विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले को प्रकृति ने गंगा यमुना के दोआब की खूबसूरत और बेहद उर्वरक सौगात बख्शी है लेकिन अक्सर सांप्रदायिक तनाव, अपराधों और विवादों के कारण यह जिला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों मे आ जाता है। ताजा मामला जिले के खब्बूपुरा गांव के एक छोटे से प्राइवेट स्कूल का है जिनकी भरमार मुजफ्फरनगर ही नहीं लगभग पूरे भारत के गांवों में कुकुरमुत्तों की तरह हो गई है। इस स्कूल को चलाने वाली एक दिव्यांग महिला शिक्षिका द्वारा एक बच्चे को पिटवाने की वायरल हुई वीडियो पर सोसल मीडिया एवं तमाम अखबारों और चैनलों में सनसनीखेज खबरें प्रसारित हो रही हैं। यह आरोप है कि शिक्षिका ने अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र को बहुसंख्यक वर्ग के छात्रों से अल्प संख्यक वर्ग के प्रति दुर्भावनाग्रस्त मानसिकता के कारण पिटवाया है। एक अनाम से गांव के अनाम से प्राइवेट स्कूल की इस घटना पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और असदुद्दीन ओवैसी आदि के आक्रोषपूर्ण बयान प्रमुखता से प्रकाशित हुए हैं।
निश्चित रूप से शिक्षक द्वारा किसी बच्चे की उसके साथियों द्वारा निर्मम पिटाई उचित नहीं है, हालांकि हमारे यहां कुछ दशक पहले तक, जब हमारी पीढ़ी स्कूल में पढ़ती थी, बचपन में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों की पिटाई को अभिभावकों का भी समर्थन मिलता था लेकिन अब न कानून इसकी अनुमति देता है और न आधिकांश अभिभावक इसका समर्थन करते हैं। इसलिए इस मामले में संबंधित शिक्षिका का व्यवहार दुराचरण की श्रेणी में आता है। यदि जांच में यह साबित होता है कि शिक्षिका ने बच्चे की पिटाई किसी धर्म या जाति विशेष के प्रति दुर्भावना की मानसिकता से कराई है तब ऐसी शिक्षिका को शिक्षिका होने का हक नहीं है और उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहद कड़ी सजा होनी चाहिए।
मूल प्रश्न यह भी है कि हमारी सरकारी शिक्षा व्यवस्था इतनी लचर क्यों हो गई कि अधिसंख्य नागरिकों का उस पर विश्वास ही नहीं रहा। शिक्षा को इस हालत में पहुंचाने के लिए देश के तमाम दल थोड़े कम या अधिक लगभग बराबर के दोषी हैं। उत्तर प्रदेश में इस कुव्यवस्था के लिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव की कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी उतनी ही दोषी हैं जितनी भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राज्य सरकार दोषी है। यही कारण है कि आजादी के दो तीन दशक बाद से सरकारी प्राइमरी शिक्षा की हालत दिन ब दिन बदतर होती चली गई और गांव-गांव और गली गली अर्धशिक्षित शिक्षकों द्वारा संचालित ऐसे प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ गई जिसमें से एक मुजफ्फरनगर जिले का वह आधा अधूरा मान्यता समाप्त होने के बाद भी चल रहा स्कूल है जिसमें यह दुर्भाग्यजनक घटना घटी है जिसे ज्यादातर राजनीतिक दल बढ़ा चढ़ाकर अपने अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं और चुनावों तक करेंगे। इन राजनीतिक दलों को यह भी बताना चाहिए कि उनके शासन काल में उत्तर प्रदेश में शिक्षा में क्या गुणात्मक परिवर्तन किया गया था और यदि उन्हें फिर से सत्ता हासिल हुई तो वे किस तरह से शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाएंगे।
शिक्षा किसी देश और समाज के भविष्य के लिए नीव का काम करती है। ब्रिटिश राज में मैकाले ने भारत की नीव खोखली करने के लिए जिस शिक्षा व्यवस्था को हम पर लादा था कमोबेश वही शिक्षा पद्धति थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ आज़ादी के बाद भी बरकरार रही। साठ के दशक तक सरकारी शिक्षकों में विद्यार्थियों के प्रति आत्मीय लगाव के कारण सरकारी प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीकठाक था लेकिन वर्तमान दौर में सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की स्थिति चिंताजनक है।
ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खतरनाक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना से सबक लेकर उत्तर प्रदेश सरकार सरकारी स्कूल शिक्षा का स्तर सुधारने की कोशिश करेगी।


