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नरेंद्र दाभोलकर हत्या के 10 साल, किस हाल में है उनका आंदोलन और परिवार
20-Aug-2023 6:34 PM
नरेंद्र दाभोलकर हत्या के 10 साल, किस हाल में है उनका आंदोलन और परिवार

SHARAD BADHE/BBC


‘जब मेरे बच्चे बड़े हो रहे थे, तब मुझे बड़ा दुख होता था कि वे अपने नाना जी के बिना बड़े हो रहे हैं। उनसे कुछ सीख नहीं सकते, उन्हें देख नहीं सकते। इस बात का भी दुख है कि किसी मुद्दे पर बात करने के लिए वे नहीं है।’ मुक्ता दाभोलकर ने बीबीसी मराठी से बातचीत में बताया है कि वह अपने पिता डॉ। नरेंद्र दाभोलकर को कैसे याद करती हैं और उन्होंने जो काम शुरू किया था उसे कैसे आगे बढ़ा रही हैं। ठीक दस साल पहले 20 अगस्त, 2013 को सामाजिक कार्यकर्ता और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एएनआईएस) के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। लेकिन दाभोलकर की हत्या के बाद भी उनके विचारों पर आधारित आंदोलन रुका नहीं है। बीते दस साल उनके आंदोलन और आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए कैसे रहे हैं, यह हमें उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर ने बताया है।

बीबीसी मराठी संवाददाता जान्हवी मूले से मुक्ता दाभोलकर ने जो बताया है, उसका संपादित अंश पढि़ए। डॉक्टर दाभोलकर की हत्या के बाद यही सोचा कि चाहे कुछ भी हो, आंदोलन के काम को इसी जोश के साथ जारी रखना है। यह वैचारिक ही नहीं बल्कि भावनात्मक प्रतिक्रिया थी। किसी व्यक्ति की हत्या करके उनके विचारों को ख़त्म करने की कोशिश की गई थी। यही कारण है कि बीते दस सालों में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के हम सभी कार्यकर्ताओं ने अपनी क्षमता से अधिक काम करने का प्रयास किया। इसमें राज्य भर में घूमना, लोगों से मिलना, व्याख्यान देना और संगठन की गतिविधियों को पहले की तरह जारी रखना जैसी बातें शामिल हैं।

हम पांच साल से उस जगह पर जा रहे हैं जहां डॉक्टर दाभोलकर को गोली मारी गई थी। हमारी मांग यही थी कि जांच ठीक से होनी चाहिए। डॉक्टर की हत्या से पहले ही जाति पंचायतों की मनमानी के खिलाफ काम शुरू हो चुका था। पिछले दस वर्षों में वह काम और बढ़ गया है। 2017 में जादू-टोना विरोधी सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अधिनियम पारित किया गया था। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने जादू-टोना विरोधी कानून के तहत दर्ज मामलों की पैरवी करने में भी महत्वपूर्ण काम किया।

जादू-टोना विरोधी अधिनियम की सफलता
कुछ साल पहले यह कानून कर्नाटक में भी पारित हुआ था, लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, वहां ज्यादा मामले दर्ज नहीं किये गये थे। हम जानते हैं कि कानून पारित करने से कोई बदलाव नहीं आता, बल्कि कानून लागू करने की जिद करने वाले लोगों की जरूरत होती है।

महाराष्ट्र में अब अगर किसी भी तरह का जादू-टोना आदि होता है तो अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति कार्यकर्ताओं और आम लोगों के साथ-साथ पुलिस का भी मानना है कि इसे संज्ञान में लिया जाना चाहिए। महाराष्ट्र में इस कानून के तहत एक हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज किये गए। इसका मतलब है कि यहां आंदोलन जिंदा है।

10 साल बाद मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगी, जादू-टोना विरोधी कानून के खिलाफ कई आपत्तियां दर्ज की गईं, कहा गया कि ‘यह कानून धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करेगा’ या ‘इस कानून का इस्तेमाल एक ही धर्म के लोगों के खिलाफ होगा।’ आम लोगों में ऐसी आपत्तियों से डर उत्पन्न होता है। राजनेता भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से निर्णय लेने से डरते हैं। लेकिन जादू टोना कानूनों के आंकड़े साबित करते हैं कि ये सभी आपत्तियां झूठी हैं। इसमें सभी जादू टोने में हर जाति और हर धर्म के गुरू शामिल हैं। साथ ही यह बात भी स्पष्ट हुई कि इससे किसी भी तरह के धार्मिक आचरण में कोई समस्या नहीं होती है। बावजूद इन सबके, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के सामने कोई आसान चुनौती नहीं थी।

श्रम और राजनीतिक इच्छाशक्ति
हमारे समाज में विज्ञान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का दौर है। बिना किसी प्रमाण के यह दावा किया जाने लगा है कि पौराणिक काल में भारत के पास सब कुछ था, और यह प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है।

दूसरी ओर, संगठित तौर पर भी अंध विश्वास की जड़ें मजबूत होने लगी हैं। राम रहीम बाबा और बागेश्वर धाम जैसे बाबा अभी भी हैं जो कॉरपोरेट तरीके से अपना साम्राज्य चलाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके राजनीतिक संबंध भी हैं। यह कॉरपोरेट प्रचार सोशल मीडिया पर भी फलता-फूलता नजर आ रहा है। जैसे-जैसे ऐसे लोग मजबूत हो रहे हैं, तेजी से बढ़ रहे हैं, आंदोलन के सामने चुनौती बढ़ती दिख रही है। राजनेता इनके खिलाफ कोई स्टैंड लेते नजर नहीं आ रहे हैं।

दरअसल, भारतीय संविधान के अनुसार वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना भारतीय नागरिक का मूल कर्तव्य है। लेकिन राजनेता न तो यह कर्तव्य निभाते दिख रहे हैं और न ही अपने व्यवहार से ऐसा कोई मानक स्थापित कर रहे हैं। राजनेताओं को लगता है कि लोगों को खुश रखना होगा। अगर उन्हें लगता है कि किसी चीज़ से लोगों को ठेस पहुंचेगी, तो वे ऐसा कुछ नहीं करते हैं, ऐसा करने से बचते हैं। इसके विपरीत, बड़ी संख्या में ऐसे नेता हैं जो लोगों की भावुकता का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते हैं। उच्च संवैधानिक पद पर बैठे राजनीति में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो वैज्ञानिक सोच को स्पष्टता से जाहिर करते हैं।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने एक ओर जहां आंदोलन का काम जारी रखा है, वहीं दूसरी ओर हत्याकांड की जांच सुचारू हो, इसके लिए भी कोशिश की है। हमारे प्रयासों की वजह से मामले की हाई कोर्ट से निगरानी हो रही है। हम इस जांच की हाई कोर्ट की निगरानी को न रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट गए हैं। मुक़दमा चल रहा है, और यह महत्वपूर्ण है कि समय से इसमें न्याय हो।
चार हत्याओं के दस साल बाद भी मास्टरमाइंड नहीं पकड़ा जा सका है। (जैसे नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी की भी हत्या हुई थी।) चार हत्याओं के बाद भी मास्टरमाइंड तक पहुंचना मुश्किल नहीं होता। लेकिन दस साल में उन्हें पकडऩे की राजनीतिक इच्छाशक्ति हमने कभी नहीं देखी, चाहे सरकार किसी की भी रही हो। आशंका है कि भविष्य में भी ऐसी घटनाएं होंगी। चूंकि हत्या करने वाले लोगों को व्यवस्था से शह मिल रही है, इसलिए दावे से नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा नहीं होगा।

सोशल मीडिया की चुनौती
दस साल पहले, सोशल मीडिया हर किसी के दैनिक जीवन का उतना हिस्सा नहीं था जितना आज बन गया है। इसलिए आज झूठ भी तेजी से फैलता है। ऐसे में हमारे सामने चुनौती जरूर बढ़ गई है। जब भी सोशल मीडिया पर कुछ गलत बातें, अंधविश्वास फैलाया जाता है तो हम तुरंत उसका जवाब तैयार करके प्रसारित कर देते हैं। बेशक, सोशल मीडिया ऐसा मॉडल है कि वहां जिस बात पर विवाद होता है वो बात ज़्यादा फैलती है। जहां दावे झूठे साबित हुए हों या फिर विवादों को सुलझाने का प्रयास किया गया है, वे सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होते हैं। यह हम सभी के लिए एक बड़ी चुनौती है। मुझे लगता है कि छोटे बच्चों के बीच सोशल मीडिया के संदेशों में सच और झूठ की पहचान सिखाने पर काम करने की आवश्यकता है। क्योंकि अंतत: अंधविश्वास को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही खत्म किया जा सकता है। यह सबूत खोजने और फिर विश्वास करने का एक साधारण मामला है।

आपको अपनी पोस्ट में भी ऐसा ही करना सीखना चाहिए। लेकिन हमें बड़ी संख्या में युवाओं को यह सिखाने की जरूरत है कि किसी भी दावे से संबंधिति सबूत को कैसे खोजें।
इस दौरान जब मैंने कुछ बच्चों से पूछा तो शहर के कॉलेजों में पढ़ रहे बच्चे फैक्ट फाइंडिंग वेबसाइट का नाम नहीं बता सके। हम जो लिख रहे हैं, पढ़ रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात जो साझा कर रहे हैं, वह सच है या झूठ? हमें इसे हर तरफ से जांचना सीखना चाहिए। इस दिशा में हमें और अधिक काम करना चाहिए। ये काम आज हमारे बच्चों के लिए ही नहीं, समाज के हर बच्चे के लिए ज़रूरी है। हर किसी को इस विचार की आवश्यकता होगी। नि:संदेह, कोई भी आंदोलन केवल विचारधारा से उत्पन्न नहीं होता है। इसलिए हम विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

हमारा जीवन कितना बदला
डॉ. दाभोलकर की हत्या के बाद हमारी निजी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। हमारा व्यक्तित्व और हमारा जीवन अनुभव बदल गया है। हमने जितना हो सके उतना देने की कोशिश की है। यही सोच है जो तर्कसंगत सोच वाले लोगों को ताकत देती है कि जो जैसा है, वैसा ही उसका सामना करना है।  जैसी बाहरी चुनौतियाँ थीं, वैसी ही कुछ आंतरिक चुनौतियाँ भी थीं। हम इससे सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे और काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जैसे-जैसे साल बीतते हैं, हम अलग-अलग चरणों में उन चीज़ों का दर्द महसूस करते हैं जो हमने खो दी हैं, ख़ासकर डॉ. दाभोलकर की उपस्थिति। जैसे-जैसे समय बीतता है दुख की यह भावना और अधिक तीव्र होती जाती है। वह गहरी उदासी आपको नीचे नहीं खींचती, बल्कि वह वैसे ही बनी रहती है।
यदि किसी प्रियजन की असामयिक हत्या हो जाए, तो लोगों को उसका दर्द सहना पड़ता है, इसका कोई विकल्प नहीं है। (bbc.com/hindi)


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