विचार / लेख

जीवन की शूटिंग के दौरान ‘जीवन’ का अनुभव...
18-Aug-2023 4:15 PM
जीवन की शूटिंग के दौरान ‘जीवन’ का अनुभव...

बलराज साहनी

‘विमल राय’ अब इस संसार में नहीं हैं। मैं उनसे अपने कथन की पुष्टि नहीं कर सकता, लेकिन मुझे लगता है कि ‘दो बीघा जमीन’ में कंगाल बस्ती की मालकिन का पात्र उन्होंने शायद उसी भीड़ में से लिया था।

विमल राय और हृषिकेश मुखर्जी दिन-भर शर्टिंग करते और सारी रात नई ‘लोकेशनों के लिए भटकते। कलकत्ता में प्रात:काल के समय सडक़ें धोने का रिवाज है। उस वातावरण को फिल्माने के लिए उन्होंने मुझे रात के तीन बजे ही रिक्शा में जोत दिया। मुझे इतना ज़्यादा रिक्शा चलाना पड़ा कि भूख के मारे मेरा बुरा हाल हो गया। एक बस्ती के बाहर मैंने एक हलवाई को गर्म-गर्म दूध बेचते देखा। मैं उसके पास गया और आधा सेर दूध देने के लिए कहा।

हलवाई ने एक नजर मुझे देखा और कडक़कर कहा, ‘जानो, दूध नहीं’ कड़ाही में यह क्या उबल रहा है? मैं पैसे दे रहा हूं, मुफ्त तो नहीं मांगता!’

‘कह जो दिया, दूध नहीं है !’ उसके गुस्से का पारा और भी चढ़ गया था।

दोपहर का समय था। गर्मी बेहद थी। कैमरा एक ट्रक में छिपाकर लगाया गया था। सारी यूनिट उस ट्रक पर सवार थी। रुमाल का इशारा पाते ही मैं रिक्शा लेकर दौड़ पड़ता था। कभी सवारी उतारता, कभी नई सवारी लेता। कभी दो सवारियां, कभी तीन। प्यास के मारे मेरी बुरी हालत थी। लेकिन ट्रक वालों को रोकना संभव नहीं था। एक जगह सडक़ के किनारे मैंने एक पंजाबी सरदार का ढाबा देखा, तो कुछ क्षणों के लिए रिक्शा एक ओर खड़ा करके भागता हुआ गया, और बड़े अपनत्व से पंजाबी में बोला, ‘भाई जी, बहुत सख्त प्यास लगी है। एक गिलास पानी पिलाने की कृपा कीजिए।’

‘दफा हो जा, तेरी बहन की... उसने मुझे घुसा दिखाकर कहा। एक पंजाबी आदमी रिक्शा चलाने का घटिया काम करे, यह उसे शायद सहन नहीं हो पाया था। मेरे मन में आया कि में उसे अपनी असलियत बताऊं और दो-चार खरी-खरी सुनाऊं, पर इतना समय नहीं था।

एक पानवाले की दुकान पर मैंने ‘गोल्ड फ्लैक’ सिगरेट का पैकेट मांगा और साथ ही पांच रुपये का नोट उसकी ओर बहाया। पान वाले ने कुछ देर मेरा हुलिया देखा, फिर नोट लेकर उसे धूप की ओर उठाकर देखने लगा कि कहीं नकली न हो। आखिर कुछ देर सोचने के बाद उसने मुझे सिगरेट का पैकेट दे दिया। अगर वह मुझे पुलिस के हवाले भी कर देता, तो कोई हैरानी की बात न होती।

चौरंगी में शूटिंग करते समय भीड़ जमा होने लगी थी। विमल राय ने मुझे और निरूपा राय को कुछ देर के लिए किसी होटल में चले जाने के लिए कहा। हम फौरन एक रेस्तरां में दाखिल हुए, तो वेटरों ने हमें धक्के देकर बाहर निकाल दिया।

हम भारतीय सभ्यता और उसके मानवतावादी मूल्यों की डींगें मारते नहीं थकते; पर हमारे देश में सिर्फ पैसे की कद्र है, आदमी की कद्र नहीं है। यह बात मैंने उस शूटिंग के दौरान साफ तौर पर देख ली थी। हमारे देश में गरीब आदमी के पास पैसा हो, तो भी उसे चीज़ नहीं मिलती। यह हमारी सभ्यता की विशेषता है। (मेरी फिल्मी आत्मकथा)


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