विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
विगत सौ साल में मनुष्य ने प्रकृति का जितना विनाश किया है उतना हमारे पूर्वजों ने पिछ्ले हजार साल में नहीं किया था।आजादी के पहले अंग्रेजों ने वनों की अंधाधुंध कटाई और लकड़ी की ढुलाई के लिए सुदूर क्षेत्रों तक रेल लाइन पहुंचाने का काम इसीलिए तेज गति से किया था। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद भी हमारी सरकारों ने प्रकृति की सबसे बडी सौगातों वन और नदियों पर ध्यान नहीं देकर बड़ा अक्षम्य अपराध किया है। इसी वजह से वन क्षेत्र कम हुए हैं और बड़े बड़े वन अंचलों में वनों की गुणवत्ता घटी है जिसके दुष्परिणाम स्वरूप नदियों में भी किनारों की मिट्टी के कटाव के कारण उथलापन आया है। औद्योगिकरण, उपभोक्तावादी अप संस्कृति, व्यक्तिगत स्वार्थ और शहरीकरण की अंधी दौड़ ने हमे प्रकृति से इतना विमुख कर दिया कि हमारी पवित्र देवी सम पूज्य सैकड़ों नदियां कब नाला बन गई हमे इसका अहसास ही नहीं रहा। सरकारी विज्ञापनों में हमे नदियों पर बने बांधों में लबालब भरा पानी और खेतों में लहलहाती फसलों के आकर्षक विज्ञापन तो दिखाए गए लेकिन प्रकृति के विद्रूप बनी सड़ती गंधाती नदियों, बंजर होती भूमि, हर साल नीचे धंसते भू जल स्तर, नंगी होती पहाडिय़ों और पेस्टीसाइड के अंधाधुंध होते उपयोग से गम्भीर बीमारियों से जूझते हुए तिल तिल मरते बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों को जान बूझकर दूर रखा गया। सरकार के चमकीले विज्ञापनों पर पलता प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी प्रकृति को रौंदती सरकारी नीतियों और उसके गंभीर दुष्परिणामों को जनता की नजरों से छिपाने के लिए उतना ही अपराधी है जितनी केंद्र और राज्यों की सरकारें हैं।
प्रकृति का संकट केवल किसी एक देश का संकट नहीं है अब यह वैश्विक संकट बन गया है। जलवायु परिर्वतन के दुष्प्रभाव चारों तरफ दिखाई पड़ रहे हैं। जहां जहां प्रकृति से जितनी ज्यादा छेड़छाड़ की गई है वहां वहां इसके दुष्परिणाम भी उतने ही शक्तिशाली स्वरूप में उपस्थित हो रहे हैं। इसी तरह जहां जहां प्रकृति की भौतिक संरचनाएं ज्यादा संवेदनशील हैं, जैसे हिमालय पर्वत श्रृंखला, वहां अक्सर इसका दुष्प्रभाव उतना ही ज्यादा है। चाहे कुछ साल पहले घटी केदारनाथ की तबाही हो या पिछले साल जोशीमठ में दरकती धरती हो या हाल ही में सामने आई हिमाचल प्रदेश की आपदा हो, ये सब घटनाएं हमे खतरे की घंटी बजाकर चेताने की कोशिश कर रही हैं लेकिन इतनी भीषण आपदाएं भी हमारे सरकारी नक्कारखाने में तूंती की आवाज बनकर रह गई हैं। सरकार पूंजीपतियों की लूट के हथियार बने प्रकृति को रौंदते विकास के हाथी को रोकने का कोई गंभीर प्रयास नहीं करती। एक बड़ा कारण यह भी है कि विकास का यही हाथी भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाही के लिए घूस और कमीशन के छत्तीस भोग उपलब्ध कराता है और यही राजनीतिक दलों के चंदे का प्रमुख स्रोत है जिसके बूते चुनाव लडक़र सत्ता का सुख भोगा जाता है। इन परिस्थितियों में सरकारों और सरकारों की गोदी में खेलती मीडिया से उम्मीद करना बेकार है। कोई बड़ा जन आंदोलन ही अब हमे बचा सकता है।
के एन गोविंदाचार्य के नेतृत्व में शुरु हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने प्रकृति केंद्रित विकास को अपने आंदोलन की केंद्रीय थीम बनाया है । गांधी भवन भोपाल में इस आंदोलन के देश भर से जुटे कार्यकर्ताओं के तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में अधिकांश वक्ताओं ने इसी विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त की है। प्रकृति विरोधी वर्तमान विकास के अश्वमेघ को कैसे रोका जाए और इसके दुष्परिणामों का सहज समाधान निकट भविष्य में कैसे हो, इसके लिए बहुमत यही रहा कि हमे सादगी और आवश्यकता के लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग का गांधीवादी संकल्प ही इस संकट से बचा सकता है। इसके अलावा कोई अन्य ब्लू प्रिंट या शॉर्ट कट दिखाई नहीं देता ।


