्त रखना सीख गए हैं जैसी संविधान उम्मीद रखता है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों के मतदाता किसी भी राजनीतिक दल के नेता से खुलेआम दुश्मनी नहीं चाहते क्योंकि उन्हें नेताओं पर विश्वास नहीं है। वे जानते हैं कि जीतने के बाद नेता अपने धुर विरोधियों को तरह तरह से परेशान करते हैं। मतदाता यह भी समझते हैं कि चुनाव से पहले यात्राओं, रैलियों, घोषणाओं और राहतों का लंबा दौर चलता है। जन आशीर्वाद यात्रा को भी आम नागारिक इसी दृष्टि से देख रहा है।
सनियारा खान
सिर्फ ग्यारह साल की उम्र में नादिया नदीम को अफगानिस्तान से भाग कर डेनमार्क जाना पड़ा था। अफगानिस्तान के हेरात इलाके में उसका जन्म हुआ था। उसके पिता अफगान नैशनल आर्मी में जेनेरल थे। सन 2000 में तालिबानियों ने उनकी हत्या कर दी थी। उसके बाद नादिया और उसका परिवार एक ट्रक के पीछे छुप कर डेनमार्क पहुंचा। उसके परिवार में उसकी मां और बहनें थी। छुटपन से ही उसे अपने पिता के साथ फुटबॉल खेलना अच्छा लगता था। डेनमार्क आने के बाद वह फुटबॉल खेलना सीखने लगी। साथ ही चिकित्सा विज्ञान में डिग्री लेने के लिए शिक्षा भी ग्रहण कर रही थी। आज के दिन वह डेनमार्क की तरफ से खेलने वाली एक प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बन चुकी है। प्रसिद्ध फोब्र्स पत्रिका में भी उसके बारे में छपा है। हाल ही में वह अब डॉक्टर भी बन चुकी है। एक पेशेवर फुटबॉलर और डॉक्टर बन चुकी नादिया ने अपने इन सफलताओं के लिए नए देश और नए दोस्तों का शुक्रिया अदा करते हुए ये कहा कि उन सभी के साथ और सहयोग के बिना वह कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती।
अब आइए हम गुजरात के मेहसाना के लुनवा गांव की एक खबर पर ध्यान देते हैं। इस गांव में श्री के टी पटेल स्मृति विद्यालय नामक एक विद्यालय है। इसी विद्यालय के दसवीं कक्षा में अच्छे अंक पाने वाले सभी छात्रों को पंद्रह अगस्त यानि कि स्वतंत्रता दिवस पर सम्मानित करने के लिए एक अनुष्ठान रखा गया था। लेकिन हैरानी की बात ये है कि सब से अधिक अंक प्राप्त करने वाली छात्रा का नाम गायब कर के द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाली छात्रा को उसके हिस्से की पुरस्कार दे दिया गया। कारण शायद यही है कि उस छात्रा का नाम अर्नाज बानो है और वह मुसलमान धर्म से जुड़ी लडक़ी है। उस लडक़ी ने रोते हुए घर जा कर घरवालों को ये बात बताई। उसके बाद उस लडक़ी के पिता ने इस मामले को लेकर विद्यालय के अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा। लेकिन विद्यालय पक्ष कोई भी कारण नहीं बता पाए। उन लोगों ने बस इतना ही कहा कि अब पुरस्कार छात्रा के घर पहुंचा दिया जाएगा। लडक़ी के पिता बार-बार ये सवाल उठा रहे है कि उसे उसी अनुष्ठान में ही क्यों सम्मानित नहीं किया गया? इस पर झूठ भी बोलने की कोशिश की गई कि छात्रा उस दिन विद्यालय आई ही नहीं थी। अंत तक विद्यालय की तरफ से कोई सही जवाब देते नहीं बना तो उन लोगों ने कहा कि छात्रा को 26 जनवरी के दिन सम्मानित किया जाएगा। अर्नाज बानो के पिता एक किसान है। उन्हें इस बात को लेकर बहुत दुख है कि उनकी बेटी को सही जगह पर क्यों सम्मान नहीं दिया गया? हम सभी को सोचना चाहिए कि इस बात से उस बच्ची के कोमल मन में क्या असर पड़ा होगा! गुजरात हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी का भी राज्य है। इस घटना से एक बात तो झूठ साबित हुई कि सबका का विकास साथ साथ करने की कोशिश हो रही है। डेनमार्क में एक शरणार्थी लडक़ी नादिया नदीम को प्यार से सहारा दे कर उसकी जिंदगी आसान कर दी गई। लेकिन इसी देश में जन्मी और पली बढ़ी एक लडक़ी को धर्म के आधार पर शर्मिंदा किया गया और वह भी विद्या के मंदिर में! हो सकता है कि अलग अलग देशों में अलग अलग सामाजिक माहौल होते हैं। कहीं फर्क़ दिखता है और कहीं नहीं भी दिखता है। दो चार अखबारों को छोड़ कर हमारी मीडिया भी इस मामले को ले कर पूरी तरह ख़ामोश बैठी है। खैर, इससे हमें हैरान नहीं होना चाहिए। क्या मालूम इस घटना से हम में से कितने लोग शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं या फिर गौरव प्राप्त कर रहे हैं? अभी अभी एक और खबर आई कि मुजफ्फरपुर के एक विद्यालय में एक महिला शिक्षिका तृप्ता त्यागी ने धार्मिक भेदभाव दिखाकर एक मुस्लिम बच्चे को हिंदू बच्चों द्वारा पिटवा रही थी और एक अन्य व्यक्ति उस घटना का वीडियो बनाते हुए मजे ले रहा था।
खैर, अभी तो लग रहा है कि इस तरह की घटनाओं द्वारा शायद एक प्रयोग भी चलाया जा रहा है ये जानने के लिए कि बहु संख्यक जनता इस तरह की घटनाओं को देख कर खुश होते हैं या फिर वे विरोध की आवाज़ उठाते हैं? ज्यादातर लोगों की खामोशी देख कर लग तो यही रहा है कि निर्वाचन के समय इन हरकतों से नेताओं को फायदा ही होगा। बेहद अफसोसनाक है, लेकिन यही सच है।


