विचार/लेख
-अपूर्व अमीन
गुजरात विधानसभा में उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने मैरिज रजिस्ट्रेशन कानून के संबंध में एक घोषणा की है, जिसके अनुसार राज्य सरकार ‘गुजरात रजिस्ट्रेशन ऑफ़ मैरिज एक्ट 2006’ में संशोधन करने जा रही है।
घोषणा के अनुसार, अब मैरिज रजिस्ट्रेशन के दौरान माता-पिता को सूचित किया जाएगा और इसके लिए एक अलग पोर्टल भी बनाया जाएगा।
राज्य के नागरिकों से इन नए नियमों के संबंध में अगले 30 दिनों तक आपत्तियाँ और सुझाव मंगवाए गए हैं। इसके बाद एक समिति का गठन किया जाएगा जो संवैधानिक सीमाओं के भीतर उचित सुझावों को ध्यान में रखते हुए इन्हें लागू करेगी।
मैरिज रजिस्ट्रेशन में कथित ‘धोखाधड़ी’ को रोकने के लिए लाए गए इन संशोधनों के संबंध में, उपमुख्यमंत्री ने कहा, ‘राज्य में विवाह पंजीकरण प्रक्रिया में कुछ ‘कमियों’ के कारण इसका ‘दुरुपयोग’ किया जा रहा है।’
हर्ष संघवी ने कहा, ‘गुजरात के पंचमहाल जिले में कई फर्जी शादियों के पंजीकरण के चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पंचमहाल के कंकोडाकोई और नाथकुवा जैसे गांवों में, जहां एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है, वहां गाँव के तलाटी (सचिव)-सह मंत्री ने सैकड़ों ‘निकाह’प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं, जिनकी हमने गहन जांच कर के सख़्त कार्रवाई की है।’
उन्होंने कहा, ‘असामाजिक तत्व अपनी असली पहचान छिपाकर राज्य की बेटियों को प्रेम के जाल में फंसाते हैं या बहलाते हैं।’
हर्ष संघवी ने कहा, ‘लव मैरिज का कोई विरोध नहीं है, लेकिन सरकार ‘धोखाधड़ी’ और ‘जबरदस्ती विवाह’ के खिलाफ कार्रवाई करेगी।’
इन नए प्रस्तावित बदलावों ने काफी बहस छेड़ दी है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए ख़तरा’ पैदा करता है।
विवाह पंजीकरण में कौन-कौन से नए सुधार सूचित किए गए हैं?
सरकार के प्रस्तावित नए मैरिज रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को छह चरणों में बताया गया है।
मैरिज रजिस्ट्रेशन आवेदन पर दोनों पक्षों और दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए, आवेदन को नोटिफाई करवाना जरूरी है और दोनों पक्षों को केंद्र या राज्य सरकार की तरफ से जारी पहचान पत्र प्रस्तुत करना होगा, जिसमें ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट और फोटो पहचान पत्र शामिल हैं।
सरकार की तरफ से किया गया प्रत्येक मैरिज रजिस्ट्रेशन, उस अधिकार क्षेत्र वाले सहायक रजिस्ट्रार को प्रस्तुत किया जाएगा। यह विवाह पंजीकरण आवेदन प्रपत्र-1(ढ्ढ) के अनुसार विवरण और दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत करना होगा। इनमें ये शामिल हैं:
दूल्हा-दुल्हन और गवाहों के आधार कार्ड
दूल्हा और दुल्हन का जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल छोडऩे का प्रमाण पत्र
विवाह का निमंत्रण पत्र
दूल्हा और दुल्हन की पासपोर्ट साइज़ की दो अलग-अलग तस्वीरें
एक शादी की तस्वीर जिसमें दूल्हा और दुल्हन की शादी की रस्म दिखाई गई हो
गवाहों की पासपोर्ट साइज़ की दो मौजूदा तस्वीरें शामिल होंगी.
आवेदन के साथ एक डिक्लेरेशन में यह बताना होगा कि दूल्हा और दुल्हन ने अपने माता-पिता को शादी के बारे में सूचित कर दिया है या नहीं।
इसके अलावा, दूल्हा और दुल्हन को अपने माता-पिता से नीचे दिए गए दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे-
माता/पिता का आधार कार्ड
पिता का पूरा नाम
पिता का पूरा पता
पिता का मोबाइल नंबर
माँ का पूरा नाम
माँ का पूरा पता
माँ का मोबाइल नंबर
साथ ही, दूल्हा और दुल्हन के माता-पिता को सहायक रजिस्ट्रार की पुष्टि/संतुष्टि के बारे में 10 कार्य दिवसों के भीतर सूचित कर दिया जाएगा कि आपके बच्चे शादी कर रहे हैं और यह जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप से या भौतिक रूप से ( निर्धारित सरकारी माध्यमों से) दी जाएगी।
सहायक रजिस्ट्रार आवेदन प्राप्त होने पर, इसे संबंधित जि़ले या तहसील के रजिस्ट्रार को भेजेंगे। रजिस्ट्रार उप-नियमों (एक से सात) में दिए गए शर्तों के पूरा होने की पुष्टि होने के बाद विवाह का पंजीकरण 30 दिनों के भीतर करेगा।
ये सभी विवरण रजिस्ट्रार की तरफ़ से सरकारी ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किए जाएंगे, जिनमें क्रम संख्या, पृष्ठ संख्या और खंड संख्या जैसी जानकारी शामिल होगी।
यह सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद, रजिस्ट्रार फॉर्म-दो के अनुसार विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र तैयार करेंगे और यह प्रमाण पत्र संबंधित पक्षों को व्यक्तिगत रूप से या डाक से भेजा जाएगा।
प्रस्तावित संशोधन के बारे में विपक्ष ने क्या कहा?
कांग्रेस सांसद गेनिबेन ठाकोर ने प्रस्तावित संशोधन का समर्थन करते हुए मीडिया से कहा, ‘जब असामाजिक तत्व बेटियों को प्रेम के जाल में फंसा लेते हैं तो बाद में बेटियों को नुक़सान होता है , इसलिए कानून के अनुसार लव मैरिज गांव में गवाहों की उपस्थिति में होने चाहिए।’
गेनिबेन का कहना है, ‘आपसी सहमति से होने वाले लव मैरिज पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मैंने प्रस्ताव दिया है कि सरकार इस विधेयक को जल्द से जल्द लागू करे, जिसमें प्रेम विवाहों का पंजीकरण गांव में ही हो और गवाह भी गांव के ही हों।’
मीडिया को संबोधित करते हुए आम आदमी पार्टी के विसावदर के विधायक गोपाल इटालिया ने कहा, ‘आज सरकार ने जनता से आपत्तियाँ और सुझाव आमंत्रित किए हैं, जो एक अच्छी बात है। इस पंजीकरण कानून में संशोधन से पहले सुझाव मांगे जाना सराहनीय है।’
कानूनी विशेषज्ञों की क्या राय है?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह संशोधन, जीवन के मौलिक अधिकारों के लिए ख़तरा है।
बीबीसी गुजराती से बात करते हुए समाजशास्त्री गौरांग जानी का कहना है कि ऐसी चीजें समाज को 18वीं शताब्दी के रूढि़वादी समाज में वापस ले जाती हैं।
गौरांग जानी कहते हैं, ‘यह मामला लोकतंत्र के खिलाफ है। देश के स्पेशल मैरिज एक्ट के अनुसार, 18 वर्षीय लडक़ी और 21 वर्षीय लडक़ा अपनी इच्छानुसार कहीं भी शादी कर सकते हैं। राज्य इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ऐसे कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरा हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में लव मैरिज के लिए माता-पिता की सहमति का कोई सवाल ही नहीं उठता।’
गौरांग जानी कहते हैं, ‘संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि विवाह के समय माता-पिता की अनुमति लेना अनिवार्य है। वास्तव में, माता-पिता को भी ऐसे कानूनों का विरोध करना चाहिए।’
गौरांग जानी कहते हैं, ‘वर्तमान में समाज बदल रहा है, अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं। रूढि़वादी लोगों की ओर से इसका विरोध हो रहा है, ऐसे कानून उन रूढि़वादी लोगों की मानसिकता को बढ़ावा देने के लिए हैं, यह पूरी तरह से एक राजनीतिक कदम है।’
उपमुख्यमंत्री के उस बयान पर जिसमें उन्होंने कहा था कि सलीम, सुरेश बनकर राज्य की बेटी को फंसाएंगे, गौरांग जानी ने कहा, ‘यह समाज के एक विशेष समुदाय को निशाना बनाकर राजनीतिक लाभ उठाने का मामला है। ऐसे बयान अल्पसंख्यक समुदाय में भय का माहौल पैदा करते हैं।’
पारिवारिक न्यायालय के वकील चेतन पांड्या ने बीबीसी गुजराती को बताया, ‘सरकार की तरफ से इस फ़ैसले को अभी तक अंतिम रूप से लागू नहीं किया गया है।’
चेतन पांड्या कहते हैं, ‘नागरिकों की आपत्तियों के लिए इसे अगले 30 दिनों तक खुला रखा गया है, इसलिए कोई भी नागरिक या नेता जिसे कोई आपत्ति हो, वह इस कानून को लेकर आपत्ति पेश कर सकता है।’
मैरिज रजिस्ट्रेशन के विशेषज्ञ वकील परेश मोदी ने बीबीसी को बताया, ‘भारतीय संविधान में शादी के लिए माता-पिता की अनुमति जैसी बातों को व्यावहारिक रूप से मान्यता नहीं दी गई है। इससे बच्चों पर पूरा नियंत्रण माता-पिता के हाथों में चला जाता है। ऐसे में, अगर दंपत्ति के माता-पिता नहीं हैं या माता-पिता तलाक जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो यह सवाल भी उठता है कि यह फ़ैसला कौन लेगा।’
परेश मोदी के अनुसार, ‘संविधान का कोई भी अनुच्छेद माता-पिता की सहमति जैसी बातों का समर्थन नहीं करता है। और अगर इसे लागू भी कर दिया जाए, तो लोग इसे आसानी से उच्च न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं।’
डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में अवैध करार दिए जाने के बाद ये सवाल उठने लगा है कि अब अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील का क्या होगा.
इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ अंतरिम ट्रेड डील पर सहमति बनने की जानकारी देते हुए भारत पर लगे 50 प्रतिशत टैरिफ़ को घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की थी. साथ ही ये दावा किया था कि भारत ने रूसी तेल ख़रीद बंद करने पर रज़ामंदी दे दी है.
इस 50 प्रतिशत टैरिफ़ में 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ़ था जबकि 25 प्रतिशत टैरिफ़ रूसी तेल ख़रीद को लेकर दंडात्मक रूप से लगाया गया था.
जब शुक्रवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ़ को 6-3 के मत से ग़ैरक़ानूनी घोषित किया, तो उसके तुरंत बाद ट्रंप ने दूसरे क़ानून (ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122) का सहारा लेते हुए नए सिरे से पहले 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ़ लगाने और फिर शनिवार को इसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने का एलान किया.
नया ग्लोबल टैरिफ़ 24 फ़रवरी से 150 दिनों के लिए लागू होगा.
हालांकि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस में एक लंबी प्रेस कॉन्फ़्रेंस की और उसमें भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर पत्रकारों के सवालों के जवाब भी दिए.
इसी दौरान उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले से भारत के साथ समझौते में 'कुछ भी नहीं बदलेगा और भारत भुगतान करना जारी रखेगा.'
कई जानकारों का कहना है कि टैरिफ़ को अवैध ठहराए जाने के बाद, भारत पर लगे पुराने टैरिफ़ का कोई क़ानूनी आधार नहीं बचता है.
भारत में प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अमेरिका-भारत ट्रेड डील को लेकर सवाल किए हैं और पूछा है कि 'सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार क्यों नहीं किया गया.
कांग्रेस ने शनिवार को भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को रोककर उसकी शर्तों पर पुनर्विचार करने की मांग की.
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह समझौता 'हताशा' में, जल्दबाजी में किया गया था और अब 'अव्यावहारिक' हो गया है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में पूछा, "आख़िर ऐसी क्या मजबूरी थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने सुनिश्चित किया कि दो फ़रवरी 2026 की रात राष्ट्रपति ट्रंप ही भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा करें? ...अगर पीएम मोदी अपनी नाज़ुक छवि बचाने को लेकर इतने व्यग्र न होते और केवल 18 दिन और प्रतीक्षा कर लेते, तो भारतीय किसान इस पीड़ा और संकट से बच सकते थे और भारत की संप्रभुता भी सुरक्षित रहती."
उन्होंने आरोप लगाया कि 'भारत-अमेरिका ट्रेड डील दरअसल एक ऐसी कठिन परीक्षा बन गई है, जिसका सामना देश को प्रधानमंत्री की व्यग्रता और आत्मसमर्पण के कारण करना पड़ रहा है.'
कांग्रेस ने इस ट्रेड डील को लोगों से 'विश्वासघात' करने वाला बताया था लेकिन केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का दावा था कि 'इस समझौते में कृषि और डेयरी सेक्टर को सुरक्षित रखा गया है.'
कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने 20 फ़रवरी को एक्स पर एक पोस्ट में अपने 15 फ़रवरी के एक लेख का हवाला देते हुए लिखा, "मैंने लिखा था कि अगर राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ़ को सुप्रीम कोर्ट ख़ारिज़ करता है तो भारत और अमेरिका दो अप्रैल 2025 की पहले वाली स्थिति में पहुंच जाएंगे."
पी चिदंबरम ने इसी पोस्ट में पूछा कि 'इस बीच अमेरिका ने भारत से कई रियायतें हासिल कर ली हैं, बिना अपनी ओर से कोई रियायत दिए. उन रियायतों का अब क्या होगा?'
उन्होंने लिखा, "संयुक्त बयान में कहा गया था कि अमेरिका से भारत को निर्यात होने वाले कई उत्पादों पर शून्य शुल्क लागू होगा. यह भी कहा गया था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के सामान आयात करने का इरादा रखता है. साथ ही भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिकी उत्पादों पर गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करेगा, जैसी बातें शामिल थीं. इन वादों का अब क्या होगा."
पूर्व वित्त मंत्री ने लिखा कि एक भारतीय टीम इस समय फ्रेमवर्क समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका में है. अब यह टीम क्या करेगी?
उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से अमेरिका-भारत के बीच घोषित समझौते पर होने वाले असर के बारे में सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की है.
ट्रेड डील पर सवाल
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने सवाल उठाया कि 'टैरिफ़ की क़ानूनी वैधता पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने वाला है, ये जानते हुए भी नई दिल्ली ने हाल ही में फ़्रेमवर्क ट्रेड डील पर सहमति दी.'
उन्होंने एक्स पर लिखा, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के एजेंडे में टैरिफ़ केंद्रीय भूमिका में बने रहेंगे और इसके संकेत उनके नए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ़ (जिसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाने का ट्रंप ने एलान किया है) से मिलता है. हालांकि अदालत के फ़ैसले ने उनकी स्थिति को कमज़ोर किया है."
ब्रह्मा चेलानी ने लिखा, "अंतरराष्ट्रीय समझौतों में भारत की सरकारों का रिकॉर्ड प्रभावशाली नहीं रहा है और अक्सर बातचीत की मेज़ पर हासिल बढ़त छोड़ने का पैटर्न दिखा है. मोदी सरकार ने भी इस कमज़ोर परंपरा को जारी रखा है. यह लद्दाख सीमा क्षेत्रों में चीन की बड़ी घुसपैठ के बाद बीजिंग के साथ हुए समझौतों, ऑपरेशन सिंदूर को रोकने वाले युद्धविराम समझौते और हाल में अमेरिका के साथ हुए फ्रेमवर्क व्यापार समझौते में दिखता है."
उन्होंने लिखा, "अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ़ की वैधता पर फैसला आने वाला है, यह जानते हुए भी नई दिल्ली ने इसी महीने की शुरुआत में वॉशिंगटन के साथ एक फ्रेमवर्क समझौता किया. इसमें भारत की ज़िम्मेदारियां पहले चरण में बहुत साफ़-साफ़, मात्रात्मक और निगरानी के तहत आने वाली हैं, जबकि अमेरिका की प्रतिबद्धताएं चरणबद्ध होंगी, शर्तों पर आधारित होंगी और कई मामलों में वापस ली जा सकती हैं."
ब्रह्मा चेलानी ने कहा है कि इससे भी गंभीर बात यह है कि इस समझौते में व्यापार से इतर प्रतिबद्धताएं भी शामिल हैं. इनमें रूसी तेल आयात को चरणबद्ध तरीके से कम करना और भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (समुद्री क्षेत्र) में उन जहाज़ों के बीच तेल हस्तांतरण रोकना शामिल है, जिन पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं. और भारत ने इस मामले में कार्रवाई भी की है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बीती 16 फ़रवरी को रिपोर्ट किया था कि भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों को लागू करने के लिए कथित रूप से ईरान से जुड़े तीन तेल टैंकरों को अपनी जल सीमा में ज़ब्त किया था. हालांकि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गॉर्ड्स कोर (आईआरजीसी) से जुड़ी फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी ने टैंकरों के ईरान से जुड़े होने के दावे का खंडन किया था.
अब भारत पर कितना होगा वास्तविक टैरिफ़?
बीबीसी संवाददाता ग्रेस एलिज़ा गुडविन की एक रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करने वाले देशों, जिनमें ब्रिटेन, भारत और यूरोपीय संघ शामिल हैं, पर भी सेक्शन 122 के तहत 10 प्रतिशत (ट्रंप ने इसे 15 प्रतिशत बढ़ाया है) का ग्लोबल टैरिफ़ लागू होगा.
अधिकारी ने कहा कि ट्रंप प्रशासन उम्मीद करता है कि ये देश अपने व्यापार समझौतों के तहत किए गए रियायतों का पालन जारी रखेंगे.
लेकिन दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटव के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक़, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर भी असर होगा.
अजय श्रीवास्तव ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में बताया कि ट्रंप ने कहा था कि रेसिप्रोकल टैरिफ़ को 25 प्रतिशत से 18 कर देंगे, जोकि अभी होना था लेकिन उससे पहले सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया और यह रेसिप्रोकल टैरिफ़ अवैध हो चुका है. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने 15 प्रतिशत नया ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है जोकि अस्थाई है और सबके ऊपर लगेगा चाहे एफ़टीए यानी फ़्री ट्रेड अग्रीमेंट हो या न हो.
उनके अनुसार, "अगर आप एफ़टीए करते हैं तो आपको उन्हें कुछ रियायतें देनी पड़ेंगी और एफ़टीए नहीं करते हैं तो बिना किसी रियायत दिए 15 प्रतिशत टैरिफ़ लगेगा."
मौजूदा समय में भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ़ की गणना में जो कन्फ़्यूज़न है उसे समझाते हुए अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात के 55 प्रतिशत हिस्से पर 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ़ लगा था. अब इसकी जगह 15 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ़ लगेगा."
वह कहते हैं, "बाकी बचे 45 प्रतिशत भारतीय निर्यात के लगभग आधे हिस्से पर अमेरिका ने पूरी दुनिया के लिए पहले ही टैरिफ़ से छूट दे रखी है जिसमें स्मार्टफ़ोन, दवाएँ, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स हैं. अब जो बचे हुए प्रोडक्ट हैं जैसे स्टील और एल्यूमीनियम, उस पर अमेरिका ने पूरी दुनिया के देशों पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगा रखा है. कुछ ऑटो कंपोनेंट्स पर 25% टैक्स है. और ये जो फ़ार्मूला है ये पूरी दुनिया पर एक समान लागू होगा."
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को अवैध इस आधार पर घोषित किया कि इसका अधिकार अमेरिकी कांग्रेस को है.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से टैरिफ़ के ग़ैरक़ानूनी घोषित किए जाने के बाद ट्रंप ने दावा किया कि 'भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में कुछ भी नहीं बदलेगा और वो भुगतान करेंगे, जबकि अमेरिका को कुछ भी भुगतान नहीं करना होगा.'
लेकिन जानकारों का कहना है कि ट्रंप के दावे का कोई क़ानूनी आधार नहीं है.
अजय श्रीवास्तव का भी कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच जिस ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है उसका बस एक ही क़ानूनी आधार है, छह फ़रवरी को जारी संयुक्त बयान.
उनके अनुसार, "संयुक्त बयान में एक बहुत स्पष्ट शर्त लिखी हुई है कि दोनों देशों में कोई भी अगर अपने टैरिफ़ को मॉडिफ़ाई करता है तो दूसरा देश कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा. अब अमेरिका में टैरिफ़ मॉडिफ़ाई हो गए हैं तो हमें फिर से देखना पड़ेगा. और इस आधार पर हम कह सकते हैं कि हमें कोई फ़ायदा नहीं है और इस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है."
अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो 15% का नया ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है, इसकी भी बुनियाद बहुत कमज़ोर है और इसे भी चुनौती दी जाएगी.
दरअसल जिस धारा 122 के तहत ट्रंप ने नए ग्लोबल टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है उसके अनुसार, सिर्फ़ 150 दिनों तक अधिकतम 15% टैरिफ़ लगाया जा सकता है लेकिन इसमें भी एक शर्त है कि ये तब लागू किया जा सकता है जब भुगतान संतुलन की समस्या हो. साथ ही ये क़ानून उस समय की बात करता है जब फ़िक्स एक्सचेंज रेट हुआ करता था.
अजय श्रीवास्तव का कहना है, "इस समय न तो अमेरिका को भुगतान संतुलन की समस्या है और न ही वहां फ़िक्स एक्सचेंज रेट का मामला है. इसीलिए अभी से लोग कहने लगे हैं कि इसे चुनौती दी जाएगी और बहुत जल्द अमेरिका को इसे भी वापस लेना पड़ेगा."
भारत को क्या करना चाहिए?
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ गई है, अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को अपने ट्रेड डील की शर्तों पर फिर से पुनर्विचार करना चाहिए.
वह कहते हैं, "हमने जो पहले ट्रेड डील वार्ता की थी, अब सब चीज़ें बदल गई हैं और अब हमें उससे निकल जाने का सोचना पड़ेगा या नई शर्तों पर फिर से बातचीत करनी पड़ेगी."
उनका कहना है, "जो पुरानी डील थी वह पूरी तरह अप्रासंगिक हो गई है और और इस समय अमेरिका में टैरिफ़ को लेकर इतनी अस्थिरता चल रही है कि भारत को इस सबसे निकल जाना चाहिए और शांति से देखना चाहिए कि अमेरिका और दुनिया में क्या हो रहा है. ट्रेड डील की बात कुछ समय के लिए भूल जानी चाहिए."
अजय श्रीवास्तव के अनुसार, 'भारत को अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील पर पुनर्विचार करना चाहिए.'
हालांकि केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, "हमने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ़ पर दिए गए फ़ैसले को देखा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बारे में प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी की है. अमेरिकी प्रशासन ने कुछ क़दमों का एलान किया है. हम इन सभी घटनाक्रम का असर समझने के लिए उनका अध्ययन कर रहे हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-पुष्य मित्र
बीबीसी के संपादक रहे संजीव श्रीवास्तव अगर रिटायरमेंट के बाद कचौड़ी की दुकान खोल लेते हैं तो यह उनके लिये आत्मगौरव का विषय हो सकता है, मगर पत्रकार बिरादरी के लिये चिंता का विषय है।
यह उदाहरण बताता है कि अगर एक पत्रकार रिटायरमेंट के बाद नेताओं और अफसरों की दलाली कर राज्यसभा से लेकर सरकारी ठेकेदारी की राह नहीं बना पाता। वह किसी पार्टी का प्रवक्ता या नेता का सोशल मीडिया मैनेजर नहीं बन पाता तो उसके पास विकल्प यही है कि वह या तो किराने दुकान खोल ले या कचौड़ी की।
अपने जीवन के सुनहरे वर्ष ईमानदार पत्रकारिता के क्षेत्र में खपाने के बाद अगर वह स्वाभिमान के साथ जीना चाहता है तो उसके कितने सीमित विकल्प हैं। आपने किसी सरकारी बाबू, बैंक कर्मी, प्रोफेसर या किसी और फील्ड के लोगों के सामने ऐसी विकल्पहीनता शायद ही देखी हो कि उसके जीवन भर की सेवा के बाद चैन से बुढ़ापा गुजारने के विकल्प कितने सीमित हैं।
-प्रेरणा
एक छोटा-सा कमरा है। उसी कमरे में बैठी हैं एक महिला, जिन्होंने ठीक सत्रह दिन पहले अपनी इकलौती संतान को खोया है।
जिस कमरे में वह बैठी हैं, वह कमरा उनके बेटे साहिल धनेसरा का था। कमरे की दीवारों पर आज भी उसके सपनों और उम्मीदों की निशानियां साफ नजर आती हैं। एक ओर मेडल्स के गुच्छे टंगे हैं, तो दूसरी ओर लिखा। ‘एक मिलियन डॉलर कमाने’ का उसका खुद से किया गया वादा। लेकिन अब ये सारे वादे और सपने अधूरे रह गए हैं।
‘23 साल से मेरी दुनिया वही था। उसको इतना संभालकर रखा। जब भी घर से बाहर निकलता था, डर लगता था और मेरा डर आखिर जीत गया’, ये शब्द साहिल की मां इन्ना माकन के हैं।
साहिल की मौत और बेबसी में न्याय की गुहार लगाती उनकी मां की आवाज इन दिनों भारतीय टेलीविजन चैनलों की सुर्खियां बन चुकी है। वह मीडिया से एक ही बात बार-बार दोहराते थक चुकी हैं, लेकिन उनकी आंखों का दर्द जस का तस है।
वह कहती हैं, ‘पुलिस स्टेशन से कॉल आई थी मैडम...एक बजकर 19 मिनट में। उन्होंने बोला एसएचओ बोल रहा हूं मैं। उसके बाद तो कॉल के बाद मुझे कोई होश ही नहीं है...कौन था...क्या था, मैंने तो ये भी नहीं देखा वहां कितने पुलिसवाले थे, मैंने कुछ नहीं देखा। मैं तो अपने बच्चे की डेड बॉडी जो वहां पड़ी थी जिस हालत में...उसे देखकर बिल्कुल सदमे में चली गई।’
साहिल 23 साल के थे। अपनी बीबीए की डिग्री पूरी कर अगले कुछ महीने में बस ब्रिटेन जाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन इसी बीच बीते तीन फऱवरी को हुए एक सडक़ हादसे ने उनकी जान ले ली और उनकी मां से उनके जीने का इकलौता सहारा छीन लिया। साहिल की मां उसकी परवरिश अकेले ही कर रही थीं।
वह कहती हैं, ‘इसको बाहर भेजते हुए डर लगता था मुझे। हमेशा हमारी इसी बात पर लड़ाई होती थी। वो कहता था मैं अब बच्चा थोड़ी हूं पर क्योंकि मैं गाड़ी चलाती हूं रोड पर...मैं यहां के लोग, यहां का सिस्टम देखती हूं। लोगों को ऐसे कुचलते हुए देखती हूं, जैसे उनकी लाइफ़ की कोई वैल्यू नहीं है। इसलिए मैं इसको बचपन से बार-बार कहती थी कि इस देश में मत रहना।’
पुलिस के मुताबिक, सडक़ पर साहिल को टक्कर मारने वाला व्यक्ति, नाबालिग है।
द्वारका के डीसीपी अंकित कुमार सिंह ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, ‘जिस पर आरोप है और जो गाड़ी चला रहा था। उसके ड्राइवर ने अपनी उम्र 19 साल बताई और हमने उसपर एफ़आईआर दर्ज कर ली। एफ़आईआर दर्ज होने के बाद जांच में उसकी उम्र 18 साल से कम निकलकर आई। हमने तुरंत उसको हिरासत में लेकर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में प्रोड्यूस किया और उसके बाद उसको तीन तारीख से ऑब्जर्वेशन होम में भेज दिया गया। पता चला है कि दस तारीख को उसको वहां से अंतरिम राहत मिली है क्योंकि उसकी बोर्ड की परीक्षाएं है। उसके पिता को भी हम हिरासत में लेंगे, मोटर व्हीकल एक्ट के तहत उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की जाएगी और अभी उसकी जांच चल रही है।’
घटना के प्रत्यक्षदर्शियों में से एक बताते हैं कि तेज़ स्पीड में आ रही काले रंग की एक स्कॉर्पियो ने सामने से बाइक पर सवार होकर आ रहे साहिल को पहले टक्कर मारी, फिर करीब सौ मीटर तक घसीटा और इसके बाद सडक़ की बाईं ओर खड़ी एक कैब को टक्कर मार दी। इस हादसे में कैब ड्राइवर को गंभीर चोटें आईं, वहीं साहिल की मौके पर ही मौत हो गई। हमने इस हादसे पर उस कैब ड्राइवर से भी बात की। अजीत घटना के बाद से बेड रेस्ट पर हैं।
वह बताते हैं, ‘इतनी तेज टक्कर थी मैम कि मुझे तो काफी देर तक यही नहीं पता चला कि हुआ क्या। पसलियां टूटी हुई हैं, पैर में चोट लगी, ये शरीर एक तरफ से पूरा फट गया था, और रीढ़ की हड्डी में दर्द है। सांस लेने में या खांसी आ जाए तब भी दोनों तरफ इतना दर्द होता है। बिल्कुल। गाड़ी अस्सी से ऊपर की स्पीड में रही होगी। वो उस बाइक को कम से कम सौ मीटर घसीटकर लेकर आया। उसकी आवाज मेरे तक आ रही थी। समझ लो कितनी स्पीड रही होगी कि मुझे उतरने का भी मौका नहीं मिला। हमें तो ज़्यादा दुख उस बेचारी मां का है, जिसका इकलौता लडक़ा था और वो भी नहीं रहा, उसके पिता जी भी नहीं थे और वो मां बेचारी अकेली रह गई।’
इन्ना माकन कहती हैं कि घटना के शुरुआती दस दिन उन्हें कोई होश नहीं था। वह अपने बेटे के अंतिम संस्कार में व्यस्त थीं। उन्होंने केस की कोई सुध नहीं ली, लेकिन जब उन्हें अभियुक्त को मिली अंतरिम ज़मानत का पता चला तो उनके लिए इसे सहन कर पाना मुश्किल हो गया। उन्होंने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपने बेटे साहिल के न्याय के लिए आवाज़ उठाई और फिर रातों रात ये मामला सुर्खियों में आ गया।
साहिल की मां की मांग है कि अभियुक्त को कड़ी से कड़ी सजा हो। वह अभियुक्त के मां-बाप पर भी सवाल उठाती हैं। वह पूछती हैं, ‘अगर उनका बेटा होता तो क्या छोड़ देते, पूरी दुनिया में आग लगा देते। मैं कहती हूं कि बच्चा गाड़ी चलाता है, वो भी इतनी स्पीड में और मां-बाप इससे बेखबर हैं, ऐसा कैसे हो सकता है।’
दरअसल, अभियुक्त की मां ने बीबीसी से बात करते हुए कहा है कि पिता की ग़ैर मौजूदगी में उनके बच्चे ने बिना उन्हें ख़बर किए, गाड़ी की चाभी ली और बहन के साथ बाहर निकल गया।
घटना के दिन के बारे में वह बताती हैं, ‘हम वॉशिंग मशीन में कपड़े धो रहे थे और बच्चा लोग कब गए चाभी निकाल के हमको पता नहीं चला।
साढ़े 11 में निकला सब। थोड़ी देर बाद फ़ोन किया। मम्मी एक्सीडेंट हो गया। मैं भागी-भागी गई।। वहां उनका बच्चा पड़ा हुए था। हम उनके बच्चे को देखे। हमको बहुत रोना आया। मैं बोली भगवान ऐसा क्यों कर दिए उनके बच्चे के साथ। अपने ताऊ के बेटे के साथ कभी-कभी चला जाता था साथ।।।ऐसे वो चलाता नहीं है।।।लेकिन पहली बार उससे ऐसा हादसा हो गया।’
हालांकि साहिल की मां अभियुक्त के परिवार की इन दलीलों को नकारती हैं।
उनके मुताबिक, ‘मां-बाप का बच्चे पर कोई लगाम नहीं था। उसने बेरहमी से मज़े-मज़े में, बिना किसी अफ़सोस के साथ ये हादसा किया है।’
उधर अभियुक्त की मां साहिल की मां की नाराजगी को जायज ठहराती हैं।
उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘उनकी नाराजगी बिल्कुल जायज है। उनकी जगह कोई दूसरी मां भी होती तो ऐसे ही करती। मुझे बहुत अफसोस है उनके बेटे का। एक मां का दर्द एक मां ही समझती है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास पैसा है तो हममें हमदर्दी नहीं है। जितना साहिल की मां को दुख है, उतना ही मुझे भी है। मेरे बेटे ने गलती की है, हम इसको स्वीकारते हैं लेकिन हम माफी मांगने के सिवा और क्या कर सकते हैं।’
कई मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि अभियुक्त जिस स्कॉर्पियो को ड्राइव कर रहा था, उस पर पहले से कई चालान थे।
समाचार एजेंसी एएनआई ने गाड़ी पर चालान को लेकर जब अभियुक्त के पिता से सवाल किया तब उनका कहना था, मेरी गाड़ी पर जो चालान है। मेरा कॉमर्शियल व्हीकल बिजनेस है। वो हमारी बिजनेस में गाड़ी यूज़ होती है और उसमें हमारे जो ड्राइवर गाड़ी चलाते हैं।।।उनके थ्रू चालान है। बच्चा के द्वारा नहीं हैं।’
सडक़ हादसे के आंकड़े सडक़
सडक़ एवं परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, साल 2023 में भारत में 4 लाख 80 हजार से भी ज़्यादा सडक़ हादसे रिपोर्ट हुए। इन हादसों में 1 लाख 73 हजार से भी ज़्यादा लोगों की जान गई, वहीं साढ़े चार लाख के करीब लोग घायल हुए।
साल 2019 से 2023 के बीच के आंकड़ों की स्टडी करने पर उनका औसत निकालेंगे, तो पता चलेगा कि भारत में औसतन हर दिन 1,317 सडक़ हादसे होते हैं और हर दिन इसमें 474 लोग अपनी जान गंवाते हैं।
इन हादसों की सबसे बड़ी वजह है ओवरस्पीडिंग।
पति की क्रूरता, धोखाधड़ी और यौन उत्पीड़न के अलावा कई और लोगों के दुष्कर्म झेलने के बाद गिजेल पेलिको ने अपनी किताब छापी. इसका नाम है "ए हिम टू लाइफ".
डॉयचे वैले पर सबीने कीजेलबाख की रिपोर्ट –
गिजेल ने पीड़ित बनकर रहने के बजाय लड़ने का रास्ता चुना. उनके पति उन्हें नशीली दवाएं देकर बेहोश कर देते थे और फिर सालों तक उनके साथ दरिंदगी करवाते रहे. इस भयानक अनुभव से उबरने के बाद, अब उन्होंने अपनी किताब में बताया है कि कैसे वो अपनी जिंदगी फिर से जीने के रास्ते पर बढ़ीं. उनकी किताब का नाम है "ए हिम टू लाइफ".
दक्षिणी फ्रांस के माजान स्थित अपने छोटे से घर में वह आखिरी बार नाश्ता कर रही थीं. नवंबर 2020 की उस सुबह, गिजेल पेलिको को अंदाजा भी नहीं था कि उनकी अब तक की सामान्य जिंदगी हमेशा के लिए खत्म होने वाली है. उन्हें पास के पुलिस स्टेशन से बुलावा आया था और वे बस उसी मुलाकात के लिए निकल रही थीं.
दो महीने पहले, उनके पति डोमिनिक पेलिको को गिरफ्तार किया गया था. उन्हें एक सुपरमार्केट में महिलाओं की स्कर्ट के नीचे वीडियो बनाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था. डोमिनिक ने कसम खाकर कहा था कि यह बस एक बार की गलती थी. उसने थेरेपी कराने का वादा भी किया था और एक वफादार पत्नी होने के नाते गिजेल उसका साथ देने का पूरा मन बना चुकी थीं.
जब एक पुलिस अधिकारी गिजेल पेलिको को अलग कमरे में ले गया, तो उन्हें रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि अब वे अपने पति को अदालत के बाहर कभी नहीं देख पाएंगी.
फ्रांस में शर्म नहीं, गर्व बनीं गिजेल पेलिको की लड़ाई
अधिकारी ने उन्हें एक महिला के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न की तस्वीरें दिखाई. शुरुआत में, वह यह समझ ही नहीं पाईं कि तस्वीरों में दिख रही महिला वे खुद थीं. जांचकर्ताओं को उनके पति के पास से गैर-सहमति से बनाए गए यौन संबंधों की 20,000 से भी ज्यादा तस्वीरें मिलीं.
डोमिनिक पेलिको 10 साल तक अपनी पत्नी को लगातार नशीली दवाएं देता रहा और डार्क वेब के जरिए अपने ही पड़ोस के पुरुषों को बुलाकर बेहोशी की हालत में उनका रेप करवाता रहा. उसने कम से कम 200 बार इस घिनौने अपराध को अंजाम दिया.
‘शर्म को अब अपना पाला बदलना होगा'
इस मामले को लेकर फ्रांस की एक अदालत में डोमिनिक पेलिको और उसके उन 50 सहयोगियों पर 2024 में सितंबर से दिसंबर तक मुकदमा चला जिनकी पहचान की गई थी. अदालत ने 51 लोगों को गिजेल पेलिको के बलात्कार के मामले में दोषी करार दिया है. पेलिको के पूर्व पति और दूसरे आरोपियों को 20 साल से 3 साल तक की सजा सुनाई गई.
गिजेल पेलिको पूरी दुनिया में महिलाओं की हिम्मत की मिसाल बन गईं. वह नारीवादी आंदोलन का एक वैश्विक चेहरा बनकर उभरीं. मुकदमा शुरू होने से हफ्तों पहले उन्होंने तय कर लिया था कि सुनवाई सार्वजनिक होगी और इस लड़ाई का एक चेहरा होगा, वह खुद.
उन्होंने मांग की कि वे भयानक वीडियो भरी अदालत में दिखाए जाएं. उन्होंने कहा, "शर्म को अब अपना पाला बदलना होगा”. उन्होंने न केवल गुनहगारों को जवाबदेह ठहराया, बल्कि उस संस्कृति को भी चुनौती दी जहां अक्सर पीड़िता को ही दोष दिया जाता है.
साढ़े तीन महीने तक चले इस मुकदमे के दौरान, गिजेल का सामना हर दिन महिलाओं की बढ़ती भीड़ से होता था जो उनकी हिम्मत की सराहना करती थीं. दुनिया भर के मीडिया घरानों ने उनकी हिम्मत को प्रमुखता से दिखाया. साथ ही, बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा उन्हें अपमानित करने की कोशिशों और उनके साथ हुए बुरे बर्ताव की जानकारी को भी विस्तार से कवर किया गया.
अदालती कार्यवाही में यह भी सामने आया कि मुख्य आरोपी ने अपनी दोनों बहुओं के नहाते समय चोरी-छिपे वीडियो बनाए थे. इतना ही नहीं, उसने अपनी बेटी की सोते समय की नग्न तस्वीरें भी रखी थीं, जिसमें उसने ऐसे अंतःवस्त्र पहने हुए थे जो उसके नहीं थे. क्या उसकी बेटी का भी यौन उत्पीड़न हुआ था, यह बात अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है. अधिकारी अब हत्या के शक में उसकी जांच कर रहे हैं.
अपने लिए मुखर हुई गिजेल
अदालत ने डोमिनिक पेलिको को 20 साल जेल की सजा दी. फ्रांस के कानून में बलात्कार के लिए यह सबसे बड़ी सजा है. उसके साथ शामिल बाकी 50 अपराधियों को भी कई सालों के लिए जेल भेज दिया गया है. ऐसे मुश्किल दौर से गुजरने वाली महिला के मन में क्या चल रहा होगा जिसके साथ हुए यौन शोषण की घटना को दुनिया भर के मीडिया संस्थानों ने कवर किया और जिसने अब अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू की है.
हालांकि, उन्होंने कानूनी तौर पर अब अपने जन्म के नाम ‘गिजेल गिलू' को फिर से अपना लिया है, लेकिन संस्मरण उसी नाम से प्रकाशित किया है जिससे दुनिया उन्हें जानती है. पत्रकार जूडिथ पेरिग्नन के साथ मिलकर लिखी गई उनकी इस किताब का शीर्षक है: ‘ए हिम टू लाइफ: शेम मस्ट चेंज साइड्स'. यह किताब एक साथ 22 भाषाओं में प्रकाशित हो रही है.
73 वर्षीय गिजेल का कहना है कि अब तक उनके बारे में जो कुछ भी लिखा गया, उन्हें कभी नहीं लगा कि उनमें उनकी कहानी को सही ढंग से पेश किया गया है. उन्हें लगा कि उन लेखों में उनकी असली शख्सियत या उनके दर्द को ठीक से नहीं दिखाया गया.
वह अपने शब्दों में अपने बचपन, मां को जल्दी खो देने और उस व्यक्ति से मुलाकात का जिक्र करती हैं जिस पर उन्होंने अपना पूरा भरोसा जताया और बाद में शादी की. वह अपने तीन बच्चों की परवरिश के बारे में लिखती हैं. साथ ही, वह यह भी लिखती हैं कि प्रोफेशनल जिंदगी में भी वह अपने पति से ज्यादा सफल थीं, लेकिन इस बात का उनकी जिंदगी पर कभी असर नहीं पड़ा.
फ्रांस के डॉक्टर ने बेहोशी की हालत में सालों तक कई मरीजों का किया यौन शोषण, ज्यादातर बच्चे
फिर वह गहरा सदमा: यह जानना कि उसी व्यक्ति ने उनकी बेहोशी का फायदा उठाकर अपनी सबसे विकृत सोच को अंजाम दिया. वह उन्हें नियमित रूप से भारी नशीली दवाएं देता रहा, जिससे उनकी याददाश्त जाने, अत्यधिक थकान और पेल्विक इन्फेक्शन जैसे गंभीर खतरों का जोखिम बना रहा.
इस मामले का खुलासा होने के बाद उन्होंने अपने पति से तलाक ले लिया. कोर्ट में, उनके उस समय के पति ने वीडियो और फोटो दोबारा देखने से मना कर दिया.
‘मैं अब भी दूसरों पर भरोसा कर पाती हूं'
अपनी किताब में गिजेल पेलिको ने बताया है कि क्यों वह इतने लंबे समय तक अपनी खुशहाल शादी की यादों को संजोए रहीं. यहां तक कि वे जेल में बंद अपने पति को धुले हुए साफ कपड़े भी भेजती रहीं. वे लिखती हैं कि इसके पीछे उनकी देखभाल करने की आदत तो थी ही, लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि वह सब कुछ ‘समझना' चाहती थीं. उनकी यह जरूरत उनके बच्चों की समझ से बाहर थी और वे इस बात से काफी नाराज थे.
मुकदमे की कार्यवाही, लोगों का अत्यधिक ध्यान और परिवार के रहस्य सामने आने से, बच्चों और भाई-बहनों के साथ गिजेल के रिश्ते पर काफी ज्यादा दबाव पड़ा. किताब कुछ हद तक यह भी बताती है कि जो कुछ भी हुआ, उन्होंने उसका सामना कैसे किया. गिजेल पेलिको खुद को अपने पति पर विजयी मानती हैं. यहां तक कि उन्हें फिर से प्यार भी मिल गया है. वे लिखती हैं, "मैं मरी नहीं हूं. मैं आज भी दूसरों पर भरोसा कर सकती हूं.”
डोमिनिक पेलिको के गुनाहों को सामने आए अब पांच साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है. उनकी पूर्व पत्नी ने अपनी जिंदगी वापस पा ली है और उसमें अपनी खुशियां फिर से ढूंढ ली है.
जब कोई खिलाड़ी जिस देश में जन्मा है, उसके अलावा किसी दूसरे देश की ओर से ओलंपिक में खेलता है, तो अक्सर बहस छिड़ जाती है. राष्ट्रीय पहचान को लेकर चर्चा छिड़ जाती है. लेकिन असल में इसके क्या मायने होते हैं?
डॉयचे वैले पर जोनाथन हार्डिंग की रिपोर्ट –
इटली में स्वर्ण पदक जीतकर, शीतकालीन ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले दक्षिण अमेरिकी बनने के बाद लुकस पिन्हाइरो ब्राथेन ने कहा, "मुझे उम्मीद है कि ब्राजील के लोग इसे देखकर समझेंगे कि आपकी अलग पहचान ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है.”
ब्राथेन ने 2022 शीतकालीन ओलंपिक में नॉर्वे की ओर से हिस्सा लिया था. उनकी मां ब्राजील की हैं और पिता नॉर्वे के हैं. हालांकि, ऐसी मिली-जुली राष्ट्रीयता रखने वाले वह अकेले खिलाड़ी नहीं हैं. लेकिन उनकी सफलता ने ओलंपिक में राष्ट्रीयता और पहचान को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर से रफ्तार दे दी है.
ओलंपिक में कौन-सा खिलाड़ी किस देश से खेलता है, यह इन पांच कारणों पर निर्भर करता है
गाइस्बर्ट ओंक, रॉटरडाम के इरास्मस यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. वह वैश्विक इतिहास, खेल, खिलाड़ियों के प्रवास और राष्ट्रीय पहचान पर शोध करते हैं. उनका कहना है कि खेलों में राष्ट्रीयता पर बात करते समय कई अहम पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है.
शीतकालीन ओलंपिक 2026 में कौन कर रहा है भारत का प्रतिनिधित्व?
सबसे पहला कारण तो खुद खिलाड़ी होते हैं, जो ऊंचे स्तर पर खेलना चाहते हैं. लेकिन कई बार वह दो देशों के बीच फंसे होते हैं. एक तरफ वह देश होता है, जिसने उनकी ट्रेनिंग और करियर में निवेश किया और उन्हें अपने पास ही रखना चाहता है. वहीं, दूसरी तरफ वह देश होता है, जो उन्हें अपने लिए खेलने का मौका देता है, ताकि खिलाड़ी पदक जीतकर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ा सके. फिर खेल संघ (यानी स्पोर्ट्स फेडरेशन) होते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सभी के लिए बराबरी का मैदान बनाना चाहते हैं और आखिर में दर्शक और प्रशंसक होते हैं, जो अपने खिलाड़ियों से जुड़ा हुआ महसूस करना चाहते हैं.
ओंक ने डीडब्ल्यू से कहा, "यहां एक तरह की खींचतान है कि कौन तय करेगा कौन किस देश से है?” उन्होंने आगे कहा, "देश आपको नागरिकता देते हैं, लेकिन अब खेलों में देश कुछ खिलाड़ियों को बहुत जल्दी नागरिकता दे रहे हैं. जबकि एक आम आदमी के पास इतनी जल्दी नागरिकता पाने की कोई सुविधा नहीं होती.”
कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में खेल मानवशास्त्र की प्रोफेसर, कैरेन मैकगैरी मानती हैं कि खिलाड़ियों की सबसे बड़ी प्रेरणा होती है, दुनिया के सबसे ऊंचे स्तर पर खेल पाने की इच्छा. मैकगैरी ने डीडब्ल्यू से कहा, "ओलंपिक जैसे अंतरराष्ट्रीय खेलों में खिलाड़ी धीरे-धीरे ज्यादातर उस देश की ओर बढ़ेंगे, जो उन्हें सबसे ज्यादा संसाधन, सुविधा या जीतने के सबसे अच्छे मौके देगा.”
भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लिए कितना तैयार है?
उनके अनुसार, "आइस डांसिंग की मौजूदा फ्रांसीसी ओलंपिक चैंपियन, लॉरेंस फोर्निए बोद्री ने कनाडा, डेनमार्क और फ्रांस, तीनों देशों के लिए प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है. कुछ लोगों को लगता है कि ऐसा करना स्वार्थी है, सिर्फ खुद के बारे में सोच के लिया गया फैसला है और उस ‘ओलंपिक भावना' के खिलाफ है, जिसमें एक देश को प्रतियोगिता का केंद्र माना जाता है. हालांकि, वहीं कुछ लोगों को इस बात से बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता.”
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के नियमों के अनुसार, अगर कोई खिलाड़ी ओलंपिक या किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में किसी एक देश के लिए खेल चुका है, तो उसे दूसरे देश के लिए खेलने से पहले तीन साल का इंतजार करना होता है.
लेकिन जैसे-जैसे दुनिया की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं, वैसे-वैसे खासकर खेल में राष्ट्रीयता को देखने का नजरिया भी बदल रहा है. मॉस्को टाइम्स की एक खबर के अनुसार, इस महीने इटली में अन्य देशों के लिए प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए 30 से भी ज्यादा रूसी खिलाड़ियों ने अपनी खेल राष्ट्रीयता बदली है.
खेलने के लिए कितनी आजाद हैं भारत की लड़कियां
मैकगैरी ने कहा, "जैसे कि मैं कनाडा से हूं और फिलहाल कनाडा में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना बहुत तेज है. जो कि काफी हद तक (अमेरिकी राष्ट्रपति) डॉनल्ड ट्रंप की ओर से टैरिफ लगाने और राजनीतिक दबाव के खतरे के खिलाफ एक तरह की प्रतिक्रिया है.”
उन्होंने आगे कहा, "जब राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो देश अक्सर बंद, बाहर वालों को कम स्वीकार करने वाले और अत्याधिक राष्ट्रवादी हो जाते हैं. जिसके चलते यह सोच ओलंपिक खेलों तक भी पहुंच सकती है, खासकर मीडिया रिपोर्टिंग में.” जैसे कि यूक्रेन के शीतकालीन ओलंपिक खिलाड़ी, व्लादिस्लाव हेरास्केविच की कहानी भी इसका एक उदाहरण हो सकता है.
शुरुआती दौर में खिलाड़ी हुआ करते थे पहचान
राष्ट्रीयता बदलना कोई नई बात नहीं है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ओलंपिक का शुरुआती मूल विचार कभी यह था ही नहीं कि खिलाड़ी देशों का प्रतिनिधित्व करें. ओंक ने कहा, "शुरुआत में ऐसे कोई नियम नहीं थे.” उन्होंने आगे कहा, "तब विचार यह था कि खिलाड़ी खुद का प्रतिनिधित्व करें, न कि किसी देश या राजा का.”
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के सह-संस्थापक, बारोन पियरे दे कूबर्टिन ने कहा था, "मेरे अनुसार असली ओलंपिक हीरो एक व्यक्तिगत वयस्क पुरुष होता है.”
हालांकि, उनकी सोच आज के समय में लैंगिक समानता के लिहाज से पुरानी लगती है. लेकिन इससे यह साफ है कि उस समय ध्यान देश पर नहीं, बल्कि खिलाड़ी पर था. उसके बाद, देशों से कहा गया कि वे अपने सबसे अच्छे खिलाड़ियों को चुनकर भेजें और तब से ओलंपिक में चीजें बदलने लगी. ओंक ने समझाया, "और यहीं से देशों की भूमिका बढ़ने लगी. वह अपने हित, पैसे, राजनीति, झंडे और राष्ट्रगान के साथ अहम होने लगे.”
इसके अलावा, ओंक का मानना है कि मेडल टेबल बनाने की मीडिया परंपरा ने भी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है. यह चलन 1920 और 1930 के दशक में शुरू हुआ, जब ओलंपिक एक बड़े और लोकप्रिय आयोजन के रूप में स्वीकार किया जाने लगा और अमेरिका और ब्रिटेन के बीच मुकाबला और अधिक गंभीर हो गया.
हालांकि, 1980 के दशक के बाद से दुनिया में माइग्रेशन बढ़ा और खिलाड़ी ट्रेनिंग व करियर के लिए अलग-अलग देशों में जाने लगे. लेकिन फिर भी राष्ट्रीयता की भावना आज भी बहुत मजबूत बनी हुई है. मैकगैरी ने कहा, "घरेलू स्तर पर राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद का एक तरह का बाजारू मूल्य होता है.”
उन्होंने आगे कहा, "जैसे ओलंपिक के कॉरपोरेट स्पॉन्सर समझते हैं कि खिलाड़ियों को ‘अपने देश का खिलाड़ी' दिखाना फायदेमंद होता है ताकि लोगों में "देश” के खिलाड़ियों के लिए भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जा सके.”
दर्शकों की भूमिका को कम नहीं आंकना
लोगों की सोच और नजरिया बहुत महत्वपूर्ण होता है. किसी खिलाड़ी को दुनिया कैसे देखती है, इससे ही तय होता है कि उसे स्वीकार किया जाएगा या नहीं. ओंक ने कहा, "दर्शक काफी राष्ट्रवादी होते हैं क्योंकि उन्हें राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय मीडिया के जरिए वही नजरिया दिखाया जाता है.” साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्कूलों में राष्ट्रीय इतिहास कैसे पढ़ाया जाता है, यह भी लोगों की सोच को बहुत हद तक प्रभावित करता है.
उनके अनुसार, "राष्ट्रीयता या किसी विशेष समूह से जुड़ाव की भावना को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. जबकि अकादमिक दुनिया में इसे हम ‘काल्पनिक समुदाय' कहते हैं. ‘मैं उस खिलाड़ी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन वो हम में से एक है, वह मेरी भाषा बोलता है, वह मेरे देश का है….' लेकिन अगर हम गहराई से, अकादमिक और दार्शनिक नजरिए से देखें, तो इससे क्या फर्क पड़ता है? आखिर ये बस अलग-अलग खिलाड़ी ही तो हैं, जो बस अपनी कोशिश कर रहे हैं. यानी जो जितना अच्छा स्केट कर सकते हैं, उतना कर रहे हैं.”
इन सब कारणों के चलते यह बहस आने वाले वर्षों में भी ऐसे ही जारी रहने वाली है. अभी का समय शायद यह सोचने के लिए एक अहम मौका है कि ओलंपिक में किसी देश का प्रतिनिधित्व करने का असल मतलब क्या है.
मैकगैरी ने कहा, "यह समय दिलचस्प है क्योंकि एक तरफ दुनिया में बहुत लोग अपने देश को लेकर ज्यादा कट्टर और बंद सोच वाले हो रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ कई लोग खुद को सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं मानते, वह कई देशों और संस्कृतियों से जुड़ी अपनी पहचान को लचीला समझते हैं (राष्ट्रीय पहचान समेत).”
-गिलेर्मो डी. ओल्मो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आर्कटिक में एक सेमी-ऑटोनॉमस इलाक़े ग्रीनलैंड पर कंट्रोल करना चाहते हैं, जो डेनमार्क के अधीन है। इतिहासकार अमेरिका के विस्तार के लिए ज़मीन खरीदने के उसके इतिहास को याद कर रहे हैं।
मिसौरी यूनिवर्सिटी के इतिहासकार जे सेक्सटन कहते हैं, ‘ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका कहता है कि इससे पहले वह दूसरी ताकतों के हाथ लग जाए, उसे इस इलाके पर कब्जा करने की ज़रूरत है।’
ट्रंप इस बात पर जोर देते हैं कि सुरक्षा के लिए अमेरिका का ग्रीनलैंड पर ‘मालिकाना हक’ होना चाहिए।
हालांकि एक समय उन्होंने कहा था कि वह इसे ‘मुश्किलों के बावजूद’ करने के लिए तैयार हैं, अब वह कहते हैं कि वह ‘तुरंत बातचीत’ चाहते हैं और इसके लिए ‘जबरदस्ती नहीं करेंगे।’
यहां, हम पिछली दो सदियों में अमेरिका की कुछ सबसे बड़ी जमीन खरीद का जिक्र कर रहे हैं, जिसकी बदौलत अमेरिका ने अपनी सीमा का विस्तार किया है।
लुइसियाना (1803)
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति थॉमस जेफऱसन ने साल 1803 में फ्रांस से लुइसियाना को खरीदने का फैसला किया था। यह एक अहम मोड़ था।
20 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा इलाके में फैले लुइसियाना को खरीदने से एक नए देश और महाद्वीप में एक अहम ताकत बनने के लिहाज़ से अमेरिका के लिए यह एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था।
लुइसियाना का इलाक़ा नॉर्थ अमेरिका में फ्रांस का सबसे बड़ा उपनिवेश था। लेकिन फ्रांस के कंट्रोल वाले सेंट डोमिंगु (जिसे अब हैती के नाम से जाना जाता है) आइलैंड पर बार-बार गुलामों के विद्रोह और ब्रिटेन के साथ युद्ध के खतरे ने फ्रांसीसी नेता नेपोलियन बोनापार्ट को इसे अमेरिका को बेचने पर मजबूर कर दिया।
उस समय लुइसियाना आज के लुइसियाना प्रांत से भी बहुत बड़ा था। यहां अब 15 आधुनिक राज्य शामिल हैं जो मिसिसिपी नदी और रॉकी पहाड़ों के बीच बसे हैं।
इस ज़मीन का मालिक होना जेफऱसन के पश्चिम की ओर बढऩे के सपनों के लिए ज़रूरी था, जिसे वह अमेरिका का भविष्य मानते थे।
अमेरिकी और फ्रांसीसी सरकारों के बीच नवंबर 1803 में एक समझौता हुआ, जिसमें अमेरिका ने लुइसियाना के लिए डेढ़ करोड़ डॉलर दिए, जो आज के हिसाब से चालीस करोड़ डॉलर से ज़्यादा होता है।
मेक्सिकन सेशन (1848)
उस समय प्रेस में एक कार्टून छपा था जिसमें एक टेलर अमेरिकी झंडे के रंग के कपड़े पहने एक लंबे, मोटे आदमी का नाप ले रहा था। तीन अन्य लोग बड़े जार और चम्मच लेकर कमरे में आते हैं। एक जार पर ‘एंटी-एक्सपेंशनिस्ट पॉलिसी’ लिखा हुआ था।
1840 के दशक तक ज़्यादातर अमेरिकी लोगों को लगने लगा था कि उनकी ‘पक्की किस्मत’ पश्चिम की ओर प्रशांत महासागर के तट तक फैलने में है। आखिर में ऐसा मेक्सिको की कीमत पर होना था।
अमेरिका की सीमाओं को बढ़ाने के सबसे बड़े समर्थकों में से एक राष्ट्रपति जेम्स के पोल्क थे। उन्होंने साल 1845 में शपथ ग्रहण की थी।
राष्ट्रपति पोल्क को टेक्सस पर कंट्रोल को लेकर चल रहा झगड़ा विरासत में मिला, जिसे 1836 में मेक्सिको से आजादी मिली थी।
अमेरिका ने सन 1845 में टेक्सस पर कब्ज़ा कर लिया और यह एक अमेरिकी राज्य बन गया। अगले साल, अमेरिका और मेक्सिको के सैनिकों के बीच झड़प के बाद अमेरिकी कांग्रेस ने मेक्सिको के खिलाफ युद्ध की घोषणा को मंज़ूरी दे दी, लेकिन झगड़े की वजहें और भी गहरी थीं।
इतिहासकार जे सेक्सटन के मुताबिक़, ‘अमेरिका ने कैलिफोर्निया में दिलचस्पी दिखाई थी, जो उस समय मेक्सिको का था और महाद्वीप के सबसे ज़्यादा आर्थिक रूप से मज़बूत इलाकों में से एक था, जिसमें गहरे पानी वाले बंदरगाह थे जो एशिया के साथ व्यापार के लिए बहुत मशहूर थे।’
सेक्सटन बताते हैं कि उस वक़्त मेक्सिको की कोई भी सरकार कैलिफ़ोर्निया को बेचने और सत्ता में बने रहने की उम्मीद नहीं कर सकती थी।
इस युद्ध में अमेरिका की जीत के बाद दोनों देशों ने 1848 में ग्वादालूप हिदाल्गो की संधि पर हस्ताक्षर किए।
अमेरिका को जो ज़मीन मिली उसके लिए उसने डेढ़ करोड़ डॉलर दिए, जो आज के लिहाज़ से लगभग 60 करोड़ डॉलर से ज्यादा है। इसमें आज के कैलिफोर्निया, नेवाडा और यूटा के साथ-साथ एरिजोना, कोलोराडो, न्यू मेक्सिको और व्योमिंग के कुछ हिस्से भी शामिल थे।
सेक्सटन कहते हैं कि अगर मेक्सिकन पक्ष युद्ध नहीं हारता तो वह इस इलाके को बेचने को तैयार नहीं होता।
वह बताते हैं, ‘यह बंदूक की नोक पर बेचा गया था।’
कुल मिलाकर, मेक्सिको ने युद्ध से पहले के अपने आधे से ज़्यादा इलाके अमेरिका को सौंप दिए, जिससे अमेरिका को लगभग साढ़े तेरह लाख वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा ज़मीन मिली।
ला मेसिला (1853)
1848 में मेक्सिको-अमेरिका युद्ध ख़त्म होने के बावजूद, दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा। साल 1854 में हुए अंतिम समझौते में, दोनों सरकारें दक्षिण में मेक्सिकन इलाके की एक छोटी सी पट्टी बेचने पर सहमत हुईं, जो बाद में एरिजोना और न्यू मेक्सिको का हिस्सा बन गई।
मेक्सिको में वेंटा डे ला मेसिला और अमेरिका में गैड्सडेन परचेज के नाम से जानी जाने वाली यह डील कुछ हद तक ट्रांसकॉन्टिनेंटल रेलवे बनाने में अमेरिकी दिलचस्पी का नतीजा थी। कुछ हद तक यह मेक्सिको की सरकार की आर्थिक मुश्किलों की वजह से भी हुई थी।
अमेरिकी सरकार ने इस डील में लगभग 77 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन के लिए एक करोड़ डॉलर का पेमेंट किया, जो आज के लिहाज़ से चालीस करोड़ डॉलर से ज़्यादा था। यह इलाक़ा आज के अमेरिका का दक्षिणी बॉर्डर बन गया।
रूस से अलास्का की खऱीद (1867)
बहुत से लोग यह नहीं समझ पाए कि 1867 में अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड ने रूसी साम्राज्य से अलास्का के दूर-दराज का आर्कटिक क्षेत्र खऱीदने का इरादा क्यों दिखाया।
सीवार्ड का मानना था कि इस जमीन का सामरिक महत्व बहुत ज़्यादा है क्योंकि यह ब्रिटिश लोगों को नॉर्थ अमेरिका में दख़ल देने से रोकेगा और इससे अमेरिका को प्रशांत महासागर में मछली पकडऩे की अच्छी जगहों तक पहुँच मिलेगी।
रूस का मानना था कि वह खुद को एक ऐसे इलाके से छुटकारा दिला रहा है जिसकी कोई कीमत नहीं थी, जिसे मैनेज करना महंगा था और माना जाता था कि इस पर उस समय रूस के मुख्य दुश्मन ब्रिटेन के हमले का खतरा था।
जब सीवार्ड ने रूस से 72 लाख डॉलर में 15 लाख 54 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन खरीदने की डील की, जो आज के हिसाब से करीब 16 करोड़ डॉलर है, तो बहुत सी अमेरिकी जनता ने इसे गलत सौदा माना। उनके विरोधियों ने इसे ‘सीवार्ड की बेवकूफी’ भी कहा, जिस पर काफी विवाद हुआ। कुछ लोगों का मानना था कि अमेरिका ने बेकार जमीन खरीदी है।
आलोचना के बावजूद, अमेरिकी कांग्रेस ने इस खरीद समझौते को मंजूरी दे दी और अलास्का अमेरिका का हिस्सा बन गया, हालांकि यह साल 1959 तक एक राज्य नहीं बना।
आखिरकार, अलास्का में सीवार्ड का निवेश सोने और तेल के बड़े भंडार की खोज के साथ रंग लाया और शीत युद्ध के दौरान इस इलाक़े की सैन्य अहमियत और बढ़ गई।
विष्णुदेव साय के जन्मदिवस पर
-छगन लाल लोन्हारे
छत्तीसगढ़ की खूबसूरत वादियों में स्थित जशपुर जिला के ग्राम बगिया में 21 फरवरी को जन्म लेने वाले मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सज्जनता और सहृदयता की एक मिसाल है। दो वर्ष के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ राज्य में विकास का एक नया आयाम गढऩे वाले तथा प्रदेश के नागरिकों के दिलों में राज करने वाले मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर विद्यमान है। श्री साय जनता के बीच के एक ऐसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं जिनकी सदाशयता और दूरगामी योजनाओं से प्रदेश में विकास और प्रगति का राह आसान हुआ है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आदिवासी पृष्ठभूमि से आते हैं।
केबिनेट बैठक में राज्य में समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसानों को 3100 रूपए प्रति क्विंटल के मान से अंतर की राशि होली पर्व से पहले एकमुश्त भुगतान किए जाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में 25 लाख 24 हजार 339 किसानों से 141.04 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा कृषक उन्नति योजना के तहत धान के मूल्य के अंतर की राशि के रूप में लगभग 10 हजार करोड़ रूपए का भुगतान होली त्यौहार से पहले एकमुश्त किया जाएगा। मुख्यमंत्री स्वयं एक किसान पुत्र हैं वे किसानों की पीड़ा को भलीभांति जानते हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा कृषक उन्नति योजना के तहत राज्य के किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी 3100 रूपए प्रति क्विंटल के मान से की की गई है, जो देश में सर्वाधिक है। बीते दो वर्षों में कृषक उन्नति योजना के तहत राज्य के किसानों को धान के मूल्य के अंतर के रूप में 25 हजार करोड़ रूपए से अधिक का भुगतान किया जा चुका है। इस साल होली से पूर्व किसानों को 10 हजार करोड़ रूपए का भुगतान होने से यह राशि बढक़र 35 हजार करोड़ रूपए हो जाएगी। किसान हितैशी सरकार के इस निर्णय से बाजार भी गुलजार होंगे, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर दिखाई देगा, ट्रैक्टर आदि की बिक्री में वृद्धि होगी।
प्रदेश की नवीन औद्योगिक नीति से राज्य में अब तक 7 लाख 83 हजार करोड़ रूपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। मुख्यमंत्री ने अपने दो साल के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को पूरे देश में एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने प्रदेश की जनता के बीच जाकर जनता का न केवल विश्वास जीता है बल्कि उनके हित को ध्यान में रखकर उन्होंने ऐसी योजनाओं का क्रियान्वयन किया है जिससे छत्तीसगढ़ का समग्र विकास सम्भव हो पाया है। यह केवल और केवल श्री विष्णुदेव साय जैसे एक संवेदनशील, कर्मठ तथा ऊर्जावान मुख्यमंत्री ही सम्भव कर सकते हैं।
श्री विष्णु देव की सुशासन में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्ष 2026 को महतारी गौरव वर्ष घोषित किया गया है। राज्य सरकार ने मातृशक्ति का सम्मान करते हुए 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन योजना के अंतर्गत प्रतिमाह 1000 रूपए की सहायता राशि प्रदान की जा रही है। प्रदेश के 42 हजार 878 महिला स्व- सहायता समूहों को आसान ऋण से अब तक 129.46 करोड़ रूपए का लाभ दिया गया है। प्रधानमंत्री मातृवंदना योजना के अंतर्गत 4.81 लाख महिलाओं को 237 करोड़ रूपए की सहायता राशि दी गई है। राज्य की 19 लाख से अधिक महिलाओं को पूरक पोषण आहार सुनिश्चित की गई है। महिला सुरक्षा के लिए सखी वन स्टॉप सेंटर और महिला हेल्पलाइन 181 की स्थापना की गई है।
महिलाओं को रोजगार मूलक कार्यों के जरिए स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने के लिए पंचायत स्तर पर 52.20 करोड़ की लागत से 179 महतारी सदनों का निर्माण कराया जा रहा है। महिला समूहों के उत्पादों की बिक्री हेतु 200 करोड़ की लागत से नवा रायपुर में यूनिटी मॉल का निर्माण कराया जाएगा। मुख्यमंत्री की पहल पर दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना के अंतर्गत प्रदेश के 5.62 लाख भूमिहीन कृषि मजदूरों को प्रतिवर्ष 10 हजार रूपए की आर्थिक सहायता दी जा रही है।
राज्य सरकार द्वारा आवास और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रख कर अब तक 26 लाख परिवारों को प्रधानमंत्री आवास स्वीकृति किए गए हैं। स्वच्छ पेयजल सबका अधिकार है। प्रदेश के 41 लाख से अधिक घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है। गुणवत्तापूर्ण जलापूर्ति के लिए राज्य में 77 जल परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित की गई है। 70 समूह जल प्रदाय योजनाओं से प्रदेश के 3208 गांव लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अलावा राज्य के शत्-प्रतिशत गांवों का विद्युतीकरण किया जा रहा है।
डबल इंजन की सरकार में रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना के साथ रेल नेटवर्क मैप से बस्तर जुड़ रहा है। जगदलपुर-विशाखापट्नम और रायपुर-विशाखापट्नम नई सडक़ परियोजनाओं से विकास की नई राहें खुल रही है। प्रदेश के 32 नगरीय निकायों में नॉलेज बेस्ड सोसाइटी हेतु लाइट हाउस निर्माण की पहल की जा रही है।
-रजनीश कुमार
भारत की विदेश नीति में कुछ साल पहले तक बिना अवामी लीग के चुनाव और बीएनपी के सत्ता में आने को किसी बड़े झटके के रूप में देखा जाता था।
अब भारत तारिक़ रहमान और उनकी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सत्ता में आने पर स्वागत करने में कोई कसर नहीं छोड़ता दिख रहा है।
बिना अवामी लीग के बांग्लादेश में चुनाव पर भी भारत ने ‘आपत्ति’ नहीं जताई।
साथ ही अवामी लीग का खुलकर समर्थन भी भारत नहीं कर रहा। तो क्या इसका ये संदेश जाता है कि बांग्लादेश में जुलाई 2024 में हुए सियासी विद्रोह के दौरान भारत ने जो रुख़ अपनाया था, वो रणनीतिक रूप से ठीक नहीं था?
बात केवल बीएनपी की ही नहीं है। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीक़ुर रहमान से भी मिल रहे हैं और इस मुलाक़ात की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर पोस्ट की जा रही हैं।
जमात से मिलने की सार्वजनिक सूचना देना एक अहम टर्न है।
बांग्लादेश में 12 फऱवरी को हुए आम चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को जीत मिली तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फऱवरी को बधाई देने में बिल्कुल भी देरी नहीं की।
पीएम मोदी ने एक्स पर बधाई संदेश पोस्ट करने के बाद तारिक़ रहमान को फोन किया और बातचीत की। तारिक़ रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला गए और पीएम मोदी ने एक पत्र लिखकर बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री को भारत आमंत्रित भी किया।
लेकिन तारिक़ रहमान ने न्योता स्वीकार किया या नहीं अभी तक कुछ बताया नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी के इस रुख़ से स्पष्ट है कि भारत तारिक़ रहमान को लेकर गर्मजोशी दिखा रहा है और अंतरिम सरकार के दौरान तनातनी वाले संबंधों से बाहर निकलना चाहता है।
लेकिन तारिक़ रहमान की तरफ़ से अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई गर्मजोशी देखने को नहीं मिली। एक दिन बाद बीएनपी के आधिकारिक एक्स अकाउंट से पीएम मोदी की पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए शुक्रिया ज़रूर कहा गया। लेकिन तारिक़ रहमान के सोशल मीडिया अकाउंट से कुछ नहीं कहा गया।
ऐसा नहीं है कि तारिक रहमान जीत के बाद सक्रिय नहीं थे। जीत के बाद भी वह ढाका में कई राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो रहे थे।
15 फरवरी को बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीक़ुर रहमान के आधिकारिक एक्स अकाउंट से एक पोस्ट की गई। इस पोस्ट में बताया गया कि बीएनपी प्रमुख तारिक़ रहमान उनके आवासीय कार्यालय में मिलने आए थे।
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी बीएनपी की सहयोगी रही है लेकिन इस चुनाव में उनकी प्रतिद्वंद्वी थी। जमात-ए-इस्लामी को कई मामलों में भारत विरोधी देखा जाता है क्योंकि इसने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम का समर्थन नहीं किया था।
बांग्लादेश पर करीबी नजऱ रखने वालों का मानना है कि तारिक़ रहमान के लिए यह आसान नहीं है कि वह जमात के विपक्ष में रहते हुए भारत के साथ संबंधों में ऐसा इंप्रेशन दें कि बीएनपी की सरकार भारत के हितों के लिए काम कर रही है।
निरुपमा सुब्रमण्यम दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नजऱ रखती हैं। बीबीसी हिन्दी ने उनसे पूछा कि भारत जितना खुलकर तारिक़ रहमान का स्वागत कर रहा है, उसे वह हाथों-हाथ क्यों नहीं ले रहे हैं?
निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ‘तारिक़ रहमान और भारत के बीच का अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है। 2001 से 2006 तक जब ख़ालिदा जिय़ा बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं तब बांग्लादेश में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त ने मुझसे कहा था कि तारिक़ रहमान वहाँ के संजय गांधी थे। लेकिन भारत के पास अब तारिक़ से बेहतर विकल्प नहीं है। भारत ने पहले कहा था कि वह चुनी हुई सरकार से बात करेगी और अब वहां के लोगों ने जनादेश दे दिया है। ऐसे में भारत स्वागत ही कर सकता था।’
जमात की चुनौती
दरअसल, बांग्लादेश की राजनीति से शेख़ हसीना की अवामी लीग के बाहर होने के बाद बीएनपी को एक मध्यमार्गी पार्टी के रूप में देखा जा रहा है। बीएनपी जमात नहीं हो सकती है क्योंकि बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में तारिक़ रहमान के पिता जिय़ा-उर रहमान भी शामिल थे। बीएनपी जमात की तरह मुक्ति संग्राम को ख़ारिज नहीं करती है।
शेख हसीना के उलट बीएनपी मुक्ति संग्राम और इस्लाम दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलने की कोशिश करती है। लेकिन यह संतुलन जमात के विपक्ष में रहते हुए इतना आसान नहीं होगा। जमात इस्लाम की अतिवादी लाइन की ओर बढ़ेगा तो बीएनपी के लिए संतुलन बनाने में मुश्किलें होंगी।
निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ''जिय़ा-उर रहमान भी ख़ुद को मुक्ति योद्धा ही समझते थे। कई टकरावों में शेख़ मुजीब-उर रहमान और जिय़ा-उर रहमान के बीच एक अहम लड़ाई यह भी थी कि किसने सबसे पहले बांग्लादेश की मुक्ति की घोषणा की। बीएनपी और उनके समर्थकों का मानना है कि सबसे पहले इसकी घोषणा जिय़ा-उर रहमान ने की थी। इसे लेकर लेकर सिलेबस भी बदलते रहे हैं। बांग्लादेश का संस्थापक कौन है, इसे लेकर भी लड़ाई होती रही है। लेकिन दूसरी तरफ़ जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की सेना का साथ दे रही थी।’
शेख हसीना जिस तरीक़े से जमात से निपटती थीं, उस तरह से तारिक़ रहमान शायद ही निपट पाएं। जमात-ए-इस्लामी चुनावी राजनीति में इस बार काफी मजबूत बनकर उभरी है।
जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन को 77 सीटें मिली हैं। बांग्लादेश के चुनाव में भारत अहम मुद्दा था। जिन छात्रों ने शेख़ हसीना को सत्ता छोड़ भागने पर मजबूर किया, उनकी नेशनल सिटिजन पार्टी भारत के ख़िलाफ़ खुलकर बोल रही थी और जमात के साथ इनका गठबंधन था। दूसरी तरफ़ तारिक़ रहमान पूरे चुनाव में किसी भी स्तर पर भारत विरोधी नहीं दिखे।
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा कहते हैं कि जमात अगर भारत के लिए समस्या बनेगी तो बीएनपी के लिए भी बनेगी।
तारिक़ रहमान की विदेश नीति
प्रोफेसर लामा कहते हैं, ‘जमात जिस हद तक खतरा भारत के लिए बनेगी, उतना ही बीएनपी के लिए भी बनेगी। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि बांग्लादेश में अब कोई तीसरी पार्टी नहीं है। बीएनपी और जमात दोनों एक-दूसरे के खिलाफ एक झटके में नहीं हो सकती हैं। जमात और बीएनपी दोनों ने मिलकर शेख़ हसीना को हटाया है। जमात और बीएनपी दोनों आमने-सामने होंगी लेकिन इसमें अभी वक़्त लगेगा।’
प्रोफेसर लामा कहते हैं कि थोड़ा इंतज़ार कीजिए अवामी लीग भी बीएनपी को समर्थन करेगी।
अपनी जीत के बाद 15 फऱवरी को तारिक़ रहमान ने पहली प्रेस कॉन्फ्ऱेंस की थी। इस प्रेस कॉन्फ्ऱेंस में रहमान से भारत के साथ संबंधों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''हमने विदेश नीति के संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है, जो बांग्लादेश के हित में है और बांग्लादेशी लोगों का हित सबसे पहले आता है। बांग्लादेश और बांग्लादेश के लोगों के हितों की रक्षा करते हुए, हम अपनी विदेश नीति तय करेंगे।"
चीन और पाकिस्तान सहित अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ संबंधों पर सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता बांग्लादेश के हितों की रक्षा करना होगी।
तारिक़ रहमान ने कहा था, ‘अगर कोई बात बांग्लादेश के हित में नहीं होगी तो स्वाभाविक रूप से हम उस पर नहीं चल सकते। मुझे पूरा विश्वास है कि पारस्परिक हित ही हमारी पहली प्राथमिकता होगी।’
यानी तारिक़ रहमान भारत को लेकर कुछ भी खुलकर बोलने से परहेज़ कर रहे हैं। गंगा वाटर ट्रीटी के 30 साल इसी साल पूरे हो रहे हैं और इसे फिर से आगे बढ़ाने के लिए नई संधि करनी होगी।
बीएनपी इस संधि को भारत की तरफ़ झुका हुआ बताती रही है और विरोध भी किया था। लेकिन सरकार में रहते हुए बीएनपी ने इसे कभी रद्द नहीं किया। अब बीएनपी को ही इसे नए सिरे से करना है। बीएनपी मानती है कि शेख़ हसीना की सरकार में भारत के साथ हुईं कई संधियां एकतरफ़ा थीं और इनकी समीक्षा होनी चाहिए।
अध्ययन बताता है 2099 में अकेले अफ्रीका में 17 करोड़ लोग खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं
सारांश
भारी उत्सर्जन जारी रहा तो 2100 तक लगभग 1.16 अरब लोग कम से कम एक बार गंभीर खाद्य संकट झेलेंगे।
अध्ययन के अनुसार 60 करोड़ से अधिक बच्चे पांच साल की आयु से पहले खाद्य असुरक्षा का अनुभव कर सकते हैं।
साल 2099 में अकेले अफ्रीका में लगभग 17 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी और खाद्य संकट के जोखिम में होंगे।
टिकाऊ विकास और उत्सर्जन कटौती से 2100 तक करीब 78 करोड़ लोगों को खाद्य संकट से बचाया जा सकता है।
आक्रामक डिकार्बोनाइजेशन से 2090-2100 के दौरान वार्षिक औसत प्रभावित आबादी 8.9 करोड़ से घटकर 4.2 करोड़ हो सकती है।
साल 2025 में दुनिया भर में 29.5 करोड़ से अधिक लोगों ने भूख और भुखमरी का सामना किया। इसके पीछे युद्ध, विस्थापन, आर्थिक संकट और जलवायु परिवर्तन जैसे कारण रहे। लेकिन आने वाले समय की तस्वीर इससे भी अधिक चिंताजनक है। नए शोध के अनुसार, यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो साल 2100 तक एक अरब से अधिक लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं।
यह आंकड़ा केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को भी शामिल करता है, जो इस सदी के अंत तक कम से कम एक बार गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगे।
कैसे किया गया शोध ?
साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित यह यह अध्ययन एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मॉडल की मदद से किया गया। इस मॉडल को खाद्य असुरक्षा के ऐतिहासिक आंकड़ों से प्रशिक्षित किया गया, जो अकाल पूर्व चेतावनी प्रणाली नेटवर्क से हासिल हुए।
जलवायु से संबंधित जानकारी के लिए मासिक तापमान के आंकड़े राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय संचालन से लिए गए। वहीं बारिश के आंकड़े क्लाइमेट हजार्डस सेंटर से प्राप्त किए गए।
इस मॉडल ने तापमान और बारिश में बदलाव को खाद्य संकट से जोड़कर भविष्य का अनुमान लगाया। आमतौर पर ऐसे पूर्वानुमानों में आय, कीमतों और सरकारी नीतियों जैसे सामाजिक-आर्थिक कारकों को भी शामिल किया जाता है, लेकिन इस शोध में मुख्य ध्यान जलवायु परिवर्तन के सीधे प्रभाव पर रखा गया।
भयावह आंकड़े
शोध से पता चला कि यदि दुनिया ने उच्च स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रखा, तो साल 2100 तक लगभग 1.16 अरब लोग कम से कम एक बार गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं।
इनमें 60 करोड़ से अधिक बच्चे शामिल होंगे। अनुमान है कि 20 करोड़ से अधिक नवजात शिशु अपने जीवन के पहले साल में ही खाद्य संकट के जोखिम में होंगे। यह स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि जिन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे अधिक होगा, वहीं जनसंख्या वृद्धि भी तेजी से हो रही है।
अफ्रीका पर सबसे अधिक असर
अध्ययन के अनुसार अफ्रीका सबसे अधिक प्रभावित होगा। साल 2099 में ही लगभग 17 करोड़ लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं। यह संख्या इटली, फ्रांस और स्पेन की वर्तमान संयुक्त आबादी के बराबर है।
अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र और साहेल जैसे इलाके विशेष रूप से संकटग्रस्त माने गए हैं। इन क्षेत्रों में सूखा, अनियमित बारिश और बढ़ता तापमान खेती और पशुपालन को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, यहां पहले से ही गरीबी और संघर्ष जैसी समस्याएं मौजूद हैं, जो स्थिति को और जटिल बनाती हैं।
हालांकि एक सकारात्मक पहलू भी है। यदि अफ्रीकी देश संघर्ष कम करें और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ें, तो 2050 के बाद खाद्य संकट का खतरा तेजी से घट सकता है।
क्या स्थिति सुधर सकती है?
शोध यह भी बताता है कि यदि दुनिया ने समय रहते कदम उठाए, तो हालात बदले जा सकते हैं। यदि देश जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करें, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दें और टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ें, तो 2100 तक लगभग 78 करोड़ लोगों को खाद्य संकट से बचाया जा सकता है।
इतना ही नहीं, यदि सरकारें आक्रामक रूप से कार्बन उत्सर्जन घटाएं, तो हर साल खाद्य संकट का सामना करने वाले लोगों की संख्या आधी से भी कम हो सकती है। यह स्पष्ट करता है कि नीति संबंधी निर्णय भविष्य तय करते हैं।
केवल अधिक भोजन उगाना समाधान नहीं
खाद्य सुरक्षा केवल अधिक अनाज उत्पादन से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। जरूरी है कि खाद्य प्रणाली ऐसी हो जो बाढ़, सूखा या अन्य जलवायु आपदाओं के दौरान भी काम करती रहे।
इसके लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत कृषि व्यवस्था, जल संरक्षण, विविध फसलों की खेती और समुदाय की भागीदारी आवश्यक है। यदि समाज के सभी वर्ग खाद्य उत्पादन और वितरण प्रणाली में शामिल हों, तो संकट के समय भी स्थिरता बनी रह सकती है।
आगे क्या करना होगा?
जलवायु परिवर्तन खाद्य संकट का जोखिम बढ़ाता है, लेकिन यह तय करना हमारे हाथ में है कि यह जोखिम वास्तविक आपदा बने या नहीं। सरकारों, उद्योगों और समाज को मिलकर कार्बन उत्सर्जन घटाने, स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और शांति व समानता को बढ़ावा देने की दिशा में काम करना होगा।
यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाते, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। लेकिन यदि हम आज जिम्मेदारी से कार्य करें, तो करोड़ों लोगों को भूख और कुपोषण से बचाया जा सकता है।
अंततः यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य का प्रश्न है। आज लिए गए निर्णय ही तय करेंगे कि 2100 की दुनिया भूख से जूझ रही होगी या सुरक्षित और स्थिर होगी।
एक औसत भारतीय परिवार की सालाना आय है दो से पांच लाख रुपये। परिवार में किसी को कैंसर हो जाए तो इलाज में 10 से 30 लाख रुपये तक लग सकते हैं। 60 से 70 फीसदी मरीज आर्थिक स्थिति बिगडऩे की वजह से इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं।
डॉयचे वैले पर रामांशी मिश्रा की रिपोर्ट –
कैंसर-यह नाम सुनकर एक आम व्यक्ति को जितना डर लगता है उतना ही ज्यादा उनका परिवार इसके खर्चों को लेकर परेशान होता है। भारत में आज भी इसके इलाज में एक आम इंसान की सारी जमा पूंजी खत्म हो जाती है लेकिन कई बार तब भी रोग ठीक नहीं हो पाता।
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यूनियन बजट 2026-27 में कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली 17 आयातित दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी माफ कर दी है। इसकी वजह से यह दवाएं अब भारत में सस्ती मिलेंगी। बजट में आयातित दवाइयों पर 10 फीसदी की इंपोर्ट ड्यूटी हटा दी गई है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर किसी एक दवा की कीमत दो से तीन लाख रुपए प्रति माह है तो उस पर 25,000 से 30,000 रुपए की इंपोर्ट ड्यूटी लगती थी। अब यह ड्यूटी हटा दी गई है जिससे दवा 30 हजार रुपए तक सस्ती हो जाएगी।
कौन सी दवाएं हुईं सस्ती
कस्टम ड्यूटी से छूट मिली हुई कैंसर की 17 दवाएं मुख्य रूप से एडवांस्ड कैंसर थेरेपी के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं। इन दवाओं का उपयोग स्तन कैंसर के इलाज के दौरान टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, ब्लड कैंसर के लिए ष्ट्रक्र-ञ्ज सेल थेरेपी, और फेफड़ों के कैंसर के लिए टायरोसिन किनेज इनहिबिटर्स समेत प्रोस्टेट कैंसर, सॉलिड ट्यूमर, लिम्फोमा और मेलानोमा जैसे कई प्रकारों में इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
कैंसर विशेषज्ञ कहते हैं कि यह दवाईयां ज्यादातर मेटास्टैटिक यानी एडवांस्ड कैंसर स्टेज के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं। इस स्तर पर कीमोथेरेपी से मरीजों को उतना फायदा नहीं मिल पाता और इस स्थिति तक आते-आते मरीज इलाज पर काफी खर्च कर चुका होता है। ऐसे में कीमत कम होने से मरीजों को सबसे अधिक फायदा होगा क्योंकि आयात शुल्क हटाने से इन दवाओं का रिटेल प्राइस कम होगा। इससे लंबे इलाज के दौरान मरीजों पर पड़ा आर्थिक बोझ हल्का होगा और एडवांस्ड थेरेपी में मरीजों को मदद मिलेगी। हालांकि, इसके बावजूद कैंसर के कुल इलाज का खर्च अभी भी काफी अधिक है।
कितना महंगा है कैंसर का इलाज
उत्तराखंड में हिमालय अस्पताल देहरादून में बतौर प्रोफेसर कार्यरत डॉ एस के वर्मा कैंसर के मरीजों का इलाज भी करते हैं। डॉ. वर्मा बताते हैं कि सरकारी व्यवस्था में कई ऐसी योजनाएं हैं जिनसे कैंसर के मरीजों को निशुल्क इलाज मिल जाता है। वर्तमान में स्तन कैंसर भारत में सबसे ज्यादा होने वाली कैंसर की किस्मों में से एक है। सरकार ने उससे जुड़ी ज्यादातर दवाओं को बेहद कम दामों पर उपलब्ध करवाना शुरू किया है। हालांकि कई ऐसे मॉलिक्यूल होते हैं जो एडवांस ट्रीटमेंट जैसे कि इम्यूनोथेरेपी आदि में काम आते हैं, उस पर योजना लागू नहीं हो पाती।
कैंसर के मरीजों की सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ज्यादातर मरीज रोग के गंभीर होने के बाद ही अस्पताल पहुंचते हैं। डॉ वर्मा बताते हैं कि अक्सर लक्षण नहीं दिखाने पर या दर्द न होने के कारण मरीजों को बीमारी का पता नहीं चल पाता और जब तक वह अस्पताल पहुंचते हैं तब तक कैंसर एडवांस स्टेज पर पहुंच चुका होता है। इसके बाद उन्हें सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।
इससे परे कुछ ऐसे भी मरीज होते हैं जो आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के दायरे से बाहर होते हैं। उनके लिए कैंसर के इलाज की प्रक्रिया काफी संघर्ष भरी होती है। डॉ वर्मा बताते हैं, ‘भले ही अस्पताल के अंदर इलाज की प्रक्रिया सस्ती हो गई हो पर इसके बावजूद कैंसर के मरीजों के लिए संघर्ष इतनी जल्दी खत्म नहीं होते। घर से अस्पताल तक आने का खर्च, तीमारदार के मरीज के साथ रहने और खाने-पीने का खर्च समेत कई ऐसी लागत भी होती है जिनकी गिनती नहीं हो पाती, लेकिन वह आर्थिक बोझ का हिस्सा जरूर बनते जाते हैं।’
फार्मा रिसर्च में सरकार के योगदान की जरूरत
एक औसत भारतीय परिवार की सालाना आय दो से पांच लाख रुपए तक होती है जबकि इस परिवार में यदि किसी को कैंसर हो जाए तो उसके इलाज का खर्च 10 से 30 लाख रुपए तक आ सकता है। आंकड़े कहते हैं कि 60 से 70 फीसदी मरीज आर्थिक स्थिति बिगडऩे के वजह से इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं। 50 फीसदी से अधिक कैंसर के मरीज तो आर्थिक तंगी की वजह से गरीबी रेखा से भी नीचे चले जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र की बात की जाए तो 80 प्रतिशत परिवार इलाज के लिए साहूकारों से या तो कर्ज लेते हैं या फिर उन्हें अपनी संपत्ति को बेचना पड़ता है।
भारत में कैंसर के मरीजों के आंकड़ों की बात की जाए तो 2022 में 14.6 लाख नए मामले सामने आए थे। सालाना 8 लाख लोगों की कैंसर की वजह से मौत हो जाती है। यह विश्व में कैंसर से मरने वालों की कुल तादाद का करीब एक चौथाई हिस्सा है। एक अनुमान में बताया गया है कि 2026 में कैंसर के नए मरीजों की संख्या 20 लाख से भी अधिक हो सकती है। अनुमान है कि 2045 तक यह आंकड़ा 67 फीसदी तक बढ़ सकता है यानी सालाना लगभग 24 लाख नए मामले सामने आ सकते हैं। भारत में मुख्य रूप से ब्रेस्ट कैंसर, ओरल कैंसर, लंग कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के मामले देखने को मिलते हैं।
डॉ. रूद्र प्रसाद आचार्य दिल्ली के द्वारका स्थित वेंकटेश्वरा अस्पताल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी और रोबोटिक्स ऑन्कोसर्जरी विभाग के निदेशक हैं। (बाकी पेज 5 पर)
वह कहते हैं, ‘कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए सबसे ज्यादा खर्च रिसर्च और डेवलपमेंट में होता है किसी भी मॉलिक्यूल का इलाज में क्या योगदान होगा इस पर वर्षों तक शोध चलता है और उसे शोध के सफल होने के बाद इस अनुसंधान में खर्च हुई लागत को दवाइयों में जोड़ा जाता है। यही कारण है की गंभीर बीमारियों की दवाइयां महंगी होती हैं।’
फार्माकोलॉजी सेक्टर में हर बीमारी को लेकर कोई न कोई अनुसंधान चल रहा है। उसकी दवाइयां तैयार हो रही हैं। डॉ। रूद्र प्रसाद आचार्य का कहना है कि सरकार फार्मोकोलॉजी सेक्टर में रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए बजट जारी नहीं करती और इसी वजह से इसका खामियाजा मरीज को भुगतना पड़ता है। उनकी दवाइयां महंगी होती हैं। अगर सरकार फार्माकोलॉजी सेक्टर के अनुसंधान पर भी बजट जारी करे तो जाहिर तौर पर दवाइयां काफी हद तक सस्ती हो सकती हैं।
मनोरंजन के बहाने आतंकवाद का पाठ पढ़ रहे हैं बाल-गोपाल
-प्रमोद भार्गव
अमेरिकी दैनिक न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर के अनुसार माइनक्राफ्ट और रोबलॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो खेल किशोर और बालकों को आतंकी बनाने का मानवता विरोधी काम कर रहे हैं। अतएव आपके लाड़ले को यदि मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई है तो होशियार हो जाइए, क्योंकि अब बच्चों को इन खेलों के जरिए आंतकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है। इन प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है। जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएं।इस सच्चाई को उजागर करने का काम यूनाइटेड नेशंस की काउंटर-टेररिज्म कमेटी ने किया है। इसके अनुसार यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं। 2021 की तुलना में यह आंकड़ा तीन गुना अधिक है। नीदरलैंड के हेग स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म के अनुसार यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों में हुई जांचों में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं। अनेक ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिए कट्टरपंथी संगठन तेजी से किशोर और बालकों को आतंकी बनाने का खेल खेल रहे हैं। ये प्रशिक्षित बच्चे इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। हालांकि भारत में आतंक फैलाने की दृष्टि से बच्चों और किशोरों को आतंकी बनाने का काम पाकिस्तानी सेना अर्से से कर रही है। मुंबई के 26/11/2008 के आतंकी हमले में शामिल अजमल कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है।
इस सच्चाई का खुलासा संयुक्त राष्ट्र भी कर चुका है। पाकिस्तान के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली‘ अखबार में पहले ही यह मुद्दा उठा दिया था कि ‘कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं। हमने इस धंधे को व्यापार का जरिया बना लिया है। वह भी अपनी ही कौम के किशोर एवं युवाओं के जीवन को दांव पर लगाने का खेल खेलते हुए!‘
पूरी दुनिया में इस समय डिजिटल खेलों का कारोबार बढ़ रहा है। इस कारण दुनिया इनके निर्माण और निर्यात में दिलचस्पी ले रही है। नतीजतन इसका रूप दैत्याकार होता जा रहा है। फिलहाल विश्व में लोकप्रिय डिजिटल खेलों में मोबाइल प्रीमियर लीग (एमपीएल), फेंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफार्म, माइनक्राफ्ट, रोबलॉक्स, ड्रीम-11, कोरियन लवर गेम और लूडो किंग हैं। ये सभी खेल भारत समेत लगभग सभी देशों में उपलब्ध हैं। भारत से संचालित होने वाली खेल कंपनियों में चीन सहित कई देशों की कंपनियों की पूंजी लगी हुई है। इन खेलों के अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील और स्पेन बड़े खिलाड़ी हैं। हाल ही में गजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या करने का मामला सामने आया हुआ है। इन बहनों ने ऑनलाइन टास्क बेस्ड कोरियन लवर गेम खेलने की लत लग गई थी।इसी आत्मघाती खेल को खेलते हुए इन बहनों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली थी। इस घटना से साफ होता है कि ये खेल कितने खतरनाक है।
कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के बढ़ते चलन के चलते दुनिया के विद्यार्थियों की मु_ी में एनरॉयड मोबाइल जरूरी हो गया था। मनोविज्ञनी और समाजशास्त्री इसके बढ़ते चलन पर निरंतर चिंता प्रकट कर रहे हैं। पालक बच्चों में खेल देखने की बढ़ती लत और उनके स्वभाव में आते परिवर्तन से चिंतित व परेशान हैं। पालक बच्चों को मनोचिकित्सकों से उपचार कराने के बावजूद लत से मुक्ति दिलाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। दरअसल बच्चों का मोबाइल या टेबलैट की स्क्रीन पर बढ़ता समय आंखों की दृष्टि को खराब कर रहा है। साथ ही अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों की गिरफ्त में भी बच्चे आ रहे हैं। पोर्न फिल्में भी देखते बच्चे पाए गए हैं। अब ऐसे वीडियो खेल भी आभासी दुनिया के लिए बनाए जाने लगे हैं, जहां खिलाड़ी आतंकी हमलों और गोलीबारी की घटनाओं को दोहरा सकते हैं। 2019 में न्यूजीलैंड की चर्च और मस्जिदों पर हुए हमलों को भी खेलों का हिस्सा बनाया जा रहा है। ये उपाय बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी बनाए जाने की दृष्टि से किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में किशोर और युवाओं को लुभाने के लिए एक्टिव क्लब्स नाम के समूह बनाए जा रहे हैं। ये ऐसे समूह हैं, जो खेलते हुए नस्लीय युद्ध की तैयारी में जुट जाते हैं और नस्लीय भावना से लड़ते दिखाई देते हैं। 27 देशों में फैले इन क्लबों द्वारा 15 से 17 साल के नादान किशोरों को लक्षित किया जा रहा है। इन्हें देखते हुए किशोर अपनी गोरी या काली पहचान से जुडक़र नस्लवादी मानसिकता की गिरफ्त में आकर आतंकी बनने की दिशा में अनायास मुड़ जाते हैं।
-नासिरुद्दीन
बहुत मुश्किल है, खुद के साथ हुई यौन हिंसा के बारे में बोलना। यह तब और मुश्किल हो जाता है, जब मुलजिम हर तरह से ताकतवर कोई मर्द हो।
मगर मुश्किलों और ख़तरों के बाद भी ताकतवारों के खिलाफ बोलना कितना जरूरी है, यह बार-बार सामने आता है। कई बार आवाज उठाने में काफी वक्त भी लगता है।
ऐसी कई मिसालें अपने देश में भी मिल जाएँगी। आवाज़ उठाने में देरी का यह मतलब कतई नहीं होता कि कोई जुर्म हुआ ही नहीं है।
हाँ, इन सबके दौरान बोलने वाली बहादुर स्त्रियों को जो झेलना पड़ता है, वह बेहद तकलीफ़देह होता है। उनकी नीयत, चरित्र और चुप्पी पर सवाल उठाए जाते हैं।
ताकत किसी चीज़ की हो सकती है। पैसा, रसूख, सत्ता, पद और जब मर्द के पास ये सब ताक़त होती है तो कई इनका बेख़ौफ इस्तेमाल यौन उत्पीडऩ और हिंसा के लिए करते हैं।
यौन अपराधी जेफऱी एपस्टीन और उसके दोस्तों की मंडली की भी कहानी कुछ ऐसी ही है।
इसी वजह से कुछ वक्त से जेफऱी एपस्टीन और उसके दोस्त- मददगार लगातार सुर्खिय़ों में बने हैं। यह यौन अपराधी कौन था या उसके दोस्त कौन हैं, इनके बारे में काफ़ी कुछ जानकारी सामने आ चुकी है।
उसके दोस्तों में पढ़ाने वाले, लेखक, कलाकार, बिजनेसपर्सन, कम्प्यूटर दिग्गज, राजनेता, नौकरशाह, अफसर। सब शामिल हैं। इसकी आँच भारत तक भी पहुँची है।
इस हंगामे के बीच, यह भी बार-बार कहा जा रहा है कि एपस्टीन फ़ाइल में नाम आना, इस बात का सुबूत नहीं है कि वह शख्स यौन शोषक या उत्पीडक़ है। सही बात है। वैसे तो ‘यौन शोषक’और ‘उत्पीडक़’ भी तब तक मुजरिम नहीं है, जब तक कानून उन्हें दोषी न ठहराए।
इसलिए ज़रूरी है क?ि एपस्टीन केस के बारे में थोड़ी जानकारी यहाँ साझा की जाए।
20 साल पहले लगा था आरोप
बात आज से लगभग 20 साल पहले साल 2005 में शुरू होती है। चौदह साल की एक लडक़ी के माँ-बाप ने इल्जाम लगाया कि जेफरी एपस्टीन ने अपने घर में उनकी बेटी पर यौन हिंसा की।
यही नहीं, एपस्टीन के घर की तलाशी के दौरान कई और लड़कियों की तस्वीरें भी मिलीं।
इसके बाद साल 2008 में एपस्टीन को यौन अपराध के लिए दोषी ठहराया गया। उसे 18 महीने की सजा हुई।
लेकि न उसे 12 घंटे के लिए बाहर जाने और काम करने की इजाजत भी मिल गई। लगभग 13 महीने तक ऐसी सजा काटने के बाद उसे रिहा कर दिया गया।
सजा के साथ ही एपस्टीन का नाम साल 2008 में ही न्यूयॉर्क के यौन उत्पीडक़ों के रजिस्टर में जिंदगी भर के लिए दर्ज कर लिया गया। यौन अपराध के मामले में यह एक अहम रजिस्टर है।
इसमें जिनका नाम दर्ज होता है, उन पर कई तरह की पाबंदी और निगरानी होती है।
लेकिन इन सबके पहले उसके वकीलों ने कम सजा और ज़्यादा बचाव का तरीका निकाला। सरकारी वकीलों के साथ समझौता हुआ। इस समझौते की शर्तों ने जाँच का दायरा सीमित कर दिया।
यानी आगे इसकी जाँच नहीं होगी कि इस मामले में यौन हिंसा की पीडि़त और भी लड़कियाँ हैं या नहीं। या एपस्टीन के साथ-साथ और कौन-कौन लोग इस अपराध में शामिल थे।
इसलिए उस वक््त पता भी नहीं चल पाया कि इस जुर्म में उसके साथ और कौन-कौन शामिल थे। यही नहीं, इस समझौते की जानकारी एपस्टीन के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को नहीं दी गई।
रसूख़दारों को बचाने के आरोप
आपराधिक न्याय प्रक्रिया को ताकतवर मर्द अपने हक में कैसे इस्तेमाल करते हैं, एपस्टीन केस इसका नमूना है। कई बार पूरा तंत्र ही उन्हें बचाने में लग जाता है।
भारत में भी यौन उत्पीडऩ या अपराध के किसी ताकतवर मुलजिम के मामले में ऐसे एक नहीं बल्कि अनेक उदाहरण आसानी से मिल जाते हैं। आज भी आरोप लग रहे हैं कि एपस्टीन के साथ शामिल ताक़तवर मर्दों को बचाया जा रहा है।
बहरहाल, एपस्टीन के यौन उत्पीडऩ से जुड़ी चर्चाओं ने तब गति पकड़ ली जब ‘मियामी हेराल्ड’ की खोजी पत्रकार जूली के। ब्राउन और उनके साथियों ने इसकी तफ़्तीश करनी शुरू की।
उनकी रिपोर्ट ने एपस्टीन के ‘यौन हिंसा के जाल’ की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। रिपोर्ट के मुताबिक, जूली ब्राउन लगभग 80 सर्वाइवरों की पहचान करने में कामयाब रहीं।
इनमें लगभग 60 महलिाओं को तलाश भी लिया। आठ बात करने के लिए तैयार हुईं और सिर्फ चार अपनी पहचान के साथ बात करने के लिए राज़ी हुईं।
ताकतवर लोगों के जुल्म और ज़्यादती के खिलाफ स्त्री का बोलना कितना मुश्किल होता है, यह इससे भी पता चलता है।
रिपोर्ट के मुताबकि, वे अपने साथ हुई हिंसा पर शमर्दिंा थीं। उन्हें कहीं न कहीं इस बात का भी अहसास था कि ऐसे ताकतवर लोगों के साथ कुछ नहीं हो सकता। इन बहादुर आवाजों के सामने आने के बाद, साल 2019 में एपस्टीन की फिर गिरफ़्तारी हुई।
महीने भर बाद ही वह अपनी जेल की कोठरी में मृत मिले। अब नए सिरे से उनकी मौत की जांच को लेकर मांग उठ रही है।
यौन हिंसा से जुड़े जेफऱी एपस्टीन के केस में तीन अहम पड़ाव हैं- साल 2005, साल 2008 और साल 2019।
इन सालों में उस पर कई इल्जाम लगे। जुर्म साबित हुआ। फिर इल्जाम की लंबी फेहरिस्त सामने आई। दोबारा गिरफ्तारी हुई।
दिलचस्प है कि यह सब उस अमेरिका में हो रहा था, जिसकी ताकतवर सत्ता खुद को आधुनिक और इंसाफपसंद मानती रही है।
लेकिन आधुनिक और इंसाफ़पसंद होने का सबसे बड़ा पैमाना है, वंचित तबकों ख़ासकर स्त्रिियों के बारे में नजरिया और उनके साथ इंसाफ़ का सुलूक।
भ्रष्टाचार से लड़ने में जिन अमेरिका, स्वीडन जैसे देशों की कभी मिसाल दी जाती थी, अब वहां भी इसमें गिरावट देखी जा रही है. करप्शन परसेप्शन इंडेक्स के अनुसार, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण इन देशों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.
डॉयचे वैले पर निक मार्टिन की रिपोर्ट –
अमेरिका और स्वीडन जैसे देश जो कभी भ्रष्टाचार से लड़ने में आदर्श माने जाते थे. अब इस रवैये में गिरावट झेल रहे हैं. करप्शन परसेप्शन इंडेक्स के अनुसार, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण इन देशों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.
दुनिया के बड़े-बड़े लोकतंत्रिक देश भी धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के सामने घुटने तक रहे हैं. पिछले मंगलवार को जारी हुए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2025 करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) में पश्चिमी देशों में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नेतृत्व की कमी सामने आई है.
सीपीआई की 31वीं रिपोर्ट में 180 से ज्यादा देशों और क्षेत्रों को पब्लिक सेक्टर में भ्रष्टाचार के आधार पर रैंक किया गया है. रिपोर्ट में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे देशों के स्कोर में गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, यह देश पहले मजबूत प्रदर्शन करने वाले देशों में से थे.
2025 करप्शन इंडेक्स में पश्चिमी देशों की गिरावट
2025 इंडेक्स के अनुसार, 80 से ज्यादा स्कोर पाने वाले देशों की संख्या पिछले 10 सालों में 12 से घटकर सिर्फ पांच रह गए हैं. इन देशों को पहले अच्छी शासन व्यवस्था का मानक माना जाता था.
इस इंडेक्स में डेनमार्क ने लगातार आठवीं बार सबसे ज्यादा 89 अंक हासिल किए हैं. उसके बाद फिनलैंड (88) और सिंगापुर (84) रहे. साथ ही, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया भर में "मजबूत राजनीतिक नेतृत्व” की कमी की आलोचना की, जो कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर कर रहा है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के प्रमुख फ्रांसुआ वैलेरियन ने डीडब्ल्यू से कहा, "कई सरकारें अब भ्रष्टाचार से लड़ना अपनी प्राथमिकता नहीं मानती हैं. सरकारों को शायद यह लगने लगा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए काफी कुछ कर लिया है और अब उन्हें अन्य जरूरी चीजों पर ध्यान देना चाहिए.”
अमेरिका का भ्रष्टाचार स्कोर इतना क्यों गिर रहा है?
करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) हर देश को 0 से 100 के पैमाने पर रैंक करता है. जिसके अनुसार 0 का मतलब बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार और 100 का मतलब साफ छवि वाला देश है. इस पैमाने के अनुसार अमेरिका का स्कोर गिरकर 64 पर पहुंच गया है, जो कि अब तक का उनका सबसे कम स्कोर है. साल 2016 के मुकाबले देखे तो यह तब से दस अंक नीचे गिर चुका है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने साझा किया कि अमेरिका का राजनीतिक माहौल पिछले एक दशक से तेजी से बिगड़ा है. संस्था के अनुसार हालिया आंकड़े पूरी तरह उस बदलाव को नहीं दिखाते, जो पिछले साल डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद हुए हैं.
हालांकि, बाइडेन सरकार के दौरान अमेरिका की रैंकिंग काफी हद तक स्थिर रही थी. लेकिन रिपोर्ट में पिछले साल अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से जुड़े बड़े नैतिक घोटालों को स्कोर गिरने की बड़ी वजह बताया गया.
वैलेरियन ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम हर चीज के लिए ट्रंप को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि कुछ चिंताजनक चीजें उनके आने से पहले ही शुरू हो चुके थे.”
इसके अलावा, रिपोर्ट ने अमेरिका में इन खतरनाक प्रवृत्तियों का भी जिक्र किया. जैसे "सरकारी पद का इस्तेमाल स्वतंत्र आवाजों को दबाने के लिए करना, स्वार्थ और लेन-देन वाली राजनीति को सामान्य बनाना, प्रॉसिक्यूशन फैसलों का राजनीतिकरण करना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले कदम उठाना.” ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कहा कि यह कदम "संकेत देते हैं कि भ्रष्टाचार स्वीकार्य बनता जा रहा है.”
डॉनल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिसके लिए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने चेतावनी दी है. जिसके तहत वॉइस ऑफ अमेरिका जैसे सरकारी प्रसारकों को खत्म किया गया और सरकारी एजेंसियों का राजनीतिक विरोधियों जैसे बाइडेन प्रशासन और अन्य शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है. उन पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने और फॉरेन कर्रप्ट प्रैक्टिसेज एक्ट (एफसीपीए) के सख्त पालन को कमजोर करने के आरोप भी लगे हैं. यह कानून अमेरिकी नागरिकों और कंपनियों को विदेशी अधिकारियों को रिश्वत देने से रोकने के लिए बनाया गया था.
डीडब्ल्यू को दिए एक इंटरव्यू में वैलेरियन ने ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने कार्यकारी आदेश के जरिए एफसीपीए में बदलाव करके उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के औजार में बदल दिया. उन्होंने ट्रंप के क्रिप्टोकरेंसी (जैसे बिटकॉइन) के समर्थन की भी आलोचना की है, जिसका इस्तेमाल अक्सर मनी लॉन्ड्रिंग में किया जाता है. इसके अलावा, उन्होंने अमीर विदेशियों के लिए तेजी से नागरिकता/वीजा देने की योजना की भी आलोचना की है. जिसे आलोचक अक्सर "ट्रंप गोल्ड कार्ड” कहते हैं. वैलेरियन ने कहा, "हमारे अंतरराष्ट्रीय अनुभव के अनुसार, ऐसे वीजा कार्यक्रम भ्रष्ट लोगों को आकर्षित करते हैं और अपराधियों को भी आकर्षित कर सकते हैं.”
यूरोप में क्यों कमजोर पड़ रहा भ्रष्टाचार विरोधी अभियान?
पिछले 10 सालों में पश्चिमी देशों में भ्रष्टाचार की धारणा सबसे ज्यादा ब्रिटेन में गिरी है. ब्रिटेन का स्कोर 11 अंक गिरकर 70 पर पहुंच गया है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार, इसकी वजह मंत्रियों, सांसदों और सरकारी अधिकारियों के लिए नैतिक नियमों को ठीक से लागू न कर पाना है.
रिपोर्ट में कोविड-19 के दौरान घोटालों का भी जिक्र किया गया है, जब सत्ता के करीबी लोगों को बिना पर्याप्त जांच के पीपीई (मास्क, मेडिकल सामान) सप्लाई करने के बड़े ठेके मिल गए थे.
इसके अलावा कई अन्य पश्चिमी देशों में भी गिरावट देखी गई है. जैसे न्यूजीलैंड 9 अंक गिरकर 81, स्वीडन 8 अंक गिरकर 80, कनाडा 7 अंक गिरकर 75 पर आ गए हैं. साथ ही, जर्मनी पिछले 10 साल में 4 अंक गिरकर 77 पर आ गया है. हालांकि, यह आंकड़ा पिछले साल से दो अंक बढ़ा है. इस इंडेक्स के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में फ्रांस का स्कोर चार अंक गिरकर 66 हो गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर हुई है और अधिकारियों तथा निजी कंपनियों के बीच मिलीभगत बढ़ी है.
हालांकि, रिपोर्ट ने पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति, निकोला सारकोजी की सजा को एक सकारात्मक कदम बताया. लेकिन सरकोजी को अवैध फंड लेने का दोषी ठहराया गया था, जिसमें लीबिया के पूर्व नेता मुआम्मर गद्दाफी से मिला पैसा भी शामिल था, जिसे राष्ट्रपति चुनाव के अभियान में इस्तेमाल किया गया था. वैलेरियन ने कहा, "कई यूरोपीय देश भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में आगे थे.” लेकिन अब यूरोपीय संघ ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर कर दिया गया है. जिस कारण यूरोप की "भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ सकती है.”
कहां कमजोर पड़ रही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई?
रिपोर्ट के अनुसार, 2012 के बाद से 50 देशों की रैंकिंग में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. खास तौर पर तुर्की, हंगरी और निकारागुआ में भारी गिरावट आई है. जिसका कारण लोकतंत्र का कमजोर होना, संस्थाओं की कमजोरी, कानून का सही से लागू न होना, सत्ता के करीबी लोगों को फायदा देना और भ्रष्ट तरीके से लाभ कमाना है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने चेतावनी दी है कि भ्रष्टाचार अब संगठित अपराध (माफिया/ड्रग कार्टेल) को लैटिन अमेरिका की राजनीति में घुसने का मौका दे रहा है. यहां तक कि कोस्टा रिका और उरुग्वे, जिन्हें पहले क्षेत्र के सबसे मजबूत लोकतंत्र माना जाता था. वह अब कोलंबिया, मेक्सिको और ब्राजील जैसे देशों की तरह भ्रष्टाचार का सामना कर रहे हैं.
रिपोर्ट में कहा गया कि यह गिरावट "तेज, लंबे समय तक रहने वाली और जिसका पलटना बहुत मुश्किल हो” वाली होती हैं. चूंकि, भ्रष्टाचार राजनीति और प्रशासनिक सिस्टम में गहराई से जड़ जमा लेता है. वैलेरियन ने डीडब्ल्यू से कहा, "सत्ता जितनी ज्यादा कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित होती है, उतना ही सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है और जितनी ज्यादा सत्ता गोपनीय होती है, उसका दुरुपयोग करना उतना ही आसान हो जाता है.”
इस भ्रष्टाचार रिपोर्ट में जेफ्री एप्सटीन की हाल ही में जारी फाइल्स शामिल नहीं हैं, जो पिछले महीने ही सामने आई थी. इन फाइल्स में कई देशों के अधिकारियों पर गलत काम, भ्रष्टाचार या दोषी यौन अपराधी जेफ्री एप्सटीन से संदिग्ध संबंधों के आरोप लगे हैं.
साथ ही, संस्था ने यह भी चिंता जताई है कि कई देशों में सरकारें गैर-सरकारी संगठनों के काम में राजनीतिक हस्तक्षेप कर रही हैं, खासकर उन संगठनों के खिलाफ जो सरकार की आलोचना करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जॉर्जिया, इंडोनेशिया और पेरू में ऐसे संगठनों पर कार्रवाई और फंडिंग कटौती बढ़ी है.
कुछ देशों में तो अब स्वतंत्र पत्रकारों, नागरिक संगठनों और व्हिसलब्लोअर्स (भ्रष्टाचार उजागर करने वालों) के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना मुश्किल होता जा रहा है. साथ ही, रिपोर्ट में यूक्रेन की भ्रष्टाचार विरोधी कोशिशों की भी तारीफ की गई है. बेशक यह देश रूस के साथ युद्ध लड़ रहा है. लेकिन हाल में रक्षा क्षेत्र में सामने आए घोटाले ने उजागर किया है कि भ्रष्टाचार अभी भी एक समस्या है.
रिपोर्ट में कहा गया कि इन मामलों का सार्वजनिक रूप से सामने आना और अदालत में उजागर होना दिखाता है कि यूक्रेन का नया भ्रष्टाचार विरोधी सिस्टम सुचारू तरीके से काम कर रहा है. वैलेरियन ने कहा, "एक देश यानी यूक्रेन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का फैसला किया, जबकि रूस ने इसके उलट रास्ता चुना है.” उन्होंने बताया कि रूस ने भ्रष्टाचार रोकने और सजा देने वाले कई कानून खत्म कर दिए हैं. करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में रूस का स्कोर 22 है और वह नीचे के देशों में बना हुआ है. जबकि, यूक्रेन का स्कोर 36 है, जो पिछले 10 सालों में सात अंक बढ़ा है.
सबसे ज्यादा भ्रष्ट देशों की स्थिति कैसी है?
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, तानाशाही वाले देशों जैसे वेनेजुएला और अजरबैजान में भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा है, क्योंकि "वहां हर स्तर पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है.”
नए भ्रष्टाचार इंडेक्स में दुनिया के दो-तिहाई से ज्यादा देशों का स्कोर 50 से नीचे रहा है. इसका मतलब है कि "दुनिया के अधिकांश हिस्सों में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है.”
रिपोर्ट में कहा गया कि जिन देशों का स्कोर 25 से कम है. वह आमतौर पर युद्ध, हिंसा या सख्त दमनकारी शासन से प्रभावित हैं. इसमें 13 अंक के साथ लीबिया, यमन, इरिट्रिया देश हैं. साथ ही, सोमालिया और साउथ सूडान जैसे देश 9 अंक के साथ शामिल हैं.
हालांकि, रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बातें भी कही गई हैं. कुछ देश जैसे अल्बानिया, अंगोला, द आइवरी कोस्ट, लाओस, सेनेगल, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है. इसके अलावा, उच्च अंक पाने वाले एस्टोनिया, दक्षिण कोरिया, भूटान और सेशेल्स जैसे देशों ने लंबे समय में अच्छा प्रदर्शन किया है.
असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले से ही बांग्लाभाषी मुसलमानों के खिलाफ मुहिम चलाते रहे हैं. लेकिन हाल ही में असम बीजेपी के सोशल मीडिया पर पोस्ट हुए एक वीडियो पर विवाद बढ़ने के बाद अब पुलिस ने शिकायत दर्ज की है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –
असम प्रदेश बीजेपी ने बीते सप्ताह अपने एक्स हैंडल से मुख्यमंत्री का एक वीडियो जारी किया था. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से बनाए गए उस वीडियो में उनको राइफल से मुस्लिम पहचान से जुड़े टोपी और दाढ़ी वाले लोगों पर बेहद करीब से निशाना साधते दिखाया गया था. उसमें 'विदेशी-मुक्त असम' और 'बांग्लादेशियों को कोई माफी नहीं' जैसे कैप्शन भी लगाए गए थे. वीडियो में मुख्यमंत्री के निशाने पर रहे लोगों में से एक चेहरा राज्य के कांग्रेस सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पुत्र गौरव गोगोई से मिलता-जुलता बताया जा रहा है.
लेकिन यह वीडियो सामने आते ही विवाद तेज हो गया. कांग्रेस ने इसे बेहद भड़काऊ और नरसंहार भड़काने का प्रयास बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. सीपीएम और सीपीआई ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है.
विवाद बढ़ने के बाद बीजेपी ने वीडियो को डिलीट करते हुए सफाई दी है कि समुचित जांच के बिना ही उसे अनधिकृत रूप से जारी किया गया था. प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने पत्रकारों से कहा, "बिना समुचित मंजूरी के अपरिपक्व तरीके से काम करने के लिए एक सह-संयोजक को हटा दिया गया है."
मुख्यमंत्री की सफाई: बांग्लादेश से अवैध रूप से आने वाले यानी मिया मुसलमानों के खिलाफ हैं, असमिया मुसलमानों के खिलाफ नहीं
दिलचस्प बात यह है कि बीते साल अगस्त में ही सैकिया ने पार्टी का सोशल मीडिया सेल के प्रबंधन के लिए चार लोगों को सह-संयोजक बनाया था. सैकिया डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पार्टी असम में वाले अवैध अप्रवासी बांग्लादेशियों को लेकर चिंतित है. समाज में इनके खिलाफ आंदोलन जरूरी है. लेकिन पार्टी लेकिन पार्टी दुर्भावनापूर्ण तरीके से मुसलमानों को गोलियों से निशाना बनाने के विचार का समर्थन नहीं करती. संज्ञान में आते ही उस वीडियो को हटा दिया गया."
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ने भी अपनी सफाई में कहा है कि वो बांग्लादेश से अवैध रूप से राज्य में आने वाले यानी मिया मुसलमानों के खिलाफ हैं, असमिया मुसलमानों के खिलाफ नहीं. सरमा ने गुवाहाटी में पत्रकारों को बताया, "वीडियो के खिलाफ कांग्रेस की शिकायत पर दिसपुर थाने में एक मामला दर्ज किया गया है. बीजेपी के एक कार्यकर्ता ने भी ऐसी ही शिकायत दर्ज कराई है."
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यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि असम में 'मिया' शब्द का इस्तेमाल बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए किया जाता है. मिया को अपमानजनक माना जाता है. उन पर अवैध रूप से बांग्लादेश से आकर राज्य में बसने के आरोप लगाए जाते रहे हैं.
सीएम बिस्वा सरमा के सोशल मीडिया पोस्ट पर पहले भी हुए हैं विवाद
असम में प्रदेश बीजेपी के एक्स हैंडल से पोस्ट कंटेंट पर विवाद का यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले बीते साल सितंबर में एआई से बना एक और वीडियो पोस्ट किया गया था जिसका शीर्षक था बीजेपी के बिना असम. उसमें मुसलमान समुदाय के लोगों को पारंपरिक पोशाक और महिलाओं को बुर्के में राज्य के विभिन्न इलाकों में दिखाया गया था. वीडियो में ऐसे कुछ लोग सीमा पर लगी कंटीले तारों की बाड़ के करीब से गुजरते नजर आते हैं. उसी समय वीडियो पर कैप्शन लिखा आता है अवैध अप्रवासी. उसका मकसद यह दिखाना था कि बीजेपी के सत्ता में नहीं रहने की स्थिति में असम पर घुसपैठियों का कब्जा हो जाएगा. करीब एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के आधार पर असम बीजेपी और एक्स से उस वीडियो को हटाने का निर्देश दिया था.
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मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मुख्यमंत्री हिमंता सरमा के विवादास्पद बयानों का सिलसिला काफी लंबा है. वोमा इससे पहले मुस्लिम समुदाय पर बाढ़ जिहाद और खाद जिहाद के आरोप भी लगा चुके हैं. उसके बाद राज्य में मतदाता सूची का विशेष संशोधन शुरू होने पर उन्होंने दावा किया था कि सूची से चार से पांच लाख मिया वोटरों के नाम कट जाएंगे. हालांकि अंतिम सूची में 2.4 लाख नाम ही कटे हैं. उन्होंने लोगों से मिया समुदाय को परेशान करने की अपील करते हुए कहा था कि परेशान होने पर ही वो असम छोड़ कर बाहर जाएंगे. मुख्यमंत्री ने इसी साल 28 जनवरी को कहा था, मिया समुदाय का रिक्शावाला अगर पांच रुपए किराया मांगे तो उसे चार रुपए ही देना चाहिए.
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य की आबादी में 34.22 फीसदी मुसलमान थे. मोटे अनुमान के मुताबिक, अब यह बढ़कर करीब 40 फीसदी तक पहुंच गई है. राज्य के 11 जिले मुस्लिम बहुल हैं. इनमें सबसे ज्यादा करीब 95 फीसदी मुस्लिम आबादी साउथ सालमारा जिले में रहती है. बांग्लादेश की सीमा से सटे इस इलाके को धुबड़ी जिले से काटकर अलग जिला बनाया गया था. इसके बाद क्रमशः धुबड़ी (79.67 फीसदी) और बरपेटा (70.74 फीसदी) का स्थान है. इन जिलों में बीते दो साल से बड़े पैमाने पर चलाया गया अतिक्रमण अभियान भी सुर्खियों में रहा है. इसके निशाने पर भी बांग्लाभाषी मुसलमान ही रहे हैं. असम में मतदाता सूची का 'गहन' नहीं 'विशेष पुनरीक्षण' क्यों?
राजनीतिक विश्लेषक: बीजेपी का निशाना असम नहीं पश्चिम बंगाल है
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री सरमा पर राज्य में हिंसा को बढ़ावा देने के लिए भड़काऊ बयान देने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि इससे राज्य में बड़े पैमाने पर अशांति पैदा होने की आशंका है. कांग्रेस नेता अमन वदूद वे भी ऐसा ही आरोप लगाया है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "बीजेपी ने बार-बार साबित कर दिया है कि उसे कानून या बुनियादी शिष्टाचार की कोई परवाह नहीं है. इससे पार्टी की हताशा जाहिर होती है. उसे अगले चुनाव में हार का खतरा सता रहा है."
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने भी 'एक्स' पर अपनी एक पोस्ट में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से सरमा के उस वीडियो का संज्ञान लेने की अपील की है. लेकिन देश के बाकी हिस्सों में जहां एक मामूली टिप्पणी या सोशल मीडिया पोस्ट पर गिरफ्तारिया हो जाती हैं वहीं सरमा के ऐसे वीडियो के बावजूद अब तक उनके या इसे पोस्ट करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हिमंता सरमा को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने काफी ढील दे रखी है. इसकी वजह उनका पूर्वोत्तर की राजनीति में चाणक्य की भूमिका में होना है. इलाके के तमाम राज्यों में होने वाले चुनाव और सरकार के गठन में उनकी अहम भूमिका रही है.
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी की निगाहें दरअसल असम से सटे बंगाल पर है. वो यहां बांग्लादेशी मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर मुहिम चला कर बंगाल में रहने वाले कथित बांग्लादेशियों को कड़ा संदेश देना चाहती है." उनका कहना था कि बीजेपी की प्राथमिकता बंगाल है, असम नहीं.
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कोलकाता में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे देवाशीष सेन डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हिमंता सरमा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से ही बांग्ला भाषी मुसलमानों को निशाना बनाते रहे हैं. उनका एक मकसद खुद को असम के सबसे बड़े हितैषी बताकर सत्ता पर काबिज रहना है. यही वजह है कि वो बांग्लाभाषी मुसलमानों के साथ ही कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई पर भी लगातार हमले कर रहे हैं."
लेकिन उनके खिलाफ ऐसे बयानों के लिए अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी है? इस पर सेन ने उल्टे सवाल किया कि आखिर कार्रवाई कौन करेगा? उनके सर पर बीजेपी के केंद्रीय नेताओं का हाथ है. अगर पहले ही उनको ऐसी टिप्पणियों के लिए टोका गया होता तो अब ऐसे वीडियो सामने नहीं आते.
दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में हिंदी विरोध की जड़ें दशकों पुरानी हैं। इस पर पहले काफी हिंसा हो चुकी है। अब त्रिभाषा फार्मूले के तहत कथित तौर पर जबरन हिंदी थोपने के विरोध में एक बार फिर यह मुद्दा तेजी से उभर रहा है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम। के। स्टालिन ने हाल में कहा था कि राज्य में हिंदी के लिए न कोई जगह थी, न है और न ही रहेगी। मुख्यमंत्री ने 'भाषा शहीद' के मौके पर यह बात कही थी। 'भाषा शहीद' शब्द का इस्तेमाल उनके लिए किया जाता है जिन लोगों ने वर्ष 1964-65 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन के दौरान अपनी जान दी थी। इनमें से अधिकतर ने आत्मदाह किया था। दिलचस्प बात है कि स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार जहां हिंदी का भारी विरोध कर रही है वहीं पूर्वोत्तर के गैर-हिंदी भाषी राज्य मिजोरम में सरकार ने अब स्कूलों में हर महीने एक दिन तमाम काम-काज हिंदी में करने का फैसला किया है। उस दिन तमाम शिक्षक और छात्र हिंदी में ही बात करेंगे।
दो-भाषा और तीन-भाषा फॉर्मूले का सवाल
तमिलनाडु सरकार ने राज्य में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू नहीं किया है। यह दक्षिणी राज्य दो भाषा (अंग्रेजी और तमिल) फॉर्मूले का पालन करता है जबकि नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी को भी शामिल करने की बात कही गई है। लेकिन डीएमके सरकार का आरोप है कि केंद्र सरकार इस नीति के जरिए राज्य पर जबरन हिंदी थोपने का प्रयास कर रही है।
मुख्यमंत्री के अलावा कई अन्य मंत्री और नेता भी अक्सर हिंदी-विरोधी टिप्पणी करते रहे हैं। सत्तारूढ़ डीएमके की सांसद कनिमोझी अक्सर राज्य में रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों पर हिंदी के इस्तेमाल का मुद्दा उठाते हुए केंद्र पर तमिल की बजाय हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है। राज्य के मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने भी हाल हिंदीभाषी आबादी को मजदूरों से जोड़ते हुए विवादास्पद टिप्पणी की थी। पनीरसेल्वम ने कहा था, उत्तरी भारत से लोग यहां टेबल साफ करने, निर्माण मजदूर के तौर पर काम करने और पानी पुरी बेचने जाते हैं। इसकी वजह यह है कि वो सिर्फ हिंदी जानते हैं।
सांसद दयानिधी मारन के अलावा कई अन्य नेता भी समय-समय पर हिंदी के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। पार्टी का दावा है कि वो राज्य में तमिल के हितों की रक्षा के लिए कृतसंकल्प है और जबरन हिंदी थोपने के प्रयासों को कामयाब नहीं होने देगी। हालांकि कांग्रेस समेत कई पार्टियो के नेताओं ने पनीरसेल्वम की इस टिप्पणी का विरोध किया है। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा है कि तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था काफी हद तक दूसरे राज्यों से आने वाले मजदूरों पर ही निर्भर है।
केंद्र की ओर से कथित रूप से जबरन हिंदी थोपने के विरोध में राज्य में वर्ष 1938 के अलावा 1965 और 1986 में बड़े पैमाने पर हिंसक आंदोलन हो चुके हैं। उसी दौर से राज्य में द्विभाषा फार्मूला लागू है। स्टालिन पहले भी कह चुके हैं कि तमिलनाडु में हिंदी थापना मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने जैसा होगा। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सहयोगी रही एआईएडीएमके ने भी साफ कर दिया है कि वह राज्य की द्विभाषा नीति का ही समर्थन करती है।
पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब को लेकर शुरू हुआ विवाद ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार इस किताब को लेकर सरकार पर हमलावर हैं, वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस ने इस मामले में एफ़आईआर भी दर्ज कर ली है।
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने दिल्ली पुलिस से इस एफ़आईआर के बारे में कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की प्रकाशक कंपनी पेंगुइन इंडिया ने सफाई भी जारी कर दी है।
पेंगुइन ने कहा है कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। अब खुद नरवणे ने भी पेंगुइन के इस दावे पर अपनी मुहर लगा दी है, लेकिन इसके बावजूद यह मामला शांत होता नहीं नजऱ आता।
बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि नरवणे के स्पष्टीकरण के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि राहुल गांधी के दावे महज़ कोरी कल्पना थी।
वह कहते हैं, ‘राहुल गांधी ने जिस मनोहर कहानी को सुनाने का प्रयास सदन के पटल पर किया था, वो उनकी उस तथाकथित प्रकाशित बुक के प्रकाशक और लेखक दोनों के द्वारा स्पष्ट रूप से ध्वस्त हो गया है। राहुल गांधी कल पूछ रहे थे कि प्रकाशक झूठ बोल रहे हैं या फिर जनरल नरवणे, लेकिन अब तो दोनों के ही बयान सामने हैं, जिससे साफ़ है कि असल झूठ बोल कौन रहा है।’
दरअसल, राहुल गांधी ने मीडिया चैनलों से बात करते हुए नरवणे की अप्रकाशित किताब से जुड़ी दिल्ली पुलिस की एफ़आईआर पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने जनरल नरवणे के साल 2023 के एक ट्वीट को पढ़ते हुए कहा, ''मैं यह कहना चाहता हूं कि या तो जनरल नरवणे सच नहीं बोल रहे या फिर पेंगुइन। मुझे नहीं लगता कि एक पूर्व सेना प्रमुख झूठ बोलेंगे। पेंगुइन का कहना है कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन वह किताब अमेजन पर उपलब्ध है। जनरल नरवणे ने ट्वीट किया है।। कृपया मेरी किताब 2023 में खरीदें।
‘मैं पेंगुइन की बजाय नरवणे जी की बात पर भरोसा करता हूं। मेरा मानना है कि नरवणे जी ने अपनी किताब में सरकार और प्रधानमंत्री के लिए कुछ असहज बातें लिखी हैं। इसलिए अब आपको तय करना है कि सच कौन बोल रहा है। पेंगुइन या देश के पूर्व सेना प्रमुख।’
पेंगुइन इंडिया ने इसे लेकर क्या सफ़ाई दी है, नरवणे ने खुद क्या कहा है ये जानने से पहले नरवणे के उस ट्वीट में क्या लिखा है, जिसका जिक्र राहुल गांधी कर रहे हैं, ये जान लेते हैं।
तो नरवणे का यह ट्वीट 15 दिसंबर, साल 2023 का है। इसमें वह लिखते हैं, ''हैलो दोस्तों। मेरी किताब अब उपलब्ध है। बस लिंक को फॉलो कीजिए। हैपी रीडिंग। जय हिंद।''
राहुल गांधी ने इसी पोस्ट को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि जब नरवणे कह रहे हैं कि किताब उपलब्ध है तो प्रकाशक कंपनी झूठ क्यों बोल रही है। लेकिन अब नरवणे ने ख़ुद पेंगुइन के दावे को सही बताया है।
बीते दो दिनों में इस पूरे विवाद को लेकर पेंगुइन इंडिया ने दो बार अपनी सफ़ाई जारी की है।
पहली सफ़ाई नौ फऱवरी को आई, जिसमें कंपनी ने एक बयान जारी कर कहा, ‘हाल की चर्चा और मीडिया रिपोर्ट्स को देखते हुए पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया स्पष्ट करना चाहता है कि 'फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी' को प्रकाशित करने का एक मात्र अधिकार हमारे पास है।’
‘यह किताब पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने लिखी है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। किताब की कोई भी कॉपी-प्रिंट में या डिजिटल फॉर्म में। अभी तक प्रकाशित, वितरित, बेची या पब्लिक के लिए हमारे द्वारा उपलब्ध नहीं कराई गई है।’
‘जो भी कॉपी अभी सर्कुलेशन में हैं। चाहे वह पूरी किताब हो या उसके अंश, चाहे प्रिंट में, डिजिटल में, पीडीएफ़ में, किसी भी फॉर्मेट में, ऑनलाइन या ऑफलाइन, किसी भी प्लेटफॉर्म पर।।। वो पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के कॉपीराइट का उल्लंघन है और इसे तुरंत रोकना होगा। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ग़लत माध्यम से किताब की प्रतियां सर्कुलेट करने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी रास्ता अपनाएगा।’
दूसरी सफ़ाई राहुल गांधी के उस सवाल के बाद जारी की गई जिसमें उन्होंने नरवणे के द्वीट का हवाला देते हुए किताब के प्रकाशित होने का दावा किया था।
अपनी दूसरी सफ़ाई में पेंगुइन इंडिया ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में किताबों के प्रकाशन से जुड़ी उसकी प्रक्रिया क्या है।
पेंगुइन इंडिया के अनुसार, किसी किताब की घोषणा होना, उसका प्री-ऑर्डर पर उपलब्ध होना और उसका वास्तव में प्रकाशित होना ।।।ये तीनों अलग-अलग चीज़ें और स्टेज हैं। किसी किताब का अमेजऩ जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर प्री-ऑर्डर के लिए दिखना या उसकी भविष्य की रिलीज़ तारीख़ तय होना, यह नहीं दर्शाता कि वह किताब प्रकाशित हो चुकी है। पेंगुइन का कहना है कि किताब को तभी प्रकाशित माना जाता है जब वह रिटेल प्लेटफ़ॉर्म पर सीधे खरीदने के लिए उपलब्ध हो।
मंगलवार को ही इस मामले में जनरल नरवणे का भी एक पोस्ट सामने आया है। नरवणे ने किताब के स्टेटस को लेकर सफ़ाई दी है और लिखा है कि पेंगुइन जो कह रहा है, किताब का स्टेटस भी वही है।
इसके बावजूद किताब की उपलब्धता को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
जैसे आरजेडी सांसद मनोज झा ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए दावा किया कि उन्होंने यह किताब पढ़ी है।
वह कहते हैं, ''मैंने वो किताब पढ़ी है। किताब उपलब्ध है। डिजिटल दुनिया में हर चीज़ उपलब्ध है। कहां रोकेंगे आप सूचना के इस युग में। यह हमारी सल्तनत की असुरक्षा दिखाता है। दिल्ली पुलिस को आप बिना वजह बदनाम कर रहे हैं। एफ़आईआर तो किसी के इशारे पर हुआ है, किसी के इरादे पर हुआ है। मैंने पेंगुइन रैंडमहाउस का वो सर्कुलर भी सोशल मीडिया पर देखा, मुझे दुख हुआ।
-इल्मा हसन
असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर पोस्ट किए गए एक वीडियो को विवाद खड़ा होने के बाद हटा लिया गया है। इस वीडियो में राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को एक राइफल संभालते हुए दिखाया गया था।
वीडियो में एआई से तैयार किया गया पार्ट जोड़ा गया था, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों की तस्वीरों पर गोलियाँ लगती हुई दिखाई गईं। यह वीडियो 7 फरवरी को असम बीजेपी हैंडल पर पोस्ट किया गया था और आलोचना बढऩे के बाद इसे 8 फरवरी को हटा दिया गया।
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भडक़ाऊ और ख़तरनाक बताया। आलोचकों का कहना है कि वीडियो एक समुदाय को निशाना बनाता है और इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है।
इस वीडियो में ‘फॉरेनर फ्री असम’ और ‘नो मर्सी’ जैसे वाक्य भी स्क्रीन पर दिखाए गए थे।
वीडियो में एक तस्वीर में दो लोगों को दिखाया गया था, जिनमें से एक की पहचान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के रूप में की जा रही थी। दोनों को सफेद टोपी पहने हुए दिखाया गया था।
करीब 17 सेकंड के इस वीडियो के अंत में मुख्यमंत्री को काउबॉय अंदाज में दिखाया गया था। इस दृश्य में वह राइफल और काउबॉय हैट के साथ दिखाई देते हैं।
वीडियो में कुछ संदेश भी दिखाई दिए जिनका अर्थ था, ‘तुम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?’ और ‘बांग्लादेशियों के लिए कोई माफी नहीं है।’
यह वीडियो ऐसे समय में साझा किया गया जब असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी पहले से तेज़ हो गई है।
हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहा
इस विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने वीडियो नहीं देखा था। उन्होंने कहा कि वह हर सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखते और कई बार पार्टी के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अलग टीम संभालती है।
हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि वह ‘मियां’ मुसलमानों के खिलाफ बोलते रहते हैं।
इस बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने असम के सीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई है।
इस पर न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में सरमा ने कहा, ‘मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मैं क्या कर सकता हूं? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में कुछ नहीं पता। अगर उन्होंने मेरे खिलाफ मामला दर्ज कराया है तो मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मैं अपने शब्दों पर कायम हूं। मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ हूं और आगे भी उनके खिलाफ रहूंगा।’
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
इस वीडियो पर कांग्रेस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, ‘बीजेपी के असम प्रदेश के आधिकारिक हैंडल ने एक वीडियो पोस्ट किया, जो अल्पसंख्यकों की ‘पॉइंट-ब्लैंक’ हत्या को महिमामंडित करता हुआ दिखाई देता है। यह बेहद घृणित और परेशान करने वाला है और इसे किसी सामान्य ट्रोल सामग्री के तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता। यह बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार के लिए उकसाने जैसा है।’ वहीं कांग्रेस नेता और वकील अमन वदूद ने इस वीडियो को लेकर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा, ‘वीडियो बिल्कुल साफ तौर पर बड़े पैमाने पर हिंसा भडक़ाने की कोशिश है। यह नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला है।’
उन्होंने कहा, ‘वीडियो का संदेश इतना भद्दा और स्पष्ट था कि हर जगह इसकी आलोचना हो रही थी। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक में बीजेपी पर हमला हो रहा था। लगभग हर कोई अदालतों और संस्थाओं से पूछ रहा था कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है।’
अमन वदूद ने कहा, ‘असम में बीजेपी पूरी तरह भटक चुकी है। विकास के उनके दावे काम नहीं कर रहे हैं। बीजेपी नहीं चाहती कि लोग इन मुद्दों पर बात करें। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ‘मियां’ समुदाय पर लगातार हमला किया जा रहा है।’ जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा, ‘कल्पना कीजिए, एक निर्वाचित मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के वीडियो में मुसलमानों पर पॉइंट-ब्लैंक गोली चलाने का अभिनय कर रहे हों, जो इतना आपत्तिजनक था कि तीखी प्रतिक्रिया के बाद उसे हटाना पड़ा।’ टीएमसी ने इसे ‘राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण’ बताया है।
-दिपाली अग्रवाल
जगजीत सिंह जालंधर के डीएवी कॉलेज के साइंस के छात्र थे। उस कॉलेज में रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश, उपेन्द्रनाथ अश्क, सुदर्शन फाकिर जैसे कितने ही प्रसिद्ध और कमाल के लोग भी पढ़े। रवीन्द्र कालिया ने अपनी आत्मकथा ग़ालिब छुटी शराब में जगजीत सिंह का जिक्र किया है, चूंकि वे उनके दो-तीन साल सीनियर थे इसलिए कॉलेज के दिनों का जिक्र कम है। मगर एक मजे की बात बताती हूं कि उसी कॉलेज में प्रसिद्ध पल्प लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक भी पढ़े हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में-कॉलेज के दिनों को याद करते हुए जगजीत सिंह पर पूरे दस पन्ने लिखे हैं। कल ही उस किताब को पढ़ा, आज जगजीत सिंह का जन्मदिन भी है। कुछेक किस्से जो बताते हैं कि कैसे पूत के पांव पालने में पलते हैं और कैसे एक कलाकार बचपन से ही उस एक कला की मिट्टी के साथ पैदा तो होता है लेकिन अपनी मेहनत से उसे लगातार आकार में ढालता रहता है कि वह कहीं बिखर न जाए।
पाठक लिखते हैं कि कॉलेज के बच्चों को कमरे चुनने की सुविधा होती थी लेकिन कोई भी तीन कमरे नहीं चाहता था, सीढिय़ों के पास वाला (शोर के कारण), वॉशरूम के पास वाला (बदबू के कारण), जगजीत सिंह के बगल वाला (उनके 5 बजे उठकर रियाज के कारण)। जगजीत सिंह ने एक बार सुरेन्द्र मोहन पाठक को भी गाते सुना और कहा कि उनकी आवाज अच्छी है, उन्हें और गाना चाहिए और बाकी का रियाज वो खुद उन्हें करवा देंगे, रियाज का समय जब सुबह 5 बजे का पता चला तो पाठक जी ने मना कर दिया। फिर वो लिखते हैं कि उस इंकार का जगजीत ने न ही बुरा माना और न ही दोबारा पेशकश दी। वह एक खुशमिजाज लडक़े थे।
जगजीत सिंह को बच्चे अपने कमरे में बुलाकर फरमाइशी कार्यक्रम करते थे और वे ख़ूब मनोयोग से उन्हें गीत सुनाते थे। कभी उनका इतना गाने का मूड होता कि बरामदे में खड़े लडक़े को गाना सुनाने लग जाते थे और तब वो खीज कर कहता कि तुझे तो पास होना नहीं है, हमें तो पढऩे दे। इस पर जगजीत कहते कि नाशुकरों, एक दिन टिकट खरीदकर मेरे गाना सुनोगे (और ये बात आने वाले दिनों में सच हुई, रवीन्द्र कालिया को तो बड़े पापड़ बेलने पड़े थे)।
एक कमाल का हुनर जो शायद जगजीत सिंह के चाहने वालों को नहीं ही पता होंगी कि फिजिक्स की क्लास में रेजोनेन्स एक्सपेरिमेंट के दौरान दो तारों को एक ही फ्रीक्वेंसी पर झंकृत करना होता था, ये काम ट्यूनिंग फोर्क करता था लेकिन जगजीत सिंह बिना ट्यूनिंग फोर्क के वो सेट कर देते थे, जब परीक्षक चेक करता तो वो एकदम रेजोनेट होती थीं और वो विस्मय से भर जाता था जबकि जगजीत ख़ुद भी नहीं समझ पाते थे कि वो ये कैसे कर लेते थे।
-चित्रगुप्त
1724 का वह काला अध्याय इतिहास में दर्ज है, जब पश्चिम अफ्रीका के घने जंगलों से मात्र चौदह वर्षीय थॉमस फुलर को गुलाम बनाने वाले अपहरणकर्ता बेडिय़ों में जकडक़र अमरीका ले आए। औपनिवेशिक वर्जीनिया की ज़मीन पर उतरा यह बच्चा न पढऩा जानता था, न लिखना। लेकिन उसके दिमाग में जो था, वह किसी भी सभ्य समाज की कल्पना से कहीं आगे था। गुलामी की जंजीरों के भीतर बंद यह किशोर एक चलता-फिरता गणित था। इसलिए लोग उसे ‘वर्जीनिया कैलकुलेटर’ कहने लगे।
1780 के दशक में जब दो शिक्षित क्वेकर सज्जन-विलियम हार्टशॉर्न और सैमुअल कोट्स—ने उसकी परीक्षा ली, तो सभ्यता खुद कटघरे में खड़ी हो गई। डेढ़ साल में कितने सेकंड होते हैं-थॉमस ने बिना कागज़़-कलम, एक मिनट से कम में सही उत्तर दे दिया। 70 साल, 17 दिन और 12 घंटे में कितने सेकंड-यह भी उसने लगभग डेढ़ मिनट में गिन दिया। जब शिक्षित व्यक्ति ने उत्तर को ग़लत बताया, तो गुलाम लडक़े ने शांति से कहा-आप लीप ईयर भूल गए हैं। दोबारा गणना हुई, और वही सच निकला जो एक अनपढ़ गुलाम ने कहा था।
यह घटना इसलिए दर्ज हुई क्योंकि इसे डॉ. बेंजामिन रश जैसे प्रतिष्ठित विद्वान ने लिखा। नहीं तो इतिहास अक्सर ऐसी प्रतिभाओं को चुपचाप दफऩा देता है। थॉमस फुलर 1790 में मर गया, लेकिन वह यह सवाल छोड़ गया कि अगर बुद्धि रंग, नस्ल, शिक्षा या हैसियत की मोहताज नहीं है, तो इंसानी समाज उसे इन जंजीरों में क्यों बाँधता है?
यूरोप और अमरीका ने लंबे समय तक नस्ल के नाम पर यह झूठ फैलाया कि कुछ लोग जन्म से ही श्रेष्ठ होते हैं और कुछ जन्म से ही हीन। थॉमस फुलर जैसी कहानियाँ उस झूठ को तार-तार कर देती हैं। यह बताती हैं कि प्रतिभा प्राकृतिक होती है, सामाजिक नहीं। वह किसी चमड़ी, किसी कुल, किसी धर्म या किसी दर्जे से नहीं निकलती—वह इंसान से निकलती है।
लेकिन अगर हम यह सोचते हैं कि नस्ल का यह ज़हर सिफऱ् पश्चिमी इतिहास की बीमारी थी, तो हम खुद को धोखा दे रहे हैं। भारत में यही धारणा जाति व्यवस्था के रूप में आज भी जि़ंदा है। यहाँ भी जन्म के आधार पर यह तय करने की कोशिश होती है कि कौन तेज होगा, कौन योग्य होगा, और कौन सिर्फ ‘आरक्षण का लाभार्थी’ कहलाएगा। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ गुलामी की जंजीरें दिखाई नहीं देतीं—वे अंकतालिकाओं, इंटरनल असेसमेंट, मौखिक परीक्षाओं और ‘मेरिट’ के दावों में छुपी होती हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने हाल ही में दिल्ली पुलिस को दी एक शिकायत में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है।
हर्ष मंदर का आरोप है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा संवैधानिक पद पर होते हुए देश की अल्पसंख्यक मुसलमान आबादी के खिलाफ नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हर्ष मंदर के इन आरोपों के बाद एक सार्वजनिक बयान में हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वह उनके खिलाफ सौ से अधिक एफ़आईआर दर्ज करवा देंगे।
हाल के सालों में भारत में नफऱत भरी भाषा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर बहस तेज हुई है।
सेंटर फॉर स्टडी ऑन हेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में देशभर में 1,318 नफरती भाषणों की घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2024 के मुकाबले 13 प्रतिशत ज़्यादा है और 2023 के मुकाबले लगभग दोगुनी हैं।
इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल औसतन हर दिन चार नफरती भाषण हुए। इन घटनाओं का सबसे बड़ा निशाना धार्मिक अल्पसंख्यक, ख़ासतौर पर मुस्लिम और ईसाई समुदाय रहे।
रिपोर्ट यह दावा भी करती है कि नफरत अब सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक निरंतर और संगठित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘पॉपुलेशन जिहाद’ जैसे साजि़शी नैरेटिव्स, हिंसा के खुले आह्वान, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार और धार्मिक स्थलों को तोडऩे की मांगें, सार्वजनिक मंचों से सामान्य रूप से कही जा रही हैं।
खास बात यह है कि ऐसी 88 प्रतिशत घटनाएं उन राज्यों में दर्ज हुईं जहां बीजेपी या उसकी सहयोगी पार्टियां सत्ता में हैं, जबकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इन भाषणों को बड़े पैमाने पर फैलाने का माध्यम बने।
इसी बीच, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के कुछ बयानों को ‘नफरत भरा’ बताते हुए दिल्ली पुलिस को शिकायत दी है, जिस पर अभी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।
बीबीसी हिन्दी के संवाददाता दिलनवाज पाशा से हुई लंबी बातचीत में हर्ष मंदर ने न केवल इस शिकायत के पीछे के कारण बताए, बल्कि नफरत की राजनीति, प्रशासन की भूमिका, न्यायपालिका, मीडिया और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर भी तीखे सवाल उठाए।
‘नफरती भाषण अब अपराध जैसा नहीं रह गया’
हर्ष मंदर का कहना है कि पिछले एक दशक में नफरत भरे भाषण इतने सामान्य हो गए हैं कि वे रोजमर्रा की राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘ऐसा लगने लगा है कि नफरत कोई अपराध ही नहीं रहा। लेकिन इतिहास हमें चेतावनी देता है, नाजी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार गैस चैंबर से नहीं, बल्कि नफरती भाषण से शुरू हुआ था।’
हर्ष मंदर इस बात पर भी जोर देते हैं कि लिंचिंग या हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी है नफरत भरी भाषा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लडऩा।
मंदर कहते हैं, ‘लिंचिंग और हिंसा के खिलाफ हम लड़ते हैं, लेकिन उतनी ही शिद्दत से नफरती भाषण का भी सामना करना होगा, क्योंकि वही आगे चलकर नफऱती हिंसा में बदलता है।’
इसी संदर्भ में वे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयानों को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ मानते हुए कहते हैं, ‘अगर कोई मुख्यमंत्री यह कहे कि ‘मेरा काम एक समुदाय को परेशान करना है’, तो यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि एक संदेश है, जो नीचे तक जाता है।’
‘धमकियों से मेरी आवाज नहीं रुकेगी’
हर्ष मंदर की पुलिस को दी गई शिकायत के बाद दिए एक बयान में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वह हर्ष मंदर के खिलाफ सौ एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं।
हालांकि, मंदर का कहना है कि उन्हें इस तरह के बयानों या पुलिस की कार्रवाई से डर नहीं लगता।
हर्ष मंदर कहते हैं, ‘अगर डिटेंशन सेंटरों में बंद लोगों की मदद करना अपराध है, अगर एनआरसी से प्रभावित लोगों के साथ खड़ा होना अपराध है, तो मैं यह अपराध करता रहूंगा।’
मंदर कहते हैं, सरकार पुलिस का डर दिखाकर मेरी आवाज दबाना चाहती है, मेरे हौसले को तोडऩा चाहती है लेकिन ‘मेरे हौसले, जमीर और काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।’
‘सत्ता, प्रशासन और नफरत की मशीनरी’
भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हर्ष मंदर लंबे समय तक प्रशासन का हिस्सा रहे।
साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद उन्होंने आईएएस की अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। हर्ष मंदर, जो ख़ुद कऱीब 20 साल तक प्रशासनिक सेवा में रहे, कहते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा अचानक नहीं होती।
वे तर्क देते हैं, ‘नफरत का उत्पादन होता है, दंगे ऐसे ही होते हैं जैसे कोई केमिकल रिएक्शन। हथियार, अफवाहें, भीड़, सब कुछ एक प्रक्रिया के तहत आता है। लेकिन इसके बावजूद हिंसा तब तक नहीं होती, जब तक सरकार उसे होने न दे।’ वे 2020 के दिल्ली दंगों का उदाहरण देते हैं। उनके अनुसार, देश की राजधानी में, जहां गृह मंत्रालय और तमाम सुरक्षा एजेंसियां मौजूद हैं, अगर चाहते तो हिंसा घंटों में रोकी जा सकती थी।
वे कहते हैं, ‘सरकार कहती है कि यह साजि़श थी। मैं मानता हूं कि साजिश थी। लेकिन वह साजिश प्रदर्शनकारियों की नहीं, सत्ता की थी।’
दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़े 758 एफआईआर दर्ज किए थे। खबरों के मुताबिक, पुलिस ने दो हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था।
‘यह आरोप गंभीर है, लेकिन अनुभव से निकला है’
जब उनसे पूछा गया कि क्या वे सीधे तौर पर सरकार को अपने नागरिकों के खिलाफ साजिश का दोषी ठहरा रहे हैं, तो हर्ष मंदर अपने प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हैं।
वे साल 1984 के सिख विरोधी दंगों और गुजरात दंगों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘हफ्तों तक चलने वाली हिंसा सरकार की सहमति के बिना संभव नहीं।’
इंदौर में 1984 के दौरान अपने अनुभव को साझा करते हुए वे बताते हैं कि कैसे एक जूनियर अफसर होने के बावजूद उन्होंने सेना बुलाकर कुछ ही घंटों में हिंसा रोकी।
हर्ष मंदर ने तब एसडीएम रहते हुए सेना को भीड़ पर गोली चलाने के आदेश दिए थे और कुछ ही घंटों के भीतर हिंसा पर काबू पा लिया गया था। वे कहते हैं, ‘अगर एक अफसर छह घंटे में दंगे रोक सकता है, तो पूरे राज्य में हफ्तों तक हिंसा कैसे चलती रही? इसका जवाब साफ है।’
बुलडोजर और ‘तुरंत इंसाफ’
मंदर का एक बड़ा सवाल ‘बुलडोजर न्याय’ पर भी है।
वे कहते हैं, ‘किसी पर आरोप लगा, और उसी दिन उसका घर तोड़ दिया गया। यह कौन तय कर रहा है कि वह अपराधी है? कानून की प्रक्रिया कहां गई?’
उनके मुताबिक, यह सब प्रशासन की मिलीभगत से हो रहा है। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘जो अफ़सर संविधान के उल्लंघन के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत कर सकते थे, वे चुप हैं।
हर्ष मंदर कहते हैं, ‘ये प्रशासनिक अधिकारी ही हैं जो लोगों के घर बुलडोजर लेकर पहुंच रहे हैं। इस संवैधानिक अपराध को न्याय बताया जा रहा है।’
-सनियारा खान
मक़बूल शेरवानी वह नाम है, जिसे भारतीय सेना ने हमेशा एक जांबाज देशप्रेमी के रूप में सम्मान दिया है। इसी लडक़े के बारे में मुल्क राज आनंद जी ने ‘डेथ ऑफ़ ए हीरो’ लिखा था।
अक्टूबर 1947 का यह वाकय़ा है। आज़ादी को ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था। सीमावर्ती इलाक़ों में बारूद की गंध फैली हुई थी। पाकिस्तानी सेना कश्मीर हथियाने की पुरज़ोर कोशिश में थी। श्रीनगर विमानतल पर उन लोगों की ख़ास नजऱ थी, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अगर वे विमानतल पर कब्जा कर लेते, तो भारतीय सेना कश्मीर में कदम नहीं रख पाती और उस सूरत में हिंदुस्तान कश्मीर को खो देता।
कश्मीर जल रहा था। अराजक तत्वों द्वारा लूट-पाट, हत्या और बर्बादी का भयानक मंजऱ चल रहा था। उन्हें रोकने के लिए भारतीय सेना अभी कश्मीर नहीं पहुँच पाई थी। दिल्ली भी उस वक़्त पूरी तरह स्थिर नहीं थी।
उसी समय बारामुला के राजपथ पर उन्नीस साल का एक मामूली कश्मीरी लडक़ा खड़ा था। उसका नाम था मक़बूल शेरवानी। यह लडक़ा राष्ट्रीय कांग्रेस सम्मेलन का एक युवा सदस्य होने के साथ-साथ एक देशप्रेमी और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी माना जाता था। एक बार इस लडक़े ने मोहम्मद अली जिन्ना को भी सांप्रदायिक राजनीति को लेकर खरी-खोटी सुनाई थी।
पाकिस्तानी दुश्मनों का सामना इसी मक़बूल से हुआ। उन्होंने मक़बूल से श्रीनगर विमानतल पहुँचने का सबसे जल्दी वाला रास्ता पूछा। मक़बूल को माजरा समझ में आ गया। उसके दिल में एक ही बात थी—उन लोगों को इधर-उधर भटकाए रखना, ताकि उनसे पहले भारतीय सेना किसी तरह श्रीनगर विमानतल पहुँच जाए।
-रामजी तिवारी
मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ एक मस्ट रीड किताब है।
यह किताब आज से 40 वर्ष पहले मराठी में प्रकाशित हो चुकी थी। सुखद यह कि हिंदी के पाठकों को अब जाकर इसका अनुवाद हासिल हुआ है। मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ का हिंदी अनुवाद सुनीता डागा ने किया है। और बहुत अच्छा अनुवाद किया है। एकदम सरल और प्रवाहमय।
मलिका अमर शेख हालाँकि चाहती हैं कि उनका परिचय उनके नाम से दिया जाए लेकिन फिर भी उनका नाम आते ही मराठी के प्रसिद्ध कवि और दलित पैंथर के संस्थापक नामदेव ढसाल का जिक्र जरूर आ जाता है, जिनसे मलिका की शादी हुई थी। कहें तो जिनसे मलिका ने प्रेम विवाह किया था।
किताब कई सवालों को सामने रखती है। मसलन कि जिस नामदेव ढसाल को हम एक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ता और मानिंद कवि के रूप में जानते हैं, वे अपने व्यक्तिगत जीवन में क्यों इतने अराजक, नशेबाज, वेश्यागामी और हिंसक थे? उन्होंने न सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मारपीट की, बल्कि किताब में इस बात का भी जिक्र आता है कि उन्होंने अपनी माँ पर भी हाथ उठाया था।
इस किताब से पता चलता है कि उन क्रांतिकारी लोगों के दलित पैंथर आंदोलन की भीतरी परतें बेहद अराजक और घिनौनी थी। निजी जीवन भी नामदेव ढसाल की तरह ही अराजक और दुहरा था, जो समाज बदलने के नारे के साथ इस आंदोलन में उतरे थे।
क्रांतिकारी और कवि होने के बरक्स यह किताब उनके आचरण को छील कर हमारे सामने रख देती है कि तुम जिनकी कविताओं और आंदोलनों पर मुग्ध हुए जाते हो, उनका एक चेहरा यह भी है। जरा इसे भी ठहर कर देखते जाओ।
मलिका ने अपनी इस आपबीती में विवाह संस्था को भी बहुत निर्ममता से प्रश्नांकित किया है। और कुल मिलाकर उसे स्त्री के विरुद्ध बताया है। साथ ही इस बात पर जोर दिया है कि स्त्री को अपने पैरों पर जरूर खड़ा होना चाहिए।
किताब का एक अंश देखिए...
‘नामदेव झुंझलाता था कि मैं अपने बेटे को ब्राहमनी संस्कार देकर लल्लू पंजू बना रही हूँ। निहायत दब्बू।
मैं कहती- ‘अगर वह ब्राह्मणी संस्कार लेकर दब्बू बनता है तो बने। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। पर मैं नही चाहती हूँ कि तुम्हारी एक भी बुरी आदत उसमें आए। गाली गलौज करते हुए लोगों पर दबंगई करने से बेहतर है कि मेरा बेटा पूर्णत: मध्यवर्गीय बने। भ्रष्ट क्रांतिकारी बनने की बनिस्बत वह मिडिल क्लास में बैठे तो मुझे आपत्ति नहीं। मैं चाहती हूँ कि मेरा बेटा खुश रहे। सुसंस्कृत बने।’
किताब राधाकृष्ण प्रकाशन से छपी है। और मस्ट रीड की श्रेणी में आती है। पढ़ जाइए।
जिस वक्त मैंने अखबार में काम करना शुरू किया था, उसी वक्त के आसपास मीडिया में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था। हमारा अखबार जो फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन तक नही छापता था, भाषा की शुद्धता और शिष्टता का खासा खयाल रखा जाता था, उस पर इस बात के आरोप लगने लगे थे कि इस अखबार की भाषा बहुत मुश्किल है।
उस वक्त मार्केटिंग टीम बार-बार ये फीडबैक लेकर आती थी कि यूथ अखबार की भाषा से कनेक्ट नहीं हो पा रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं क्लिष्ट भाषा की समर्थक हूँ, मगर मुझे लगता है कि अखबार की जिम्मेदारी सिर्फ खबरें परोसना ही नहीं, जनमत तैयार करना, सामाजिक मूल्यों की सृष्टि और भाषा के संस्कार देना भी है।
मगर वो तेज आँधी थी, जिसने हिंदी अखबार की भाषा को हिंग्लिश नामक एक नई भाषा दी। भाषा से शुरू होने वाली ये प्रक्रिया बाद में पत्रकारिता और सामाजिक मूल्यों में बदलाव तक पहुँची। आज हम पत्रकारिता में देख रहे हैं कि पत्रकार किस तरह से हमारे समाज को पथभ्रष्ट करने की योजना में प्राणपण से जुटे हुए हैं।
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जिस वक्त स्मिता पाटील ने मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया, उसी वक्त से वे इन फिल्मों को लेकर बहुत सहज नहीं थीं। बताया जाता है कि नमकहलाल फिल्म के गाने "आज रपट जाए तो" की शूटिंग के बाद वे बहुत डिस्टर्ब रहीं और रात भर रोती रहीं। अमिताभ ने उनसे इस सिलसिले में बात की औऱ भी साथी कलाकारों से बात करने के बाद वे सैटल हो पाईं।
किसी इंटरव्यू में लता मंगेशकर से जब ये सवाल किया गया कि उन्हें किसी गाने के लेकर अफसोस हुआ कभी, तो उन्होंने बताया कि "मैं का करूं राम मुझे बुडढा मिल गया" गाने को लेकर आज तक अफसोस है, ये गाना मुझे नहीं गाना चाहिए था।
अमोल पालेकर अपनी आत्मकथा में फिल्म "तीसरा कौन" का किस्सा बताते हैं। फिल्म में एक साधारण सा लगने वाला व्यक्ति अंत में खलनायक के रूप में उभरता है, वे लिखते हैं कि ‘इसलिए इस भूमिका के लिए मैंने अपनी रजामंदी दे दी कि मैं अभिनय के विभिन्न पहलू दिखा सकूं। इस बारे नहीं सोचा था कि इसमें खलनायक की किस तरह की प्रवृत्ति दिखानी होगी।‘
शूटिंग के अंत में जब यह पता चला कि इस भूमिका को बेटी का यौन शोषण करने वाले बाप के रूप में भी समझा जा सकता है। इस पर मैं बहुत बेचैन हो गया। निर्माता ने दलील दी कि किसी प्रकार का दुष्कृत्य होते हुए नहीं दिखाया गया था और अंत में केवल डायलॉग्स से ही वह बात सामने आई थी। हर तरह की दलील के बावजूद, वे उस भूमिका को नहीं करने पर अड़े रहे।
घर घर और हर हाथ तक पहुंच रहे डिजिटल डिवाइसेज के साथ ही भारत में केवल टीनएजर्स ही नहीं बल्कि छोटे बच्चों तक भी पोर्न की पहुंच आसान हो रही है। इसका सीधा असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है।
डॉयचे वैले पर रामांशी मिश्रा की रिपोर्ट –
उत्तर प्रदेश के कानपुर में 13 साल और 8 साल के दो लडक़ों ने कथित तौर पर पॉर्न वीडियो देखकर छह साल की बच्ची के साथ गैंगरेप किया। बच्ची के चिल्लाने की आवाज सुनकर आसपास के लोग पहुंचे और आरोपियों को पुलिस के हवाले किया। पुलिस की पूछताछ में दोनों लडक़ों ने माना कि वे मोबाइल में पॉर्न वीडियो देखते हैं।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में 13 साल के एक लडक़े पर ढाई साल की बच्ची का रेप करने का आरोप है। कोरबा पुलिस के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि बच्ची के अभिभावकों की शिकायत के बाद नाबालिग आरोपी के खिलाफ पॉक्सो के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी बच्चे को मोबाइल पर पॉर्न देखने की लत है। अब उसकी काउंसलिंग की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट पवन दुग्गल भी ऐसे एक मामले के बारे में बताते हैं। पवन दुग्गल के मुताबिक, उनके पास एक केस आया था जिसमें महज साढ़े पांच वर्ष के बच्चे ने हस्तमैथुन करते हुए एक वीडियो बनाया और उसे अपने साथ पढऩे वाली एक लडक़ी के नंबर पर भेज दिया।
पवन दुग्गल बताते हैं कि वीडियो देखने के बाद दोनों बच्चों के माता-पिता काफी हैरान थे। लडक़े के माता-पिता को इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि बच्चा इस तरह की हरकतें कर रहा है। इस पूरे मामले में दोनों ही पक्षों के अभिभावक किसी तरह की कार्रवाई नहीं चाहते थे, लेकिन वे प्रकरण को संज्ञान में लाना चाहते थे। अब दोनों बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है।
भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों में बच्चों के बीच पोर्नोग्राफी देखने के मामले बढ़ रहे हैं। इसके नकारात्मक प्रभावों की सूची भी लंबी है। कई देशों ने पोर्नोग्राफी को बच्चों की पहुंच से दूर करने के लिए कुछ प्रभावी कदम उठाए हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में इसपर लगाम कस पाना एक चुनौती से कम नहीं है।
उत्तर प्रदेश और केरल के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में बतौर मनोचिकित्सक अपनी सेवाएं दे चुके डॉ। जयनाथ भंडारा पुराइल कहते हैं कि पोर्नोग्राफी की लत का पता चलने पर प्रोफेशनल या चिकित्सकीय मदद जरूरी है। अगर समय पर सहायता न ली जाए, तो इसके परिणाम घातक भी हो सकते हैं। किशोरों में अवसाद, अपराधबोध और अकेलेपन की भावना घर कर सकती है। इसके अलावा वे अपनी पढ़ाई, शौक या दोस्तों और परिवार से दूरी बढ़ाना भी शुरू कर देते हैं। स्कूल और खेलकूद की गतिविधियों में रुचि कम होने लगती है और उनके प्रदर्शन पर भी असर पड़ता है। डॉ। पुराइल बताते हैं, ‘समुचित सहायता न मिलने पर किशोरों में सेक्शुअल डिसफंक्शन, यानी यौन विकार जैसी कुछ अन्य शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं।’
कैसे लगती है पोर्नोग्राफी की लत?
इस समय ब्रिटेन के सीएनटीडब्ल्यू एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के जनरल एडल्ट सायकेट्री विभाग में कार्यरत डॉ। पुराइल बताते हैं कि पॉर्न की लत कई कारणों से हो सकती है। मनोवैज्ञानिक कारणों की बात करें, तो बचपन में ही यौन सामग्री यानी सेक्शुअल कंटेंट का आसानी से मिलना सबसे अहम है। इसके अलावा चिंता, अवसाद या तनाव से जूझने पर भी पोर्नोग्राफी की लत लग सकती है। किशोरों में हमउम्र साथियों के कारण भी पोर्नोग्राफी की लत लग सकती है। साथियों के प्रभाव में किशोर पोर्न को देखना शुरू करते हैं और धीरे-धीरे इसके लती हो जाते हैं। उन्हें ये लत सामान्य लगने लगती है।
उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया, ‘पोर्नोग्राफी की लत एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति बार-बार अश्लील सामग्री देखने की आदत में इस हद तक उलझ जाता है कि अपनी आदतों पर नियंत्रण खो बैठता है। यह उसकी मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति को प्रभावित करने लगता है। इस लत में व्यक्ति अपने काम, पढ़ाई और रिश्तों को नुकसान पहुंचाने लगता है।’ इसके अन्य कारणों के बारे में डॉ। पुराइल बताते हैं, ‘आजकल किशोरों में सेक्स हॉर्मोन, जैसे कि एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन के स्तर जल्दी बढऩे लगे हैं। इसके कारण उनकी यौन इच्छा बढ़ जाती है। इसके चलते भी वे पोर्नोग्राफी वीडियो देखने के लती होने लग जाते हैं।’
इसके अलावा इंटरनेट की सहज उपलब्धता और पॉर्न साइट्स की संख्या में हो रही वृद्धि भी बड़ी वजह है। ऐसे कॉन्टेंट आसानी से मोबाइल फोन और लैपटॉप पर पहुंच जाते हैं। एडवोकेट पवन दुग्गल बताते हैं कि वर्तमान में जिस तरह दुनिया डिजिटाइजेशन की ओर जा रही है, उसके फायदों के साथ नुकसान भी सामने आ रहे हैं। वह बताते हैं, ‘मेरे पास ही एक ऐसा मामला आया, जिसमें आठ साल के बच्चे ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अपनी ही टीचर का एक अश्लील वीडियो बनाया। इसके बाद उसने अपने स्कूल के ही अन्य टीचरों की मेल आईडी पर वह वीडियो भेजा। यह कंटेंट पूरी तरह से डीप फेक पर आधारित था।’
डिजिटल तरक्की के कारण असली कंटेंट के साथ डीप फेक और एआई जनरेटेड कंटेंट आसानी से उपलब्ध हैं और बच्चों तक भी पहुंच रहे हैं। एआई का आसानी से इस्तेमाल कर अश्लील सामग्री बनाई जा सकती है। जरूरी है कि इस दिशा में बच्चों के भीतर जागरूकता बढ़ाई जाए।
पोर्नोग्राफी की लत किशोरों के जीवन पर जितना नकारात्मक असर डालती है, उसे लक्षणों के आधार पर पकडऩा उतना ही मुश्किल भी होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर देखा जाता है कि पोर्नोग्राफी के लती किशोरों में झूठ बोलने, पॉर्न देखने की आदत छिपाने और ब्राउजिंग हिस्ट्री मिटाने की कोशिश होती है। इसके बावजूद लती किशोरों में कुछ मनोवैज्ञानिक लक्षण पहचाने जा सकते हैं। पोर्नोग्राफी के लती किशोरों से इस बारे में पूछे जाने पर आमतौर पर उनमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा देखने को मिलता है। डॉ। पुराइल बताते हैं कि पॉर्न देखने की मनाही पर प्रभावित किशोर आक्रामक या उदासीन हो सकता है। कुछ टीनएजर्स अपना मूड बदलने या तनाव कम करने के लिए पॉर्न देखते हैं। लती होने के बाद उनमें पॉर्न देखने की तीव्र इच्छा होने लगती है।


