विचार / लेख

सौ स्त्रियों के बुर्के सहसा उठ गए
22-Aug-2023 3:57 PM
सौ स्त्रियों के बुर्के सहसा उठ गए

अपूर्व गर्ग

ये महिलाओं को तय करना है उन्हें क्या पहनना ओढऩा है।

बुर्का-घूंघट या बिना बुर्का-घूंघट लिबास ये उनका निजी चयन है।

जिन्हें इस इस वेशभूषा से असुविधा है ,जिन्हें लगता है उनके सामने वो महिलायें भी बिना घूंघट या बुकऱ्े के संवाद करे, आराम से रहें तो उनकी जि़म्मेदारी बनती है कि वो ये सुनिश्चित करें, महिलाओं को भरोसा दिलाएं कि वे उनके अधिकारों को लेकर संवेदनशील हैं और उनका व्यक्तित्व ऐसा हो जो महिलाओं के लिए सम्मानजनक हो।

ये बात सबसे अच्छी तरह सिखा गए महात्मा गाँधी।

महात्मा गाँधी जब दिल्ली बिरला हाउस में अपना अंतिम उपवास कर रहे थे।

इस उपवास से ये भी हुआ कि कुछ दिनों बाद गांधीजी की जान बचाने लोगों ने अनशन शुरू कर दिए और हिन्दू-मुसलमान गले मिलने लगे।

करीब सौ बुर्कापोश मुसलमान स्त्रियां गांधीजी से अनशन तोडऩे की प्रार्थना करने पहुंचीं। उन्होंने कहा वे अब सुरक्षित हैं और पिछले तीन दिनों से उनके साथ अनशन कर रही हैं।

गांधीजी ने बुर्कापोश स्त्रियों से कहा -‘इस्लाम के नियम के अनुसार पिता ,पुत्र ,भाई और सम्बन्धियों से तो पर्दा नहीं किया जाता . यदि आप मुझे अपना पिता और भाई समझती हैं तो मुझसे यह पर्दा क्यों है ?’

एक सौ स्त्रियों के बुर्के सहसा उठ गए।

गांधीजी ने सभी को आश्वस्त किया ज्यों ही ये सांप्रदायिक द्वेष समाप्त हो जाएगा वे अनशन समाप्त कर देंगे।


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