विचार / लेख

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Date : 02-Apr-2020

सुभाष गाताडे

इन दिनों कहा जा रहा है- हाथ धोएं, घरों तक सीमित रहें, सामाजिक दूरी बनाए रखें। यह सारे कदम ज़रूरी हैं, मगर सरकार की अपनी जिम्मेदारी का क्या? मिसाल के तौर पर अगर स्वास्थ्य प्रणाली मजबूत नहीं रखी तो फिर तमाम ध्यान रखने के बावजूद जिन्हें संक्रमण हो जाएं उनके बड़े हिस्से के लिए मरने के अलावा कोई चारा नहीं है।

कई बार ऐसे दृश्य, ऐसी तस्वीरें खींचे जाते वक्त ही कालजयी बने रहने का संकेत देती हैं। वह एक ऐसी ही तस्वीर थी। मिलान, जो इटली के संपन्न उत्तरी हिस्से का मशहूर शहर है, वहां अपने डॉक्टरी यूनिफॉर्म पहनी एक टीम मालपेन्सा एयरपोर्ट पर उतर रही थी और मिलान के उस प्रसिद्ध एयरपोर्ट में जमे तमाम लोग खड़े होकर उनका अभिवादन कर रहे थे। (18 मार्च 2020)

यह क्यूबा के डॉक्टर तथा स्वास्थ्य पेशेवर थे जो इटली सरकार के निमंत्रण पर वहां पहुंचे थे। एयरपोर्ट में खड़े लोगों में चंद श्रद्धालु ऐसे भी थे, जिन्होंने अपने सीने पर क्रॉस बनाया, अपने भगवान को याद किया क्योंकि उनके हिसाब से क्यूबा के यह डॉक्टर किसी ‘फरिश्ते’ से कम नहीं थे।

मिलान वही इलाका है जो कोरोना से बुरी तरह प्रभावित इटली के लोम्बार्डी क्षेत्र में स्थित है। दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कही जाने वाली इटली जिसकी स्वास्थ्य सेवाओं की दुनिया में काफी बेहतर मानी जाती हैं, कोरोना के चलते मरने वालों की तादाद वहां 9,000 पार कर गई है। ( 28 मार्च 2020)

क्यूबा की यह अंतरराष्ट्रीयतावादी पहल इस मायने में भी मायने रखती है कि इटली उन मुल्कों में शुमार रहा है जिसने क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने में हमेशा अमेरिका का साथ दिया है। और यह कोई पहली टीम नहीं है जो क्यूबा से दूसरे मुल्कों में रवाना हुई है। इसके पहले कोरोना से जूझने के लिए क्यूबा की टीमें पांच अलग अलग मुल्कों में भेजी गयी है: वेनेजुएला, जमैका, ग्रेनाडा, सूरीनाम और निकारागुआ।

एक ऐसे समय में जब विकसित कहे जाने वाले मुल्कों में कोरोना नामक फिलवक्त़ असाध्य लगने वाली बीमारी से मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है, अस्पतालों से महज मरीजों की ही नहीं बल्कि डॉक्टरों एव स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मरने की ख़बरें आना अब अपवाद नहीं रहा, इस छोटे-से एक करोड़ आबादी के इस मुल्क ने अपनी दखल से जबरदस्त छाप छोड़ी है।

आलम यह है कि कोरोना के चलते उपजे वैश्विक संकट से जूझने की अग्रणी कतारों में क्यूबा दिख रहा है। यह वही क्यूबा है जिस पर अमेरिका की तरफ से पचास साल से अधिक समय से आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं और अमेरिका की इस अन्यायपूर्ण हरकत का तमाम पूंजीवादी मुल्कों ने साथ दिया है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन प्रतिबंधों को संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से गैरकानूनी घोषित किया गया है और क्यूबा का आकलन है कि सदियों से चले आ रहे इन प्रतिबंधों ने उसे 750 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां आर्थिक स्थिति पर काफी विपरीत असर पड़ा है। गौरतलब है कि क्यूबा में लोगों की औसतन उम्र 78 साल के करीब पड़ती है जो संयुक्त राज्य अमेरिका के बराबर है और अगर प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्चे को देखें तो वहां अमेरिका की तुलना में महज 4 फीसदी खर्च होता है।

कहने का तात्पर्य कि चाहे निजी बीमा कंपनियां हों, गैरजरूरी इलाज हो, बीमारियों का निर्माण हों या अस्पताल में अधिक समय तक भर्ती रखकर होने वाले छूत के नए संक्रमण हो, अमेरिका में मरीजों का खूब दोहन होता है। वहां स्वास्थ्य रक्षा का फोकस बीमारी केंद्रित है वहीं क्यूबा में वह निवारण केंद्रित है।

मालूम हो कि चीन में कोरोना से मरनेवाले मरीजों में तेजी से कमी आई है जिसमें एक महत्वपूर्ण कारक के तौर पर क्यूबा द्वारा विकसित एंटीवायरल ड्रग अल्फा 2 बी का उल्लेख करना जरूरी है। यह दवाई वर्ष 2003 से चीन में निर्मित हो रही है जहां क्यूबा सरकार की मिल्कियत वाली फार्मास्युटिकल कंपनी के साथ मिलकर यह उत्पादन हो रहा है। इसे इंटरफेरॉन कहते हैं जो एक तरह से प्रोटीन्स होते हैं जो मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।

शायद ‘मुनाफे के लिए दवाईयां’ के सिद्धांत पर चलने वाले मौजूदा मॉडल में ऐसी कामयाबियों पर गौर करने की फुर्सत नहीं है। क्यूबा ने इस दवा को डेंगू जैसी बीमारी से लडऩे में बेहद प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया है।

आखिर क्यूबा इस स्थिति में कैसे पहुंचा यह लंबे अध्ययन का विषय है। फिलवक्त़ इतना ही बताना काफी रहेगा कि क्यूबा की सार्वभौमिक स्वास्थ्य प्रणाली, जिस ‘चमत्कार’ को लेकर पश्चिमी जगत के तमाम विद्वानों ने कई किताबें भी लिखी हैं और बीबीसी जैसे अग्रणी चैनलों ने उस पर विशेष डॉक्युमेंट्री भी तैयार की है।

अपनी चर्चित किताब ‘सोशल रिलेशंस एंड द क्यूबन हेल्थ मिरैकल’ (2010) में एलिजाबेथ काथ बताती हैं कि ‘क्यूबा में स्वास्थ्य नीति पर अमल में व्यापक स्तर पर लोकप्रिय सहभागिता और सहयोग दिखता है, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य को वरीयता देने की सरकार की दूरगामी नीति के तहत हासिल किया गया है। सरकार का इतना राजनीतिक प्रभाव भी है कि वह शेष जनता को इसके लिए प्रेरित कर सके।’

व्यापक इंसानियत के प्रति क्यूबाई जनता के सरोकार की एक ताजी मिसाल मार्च महीने के मध्य में समूची दुनिया के मीडिया में आयी जब उसने ब्रिटेन के ऐसे जहाज को अपने यहां उतरने की अनुमति दी, जिस जहाज पर सवार कई यात्राी कोविड-19 बीमारी का शिकार हुए थे और कैरेबियन समुद्र में वह जहाज महज पानी में तैर रहा था।

यह ख़बर मिलने पर कि उसमें सवार यात्राी कोविड-19 का शिकार हुए हैं, किसी मुल्क ने उन्हें अपने यहां उतरने की अनुमति नहीं दी थी।

क्यूबाई इंकलाब के महान नेता चे ग्वेरा- जो 1967 में सीआईए के गुर्गों के हाथों शहीद हुए थे- ने अपनी जनता को लिखे अंतिम पत्र में लिखा था ‘अनटिल विक्टरी, ऑलवेज’ (विजयी होने तक हमेशा)। क्यूबा की जनता आज भी उनके संदेश को दिलों में संजोए है।

निश्चित ही कोरोना का कहर अभी जारी है और जैसा कि जानकार बता रहे हैं कि आने वाला समय समूची विश्व की मानवता के लिए जबरदस्त चुनौतियों का समय है, कितने लोग इसमें कालकवलित होंगे और कितने बच निकलेंगे इसका अनुमान लगाना संभव नहीं। लेकिन एक बात तो तय है कि आपदा के ऐसे समय में लोगों/मुल्कों की खुदगर्जी और निस्वार्थी भाव ही सामने नहीं आ रहा बल्कि इस आपदा का लाभ उठाने में कॉरपोरेट सम्राटों की क्या कारगुजारियां चल रही हैं, वह भी साफ दिख रहा है। आपदा का समय मनुष्य के एक और पहलू को बखूबी उजागर करता है, जिसे उसका अहमकपना भी कह सकते हैं।

ताली बजाओ ! कोरोना भगाओ !!

‘जस्ट हाउ स्टुपिड आर वी? फेसिंग द ट्रुथ अबाउट अमेरिकन वोटर’ (हम लोग कितने जड़बुद्धि हैं? अमेरिकी मतदाता की सच्चाई से रूबरू)

21वीं सदी की पहली दहाई के अंत में इतिहासकार रिंक शेन्कमॅन की आयी किताब में अमेरिकी मतदाता की जड़बुद्धि/प्रतिभा की पड़ताल की थी।

यूएस न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह आखिर यह पड़ताल करने के लिए क्यों प्रेरित हुए और ‘दुनिया के सबसे ताकतवर जनतंत्र का दिशा-निर्देशन करने के लिए अमेरिकी कितने कम तैयार हैं?’

दक्षिण एशिया के इस हिस्से में रहने वाले लोगों के बारे में, खासकर हम भारतीयों के बारे में ऐसा कोई अध्ययन हुआ हो, जो हमारी अपनी ‘जड़बुद्धि’ की पड़ताल करता हो, ऐसी जानकारी नहीं है। वैसे यह अलग बात है कि यहां दैनंदिन जीवन में इतना कुछ होता रहता है कि ऐसा प्रतीत होता है कि यहां ऐसे पड़ताल की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।

खतरनाक कोविड-19 वायरस और उससे उत्पन्न परिस्थिति जिसने फिलवक्त़ समूची दुनिया में हलचल मचा दी है, उसने हमें एक अवसर प्रदान किया है हम आम समयों में भारतीयों द्वारा प्रकट किए जाने वाले विवेक की चर्चा करें।

मीडिया में यह ख़बरें भी आयी है कि किस तरह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री अपने सहयोगियों के साथ बाकायदा एक मंत्र दोहरा रहे हैं जिसमें कोरोना को ‘जाने के लिए’ गो कोरोना, कोरोना गो कहा जा रहा है। या किस तरह एक हिंदुत्ववादी संगठन की तरफ से कोरोना वायरस से ‘मुक्ति पाने’ के लिए गोमूत्र पार्टी का आयोजन किया गया था। (बाकी पेज 7 पर)

मालूम हो कि अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है जिसके चलते पूरी दुनिया में 16,000 से अधिक लोग मर गए हैं और लाखों लोग प्रभावित हैं। इटली, जो विश्व की सातवें नंबर की अर्थव्यवस्था है, तथा जिसकी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था अच्छे में शुमार की जाती है, वह उस त्रासदी का प्रतीक बना है।

अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी अपडेट को देखें तो पाते हैं कि जहां पहली कोविड-19 केस उजागर होने के बाद 1,00,000 केस तक पहुंचने में 67 दिन का वक्त़ लगा, वहीं अगला चक्र 11 दिन में तय हुआ तथा महज चार दिन में और एक लाख केस इसमें जुड़ गए।

किसी संभावित मरीज को या मरीज को अलग-थलग रखने के अलावा तथा उसे दवाई देते रहने का अलावा अन्य कोई तरीका मौजूद नहीं हैं, अधिक से अधिक उसके निवारण के लिए हम एक दूसरे से शारीरिक दूरी बनाए रख सकते हैं।

इस विकसित होते घटनाक्रम को देखते हुए यह देखना अकल्पनीय था कि भारत के लोगों ने 22 मार्च को- जिस दिन प्रधानमंत्री के आह्वान पर जनता कफ्र्यू का पालन किया गया था, जिसका मकसद था कोरोना के इलाज में लगे डॉक्टरों एवं स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाए- क्या किया ?

सबसे अहम बात थी कि उस पूरे दिन गोया फेक न्यूज और अफवाहों की बहार आई थी जिसकी अगुआई निश्चित ही दक्षिणपंथ से जुड़े आईटी सेल कर रहे थे।

यह कहा जा रहा था कि किस तरह ‘तालियां पीटने से वायरस मर जाता है’ या किस तरह दिन भर का ‘जनता कफ्र्यूू’ वायरस के विस्तार की श्रृंखला को तोड़ देगा।

इस बकवास का सिलसिला- जिसे ‘भक्तगणों’ की तरफ से खूब आगे बढ़ाया जा रहा था, इस कदर आगे बढ़ा कि सरकार की संस्था प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो को आगे आकर यह सफाई देनी पड़ी कि तालियों के स्पंदन से कोई वायरस नहीं मरता है।

दूसरे कोरोना वायरस से लडऩे के अपने उत्साह और उन्माद को प्रदर्शित करते हुए लोग ठीक शाम बजे देश के अलग-अलग हिस्सों में जुलूसों में निकले और इस तरह उन्होंने वायरस के निवारण की प्रारंभिक कदम के तौर पर रेखांकित सामाजिक दूरी के विचार को सिर के बल ला खड़ा किया। उन्होंने नारे लगाए, बर्तन पीटे और पारंपरिक वाद्य बजाए’और कोरोना को जाने का आह्वान किया। यह सिलसिला पूरे मुल्क में चला।

आखिर ऐसे ‘कोरोना उत्सव’ को (जैसा कि एक पढ़ी-लिखी महिला ने 22 मार्च की शाम को अपनी तस्वीरें फेसबुक पर साझा करते लिखा था) कैसे समझा जाए जबकि हक़ीकत यही है जानकारों का यह कहना है कि ‘भारत आने वाले समय में कोरोना वायरस का हॉट स्पॉट बनने वाला है और सबसे खराब स्थिति यही होगी कि भारत की लगभग 60 फीसदी आबादी उससे संक्रमित होगी।

एक बात तो तय है कि भारतीय अपने बारे में जो दावे करते हैं और जमीन पर जो वास्तविक हालत हैं उसमें गहरा अंतराल है।

भारत का संविधान जो दुनिया में अपने किस्म का अनोखा है, जिसमें ‘वैज्ञानिक चिंतन विकसित करने, अनुसंधान-खोज सुधार की प्रवृत्ति को विकसित करना’ नागरिकों के कर्तव्यों में शुमार किया गया है। (धारा 51 ए)

लेकिन हक़ीकत यही है कि आज़ाद भारत की सत्तर साल से अधिक की यात्रा के बाद, यही उजागर होता है कि इस विचार की स्वीकार्यता बेहद सतही है।

भारतीय जनता का विशाल बहुमत अभी भी सभी किस्म की अतार्किक, अवैज्ञानिक चीजों और परिघटनाओं पर यकीन करता है और जिनमें पढ़े-लिखे अग्रणी हैं।

क्या यह कहा जा सकता है कि भारतीय (खासकर मुखर तबके से संबद्ध) लोग) किसी किस्म की ‘आभासी श्रेष्ठताबोध के संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह’ से ग्रसित हैं’ जो इस बात से संबंधित है कि ‘अपनी क्षमता की कमी को पहचानने में भी वह अक्षम हैं।’

इस परिघटना की चर्चा सामाजिक मनोविज्ञानी डेविड डनिंग और जस्टिन क्रूगर करते हैं। उनके मुताबिक आभासी श्रेष्ठताबोध का संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह दरअसल कम क्षमतावाले लोगों के आंतरिक भ्रम और उच्च क्षमता वाले लोगों को लेकर बाह्य गलत धारणा से उपजता है।

निश्चित ही एक ऐसे मुल्क और उसकी अवाम के लिए जो अपने आप को ‘विश्व गुरू’ समझती है और ऐसा दावा भी करती है, यह प्रश्न ही अपने आप में कुफ्र समझा जा सकता है।

अमेरिकन थिंक टैंक, प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा वैश्विक रुखों के सर्वेक्षण (2007) के नतीजे इस मामले में गौर करने वाले हैं जिसके मुताबिक किस तरह भारतीय अपने आप को ‘दुनिया में नंबर’ 1 मानते हैं। 

इस सर्वेक्षण में 47 देशों के लोगों से पूछा गया था कि क्या वह इस बात से सहमत या असहमत हैं- ‘हमारे लोग सर्वोत्कृष्ट नहीं हैं, लेकिन हमारी संस्कृति अन्यों से बेहतर है।’

इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि भारतीय इस फेहरिस्त में अव्वल थे। लगभग 93 फीसदी ने इस बात को स्वीकारा कि हमारी संस्कृति बाकियों से श्रेष्ठ है, जिनमें से 64 फीसदी लोगों ने इस मामले में कोई किंतु- परंतु भी नहीं कहा।

भारत के 93 फीसदी की तुलना में 69 फीसदी जापानी, 71 फीसदी चीनी और 51 फीसदी अमेरिकी अपनी संस्कृति के श्रेष्ठ होने की बात को मानते थे।

इस बात को दोहराना जरूरी है कि इस क्षेत्र में हिंदुत्व वर्चस्ववाद के उभार के बाद अपनी ‘श्रेष्ठता’ की इस भावना को नया बल मिला है। यह एक ऐसी हकीकत है कि जिसे हिंदुत्व वर्चस्ववाद के हिमायतियों ने बखूबी इस्तेमाल किया है।

आपदा कॉरपोरेट क्षेत्र की मुनाफे की लूट के सिद्धांत को भी केंद्र में ला रख देती है और बताती है कि जनता का स्वास्थ्य उन थैलीशाहों के लिए वाकई में क्या मायने रखता है।

‘वांछित मौतें, घातक उपेक्षा’

‘बेला चाओ ! बेला चाओ !!

वह गीत जो कभी 19 वीं सदी की इटली के कामगार औरतों (धान बीनने वाली) के संघर्षों में जन्मा था और जो बाद में वहां के फासीवाद विरोधी संघर्ष का अपना समूहगान बना, वह पिछले दिनों रोम की सडक़ों पर गूंजता दिखा।

गौरतलब था कि कहीं कोई लोग एकत्रित नहीं थे अलबत्ता आप उनके घरों की खिड़कियों से या उनकी बालकनियों से उनकी आवाज़ सुन सकते थे।

एक ऐसे समय में जब पूरा मुल्क जो दुनिया की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है अपने घरों में ‘कैद’ है, लोग अपने अपने घरों तक सीमित है और कोरोना के चलते मरने वालों की तादाद कई हजार हो चुकी है, अपने-अपने घरों से एक ही समय में किया गया यह समूहगान एक तरह से उनका अपना तरीका था कि दुख की इस घड़ी में खुशी के चंद पल ढूंढने का और अपने आप को उत्साहित रखने का तथा एक दूसरे के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने का।

जैसे-जैसे दुनिया अपनी सांस रोके इस महामारी के फैलाव को देख रही है और गौर कर रही है कि किस तरह सरकारों एवं नगर पालिकाओं और निगमों को इसे रोकने के लिए अभूतपूर्व कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, परस्पर एकजुटता और उम्मीद की ऐसी तमाम कहानियां दुनिया के अलग अलग हिस्सों से ही आ रही है।

निराशा के इन लम्हों में ही यह जानना सुखद था कि क्यूबा और चीन के डॉक्टर तथा पैरामेडिक्स की एक टीम इटली पहुंची है और वहां स्वास्थ्य महकमे को मदद पहुंचा रही है।

अगर हम अपने मुल्क को देखें तो यहां कोरोना नियंत्रण में सूबा केरल की हुकूमत की कोशिशें और किस तरह जनता भी इन कोशिशों से जुड़ी है, इसे काफी सराहना मिली है।

देखने में यह आया है कि न केवल यहां के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस खतरे को पहले भांपा और ऐसे कदम बढ़ाए ताकि प्रभावित इलाकों से – मुख्यत: वुहान आने वाले लोगों को क्वारंन्टाइन करने अर्थात अलग रखने के लिए कदम उठाये।

ऐसे मामलों में जहां ऐसे यात्राियों के संपर्क में उनके परिवार वाले भी आए थे, तो उन्हें भी सुरक्षित अलग रखने का इंतजाम किया।

‘द टेलीग्राफ’ की खबर थी कि किस तरह केरल सरकार के साथ काम करनेवाले डॉक्टर अपनी ‘श्मशान शिफ्ट’ भी कर रहे हैं अर्थात ‘मृतक के शरीर की जांच के लिए श्मशान ग्रहों का भी दौरा कर रहे हैं)।

जनता को राहत पहुंचाने में किस तरह सरकारी मुलाजिम भी जुटे हैं इसे उजागर करने वाली एक तस्वीर भी काफी वायरल हुई है जिसमें आंगनबाड़ी में कार्यरत एक महिला एक बच्चे के घर पहुंची है ताकि मिड डे मील का पैकेज उसे दिया जाए।

दरअसल कोरोना के चलते केरल सरकार ने तमाम स्कूल और आंगनबाडिय़ां बंद की हैं और कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वह बच्चों के घरों पर मिड डे मील पैकेज पहुंचाये।

हम यह भी देख रहे हैं कि इस महामारी ने बकौल टेडरॉस अधानोम, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक हैं दुनिया की तमाम राजधानियों में व्याप्त ‘नैतिक क्षय’ को भी उजागर किया है।

महानिदेशक महोदय इस स्थिति को देख कर विचलित थे कि इस महामारी के रोकथाम के लिए कोई गंभीर प्रयास करने के काम से किस तरह इन तमाम सरकारों ने इनकार किया है। विकसित दुनिया के इन अग्रणियों के इस लापरवाही भरे रवैये को देखते हुए, जहां वह लोगों के स्वास्थ्य के बनिस्बत कॉरपोरेट क्षेत्र के मुनाफे को लेकर चिंतित दिखे, उन्हें यह याद दिलाना पड़ा कि मानवीय जीवन हमारे लिए कितना अनमोल है।

राष्ट्रपति ट्रंप, जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के कर्णधार हैं, दरअसल जनता के स्वास्थ्य के प्रति इस आपराधिक लापरवाही तथा कॉरपोरेट मुनाफे की अधिक चिंता के प्रतीक के तौर पर सामने आए हैं। उनकी यह बेरूखी तबभी बरकरार रही जब अमेरिकी सरकार के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी और संक्रामक रोगों के संस्थान के निदेशक एंथनी फौसी ने यह ऐलान किया कि यह ‘मुमकिन’ है कि इस महामारी से अमेरिका के लाखों लोग कालकवलित हो सकते हैं।

देश के नाम उन्होंने दिए संबोधन में (12 मार्च) लोगों को यह उम्मीद थी कि वह इस बीमारी की रोकथाम के लिए कदमों का ऐलान करेंगे- जैसे अस्पतालों के विस्तार के लिए या जांच के लिए उपलब्ध संसाधनों को बढ़ाने या अग्रणी चिकित्सा कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए सबसे बुनियादी सुरक्षात्मक उपकरण प्रदान करने के लिए सुविधाएं देना- मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

उन्होंने ऐलान किया कि वह बिजनेस के लिए 50 बिलियन डॉलर का कर्जा दे रहे हैं- ताकि कोरोना के चलते उत्पन्न आर्थिक संकट से वह निजात पा लें- और अमेरिकी कांग्रेस से यह अपील की कि वह कॉरपोरेट के पक्ष में कर कटौती का ऐलान करे।

यह भी देखने में आ रहा है विकसित पूंजीवादी दुनिया के अन्य नेताओं की भी इस मामले में प्रतिक्रिया कोई खास भिन्न नहीं है।

सर पैटरिपक वालेन्स, जो जॉन्सन के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार हैं, उन्होंने एक तरह से ब्रिटिश सरकार के मन में क्या चल रहा है इसे जुबां दी, जब उन्होंने जोर दिया कि ‘ब्रिटिश हुकूमत को चाहिए कि वह इसके लिए अधिक कोशिश न करे कि कोरोना वायरस लोगों में संक्रमित हो- यह संभव भी नहीं है और वांछनीय भी नहीं।’

ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार द टेलीग्राफ के मशहूर स्तंभकार ने गोया सत्ताधारी तबके के सरोकारों को प्रकट किया जब उन्होंने खुलकर लिखा ‘कोविड-19 दूरगामी तौर पर लाभप्रद भी हो सकता है कि वह निर्भर बुजुर्गों को अधिक प्रभावित करे।’

चाहे डोनाल्ड ट्रंप हों, बोरिस जॉनसन हों या पूंजीवादी जगत के तमाम कर्णधार हों, इस महामारी ने इस हक़ीकत को और उजागर किया है कि मितव्ययिता की नीतियां- जिसका मतलब स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य अवरचनाओं पर सार्वजनिक खर्चों में कटौती- जो अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग स्तरों पर मौजूद हैं उनका जनता के स्वास्थ्य पर बेहद विपरीत प्रभाव पडऩे वाला है।

नेशनल हेल्थ सर्विस – वह मॉडल जिसे ब्रिटिश सरकार ने अपनाया वह ऐसा संकट है जो इन विभिन्न मुल्कों में हावी होता दिख रहा है।

मुनाफा आधारित मौजूदा प्रणाली की संरचनात्मक सीमाएं- जिसे आम भाषा में पूंजीवाद कहा जाता है- वह भी ऐसी घड़ी में बेपर्द हो रही हैं कि ऐसी कोई महामारी को नियंत्रित करने के लिए कोई दूरगामी योजना वह बना नहीं सकती।

यह आम जानकारी है कि ऐसे किसी वायरस के भविष्य में प्रकोप को नियंत्रित रखने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय वैक्सीन ही हो सकते हैं। आज जबकि कोरोना सुर्खियों में है, विगत दो दशकों में हम ऐसे वायरसों से कई प्रकोपों से हम गुजरे हैं फिर वह चाहे सार्स हो, मेर्स हो, जीका हो या इबोला हो।

ऐसे प्रकोपों से अनुसंधानकर्ताओं को इनके वैक्सीन बनाने के लिए प्रेरित भी किया मगर इबोला को छोड़ कर कहीं भी सफलता हाथ नहीं लगी है। इसका कारण समझना कोई मुश्किल नहीं है जिसे ‘द गार्डियन’ ने स्पष्ट किया है:

मौजूदा ढांचे में दोनों दुनिया की सबसे खऱाब बातें मौजूद हैं – वह नये खतरों को लेकर अनुसंधान शुरू करने में बेहद ढीली दिखती है क्योंकि पैसे ही नहीं हैं और उसे तुरंत छोड़ देने में भी माहिर है जब उसे पता चलता है कि भविष्य में इसके लिए पैसे नहीं होंगे। यह बाज़ार आधारित प्रणाली है और बाज़ार हमेशा ही हमसे धोखा करता रहा है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की बढ़ती असफलता और एक ऐसा राज्य जिसे जनता के स्वास्थ्य की तुलना में कॉरपोरेट के मुनाफों की चिंता है, ऐसी पृष्ठभूमि में ऐसी महामारी जैसी स्थिति सरकारों के कर्णधारों के लिए तमाम जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ देने का बहाना बनती है और वह व्यक्तिगत नागरिक पर ही सारी जिम्मेदारी डालकर मुक्त हो जाते हैं, जैसा कि इन दिनों कहा जा रहा है- नियमित हाथ धोएं, घरों तक सीमित रहें, सामाजिक दूरी बनाए रखें।

निश्चित ही यह सारे कदम जरूरी हैं, मगर सरकार की अपनी जिम्मेदारी का क्या? मिसाल के तौर पर अगर स्वास्थ्य प्रणाली मजबूत नहीं रखी तो फिर तमाम ध्यान रखने के बावजूद जिन्हें संक्रमण हो जाएं उनके बड़े हिस्से के लिए मरने के अलावा कोई चारा नहीं है।

हर महामारी या आपदा की जिम्मेदारी नागरिक पर डालने की बात गोया ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के उस कथन की ही पुष्टि करती है कि ‘अब कोई समाज नहीं है, अब महज व्यक्तिगत पुरूष और स्त्रियां हैं, और परिवार हैं। और कोई भी सरकार उसके लोगों के बिना कुछ भी नहीं कर सकती और लोगों को तो सबसे पहले अपना ध्यान रखना होता है।’

यह वही थैचर थी जिन्हें पश्चिमी जगत में इस बात के लिए नवाज़ा जाता हैं कि उन्होंने राष्ट्रीकृत उद्योगों के निजीकरण का रास्ता सुगम किया और कल्याणकारी राज्य को सीमित करती गईं- जिसका मतलब था चाहे शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक अवरचनागत उद्योगों से राज्य की विदाई औेर मुनाफा कमाने को केंद्र में रखना। (सुभाष गाताडे वामपंथी एक्टिविस्ट, लेखक और अनुवादक हैं।)


Date : 02-Apr-2020

अजीत साहनी

पहले स्पष्ट कर दूं कि यह लेख कुछ प्रारंभिक सूचनाओं पर आधारित है जो कल ही हमारे सामने आई है उनके बारे में जब गहरा अनुसंधान किया जाएगा तब ही कुछ स्पष्ट नतीजे ओर सही तस्वीर उभर कर सामने आएगी।

भारत से ही शुरुआत करते हैं कल कोरोना पॉजिटिव का भारत में ऐसा केस आया है जिसे देखकर चिकित्सक आश्चर्य चकित है, कल दिन भर देश का मीडिया में कुछ विदेशी मुस्लिमों को जो तबलीगी जमात के फंक्शन में शामिल होने आए थे उसे लेकर हल्ला मचता रहा, उन्हें देश के अलग अलग शहरों में पकड़ कर डिटेन किया गया, क्वारंटाइन में रखा गया इसी सिलसिले में राँची में कल मलेशिया से आई 22 वर्षीय युवती को रोक लिया गया और सैंपल की जांच की गई। सैम्पल में महिला कोरोना पॉजिटिव पाई गई लेकिन उसकी हालत देखकर राँची के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स सहित स्थानीय चिकित्सक हैरान रह गए क्योंकि महिला में इस बीमारी के कोई भी लक्षण नहीं पाए गए।

यानी न तो उसके गले में दर्द था न उसे बुखार था न उसे किसी तरह की सूखी खाँसी थी रिम्स के विभागाध्यक्ष डॉ मनोज कुमार ने बताया कि उन्होंने उसके सेंपल की बार-बार जांच करवाई है। रात में जांच के दौरान कोरोना के स्क्रीनिंग जीन का पता चला। मंगलवार को सुबह नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) पुणे से मिले कंफर्म किट से दोबारा युवती के सैंपल की जांच की गई, जिसमें पॉजिटिव होने की पुष्टि हुई। इसके बाद एनआइवी पुणे से क्रॉस कराया गया। तब जाकर कोरोना की पुष्टि की गई है।

डॉ मनोज कुमार ने बताया कि सबसे ज्यादा सतर्कता बरतने की बात यह है कि युवती में कोरोना का कोई लक्षण नहीं मिला है। अक्सर देखा जाता है कि जिसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है उसको तत्काल लक्षण नहीं मिलता है। ऐसे में यह ध्यान देना होगा कि युवती जिस-जिस व्यक्ति के संपर्क में आई होगी उसको क्वारेंटाइन में रहना होगा।

यह डरने की भी बात है! घबराने की भी बात है लेकिन वही दूसरी तरफ यह उम्मीद भी जगाती है कि रोग से हम आसानी से बच जाएंगे। यहां यह भी सोचने में आता है कि क्या एक मरीज के मिलने से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, लेकिन कल कोरोना के बारे में एक ओर बड़ी आश्चर्यजनक सूचना चीन से आई। कल चीन ने विश्व के सामने यह पहली बार स्वीकार किया कि चीन ने कहा है कि उसके यहां कोरोना से संक्रमित 1541 ऐसे केस हैं जिनमें कोई लक्षण नहीं दिखे हैं। इससे भी बड़ा धमाका चीन ने तब किया जब उसने बताया कि वह बिना लक्षण वाले मरीजों को कोरोना वायरस के मामलों में शामिल ही नहीं करता है। अगर किसी में कोरोना संक्रमण का कोई लक्षण नजर नहीं आता है और वह टेस्ट में पॉजिटिव आता है तो चीन उसे कन्फर्म केस नहीं मानता। इस बात की शेष विश्व ने कड़ी आलोचना की है।

शायद यहा पर चीन के अब सब कुछ नॉर्मल हो जाने असलियत सामने आ जाती है चीन में शायद आज भी बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव लोगो की संख्या मौजूद है लेकिन उनके ऐसे लक्षण नही है जो कोरोना पॉजिटिव के लक्षण बताए जाते हैं, और न ही उससे बड़ी संख्या में अब मौतें हो रही है इसलिए वहा अब सब कुछ खुल जाने की बात कही जा रही है।

चिकित्सक इस बात को शुरू से स्वीकार कर रहे है कि कोरोना से पीडि़त 80 प्रतिशत व्यक्ति बिना हॉस्पिटल में इलाज के घर पर ही साधारण फ्लू की दवाइयों से ठीक हो जाता है। तो क्या यह माना जाए कि कोरोना दरअसल उतना खतरनाक नही है जितना बताया जा रहा है?

बहुत से लोग इस बात में विश्वास कर रहे हैं कि कोरोना के खतरे को मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर बतला रहा है। मित्र अजित साहनी ने इस बारे बताया भी था कि इटली से एक रिपोर्ट भी आई है जिसमें ये कहा गया कि इटली में इस दौरान जितनी मौतें हुईं हैं, उसमें सरकार ने मृत्यु प्रमाण पत्र में सिर्फ 12 प्रतिशत लोगों को ही कोरोना के कारण से मृत्यु हुई दर्शाया है, 88 प्रतिशत विभिन्न कारणों से मरे हैं फाइनेंसियल टाईम्स ने यह बात छापी हैं, मित्र अजित साहनी एक ओर बात कह रहे हैं कि पूरी दुनिया में वायरस इंफेक्शन, इन्फ्लूएंजा, जो सीधे श्वसन तंत्र पर हमला करता है, उससे रोज 1800 लोग मरते हैं, यह उनका नहीं डब्ल्यूएचओ  का कहना है डब्ल्यूएचओ यह बात तीन साल पहले ही बता चुका है। तो क्या यह घबराने की बिल्कुल बात नहीं है? लेकिन दुनिया भर में इस बात से पैनिक मचा हुआ है! जहां तक मेरा सोचना है सच इन दोनों के कहीं बीच में है।

यह बात बिल्कुल ठीक है कि कोविड-19 कोरोना वायरस श्रृंखला का एक नया वायरस है इसमे लोगों को संक्रमित कर देने की भयंकर ताकत मौजूद है इटली जैसे यूरोप के देशों में, अमेरिका में चीन में ईरान आदि एशियाई देशों में बड़ी तेजी के साथ फैला भी है और लोगों के श्वसन तंत्र को संक्रमित कर रहा है लेकिन यह सोचने की बात यह है कि यह उस तरह के लोग है जो बड़े हाइजीनिक ढंग से जी रहे थे खास बात यह भी है कि मरने वाले 80 प्रतिशत से अधिक लोग 55 साल की आयु से अधिक है और अन्य व्याधियों से ग्रस्त है। ऐसा कही देखने में नहीं आया है कि कोई बिल्कुल स्वस्थ आदमी हो अचानक वह कोरोना की चपेट में आया हो ओर उसकी मृत्यु हो गई हो (आपके पास ऐसी कोई घटना की खबर हो तो कृपया बताएं)।

इन प्रारंभिक जानकारियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोविड-19 वायरस ठीक उसी थ्योरी पर काम कर रहा है जो एवोल्यूशन यानी विकासवाद का आधारभूत सिद्धांत है और वो थ्योरी है सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट। आपको जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि मूल रूप से यह वाक्यांश हर्बर्ट स्पेंसर ने अपनी किताब प्रिंसिपल ऑफ बायोलॉजी में लिखा था जिसे बाद में डार्विन ने अडॉप्ट कर लिया, हिंदी में इसका सही अनुवाद है स्वस्थतम की उत्तरजीविता।

 

 


Date : 01-Apr-2020

डॉ. राजू पाण्डेय
निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात के मरकज में 24 लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद मचा हडक़ंप थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूरे देश से मरकज में आने वाले हजारों लोगों को तलाशने और उन्हें आइसोलेट करने का कठिन कार्य राज्य सरकारों के लिए एक चुनौती है। मरकज में आने वाले लोगों के कोरोना पॉजिटिव निकलने का सिलसिला जारी है। इनमें से लगभग 10 लोग अलग-अलग प्रांतों में अपनी जान भी गंवा चुके हैं। 
तब्लीगी जमात के इन लोगों का कोविड-19 के लिए तो इलाज होगा ही किन्तु उससे भी ज्यादा इन्हें काउंसलिंग की आवश्यकता है क्योंकि कि कोई मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति ही अपने इर्दगिर्द मंडराती मौत को देखने के बाद भी सारी सावधानियों को दरकिनार करते हुए मजहबी उन्माद में डूबा रह सकता है। यह पहला अवसर है जब धर्म को एक रोग कहने की इच्छा हो रही है, दुविधा केवल यह है कि इसे संक्रामक रोग कहा जाए या आनुवंशिक। जो कुछ निजामुद्दीन में हुआ है उसे किसी क्रॉनिक डिसीज का एक्यूट अटैक भी कह सकते हैं। 
धर्म आश्वासनों का विज्ञान है और शायद हमें यथास्थितिवादी, भाग्यवादी और नियतिवादी बनाने की कला भी। जरा, व्याधि, मरण, भूख, गरीबी, बेकारी, अभाव और ऐसे कितने ही दु:ख- जिनके विषय में हमें लगने लगता है कि ये चिरस्थायी है और पुरुषार्थ एवं परिश्रम इनसे मुक्ति नहीं दिला सकते- हमें चमत्कार की मृगतृष्णा की ओर धकेलते हैं। हम सोचते हैं कि हमारे साथ जो कुछ अप्रिय, अन्याय पूर्ण, और अतार्किक घटित हो रहा है उसका समाधान भी वैसा ही चमत्कारिक और तर्कातीत होगा। हम भौतिक दु:खों से मुक्ति और सांसारिक समस्याओं के समाधान के लिए धर्म के मार्ग पर चल निकलते हैं। जैसा कि हर यात्रा में होता है हमें मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। धर्म के मार्ग पर हमें अनेक प्रकार के मार्गदर्शक मिलते हैं। 
 कुछ धर्म गुरु शोषण-गरीबी-अभाव- बीमारी आदि को न्यायोचित ठहराने की तर्क पद्धति का प्रयोग करते हुए (जिसमें पूर्वजन्म, पुनर्जन्म, नर्क एवं स्वर्ग तथा कर्मफल सिद्धांत जैसी कितनी ही अवधारणाएं सम्मिलित होती हैं) हमें यह विश्वास दिला देते हैं कि जिस परिस्थिति में हम हैं वह ही हमारे लिए सर्वोत्तम है। हम भाग्यवान हैं कि हमारे साथ और अधिक बुरा नहीं हुआ। वे भौतिक परिस्थिति को बदल नहीं पाते बल्कि हमारी मन:स्थिति को बदल देते हैं। 
यह मनोवैज्ञानिक प्रयोग वर्ण व्यवस्था, लैंगिक भेदभाव और गैर बराबरी तथा शोषण के कितने ही उपकरणों को बचाए रखने का कारण बना है। कुछ धर्म गुरू ऐसे होते हैं जो तंत्र-मंत्र और जादू-टोने तथा विभिन्न प्रकार के उपायों द्वारा हमारी भौतिक समस्याओं का भौतिक समाधान देने का वादा करते हैं। इन्हें भी कभी लॉ ऑफ एवरेजेस के कारण और कभी इनके बताए उपायों के कारण हममें उत्पन्न आत्मबल के फलस्वरूप कामयाबी मिलती रहती है। हम आश्चर्य करते हैं कि वैज्ञानिक और चिकित्सक भी न केवल धर्म के विमर्श में प्रवेश करते हैं बल्कि इससे प्रभावित होते देखे जाते हैं।
 दरअसल जितना अधिक हम जानते हैं उतना ही अधिक हमें यह बोध होता है कि जो जाना है वह बहुत कम है और अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे जानना शेष है। अपने डिसिप्लिन की सीमा का यह बोध उस अज्ञात को जानने, उस अनसुलझे को सुलझाने के लिए धर्म के विमर्श में प्रवेश करने को प्रेरित करता है। जब एक बार आप धर्म के विमर्श के नियमों को स्वीकार लेते हैं तो उन नतीजों तक जिन तक धर्म आपको पहुंचाना चाहता है आपका पहुंचना अनिवार्य हो जाता है। 
धर्म सम्पूर्ण समर्पण की मांग करता है। कहा जाता है कि बिना विश्वास के न तो कोई धार्मिक अनुभूति प्राप्त हो सकती है न ही कोई चमत्कार घटित हो सकता है। ऐसा विश्वास, ऐसी आस्था और ऐसा समर्पण तभी संभव हैं जब हम तर्क न करें, प्रश्न न पूछें और अपने विवेक का प्रयोग न करें। जब धर्म भौतिक समृद्धि को प्राप्त करने की अभौतिक युक्तियों का शास्त्र बन जाता है तब स्वाभाविक रूप से उसकी मित्रता सत्ता और संपन्नता से हो जाती है। वह पूरी दुनिया में युद्धों का कारण बनता है और अपने प्रचार के लिए सत्ता और सैन्य कार्रवाई पर निर्भर करने लगता है। 
निजामुद्दीन में जो लोग एकत्रित हुए थे वे धर्म प्रचार से संबंधित थे। यह बिल्कुल संभव है कि उन्हें यह विश्वास दिला दिया गया हो कि धर्म प्रचार का पावन कार्य करने वाले की ईश्वर रक्षा करते हैं। यह भी संभव है कि उनके मन में यह विचार डाल दिए गए हों कि अपने धर्म का कार्य करते हुए यदि प्राण भी गंवाने पड़ें तो हमें पीछे नहीं हटना चाहिए क्योंकि इससे हमारा मरणोत्तर जीवन सुख, वैभव और ऐश्वर्य में बीतेगा। हो सकता है कि गरीबी और अशिक्षा ने इन लोगों को शातिर धर्म गुरुओं के लिए आसान शिकार बना दिया होगा। 
धर्म गुरू मरने के बाद जन्नत, हेवन या स्वर्ग के सब्जबाग दिखाकर लोगों को बड़ी आसानी से जान की कुर्बानी देने के लिए तैयार कर लेते हैं। अपनी दुनियावी दिक्कतों से निजात पाने के लिए लोग मजहब की दुनिया में आते हैं और किसी धर्म गुरु या धर्म की बुनियाद पर शानो-शौकत और ऐशोआराम की जिंदगी जीने वाले किसी हुक्मरान की हुकूमत के लिए यह समझते हुए कुर्बान हो जाते हैं कि ये कुर्बानी उन्होंने अपने दीन के लिए दी है। यह भी  संभव है कि इनमें सामूहिक प्राणोत्सर्ग का भाव भर दिया गया हो। 
इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि धर्म सामूहिक आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता रहा है। स्विटजरलैंड, फ्रांस और कनाडा में मौजूद द ऑर्डर ऑफ द सोलर टेंपल  द्वारा 1994 और 1995 में कई सामूहिक आत्महत्याओं और एक के बाद एक हत्याओं को अंजाम देने के वाकये, 17 मार्च 2000 को युगांडा में द मूवमेंट फॉर द रेस्टोरेशन ऑफ द टेन कमांडमेंट्स ऑफ गॉड के 778 सदस्यों की सामूहिक आत्महत्या का मामला, 24 से 27 मार्च 1997 के बीच अमरीका के कैलीफोर्निया में रैंचो सांता-फे में हैवेंस गेट समूह के 39 अनुयायियों की सामूहिक आत्महत्या का प्रकरण, एडम पंथ (आदम पंथ) को मानने वाले और अपने घर का नाम एडम हाउस रखने वाले एक ही परिवार के 9 सदस्यों द्वारा बांग्लादेश के माइमेनसिंह क्षेत्र में 2007 में ट्रेन के आगे कूदकर सामूहिक आत्महत्या की घटना और राजधानी दिल्ली के बुराड़ी के संत नगर इलाके में 2018 में एक ही घर में 11 लोगों की मृत्यु की घटना कुछ ऐसे हालिया उदाहरण हैं जो धर्म की इस खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
तब्लीगी जमात के धर्म गुरुओं द्वारा अपने भवन के खिडक़ी दरवाजे बंद कर अपने लोगों को ही दमघोटू माहौल में जीने को मजबूर किया जाना बहुत प्रतीकात्मक है, यदि किसी धर्म के भवन के खिडक़ी दरवाजे वैज्ञानिक चिंतन, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों और (बाकी पेज 8 पर)
मनुष्य की महत्ता एवं गरिमा की स्थापना करने वाले उदार विचारों के लिए नहीं खोले जाएंगे तो अंदर की सड़ांध उस धर्म के अनुयायियों को रोगी बना देगी। वर्तमान सत्ता की विचारधारा अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की धार्मिक पहचान को चुनौती दे रही है। यह सच है कि इस विचारधारा को मुस्लिम समुदाय का कोई भी बदलाव संतुष्ट नहीं कर सकता। लेकिन मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं को कुरेदे जाने की इस भडक़ाऊ प्रक्रिया का जो सर्वाधिक सकारात्मक लाभ प्रगतिशील मुस्लिम वर्ग ले सकता है वह अपने धर्म और समाज में व्याप्त जड़ता एवं कट्टरता से छुटकारा पाने का प्रयास करना है। इस कठिन कार्य के लिए नई सोच वाले मुसलमानों के पास मौका भी है और बहाना भी। किंतु मुस्लिम समुदाय यदि धर्मांधता का मार्ग चुनेगा तो वह बहुसंख्यक वर्ग की सर्वोच्चता स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाली इस विचारधारा का काम आसान ही करेगा। मुस्लिम समुदाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आमदनी आदि कितने ही विकास के मानकों पर राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है किंतु उसे कभी इनके लिए आंदोलित होते नहीं देखा गया। मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व पुलिस, सेना, नौकरशाही, विधायिका और न्यायपालिका में घटता जा रहा है किंतु इसके लिए भी वह कभी सडक़ों पर नहीं उतरा। हां जब भी उसकी धार्मिक पहचान खतरे में पड़ती है तो वह जरूर संघर्ष करता दिखता है और यही बहुसंख्यकवाद के समर्थक चाहते हैं क्योंकि इस तरह वे बहुसंख्यक वर्ग का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण कर सकते हैं। 
कोरोना हमें अवसर दे रहा है कि हम धर्म के नाम पर चल रहे पाखंड से बाहर निकलें किंतु हम हैं कि धर्म के विमर्श को छोडऩे को तैयार नहीं है। सत्तारूढ़ दल के कुछ पिंच हिटर नुमा नेता यह कहना प्रारंभ कर चुके हैं कि यह हमारे देश को कोरोना के माध्यम से बर्बाद करने का षड्यंत्र है और इसीलिए विदेशों से कोरोना पीडि़त लोगों को भेजा गया था। चीजें धीरे धीरे जिस दिशा में जा रही हैं उससे ऐसा लगता है कि हम बहुत जल्दी चीखते चिल्लाते एंकरों को पाकिस्तान की कोरोना साजिश पर डिबेट कराते देख सकेंगे। फिर घुसपैठिए भी आ जाएंगे और इन्हें निकाल बाहर करने के लिए सीएए, एनआरसी तथा एनपीआर की जरूरत भी पैदा हो जाएगी। 
तब्लीगी जमात के कर्ताधर्ताओं की सफाई का सार संक्षेप यह है कि भारत सरकार कोरोना को हल्के में लेती रही और लापरवाह बनी रही हमने तो केवल अपनी सरकार का अनुकरण किया है। सरकार ने विदेशों से लोगों को क्यों आने दिया?क्यों नहीं उनकी जांच की गई? क्यों अचानक लॉक डाउन का फैसला लिया गया? क्यों हमें अपने अपने गंतव्य तक जाने के लिए साधन मुहैया नहीं कराए गए? हमने तो लॉक डाउन का पालन करते हुए अपने हजार लोगों को नजरबंद रखा था फिर कोई हमें बताए कि हमारा जुर्म क्या है? हमने लॉक डाउन के पहले भीड़ कम करने के उद्देश्य से अपने सैकड़ों लोगों को देश भर में भेजा तो था। हमें क्या पता कि वे कोरोना संदिग्ध निकल आएंगे सरकार ने तो इनकी जांच नहीं की थी। यहां मौजूद लोगों का हम इलाज कराने निकलते तो लॉक डाउन टूटता। हमने इतनी बड़ी तादाद में अपने लोगों को एक छोटी सी जगह में लॉक डाउन की इज्जत करने के लिए बंद रखा। हम लॉक डाउन का पालन करने में इतने मशगूल थे कि हम यह भूल गए कि सोशल डिस्टेन्सिंग क्या है। हम तो यह भी भूल गए कि लॉक डाउन आखिर किया क्यों गया है। इस भोलेपन पर ऐसा कौन होगा जो कुर्बान नहीं हो जाएगा। भोलापन तो दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार का भी देखते ही बनता है। विधानसभा चुनाव में मिली ताजी-ताजी हार से खीजे स्थानीय विपक्षी नेता यह कहते सुने जा रहे हैं कि यह पूरा आयोजन केजरीवाल की शह पर हुआ है। बात बढ़ेगी तो केजरीवाल जी जो कहेंगे वह पूरा देश जान रहा है- दिल्ली पुलिस आपकी, गृह मंत्रालय आपका, गुप्तचर विभाग आपका, अमित शाह जैसा ताकतवर गृह मंत्री और अजीत डोभाल जैसा काबिल एनएसए दोनों दिल्ली में मौजूद (प्रधानमंत्री के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा) फिर मेरी क्या गलती है। केजरीवाल एक मंजे हुए राजनेता हैं और पुराने नौकरशाह भी। वे अपने समर्थकों और अधिकारियों को यह कहते लगते हैं कि बिना पकड़ में आए जो भी कर सकते हो कर लो। अगर पकड़ में आ गए तो फिर मैं यही कहता मिलूंगा कि कानून अपना काम करेगा, किसी को बख्शा न जाएगा। 
तब्लीगी जमात से जुड़े इस मामले ने बुद्धिजीवियों के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर दी है। कट्टर प्रगतिशील खेमे के छत्रप अपने सेनापतियों की फेसबुक पोस्ट्स और ट्वीट्स को हर आधे घंटे में जांच रहे हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इस घटना की निंदा करनी है या नहीं। कुछ लोग उन तथ्यों की प्रतीक्षा करेंगे जो उन्हें इस घटना की निंदा करने की बदमजा जिम्मेदारी से मुक्त कर देंगे बल्कि शायद प्रत्याक्रमण का मौका भी दे देंगे। कुछ लोग अन्य धर्मावलंबियों द्वारा कोरोना के इलाज के बारे में दिए दकियानूसी बयानों तथा इनके द्वारा सोशल डिस्टेन्सिंग के उल्लंघन के मामलों की तलाश कर रहे हैं। गोमूत्र पार्टी करते स्वामी चक्रपाणि और रामलला को फाइबर के मंदिर में ले जाते योगी आदित्यनाथ और उनके साथी रामभक्त इनका काम आसान कर रहे हैं। जब हम धार्मिक कट्टरता की खुल कर आलोचना करने के बजाए इस पर धर्म और समुदाय के नाम के आधार पर  प्रतिक्रिया करने लगते हैं तब हम स्वयं को प्रगतिशील कहलाए जाने का अधिकार खो देते हैं। 
 कट्टर दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी भी सतर्क हैं और अपने धार्मिक नेताओं की विगत और आगत मूर्खताओं को न्यायोचित ठहराने के लिए पिछले सत्तर सालों में की गई बेवकूफियों की सूची बना रहे हैं। ये बहुसंख्यक वर्ग को अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भडक़ाने की रणनीति भी तैयार कर  रहे हैं। जब बहुसंख्यक वर्ग के लोग आक्रामक होकर अल्पसंख्यक समुदाय के साथ हिंसा पर उतर आएं या सरकार इस घटना को आधार बनाकर सम्प्रदाय विशेष को निशाना बनाने लगे तब इन्हें जस्टिफाई करने के लिए पिछले सत्तर साल में हुए नरसंहारों, दंगों और इमरजेंसी सहित दमनात्मक सरकारी कार्रवाइयों की लिस्ट बनाने का श्रम साध्य कार्य भी इन बुद्धिजीवियों को करना है।
जब पूरा देश एक विश्वव्यापी महामारी के आक्रमण से चिंतित हो, अफरा-तफरी का माहौल हो, देश की एक बड़ी आबादी अपनी जान की सलामती के लिए घरों में दुबकी हो, गरीब भूख से तड़प रहे हों तब भी यदि उस देश के बेहतरीन दिमाग धर्म और सम्प्रदाय का खेल खेलने में मशगूल रहें तो यह बेहिचक कहा जा सकता है कि उस देश का भगवान ही मालिक है। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि चिकित्सा से संबंधित पूरे तंत्र पर यदि बाजारवाद हावी न होता, यदि हमारी चिकित्सा व्यवस्था अधिक सस्ती, सुलभ, संवेदनशील और जनोन्मुख होती तो शायद आज लोगों की मंजिल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि अस्पताल होते।

 


Date : 01-Apr-2020

मुकेश नेमा
पति लगातार बर्दाश्त करने जैसी चीज होता नहीं! यह बात कोरोना ने समझाई है हमारे यहाँ की महिलाओं को! बहुत सी औरतें अब जाकर यह बात जान पाई है कि उनके पल्ले पड़ा आदमी उससे कहीं ज़्यादा खड़ूस, सनकी और गैरजिम्मेदार है जितना वो अब तक समझ बैठी थी! 
पति नाम की इस विचित्र जीव को अभी तक तो किश्तों में झेलती थी वो! आदमी सुबह दस-ग्यारह बजे घर छोड़ देता था ! फिर शाम को छह सात बजे ही दर्शन होते थे उसके! हफ़्ते में दो शनिवार और चार संडे की छुट्टियों का अधिकतर वक्त भी ये शख्स छुटपुट खरीददारी, तफऱीह और यार दोस्तों से मिलने जुलने में निकाल देता था! ऐसी गतिविधियों में आदमी को मिलनसार दिखना ही पड़ता है और उसकी असली शक्ल नहीं जानी जा सकती! 
दरअसल भगवान ने कोरोना को धरती पर भेजा ही इसलिये है कि आदमियों की असलियत खुल जाये! कलई उतर जाये उनकी! औरतें अब जाकर जान सकी है कि उनके पति में उनकी मरी सास छुपी बैठी है! वह यह जानकर हैरान होती है कि उसका पति उसकी सास का बेहतर प्रोसेसर और तीन कैमरों वाला अगला एडीशन है! उसकी सास का चिड़चिड़ापन ,हुकुम चलाने की प्रवृत्ति, हर काम में टांग अड़ाने की आदत जस की तस उसकी औलाद में उतर आई है! 
कोरोना की वजह से पति को मिली लंबी छुट्टियाँ जी का जंजाल भर साबित होती है ! पति नाम का प्राणी देर रात तक जागता है ,जब तक जागा रहता है कुछ ना कुछ खाते रहना चाहता है! बीबियाँ आमतौर पर भलीमानस होती ही है इसलिये उसकी थाली और उसके पेट को भरने की अपनी तरफ़ से हर मुमकिन कोशिश करती भी है! अति तब हो जाती है जब हाथ पर हाथ धरे बैठा ये बंदा उसके जतन से बनाये मटर पनीर पर नाक चढ़ाता है और अपनी अम्मा की बनाई देहाती कढ़ी की तारीफ के कसीदे काढऩे लगता है ! 
आम हिंदुस्तानी पति अपने ही घर में बाराती की तरह बर्ताव करता है! उसे हर चीज अपने हाथ में चाहिये होती है! ना मिलने पर वो झल्लाता है! पाँव पटकता है! और टेंशन बढ़ाता है! उससे घर के किसी काम में हाथ बँटाने की उम्मीद करना भूत से पूत माँगने के बराबर होता है! उसे इस बात पर ही ताज्जुब होता है कि उससे ऐसी उम्मीद की जा रही है! उसे लगता है घर के काम बँटाने की बात उसकी बेइज़्ज़ती है! वो अपनी इज़्ज़त बचाने के चक्कर में ऐंठता है! और घर का माहौल ज़हर कर देता है ! 
घर में लगातार मौजूद आदमी पड़ौसी से पार्किंग के लिये लडऩे के अलावा ,लगातार न्यूज चैनल देखता है! गूगल से भी कोरोना के बारे में ही जानना चाहता है ! फेसबुक पर कोरोना बाबत लंबी लंबी पोस्ट लिखता है! ट्विटर पर बहस करता है और सोचता है यही देश सेवा है! कोरोना उसके दिमाग़ पर चढ़ बैठता है! वो कोरोना को ओढ़ता, बिछाता है ,उसके अलावा और किसी टॉपिक पर बात नहीं करता! उस सिस्टम को कोसता है जिसका वो खुद हिस्सा है! इकतरफ़ा संवाद करता है और पिंजरे में बंद शेर सा भटकता है ! 
बच्चे भी कष्ट पाते है इस बदले हुये इंसान से!  घर में बैठा आदमी अचानक अपने बच्चों को अनुशासन, मेहनत और हाथ धोने का पाठ पढ़ाने पर उतारू हो जाता है ! खुद जि़ंदगी भर अव्यवस्थित रहा बंदा बच्चों को व्यवस्थित करने पर आमादा हो जाता है! वो उनके उठने बैठने , सोने जागने का वक्त तय करना चाहता है! लंबे लंबे भाषण देता है! इस दौरान बड़बड़ाता है! अनमना होता है ! उसकी ये क्लॉसे कभी भी वक्त बेवक्त शुरू हो जाती है! और बच्चे भी अपनी अम्मा के सुर में सुर मिलाते हुये कोरोना के सत्यानाश की कामना करने लगते है! 
सब ऐसे होते नहीं वैसे! सौ में से एकाध कभी कभार चाय बना कर पिला देते है बीबी बच्चों को! हो सकता है चार छह गिलास भी धो दे! अमूमन इस कि़स्म के पति भी पास की दुकान से दूध की थैली और सब्जिय़ाँ लाकर दिन भर के लिये फुर्सत हो लेते है ! ऐसा करने के बाद अपनी करनी का दिन भर बखान करते है और पूरे शहर के बाकी पतियों को मुश्किल में डालने का सबब बनते है !
हाथ पर हाथ धरे घर में बैठा आदमी गड़े मुर्दे उखाड़ता है! तुमने तब ऐसा क्यों किया था, उससे ऐसी उम्मीद नहीं थी! मैं उसका वो हाल कर सकता था पर तुम्हारे लिहाज से रूक गया था! इस टाईप के दर्जनों बासी कि़स्से दोहराता है वो जो काम के बोझ से दबी बीबी का दिमाग खराब करने के अलावा और किसी मतलब के नहीं होते! 
महिलायें दिल से चाहती है कि ऐसे बवाली पति जान छोड़े उनकी! कुछ देर के लिये ही सही पर रूखसत हो घर से! पर ये तभी मुमकिन होगा जब कोरोना हम सभी की जान छोडऩे के लिये राज़ी हो जाये! कोरोना तुम्हारा मरना सबसे ज़्यादा इसलिये जरूरी है ताकि हिंदुस्तानी औरतें पूरे दिन अपनी मर्जी से जी सके! 

 


Date : 01-Apr-2020

ध्रुव गुप्त
वायरसजन्य रोगों के कारण लोगों को आइसोलेशन में भेजे जाने के चर्चे इन दिनों आम है। इतिहास गवाह है कि प्रेमजन्य रोगों की वज़ह से लोगों के इससे भी लंबे आइसोलेशन में भेजा जाता रहा है। प्रेम के कारण सबसे लंबा आइसोलेशन झेलने वाली शख्सियतों में एक थी मुगल सम्राट औरंगजेब की बड़ी बेटी जेबुन्निसा। अपने चाचा दारा शिकोह से प्रभावित जेबुन्निसा ने बचपन से अपना ध्यान फारसी और सूफ़ी साहित्य के अध्ययन में लगाया था। 
किशोरावस्था तक आते-आते अपनी भावनाओं को वह गज़़लों और रूबाइयों में ढालने लगी। पिता के कठोर अनुशासन की वज़ह से दरबार में अदबी महफि़लों की गुंजाईश नही थी तो अपना परिचय छुपाकर वह मख्फी नाम से शहर में आयोजित होने वाले मुशायरों में शिरक़त करने लगी। रूमानी शायरी और सुरीली आवाज के कारण उसकी लोकप्रियता बढऩे लगी। इन्हीं मुशायरों के दौरान युवा शायर अकील खां रज़ी से उसका परिचय हुआ जो बहुत जल्दी मुहब्बत में बदल गया। उन दोनों की मुशायरों से अलग भी व्यक्तिगत मुलाक़ातों की ख़बर जब औरंगज़ेब तक पहुंची तो उसे अपनी बेटी का रूमान बिल्कुल पसंद नहीं आया। 
मुगल सल्तनत वैसे भी अपनी बेटियों के प्रति ज्यादा रूढि़वादी और अनुदार रहा था। औरंगजेब ने जेबुन्निसा को दिल्ली के सलीम गढ़ किले में कैद कर दिया।
अविवाहित जेबुन्निसा के जीवन के आखिरी बीस साल निर्जन सलीमगढ़ किले के एकांत में गुजऱे। इस मुश्किल दौर में शायरी ने उसे सहारा दिया। प्रेम की व्यथा और अंतहीन प्रतीक्षा उसकी शायरी का मूल स्वर है। उस घोर रूढि़वादी दौर में भी जेबुन्निसा ने बेख़ौफ़ होकर प्रेम की आंतरिक अनुभूतियों को स्वर दिए। अपने जीवन के आखिरी दौर में उसने दीवान-ए-मख्फी की पांडुलिपि तैयार की जिसमें उसकी पांच हज़ार से ज्यादा गज़़लें, शेर और रूबाईयां संकलित थीं। उसकी मौत के बाद फारसी के किसी विद्वान ने उसके दीवान की पांडुलिपि पेरिस और लंदन की नेशनल लाइब्रेरियों में पहुंचा दिया जहां वे आज भी सुरक्षित हैं। 
साहित्य के जानकारों की नजऱ पडऩे के बाद उसके दीवान के अनुवाद अंग्रेजी,फ्रेंच,अरबी सहित कई-कई भाषाओं में हुए। दुर्भाग्य से उसके अपने देश की किसी भाषा में उसके दीवान के प्रकाशन और मूल्यांकन का काम अभी बाकी है। आज आपके लिए प्रस्तुत है प्रेम के कारण दुनिया का सबसे लंबा आइसोलेशन झेलने वाली जेबुन्निसा की एक कविता का मेरे द्वारा अंग्रेजी से किया गया अनुवाद-
अरे ओ मख्फी
बहुत लंबे हैं अभी
तेरे निर्वासन के दिन
और शायद उतनी ही लंबी है
तेरी अधूरी ख़्वाहिशों की फेहरिस्त
अभी कुछ और लंबा होगा
तुम्हारा इंतज़ार
शायद तुम रास्ता देख रही हो
कि उम्र के किसी मोड़ पर
किसी दिन
लौट सकोगी अपने घर
लेकिन, बदनसीब
घर कहां बच रहा है तुम्हारे पास
गुजऱे हुए इतने सालों में
ढह चुकी होंगी उसकी दीवारें
धूल उड़ रही होगी अभी
उसके दरवाजों
और खिड़कियों पर
अगर इंसाफ़ के दिन ख़ुदा कहे
कि मैं तुम्हें हजऱ्ाना दूंगा
उन तमाम दुखों का
जो जीवन भर तुमने सहे
तो क्या हजऱ्ाना दे सकेगा वह मुझे
जन्नत के तमाम सुखों के बाद भी
वह एक शख्स तो उधार ही रह जाएगा
ख़ुदा पर तुम्हारा !


Date : 31-Mar-2020

अमरीक सिंह
कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे के मद्देनजर पंजाब में अमरिंदर सिंह सरकार ने कर्फ्यू लगाया हुआ है। लोग-बाग अपने घरों में कैद हैं और जो बाहर निकल रहे हैं, उनकी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। कफ्र्यू के बीच बाहर निकलने वाले जायज लोगों को भी पुलिस की थुक्का-फजीहत बर्दाश्त करनी पड़ रही है। इस महामारी के दौर में भी यह बखूबी साबित हो रहा है कि ‘पुलिस (खासकर भारतीय) ‘पुलिस’ ही है और कफ्र्यू आखिरकार ‘कफ्र्यू’ ही है!’ सरकारी दावों के विपरीत लोगों को आवश्यक चीजों से महरूम होने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है। केंद्र और राज्य सरकारों को दिहाड़ीदारों और असंगठित कामगारों की सचमुच कोई परवाह होगी, जमीनी स्तर पर पंजाब में यह भी नजर नहीं आ रहा। फौरी हालात ये हैं कि पंजाब में सख्त कफ्र्यू की सार्थकता पूरी तरह दांव पर है।
सरकारी घोषणा थी कि कफ्र्यू के बाद लोग कतई घरों से बाहर ना निकलें। उन्हें आवश्यक चीजों की कमी नहीं आने दी जाएगी। हेल्पलाइन नंबर जारी कर दिए गए थे। लेकिन हो क्या रहा है? कालाबाजारी जोरों पर है। जो सब्जी या फल पहले 50 रुपए किलो था वह अब 100 से 150 रुपए किलो तक है। आटे की थैलियां दुगने दामों में बेची जा रही हैं। यही हाल बिस्किट, ब्रेड, रस्क सहित बेकरी के अन्य सामानों का है। दवाइयों के दाम भी एकाएक बढ़ गए हैं। और जब लोग मजबूरी में घर से बाहर निकल रहे हैं तो पुलिस सडक़ों पर मरीजों तक को पीट रही है। आपदा की इस घड़ी में अमानवीयता और क्रूरता के इस तंत्र पर कोई ‘कफ्र्यू’ नहीं।
एक बात शीशे की मानिंद साफ है, केंद्र और राज्य, दोनों की सरकारें चंद दिन पहले तक लापरवाही की नींद सोई रहीं। करीब 90 हजार एनआरआई मार्च में पंजाब आए जिनमें से कुछ में इस महामारी के लक्षण भी थे। सरकारें पहले अतिरिक्त सतर्कता बरततीं तो शायद आज पंजाब इस तरह त्राहि-त्राहि नहीं कर रहा होता। पानी जब सिर से गुजरा तो देश भर में जनता कर्फ्यू, लॉकडाउन और पंजाब में अनिश्चितकालीन ‘सख्त’ कफ्र्यू की घोषणा कर दी गई। अब आलम क्या है, घरों में बंद तमाम लोग सूचनाएं/खबरें सोशल मीडिया, टीवी चैनलों के जरिए हासिल कर ही रहे हैं।
खैर, अब सवाल उन लोगों का है जो रोज होने वाली कमाई के जरिए दो जून की रोटी का इंतजाम किया करते थे। क्या कफ्र्यू लागू करना जीवन से आगे की चीज है, यह फगवाड़ा के एक ऐसे किसान परिवार से जानिए, जिसके दो सदस्यों ने सल्फास को हथियार बनाकर अपनी जान दे दी। जो शेष हैं जीना चाहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे निराश हो रहे हैं। इस परिवार की महिलाएं तक खेतों में मजदूरी करती थीं और कफ्र्यू तथा लॉकडाउन ने श्रम-जीवन के इस सिलसिले को बेमियादी वक्त के लिए मुल्तवी कर दिया है।
इस परिवार की हिंदी में पढऩे वालों के लिए अम्मा (पंजाबियों के लिए बीजी) 81 साल की निहाल कौर यह कहते हुए रोने लगतीं हैं कि, पुत्तरा ऐसा वक्त कभी नहीं देखा। हमारे घर के दो बच्चे चले गए कर्ज के कारण। हमने हिम्मत नहीं हारी। लेकिन अब? एक खतरा कोरोना वायरस का और दूसरा भुखमरी का। घर में एक पैसा नहीं और उधार देने को कोई तैयार नहीं। किसी को यकीन ही नहीं कि यह सिलसिला कब खत्म होगा और होगा भी तो हालात सामान्य कब होंगे। तमाम लोग नगद लेकर सामान दे-ले रहे हैं। हम कहां जाएं?
जालंधर शहर के ऐन बीचों-बीच एक गांव है रेड़ू। जालंधर-पठानकोट हाइवे पर। वहां किराए के एक कमरे के मकान में रहने वाला बक्शीश सिंह का परिवार बीते दो दिन से ढंग से खा नहीं पा रहा। लगभग पूरा परिवार भूखा है। राज्य सरकार कहती है कि 10 लाख ऐसे लोगों तक खाने के पैकेट पहुंचाए गए हैं लेकिन अब तक बक्शीश सिंह के परिवार तक तो नहीं पहुंचा। बक्शीश सिंह की उम्र जानिए, लगभग 65 साल। रुआंसे होकर कहते हैं, तीन बार खाने की तलाश में और गुहार लगाने के लिए बाहर शहर (पठानकोट बाईपास) चौक तक गया लेकिन पुलिस ने खदेड़ दिया। गांव वाले कब तक खाना खिलाएंगे?
कुछ धार्मिक संगठनों ने जरूरतमंदों को खाना पहुंचाने की जोर-शोर से घोषणा की है लेकिन जालंधर के ही सोफी पिंड के नीरज कुमार के लिए अभी यह बेमतलब है। इस पत्रकार ने नीरज के सामने ही प्रशासन के कुछ आला अधिकारियों को फोन कर जानना चाहा कि शासनादेश तो यह हैं कि किसी को भूखा नहीं रखा जाएगा लेकिन फौरी हालात यह हैं, तो लगभग सभी का जवाब था, कि आते-आते ही सब कुछ आएगा! वैसे, हम पूछ नहीं पाए कि क्या मौत भी? कुछ जगह के हालात यही बता रहे हैं कि कोरोना वायरस से ज्यादा मौतें शायद भुखमरी और अवसाद/तनाव से हो सकती हैं।
पंजाब की किसानी के आगे इस वक्त सबसे ज्यादा दिक्कतें हैं। सूबे में गेहूं की फसल एकदम तैयार और कटने के इंतजार में है। कइयों को नहीं लगता कि इस बार गेहूं की फसल अपने मुफीद मुकाम तक पहुंचेगी। जालंधर जिले के रुपेवाली गांव के एक किसान, मदनलाल जिन्होंने 70 एकड़ जमीन पर गेहूं खड़ी की है, कहते हैं, दोआबा के किसान परिवारों के ज्यादातर बच्चे विदेशों में हैं और मशीनरी के बावजूद फसल कटाई और बुवाई के लिए हम लोग पूरी तरह उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और राजस्थान से आने वाले प्रवासी मजदूरों पर निर्भर हैं। लेकिन अब वे नहीं आएंगे क्योंकि आवाजाही के सारे साधन पूरी तरह बंद हैं। पंजाब में कर्फ्यू है तो उनके राज्यों में लॉकडाउन।
सूबे के बाकी हिस्सों में भी किसान प्रवासी मजदूरों के नहीं आने की पुख्ता आशंका के चलते बेहद परेशान और चिंतित हैं। उनकी समझ से बाहर है कि होगा क्या? हालांकि सरकार और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (लुधियाना) की ओर से लगातार दावा किया जा रहा है कि किसानों को किसी किस्म की मुश्किल नहीं आने दी जाएगी लेकिन स्पष्ट रूपरेखा सामने कोई नहीं रख रहा।
राज्य में पिछले कुछ दिनों से तेज हवाओं के साथ बारिश हो रही है जो ज्यादातर फसलों पर तेजाब की मानिंद है। यानी बारिश जारी रहती है तो कोरोना वायरस का जंजाल बर्बाद करे ना करे, तूफानी बरसात यकीनन कर देगी। राज्य के जिन खेतों में गेहूं से इतर फसलें लगाईं गईं थीं, वे पककर तैयार हुईं, कट कर हाथों में भी आईं लेकिन कफ्र्यू के चलते बेमौत मारी गईं यानी सड़ गईं। पंजाब की लगभग 18000 हेक्टेयर खेतिहर भूमि में ऐसी फसलें होतीं हैं। फल भी। अब सब कुछ तबाह है। धरती बेशक बंजर नहीं है लेकिन उससे भी बदतर हालात में है।
यह सारा कहर तब दरपेश है जब पंजाब की किसानी पहले से ही कर्ज के जानलेवा मकडज़ाल में है। रिकॉर्ड पैमाने पर किसान और स्थानीय खेत मजदूर खुदकुशी के लिए मजबूर हैं। कोरोना वायरस, कफ्र्यू और लॉकडाउन की सुर्खियों के बीच भी खबर मिलती है कि जिला मानसा के बरेटा में 27 वर्षीय एक किसान ने आत्महत्या कर ली। कीटनाशक निगलकर जान देने वाले हरपाल सिंह पर सात लाख रुपए का कर्ज था। इस सवाल का जवाब कौन देगा कि देशव्यापी बल्कि विश्वव्यापी इस संकट के बीच किसने कू्ररता के साथ ऐसे कर्ज मांगा होगा जिसे अदा करने का इतना मारक दबाव होगा? संकट में भी क्या दुनिया वही है जिसमें आत्महत्या रोजमर्रा का एक सच है।
बहरहाल, पंजाब में पुलिस ने कर्फ्यू की अपनी सख्त पाबंदी को निभाते, कफ्र्यू का उल्लंघन करने वालों पर आज भी (इन पंक्तियों को लिखने वाले दिन) 190 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए और कल का यह आंकड़ा 286 था। इन लोगों में वे भी शामिल हैं जो इलाज या रोटी के लिए घरों से बाहर निकलने के ‘गुनहगार’ हैं।
जाते-जाते कफ्र्यू ग्रस्त पंजाब की एक और तस्वीर : जो अमीर हैं, वे आरामयाफ्ता या जुए और पार्टियों में मसरूफ हैं। बीच के लोग टीवी/नेट से दिल बहला रहे हैं। बच्चों के हिस्से की सुबह और शाम के असली रंग गायब हैं। जिनके अभिभावक समर्थ हैं वे लगातार नेटजाल में फंस रहे हैं। बचा चौथी दुनिया का तबका, तो वह एक नई वजह से उसी पुराने मकडज़ाल में है जो लगातार कसता जा रहा है। (दिप्रिंट)

 


Date : 31-Mar-2020

रमण रावल

सही कहते हैं कि मुसीबत अकेले नहीं आती। कोरोना के कहर ने फिर यह बता दिया। ऐसा नहीं है कि जिसे कोरोना हुआ है, वही आक्रांत है। सचाई तो यह है कि जो  संक्रमित नहीं हुए हैं, वे ज्यादा दहशत में हैं। वजह भी है। यह डर केवल इस जानलेवा बीमारी तक सीमित नहीं है, इससे निपटने में जो कुछ भी करना पड़ रहा है, वह ऐसा दुष्कर काम है कि 21 दिन पूरे होते-होते व्यक्ति ची बोलने लगेगा। जीवन में संयम बरतने की जितनी भी नसीहतें हमने खुद दूसरों को दी है और हमें भी मिली हैं, उनका मिश्रित स्वरूप देखने को मिल रहा है।
दिनचर्या की शुरुआत ही संयम के उपदेश से होती है। दूध की किल्लत के चलते चाय कम पीने, मग भरकर न पीने या कॉफी-दूध के बदले चाय पीने की नसीहत मिल रही है। खाली बैठे-बैठे दिन भर कुछ भी खाने की इच्छा ज्यादा ही होती है, लेकिन कहीं राशन की कमी न हो जाये तो कहा यह जा रहा है कि थोड़ा कम खाओ नहीं तो मुटिया जाओगे और राशन की भी कमी हो जायेगी। नाश्ते की बजाय सीधे खाने की बात हो रही है।
लॉक डाउन के कारण घर में काम करने वाली बाई या भाई दोनों ही आ नहीं पा रहे हैं। याने बर्तन,कपड़े धोने, झाड़ू-पोंछा करने व रसोई बनाने की जिम्मेदारी अकेले महिलाओं की नहीं रही। उनकी स्वाभाविक अपेक्षा है कि घर के पुरुष सदस्य भी इसमें हाथ बंटायें। ऐसे में उन घरों में राहत है, जो संयुक्त परिवार हैं या जिनमें बड़ी बेटियां भी हैं। एकल परिवारों में दिन भर द्वंद्व मचा रहता है कि कौन-सा काम कौन करे? चूंकि स्कूल-कॉलेज की भी छुट्टी है तो बच्चे भी घर पर ही हैं। जहां छोटे बच्चे हैं, उनकी एक तरफ परीक्षा की तैयारियां हैं तो दूसरी तरफ सुबह से शाम तक उनकी अनंत जिज्ञासायेें हैं। कोई अभिभावक इनके खत्म न होने वाले सवालों के जवाब दने की स्थिति में नहीं है। याने असल परीक्षा अभिभावक की चल रही है।
किंडर गार्डन स्कूल, प्ले स्कूल, प्री स्कूल,मांटेसरी स्कूल वाले कल्चर में अब अभिभावकों को यह आदत ही नहीं रही कि वे अपने बच्चों के साथ खेलें, वक्त बितायें, उनके बाल मन को संंतुष्ट करने लायक गतिविधियों में उन्हें व्यस्त रख पायें। जिन घरों में दादी-नानी,बुआ-मौसी,दीदी-भैया,चाचा-चाची नहीं हैं, उन घरों में बेहद गंभीर समस्या है कि वे कैसे बच्चों को अनमना होने से बचाये रखें । कहा तो यह जा रहा है कि हमें अनायास यह अवसर मिला है, जब हम अपनों के बीच आत्मीय पल बिता सकें, सुख-दु:ख साझा कर सकें। बात सही तो है, लेकिन यह उतना आसान नहीं है।
हमें नहीं भूलना चाहिये कि यह इक्कीसवीं सदी है। जिसमें मोबाइल, इंटरनेट, इंस्टाग्राम, फेसबुक,ट्वीटर, टीवी जैसे डिवाइस-साधन की भरमार है। वर्क टू होम कल्चर तो काफी समय से आ ही चुका है। यह जिनकी मजबूरी या जरूरत है, उनके लिये तो ठीक है, लेकिन भौतिक रूप से नौकरी,कारोबार या सेवा आधारित काम करने वाले इन दिनों इन तमाम डिवाइस का बेजा उपयोग करने में लगे होंगे, इसमें संदेह नही होना चाहिये। तब यह बात कितने हद तक सही हो सकती है कि ये पल अपनों के बीच बिताने का यह वाकई सही मौका है?
ऐसे अनेक व्यावहारिक मसले हैं, जिनके समाधान इस लॉक डाउन हालात में आसान नहीं है। यह जरूर है कि ये लम्हे हमें आत्म निर्भर बना सकते हैं, हममें कुछ भी कर पाने का माद्दा पैदा कर सकते हैं। मसलन, घर में बिजली, नल, ड्रेनेज,लांड्री संबंधी कोई काम निकला तो जाहिर है कि इस समय कोई आने वाला नहीं है । याने खुद कर सको तो राहत वरना उस दिक्क्त के साथ 21 दिन तो पक्का बिताओ। संभव है कि हालात के मद्देनजर उसके बाद भी कुछ दिन की अवधि और बढ़ जाये। यूं देखें तो विदेश में इस तरह के काम बाहरी व्यक्ति से करवाना महंगा सौदा होता है। इसलिये ज्यादातर लोग इन कामों को खुद करते हैं।
नई पीढ़ी के लिये तो फिर भी घर में समय बिताना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन 50 पार की पीढ़ी के लिये सीमित विकल्प हैं। गुजरे वक्त में यह पीढ़ी शतरंज, ताश, सांप-सीढ़ी , लूडो या  बैडमिंटन जैसे घरेलू खेल भूल गया है। और तो और इस तरह के साधनों का घर में मिलना मुश्किल है। सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि किताबों की तरफ से जो ध्यान हटा है, वह इस वक्त के लिये बेहद अखरने वाला है। अफसोस तो इस बात का है कि हिंदी किताबें अब मिलना मुश्किल हो रहा है। अंग्रेजी किताबें तो फिर भी बहुतायत में हैं और नई पीढ़ी इन्हें पढ़ भी रही हैं,किंतु मध्य व प्रौढ़ वय की पीढ़ी को अब बिल्कुल आदत नहीं रही कि प्रतिदिन वे सोने से पहले कुछ पन्ने पढ़ते हों। जिन घरों में किताबें संग्रहित हैं, वहां तो फिर भी गुंजाइश बनी रहेगी कि फिर से पढऩे की आदत बन जाये, लेकिन जो चाहते हैं कि किताबें पढ़ी जाये, लेकिन किताबें नहीं हैं, वे खरीदने नहीं जा सकते।
    यूं देखा जाये तो यह समय आत्मावलोकन का भी है। साथ ही शरीर और मन की मरम्मत, झाड़-पोंछ भी की जा सकती है। योग-व्यायाम के जरिये स्वास्थ्य को बेहतर रखने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। आप जो काम कर रहे हैं, उसे बेहतर तरीके से करने पर चिंतन किया जा सकता है। कुछ नया करना चाहते हैं तो उस बारे में भी बाकायदा प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं। चूंकि मोबाइल पर किसी से भी संपर्क किया जा सकता है तो अपने से जुड़े विषय विशेषज्ञों से चर्चा की जा सकती है। भविष्य में काम,कारोबार, सेवा से लेकर तो पारिवारिक जिम्मेदारी तक का निर्वाह कैसे किया जाये या अतीत में क्या कमियां रह गईं, उन पर विचार कर समाधान पर सोचा जा सकता है।
शासन-प्रशासन से जुड़े लोग भी जन क्लयाण की बेहतरीन योजनाओं का खाका तैयार कर सकते हैं। इस आपदा के मद्देनजर जो आर्थिक परेशानियां खड़ी होने वाली हैं, सबसे पहले उस पर चिंतन-मनन करना होगा। इस समय विकसित राष्ट्रों की हालत खराब है तो हम तो मुश्किल दौर में हैं,इसलिये ज्यादा ध्यान केंद्रित करना होगा। ऐसा भी न हो कि राजस्व की भरपाई के लिये 4-6 माह बाद जनता पर करों का बोझ लाद दिया जाये। चूंकि, जनता को राहत भी देना है, घाटे को कम भी करना है तो युक्तिपूर्ण तरीके से उपाय खोजने होंगे।
   उम्मीद है, ये 21 दिन समूचे भारत के लिये आत्म अवलोकन, चिंतन-मनन के लिये बेहतरीन मौका साबित होगा। इस दरम्यान हम कोरोना के खात्मे की दिशा में तो काम करें ही, खुद, देश,समाज और ब्रह्मांड की बेहतरी के लिये भी सोचें-विचारें


Date : 30-Mar-2020

अशोक वाजपेयी

एकान्त में रहने का अभ्यास है पर जब वह बंदिश के तौर पर होता है तो बेचैनी होना स्वाभाविक है। जब हमें लाचार होकर दूरी बनानी पड़ती है तब हमें अहसास होता है कि दूसरों के बिना, कुछ समय भी कितना असह्य और निरर्थक लगता है। दूसरों से अपने को अलग करना कई बार जरूरी होता है और दोनों पक्षों के लिए हितकर भी। पर यह विवश एकान्त हमें यह दुखद सीख देता है कि हम किस क़दर दूसरों पर निर्भर हैं। इसका अर्थ यह भी है कि हमें दोनों चाहिये-सामुदायिकता और एकान्त। पर ऐसी सामुदायिकता नहीं जिसमें एकान्त की जगह या संभावना न हो और ऐसा एकान्त नहीं जिसमें सामुदायिकता को बरबस थामा गया हो और जो एकान्त के लिए ख़तरा हो। हमारी अद्वितीयता भी बिना द्वितीयता के संभव नहीं है।

इस विवश एकान्त के कुछ लाभ भी हैं। वह परिवार के सभी सदस्यों को एक-दूसरे के नज़दीक लाता है और उन्हें साथ समय बिताने, बतियाने, याद करने का अवकाश देता है। इसका रोज़मर्रा की आपाधापी में अक्सर अवकाश नहीं मिलता। यह अवसर भी मिलता है कि आप कई लंबित-विलम्बित काम निपटा लें। मैंने ही एक प्रश्नावली के आठ पेजी उत्तर लिख डाले। बहुत सारी पुस्तकें अनपढ़ी-अधपढ़ी पड़ी हैं तो उन्हें पढऩा शुरू किया। व्योमेश शुक्ल और आशुतोष भारद्वाज, दो युवा लेखकों की पहली आलोचना-पुस्तकें पढ़ गया। अब अमरीकी लेखक-बुद्धिजीवी सूसन सोण्टेग की आठ सौ पृष्ठों में फैली जीवनी पढ़ रहा हूं। सेमुएल बैकेट पर एक फ्रेंच पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद भी थोड़ा सा पढ़ा। बैकेट की अल्पतमता और फ्रेंच में ही लिखने वाले मोरक्कन कवि अब्देललतीफ लाबी की विपुलता के बीच फंसा सा हूं।

इतना सब पढऩा यह सहज विनय जगाता है कि भाषा में कितनी दृष्टियां, शैलियां, अतिकथन-अल्पकथन, रसमयता, लालित्य, विडम्बनाएं-अन्तर्विरोध, गहराइयां और विस्तार, जीवन और मृत्यु, उम्मीद-नाउम्मीदी, साहस-दुस्साहस, सुन्दरता-क्रूरता चरितार्थ हो चुकी हैं कि उनके रहते कुछ लिखने का उपक्रम करना कई बार भयानक धृष्टता और मूर्खता तक लगती है। पर जैसे दूसरों का प्रेम जानकर भी हम अपना प्रेम करने से नहीं चूकते वैसे ही दूसरों के लिखे की सघनता-विपुलता-गुणवत्ता आदि आपको अपना लिखने से विरत नहीं कर पातीं। कई बार प्रेम मूर्खता है तो कई बार लिखना भी। पर ऐसी मूर्खता से बचने का उपाय हम जैसे साठ से भी अधिक बरसों से लिखने में लगे लोगों को कहां पता है?

एक तरह से सारे बाहरी जीवन से कटे इस विवश एकान्त में पुस्तकें ही हमारे पास दूसरों के स्पन्दित जीवन लाती हैं। दूसरे, शब्दों के रास्ते, हमारे पास आ जाते हैं और हमें फिर जीवन जीने-सहने-रचने योग्य लगने लगता है।

इस अहसास से, चाहे आप समुदाय में या एकान्त में हों, बचना मुश्किल है कि हमारे समाज में साहित्य की जगह कम है। पहले अधिक थी इस पर, वर्तमान स्थिति को देखते हुए, यकीन करना मुश्किल है। अगर ऐसा था भी तो वह काफी पहले का समय रहा होगा। आज जो लोग अपने ही घरों में दिन भर बंद रहने को विवश हैं, उनमें से कितनों के पास पढऩे के लिए साहित्य की कुछ पुस्तकें होंगी और उनमें से भी कितने उन्हें पढऩे की इच्छा रखते होंगे! अटकल लगाई तो जा सकती है पर दुखी मन को और दुखी क्यों करना!

सही है कि सबके पास जगह इतनी कम है कि उसमें घरेलू जरूरी चीजें ही मुश्किल में अंट पाती हैं, उसमें पुस्तकों के लिए जगह नहीं निकाली जा सकती। पर जिनके पास थोड़ी-बहुत जगह निकल सकती है वे भी उस जगह को पुस्तकों के बजाय दूसरी चीजों के लिए ही, ज्यादातर, उपयुक्त मानते हैं। ऐसे तो करोड़ों होंगे जो जगह होने के बावजूद पुस्तकों की कोई जरूरत महसूस नहीं करते और जिन्हें अपनी आखिरी पुस्तक पढ़े या पलटे कई दशक बीत चुके होंगे। उन्होंने पुस्तकों को बेदखल नहीं किया है, उन्होंने पुस्तकों को अपने यहां दाखिल ही नहीं होने दिया है। यह नहीं कहा जा सकता कि इस वज़ह से उनके जीवन में रस या भरापूरापन कुछ कम है। अगर है भी तो उन्हें यह अभाव परेशान नहीं करता। जिस नई गोदामियत में इन दिनों हम बहुत मुदित मन से रहते-विचरते हैं उसमें चीजों का ऐसा अटाला हम जोड़ते-सहेजते रहते हैं कि पुस्तकों के लिए न तो जरूरत बचती है, न जगह। इसका जरा भी अहसास पढ़े-लिखों तक को नहीं रह गया है कि हमें ज्ञान, दिलासा, राहत देने, व्यक्ति-समय-समाज को समझाने, दूसरों से साक्षात् करने का जरूरी काम पुस्तकें और साहित्य करते हैं।

एक रुख यह हो सकता है कि जिस चीज के लिए जगह इतनी कम है उसका उत्पादन इतना गैर-आनुपातिक रूप से अधिक क्यों? बाजार में जिस चीज की अधिक खपत नहीं वह अपने आप गायब हो जाती है। लेकिन पुस्तकें उत्पाद तो हैं पर वही नहीं हैं। लेखक लोगों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए नहीं लिखता है। वह बन जाये इसकी आकांक्षा शायद करता है पर अगर न बने तो वह लिखना बंद नहीं कर देगा। वह लिखता है क्योंकि उसे अपनी, अपने समय और समाज की, मानवीय स्थिति और विडंबना की गवाही देना है। उसे भाषा की विपुलता और सूक्ष्मता को, उसकी संभावना को बचाना है। वह लिखता है क्योंकि उसके पास दूसरों से साझा करने को कुछ और उसके लिए उत्साह है। वह अकसर निराश होता है, अकेला पड़ जाता है पर लिखने की अपनी दीवानगी से अपने को मुक्त नहीं करता।

पुस्तकों को अगर हम जगह नहीं दे पाते तो यह हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम कुछ अधिक मानवीय नहीं होना चाहते, न कुछ अधिक देखना-महसूस करना चाहते हैं तो यह हमारा निर्णय है। कई बार जिसे आज जगह नहीं मिलती उसे अच्छी-खासी बाद में मिलती है।

कोराना एकान्त में मंसूर का साथ

एकान्त है और मल्लिकार्जुन मंसूर को हम लगातार सुन रहे हैं। लगता है कि एकान्त ही गा रहा है, सामुदायिकता को याद करते हुए, उसे विकल पुकारते हुए। यह संगीत पलायन या विराग का संगीत नहीं है, तब भी जबकि राग का नाम कबीरी भैरव है। यह संग-साथ का संगीत है। यह एकान्त को अनुपस्थित सामुदायिकता से, समय को अलक्षित अनन्त से, अतीत को वर्तमान से जोडऩे-मिलाने वाला संगीत है। इसमें अमूर्तन आकार ले रहा है। (बाकी पेज 8 पर)

यह संगीत अमूर्तन का घर है और उसका पड़ोस भी। फिर भी यह पुकारता संगीत है- विकलता, विक्षोभ, लालित्य, सुघर स्थापत्य से गूजता संगीत। यह संगीत है और संगीतातीत घटना भी है।

विस्मय और रहस्य की दो धाराओं के बीच निश्छल पर कलकल बहता हुआ। उसे कहीं जाना नहीं है। वह अविराम है पर कहीं भी कभी भी रुक सकता है। उसका प्रवाह उच्छल है। उसका जल कई रंग लेता हुआ नीरंग हो जाता है। उसमें निर्मल स्वच्छता, निष्कलुष उज्ज्वलता, चमकता आवेग है। वह कहीं से आया नहीं है और न ही कहीं जा रहा है। वह यहीं का संगीत है, हमें घेरता-लपेटता, दुलारता-सहलाता। उसके आवर्तन, जो अविराम और अबाध लगते हैं, एक के बाद एक आते जाते हैं और बिना किसी आडम्बर या नाटकीयता के, सहज भाव से, अपने को एक दूसरे से गूंथते चलते हैं और राग रूपायित होता चलता है। थोड़ी देर में आप राग को भूल जाते हैं, जो आपके सामने अवतार ले रहा होता है वह कोई देवता या ईश्वर नहीं स्वयं मल्लिकार्जुन मंसूर हैं-अप्रतिहत, अक्षय, समय में अवस्थित होकर भी कालातीत। फिर लगता है कि मंसूर कोई राग नहीं स्वयं अपने को गा रहे हैं। जिसका यह भी अर्थ है कि बचता है शुद्ध संगीत, राग-बन्धन से भी मुक्त, समय को स्थगित करता हुआ, कई बार उसे रौंदता हुआ।

कल रात दो बजे के बाद से नींद नहीं आई सो बैठकर पढ़ता रहा। सुबह पौने पांच बजे खिडक़ी से पहली चिडिय़ा का स्वर सुनाई दिया। एक बेचैन रात के समाप्त होने और मंगल प्रभात का अग्रदूत। मंसूर का संगीत ऐसा ही मंगल प्रभात है। पन्तजी की कविता याद करते हुए पूछने का मन होता है प्रथम स्वर का आना, मंसूर जी, आपने कैसे पहचाना? रूमानी होते हुए भी इस संगीत में महाकाव्य जैसा वितान है-वह सारे संसार को अपने में संक्षिप्त कर लेता है। मंसूर अपनी अकेली आवाज में सारे संसार का गुणगान करते हैं। यह उनका भर नहीं, संसार का गान है। कोराना एकान्त में मन कृतज्ञता से भर उठता है कि इस निपट एकान्त में हमें संसार का संगीत मंसूर के माध्यम से सुन पाने का वरदान मिल रहा है। (सत्याग्रह)


Date : 30-Mar-2020

प्रो. बद्रीनारायण, समाज शास्त्री

किसी भी महामारी की सबसे बड़ी मार हाशिए पर मौजूद गऱीब तबका सहता है। लेकिन लोग इसी असहाय वर्ग को इसके फैलने की वजह मानते हैं।

आम तौर पर अमीर और मध्य वर्ग का मानना यह रहता है कि महामारियां गऱीबों के कंधों से होकर पैर पसारती हैं। लेकिन, अगर इतिहास पर नजऱ डालें तो पता चलता है कि महामारियां अभिजात्य और उच्च तबके के हाथों ही मध्य वर्ग और फिर गऱीबों तक पहुंचती हैं। मैं इलाहाबाद के पास एक गांव में रहने वाले एक उम्रदराज़ शख्स से फ़ोन पर बातें कर रहा था।

बात कोरोना और उससे बचने की हिदायतों से जुड़ी हुई थी। बात के बीच में उन्होंने मुझसे पूछा, कोई भी महामारी गऱीबों के कंधों पर चढक़र आती है या अमीरों के।

यह मेरे लिए एक यक्ष प्रश्न की तरह था। शहरी मध्य वर्ग के किसी भी आदमी से अगर आप यह सवाल करें तो वह तुरंत बोलेगा, ये झुग्गी-झोपड़ी वाले, मज़दूर, स्लम में रहने वाले लोग गंदे ढंग से रहते हैं और गंदगी फैलाते हैं। इन्हीं गंदगियों से महामारियां फैलती हैं।

क्या हैं इतिहास के सबक?

अगर दुनिया में अब तक आई महामारियों के अनुभवों को खंगालें तो हमें चौंकाने वाला जवाब मिलता है। चाहे सन् 165 से 180 के मध्य फैला एन्टोनाइन प्लेग हो या 1520 के आसपास दुनिया भर में फैला चेचक (स्मॉल पॉक्स) या पीला बुखार (येलो फीवर), रसियन फ्लू, एशियन फ्लू, कॉलरा, 1817 के दौरान फैला इंडियन प्लेग हो, सभी के फैलने के रूट की मैपिंग करें तो साफ़ जाहिर होता है कि इन सभी महामारियों का पहला कैरियर अमीर वर्ग के कुछ लोग या अमीर वर्ग में एंट्री करने की जद्दोजहद करता मध्य वर्ग का एक तबका ही रहा है।

कौन सा तबका है जि़म्मेदार?

ये सभी महामारियां दुनिया भर में प्राय: दुनिया की खोज में लगे कुछ नाविकों, कई व्यापारियों, कुछ समुद्री जहाज के चालकों एवं उसमें कार्यरत लोगों, युद्ध में जाने और युद्ध से आने वाले सैनिकों, पर्यटकों के एक तबके तथा उपनिवेशवाद के प्रसार के समय औपनिवेशिक शक्तिशाली देशों की व्यापारिक कंपनियों के आधिकारियों एवं कर्मचारियों या औपनिवेशिक शासन के अभिजात्य अफसरों के कंधों पर चढक़र एक देश से दूसरे देशों में फैलती रही हैं। फिर उन देशों और समाजों के कम गतिशील मध्य वर्ग इनके माध्यम से एक निष्क्रिय निर्दोष ग्रहणकर्ता के रूप में इन महामारियों का शिकार होकर उन्हें निम्न वर्ग एवं समाज के अन्य तबकों तक फैलने का कारण बनता रहा है।

अभिजात्य वर्ग और विदेश में आवाजाही करने वालों ने फैलाया कोरोना

अभी जिस कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए आज दुनिया का हर देश संघर्ष कर रहा है, उसने भी कुछ पर्यटकों, दुनियाभर के मुल्कों में हवाई यात्रा करने की क्षमता रखने वालों के एक समूह, विदेशों में कार्यरत लोगों का तबका, ग्लोबल रूप से स्वीकृत गायकों, कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाडिय़ों और कुछ बड़े नौकरशाहों, पांच सितारा होटलों में पार्टी आयोजित करने की शक्ति रखने वालों का एक तबका, ग्रीस, स्विट्जरलैंड और फ्रांस में हनीमून मनाने वालों मे से कुछ के देह में प्रवेश कर हमारे समाजों में फैलने का अवसर प्राप्त किया है।

बातचीत के बीच हमारे एक मित्र ने कहा, भाई! यह कोरोना भी गजब बीमारी है, यह हवाई जहाज पर चलता है, बड़े होटलों में ठहरता है। यह भूमण्डलीकरण और नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक फायदा उठाने वाले ग्लोबल हुए कुछ लोगों के साथ हमारे देश में पांव पसारता गया है। इनसे ट्रैक्सी ड्राइवर, होटलों के बेटर, दुकानदारों, सैलूनवालों एवं देश के भीतर एक शहर से दूसरे शहर में कमाने गए लोगों को शिकार बना रहा है। अगर निरपेक्ष ढंग से देखें तो विभिन्न समाजों के प्रभावशाली तबके के कुछ लोगों की गति के साथ यह कोरोना महामारी गरीब वर्ग तक पहुँच रहा है।

हमारे समाजों का गरीब समुदाय, बिहार एवं उत्तर प्रदेश से मुंबई, पुणे, दिल्ली जाकर काम करने वाले खुले में झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले प्रवासी मजदूर इसके प्रथम वाहक नहीं रहे हैं।

गरीब नहीं होते वायरस के प्रथम कैरियर

जिनकी जिंदगी में हम गंदगियां देखते हैं, जिन्हें हम गंदगियों और बीमारियों के प्रसार का कारण मानते हैं, वे इस बीमारी के प्रथम कैरियर नहीं हैं।

दुनिया भर में महामारियों के प्रसार के ये अनुभव हमें अपने कॉमन सेन्स में एक जरूरी परिवर्तन की मांग करते हैं। गरीबी एवं बीमारी के प्रसार की आम अवधारणा को हमें अपने दिल और दिमाग से निकालना ही होगा। नहीं तो हमारे महानगरों और मेट्रो का अभिजात्य वर्ग इन मजदूरों, गरीबों, झुग्गी-झोपड़ी वालों को उपेक्षा की नजरों से ही देखता रहेगा।

यह विदित तथ्य है कि कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए हुए लॉकडाउन का सबसे ज्यादा खामियाजा वह दिहाड़ी मजदूर, इनफॉर्मल सेक्टर में काम करने वाला श्रमिक, गांव का किसान उठा रहा है, जो इन महामारियों का कहीं से कारण नहीं रहा है।

हालांकि, यह सुखद है कि हमारी राजसत्ता एवं सरकार आज उनकी समस्याओं के प्रति संवेदित हो कोरोना कवर के तहत इन संवर्गों को ध्यान में रख अनेक योजनाएँ लागू की हैं।

ऐसी ही संवेदनशीलता एवं यर्थाथ नजरिए से हमें महामारियों के प्रसार की गतिकी को समझना होगा। (बीबीसी)


Date : 30-Mar-2020

कुमार हर्ष, गोरखपुर से

मन बहुत दु:खी है। जहां रहता हूँ वहां से बमुश्किल 100 मीटर दूरी पर बस स्टेशन है। इस नीरव समय में कल आधी रात से जोर जोर की आवाज़ें शुरू हुई जो लगभग 20 घण्टे बाद अभी तक जारी है। बीच बीच में माइक पर गूंजती आवाज़ें भी है।

महराजगंज वाले 7041 पर बैठ जाएं। 8252 पडरौना जा रही है तुरन्त बैठिए। ऐसी ही कई उद्घोषणाएं। पुलिस लगातार मौजूद है। लाइन लगवाती। भीड़ भीतर की बजाय पहले छत पर जाती है। दिन में कुछ लोग, मेरे कुछ दोस्त भी खाने का सामान लेकर गए थे।

दिन भर आवाजें बेचैन करती रहीं। मन नही माना तो अभी थोड़ी देर पहले वहां गया। मैंने विभाजन की तस्वीरें सिर्फ फिल्मों में देखी है। ये दृश्य वैसे ही लगते हैं। इसमें आदमी भी है, औरते और बच्चे भी। साथ में बोरे, झोले, पेंट के बड़े डिब्बों में सिमटी गृहस्थी है। बस किसी तरह घर पहुंचना है बस।

टीवी से लेकर सोशल मीडिया में आरोपों की भरमार है। चीन को गालियां देते लोग अब केजरीवाल को गरिया रहे हैं। उनकी राय में सब किया धरा उन्हीं का है। पहले अपनी खांसी दुनिया को दे दी और अब अपनी मुसीबत भी टरका दी।

कुछ अलग लोग भी है जो 2014 से एक ही बात कह रहे। जैसे भजनों में एक टेक होती है। अखण्ड पाठ में जैसे सम्पुट होता है वैसे ही उनके टेक और सम्पुट है जिसमें एक नाम ही रहता है।

कुछ इन मजदूरों या प्रवासियों को ही विलेन बता रहे हैं। कह रहे है कि सालों ने हमारे संयम को पलीता लगा दिया। अब जिंदा बम की तरह घूम रहे हैं। इन आवाजों को सुनने पर गुस्सा आ रहा है। कोई नहीं सोच रहा है कि मुसीबत में हर कोई घर ही भागना चाहता है। सुरक्षित इलाकों में रह रहे लोग अखबार तक तो ले नहीं रहे और मौत के मुहाने पर बेघर खड़े इन विपन्न लोगों को मरने से पहले अपनों के बीच तक पहुंच जाने को अपराध बताते हैं।

ये सोचकर ही डर लगता है कि कैंसर पीडि़त वो आदमी बीबी बच्चों के साथ दिल्ली से सिद्धार्थनगर क्यों भागा। वो भी मोपेड से। मौत तो तय ही थी पर उससे पहले वो परिवार को महफूज कर देना चाहता था। पर रास्ते में ही मर गया। आप गाली बकते रहिए।

कल देर रात एक मित्र पुलिस अधिकारी का फोन आया। सुबह से रात 10 बजे तक हजारों की भीड़ को बसों में बिठाते वर्दी भी भीग गयी थी और उनका स्वर भी। बेबस जिंदगी की न जाने कितनी किताबें पढ़ ली थी उन्होंने।

सबसे अरज है। यह वक्त कठिन है। आरोप प्रत्यारोप का नहीं। आप जैसा सोचते हैं दुनिया वैसी ही दिखने लगती है। बहुत निगेटिविटी आपको ही चोट पहुंचाएगी। प्रार्थना कीजिये कि यह संकट जल्दी से जल्दी टले। मुसीबतजदा लोगों के लिए कुछ कर सकें तो कीजिये। न कर सकें तो अपने परिजनों को ही खुशी दीजिये।

यह वक्त भी गुजर जाएगा।

(मीडिया/स्वराज)


Date : 29-Mar-2020

अपूर्वानंद

कृतज्ञता के साथ जब अपनी लाचारी का एहसास जुड़ जाए तो मनुष्य उससे मुक्त होना चाहता है। एक समुदाय ही रहम, कृपा, राहत का पात्र बनता रहे यह वह कबूल नहीं कर सकता। वह बराबरी हासिल करना चाहता है।

अभी कुछ रोज पहले जब सरकारी आह्वान पर राष्ट्रीय कृतज्ञता का कोलाहल सुना तो एक कविता याद हो आई।

हम भारतीय हैं

धन्यवाद, धन्यवाद, क्षमा कीजिएगा, नहीं कहते हैं

हम सिर्फ देखते हैं अपनी आंखों से

और ले लेते हैं पानी भरा गिलास

फिर से उधर एक बार देख कर।

रघुवीर सहाय की ‘भारतीय’ शीर्षक यह कविता जाने कब से मन में अटकी रह गई है। आज जब कृतज्ञता के भाव पर विचार कर रहा हूं, यह उभर आई है।

इस कविता को जब पढ़ा था तब समझ में आया कि हमारे लिए धन्यवाद कहना क्यों दुष्कर हुआ करता था। कवि भारतीयता के इस लक्षण या गुण की प्रशंसा कर रहा है या उसे अपनी न्यूनता बताकर व्यंग्य कर रहा है, कहना कठिन है। लेकिन जो कह रहा है वह उसे हम अपने रोजाना के आचरण से जानते हैं कि सच है। पानी का गिलास लेकर दोबारा उस ओर देख भर लेना ही धन्यवाद का पर्याय है। सिर्फ अपनी आंखों से देखना और पानी का गिलास लेकर फिर से एक बार उधर देखा लेना ही कृतज्ञता ज्ञापन है।

धन्यवाद दिया जाता है या किया जाता है? इसे लेकर बोलने वालों में हमेशा दुविधा देखी जाती है। इसलिए शुद्ध हिंदी में उसे ज्ञापित कर दिया जाता है।

धन्यवाद ज्ञापन के लिए आयोजन करना पड़ता है। धन्यवाद हमेशा ही कृत्रिम जान पड़ता था, ऐसा जो बहुत औपचारिक है। बल्कि कहने वाले और जिसे संबोधित किया जा रहा हो, उनके बीच एक दूरी का आभास देने वाला।

धन्यवाद कहने में मानो जीभ को श्रम करना होता है और झेंप-सी होती है। हिंदी क्षेत्र की ही भाषा जो उसकी बहन मानी जाती है, यानी उर्दू उसमें शुक्रिया बोलना उतना संकोच का विषय नहीं।

शुक्रिया कहें या ‘बड़ी मेहरबानी’ या सिर्फ ‘मेहरबानी’, शब्द सहजता से जुबान पर चढ़ते हैं। ऐसा क्यों?

हिंदी और उर्दू विभाग अगल-बगल हैं, लेकिन दोनों के शिष्टाचार में फर्क है। शुक्रिया, मेहरबानी ये शब्द अक्सर एक जगह आपके कानों में पड़ेंगे लेकिन धन्यवाद अपवादस्वरूप ही।

वैसे शुक्रिया भी हिंदी का शब्द है। हिंदी वाले मानेंगे कि वह अधिक स्वाभाविक भी लगता है। धीरे-धीरे हिंदी के औपचारिक शिक्षण में जिस तरह का बाहरी-भीतरी का भेद गहरा हुआ है, उसके चलते हो सकता है उसे कई हिंदी भाषी अपना न मानें।

हिंदी में धन्यवाद को लेकर इस संकोच को लेकर मैंने अपनी मलयालम भाषी मित्र देविका से बात की तो उन्होंने स्वीकार किया कि मलयालम में भी इसके लिए जो शब्द है, वह बनाया हुआ है- नंदी।

यह भी औपचारिक है रोजाना शायद ही इस्तेमाल होता हो। दूसरा प्रयोग है, वलिया उपकार। यह बड़ी मेहरबानी  का ही समतुल्य है।

मलयालम की करीबी भाषा तमिल में यह शब्द है नंद्री। सत्या शिवरमन ने कहा कि यह भी मनुष्य समाज के धीरे धीरे परिष्कृत होने के क्रम में ही विकसित हुआ है।

भारतीय स्वभाव में यह जो संकोच है उसे तोड़ देता है थैंक्स या थैंक यू। जिनसे धन्यवाद बोला नहीं जाता, वे थैंक्स धड़ल्ले से बोलते हैं।

कृतज्ञता को लेकर भारतीय संकोच की व्याख्या कैसे करें? क्या इस तरह कि हम मानते हैं कि हर किसी का काम बंधा है, वह दैवी विधान है।

सामाजिक हैसियत में जो नीचे की सीढ़ी पर है, वह अपना कर्तव्य कर रहा है। उसके लिए कृतज्ञता क्यों? एक हलवाहे को या बेगार खटने वाले को कब धन्यवाद की एक निगाह भी मिली?

ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव के अलावा शायद हम सिर्फ डॉक्टरों के प्रति ही कृतज्ञ होते रहे हैं। लेकिन जब अस्पताल पैसा न होने के कारण या डॉक्टर किसी और घृणा के चलते इलाज न करे तो इस पेशे के प्रति कृतज्ञता बिना शर्त कैसे हो?

बाहर से आने वालों को भारतीयों के इस व्यवहार से धक्का लगता है और इसका आदी होने में उन्हें समय लग जाता है।

बस या ट्रेन में किसी को बैठने के लिए जगह देने पर बिना कुछ कहे उसे स्वीकार कर लेना या दुकान में सामान लेने पर दुकानदार का बिना अनुरोध के सीधे पैसे तलब करना, इन चीजों को विदेशी नोट करते हैं। लेकिन फिर उनमें से कुछ यह मानते हैं कि इन औपचारिकताओं के अभाव से यह नहीं मानना चाहिए कि भारतीयों में धन्यवाद या कृतज्ञता का भाव है ही नहीं।

प्रत्येक प्रकार के भारतीयों में भी संसार के अन्य लोगों की तरह ही यह रिवाज रहा है कि भोजन आरंभ करने के पहले ईश्वर को धन्यवाद दें। भोजन मंत्र प्रत्येक धर्म में हैं।

भोजन के लिए ईश्वर को क्यों शुक्रिया अदा करें, यह सवाल रघुवीर सहाय का है। वह तो अनावश्यक ही श्रेय लेने आ जाता है।

भोजन क्या है, उसका रस या महत्त्व क्या है, यह मनुष्य के अलावा कौन जानता है? अगर ऐसा न था तो वह उसके लिए कृतज्ञ ही क्यों होता?

‘अन्न का रस’ शीर्षक कविता का अलग से अर्थ करने की जरूरत ही नहीं-

खाने के पहले कृतज्ञ होता हूं मैं

खाने के बाद भी

कहां आ जाते हो श्रेय लेने को

हर बार

ईश्वर

क्या तुम नहीं जानते

कि अन्न जो तुमने उगाया है

उसमें एक रस है

जो मैं ही जानता हूं?

विधाता के प्रति इस जीवन के लिए और उसमें अन्न, जल, वायु और दूसरे वरदानों के लिए कृतज्ञ होने की परंपरा लेकिन प्रत्येक संस्कृति में है। लेकिन खाना मिलना क्या सिर्फ ईश्वर की कृपा पर निर्भर है? सबका खाना क्या एक जैसा है?

कोरोना वायरस के वक्त जिसका काम छूट गया और जो सडक़ पर भटक रहा है, उसे सरकारें या हमदर्द शहरी जो खाना दे रहे हैं उसके लिए वह किसे धन्यवाद दे?

जो हिंसा में बेघर होकर राहत शिविरों में हैं, उनके लिए जब खाना राहत के तौर पर आता है तो उसे कबूल करते वक्त वे किसे शुक्रिया अदा करें?

‘खाने से पहले’ बहुत छोटी कविता है लेकिन शायद ऐसे ही अवसरों के लिए है-

सामने थाली को देखकर

पहले मैं ईश्वर को धन्यवाद करता था

आज मुझे अपमान याद आता है।

यह जो अपमान है, वह खाने या भोजन के एक असाधारण घटना में बदल जाने और अपने जैसे ही किसी और की मेहरबानी के एहसास से जुड़ा हुआ है। (बाकी पेज 8 पर)

ऐसे किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े जिसका आपसे कोई रिश्ता नहीं आपके और उसके बीच एक गैर-बराबरी का रिश्ता बना देती है।

वह साधारण भोजन नहीं, राहत है। ऐसी राहत लेते हुए अपनी कमतरी का एहसास होता है। जो देता है, वह क्या इस अपमान या संकोच को वैसे ही समझ पाता है?

अविनाश पिछले एक महीने से भटक रहे हैं भजनपुरा, कोंडा, खजूरी, मुस्तफाबाद, चमन पार्क, शिव विहार की गलियों में। कल उन्होंने एक कारखाना मालिक के बारे में बताया जिनका सब कुछ फरवरी की हिंसा में खाक हो गया।

अब वे लोनी में अपने परिवार के कई सदस्यों के साथ एक कमरे में सिर छुपाए हुए हैं। यह जगह जहां उन्हें पनाह मिली है, वह उनकी हैसियत के लोगों के लिए नहीं।

यहां उनके कामगार और मजदूर रहते हैं। उनके बीच रहने में जिंदा बचे रहने और सुरक्षित रहने का आश्वासन तो है, लेकिन यह कहते-कहते वे रो पड़े।

वे जरूर कृतज्ञ हैं उनके जिनके कारण वे इस खोली में भी रह पा रहे हैं, लेकिन इसमें उस अपमान का दंश है जो रघुवीर सहाय की कविता में है।

अविनाश जब यह बता रहे थे मुझे 1984 में पटना के तख्त श्री हरमंदिर साहब की याद हो आई। पटना भर के सिखों का आश्रयस्थल आखिरकार यही गुरुद्वारा रह गया था। हम पटनावासी अपने ही हमशहरों से मिलने उस जगह गए, जो था तो तीर्थस्थल लेकिन इस बार हम तीर्थयात्रियों की तरह वहां नहीं गए थे।

हमारे पास थी शर्म सहानुभूति के साथ। वहां मैंने उन सरदारजी को देखा जो पटना मेडिकल कॉलेज के राजेन्द्र सर्जिकल वार्ड की कैंटीन चलाते थे।

कल तक जो अपनी बारी आने पर ही समोसे और चाय देते थे, आज इस अवस्था में हमें देखकर उन्होंने आंखें झुका लीं। उन्होंने जीवन में कभी न सोचा होगा कि इस तरह वे किसी का एहसान लेने को मजबूर हो जाएंगे।

कृतज्ञता के लिए देने और लेने का रिश्ता होना चाहिए। एक जिसके कुछ करने से दूसरे के जीवन में किसी भी तरह की, बड़ी या छोटी, बेहतरी आ रही हो।

इस रिश्ते में एक कृतज्ञता का अधिकारी है और दूसरा एहसानमंद बने रहने के लिए अभिशप्त है। उन दोनों के बीच इस रिश्ते के बदलते रहने की या इसके दोतरफा होने की जरूरत है।

अगर ऐसा न हो पाए तो मान लेना चाहिए कि नाइंसाफी ही इस तरह के जीवन का नियम है।

कोरोना वायरस का एक परिणाम दुर्भिक्ष (अकाल) भी हो सकता है। खुद को अपने घरों में बंद करके जिन्हें सडक़ पर भटकते रहने के लिए हमने छोड़ दिया है, वे संभव है भूख से मारे जाएं।

यह जो दुर्भिक्ष सामने मुंह बाए खड़ा है, इसमें कृतज्ञता जैसे मानवीय भाव की क्या जगह होगी?

यह जो एक झटके से जीवन से बाहर कर दिए जाने का सदमा है, वह क्यों एक खास तरह की आबादी के हिस्से ही क्यों हो?

इस दुर्भिक्ष में जो न तो हवा के पहले से हल्के हो जाने का एहसास कर पाएं, न जिन्हें मोर के बोलने का आनंद अपने कमरे के भीतर से मिल पाए क्योंकि वे शहरबदर कर दिए गए हैं, वे किनके प्रति एहसानमंद हों?

अगर उन्हें रास्ते में कुछ भलेमानस खाना खिलाएं तो वे उनके प्रति किस हद कृतज्ञ हों? और कैसे?

रघुवीर सहाय की ‘दुर्भिक्ष’ शीर्षक कविता इस समान रिश्ते को एक निजी प्रकरण के माध्यम से व्यक्त करती है-

वह आया और चबूतरे पर खड़ा हुआ

जंगले को खटखटा कर उसने बुलाया

और अपना बरतन वाला हाथ उठाया

मैंने कहा अरे, और फिर सकता खा गया

वह मुझसे कुछ बड़ा था उसी स्कूल में था

कुछ बरस पहले यह सुना था कि

कहीं चला गया था।

उस स्कूली मित्र को देखकर पहला ख्याल यह आया,

कि मुझे शर्म लगती है

और इसे लगेगी पहचाने जाने पर

ऐसा लेकिन होता नहीं। वह मित्र वाचक को पहचानता है और नि:संकोच कहता है,

जाओ कुछ ला दो न देने और लेने का यह एक नया रिश्ता इन दोनों के बीच बना है, वह कैसा है?

मैं बैठक में लौटा

दो रोटी लाया था, भीतर बुलाकर परस दिया

उसने उठाया वह परोसा और रख लिया बूढ़े बाप के लिए

और वह चला गया आदर से झुक प्रणाम करके जो हाल में सीखा था

यह कृतज्ञता ज्ञापन देने वाले को असहज कर देती है, लेकिन तभी जब वह इस असमान रिश्ते को स्वाभाविक न माने। अगली पंक्ति मारक है,

जाते वक्त हमको धकेल कर छोड़ गया जहां हम पहले थे। जब कृतज्ञता का भाव गैर-बराबरी और नाइंसाफी की स्थिति से जुड़ा हो तो हिंसा पैदा होती है। अक्सर लोग यह शिकायत करते मिलते हैं कि जिसकी भलाई करो, वह पहला मौका मिलते ही पीठ में छुरा घोंप देता है।

कृतज्ञ लोग हैं लेकिन कृतघ्न भी हैं। कृतज्ञता के साथ जब अपनी लाचारी का एहसास जुड़ जाए तो मनुष्य उससे मुक्त होना चाहता है। एक समुदाय ही रहम, कृपा, राहत का पात्र बनता रहे यह वह कबूल नहीं कर सकता। वह बराबरी हासिल करना चाहता है। कृतज्ञता पर यह बातचीत शायद रास्ता भटक गई है। लेकिन उसमें हर्ज ही क्या है?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं।) (द वायर)


Date : 29-Mar-2020

जितेन्द्र पारख

नेटफ्लिक्स और अमेजन की सीरीज़ के बारे में चर्चा करने, सोशल मीडिया में नए नए मीम देखने के बीच जब सोशल मीडिया में एक 17 साल का लडक़ा आता है जो रो-रो कर बताता है कि घर जाने के लिए पैसे नहीं हैं, एक आदमी आता है जिसके पास फोन नहीं है और कैसे भी करके बस बिहार पहुँचना है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि क्या किया जाए।

बहुत गुस्सा भी आता है और दु:ख भी होता है। मौत के डर से इंसान घर में है, मीलों चलने को तैयार है। दो वक्त का अनाज मिलते रहे  इसके लिए हरसंभव कोशिश कर रहा है। इंसान हताश है, बेबस है। कल तक इंसान प्रकृति के सामने  शक्ति प्रदर्शन करते थक नहीं रहा था और आज पूरा विश्व एक सूक्ष्म वायरस के आगे बेबस नजर आ रहा है।

चीन से उपजा यह वायरस अब ब्रिटेन, अमेरीका, जापान, दक्षिण कोरिया, फि़लीपींस, थाईलैंड, भारत, ईरान, नेपाल और पाकिस्तान जैसे 168 देशों तक पहुंच चुका है। दुनिया का सबसे ताकतवर देश और सुपरपावर माना जाने वाला अमेरिका भी कोरोना का इलाज नहीं ढूंढ पाया। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अपने हुनर का लोहा मनवाने और  2020 तक आकाश में इलुमिनेशन सेटेलाइट नाम से उपग्रह भेजनेवाला चीन, स्वास्थ्य के लिए नए नए इक्विपमेंट्स बनाने वाला इटली भी आज इस कोरोना वायरस से जूझ रहा है।

ऐसा नहीं है कि महामारी जैसी स्थिति विश्व में पहली बार हुई है लेकिन जिस आधुनिक और प्रौद्योगिकी युग में हम जी रहे है उसमें इतनी बेबसी और खौफ बेशक नई बात है। आज से 102 साल पहले यानि 1918 में स्पैनिस फ्लू हुआ था, जिसमें दुनिया भर के 5 करोड़ लोगों की जान गई थी। इसके अलावा 1957 में एशियाई फ्लू में लगभग 11 लाख लोगों की जान गई थी। जबकि 2009 में स्वाइन फ्लू से आप परिचित होंगे ही, इसमें भी करीब 2 लाख लोगों की जानें गईं थी लेकिन हर घटना के बाद तमाम दावे किए जाते थे इन्हें रोकने के लिए और देखिये सब धरे के धरे रह गए।

इस महामारी से स्थिति इतनी भयवाह हो गई है कि इटली में कोविड 19 के कारण मरने वाले कई लोगों के पास आखरी वक्त में उनके परिवार का कोई सदस्य या कोई मित्र नहीं था। स्पेन में इंसान को दफनाने के लिए कब्रिस्तान छोटे पड़ गए है। भारत में दुकानों में ताले लग गए, सडक़े वीरान हो गई है।इन सारे परिणामों के जिम्मेदार बहुत हद तक हम ही है। हम लोग बार बार भूल जाते है कि इस पूरे संसार में हमारे अलावा भी बहुत जीव जंतु रहते है। हम भूल जाते है की हमारे जैसे प्रकृति के हर जीव का जीवनशैली है। लेकिन हमें फुर्सत नहीं थी नदी में ईमारत खड़ी करने और पहाड़ो में प्लांट लगाने से।

भारत की बात करे तो समय-चक्र को जरा सा पीछे ले चलें तो ये देख पाएंगे कि किस प्रकार केदारनाथ-त्रासदी के रूप में प्रकृति ने अपना विकराल रूप दिखाया और हजारों लोग पलक-झपकते ही काल के गाल में समां गए। प्रकृति का एक अन्य रूप सामने आया जब सुनामी ने भारत सहित अन्य एशियाई देशों में मौत का तांडव किया था। लाखों लोगों का आशियाना उजड़ गया, लाखों मरे, हजारों लोगों को अपना ठिकाना बदलना पड़ा। इससे पहले शायद ही मौत का ये मंजर देखा हो दुनिया ने।

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी पूरी मानव जाति के लिए खतरा पैदा कर रही है। कोरोना का तांडव थमता नहीं दिख रहा है। घर में रहने से शायद इस वायरस से बच जाए लेकिन अगर इस दुनिया में आगे अच्छे से रहना है तो प्रकृति के नियमों के साथ जीना सीखना होगा। शायद दुनिया कोरोना से बच जाए लेकिन हमारी इंसानी फितरत और लालच से प्रकृति बचेगी की नहीं पता नहीं।


Date : 29-Mar-2020

 

 

 

 

तारन प्रकाश सिन्हा

जब युद्ध की परिस्थितियां हों

तब हल के फालों को गलाकर

तलवारें ढाल लेनी चाहिए।

देश इस समय यही कर रहा है।

ऑटो मोबाइल सेक्टर की नामवर कंपनी महिंद्रा और महिंद्रा अब वैंटिलेटर्स के निर्माण के लिए आगे आ रही है और खबरों के मुताबिक वह चार-पांच लाख रुपए के वैंटिलेटर्स साढ़े 7 हजार रुपए से भी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की तैयारी में है।

भारत में कोरोना वायरस को बड़ा खतरा इसलिए भी माना जा रहा था क्योंकि यहां संक्रमितों की संभावित संख्या की तुलना में वेंटिलेटर्स की संख्या बहुत कम है। महिंद्रा की पेशकश ने इस खतरे को न केवल कम कर दिया, बल्कि इस युद्ध को भी आसान कर दिया है।

अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए पलंग से लेकर सैनेटाइजर जैसे सामान कम न पड़े, इसके लिए रेलवे ने भी कमर कस रखी है। रेलवे ने अपने कई प्रोडक्शन इकाइयों को मेडिकल संबंधी सामान बनाने का आदेश जारी कर रखा है। खबर यह भी है कि कई वातानुकूलित ट्रेनों को भी अस्पतालों में तब्दील करने के बारे में विचार किया जा रहा है, यह इनोवेटिव आइडिया रेलवे को आमलोगों से ही मिला था।

कोरोना से रक्षा के लिए जब सेनेटाइजर्स कम पडऩे लगे तब शराब का उत्पादन करने वाली डिस्टिलरियों ने सेनेटाइजर्स का उत्पादन शुरू कर दिया। मास्क की कमी को दूर करने के लिए गांव-गांव में स्व सहायता समूह की महिलाएं अपनी सिलाई मशीनें लेकर जुट गईं।

संक्रमितों की जांच के लिए जब महंगे विदेशी किटों की उपलब्धता रोड़ा बनी तब पुणे के माईलैब डिस्कवरी साल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की देसी संस्था ने सस्ता किट तैयार कर दिखाया। इससे मरीजों की जांच अब एक-डेढ़ हजार रुपए में भी हो सकेगी, जिस पर पहले चार-पांच हजार रुपए तक खर्च हो जाया करते थे। भारत की यह उपलब्धि भी किसी मंगल मिशन से कम नहीं है। इस तरह के उदाहरणों का लंबा सिलसिला है। हम वो लोग हैं जो पुडिय़ों के लिए गर्म हो रहे तेल से राकेट साइंस सीख लेने की योग्यता रखते हैं।

 


Date : 28-Mar-2020

अनुराग भारद्वाज

रूसी साहित्य के सबसे चमकते सितारे मैक्सिम गोर्की का अपने देश ही नहीं, विश्व में भी ऊंचा दर्जा है। वे रूस के निझ्नी नोवगरद शहर में जन्मे थे। पिता की मौत के बाद उनका बचपन मुफलिसी और रिश्तेदारों के तंज खाते हुए गुजरा में गुजरा। गोर्की ने चलते-फिरते ज्ञान हासिल किया और पैदल घूम-घूमकर समाज और दुनियादारी की समझ हासिल की। 1892 में ‘मकार चुद्रा’ पहला उपन्यास था जिस पर उन्होंने एम गोर्की के नाम से दस्तखत किये थे।
इससे पहले अलेक्सेई मक्सिमोविच पेश्कोव से गोर्की बनने तक उनका सफर कई ऊंचे नीचे-पडावों से गुजरा। ‘मेरा बचपन’, ‘लोगों के बीच’ और ‘मेरे विश्वविद्यालय’ उपन्यास मैक्सिम गोर्की की आत्मकथायें हैं और इनमें उन्होंने अपना जीवन खोलकर रख दिया। ‘मेरा बचपन’ में उन्होंने अपने पिता की मौत से किताब का पहला पन्ना लिखा। इससे जाहिर होता है कि अलेक्सेई को पिता से गहरा लगाव रहा होगा और मां से कुछ खौफ। वे लिखते हैं  ‘...नानी मां से डरती है। मैं भी तो मां से डरता था, इसलिए नानी के साथ अपनापन और गाढ़ा हो गया।’
पर गोर्की का सबसे यादगार उपन्यास ‘मां’ ही है जो रूस में जार शासन के समय के समाज का हाल दर्शाता है। रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की पत्नी नदेज्श्दा कोस्तैन्तिनोवा क्रुप्स्केया ने लेनिन की जीवनी में लिखा है कि वे (गोर्की) ‘मां’(उपन्यास) को बेहद पसंद करते थे। वहीं, लेनिन की बहन उल्यानोवा भी लिखती हैं कि गोर्की को इसे बार-बार पढऩा पसंद था। लेनिन ने भी इस किताब का जिक्र किया है। गोर्की ने लेनिन से हुए संवाद पर कुछ यूं लिखा; ‘बड़ी साफगोई से लेनिन ने अपनी चमकदार आंखों से मुझे देखते हुए इस किताब की खामियां गिनायीं। संभव है उन्होंने इसकी स्क्रिप्ट पढ़ी हो।’ जाहिर था यह उपन्यास उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना थी।
दरअसल, गोर्की को इसलिए पसंद किया जाता है कि जो उन्होंने लिखा, अपने जैसों पर ही लिखा। उनकी कहानियों के किरदार उनके आस-पास के ही लोग हैं। या कहें कि गोर्की उसी समाज के हैं जिस समाज पर उन्होंने लिखा। ‘मां’ की आलोचना में कई टिप्पणीकारों ने कहा कि उपन्यास में जिन पात्रों का जिक्र है, वैसे पात्र असल जिंदगी में नहीं होते।’ इस आलोचना के बाद उन्होंने खुलासा किया कि ये कहानी एक मई, 1902 को रूस के प्रांत सोर्मोवो के निझ्नी नोवगरद इलाके में हुए मजदूर आंदोलन से प्रभावित थी और इसके किरादर असल जिंदगी से ही उठाये हुए थे। मां, निलोव्ना और उसका बेटे पावेल के किरदार गोर्की के दूर की रिश्तेदार एक महिला एना किरिलोवना जलोमोवा और उसके बेटे प्योतोर जलोमोव से प्रभावित थे।
गोर्की ने इस उपन्यास में उस अवश्यंभावी टकराव को दिखाया है जो सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच हुआ था। जानकार यह भी कहते हैं कि उपन्यास में दिखाया गया काल वह है जब रूस में क्रांति आने वाली थी। पर कुछ लोग कहते हैं कि ‘मां’ रूस की क्रांति की तैयारी को दिखाता है उस काल को नहीं, यानी क्रांति से कुछ पहले वाला समय। जो भी हो, यह तय है कि गोर्की सरीखे लेखकों ने क्रांति की आहट सुन ली थी। पर आश्चर्य की बात यह है कि अगर किसी उपन्यास को रूसी क्रांति का जनक कहा जाता है तो वो अपटन सिंक्लैर का ‘जंगल’ है। जबकि ‘जंगल’ बाद में रचा गया है। ‘मां’ 1906-1907 के दरमियान लिखा गया और जबकि ‘जंगल’ 1904 में। जहां ‘मां’ एक रूसी समाज में संघर्ष की दास्तान है, ‘जंगल’ में अमेरिकी पूंजीवाद और सर्वहारा के टकराव का बयान है।
तो क्या हम मान सकते हैं कि पश्चिमी दुनिया ने रूसी क्रांति का सेहरा अमेरिकी लेखकों के सिर बांधकर कुछ रुसी लेखकों के साथ अन्याय किया है? यकीन से तो नहीं कहा जा सकता पर बात फिर यह भी है कि गोर्की को पांच बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया, पर यह सम्मान उन्हें एक बार भी नहीं मिला। वहीं रूस से भागकर अमेरिका चले गये अलेक्सेंडर जोलजेनितसिन को यह सम्मान दिया गया था। दोनों ही लेखकों को अपने काल में जेल हुई थी। गोर्की को जार शासन विरोधी कविता लिखने के लिए जेल में डाला गया तो जोलजेनितसिन को रूसी तानाशाह स्टालिन ने जेल भेजा।
गोर्की के साथ पश्चिम ने पहले भी बदसुलूकी की। अप्रैल 1906 में जेल से रिहा होने के बाद गोर्की और उनकी मित्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चंदा इक_ा करने और अपने पक्ष में हवा बांधने के लिए अमेरिका गए। शुरुआत में तो उनकी बड़ी आवभगत की गई पर बाद में दोनों के संबधों के चलते अमेरिकी समाज ने उनकी फजीहत की। हालात इस कदर बिगड़ गए कि दोनों को होटल से बाहर फिंकवा दिया गया। गोर्की इस अपमान को कभी भुला नहीं पाए।
स्टालिन ने गोर्की के साथ अलग बर्ताव किया। उसने इटली में निर्वासित गोर्की को ससम्मान घर यानी रूस वापसी का न्यौता भेजा और वादा किया कि उन्हें राष्ट्रकवि की हैसियत दी जायेगी। स्टालिन ने ऐसा किया भी। गोर्की को आर्डर ऑफ द लेनिन के सम्मान से नवाजा गया और उनके जन्मस्थान का नाम बदलकर ‘गोर्की’ रखा गया। जानकार कहते हैं कि यह स्टालिन की रणनीति थी जिसके तहत वह गोर्की जैसे लेखक के जरिये विश्व को नव साम्यवाद का चेहरा दिखाना चाहता था। गोर्की ने रूस आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया और कई ऐसे लेख लिखे जिनमें स्टालिन का गुणगान किया था।
गोर्की ने ऐसा क्यों किया, यह समझ से परे है क्योंकि रूसी क्रांति के कुछ समय बाद वे लेनिन के कट्टर आलोचक बन गए थे। इसी बात से यह विवाद खडा हुआ कि क्या गोर्की जीनियस थे या उनके इर्द-गिर्द जीनियस होने का आभामंडल गढ़ा गया? शायद यही दाग गोर्की के जीवन पर लगकर रह गया है जो मिटाया नहीं जा सकता। गोर्की की मौत भी संदेह के घेरे में हैं। कुछ लोगों का मानना है कि स्टालिन ने अपने विरोधियों के सफाए के लिए शुरू किये गए प्रोग्राम ‘दी ग्रेट पर्ज’ से पहले ही खुफिया पुलिस के हाथों उन्हें मरवा दिया था।
गोर्की की ज़्यादातर रचनाओं में सर्वहारा ही नायक है। उनकी कहानी ‘छब्बीस आदमी और एक लडकी’ एक लडकी और 26 मजदूरों की है जो उससे मन ही मन प्यार करते हैं। वह किसी से दिल नहीं लगाती पर उनसे बड़ी इज्जत से पेश आती है। एक दफा मजदूर एक सिपाही को उसका प्यार पाने को उकसाते हैं और वह सिपाही कामयाब हो जाता है। एकतरफा प्यार करने वाले मजदूर अपनी खीझ और भडास लडकी को तमाम गालियां तिरस्कार देकर निकालते हैं। कहानी में इंसान के टुच्चेपन के साथ-साथ दर्शन भी नजर आता है। वे लिखते हैं कि ‘प्यार भी घृणा से कम सताने वाला नहीं। शायद इसलिए कुछ चतुर आदमी मानते हैं कि घृणा प्यार की अपेक्षा अधिक प्रशंसनीय है।’ एक जगह वे लिखते हैं, ‘कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो जीवन में सर्वोत्तम और उच्चतम को आत्मा या जिस्म का एक प्रकार का रोग समझते हैं और जिसको साथ लेकर अपना सारा जीवन व्यतीत करते हैं।’ जहां तक गोर्की के काम की समालोचना का सवाल है तो कुछ जानकार कहते हैं कि गोर्की के जीवन और लेखन में विरोधाभास के साथ-साथ ‘क्लीशे’ नजर आता है। गोर्की के साहित्य को खंगालने वाले आर्मीन निगी कहते हैं कि वे दोस्तोय्विसकी की तरह क्लासिकल राइटर तो नहीं थे, पर विश्व साहित्य के पुरोधा कहे जा सकते हैं। प्रेमचंद गोर्की के मुरीद थे। गोर्की की मौत पर उन्होंने कहा था, ‘जब घर-घर शिक्षा का प्रचार हो जाएगा तो गोर्की तुलसी-सूर की तरह चारों ओर पूजे जायेंगे’। पर ऐसा नहीं हो पाया क्यूंकि जिस आदर्श समाजवाद की परिकल्पना गोर्की ने की उसके क्रूरतम रूप यानी साम्यवाद ने दुनिया को ही हिलाकर रख दिया और नतीजन उसका खात्मा हो गया।
पर पूंजीवाद ने भी सर्वहारा के दर्द को मिटाया नहीं बस एक ‘एंटीबायोटिक’ की तरह दबाकर रख छोडा। वह दर्द अब-जब भी कभी-कभी टीस बनकर उभरता है, तो कुछ ताकतें फिर उसे दबा देती हैं। शायद इसीलिए अब गोर्की नहीं पढे जाते हैं। (सत्याग्रह)

 


Date : 28-Mar-2020

तारन प्रकाश सिन्हा

देश में कोविड-19 से होने वाली प्रभावितों का आंकड़ा 700 से पार हो चुका है। हालात बहुत चिंताजनक हैं, लेकिन राहत की बात है कि अब नियंत्रण में हैं। भारत इस महामारी से जिस कुशलता के साथ निपट रहा है, उसकी दुनियाभर में तारीफ हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हमारे प्रयासों की सराहना तो की है, इस महामारी की सबसे बड़ी चुनौती झेल चुके चीन ने भी तारीफ की है। कोविड-19 के जन्म से लेकर इस पर नकेल कसने तक चीन के पास लंबा अनुभव है, और वह कह रहा है कि भारत समय से पहले ही इस पर विजय पा लेगा।
ऐसे समय में जबकि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के हौसले पस्त हैं, इस भयंकर महामारी से निपटने के लिए भारत का मनोबल देखते ही बनता है। इसी मनोबल के बूते इस देश ने कोविड-19 को दूसरे चरण में ही अब तक थाम रखा है, अन्यथा अब तक तस्वीर कुछ और होती।
यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा है कि कोरोना को लेकर दुनिया का भविष्य भारत के प्रयासों पर निर्भर है, तो इसके गहरे निहितार्थ है। इसीलिए इन प्रयासों को लेकर उसके द्वारा प्रकट की गई प्रसन्नता बहुत व्यापक है। भारत के इन्हीं प्रयासों ने उसे उसके समानांतर देशों में कोरोना के विरूद्ध चल रहे अभियान में एक तरह से नेतृत्वकर्ता की भूमिका में स्वीकार्यता दी है। 
पहले जनता कफ्र्यूू और बाद में 21 दिनों का लाक-डाउन जैसे कड़े फैसलों के दौरान जो परिदृश्य उभरा है, उसमें यह साफ नजर आता है कि हम न केवल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, बल्कि सबसे ताकतवर और एकजुट लोकतंत्र भी हैं। वह इसलिए कि भारत की तुलना में कोविड-19 से कई गुना अधिक पीडि़त होने के बावजूद अमेरिका अब तक ऐसे फैसलों की हिम्मत नहीं जुटा पाया है। 
चीन संभवत: इसीलिए चकित है कि लोकहित में कड़े फैसले तानाशाही के बिना भी लिए जा सकते हैं। 
कोविड-19 की पीड़ा के इस दौर में भारत न सिर्फ एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा है, बल्कि उसने अपने संघीय ढांचे की ताकत का भी अहसास करा दिया है। दुनिया देख रही है कि बहु-दलीय प्रणाली वाले इस देश के प्रत्येक राजनैतिक दल का मूल सिद्धांत एक है। जब देश और मानवता पर संकट आता है तो जाति, धर्म, संप्रदाय सबसे सब हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। इस समय यही राजनीतिक एकजुटता देश को ताकत दे रही है।
केंद्र और राज्य, शासन और प्रशासन, जनप्रतिनिधि और जनता, इन सबकी सीमाएं टूट चुकी हैं। सबके सब इस समय एकाकार हैं। अद्भुत समन्वय और तालमेल के साथ यह देश अपने अनदेखे दुशमन के साथ जंग लड़ रहा है। चाहे वह मेडिकल स्टाफ हो, या पुलिस के जवान, या फिर स्वच्छता-सैनिक, सभी ने साबित कर दिखाया है कि देश के लिए जो जज्बा सरहद पर लडऩे वाले सैनिक का होता है, वही जज्बा इस देश के जन-जन में है।
कोविड-19 पर हम निश्चित ही विजय पा लेंगे। उसके बाद नव-निर्माण का दौर होगा। हमें अपने हौसले पर भरोसा है। हम चीन जैसे देशों को एक और बार यह कहने पर मजबूर कर देंगे कि भारत समय से पहले उठ खड़ा होगा।

 


Date : 28-Mar-2020

अव्यक्त
गांधीजी कहते थे कि भय घृणा को जन्म देता है। आज महामारी से मौत का भय फिर से घृणा की नई घटनाओं और परिघटनाओं को जन्म दे रहा है। वह हमारे दिमाग में पहले से बैठे पूर्वाग्रहों को और भी जहरीले रूप में सामने ला रहा है।
10 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में उत्तर-पूर्व के छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें ‘कोरोनावायरस’ कहकर चिढ़ाया जा रहा है। उसी दिन मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में नागालैंड के छात्रों ने इसी तरह की शिकायत दर्ज कराई। इसी सप्ताह दिल्ली विश्वविद्यालय से सटे विजयनगर इलाके में मणिपुर की एक छात्रा पर यह कहते हुए थूक फेंका गया कि देखो चीनी कोरोनावायरस आ रही है। इसी तरह मुंबई में भी लॉ की पढ़ाई कर रही उत्तर-पूर्व की एक छात्रा को कहा गया कि ‘चीनी वायरस कोरोना जाओ यहाँ से’।
कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ रहे दार्जीलिंग के दो छात्रों को भी ‘कोरोनावायरस’ कहा गया। पुणे में भी एक दुकान पर मिजोरम की एक महिला के साथ एक स्थानीय महिला ने इसी आधार पर बदसलूकी की जिसका वीडियो बहुप्रसारित हो रहा है।
कोरोना प्रसंग में दुनियाभर के कई देशों से एशियाई मूल (खासकर चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों) के नागरिकों के साथ नस्लीय पूर्वाग्रहयुक्त दुव्र्यवहार की घटनाएँ सामने आ रही हैं। चौदहवीं सदी से ही महामारियों का इतिहास ऐसे सामुदायिक पूर्वाग्रहों के आधार पर हुई हिंसा की घटनाओं से भरा पड़ा है।
लेकिन इस सबके बीच इतिहास में ऐसे प्रसंग भी हैं जिनके बारे में जानना चाहिए। मसलन 1918 में अमरीका में भयानक इन्फ्लुएन्जा महामारी फैली थी। दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध की आग में झुलस रही थी और विभिन्न राष्ट्रीयताओं के बीच घृणा और पूर्वाग्रह चरम पर थे।
सैन फ्रैंसिस्को और फिलाडेल्फिया में लाशों के ढेर लग गए थे। सार्वजनिक सेवाएँ लगभग ठप पड़ गई थीं। लेकिन लोगों ने आपसी पूर्वाग्रहों से समय रहते निजात पा ली। सारी भिन्नताओं को भुलाकर वे एक साथ हो गए।
समृद्ध तबके के स्वयंसेवी बड़ी संख्या में गरीबों की बस्तियों में पहुँचने लगे।  उन्होंने उनके लिए सामुदायिक रसोई खोल दिए। 2000 टैक्सी चालकों ने अपनी टैक्सी को नि:शुल्क एंबुलेंस का रूप दे दिया।
कैथोलिक नन अपनी धार्मिक वर्जनाओं को त्यागकर यहूदी अस्पतालों में काम करने लगीं। 
बीमारी के खतरों के बीच सभी तरह के लोग नर्स के रूप में अपनी सेवाएँ देने लगे। और यह सब कुछ बिना किसी संस्थागत ढाँचे की मौजूदगी में किया गया।
भारत का समाज आज भी अपनी विभिन्नता को आत्मसात करने लायक नहीं बन सका है। चमड़ी का रंग, नाक का आकार, मुखाकृति और देहयष्टि की भौगोलिक विशेषताओं के बारे में भारतवासी आपस में ही घोर अज्ञानता के शिकार रहे हैं।
बड़े शहरों में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा पाने लायक हो जाने के बावजूद शेष भारत के ज्यादातर छात्र उत्तर-पूर्व भारत और अफ्रीकी छात्रों के प्रति एक प्रकार की ‘अन्यता’ ग्रंथि के शिकार रहते हैं। यह कब नस्लभेद और ज़ेनोफ़ोबिआ में बदल जाता है पता भी नहीं चलता।
माता-पिता और शिक्षकों को चाहिए के वे बचपन से ही अपने बच्चों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मनुष्यों की शारीरिक विशेषताओं के बारे में संवेदनशील बनाएँ। सबको मनुष्य-मात्र के रूप में देखने-दिखाने की सहजता पैदा करें।
क्योंकि समय-समय की बात है और जगह-जगह की बात है। ऐसी संवेदनशीलता और सहजता के अभाव में कब और कहाँ खुद आप भी इसका शिकार हो जाएंगे यह कहा नहीं जा सकता।
यह विडंबना ही है कि अक्सर पीडि़त के रूप में हम जिस बात का रोना रोते हैं, पीडक़ के रूप में वह भूल जाते हैं।

 


Date : 27-Mar-2020

कोरोना वायरस के विश्व व्यापी संक्रमण के बीच दो सबसे बड़ी आबादी वाले देशों चीन और भारत के लिए चुनौती सबसे बड़ी है। चीन से पैदा हुए कोरोना वायरस के संक्रमण ने दुनिया के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए आलोचना झेलने वाले चीन का दावा है कि उसने इस पर काफी हद तक काबू पा लिया है और अब वो दूसरे देशों की मदद के लिए तैयार है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चीन की कोशिशों की तारीफ की है। डब्लूएचओ का कहना है कि अब यूरोप और अमरीका कोरोना वायरस संक्रमण के केंद्र बन चुके हैं। इटली तो मौतों के मामले में चीन को काफ़ी पीछे छोड़ चुका है और अब स्पेन भी चीन से आगे निकल गया है। फ्रांस और ब्रिटेन में मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और अमरीका भी संक्रमण के मामले में ज़्यादा पीछे नहीं।

चीन में अभी तक कोरोना वायरस के कारण 3287 लोगों की मौत हुई हैं। जबकि 74 हजार लोग ठीक भी हुए हैं। इटली में 7500 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, जबकि स्पेन में मरने वालों की संख्या 3600 से ज़्यादा हो गई है। लेकिन चीन के बाद सबसे ज़्यादा चिंता भारत को लेकर है। 1।37 अरब आबादी वाले देश की हर गतिविधि पर दुनियाभर की नजऱ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कई बार भारत को सावधान कर चुका है, तो साथ में कुछ कदमों की सराहना भी कर चुका है।

इस समय भारत में 21 दिनों का राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन चल रहा है। भारत की बड़ी आबादी को देखते हुए ये मुश्किल कदम है। लेकिन साथ ही मुश्किल है हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर। भारत सरकार भी दबी जुबान में ये मान रही है कि अभी देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए देश का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं है। वेंटिलेटर्स की कमी है और बड़ी संख्या में लोगों के टेस्ट भी नहीं हो पा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए 15000 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की है। लेकिन साथ ही उन्होंने लोगों से बार-बार अनुरोध किया है कि अगर कोरोना वायरस के चेन को तोडऩा है तो लॉकडाउन का सही से पालन करना है। अन्यथा एक बार स्थिति हाथ से निकल गई, तो देश वर्षों पीछे चला जाएगा।

चीन ने किया आगाह

लॉकडाउन के फैसले के बावजूद चीन ने भारत को आगाह किया है और बताया है कि कैसे वो कोरोना पर नियंत्रण कर सकता है।

ग्लोबल टाईम्स के मुताबिक चीन के सीडीसी (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) एक्सपर्ट जेंग गुआंग ने कहा है कि अगर भारत चाहता है कि उसे घरेलू स्तर पर कोरोना वायरस का प्रसार रोकना है, तो उसे इंपोर्टेड केस को रोकना होगा।

इंपोर्टेड केस यानी बाहर से आए लोगों के माध्यम से फैल रहे वायरस को रोकना। पिछले दिनों भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर ये आरोप लगाए कि उसने फैसले लेने में देरी की।

अगर भारत में पहला मामला जनवरी के आखऱिी सप्ताह में पता चला था, तो सख़्त फ़ैसले लेने में इतनी देरी क्यों हुई। दरअसल इस बीच भारत में विदेशों से आए लोगों के माध्यम से कोरोना वायरस फैल गया। हालांकि सरकार का दावा है कि अभी भी उसने सामुदायिक स्तर पर इसे फैलने से रोका है। लेकिन दिन प्रति बढ़ते मामले भारत सरकार का सरदर्द भी बढ़ा रहे हैं।

दरअसल विदेशों से आए लोगों से शुरू हुआ संक्रमण अभी उन लोगों के परिजनों और उनके संपर्क में आए लोगों में ही फैला है। सरकार लॉकडाउन करके इस चेन को सामुदायिक स्तर पर फैलने से रोकना चाहती है।

चीन ने भी भारत को यही सबक दिया है कि अगर घरेलू स्तर पर बड़ा स्वरूप लेने से बचाना है तो इंपोर्टेड केस को रोकना होगा। जेन गुआंग का ये भी कहना है कि इस वायरस पर प्रभावी नियंत्रण करके भारत और चीन दुनिया को ये दिखा सकते हैं कि उन्होंने कैसे ये लड़ाई लड़ी।

चीन की ओर से मदद की पेशकश

पिछले दिनों चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से फ़ोन पर बात की और उन्हें कोरोना वायरस से लडऩे में हर संभव मदद की पेशकश की।

चीन ने हर दिन भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई और कहा कि भारत चीन के अनुभव से सबक सीख सकता है।

चीन के विदेश मंत्री ने भी माना है कि दुनिया की नजऱ भारत और चीन पर इसलिए है क्योंकि दोनों की आबादी एक अरब से ज़्यादा है।

ऐसे में उनका तर्क है कि दोनों देशों को मिलकर इस वायरस से लडऩा होगा। जयशंकर ने भी कोरोना पर काबू पाने की चीन की कोशिशों की सराहना की और कहा कि वे चीन की मदद की पेशकश के लिए उसका धन्यवाद देते हैं।

चीन में जब कोरोना वायरस का संक्रमण अपने चरम पर था और वुहान में हर दिन बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो रहे थे, चीन ने सिर्फ 10 दिनों में मेकशिफ्ट अस्पताल बनाकर पूरी दुनिया को ये बता दिया कि वो कोरोना को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं।

चीन को इस कोशिश का फायदा कोरोना को क़ाबू करने में मिला। चीन की कई कंपनियों ने पेशकश की है कि वो मेकशिफ्ट अस्पताल बनाने में भारत समेत अन्य एशियाई देशों की मदद भी कर सकते हैं।

चायना रेलवे कंस्ट्रक्शन कॉर्प के एक एक्सपर्ट ने ग्लोबल टाइम्स को बताया, चीन की कई कंपनियाँ भारत में कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं। इन कंपनियों के पास पहले से ही अच्छा सप्लाई नेटवर्क है। भारत अगर चाहे तो ये कंपनियाँ चीन के वुहान की तरह भारत में मेकशिफ़्ट अस्पताल बनाने का काम शुरू कर सकती हैं।

भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक इस समय भारत में करीब 600 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हैं, 13 लोगों की मौत हो चुकी है और 42 लोग डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। लेकिन जानकार सबसे ज़्यादा सवाल इस पर उठा रहे हैं कि भारत अभी भी कम लोगों के टेस्ट कर रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक भारत जहाँ एक सप्ताह में 5000 लोगों के टेस्ट कर रहा है, वहीं अमरीका एक सप्ताह में 26 हजार और ब्रिटेन एक सप्ताह में 16 हजार लोगों के टेस्ट कर रहा है।

यानी भारत की सबसे बड़ी समस्या हेल्थकेयर सिस्टम पर भारी दबाव की है, वो चाहे अस्पताल, वेंटिलेटर्स की कमी हो या फिर पर्याप्त संख्या में लोगों के टेस्ट न कर पाने की समस्या।

अब भारत ने प्राइवेट टेस्ट लैब्स को कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए अनुमति दी है और जानकारों का मानना है कि इससे वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या में उछाल आ सकता है।

चीन ने कैसे किया नियंत्रण

एक समय चीन के सबसे ज़्यादा प्रभावित वुहान में एक दिन में 13 हज़ार तक संक्रमण के मामले सामने आए थे। लेकिन आज स्थिति ये है कि वुहान में पिछले दो दिनों से एक भी संक्रमण के मामले सामने नहीं आए हैं।

वुहान में लगाई गई पाबंदियों में ढील दी जा रही है और एक दिन पहले छोटे स्तर पर ट्रेन सेवा भी शुरू की गई। कई लोग वुहान से राजधानी बीजिंग भी पहुँचे।

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक अब भी जो मामले चीन में सामने आ रहे हैं, वे ज्यादातर इंपोर्टेड मामले हैं।

कोरोना पर काबू करने के लिए चीन के शीर्ष नेतृत्व की भी काफी सराहना की जा रही है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सराहना विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक ने भी की और कहा कि बाक़ी दुनिया के देश इससे सीखें।

शी जिनपिंग ने समय रहते पूरे देश को इसके ख़तरे के प्रति न सिफऱ् आगाह किया बल्कि संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल भी किया। मेकशिफ़्ट अस्पताल बने, टेस्टिंग फैसिलिटी बने, वुहान और हूबे की सीमाएँ सील की गईं।

वुहान में दो सप्ताह के अंदर जो दो मेकशिफ्ट अस्पताल बनाए गए, वहाँ 2600 मरीज़ों के लिए व्यवस्था थी। शिन्हुआ के मुताबिक जिम और एक्जीबिशन सेंटर्स की जगह 16 अस्थायी अस्पताल बनाए गए, जिनमें 13 हजार बेड्स थे। यही नहीं सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए पूरे संसाधन झोंक दिए। मरीज़ों की समय से भर्ती हो, इसके लिए सख़्त हिदायत थी।

चीन की इसी प्रशासनिक सूझबूझ को देखते हुए लांसेट ने अपने संपादकीय में लिखा- चीन की सफलता उसके मजबूत प्रशासिक व्यवस्था की वजह से है। किसी भी ख़तरे के समय प्रशासन पूरी तरह मोबिलाइज हो जाता है। साथ ही उसे जनता का समर्थन भी मिलता है।

लॉकडाउन और सीमाएँ सील होने के दौरान सरकार ने ये सुनिश्चित किया कि लोगों को सभी ज़रूरी सामान बिना किसी रुकावट के घर बैठे मिल सकें। जब लोगों को घर बैठे सामान मिलने लगे, तो लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा समर्थन किया।

चीन ने नए टेस्टिंग किट बनाए, दवाएँ विकसित कीं और वैक्सीन के लिए भी तैयारी शुरू की। अब चीन दुनिया के बाक़ी देशों के साथ मिलकर वैक्सीन पर तेज़ी से काम कर रहा है।

चीन ने तकनीक का भी बेहतर इस्तेमाल किया। छिडक़ाव के लिए रोबोट्स का इस्तेमाल किया गया, ड्रोन्स के माध्यम से तापमान मापे गए।

चीन ने संक्रमण के इस दौर में अन्य देशों की भी मदद की। चीन ने दक्षिण कोरिया को मास्क और प्रोटेक्टिव गाउंस भेजे। पाकिस्तान, ईरान, जापान और अफ्रीकी यूनियन को टेस्टिंग किट भेजे।

भारत के लिए सबक

चीन ने जिस तरह कोरोना वायरस के संक्रमण को क़ाबू करने का दावा किया है, भारत इससे सबक ले सकता है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जब चीन के विदेश मंत्री ने बात की, तो कहा कि वो चीन की कोशिशों की सराहना करते हैं। लेकिन भारत ने अब भी मेक शिफ़्ट अस्पतालों को लेकर कोई ठोस फ़ैसला नहीं किया है।

भारत की सबसे बड़ी चुनौती ही स्वास्थ्य व्यवस्था और बड़ी आबादी है। चीन ने मदद की पेशकश करके गेंद भारत के पाले में डाली तो है, लेकिन फ़ैसला तो भारत को करना है।


Date : 27-Mar-2020

कोरोना वायरस से आर्थिक मंदी गहराने की चिंताओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कई अहम फैसले किए हैं। केंद्रीय बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रेपो रेट में 75 बेसिस प्वाइंट्स की बड़ी कटौती करने का ऐलान किया। आरबीआई के इतिहास में इस सबसे बड़ी कटौती के बाद रेपो रेट 5.15 से घटकर 4.40 फीसदी हो गया है।

उधर, रिवर्स रेपो रेट में में 90 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती कर इसे चार फीसदी कर दिया गया है। आरबीआई मुखिया शक्तिकांत दास के मुताबिक यह फैसला कोरोना वायरस से फैलने वाली आर्थिक मंदी का मुकाबला करने के लिए किया गया। उनकी मानें तो इसका मकसद यह है कि बैंकों को आरबीआई के पास पैसा जमा करते रहने से ज्यादा आकर्षक विकल्प यह लगे कि उस पैसे को उत्पादक क्षेत्रों के लिए कर्ज दिया जाए।

शक्तिकांत दास ने कहा कि कोरोना वायरस के चलते उपजे हालात में अनिश्चितता और नकारात्मकता का माहौल है। आरबीआई मुखिया कहना था कि इसका विकास दर पर बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने ऐलान किया कि सभी बैंक और वित्तीय संस्थान अगले तीन महीनों के लिए अपने ग्राहकों को कर्ज चुकाने के मामले में ढील दे सकते हैं। यह ऐलान हर तरह के कर्ज पर लागू होगा। उनके मुताबिक केंद्रीय बैंक ने आज समेत हाल के समय जो ऐलान किये हैं उनसे बाजार में छह लाख करोड़ रु से भी ज्यादा की तरलता सुनिश्चित होगी।

शक्तिकांत दास ने बैंकों के ग्राहकों से न घबराने अपील भी की। उनका कहना था कि ग्राहकों को परेशान होकर अपना पैसा बैंक से निकालने की जरूरत नहीं है क्योंकि बैंकिंग सेक्टर की सेहत ठीक है। उन्होंने कहा कि यह बात सरकारी और प्राइवेट, दोनों बैंकों पर लागू होती है। शक्तिकांत दास का कहना था कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और वह इस संकट से निपटने में सक्षम है। (सत्याग्रह)


Date : 27-Mar-2020

अव्यक्त

हम हिमाचल प्रदेश के एक सुदूर पर्वतीय गाँव में रहते हैं। शहरी दिखावटी जीवन-शैली का प्रभाव अब यहाँ भी दिखने लगा है। लेकिन ग्राम्यता, सामाजिकता और आत्मीयता अब भी यहाँ भरपूर बची हुई है।

हमारी छोटी-सी गृहस्थी में अनाज वगैरह का ज्यादा संग्रह होता नहीं। इसलिए कई सहग्रामियों ने आगे बढक़र पूछा कि घर में चावल-आटा-गैस वगैरह कम पड़े तो बताइयेगा। हम अपने घर से दे देंगे।

दो हज़ार किमी दूर झारखंड से कई आदिवासी परिवार मिस्त्री और मजदूरों के रूप में यहाँ अस्थाई रूप से आकर रहते हैं। हमारे पड़ोस में भी खेतों के बीच बने एक कच्चे मकान में दो आदिवासी परिवार संयुक्त रूप से रहते हैं। परिवार में बच्चे भी हैं।

सुबह-सुबह हम दोनों ने तय किया कि पड़ोसी धर्म और मनुष्य धर्म का पालन करते हुए उनका हाल-चाल पूछने जाएँ। भारत के आदिवासी अब भी एकदम निष्कपट, सरल और निर्लोभी लोग हैं।

उन्होंने कहा कि परसों ही उन्होंने अनाज, नमक, तेल और गैस आदि की व्यवस्था कर ली थी। बहुत जरूरत की स्थिति में जलावन वाले चूल्हे का इंतजाम भी है। वे अपने ठेकेदार से लगातार संपर्क में हैं।

हमने फिर भी कहा कि भाई, कभी कोई ऐसी जरूरत आन पड़े तो बेहिचक बताना। उनकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता का उमड़ाव सहज ही देख सकता था। उनका हृदय गद्-गद् हो गया। गला भर आया। कहा, जरूर बताएंगे। आपको भी कोई जरूरत पड़े तो बताइयेगा।

पूरे देश से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि लोग शहरों में यहाँ-वहाँ अधर में फँस गए हैं। कुछ लोग तो अपने सामानों का बोझ उठाए सैकड़ों मील दूर अपने गाँवों के लिए पैदल ही निकल पड़े हैं। इनमें महिलाएँ और बच्चे भी हैं।

कुछ राज्य सरकारों ने थोड़ी-बहुत व्यवस्थाएँ अवश्य की हैं इनके लिए। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में सरकारी प्रयास हमेशा ही अपर्याप्त होंगे।

पूर्णबंदी के बीच जहाँ तक संभव हो और उचित हो, अपने आस-पड़ोस के उन इलाकों की टोह अवश्य लें जहाँ प्रवासी कामगार और दिहाड़ी मजदूर छोटे-छोटे कमरों में 10-12 की संख्या में एक साथ मिलकर रहते हैं। फिर जो बन पड़े सो करें।

कुछ मित्रवत सुझाव हैं, केवल याद दिलाने के उद्देश्य से—

उनसे भाई-बहन या केवल एक साथी मनुष्य के रूप में मिलें। दाता या उपकारी के रूप में नहीं।

 प्रेम और कृतज्ञता से भरकर मिलें।

किसी को कुछ देते-बांटते हुए फ़ोटो न खिचाएँ, वीडियो न बनाएँ।

किसी को अपने घर में टिका सकें तो अवश्य टिका लें। घर बड़ा-छोटा नहीं होता, दिल बड़ा-छोटा होता है।

गाँवों में भी जाति, संप्रदाय और दलगत भावना से ऊपर उठकर सभी एक-दूसरे की मदद करें। यह याद रखते हुए कि हम सबसे पहले और सबसे आखिर में मनुष्य-मात्र हैं। बाकी सब ऊपरी ढकोसले हैं।

 


Date : 26-Mar-2020

रमण रावल 
बांग्लादेश की निर्वासित और विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कोरोना के मद्देनजर जो बात कही है, उससे आप-हम सहमत/असहमत भले हों, विचारणीय जरूर है। उन्होंने कहा है कि देवता (उनका आशय सभी धर्मों के देवताओं से है) हैं तो कोरोना संकट से लोगों को उबारने मदद क्यों नहीं कर रहे? आस्तिक व नास्तिक दोनों अपने ढंग से इस पर पेश आ सकते हैं। ऐसा उन्होंने किसी एक धर्म के लिये ही नहीं बोला, बल्कि साफ तौर पर हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी के लिये कहा है। यह मौका धर्म और उनके मानने वालों  के लिये किसी बहस और गैर जरूरी विवाद का नहीं है, लेकिन मेरा मानना है कि इस बहाने सही उनकी बातों पर चर्चा तो बनती है।
जैसे वे कहती हैं कि पोप अनेक  मौकों पर दावा करते हैं कि वे यीशू से सीधे बात कर सकते हैं तो इस समय वे कोरोना के उपचार क्यों नहीं पूछते। रोम और इटली तो जबरदस्त संक्रमित भी है तो यीशू के अनुयायियों को राहत मिलना चाहिये। वे मंदिर के पुजारियों से पूछती हैं कि अच्छे समय में वे भक्तों से चढ़ावा, दान लेते हैं तो इस समय जब भक्त पर जान का खतरा मंडरा रहा है, वे मंदिरों के पट बंद कर और अनेक जगह तो भगवान की मूर्तियों को भी मास्क पहनाकर गायब हो गये हैं, ऐसा क्यों?
वे मुल्ला-मौलवियों से भी सवाल करती हैं कि काबा-मक्का,मदीना सब दूर सन्नाटा क्यों है? क्यों नहीं अल्लाह अपने बंदों को कोरोना से बचा पा रहा है? वे यह भी कहती हैं कि डार्विन ने 160 साल पहले ही विकास के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए कह दिया था कि मनुष्य का मौजूदा स्वरूप बंदर से बना है और ईश्वर जैसा कुछ नहीं है, तब हम ईश्वर-ईश्वर की रट क्यों लगाये रहते हैं।
यहां मैं अपने आस्तिक या नास्तिक होने के सवाल को एक तरफ रखकर कहना चाहता हूं कि कोई भी देवता कभी-भी भक्त की मदद के लिये दौड़ा चला आता हो, ऐसा किसी धर्म ग्रंथ में नहीं है। कोई व्याख्याकार ऐसा दावा नहीं करता। कोई पंडा-पुजारी ऐसा करता है तो उसका ईमान और इसे मानने वाले का यकीन जाने। मूल बात यह है कि तस्लीमा ने अपने लेखन में हमेशा कठमुल्लापन को निशाना बनाया है। धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड की छीछालेदार की है। वे काफी हद तक सही होती  हैं। इसीलिये उन्होंने बेहद तार्किक तरीके से कोरोना को लेकर एक बार फिर धर्म के ठेकेदारों पर सवाल दागे हैं। मुझे नहीं लगता कि वे लोगों की धार्मिक आस्थाओं पर सवाल उठा रही होंगी।
अब मैं अपनी बात कहता हूं। दरअसल, इस समय जो दुनिया भर में हो रहा है, उसे देखते हुए धार्मिक संगठनों ने वाकई ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे लगे कि धर्म के पहरेदार, प्रतिनिधि, पुजारी, पोप, पंडे या मौलवी अपने-अपने ईष्ट से सीधे तौर पर ऐसी कोई प्रार्थना कर रहे हैं ,जो बताये कि वे लोगों के संकट से दुखी हैं और उपाय ढूंढ रहे हैं। ईश्वरीय मदद की बात को एक तरफ रख भी दें तो याद नही पड़ता कि धार्मिक संस्थाओं, मठो,मस्जिदों, चर्चों से पीडि़त लोगों की मदद के लिये खजाने का मुंह खोल दिया गया हो। लाखों-करोड़ों रूपये की सालाना आमदनी वाले संस्थान, करोड़ों-अरबों रुपये के सोने-चांदी व नकदी का भंडारण करने वाले धार्मिक संस्थानों ने दवा, राशन-पानी का इंतजाम अपने ऊपर ले लिया हो, ऐसी तो जानकारी नहीं है। क्या यह अपेक्षा नहीं की जाना चाहिये कि जो लोग सामान्य दिनों में, अपनी बेहतरी के समय में कभी गुप्त तो कभी प्रकट दान देने वाले अनुयायी, भक्त, बंदे आज छुपे-छुपे बैठे हैं तो उन्हें आत्मिक,आध्यात्मिक , भौतिक मदद की जाये?
कमोबेश हर मुल्क के धाार्मिक प्रतिष्ठान इस मामले में उदासीन रहे हैं। यदि कहीं से कुछ राहत आ रही है तो वे सामाजिक संस्थान हैं, जो जान की परवाह किये बिना भी आगे आये हैं। वैसे मेरा मानना है कि किसी भी प्राकृतिक या मानव जनित आपदा के वक्त भी ये धार्मिक संस्थान अपना बड़ा दिल नहीं दिखा पाते। अलबत्ता, सामाजिक संगठन, व्यापारिक-औद्योगिक घराने और व्यक्तिगत स्तर पर मदद का अंबार लग जाता है। आखिरकार ऐसा क्यों? क्या तमाम उपदेश-प्रवचन केवल सामान्य नागरिकों के लिये हैं? तमाम मिसालें एक अदना व्यक्ति ही पेश करे? समर्पण, सर्वजन हिताय, परोपकार, प्राणी मात्र की मदद,सृष्टि का हर प्राणी एक समान जैसी चिकनी-चुपड़ी बातें मंच के नीचे बैठे, पंडाल में हाथ जोड़े भक्ति में तल्लीन व्यक्ति के लिये ही है?
कोरोना संकट के बहाने उपजी इस बहस का स्वागत भले ही करने का साहस हम नहीं दिखा पायें, क्योंकि धर्म के मामले को संवेदनशील बताकर किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना मानव स्वभाव है ही नहीं, तो भी इस पर पूर्वाग्रह के बिना चर्चा तो की ही जा सकती है। बहुत आसान है किसी दूसरे को दोषी ठहराना ,लेकिन जो अंगुली संगठित क्षेत्र की ओर जब भी उठती है तो उसे बगावत मान लेना भी तो उचित नहीं । मामला जब धर्म से जुड़ा हो तो अनाड़ी, धर्मांध लोगों को आसानी से भडक़ाकर तलवार,पत्थर थमा दिये जाते हैं। और कुछ नहीं तो धर्म के ये ठेकादर उन्हीं अनाड़ी और धर्मांध लोगों के भले के लिये ही आगे आने के जतन कर लें तो लोगों की आस्था धर्म के प्रति और बढ़ेगी ही।
यूं हम बात करें तो माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत के मुताबिक आबादी के बेतहाशा बढऩे पर प्रकृति ही संतुलन के उपाय आजमा लेती है। कोरोना वायरस का मसला मानवजनित होते हुए कुदरत के काम में अड़ंगा तो है ही। इसलिये माल्थस को याद रखना ही होगा। आयंदा भी कोशिश यह रहे कि कुदरत से छेडख़ानी न की जाये तो यह खुद पर मेहरबानी समान होगा। वैसे यह तो पक्का है कि जब तक दुनिया कायम है, तब तक धर्म, ईश्वर को मानने वाले भी बरकरार रहेंगे ही। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। धर्म या ईश्वर का अस्तित्व हमें गलत करने से रोकता है या डराकर रखता है तो इसमें गलत या नुकसान कुछ भी नहीं है, बल्कि ताज्जुब इस बात का है कि खुदा-ईश्वर-यीशू के होने के अहसास के बावजूद हम तमाम अनैतिक, कदाचरण वाले काम करने से परहेज नहीं कर रहे। दुनिया में आर्थिक से लेकर तो हर तरह के अपराध तक द्रूत गति से बढ़ रहे हैं। अपराधों के आकार-प्रकार ने समूची मानव जाति को हिलाकर रख दिया, फिर भी इसे अंजाम देने वाले किसी अंजाम से नहीं डर रहे । इसे क्या कहेंगे? क्या वे यह मानते हैं कि ईश्वर नहीं है? उन्हें धर्म, ईश्वर, कानून, समाज किसी का डर क्यों नहीं लगता? 


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