विचार / लेख
डॉ. संजय शुक्ला
बीते सोमवार को हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में 48 लोगों की मौत बादल फटने के बाद हुई तेज बारिश और भूस्खलन के बाद मलबे में दबने से हुई है। दरअसल यह पहली आपदा नहीं है जिसमें कुदरत ने कहर ढाया हो बल्कि इस बारिश के दौरान पहाड़ी राज्यों में भारी बारिश, बाढ तथा भूस्खलन के चलते चट्टानों में दबने से जान-माल का काफी नुकसान हुआ है। दरअसल इन हादसों के लिए सरकार और आम नागरिक ही जबाबदेह हैं तथा यह कुदरती नहीं बल्कि मानवीय कहर है। पहाड़ी राज्यों में बढ़ते हादसों के मद्देनजर अहम सवाल यह भी है कि सरकार और समाज प्रकृति के प्रति अपनी प्रवृत्ति कब बदलेगा? दरअसल सरकारों के आधुनिक विकास की भूख हमारी परंपरा, संस्कृति और प्रकृति को लगातार निगल रही है जिससे पहाड़ भी अछूता नहीं है। पहाड़ों और मनुष्य का सहजीवन सदियों से रहा है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले अनेक पहाड़ों का अपना धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है जहां अनेक तीर्थस्थल स्थापित हैं। इसके अलावा पहाड़ों संबंध का पानी, जलवायु, जैवविविधता और प्राकृतिक संपदाओं से भी है।
इसी साल नववर्ष की छुट्टियों के दौरान हिमाचल प्रदेश से खबर आई थी कि वहां पहाड़ों पर बसे मनाली सहित अन्य पर्यटक शहरों में सैलानियों और चारपहिया वाहनों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी जिससे घंटों यातायात अवरूद्ध रहा। वैश्विक महामारी कोरोना की पाबंदियां खत्म होने के बाद देश के विभिन्न तीर्थस्थलों और पर्यटक स्थलों में सैलानियों तथा श्रद्धालुओं की भीड़ काफी बढ़ी है। इन स्थलों में सैलानियों और वाहनों की भीड़ बढऩे के बाद वहां के प्रकृति में लगातार असंतुलन दिखाई दे रहा है यह असंतुलन पर्यावरणीय, जैवविविधता और भूगर्भीय है। पहाड़ों पर बसे तीर्थस्थलों और पर्यटन स्थलों पर क्षमता से ज्यादा वाहनों और यात्रियों का बोझ पहाड़ों को लगातार कमजोर कर रही है। सरकार इन स्थलों में तीर्थयात्रियों और सैलानियों के बढ़ते आकर्षण के कारण यहां व्यवसायिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है। सरकार द्वारा पर्यटकों को लुभाने के लिए जमीन बेची जा रही है जहाँ पर्यावरणीय सिफारिश को ताक में रखकर पहाड़ों को काटकर सडक़ें बनाई जा रही है अथवा चौड़ी की जा रही है।
पर्वतीय क्षेत्रों में अंधाधुंध बहुमंजिला होटल और रिजार्ट, रोपवे बन रहे हैं फलस्वरुप पहाड़ों पर मानव बसाहट बढ़ रही है। यातायात और जनसंख्या के दबाव से भी पहाड़ का परिस्थिकीय तंत्र बिगड़ रहा है। दैत्याकार क्रेन और भारी निर्माण उपकरण पहाड़ों को खोद रहे हैं, पहाड़ों के चट्टानी सीने को बारुद के विस्फोटों से तोड़ा जा रहा है। नदियों मेंं बेतहाशा रेत खनन हो रहा है, नदियों के मुहाने पर क्रशर प्लांट लगा दिया गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है फलस्वरूप पहाड़ों की मिट्टी बांधकर रखने की क्षमता कमजोर हो रही है। सरकार का नजरिया केवल पर्यटन उद्योगों को ही बढ़ावा देने का नहीं है बल्कि वह औद्योगिक और शहरी विकास के लिए जरूरी बिजली उत्पादन के लिए पहाड़ों को बंजर कर रही है व नदियों के अविरलता को बांध रही है।
सरकार के इन फैसलों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण संगठन लगातार अदालतों का दरवाजा खटखटा रहीं हैं लेकिन अदालती आदेशों और पर्यावरणीय कानूनों को धता बताकर पहाड़ों और नदियों पर पनबिजली परियोजनाओं का लगातार निर्माण कर रही है। इसके अलावा सरकार, कार्पोरेट घरानों, ठेकेदारों और प्रशासनिक अमले की गिद्ध नजर पहाड़ों में समेटे बेशकीमती खनिज संपदाओं की ओर भी जिसके चलते यह नापाक गठजोड़ पहाड़ों की सीना छलनी कर रही है। सरकार और कारपोरेट के इस गठजोड़ के खिलाफ आदिवासियों और प्रशासन के बीच संघर्ष की खबरें भी यदाकदा प्रकाश में आती है। साल 2019 में बस्तर के दंतेवाड़ा में बैलाडीला के नंदीराज पर्वत जिसे आदिवासी अपना देवस्थान मानते हैं में अडानी समूह द्वारा किए जा रहे लौह अयस्क खनन के खिलाफ आदिवासियों ने जम कर आंदोलन किया था।इसके अलावा हसदेव अरण्य क्षेत्र में भी वहां के आदिवासी और सामाजिक कार्यकर्ता कोयला खनन के खिलाफ हैं।
बिलाशक आधुनिक विकास की सनक पहाड़ों को खोखला कर रही है, नदियों की अविरलता खत्म कर रही है वहीं पेड़ों के कटने के कारण जंगल बांझ दिखाई देने लगे हैं। यह कहना गैर मुनासिब नहीं होगा कि आधुनिक सभ्यता ने सबसे ज्यादा उस प्रकृति के प्रति दिखाई है जिसके गोद में वह विकसित हुआ है। विकास का सपना शुरू में बड़ा लुभावना लगता है लेकिन जब यह विनाश बनकर प्रकट होता है तो वह प्रलयंकारी और भयावह होता है।देश की सरकारें विकास के नाम पर जिस तरह से प्रकृति और संस्कृति को रौंद रही उसकी त्रासदी मनुष्य को ही भोगना पड़ रहा है। साल 2013 में केदारनाथ के जल तांडव और 2021 में चमोली के जलप्रलय से सरकार और समाज ने कोई सीख नहीं लिया है। इस सीख की अनदेखी का परिणाम है कि अब पहाड़ मनुष्य से बदला ले रहे हैं।
गौरतलब है कि पहाड़ों पर हो रहे अंधाधुंध और बेतरतीब निर्माण के चलते पहाड़ जहां कमजोर हो रहे हैं वहीं इसका दुष्प्रभाव जलवायु पर भी पड़ रहा है। पहाड़ों का संबंध पानी से है क्योंकि पानी चट्टानों के बीच होती है जो प्राकृतिक रूप से रिसती रहती है जो आगे चलकर नदियों और नालों का स्वरूप लेती है। पहाड़ों के ये जलस्रोत जहां भूजल स्तर को बढ़ाते हैं वहीं इससे निकलने वाली नदियां और नालों से लोगों की आजीविका और जरूरतें पूरी होती है। पहाड़ों पर चलने वाले क्रशर उद्योगों के कारण चट्टान खिसकने और टूटने लगे हैं फलस्वरूप पानी का प्राकृतिक स्त्रोत खत्म हो रहा है वहीं पहाड़ के मलबों को नदियों और जंगलों में डालने के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में बताया है कि पहाड़ों की क्षमता की अनदेखी के कारण भूस्खलन का खतरा लगातार बढ़ा है।
पहाड़ों, जंगलों और नदियों पर बढ़ रहे अनुदारता का ही परिणाम है कि पहाड़ी इलाकों में बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं साल दर साल बढ़ रही है। पहाड़ों के साथ हो रहे निर्ममता के कारण देश और दुनिया में जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या विकराल रूप ले रही है। ग्लेशियर का पिघलना, बाढ़, सूखा और तूफान जैसे आपदाओं का संबंध पहाड़ और पर्यावरण से है लिहाजा पहाड़ों के प्रति सरकार और समाज को गंभीर होना ही होगा। पहाड़ों पर औषधि महत्व के दुर्लभ जड़ी- बूटियों और जीव जंतुओं का अस्तित्व खतरे में है।
अलबत्ता पहाड़ों के प्रति अनुदारता के लिए आम नागरिक भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। पर्वतीय इलाकों में पर्यटकों के वाहनों के धुएं और हार्न उस इलाके में वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहे हैं फलस्वरूप पर्यावरण और ईकोसिस्टम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पहाड़ों पर पर्यटकों और पर्वतारोहियों द्वारा हर महीने हजारों टन प्लास्टिक कचरा जिसमें प्लास्टिक बोतल, पॉलिथीन बैग, शीतल पेय के केन, स्ट्रा, चिप्स एवं अन्य खाद्य पदार्थों के पैकेट और अन्य डिस्पोजेबल सामान पहाड़ों, जंगलों या नदियों में फेंक दिए जाते हैं। एक एनजीओ ‘हीलिंग हिमालय’ के प्रदीप सांगवान बताते हैं कि हिमालयन क्षेत्र के पर्यटन स्थलों से वे रोज 1.5 टन गैर बायोडिग्रेडेबल कचरा इक_ा करते हैं। गौरतलब है कि ये प्लास्टिक कचरे हिमालय के तापक्रम को बढ़ाते हैं जिससे ग्लेशियर पिघलता है फलस्वरूप झील बनते हैं जो जलप्रलय जैसे बाढ़ लाते हैं।
बहरहाल इसमें दो राय नहीं कि आर्थिक विकास के लिए सरकार को बिजली और पर्यटन उद्योग दोनों की जरूरत है आखिरकार इससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता है लेकिन सरकार और समाज की जवाबदेही है कि विकास के साथ - साथ पहाड़ों, जंगल और नदियों की जैवविविधता और पर्यावरण संरक्षण को भी विमर्श में लाना होगा ही होगा। क्या हम ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जहां पहाड़ न हो, नदियां न हों, जंगल न हो? निश्चित तौर पर इसका उत्तर ‘नहीं’ ही होगा।


