विचार / लेख

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Date : 22-Jul-2019


भारत में समलैंगिकता अब अपराध नहीं रही। कानून ने इसे मान्यता दे दी है। इसके बावजूद भारतीय समाज के लोग खुलकर इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

एल से लेस्बियन
लेस्बियन यानी वे महिलाएं जो महिलाओं की ओर आकर्षित होती हैं। 1996 में आई फिल्म फायर ने जब इस मुद्दे को उठाया तब काफी बवाल हुआ। आज 20 साल बाद भी यह मुद्दा उतना ही संवेदनशील है।

भारत के दक्षिण में स्थित चेन्नई में रहने वाली एक ट्रांसजेंडर लडक़ी शेम्बा शुरू में लडक़े की तरह दिखती थी। छह साल की उम्र में लडक़ी की तरह चलने पर स्कूल के साथियों ने छेडख़ानी की। जब 10 साल की उम्र में उसने लड़कियों जैसे कपड़े पहनने शुरू किए तो उसके ऊपर पत्थर फेंके गए। इस वजह से उसने स्कूल जाना छोड़ दिया, वकील बनने का अपना सपना त्याग दिया। अब इस बात की संभावना ज्यादा बढ़ गई है कि भविष्य में वह या तो भीख मांगेगी या सेक्स वर्कर के तौर पर काम करेगी।
शेम्बा ने कहा, उन्होंने मेरे सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं छोड़ा। मुझे लगता है कि मैं जो कर रही थी वो मेरे लिए बिल्कुल सामान्य बात थी। लेकिन मेरे साथ पढऩे वालों के लिए यह बिल्कुल असामान्य बात थी। पहले मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। बाद में जब उन्होंने मेरे ऊपर पत्थर फेंकने शुरू किए, तो मैंने स्कूल नहीं जाने का फैसला किया। यह कहानी सिर्फ एक शेम्बा की नहीं है। यूनेस्को द्वारा तमिलनाडु में एलजीबीटी समुदाय के 400 लोगों के बीच किए गए एक सर्वे के अनुसार, डर की वजह से आधे से अधिक ने क्लास में जाना छोड़ दिया और एक तिहाई ने स्कूल छोडऩे का फैसला किया।
शोषण की अनगिनत घटनाएं
एलजीबीटी समुदाय के बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार में बलात्कार, छेड़छाड़, मार-पीट, कमरे में बंद कर देना, उनके सामान चोरी कर लेना और उनके बारे में भद्दी अफवाहें फैलाना शामिल है। 
एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था सहोदरन ने सर्वे में यूनेस्को की मदद की है। सहोदरन की सदस्य और ट्रांसजेंडर जया गुणसेलेन कहती हैं, हम जानते हैं कि दुव्र्यवहार होता है लेकिन जो आंकड़े आए हैं, वे हैरान करने वाले हैं। यहां तक कि मुझे स्कूल में धमकाया गया था। लेकिन कुछ लोगों की बातें सुन मैं हैरान रह गई। वे बदमाशों के गिरोह और शारीरिक शोषण करने वालों के बारे में बताते हैं। हालांकि कुछ पीडि़तों ने शर्मिंदगी की वजह से हिंसा के निशान छिपा लिए।
तमिलनाडु राज्य शिक्षा विभाग ने कहा कि यहां पहले से ही छात्रों के लिए एक हॉटलाइन है, जो परामर्श प्रदान करता है। राज्य सरकार यौन और लिंग विविधता के आधार पर धमकाने जैसे मामलों पर अंकुश लगाने की नीति को मजबूत करने की योजना बना रही है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2018 में समलैंगिकता को मान्यता देने के ऐतिहासिक फैसले के बावजूद भारत के एलजीबीटी समुदाय को अक्सर उनके परिवारों द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है। उन्हें नौकरी मिलने में परेशानी होती है। ऐसे में वे सेक्स वर्कर बनने या भीख मांगने के लिए मजबूर होते हैं।
ट्रांसजेंडरों के लिए नए बिल में बदलाव
वर्ष 2018 में ट्रांसजेंडरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए लोकसभा में बिल पास किया गया था लेकिन उस समय यह निरस्त हो गया था। अब इस साल इसे फिर से संसद में पेश किया जाना है लेकिन मसौदे में दो अहम बदलाव किए गए हैं। पहला ये है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता के लिए जिला स्क्रीनिंग कमेटी के गठन की आवश्यकता वाले हिस्से को हटा दिया है।
इस कमेटी में मुख्य चिकित्सा अधिकारी, सामाजिक कल्याण अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, ट्रांसजेंडर समुदाय का प्रतिनिधि और सरकार द्वारा नामांकित एक व्यक्ति होता था। अब लोग स्वयं ही अपनी पहचान ट्रांसजेंडर के रूप में कर सकेंगे और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा एक प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा। दूसरा बदलाव ये है कि अब तक ट्रांसजेंडरों द्वारा भीख मांगने के काम को अपराध माना जाता रहा है लेकिन नए बिल के अनुसार ये अपराध नहीं माना जाएगा। (डॉयचेवेले)
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Date : 22-Jul-2019

दक्षिण कोरिया के लोग बीयर काफी पसंद करते हैं लेकिन वे टोक्यो के साथ कारोबारी विवाद पर गुस्सा हैं। और इस गुस्से का इजहार इन दिनों राष्ट्रभक्ति दिखाते हुए वे जापान के पेय पदार्थों के बहिष्कार से कर रहे हैं।

जापान ने जुलाई के शुरू में सैमसंग जैसे दिग्गज टेक कंपनियों के लिए जरूरी सामान जैसे चिप्स के लिए उपयोग किए जाने वाले रसायनों के निर्यात पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया। इससे वैश्विक स्तर पर तकनीकी क्षेत्र पर प्रभाव पडऩे की आशंकाओं को हवा मिली है। जापान के इस कदम पर दक्षिण कोरिया के केंद्रीय बैंक ने कहा था कि इससे अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। दोनों देशों के अधिकारियों ने बिगड़ती स्थिति को नियंत्रित करने के लिए घंटों तक बातचीत की, लेकिन अभी तक विवाद का कोई हल नहीं निकला है।
दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी हाइपर मार्केट श्रृंखला ई-मार्ट के अनुसार वहां बीयर पीने वाले जापान को लेकर अपना गुस्सा दिखा रहे हैं। उन्होंने चार बड़े जापानी ब्रांड के पेय पदार्थों को पीना छोड़ दिया है। असही, किरिन, सपोरो और संतूरी चार बड़ी बीयर कंपनियों की बिक्री जून के अंतिम 15 दिन के मुकाबले जुलाई के शुरुआती 15 दिनों में 25 प्रतिशत तक गिर गई है। ई-मार्ट के अधिकारी ने बताया, यह गिरावट अचानक हुई है। लंबे समय से ऐसा नहीं हुआ था। इस अवधि में कोरियन ब्रॉन्ड के बीयरों की बिक्री में 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान द्वारा कोरियाई लोगों के जबरन श्रम के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच दशकों से चल रहा विवाद हाल के दिनों में बढ़ा है। इसने दक्षिण कोरिया में गुस्से को बढ़ा दिया है। वहां 10 में से सात लोग अभी भी पूर्व औपनिवेशिक शासक के प्रति नकारात्मक भावना रखते हैं। इस बीच दक्षिण कोरिया में किराने की लगभग 3,700 दुकानों ने कुछ या सभी जापानी उत्पादों की खरीद रोक दी है। राजधानी सियोल के एक सुपरमार्केट के आगे लगे बोर्ड पर संकेतों में कहा गया है, जापान एक ऐसा देश है जिसे अपने अतीत पर पछतावा नहीं है। हम अपने यहां जापानी उत्पाद नहीं बेचते हैं।
जापान सरकार का कहना है कि उपकरण बनाने वाले रसायन के व्यापार पर प्रतिबंध, सियोल के साथ संबंधों में विश्वास की कमी के कारण लगाए गए हैं। साथ ही जापान ने दक्षिण कोरिया पर संवेदनशील जापानी सामग्री के निर्यात को अनुचित तरीके से हैंडल करने का भी आरोप लगाया। लेकिन सियोल का कहना है कि दक्षिण कोरियाई अदालतों द्वारा जापानी कंपनियों को दशकों पहले जबरी श्रम के पीडि़तों को मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। इसी का बदला लेने के लिए जापान ने ऐसा कदम उठाया है।
बहिष्कार के बीच इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर शेयर की गई है, जिसमें कहा गया है कि मैं जापान नहीं जाऊंगा, मैं जापानी उत्पाद नहीं खरीदूंगा। न शब्द को जापानी ध्वज के लाल डिस्क के साथ ओ के रूप में दिखाया गया है। जापान में दक्षिण कोरिया जाने वाले लोगों के सबसे बड़े ऑनलाइन प्लेटफार्मों में से एक ने आंदोलन के समर्थन में अनिश्चितकालीन बंद की घोषणा की। इस प्लेटफार्म पर 10 लाख से अधिक से अधिक यूजर यात्रा से संबंधित सुझाव साझा करते हैं।
दक्षिण कोरियाई स्टेशनरी चेन क्योबो हॉटट्रैक ने संकेत देना शुरू कर दिया है कि कौन सी कलम किस देश में बनी है। इसके लिए वे राष्ट्रीय ध्वज या फूल वाले चिन्ह के साथ लेबल लगा रहे हैं। इस हफ्ते कोरियाई पेन की बिक्री में 23 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। देश के ब्यूटी ब्लॉगर्स भी राष्ट्रवादियों के निशाने पर आ गए हैं। 
रिसाबा एक प्रसिद्ध ब्यूटी ब्लॉगर हैं, जिनके वीडियो चैनल के 20 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं। इस महीने की शुरुआत में एक जापानी मेकअप उत्पाद को दिखाने के लिए उन्हें सार्वजनिक आलोचना के बाद माफी मांगनी पड़ी थी।
दक्षिण कोरिया और जापान दोनों लोकतांत्रिक देश हैं तथा अमेरिका के सहयोगी हैं। इनका सामना तेजी से विकसित हो रहे चीन और परमाणु हथियार संपन्न उत्तर कोरिया से है। हालांकि दक्षिण कोरिया के वामपंथी माने जाने वाले राष्ट्रपति मून जे इन उत्तर कोरिया के साथ जुडऩे के लिए जोर दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जापान के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाई दोनों देशों की राष्ट्रीय पहचान के केंद्र में है।
जापान में असाही शिम्बुन समाचार पत्र द्वारा लगभग एक हजार लोगों के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 56 प्रतिशत ने चिप्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों के दक्षिण कोरिया को निर्यात पर सरकारी नियंत्रण को कड़ा करने का समर्थन किया है। (डॉयचेवैले)

 


Date : 22-Jul-2019

हाल ही में इसी से प्रेरित एक प्रयोग में वैज्ञानिकों के एक अन्य समूह ने प्रकाश तरंगों की बजाए ध्वनि का प्रयोग किया। माइक्रोफोन और कार में उपयोग किए जाने वाले छोटे स्पीकरों की सहायता से एक खंभे जैसा हार्डवेयर तैयार किया गया है। 

पूर्व में शोधकर्ताओं द्वारा ऐसे उपकरण विकसित किए जा चुके हैं जो कोनों के पीछे ओझल चीज़ों को देखने के लिए प्रकाश तरंगों का उपयोग करते थे। इस प्रक्रिया में प्रकाश तरंगों को कोनों पर टकराकर उछलने दिया जाता था ताकि जो वस्तुएं आंखों की सीध में नहीं हैं उन्हें भी देखा जा सके।  हाल ही में इसी से प्रेरित एक प्रयोग में वैज्ञानिकों के एक अन्य समूह ने प्रकाश तरंगों की बजाए ध्वनि का प्रयोग किया। माइक्रोफोन और कार में उपयोग किए जाने वाले छोटे स्पीकरों की सहायता से एक खंभे जैसा हार्डवेयर तैयार किया गया है। 
ये स्पीकर ध्वनियों की एक श्रंृखला उत्सर्जित करते हैं जो एक दीवार पर, एक कोण पर टकराने के बाद दूसरी दीवार पर छिपी हुई वस्तु पर पड़ती है। वैज्ञानिकों ने दूसरी दीवार पर अक्षर का एक पोस्टर बोर्ड रखा था। इसके बाद उन्होंने इस उपकरण को धीरे-धीरे घुमाया और हर बार अधिक ध्वनियों की संख्या बढ़ाते गए। हर बार ध्वनियां एक दीवार से परावर्तित होकर दूसरी दीवार पर रखे पोस्टर बोर्ड से टकराकर माइक्रोफोन में वापस आई।
भूकंपीय इमेजिंग एल्गोरिदम का उपयोग करते हुए उनके यंत्र ने अक्षर की एक मोटी-मोटी छवि बना दी। शोधकर्ताओं ने एल  और टी  अक्षरों के साथ भी प्रयोग किया और अपने परिणामों की तुलना प्रकाशीय विधि से की। प्रकाशीय विधि, जिसके लिए महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती है, अधिक दूरी के रु की छवि बनाने में विफल रही। इसके साथ ही ध्वनि-आधारित विधि में केवल 4-5 मिनट लगे जबकि प्रकाशीय विधि में एक घंटे से अधिक समय लगता है। शोधकर्ता अपने इस कार्य को कंप्यूटर विजऩ एंड पैटर्न रिकॉग्निशन काफ्रेंस में प्रस्तुत करेंगे। 
इस तकनीक की व्यावहारिक उपयोगिता में अभी काफी समय है, लेकिन शोधपत्र के लेखकों का ऐसा मानना है कि आगे चलकर इस तकनीक का उपयोग वाहनों में अनदेखी बाधाओं को देखने के लिए किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)


Date : 21-Jul-2019

-रचना सरन
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की सोनभद्र के पीडि़तों से मिलने की 26 घंटे तक चली जद्दोजहद हताश-नाउम्मीद कांग्रेसियों में उत्साह भरने में कामयाब रही हंै। साथ ही, भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों में कांग्रेस को फिलहाल बढ़त भी दिला गई हंै। 
प्रियंका गांधी ने चुनार के किले में शनिवार को सोनभद्र में मारे गए लोगों के परिवार से मिलने के बाद कहा कि वह अपने मकसद में कामयाब रहीं। खुद राष्ट्रीय स्तर पर उनको मिली सुर्खियों को छोड़ भी दिया जाए तो नि:संदेह यूपी में करीब 30 साल से हाशिए पर चल रही कांग्रेस को संजीवनी देने की उनकी कोशिश इस मायने में कामयाब होती दिखी कि दो दिन प्रदेश के कई जिलों में कांग्रेसी सड़क पर उतरते दिखे। नेताओं में प्रियंका के संघर्ष में शामिल होने की होड़ दिखी। 
लोकसभा चुनाव में प्रदेश में हुई शर्मनाक हार और उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता लगभग कोमा में हैं। हताश और निराश पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिए यह जरूरी भी था कि प्रियंका खुद सड़क पर उतर कर सरकार के खिलाफ मोर्चा लें। ट्विटर और बयानों से तो वह सरकार के खिलाफ लोहा पहले से ही ले रही थीं लेकिन सोनभद्र की घटना ने उन्हें सड़क पर उतरने का अवसर दिया और वह पूरे दमखम से उतरीं भी। नतीजतन, उत्साहित कांग्रेसी देखते-देखते सोनभद्र, मिर्जापुर ही नहीं प्रदेश के दूसरे जिलों में भी नारेबाजी करते और पुतला फूंकते सड़कों पर उतर गए। 
दूसरे, प्रियंका जानती हैं कि भाजपा से अगली चुनावी लड़ाई के लिए जरूरी है कि पहले बतौर विपक्षी दल कांग्रेस मुख्य मुकाबले में आए। फिलहाल प्रियंका सोनभद्र प्रकरण पर दूसरों पर भारी होती दिखीं। लेकिन मजबूत संगठन के अभाव में प्रियंका और कांग्रेस यह माहौल कब तक बनाये रखते हैं, यह उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं। (लाइव हिंदुस्तान)


Date : 20-Jul-2019

पवन वर्मा

20 जुलाई 1969 को मंजिल पर पहुंचा अपोलो 11 मिशन बताता है कि जब राजनीतिक महत्वाकांक्षा विज्ञान से मिलती है तो मानव सभ्यता दुर्लभतम उपलब्धियां हासिल करती है।

21 नवंबर, 1962 व्हाइट हाऊस के कैबिनेट रूम में एक महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही है। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने मीटिंग में मौजूद नासा के मुख्य प्रशासक जेम्स वेब से पूछते हैं, ‘चंद्रमा तक पहुंचना नासा की पहली प्राथमिकता नहीं है?’ वेब इनकार में सिर हिलाते हैं, ‘यह हमारी शीर्ष प्राथमिकता नहीं है।’ कैनेडी को यह बात ठीक नहीं लगती और वे उनसे नासा की ‘प्राथमिकताएं’ बदलने पर जोर देते हुए कहते हैं, ‘यह राजनीतिक वजहों, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक वजहों से महत्वपूर्ण है। आपको ठीक लगे या न लगे अब यह काम एक दौड़ का हिस्सा बन चुका है।’ बैठक के दौरान अचानक राजनीति और विज्ञान आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। वेब कैनेडी को आगाह करते हैं कि नासा के वैज्ञानिक चंद्रमा पर मानव उतारने की किसी भी परियोजना को लेकर संदेह में हैं। वे कहते हैं, ‘हम चंद्रमा की सतह के बारे में कुछ भी नहीं जानते।’ उनकी राय थी कि अंतरिक्ष के बारे में और गहराई से अध्ययन के बाद ही अमरीका इस दौड़ को जीत सकता है।
कैनेडी इन तर्कों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते। चंद्रमा तक पहुंचने की दौड़ में सोवियत संघ (तत्कालीन यूएसएसआर) को हराने का महत्व बताते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति कहते हैं, ‘हम उम्मीद करते हैं कि हम उन्हें हराएंगे। हमने कुछ ही साल पहले अपना कार्यक्रम शुरू किया है लेकिन हम उन्हें बताएंगे कि हमारा कार्यक्रम उनके बाद भले ही शुरू हुआ हो पर हम उनसे आगे निकल चुके हैं।’
अमरीका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष की दौड़ दोनों देशों के बीच चल रहे शीत युद्ध का ही एक मोर्चा थी। शीत युद्ध मूल रूप से दोनों खेमों के बीच लोकतांत्रिक-पूंजीवादी बनाम सैन्य-साम्यवादी व्यवस्था का संघर्ष था जो सबसे पहले बड़े स्तर पर कोरिया युद्ध (1950-53) में दिखा। यहां उत्तर कोरिया की साम्यवादी सरकार को सोवियत खेमे का समर्थन था तो दक्षिण कोरिया की तरफ अमरीका और उसके सहयोगी देश थे। दोनों देशों के बीच यह तनाव एशिया से लेकर यूरोप में जर्मनी तक चलता रहा। यह एक तरह की जमीनी लड़ाई थी जहां ये देश एक दूसरे से सीधे उलझने के बजाय दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूकें चला रहे थे।
यही जमीनी लड़ाई उस समय अंतरिक्ष की दौड़ में बदल गई जब 1957 में सोवियत संघ पहले मानव निर्मित सेटेलाइट स्पूतनिक को अंतरिक्ष में छोडऩे में कामयाब हो गया। कैनेडी वेब से जिन सालों की बात कर रहे थे उनमें सोवियत संघ अंतरिक्ष की दौड़ का सबसे तेज धावक था। स्पूतनिक के दो साल बाद उसने चंद्रमा पर लूना 2 नाम का प्रोब भी उतार दिया। उसी साल उसके लूना 3 मिशन ने चंद्रमा के उस हिस्से की तस्वीरें भी खींचीं जो धरती से नहीं दिखता। यूरी गैगरिन को 1961 में बाह्य अंतरिक्ष में भेजने के साथ ही सोवियत संघ वह पहला देश बना जो इंसानों को पृथ्वी की कक्षा में भेजकर सुरक्षित वापस ला सकता था। लूना 3 मिशन के बाद चंद्रमा तक पहुंचने के उसके और भी अभियान लगातार सफल हुए।
इधर जमीन पर शीतयुद्ध एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच रहा था। 1961 में अमरीका ने इटली और तुर्की में अपनी ज्यूपिटर मिसाइलें तैनात कर दीं। इनकी रेंज मॉस्को तक थी। इसके जवाब में एक साल बाद ही सोवियत संघ ने लैटिन अमरीकी देश क्यूबा में अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात करने का फैसला कर लिया। इससे विश्व के दो सबसे ताकतवर देश परमाणु युद्ध की कगार पर पहुंच गए थे। इसे क्यूबा मिसाइल संकट के नाम से जाना जाता है। हालांकि बाद में दोनों देशों के बीच समझौता हो गया और अमरीका को यूरोपीय देशों से अपनी परमाणु मिसाइलें हटानी पड़ीं। सोवियत संघ ने भी क्यूबा से अपने हथियार हटा लिए।
1961 में कैनेडी ने अमरीकी संसद के एक संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा था कि उनका लक्ष्य है कि दशक के आखिर तक अमरीका चांद पर मानव भेज दे। लेकिन क्यूबा मिसाइल संकट ने इसे उनका सबसे पहला राजनीतिक लक्ष्य बना दिया। क्यूबा मिसाइल संकट अक्टूबर, 1962 की बात है और कैनेडी और नासा के मुख्य प्रशासक के बीच जिस बातचीत की चर्चा हमने शुरू में की वह इसके एक महीने बाद नवंबर की है। 2011 में बोस्टन स्थित जॉन एफ केनेडी प्रेजिडेंशियल लाइब्रेरी एंड म्यूजियम ने इस बातचीत के टेप सार्वजनिक किए थे जिनसे साफ पता चलता है कि अमरीका का चंद्र अभियान राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते इतनी तेजी से आगे बढ़ा था।
व्हाइट हाउस की बातचीत आगे बढ़ती है और कैनेडी, जेम्स वेब को याद दिलाते हैं कि संघीय सरकार नासा के कायक्रमों पर भारी-भरकम रकम खर्च कर चुकी है। वे यह भी कहते हैं कि भविष्य में उनकी सरकार सिर्फ चंद्रमा से जुड़े अभियानों को ही धन देगी। चंद्र अभियान को प्रथमिकता न बनाने के लिए वे नासा को चेतावनी देते हुए अपनी अंतिम बात कहते हैं, ‘यदि ऐसा नहीं होता है तो हमें इतना पैसा दूसरे अभियानों पर खर्च करने की जरूरत नहीं है क्योंकि मेरी अंतरिक्ष में कोई दिलचस्पी नहीं है।’
इस समय तक नासा चंद्रमा के अध्ययन के लिए रेंजर अभियान शुरू कर चुका था। लेकिन इसके छह अभियान असफल होने और सोवियत संघ के लगातार सफल होने से अमरीकी नागरिकों के बीच हताशा का माहौल था। कैनेडी को अमरीका का राष्ट्रपति बने दो साल पूरे होने जा रहे थे। उन्हें लगता था कि अमरीका को अब किसी भी कीमत पर अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करनी है। जॉन एफ कैनेडी एंड द रेस टू द मून के लेखक जॉन लॉग्सडन एक रिपोर्ट में बताते हैं, ‘सोवियत संघ ने सफल अभियानों के जरिए एक तरह से अंतरिक्ष को खेल का मैदान बना दिया था और कैनेडी के पास इस चुनौती को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।’
कैनेडी के पहले आइजनहॉवर अमरीका के राष्ट्रपति थे और उन्होंने रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रमों का जवाब देने के लिए अमेरिका में विज्ञान और तकनीक की शिक्षा में भारी निवेश किया था। 1970 के दशक की शुरुआत में यहां से ऐसे ग्रेजुएट निकलने लगे थे जो नासा के अपोलो मिशन की जरूरतों को पूरा कर सकें। संस्थान के पास अब मानव संसाधन पर्याप्त संख्या में था। कैनेडी की वजह से उसे भारी फंड भी मिल गया। चंद्रमा के अध्ययन के लिए चल रहे नासा के रेंजर अभियान अब सफल होने लगे थे।
 

 


Date : 20-Jul-2019

टी ई नरसिम्हन, गिरीश बाबू
डोसा किंग के नाम से मशहूर और शाकाहारी रेस्तरां की प्रसिद्ध सरवण भवन श्रृंखला के संस्थापक पी राजगोपाल का गुरुवार सुबह चेन्नई के एक निजी अस्पताल में देहावसान हो गया। दो दिन पहले ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 18 साल पहले अपने शांताकुमार नाम के व्यक्ति की हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी जिसके बाद 8 जुलाई को 72 वर्षीय राजगोपाल ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। उन पर आरोप था कि एक ज्योतिषी की सलाह पर शांताकुमार की पत्नी से शादी करने के लिए उन्होंने पति की हत्या कर दी थी।
न्यायालय में समर्पण करने के बाद उन्हें पहले सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया और बाद में न्यायालय के आदेशानुसार चेन्नई के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया। राजगोपाल न्यायालय में आत्मसमर्पण करने के लिए एंबुलेंस से पहुंचे और स्ट्रेचर पर लेटे राजगोपाल ने चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगाया हुआ था। इस दौरान राजगोपाल के वकील ने बताया कि वह गुर्दे की बीमारी के साथ साथ दूसरी कई बीमारियों से पीडि़त हैं। सरवण भवन श्रृंखला के तहत चेन्नई में 20 और दिल्ली समेत दूसरे हिस्सों में 5 रेस्तरां हैं।  अमरीका, ब्रिटेन, इटली, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्वीडन, बेल्जियम, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, मलेशिया और खाड़ी देशों में भी उनके रेस्तरां हैं। आंकड़ों के मुताबिक साल 2017 में सरवणा भवन शृंखला का कारोबार 3,000 करोड़ रुपये के करीब रहा था। 
इस कारोबारी के उभार और पतन में ज्योतिष शास्त्र पर दृढ़ विश्वास का अहम योगदान रहा और सरवणा रेस्तरां ने दक्षिण भारत में खाने की गुणवत्ता को पूरी तरह बदल दिया। साल 1947 में तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में जन्मे राजगोपाल की कहानी जमीन से आसमां तक पहुंचने की कहानी है। वर्ष 1968 में वह चेन्नई आए और के के नगर में प्रोविजन स्टोर खोला। जब यह कारोबार चलने लगा तो उन्होंने नाकाम हो चुके रेस्तरां को खरीदने के लिए एक मित्र को साथ ले लिया और 1981 में इस कारोबार में कदम रख दिया। इसके पीछे की कहानी यह है कि एक ज्योतिषी ने उन्हें बताया था कि यह रेस्तरां उनके लिए सुख-समृद्धि लेकर आएगा। 
उन्होंने काफी कम कीमतों पर साफ जगह पर बढिय़ा भोजन देना शुरू किया जिससे कई लोग वहां आने लगे। शुरुआती समय में कारोबार में घाटा हुआ लेकिन धीरे-धीरे शहर में उनके रेस्तरां का नाम बढऩे लगा। इसके चलते उन्होंने एक होटल से आगे बढ़ते हुए खाने की एक श्रृंखला खोली और खाने की गुणवत्ता के साथ साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया। धीरे धीरे खाने की कीमतें भी बढ़ीं। यहां के लोग उन्हें अन्नाची (बड़ा भाई) कहने लगे। साल 1997 में उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर एक पुस्तक भी लिखी जिसमें उन्होंने अपनी सफलता की कहानियां बताईं। नई शताब्दी (2000) की शुरुआत में इस श्रृंखला का विस्तार देश के दूसरे क्षेत्रों के अलावा विदेश तक होने लगा। उन्होंने कर्मचारियों के बीच भरोसा बढ़ाया और उन्हें लगातार खुश रखा। कर्मचारियों को जीवन यापन के लिए बेहतर सुविधाओं के साथ साथ पेंशन और उनके बच्चों को शिक्षा की भी सुविधा दी गई। एक समय के बाद यह ब्रांड किसी दूसरे बहुराष्ट्रीय रेस्तरां के समान हो गया और इसके नाम से लोग यहां आने लगे। 
वह तमिलनाडु और राज्य के बाहर दूसरे इलाकों में भी मंदिर और धार्मिक स्थानों को बनाने के लिए काफी उदार थे। खबरों के मुताबिक राजगोपाल अपने ही एक कर्मचारी की बेटी जीवज्योति से शादी करना चाहते थे लेकिन उसने शादी से मना कर दिया। इस समय राजगोपाल की पहले से ही दो पत्नियां थीं और पहली पत्नी से दो बेटे थे। स्थानीय खबरों के अनुसार एक ज्योतिषी ने जीवज्योति से शादी करने की सलाह दी थी और कहा था कि इससे उनके लिए सुख-समृद्धि आएगी। जीवज्योति ने शांताकुमार से शादी कर ली जिससे राजगोपाल क्रोधित हो गए। साल 2001 में शांताकुमार मृत पाए गए और स्थानीय अदालत ने साल 2004 में राजगोपाल को हत्या का दोषी पाते हुए 10 साल की सजा सुनाई। वर्ष 2009 में मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास में बदल दिया। राजगोपाल ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की लेकिन न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और 72 वर्षीय कारोबारी के पास कोई भी विकल्प शेष नहीं रहा। स्थानीय रिपोर्ट बताती हैं कि ज्योतिषी की सलाह पर उन्होंने मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में दान देना जारी रखा। (बिजनेस स्टैंडर्ड)

 

 


Date : 20-Jul-2019

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज  की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग पर रोक लगाने के लिए 1 अरब हेक्टेयर अतिरिक्त जंगल लगाने की आवश्यकता है। यह क्षेत्र लगभग संयुक्त राज्य अमरीका के बराबर बैठता है। हालांकि यह काफी कठिन मालूम होता है लेकिन साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पृथ्वी पर पेड़ लगाने के लिए इतनी जगह तो मौजूद है।
कृषि क्षेत्रों, शहरों और मौजूदा जंगलों को न भी गिना जाए तो दुनिया में 0.9 अरब हेक्टेयर अतिरिक्त वन लगाया जा सकता है। इतने बड़े वन क्षेत्र को विकसित किया जाए तो अनुमानित 205 गीगाटन कार्बन का स्थिरीकरण हो सकता है। यह उस कार्बन का लगभग दो-तिहाई होगा जो पिछले दो सौ वर्षां में मनुष्य ने वायुमंडल में उड़ेला है। इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले थॉमस क्रॉथर के अनुसार यह जलवायु परिवर्तन से निपटने का सबसे सस्ता समाधान है और सबसे कारगर भी है।
आखिर यह कैसे संभव है? यह पता लगाने के लिए क्रॉथर और उनके सहयोगियों ने लगभग 80,000 उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण किया और यह देखने की कोशिश की कि कौन-से क्षेत्र जंगल के लिए उपयुक्त होंगे। इसमें से उन्होंने मौजूदा जंगलों, कृषि क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों को घटाकर पता किया कि नए जंगल लगाने के लिए कितनी जमीन बची है। आंकड़ा आया 0.9 अरब हैक्टर। एक अनुमान के मुताबिक 0.9 अरब हेक्टेयर में 10-15 खरब पेड़ लगाए जा सकते हैं। पृथ्वी पर इस समय पेड़ों की संख्या 30 खरब है। इसमें आधी से अधिक बहाली क्षमता तो मात्र छह देशों - रूस, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और चीन में है।
परिणाम बताते हैं कि यह लक्ष्य वर्तमान जलवायु के तहत प्राप्त करने योग्य है। लेकिन जलवायु बदल रही है, इसलिए हमें इस संभावित समाधान का लाभ लेने के लिए तेज़ी से कार्य करना होगा। यदि धरती के गर्म होने का मौजूदा रुझान जारी रहता है तो 2050 तक नए जंगलों के लिए उपलब्ध क्षेत्र में 22.3 करोड़ हेक्टेयर की कमी आ जाएगी। (स्रोत फीचर्स)

 

 

 

 


Date : 19-Jul-2019

अनुराग भारद्वाज

वहीं, कुछ जानकार इसे राजनैतिक अवसरवादिता मानते हैं। उनके मुताबिक़ 1967 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो पार्टी पर उनकी पकड़ मज़बूत नहीं थी। लोग उन्हें कांग्रेस सिंडिकेट की ‘गूंगी गुडिय़ा’ कहते थे। कहते हैं कि इंदिरा की इस छवि को तोडऩे में ‘पांच पांडव’ बड़े कारगर साबित हुए। ये थे विदेश सेवा के अफ़सर त्रिलोक नाथ कौल, राजनेता और डिप्लोमेट दुर्गा प्रसाद धर, अर्थशास्त्री पृथ्वी नाथ धर, भारतीय पुलिस सेवा के अफसर रामेश्वर नाथ काउ और इनके सर्वे सर्वा और भारतीय विदेश सेवा के अफसर प्रेमेश्वर नारायण हक्सर। ये पांचों ही कश्मीरी पंडित थे !

साल 1969 कई लिहाज़ से सनसनीखेज था। इस साल इंदिरा गांधी देश की सबसे ताक़तवर नेता बनकर उभरीं। इसी साल तीन अहम घटनाएं हुईं- बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राष्ट्रपति का चुनाव और कांग्रेस पार्टी का विभाजन। ये तीनों घटनाएं एक दूसरे में इस तरह उलझी हुई हैं कि इन्हें अलग-अलग करके पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। तो इन्हें एक साथ ही समझते हैं।
क्या बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसके पहले भी हुआ था?
चर्चित लेखक बख्तियार के दादाभाई अपना किताब ‘बैरंस ऑफ़ बैंकिंग’ में लिखते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में केंद्रीय बैंक को सरकारों के अधीन करने के विचार ने जन्म लिया। उधर, बैंक ऑफ इंग्लैंड का राष्ट्रीयकरण हुआ, इधर, भारतीय रिज़र्व बैंक के राष्ट्रीयकरण की बात उठी जो 1949 में पूरी हो गई। फिर 1955 में इम्पीरियल बैंक, जो बाद में ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया’ कहलाया, सरकारी बैंक बन गया।
क्या यह आर्थिक जरूरत से ज्यादा से राजनैतिक कदम था?
आर्थिक तौर पर सरकार को लग रहा था कि कमर्शियल बैंक सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया में सहायक नहीं हो रहे थे। बताते हैं कि इस समय देश के 14 बड़े बैंकों के पास देश की लगभग 70 फीसदी पूंजी थी। इनमें जमा पैसा उन्हीं सेक्टरों में निवेश किया जा रहा था, जहां लाभ के ज्यादा अवसर थे। वहीं सरकार की मंशा कृषि, लघु उद्योग और निर्यात में निवेश करने की थी।
दूसरी तरफ एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 1947 से लेकर 1955 तक 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे जिनमें लोगों का जमा करोड़ों रुपया डूब गया था। उधर, कुछ बैंक काला बाज़ारी और जमाखोरी के धंधों में पैसा लगा रहे थे। इसलिए सरकार ने इनकी कमान अपने हाथ में लेने का फैसला किया ताकि वह इन्हें सामाजिक विकास के काम में भी लगा सके।
वहीं, कुछ जानकार इसे राजनैतिक अवसरवादिता मानते हैं। उनके मुताबिक़ 1967 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो पार्टी पर उनकी पकड़ मज़बूत नहीं थी। लोग उन्हें कांग्रेस सिंडिकेट की ‘गूंगी गुडिय़ा’ कहते थे। कहते हैं कि इंदिरा की इस छवि को तोडऩे में ‘पांच पांडव’ बड़े कारगर साबित हुए। ये थे विदेश सेवा के अफ़सर त्रिलोक नाथ कौल, राजनेता और डिप्लोमेट दुर्गा प्रसाद धर, अर्थशास्त्री पृथ्वी नाथ धर, भारतीय पुलिस सेवा के अफसर रामेश्वर नाथ काउ और इनके सर्वे सर्वा और भारतीय विदेश सेवा के अफसर प्रेमेश्वर नारायण हक्सर। ये पांचों ही कश्मीरी पंडित थे!
रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि पीएन हक्सर के विचार इंग्लैंड की लेबर पार्टी से मेल खाते थे। वे कुछ हद तक बाज़ार विरोधी विचारधारा, यानी के समाजवाद के प्रति लगाव रखते थे। उनका झुकाव तत्कालीन सोवियत रूस की तरफ़ था। सोवियत रूस और पूर्वी यूरोप के देशों में बैंक सरकार के अधीन रहते थे। गुहा ने कैथरीन फ्रैंक की किताब ‘लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरु गांधी’ के हवाले से लिखा है कि 1967 से लेकर 1973 तक हक्सर कांग्रेस सरकार में सबसे ताक़तवर व्यक्ति थे, और इंदिरा उनकी समझ की कायल थीं। यही से इंदिरा गांधी का भी झुकाव लेफ्ट की तरफ हो गया था।
1967 में इंदिरा ने कांग्रेस पार्टी में ‘दस सूत्रीय कार्यक्रम’ पेश किया। बैंकों पर सरकार का नियंत्रण, पूर्व राजे-महाराजों को मिलने वाले वित्तीय लाभ और न्यूनतम मज़दूरी का निर्धारण इसके मुख्य बिंदु थे। गुहा लिखते हैं कि इंदिरा की पेशकश पर कांग्रेस पार्टी ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखायी। इंदिरा को यह बात नागवार गुजऱी। इससे सिंडिकेट और इंदिरा गांधी आर-पार की लडाई के मूड में आ गए।
मशहूर पत्रकार इंदर मल्होत्रा की किताब ‘इंदिरा गांधी- अ पर्सनल एंड पोलिटिकल ऑटोबायोग्राफी; के हवाले से रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि पीएन हक्सर ने इंदिरा को एक सलाह दी थी। वह यह कि सिंडिकेट को ख़त्म करना है तो ताक़त की इस निजी लड़ाई को विचारधारा की लड़ाई के तौर पर पेश करना होगा। इसके लिए, उस साल एआईसीसी बंगलौर अधिवेशन में इंदिरा ने तुरंत प्रभाव से बैंकों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रख दिया। लोगों में संदेश गया कि इंदिरा गरीबों के हक की लडाई लडऩे वाली योद्धा हैं। पर अभी एक अड़चन और थी।
राष्ट्रीयकरण में कौन अड़ंगा डाल रहा था और कैसे बात बनी?
तेज तर्रार राष्ट्रवादी और तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई इसमें आड़े आ रहे थे। इंदिरा उनसे खौफ खाती थीं। हालांकि, इंदिरा के दस सूत्रीय कार्यक्रम को पार्टी में पेश करने वाले मोरारजी देसाई ही थे जो सामाजिक नजरिये से बैंकों पर सरकारी नियंत्रण के पक्षधर थे। पर वे उनके राष्ट्रीयकरण के पक्ष में नहीं थे।
हक्सर द्वारा संचालित ‘पांच पांडवों’ की टीम ने मोरारजी देसाई को इंदिरा गांधी के रास्ते से हटाने का प्लान बनाया। इसके तहत चंद्रशेखर और कांग्रेस की तब की युवा पीढ़ी के नेताओं ने देसाई और उनके बेटे कांति देसाई पर वित्तीय गड़बडिय़ां और कुछ बड़े उद्योग घरानों को फायदा पंहुचाने का इल्जाम लगाया।
लोहा गर्म था। इंदिरा ने हथौड़ा मार दिया। कुलदीप नायर ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखते हैं, ‘इंदिरा ने पत्रकारों और अन्य लोगों को बताया कि मोरारजी देसाई पूंजीवादी सोच रखते हैं और ये सोच सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाती।’ उन्होंने मोरारजी का पोर्टफोलियो बदलने का आदेश दे दिया। वे इसके लिए राज़ी नहीं हुए और उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
अब रास्ता साफ था। 19 जुलाई, 1969 को एक अध्यादेश जारी करके सरकार ने देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। जिस आर्डिनेंस के जरिये ऐसा किया गया वह ‘बैंकिंग कम्पनीज आर्डिनेंस’ कहलाया। बाद में इसी नाम से विधेयक भी पारित हुआ और कानून बन गया। यह इंदिरा की पहली जीत थी।
एक मोहरे का सफर जिसे वज़ीर ने बादशाह बना दिया?
कांग्रेस सिंडिकेट के सदस्य मोरारजी देसाई के निकाले जाने पर इंदिरा से नाराज हो गए। पर अगर वे कुछ कदम उठाते, तो देश में संदेश जाता कि ये लोग देश हित में नहीं हैं। लिहाजा, सिंडिकेट अपमान का घूंट पीकर रह गया।
उधर, राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन की अचानक मौत से इंदिरा गांधी को एक और मौका मिला। कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के बजाय इंदिरा ने निर्दलीय कैंडिडेट वीवी गिरी के पक्ष में अपने खेमे के लोगों से हवा बांधने को कहा। नैयर लिखते हैं कि कांग्रेस के नेता एसके पाटिल ने राष्ट्रपति के चुनाव के बाद एक आम सभा में कहा कि इंदिरा ने हिटलर के प्रोपेगैंडा मॉडल की तरह काम किया था। उन्होंने कांग्रेस में यह प्रचलित करवा दिया था कि गिरी कम्युनिस्ट विचारधारा के व्यक्ति हैं और इसीलिए वे राष्ट्रपति के लिए एक बेहतर विकल्प हैं।
इससे, इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के संबंध और बिगड़ गए। जब इंदिरा से इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बड़े नाटकीय अंदाज़ में रोते हुए इसे अपने पर इल्ज़ाम बताया। सिंडिकेट ने इंदिरा से कहा कि वे पार्टी को संबोधित करते हुए कांग्रेस उम्मीदवार को वोट देने की बात कहें। इंदिरा ने बड़े ही गोलमोल तरीके से नेताओं को अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट देने को कहकर सारा मामला ही बिगाड़ दिया। नतीजन कांग्रेस के नेताओं में फूट पड़ गयी। कुछ ने संजीव रेड्डी के पक्ष में, तो कुछ ने वीवी गिरी के पक्ष में मतदान किया। वीवी गिरी जीत गए! यह इंदिरा की दूसरी जीत थी।
कांग्रेस के दो फाड़
पानी अब सर के ऊपर से गुजऱ चुका था। कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा और इंदिरा के बीच ज़बरदस्त पत्र व्यवहार शुरू हो गया। 12 नवंबर 1969 को इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
अब तक जैसा पीएन हक्सर और टीम ने सोचा था, कमोबेश वैसा ही हो रहा था। कांग्रेस और में देश इंदिरा की छवि एकसमाजवादी नेता के तौर पर उभरी। पार्टी के नौजवान नेताओं का धड़ा खुलकर उनके समर्थन में खड़ा हो गया। उन्होंने कांग्रेस (आर) की स्थापना कर ली और दूसरी तरफ़ मूल पार्टी कांग्रेस (ओ) कहलाई।
दिसंबर में दोनों पार्टियों ने अपने-अपने अधिवेशन किये। आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के 705 सदस्यों में से 429 इंदिरा के साथ थे। इनमें से 220 लोकसभा में सदस्य थे। पर सरकार बनाने के लिए इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) पार्टी को अब 45 सदस्यों की ज़रूरत थी। ऐसे में कांग्रेस की लेफ्टवादी छवि को देखते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उनको समर्थन देने की घोषणा कर दी। और इस तरह इंदिरा गांधी दोबारा सरकार बनाने में कामयाब हो गयीं। यह इंदिरा गांधी की निर्णायक जीत थी। बाद में कांग्रेस (ओ) का नामोनिशान मिट गया।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के क्या नतीजे रहे?
राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। शहर से उठकर बैंक गांव-देहात की तरफ चल दिए। आंकड़ों के मुताबिक़ जुलाई 1969 को देश में बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थीं। 1994 के आते आते यह आंकड़ा साठ हज़ार को पार गया।
इसका फायदा हुआ कि बैंकों के पास काफी मात्रा में पैसा इकट्टा हुआ और आगे बतौर कर्ज बांटा गया। प्राथमिक सेक्टर, जिसमें छोटे उद्योग, कृषि और छोटे ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स शामिल थे, को फायदा हुआ। सरकार ने राष्ट्रीय बैंकों को दिशा-निर्देश देकर उनके लोन पोर्टफोलियो में 40 फीसदी कृषि लोन की हिस्सेदारी की बात की। बैंकों के जरिये रोजग़ार भी बढ़ा।
दूसरी तरफ, अपने टार्गेट और व्यक्तिगत लाभ के चलते, आंख बंद करके पैसा बांटा गया जिससे बैंकों का एनपीए बढ़ा। आज यह आंकड़ा आठ लाख करोड़ रु से भी ज्यादा हो चुका है। फायदा लेने वालों में रसूखदार ही थे। छोटे किसान या व्यापारी हाशिये पर खड़े रह गए। 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला जिसमें और छह निजी बैंकों को सरकारी कब्जे में लिया गया। (सत्याग्रह)

 


Date : 19-Jul-2019

कृष्णकांत
फिर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भागे हुए विधायकों के भागने की क्रिया पर कोई एक्शन न लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वास मत के दौरान भागे हुए विधायकों को विधानसभा से भी भागने की छूट दे दी।

कांग्रेस के जो विधायक भाग गये थे, कांग्रेस उनके पीछे भाग रही थी, लेकिन बीजेपी उनको लेकर काफी आगे तक भाग गई है। इसलिए कांग्रेस चाहे जितना भागे, वह भागे हुए विधायकों के बराबर नहीं भाग सकती।
एक भागा हुआ विधायक बोला कि हे कांग्रेस! तुम भागकर सदन में पहुंचो, मैं भी भागकर आता हूं। कांग्रेस भागकर विधानसभा पहुंची तो विधायक भागकर लापता हो गया। कांग्रेस कुछ देर अज्ञात के पीछे भागती रही, फिर भागकर पुलिस के पास पहुंची और शिकायत की कि भागा हुआ विधायक फिर से भाग गया है, आप भागकर उसका पता लगाइए।
उधर भागे हुए जिन विधायकों को बीजेपी लेकर भाग गई थी, वे कहीं पर लंब-दंड गोल-पिंड धर-पकड़ प्रतियोगिता यानी क्रिकेट खेलते पाए गए। वे बैट और बॉल लेकर एक दूसरे के पीछे भाग रहे हैं।
इसके पहले ये हुआ कि कांग्रेस के विधायक भाग गए। फिर भागे हुए विधायकों को बीजेपी लेकर भाग गई। फिर भागे हुए विधायकों को लेकर भागने के चक्कर में कांग्रेस मुंबई तक भागी, लेकिन विधायक उसके साथ नहीं भागे। फिर कांग्रेस भागे हुए विधायकों में से दो विधायक छीनकर भाग गई। फिर जो विधायक बीजेपी के साथ भागे थे, वे सुप्रीम कोर्ट भाग गए। फिर कांग्रेस बोली जो भाग गए थे, वे भाग कर आ रहे हैं। फिर भागे विधायक लेकर भागने की विशेषज्ञ बीजेपी भागे विधायकों के रिवर्स भागने से घबरा गई और अपने नहीं भागे हुए विधायकों को ही लेकर भाग गई।
कुछ विधायक मुंबई, कुछ सिरडी, कुछ उज्जैन तो कुछ इधर उधर भाग रहे थे, फिर बीजेपी ने सबकी गर्दन पकड़ी और लेकर रिजॉर्ट भाग गई। मुंबई और बेंगलुरु के रिजॉर्ट में बाहर वालों का अंदर तक भागना मना था, इसलिए कांग्रेस रिजॉर्ट के बाहर तक कई बार भागी, और वापस भाग आई।
फिर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भागे हुए विधायकों के भागने की क्रिया पर कोई एक्शन न लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वास मत के दौरान भागे हुए विधायकों को विधानसभा से भी भागने की छूट दे दी।
अब विश्वास मत के पहले बीजेपी कह रही है कि जो भागे वे मेरे साथ हैं। कांग्रेस कह रही कि जो भागे वे भागे, लेकिन हमें उम्मीद है कि बीजेपी के भी कुछ विधायक भाग जाएंगे और हम विश्वास मत जीत लेंगे। बीजेपी कह रही है कि हमारे साथ ज्यादा विधायक भागे हैं इसलिए हम कांग्रेस को सत्ता से भगा देंगे।
कांग्रेस कह रही है कि हम बीजेपी की विधायक भगाने की आदत भगा देंगे। अब कौन भागा, कौन आया, विधानसभा में इसका परीक्षण हो रहा है। कुछ घंटों में पता चल जाएगा कि कौन कुर्सी पर टिकेगा और कुर्सी छोडक़र भाग जाएगा।


Date : 18-Jul-2019

डॉ. संजय षुक्ला,

छत्तीसगढ़ में इन दिनों स्कूली बच्चों के मध्यान्ह भोजन में अण्डा षामिल किये जाने के सरकारी निर्णय पर भारी बवाल मचा हुआ है, कई धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठन सरकार के इस फैसले के खिलाफ विरोध दर्ज करवा रहे हैं। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा इस मुद्दे पर सरकार को विधानसभा के भीतर और बाहर लगातार घेर रही है तो दूसरी ओर कबीरपंथी, गायत्री परिवार, जैन-माहेष्वरी तथा ब्राम्हण समाज के संगठन अण्डे को मांसाहार मानते हुए फैसले को वापस लेने की मांग पर अड़े हुए हैं। सरकार के फैसले के विरोध में कबीरपंथ के हजारों अनुयायी अपने पंथ श्री प्रकाषमुनि नाम साहेब के नेतृत्व में सडक़ पर उतर आए और अनषन पर बैठ गए, लेकिन इस फैसले का कांग्रेसी विधायकों ने प्रषंसा करते हुए मुख्यमंत्री से सप्ताह में तीन दिन अण्डा देने की मांग की है। बहरहाल इस बीच राज्य षासन ने अण्डे का फण्डा सुलझाने के लिए अपने पुराने आदेष के संदर्भ में विस्तृत दिषा-निर्देष जारी कर दिया है,  स्कूली षिक्षा विभाग ने यह भी स्पश्ट किया है कि जो बच्चे अण्डा खाना नहीं चाहते उनके लिए दूध या सोया से बनी हुयी चीजें उपलब्ध करायी जाऐंगी। विभाग की तरफ से सभी जिला कलेक्टरों को पत्र लिखकर यह निर्देष दिया गया है कि आगामी दो सप्ताह में षाला विकास समिति पालकों की एक बैठक लेकर यह देखें कि स्कूलों में अण्डा दिये जाने पर सहमति है अथवा नहीं। बैठक में ऐसे छात्र-छात्राओं को चिन्हांकित करने का निर्देष दिया गया है जो मिड-डे-मील में अण्डा ग्रहण नहीं करना चाहते। निर्देष में आगे यह षामिल किया गया है कि मध्यान्ह भोजन तैयार करने के बाद अलग से अण्डे उबालने या पकाने की व्यवस्था की जाए, जिन विद्यार्थियों को अण्डा सेवन के लिए चिन्हांकित किया गया है उन्हें मध्यान्ह भोजन के समय पृथक पंक्ति में बैठाकर भोजन परोसा जाए। जिन स्कूलों में अण्डा दिये जाने पर आम सहमति नहीं है वहां की षाला विकास समिति बच्चों को अण्डा घर में पहुंॅचाने की व्यवस्था करें। पत्र में यह भी लिखा गया है कि जिन स्कूलों में अण्डा वितरण नहीं किया जाना हो वहां षाकाहारी छात्र-छात्राओं के लिए अन्य प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ जैसे सुगंधित सोया दूध, सुगंधित मिल्क, प्रोटीन क्रंच, फोर्टिफाइड बिस्किट, फोर्टिफाइड सोयाबड़ी, सोया मंूगफली चिकी, सोया पापड़, फोर्टिफाइड दाल विकल्प के रूप में परोसा जावे। बहरहाल राज्य षासन के इस आदेष ने अण्डा के विरोध की धार को भोथरा करने का प्रयास किया है। षासन ने पहले ही स्पश्ट कर दिया है कि मिड-डे-मील में अण्डा ग्रहण करने की व्यवस्था स्वैच्छिक है तथा सभी के लिए इसकी बाध्यता नहीं है, इसके बावजूद भाजपा सहित अनेक संगठन सरकार को इस मुद्दे पर लगातार घेरने का प्रयास कर रहे हैं। बहरहाल जब सरकार ने अण्डा सेवन को स्वैच्छिक घोशित कर दिया है और षाला विकास समिति तथा पालकों पर व्यवस्था की जवाबदेही सौंप दी है तब यह विवाद निरर्थक ही माना जाएगा।

गौरतलब है कि मिड-डे-मील भारत सरकार की योजना है जिसकी षुरूआत 15 अगस्त 1995 को हुयी थी। योजना के अंतर्गत पूरे प्रदेष के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को दोपहर का भोजन नि:षुल्क प्रदान किया जाता है। इसका उद्देष्य छात्रों के पोशण के स्तर को उन्नत करना है। हर पंचवर्शीय योजना में सरकार द्वारा मिड-डे-मील योजना के लिए बजट तय किया जाता है। 12वें पंचवर्शीय योजना में इसके लिए सरकार ने 901.55 अरब रूपये का बजट रखा था। केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा इस योजना पर आने वाले खर्च को साझा किया जाता है जिसके अंतर्गत केन्द्र सरकार 60 फीसदी तथा राज्य सरकार 40 फीसदी खर्च वहन करते हैं। केन्द्र सरकार भोजन के लिए अनाज और वित्त पोशण प्रदान करता है जबकि संघीय और राज्य सरकारों द्वारा सुविधाएं, परिवहन और स्वयं की लागत का खर्च उठाया जाता है। बच्चों को पर्याप्त पौश्टिक खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने के उद्देष्य से चालू की गयी इस योजना के तहत ऐसे बच्चों को स्कूलों में पोशणयुक्त खाना देने का लक्ष्य रखा गया है, जो गरीब हैं तथा जिनके परिवारों को दो वक्त का पौश्टिक खाना नसीब नहीं होता। ऐसे गरीब परिवारों के छोटे बच्चों के षारीरिक और मानसिक विकास के लिए इस योजना के तहत पोशक भोजन उपलब्ध कराया जाता है। योजना का दूसरा उद्देष्य यह भी है कि गरीब बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए स्कूलों में दाखिले ले ताकि इन तबकों में षिक्षा का प्रसार हो सके। गरीब, कुपोशण एवं सूखा प्रभावित बच्चों को साल भर पौश्टिक आहार उपलब्ध कराना भी इस योजना का उद्देष्य है इसलिए गर्मियों के छुट्टियों में भी स्कूलों में मिड-डे-मील परोसा जाता है। सरकार ने इस योजना की निगरानी और भोजन की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए अनेक स्तरों पर निगरानी समितियों का प्रावधान किया है। बहरहाल इन तमाम उपायों के बावजूद इस योजना के तहत मिलने वाले भोजन की गुणत्ता में गिरावट तथा घटिया भोजन मिलने की षिकायतें आम हो चुकी है। कई बार मध्यान्ह भोजन में छिपकली, कीड़े-मकोड़े तथा अन्य घातक रसायन मिलने के कारण बच्चों के बीमार होने या उनकी मौत होने की खबरें भी प्रकाष में आयी हैं। दूसरी ओर इस योजना में भ्रश्टाचार और अनियमितताओं की खबरें साख पर बट्टा लगा रही है।

                                गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ जैसा विकासषील राज्य कुपोशण की दंष झेल रहा है। छत्तीसगढ़ के 38 फीसदी बच्चें अभी भी कुपोशण की गिरफ्त में है जबकि आदिवासी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 44 फीसदी है। भारत में 55 फीसदी से ज्यादा आबादी कुपोशित है, गर्भावस्था के दौरान गर्भ में ही बच्चों की कुपोशण की प्रक्रिया षुरू हो जाती है। भारत दुनिया के कुपोशणग्रस्त 119 देषों की सूची में 103 पायदान पर है।  ग्रामीण और षहरी क्षेत्रों के गरीब बच्चों में से हर दूसरा बच्चा कुपोशण का षिकार है। चिकित्सा विषेशज्ञों ने माना है कि अण्डा अपने खास वजहों से कुपोशण को खत्म करने में कारगर हो सकता है। अण्डा प्रोटीन का सबसे बेहतर स्रोत है। अण्डे में विटामिन सी को छोडक़र अन्य सभी विटामिन जैसे विटामिन ए, बी, बी-12, विटामिन डी, विटामिन ई, कैल्षियम, मैग्निषियम, पोटेषियम, सोडियम, वसा, एच.डी.एल. कोलेस्ट्रॉल और आयरन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा इसमें फॉलेट, सेलेनियम और कई खनिज लवण पाये जाते हैं। इसमें कोलिन पाया जाता है जिससे स्मरण षक्ति और कार्यक्षमता बढ़ती है। अण्डे में मौजूद एण्टी-ऑक्सीडेंट से आंखों के मांस-पेषियों एवं रेटिना को मजबूती मिलती है। अण्डे के खाने से पेट देर तक भरा रहता है और इससे बाल और नाखून भी मजबूत होते हैं, अण्डा एक संतुलित और पूर्ण पोशण आहार है। ब्रिटिष हार्ट फाउण्डेषन ने हृदय को स्वस्थ रखने के लिए एक सप्ताह में तीन अण्डे खाने की सलाह दी है। चीन में दस लाख लोगों पर किया गया यह अध्ययन बताता है कि दिन में एक अण्डा खाने से दिल की बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है। एक षासकीय सर्वेक्षण एस.आर.एस.-2014 के मुताबिक छत्तीसगढ़ के 83 फीसदी लोग अण्डा सेवन करते हैं। बहरहाल राज्य के दुर्गम आदिवासी एवं ग्रामीण अंचलों में कुपोशण की समस्या को दृश्टिगत रखते हुए राज्य के 37 जनसंगठनों ने सरकार से मिड-डे-मील में अण्डा देने की मांग की थी। लेकिन इसके राह में अब विरोध और राजनीति आड़े आ रही है। यहां यह भी विचारणीय है कि मध्यान्ह भोजन में अण्डा देने का विरोध वे लोग कर रहे हैं जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते और उनके बच्चे सुपोशित या अतिपोशित की श्रेणी में है। विडंबना है कि इस विरोध को धार्मिक आस्था के साथ जोड़ा जा रहा है जो सरासर कुपोशण की मार झेल रहे बच्चों के साथ अन्याय है। अण्डे के षाकाहारी अथवा मांसाहारी होने के संबंध में भी वैज्ञानिकों और जैन मुनियों तथा साधु-संतों में व्यापक मतभेद है। वैज्ञानिकों के अनुसार बाजार में मिलने वाले ज्यादातर अण्डे अनफर्टिलाईज्ड होते हैं यानि उससे कभी चूजे बाहर नहीं आ सकते। एक अन्य वैज्ञानिक के मुताबिक अण्डे की जर्दी यानि एल्बूमिन में केवल प्रोटीन होता है उसमें मुर्गी का कोई हिस्सा मौजूद नहीं होता। यह भी विचारणीय है कि महात्मा गांधी अण्डा को मांसाहार की श्रेणी में नहीं रखते थे जबकि वे दूध को मांसाहार की श्रेणी में मानते थे। वे अण्डा खाने वालों को षकाहारी और मांसाहारी के बीच के श्रेणी में रखते थे। बापू का यह सोच व्यवहारिक भी प्रतीत होता है क्योंकि समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो अण्डा का सेवन तो करते हैं लेकिन बाकी मांसाहार से दूर रहते हैं। हालांॅकि धार्मिक साधु-संत और मुनिगण अण्डा को मांसाहार तथा दूध को षाकाहार की श्रेणी में रखते हैं।

                                दरअसल मिड-डे-मील में अण्डे के विरोध पर नजर डालें तो इसके पीछे एक बहुत बड़े वोट बैंक की राजनीति है। फैसले के खिलाफ खड़े कबीरपंथ और गायत्री परिवार दो ऐसे सामाजिक संगठन हैं जिनकी अपनी एक विषाल राजनीतिक जमीन हैं। इन संगठनों से प्रदेष के अन्य पिछड़े वर्गों का बहुत बड़ा तबका जुड़ा हुआ है जो राजनीतिक रूप से निर्णायक और प्रभावषाली है, इन कारणों के चलते सरकार भी इस विवाद पर फूंक-फूंक कर कदम रख रही है तो भाजपा पॉलिटिकल मायलेज हासिल करना चाहती है। यह गौरतलब है कि देष के कई भाजपा षासित राज्यों सहित पंद्रह से अधिक राज्यों के स्कूलों व आंगनबाड़ी केन्द्रों में पिछले कई सालों से अण्डा बांटा जा रहा है, लेकिन राज्य में भाजपा इस फैसले के खिलाफ खड़ी है। हालांॅकि केन्द्र सरकार द्वारा मिड-डे-मील के घोशित मेन्यू में अण्डा षामिल नहीं है लेकिन राज्य सरकारें अपनी जरूरत के मुताबिक इसे मेन्यू में षामिल कर रहे हैं। बहरहाल मध्यान्ह भोजन में इस व्यवस्था का विरोध करने वालों की सलाह है कि मिड-डे-मील में अण्डा परोसने के बजाए सोयाबीन, चना, गुड़, दूध और फल परोसा जाए क्योंकि इनमें भी पोशक तत्व विद्यमान है। इन तर्कों को बहुत हद तक उचित ठहराया जा सकता है लेकिन व्यवहारिक मुद्दा यह है कि अण्डा सेवन करने वाले छात्र व पालक यदि इसका सेवन करना चाहते हैं तो इस पर बाधक नहीं बनना चाहिए। षाकाहार के तर्कों के बीच यह भी उल्लेखनीय है कि सोयाबीन और दाल मिड-डे-मील के मेन्यू में षुरूआत से ही षामिल हैं लेकिन ये खाद्य पदार्थ कुपोशण को दूर करने में ज्यादा कारगर नहीं है इसलिए राज्य सरकार ने यह व्यवस्था लागू की है। हालांॅकि मध्यान्ह भोजन में मेन्यू के अनुसार भोजन नहीं मिलने की षिकायतें भी पालकों की ओर से आम हैं। बहरहाल इस मुद्दे पर जारी बवाल के बीच यह भी विचारणीय है कि राज्य की एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी के चलते अपने बच्चों को पौश्टिक भोजन देने में असमर्थ हैं फलस्वरूप उनके बच्चें कुपोशण के षिकार हो रहे हैं। यहां यह जानना आवष्यक है कि कुपोशण कई बीमारियों का प्रमुख कारण है इसलिए केवल धार्मिक आस्था या राजनीतिक उद्देष्य के चलते कुपोशित बच्चों की थाली से अण्डा वर्जित करना नौनिहालों के सेहत के साथ खिलवाड़ है। सरकार और समाज का सामूहिक दायित्व है कि कुपोशण मुक्ति के लिए टकराव का रास्ता छोडक़र समवेत प्रयास करें क्योंकि यह हमारी भावी पीढ़ी से जुड़ा मुद्दा है।

(लेखक, षासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं)

 

               


Date : 18-Jul-2019

राजीव डोगरा
पाकिस्तान सूरज को चांद और चांद को सूरज बना देता है। अगर कोई इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) का फैसला ध्यान से सुने, तो ये पाकिस्तान के लिए बहुत ही शर्मिंदगी की बात होनी चाहिए। शायद ही आईसीजे के इतिहास में किसी देश के बारे में इतना खुला और इतना साफ फैसला दिया गया हो। हर दूसरे पैराग्राफ़ में उन्होंने पाकिस्तान को गलत क रार दिया है, पाकिस्तान के लिए लगभग बेइज़्जती भरे शब्द इस्तेमाल किए हैं।
अगर उससे वो इतने संतुष्ट हैं तो इसके बारे में क्या कहा जा सकता है। लेकिन इससे हटकर एक और चीज है कि ये फैसला ना सिर्फ पाकिस्तान और भारत से जुड़ा है, बल्कि ये फैसला पूरी दुनिया के देशों के लिए और मानवाधिकारों के लिए है।
मान लीजिए कि कल को अमरीका का कोई नागरिक चीन में जाता है और चीन उसको इस तरह गिरफ्तार कर लेता है तो आईसीजे के इसी फैसले का हवाला दिया जाएगा और चीन को भी ये सब बातें माननी पड़ेगीं।
या चीन का कोई नागरिक किसी और देश में जाता है और उसके साथ ये सलूक होता है, तो चीन भी इसी फैसले का हवाला देगा। इसलिए चीनी जज बहुमत के साथ गए। और अगर पाकिस्तान इतना ही संतुष्ट है, तो अपने जज से पूछिए कि वो बहुमत के साथ क्यों गए। उन्होंने कहा कि मैं भी सहमत हूं कि आईसीजे ने ठीक कहा है कि इस मामले में वियना कन्वेंशन सुप्रीम है।
भारत के एक युवा हामिद अंसारी को उन्होंने बिना किसी बात के छह साल कड़ी क़ैद में रखा। बाद में बहुत एहसान जताकर उसे छोड़ा गया। उससे पहले सरबजीत सिंह और चमेल सिंह, जिनको उनके कोर्ट ने बरी कर दिया था, उन्हें पाकिस्तानी स्टेट ने कैद में ही मार डाला। तो ऐसी कई चीजें चलती आ रही थीं, जिसमें भारतीय नागरिकों के साथ ये हुआ।
दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन दरगाह के प्रमुख मौलवी पाकिस्तान गए थे, उन्हें आईएसआई अग़वा करके कहीं ले गया। तीन चार दिन उनके साथ काफी मार-पीट की। तो भारतीय नागरिक पाकिस्तान में असुरक्षित हैं और ये लगातार होती घटनाएं उबलकर कुलभूषण जाधव के मामले में आईं। क्योंकि सभी कहते हैं कि किसी चरमपंथी गुट ने ईरान से इनका अपहरण करके आईएसआई को बेचा था। इसलिए ये भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का सवाल है, जो बेचारे किसी गलती से या किसी कारण से पाकिस्तान में पहुंचे जाते हैं। भारत में इस वजह से ये मुद्दा इतना बड़ा बन गया।
जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसने प्रोपेगेंडा का एक हथकंडा बना लिया था। उन्होंने कहा था कि देखिए ये कुलभूषण जाधव हैं। ये चरमपंथी हैं। इसने पता नहीं कहां-कहां बम फेंके और भारत हमपर आरोप लगाता है, हम सामने ये सबूत लाए हैं। लेकिन पाकिस्तान दुनिया को बेवकूफ नहीं बना सकता, क्योंकि भारत ने पिछले चालीस साल से चरमपंथ का सामना किया है। चाहे वो मुंबई में हो, कश्मीर हो या पंजाब हो या दिल्ली हो। पाकिस्तान ने कोई भी ऐसा सबूत कुलभूषण जाधव के मामले में नहीं दिखाया, जिसमें उन्होंने उनकी एक चींटी को भी मारा हो।
आईसीजे जैसी महान कानूनी संस्था पाकिस्तान को जितना भला-बुरा कह सकती थी, वो कह दिया है। आईसीजे का इतिहास उठाकर देख लें कि उन्होंने इससे पहले किसी देश की इतने कड़े शब्दों में निंदा की हो।
इससे अंतरराष्ट्रीय राय पर तो असर पड़ेगा ही। ब्रिटेन के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था कि दुनिया के 70 प्रतिशत चरमपंथी घटनाओं के तार पाकिस्तान से जुड़े हुए मिलेंगे। तो हर देश पाकिस्तान से पीडि़त है। पहले की शिकायत को अब एक कानूनी ढांचा भी मिल गया है कि पाकिस्तान हर तरह से ठीक रास्ते पर चलने से इनकार कर रहा है।
पहली बात तो वियना कन्वेंशन के मुताबिक काउंसलर एक्सेस देने की बात कही गई है। यानी इस्लामाबाद स्थित इंडियन हाई कमिशन के एक अधिकारी को अकेले में कुलभूषण से मिलने का हक है। उस वक्त वहां आईएसआई और पाकिस्तान आर्मी के लोग मौजूद नहीं रह सकते।
उन्हें ये मुलाकात जल्द से जल्द करने का हक है ताकि वो जाकर पूछें कि क्या उन्हें किसी तरह की यातना दी गई है, कहां पकड़ा गया है, क्यों पकड़ा गया है और क्या पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा में कुछ सच भी है या सारा झूठ है।
दूसरा आईसीजे ने कहा है कि ट्रायल नए तरीके से होना चाहिए। मतलब फिर से पुराने ट्रायल पर विचार और इसकी समीक्षा होनी चाहिए। इसका मतलब ये है कि अब सिविलि कोर्ट में जाकर ट्रायल होना चाहिए। जहां उनको सही तरीके से कानूनी मदद मिल सके। मतलब उनके वकील वगैहरा काबिल हों और जो उनका केस जज के सामने रख सकें।
कोई और देश होता तो पहली फ्लाइट से कुलभूषण जाधव को वापस भेज देता। लेकिन जिस तरह से कुलभूषण की मां और पत्नी से सलूक किया गया। स्टेट लेवल पर औरतों के साथ इतना दुव्र्यवहार करना, मैंने अपने 45 साल के राजनयिक करियर में ये कभी नहीं देखा है। इसलिए पाकिस्तान से उम्मीद करना कि वो कोई ठीक कदम उठाएंगे, सवाल उठता है कि क्या ये हो पाएगा? ये आने वाला समय बताएगा।
(बीबीसी संवाददाता दिलनवाज पाशा से बातचीत पर आधारित)

 


Date : 17-Jul-2019

हिमांशु शेखर'

भाजपा में पिछले 13 वर्षों से संगठन महामंत्री का पद संभाल रहे रामलाल की विदाई के बाद अब बीएल संतोष को यह जिम्मेदारी मिली है।
भाजपा में संगठन महामंत्री के तौर पर बीएल संतोष की नियुक्ति ने न सिर्फ राजनीतिक जानकारों बल्कि भाजपा नेताओं को भी हैरान किया है। पिछले 13 साल से इस पद पर रहे रामलाल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने वापस संघ में बुलाने का निर्णय लिया। इसके बाद से नए संगठन महामंत्री की नियुक्ति को लेकर कई नामों की चर्चा थी। इनमें सह संगठन मंत्री वी. सतीश का नाम भी शामिल था जो काफी समय से वे संयुक्त संगठन महामंत्री के तौर पर काम कर रहे थे। वरिष्ठता के आधार पर भी उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही थी। लेकिन आखिर में बाजी बीएल संतोष के हाथ लगी।
रामलाल के संघ में वापस जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए बीएल संतोष का कहना था, ‘2006 से लेकर 12 सालों तक रामलाल से काफी कुछ सीखने को मिला। राजनीति क्षेत्र में मेरी नियुक्ति उनके साथ की गई थी। शांतचित्त से काम करना उनकी पहचान रही है। वे मेरे लिए पिता तुल्य थे। संघ के काम में वापस जा रहे हैं। हम आपको याद करते रहेंगे।’
भाजपा में संगठन के स्तर पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद संगठन महामंत्री का माना जाता है। इस पद पर उन्हीं संघ प्रचारकों में किसी की नियुक्ति होती है जिसे संघ खुद भाजपा में भेजता है। रामलाल के पहले इस पद पर केएन गोविंदाचार्य और संजय जोशी जैसे दिग्गज काम कर चुके हैं। संगठन महामंत्री भाजपा और संघ के बीच सबसे प्रमुख कड़ी के तौर पर काम करते हैं। संघ और भाजपा में समन्वय का काम संगठन उनका ही होता है। संगठन महामंत्री को संगठन महासचिव भी कहा जाता है और पार्टी के जितने महासचिव होते हैं, उनमें संगठन महासचिव का पद सबसे प्रमुख माना जाता है।
भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किए गए बीएल संतोष के बारे में कुछ बातें जानना प्रासंगिक है। बीएल संतोष कर्नाटक के शिमोगा जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद कुछ सालों तक निजी क्षेत्र में काम किया। बाद में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। 1993 से वे लगातार संघ में काम कर रहे हैं।
संघ ने बीएल संतोष को कर्नाटक और दूसरे दक्षिण भारतीय राज्यों में कई जिम्मेदारियां दीं। उन्होंने इस दौरान संघ और उसके सहयोगी संगठनों के लिए खूब काम किया। बाद में बीएल संतोष को संघ ने भाजपा में भेज दिया। भाजपा में भी उन्हें जिम्मेदारी कर्नाटक में ही मिली। वे कर्नाटक प्रदेश संगठन मंत्री के तौर पर काम करने लगे। आठ साल तक वे इस पद पर रहे। कर्नाटक में भाजपा के विस्तार में जिन दो लोगों को पार्टी के अंदर सबसे अधिक श्रेय दिया जाता है, उनमें एक तो पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा हैं और दूसरे बीएल संतोष हैं।
लेकिन पार्टी के लिए परेशानी की बात यह रही कि समय के साथ इन दोनों नेताओं के आपसी संबंध खराब होते चले गए और शीर्ष नेतृत्व के दखल के बावजूद ये आज तक नहीं सुधरे हैं। 2014 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह बीएल संतोष को राष्ट्रीय टीम में लेकर आए। उन्हें संयुक्त संगठन महामंत्री का दायित्व दिया गया। उन्हें राष्ट्रीय  टीम में लाने के बावजूद अमित शाह ने उन्हें दक्षिण भारत का ही काम दिया। कर्नाटक के साथ-साथ अमित शाह ने उन्हें तमिलनाडु, केरल और गोवा का भी दायित्व दिया।
आम तौर पर संयुक्त संगठन महामंत्री चुनावी राजनीति से खुद को दूर रखते हैं। लेकिन कर्नाटक भाजपा के नेता बीएल संतोष पर आरोप लगाते रहे हैं कि उनकी नजर हमेशा से कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रही है और जब भी उन्हें लगता है कि वे मुख्यमंत्री बन सकते हैं तब वे अतिसक्रिय हो जाते हैं। इस बारे में बीएस येदियुरप्पा उन पर खुल कर आरोप लगा चुके हैं।
पार्टी के अंदर बीएल संतोष के बारे में यह बात भी चल रही है कि उन्होंने ही कर्नाटक के दिग्गज भाजपा नेता रहे अनंत कुमार की पत्नी को टिकट नहीं देने की सलाह दी। उनका कहना था कि तेजस्वी सूर्या को टिकट देना चाहिए। इस मामले में उनकी चली और तेजस्वी सूर्या बेंगलुरु दक्षिण की वह सीट जीतने में कामयाब हुए जहां से अनंत कुमार सांसद थे।
बीएल संतोष के बारे में बताया जा रहा है कि वे पांच भाषाएं बोल सकते हैं। इनमें हिंदी, अंग्रेजी और कन्नड़ के अलावा तमिल और तुलू भी शामिल हैं। पार्टी में उनकी पहचान आधुनिक तकनीक का सहजता से इस्तेमाल करने वाले नेता की भी है।
बीएल संतोष को यह जिम्मेदारी मिलने की कई वजहें बताई जा रही हैं। सबसे पहली तो यह कि वे कर्नाटक के हैं। भाजपा को लगता है कि उन्हें इस अहम पद पर बैठाकर पार्टी दक्षिण भारत में अपने विस्तार की योजना को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकती है। संयुक्त संगठन महामंत्री के तौर पर वे दक्षिण भारतीय राज्यों का ही काम देख रहे थे। पार्टी को लगता है कि बीएल संतोष के इस पद पर होने की वजह से भाजपा केरल और तमिलनाडु में भी पैठ जमा सकती है। मोदी लहर के बावजूद कर्नाटक के अलावा दूसरे दक्षिण भारतीय राज्यों में न तो 2014 में भाजपा का प्रदर्शन ठीक था और न ही 2019 में इसमें खास सुधार हुआ।
बीएल संतोष के पक्ष में दूसरी बात यह गई कि वे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त हैं। अमित शाह ही उन्हें 2014 में कर्नाटक से सह संगठन मंत्री बनाकर दिल्ली लाए थे। पार्टी के अंदर कहा जाता है कि बीएल संतोष की कार्यशैली से अमित शाह प्रभावित रहते हैं। उनको यह जिम्मेदारी मिलने की तीसरी वजह यह बताई जा रही है कि वे आक्रामक ढंग से हिंदुत्व के मुद्दों को उठाते रहे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की शैली भी यही है।
चुनाव प्रबंधन के मामले में भी बीएल संतोष को माहिर माना जाता है। यह बात भी उनके पक्ष में गई। जानकारों के मुताबिक भाजपा के अंदर हर स्तर पर जिस तरह से नई पीढ़ी के लोगों को लाया जा रहा है, उस वजह से भी किसी पुराने नेता पर बीएल संतोष को तरजीह देकर पार्टी ने उन्हें संगठन महामंत्री बनाया। (सत्याग्रह)

 

 

 


Date : 17-Jul-2019

चार अमेरिकी महिला सांसद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की आंखों में खटक रही हैं। ट्रंप ने कहा कि जहां से वे आई हैं, उन्हें वहीं वापस लौट जाना चाहिए। लेकिन सच तो ये है कि वे सब अमेरिकी नागरिक हैं।
अमेरिका की चार महिला सांसद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की आंखों में खटक रही हैं। ये सभी जातीय अल्पसंख्यक समूहों से आती हैं और अपनी पार्टी के सबसे सक्रिय उदारवादी धड़े का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। इस स्वयंभू "दस्ते" में न्यूयॉर्क की अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज, मिनेसोटा की इल्हान उमर, मैसाचुसेट्स की अयान प्रेसली और मिशिगन की रशीदा तलीब हैं। उमर को छोड़ सभी अमेरिका में ही जन्मी हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने इन सब को निशाने पर लेते हुए कई टिप्पणियां की और यहां तक कह दिया कि जहां से वे आई हैं, वहीं वापस लौट जाएं। ट्रंप ने इनके ऊपर अमेरिका के दुश्मन जैसे अल-कायदा के लिए प्यार रखने का आरोप लगाया।
प्यूर्टो रिको मूल की 29 वर्षीय ओकासियो-कोर्टेज अमेरिकी संसद की सबसे कम उम्र की सदस्य हैं। वहीं अयान प्रेसली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी हैं जो मैसाचुसेट्स से चुनकर संसद पहुंची हैं। रशीदा तलीब और इल्हान उमर कांग्रेस में चुनी जाने वाली पहली दो मुस्लिम महिलाएं हैं। तालीब संसद के लिए चुने गए फिलिस्तीनी मूल की पहली अमेरिकी हैं।
उमर बचपन में युद्धग्रस्त सोमालिया से भाग शरणार्थी के रूप में अमेरिका आयी थी। वे सदन में पहली अश्वेत मुस्लिम महिला हैं। वे हिजाब पहनती हैं। ये सभी उस नई लहर का हिस्सा हैं, जिसने संसद की प्रतिनिधि सभा को डेमोक्रेटों के नियंत्रण में वापस लाने में मदद की, और सभी ने जनवरी में पदभार संभाला। वे एकजुट होकर रिपब्लिकन ट्रंप का विरोध का अभियान चलाए हुए हैं। वे भी ट्रंप की तरह सोशल मीडिया को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं और डेमोक्रेट पार्टी के प्रतिरोध के बावजूद एक प्रगतिशील एजेंडा को आगे बढ़ाती रही हैं।
ओकासियो-कोर्टेज खुद को एक समाजवादी मानती हैं। अमेरिका में उनके जैसे कम ही नेता है जिनमें वरिष्ठ सीनेटर बर्नी सैंडर्स भी शामिल हैं। वे सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहती हैं। 47 लाख लोग उन्हें फॉलो करते हैं। पिछले महीने उन्होंने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया जब दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में आप्रवासी हिरासत केंद्र की सुविधाओं को "कॉन्सेन्ट्रेशन कैंप" कह डाला। इस पर उनकी आलोचना हुई कि उन्होंने होलोकॉस्ट के पीडि़तों का अपमान किया है।
उमर और तलीब पर अक्सर यहूदी-विरोधी होने का आरोप लगा है क्योंकि उन्होंने इस्राएल का बहिष्कार करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय अभियान को समर्थन देने की घोषणा की थी। फरवरी महीने में 37 वर्षीय उमर ने कहा था कि अमेरिकी राजनेता अपने वित्तीय हितों के लिए इस्राएल का समर्थन करते हैं। इस बयान के लिए उनकी काफी आलोचना की गई थी। मार्च में उनके ऊपर अमेरिका में हुए 9/11 के हमलों के प्रभाव को कम करने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया था, जब उन्होंने कहा था कि "कुछ लोगों ने ऐसा किया था।"
मई महीने में 42 वर्षीय तलीब द्वारा होलोकॉस्ट को लेकर की गई टिप्पणी की आलोचना यहूदी विरोधी के रूप में की गई थी। याहू के "स्कलडगरी" पॉडकास्ट में तलीब ने कहा, "यह एक तरह का शांत भाव है। जब मैं होलोकॉस्ट और उसकी त्रासदी के बारे में सोचती हूं, लोगों को बताती हूं। तथ्य यह है कि मेरे पूर्वजों (फलस्तीनियों) ने अपनी जमीन खो दी और कुछ लोगों ने अपना जीवन खो दिया।"
45 साल की प्रेसली ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियों की घोर आलोचक हैं। प्रेसली ने आप्रवासियों को रखे जाने वाले हिरासत केंद्रों को "पिंजरा" कहा था। प्रेसली, तलीब और ओकासियो-कोर्टेज सभी संसद की अहम हाउस फाइनेंस कमेटी की सदस्य हैं। प्रेसली ने कहा कि उनका "दस्ता" किसी भी तरह से खुद और अन्य तीन सांसदों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, "हमारा दस्ता बड़ा है। हमारे दस्ते में हर वो व्यक्ति शामिल है जो अधिक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।"
आरआर/आरपी (एएफपी)

 

 

 


Date : 16-Jul-2019

 प्रियदर्शन

इंग्लैंड के हाथों क्रिकेट विश्व कप का फाइनल मुकाबला गंवाने के बाद न्यूजीलैंड के कप्तान केन विलियम्सन अपनी टीम के साथ 7 रॉयटर्स
लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच हुए विश्व कप फाइनल के बेहद रोमांचक मुकाबले को बहुत सारे लोग क्रिकेट की जीत बता रहे हैं, लेकिन दरअसल वह क्रिकेट की हार है। इससे ज़्यादा बेतुकी और हास्यास्पद बात नहीं हो सकती कि किसी भी मैच का फ़ैसला इस आधार पर किया जाए कि उसमें कितने चौके-छक्के लगे। सुपर ओवर तक जो मैच क्रिकेट के खेल के सहारे चला, वह नतीजे में बिल्कुल तमाशा बन गया। आने वाले दिनों में अब हर टीम यह कोशिश करेगी कि उसके रन जितने भी बनें, उनमें बड़ा हिस्सा चौकों-छक्कों का हो। क्या पता, कल को किसी सुपर ओवर में जीत की यही कसौटी बन जाए।
दरअसल, इस नियम में क्रिकेट में जो ‘रन’ शब्द है, उसका ही महत्व खत्म कर दिया है। रन शब्द ही इसलिए बना कि वह दौड़ कर जुटाया जाता है। वैसे भी किसी मैच में एक या दो या तीन रन दौड़ कर जुटाने का भी अपना रोमांच है। रन आउट की गुंज़ाइश ऐसे ही मौक़ों पर बनती है, छक्के-चौकों के बीच नहीं।
मार्टिन गुप्टिल के एक शानदार थ्रो ने दो रन चुराने की कोशिश में लगे महेंद्र सिंह धोनी का विकेट ही नहीं उड़ाया, भारत के हाथ से सेमीफाइनल भी छीन लिया। खुद फाइनल में गुप्टिल दो रन के साथ जीत चुराने की कोशिश में आउट हुए और फिर भी टीम को बराबरी पर ले आए। अच्छी और सयानी टीमें एक-एक रन चुराने पर ज़ोर देती हैं। उन्हें मालूम होता है कि छक्के-चौके सहायक भूमिका की चीज़ हैं या फिर जब एक-एक रन लेते हुए आंख जम जाए, और इस खेल में गेंदबाज कुछ हताश हो जाए तो चौके-छक्कों की बारी आती है। लेकिन इस नियम ने अचानक रन का महत्व खत्म कर दिया। आप तमाशे की तरह चौके और छक्के लगाएं और इसके बाद विजेता बन जाएं।
पूछा जा सकता है कि किसी सुपर ओवर में अगर दो टीमों का स्कोर बराबर हो जाए तो फिर निर्णय किस आधार पर हो। इसका एक तार्किक जवाब तो यह है कि जिस टीम ने कम विकेट गवाए हों, उसे विजेता घोषित किया जाना चाहिए। आखिर क्रिकेट गेंद और बल्ले के संघर्ष का ही नाम है। इसमें रन बनाने और विकेट लेने की अहमियत है। अगर आप रन के मामले में बराबर हो जाते हैं, लेकिन अगर आपने विकेट बचाए रखे हैं तो आपको विजेता माना जाना चाहिए।
खेल में भी अगर यही पैमाना होता तो न्यूजीलैंड जीतता क्योंकि न्यूजीलैंड ने आठ विकेट गंवाए थे, जबकि इंग्लैंड ऑल आउट हो चुका था। बेशक, आप यह पैमाना भी बना सकते हैं कि सुपर ओवर में किसी टीम ने कितने रन बनाए और कितने विकेट खोए। ऐसी हालत में इंग्लैंड जीत जाता क्योंकि उसने कोई विकेट नहीं खोया था। लेकिन अगर पूरे मैच और सुपर ओवर के रनों और विकेटों को जोडक़र देखा जाए- जो ज़्यादा उचित है क्योंकि सिर्फ सुपर ओवर को फ़ैसले करने का आधार बनाना ठीक नहीं- तब भी न्यूज़ीलैंड बाजी मार जाता।
 क्रिकेट विश्व कप का फाइनल मैच दरअसल न्यूजीलैंड ने जीता था। उसे कम से कम एक और अवसर पर एक नियम की विडंबना का शिकार होना पड़ा, जब उसके आखिरी ओवर की चौथी गेंद पर छह रन बन गए। इसे फिर भी खेल का हिस्सा माना जा सकता है। माना जा सकता है कि क्रिकेट जिन अनिश्चितताओं का खेल है उनमें कभी यह भी संभव है कि कोई गेंद किसी बल्लेबाज के शरीर से टकराकर सीमा पार कर जाए और बल्लेबाज को अतिरिक्त रन मिल जाएं।
लेकिन सुपर ओवर के बाद चौके-छक्कों के आधार पर मैच का फैसला करने का कोई तर्क नहीं बनता। इसके बाद तो अस्पष्ट तर्कों की गुंजाइश ज्यादा बनती है। कल्पना करें कि अगर दोनों टीमें चौकों में भी बराबर हो जाएं तो आप क्या करेंगे? क्या आप टीम के छक्कों के आधार पर फैसला करेंगे? और अगर छक्के भी बराबर हो जाएं तो आप क्या करेंगे? इस सवाल पर ट्विटर पर बहुत सारे मज़ाक चल पड़े हैं। हमारे एक मित्र फिरोज़ मुजफ़्फ़ऱ ने टिप्पणी की, ‘क्या आप इस बात पर फैसला करेंगे कि किस खिलाड़ी ने सुबह कितने अंडे खाए?’ लेखक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हिमांशु पंड्या ने ट्वीट किया है, ‘फ़ैसला तो इस बात से भी हो सकता है कि खिलाड़ी के बाएं गाल पर कितने तिल हैं?’
यह बेतुकी सी लगने वाली टिप्पणियां असल में नियम के बेतुकेपन को ही उजागर कर रही हैं। मामला यह नहीं है कि छक्के-चौके बराबर हो जाएं तो क्या होगा। यह सवाल दूसरी तरफ से भी पूछा जा सकता है कि अगर दोनों टीमों के स्कोर और विकेट दोनों बराबर हो जाएं, तब आप फैसला कैसे करेंगे। इसका सीधा जवाब है कि अंतिम विजेता खोजने की हड़बड़ी नहीं दिखाएंगे। कई खेलों में और क्रिकेट में भी कई बार साझा विजेता होते हैं। दोनों टीमों को चैंपियन घोषित किया जाता है। क्रिकेट में भी यह पहले कई बार हो चुका है कि दो-दो टीमें किसी टूर्नामेंट की चैंपियन घोषित की गईं।
कल के मैच का इकलौता तार्किक नतीजा यह था कि दोनों टीमों को विजेता घोषित कर दिया जाता। आखिर, दोनों ने फाइनल में शानदार जुझारूपन दिखाया था। अगर ऐसा होता तो पहली बार क्रिकेट विश्व कप को दो विजेता मिलते और क्रिकेट की शालीनता भी बची रहती। तब कह सकते थे कि क्रिकेट जीता है। अभी की स्थिति में तो क्रिकेट हार गया है।
रविवार को खेले गए क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड के बीच हुई टक्कर में मैच और सुपरओवर दोनों टाई हो गया। आईआईसी ने नए नियम के आधार पर पूरी पारी और सुपरओवर में लगाए गए चौके-छक्के की संख्या के आधार पर इंग्लैंड को विजेता घोषित कर दिया।
दुनियाभर के मौजूदा और पूर्व क्रिकेटरों ने चौके छक्के गिनकर विश्व कप विजेता का निर्धारण करने वाले आईसीसी के ‘हास्यास्पद’  नियम की जमकर आलोचना की जिस नियम की वजह से लॉर्ड्स पर फाइनल में इंग्लैंड ने न्यूज़ीलैंड को हराया।
इंग्लैंड ने मैच में 22 चौके और दो छक्के लगाए, जबकि न्यूजीलैंड ने 16 चौके लगाए थे। दरअसल, आईसीसी के एक नए नियम के अनुसार, अगर किसी टाई मैच का नतीजा अगर सुपरओवर में भी नहीं निकल सके और सुपरओवर में भी मैच टाई हो जाए तो ऐसी सूरत में मैच का नतीजा पूरी पारी और सुपरओवर में लगाए गए चौके- छक्के की संख्या के आधार पर तय की जाएगी। बता दें कि, क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच टक्कर हुई। 50-50 ओवरों के इस मैच का कोई नतीजा नहीं निकल सका क्योंकि दोनों टीमों ने बराबर बनाए।
इसके बाद विजेता का फैसला करने के लिए आईसीसी ने सुपर ओवर का नियम इस वल्र्ड कप में लागू किया। मैच सुपर ओवर की 6-6 गेंदों तक भी पहुंचा लेकिन वहां भी दोनों टीमों 15-15 रन बनाए और मुकाबला बराबरी पर छूटा। इसके बाद आईआईसी ने नए नियम के आधार पर पूरी पारी और सुपरओवर में लगाए गए चौके- छक्के की संख्या के आधार पर इंग्लैंड को विजेता घोषित कर दिया।

दुनियाभर के खिलाडिय़ों ने बाउंड्री गिनने के आईसीसी के नियम की आलोचना की


* गंभीर ने ट्विटर पर लिखा, ‘समझ में नहीं आता कि विश्व कप फाइनल जैसे मैच के विजेता का निर्धारण चौकों-छक्कों के आधार पर कैसे हो सकता है। हास्यास्पद नियम। यह टाई होना चाहिस् था। मैं न्यूजीलैंड और इंग्लैंड दोनों को बधाई देता हूं।’
* विश्व कप 2011 के प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह ने लिखा, ‘मैं नियम से सहमत नहीं हूं लेकिन नियम तो नियम है। इंग्लैंड को आखिरकार विश्व कप जीतने पर बधाई। मैं न्यूज़ीलैंड के लिये दुखी हूं जिसने अंत तक जुझारूपन नहीं छोड़ा। शानदार फाइनल।’
* आस्ट्रेलिया के पूर्व बल्लेबाज डीन जोंस ने लिखा, ‘डकवर्थ लुईस प्रणाली रन और विकेट पर निर्भर है। इसके बावजूद फाइनल में सिर्फ चौकों-छक्कों को आधार माना गया। मेरी राय में यह गलत है।’
* न्यूज़ीलैंड के पूर्व हरफनमौला डियोन नैश ने कहा, ‘मुझे लग रहा है कि हमारे साथ छल हुआ है। यह बकवास है। सिक्के की उछाल की तरह फैसला नहीं हो सकता। नियम हालांकि पहले से बने हुए हैं तो शिकायत का कोई फायदा नहीं।’
* भारत के सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा ने ट्वीट किया, ‘क्रिकेट के कुछ नियमों पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत है।’
स्टफ डॉट कॉम डॉट न्यूज़ीलैंड ने लिखा, ‘क्रिकेट विश्व कप फाइनल: चौकों छक्कों की गिनती ने न्यूज़ीलैंड को जीत से महरूम किया।’
‘न्यूज़ीलैंड हेराल्ड’ ने लिखा, ‘क्रिकेट विश्व कप फाइनल: 22 नायक और कोई विजेता नहीं।’ एक अन्य कालम में लिखा, ‘ओवरथ्रो के लिये इंग्लैंड को छह नहीं, पांच रन मिलने चाहिये थे।’
न्यूज़ीलैंड के पूर्व कोच माइक हेसन ने कहा कि विश्व कप फाइनल का फैसला सुपर ओवर के आधार पर नहीं किया जाना चाहिये था। उन्होंने अपने कालम में लिखा, ‘केन विलियमसन और इयोन मोर्गन दोनों को कप दिया जाना चाहिये था। इस तरह का फाइनल कोई भी टीम नहीं हारना चाहेगी। न्यूज़ीलैंड के कप्तान विलियमसन के हाथ में भी कप होना चाहिये था।’
हेसन ने कहा, ‘ नॉकआउट चरण में फैसला सुपर ओवर पर हो सकता है लेकिन फाइनल में नहीं।’
निराश नीशम ने कहा- खिलाड़ी मत बनो बच्चों विश्व कप के रोमांचक फाइनल में इंग्लैंड से हारने के बाद मायूस न्यूज़ीलैंड के हरफनमौला जिम्मी नीशम ने बच्चों को सलाह दी, ‘खिलाड़ी मत बनना ’। यह पहला विश्व कप फाइनल था जो सुपर ओवर तक खिंचा। सुपर ओवर में भी स्कोर बराबर रहने के बाद विजेता का फैसला दोनों टीमों द्वारा लगाए गए चौकों-छक्कों के आधार पर हुआ।’ (द वायर)

 

 

 


Date : 16-Jul-2019

 

अरविंद मिश्र

पिछले दिनों शासन ने नरुवा, गरुवा, घुरुवा बारी की अवधारणा को अपनाया जो प्राचीन ग्राम्यचरना को साकार करने का उद्यम हैं। नरुवा यानि प्राकृतिक छोटे-छोटे जलाशय, गरुवा यानि मवेशियों का सार्थक उपयोग, घुरुवा यानि कृषि के लिए आसान खाद, बारी यानि साग भाजी की उपज। इनके प्रबंधन से गांव का जीवन व्यापन सुलभ हो जाता है। 
गांव की सुव्यस्थित रचना में दुसरी कड़ी पौनी पसारी है। ग्रामीणों में अनेक प्रकार के हुनरमंद लोग होते हैं। लुहार, कुम्हार, नाई, धोबी, मोची आदि। छत्तीसगढ़ में रोजगार व्यवस्था के लिए पौनी पसारी एक समाजवादी व्यवस्था हैं। अप्रैल-मई के माह में ग्रामीण किसान फुर्सत में होते हैं। उस दरम्यान गांव की रोजमर्रा की जरूरतों से संबंधित कामकाजी लोगों को नियोजित करने की एक प्रथा है। 
यह एक बेहतर प्रबंध है। जिसके अनुसार नाई, धोबी, लुहार, मोची इत्यादि कामकाजी लोगों के लिए पारिश्रमिक की व्यवस्था की जाती है। प्रत्येक घर से अनाज या सुविधा अनुसार रुपये एकत्र किया जाता है। सभी ग्रामवासी अपनी हैसियत के अनुसार अनाज या रुपये उन कामकाजी लोगों के लिए प्रावधान करते हैं। इस तरह उनके वर्षभर के जीवन व्यापन के लिए एक पैकेज होता हैं जो ग्रामवासियों द्वारा प्रबंध किया जाता है। यह सहअस्तित्व का एक अनूठा उदाहरण है। छत्तीसगढ़ के गाव कभी कोई व्यक्ति भूखा नहीं मरता। लाचार लोगों के लिए गांव के लोग एकत्र कर भोजन की व्यवस्था करते हैं। भूख से मरने नहीं देते।  शासन ने पौनी पसारी की प्रतीकात्मक व्यवस्था अमल में लाने की योजना बनाई है जो रोजगार के क्षेत्र में कारगर सिद्ध होगी। 
महात्मा गांधी का विचार है कि लघु उद्योगों से भारत की अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ किया जाना चाहिए। रोजगार के अधिकतम साधन बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे व्यापार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस विचार को पौनी पसारी योजना चरितार्थ करता है। 
यह योजना गांव ही नहीं वरन् शहर में भी सफल हो सकता है। प्राय: यह देखा जाना है कि शहरों में सडक़ किनारे नाई, धोबी, लुहार, कुम्हार जैसे छोटे व्यवसाय के लोग अपनी जर्जर ठेला या गुमटी में व्यवसाय चलाते हैं। इन्हें चबूतरा या पक्का ठेला देकर मजबूत सहारा दिया जा सकता है। इन्हें वार्डवार या जोनवार चिन्हांकित कर स्थल का आबंटन किया जा सकता है। वार्ड या जोन में इनकी स्थापना से मुहल्ले के लोगों को रोजमर्रा के आवश्यक कार्यों के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। सारी सुविधाएं एक ही स्थान पर आम लोगों को मुहैया कराई जा सकती है। दो-तीन वार्ड या मोहल्ला के बीच में एक कॉम्प्लेक्स की तरह स्थापित किया जा सकता है ताकि उनकी सेवाएं आसानी से उपलब्ध हो सके। 
हमारे दैनिक जीवन में नाई, धोबी, मिस्त्री आदि मूलभूत सेवाएं हैं फिर भी ये वंचित लोग हैं इन सेवाओं पर शासन का ध्यान बड़ी सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ है। यह योजना कमल लागत में अधिकतम लोगों को रोजगार प्रदान करने का श्रेष्ठ साधन है। गांव, शहर, कस्बे सभी जगह साप्ताहिक यास दैनिक बाजार प्राय: दो तीन मुहल्ले के बीच स्थित होते हैं जहां लोग पैदल या सायकल से दैनिक वस्तुएं लेने जाते है। इन्हीं बाजारों में स्थित खाली जगह को पौनी पसारी के लिए उपयोग किया जा सकता है। सब्जी वालों की चबूतरा की संख्या बढ़ाकर इन्हें आबंटित किया जा सकता है। जगह कम होने की स्थिति में उसी बाजार में दो मंजिला भवन तैयार किया जा सकता है। जहां प्रथम मंजिल (भूतल) में पार्किंगनुमा स्थल में सब्जी बाजार तथा दूसरे मंजिल में पौनी पसारी परिसर बनाया जा सकता हैं। इस तरह के भवन में बनने से शेड के कारण धूप व बरसात से सुरक्षा होगी तथा आवारा मवेशियों से भी निजात मिलेगा। दुकान बनाने में यदि खर्च अधिक हो इन्हें प्रत्येक शेड में सामाग्री रखने के लिए रैक या आलमारी बनाकर दिया जा सकता है। जहां वे अपना सामान ताला लगाकर सुरक्षित रख सकेंगे। 
सभी दुकानदार आपस में अंशदान कर साफ सफाई व सुरक्षा गार्ड की व्यवस्था कर सकते हैं। यदि नगर पालिक सक्षम हो तो सफाई और सुरक्षा की मूलभूत सुविधा उन्हें देना चाहिए। 
पौनी पसारी में बहुत छोटे व्यवसाय के लोग होते है जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। अत: यदि उनसे किराया बिजली बिल, साफ-सफाई शुल्क लेना हो तो न्यूनतम होना चाहिए। क्योंकि ऐसे रोजगार में संबंधित लोगों का बमुश्किल 200-300 रुपये दैनिक आमदानी होती है। यदि शुल्क अधिक होगा तो आमदानी का बड़ा हिस्सा शुल्क में ही खर्च हो सकता है। 
छत्तीसगढ़ में कृषि एवं ग्राम की प्रधानता है। अत: इस बात को केंद्र में रखकर योजना बनाई जाती है तो सार्थक साबित होगा। पौनी पसारी, नरुवा, गरुवा योजना केवल गांवों तक सिमित रखने की जरूरत नहीं वरन् उसे शहरों और महानगरों तक अमलीकृत होना चाहिए। गांव और शहर एक-दूसरे के पूरक है अत: ऐसी योजनाएं सावभौम होती है। 
ग्राम्य रचना के लिए गांव में प्रचलित मौलिक व्यवस्था परिणामदायी होगा। इसी तरह की अन्य योजनाओं के शोध की जरूरत हैं। 
सी 288 रोहणीपुरम, गोल चौक, रायपुर

 


Date : 15-Jul-2019

कृष्ण प्रताप सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

चुनावों को रस्म अदायगी बनने से रोकना है तो उनकी निष्पक्षता व स्वतंत्रता की हर हाल में रक्षा करना जरूरी है। यह भी समझना होगा कि चुनाव सुधारों के संबंध में समूचे विपक्ष का अगंभीर, नैतिकताहीन रवैया ऐसी स्थिति लाने में सत्ताधीशों की मदद ही करेगा।
‘भारत में यह प्रचलन बन गया है कि कोई मजबूत व्यक्ति सत्ता नहीं छोड़ता, लेकिन हम बिना सत्ता का मोह छोड़े विचारधारा की लड़ाई में अपने प्रतिद्वंद्वी को नहीं हरा सकते। हमारे देश के संस्थागत ढांचे पर कब्जे का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घोषित लक्ष्य पूरा हो चुका है। हमारा लोकतंत्र बुनियादी तौर पर कमजोर हो गया है। अब इसका वास्तविक खतरा है कि आगे चुनाव महज रस्म अदायगी भर रह जाएं।’
कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पिछले दिनों ट्विटर पर सार्वजनिक की गई अपनी चि_ी में राहुल गांधी ने ये पंक्तियां लिखीं तो उन्हें शायद ही इल्म रहा हो कि उनका यह कथन जल्दी ही, थोड़े बदले हुए रूप में ही सही, उनकी पार्टी व जनता दल 6 सेकुलर 8 गठबंधन द्वारा शासित कर्नाटक में सही सिद्ध होने लगेगा। वहां जनादेश की मनमानी व्याख्याओं के बीच इन दोनों पार्टियों के असंतुष्ट विधायक लोभ-लालच की राजनीति की पुरानी कथाओं में जिस तरह नई कडिय़ां जोड़ रहे हैं, उसके कारण जिस लड़ाई को राहुल विचारधारा की लड़ाई बताया करते हैं, वह इतनी निर्वस्त्र हो चली है कि अपनी लाज तक नहीं बचा पा रही!
विडंबना देखिए कि एक ओर राहुल कांग्रेस अध्यक्ष पद छोडऩे के बाद भी भाजपा से दस गुनी ताकत से लडऩे का दावा कर रहे हैं, दूसरी ओर जैसे कर्नाटक के विधायकों के इस्तीफे ही काफी न हों, उनके गोवा के दस विधायकों ने भी ऐन महाभारत के वक्त अपनी निष्ठाएं बदल ली हैं। यह दावा करते हुए कि अब भाजपा के साथ राज्य की सरकार का हिस्सा बन जाने के बाद वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों का तेजी से विकास कर सकेंगे। इससे पैदा हालात ने कई बड़े और पेचीदा सवालों को जन्म दिया है।
पहला और सबसे बड़ा यह कि क्या इस मामले में भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगा देने मात्र से कांग्रेस खुद को उससे ज्यादा नैतिक अथवा वैचारिक शुचिता की वाहक सिद्ध कर सकती है? 
क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि अगर कांग्रेस के पास विचारधारा की कोई पूंजी है तो उसके अनेक सिपाही दृढ़तापूर्वक उस पूंजी की रक्षा का दायित्व निभाने के बजाय रीढ़विहीनों की तरह लोभ व लालचों को दंडवत प्रणाम क्यों कर रहे हैं?  ऐसे सिपाहियों के बूते वह विचारधारा की लड़ाई कैसे लड़ या जीत सकती है?
क्या इस कठिन समय में इस पड़ताल की जरूरत नहीं है कि उसके इन सिपाहियों ने अपनी रीढ़ अभी-अभी गंवाई है या अरसा पहले गंवा दी थी और अब उसके प्रदर्शन का मौका पाया है?  और क्या इसके जिम्मेदार सिर्फ ये सिपाही ही हैं? उसके चुने हुए जनप्रतिनिधि तक उन्हें दिए जा रहे लोभ का कोई प्रतिकार किए बिना ‘फॉर सेल’ का बोर्ड लगाकर खरीदारों के सामने हाजिर हुए जा रहे हैं तो वह क्योंकर कह सकती है कि चुनावों को रस्म अदायगी और जनादेशों को व्यर्थ बनाने की वर्तमान सत्ताधीशों की कवायदों में उसका कोई ‘योगदान’ नहीं है?
2014 से 2019 के बीच भाजपा उसके इतने अलमदारों को अपने पाले में खींच लाई है कि कई लोग उसको ‘मोदी कांग्रेस’ कहने लगे हैं, तो यह उसका ‘योगदान’ नहीं तो और क्या है? देश में वामदलों को छोड़ और कौन-सी पार्टी है, जिसमें भूतपूर्व कांग्रेसी और उनका अक्स नहीं है? कांग्रेस का यह ‘योगदान’ न होता तो क्या आज देश का विपक्ष इतना श्रीहीन हो सकता था?
दरअसल, चुनावों को रस्म अदायगी बनाने की कवायदें ऐन चुनावों के वक्त ही शुरू नहीं होतीं। उन्हें चुनावों से पहले और उनके बाद निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के रस्मी तौर पर भी लोकतांत्रिक नजर न आने वाले जनविरोधी आचरणों में भी देखा और पढ़ा जा सकता है। उनकी वादाखिलाफियों में भी, जनादेशों की स्वार्थी व अनर्थकारी व्याख्याओं में भी और मध्यावधि चुनाव के डर में भी।
कर्नाटक में कांग्रेस व जनता दल सेकुलर के वे विधायक जिन्हें मीडिया ‘बागी-बागी’ कहकर अलानाहक ऊंचा आसन दिए हुए है, इन दिनों इस सभी रूपों में सामने आकर बता रहे हैं कि उनके लिए जनादेश की पवित्रता तभी तक मायने रखती है, जब तक उसकी बिना पर स्वार्थ साधना होती रहे।
हम जानते हैं कि उसमें बाधा आने पर वे उसी तरह की ‘नई साधना’ के लिए इस्तीफे जैसे ‘आत्मघाती विस्फोट’ पर उतर आए हैं- यह सोचकर कि क्या हुआ जो विधायकी चली जाएगी और तो बहुत कुछ हाथ आ जाएगा। इसमें गोवा के दस कांग्रेस विधायकों के पालाबदल को भी जोड़ लें तो यह सवाल बनता ही है कि इससे जनादेश देने वाले मतदाताओं में जो खीझ, उदासी या नाउम्मीदी पैदा होती है, क्या वह भी चुनावों को रस्मअदायगी बनाने की ओर ही नहीं ले जाती?  ले जाती है तो कैसे कह सकते हैं कि इसके लिए महज नरेंद्र मोदी सरकार या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही दोषी है? 
ठीक है कि इन दोनों ने बेहद चालाकी से ‘एक देश, एक चुनाव’ का नारा दे रखा है और चुनाव में बिग मनी व बाहुबल का अकूत दुरुपयोग रोकने समेत सारे जरूरी चुनाव सुधारों से मुंह मोड़ रखा है। लेकिन गत दो जुलाई को राज्यसभा में चुनाव सुधारों पर जो बहस हुई, उसमें कांग्रेस या दूसरे विपक्षी दलों ने ही कहां कहा कि विधायकों व सांसदों की निधियों व लोभों-लाभों पर अंकुश लगाकर उन्हें अपने वादों को निभाने और दल बदलने या इस्तीफे देने से पहले अपने मतदाताओं से पूछने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए?
मोदी सरकार के तो ऐसे किसी प्रस्ताव में रुचि लेने का सवाल ही नहीं था, क्योंकि उसने खुद 2014 के अपने सारे वादों को हाशिये में भी न रहने देने की कला प्रदर्शित करके नया अस्तित्व पाया है। लेकिन कांग्रेस को तो ऐसे विधायकों व सांसदों से उन उपचुनावों का खर्च वसूलने के कानूनी प्रावधान की वकालत करनी चाहिए थी, जो उनके द्वारा अपनी सीटों से दिए जाने वाले इस्तीफों के कारण कराने पड़ते हैं। किसे नहीं मालूम कि ऐसे इस्तीफे किसी ‘अपने’ के लिए सीट खाली करने या कर्नाटक जैसे हालात में ‘बहुत कुछ वसूलने’ के लिए ही दिए जाते हैं?
उक्त चर्चा में विपक्ष ने भले ही चुनावों में बिग मनी के इस्तेमाल, चुनाव आयोग और मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए, एकतरफे चुनावी चंदे पर चिंता जताई, कारपोरेट फंड बंद करने पर जोर दिया, लेकिन विधायकों व सांसदों की विचारहीन निरंकुशता रोकने के लिए मुंह नहीं खोला। और तो और, उसने चुनाव आयोग के उस नियम के खिलाफ भी कुछ नहीं कहा जिसके तहत किसी व्यक्ति की ईवीएम में खराबी की शिकायत झूठी साबित होने पर उसे 6 महीने की जेल की सजा या उस पर जुर्माने का प्रावधान है। 
प्रसंगवश, सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में इस नियम को हटाने की मांग की गई है, जिस पर कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांग रखा है।
गौरतलब है कि इस विपक्ष के मुकाबले भारतीय प्रशासनिक सेवा के 64 सेवानिवृत्त अधिकारियों द्वारा गत लोकसभा चुनाव में हुई गड़बडिय़ों को लेकर चुनाव आयोग को लिखे पत्र में कहीं ज्यादा गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं।
यकीनन, चुनाव आयोग ने उक्त चुनाव को जिस तरह अनावश्यक तौर पर लंबे खींचा, सत्तापक्ष की ओर से आदर्श आचार संहिता के धड़ल्ले से किए गए उल्लंघनों को लेकर आंखें मूंदे रखीं, साथ ही एक चुनाव आयुक्त की असहमति तक को दरकिनार कर क्लीन चिट देता और अपने फैसलों को संदिग्ध बनाता रहा, वह इस आयोग को भी चुनाव सुधारों की जद में लाने का पर्याप्त आधार है क्योंकि इसके बगैर चुनावों को रस्म अदायगी होने से रोकना लगातार मुश्किल होता जाएगा।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तो ठीक है, लेकिन उसे इतना स्वच्छंद नहीं ही होना चाहिए कि चुनाव तारीखों की घोषणा में देरी करके प्रधानमंत्री को विभिन्न लोकलुभावन परियोजनाओं के उद्घाटन का अपना अभियान मुकम्मल करने का वक्त देने से भी न डर लगे और न लाज आए। इतना ही नहीं, विपक्षी दल मतगणना के आरंभ में ही वीवीपैट मिलान की मांग करें तो उन्हें बिना किसी ठोस वजह से सिरे से नकार दे।
एक विश्लेषक ने ठीक ही लिखा है कि यहां ‘बीती ताहि बिसार दे’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जाना चाहिए और बीते चुनाव की शंकाओं और चिंताओं पर लगातार बात की जानी चाहिए। ताकि आगे ऐसा करने का कोई और कुटिल इरादा फिर पनप रहा हो, तो उस पर लगाम लग सके। चुनावों को रस्म अदायगी बनने से रोकना है तो उनकी निष्पक्षता व स्वतंत्रता की हर हाल में रक्षा करना जरूरी है।
यह समझना भी कि चुनाव सुधारों के संबंध में कांग्रेस कहें या समूचे विपक्ष का बेहिस, अगंभीर, नैतिकताहीन व रस्मी रवैया चुनावों को रस्मअदायगी बनाने में सत्ताधीशों की मदद ही करेगा। खासकर, जब किसी ‘विचारधारा’ के फायदे चाहने वालों की संख्या बढ़ती जा रही हो और नुकसान का जोखिम उठाने वालों का अकाल पड़ता जा रहा हो! (द वायर)

 

 


Date : 15-Jul-2019

समीरात्मज मिश्र

भारत में महिला पुलिसकर्मियों के हालात ऐसे हैं कि बच्चा बीमार होने पर छुट्टी तक नहीं मिल पाती है और बीमार बच्चे को काम पर साथ ले आओ, तो निलंबन का सामना भी करना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पिछले दिनों एक महिला कॉन्स्टेबल को इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि वह अपनी दुधमुंही बच्ची को साथ लेकर ड्यूटी पर आ रही थी। हालांकि अभी कुछ महीने पहले ही झांसी में जब एक महिला पुलिसकर्मी इसी तरह बच्चे को साथ लेकर ड्यूटी पर आई तो न सिर्फ उसे सम्मानित किया गया, बल्कि उसे अपने गृह जनपद के पास तैनाती भी दे दी गई।
लखनऊ में महिलाओं की सुरक्षा और सहायता के लिए काम करने वाले पुलिस के एक विभाग विमेन पॉवर हेल्पलाइन 1090 में तैनात महिला सिपाही सुचिता सिंह को अपने नवजात शिशु की देखभाल के लिए जब छुट्टी नहीं मिली, तो वह बच्चे को लेकर ड्यूटी पर आने लगीं। लेकिन उनके विभाग ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें निलंबित कर दिया।
महिला सिपाही सुचिता सिंह ने अब इंसाफ पाने के लिए राज्य के पुलिस महानिदेशक के यहां गुहार लगाई है। डीजीपी ने फिलहाल महिला सिपाही को अपने कार्यालय से संबद्ध करके मामले की जांच शुरू करा दी है। 1090 में तैनात एक अन्य महिला सिपाही ने भी अपने उत्पीडऩ का आरोप लगाया है। शानू पाल नाम की इस महिला सिपाही ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई है कि उसने जब इमरजेंसी में अफसरों से छुट्टी मांगी तो उसे डांटकर भगा दिया है।
पिछले साल झांसी के थाना कोतवाली में महिला सिपाही अर्चना जयंत की छह महीने की दुधमुंही बेटी को गोद में लेकर अपनी ड्यूटी निभाते हुए तस्वीर वायरल हुई थी। उसके बाद राज्य के पुलिस प्रमुख ने उस महिला सिपाही का सम्मान करते हुए उन्हें मदर कॉप की उपाधि दी थी और उनके गृह जनपद के नजदीक तैनाती भी दे दी थी।
यूपी के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने 1090 में काम करने वाली उन महिलाओं के बच्चों के लिए एक क्रेच भी बनवाया था, ताकि महिला सिपाही और अन्य कर्मी बच्चों को क्रेच में छोडक़र आसानी से काम कर सकें, लेकिन बाद में इस क्रेच को बंद कर दिया गया।
पुलिस के आला अधिकारियों ने महिला सिपाहियों के साथ किसी तरह के उत्पीडऩ की बाद से तो इनकार किया है लेकिन यह सच है कि पुलिस विभाग में काम करने वाली महिलाओं को, खासकर छोटे पदों पर काम करने वाली महिलाओं को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसे लेकर कई तरह की योजनाएं बनीं, अक्सर इस मुद्दे पर सेमिनार होते हैं लेकिन समस्याएं जस की तस हैं।
यूपी में पुलिस के एक आला अधिकारी बताते हैं कि इन्हीं परेशानियों की वजह से तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस विभाग में महिलाएं आना नहीं चाहतीं। आज भी पुलिस में उनकी भागीदारी महज सात फीसद है। देश में दस राज्य ऐसे हैं जहां पुलिस विभाग में पांच प्रतिशत से भी कम महिलाएं हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यह स्थिति तब है जबकि भारत सरकार ने 2009 में पुलिस में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को 33 फीसद तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया था। कई राज्यों ने इसे अपने यहां लागू करने की कोशिश भी की लेकिन लक्ष्य तक अभी कोई भी राज्य नहीं पहुंच सका है। 2013 में भारत के गृह मंत्रालय ने हर पुलिस थाने में कम से कम तीन महिला सब इंस्पेक्टर और दस महिला पुलिस कॉन्स्टेबल नियुक्त करने की सिफारिश की लेकिन ऐसा शायद ही कोई राज्य हो जिसने इस पर पूरी तरह से अमल किया हो। पुलिस विभाग में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की राह में सबसे बड़ी अड़चन यही है कि अभी भी महिलाओं में यह विश्वास नहीं बन पाया है कि यह विभाग महिलाओं के लिए भी उतना मुफीद है जितना कि पुरुषों के लिए। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस विभाग के पुरुष कर्मचारी कोई बहुत अच्छी स्थिति में हैं लेकिन महिलाओं के लिए तो स्थितियां ज्यादा प्रतिकूल हैं।
उत्तर प्रदेश में एडीजी के पद पर तैनात एक वरिष्ठ महिला आईपीएस अधिकारी इसकी वजह बताती हैं, दरअसल यह पेशा पुरुषों के लिए बना था, इसलिए हर चीज पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाई गई। न सिर्फ पुलिस की नीतियां और इंफ्रास्ट्रकचर बल्कि हथियार तक पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाए गए और विभाग का माहौल भी उसी हिसाब से ढल गया। लेकिन अब चूंकि महिलाएं इस पेशे में आने लगी हैं तो उनके मुताबिक माहौल को ढालना होगा ताकि वे पुरुषों के साथ उतनी ही दक्षता के साथ काम कर सकें।
यूपी पुलिस में तैनात एक महिला कॉन्स्टेबल नाम न छापने की शर्त पर बताती हैं कि अक्सर पुरुष सहयोगियों और अधिकारियों का सहयोग तो मिलता है लेकिन महिलाकर्मियों को हर तरह के शोषण का भी शिकार होना पड़ता है। उनके मुताबिक कार्यस्थल पर तमाम तरह की दिक्कतों के अलावा पुरुष सहकर्मियों का महिलाओं के प्रति व्यवहार भी बहुत प्रताडऩा देता है। 

महिला पुलिसकर्मियों की दिक्कत सबसे ज्यादा तब बढ़ जाती है जब उन्हें कहीं बाहर किसी मिशन पर या दंगा नियंत्रण इत्यादि जैसी जगहों पर भेजा जाता है। एक महिला पुलिसकर्मी बताती हैं, बाहर तैनाती के दौरान महिला और पुरुष पुलिस कर्मियों की बैरक अलग-अलग भले ही होती हैं लेकिन उनके बीच किसी तरह की दीवार नहीं होती। कई बार तो दरवाजे और पर्दे तक नहीं होते। ऐसी स्थिति में महिलाओं को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
शौचालय एक ऐसी समस्या है जिस पर भारत में पिछले चार साल से मिशन भले ही चलायी जा रहा हो लेकिन महिला पुलिसकर्मियों को इसकी कमी से आज भी दो-चार होना पड़ता है। पुलिस थानों और ड्यूटी की जगहों पर अक्सर अलग से शौचालय नहीं होते।
एक जगह से दूसरी जगह तक आने-जाने के लिए महिलाओं को भी पुरुष पुलिसकर्मियों की तरह ही ट्रकों से ही यात्रा करनी पड़ती है, जबकि उस पर चढऩे और उतरने में महिलाओं को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके लिए महिलाओं ने कई बार अधिकारियों को अवगत भी कराया है लेकिन फिलहाल यही व्यवस्था कायम है।
पुलिस विभाग में काम आने वाले तमाम हथियार और उपकरण आज भी महिलाओं के हिसाब से डिजाइन नहीं किए गए हैं और उन्हें भी वही उपकरण इस्तेमाल करने होते हैं जो कि उनके पुरुष सहकर्मी करते हैं। दंगों के वक्त इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार और उपकरण इतने भारी होते हैं कि कई बार महिलाओं के लिए तमाम तरह की शारीरिक परेशानियों का कारण बन जाते हैं। कई बार बाहर तैनाती के वक्त लंबे समय तक परिवार और बच्चों से दूर रहना भी महिला पुलिसकर्मियों को असहज करता है। (डॉयचेवेले)

 


Date : 14-Jul-2019

सिफिलिस बीमारी पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। साल 2016 में यह नवजातों की मृत्यु की सबसे बड़ी वजह बन कर सामने आई थी। इस पर नियंत्रण के लिए यौन संबंध के दौरान सुरक्षा जरूरी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया है कि यूरोप में सिफिलिस बीमारी के मामले पिछले एक दशक में काफी ज्यादा बढ़े हैं। 2000 के दशक के बाद से पहली बार एचआईवी के नए मामलों की तुलना में कुछ देशों यह बामारी तेजी से फैली है। यूरोप के रोग निवारण और नियंत्रण केंद्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, समलैंगिक पुरुषों के बीच असुरक्षित यौन संबंधों और अपने साथी के साथ बिना सुरक्षा के यौन संबंध बनाने की वजह से 2010 के बाद से इस यौन संचारित रोग के मामलों में 70 फीदसी तक की वृद्धि हुई है।
यूरोपीयन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल, ईसीडीसी में यौन संचारित संक्रमणों के विशेषज्ञ एंड्रयू अमातो-गोची बताते हैं, पूरे यूरोप में सिफिलिस संक्रमण में वृद्धि के कई कारक हैं। इनमें बिना कंडोम के यौन संबंध बनाना, कई लोगों के साथ यौन संबंध बनाना और लोगों में एचआईवी संक्रमण का डर समाप्त होना शामिल हैं। यह यूरोपीय रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन के पिछले महीने के उस बयान के बाद आई है जिसमें उसने कहा था कि दुनिया भर में हर दिन लगभग एक लाख लोग यौन संचारित संक्रमण की चपेट में आते हैं।
सिफिलिस से पुरुषों और महिलाओं में गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। स्टिलबर्थ और नवजात की मौत भी हो सकती है। इससे एचआईवी का भी खतरा बढ़ जाता है। वर्ष 2016 में सिफिलिस पूरी दुनिया में नवजातों की मौत का सबसे बड़ा कारण बना था।
यूरोप में स्वास्थ्य और बीमारी की निगरानी करने वाले स्टॉकहोम स्थित ईसीडीसी ने बताया, 2007 से लेकर 2017 तक 30 देशों में सिफिलिस के 2,60,000 मामले सामने आए। 2017 में सबसे ज्यादा 33,000 मामले सामने आए। इसका मतलब यह है कि वर्ष 2000 के बाद एचआईवी से ज्यादा सिफिलिस से लोग प्रभावित हुए। ब्रिटेन, जर्मनी, आयरलैंड, आइसलैंड और माल्टा जैसे पांच देशों में समस्या दोगुनी बढ़ी जबकि एस्टोनिया और रोमानिया में 50 फीसदी या उससे अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। ईसीडीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2007 और 2017 के बीच दर्ज किए गए दो-तिहाई मामलों में यौन संबंध दो पुरुषों के बीच बनाए गए थे। वहीं 23 फीसदी मामले महिलाओं के साथ संबंध बनाने वाले पुरुषों और 15 फीसदी महिलाओं में सामने आए।
पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले मामलों का अनुपात लात्विया, लिथुआनिया और रोमानिया में 20 फीसदी से कम और फ्रांस, जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड, स्वीडन और ब्रिटेन में 80 प्रतिशत से अधिक है। 
अमातो गोची का कहना है कि वे समलैंगिक पुरुष जिनके बीच एचआईवी संक्रमण का डर नहीं रहता है, इस समस्या का मुख्य कारण हैं। उन्होंने कहा, इस प्रचलन को बदलने के लिए लोगों को यौन संबंध बनाने के दौरान कंडोम का उपयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित करना होगा। (डॉयचेवेले)


Date : 14-Jul-2019

-कुमार सिद्धार्थ
देश के महानगरों और शहरों में जिस तेजी से वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है, उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का है। यह ऐसा मुद्दा है जिस पर वर्षों से चिंता जताई जा रही है, लेकिन इस दिशा में कुछ खास परिणाम देखने में नहीं आ रहे।  देश में दुपहिया और चार पहिया वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है और रोजाना लाखों नए वाहन पंजीकृत हो रहे हैं। फिलहाल देश भर में करोड़ों वाहन ऐसे हैं, जो पेट्रोल और डीजल से चल रहे हैं और इनसे निकलने वाला काला धुआं कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है। 'विश्व स्वास्थ्य संगठनÓ की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि भारत के लगभग 11 फीसदी वाहन कार्बन उत्सर्जक हैं, जो वायु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत हैं।
पेरिस में हुए 'जलवायु परिवर्तन समझौतेÓ के प्रति प्रतिबद्धता के चलते अब बिजली से चलने वाले वाहनों के विस्तार को लेकर गंभीरता से काम शुरू हुआ है। इस दिशा में भारत सरकार ने साल 2030 तक बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने के लिए एक वृहद योजना तैयार की है। ये वाहन बैटरी से चलेंगे और बैटरी बिजली से चार्ज होगी। 
माना जाता है कि बिजली से चलने वाले वाहनों की देखभाल व मरम्मत का खर्च भी कम आता है। सरकार की इस पहल से अब इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर निर्माता कंपनियां भी गंभीर हो चुकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि पूरे देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढऩे से बिजली क्षेत्र में बड़ा बदलाव आएगा और जहरीली गैसों के उत्सर्जन में 40 से 50 फीसदी की कमी आएगी। इससे देश में कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 'नीति आयोगÓ की अगुवाई में विद्युत गतिशीलता के मिशन को मंजूरी दी है। ध्यान रहे कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को सार्वजनिक परिवहन से जोडऩे के लिए केंद्र सरकार की हाइब्रीड (बिजली और जैविक दोनों) और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने और उनके निर्माण की नीति 'फास्टर एडॉप्शन एण्ड मैन्युफैक्चरिंग इलेक्ट्रोनिक व्हीकल्सÓ (एफएएमई) जिसे 2015 में लॉन्च किया गया था, का पुनरीक्षण किया जा रहा है। इसके तहत 'नीति आयोगÓ ने बिजली से चलने वाले वाहनों की जरूरत, उनके निर्माण और इससे संबंधित जरूरी नीतियां बनाने की शुरूआत की है।
दरअसल, ऑटोमोबाइल के लिए भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। भारत में इस वक्त लगभग 0.4 मिलियन इलेक्ट्रिक दुपहिया वाहन और 0.1 मिलियन ई-रिक्शा हैं। कारें तो केवल हजारों की संख्या में ही सड़कों पर दौड़ रही हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 'सोसाइटी ऑफ  मैन्युफैक्चर्स ऑफ  इलेक्ट्रिक व्हिकलÓ (एसएमईवी) के अनुसार, भारत ने 2017 में बेचे जाने वाले 'आंतरिक दहनÓ (आईसी) इंजन वाले वाहनों में से एक लाख से भी कम बिजली से चलने वाले वाहनों को बेचा। इनमें से 93  फीसदी से अधिक इलेक्ट्रिक तीन-पहिया वाहन और 6 फीसदी दुपहिया वाहन थे। इलेक्ट्रिक गाडिय़ों में दुपहिया वाहन ही अग्रणी है।
भारत भले ही इलेक्ट्रिक कारों में दूसरे देशों से पीछे हो, लेकिन बैटरी से चलने वाली ई-रिक्शा की बदौलत उसने चीन को पीछे छोड दिया है। रिपोट्र्स के मुताबिक मौजूदा समय में भारत में करीब 15 लाख ई-रिक्शा चल रहे हैं, जो चीन में साल 2011 से अब तक बेची गईं इलेक्ट्रिक कारों की संख्या से ज्यादा हैं। एटी कर्नी नाम की एक कंसल्टिंग फर्म की रिपोर्ट में बताया गया है कि हर महीने भारत में करीब 11,000 नए ई-रिक्शा सड़कों पर उतारे जा रहे हैं। भारत में अभी इलेक्ट्रिक गाडिय़ों को चार्ज करने के लिए कुल 425 पॉइंट बनाए गए हैं। सरकार 2022 तक इन प्वाइंट्स को 2,800 करने वाली है।
कुछ दिनों पहले भारत सरकार ने देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के विनिर्माण और उनके तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए  'फेम इंडियाÓ योजना के दूसरे चरण को मंजूरी दी है। कुल 10 हजार करोड़ रुपए लागत वाली यह योजना 1 अप्रैल, 2019 से तीन वर्षों के लिये शुरू की गई जो मौजूदा योजना 'फेम इंडिया वनÓ का विस्तारित संस्करण है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में इलेक्ट्रिक और हाईब्रिड वाहनों के तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसके लिए लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में शुरुआती स्तर पर सब्सिडी देने तथा ऐसे वाहनों की चार्जिंग के लिए पर्याप्त आधारभूत संरचना विकसित करना है। यह योजना पर्यावरण प्रदूषण और ईंधन सुरक्षा जैसी समस्याओं का समाधान करेगी।
गौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से बिजली की मांग भी बढ़ रही है। नॉर्वे और चीन जैसे देशों ने बड़े पैमाने पर बिजली से चलने वाले वाहनों का निर्माण शुरू किया है। जनवरी 2011 से दिसंबर 2017 के बीच चीन में बिजली से चलने वाले  17 लाख 28 हजार 447 वाहन सड़कों पर उतारे गए। उद्योग मंडल 'एसोचौमÓ और 'अन्सट्र्स एंड यंगÓ (ईएण्डवाई) के संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि साल 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से बिजली की मांग 69.6 अरब यूनिट पहुंचने का अनुमान है।
आलोचकों का तर्क है कि भारत में 90 फीसदी बिजली का उत्पादन कोयले से होता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक कारों से प्रदूषण कम करने की बात बेईमानी लगती है। नॉर्वे के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से कराए गए एक शोध के मुताबिक बिजली से चलने वाले वाहन पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से कहीं ज्यादा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। 
अध्ययन में कहा गया है कि यदि बिजली उत्पादन के लिए कोयले का इस्तेमाल होता है तो इससे निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसें डीजल और पेट्रोल वाहनों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं। यही नहीं, जिन फैक्ट्रियों में बिजली से चलने वाली कारें बनती हैं वहां भी तुलनात्मक रूप में ज्यादा विषैली गैसें निकलती हैं। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इन खामियों के बावजूद कई मायनों में ये कारें फिर भी बेहतर हैं। रिपोर्ट में ये कहा गया है कि ये कारें उन देशों के लिए फायदेमंद हैं जहां बिजली का उत्पादन अन्य स्रोतों से होता है।
अपने देश में ऊर्जा अभाव के चलते इलेक्ट्रिक वाहनों का सपना चुनौतीपूर्ण ही लगता है। इलेक्ट्रिक वाहन चलाने के लिए पर्याप्त बिजली मिल सके, अभी इस पर काम किया जाना है। वहीं उसके लिए बुनियादी सुविधाओं, संसाधनों और बजट का प्रावधान किया जाना है। वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार बैटरी निर्माण और चार्जिंग स्टेशनों की समस्या का समाधान कर दे तो बड़ी तादाद में बिजली-चलित वाहन बाजार में उतारे जा सकते हैं। जाहिर है बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम सरकार को करना है और इसके लिए ठोस दीर्घावधि नीति की जरूरत है। देखना होगा कि आने वाले समय में बिजली आधारित वाहनों के उपयोग और उससे उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों की पहल कितनी कारगर साबित होगी ? (सप्रेस)


Date : 13-Jul-2019

दुष्यंत कुमार

हाल ही में कुछ ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जो सामान्य वर्ग (सवर्ण) के आरक्षण के चलते एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणियों से होने वाले भेदभाव की ओर ध्यान दिलाती हैं

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जब संविधान में संशोधन करते हुए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) लोगों के लिए आरक्षण (जिसे सवर्ण आरक्षण भी कहा जाता है) का प्रावधान किया, तब इस पर कई तरह के सवाल उठे थे। उस समय से वंचित तबक़ों के प्रतिनिधियों समेत कई जानकार कह रहे हैं कि मोदी सरकार का यह क़दम संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है।

इस सवाल के साथ यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सरकार ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा कि उसने ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए आरक्षण सामान्य श्रेणी से ही सुनिश्चित किया है, लिहाज़ा यह आरक्षण किसी भी तरह अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए तय कोटे से छेड़छाड़ नहीं करता।
हो सकता है सरकार की इस दलील से कुछ लोग इत्तेफ़ाक़ रखते हों, लेकिन हाल में कुछ जानकारियां सामने आई हैं जो सामान्य आरक्षण के चलते एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणियों के उम्मीदवारों के साथ होने वाले भेदभाव की ओर ध्यान दिलाती हैं, ख़ास तौर पर ओबीसी के मामले में।
हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने 2019-20 के पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स के लिए एक नोटिफिक़ेशन जारी किया है। इसमें दाख़िले के लिए भरे जाने वाले फ़ॉर्म की फ़ीस आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के लिए अलग-अलग है, जो सामान्य बात है। लेकिन इसमें अनारक्षित और ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 750 रुपये फ़ीस जमा कराने के बात कही गई है, जबकि ईडब्ल्यूएस श्रेणी को एससी-एसटी के साथ रखकर उनके नामांकन की फ़ीस 300 रुपये रखी की गई है।
डीयू के फ़ीस तय करने का यह तरीक़ा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। कई लोगों ने सवाल किया है कि जब आरक्षण का लाभ पाने के लिए ईडब्ल्यूएस और ओबीसी दोनों वर्गों को आठ-आठ लाख रुपये की आय सीमा के तहत रखा गया है, तो ओबीसी वर्ग की फ़ीस 750 और ईडब्ल्यूएस की फ़ीस 300 रुपये रखने का क्या तर्क है।
सामान्य आरक्षण लागू करते समय भी आठ लाख रुपये की आय सीमा को लेकर ख़ासी चर्चा हुई थी। तब कई लोगों ने यह कहते हुए ईडब्ल्यूएस आरक्षण का विरोध किया था कि सालाना कम से कम आठ लाख रुपये कमाने वाले किसी परिवार का उम्मीदवार गऱीब कैसे माना जा सकता है। जबकि इतनी ही कमाई वाले ओबीसी उम्मीदवार को क्रीमीलेयर का बताया दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि अब ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार के लिए तय की गई फ़ीस ओबीसी से ढाई गुना कम क्यों है।
यहां इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि मोदी सरकार ने सामान्य आरक्षण लागू करने के बाद कहा था कि सवर्णों के लिए तय की गई आय सीमा अंतिम नहीं है और वह इसकी समीक्षा कर इसे कम कर सकती है। लेकिन आरक्षण लागू होने के बाद अब तक ऐसा कुछ नहीं किया गया। इस बीच चुनाव बीत गए और विश्वविद्यालयों ने भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करने में ज़बर्दस्त सक्रियता दिखाते हुए भर्तियों के लिए एक के बाद एक नोटिफिक़ेशन जारी कर दिए।
इन सबके बीच यह सवाल कहीं गुम हो गया कि तमाम सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में पहले से ही अपनी जनसंख्या से कहीं ज़्यादा नेतृत्व वाले सवर्ण वर्ग को आरक्षण देने के लिए आठ लाख रुपये की आय सीमा में रखना क्या सही है। इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा चुने गए देश के 445 उच्च शिक्षा संस्थानों के डेटा पर आधारित एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। यह बताती है कि 2016-17 में इन संस्थानों में 16 लाख छात्र-छात्राओं का नामांकन हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक़ इनमें से 28 प्रतिशत यानी कऱीब चार लाख 55 हजार छात्र आर्थिक रूप से गऱीब वर्ग (सामान्य वर्ग के) से ही थे। यह आंकड़ा ईडब्ल्यूएस को मिलने वाले दस प्रतिशत आरक्षण से लगभग तीन गुना ज़्यादा है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि ज़्यादातर शिक्षा संस्थान दो से 5।50 लाख रुपये तक सालाना आय वाले परिवारों को आर्थिक रूप से पिछड़ा मानते हैं। यह मोदी सरकार द्वारा तय की गई सीमा से दो-ढाई लाख रुपये कम है। ऐसे में अगर विश्वविद्यालय आठ लाख रुपये वार्षिक आय वाले उम्मीदवारों को फ़ीस में ढाई गुना रियायत देंगे तो लाज़मी है इससे ईडब्ल्यू आरक्षण पर सवाल उठेंगे।
पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स के लिए डीयू के फ़ीस स्ट्रक्चर के अलावा धर्मशाला केंद्रीय विश्वविद्यालय का नया एडमिशन रोस्टर भी ‘सवर्ण’ आरक्षण के अतार्किक होने का संकेतक बताया जा रहा है। इस विश्वविद्यालय ने 2019-20 के सत्र के लिए जो मेरिट सूची जारी की है, उसके मुताबिक़ अगर कोई ईडब्ल्यूएस (या गऱीब सवर्ण) उम्मीदवार सौ में से एक से दस अंक भी लाता है, तो भी उसे दाख़िला मिल जाएगा। अमर उजाला ने मेरिट सूची के हवाले से बताया कि 1।25 अंक वाला ईडब्ल्यूएस विद्यार्थी बॉटनी में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर सकता है। वहीं, दस अंक लाने पर इसी कैटेगरी के उम्मीदवार को अंग्रेज़ी विषय में एमए करने दिया जाएगा।
हालांकि इसी तरह की रियायत एससी-एसटी वर्ग के उम्मीदवारों को भी दी गई हैं। लेकिन दिक़्क़त यह है कि उन्हें ईडब्ल्यूएस से बाहर रखा गया है। वे इसका लाभ नहीं उठा सकते। इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार भी एससी-एसटी व ओबीसी को मिले आरक्षण के दायरे से बाहर हैं लेकिन ऐसा सीधे-सीधे कह देना सही नहीं होगा।
यह कई रिपोर्टों से साबित हुआ है कि देश के वंचित तबक़ों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया है। विश्वविद्यालयों में दलित, आदिवासी और ओबीसी वर्ग के शिक्षकों की संख्या उनकी जनसंख्या के हिसाब से बहुत कम है। वहीं, आरक्षण का कोटा पूरा नहीं होने की सूरत में ख़ाली रह जाने वाली सीटों को सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भरा जाता रहा है। इस व्यवस्था के होते यह नहीं कहा जा सकता कि सवर्ण वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी से ज़्यादा सीटें नहीं मिलतीं।
बहरहाल, इन सबके बीच एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहत की बात यह रही कि सरकार ने विवादित 13 पॉइंट रोस्टर को हटा कर दोबारा लाए गए पुराने 200 पॉइंट रोस्टर से जुड़े विधेयक को मंज़ूरी दे दी है। बीते बुधवार को कैबिनेट ने विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती से जुड़े इस रोस्टर को हरी झंडी दिखा दी। अब उच्च शिक्षा संस्थानों में भर्तियां विभाग की जगह विश्वविद्यालय को इकाई मानते हुए की जाएंगी। हालांकि इससे सामान्य आरक्षण से जुड़ा विवाद ख़त्म नहीं होने वाला। (सत्याग्रह)


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