विचार / लेख
डॉ. आर.के.पालीवाल
हमारी राजनीति में पिछ्ले बीस साल में जो सबसे बड़ा परिर्वतन हुआ है वह बहुत तेजी के साथ कांग्रेस का बी जे पी करण और बी जे पी का कांग्रेसीकरण है। इसमें दुर्भाग्य यह रहा है कि दोनों दलों ने एक दूसरे की अच्छाइयों के बजाय एक दूसरे की विकृतियों और बुराइयों को अधिक आत्मसात किया है। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस की सबसे बड़ी विशेषता देश की विविधता को साधने की रही है और भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता सामूहिक नेतृत्व की थी, लेकिन इन दो बड़े गुणों को उन्होने एक दूसरे से नहीं सीखा।कांग्रेस की सबसे बडी बुराई व्यक्ति और परिवारवाद भारतीय जनता पार्टी में भी बहुत तेजी से आगे बढ़ी हैं। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की सबसे बडी अच्छाई उसका सामूहिक नेतृत्व थी ,जिसमें एक मजबूत पाया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का था और दूसरा भाजपा के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले कई कद्दावर नेताओं, यथा अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, वैकेया नायडू, नितिन गडकरी,सुषमा स्वराज, कल्याण सिंह और येदियुरप्पा आदि का था। भाजपा के इस गुण को कांग्रेस आत्मसात नहीं कर सकी। हालांकि आज भाजपा में भी ऐसी स्थिति नहीं है। न राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भारतीय जनता पार्टी पर वैसा प्रभाव रहा है और न प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के अलावा भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष जे पी नड्डा सहित किसी अन्य नेता का पार्टी में खास दबदबा है। इसी तरह भाजपा ने कांग्रेस के सह अस्तित्व के सिद्धांत को आत्मसात नहीं किया।
कांग्रेस और भाजपा में हुए नकारात्मक परिवर्तनों का सबसे बड़ा कारण सत्ता प्राप्ति के लिए एक दूसरे के नाराज चल रहे जिताऊ नेताओं की सेंधमारी है। जब कोई नेता कई दशक एक दल में गुजारकर दूसरे दल में प्रवेश करता है तो उसके साथ पुराने दल की कार्य प्रणाली भी दूसरे दल में वैसे ही प्रवेश करती है जैसे किसी देश से दूसरे देश में खाद्यान्न लाने पर उस देश के खरपतवार भी साथ आकर नए देश में प्रवेश कर जाते हैं। जब एक दल से दूसरे दल में आवाजाही व्यापक पैमाने पर होती है, जैसे मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से निकलकर दर्जनों विधायक और हजारों कार्यकर्ता भाजपा में घुसे थे तब पुराने दल की बडी विकृतियां भी दूसरे दल में उतनी ही ज्यादा मात्रा में घुसती हैं।
मध्य प्रदेश में एक दल द्वारा दूसरे दल में सेंधमारी का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि आजकल कांग्रेस भी भाजपा में असंतुष्ट नेताओं को खोज खोज कर उसी तरह सेंधमारी की कोशिश कर रही है जिस तरह की सेंधमारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने करके कांग्रेस की बहुमत की कमलनाथ सरकार को गिराकर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में अपनी वर्तमान सरकार बनाई थी। जब राजनीतिक दलों में विस्तारीकरण के लिए नए नेता विकसित करने के बजाय दूसरे दलों के असंतुष्ट नेताओं पर डोरे डालना प्रमुख अस्त्र बन जाता है तब उस दल के चाल, चरित्र और चेहरे में आमूल चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है। वैसे तो वर्तमान राजनीतिक दौर में दल बदल इतना सामान्य हो गया है कि दलों की विचारधारा पूरी तरह गौण हो गई है। बहुत से नेता इतनी बार दल बदल चुके हैं कि हर दल के घाट का पानी पी कर उनकी अपनी कोई विचारधारा ही नहीं बची है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीन ऐसे राज्य हैं जिनमें विधान सभा और लोकसभा चुनावों के बीच एक साल से भी कम समय का अंतर रहता है। इन तीन राज्यों की दूसरी समान राजनीतिक विशेषता यह भी है कि इनमें भाजपा और कांग्रेस ही दो प्रमुख राजनीतिक दल हैं। एक साल में दो चुनाव होने के कारण यहां बहुत लंबा चुनावी दौर चलता है क्योंकि इसका असर दो दो चुनावों पर पड़ता है। अगला एक साल इन तीनों राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन तीनों राज्यों की राजनीति का असर कांग्रेस और भाजपा के लिए इन प्रदेशों के साथ साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी दोनों दलों की रणनीति को प्रभावित करेगा।


