विचार / लेख
मनीष सिंह
भारत का संविधान किसी नागरिक को धर्मनिरपेक्ष होने का आदेश या उपदेश नही देता।
आम धारणा बनाई गई है कि धर्मनिरपेक्षता हिन्दुओ पर थोप दी गयी है। मुसलमानों को खुल्ली छूट मिल रखी है। जो लोग व्हाट्सऐप फार्वर्ड की मदद से, कॉन्स्टिट्यूशन में पीएचडी करते आये हैं, उनके लिए यह समझना जरूरी है।
संविधान मुख्यत:, गणराज्य के लिए निर्देशावली है। याने ‘सरकार’ उसके बिहाफ में क्या करे, क्या न करे। करे, तो किस तरह से, किन दायरों, प्रक्रियाओं के तहत करे।
तो धर्मनिरपेक्ष सरकार को होना है।
उसे किसी धर्म को फेवर नही करना है, डिस फेवर नही करना है। सरकार का काम व्यापार है, चाकरी है। याने टैक्स लेना है, सेवा देनी है।
सबसे टैक्स लेना है, सबको सेवा देनी है।
भारत गणराज्य, याने सरकार इसके कोष से मंदिर नहीं बनवा सकता। सरकार तीर्थाटन नहीं करा सकती। वो मस्जिद भी नहीं बनवा सकती, हज भी नहीं करा सकती। हां, वह श्मशान और कब्रिस्तान बनवा सकती है। यह एक सेवा है।
जनता मंदिर बनवाये, मस्जिद बनवाये, हज करे या गोआ जाए, संविधान आपको बाध्य नहीं रोकेगा, अनलेस किसी अन्य कानून (जैसे किसी की भूमि पर कब्जा करके बनाना) का उल्लंघन न हो।
सत्ता किसी साधना पद्धति को इंसेटिवाइज नहीं करेगी, विशेष महत्व नहीं देगी। यही वो धर्मनिरपेक्षता है, जो सम्विधान मे लिखित है।
किसी लोकतंत्र की गुणवत्ता, वहां के अल्पसंख्यकों की वेल बीइंग से नापी जाती है। उन्हें अपनी मान्यताओं, रवायतों के साथ जीने की कितनी छूट है, यह दुनिया देखती है।
अल्पसंख्यक आपके लोकतंत्र का थर्मामीटर है, शोकेस हैं। शोकेस अक्सर गोदाम से ज्यादा चमकाया और सजाया जाता है।
यूँ तो भारत मे शोकेस की हालत, गोदाम से ज्यादा खराब है। यह सच्चाई सरकारे जानती थी, इसलिए उनके हालात सुधारने को बड़ी-बड़ी बातें करती थी है। विघ्नसंतोषी, इसी से चिढ़ते हैं।
ईष्र्यावश, खतरे में आ जाते हैं।
तब, पहले से जर्जर शोकेस को दंगाई बन तोडऩे पर उतारू हो जाते हैं। और जब ऐसे दंगाइयों के हाथ मे सत्ता आ जाये, तो शोकेस पर बुलडोजर चलता है।
बहरहाल, संदेश यह, कि हमारे संविधान के अंतर्गत धर्मनिरपेक्षता पोलिटिकल टम्र्स में है, इंडिविजुअल नहीं। नागरिक के लिए नहीं।
तो किसी नागरिक को धर्मनिरपेक्ष होने की जरूरत नहीं है। यह जिम्मेदारी और बाध्यता, सरकार की है। आप तो आराम से, अपना धर्म मानें।
दूसरे धर्म वालो को डिस्टर्ब न करें। उनको ज्ञान न ठेलें। ज्ञान अपने बच्चों को दें। अपनी संस्कृति का, अपनी साधना पद्धति का, अपने धर्म का। और उन्हें बतायें, समझायें...
कि उनका सबसे बड़ा धर्म, इंसान होना है।
प्रबुद्ध होना है।


