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30-Jul-2021 1:49 PM (28)

वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की लैंगिक समानता दिखाने वाली 'ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स' रिपोर्ट में भारत 156 देशों की लिस्ट में नीचे से 17वें स्थान पर चला गया है. जिसका मतलब हुआ कि यहां महिलाओं की स्थिति लगातार खराब हो रही है.

  डॉयचे वैले पर अविनाश द्विवेदी की रिपोर्ट

भारत की इन दो तस्वीरों को देखिए. हाल ही में भारत सरकार ने मंत्रिमंडल में बदलाव किए, जिसके बाद केंद्र सरकार में महिला मंत्रियों की संख्या बढ़कर 11 हो गई. इसकी काफी तारीफ हुई और सोशल मीडिया पर सभी महिला मंत्रियों की एक-साथ ली गई तस्वीर शेयर की जाती रही.

दूसरी ओर साल 2021 में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की लैंगिक समानता दिखाने वाली 'ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स' रिपोर्ट में भारत 156 देशों की लिस्ट में नीचे से 17वें स्थान पर चला गया. जिसका मतलब हुआ कि यहां महिलाओं की स्थिति लगातार खराब हो रही है.

इस बात को उतनी तवज्जो नहीं मिल सकी. महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत दक्षिण एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में से एक है. इससे खराब प्रदर्शन सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान का रहा है जबकि बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और भूटान सभी उससे आगे निकल चुके हैं.

वहीं महिलाओं के राजनीतिक रूप से सशक्त होने की बात करें तो भारत की रैंक इस साल 51 हो चुकी है, जो पिछले साल 18 थी. यह सारी चर्चा इसलिए क्योंकि फिलहाल भारत में महिलाओं से जुड़े कुछ जरूरी कानून बनाए जा रहे हैं, जिन्हें बनाने में महिलाएं की संख्या न के बराबर है.

बेहद जरूरी कानून
ये कानून हैं, यूनीफॉर्म सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानून. जनसंख्या नियंत्रण कानून असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तैयार किया जा चुका है जबकि कई अन्य बीजेपी शासित राज्य ऐसे कानून बनाने की अभी तैयारी कर रहे हैं. जनसंख्या नियंत्रण कानून में दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर चुनाव लड़ने से रोक और सरकारी सब्सिडी खत्म किए जाने का प्रावधान है जबकि यूनिफॉर्म सिविल कोड सभी समुदायों के लिए शादी और तलाक संबंधी एक जैसे नियमों की वकालत करता है.

फिलहाल भारत में सुगबुगाहट है कि हर साल 5 अगस्त को बड़े कदम उठाने के लिए चर्चित वर्तमान बीजेपी सरकार इस साल यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू कर सकती है. महिलाओं के लिए बेहद जरूरी माने जा रहे इन कानूनों में जानकार दो स्तरों पर समस्या देख रही हैं.

पहली, इन्हें बनाने में महिलाओं का योगदान नगण्य है और दूसरी कि इस बात की गारंटी नहीं है कि इन कानूनों के बन जाने से एक ऐसा समाज बनाया जा सकेगा, जिसमें लैंगिक न्याय सुनिश्चित हो.

दूसरा डर भी पहले डर से ही जुड़ा है. कई जानकार यह सवाल पूछती हैं कि क्या ये कानून सिर्फ पुरुषों द्वारा महिलाओं के लिए बनाए गए कानून नहीं होंगे. उनके डर के लिए पर्याप्त वजहें भी उपलब्ध हैं. हाल ही में भारत के पांच राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनावों में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं बढ़ सकी.

ज्यादातर राज्यों में कुल मतदाताओं की करीब 50% महिलाएं हैं लेकिन इन चुनावों में महिला उम्मीदवार मात्र 10 फीसदी रहीं. केरल में 9 फीसदी, असम में 7.8 फीसदी महिलाएं ही उम्मीदवार थीं जबकि तमिलनाडु, पुद्दुचेरी में करीब 11 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं रहीं.

पुरुष ले रहे महिलाओं से जुड़े फैसले
ऐसा नहीं है कि भारत में महिलाएं राजनीति को लेकर उदासीन हैं. केरल की कांग्रेस नेता लतिका सुभाष इस बात की मिसाल हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में टिकट न मिलने के विरोध में उन्होंने अपना मुंडन करा लिया था. एक मीडिया बातचीत में उन्होंने कहा, "मैंने उम्मीदवारों में महिलाओं के लिए कम से कम 20 फीसदी टिकट रिजर्व किए जाने की बात की थी. ऐसा नहीं है कि भारत के बड़े राजनीतिक दलों में महिलाओं का अभाव है लेकिन उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जाता है और पार्टी चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देती."

भारत में कई महिलाएं बड़े राजनीतिक पद भी संभाल चुकी हैं लेकिन लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने वाला महिला आरक्षण बिल साल 2010 से ही राज्यसभा में पास होने के बाद से ही लटका हुआ है.

जनसंख्या कानून बनाने वाले असम और उत्तर प्रदेश को ही ले लेते हैं, जिनकी विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10% से भी कम है. असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में महिलाओं की संख्या मात्र 6 है जबकि उत्तर प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में मात्र 38 महिला विधायक हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन इसके लिए भारतीय समाज की पुरुषवादी सोच को जिम्मेदार मानती हैं. वह कहती हैं, "हम समझ सकते हैं 90% से ज्यादा पुरुषों वाली कोई संस्था महिलाओं के लिए कितने संवेदनशील कानून बनाएगी."

वहीं कुछ जानकार यह तर्क भी देती हैं कि अगर पुरुष महिलाओं को समान अधिकार देने वाला 'आदर्श' कानून बना भी लेते हैं तो भारत में कानून लागू कराने वाले प्रशासन की जो पुरुषवादी मानसिकता है क्या वह इन्हें प्रभावी रहने देगी?

कानूनों में गड़बड़ी के पर्याप्त आसार
यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में आती है लेकिन यह कैसा होगा, इसे संविधान में साफ नहीं किया गया है, न ही संविधान सभा ने इसे लेकर स्पष्टता दिखाई है. जानकार डर जताती हैं कि पुरुषों के बनाए कानून के गोवा के यूनिफॉर्म सिविल कोड (पुर्तगाली सिविल प्रोसीजर कोड) जैसे हो जाने का डर है.

इसमें कैथलिक लोगों पर अन्य समुदाय से अलग नियम लागू होते हैं. गोवा का यह कानून हिंदू मर्दों को अब भी विषेश परिस्थितियों में दो शादियां करने का अधिकार देता है जैसे कि तब, जब उसकी पत्नी बच्चे न पैदा कर सकती हो.

नारीवादी कार्यकर्ता कविता कृष्णन कहती हैं, "भारत की ज्यादातर समस्याओं की जड़ संसाधनों का असामान्य वितरण है, न कि गरीबी और जनसंख्या. ऐसे में सबसे जरूरी है कि कानून लोकतांत्रिक हो न कि महिलाओं के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने वाला. कानून का लक्ष्य महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा शिक्षा, नौकरियां और सुविधाएं देने वाला होना चाहिए, न कि अधिकारों से रोक देने वाला. जबकि वर्तमान जनसंख्या कानून इससे उलट हैं."

फायदे नहीं, नुकसान कई
जानकारों के मुताबिक फिलहाल जिस रूप में जनसंख्या नियंत्रण कानूनों को पेश किया जा रहा है, उससे महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर होने का डर है. इन कानूनों के लागू होने के बाद भारत के पुरुषवादी समाज में लड़के की चाहत में महिलाओं को बार-बार गर्भपात कराने पर मजबूर किया जा सकता है, जबकि पहले ही भारत में दूसरे और तीसरे बच्चे के तौर पर लड़कियों का अनुपात लगातार तेजी से गिर रहा है.

कविता कृष्णन कहती हैं, 'यूपी सरकार की ओर से बताया गया है कि बिल पर 8,500 लोगों ने प्रतिक्रिया दी है, जिनमें से सिर्फ 0.5 फीसदी ही इसके खिलाफ हैं. मैं मान लेती हूं कि प्रतिक्रिया देने वालों में महिलाएं भी शामिल होगीं लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं कि कानून लागू होने पर उनपर बुरा असर नहीं होगा. हम अंदाजा लगा सकते हैं कि जब भारत में घर के फैसले लेने में महिलाओं का योगदान बेहद कम है, तो गर्भधारण और गर्भपात जैसे अहम फैसलों में उनकी कितनी सुनी जाएगी.'

जानकार यह भी मानते हैं कि इस कानून का सबसे बुरा असर समाज में हाशिए पर पड़ी महिलाओं को झेलना होगा और यह राजनीति में उनके दखल को बढ़ाने के बजाए कम करने का काम करेगा. पिछले कुछ सालों से भारत में स्थानीय निकायों और पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही थी, इन कानूनों से उस पर भी बुरा असर होने का डर बन गया है.

नये कानूनों के मुताबिक 15-49 की उम्र की महिलाओं को अगर तीसरा बच्चा पैदा होता है, तो न सिर्फ उनकी राजनीतिक भागीदारी बल्कि सामाजिक सुरक्षा, जैसे सब्सिडी आदि भी छीन ली जाएगी. (dw.com)


30-Jul-2021 1:43 PM (35)

बाइडेन प्रशासन के दो महत्वपूर्ण पदाधिकारी - विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकेन और उपविदेश मंत्री वेंडी शर्मन ने बीते दिनों एशिया का दिलचस्प दौरा किया. इन दौरों का हासिल क्या रहाय़

 डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट

अमेरिकी विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकेन 27 जुलाई को अपनी दो- दिवसीय यात्रा पर भारत आये तो वहीं उपविदेश मंत्री वेंडी शर्मन 25 और 26 जुलाई को चीन के दौरे पर रहीं.

अपनी भारत यात्रा के दौरान ब्लिंकेन विदेशमंत्री एस जयशंकर, राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, और प्रधानमंत्री मोदी से भी मिले और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारत-अमेरिका संबंधों की महत्ता पर काफी प्रकाश डाला. ब्लिंकेन की यात्रा से भारत और अमेरिका संबंधों में और मजबूती आयी है.

दोस्ती की चाशनी में और मिठास घोलने की कोशिश के तहत ब्लिंकेन ने अमेरिकी सरकार की तरफ से भारत को वैक्सीन की खरीद के लिए 2.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर की मदद की भी घोषणा की. दोस्त वही है जो बुरे वक़्त में जो साथ दे - अच्छे वक़्त में तो सब यार हैं. कोविड काल की मार झेल चुके अमेरिका और भारत इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं. जब अमेरिका में कोविड महामारी का प्रकोप अपने चरम पर था तब भारत ने भी अपनी क्षमतानुसार अमेरिका की मदद की थी.

क्वॉड पर जोर
ब्लिंकेन की भारत यात्रा जयशंकर की मई 2021 यात्रा की दोस्ताना रिटर्न विजिट के तौर पर हुई है. ब्लिंकेन से पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ने भी मार्च 2021  में भारत का सफल दौरा किया था और अप्रैल में जलवायु परिवर्तन से जुड़े मामलों पर अमेरिकी प्रशासन के विशेष दूत केरी ने भी अप्रैल 2021 में भारत का दौरा किया था.

ब्लिंकेन की यात्रा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के इस वक्तव्य के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण हो जाती है जिसमें उन्होंने अमेरिका, जापान, भारत और आस्ट्रेलिया के साझा सामरिक गठबंधन क्वॉड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग – क्वॉड की शिखर वार्ता आयोजित करने की पेशकश की. 

माना जा रहा है कि क्वॉड की यह शिखर वार्ता संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेम्बली की बैठक की साइडलाइन में आयोजित होगी. गौरतलब है कि अगस्त में भारत संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भी करेगा. उम्मीद की जा रही है किॉक्वाड शिखर सम्मलेन के अलावा भारत और अमेरिका के बीच भी एक द्विपक्षीय शिखर बैठक भी होगी हालांकि इस सन्दर्भ में सुनिश्चित तौर पर कुछ कहने में अभी समय है. 

क्वॉड को धीरे- धीरे संस्थागत रूप देने की बाइडेन प्रशासन की कवायद लगातार जारी है और इस कोशिश में धीरे-धीरे ही सही, क्वॉड के चारों सदस्य देशों को सफलता भी मिल रही है. क्वॉड वैक्सीन इनिशिएटिव को 2022 की शुरुआत तक लॉन्च करने पर भी दोनों देशों के नेताओं के बीच बात हुई. यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है जिसकी सराहना की जानी चाहिए.

भारत का वैश्विक महत्व
इस सन्दर्भ में भारत और अमेरिका के बीच सुदृढ़ संबंध बुनियाद का काम करते हैं. इस बात का जिक्र और भारत-अमेरिका सामरिक साझेदारी का बखान प्रधानमंत्री मोदी ने ब्लिंकेन से मुलाकात  के बाद सोशल मीडिया पर भी किया. इसकी झलक अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकेन के वक्तव्यों में भी देखने को मिली, खास तौर पर तब जब उन्होंने यह कहा कि बहुत कम ही रिश्ते हैं जो भारत और अमेरिका के रिश्तों से भी महत्वपूर्ण हैं. 

इस वक्तव्य के दोनों ही पहलू दिलचस्प हैं - एक तो यह कि भारत और अमेरिका के सम्बन्ध खास हैं और महत्वपूर्ण भी, लेकिन यह भी कि इन संबंधों से भी महत्वपूर्ण कुछ और रिश्ते हैं और शायद भारत और अमेरिका को आपसी संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए.

ब्लिंकेन ने अपने वक्तव्य में न सिर्फ भारत-अमेरिका संबंधों को दुनिया के सबसे अहम द्विपक्षीय संबंधों में से एक करार दिया बल्कि बातचीत के दौरान उठे मुद्दों से भी इस वक्तव्य की सच्चाई का आभास होता है. 

भारतीय शीर्ष नेताओं के साथ बैठकों के दौरान ब्लिंकेन ने सिर्फ द्विपक्षीय मुद्दों पर ही विचार विमर्श नहीं किया बल्कि वैश्विक महत्त्व के बड़े मुद्दों जैसे कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और आतंकवाद से जुड़े मुद्दे, इंडो-पैसिफिक, खाड़ी देशों से जुड़े मुद्दे, कोविड महामारी और वैक्सीन से जुड़े मुद्दे, म्यांमार में लोकतंत्र बहाली, और संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार जैसे मुद्दों पर भी चर्चा और चिंतन हुआ. 

जहां तक ब्लिंकेन की भारत यात्रा का सवाल है तो उसकी बड़ी उपलब्धि यही है कि इस वार्ता ने आगामी चतुर्देशीय क्वॉड और द्विपक्षीय भारत-अमेरिका शिखर वार्ता की तैयारियों के साथ-साथ भारत को इस बात का एहसास भी दिलाना था कि वैश्विक मामलों में भी अमेरिका भारत को एक बड़ा साझेदार और जिम्मेदार स्टेकहोल्डर समझता है.

चीन में शर्मन
जहां एक और ब्लिंकेन की यात्रा ने भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों के बेहतर दिनों की उम्मीद और बुलंद की, तो वहीं अमेरिकी उपविदेश मंत्री वेंडी शर्मन की चीन की यात्रा कुछ खास उपलब्धि हासिल नहीं कर पाई. एशिया की दो महाशक्तियों के दौरे पर आये अमेरिकी विदेश मंत्री और उपविदेश मंत्री की यात्रा बिना कुछ कहे ही कई सन्देश दे गई.  

सबसे पहला तो यही है कि एशिया में होने के बावजूद मंत्री ब्लिंकेन ने भारत आने का निर्णय लिया और चीन (जापान, कोरिया, और मंगोलिया) की यात्रा का जिम्मा उपविदेश मंत्री वेंडी शर्मन के जिम्मे कर दिया. कूटनीतिक संकेतों के माहिर और अक्सर राजनय की बड़ी-बड़ी बातों को इशारों में कह जाने के लती चीन को यह बात तो जरूर अखरी होगी.

जो भी हो, वेंडी शर्मन का पिछले हफ्ते का पूर्वी एशिया दौरा अपने में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. मार्च 2021 में अलास्का में हुए चीन और अमेरिका मंत्री-स्तरीय वार्ता के असफल होने के बाद तियानजिन में जुलाई 2021 में हुई बैठक से चीन-अमेरिका संबंधों के समर्थकों की उम्मीदें थीं कि शायद दोनों देश बातचीत के जरिये संबंधों को वापस पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे.

अफसोस कि ऐसा हुआ नहीं. आशाओं के बिलकुल उलट दोनों देशों के बीच हुई वार्ता न सिर्फ असफल रही बल्कि शायद तल्खियों की बातें भी दुनिया के सामने आई हैं. अपनी यात्रा के दौरान शर्मन ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी और अन्य प्रमुख नेताओं के साथ बातचीत की. दोनों पक्षों के बीच की बातचीत में डैमेज कंट्रोल की कवायद और उम्मीद छायी रही.  

कलह टालने की कोशिश
बातें इस मुद्दे पर भी हुईं कि कैसे दोनों महाशक्तियां अपने संबंधों को जिम्मेदाराना ढंग से चला सकें और इसके सुचारु रूप से चलाने के लिए क्या नियम बनाए जाएं. बेतकल्लुफी के अंदाज में वेंडी शर्मन ने यह भी कहा कि चीन और अमेरिका एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करें, यह तो सही है लेकिन अमेरिका यह हरगिज नहीं चाहता है कि चीन के साथ उसके संबंधों में कलह और विवाद पैदा हों.

शर्मन अपनी बैठकों में चीन और अमेरिका के शासन-प्रशासन और विदेश नीति से जुड़े मूलभूत मूल्यों में पनपते मूलभूत मतभेदों की और इंगित करना नहीं भूलीं. उन्होंने चीन में मानवाधिकार हनन के मुद्दों को उठाया जो निश्चित तौर पर चीन को रास नहीं आया. 

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार मंत्री शर्मन ने साइबर हैकिंग, ताइवान की सुरक्षा, कोविड महामारी की वजह-सम्बन्धी विश्व स्वास्थ्य संगठन की जांच में सहयोग, पूर्वी और दक्षिण पूर्वी सागर में चीन की अतिक्रमण की गतिविधियों पर भी बाइडेन प्रशासन के विचार और चिंताएं जाहिर कीं. साथ ही कई साझा हितों के मुद्दों पर भी बातें हुई जिनमें अफगानिस्तान, उत्तरी कोरिया, ईरान, और म्यांमार जैसे मुद्दे छाए रहे.

वहीं दूसरी और चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार चीनी नेताओं ने भी अमेरिका को दो टूक सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शिन्हुआ के अनुसार वांग यी ने शर्मन से कहा कि अमेरिका को चीन-सम्बन्धी अपने ‘मिसगाइडेड माइंडसेट' और ‘खतरनाक नीतियों' - दोनों को छोड़ना चाहिए. चीन और अमेरिका के बीच संबंधों में कितना उतार आ चुका है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उपविदेश मंत्री शर्मन बाइडेन प्रशासन की तरफ से चीन की यात्रा करने वाली सबसे उच्चासीन पदाधिकारी हैं. 

भारत बनाम चीन
शर्मन की यात्रा के पीछे कहीं न कहीं एक मकसद यह भी था कि अक्टूबर 2021 में रोम में होने वाली G-20 की शिखर बैठक के दौरान जो बाइडेन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बात-चीत का रास्ता तलाशा जाए. 

लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं है. चीन अब इस बात के लिए तैयार नहीं दिखता कि अमेरिका अपने को सबसे बड़ी महाशक्ति के तौर पर देखे. इस सन्दर्भ में वांग यी का वक्तव्य गौरतलब है जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका को खुद को बेहतर और चीन को कमतर कर आंकना छोड़ना पड़ेगा.

जो भी हो, ब्लिंकेन और शर्मन की यात्राओं से आगामी समय के सामरिक और कूटनीतिक समीकरणों की रूपरेखा और साफ हो रही है. भारत के साथ अमेरिका की बढ़ती नजदीकियों में जहां इंडो-पैसिफिक व्यवस्था में भारत की बड़ी भूमिका एक अच्छी खबर है तो वहीं चीन के साथ अमेरिका और भारत दोनों के असहज रिश्ते इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और समृद्धि पर गहरे काले मंडराते बादलों की तरह. (dw.com)
 


30-Jul-2021 11:56 AM (34)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भारत की दृष्टि से इधर दो विदेश-यात्राएं ध्यान देने लायक हुई हैं। पहली अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की दिल्ली यात्रा और दूसरी तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की चीन-यात्रा! इन दोनों यात्राओं का उद्देश्य एक ही है। अपने-अपने हितों के लिए दूसरे राष्ट्रों को पटाना। ब्लिंकन भारत इसीलिए आए हैं कि अफगानिस्तान में वे अपनी जगह भारत को फंसाना चाहते हैं। भारत किसी भी हालत में अपनी सेनाएं काबुल नहीं भेजेगा लेकिन वह अशरफ गनी सरकार की सैनिक साज-सामान से मदद करता रह सकता है। वह अफगानों को सैनिक प्रशिक्षण देता रहा है और देता रहेगा लेकिन असली सवाल यह है कि इस वक्त ब्लिंकन भारत क्यों आए हैं ?

यह ठीक है कि तालिबान से दोहा में चल रही बातचीत में भारत को दर्शक की तरह शामिल कर लिया गया था लेकिन अमेरिका ने भारत सरकार से यह क्यों नहीं कहा कि वह तालिबान से सीधे बातचीत करे और अफगान सरकार और तालिबान का झगड़ा सुलझाए? यदि ऐसी कोशिश अमेरिका, रूस, चीन, तुर्की, पाकिस्तान और ईरान कर सकते हैं तो भारत क्यों नहीं कर सकता है? भारत को हाशिए में रखकर उसे अपने राष्ट्रहित के लिए इस्तेमाल करने की अमेरिकी नीति से भारत सरकार सावधान जरुर है लेकिन अफगान-मामले में उसका दब्बूपना समझ के बाहर है। हमारे विदेश मंत्री जयशंकर ने ब्लिंकन द्वारा उठाए गए भारत के लोकतांत्रिक मामलों का उचित कूटनीतिक भाषा में जवाब दिया है और ब्लिंकन ने भी अपने रवैए में जऱा नरमी दिखाई है लेकिन उन्होंने इस यात्रा के दौरान चीन पर जमकर निशाना साधा है।

दलाई लामा के प्रतिनिधि से मिलना भी इसका स्पष्ट संकेत है। चीन ने भी उसके लोकतंत्र के बारे में ब्लिंकन की टिप्पणी को आड़े हाथों लिया है। अफगानिस्तान का मामला अब अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा का मामला बनता जा रहा है। मुल्ला बरादर की चीन-यात्रा से ही शायद खफा होकर ब्लिंकन ने कह दिया कि यदि तालिबान हिंसा फैलाकर काबुल पर कब्जा कर लेंगे तो अफगानिस्तान दुनिया का अस्पृश्य राष्ट्र बन जाएगा। इस बात से भारत की सरकार को भी थोड़ा मरहम लगेगा लेकिन मुल्ला बरादर ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मिलने के बाद चीनी मदद के लिए तहे-दिल से आभार माना है और चीन के उइगर मुसलमानों के आंदोलन से तालिबान को अलग कर लिया है। उसने काबुल के पास आयनक नामक 60 लाख टन तांबे की खदान में 3 ?बिलियन डॉलर लगाने का वादा किया है। उसका रेशम महापथ तो अफगानिस्तान से गुजरेगा ही। वह नए अफगानिस्तान को बनाने में भारत को भी पीछे छोड़ देगा। जाहिर है कि अब तक के भारतीय महान योगदान पर चीन पानी फेरने की पूरी कोशिश करेगा। भारत को देखना है कि अफगानिस्तान में चलनेवाली चीन-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा में वह कहां खड़ा रह पाएगा?
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)  (नया इंडिया की अनुमति से)

 

 


29-Jul-2021 10:01 PM (73)

-कृष्ण कांत

 

उन्होंने कभी देश की आजादी के लिए भगत सिंह के साथ मिलकर सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका था, ताकि ‘बहरों को सुनाया जा सके।’
भगत सिंह को फांसी हुई और उन्हें कालापानी की सजा। करीब आठ साल बाद छूटकर आए तो गांधी का साथ देने के लिए फिर से आंदोलन में कूद पड़े। फिर पकड़े गए और फिर जेल गए। कुल मिलाकर करीब 15 साल जेल में रहे।
बहरे अंग्रेजों को उन्होंने अपना धमाका सुना भी दिया था, लेकिन स्वदेशी भूरे अंग्रेजों से वे हार गए। देश आजाद हो गया। अब आजादी का यह नायक अपनी जिंदगी जीने की जद्दोजहद से जूझ रहा था।
पेट पालने के लिए इस महान क्रांतिकारी ने क्या क्या नहीं किया? सिगरेट कंपनी का एजेंट बनकर पटना में गुटखा-तंबाकू की दुकानों के चक्कर लगाए। बेकरी में बिस्कुट और डबलरोटी बनाने का काम किया। एक मामूली टूरिस्ट गाइड बनकर पेट पालने के लिए रोटी कमाई।
वे एक ऐसे देश के नायक थे जहां राह चलते लोगों को भगवान बनाकर पूजा जाता है। लेकिन लोग उन्हें भूल चुके थे। इस महान क्रांतिकारी का नाम था बटुकेश्वर दत्त।
एक बार उन्होंने सोचा कि पटना में अपनी बस सर्विस शुरू की जाए। परमिट लेने की ख़ातिर कमिश्नर से मिले। कमिश्नर ने उनसे कहा कि प्रमाण पेश करो कि तुम बटुकेश्वर दत्त हो।
1964 में बटुकेश्वर दत्त बीमार पड़े। उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें बिस्तर तक नहीं नसीब नहीं हुआ। उनके इलाज को लेकर लापरवाही बरती गई।
अंतत: देर हो गई। हालत बिगडऩे पर उन्हें दिल्ली लाया गया। बटुकेश्वर दत्त ने पत्रकारों से कहा, ‘मैंने सपने में ही नहीं सोचा था कि जिस दिल्ली में मैंने बम फेंक कर इंकलाब जिंदाबाद की हुंकार भरी थी वहीं मैं अपाहिज की तरह लाया जाऊंगा’।
इस दौरान अस्पताल में पंजाब के मुख्यमंत्री बटुकेश्वर दत्त से मिलने पहुंचे। उन्होंने मदद की पेशकश की तो दत्त ने कहा, ‘हो सके तो मेरा दाह संस्कार वहीं करवा देना, जहां मेरे दोस्त भगत सिंह का हुआ था।’
20 जुलाई, 1965 को बटुकेश्वर दत्त अपने दोस्त भगत सिंह के पास चले गए।
बटुकेश्वर दत्त को याद करने की हिम्मत जुटाइये तो आपको रोना आ जाएगा। उन्होंने बलिदान, क्रांति, आंदोलन और इंकलाब का सर्वोच्च उदाहरण पेश किया था। लेकिन इस देश ने उनके साथ जो किया, वह नमकहरामी और कृतघ्नता का निकृष्टतम उदाहरण है।
बटुकेश्वर दत्त! हमारे खून का हर कतरा आपका कर्जदार है। नमन!
 


29-Jul-2021 2:07 PM (57)

-दिव्या आर्य

टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए पदक की दावेदार पहलवान विनेश फोगाट का सबसे पहला ‘दंगल’ अपनी सहूलियत के कपड़े पहनने का था। टी-शर्ट और ट्रैक-पैंट में कुश्ती करना बेहतर था, लेकिन ऐसे कपड़ों में उनके शरीर के उभार दिखने से लोगों को परेशानी थी।

हरियाणा में पली-बढ़ी विनेश जब सलवार-कुर्ते की जगह चुस्त पोशाक पहनकर अभ्यास करती तो कई उंगलियां उठतीं कि लडक़ी को ऐसे कपड़े पहनकर घर से निकलने कैसे दिया गया।
यानी लडक़ी अगर खेल खेले, तो तन ढका रहे और वो दंगल के अखाड़े में पारंपरिक लडक़ी बनी रहे, अगर कुछ लोगों का बस चलता तो वे कुश्ती के मुकाबले में भी घूँघट की माँग करते।
विनेश की बात हरियाणा के गाँव की है और पंद्रह साल पुरानी है, लेकिन दुनिया के हर कोने में, हर दौर में महिला खिलाडिय़ों की पोशाक पर चर्चा कई बार उनकी मेहनत और लगन पर हावी हो जाती है।
टोक्यो ओलंपिक में भी अपनी सहूलियत के कपड़े पहनने का एक दंगल चल रहा है। जर्मनी की महिला जिमनास्टिक टीम ने जांघों से पहले खत्म होने वाली पोशाक ‘लियोटार्ड’ की जगह पूरा बदन ढँकने वाली ‘यूनीटार्ड’ पहनने का फैसला किया।
उनका तर्क ये है कि ढँके बदन में उन्हें ज़्यादा सहूलियत है और मर्दों की तरह उन्हें भी इसकी आज़ादी मिलनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में महिला खिलाडिय़ों की पोशाक अक्सर ऊंची, छोटी और तंग रहती है।
वहीं मर्दों की पोशाक के नियमों में शरीर को आकर्षक दिखाने वाले कोई कायदे नहीं हैं, सारा ध्यान खेलने की सहूलियत पर होता है। अभी तक ऐसा विवाद शायद नहीं हुआ, लेकिन अगर कोई महिला खिलाड़ी स्कर्ट की जगह, पुरुषों की तरह लंबे शॉर्ट्स में टेनिस खेलने आएगी तो न जाने क्या प्रतिक्रिया होगी?
खेल के नियम बनानेवालों और बाजार ने महिलाओं के शरीर को उनके खेल जितनी ही अहमियत जो दे रखी है। यानी लडक़ी खेल खेले, तो चाहे जितनी दौड़-भाग हो पर वो आकर्षक बनी रहे।
मर्दाना दुनिया में आकर्षक औरतें
खेल की दुनिया को हमेशा मर्दाना माना गया है। औरतों की कोमल समझी जाने वाली प्रवृत्ति से अलग, शारीरिक दम-खम बढ़ाने के लिए पसीने में भीगी, कठोर दिनचर्या वाली जिंदगी। लेकिन विडंबना ये कि उसमें भी औरत से सुंदरता और शारीरिक आकर्षण बनाए रखने की उम्मीद कायम रहती है। और हद तो ये है कि अगर वो आकर्षक बनी रहे तो खेल से ध्यान हटने का आरोप भी सबसे पहले उसी पर लगता है।
विनेश की बड़ी बहन गीता ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके करियर के शुरुआती समय में लोग घात लगाए रहते थे कि लडक़ी से कोई चूक हो जाए या कोई लडक़ा दोस्त बन जाए तो कैसे इनके मां-बाप को शर्मिंदा करके ये जता दिया जाए कि इन्हें छूट देना गलत था। यानी लडक़ी खेल खेले, और आकर्षक हो तो बदचलन भी हो सकती है।
बीमारी जाती नहीं
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज ने साल 2017 में जब बिना बाज़ू की टॉप में अपनी एक सेल्फी ट्विटर पर पोस्ट की तो उन पर ताने कसने वालों की कमी नहीं थी।
उन्हें ट्विटर पर तो ट्रोल किया ही गया, मीडिया में उनके बारे में छपे लेख की हेडलाइंस ने भी ‘पॉर्न स्टार’, ‘इनडीसेंट’ और ‘एक्सप्लोसिव’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।
खेल की मर्दाना दुनिया में ‘मॉडर्न’ और ‘फॉर्वर्ड’ होने के ऐसे तमगे महिलाओं पर ही लगाए जाते हैं। उन्हीं के कपड़ों पर सवाल उठते हैं। चाहे वो मैदान पर हों या बाहर।
18 साल की उम्र में टेनिस की दुनिया में भारत का नाम करने वाली सानिया मिजऱ्ा की पोशाक भी मर्यादाओं के उल्लंघन के आरोप के घेरे में आई थी।
साल 2005 में सुन्नी उलेमा बोर्ड के एक मौलाना ने उनपर ‘अभद्र’ कपड़े पहनकर खेलने का आरोप लगाया जिससे उनके मुताबिक ‘नौजवान लड़कियों पर बुरा असर पड़ रहा था।’
उन्होंने फतवा जारी करके कहा था कि इस्लाम औरतों को छोटी निकर, स्कर्ट और बिना बाज़ू के कपड़े पहनने की इजाजत नहीं देता और सानिया जैसे कपड़े पहनती हैं वो शरीर के बड़े हिस्सों को ढँकती नहीं, जिसके बाद कल्पना करने के लिए कुछ नहीं बचता।
सानिया ने फतवे पर टिप्पणी देने से मना कर दिया और बस इतना कहा कि उनके कपड़ों पर इतना विवाद हो, ये उन्हें परेशान करता है।
परेशान तो करेगा ही। कभी धर्म तो कभी समाज और कभी बाजार, महिला खिलाड़ी के शरीर से नजर हटती ही नहीं है।
‘सेक्सिजम’ और हिंसा का संबंध
मर्दों की दुनिया में, खेल के कपड़ों में, अक्सर महिला खिलाडिय़ों को ‘अवेलेबल’ भी मान लिया जाता है। सुरक्षित माने जाने वाले ट्रेनिंग सेंटर्स और कोच के हाथों यौन उत्पीडऩ के किस्से आम हैं, लेकिन आवाज उठाना मुश्किल है और पहले से ही दुर्लभ मौकों को खोने का दबाव ज़्यादा।
महिला खिलाडिय़ों को उनके आकर्षण के चश्मे से देखने और इस हिंसा का गहरा ताल्लुक है।
जर्मन जिमनास्टिक्स टीम ने टोक्यो ओलंपिक से पहले, इसी साल अप्रैल में यूरोपियन आर्टिस्टिक जिमनास्टिक्स चैम्पियनशिप में पहली बार ‘यूनीटार्ड’ पहनकर अपना विरोध दर्ज किया था।
जर्मन फेडरेशन ने कहा था कि जिमनास्टिक्स में महिलाओं की ‘सेक्सुअलाइज़ेशन’ और यौन हिंसा रोकने के लिए ये कदम जरूरी है।
जिमनास्टिक्स की दुनिया में हिंसा का ताज़ा उदाहरण अमेरिकी महिला टीम के डॉक्टर रहे लैरी नासर का है, जिन पर 150 महिला खिलाडिय़ों ने यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया और जिन्हें अब 175 साल की जेल की सज़ा हो गई है। लेकिन ‘सेक्सिस्ट’ सोच और संस्कृति में बदलाव लाना आसान नहीं है।
पिछले सप्ताह नार्वे की महिला बीच-हैंडबॉल टीम ने भी जब अपनी सहूलियत को आगे रखते हुए बिकिनी शॉर्ट्स की जगह निकर पहनने का फैसला किया तो उन्हें पोशाक के नियम के उल्लंघन के लिए हर्जाना देना पड़ा, लेकिन महिला खिलाड़ी अकेली भी नहीं। अमेरिकी पॉप स्टार ‘पिंक’ ने इस हर्जाने का खर्च उठाने की पेशकश की है।
अपने ट्वीट में उन्होंने कहा कि हर्जाना तो ऐसे ‘सेक्सिस्ट’ नियम बनाने वाली फेडरेशन पर लगाया जाना चाहिए, ‘मुझे नॉर्वे की महिला टीम पर गर्व है, बढ़े चलो।’
वैसे इस ‘बढ़े चलो’ के नारे को जीने में अभी बहुत सारे दंगल बाकी हैं। (bbc.com/hindi)
 

 


29-Jul-2021 12:51 PM (80)

-डॉ. संजय शुक्ला

 

छत्तीसगढ़ सरकार ने आगामी 2 अगस्त से कोविड संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी सुरक्षा और सावधानियों के साथ स्कूल और कॉलेज खोलने का फैसला किया है। देश के अनेक राज्यों में भी अब शिक्षण संस्थान खुल रहे हैं। वैश्विक महामारी कोरोना के कारण बीते 15 महिनों से अमूमन देश के सभी स्कूल, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में तालाबंदी है।शिक्षा किसी भी राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विकास की बुनियाद होती है लेकिन कोरोना ने इस बुनियाद पर ही आघात किया है। संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक कोरोना के कारण दुनिया के 160 करोड़ बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है। भारत में सरकारी शिक्षा पहले से ही बदहाल थी लेकिन इस महामारी ने इस व्यवस्था पर ‘दुबले पर दो आषाढ़’ की कहावत को चरितार्थ कर दिया है। कोरोनाकाल के दौरान देश के शिक्षा व्यवस्था पर नजर डालें तो सरकारों की प्राथमिकता में यह हाशिये पर ही रहा। सरकार और शिक्षा विभाग से जुड़े नीति नियंताओं ने शिक्षा के नाम पर ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल पाठ्य सामग्री, सिलेबस में कटौती और परीक्षाओं को रद्द कर जनरल प्रमोशन को ही इस चुनौती का हल मान लिया जबकि दुनिया भर के महामारी विशेषज्ञ लगातार यह चेताते रहे कि इस महामारी की मियाद तय नहीं है और यह आपदा लहर दर लहर कहर बरपाएगी। अहम सवाल यह कि रणनीतिकारों ने चेतावनी के लिहाज से शिक्षण और परीक्षा की कारगर योजना क्यों तैयार नहीं किया ? गौरतलब है कि दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देशों ने महामारी के लिहाज से अपने क्लासरूम से लेकर पढ़ाई और परीक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव किए हैं ताकि सभी छात्रों को समान शिक्षा का अवसर मिले लेकिन भारत अभी भी अपने पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है जिसका खामियाजा देश के भविष्य को भोगना होगा। बहरहाल अनलॉक के इस दौर में जब देश भर के बाजार, मॉल, मल्टीप्लेक्स, जिम, स्वीमिंग पूल और धार्मिक स्थल खुल चुके हैं तब स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की तालाबंदी खत्म करना आवश्यक है। गौरतलब है कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के चौथे सीरो सर्वे के नतीजों के मुताबिक देश के 67.6 फीसदी लोगों में कोरोना एंटीबॉडी बन चुकी है तथा बच्चों में संक्रमण का खतरा कम है इसलिए अब स्कूल और कॉलेज खोलने पर विचार किया जा सकता है।

भारत में बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था में शुरुआत से ही असमानता रही है, महामारी ने असमानता की इस खाई को और भी गहरा कर दिया है। एक तरफ संपन्न छात्र ऑनलाइन पढा़ई कर रहे हैं तो दूसरी ओर आर्थिक रूप से कमजोर छात्र इस वर्चुअल पढा़ई से कोसों दूर हैं। गौरतलब है कि कोरोना लॉकडाउन ने हजारों अभिभावकों के आजीविका और आय पर बुरा असर डाला है फलस्वरूप वे अपने बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी कम्प्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। इन दुश्वारियों का परिणाम यह कि लाखों बच्चों और युवाओं की पढ़ाई बाधित हो रही है और उन्हें अपनी पढ़ाई छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।  हमारे समाज में पहले से ही बालिका शिक्षा के प्रति भेदभाव था लेकिन अब महामारी और गरीबी के कारण लड़कियों की पढ़ाई छूटने की संभावना बढ़ रही है। एक शोध के मुताबिक आर्थिक रूप से कमजोर 70 फीसदी परिवारों ने माना है कि आर्थिक तंगी के कारण वे अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में अहम सवाल यह कि गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर में बिना पढा़ई के समान अवसर के गरीब छात्र साधन संपन्न छात्रों से कैसे मुकाबला करेंगे? आर्थिक आधार पर संसाधनों की कमी के कारण गरीब छात्रों के मेधा का क्षरण निश्चित तौर पर कल के भारत में सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई को चौड़ा करेगी। विचारणीय तथ्य यह भी कि मेडिकल, इंजीनियरिंग, विधि और नर्सिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्स में वर्चुअल पढा़ई आखिरकार कैसे संभव है? इन पाठ्यक्रमों में तो सैद्धांतिक पक्ष के साथ प्रायोगिक अध्ययन भी अत्यावश्यक है। इन परिस्थितियों में इन कोर्सेज से निकलने वाले प्रोफेशनल की गुणवत्ता और दक्षता पर भी सवालिया निशान लगेंगे।

दूसरी ओर अभिभावकों के मुताबिक ऑनलाइन पढ़ाई उतना कारगर साबित नहीं हो रही है बल्कि बच्चे इंटरनेट पर आपत्तिजनक चीजें देखने और ऑनलाइन गेम के आदी बन रहे हैं। राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग के हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 10 साल उम्र के 59.2 फीसदी बच्चे स्मार्ट फोन का इस्तेमाल सोशल मीडिया में चैटिंग के लिए कर रहे हैं और इनका सोशल नेटवर्किंग अकाउंट बन चुका है। आश्चर्यजनक रूप से केवल 10 फीसदी बच्चे ही मोबाइल फोन का उपयोग ऑनलाइन पढ़ाई के लिए कर रहे हैं। एक अन्य अध्ययन के अनुसार देश के लाखों अंध, मूक-बधिर छात्र वर्चुअल पढ़ाई में असमर्थ हैं। बुनियादी शिक्षा ही उच्च शिक्षा की बुनियाद होती है और शिक्षा का पूरा ढांचा उत्तरोत्तर एक समयबद्ध व्यवस्था में नियत है जिसका संचालन और मूल्यांकन शिक्षण और परीक्षा पर निर्भर है। बीते दो शिक्षा सत्रों के दौरान स्कूलों और कालेजों में कक्षा और परीक्षा दोनों बंद है।  महामारी के कारण चौपट होती शिक्षा व्यवस्था की चिंता शिक्षाविदों, अध्यापकों और अभिभावकों को बहुत ज्यादा है। दरअसल बच्चे और युवा स्कूल व कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ दोस्ती, धैर्य, आदर, सामूहिकता, विनम्रता और दूसरे की संस्कृति से परिचय इत्यादि सीखते हैं वे अपने शिक्षक और सहपाठियों से विषयों को समझते हैं लेकिन वे अभी इनसे वंचित हैं। स्कूल बंद होने तथा मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर घंटों बैठने का असर बच्चों, किशोरों व युवाओं के शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। हमारी भावी पीढ़ी मोटापा, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, भय, एकाकीपन,अनिद्रा और अवसाद जैसे रोगों का शिकार हो रहे हैं।

गौरतलब है कि शिक्षा के मूल में सीखने का कौशल, विषयों को समझना और विश्लेषण करना, शिक्षक और छात्र के बीच परस्पर सवाल -जवाब है जो वर्चुअल माध्यम में संभव नहीं है बल्कि फिजिकल स्कूल और क्लास ही इसके उपयुक्त माध्यम है। भारत जैसे कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश में ऑनलाइन शिक्षा ग्रामीण भारत और गरीबों के लिए दूर की कौड़ी  है। दरअसल ऑनलाइन पढ़ाई एक मजबूरीवश व्यवस्था है, लिहाजा स्कूलों को सतर्कता के साथ खोलने पर विचार किया जाना चाहिए। दुनिया के 51 देशों में कोरोनारोधी सावधानियों के साथ स्कूल और कॉलेज खुल चुके हैं। भारत में भी लगातार अनलॉक और संक्रमण के कम होते मामलों के मद्देनजर शिक्षण संस्थानों को खोलने की दिशा में आगे बढऩा चाहिये, क्योंकि शिक्षा के पहिये को पीछे घुमाया नहीं जा सकता है। इस बीच विशेषज्ञों ने महामारी की तीसरी लहर और यह लहर बच्चों के लिए घातक होने संबंधी चेतावनी जारी की है हालांकि बच्चों पर प्रभाव के संबंध में मतभिन्नता है।बेशक बच्चों का स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता है और अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों के सेहत के खातिर उन्हें स्कूल भेजने के लिए सहमत नहीं हैं। दूसरा पहलू यह भी कि महामारी की अनिश्चितता और बच्चों के भविष्य के लिहाज से अभिभावकों को साकारात्मक होना होगा और अपने

बच्चों को जिम्मेदार और जागरूक बनाना होगा ताकि वे भविष्य की चुनौतियों से जूझ सके।हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने स्कूल खोलने व संचालन के लिए ग्राम पंचायत, पार्षद,स्कूल प्रबंधन और पालक समिति को जिम्मा सौंपा है यानि इनके सहमति और व्यवस्थानुसार स्कूल संचालित होंगे।

हालिया परिस्थिति में शिक्षकों और स्कूली स्टाफ का टीकाकरण कर बच्चों को संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी सभी साधनों जैसे मास्क, सेनेटाइजर और सोशल डिस्टेसिंग का पालन सुनिश्चित करते हुए कालखंडों की अवधि कम कर स्कूल खोलने की दिशा में प्रयास होना चाहिये। स्कूलों में छात्रों के बीच सोशल डिस्टेसिंग कायम रखने के उद्देश्य से एक क्लास रूम में एक तिहाई छात्रों की बैच बनाकर हर बैच की एक दिन के अंतराल में कक्षाएँ लगाई जाएं तथा उन्हें अंतराल के बीच वाले दिन के लिए पर्याप्त होमवर्क दिए जाऐं ताकि छात्र घर में भी पढ़ाई करें। दरअसल यह देखा जा रहा है कि लगातार स्कूल बंद होने और जनरल प्रमोशन के कारण विद्यार्थियों में पढ़ाई के प्रति रूचि बहुत तेजी से खत्म हो रही है तथा वे पुस्तक-कापी से दूर हो रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों की कक्षाओं को साफ-सुथरा और हवादार रखते हुए नियमित सेनेटाइजिंग की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। रोगप्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखने के उद्देश्य से स्कूली बच्चों को नियमित योगाभ्यास के साथ मध्याह्न भोजन में प्रोटीन और विटामिन सी युक्त पौष्टिक खाद्य सामग्री परोसे जाऐं। विचारणीय है कि शिक्षा से ही समाज में व्याप्त गरीबी, असमानता, भेदभाव, कुरूतियों और अंधविश्वास को दूर किया जा सकता है लेकिन जब समाज का ही एक हिस्सा शिक्षा के समान अवसर से अछूता रहेगा तो विसंगतियां कैसे खत्म होगी ? गौरतलब है कि महामारी की मियाद तय नहीं है लिहाजा सरकारों को अभिभावकों को भरोसे में लेकर शिक्षा को अनलॉक करने  की दिशा में गंभीरता से विचार करना ही होगा आखिरकार यह भारत के भविष्य से जुड़ा मसला है।
(लेखक शासकीय आयुर्वेद कॉलेज, रायपुर में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)


29-Jul-2021 12:06 PM (38)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संसद का यह वर्षाकालीन सत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण होना था लेकिन वह प्रतिदिन निरर्थकता की ओर बढ़ता चला जा रहा है। कोरोना महामारी, बेरोजगारी, अफगान-संकट, भारत-चीन विवाद, जातीय जनगणना आदि कई मुद्दों पर सार्थक संसदीय बहस की उम्मीद थी लेकिन पेगासस जासूसी कांड इस सत्र को ही लील गया है। पिछले लगभग दो सप्ताह से दोनों सदनों का काम-काज ठप्प है। दोनों सदन अनवरत शोर-शराबे के बाद रोज ही स्थगित हो जाते हैं। संसद चलाने का एक दिन का खर्च 44 करोड़ रु. होता है। लगभग 500 करोड़ रु. पर तो पानी फिर चुका है।

ये पैसा उन लोगों से वसूला जाता है जो दिन-रात अपना खून-पसीना एक करके कमाते हैं और सरकार का टैक्स भरते हैं। ऐसा लगता है कि संसद का सत्र चलाने की परवाह न तो सरकार को है और न ही विपक्ष को ! दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े हुए हैं। ये शायद अड़ते नहीं लेकिन पेगासस जासूसी का मामला अचानक ऐसा उभरा कि पक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें भांजने लगे। क्या विपक्ष के लोगों को पता नहीं कि जासूसी किए बिना कोई सरकार क्या, कोई परिवार भी नहीं चल सकता?

वे खुद जब सत्ता में थे तो क्या वे जासूसी नहीं करते थे ? क्या कांग्रेसी शासन में उसके वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने दफ्तर में ही जासूसी यंत्र लगे होने की शिकायत नहीं की थी? देश के प्रांतों में चल रही विरोधी दलों की सरकारें क्या जासूसी नहीं करतीं ? लेकिन जासूसी के मुद्दे पर संसद में बहस की मांग बिल्कुल जायज है और सरकार को यह बताना होगा कि फलां-फलां आदमी की जासूसी वह क्यों करती थी ? यदि उसने जानबूझकर या गलती से देश के कुछ निरापद और महत्वपूर्ण लोगों की जासूसी की है या उसके अफसरों ने उस सूची में कुछ मनमाने नाम जोड़ लिये हैं तो वह सार्वजनिक तौर पर क्षमा क्यों नहीं मांग लेती है?

जासूसी के मामले को वह जितना छिपाएगी, उसकी चादर उतनी ही उघड़ती चली जाएगी लेकिन विरोधी दलों को भी सोचना चाहिए कि यदि वे संसद को चलने ही नहीं देंगे तो जासूसी का यह मामला आया-गया-सा ही हो जाएगा। वे संसद का सत्र बाकायदा चलने क्यों नहीं देते ? वे प्रश्न पूछ सकते हैं, स्थगन-प्रस्ताव और ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ला सकते हैं। वे बीच में हस्तक्षेप भी कर सकते हैं। विरोधी दल इस मुद्दे पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सांसदों से कह रहे हैं कि वे विरोधियों की पोल खोलें। इसका अर्थ क्या यह नहीं हुआ कि हमारे देश के सभी राजनीतिक दल सतही राजनीति में उलझ रहे हैं और संसद-जैसे लोकतंत्र के प्रकाश-स्तंभ की रोशनी को धुंधला करते चले जा रहे हैं ?
(नया इंडिया की अनुमति से)


28-Jul-2021 1:30 PM (68)

-सुदामा चौधरी

शहर लखनऊ में बसे उपनगर गोमती नगर में एक बड़े आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नजरों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था- मैं इतना बड़ा आईएएस अफसर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो दिल्ली में बसना चाहिए था और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे।

परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया-आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है? कि बल्ब किस कम्पनी का बना हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के फ्यूज होने के बाद इनमें से कोई भी बात बिल्कुल ही मायने नहीं रखती है। लोग ऐसे बल्ब को कबाड़ में डाल देते हैं। है कि नहीं?

फिर जब उन रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति में सिर हिलाया तो बुजुर्ग फिर बोले-रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो जाती है। हम कहां काम करते थे, कितने बड़े/छोटे पद पर थे, हमारा क्या रुतबा था, यह सब कुछ भी कोई मायने नहीं रखता। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे सिंह साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो मेहरा जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज बल्ब करीब-करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं तो कोई उपयोगिता नहीं। उगते सूर्य को जल चढ़ाकर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं करता।

कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते हैं कि रिटायरमेंट के बाद भी उनसे अपने अच्छे दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे नेम प्लेट लगाते हैं- रिटायर्ड आइएएस/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज आदि-आदि। अब ये रिटायर्ड आईएएस/आईपीएस/पीसीएस/तहसीलदार/ पटवारी/बाबू/प्रोफेसर/प्रिंसिपल/अध्यापक कौन-सी पोस्ट होती है। भाई माना कि आप बहुत बड़े ऑफिसर थे, बहुत काबिल भी थे, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती थी पर अब क्या? अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि मायने रखती है कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे थे। आपने कितनी जिंदगियों को छुआ। आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी। समाज को क्या दिया कितने लोगों की मदद की पद पर रहते हुए कभी घमंड आए तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन सबको फ्यूज होना है।
 


28-Jul-2021 11:57 AM (55)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

यह कोई विचित्र संयोग नहीं है कि अमेरिका के विदेश मंत्री भारत आए हुए हैं और पाकिस्तान के विदेश मंत्री चीन गए हुए हैं। दोनों का मकसद एक-जैसा ही है। दोनों चाहते हैं कि अफगानिस्तान में खून की नदियां न बहें और दोनों का वहां वर्चस्व बना रहे। अमेरिका चाहता है कि इस लक्ष्य की पूर्ति में भारत उसकी मदद करे और पाकिस्तान चाहता है कि चीन उसकी मदद करे। हम पहले चीन को लें। चीन को तालिबान से क्या शिकायत है? उसे कौनसा डर है? उसे डर यह है कि यदि काबुल पर तालिबान का कब्जा हो गया तो चीन का सिंक्यांग (शिनच्यांग) प्रांत उसके हाथ से निकल सकता है। वहां पिछले कई दशकों से पूर्वी तुर्किस्तान आंदोलन चल रहा है।

वहां के उइगर मुसलमानों ने पहले च्यांग काई शेक और फिर माओ त्से तुंग की नाक में भी दम कर रखा था। वे अपना स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्र चाहते हैं। माना जाता है कि चीनी सरकार ने लगभग 10 लाख उइगर मुसलमानों को अपने यातना-शिविरों में कैद कर रखा है। लगभग 10 साल पहले जब मैं इस प्रांत की राजधानी उरुमची में गया था तो उइगरों की बदहाली देखकर मैं दंग रह गया था। चीन को लग रहा था कि यदि काबुल में तालिबान आ गए तो वे चीन के विरुद्ध जिहाद छेड़ देंगे और कई अमेरिकापरस्त इस्लामी राष्ट्र उनका साथ दे देंगे। इसीलिए चीन ने तालिबान नेताओं को पेइचिंग बुलवाकर उनसे कहलवा लिया कि उइगर आंदोलन से उनका कुछ लेना-देना नहीं है।

लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के संयुक्त बयान में कहा गया है कि उनके दोनों देश मिलकर अफगान-संकट के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिश करेंगे। गृहयुद्ध को रोकेंगे। पूर्वी तुर्किस्तान मुस्लिम आंदोलन और अफगानिस्तान के आतंकवाद को रोकेंगे। जान-बूझकर इस बयान में तालिबान का नाम नहीं लिया गया है, क्योंकि पाकिस्तान बड़ी दुविधा में है। हालांकि तालिबान उसी का पनपाया हुआ पेड़ है लेकिन उसको डर है कि काबुल में उनके आते ही लाखों अफगान शरणार्थी पाकिस्तान में डेरा डाल लेंगे।

तालिबान जरा मजबूत हुए नहीं कि वे पेशावर पर अपना दावा ठोक सकते हैं। इसके अलावा यदि बातचीत से मामला हल नहीं हुआ तो अफगानिस्तान में खून की नदियां बहेंगी। पिछले दो माह में लगभग 2500 अफगान मारे जा चुके हैं। सैकड़ों अफगान फौजी डर के मारे पहले ताजिकिस्तान और अब पाकिस्तान में जाकर छिप गए हैं। अमेरिका और चीन, दोनों ही अपने-अपने दांव चल रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान जैसे चीन का पिछलग्गू बना हुआ है, वैसे भारत अमेरिका का नहीं बन सकता। इस वक्त भारत को अपने कदम बहुत फूंक-फूंककर रखने होंगे। अमेरिका लाख चाहे लेकिन भारत को अपनी फौजें काबुल नहीं भेजनी हैं। अमेरिका उजबेक और ताजिक हवाई अड्डों का इस्तेमाल करके गनी सरकार की मदद करना चाहे तो जरुर करे लेकिन बेहतर यही होगा कि काबुल में एक सर्वदलीय कामचलाऊ सरकार बने और चुनाव द्वारा भविष्य में उसकी लोकतांत्रिक राजनीति चले।
(नया इंडिया की अनुमति से)

 


27-Jul-2021 7:54 PM (79)

-रवीश कुमार

किसी भी शहर में एक्सप्रेस-वे के एलान के समय अगर इस तरह की हेडलाइन हो तब क्या असर होगा। अमर उजाला की एक ख़बर पढ़ते समय ख़्याल आया कि अगर ऐसी योजनाओं के एलान के समय इस तरह से छापा जाए कि ऑटो, दुपहिया वाहन, रिक्शा-ठेला, साइकिल और ट्रैक्टर के लिए नहीं है, केवल कार वालों के लिए है तो विकास को लेकर आम जनता के मन में कैसी छवि बनती। ख़बर छपती कि कार वाले दिल्ली से मेरठ पहुँचेंगे एक घंटे में लेकिन गाँव वाले ट्रैक्टर लेकर गए तो जाएँगे जेल। मेरठ पहुँचने में लग जाएँगे कि कई दिन। लेकिन होगी ज़मानत। तब फिर हम और आप विकास को किस नज़र से देखते। लेकिन जब ऐसी योजनाओं का एलान होता है तब ऐसी सूचनाएँ पीछे रह जाती हैं और होती ही नहीं हैं। आस-पास के लोगों को लगता है कि विकास आ रहा है। इलाक़े का विकास हो जाएगा।
 
अमर उजाला की इस ख़बर को पढ़ना चाहिए। कोई कमिश्नर हैं जो मेरठ-दिल्ली एक्सप्रेस-वे की प्रगति की समीक्षा कर रहे हैं। समीक्षा बैठक में उन्होंने कहा है कि "ऑटो, टू-व्हीलर, ट्रैक्टर और अन्य अनधिकृत वाहनों के चलाने पर एफआईआर की जाएगी। इसके लिए ट्रैफ़िक पुलिस को सख़्त निर्देश दिए।  एक्सप्रेस-वे के पास अवैध होर्डिंग, ढाबे पर कार्रवाई करने के आदेश भी दिए गए।" क्या ऐसी योजनाओं के लाँच के समय अख़बार या चैनल का संवाददाता घोषणा के समय यह सवाल करता है कि कार वालों के लिए एक्सप्रेस-वे बन रहा है लेकिन ट्रैक्टर चालकों के लिए रास्ता क्या होगा, क्या कोई लेन बन रही है या उनकी चिन्ता ही नहीं है? या फिर घोषणा के वक़्त यह सब बताया ही नहीं जाता है। अख़बार में बड़ा सा विज्ञापन छप जाता है कि दिल्ली से मेरठ पहुँचना हुआ आसान।

एक्सप्रेस-वे के आते ही सबसे पहले जो चीज़ ग़ायब होती है वह स्थानीय लोगों के विकास की ही है। जिन सड़कों को पार कर गाँव के किसान इस खेत से उस खेत में चले जाते थे या रिश्तेदारों के यहाँ जाया करते थे अब वहाँ पहुँचने के लिए तीन किलोमीटर का लंबा यूँ-टर्न ले रहे हैं ताकि दूर से आने वाले जल्दी गुज़र सकें और जो नज़दीक के हैं वो देर से गुज़रा करें। जहां से भी एक्सप्रेस-वे गुज़रता है वहाँ के स्थानीय लोग उसके कारण अपने आने-जाने की जगहों से और दूर हो जाते हैं। वहाँ तक पहुँचने के लिए पहले से ज़्यादा पैसे भी ख़र्च करते हैं। आज कल पेट्रोल सौ रुपया लीटर है।कार वालों के लिए रफ़्तार ज़रूरी है तो फिर उसमें ऑटो और टू-व्हीलर के लिए लेन क्यों नहीं है।

एक्सप्रेस-वे होना चाहिए या नहीं होना चाहिए इस बहस को छोड़ कर इस पर बात कीजिए कि होना चाहिए तो कैसा होना चाहिए। क्या केवल कार वालों के लिए होना चाहिए। जिस एक्सप्रेस-वे के लिए किसानों की ज़मीन ली जाएगी उसी पर ट्रैक्टर के चलने की अनुमति नहीं होगी। कमिश्नर ने कहा है कि अनधिकृत वाहन नहीं चलेंगे। जब आप कोई भी गाड़ी ख़रीदते हैं तो रोड टैक्स देते हैं। आपका वाहन सड़क पर चलने के लिए अधिकृत होता है लेकिन एक्सप्रेस-वे बनने के बाद एक ख़ास रास्ते के लिए अनधिकृत हो जाता है।

दशकों पहले जब एक्सप्रेस-वे की धारणा जब आयात होकर भारत आई तो भारत में पहले से मौजूद सड़कों के अनुभवों और उनके किनारे विकसित आर्थिक गतिविधियों को उजाड़ दिया गया। धारणा बनी कि सड़क ऐसी हो जिस पर आगे-पीछे, अग़ल-बगल कार वाले ही दिखें। इससे कारें बिकेंगी। अब ऑटोमोबिल सेक्टर पहले की तरह रोज़गार नहीं देता है। सारी बड़ी कंपनियों की कार बनाने की प्रक्रिया रोबोट पर आधारित हो चुकी है। वहाँ आदमी की ज़रूरत पहले से काफ़ी कम हो गई है। लेकिन इस सेक्टर के लिए सड़कों पर मौजूद कारोबार को ख़त्म कर दिया गया। आप एक्सप्रेस वे से दायें-बायें कट नहीं सकते हैं। एक बार प्रवेश किया तो रास्ता उसी तरह से तय करना होगा जैसे सड़क बनाई गई है।

पहले क्या था। सड़क के किराने बहुत से ढाबे वाले होते थे। उन ढाबों पर रुकते समय स्थानीय उत्पादों को भी लोग ख़रीदा करते थे। इससे आस-पास के लोगों के लिए काम के छोटे-मोटे अवसर बनते होंगे और कुछ अमीर लोग भी पैदा होते होंगे। इसके अलावा इन ढाबों से ख़ास विशेषज्ञताएं भी पनपती हैं। किसी का पेठा लोकप्रिय होता है, किसी की लस्सी तो किसी का पराठा। एक्सप्रेस की अवधारणा से ढाबे ग़ायब हैं।कमिश्नर ने कहा है कि किनारे अवैध रुप से चलने वाले ढाबे पाए गए तो एफ आई आर होगी। आप लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर जाइये। केवल सड़क दिखती है। ढाबे ग़ायब हैं। बहुत लंबा चलने के बाद एक ढाबा आता है जिसे ठेके पर किसी को दिया गया होता है। जहां कार पार्क करने की सुविधा है। चीज़ें इतनी महँगी हैं कि रोडवेज़ की बस में चलने वाले मुश्किल से ही कुछ ख़रीद सकते हैं।

मैंने जो कहा वह कोई नई बात नहीं है। दिल्ली में जब फ्लाईओवर का दौर शुरू हो रहा था तब प्रो दिनेश मोहन इन बातों को इसी तरह से रखा करते थे। पहले सड़क पर जाम लगता था अब फ्लाईओवर पर लगता है। बहुत कम अपवाद होंगे। उनकी बातें उस समय की थीं जब इन चीज़ों की अवधारणा को लेकर भारत में बेच कर विद्वान बन रहे थे। तब लगता था प्रो दिनेश मोहन पुराने ज़माने की बात कर रहे हैं। आज उनके उठाए सवालों को सच होते देख रहा हूँ। सरकार यही एक रिपोर्ट रख दे कि एक्सप्रेस-वे बनने के बाद उस इलाक़े का विकास कैसे होता है। विकास होता है या विकास के नाम पर विस्थापन होता है।


27-Jul-2021 7:50 PM (41)

-गिरीश मालवीय

 

अरब स्प्रिंग क्या अब किसी को याद है ? कल जब ट्यूनीशिया में हुई हिंसा से जुड़ी खबरें सुर्खियों में आई तो मुझे इस आंदोलन की याद आयी ...दरअसल अरब स्प्रिंग की शुरुआत ट्यूनीशिया से ही हुई थी... हुआ यह था कि 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनीशिया में मोहम्मद बउजिजि नाम के फल विक्रेता ने पुलिस और प्रशासन की 'नाइंसाफी' से परेशान होकर खुद को आग लगा ली थी, शासक जैनुल आबिदीन बेन अली की हुकूमत ट्यूनीशिया में 24 साल से चल रही थी। जाहिर है, लोगों का गुस्सा शांत करने की कोई जरूरत उसे नहीं महसूस हुई। ....बोआजिजी की मौत के महज 10 दिनों के भीतर ही पूरे ट्यूनिशिया में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. लोगों में गुस्सा इतना ज्यादा था कि सरकार के खिलाफ हिंसा शुरू हो गई. राष्ट्रपति बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा.

इस आंदोलन की आग ट्यूनिशिया तक नहीं रुकी बल्कि इसने देखते-देखते कई देशों को अपनी चपेट में ले लिया. ट्यूनिशिया के बाद लीबिया, मिस्र, यमन, सीरिया और बहरीन में भी हजारों लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. 2011 में मिस्र का तहरीर चौक अरब क्रांति की नई तस्वीर बन गई. न सिर्फ बेन अली, गद्दाफी, होस्नी मुबारक और अली अब्दुल्ला सालेह जैसे शासकों को सत्ता छोड़नी पड़ी. मोरक्को, इराक, अल्जीरिया, ईरान, लेबनान, जॉर्डन, कुवैत, ओमान तक प्रदर्शन देखने को मिले।

अरब स्प्रिंग के जरिए दुनिया को पहली बार सोशल मीडिया की संभावनाओं और ताकत का अंदाजा लगा था। इस विद्रोह में सोशल मीडिया ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। लोगों ने यमन, सीरिया, लीबिया, मिस्र जैसे देशों से तस्वीरें और वीडियो ट्विटर, फेसबुक और YouTube पर अपलोड किए। दुनिया ने तानाशाही के मंजर को  कभी रिकॉर्डेड तो कभी लाइव देखा. युवाओं ने संगठित होने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया. जिन बातों को सरकारें छुपाना चाहती थीं, वहीं दुनिया हर समय देख रही थी।

इस आंदोलन के ग्लोबल प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि अप्रैल 2011 में भारत में शुरू हुए जनलोकपाल आंदोलन में जंतर-मंतर की तुलना तहरीर चौक से अक्सर की जाती थी।

लेकिन कल ट्यूनीशिया से आई खबर बताती है कि अरब स्प्रिंग का आंदोलन अंदर से कितना खोखला था ट्यूनीशिया में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 70% से अधिक ट्यूनीशियाई सोचते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य क्रांति से पहले की तुलना में बदतर है।

अरब स्प्रिंग की शुरुआत के दस साल बाद, फेसबुक, ट्विटर और गूगल जो क्रांति के प्रतीक हुआ करते थे वे अब विशाल विघटनकारी अभियानों को प्रश्रय देने वाले तंत्र में बदल गए हैं जिसमे उत्पीड़न है, सरकार की सेंसरशिप है, मानव अधिकार के कार्यकर्ताओं, पत्रकारों,  और किसी भी असहमतिपूर्ण आवाज को दबाने की ताकत है...


27-Jul-2021 2:30 PM (53)

-रवि सिन्हा

 

जवाबदेही लोकतंत्र का मूलभूत तत्व है और, माना जाता है कि अंतत: लोग ही लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और तंत्रों के माध्यम से सत्ता में बैठे लोगों पर निगरानी रखते हैं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि लोकतंत्र में अक्सर क्या होता है। चुनावी प्रतिस्पर्धा  ऐसी ‘तकनीकों’ (अक्सर धार्मिक, सांस्कृतिक और पहचान-आधारित) को जन्म देती है जो नागरिकों को ‘भक्त’ और उत्पाती सैनिकों के रूप में  (हिटलर की ‘ब्राउन शर्ट्स’ याद करें) तब्दील कर देती है। लोकतंत्र का यह अँधेरा पहलू दूसरे पहलू की तुलना में अधिक बार उछल कर सामने आता है। आज हिंदुस्तान उसी तबाही के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका में ट्रम्प इसी तरह की परिघटना का उदाहरण था।

लेकिन क्या आंदोलनों को भी किसी व्यक्ति या किसी विचार के प्रति जवाबदेह होना चाहिए? यह कहा जा सकता है कि आंदोलन अपने स्वयं के मिशन, मूल्यों, उद्देश्यों, तर्कों और रणनीतियों के प्रति जवाबदेह होते हैं। क्या इस हिसाब से कोई आंदोलनों का मूल्यांकन कर रहा है?

वामपंथी आंदोलन के लिए तो यह सच है कि उसका लेखा-जोखा पूरी दुनिया में पर्याप्त रूप से किया गया है। यहाँ तक कि, अधिकांश लोगों के लिए अब इसे टास्क के रूप में लेने की कोई ज़रूरत ही नहीं रह गई है। बहुतों के लिए तो वामपंथ ख़त्म ही हो गया है। जो ख़त्म हो गया है उस पर समय क्यों बर्बाद करना? लेकिन फिर भी,सबसे मजे की बात यह है कि वामपंथ अभी भी अधिकांश अन्य आंदोलनों और उनके बौद्धिक दिग्गजों की आलोचनाओं का पसंदीदा निशाना बना हुआ है जिसको जब चाहे कोड़े मारे जा सकते हैं। यहाँ भारत में दलित बुद्धिजीवियों का प्रिय शगल वामपंथी आंदोलन में सवर्ण (उच्च जाति) वर्चस्व को उजागर करना है और बहुत सी नारीवादियों का काम तो बस वामपंथियों के ‘स्त्री-द्वेष’ पर ही ध्यान केंद्रित करना है। मानो भारतीय समाज के किसी सर्वेक्षण में दलितों और महिलाओं के खिलाफ उत्पीडऩ और हिंसा के सबसे संभावित और सबसे बड़े अपराधियों के रूप में वामपंथी ही उभर कर आए हों! इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वामपंथ को अपनी सभी बीमारियों और अपनी सभी विफलताओं की ख़बर लेनी चाहिए। लेकिन, क्या एक आंदोलन जिसे अक्सर ही मृत घोषित कर दिया जाता हो उसे आंदोलनों के मूल्यांकन के प्रमुख उदाहरण के रूप में लिया जाना चाहिए?

 उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने घोषणा की है कि यही वह पार्टी होगी जो वास्तव में राम मंदिर का निर्माण करेगी। यह पार्टी खुलेआम और जोर-शोर से एक जाति के रूप में ब्राह्मणों को अपने पाले में आने की अपील कर रही है। सभी जानते हैं कि बाबासाहेब अम्बेडकर ने जाति-उन्मूलन की बात की थी और घोषणा की थी कि हिंदू धर्म के तहत दलित मुक्ति की कोई गुंजाइश नहीं है। यह विडंबना बसपा तक ही सीमित नहीं है। वर्तमान शासन में एक दलित विनीत भाव से राष्ट्रपति बनता है और एक पूर्व दलित पैंथर एक मंत्री है। इन सब बातों की व्याख्या तो इस तरह की जाती है कि लोकतंत्र की बाध्यताएँ  इस व्यावहारिक आचरण के लिए मजबूर करती हैं। लेकिन खुद उस आंदोलन के बारे में क्या कहा जाए? अम्बेडकर के मिशन का क्या हुआ?

सवाल और भी गहरा है। ऐसा कैसे हुआ कि दलित समुदायों में हिंदुत्व इस तरह की पैठ बनाने में सफल रहा? ‘दलित सांस्कृतिक दिमाग’ में ‘हिंदू सभ्यतात्मक दिमाग’ किस तरह और किस हद तक बैठ गया है? ऐसा क्यों है कि गुजरात नरसंहार के दौरान और अन्य जगहों पर भी दलित हिंदुत्व के ‘ब्राउन शर्ट’  बनने के उतने ही आकांक्षी रहे हैं जितना कि कोई अन्य समुदाय? ऐसा क्यों है कि दलितों के ऊपर अत्याचार की किसी घटना के बाद कोई दलित नेता किसी प्रज्ज्वलित उल्कापिंड की तरह सामने आता है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक क्षितिज से उतनी ही तेजी से गायब भी हो जाता है जबकि चुनावी खेल के खिलाड़ी जमीनी राजनीतिक अखाड़े पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रहते हैं?

उम्मीद है कि  कोलंबिया और हार्वर्ड विश्वविद्यालयों से लेकर जेएनयू और उस्मानिया तक के सामाजिक आंदोलनों के सिद्धांतकार- इस पहेली को गंभीरता से ले रहे हैं। हम सभी सरल और सामान्य बुद्धि के उत्तर जानते हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। पहेली को एक गहरी व्याख्या की जरूरत है। सामाजिक आंदोलनों के बौद्धिक पैगम्बर कब तक इन आंदोलनों के इतिहास और इनके बचे रहने का जश्न मनाने से ही संतुष्ट रहेंगे?

दलित लेखक कब तक अन्य (सवर्ण) लेखकों की वंशावली पूछते रहेंगे और उनके जातिनामों के लिए उनपर इलज़ाम लगा कर संतुष्ट होते रहेंगे? वे कब तक दलित जीवन और उसके अनुभव के साहित्यिक चित्रण और उसकी सैद्धांतिक व्याख्या पर एकाधिकार की मांग भर करते रहेंगे? असली सवाल और असली चुनौतियों पर अभी ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद रूपाली सिन्हा)


27-Jul-2021 2:28 PM (55)

- प्रकाश दुबे

 

ममता से मत कह देना कि दिल्ली दूर है। 26 जुलाई को दिल्ली में पग रखने से पहले ऐलान किया गया है-होशियार खबरदार। तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल की माननीय अध्यक्ष दिल्ली दरबार में पधार रही हैं। मुख्यमंत्री यूं तो विधानसभा सदस्य भी नहीं हैं। सांसदों ने उन्हें फटाफट संसदीय दल का अध्यक्ष चुन लिया। मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री जान लें कि लोकसभा के दो दर्जन और राज्यसभा के दर्जन भर से अधिक सांसदों की नेता हैं। हिंदी में पार्टी का नाम सर्वभारतीय तृणमूल कांग्रेस है। पहला अवसर नहीं है जब संसदीय दल का अध्यक्ष गैरसांसद को बनाया। लोकसभा में पार्टी नेता शरद पवार थे। संसदीय दल की अध्यक्ष सांनिया गांधी, जो बाद में सांसद बनीं। मुख्यमंत्री के पुराने भरोसेमंद और इन दिनों कट्टर विरोधी सुवेन्दु (शुभेन्दु) अधिकारी दिल्ली में डटे हैं। दिल्ली पहुंचने से पहले गृहमंत्री के साथ सुवेन्दु की बैठकों का हिसाब भाजपा अध्यक्ष के पास भी नहीं है।

जागो मोहन प्यारे
पूछने वाले बार-बार पूछ कर तंग करते रहे-त्यागपत्र मांगा है? दिल्ली में दिया क्या? कब दे रहे हो? डॉ. बूकनाकेरे सिद्धलिंगप्पा येदियुरप्पा सवालों से परेशान थे। दक्षिण में पार्टी की जड़ें मजबूत करने वाले येदि दक्षिण दिल्ली में बेटे-पोते के साथ साधारण कहवाघर में जाकर काफी पीने का दर्द भूल नहीं पाए। बंगलूरु में बड़ा झटका लगा। बंगलूरु के सितारा होटल में रविवार 25 जुलाई को विधायकों के मुंह का जायका बदलना चाहते थे। इस उम्मीद में कि इससे अगली बार मुंह मीठा करने का अवसर मिलेगा। मुख्यमंत्री पद पर दो साल पूरे करने का जश्न मनाने से आलाकमान ने रोक दिया। यही नहीं, प्रदेशाध्यक्ष नलिन कुमार कटिल के नाम से जारी छोटी सी क्लिपिंग में येदि की विदाई का ऐलान कर दिया गया। गद्दी के वारिस के रूप में तीन दावेदारों के नाम उछाल दिए। येदि पर मठ-महंतों की धमकी और संघ की कृपा काम नहीं आई। चली आलाकमान की। येदि की भी चली। इतनी कि पहले भोजन किया और फिर राजभवन गए।

वीणावादिनी कुलपति दे
डॉ. हरिसिंह गौर को समर्पित सागर के केन्द्रीय विश्वविद्यालय का नाम नामी गिरामी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल हो गया है। प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र के अंतर्गत बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पूर्णकालिक कुलपति नहीं है। कार्यवाहक से काम चल रहा है। विचार की लड़ाई के प्रमुख केन्द्र जवाहरलाल नेहरू विवि के कुलपति का कार्यकाल जनवरी महीने में समाप्त हो चुका है। देश की राजधानी के दिल्ली विवि में अक्टूबर 2020 से कुलपति नहीं है। करेला और नीम चढ़ा यह कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर के कुलपति के लिए सुझाए गए नाम सरकार को पसंद नहीं आए। पांच महीने से सागर विवि कार्यवाहक कुलपति के भरोसे है। साल भर से विश्वविद्यालय असुरक्षित है-इस मायने में कि वहां कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से मध्य प्रदेश विशेष ध्यान देने की अपेक्षा करेगा ही। आषाढ़ महीने में देवता शयन करने चले जाते हैं। महामारी के कारण सिर्फ ऑनलाईन शिक्षार्थी ही जाग रहे होंगे। देवी सरस्वती जाग रही हों और मंत्री की कोशिश परवान चढ़ी तब भी दर्जन भर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को देवउठनी एकादशी तक कुलपति मिलने की गुंजाइश नजऱ नहीं आती।  

मणिपुरी सती सावित्री  
सत्यवान और सावित्री की कथा के कलयुगी और मणिपुरी रूप में यमराज के बजाय न्याय की देवी की भूमिका है। मणिपुर के पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत 17 मई को गिरफ्तार किया गया। पत्नी रंजीता ने उच्च न्यायालय को पत्र लिखा। अदालत ने पत्र को याचिका के स्वीकार कर लिया। अदालत उठने से पहले शुक्रवार 23 जुलाई को पांच बजे तक रिहाई का आदेश जारी किया। उच्चतम न्यायालय ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी कसने वाले समाज प्रबोधनकार एरेंद्रो लोचमबाम को कुछ दिन पहले रिहा करने का आदेश जारी किया था। एरेंद्रो और पत्रकार किशोर पर लगाए गए आरोप लगभग समान हैं। प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष का निधन हुआ। पत्रकार ने फब्ती कसी-गोबर और गोमूत्र काम नहीं आया। इसे लोग फूहड़ कह सकते हैं। मणिपुर की एन वीरेन्द्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना। गिरफ्तार कर लिया। उनका दोष नहीं है। पार्टी कार्यकर्ता प्रेमानंद मैते का मान रखना मुख्यमंत्री का कर्तव्य है।
  (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


27-Jul-2021 1:04 PM (46)

 

1979 से लेकर अब तक के उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से पिछले 43 वर्षों में एक भी ऐसा साल नहीं गुजरा, जब बिहार में बाढ़ नहीं आई हो

पुष्य मित्र
बिहार राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा 23 जुलाई को जारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल 18 जून से अब तक 16.61 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं। 11 जिलों के 388 पंचायतों में बाढ़ की स्थिति है। 1.10 लाख लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, यानी ये बेघर हो चुके हैं। अगर इन आंकड़ों के हिसाब से सोचें तो बिहार में बाढ़ की स्थिति काफी गंभीर है, मगर विभाग ऐसा नहीं मानता। क्योंकि बिहार में अमूमन हर साल इससे अधिक बुरी स्थिति रहती है। अगर आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों पर ही गौर किया जाये तो हर साल बिहार में बाढ़ की वजह से 75 लाख लोग प्रभावित होते हैं। औसतन 18-19 जिलों में बाढ़ की स्थिति बनती है।

देश के कुल बाढ़ प्रभावित इलाकों में से 16.5 प्रतिशत क्षेत्रफल बिहार का है और कुल बाढ़ पीडि़त आबादी में 22.1 फीसदी बिहार में रहती है। राज्य के 38 में से 28 जिले बाढ़ प्रभावित हैं। 1979 से लेकर अब तक के उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से पिछले 43 वर्षों में एक भी ऐसा साल नहीं गुजरा, जब बिहार में बाढ़ नहीं आई हो। इस बाढ़ की वजह से बिहार में हर साल औसतन 200 इंसानों और 662 पशुओं की मौत होती है और तीन अरब सालाना का नुकसान होता है। राज्य सरकार बाढ़ सुरक्षा के नाम पर हर साल औसतन 600 करोड़ रुपये खर्च करती है और बाढ़ आने के बाद राहत अभियान में अमूमन दो हजार रुपये से अधिक की राशि खर्च होती है।

आखिर इसका समाधान क्या है, यह जानने के लिए डाउन टू अर्थ ने उन पांच जानकारों से बातचीत की जो इस संकट को समझते हैं।

आजादी के बाद से बिहार की बाढ़ और सूखे का सालाना विस्तृत इतिहास लिख रहे उत्तर बिहार की नदियों के विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, समाधान ढूंढना सरकार का काम है, जिनके पास सैकड़ों इंजीनियरों की टोली है। हमलोग सिर्फ यही कह सकते हैं कि आजादी के बाद से बाढ़ का समाधान निकालने के लिए जो नीति अपनाई गई वह गलत साबित हो रही है। अभी सरकार नदियों के किनारे तटबंध बनाकर इसका समाधान करने की कोशिश करती है। मगर आंकड़े गवाह हैं कि आजादी के बाद से जैसे-जैसे तटंध बढ़े बिहार के बाढ़ पीडि़त क्षेत्र का दायरा भी बढ़ता चला गया। आजादी के वक्त जब राज्य में तटबंधों की कुल लंबाई 160 किमी थी तब राज्य का सिर्फ 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ पीडि़त था। अब जब तटबंधों की लंबाई 3731 किमी हो गया है तो राज्य की लगभग तीन चौथाई जमीन यानी 72.95 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित है। यानी इलाज गलत है।

उत्तर बिहार की बाढ़ पर लगातार नजर रखने और बागमती नदी पर बन रहे तटबंध के विरोध में आंदोलन की अगुआई करने वाले अनिल प्रकाश कहते हैं, यह हमारा इलाका तो फ्लड प्लेन है ही। पंजाब से लेकर बंगाल तक हिमालय की तराई में बसा इलाका बाढ़ के साथ लाई मिट्टी से ही बना है, इसलिए सबसे पहले हमें इसे आपदा मानना बंद कर देना चाहिए। अगर ये आपदा होती तो इस पूरे इलाके में इतनी घनी आबादी नहीं होती। सीतामढ़ी जिले का उदाहरण लें, जहां हर साल बाढ़ आती है, मगर वहां आबादी का घनत्व 1500 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जबकि देश की आबादी का धनत्व औसतन 462 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। अगर हमें अब भी इस संकट से बचना है तो बाढ़ के साथ जीने की कला को फिर से अपनाना पड़ेगा। सारे निर्माण इस तरह हों कि नदियों को बाढ़ के दिनों में बहने का सहज रास्ता मिल जाये। जहां बाढ़ का पानी सडक़ को तोड़े, वहां पुल बने और हर गांव में ऐसी ऊंची जगह बने, जहां लोग बाढ़ के दिनों में रह सकें।

नदियों के मुक्त प्रवाह के लिए संघर्ष कर रहे रणजीव भी कहते हैं, अगर सचमुच हम बाढ़ की आपदा से मुक्ति चाहते हैं तो हमें प्राकृतिक नदी तंत्र को फिर से जिंदा करना होगा। तथाकथित विकास के हस्तक्षेप ने नदी को रिसोर्स मान लिया है और उसे गटर में बदल दिया है। वे कहते हैं कि हिमालय से उतरने वाली नदी को समुद्र तक पहुंचाने के लिए गंगा नदी का विकास हुआ था। आज भी उसे 37 नदियां मिलती हैं। मगर हमने तटबंधन, सडक़, पुल-पुलिये और रेलवे का गलत तरीके से निर्माण कर उसके रास्ते को बाधित किया है। इसके अलावा नदियों के पेट में अवैध निर्माण हो रहा है। सीतामढ़ी में तो कलेक्टरियेट भी लखनदेई नदी के पेट में बना दिया गया है। यह अवैज्ञानिक विकास ही बाढ़ के आफत में बदलने की वजह है।

 वहीं, बिहार के जलसंसाधन विभाग के पूर्व सचिव गजानन मिश्र कहते हैं कि हिमालयी नदियों की मुख्य समस्या यह है कि यह अपने साथ बड़े पैमाने पर सिल्ट लाती है। बारिश के चार महीने में अत्यधिक जल लाती है, जो उसके द्वारा पूरे साल में लाए गए पानी का लगभग 90 फीसदी होता है और इस पानी की गति काफी तेज होती है। इस तेज गति को मिट्टी का तटबंध झेल नहीं सकता और नदियां इतना सिल्ट लाती है कि उसकी पेटी लगातार भरती रहती है। मगर इसके बावजूद महज डेढ़ दो दशक पहले तक नदी की अपनी प्राकृतिक व्यवस्था ऐसी थी कि बाढ़ आपदा की तरह नहीं लगती। 1870-75 के पहले के किसी रिकार्ड में बाढ़ का जिक्र आपदा के रूप में नहीं मिलता। 1890 में पहली दफा बाढ़ की आपदा का जिक्र मिलता है, जब इस इलाके में रेलवे के निर्माण की वजह से इन नदियों की राह में जगह-जगह अवरोध खड़े होने लगते हैं। फिर सडक़ें बनती हैं, जो अमूमन उत्तर से दक्षिण की दिशा में बहने वाली धाराओं को जगह-जगह काटती हुई पूरब से पश्चिम की दिशा में बनती हैं। फिर सरकार बाढ़ नियंत्रण के नाम पर तटबंधों की नीति को अपनाती है, जिसका अंजाम हम देख चुके हैं।

अब अगर बाढ़ की आपदा से बचना है और हिमालय से आ रहे पानी और मिट्टी का सदुपयोग करना है तो नदियों को उसकी धाराओं और चौरों से जोडऩा होगा। अब इसमें इंजीनियर चाहें तो किसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं। यही सटीक समाधान हो सकता है।

 बिहार में बाढ़ की बात जब होती है तो सबसे अधिक कोसी नदी की बात होती है, मगर हाल के वर्षों में गंडक-बूढ़ी गंडक और महानंदा के बेसिन में बाढ़ ने अधिक तबाही मचाई है। उस बेसिन में मसान और पंडई जैसी नदियों में साल में कई-कई बार बाढ़ आ जाती है। इन दिनों चंपारण के इलाके में बाढ़ के संकट को नजदीक से देख रहे मेघ पईन अभियान के संयोजक एकलव्य प्रसाद कहते हैं कि सबसे पहले तो हमें बाढ़ को एक सामान्य नजरिये से देखना बंद करना होगा। कोसी की बाढ़ अलग है और मसान और पंडई की बाढ़ अलग। हर नदी के बेसिन का अलग से अध्ययन करना और उसके लिए वहां के लोगों की राय के हिसाब से समाधान निकालना होगी।

वे कहते हैं कि बाढ़ तो आएगी ही और उसे न रोक सकते हैं, न ही रोकना उचित होगा। मगर हम उसके संकट को घटा सकते हैं और इसके लिए हमें अलग-अलग इलाके के सवाल को वहां जाकर, वहां के लोगों से बातकर समझना होगा, तभी समाधान निकलेगा। वे भी बाढ़ के साथ जीने की कला विकसित करने की बात कहते हैं और मानते हैं कि फ्लड रिजिलियेंस हैबिटाट तैयार करने का उपाय सुझाते हैं।

कुल मिलाकर सभी जानकार मानते हैं कि बाढ़ पहले आपदा नहीं थी। पिछले डेढ़ दशकों में हुए अवैज्ञानिक निर्माण, बाढ़ नियंत्रण के अवैज्ञानिक तरीके और नदियों के रास्ते में उत्पन्न अवरोधों ने इस बाढ़ को भीषण आपदा में बदल दिया है। अगर बिहार को इस आपदा से उबरना है तो नदियों की राह में से अवरोधों को हटाना पड़ेगा, बारिश के दिनों में भी उसे प्राकृतिक रूप से बहने और गंगा से मिलने का रास्ता देना होता। छोटी नदियों और चौरों को नदियों से फिर से जोडऩा होगा और लोगों को बाढ़ के साथ जीने की कला विकसित करना होगा। (downtoearth.org.in)


27-Jul-2021 11:56 AM (51)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मांग की है कि इस बार जातीय जन-गणना जरुर की जाए और उसे प्रकट भी किया जाए। पिछली बार 2010 में भी जातीय जन-गणना की गई थी लेकिन सरकार उसे सार्वजनिक नहीं कर पाई थी, क्योंकि हमने उसी समय 'मेरी जाति हिंदुस्तानी' आंदोलन छेड़ दिया था। देश की लगभग सभी प्रमुख पार्टियों का रवैया इस प्रश्न पर ढीला-ढाला था। कोई भी पार्टी खुलकर जातीय जन-गणना का विरोध नहीं कर रही थी लेकिन कांग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टी के कई प्रमुख शीर्ष नेताओं ने हमारे आंदोलन का साथ दिया था। उसका नतीजा यह हुआ कि सरकार ने जातीय जन-गणना को बीच में रोका तो नहीं लेकिन श्रीमती सोनिया गांधी ने हमारी पहल पर उसे सार्वजनिक होने से रुकवा दिया।

2014 में मोदी सरकार ने भी इसी नीति पर अमल किया। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी ने हमारा डटकर समर्थन किया था।अब कई नेता दुबारा उसी जातीय जन-गणना की मांग इसीलिए कर रहे हैं कि वे जातिवाद का पासा फेंककर चुनाव जीतना चाहते हैं। उनका तर्क यह है कि जातीय जन-गणना ठीक से हो जाए तो जो पिछड़े, गरीब, शोषित-पीडि़त लोग हैं, उन्हें आरक्षण जरा ठीक अनुपात में मिल जाए लेकिन वे यह क्यों नहीं सोचते कि 5-7 हजार नई सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिल जाने से क्या 80-90 करोड़ वंचितों का उद्धार हो सकता है? यह जातीय आरक्षण-अयोग्यता, ईर्ष्या-द्वेष और अविश्वास को बढ़ाएगा ही। जरुरी यह है कि देश के 80-90 करोड़ लोगों को जिंदगी जीने की न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं।

उनका आधार जाति नहीं, जरुरत हो। जो भी जरुरतमंद हो, उसकी जाति, धर्म, भाषा आदि को पूछा न जाए। उसके लिए सरकार विशेष सुविधाएं जुटाए। जातीय आरक्षण एकदम खत्म किया जाए। अंग्रेज ने जातीय जन-गणना 1857 के बाद इसीलिए शुरु की थी कि वह भारतीयों की एकता को हजारों जातियों में बांटकर टुकड़े-टुकड़े कर दे। 1947 में उसने मजहब का दांव खेलकर भारत को दो टुकड़ों में बांट दिया। 1931 में कांग्रेस ने जातीय जन-गणना का इतना कड़ा विरोध किया था कि अंग्रेज सरकार को उसे बंद करना पड़ा था। स्वतंत्र भारत में डॉ. लोहिया ने 'जात तोड़ो' आंदोलन चलाया था। सावरकर और गोलवलकर ने जातिवाद को राष्ट्रवाद का शत्रु बताया था।

कबीर, नानक, दयानंद, विवेकानंद, गांधी, फुले, आंबेडकर आदि सभी महापुरुषों ने जिस जातिवाद का खंडन किया था, उसी जातिवाद का झंडा यह राष्ट्रवादी सरकार क्यों फहराएगी? बेहतर तो यह हो कि मोदी सरकार न सिर्फ जातीय आरक्षण खत्म करे बल्कि सरकारी कर्मचारियों के जातीय उपनामों पर प्रतिबंध लगाए, विभिन्न संगठनों, गांवों और मोहल्लों के जातीय नाम हटाए जाएं और देश के सभी वंचितों और पिछड़े को किसी भेद-भाव के बिना शिक्षा और चिकित्सा में विशेष सुविधाएं दी जाएं।
(नया इंडिया की अनुमति से)

 


26-Jul-2021 8:53 PM (56)

-गिरीश मालवीय

 

न्यू वल्र्ड ऑर्डर का सबसे अहम और सबसे घातक हथियार सामने आ रहा है और वह है ‘डिजिटल मनी।’
दरअसल कोरोना महामारी ने वैश्विक समाज के सभी क्षेत्रों, खासतौर पर अर्थव्यवस्था में जिन कमजोरियों को उजागर किया है। उससे पूंजीवाद के वर्तमान रूप क्रोनी कैपटलिज्म पर एक बड़ा संकट आ खड़ा है और इस संकट को दूर करने के लिए पूरे विश्व के विभिन्न देशों के रिजर्व बैंकों के बीच डिजिटल मुद्रा की दौड़ शुरू हो गई है। यह कदम एक क्रांतिकारी परिवर्तन साबित होने जा रहा है अभी तक हम जिस जीवनशैली को जानते हैं उसमें नगदी यानी कागजी मुद्रा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन अब पूरी व्यवस्था ही बदलने जा रही है।
दुनिया इस समय अपने पूरे इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक और सामाजिक प्रयोग के बीच में है, इसमे इंटरनेट सबसे महत्वपूर्ण होकर उभरा है अब इस तकनीक के जरिए हमारे पूरे जीवन को पूरी तरह से डिजिटाइज करने की कोशिश कर रही है।
मार्च 2020 में विश्व अर्थव्यवस्था को जो जोरदार झटका लगा है उसका सबसे बड़ा असर मौद्रिक प्रणाली पर पड़ा है यह संकट सिर्फ नोट छापने और ब्याज दरों में कटौती से खत्म नही होने वाला है , न्यू वल्र्ड आर्डर कहता है कि जो इस डिजिटल मुद्रा की तरफ अपने कदम नहीं बढ़ाएगा वह अपनी मुद्रा के बुरे से बुरे अवमूल्यन के लिए तैयार रहे
पिछले कई वर्षों से वित्तीय क्षेत्र में हम पर डिजिटलीकरण थोपा जा रहा है। नोटबंदी का घोषित उद्देश्य काला धन रोकना नहीं बल्कि मुद्रा का डिजिटलीकरण करना था अब आश्चर्यजनक रूप से बैंक मर्ज किए जा रहे हैं। शाखाएं बंद की जा रही हैं, नकदी को पीछे धकेला जा रहा है।  
यह कोई कांस्पिरेसी थ्योरी नहीं है यह सच्चाई है! जिससे हमारे बुद्धिजीवी नजरे चुरा रहे हैं, कोरोना ऐसी व्यवस्था के लिए गोल्डन अपॉर्च्युनिटी लेकर आया है क्योंकि अर्थव्यवस्था उद्योगपतियों के कर्ज के बोझ के नीचे दबी हुई है और यह लोन डूब रहा है, मरता क्या न करता वाली सिचुएशन है।
अब ब्रम्हास्त्र चलाने का समय है भारत का रिजर्व बैंक हमारे समय की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण परियोजना पर काम कर रहे हैं वह है डिजिटल मुद्रा की शुरूआत।
अमेरिका में भी यूएस डॉलर को पूरी तरह से डिजिटल बनाने का विचार, जो कुछ साल पहले अकल्पनीय था अब तूल पकड़ता जा रहा है. डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स दोनों ने पारंपरिक कागजी डॉलर के साथ साथ अब  ‘डिजिटल डॉलर’ पर विचार करना शुरू किया है लेकिन इस खेल में। अमेरिका अभी पीछे है
इस खेल में सबसे आगे है चीन जिसने कई महीने पहले ही डिजिटल युआन जारी कर दिया है दरअसल चीन में हाल के वर्षों में ऑनलाइन भुगतान की कई सेवाएं लोकप्रिय हुई हैँ। उनमें एन्ट ग्रुप का अली-पे और टेसेन्ट ग्रुप का वीचैट-पे सबसे लोकप्रिय हैं। (जैसे भारत में पेटीएम ) इनकी बढ़ती लोकप्रियता से चीन सरकार को ये अंदेशा हुआ कि देश में सारा वित्तीय लेनदेन निजी हाथों में जा सकता है। इसलिए उसका तोड़ उसने डिजिटल युआन के रूप में निकाला है।
लोग इतने भोले है कि उन्हें डिजिटल मनी ओर क्रिप्टो करंसी के बीच मूलभूत अंतर की समझ नही है वो इसे एक ही समझ रहे हैं दरअसल यह मुद्रा सेंट्रल बैंक ( भारत में रिजर्व बैंक ) द्वारा जारी डिजिटल करेंसी है, यह बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी नही है बल्कि यह उसके लगभग विपरीत है। क्योंकि क्रिप्टो करेंसी  विकेंद्रीकृत होती है; वे सरकारों द्वारा जारी या समर्थित नहीं होती  लेकिन, डिजिटल करेंसी को केंद्रीय बैंक द्वारा जारी और विनियमित किया जाता है और लीगल टेंडर के रूप में इसकी स्थिति की गारंटी राज्य द्वारा दी जाती है।
यह क्रिप्टोकरंसी या पेटीएम जैसी नहीं है डिजिटल मुद्रा के अस्तित्व में आने के बाद कोई भी व्यापारी इसे स्वीकार करने  से इनकार नहीं कर सकता।
दरअसल चीन द्वारा जारी डिजिटल मुद्रा डिजिटल युआन पूरी दुनिया मे डॉलर की बादशाहत को चुनौती देने की बड़ी कोशिश है पूरी दुनिया मे डिजिटल मुद्रा की रेस एक नए प्रकार के संघर्ष को जन्म दे रही है।


26-Jul-2021 12:12 PM (62)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कल ऐसी बात कह दी है, जिसे कहने की हिम्मत आज तक पाकिस्तान का कोई फौजी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भी नहीं कर सका है। आजकल पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर में आम चुनाव चल रहे हैं। एक चुनावी सभा में बोलते हुए इमरान ने कह दिया कि पाकिस्तान सरकार उसके कश्मीर की जनता को आत्म-निर्णय का ऐसा विकल्प देगी, जिसके अन्तर्गत वह चाहे तो पाकिस्तान में मिल सकता है या वह स्वतंत्र राष्ट्र भी बन सकता है।

यह स्वतंत्र राष्ट्र का विकल्प एक बम-विस्फोट की तरह है। पाकिस्तान के सारे विरोधी नेता इमरान पर टूट पड़े हैं। इमरान ने यह बात शायद इसलिए कह दी कि उन पर यह आरोप लगाया जा रहा था कि वे 'आजाद कश्मीरÓ को पाकिस्तान का पांचवाँ प्रान्त बनाना चाहते हैं। ऐसे प्रचार से कश्मीर में उनकी पार्टी के वोट कटने की अफवाहें फैलने लगी थीं। लेकिन इमरान की यह बात ऐसी है, जिसका खंडन लियाकतअली खान से लेकर नवाज़ शरीफ तक सभी प्रधानमंत्री और अयूबखान, याह्याखान, जिया-उल-हक और मुशर्रफ तक सारे फौजी राष्ट्रपति भी करते रहे हैं।

इस्लामाबाद में जब प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो से मैं पहली बार मिला तो उन्होंने मुझसे कहा कि आप पहले अपने कश्मीर में प्लेबिसिट (आत्म-निर्णय) करवाइए। मैंने उनसे पूछा कि आपने सुरक्षा परिषद का 1948 का प्रस्ताव क्या पढ़ा नहीं है? कृपया प्लेबिसिट की पहली शर्त पढि़ए। उसके शुरु में ही कहा गया है कि आपके कब्जाए कश्मीर से एक-एक सिपाही और एक-एक सरकारी कर्मचारी को वहां से हटाइए। उसके बाद ही दोनों कश्मीर में जनमत-संग्रह हो सकता है। मैंने उनसे पूछा कि जनमत-संग्रह में क्या वे तीसरे विकल्प से सहमत हैं। याने कश्मीर की आजादी का विकल्प आपको स्वीकार है? उन्होंने कहा 'बिल्कुल नहीं।Ó

लेकिन रावलपिंडी में मुझसे मिले कश्मीरी नेताओं ने मुझसे कहा था कि हम तीसरा विकल्प भी चाहते हैं याने भारत में या पाकिस्तान में मिलने के अलावा हमें 'स्वतंत्र राष्ट्रÓ का विकल्प भी चाहिए। बेनजीर ने परेशान होकर मुझसे कहा कि 'द थर्ड आप्शन इज़ रुल्ड आउटÓ। आपकी-हमारी बातचीत 'आफ द रिकार्डÓ रखिएगा। कश्मीरी आंदोलनकारियों को यह पता नहीं चलना चाहिए कि तीसरे विकल्प पर पाकिस्तानी सरकार की आधिकारिक राय क्या है?

उस राय को अब इमरान खान ने उलट ही नहीं दिया है बल्कि उसे सबके सामने प्रकट भी कर दिया है। हो सकता है कि इसका फायदा वे कश्मीरी चुनाव में उठा ले जाएं लेकिन पाकिस्तान की फौज और जनता तो उससे कतई सहमत नहीं हो सकती। इमरान खान ने एक नई मुसीबत मोल ले ली है। वे प्रधानमंत्री तो बन गए हैं लेकिन उनका खिलाड़ीपन ज्यों का त्यों कायम है।
(नया इंडिया की अनुमति से)


25-Jul-2021 11:58 AM (64)

 बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

उत्तराखंड की सरकार ने हरिद्वार में चल रहे बूचड़खानों  पर रोक लगा दी थी। वहां के उच्च न्यायालय ने इस रोक को अवैध घोषित कर दिया है। उसका फैसला यह है कि जिन्होंने रोक की अर्जी लगाई थी, उनका तर्क गलत था लेकिन उनकी बात सही है। याचिकाकर्ताओं का तर्क यह था कि बूचडख़ानों पर रोक लगने से हरिद्वार के मुसलमानों के अधिकारों का हनन होता है, क्योंकि वे मांसाहारी हैं। यह मामला अल्पसंख्यकों के साथ होनेवाले अन्याय का है। अदालत ने इस तर्क को रद्द कर दिया है। उसने कहा है कि उत्तराखंड के 72 प्रतिशत लोग, जिनमें हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई भी शामिल हैं, मांसाहारी हैं। इसलिए यह अल्पसंख्यकों का मामला ही नहीं है।

यह मामला मानव अधिकार का है। हर व्यक्ति का अपना अधिकार है कि अपना खाना वह क्या खाएगा, यह वह खुद तय करे। अदालत या सरकार को क्या अधिकार है कि वह किन्हीं लोगों को मांसाहार या शाकाहार करने से मना करे। अदालत का यह फैसला कानूनी हिसाब से तो बिल्कुल ठीक है लेकिन इस मुद्दे से जुड़े दो तर्क हैं, जिन पर गौर किया जा सकता है। एक तो हरिद्वार को हिंदुओं का अति पवित्र स्थल माना जाता है। इसलिए वहां बूचडख़ाने बंद किए जाएं, यह मांग स्वाभाविक लगती है। यदि वहां मांस नहीं बिकेगा तो गाय और सूअर, भेड़, बकरी का भी नहीं बिकेगा। याने मुसलमानों को परेशानी होगी तो मांसाहारी हिंदुओं को भी परेशानी होगी। अर्थात यह कदम सांप्रदायिक नहीं है।


दूसरी बात यह है कि इन व्यक्तिगत मामलों में कानूनी दखलंदाजी बिल्कुल गलत है लेकिन इस बुनियादी सवाल पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या मांसाहार मनुष्यों के लिए स्वास्थ्यप्रद है? दुनिया के सभी वैज्ञानिकों ने माना है कि आदमी की आंत और उसके दांत मांसाहार के लिए बने ही नहीं हैं। अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए शाकाहार ही सर्वोत्तम है। किसी भी धर्मग्रंथ- बाइबिल, कुरान, जिंदावस्ता, गुरुग्रंथ साहब, वेद और पुराण में यह नहीं लिखा है कि जो मांस नहीं खाएगा, वह घटिया यहूदी या घटिया ईसाई या घटिया मुसलमान या घटिया सिख या घटिया हिंदू कहलाएगा। जहां तक कुर्बानी का सवाल है, असली कुर्बानी तो अपने प्रिय बेटों की होती है लेकिन पशुओं की फर्जी कुर्बानी करनेवालों के लिए यह जरुरी नहीं है कि वे कुर्बानी का मांस खाएं ही। मांसाहार विश्व की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की दृष्टि से भी बहुत हानिकर है। जो लोग अपनी खान-पान की परंपरा को भी तर्क और विज्ञान की तुला पर तोल सकते हैं, वे स्वत: अपने आप को मांसाहार से मुक्त करते जा रहे हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)


24-Jul-2021 5:52 PM (57)

-रमेश अनुपम 

माखनलाल चतुर्वेदी जैसा मेधावी शिष्य  माधवराव सप्रे जैसे प्रतिभाशाली गुरु की खोज थे। खंडवा से बुलाकर उन्होंने ही जबलपुर में " कर्मवीर ” पत्र के संपादन का गुरूतर भार सौंपा था।

योग्य गुरु ने माखनलाल चतुर्वेदी के भीतर छिपी हुई प्रतिभा को पहचान लिया था।  

माधवराव सप्रे के अंतिम दिनों तक गुरु और शिष्य का साथ बना रहा। दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे।

माधवराव सप्रे के निधन के पश्चात  माखनलाल चतुर्वेदी ने मई 1926 में अपने गुरु पर एक मार्मिक कविता लिखी है। यह कविता आज गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु और शिष्य का पुण्य स्मरण करते हुए प्रस्तुत है :

कहाँ चले? क्या अपने मठ का पथ भूले हो? कहाँ चले? 
कहाँ चले? संयम का जीवन-
रथ भूले हो? कहाँ चले?


कहाँ चले? क्या वहाँ राष्ट्र भाषा का हित है? कहाँ चले? 
कहाँ चले? रे तपी बता क्या स्वप्रोत्थित है? कहाँ चले? 
क्या सम्मेलन है कोई? क्या 'शास्त्री' ने बुलवाया है
या नर्मदा तीर से तुझको बता बुलावा आया है?


श्वेत केश ही काफी है, तू-पुतली मत कर श्वेत सखे !
हरियाले दिन की आशा को मत अभाव से रेत सखे। 
कष्टों का रथ काफी है, मत वीर 'रथी' अपनावे तू 
उत्तरा खंड में चलो चलें इस दशा भूल मत जावे तू। 
जो अपनी भूमि जगाने को सहसा नंगे पैरों दौड़ा, 
आहा ! नंगे ही पावों यों पथ नहीं मृत्यु का भी छोड़ा !


"विश्राम कर्म को कहते हैं" यह कहाँ सुनाई पड़े कहो ?
 "भगवान कर्म में रहते हैं " क्यों कर दिखलाई पड़े कहो? 
चल बस, कर्म करते-करते रे राष्ट्र-धुरीण कर्मयोगी! 
निन्दा झिड़की, अपमान, द्वेष, सप्रेम महान् कष्टभोगी!
अपनों ही के होते अपार तुझ पर प्रहार थे 'कभी-कभी'
हम तेरा गर्व गिराते थे ऐसे उदार थे कभी-कभी!


"मैं विद्यार्थी हूँ" पढ़ो तुम्हारे कष्ट हटाये जायेंगे, 
"मैं रोगी, भाषा-सेवी हूँ" सेवा अवश्य ही पावेंगे,
"मैं भावों का दीवाना हूँ" बस मातृभूमि पर चढ़ जाओ, 
"लेखनी लिये हूँ" क्रान्ति करो, लिख चलो, युद्ध में बढ़ जाओ; 
लाओ जागृति के चरणों में युवकों के शीश चढ़ा डालूँ, 
थैलियाँ हजारों माता पर- हँस कर बरबाद करा डालूँ।


बेकार तुम्हारा जाना है है, 'नारायण''  नेत्रों आगे, 
तुम तज 'अनन्त' को, यो अनन्त के पथ में क्यों चर अनुरागे? 
बलि का शिर सहसा झुके- जहाँ, वह 'वामन' का अवतार यहाँ 
रवि - रश्मि नसा दे अन्धकार है वह प्यारा व्यापार यहाँ। 
गणपति', शंकर, हैं सेवा में बलि हो जायेंगे 
यही रहो इस रुदन मालिका को, कुंठित हैं, क्या शीर्षक दें तुम्हीं कहो?

जिसके लेने से जगते थे जागृति का पावन नाम चला, 
फल की आशा को ठुकराये उन्मुक्त मुक्ति धन काम चला! 
आत्माभिमान की बेदी का पिछड़े प्रदेश का दाम चला 
सब बोल उठे 'जयराम' और दुखियों से अपना राम चला!' 
यह नाम चला, यह काम चला यह दाम चला, यह राम चला! 
साहित्य कोकिला कहाँ रमें? अपना अभिमत आराम चला!

ना, ना, मत आग लगाओ, हा, लग जायेगी यह लाखों में! 
क्यों देते हो तुम 'दाग', दाग? पड़ जाय कहीं मत आँखों में! 
क्या मुट्ठी भर हड्डियाँ? नहीं, ये अभिलाषाएँ राख हुई ! 
गलियाँ कल तक हरियाली थीं सहसा अब वे वैषाख हुई ! 
मत छेड़ो, जी भर रोने दो, मत रोको अन्तरतम खोलो ; 
बस करुण कंठ से एक बार दृढ़ हो, माधव माधव !! बोलो। 


वह मूर्ति कर्म में जीती थी हो परम शान्त प्रस्थान किया. 
अगणित अनुनय बेकार हुए निष्ठुर हरि ने कब ध्यान दिया ! 
दुनियाँ की आँखमिचौनी से वे दोनों आँखें बन्द हुई, 
बन्धन ठुकराकर, तपोमयी वह आत्मा अब स्वच्छंद हुई 
किन्तु प्रेम के अंतस्तल में उलझा उसका काम 
स्मृतियों के एकांत देश में लिखा मधुर वह नाम।

अन्तर्धान हुए, पर, सूरत-अभी दृष्टि आती है, 
अन्तक हार गया, ध्वनि प्यारी अभी सुनी जाती है। 
भुजा न पहुँचे, हृदय चरण तक अभी पहुँच पाता है 
खुलने पर मत रहे, बन्द आँखों में आ जाता है! 
शोक तरंगिणि में मत छूटे, सहसा मेरा धीर, 
सिसक बन्द हो, धुल मत जाये, यह उज्ज्वल तसवीर।


देख न पाये श्रद्धास्पद् वह तेरा देश-निकाला,
देख न पाये, खारूं के तट जलने वाली ज्वाला;
देख न पाये मनसूबों की कैसी थी वह धूल,
देख न पाये, जल जाने पर कैसे थे वे फूल ! 
देख न पाये मधुर वेदना जीवित है पछताना, 
कह न सके "अलविदा-" लौट कर इसी भूमि पर आना?


जिन हाथों पुष्पांजलियाँ थीं उन हाथों हैं ज्वाला, 
और कपाल-क्रिया करने को है प्रहार का प्याला! 
गा देता था, हँसते देखा मैंने कभी श्मशान, 
किन्तु आज नीरस वंशी है नहीं लौटते प्राण। 
करुणा बढ़ती है. री मुरली री अगणित अघ-छिद्रा ! 
हा!हा!! माधव की बढ़ती है यह अपार चिरनिद्रा !


किस मुँह से लौटू अपनों में? क्या सन्देश सुनाऊँ? 
बलियों के वे गीत आज मैं किसके स्वर में गाऊँ? 
कैसे धन को शील सिखाऊँ? 
गुण को धीर बँधाऊँ? 
कुटी और महलों तक कैसे हृदय-ज्योति पहुँचाऊँ? 
किसको दूनी लगन लगेगी घावों के पाने पर, 
और कौन हुंकार उठेगा आँसू आ जाने पर ?

मित्र बना, छत्तीसोगढ़ में कौन प्रकाशन करेगा. 
'दास-बोध' में कौन शिवाजी पाने को उतरेगा? 
'भारतीय युद्धों का किसको आवेगा उन्माद? 
विजय प्राप्ति में किसको आवेगा दिन दूना स्वाद 
कौन लोकमान्यत्व लायँगे केसरि हों गरजेंगे 
लख 'हिन्दी- गीता रहस्य किस पर लाखों लरजेंगे?


किसे न छू पायेगा अपनी विद्या का अभिमान ? 
अपनी मृत्यु कौन देखेगा जीते जी मतिमान ? 
किसे करेगी विकल राष्ट्रभाषा की एक पुकार? 
टूटे हृदय कौन जोड़ेगा-झुककर अगणित बार! 
किसे दिखाई देंगे छोटे-राष्ट्र-हितैषी जीव? 
कौन भोग से अधिक-त्याग में तत्पर रहे अतीव?


आगे आने वाली घड़ियाँ किसे दीख जायेंगी? 
सम्मानों की राशि कहाँ निश्चित ठोकर पायेंगी? 
कहाँ आप्त जन पर बरसेगा गुरुजन का सम्मान ? 
कहाँ 'घात का बदला होगा प्रेम और सम्मान ? 
किसे कुमारी से हिमगिरि तक 'महाराष्ट्र' दीखेगा? 
कौन तपस्वी, घोर तपस्या यों किससे सीखेगा?


किसमें शत्रु वीर श्री पायेंगे: अपने अपना सा? 
कौन बधिक के निश्चय को कर डालेगा सपना-सा ? 
चढ़ जावेगा कौन अभय हो अपनों के चरणों पर? 
अंजलियाँ अर्पित होवेंगी किसके आचरणों पर? 
किसे वेदना होगी सबको हिला-मिला देने की? 
अपने ही शिर, आप स्वयं एकान्तवास लेने की ?

अहह ! बिना बादल बिजली गिर पड़ी निठुर व्यापार हुआ! 
मृत्यु द्वार खुल पड़ा, हाय! यह महँगा देशोद्धार हुआ। 
विमल विजय सानी गीता का वीर गान गाते-गाते. 
"मैं न मरूँगा अभी" यही ध्वनि अंतिम पल तक गुंजाते; 
विकल रायपुर, आकुल परिजन मध्यप्रदेश श्मशान हुआ, 
दीन राष्ट्रभाषा चीत्कारी! माधव का प्रस्थान हुआ !

अगले रविवार  पिंगलाचार्य जगन्नाथ प्रसाद ’भानु’


24-Jul-2021 12:03 PM (139)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे बड़े और सबसे प्रामाणिक अखबार, भास्कर, पर छापों की खबर ने देश के करोड़ों पाठकों और हजारों पत्रकारों को हतप्रभ कर दिया है। जो नेता और पत्रकार भाजपा और मोदी के भक्त हैं, वे भी सन्न रह गए। ये छापे मारकर क्या सरकार ने खुद का भला किया है या अपनी छवि चमकाई है ? नहीं, उल्टा ही हुआ है। एक तो पेगासस से जासूसी के मामले में सरकार की बदनामी पहले से हो रही है और अब लोकतंत्र के चौथे खंभे खबरपालिका पर हमला करके सरकार ने नई मुसीबत मोल ले ली है। देश के सभी निष्पक्ष अखबार, पत्रकार और टीवी चैनल इस हमले से परेशान हैं। 

सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार ने 'भास्करÓ पर छापे इसलिए मारे हैं कि उसने अपनी अकूत संपत्तियों को विदेशों में छिपा रखा है ताकि उसे आयकर न देना पड़े। इसके अलावा उसने पत्रकारिता के अलावा कई धंधे चला रखे हैं। उन सबकी अनियमितता को अब सप्रमाण पकड़ा जाएगा। यदि ऐसा है तो यहां सरकार से मेरे तीन सवाल हैं। पहला, ये छापे अभी ही क्यों डाले गए? पिछले 6-7 साल से मोदी सरकार क्या सो रही थी ? अभी ही उसकी नींद क्यों खुली? उसका कारण क्या है? दूसरा, यह छापा सिर्फ भास्कर पर ही क्यों डाला गया? क्या देश के सारे नेतागण, व्यापारी और व्यवसायी वित्तीय-कानूनों का पूर्ण पालन कर रहे हैं? क्या देश के अन्य बड़े अखबार और टीवी चैनलों पर भी इस तरह के छापे डाले जाएंगे? तीसरा, अखबार के मालिकों के साथ-साथ संपादकों और रिपोर्टरों के भी फोन जब्त क्यों किए गए?

उन्हें दफ्तरों में लंबे समय तक बंधक बनाकर क्यों रखा गया? उन्हें डराने और अपमानित करने का उद्देश्य क्या था? इन छापों का एकमात्र उद्देश्य है, स्वतंत्र पत्रकारिता के घुटने तोडऩा। भास्कर देश का सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली अखबार इसीलिए बन गया है कि वह निष्पक्ष है और प्रामाणिक है। यदि उसने कोरोना के दौरान सरकारों की लापरवाहियों को उजागर किया है तो ऐसा करके उसने सरकार का भला ही किया है। उसने उसे सावधान करके सेवा के लिए प्रेरित ही किया है। यदि उसने गुजरात की भाजपा सरकार की पोल खोली है तो उसने राजस्थान की कांग्रेस सरकार को भी नहीं बख्शा है। भास्कर के पत्रकार और मालिक अपनी प्रखर पत्रकारिता के लिए विशेष सम्मान के पात्र हैं।

संत कबीर के शब्दों में 'निदंक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छबायÓ! भास्कर के साथ उल्टा हुआ। भाजपा सरकारों ने उसे विज्ञापन देने बंद कर दिए। मैं भास्कर को सरकार का अंध विरोधी या अंध-समर्थक अखबार नहीं मानता हूं। पिछले 40 साल से मेरे लेख भास्कर में नियमित रुप से छप रहे हैं लेकिन आज तक किसी संपादक ने एक बार भी मुझसे नहीं कहा कि आप सरकार की किसी नीति का समर्थन या विरोध क्यों कर रहे हैं। भास्कर में यदि कांग्रेस के बुद्धिजीवी नेताओं के लेख छपते हैं तो भाजपा के नेताओं को भी उचित स्थान मिलता है। भास्कर पर डाले गए इस सरकारी छापे से सरकार को नुकसान और भास्कर को फायदा ही होगा। भास्कर की पाठक-संख्या में अपूर्व वृद्धि हो सकती है।
(नया इंडिया की अनुमति से)

 


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