विचार/लेख
-आर.के.जैन
तमिलनाडु के चुनाव नतीजों में बहुत बड़ा उलटफेर हो गया है। वहां एक्टर विजय की पार्टी टीवीके सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। हालाँकि डीएमके या एआईएडीएमके से गठबंधन करना पड़ सकता है।
तमिल सिनेमा के सुपरस्टार जोसेफ विजय (थलापति विजय) ने फरवरी 2024 में अपनी नई राजनीतिक पार्टी ञ्जङ्क्य की स्थापना की थी। यह पार्टी 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में पहली बार चुनाव में उतरी। मतगणना के नतीजे चौंकाने वाले हैं। सत्तारूढ़ डीएमके तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। लेकिन विजय की पार्टी और एआईएडीएमके ने डीएमके को पीछे छोड़ दिया है। रुझानों में विजय की सरकार बनना तय माना जा रहा है।
विजय ने अपने आखिरी फिल्म जन नायकन (पूर्व में थलापति 69) की घोषणा के साथ ही राजनीति में कदम रखा। विजय को तमिलनाडु का अगला एमजीआर बताया जा रहा है। जिन्होंने एआईएडीएमके की स्थापना की थी और तमिल सिनेमा के महानायक थे।
तमिलनाडु में फिल्म अभिनेताओं के राजनीति में आने की पुरानी परंपरा है (जैसे एमजीआर और जयललिता मुख्यमंत्री बने)। लेकिन कई अन्य अभिनेता जैसे शिवाजी गणेशन, कमल हासन,रजनीकांत आदि को सीमित या मिलीजुली सफलता ही मिली। विजय, आंध्र प्रदेश के एनटीआर (एन. टी. रामाराव) से प्रेरणा ले रहे हैं, जिन्होंने बहुत तेजी से राजनीतिक सफलता हासिल की थी।
विजय की बढ़त के निम्न फैक्टर रहे हैं :
1. विजय की पृष्ठभूमि और तैयारी: उनके फैन क्लब (विजय मक्कल इयक्कम) शुरू में कल्याणकारी संगठन थे, बाद में राजनीतिक रूप लेते गए। डीएमके प्रवक्ता कनिमोझी ने सोमवार 4 मई को स्वीकार किया कि विजय के फैंस ने जीत में बड़ी भूमिका निभाई है।
2. उनकी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों (किसान, स्वास्थ्य, महिलाओं आदि) पर जोर बढ़ता गया।
3. श्रीलंकाई तमिलों और नीट विरोध जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक रुख अपनाया।
चुनौतियाँ: करूर रैली में स्टैंपीड में 41 लोगों की मौत और व्यक्तिगत जीवन में तलाक की घटना की वजह से आलोचना हुई लेकिन उनकी लोकप्रियता ने इन चुनौतियों को धो डाला।
विजय की सरकार बनी तो वह क्या करेंगे ?
टीवीके खुद को गठबंधन-विरोधी बताती रही है। उसने न तो सत्तारूढ़ ष्ठरू्य के साथ और न ही क्चछ्वक्क के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताई है। लेकिन नतीजों के बाद नए हालात में वो किसी न किसी पार्टी से समझौता कर सकती है।
-आशीष कान्ति घोष
वैचारिक संघर्ष के वो कठिन दिन : आशीष कान्ति घोष
भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इतिहास में कई ऐसे दौर आए हैं जिन्हें उनके ‘कठिन दिन’ कहा जा सकता है। इन कठिन परिस्थितियों ने ही इन दलों को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से मजबूती दी। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित इस दल का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक राष्ट्रवादी विचारधारा को खड़ा करना था। कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच एक नया विकल्प खड़ा करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।
इसका मुख्य संकल्प और उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारधारा, सांस्कृतिक एकता और एक सशक्त भारत का निर्माण करना था।जनसंघ का संकल्प मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित था।
अखंड भारत- जनसंघ का सबसे प्रमुख संकल्प ‘अखंड भारत’ था। एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान:कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए यह जनसंघ का सबसे बड़ा नारा और संकल्प था।
राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता- यह भारतीय संस्कृति और सभ्यतागत चेतना पर आधारित राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहता था।एकात्म मानववाद: पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म मानववाद’ को अपना मूल दर्शन माना, जो सर्वांगीण विकास पर जोर देता है ।
अंत्योदय- समाज के अंतिम व्यक्ति के विकास का संकल्प।
धारा 370 का विरोध-कश्मीर में अलग विधान का कड़ा विरोध और राष्ट्र की एकता के लिए 370 को हटाने का संकल्प। डॉ. मुखर्जी ने इन आदर्शों की प्राप्ति के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, प्रमुख कठिन समय और संघर्ष के चरण निम्नलिखित हैं:-
भारतीय जनसंघ के शुरुआती संघर्ष सीमित चुनावी सफलता- शुरुआती दौर (1951-1952)
स्थापना- 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुई।
पहला चुनाव (1951-52): जनसंघ ने अपना पहला आम चुनाव ‘दीपक’ चुनाव चिह्न के साथ लड़ा।
परिणाम- पार्टी को केवल 3 सीटें और लगभग 3.06 फीसदी वोट मिले। डॉ. मुखर्जी खुद कलकत्ता दक्षिण-पूर्व सीट से निर्वाचित हुए थे
डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन (1953)- पार्टी के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन ने पार्टी को नेतृत्व के गहरे संकट में डाल दिया था। उनके बाद दीनदयाल उपाध्याय ने महासचिव के रूप में संगठन को संभाला।
विस्तार और उदय (1957-1971)
1950 और 60 के दशक में जनसंघ ने उत्तर भारत के राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में अपनी पैठ बढ़ानी शुरू की।
1957 का चुनाव- सीटों की संख्या बढक़र 4 हुई। इसी चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार संसद पहुँचे।
1962 का चुनाव- पार्टी ने 14 सीटें जीतीं।
1967 का चुनाव- यह जनसंघ के लिए एक बड़ा मोड़ था, जहाँ पार्टी ने 35 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई।
दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु (1968)- पार्टी के प्रमुख विचारक और तत्कालीन अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुगलसराय स्टेशन पर रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा आघात थी।
1971 का चुनाव- इंदिरा गांधी की ‘गरीबी हटाओ’ लहर के बावजूद जनसंघ 22 सीटें बचाने में सफल रहा।
दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार जोसेफ़ विजय ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सबको चौंका दिया है.
विजय, जिन्हें उनके फ़ैंस 'थलपति' के नाम से जानते हैं, की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेट्री कड़गम) ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की डीएमके को भी रुझानों में पीछे छोड़ दिया है.
डेटानेट के मुताबिक़ टीवीके 104 सीटों पर आगे चल रही है जबकि सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) 63 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं.
विपक्षी एआईएडीएमके भी डीएमके से फ़िलहाल आगे निकल गई है और वो 67 सीटों पर आगे है.
ख़ुद विजय पेरांबुर सीट से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आर डी शेखर से लगभग तीन हज़ार वोटों से आगे चल रहे हैं.
एक्टर विजय तमिलनाडु के साथ-साथ हिंदी भाषी इलाक़ों में भी बेहद लोकप्रिय हैं.
एग्ज़िट पोल में उनके अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जताई गई है लेकिन रुझान चौंकाने वाले आ रहे हैं.
फ़िल्मों में सफलता के बाद अब वह राजनीति में भी सक्रिय हुए.
पिछले साल सितंबर में उनका नाम एक बार फिर सुर्ख़ियों में तब आया था जब तमिलनाडु के करूर में उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की रैली के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें 39 लोगों की मौत हो गई थी.
इस घटना पर विजय ने सोशल मीडिया पर गहरा दुख और सदमा जताया. साथ ही मारे गए लोगों के लिए 20-20 लाख रुपये और घायलों के लिए दो-दो लाख रुपये की मदद की घोषणा की थी.
विजय की ज़िंदगी भी किसी फ़िल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रही, फ़िल्मी माहौल में जन्म, बचपन से ही अभिनय की शुरुआत, संघर्ष के बाद स्टारडम हासिल करना, पिता से मतभेद और फिर राजनीति में उतरना.
चाइल्ड एक्टर के तौर पर शुरुआत और पारिवारिक पृष्ठभूमि
विजय का पूरा नाम जोसेफ़ विजय चंद्रशेखर है. उनका जन्म 22 जून 1974 को चेन्नई में हुआ.
पिता एस.ए. चंद्रशेखर तमिल सिनेमा के जाने-माने निर्देशक रहे हैं और माँ शोभा एक गायिका थीं.
फ़िल्मी माहौल में पले-बढ़े विजय ने बहुत कम उम्र में ही अभिनय शुरू कर दिया था.
उनके पिता ने उन्हें 'वेट्री' फ़िल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने का मौक़ा दिया. बचपन से ही विजय ने तय कर लिया था कि उनका भविष्य सिनेमा में ही है.
कॉलेज में उन्होंने विज़ुअल मीडिया की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन अभिनय के जुनून के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी.
बाद में उनकी माँ शोभा ने एक स्क्रिप्ट लिखी और पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने उस पर फ़िल्म बनाई. इसी फ़िल्म 'नालैया थीरपू' (1992) से विजय ने बतौर हीरो शुरुआत की.
हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर उतनी सफलता हासिल नहीं कर सकी, जितनी इससे उम्मीद थी. लेकिन इसने विजय के करियर की नींव रख दी.
शुरुआती पहचान से 'थलपति' तक
विजय के शुरुआती करियर की पहचान 'फ़ॉर्मूला फ़िल्मों' से जुड़ी रही, जिनमें एक्शन और रोमांटिक गानों का भरपूर मेल होता था.
लेकिन समय के साथ उनकी यह छवि बदल गई. कॉमेडी, एक्शन और सामाजिक विषयों वाली फ़िल्मों में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और धीरे-धीरे साधारण हीरो से 'थलपति' (सेनापति) बन गए.
'गिल्ली' जैसी सुपरहिट फ़िल्म ने उन्हें 'मास हीरो' की छवि दी और छोटे बच्चों तक को उनका प्रशंसक बना दिया.
वहीं 'कथी' ने उनके अभिनय को सामाजिक और राजनीतिक संदेशों से जोड़ा, जबकि 'थेरी', 'मर्सल' और 'बिगिल' जैसी फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड बनाए.
अभिनय के साथ-साथ विजय को बेहतरीन डांसर भी माना जाता है.
निजी ज़िंदगी
विजय की निजी ज़िंदगी में अहम मोड़ तब आया जब लंदन में पली-बढ़ी संगीता उनकी फ़िल्में देखकर उनकी फ़ैन बनीं.
धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर यह रिश्ता आगे बढ़ा.
25 अगस्त 1999 को परिवार की सहमति से विजय ने संगीता से शादी की.
शादी के बाद संगीता उनकी निजी कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर बन गईं और कहा जाता है कि आज भी विजय वही कपड़े पहनते हैं जिन्हें उनकी पत्नी चुनकर देती हैं.
राजनीति में एंट्री
फ़रवरी 2024 में विजय ने राजनीति में औपचारिक रूप से क़दम रखा और अपनी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की घोषणा की.
उन्होंने साफ़ किया कि वह संसद (2024 लोकसभा) का चुनाव नहीं लड़ेंगे और न ही किसी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे, बल्कि उनका ध्यान 2026 के विधानसभा चुनावों पर रहेगा.
इसी एलान के साथ उन्होंने यह भी कहा कि वह सिनेमा छोड़ रहे हैं.
टीवीके की पहली रैली 27 अक्तूबर 2024 को तमिलनाडु के विल्लुपुरम ज़िले के विक्रवंडी में हुई, जहाँ भारी भीड़ उमड़ी.
मंच से विजय ने लोगों को बांटने वाली राजनीति करने वाली पार्टियों को आड़े हाथों लिया और कहा कि ऐसी ताक़तें वैचारिक रूप से उनकी पार्टी की विरोधी हैं.
उन्होंने द्रविड़ मॉडल के नाम पर धोखाधड़ी करने और "एक परिवार पर राज्य को लूटने" का आरोप भी लगाया.
राजनीति में आने से पहले विजय के परिवार में भी विवाद छिड़ा.
उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर ने पहले ही ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम नाम से एक पार्टी बनाई थी. इसको लेकर विजय और उनके पिता के बीच मतभेद सामने आए.
विजय ने अपने माता-पिता समेत 11 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया था और मांग की थी कि उनके नाम का इस्तेमाल किसी चुनावी गतिविधि या भीड़ जुटाने के लिए न किया जाए.
'इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक़ चंद्रशेखर ने इससे पहले भी विजय के फ़ैन क्लब को ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम के तहत एक राजनीतिक पार्टी के रूप में रजिस्टर करने की कोशिश की थी.
इस विवाद के बाद विजय ने एक बयान में कहा था, "मैं अपने प्रशंसकों और जनता को बताना चाहता हूं कि मेरे पिता की राजनीतिक पार्टी और मेरे बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई भी संबंध नहीं है."
सिनेमा को छोड़ने का एलान
जनसभा को संबोधित करते हुए विजय ने कहा कि राजनीति में आने के लिए उन्होंने अपना अभिनय करियर और कमाई दोनों पीछे छोड़ दिए हैं.
वह पहले ही साफ़ कर चुके थे कि राजनीति में सक्रिय होने के बाद अभिनय छोड़कर पूरी तरह समाजसेवा करेंगे.
सितंबर 2024 में प्रोडक्शन हाउस केवीएन ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की थी कि फ़िल्म 'थलपति 69' विजय की आख़िरी फ़िल्म होगी.
पार्टी की विचारधारा पर क्या कहा था?
अपनी पहली रैली में विजय ने टीवीके की विचारधारा पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा था, "हम द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल राष्ट्रवाद को अलग नहीं करेंगे. ये दोनों इस मिट्टी की दो आँखें हैं. हमें ख़ुद को किसी ख़ास पहचान तक सीमित नहीं रखना चाहिए."
विजय ने बताया कि उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होगी.
उन्होंने कहा कि टीवीके पेरियार के दिखाए रास्ते पर चलेगी, जिसमें महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय की बात शामिल है. हालांकि उन्होंने साफ़ किया कि पेरियार के नास्तिकता वाले विचार को वह स्वीकार नहीं करते.
इसके अलावा विजय ने यह भी साफ़ किया कि टीवीके राज्य में दो भाषाओं की नीति को समर्थन देगी. उन्होंने कहा कि सरकारी कामकाज तमिल और अंग्रेज़ी दोनों में होना चाहिए.
विजय का कहना है कि उनकी पार्टी जातिगत जनगणना का समर्थन करती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में ज्यादा लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद अब भी इलाज का बड़ा खर्च आम लोगों को ही उठाना पड़ रहा है. गरीब राज्यों में इसका बोझ कई गुना ज्यादा है
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट–
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने के सरकारी दावों के बीच एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने ‘पारिवारिक सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य' रिपोर्ट जारी की है. इसके अनुसार देश में हर 8 में से एक व्यक्ति बीमार है. यानी सर्वे में शामिल हर 100 में से करीब 13 लोगों ने पिछले 15 दिनों में किसी न किसी बीमारी से पीड़ित होने की बात कही. यह आंकड़ा 2017–18 के पिछले सर्वे में 7.5 प्रतिशत था. यानी बीमार लोगों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है.
यह रिपोर्ट नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के 80वें राउंड (जनवरी–दिसंबर 2025) पर आधारित है. इसके अनुसार पिछले आठ सालों में बीमा कवरेज में बढ़ोतरी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह लगभग तीन गुना बढ़कर 14.1 प्रतिशत से 47.4 प्रतिशत हो गया है. जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 19.1 प्रतिशत से बढ़कर 44.3 प्रतिशत तक पहुंच गया.
इसका मतलब हुआ कि भारत के गांवों में अब करीब 46 प्रतिशत और शहरों में 32 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है. 2017-18 में यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्र में 13 प्रतिशत और शहरों में सिर्फ 9 प्रतिशत था. यह दिखाता है कि अब पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा लोग इंश्योरेंस कवरेज के दायरे में आते हैं. इसके बावजूद अस्पताल का खर्च मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है.
ग्रामीण भारत में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर मरीज औसतन करीब 31,484 रुपये खर्च करते हैं. ये कुल खर्च का लगभग 95 प्रतिशत है, जो उन्हें अपनी जेब से देने पड़ते हैं. इसी तरह शहरों में अस्पताल में भर्ती होने पर करीब 83 प्रतिशत खर्च यानी औसतन करीब 38,688 रुपये भी मरीजों को खुद देने पड़ते हैं. बच्चे के जन्म (डिलीवरी) के मामलों में भी लोगों को इलाज का ज्यादातर खर्च खुद भरना पड़ता है.
भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था कमजोर
सर्वे के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आधे से अधिक और शहरी क्षेत्रों में करीब दो-तिहाई मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं. अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च सभी प्रकार के अस्पतालों (सरकारी, निजी और चैरिटेबल) को मिलाकर लगभग 34,064 रुपये है जबकि सरकारी अस्पतालों में यह खर्च काफी कम, करीब 6,631 रुपये रहता है. निजी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च बढ़कर लगभग 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है.
दूसरी तरफ अस्पताल में भर्ती होने की दर में खास बदलाव नहीं हुआ है और यह करीब 2.9 प्रतिशत पर ही स्थिर है. सामुदायिक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. दिव्यांश सिंह बताते हैं कि वैश्विक तुलना में भारत में स्वास्थ्य बीमा का कवरेज अभी भी सीमित माना जाता है. कई बीमा पॉलिसियों में जिन बीमारियों और इलाज को कवर किया जाता है, उससे कहीं लंबी सूची उन सेवाओं की होती है जिन्हें बाहर रखा गया है. वहीं ब्रिटेन जैसे देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के तहत अधिकांश सेवाएं सीधे सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं, जिससे मरीजों का जेब से खर्च बहुत कम रहता है.
कई दूसरे देशों में बीमा में मरीज पहले एक तय छोटी रकम देता है और उसके बाद बाकी बड़ा खर्च बीमा कंपनी उठाती है. जबकि भारत में स्वास्थ्य बीमा की सीमा तय की जाती है. जैसे आयुष्मान भारत योजना में पांच लाख रुपये तक ही मुफ्त इलाज मिलता है और उसके बाद का पूरा खर्च मरीज उठाता है. इस पर डॉ. दिव्यांश सिंह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "आयुष्मान भारत जैसी बड़ी योजनाओं का लाभ मुख्य रूप से अस्पताल में भर्ती होने पर मिलता है. जबकि भारत में ज्यादातर खर्च ओपीडी और दवाइयों पर हो रहा है. फिर इसके अंतर्गत सभी तरह के इलाज जैसे डेंटल ट्रीटमेंट, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां और ज्यादातर क्रॉनिक बीमारियां पूरी तरह कवर नहीं होतीं. एक आम नागरिक के लिए ओपीडी पर होने वाला खर्च, अस्पताल में भर्ती (आईपीडी) के खर्च से अधिक है. यह एक बार का खर्च 4,000 रुपये तक पहुंच जाता है. यह भी बीमा में शामिल नहीं किया जाता.”
वह आगे बताते हैं, "निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होता है. सरकार भले ही गांवों में पीएचसी और सीएचसी में डॉक्टर तैनात करती है. लेकिन वहां जरूरी दवाइयों और संसाधनों की कमी बनी हुई है. ऐसे में गांव के लोगों को शहर के निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है. उनका आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है. इसलिए लोग बीमार होने पर घर पर ही इलाज करने लगते हैं."
भारत के राज्यों में भी काफी असमानता
सरकारी अस्पतालों में इलाज बहुत सस्ता नहीं है बल्कि कई गरीब राज्यों में यह खर्च ज्यादा है. बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर जेब से होने वाला औसत खर्च 6,631 रुपये के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है. बिहार में यह 10,553 रुपये उत्तर प्रदेश में 12,878 रुपये और झारखंड में 12,364 रुपये है. पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति भी चिंताजनक है. मणिपुर में औसतन 16,007 रुपये और नागालैंड में 16,342 रुपये खर्च होते हैं.
दक्षिणी राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है. तमिलनाडु में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसत खर्च केवल 1,357 रुपये और केरल में 9,313 रुपये दर्ज किया गया है. डीडब्ल्यू ने 'जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया' के संयोजक अमूल्य निधि से बात की. वह सरकारी अस्पतालों के निजीकरण को मुख्य वजह बताते हैं. पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत कई स्वास्थ्य केंद्र निजी हाथों में सौंप दिए जा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर उत्तरप्रदेश के शामली, महराजगंज और संभल में इस मॉडल पर 3 मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जा चुके हैं.
भारत: सड़क हादसा होने के बाद क्या करें और क्या नहीं
सर्वे में यह भी पाया गया कि निजी अस्पतालों के मामले में जम्मू-कश्मीर सबसे ऊपर है. यहां औसतन खर्च 77,217 रुपये है. इसके बाद तमिलनाडु में यह खर्च 74,168 रुपये और तेलंगाना में 64,228 रुपये है. ये सभी आंकड़े निजी अस्पतालों के लिए राष्ट्रीय औसत 50,508 रुपये से बहुत ज्यादा है.
अमूल्य निधि कहते हैं, "हमारे अपने सर्वेक्षण के अनुसार 12 राज्यों में से 106 जिला अस्पतालों का पीपीपी मॉडल के तहत निजीकरण किया गया है. सरकार का अपना डाटा बता रहा है कि बीमारियां और मरीज दोनों बढ़ रहे हैं. मगर जनता इलाज के लिए अस्पताल नहीं जा पा रही है तो इसके दो बड़े कारण हैं. पहला, इलाज बहुत महंगा है. दूसरा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है. नियम है कि हर 5 किलोमीटर के अंदर एक सब-सेंटर होना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सिर्फ इमारत है. वहां डॉक्टर, दवाइयां और जरूरी उपकरणों की कमी है."
बीमारी के रुझान में बदलाव
रिपोर्ट दिखाती है कि देश में बीमारी का पैटर्न भी बदल रहा है. पहले जहां ज्यादातर लोग संक्रामक बीमारियों से प्रभावित होते थे. वहीं अब डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों जैसी लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. यह बढ़ोतरी खासकर 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और खासकर बुजुर्गों में देखने को मिल रही है. बचपन और किशोरावस्था में संक्रमण और सांस से जुड़ी बीमारियां अधिक देखी जाती हैं. युवावस्था में मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और पेट से जुड़ी समस्याएं ज्यादा रिपोर्ट की गईं.
भारत में एक आम आदमी को कितना महंगा पड़ता है कैंसर का इलाज
रिपोर्ट के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में बीमारी की दर ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा है. 2025 में जहां शहरी इलाकों के करीब 14.9 प्रतिशत लोगों ने खुद को बीमार बताया, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा लगभग 12.2 प्रतिशत रहा. लिंग के आधार पर भी अंतर साफ दिखाई देता है. महिलाओं में स्वास्थ्य समस्याएं पुरुषों की तुलना में अधिक दर्ज की गई हैं. महिलाओं में बीमारी की दर 14.4 प्रतिशत रही जबकि पुरुषों में यह 11.8 प्रतिशत बताई गई है.
कुछ आंकड़े जो सर्वे ने भी सामने नहीं रखे
ओपीडी सेवाओं पर खर्च की जानकारी सर्वे में नहीं दी गई है जबकि इसके लिए डाटा एकत्रित किया गया था. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े आलोचकों का कहना है कि उन मरीजों की पर्याप्त जानकारी नहीं है जो बीमार तो हुए पर इलाज के लिए अस्पताल नहीं गए. अमूल्य निधि इस आंकड़े को इस तरह समझाते हैं, "सर्वे यह बताता है कि लगभग 13.1 प्रतिशत लोग 15 दिनों में बीमार हुए. लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितने लोगों ने इलाज नहीं कराया और इसके पीछे क्या कारण थे. साथ ही, अस्पताल में भर्ती होने की दर सिर्फ 2.9 प्रतिशत है. यह संकेत है कि इलाज की जरूरत कम नहीं, बल्कि सेवाओं तक पहुंच में बाधाएं बनी हुई हैं."
भारत में कम उम्र की महिलाओं में बढ़े ब्रेस्ट कैंसर के मामले
इसके अलावा रिपोर्ट बताती है कि मातृ स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. अब लगभग 96.2 प्रतिशत डिलीवरी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में हो रही है. डॉ. दिव्यांश सिंह इस आंकड़े पर सवाल उठाते हैं, "शहरों में लोग निजी अस्पतालों पर भरोसा करते हैं. गांवों में अब भी महिलाएं पुराने रूढ़िवादी तरीकों पर निर्भर करती हैं. गर्भावस्था के दौरान जांच लगभग सभी को मिल रही होगी लेकिन डिलीवरी के बाद की देखभाल, खासकर गांवों में, सबको नहीं मिलती."
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की जानकारी के अभाव में स्वास्थ्य सेवाओं से बाहर रह जाने वाले लोगों की असली स्थिति पूरी तरह सामने नहीं आ पाती.
-अशोक पांडे
केन्या के सेबेस्टियन सावे इन दिनों दुनिया की निगाह में हैं. बीती छब्बीस अप्रैल को उसने दो घंटे से कम समय में मैराथन पूरी कर इतिहास बना डाला. तब से तमाम बड़े-छोटे अखबारों-चैनलों-पत्रिकाओं में उसके संघर्ष, ग़ुरबत में बीते जीवन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बारे में सैकड़ों लेख लिखे-छापे जा चुके हैं. खेत मजदूर पिता की माली हालत ऐसी न थी कि बेटे को अपने साथ रख पाते से सेबेस्टियन के बचपन का बड़ा हिस्सा दादी के पास रहकर बीता जो एक ऐसे घर में रहती थीं जिसमें बिजली भी नहीं थी.
सेबेस्टियन के चाचा केन्या छोड़ कर युगांडा चले गए थे जहां उन्होंने 800 मीटर दौड़ का राष्ट्रीय रेकॉर्ड बनाया था जो अब भी कायम है. वे ही सेबेस्टियन के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत थे. उन्हीं के इसरार पर उसने भी इसी दौड़ में अपना करियर बनाने की सोच रखी थी. सात बरस पहले उसे एक प्रतिष्ठित रेस में भाग लेने का मौका था लेकिन वह समय पर नहीं पहुँच सका. आठ सौ मीटर दौड़ के सारे स्लॉट भर चुके थे. बस 5000 मीटर रेस में जगह बची थी. उसने उसी में हिस्सा लिया और रेस जीत ली. यही उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.
मार्च 2020 में पैर में चोट लग गयी. दौड़ना मुश्किल हो गया. लेकिन वह उबर गया. फिर उसी साल उसे वेलेंशिया में
पहली मैराथन भागनी थी, उसे कोविड हो गया.
-दिनेश चौधरी
रुप्पन बाबू ने अकड़ी हुई गर्दन के साथ कहा, ‘हमें नकली अक्ल से कोई खतरा नहीं है। इससे खतरा उन्हें हो सकता है, जिनके पास असली अक्ल होती है। हम ठहरे निपट मूरख। अक्ल के मामले में अपने हाथ बड़े तंग है। जब ऊपर वाले के यहाँ यह बंट रही थी, हम बैद महाराज के पीछे जयकारा लगाने के जरूरी काम में व्यस्त थे। अक्ल न उनके हिस्से में आई न अपने। हमारे पास ठेठ मौलिक किस्म की मूर्खता है, इसलिए हमें नकली अक्ल से कोई खतरा नहीं है। अक्ल है ही नहीं तो असल क्या और नकल क्या?’
स्थान-शिवपालगंज में ग्राम प्रधान का कार्यालय। समय-सनीचर के हाथों पिसी भंग को छानने के बाद वाला। मुख्य वक्ता-युवा दिलों की धडक़न रुप्पन बाबू। वक्तव्य के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्ति-भंग की तरंग। मुख्य श्रोता-खन्ना मास्टर, सनीचर, जोगनाथ और बेईमान मुन्नू का भतीजा। मालवीय मास्टर भी होते पर नया सिनेमा लगने के कारण वे छंगामल इंटर कॉलेज के किसी छात्र के साथ नगर-भ्रमण पर थे। बेईमान मुन्नू का भतीजा, जैसा कि आप सब जानते हैं, नवें दर्जे का होनहार विद्यार्थी था और आटा चक्की वाले मास्टर मोतीराम की क्लास में पढ़ता था। मास्टर मोतीराम प्रिंसिपल वाले गुट में थे, इसलिए खन्ना मास्टर गेहूँ पिसवाने के लिए बेईमान मुन्नू की सेवाएँ लेते थे। उनका भतीजा इसी फेर में झोले समेत सभा में शामिल हो गया था, अन्यथा उसके यहाँ होने का कोई औचित्य नहीं था।
रुप्पन बाबू के वक्तव्य को सुनकर सनीचर उनके इस तर्क से बहुत प्रभावित हुआ। न भी होता तो जाहिर तो यही करना पड़ता। सनीचर की इतनी औकात नहीं थी कि रुप्पन बाबू कोई बात कहें और वह प्रभावित न हो। प्रभावित होने के प्रमाण-स्वरूप उसने अपने दाँत बाहर की ओर निकाल लिए, जो पहले से ही बाहर थे और अब वह पहले से भी ज्यादा मूर्ख लगने लगा था। उसे पता था कि परधानी उसे मूर्खता के बल पर ही हासिल हुई है। मूर्ख न होता तो बैद महाराज उसे परधान पद का उम्मीदवार भला क्यों चुनते?
रुप्पन बाबू ने अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘अब इस तरह समझ लो की नकली अक्ल है क्या? मशीन में हम जो डाटा डालते हैं, उसी की प्रोसेसिंग होती है। जैसे हम बेईमान मुन्नू की चक्की में गेहूँ डालते हैं तो गेंहूँ का आटा निकलता है। चावल डालते हैं तो चावल का आटा निकलता है। सिर्फ फिजिकल प्रॉपर्टी चेंज होती है। अक्ल डालते हैं तो पिसकर अक्ल बाहर निकलती है। अब अगर हम इसमें मूर्खता की बातें डालेंगे तो क्या बुद्धिमानी की बात बाहर निकलेगी? नहीं न! बस यही हमारा मास्टर स्ट्रोक है!’
मास्टर स्ट्रोक के नाम पर सनीचर चौकन्ना होकर सीधा खड़ा हो गया। समझ गया कि इसका सम्बन्ध हो न हो बैद महाराज से है। मास्टर स्ट्रोक लगाने का काम शिवपालगंज में अकेले उन्हीं के बस का था। कोई और होता तो सनीचर कॉपीराइट के वायलेशन के नाम पर उससे भिड़ जाता पर रुप्पन तो उसी खानदान के रोशन चिराग थे। सनीचर कोई और बात कहता, इससे पहले ही खन्ना मास्टर मैदान में कूद पड़े, कहा-‘अक्ल का मुकाबला भला मूर्खता से कैसे किया जा सकता है?’
रुप्पन बाबू के दिल में फौरन यह बात आई कि इस मुल्क में मास्टर लोग जब भी कोई बात कहेंगे, मूर्खता की ही कहेंगे। हमारे पास रिसोर्सेज की कमी नहीं है। स्कूल-कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक कच्चा माल इफरात भरा पड़ा है। इनका सही ढंग से दोहन हो तो दुनिया में कोई माई का लाल अपना मुकाबला नहीं कर सकता.. दिल की बात दिल में ही रखते हुए प्रकटत: उन्होंने कहा, ‘अब मास्टर जी बात तो तुम्हारी भी सही है पर मामला होने और न होने का है। इंसान वही चीज इस्तेमाल करेगा जो उसके पास होगी। उनके पास अक्ल है तो वे अक्ल का इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे पास नहीं है तो हम क्या करेंगे? जो साधन होगा, वही न काम में लायेंगे! हमारे पास जो है, उसी का बेहतर इस्तेमाल करने में अपनी भलाई है।’
रुप्पन बाबू ने अपना वक्तव्य जारी रखा, ‘सब तरफ इसी बात को लेकर बहस छिड़ी है कि असली और नकली अक्ल के फेर में दुनिया का क्या होगा? हम कहते हैं कि ये मुद्दा ही गलत है। असली चीज का मुकाबला असली चीज से ही हो सकता है, भले ही वह मूर्खता क्यों न हो। हमको अपनी रिसर्च इसी तरफ आगे बढ़ानी चाहिए।’
खन्ना मास्टर थोड़े कन्फ्यूज हो गये। जब समझदारी का मुकाबला नासमझी से करना हो तो उन्हें समझ में नहीं आया कि वे रुप्पन बाबू की अज्ञानता से प्रभावित हों या उनके ज्ञान से। उन्होंने रुप्पन बाबू से कहा कि वे अपनी बात किसी उदाहरण के साथ सरल भाषा में रखें।
टीचर होने के नाते खन्ना मास्टर का रुप्पन बाबू खूब सम्मान करते थे। वे कॉलेज के प्रिंसिपल का भी उतना ही सम्मान करते थे और चपरासी का भी। वे खन्ना मास्टर, प्रिंसिपल साहब, चपरासी, और सनीचर; उन सबको समभाव से देखते थे जो बैद महाराज की चाकरी करते थे। वे खन्ना मास्टर से उसी सम्मान के साथ सम्बोधित हुए और कहा, ‘सुनो खन्ना मास्टर! इंसान और मशीन का मुकाबला कभी नहीं हो सकता। इंसान, इंसान है और मशीन, मशीन है। जैसे बैद महाराज, महाराज हैं और सनीचर फटीचर है..।’
रुप्पन बाबू के इस वाक्य को सनीचर ने प्रशंसा की तरह ग्रहण किया और उनके आगे रखे खाली प्याले को लबालब भर दिया। रुप्पन बाबू ने ‘थैंक्स’ की मुद्रा में एक घूँट भरते हुए कहा, ‘बात किसी चीज को जानने की नहीं, मानने की है। हम अपने सभी मूर्खतापूर्ण कामों को ही समझदारी बताने लगें तो हमसे कोई क्या खाकर आगे बढ़ जायेगा? आप कितने भी ज्ञानी हों, हम परम-मूर्ख को ही अपना परम-पिता मान लें तो आप क्या कर लेंगे? सच और समझदारी से ज्यादा बड़ी ताकत झूठ और नासमझी में होती है बशर्ते प्रचार तगड़ा हो। जो जितना ज्यादा प्रोपेगंडा कर सके, आज के जमाने में वही सही है। और इस काम में हमारी सहायता कौन करेगा? कोई अक्ल वाला इंसान तो नहीं करेगा। करेगा भी तो लालच में। नि:स्वार्थ सेवा तो हमें असल वालों से ही मिलेगी। इसीलिए हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जरूरत नहीं है, हम ओरिजिनल नॉनसेंस से अपना काम बेहतर ढंग से चला सकते हैं।’
‘ओरिजिनल नॉनसेंस से क्या यह मतलब निकाला जाये कि अर्टिफिशियल नॉनसेंस भी हो सकता है?’ खन्ना मास्टर ने पूछा।
‘हो सकता है पर इसकी जरूरत ही क्या है?’ रुप्पन बाबू ने कहा, ‘जब हमारे पास शुद्ध देसी घी है तो हमें वनस्पति तेल की क्यों खाना चाहिए? हम गांधी के चेले हैं और मशीन पर निर्भरता नहीं रखना चाहते। मास्टरजी! तुम्हें तो पता ही है कि हमारे छंगामल इंटर कॉलेज में साढ़े तीन सौ इस्टूडेंट हैं, जो किताबों में अपना समय बर्बाद नहीं करते। प्रिंसिपल साहब इन्हें व्हाट्सएप पर ज्ञान की सामग्री भेज देते हैं। इनका डेटा यही है। जब हमारे पास असली वाले हैं तो हमें मशीन की क्या जरूरत?’
‘अब एक मजे की बात सुनो’, रुप्पन बाबू ने अपना व्याख्यान जारी रखा, ‘आज मैं मशीन से बात कर रहा था। वो अपने आप को बड़ा सयाना समझता है तो मैंने भी सोचा कि जरा इसे गंजहों की भाषा समझाई जाये। मैंने उससे पूछा कि -तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर?’
‘उसने खटाक से कहा- तीन!’, रुप्पन बाबू बोले, ‘मगर-मैंने कहा कि बीच वाला तीतर भी बोल रहा है कि उसके आगे भी तीन हैं और पीछे भी तीन..यह कैसे हुआ?’
‘मशीन सोच में पड़ गयी। सारी अर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी धरी रह गयी। आखिर में मुझसे ही पूछा कि अच्छा तुम्हीं बता दो।’
‘मैंने कहा, बीच वाला तीतर झूठ बोल रहा था। यह सुनते ही मशीन हैंग हो गई। हम अपने ओरिजिनल नॉनसेंस में थोड़ा-सा झूठ और बहुत सारी बेशर्मी मिला लें तो दुनिया की कोई ताकत हमारा मुकाबला नहीं कर सकती।’
इतना सुनते ही सनीचर ने मारे प्रसन्नता के भंग के सारे ग्लास भर दिये। इसके बाद की कार्रवाई का विवरण रिकॉर्ड से निकाल दिया गया है, क्योंकि वह गंजहों की मौलिक, मुहावरेदार, आत्मीय सम्बन्ध बनाने वाली भाषा से होते हुए सर्फरी बोली में पहुँच चुकी थी। शिक्षक होने के नाते खन्ना मास्टर वहाँ से खिसक चुके थे।
(303, राजुल एग्जॉटिका, कजरवाड़ा रोड, बिलहरी, जबलपुर -482020)
-------------
(जबलपुर के लेखक दिनेश चौधरी पिछले कुछ वक्त से सामयिक संदर्भों, और मुद्दों को लेकर श्रीलाल शुक्ल के विख्यात व्यंग्य-उपन्यास ‘राग दरबारी’ के किरदारों को लेकर उसी तर्ज पर लिख रहे हैं। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़’को इन्हें छापने की इजाजत दी है। -संपादक)
- सी. पी. राधाकृष्णन
चित्रा पूर्णिमा के शुभ अवसर पर, जब मंदिर उत्सव मनाए जा रहे हैं, मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रत्येक घर में सुख- समृद्धि बढ़े। मुझे सभी भाईयों और बहनों को बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं देते हुए प्रसन्नता हो रही है।
भारत ने विश्व को जो अनेक उपहार दिए हैं, उनमें बौद्ध धर्म सर्वोपरि है। भगवान बुद्ध का जीवन और उनके उपदेश, आज भी दुनिया भर के लाखों लोगों के जीवन को प्रकाशमान कर रहे हैं। भारत ने विश्व को आत्म-साक्षात्कार का महत्व सिखाया। बुद्ध शब्द का अर्थ ही है "जाग्रत व्यक्ति"। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मानवता को आत्मज्ञान की राह दिखाने वाली इस महान आत्मा का जन्म और ज्ञान प्राप्ति, दोनों एक ही दिन हुए।
राजकुमार सिद्धार्थ का पालन-पोषण विलासिता में हुआ। 29 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपना महल, पत्नी, पुत्र और समस्त सांसारिक धन-संपत्ति त्यागकर आध्यात्मिक सत्य की खोज में विचरण किया। छह वर्षों के गहन शोध के बाद, उन्होंने बोधगया के बोधि वृक्ष के नीचे परम ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बन गए। चार आर्य सत्यों और नैतिक आचरण के मार्ग की प्राप्ति ने एक नए दर्शन का आरंभ किया, जिसने विश्व इतिहास में भारत के गौरव को नई ऊंचाई दी। वाराणसी के पास सारनाथ में उन्होंने पांच तपस्वियों को अपना प्रथम उपदेश दिया। "धर्मचक्र प्रवर्तन" के नाम से प्रसिद्ध यह उपदेश बौद्ध धर्म की नींव बना और बौद्ध परंपरा की औपचारिक शुरुआत का यह प्रतीक था। समय के साथ, अनेक लोग उनके उपदेशों से प्रभावित हुए। मगध के राजा बिम्बिसार ने राजगीर में वेणुवन (बांस उपवन) विहार दान किया। धनी अनाथपिंडिका ने पूरे जेतवन उपवन को स्वर्ण मुद्राओं से ढककर एक विहार(मठ) का निर्माण करवाया। ऐसे कार्य भारत में विद्यमान धर्मपरायणता में गहरी आस्था को दर्शाते हैं।
विहारों के माध्यम से चार आर्य सत्यों का प्रसार होता है: इच्छा दुख का मूल कारण है; इच्छा का त्याग करने से दुख पर विजय पाई जा सकती है, और अष्टांगिक मार्ग का पालन कर दुख से मुक्त जीवन जिया जा सकता है। बुद्ध ने सलाह दी: अतीत पर ध्यान न दें, वर्तमान में जिएं। सत्यनिष्ठा में महान शक्ति होती है। मन सभी कर्मों का मूल है, इसलिए सकारात्मक सोच विकसित करें। कठिन समय में भय से पीछे न हटें। जीवन की यात्रा अंततः व्यक्तिगत होती है, इसलिए इसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाओ। शब्दों में घाव देने की शक्ति होती है, इसलिए मधुर वाणी बोलो। प्रेम और अहिंसा आवश्यक हैं। निरंतर सीखते रहो, कभी रुकें नहीं।
मणिमेकलई और कुंडलकेसी जैसे तमिल साहित्यिक ग्रंथों में बौद्ध दर्शन का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। हालांकि, अनेक प्राचीन ग्रंथ समय के साथ लुप्त हो गए, फिर भी उनका योगदान अमूल्य बना हुआ है।
“मदिरा जो मन को भ्रमित करती है, और जीव हिंसा-
बुद्धिमान, मोह से मुक्त होकर, इनका त्याग करते हैं, सुनो:
जन्म और मृत्यु, तथा मृत्यु के बाद पुनर्जन्म,
नींद और जागरण के समान हैं-यही सत्य है।
जो धर्मपूर्ण कर्म करते हैं, वे श्रेष्ठ लोक को प्राप्त होते हैं,
और जो अधर्म करते हैं, वे गहन दुःख में गिरते हैं।
इस सत्य को समझकर विवेकी जन अपने सभी बंधनों को तोड़ देते हैं।”
इस प्रकार महाकाव्य मणिमेकलै (आथिरै पिच्चैयिट्टा काथै: 84–90) बौद्ध धर्म के सार को स्पष्ट करता है।
उन्होंने पांच नैतिक सिद्धांतों पर विशेष बल दिया-अहिंसा, चोरी न करना, व्यभिचार से दूर रहना, सत्य बोलना और नशीले पदार्थों से परहेज़ करना। धर्म से आगे बढ़कर उन्होंने सिखाया कि मन ही हर चीज़ की जड़ है। सकारात्मक विचार और श्रेष्ठ कर्म ही व्यक्ति तथा समाज में संतुलन और शांति लाते हैं। अशांत मन को ज्ञान और स्पष्टता देने के कारण उन्हें “एशिया का प्रकाश” कहा जाता है।
मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मन की बात” कार्यक्रम के शब्द याद आते हैं-“भगवान गौतम बुद्ध के जीवन का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने हमें सिखाया कि शांति की शुरुआत हमारे भीतर से होती है, उन्होंने यह एहसास कराया कि स्वयं पर विजय पाना ही सबसे बड़ी जीत है। आज जब दुनिया तनाव और संघर्ष के दौर से गुजर रही है, तब बुद्ध के उपदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।”
(छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक असहज सच)
- पीयूष मिश्रा
प्रदेश के अनेक गांवों में सुबह जल्दी निकलें, तो एक दृश्य दुर्भाग्य से आम होता जा रहा है। कुछ घरों के दरवाजे बंद हैं, कुछ आंगन सूने हैं, और कहीं बच्चों की आंखों में है एक स्थायी इंतजार- यह इंतजार केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस जीवंत दिनचर्या का है, जो कभी इन गांवों की रौनक हुआ करती थी।
आज स्थिति यह है कि गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं और शहरों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। सरगुजा, जशपुर, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, बस्तर और कांकेर जैसे जिलों से बड़ी संख्या में लोग हैदराबाद, सूरत, मुंबई और दिल्ली तथा उसके आस-पास के अर्बन कॉंगलोमेरट्स की ओर जाते हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव अब पहले से कहीं अधिक गहरा और व्यापक हो चुका है।
शहरों के ग्लैमर को परिभाषित करनेवाली गगनचुंबी इमारतें, कॉर्पोरेट हाइटेक दफ्तर और अपमार्केट मॉल, सभी गाँव से पलायन करनेवाले मजबूर... क्षमा करें... मजदूर ने ही बनाएं हैं। बहुत हद तक भारत में पलायन को एक सामान्य आर्थिक प्रक्रिया मान लिया गया है, परंतु इसके भीतर छिपा सामाजिक यथार्थ कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2020-21 के अनुसार देश में लगभग 28.9त्न जनसंख्या प्रवासी है। 2011 की जनगणना में 45 करोड़ से अधिक लोग अपने मूल स्थान से अलग रह रहे थे और हालिया अनुमान बताते हैं यह संख्या 60 करोड़ के आसपास जा चुकी है। इन प्रवासियों में बड़ी संख्या श्रमिकों की है, जिनके लिए पलायन विकल्प नहीं, परिस्थितिजन्य अनिवार्यता है। छत्तीसगढ़ में ही लगभग 88 लाख लोग किसी न किसी रूप में प्रवासन से जुड़े हैं। यह संकेत है कि यह मुद्दा अब व्यक्तिगत आजीविका नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को प्रतिबिंबित करता है।
छत्तीसगढ़ जैसे युवा राज्य में, जहां बड़ी जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में है, यह विषय अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। पलायन व्यक्ति का स्थानांतरण मात्र नहीं, बल्कि गांव की श्रमशक्ति, ऊर्जा और संभावनाओं का विघटन भी है। परिणामस्वरूप एक ओर गांवों की आर्थिक गतिविधियां कमजोर पड़ती हैं और दूसरी ओर शहरों में अवसंरचना पर दबाव, झुग्गी-बस्तियों का विस्तार और असंगठित श्रम का शोषण बढ़ता है। अत: प्रवासन एक साथ ग्रामीण क्षरण और शहरी असंतुलन—दोनों की जननी है।
परंतु इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गहरा और अनदेखा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। गांवों में ऐसे असंख्य बच्चे हैं, जिनके पिता, और कुछ के माता-पिता दोनों, महीनों या वर्षों से बाहर हैं। वे दादा-दादी या अन्य परिजनों के साथ रहते हैं लेकिन उनके जीवन में एक स्थायी भावनात्मक रिक्तता धीरे-धीरे आकार लेने लगती है। बच्चा प्रतिदिन किसी संवाद, किसी स्पर्श, किसी उपस्थिति की प्रतीक्षा करता है। वह जानता है कि पिता दूर हैं, फिर भी हर शाम उसके भीतर एक उम्मीद बनी रहती है। समय के साथ यह प्रतीक्षा असुरक्षा में बदल जाती है-वह कम बोलने लगता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और उसका आत्मविश्वास डोल जाता है। यह केवल भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की जड़ में लगने वाली दरार है।
हमारी संस्कृति में परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, अपितु जीवन का आधार माना गया है। संयुक्त परिवार, पीढिय़ों के बीच सतत् संवाद, साथ बैठ कर भोजन करना और दिनभर की घटनाओं को साझा करना, ये सब केवल परंपराएं नहीं, बल्कि मनुष्य के मानसिक संतुलन के स्तंभ हैं। जब पलायन इस संरचना को तोड़ता है, तो उसका प्रभाव केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता। बच्चे अपने माता- पिता के साथ जो संवाद, अनुशासन और स्नेह सीखते, वह उनसे छूट जाता है। यही कारण है कि आज हमें कुटुंब-प्रबोधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, परिवार को पुन: केंद्र में लाने की आवश्यकता है।
स्वयं एक औद्योगिक इकाई के संचालन के अनुभव से यह द्वंद्व अधिक स्पष्टता से समझ आता है। मेरे गांव के समीप उद्योग स्थापित करने का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी था कि स्थानीय लोगों को ऐसी आजीविका मिले, जहां से वे प्रतिदिन अपने परिवार के पास लौट सकें। यहां मजदूरों को मिलने वाली आय शहरी क्षेत्रों की तुलना में कुछ कम हो सकती है, परंतु इसके बदले जो मिलता है, वह है बच्चों के साथ समय, पारिवार के साथ संवाद और सामाजिक संतुलन। दिन कैसा भी गुजरे शाम में घर लौटकर वे और उनका पारिवार एक-दूसरे से वंचित नहीं रहते। यह उनके द्वारा ऐसा अमूर्त निवेश है, जिसका मूल्य किसी मूर्त वेतन से नहीं आंका जा सकता।
लेकिन इसी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी सामने आती है। उद्योग में ऐसे श्रमिक भी हैं, जो दूर-दराज से आकर महीनों तक अपने परिवार से दूर रहते हैं। उनकी आंखों से कमाई की मजबूरी स्पष्ट टपकती है, परंतु जीवन में स्थिरता का अभाव भी उतना ही स्पष्ट दिखता है। दूसरी ओर, कई बार यह भी देखने में आता है कि स्थानीय युवा अपने गांव में उतनी उत्पादकता से कार्य नहीं करते, जितनी वे बाहर जाकर करते हैं। वही व्यक्ति, जो गांव में अनुशासन से कार्य नहीं करता, बाहर जाकर लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में काम करता है और कई बार शोषण तक सहन करता है। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि माइन्ड्सेट का संकट है-अपने परिवेश का अवमूलन और बाहरी अवसरों का अति-मूल्यांकन।
प्रवासी श्रमिकों की स्थिति का एक और पहलू है, जो समाज के लिए चिंताजनक है। परिवार से दूर, अस्थायी, अनियंत्रित और असुरक्षित परिस्थितियों में रहने के कारण कई बार मद्यपान की प्रवृत्ति और पॉर्न की खपत में वृद्धि देखी जाती है, जिसके फलस्वरूप रेप और हत्या जैसे जघन्य अपराध की घटनाएं भी सामने आती हैं। यह केवल व्यक्तिगत पतन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के विघटन का संकेत है। जब यही व्यक्ति अपने गांव लौटता है, तो यह व्यवहार भी साथ लाता है, जिससे धीरे-धीरे समाज का मूल स्वरूप प्रभावित होता है।
छत्तीसगढ़ जैसे युवा राज्य, जिसकी माध्य आयु लगभग 24-26 वर्ष के बीच आँकी जाती है, के लिए यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यह सीधे-सीधे उसकी मानव संसाधन क्षमता पर चोट करती है।
यदि बच्चे भावनात्मक असुरक्षा, सामाजिक असंतुलन और मार्गदर्शन के अभाव में बड़े होंगे और युवाओं को कार्य-व्यवहार की नैतिक चुनौतियाँ से दो-दो हाथ होते रहना पड़ेगा,
तो यह दीर्घकाल में राज्य की उत्पादकता और सामाजिक स्थिरता दोनों को प्रभावित करेगा। किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसके खनिज संपदा या उद्योग नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी की गुणवत्ता में निहित होती है।
-अरुण कुमार त्रिपाठी
हिंदी पत्रकारिता जब अपने उद्भव के दो सौ वर्ष पूरा करके विकास की ऐसी अवस्था में पहुंच गई है जब उसके चीखने और उछलने वाले एंकर, संवाददाता और संपादक अपनी कामयाबी इस बात में मानते हैं कि वे समाज में नफरती कहानियां और बहसें चलाते हुए सत्ता के कितने करीब पहुंच जाएं और कितनी जल्दी सूचना आयुक्त या राज्यसभा के सदस्य बन जाएं। वे सत्ताधीशों के साथ कितनी विदेश यात्राएं करें या कितने धार्मिक आयोजनों में मंच पर रहें, या फिर वे अपने निरंतर बढ़ते हुए लाखों के पैकेज का अनंत काल तक आनंद लेते रहें और बार बार परदे पर किसी विपक्षी नेता को डांटते हुए अपना ग्लैमर बिखेरते रहें। ऐसे समय में कोई पत्रकार हाल में शहीद हुई लेबनान की पत्रकार अमल खलील पर क्यों कुछ लिखना और उनसे कुछ सीखना चाहेगा। लेकिन इस स्तंभकार को लगता है कि अमल खलील की पत्रकारिता और उनके छोटे से जीवन से सीखने और उससे पश्चिम एशिया और उसकी जोखिम भरी पत्रकारिता को समझने में बहुत मदद मिल सकती है। उनका जीवन हमारी दो सौ वर्षीय हिंदी पत्रकारिता को आइना दिखाने का साहस भी रखती है।
बयालीस वर्षीय अमल खलील (1984-2026) बेरूत के अरबी अखबार अल-अखबार की पत्रकार थीं। जिन्हें पिछले हफ्ते दक्षिणी लेबनान में इजराइली सेना ने निशाना लगाकर मार डाला। हिंदी के ग्लैमर वाले पत्रकारों के मुकाबले सत्रह साल के अनुभव वाले इस पत्रकार का सैलेरी पैकेज भी बहुत मामूली था। उन्हें पहले से ही धमकियां दी गई थीं कि संभल जाएं नहीं तो मार दी जाएंगी। लेकिन पत्रकारिता उनका जुनून था। वे जिस मलबे में दबी हुई थीं वहां से उन्हें निकाले जाते समय भी उस पर इजराइली सेना मिसाइलें बरसा रही थी ताकि उन्हें किसी भी कीमत पर बचाया न जा सके। इस बात को रेडक्रॉस के कर्मचारियों ने कहा है, जिसका इजराइली सेना ने खंडन किया है। वे उस दक्षिणी लेबनान की विशेषज्ञ थीं जिस पर इजराइल लगातार हमले कर रहा है और तमाम शांति वार्ताओं के बाद भी वहां से हटने को तैयार नहीं है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अमल खलील युद्ध संवाददाता थीं। वे स्वयं एक इंटरव्यू में इस बात से इंकार करती हैं। उनका कहना है कि उनके पास वैसा कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था जो युद्ध संवाददाता के पास होता है। वे अपने को फील्ड करेस्पांडेंट(क्षेत्र संवाददाता) बताती हैं। इजराइली हमले और लेबनानी प्रतिरोध के बीच उन्होंने जिस तरह की खबरें कीं वे अपने में एक मिसाल हैं। विशेषकर आज अपने परदे पर सनसनीखेज तरीके से मिसाइलों और युद्धों को दर्शाने वाली टीवी पत्रकारिता और युद्ध पर रंग बिरंगे पन्ने सजाने वाले अखबारों को सिखाने के लिए अमल खलील के पास बहुत कुछ है। खलील ने कहा था कि ज्यादातर पत्रकार आग लगाऊ रिपोर्टिंग करते हैं। वे लोग भी जो इजराइली हमले की ओर से कर रहे हैं और वे भी जो लेबनान और फिलिस्तीन जनता की ओर से उनके हमले से होने वाले विनाश को दर्शाते हैं। खलील के अनुसार ऐसे पत्रकार जो लेबनान की ओर से रिपोर्टिंग करते हैं वे एक जवाबी प्रोपेगैंडा चलाते हैं। वे इजरायली हमले से हुए नुकसान को कम करके दर्शाते हैं और प्रतिरोध को बड़ी उपलब्धि के तौर पर बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं। उसके विपरीत अमल खलील ने वस्तुगत रिपोर्ट दिखाने की कोशिश की ताकि पाठक या दर्शक इजराइली हमले के प्रति सावधान रहें। उनकी रिपोर्टिंग के दो पक्ष थे। एक लेबनानी और फिलस्तीनी प्रतिरोध की खबर देना और दूसरा सामान्य नागरिकों के जीवन की सच्चाई बताना।
अमल का कहना था कि वे इजराइली हमलों और उसके बाद की स्थितियों का दस्तावेजीकरण करती थीं। इसमें उनके दो उद्देश्य थे। एक तो साम्यवादी विचार और दूसरा प्रतिरोध। उन्होंने 2006 और 2023 के हमलों को भी विस्तार से कवर किया था। उन्हें अपना गांव छोडक़र भागना भी पड़ा था। फिर भी वे दक्षिणी लेबनान में कवरेज के लिए जाया करती थीं। अखबार में खबरें लिखने के कारण उन्हें कम लोग ही जानते थे। लेकिन उनकी रिपोर्ट को लोग पढ़ते थे। बल्कि उनके संपादक का कहना था कि उन्हें बहुत कुछ सिखाने और बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनमें एक स्वाभाविक किस्म का पत्रकार है। अमल ने 2020 से अपना वीडियो बनाना शुरू किया लेकिन उन्होंने अपने वीडियो में खुद को कभी नहीं प्रस्तुत किया। वे कहती भी थीं कि मैं कहानी कहने के लिए हूं न कि खुद कहानी बनने के लिए। उनकी यह बात आज के हिंदी पत्रकारों के एकदम विपरीत है जो बिना कुछ किए धरे हमेशा कहानी बनने को लालायित रहते हैं।
लेकिन आखिर में अमल खलील खुद कहानी बन गईं क्योंकि अपनी उत्पीडि़त जनता की कहानी कहने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, घर, परिवार, करियर और जीवन भी। अमल जानती थीं कि उनके साथ क्या होने वाला है। उन्हें मालूम था कि पिछले दो सालों में गजा में कितने पत्रकार मारे गए। यहां तक कि उनके अखबार के वरिष्ठ संवाददाता असफ अबू रहल कुछ साल पहले जब दक्षिणी लेबनान के कवरेज के लिए आए थे तो उन्हीं के सामने उन्हें इजरायली सैनिकों ने मार डाला था। थोड़ी देर बाद एक इजरायली सैनिक ने अमल से पूछा था कि क्या वे अल-अखबार की पत्रकार हैं, जब उन्होंने हां कहा तो इजरायली सैनिक ने उन्हें खून से सना हुआ उनका परिचय पत्र पेश किया और कहा कि अब यही बचा है।
अमल खलील के जीवन और उनकी पत्रकारिता के बहाने यह सवाल लाजिमी है कि वे युद्ध संवाददाता थीं या शांति संवाददाता। यहां हम नार्वे के मशहूर समाजशास्त्री और शांति अध्येता जोहान गाल्तुंग के हवाले से कह सकते हैं कि अमल ने शांति की पत्रकारिता की। वैसे जैसे भारत में तमाम पत्रकार नफरत के खिलाफ अपनी जान जोखिम में डालकर दंगों में कूदते रहे हैं। जिनमें सबसे बड़ा नाम है गणेश शंकर विद्यार्थी का। उन्हीं की परंपरा के कई पत्रकार रहे हैं जिन्होंने अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को अपनी जान जोखिम में डालकर भीड़ के उन्माद और उसे भडक़ाने वालों की सच्चाई दर्शाने की कोशिश की थी।
युद्ध की पत्रकारिता और शांति की पत्रकारिता का अंतर स्पष्ट करते हुए गाल्तुंग कहते हैं कि आमतौर पर पारंपरिक पत्रकारिता युद्ध की पत्रकारिता है। वह एक तरफ के विनाशकारी हथियारों के जखीरों और सैन्य शक्ति का गौरवगान करती है और विनाश का प्रचार करती है। वह नेताओं और सैनिक अधिकारियों के चुनौती देने वाले और भडक़ाने वाले बयानों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करती है। उसके वर्णनों में आमजन के दुखों और तकलीफों के लिए बहुत कम जगह होती है और न ही उनके शांति प्रयासों को स्थान दिया जाता है।
-देवेन्द्र नाथ शर्मा
छत्तीसगढ़ के एक सरकारी महाविद्यालय में विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर अपने ही महाविद्यालय के विद्यार्थियों को महाविद्यालय के ही पुस्तकालय का भ्रमण करवाया गया। विद्यार्थियों को रैक में रखी किताबों को दिखलाया गया, कुछ विद्यार्थियों ने पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं को अपने हाथों में लेकर देखा, पलटाया।
यहां कुछ सवाल खड़े होते हैं; एक तो यह कि विद्यार्थियों में न पुस्तकों के प्रति रुचि है और न ही पुस्तकालय के प्रति। साल भर के सत्र के बीत जाने के बाद में विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर यदि वे पुस्तकालय का भ्रमण कर रहे हैं तो यह सोचा जा सकता है कि इसके पहले पुस्तकालय का वे कितना उपयोग वे कर रहे या कर पा रहे होंगे? दूसरा, महाविद्यालयों में अब पुस्तकालय में बैठकर पढऩे की संस्कृति भी खत्म-सी होती जा रही है। न पाठक आते हैं और न ही पाठकों के लिए माकूल व्यवस्थाएं पुस्तकालय में होती है। निजी महाविद्यालयों में स्थिति थोड़ी बेहतर होती है किंतु गिनती के महाविद्यालय को छोडक़र सभी सरकारी महाविद्यालयों में पुस्तकालय अलमारी और रैंक्स में ही बंद या नजरबंद है। अधिकतर महाविद्यालयों में लाइब्रेरियन ही नहीं है, प्राध्यापक को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। बच्चों के लिए बैठने की व्यवस्था का अभाव और पुस्तकालय से पुस्तकों का नियमित नियतकालिक लेन-देन का खंडित तरीके से होना, पुस्तकालय के प्रति विद्यार्थियों में अरुचि उत्पन्न करता है। दो दशकों से परीक्षा की तैयारी हेतु विद्यार्थियों की कुंजियों पर बढ़ी निर्भरता उन्हें पुस्तकालय से दूर करती हैं। महाविद्यालयीन पुस्तकालयों में नई किताबों व शोध पत्रिकाओं का हर वर्ष होने वाला नियमित क्रय लगभग बंद है। ऐसी स्थिति में पुस्तकालय हेतु नियमित आबंटन न होने से समृद्ध पुस्तकालयों वाले पुराने महाविद्यालयों में नई-नई पुस्तकों की खरीद न हो पा रही हैं और शोध व अन्य स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रदाय अवरुद्ध हो गया है। गत कुछ वर्षों में खुले नए सरकारी महाविद्यालयों में तो पुस्तकालय एक-दो अलमारी में ही सीमित है। न बैठने की जगह और न ही पुस्तकों के पढऩे की उपयुक्त व्यवस्था। ऐसी स्थिति में लगता है कि जहां अच्छे पुस्तकालय रहे हैं, उन महाविद्यालय के पुस्तकालय अब एक संग्रहालय में तब्दील होते चले जा रहे हैं। जहां विद्यार्थियों को लाकर बताया जा सकेगा कि ऐसे पुस्तकालय हुआ करते थे जिसमें पुस्तक रखी जाती थी और विद्यार्थी बैठ कर पढऩे आते थे और सप्ताह-दो सप्ताह के लिये पुस्तक अपने घर भी ले जा सकते थे।
सोशल मीडिया पर कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि कार्यस्थल पर अगर हिजाब की अनुमति है, तो हिंदू धार्मिक प्रतीकों की इजाजत क्यों नहीं होनी चाहिए। भारत में कंपनियों के नियम और कानून इस बारे में क्या कहते हैं?
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट–
देश में कार्यस्थल पर धार्मिक प्रतीकों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। हाल ही में लेंसकार्ट और एयर इंडिया की हैंडबुक के स्क्रीनशॉट वायरल हुए। दावा किया गया कि एयर इंडिया के केबिन क्रू को ड्यूटी के दौरान बिंदी, सिंदूर, तिलक, चूड़ा और कलावा पहनने की अनुमति नहीं है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे हिंदू संस्कृति का अपमान बताना शुरू कर दिया। बाद में दोनों कंपनियों ने स्पष्ट किया कि जिन मैनुअल्स को लेकर विवाद उठ रहा है, वे असल में पुराने हैं।
किस चीज की इजाजत है और किस पर रोक है, यह हर संस्था के अपने नियम और परिस्थितियों पर निर्भर करता है, न कि सीधे किसी के धर्म पर। अक्सर ऐसे प्रतिबंध कार्यस्थल पर समानता और एकरूपता बनाए रखने के उद्देश्य से लगाए जाते हैं। हालांकि अदालतें कुछ प्रतीकों को ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ मानती हैं। जबकि कई अन्य को वैकल्पिक या सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखती हैं, फिर भले ही आस्था रखने वाले इससे असहमत हों।
विवाहित हिंदू महिला का ‘विवाहित दिखना’
प्रियंका मित्तल गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं। उनकी शादी पिछले साल राजस्थान के भीलवाड़ा के एक परिवार में हुई थी। प्रियंका सिंदूर, चूडिय़ां और मंगलसूत्र पहनकर दफ्तर नहीं जातीं। इस पर ससुराल ही नहीं, उनके अपने परिवार को भी आपत्ति है। प्रियंका इसके पीछे अपने कारण बताती हैं। चूडिय़ां पहनकर लैपटॉप पर काम करना मुश्किल होता है। गर्मियों में मंगलसूत्र से गर्दन पर रैशेज हो जाते हैं। वह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, ‘मुझे देखकर कोई भी सबसे पहले यही सवाल पूछता है कि मंगलसूत्र कहां है? शादी के बाद मैं अपने घर गई थी। मैं बहुत थकी हुई थी। इसलिए मैंने मंगलसूत्र उतारकर रख दिया। मेरी मां ने तुरंत मुझे वापस पहनने के लिए कहा।’
प्रियंका आगे बताती हैं, ‘मेरी अपनी पसंद मायने ही नहीं रखती। मुझे हर समय मंगलसूत्र, बिछिया और सिंदूर पहनकर ‘शादीशुदा’ दिखना है। ससुराल में तो मुझे हर समय घाघरा पहनने और घूंघट करने को कहा जाता है। लोग तो यह तक कहते हैं कि पत्नी बनना एक ‘सौभाग्य’ है। ये प्रतीक हमारी पहचान और गर्व हैं।’
सायली केतकर मुंबई में स्थित एक निजी बैंक में काम करती हैं। उनके पति कहते हैं कि जैसे मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनती हैं, वैसे ही उन्हें सिंदूर और मंगलसूत्र पहनना चाहिए। शादी में मिले गहनों को लेकर भी उन पर दबाव है। सायली ने बताया, ‘मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं सोने का नथ, मंगलसूत्र और अंगूठी हमेशा पहनकर रखूं। लेकिन इन्हें पहनकर बैंक में काम करना अनकम्फर्टेबल लगता है। वैसे भी नाम से धर्म और उम्र से वैवाहिक स्थिति समझी जा सकती है। इसके लिए प्रदर्शन की जरुरत नहीं।’
कई नारीवादी और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों में इन्हें ऐसे प्रतीक माना जाता है जो महिला की पहचान को विवाह से जोड़ते हैं, लेकिन पुरुषों पर समान प्रतीकात्मक दायित्व नहीं डालते। इसी वजह से आधुनिक बहसों में इन्हें धर्म से ज्यादा सामाजिक और पितृसत्तात्मक परंपराओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। लेकिन चूंकि बहुत-सी महिलाएं अपनी पसंद से बिंदी, सिंदूर या मंगलसूत्र पहनती हैं इसलिए इनके केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक मायने भी हैं।
ऐसा भी नहीं कि ऐसे प्रतीकों को लेकर बहस सिर्फ भारत में ही है। साल 2017 में ‘यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस’ ने फैसला सुनाया कि कंपनियां कर्मचारियों के धार्मिक प्रतीकों जैसे हिजाब, पगड़ी, क्रॉस और किप्पा पर रोक लगा सकती हैं, बशर्ते यह नियम ‘न्यूट्रल’ ड्रेस कोड के तहत सभी पर समान रूप से लागू हो। अदालत ने अपने बयान में कहा, ‘किसी संस्था का आंतरिक नियम, जो किसी भी राजनीतिक, दार्शनिक या धार्मिक प्रतीक को दिखने से रोकता है, उसे सीधे तौर पर भेदभाव नहीं माना जाएगा।’ कई धार्मिक संगठनों ने इस फैसले पर चिंता जताई और कहा कि इससे कर्मचारियों के धार्मिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ का फैसला लेती है अदालत
कार्यस्थल पर ऐसे नियम और शर्तें अक्सर समानता और एकरूपता (यूनिफॉर्मिटी) कायम रखने के लिए बनाए जाते हैं। ताकि किसी के साथ भेदभाव न हो और सभी कर्मचारी एक स्तर पर रहें। भारतीय कानून में ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ (एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिस) का सिद्धांत यह तय करने के लिए इस्तेमाल होता है कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथाएं वास्तव में उसके लिए अनिवार्य है। यह अधिकार अदालत के पास है। अगर कोई प्रथा महत्त्वपूर्ण मानी जाती है तो उसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलता है। जैसे सिखों के लिए बाल न काटना और पगड़ी रखना उनकी आस्था का अहम हिस्सा माना गया है।
सुप्रीम कोर्ट में वकील शशांक सिंह डीडब्ल्यू से कहते हैं कि कंपनी और कर्मचारी के बीच कॉन्ट्रैक्ट साइन होता है। कर्मचारी कार्यस्थल की नीतियों का पालन करने के लिए सहमति देता है। शशांक अपने अनुभव से बताते हैं, ‘अदालत में वकील कलावा और तिलक लगाकर आने लगे हैं। यह चलन 2014 के बाद से बढ़ गया है। इसे कुछ लोग अपनी धार्मिक पहचान और बहुसंख्यक उपस्थिति जताने के तरीके के रूप में देखते हैं। इसीलिए कार्यस्थलों पर समानता के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए ऐसे नियम बनाए जाते हैं।’
शशांक उदाहरण देकर समझाते हैं, ‘अदालतों में वकीलों को रंग-बिरंगे कपड़े और टोपी पहनने की अनुमति नहीं होती। इसी तरह सेना और केबिन क्रू में इस तरह के कई नियम होते हैं, क्योंकि उनके काम की प्रकृति ही ऐसी है। हालांकि, कुछ अपवाद भी होते हैं। जैसे सिखों की पगड़ी, हिजाब और पंडित का शिखा रखना। इन्हें धार्मिक प्रथाओं के रूप में अलग तरीके से देखा जाता है।’
-अजीत साही
राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है। मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है।
2011 में अन्ना हजारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया। देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द खत्म हो जाएगा। हज़ारों की भीड़ जमा हो गई। क्रंति को नाम मिला India Against Corruption। नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए। मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं। मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया।
उस दौर में अक्सर बहन के घर मुलाकात होती थी। एक दिन उन्होंने मुझे कहा, ‘अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं।’
कुछ हफ्तों बाद आग्रह कर के वो अपनी गाड़ी में मुझे महाराष्ट्र भवन ले गईं। वहाँ एक कमरे में उन्होंने मुझे अन्ना हजारे से मिलवाया। उन्होंने अन्ना हज़ारे से मेरे बारे में अच्छी अच्छी बातें कीं। मैं चुप बैठा रहा। फिर अन्ना करवट पलट कर सो गए और हम कमरे से बाहर आ गए।
एक दिन मैंने बहन से धीरे से कहा- ‘मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ। आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख्ता कर लें। कल ये एक पार्टी बनेगा। आप सेटिंग करके चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट लें। आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे। बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवार न खड़ा करें।’
बहन को मेरी बात नागवार गुजरी। बोलीं, ‘मुझे अफसोस है कि आप इतने सिनिकल हैं। अन्ना और अरविंद पार्टी बनाने की सोच भी नहीं सकते हैं। हम इंडिया बदलने निकले हैं। आपकी सोच बहुत छोटी है। आप इस माइंडसेट से बाहर निकलिए। ये एक दूसरी आज़ादी है। वी आर मेकिंग हिस्ट्री।’
ये सुनकर मुझे बरबस बचपन और जवानी का खयाल आ गया।
मैं ग्यारह साल का था जब इमरजेंसी ख़त्म हुई थी। कुछ महीनों पहले ही मेरे पिता का देहांत हुआ था तो हम इलाहाबाद के रानीमंडी में अपने ननिहाल रहने आ गए थे। 1977 में जब इंदिरा गाँधी चुनाव हारीं और जनता पार्टी चुनवा जीती तो पूरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में दीवाना हो गया।
ढाई साल बाद 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरी और इंदिरा गाँधी चुनाव जीत गईं। पूरे मुहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस ख़ुशी में शामिल हो गया।
फिर 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई। दो महीने बाद लोकसभा चुनाव हुआ। इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन ने चुनाव लड़ा। मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। सिविल लाइंस जाकर मैंने खादी का नया कुर्ता पैजामा खरीदा और अमिताभ बच्चन की कैंपेनिंग में लग गया।
चुनाव से चौबीस घंटे पहले एक जीप में छंटे हुए कांग्रेसी गुंडों के साथ मुझे गांवों की ओर भेज दिया गया। मैंने वहाँ बूथ मैनेजमेंट का पावन अनुभव किया।
आधी रात खेतों के बीच घुप अंधेरे में कच्ची सडक़ पर दो जीपें आमने सामने रुकीं। मैं अपनी जीप में बैठा रहा। मेरी जीप के गुंडे और दूसरी जीप के गुंडे जीपों की हेडलाइट में गुटखा खाते बातें करते रहे। फिर दूसरी जीप पर से विपक्षी पार्टी का झंडा उतर गया। आवाज लगाकर मुझे कांग्रेस का झंडा लाने को कहा गया। उसे दूसरी जीप पर लगा दिया गया। फिर दोनों जीपें अपने अपने अपने रस्ते निकल लीं।
राजीव गाँधी ने बंपर जीत हासिल की। अमिताभ बच्चन ने भी। तब तक मेरा परिवार ननिहाल छोड़ कर सरकारी अफसरों के मुहल्ले में रहने लगा था। इस मुहल्ले में भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मैं भी इस खुशी में शामिल हो गया।
फिर 1989 आया। अब मैं दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में रिपोर्टर की नौकरी कर रहा था। देश जान गया था कि राजीव गाँधी भ्रष्ट है। देश ये भी जान गया था कि वी पी सिंह देवता है। राजीव गाँधी हार गया। वी पी सिंह जीत गया। जिस मुहल्ले में मैं रहता था वहाँ भी खुशी की लहर दौड़ गई।
ख़ैर। जैसा कि मैंने अपनी मुंहबोली बहन से कहा था, ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड ्रद्दड्डद्बठ्ठह्यह्ल ष्टशह्म्ह्म्ह्वश्चह्लद्बशठ्ठ से पार्टी निकली। उस मकाम पर केजरीवाल ने अन्ना हजारे को थैंक्यू बोल दिया। मेरी बहन गाँधी को छोड़ कर नेहरू के साथ चली गईं। तमाम और लोगों ने भी यही मुश्किल फ़ैसला लिया।
उस दौर में पार्टी के एक दूसरे भारी नेता थे। मैं उनकी तब भी और आज भी इज़्जत करता हूँ। उन्होने मुझे घर बुलाया। केजरीवाल भी थे। दोनों बोले हम पार्टी शुरू कर रहे हैं और एक खोजी पत्रकारिता की वेबसाइट बना रहे हैं। तुम हमारे साथ आ कर उसे चलाओ। विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ कर मैंने बताया मैं इस नेक काम के काबिल नहीं हूँ। बाद में नेहरू ने उन दूसरे नेता को भी पार्टी से निकाल दिया।
मेरी बहन ने भी वक्त आने पर नेहरू को छोड़ दिया। आज वो पार्टीगत राजनीति की माननीय सदस्या हैं। मेरी मनोकामना है कि देर से ही सही, उनको संसद की सदस्यता मिलनी चाहिए। और ऐसा क्यों न हो?
अगर आप सोच रहे हैं कि इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स है तो मैं माफी चाहता हूँ, इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं है। भारतीय समाज जिस रुआब से अपनी पीठ थपथपाता है दरअसल वो भीतर से उतना ही खोखला और लचर है। हम उस मरीज की तरह हैं जो दुनिया से जानलेवा मज$ छुपाकर सोचता है कि कोई मज$ है ही नहीं।
लेकिन दुनिया जानती है कि मज$ लाइलाज है। पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है।
-दिमित्री स्क्वोर्त्सोव
अमेरिका ईरान पर अपनी नौसैनिक नाकाबंदी को और सख्त कर रहा है, जिससे तेल टैंकरों को देश छोडऩे और उपकरण एवं खाद्य सामग्री ले जाने वाले जहाजों को प्रवेश करने से रोका जा रहा है। वाशिंगटन अचानक हमले की बजाय तेहरान का गला घोंटने की धीमी रणनीति अपना रहा है। इस नाकाबंदी का ईरानी अर्थव्यवस्था पर पहले से ही क्या प्रभाव पड़ रहा है, ईरान इसके जवाब में क्या कदम उठा सकता है और यह नाकाबंदी कब वास्तव में असहनीय हो जाएगी?
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के बावजूद, ईरान के तटों और बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी जारी है। आर्थिक दृष्टि से, यह तेहरान के लिए खुले युद्ध से भी अधिक विनाशकारी है। बमबारी से हुए नुकसान की भरपाई धीरे-धीरे की जा सकती है, लेकिन नौसैनिक नाकाबंदी न केवल नुकसान पहुंचाती है, बल्कि निर्यात राजस्व को भी प्रतिदिन बाधित करती है, आवश्यक वस्तुओं के आयात में बाधा डालती है और आर्थिक स्थिरता को पूरी तरह से ध्वस्त कर देती है।
ईरान की अर्थव्यवस्था को युद्धविराम से पहले भारी नुकसान हुआ था। मीडिया रिपोर्टों में कारखानों, पुलों, बिजली संयंत्रों, रेलवे और हवाई अड्डों के विनाश, खाड़ी देशों के साथ कुछ आर्थिक संबंधों के टूटने, बढ़ती बेरोजगारी और आसमान छूती कीमतों का जिक्र किया गया है। रॉयटर्स के अनुमान के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान में कुछ वस्तुओं की कीमतों में लगभग 40त्न की वृद्धि हुई है, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए 6.1त्न की आर्थिक गिरावट का अनुमान लगाया है। इसका मतलब यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है, लेकिन यह देश की आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति में भारी गिरावट को जरूर दर्शाता है।
इस नाकाबंदी से ईरान के विदेशी व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। मौजूदा तनाव बढऩे से पहले, ईरान ने 2025/26 वित्तीय वर्ष में लगभग 109.7 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार किया था, जिसमें 51.66 अरब डॉलर गैर-ऊर्जा निर्यात और 58.02 अरब डॉलर आयात शामिल थे। हालांकि, अमेरिका द्वारा नाकाबंदी लागू किए जाने के बाद, प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल ईरानी तेल का निर्यात खतरे में है। तुलनात्मक रूप से, नाकाबंदी से पहले मार्च में ईरान ने प्रतिदिन 18.4 करोड़ बैरल और अप्रैल में 17.1 करोड़ बैरल तेल का निर्यात किया था, जिसमें से 80 फीसदी से अधिक खेप चीन को भेजी जाती थी।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो, ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें 90-100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होने के कारण, प्रतिदिन 1.7-2.0 मिलियन बैरल के नुकसान का मतलब है कि केवल तेल से ही प्रति माह लगभग 4.5-6 बिलियन डॉलर का सकल राजस्व नुकसान होगा—छूट, वैकल्पिक उपायों और अतिरिक्त लागतों को शामिल किए बिना भी। तेल क्षेत्र को लगे इस झटके को पेट्रोकेमिकल क्षेत्र के एक अन्य झटके ने और भी बढ़ा दिया- 16 अप्रैल को ईरान ने पेट्रोकेमिकल निर्यात रोक दिया, जिससे सामान्यत: लगभग 29 मिलियन टन उत्पाद और लगभग 13 बिलियन डॉलर वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था। इससे प्रति माह 1.1 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त वार्षिक राजस्व नुकसान होता था। कुल मिलाकर, केवल इन दो मुख्य निर्यात मदों से होने वाला मासिक नुकसान ही कई अरब डॉलर तक पहुंच जाता है।
लेकिन यह नाकाबंदी केवल निर्यात और इसलिए केवल विदेशी मुद्रा को ही प्रभावित नहीं कर रही है। यह आयात को भी कम कर रही है—ठीक वही आयात जिनके बिना ईरानी उद्योग और कृषि का दम घुटने लगा है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, ईरान आयातित गेहूं, मक्का, चावल और वनस्पति तेलों पर अत्यधिक निर्भर है; मक्का पर निर्भरता लगभग 95त्न और गेहूं पर लगभग 15त्न है। ईरान के सबसे बड़े आयातों में सोयाबीन मील, सोयाबीन, चावल और मक्का शामिल हैं। ईरानी सीमा शुल्क विभाग ने बुनियादी वस्तुओं के वार्षिक आयात का अनुमान लगभग 25 मिलियन टन लगाया है; वर्तमान नाकाबंदी से पहले के दस महीनों में, बंदरगाहों से 21 मिलियन टन माल आयात किया गया था। इसका मतलब यह है कि दक्षिणी बंदरगाहों के अवरुद्ध होने से ईरान को पशु आहार और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का आधार मिलता है।
इन महत्वपूर्ण आपूर्तियों के स्रोत भी बहुत विशिष्ट हैं। ब्राज़ील मक्का और सोयाबीन का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है; भारत चावल और औषधियों का मुख्य स्रोत है; चीन ईरान का मुख्य व्यापारिक साझेदार और उपकरण एवं मध्यवर्ती वस्तुओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आपूर्तिकर्ता है; तुर्की और जर्मनी औद्योगिक एवं चिकित्सा आपूर्तियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। रॉयटर्स ने स्पष्ट रूप से बताया है कि ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में चीन, भारत, तुर्की, जर्मनी, इराक और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, जबकि इसके मुख्य आयात में मध्यवर्ती वस्तुएं, सब्जियां, मशीनरी और उपकरण शामिल हैं। समस्या यह है कि शांति काल में, इन आपूर्तियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समुद्र के रास्ते और खाड़ी के लॉजिस्टिक्स केंद्रों से होकर, मुख्य रूप से अमीराती बंदरगाहों के माध्यम से ईरान तक जाता था।
इसके क्या परिणाम होंगे? मुख्य रूप से, देश में पशुधन और मुर्गीपालन के चारे, कृषि रसायनों, कुछ उर्वरकों, औद्योगिक कच्चे माल, पुर्जों, चिकित्सा सामग्री और कुछ दवाओं की आपूर्ति में भारी कमी आई है। अल्पावधि में, इसका मतलब अकाल नहीं है, बल्कि कुछ वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और कमी है। मध्यम अवधि में, इसका अर्थ है मुर्गीपालन और पशुधन उद्योगों में संकट और खाद्य, यांत्रिक इंजीनियरिंग और रसायन उद्योगों में उत्पादन में कमी।
और फिर एक और भी खतरनाक प्रक्रिया शुरू हो जाती है: उर्वरक की कमी अगली फसल को प्रभावित करती है। यह कोई संयोग नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन वैश्विक खाद्य और उर्वरक बाजारों पर युद्ध के प्रभाव पर अलग-अलग चर्चा कर रहे हैं : यदि फसल के मौसम के दौरान आपूर्ति बाधित होती है, तो वास्तविक कमी दिखने से पहले ही कुछ नुकसान अपरिवर्तनीय हो जाता है।
हालांकि, तेहरान इस स्थिति से अचंभित नहीं था। 2025 की गर्मियों में 12 दिनों के युद्ध के बाद, ईरान ने सावधानीपूर्वक अपनी अर्थव्यवस्था को युद्ध की स्थिति में ढालना शुरू कर दिया।
एक संकट प्रबंधन टीम का गठन किया गया, युद्धकालीन परिस्थितियों में व्यापार सेवाओं के संचालन के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया, और कुछ प्रक्रियाओं को दूरस्थ और रोटेशनल कार्य में परिवर्तित किया गया। उद्योग मंत्रालय ने क्षतिग्रस्त उद्यमों को उत्पादन में बहाल करने के लिए पैकेज तैयार किए। 2025 के पतझड़ तक, ईरानी अधिकारियों ने कच्चे माल और घटकों के आयात को बाधित न करने के लिए जानबूझकर मुद्रा और आयात नियमों में ढील देना शुरू कर दिया था। दूसरे शब्दों में, यह सोवियत-शैली का पूर्ण सैन्य लामबंदी नहीं था, बल्कि अस्तित्व के लिए एक चयनात्मक समायोजन था: आयात का समर्थन करना, बुनियादी वस्तुओं का उत्पादन बनाए रखना और व्यापार तंत्र को ठप होने से रोकना।
हाल के महीनों में, नए युद्ध और उसके बाद हुए युद्धविराम के मद्देनजर, ये उपाय काफी सख्त हो गए हैं। ईरानी सीमा शुल्क विभाग ने तत्काल रियायतों का एक पैकेज पेश किया: आवश्यक वस्तुओं की 100त्न सीमा शुल्क निकासी यथाशीघ्र, प्राथमिकता वाले कार्गो की 90त्न त्वरित निकासी, आयात पंजीकरण की अवधि में विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली की विफलता की स्थिति में कागजी दस्तावेजों का उपयोग,
और कार्गो को अन्य सीमा चौकियों पर पुनर्निर्देशित करने की विस्तारित शक्तियां। ईरानी राष्ट्रपति ने आदेश दिया कि आवश्यक वस्तुओं का न्यूनतम स्टॉक 60 लाख टन बनाए रखा जाए। दक्षिणी बंदरगाहों के अवरुद्ध होने से ईरान को पशु आहार और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का आधार मिलता है।
इन महत्वपूर्ण आपूर्तियों के स्रोत भी बहुत विशिष्ट हैं। ब्राज़ील मक्का और सोयाबीन का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है; भारत चावल और औषधियों का मुख्य स्रोत है; चीन ईरान का मुख्य व्यापारिक साझेदार और उपकरण एवं मध्यवर्ती वस्तुओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आपूर्तिकर्ता है; तुर्की और जर्मनी औद्योगिक एवं चिकित्सा आपूर्तियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। रॉयटर्स ने स्पष्ट रूप से बताया है कि ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में चीन, भारत, तुर्की, जर्मनी, इराक और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, जबकि इसके मुख्य आयात में मध्यवर्ती वस्तुएं, सब्जियां, मशीनरी और उपकरण शामिल हैं। समस्या यह है कि शांति काल में, इन आपूर्तियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समुद्र के रास्ते और खाड़ी के लॉजिस्टिक्स केंद्रों से होकर, मुख्य रूप से अमीराती बंदरगाहों के माध्यम से ईरान तक जाता था।
इसके क्या परिणाम होंगे? मुख्य रूप से, देश में पशुधन और मुर्गीपालन के चारे, कृषि रसायनों, कुछ उर्वरकों, औद्योगिक कच्चे माल, पुर्जों, चिकित्सा सामग्री और कुछ दवाओं की आपूर्ति में भारी कमी आई है। अल्पावधि में, इसका मतलब अकाल नहीं है, बल्कि कुछ वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और कमी है। मध्यम अवधि में, इसका अर्थ है मुर्गीपालन और पशुधन उद्योगों में संकट और खाद्य, यांत्रिक इंजीनियरिंग और रसायन उद्योगों में उत्पादन में कमी।
और फिर एक और भी खतरनाक प्रक्रिया शुरू हो जाती है: उर्वरक की कमी अगली फसल को प्रभावित करती है। यह कोई संयोग नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन वैश्विक खाद्य और उर्वरक बाजारों पर युद्ध के प्रभाव पर अलग-अलग चर्चा कर रहे हैं : यदि फसल के मौसम के दौरान आपूर्ति बाधित होती है, तो वास्तविक कमी दिखने से पहले ही कुछ नुकसान अपरिवर्तनीय हो जाता है। हालांकि, तेहरान इस स्थिति से अचंभित नहीं था। 2025 की गर्मियों में 12 दिनों के युद्ध के बाद, ईरान ने सावधानीपूर्वक अपनी अर्थव्यवस्था को युद्ध की स्थिति में ढालना शुरू कर दिया।
एक संकट प्रबंधन टीम का गठन किया गया, युद्धकालीन परिस्थितियों में व्यापार सेवाओं के संचालन के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया, और कुछ प्रक्रियाओं को दूरस्थ और रोटेशनल कार्य में परिवर्तित किया गया। उद्योग मंत्रालय ने क्षतिग्रस्त उद्यमों को उत्पादन में बहाल करने के लिए पैकेज तैयार किए। 2025 के पतझड़ तक, ईरानी अधिकारियों ने कच्चे माल और घटकों के आयात को बाधित न करने के लिए जानबूझकर मुद्रा और आयात नियमों में ढील देना शुरू कर दिया था। दूसरे शब्दों में, यह सोवियत-शैली का पूर्ण सैन्य लामबंदी नहीं था, बल्कि अस्तित्व के लिए एक चयनात्मक समायोजन था: आयात का समर्थन करना, बुनियादी वस्तुओं का उत्पादन बनाए रखना और व्यापार तंत्र को ठप होने से रोकना।
हाल के महीनों में, नए युद्ध और उसके बाद हुए युद्धविराम के मद्देनजर, ये उपाय काफी सख्त हो गए हैं। ईरानी सीमा शुल्क विभाग ने तत्काल रियायतों का एक पैकेज पेश किया: आवश्यक वस्तुओं की 100त्न सीमा शुल्क निकासी यथाशीघ्र, प्राथमिकता वाले कार्गो की 90त्न त्वरित निकासी, आयात पंजीकरण की अवधि में विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली की विफलता की स्थिति में कागजी दस्तावेजों का उपयोग, और कार्गो को अन्य सीमा चौकियों पर पुनर्निर्देशित करने की विस्तारित शक्तियां। ईरानी राष्ट्रपति ने आदेश दिया कि आवश्यक वस्तुओं का न्यूनतम स्टॉक 60 लाख टन बनाए रखा जाए।
युद्धविराम के बाद, अधिकारियों ने आयात आदेशों के पंजीकरण की अवधि 30 मई तक बढ़ा दी और 2,800 "अत्यंत महत्वपूर्ण औद्योगिक वस्तुओं" पर लगे कुछ प्रतिबंध हटा दिए। प्रभावित व्यवसायों और परिवारों के लिए सहायता पैकेज भी साथ ही शुरू किए गए। क्या यह कारगर रहा? आंशिक रूप से। ईरानी व्यवस्था ने अब तक तत्काल आर्थिक पतन को रोकने में कामयाबी हासिल की है। युद्ध के 39 दिनों के दौरान, 28 फरवरी से 7 अप्रैल तक, सीमा शुल्क विभाग ने 28.74 करोड़ टन आवश्यक वस्तुओं की निकासी की और ऐसे माल से लदे 112,000 से अधिक ट्रकों को गुजरने की अनुमति दी। नए ईरानी वर्ष के शुरुआती दिनों में भी आवश्यक वस्तुओं की सीमा शुल्क निकासी जारी रही। और 28 फरवरी से 17 अप्रैल तक, देश की सडक़ों पर 6 करोड़ टन से अधिक माल का परिवहन हुआ।
इन सबका मतलब यह है कि झटकों और बाधाओं के बावजूद, घरेलू रसद सेवाएं अभी भी सुचारू रूप से चल रही हैं। लेकिन इससे मूल बात नहीं बदलती: लामबंदी के उपाय लड़ाई को लंबे समय तक जारी रखने में मदद करते हैं, लेकिन वे सामान्य समुद्री निर्यात और पारंपरिक समुद्री आयात के नुकसान की पूरी तरह से भरपाई नहीं कर सकते।
- चंदन कुमार जजवाड़े
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (आप) छोडक़र बीजेपी में शामिल होने का ऐलान किया है। पार्टी छोडऩे के बाद राघव चड्ढा ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की।
शुक्रवार को संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राघव चड्ढा ने कहा, ‘हमने तय किया है कि हम, राज्य सभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य संविधान के प्रावधानों के अनुसार बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।’
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ताज़ा घटनाक्रम को लेकर एक्स पर राघव चड्ढा का नाम लिए बिना सिर्फ इतना लिखा, ‘बीजेपी ने फिर से पंजाबियों के साथ किया धक्का।’
इससे पहले दिल्ली में भी आप के कई नेता पार्टी छोडक़र बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। इन्हीं में से एक कपिल मिश्रा हैं, जो कभी केजरीवाल सरकार में मंत्री हुआ करते थे और अब दिल्ली में बीजेपी की सरकार में मंत्री हैं।
लेकिन राज्यसभा सांसदों का पार्टी छोडऩा कुछ मायनों में काफी अलग है क्योंकि ये आम लोगों के वोट से चुनकर नहीं आते हैं। ऐसे में इन सांसदों से बीजेपी को क्या कोई फायदा हो सकता है। आगे हम कुछ एक्सपर्ट्स से बातचीत के आधार पर इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे।
राघव चड्ढा ने एक एक्स पोस्ट में कहा, ‘आज, भारत के संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए, राज्यसभा में आप के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया है।’
‘सात सांसदों ने इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे राज्यसभा के माननीय सभापति को सौंपा गया। मैंने दो अन्य सांसदों के साथ मिलकर हस्ताक्षरित दस्तावेज खुद सौंपे हैं।’
आम आदमी पार्टी का बीजेपी पर आरोप
वहीं दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा, ‘जो राज्यसभा सदस्य आज बीजेपी के सामने झुक गए, अपनी निजी मजबूरियों, डर और लालच के कारण जिन्होंने पंजाब के लोगों के साथ गद्दारी की है, उन्हें पता होना चाहिए कि पंजाब गद्दारों को कभी माफ नहीं करता है।’
आम आदमी पार्टी ने इस महीने की शुरुआत में राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर की जिम्मेदारी राघव चड्ढा की जगह अशोक कुमार मित्तल को दे दी थी।
पार्टी के इस फैसले के बाद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में पार्टी के प्रति नाराजगी जताई थी। इसके बाद आप के कई नेताओं से सोशल मीडिया पर ही उनकी बहस भी हुई थी।
उस समय आप के कई नेताओं ने राघव चड्ढा पर संसद में अपने भाषणों में बीजेपी के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया था।
आम आदमी पार्टी नेताओं ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय राघव चड्ढा के लंदन में होने पर भी सवाल उठाए थे।
आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने बीबीसी न्यूज हिन्दी से बातचीत में मौजूदा घटनाक्रम को ‘बीजेपी की चाल’ बताया।
उन्होंने आरोप लगाया, ‘यह सब बीजेपी का लिखा हुआ है। राघव चड्ढा को हटाकर अशोक मित्तल को राज्यसभा में उप नेता बनाया तो 15 अप्रैल को उनके घर ईडी पहुंच गई। पहले ईडी भेजो, सीबीआई भेजो, फिर जेल भेजो। इसके बाद चुनाव आयोग लगा दो और वोट कटवा दो।’
सोमनाथ भारती दावा करते हैं, ‘बीजेपी पंजाब में अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहती है। उनको लगता है कि इन राज्यसभा सांसदों की मदद से वो पार्टी को फैला पाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि इनमें से किसी के पास राजनीतिक अनुभव तो है नहीं। सबकी ताकत अरविंद केजरीवाल हैं।’
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं।
राज्य में साल 2022 में हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो बीजेपी ने उन चुनावों में 73 उम्मीदवार खड़े किए थे। इनमें से महज दो उम्मीदवार ही जीत हासिल कर पाए थे, जबकि पार्टी के 55 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।
वहीं आम आदमी पार्टी ने सभी 117 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और उसे 92 सीटों पर जीत मिली थी। यानी आप पंजाब में एक बड़ी पार्टी के तौर पर स्थापित हो गई।
जबकि राज्य में परंपरागत रूप से मजबूत मानी जाने वाली पार्टी कांग्रेस को सभी सीटों पर चुनाव लडक़र 18 सीटों पर जीत मिली थी।
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, ‘बीजेपी पंजाब में ख़ुद को मजबूत करना चाहती है। वो नहीं चाहती है कि अगले साल होने वाले चुनाव में कांग्रेस जीतकर आए। इस लिहाज से आप के सांसदों का बीजेपी में जाना महत्वपूर्ण है।’
‘भले ही वे लोग राज्यसभा से हैं और जनता के नेता नहीं हैं। लेकिन इनकी पृष्ठभूमि देखें तो ये समाज में खास जगह रखते हैं, जो जनता के बीच काफी मायने रखती है। हरभजन सिंह क्रिकेटर रहे हैं। अशोक मित्तल बड़े पैसे वाले हैं।’
-शारदा उगरा
आज जब सचिन तेंदुलकर के जन्मदिन पर सोशल मीडिया जश्न में डूबा हुआ है, तो मुझे सचिन से जुड़ा एक दशक से भी ज़्यादा पुराना कि़स्सा याद आ रहा है।
ये बात, उस वक्त की है, जब भारत ने 2011 का वनडे वर्ल्ड कप जीत लिया था। उस वक्त तेंदुलकर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक पूरा करने की कोशिश कर रहे थे।
एक दिन मेरे दोस्त के सात साल के बेटे ने पूछा कि, ‘सचिन ने आईपीएल में कितने शतक लगाए हैं?’
ये बड़ा मासूम सा सवाल था, जिस पर न इतिहास का साया था, न विरासत का बोझ। मैंने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।।। ‘हम्म...एक’। बच्चे ने हैरानी से कहा, ‘सिर्फ एक।’
मैं उसके मासूम सवाल पर चौंक ज़रूर गई थी, मगर मुझे ख़ुशी भी हुई थी।
उस स्कूली बच्चे ने 2011 के विश्व कप में सचिन की धुआंधार पारियों को देखा था। फिर भी उसकी नजर में सचिन तेंदुलकर की यही छवि थी जबकि उस वक्त सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट के इतिहास में भारत के सबसे बड़े स्टार थे।
क्रिकेट के ‘भगवान’
वो सोशल मीडिया और ख़ुद के प्रचार से पहले का दौर था। आज जब सचिन तेंदुलकर, मुंबई इंडियंस की टीम के डग आउट में पहुंचते हैं, या फिर विज्ञापनों में और इंस्टाग्राम पर दिखते हैं, तो मेरे ज़हन में सवाल उठता है कि अब सात साल के बच्चे सचिन तेंदुलकर को किस नजर देखते होंगे?
इस साल नवंबर में सचिन तेंदुलकर को सक्रिय क्रिकेट से संन्यास लिए हुए 13 साल पूरे हो जाएंगे।
टीनएजर्स के लिए वो महज़ एक ऐसे पूर्व खिलाड़ी हैं, जिनके बारे में सयाने लोग कहते हैं कि वो बहुत शानदार खिलाड़ी थे।
उनके लिए सचिन तेंदुलकर, 1989 से 2013 के दौर वाले क्रिकेट के भगवान नहीं, जैसा उन्हें करोड़ों क्रिकेट फ़ैन याद करते हैं। आज के नौजवानों के लिए वो 2023 वाले पूर्व क्रिकेटर हैं।
आज के युवा धोनी, कोहली और रोहित शर्मा के दौर में बड़े हुए हैं, जो मैदान के चारों और शॉट लगाने वाली बैटिंग करते हैं।
टी-20 के दौर में इन नौजवानों ने इन खिलाडिय़ों को हर गेंद पर ज़बर्दस्त शॉट लगाते देखा है, जो कई बार मैदान के उन कोनों तक पहुंच जाती है, जिसके बारे में उन्हें मालूम है कि तेंदुलकर ऐसा शॉट नहीं खेलते थे।
जादुई आंकड़े
ऐसा नहीं है कि सचिन तेंदुलकर ने टी-20 मैच नहीं खेले। वो छह सीजऩ तक मुंबई इंडियंस के लिए खेले थे।
78 मैचों में सचिन ने 2334 रन बनाए थे। इनमें 13 अर्धशतक और एक सेंचुरी थी। ढ्ढक्करु के इन 78 मैचों में सचिन तेंदुलकर का स्ट्राइक रेट 119।31 और औसत 34.83 रनों का था। जब आईपीएल शुरू हुआ था, तो सचिन तेंदुलकर अपने इंटरनेशनल करियर के 19वें बरस में थे।
आईपीएल के पहले सीजऩ के दौरान वो 35 साल के हुए थे। आईपीएल में सचिन तेंदुलकर का सबसे बढिय़ा सीजऩ 2010 का रहा था।
तब मुंबई इंडियंस की टीम पहली बार फ़ाइनल में पहुंची थी। हालांकि, वो फ़ाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स से हार गई थी।
उस वक्त 37 साल के तेंदुलकर ने टी20 मैचों में 180 के जादुई आंकड़े को पार कर लिया था।
ये टी-20 में किसी बल्लेबाज़ के औसत और उसके स्ट्राइक रेट का जोड़ होता है, जिसे टी20 मैचों में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
2010 में सचिन तेंदुलकर आईपीएल के प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट बने थे। उन्होंने उस सीजऩ में 47।53 के औसत और 132।61 के स्ट्राइक रेट से 618 रन स्कोर किए थे। ये आईपीएल में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा था।
आज कैसे बल्लेबाज होते?
उन्होंने कहा कि गेंद को बार-बार बाउंड्री लाइन के बाहर भेजने का आत्मविश्वास हासिल करने के लिए, ‘आपको पिच के मिज़ाज के मुताबिक़ लगातार कोशिश करते रहना होगा। हर पिच अलग तरह की होती है। आपको ख़ुद को पिच के हिसाब से खेलने के लिए ढालना पड़ता है। मैं अपने ज़हन और खेल को पिच का मिज़ाज भांपकर बदल लेता।’
मैंने सचिन तेंदुलकर के जितने भी इंटरव्यू लिए, हर बार यही अहसास हुआ कि आप ऐसे शख़्स से बात कर रहे हैं, जिसकी नस-नस में क्रिकेट समाया हुआ है।
वैसे तो अंग्रेज़ी के हृद्गह्म्स्र शब्द का हिंदी में मतलब 'पढ़ाकू' होता है। मगर, सचिन तेंदुलकर के मामले में आपको याद रखना होगा कि उनकी सारी पढ़ाई क्रिकेट के खेल और क्रिकेट के मैदान को लेकर थी।
यही वजह है कि वो कहते हैं कि वो आज के दौर की ज़रूरत के मुताबिक़, हर गेंद पर रन बनाने का कोई न कोई तरीक़ा तलाश ही लेते।
जब सचिन को वनडे मैचों में पारी की शुरुआत करने को कहा गया था, तो उन्होंने यही तो किया था।
अभिषेक शर्मा ने ब्रॉडकास्टर से की ये गुज़ारिश, ‘अगली बार से मैं चाहता हूँ।’
अपने वनडे मैचों के करियर के पहले दस वर्षों में सचिन तेंदुलकर, अपने दौर के ज़्यादातर खिलाडिय़ों से कहीं ज़्यादा स्ट्राइक रेट (86।78) से रन बना रहे थे। इस दौरान उन्होंने 24 शतक और 44 अर्थशतक लगाए थे।
एक दिन मुंबई के पूर्व ओपनर ज़ुबिन भरूचा और अब राजस्थान रॉयल्स टीम के हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर से किसी और मसले पर बात हो रही थी।
जब सचिन तेंदुलकर के एक नौजवान खिलाड़ी के तौर पर आईपीएल के फॉर्मैट में ढल जाने का सवाल उठा, तो ज़ुबिन ने ठहाका लगाया। उन्होंने कहा कि ‘ये तो सवाल ही बेमानी है।’
भरूचा ने घंटों आईपीएल मैचों में ‘बल्ले की चोट से गेंदों को उड़ते’ देखा है।
वो कहते हैं कि ‘हां, गेंद को कोई भी मार सकता है। एबी डिविलियर्स, केविन पोलार्ड या कोई और। ये सब बहुत बढिय़ा खिलाड़ी हैं। लेकिन, सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाज़ी की ख़ास बात यही है कि वो किसी भी दौर में होते, कामयाब बल्लेबाज़ ही होते। फिर चाहे वो अपने दौर के पहले होते, या उसके बाद।’
-सनियारा खान
डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाला एक फ्रांसीसी व्यक्ति, अपनी आंखों में हमारे देश के लिए ढेरों सपने संजोकर यहां आया था। वे फिल्मकार होने के साथ ही एक लेखक भी था। उनका नाम है वैलेंटीन हेनाल्ट। वे सन् 2023 में हिंदुस्तान आए थे। हमारे देश में जाति धर्म से कुछ लोग, ख़ास करके दलित महिलाएं किस तरह प्रभावित होती हैं, इसी पर उनको एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनानी थी। लेकिन बहुत जल्द ही उनको गोरखपुर पुलिस ने गिरफ़्तार कर जेल में बंद कर दिया। क्योंकि वे दलित महिलाओं के पक्ष में अंबेडकर जन मोर्चा द्वारा किए गए एक विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए थे। यह जानने के लिए कि वे लोग किस बात को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। पर यह सवाल उनको परेशान कर रहा था कि उनको किस जुर्म में जेल में बंद किया गया है? लेकिन किसी से भी उनको सही जवाब नहीं मिल रहा था।
बगैर किसी कारण उनको पुलिसवाले आतंकवादी, शहरी नक्सल और विदेशी दुश्मन के रूप में साबित करने की कोशिश कर रहे थे। उनका कहना था कि उनको उनकी होटल से वीजा नियम उल्लंघन करने का अपराध बताकर गिरफ्तार करके लाया गया है। इसके बाद गोरखपुर जेल के अंदर रहते हुए, हिंदुस्तानी जेलों के अंदर क्या-क्या होता है और किस तरह का कानून चलता है, इन बातों को वे धीरे-धीरे समझने की कोशिश कर रहे थे। जितनी बातें वे समझ पा रहे थे, उतना ही वे हैरान होते जा रहे थे। जेल के अंदर की दुनिया एक अलग ही दुनिया थी। बाहर की दुनिया के समानांतर, लेकिन पूरी तरह अलग रंग लिए हुए। जेल के अंदर हो रही हिंसा और संगठित अपराधों को करीब से देखने के बाद उनकी आंखों से बहुत सारी बातों को लेकर पर्दा हट गया था ।
वे अक्सर छुप-छुपकर जेल के अंदर अलग-अलग लोगों से बातें करते थे और काफी सवाल भी पूछते रहते थे। यहां-वहां से छोटे-छोटे कागज उठाकर अपने पास रखते थे। किसी से कलम लेकर सवाल-जवाब लिखकर अपने पास रख लिया करते थे।
उनका मुकदमा खत्म होने पर वे सन् 2024 में फ्रांस लौट गए। उसके बाद उन्होंने जेल के अंदर जो कुछ भी होते हुए देखा था, उन्हीं अनुभवों को लेकर फ्रेंच भाषा में एक संस्मरण लिखने लगे। उस संस्मरण का नाम था-‘I had an Indian Dream : In the Hell of Gorakhpur Prison’. सच में, वे इस देश के बारे में जिन सपनों को अपने सीने में संजोकर आए थे, वो सभी सपने गोरखपुर जेल के अंदर दम तोडऩे लगे थे। इस संस्मरण में कुल सोलह अध्याय हैं। कैसे उनको गिरफ्तार करने के बाद जेल भेज दिया गया था और जेल के अंदर आम कैदियों को कई बार किस तरह नौकरों की तरह रहना पड़ता था... इन्हीं सारी बातों को इस संस्मरण में खुलकर बताया गया है।
जब वे इस देश में आए थे तब वे अपने सपनों का हिंदुस्तान को ही देखने आए थे। तब तक ये देश उनकी नजर में आध्यात्मिक देश था। वे संन्यासियों के बीच रहकर उनसे आध्यात्मिकता के बारे में जानना चाहते थे। वाराणसी और हिमालय को सामने खड़े होकर देखना और महसूस करना चाहते थे। शायद बहुत सारे पर्यटकों को यही सब बातें आकृष्ट करती हैं। लेकिन यहां कदम रखने के बाद उन्होंने असल हिंदुस्तान को जाना और उसे समझने की कोशिश करने लगे। हिंदुस्तानी समाज के दोहरे रूप देखकर वे हैरान हो जाते थे। यहां आने के बाद वैलेंटीन हेनाल्ट ने देखा कि कई अंग्रेजी बोलने वाले और हाई प्रोफाइल लोग नीची कहीं जाने वाली जाति के लोगों से दूर रहना पसंद करते हैं। बहुत से ब्राह्मण उनसे कहते थे कि अब तो दलित लोगों को बहुत ज्यादा सुविधा मिलने लगी हैं। उन लोगों के अधिकार क्षेत्र भी पहले से बढ़ गए हैं। लेकिन उन्हीं के घरों में कई दलित नौकर होते थे। उत्तर प्रदेश में जगह-जगह दलित महिलाओं के साथ होने वाले निर्मम अत्याचारों के बारे में जानकर वे इसलिए भी और दुखी थे कि सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार के बड़े-बड़े संगठनों में भी इन बातों को लेकर गहरी चुप्पी है।
अपने संस्मरण में उन्होंने उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जेल के अंदर के भयावह क्रूरता के साथ-साथ जाति और धर्म के हिसाब से चल रहे अलग-अलग सिस्टम....सभी कुछ खुलकर बताया है। यही नहीं, अलग-अलग राजनैतिक पार्टियों के लोग सत्ता और धन के सहारे जेल में अपनी मर्जी की जिंदगी गुजारते हैं। बाकी सभी लोग उनसे डरते हैं। कई बार पुलिस वाले दबी जबान से उनको समझाते थे कि यहां की समस्याओं को लेकर फिल्म बनाने की जगह उनको अपने देश की समस्याओं को लेकर सोचना चाहिए। एक बार एक पुलिस कमिश्नर ने उनको कहा कि यहां के दलितों को लेकर उनको चिंता नहीं करना चाहिए। हैरानी की बात ये है कि वह कमिश्नर फ्रांस जाकर उसी शिक्षानुष्ठान से पढक़र आया था, जहां से वैलेंटीन हेनाल्ट ने भी पढ़ाई की है।
लोकसभा में पिछले दिनों परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पर्याप्त संख्या बल के अभाव में गिर गया। सरकार विपक्ष पर महिलाओं के अपमान का आरोप लगा रही है लेकिन विपक्ष इसे सरकार के षड्यंत्र के तौर पर पेश कर रहा है।
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र का लिखा-
पिछले हफ्ते तीन दिन के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें 131वें संविधान विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पारित कराने की कोशिश थी। हालांकि यह विशेष सत्र नहीं बल्कि बजट सत्र का ही विस्तारित हिस्सा था। लेकिन इस सत्र की टाइमिंग और उसमें लाए जाने वाले विधेयक को लेकर सरकार विपक्ष के निशाने पर रही और आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका जताई जा रही थी।
करीब तीन साल पहले पारित महिला आरक्षण कानून में संशोधन के लिए लाए जाने वाले 131वें संविधान संशोधन विधेयक का मुख्य मकसद परिसीमन करना था जिसके लिए विपक्ष तैयार नहीं था। विधेयक पारित नहीं हो सका और अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कांग्रेस पार्टी समेत समूचे विपक्ष पर आरोप लगाया कि इन पार्टियों ने महिलाओं का अपमान किया है। वहीं विपक्ष का कहना है कि महिलाओं के अपमान का तो सवाल ही नहीं है, क्योंकि विधेयक में महिला आरक्षण से संबंधित कोई बात ही नहीं है।
बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने विधेयक का बचाव करते हुए मीडिया से बातचीत में कहा कि डीलिमिटेशन के बिना आरक्षण को लागू करना संभव ही नहीं है। उनका कहना था, ‘संवैधानिक मर्यादाओं को समझे बिना ऐसी बातें करना आसान है। बिना डीलिमिटेशन किए और कांस्टीट्यूएंसी बढ़ाए, आरक्षण लागू करना संभव ही नहीं है। यदि ऐसा करेंगे तो पुरुषों के अधिकार का सवाल उठेगा। इसलिए सरकार का प्रस्ताव संविधान के दायरे में है।’ ऐसे में अभी भी कई लोगों में ये दुविधा है कि आखिर माजरा क्या है? सरकार विपक्ष पर महिलाओं के अपमान का आरोप क्यों लगा रही है और विपक्ष सरकार की नीयत पर सवाल क्यों उठा रहा है?
नया विधेयक बनाम पुराना विधेयक
दरअसल, महिला आरक्षण विधेयक जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कहा गया है, उसे 2023 में ही संसद के दोनों सदनों में पारित किया जा चुका है और वो कानून भी बन चुका है। 106वें संविधान संशोधन के रूप में उस विधेयक को पारित कराने के लिए भी तत्कालीन सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था लेकिन विपक्ष के समर्थन से उस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किया गया था।
पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल राज्यसभा सदस्य हैं और सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, विधेयक पास कराने की सरकार की मंशा ही नहीं थी। वो तो यही चाहते थे कि कैसे इसके बहाने चुनाव के दौरान भाषण देने का मौका मिले। महिला आरक्षण विधेयक तो 2023 में ही पास हो चुका है, और सर्वसम्मति से पास हो चुका है। हम सबने उसे मिलकर पास कराया है। उस विधेयक में आपने देश से वादा किया था कि 2026 के बाद जनगणना होगी, उसके बाद परिसीमन होगा और फिर महिला आरक्षण की व्यवस्था तय की जाएगा। ये उनका संवैधानिक कर्तव्य था लेकिन सरकार उससे पीछे हट गई।’
दरअसल, 2023 में पारित संविधान संशोधन विधेयक में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण का प्रावधान किया गया है लेकिन उस वक्त सरकार का कहना था कि इसकी व्यवस्था जनगणना और परिसीमन के बाद तय की जाएगी।
सरकार की मंशा पर सवाल
लेकिन जब अचानक सरकार 131वां संशोधन विधेयक 2026 लेकर आई तो विपक्ष सरकार की मंशा पर सवाल उठाने लगा। उसका कारण यह था कि सरकार अपने ही वादे से मुकर रही थी। यानी 2026 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बजाय, सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कर रही थी। हालांकि विपक्ष को सबसे ज्यादा आपत्ति विधेयक के दूसरे हिस्से पर थी जिसके तहत लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था।
लोकसभा सदस्य और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी का साफतौर पर कहना था कि महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण अभी देना है तो 543 सीटों पर ही सरकार क्यों नहीं दे रही है।
इस दौरान एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ जिसमें सरकार उलझ गई। दरअसल, 2023 का विधेयक संसद में पारित भी हो गया था और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वो कानून भी बन गया था लेकिन कानून नोटिफाई नहीं हुआ था और बिना नोटिफाई हुए वह व्यावहारिक रूप में अमल में नहीं था। कानूनी जानकारों के मुताबिक, बिना अमल में आए किसी कानून में संशोधन नहीं हो सकता। इसलिए सरकार ने जिस दिन नया संविधान संशोधन विधेयक पेश किया उसी रात अचानक पुराने कानून का नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया।
सरकार की इस हड़बड़ी और अचानक नए विधेयक लाने को लेकर इन्हीं वजहों से सवाल उठ रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका वृंदा गोपीनाथ कहती हैं कि वास्तव में यह महिला आरक्षण विधेयक था ही नहीं, बल्कि परिसीमन के जरिए आरक्षण लागू करने की कोशिश थी जिसमें सरकार नाकाम रही।
उनके मुताबिक, "सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना जरूरी है कि संसद में जिस विधेयक को खारिज किया गया, वह महिला आरक्षण विधेयक 2026 नहीं था, बल्कि 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 था जिसका मकसद परिसीमन के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण लागू करना था। लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने से दक्षिणी और पूर्वी राज्यों के हित प्रभावित होते। सरकार को भी यह मालूम था।’
महिला आरक्षण के बीच कैसे आया परिसीमन?
दरअसल, विपक्षी दलों का विरोध इस बात को लेकर था कि सरकार ने महिला आरक्षण को चुपचाप परिसीमन से जोड़ दिया, जबकि सरकार को मालूम था कि परिसीमन के आधार पर लोकसभा में सीटें बढ़ाए जाने का दक्षिण भारत के राज्य विरोध कर रहे हैं। यही नहीं, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटें बढ़ाने को लेकर और भी कई व्यवस्थागत सवाल उठाए जा रहे हैं।
राज्यसभा सांसद पी विल्सन तो एक प्राइवेट मेंबर बिल के लिए भी राज्यसभा में नोटिस दिया ताकि लोकसभा की मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण सुनिश्चित किया जाए लेकिन उनके नोटिस को खारिज कर दिया गया। उन्होंने राज्यसभा में नियम 267 के तहत यह नोटिस दिया था।
उधर, विधेयक के लोकसभा से खारिज हो जाने के बाद सत्तापक्ष की ओर से दावा किया जा रहा है कि इसके जरिए महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही थी जिसे विपक्ष ने नाकाम कर दिया। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश की आम महिलाएं इस कानून को कैसे देख रही हैं। ज्यादातर महिलाओं का ये मानना है कि राजनीति में आने की इच्छुक महिलाओं के लिए तो ये एक अवसर की तरह जरूर है लेकिन आम महिलाओं के भीतर इसे लेकर कोई बहुत उत्साह नहीं है।
भगीरथ की मोक्षदायिनी गंगा की मूल धारा आदि गंगा आज औपनिवेशिक इंजीनियरिंग, बेतरतीव शहरी फैलाव, सांस्कृतिक विस्मृति और मेट्रो के खम्भों के बीच उलझ कर रह गई है
पिछले जनवरी में कोलकाता प्रवास के दौरान बाँसद्रोणी जाने के क्रम में मेरा सामना एक ऐसी कड़वी हकीकत से हुआ जो आधुनिक भारत के शहरी 'विकास' के पीछे छिपे विनाश की गवाही दे रही थी। जहाँ एक तरफ अत्याधुनिक मेट्रो ट्रेन कंक्रीट के खंभों पर सरपट दौड़ रही थी, और ठीक उसके नीचे काले, गाढ़े और बदबूदार पानी का एक संकरा प्रवाह था. स्थानीय लोगो से पता चला कि जिसे मैं एक 'गंदा नाला' समझ रहा हूँ, उसका नाम 'आदिगंगा' है, मोक्षदायणी गंगा की प्राचीन (आदि) मुख्य धारा! वही नदी जो हजारो सालो से आस्था का केंद्र रही और जिसके किनारे कभी इस शहर की नींव रखी गयी थी, आज एक बजबजाते नाले में बदल चुकी है, जिसको स्थानीय लोग टॉली नाला कहते हैं।
हालांकि, नाला शब्द का मूल अर्थ गंदगी से नहीं जुड़ा है। एक प्राकृतिक ढांचा जो बरसात के पानी की निकासी के लिए उपयोग में आता है। लेकिन हमारे विकास के नाम पर की गई लापरवाहियों और जल संसाधनों के दुरुपयोग ने इस शब्द के अर्थ को बदलकर गंदगी और सड़ांध का पर्याय बना दिया है। यहाँ केवल भाषा नहीं बदली, बल्कि नदी-पानी के साथ हमारी अंतर्संबंध भी बदल चुकी है। यह केवल एक नदी के लुप्त होने की ही कहानी नहीं है, बल्कि यह एक इतिहासिक दास्तवेज है जहाँ प्रकृति के बदलावों और इंसान की ‘शहरी’ और 'इंजीनियरिंग' की भूख ने मिलकर एक जीवित सभ्यता के वाहक को सीवेज लाइन में तब्दील कर दिया। यह कहानी केवल कोलकाता के आदि गंगा की ही नहीं बल्कि दिल्ली के यमुना की, वडोदरा के विश्वामित्री की, चेन्नई के अडियार की, पुणे के मुला-मुठा की, भारत के अधिकांश शहरो की आधार रही उन तमाम नदियों की कहानी है जो अब उन्ही शहरो की बलि चढ़ रही है।
आदिगंगा का पौराणिक और सांस्कृतिक वैभव
आदि गंगा महज पानी की एक धारा नहीं, बल्कि बंगाल की 'पवित्र भूगोल' का केंद्र रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर उतारा, तो कपिल मुनि के आश्रम की ओर बढ़ते हुए गंगा कई धाराओं में बंट गई। आदिगंगा को ही वह 'असली' धारा के रूप में मानी जाती है, जिसने भगीरथ के पूर्वजों की राख को छूकर उन्हें मोक्ष दिया।
यही कारण है कि बंगाल के मध्यकालीन साहित्य, जैसे बिप्रदास पिपलई की 'मनसामंगल', मुकुंदराम चक्रवर्ती की 'चंडीमंगल', कृष्णराम दास की ‘रायमंगल’, अयोध्या राम की ‘सत्यनारायण कथा’, हरिदेब की सीतामंगल आदि रचनाओं में आदि गंगा जो गंगा की मुख्य धारा है, के भूगोल के साथ साथ गौरवशाली धार्मिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ मिलता है।
वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु की यात्राओं में भी इसी धारा से गुजरने का वर्णन आता है; आज भी उनकी स्मृति में जिस स्थान को वैष्णवघाटा कहा जाता है, वह आदिगंगा के तट से ही जुड़ा हुआ है। मृतप्राय हो चुके नदी के किनारे एक शक्तिपीठ के रूप में कालीघाट मंदिर आज भी एक प्रमुख तीर्थ है। श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों का श्राद्ध और दाह संस्कार करते हैं और आस्था की डुबकी लगाते हैं, क्योंकि भले ही गंगा की मुख्य धारा आज हुगली के रूप में बह रही हो, पर लोकमान्यता में आदिगंगा को ही मूल धारा माना जाता है।
टेकटोनिक शिफ्ट: आदि गंगा के पतन की शुरुआत
गंगा की मुख्य धारा के मृतप्राय हो जाने के पीछे बेतरतीब शहरीकरण के साथ साथ लगभग पिछले पांच सौ सालो का क्षेत्रीय और व्यापक स्तर के भूगर्भीय बदलाव भी शामिल रहे है। जिसकी कहानी कोलकाता से तीन सौ किलोमीटर उत्तर ‘गिरिया’ से शुरू होती हैं, जहां से 16वीं शताब्दी के उतरार्ध तक गंगा की मुख्य धारा भागीरथी के रूप में दक्षिण में प्रयाण करती थी, और एक छोटी धारा पद्मा के रूप पूरब की ओर (जो अब बांग्लादेश है) बह निकलती थी।
भागीरथी नदी दक्षिण में जलंगी नदी से मिलने के बाद तीन अलग-अलग धाराओं सरस्वती (पश्चिम), हूगली (मध्य), जमुना-बिद्याधरी (पूरब) के रूप में बह निकलती है, जिसे बंगाल की त्रिबेणी कहा जाता है। प्रयागराज के त्रिवेणी के उलट जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है, जिसे 'युक्त वेणी' कहा जाता है, बंगाल के इस त्रिबेणी को 'मुक्त वेणी' कहा जाता है, क्योंकि यहां से तीन धाराएं अलग अलग मुक्त होती हैं।
सोलहवीं शताब्दी के आखिरी में बंगाल बेसिन में एक बड़ा टेक्टोनिक शिफ्ट हुआ, जिसके कारण डेल्टा का पश्चिमी हिस्सा (जहाँ कोलकाता स्थित है) थोड़ा ऊपर उठ गया और पूर्वी हिस्सा (वर्तमान बांग्लादेश) धंस गया। इस 'ईस्टवर्ड शिफ्ट' के कारण गंगा भागीरथी, हुगली-आदिगंगा और अन्य पश्चिमी धाराओं को आंशिक रूप में छोड़कर पूर्व की ओर मुख्य रूप से 'पद्मा' नदी से होकर बहने लगी।
इससे बंगाल का पश्चिमी हिस्सा जो उस समय तक सरस्वती पर स्थित नदी बन्दरगाहो के कारण समुद्री व्यापार का केंद्र था, पानी में बहाव के कमी और नदी में गाद जमा हो जाने के कारण बड़े स्तर पर प्रभावित हुआ।
ऐतिहासिक रूप से, हुगली-आदि गंगा ना हो के सरस्वती नदी ही बंगाल की मुख्य व्यापारिक धमनी थी, जिस पर 'सप्तग्राम' जैसा समृद्ध पत्तन फला-फूला।आदिगंगा, जो कभी लहरें मारती नदी थी, अब केवल मानसून के पानी पर निर्भर रहने वाली एक 'स्पिल चैनल' बनकर रह गई।
औपनिवेशिक दबाव और 'काटा गंगा'
धीरे धीरे घट रहे पानी का प्रभाव भागीरथी और सरस्वती नदी से होके आदि गंगा पर पड़ने वाला था, जिसमें केवल प्रकृति ही नहीं,नहीं, इंसानी हस्तक्षेप का भी बड़ा हाथ रहा। टेक्टोनिक शिफ्ट के पहले तक सरस्वती नदी का जलमार्ग गहरा होने के कारण ताम्रलिप्ति के जगह सप्तग्राम बहुत व्यस्त और समृद्ध पोर्ट के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था जिसे पुर्तगालीयो ने 'पोर्तो पेकेनो' (छोटा बंदरगाह) का नाम दिया था।
लेकिन टेक्टोनिक शिफ्ट के बाद पानी के बहाव में कमी के कारण सरस्वती नदी धीरे-धीरे गाद से भरने लगी. बड़े जहाज अब सप्तग्राम तक नहीं जा पा रहे थे, इसलिए पुर्तगाली व्यापारियों ने सरस्वती नदी में ही काफी नीचे 'बेतड़' पत्तन का उपयोग शुरू किया, जहाँ से माल छोटी नावों के जरिए सप्तग्राम भेजा जाता था।
सरस्वती नदी के व्यापारिक मार्ग को गाद से बचा कर सुचारू रखने के लिए अठारहवीं शताब्दी के मध्य (1739 और 1756 के बीच कभी) नवाब अलीवर्दी खान के शासनकाल में डच इंजीनियरों की सहायता से हावड़ा के संकरैल के पास हुगली जो उस समय आदि गंगा के रास्ते बहती थी, को सरस्वती के निचले और गहरे हिस्से से जोड़ने के लिए इस धारा को काटा गया। इस मानव-निर्मित नहर को 'काटा गंगा' कहा गया।
इस हस्तक्षेप के कारण धीरे धीरे सरस्वती नदी से होते हुए यही धारा हुगली की मुख्य धारा बन गई और पहले से ही पानी की कमी झेल रही गंगा की मुख्य धारा आदिगंगा को उसके भाग्य पर छोड़ दिया गया। इस प्रकार औपनिवेशिक ताकतों के प्रभाव में और समुद्री व्यापर को सुनिश्चित करने के दबाब में आदि गंगा सूखती और सिकुड़ती चली गयी।
औपनिवेशिक इंजीनियरिंग: टॉली नाला
'काटा गंगा' प्रकरण के कुछ सालो बाद ही बाद हुगली का सारा पानी अब सीधे सरस्वती की निचली धारा के रास्ते समुद्र में मिलने लगी और आदि गंगा पानी कमी के कारण तेजी से सिकुड़ने लगती है जिसका जिक्र भारत के पहले सर्वेयर जनरल जेम्स रेंनेल अपने सर्वे में इसे बस एक फेंटलाइन के रूप में दर्शाते है।
1775-1777 के बीच, ईस्ट इंडिया कंपनी के मेजर विलियम टॉली ने व्यापारिक लाभ के लिए आदिगंगा की पुरानी धारा के कुछ भाग (हेस्टिंग्स से गरिया तक) और वहा से सामुकपोता तक नहर खुदवाई ताकि इसका उपयोग सुंदरबन तक के लिए एक व्यापारिक मार्ग के रूप में हो सके, जिसे 'टॉली नाला' का नाम दिया गया।
इस प्रकार 15 किलोमीटर लम्बी नहर के सहारे आदि गंगा जो गरिया से दक्षिण की तरफ मुड के बरुइपुर, सुर्यापुर, मागरा से होकर पानी के विस्तृत विन्यास के हिस्सेके रूप में सागर द्वीप के पास समुद्र में मिल जाती थी, अब उसके एक हिस्से का प्रवाह सुन्दरवन की ओर प्रवाहित होने वाली विद्याधरी नदी तक हो गया।
अगले कुछ दशकों के लिए आदि गंगा के दिन बहुरते है और यह जल परिवहन खास कर छोटे नाव के माध्यम से स्थानीय व्यापर का केंद्र बन जाती है। इस प्रकार जल परिवहन को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए आदिगंगा के रख रखाव पर सरकारी कृपा बनी रही।
यह अंग्रेजी हुकूमत के शुरुवाती दौर की बात थी जब कोलकाता और आसपास के व्यापक रूप से फैले क्रीक, नदी नालों को जल परिवहन के लिए विकसित किया गया, पर कुछ दशकों में ही अंग्रेजों ने जलमार्गों के बजाय पहले सड़क और उन्नीसवी शताब्दी के उतरार्ध में रेलवे को प्राथमिकता देनी शुरू की।
नतीजतन आदिगंगा के रास्ते व्यापार कम हुआ और अंततः नदी के रखरखाव में निवेश पूरी तरह बंद हो गया. धीरे-धीरे, ज्वार के साथ आने वाली गाद ने इसे और भी उथला बना दिया। इस प्रकार आदिगंगा एक बार फिर नेपथ्य में चली गयी।
आदि गंगा की सांस्कृतिक स्मृति
उन्नीसवी शताब्दी के उतरार्ध में मृतप्राय आदि गंगा को स्थिति को ब्रिटिश अधिकारी विलियम विलसन हंटर 'ए स्टैटिस्टिकल अकाउंट ऑफ बंगाल' (1875) में दर्ज करते है। तब तक प्रवाह विहीन नदी सूख कर केवल छोटे पोखरों या 'डोबा' की एक श्रृंखला भर रह गई थी।
हालांकि नदी में कोई बहाव नहीं थी फिर भी स्थानीय लोगो के बीच गंगा की मुख्य धारा के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आई थी और अपने मृतकों को नदी की सूखी पेटी में ही अंतिम संस्कार की परम्परा बनी रही, क्योंकि उनकी मान्यता में यही 'मूल' गंगा थी, जिसके किनारे जलाए जाने से मोक्ष मिलता है।
हंटर से लगभग सौ साल पहले भी एक स्थानीय पुजारी के हवाले सूख रही आदि गंगा को ही गंगा की मुख्य धारा मानने की मान्यता का जिक्र तब के अंग्रेजी सरकार के नुमाइंदे जॉन जे होलवेल भी करते है।
बाद में नदी की पेटी में स्थानीय जमींदार परिवार धार्मिक आस्था के अनुरूप अपने अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए डोबा आरक्षित करने लगे, जिसमे कुछ् का अस्तित्व नदी के बरुइपुर, सुर्यापुर वाले रास्ते में डोबा की एक विस्तृत श्रृंखला के रूप में आज भी बचा हुआ है, जैसे करेर गंगा, धोषेर गंगा, मित्रो गंगा, यहाँ तक इन तालाबो के नाम के साथ गंगा नाम आज भी चलन में है, जो गंगा की मुख्य धारा के साथ सांस्कृतिक स्मृति का भान कराती है।
आधुनिक भारत: कंक्रीट के खंभों उलझी नदी
आजादी के बाद मुख्यतः अनियोजित शहरीकरण, प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक-पर्यावरणीय असंतुलन के कारण आदिगंगा की स्थिति बिगडती चली गई। कोलकाता शहर के फैलाव और नदी तटों पर अवैध कब्जे, झुग्गी-बस्तियों का विस्तार ने गंगा की इस पवित्र धारा को 'वेस्ट डंपिंग ग्राउंड' में बदल दिया।
तकनीकी व्यवस्थाओं की कमी, जैसे उचित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का अभाव और पुरानी जल-निकासी प्रणाली का रखरखाव न होना और अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों ने स्थिति को और गंभीर बनाता गया।
हालाकि बीच-बीच में नदी के बचाव के लिए भी प्रयास होते रहे, पर विभिन्न सरकारी योजनाएँ, सीवेज ट्रीटमेंट परियोजनाएं और सफाई अभियान अक्सर तकनीकी समाधान तक सीमित रहे, जिनमें नदी को एक जीवंत सामाजिक-पर्यावरणीय तंत्र के रूप में समझने के बजाय मात्र एक “ड्रेनेज चैनल” मान लिया गया।
कई बार पुनरुद्धार के नाम पर बुनियादी ढाँचा निर्माण, अतिक्रमण हटाने या “सौंदर्यीकरण” पर जोर दिया गया, जो वास्तव में नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित करने के बजाय शहरी विकास के हितों को साधने का माध्यम बन गया। नदी के साथ की स्थानीय समझ और सांस्कृतिक संबंधों की उपेक्षा ने आदि गंगा के पुनर्जीवन के प्रयासों को कमजोर किया।
नब्बे के दशक में बड़े स्तर पर नदी से गाद हटाने के बाद नदी में थोड़ा बहुत बहाव वापस आया पर नयी सदी के शुरुवात तक नदी मेट्रो के कुचक्र में फंस गयी। साल 2001 में, जब टॉलीगंज से गरिया के बीच मेट्रो रेलवे के विस्तार की योजना बनी, तो पर्यावरणविदों के भारी विरोध के बावजूद, नदी के सीने पर मेट्रो के 300 कंक्रीट के खंभे गाड़ दिए गए।
इन खंभों ने कभी 75 किलोमीटर लंबी रही नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया और आदि गंगा कोलकाता में अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव से दूर, एक अवरुद्ध और प्रदूषित प्रवाह के रूप में सीमित रह गई है।
क्या आदि गंगा की मुक्ति संभव है?
आज आदिगंगा सूख रही, इसमें से जीवन के निशान धीरे धीरे खत्म हो रहे है, इसके पुनर्जीवन के नाम पर हजारों करोड़ खर्च कर हम तथाकथित आधुनिक शहर के लिए जरुरी हित साध रहे है। एक बार फिर नेशनल क्लीन गंगा मिशन नदी को पुनर्जीवन के 650 करोड़ की राशि के प्लान के साथ हाज़िर है।
एक बार फिर बंगाल के चुनाव में सभी पार्टियों के आदि गंगा के कायाकल्प के वादे गूंज रहे है। पर हम नदी को एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र मान कर और उसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक और जलसमाज वाले पहलू को देखे बिना बस शहरी अपशिष्ट वहन करने वाली धारा के सौदर्यीकरण से आगे अब भी सोच नहीं पा रहे है।
आदिगंगा की यह व्यथा केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभूतपूर्ण क्षरण है। जिन नदी ने सदियों तक हमें व्यापारिक संपन्नता और आध्यात्मिक शांति दी, उसे हमने अपने 'विकास' की वेदी पर चढ़ा दिया। रेंनेल और हंटर के नक्शों में और मनसामंगल, चंडीमंगल और श्चैतन्य महाप्रभु की यात्रा वाली नदी कभी 'पवित्र धारा' थी, आज वह हमारे शहरी लालच के स्मारक के रूप बच गयी है। हम देख ही नहीं पा रहे है कि कैसे फैलते शहर अपनी ही नदियों को निगल रही हैं! क्या हम अपनी अगली पीढ़ियों को यह बताने की हिम्मत जुटा पाएंगे कि जिसे वे 'नाला' कह रहे हैं, वह कभी 'आदिगंगा' थी?
(hindi.downtoearth)
जर्मन शहर बॉन में एक नई प्रदर्शनी लगाई गई है, जो सेक्स वर्क के इतिहास और उससे जुड़ी संस्कृति को दर्शाती है. यह दिखाती है कि इस काम के लिए जो शब्द इस्तेमाल हुए, उसने समाज में इसके प्रति किस तरह से नफरत या भेदभाव पैदा की.
डॉयचे वैले पर ब्रेंडा हास का लिखा-
"लालुन दुनिया के सबसे पुराने पेशे की सदस्य हैं.”
अंग्रेजी लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी 1888 की कहानी ‘ऑन द सिटी वॉल' में यह ऐसी लाइन लिखी, जिसने सेक्स वर्क के लिए दुनिया का सबसे मशहूर छद्म नाम तैयार कर दिया. तब से यह मुहावरा बार-बार दोहराया जाता रहा है. सीधे तौर पर काम का नाम लेने के बजाय, इस तरह की घुमावदार भाषा उस समय के समाज की नैतिकता को दिखाती थी. तब लोग ऐसे शब्दों का इस्तेमाल इसलिए करते थे, ताकि इस विषय पर बात भी हो जाए और उन्हें शर्मिंदगी का सामना भी न करना पड़े.
बॉन के बुंडेसकुंस्टहाले (फेडरल आर्ट गैलरी) में एक नई प्रदर्शनी शुरू हुई है, जिसका नाम है ‘सेक्स वर्क: ए कल्चरल हिस्ट्री'. यह प्रदर्शनी दिखाती है कि अलग-अलग समाजों और बदलत समय के साथ सेक्स वर्क को कैसे पेश किया गया, इसके लिए क्या नियम बनाए गए और इस काम से जुड़े लोगों के अनुभव कैसे रहे. यह इतिहास के माध्यम से समाज की बदलती सोच को समझने की एक कोशिश है.
प्रदर्शनी लगाने वाले इस विषय को ‘एक ऐसा क्षेत्र बताते हैं जो नैतिकतावादी और अत्यधिक राजनीतिक चर्चाओं से भरा हुआ है.' यहां ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरानी कलाकृतियों, कानूनी कागजातों, और आज के दौर के लोगों की बातों के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई है कि समाज में सेक्स वर्क को किस तरह एक खास सांचे में ढाला गया. प्रदर्शनी यह भी उजागर करती है कि कैसे आम बहसों में इसकी हकीकत को अक्सर तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है.
यह प्रदर्शनी आपको यह नहीं बताती कि क्या सही है और क्या गलत है. इसके बजाय, यह आपको खुद से यह पूछने के लिए तैयार करती है कि आपकी अपनी सोच कैसे बनी. क्या यह मीडिया की खबरों का असर है, समाज की उम्मीदें हैं, या फिर वे शब्द हैं जो आपने बचपन से सुने हैं? यह आपकी अपनी धारणाओं को टटोलने का निमंत्रण है.
परजीवी से लेकर सेक्स वर्कर तक
प्रदर्शनी का एक हिस्सा भाषा की पड़ताल करता है. यहां एक शब्द-कोश दिया गया है जो यह दिखाता है कि इतिहास में सेक्स वर्कर्स के लिए किन-किन शब्दों का इस्तेमाल हुआ. यह इस बात की भी पड़ताल करता है कि इन शब्दों ने किन सच्चाइयों को दुनिया के सामने रखा और किन्हें हमेशा के लिए छुपा दिया. साथ ही, यह भी दिखाया गया है कि इन शब्दों ने लिंग, नैतिकता और श्रम को लेकर हमारी सोच को कैसे गढ़ा.
अर्नेस्टीन पास्टोरेलो, इस प्रदर्शनी के आयोजनकर्ताओं में से एक हैं और वह सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट भी हैं. वह कहती हैं, "सेक्स वर्क के इतिहास पर शोध करना मुश्किल है, क्योंकि हर दौर में हमें अलग-अलग नामों से पुकारा गया. ऐतिहासिक दस्तावेजों में अक्सर अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.”
वह आगे कहती हैं, "ऐतिहासिक शब्दावली अक्सर सटीक नहीं होती. 19वीं सदी में, ‘वेश्या' शब्द का इस्तेमाल किसी भी ऐसी महिला के लिए किया जा सकता था जो सार्वजनिक जगहों पर ‘बहुत ज्यादा दिखाई देती' थी, चाहे वह असल में यौन सेवाएं देती थी या नहीं.” वे समझाती हैं कि उस समय यह ‘ठप्पा' बहुत ही लापरवाही से किसी पर भी लगा दिया जाता था, चाहे वे महिलाएं गरीबी में जी रही हों, नशे की समस्या से जूझ रही हों या जिन्हें समाज ‘बिगड़ा हुआ' मानता था. इस वजह से, ऐतिहासिक शोध के लिए इन शब्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इन शब्दों के साथ इतनी बुराई और नफरत जुड़ी हुई है कि आज भी जब हम सेक्स वर्क पर बात करते हैं, तो वही पुरानी सोच हमारे आड़े आती है.
इसी तरह की गलतफहमियां दूसरे ऐतिहासिक मामलों में भी दिखती हैं. पुराने सोवियत संघ और अन्य कम्युनिस्ट देशों में सेक्स वर्कर्स पर ‘सामाजिक परजीवी' होने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया जाता था. यह शब्द शारीरिक रुप से सक्षम उन वयस्कों के लिए इस्तेमाल होता था जो ‘सामाजिक तौर पर उपयोगी कोई काम' नहीं कर रहे थे और आधिकारिक श्रम प्रणाली यानी सरकारी सिस्टम से बाहर रहकर पैसा कमा रहे थे. सेक्स वर्क को भी इसी श्रेणी में रखा गया था, क्योंकि इसे समाज के लिए उपयोगी काम नहीं माना जाता था.
इस भाषा से यह साफ पता चलता है कि अधिकारियों ने शब्दों का इस्तेमाल लोगों के व्यवहार पर लगाम लगाने के लिए किया. इन शब्दों के जरिए ही यह तय किया जाता था कि किसे एक ‘असली श्रमिक' माना जाए और किसे नहीं.
कब और कैसे विकसित होता है यौन रुझान?
जब हम इन सभी शब्दों को एक साथ देखते हैं, तो समझ आता है कि किसी को कोई ‘नाम' देना केवल पुकारना नहीं है, बल्कि उसके पीछे लिंग, वर्ग और समाज में उसकी हैसियत को लेकर कई धारणाएं छिपी होती हैं. कुछ नाम तो सीधे तौर पर अपमान करने के लिए बने हैं. जैसे, जर्मन भाषा का शब्द ‘स्ट्रिशर', जो मुख्य रूप से उन पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है जो सेक्स वर्क करते हैं. यह शब्द एक मुहावरे से निकला है जिसका मतलब होता है ‘सड़क पर ग्राहकों की तलाश में घूमना.'
1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में, इस शब्द का इस्तेमाल खासकर बर्लिन के बानहोफ जू स्टेशन के पास काम करने वाले पुरुष सेक्स वर्कर्स के लिए होने लगा. यह जगह उस समय काफी बदनाम थी. इस वजह से, ‘स्ट्रिशर' शब्द का मतलब केवल काम से नहीं रहा, बल्कि यह गरीब, बेघर, और समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों के लिए दुखद पहचान बन गया. इसने उस दौर के शहरी जीवन के एक अंधेरे पक्ष को लोगों के सामने रखा.
क्या सोचती हैं कैजुअल सेक्स से ऊब चुकी महिलाएं
आज के डिजिटल दौर में ‘पॉर्न परफॉर्मर' जैसे शब्द यह दिखाते हैं कि यह काम अब कितना बदल चुका है. सब्सक्रिप्शन वाली शुरुआती वेबसाइटों से लेकर आज के ‘ओनली-फैन्स' जैसे प्लैटफॉर्म तक, अब परफॉर्मर खुद अपना कंटेंट बनाते हैं और उसे सीधे लोगों तक पहुंचाते हैं. आज के समय में कुछ लोग खुद को 'सेक्स वर्कर' कहना पसंद करते हैं, तो कुछ इस पहचान से खुद को दूर रखते हैं.
नाम को फिर से अपनाना और उस पर बहस करना
यह प्रदर्शनी यह भी दिखाती है कि सेक्स वर्करों ने अपने बारे में इस्तेमाल होने वाली भाषा को कैसे आकार दिया है. ‘सेक्स वर्क' शब्द 1970 के दशक के आखिर में अमेरिकी एक्टिविस्ट कैरोल लीघ ने गढ़ा था. वह एक ऐसा शब्द चाहती थीं जो किसी काम को बताए, न कि कोई नैतिक ठप्पा लगाए. इस बदलाव से एकजुट होने, पहचान बनाने और अपनी बात रखने के लिए जगह बनी.
सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट अर्नेस्टीन पास्टोरेलो कहती हैं कि ‘सेक्स वर्क' शब्द को इसलिए ज्यादा पसंद किया जाता है, क्योंकि इसका मतलब ‘ठीक वही है जिसकी असल में बात हो रही है, न उससे ज्यादा और न उससे कम.' यानी, पैसे या दूसरी चीजों के बदले यौन सेवाएं देना, ताकि गुजारा चल सके. उनकी नजर में, यह शब्द चर्चा के लिए स्पष्ट आधार देता है, बजाय उन शब्दों के जो पुरानी नैतिक सोच पर आधारित हैं.
द वूम्ब सर्विस: छात्रों का गुप्त नेटवर्क, जो बांटता है गर्भनिरोधक और कंडोम
नजरिए में आया यह बदलाव असल में भी देखने को मिल रहा है. अलग-अलग देशों में सेक्स वर्कर के आंदोलनों ने अपने लिए इस्तेमाल होने वाले अपमानजनक शब्दों को अपनाकर उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया है. उन्होंने ‘एस्कॉर्ट' या ‘स्ट्रिपर' जैसे शब्दों को अपनी मर्जी से चुना है और बाहर से थोपे गए नामों को चुनौती दी है. ये चुनाव इस बात का सबूत हैं कि वे अब अपनी जिंदगी और अपने काम को अपनी शर्तों पर बयां करना चाहते हैं.
इसके साथ ही, कुछ लोग ‘सेक्स वर्क' शब्द के इस्तेमाल पर सवाल भी उठाते हैं.' ‘ग्लोबल अलायंस अगेंस्ट ट्रैफिकिंग इन वीमेन' जैसी संस्थाओं और स्वीडन की नीति विशेषज्ञ गुनीला एकबर्ग जैसी विशेषज्ञों का कहना है कि यह शब्द गंभीर समस्याओं के बीच के अंतर को धुंधला कर देता है. उनका मानना है कि जब हम सबको एक ही नाम (सेक्स वर्क) दे देते हैं, तो उन लोगों को पहचानना मुश्किल हो जाता है जिन्हें गरीबी, दबाव या किसी मजबूरी की वजह से इस काम में धकेला गया है. उनके लिए यह ‘मर्जी का पेशा' नहीं, बल्कि ‘शोषण' का मामला है.
यह असहमति दिखाती है कि भाषा किस तरह से कुछ बातों को तो साफ तौर पर सामने लाती है, लेकिन दूसरों की मजबूरियों को समझना मुश्किल बना देती है.
भाषा और श्रम अधिकार
बतौर पास्टोरेलो, अगर हम अधिकारों की बात करना चाहते हैं, तो सेक्स वर्क को एक ‘काम' की तरह देखना बहुत जरूरी है. वे मानती हैं कि कई लोग मजबूरी में यहां आते हैं, लेकिन उनका मानना है कि जब हम इसे ‘श्रम' कहेंगे, तभी हम इस बारे में बात कर पाएंगे कि इन लोगों को सुरक्षा कैसे मिले, इनके अधिकार क्या हों और ये कैसे एक साथ मिलकर अपनी आवाज उठा सकें.
वह बताती हैं, "इसे काम की तरह देखने से, हमें इस पर ट्रेड यूनियन के नजरिए से बात करने का मौका मिलता है. यह एक बुनियादी सम्मान की बात है कि हमें भी मजदूर माना जाए. इसलिए, हम भी उन्हीं सुरक्षा नियमों और अधिकारों के हकदार हैं जो बाकी कामगारों को मिलते हैं.” उनका मानना है कि पहचान मिलने के लिए ‘सशक्तिकरण' की शर्त नहीं होनी चाहिए. "सेक्स वर्क करने का हमारा अधिकार हमारे श्रम अधिकारों पर निर्भर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि यह हमें सशक्त बनाने वाला है या नहीं.”
कुल मिलाकर, यह प्रदर्शनी संस्कृति, भाषा और असल जिंदगी के अनुभवों के जरिए हमें यह बताती है कि सेक्स वर्क को समझने के लिए सबसे पहले यह मानना जरूरी है कि यह एक उलझा हुआ विषय है. हमें उन शब्दों पर गौर करना होगा जो समाज ने अब तक इस्तेमाल किए हैं. साथ ही, उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा जिन्हें इन शब्दों ने कभी अपनी चर्चा का हिस्सा ही नहीं बनाया और नजरअंदाज कर दिया.
यह प्रदर्शनी ‘सेक्स वर्क- ए कल्चरल हिस्ट्री' बॉन के बुंडेसकुंस्टहाले में 25 अक्टूबर, 2026 तक चलेगी.
-सुनीता नारायण
कुछ तस्वीरें जीवन भर आपके साथ रहती हैं। ऐसी ही मेरी एक याद कई दशक पुरानी है, जो राजस्थान के एक गांव से जुड़ी है। मुझे याद है, मैं उस दिन बहुत तडक़े उठ गई थी, उस समय बस्ती पर अब भी धुंध छाई हुई थी। मैं पास की एक डेयरी तक पैदल गई, जिसे मैं पश्चिमी फिल्मों जैसी जगह समझ रही थी, जहां गायों और भैंसों की कतारें हों और उनका हाथ से दूध निकाला जा रहा हो (यह ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीनों से पहले का समय था)।
लेकिन वहां पहुंचकर एक बिल्कुल साधारण-सी इमारत मिली। अंदर पारंपरिक शॉल में लिपटी महिलाएं कतार में खड़ी थीं। वे बारी-बारी से अपने बर्तन एक छोटे तराजू पर रखतीं, एक छपी हुई पर्ची लेतीं और फिर दूध को एक बड़े कंटेनर में उंडेल देतीं।
उनमें से कोई भी पढऩा-लिखना नहीं जानती थीं। फिर भी उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बताया कि उस पर्ची में न केवल दिए गए दूध की मात्रा दर्ज होती है, बल्कि उसकी वसा (फैट) की मात्रा भी लिखी होती है, जिसके आधार पर उन्हें भुगतान मिलता है।
दूध से भरे बर्तनों को तेजी से छोटे वाहनों में लाद दिया जाता, जो गांव-गांव घूमकर दूध इक_ा करते और फिर उसे जिला या राज्य स्तर की डेयरियों तक पहुंचाते। यही था मशहूर अमूल मॉडल, जिसे अब पूरे भारत में अपनाया जा चुका है।
चाहे किसी डेयरी के पास कई गायें हों या किसी घर में एक-दो पशु ही क्यों न हों, सभी इस सहकारी व्यवस्था का हिस्सा बन सकते थे।
आज वह दृश्य और भी प्रासंगिक लगता है, जब दुनिया प्रतिद्वंद्विता से आकार लेती एक नई आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जो वैश्वीकरण की कब्रों पर खड़ी होती दिखाई देती है। जैसा कि मैंने अपने पिछले कॉलम में लिखा था, इस उभरते दौर में हर देश को अपने घरेलू संसाधनों और आर्थिक ताकत के आधार पर अपना भविष्य सुरक्षित करना होगा।
इसलिए अब समय है कि हम भी गंभीरता से विचार करें कि हमारे विकास का सबसे उपयुक्त रास्ता क्या हो सकता है और क्यों वह पुराने समृद्ध देशों के रास्ते से अलग होना चाहिए, जो आज अपनी आर्थिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं।
आइए, डेयरी क्षेत्र की ही बात करते हैं। इस क्षेत्र में पश्चिमी मॉडल भी बाकी अर्थव्यवस्था की तरह ही है। यह बड़े पैमाने पर उत्पादन, औद्योगिक ढांचे, भारी मशीनीकरण और बाहरी संसाधनों के व्यापक उपयोग पर आधारित है। इसकी तर्कशक्ति सीधी और आकर्षक है: जितना बड़ा उत्पादन, उतनी अधिक बिक्री और उतना ही ज्यादा मुनाफा।
लेकिन ये फायदे एक कीमत के साथ आए। कीटनाशकों और एंटीबायोटिक जैसे बाहरी संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता ने पर्यावरण प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं पैदा कीं। इसके बाद नियम-कानून कड़े किए गए, जिससे लागत और बढ़ गई।
दूध को सस्ता बनाए रखने के लिए सरकारों को सब्सिडी देनी पड़ी। लेकिन समस्या और गहरी हो गई, क्योंकि अब दूध की आपूर्ति मांग से ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में उत्पादकों को नए बाजार तलाशने पड़ रहे हैं।
नतीजा यह है कि आज विवाद इस बात पर है कि कौन-सा देश इस कृत्रिम रूप से सस्ते किए गए उत्पाद के लिए अपना बाजार खोलेगा और ऐसे आयात का घरेलू उत्पादन व किसानों पर क्या असर पड़ेगा।
यूरोपीय किसान कहते हैं कि यूरोपीय संघ व मर्कोसुर के बीच हुआ व्यापार समझौता उन्हें कारोबार से बाहर कर देगा, क्योंकि लैटिन अमेरिकी किसानों ने गहन औद्योगिक खेती में महारत हासिल कर ली है।
भारत में भी यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हालिया व्यापार समझौतों में कृषि और डेयरी सबसे विवादास्पद मुद्दे रहे हैं और यह चिंता वाजिब है। इसीलिए यह समझना जरूरी है कि भारत का डेयरी मॉडल किस तरह अलग है, क्यों यह हमारी आर्थिक सुरक्षा के लिए अहम है और कैसे यह हमारे अलग तरीके से गढ़े जाने वाले भविष्य का हिस्सा बन सकता है।
-अशोक पाांडे
हमारे समय की जीनियस लेखिका हेलेन ड्यूइट ने तीन दिन पहले करीब पौने दो करोड़ रुपए का प्रतिष्ठित इनाम विंडहैम-कैम्पबेल प्राइज़ महज़ इसलिए ठुकरा दिया कि उसके एवज में उन्हें कुछ लिट्-फेस्ट्स में हिस्सा लेना था, कुछ इंटरव्यू देने थे और कुछ वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डालने थे।
लेखक को इन्फ़्लूएन्सर में तब्दील कर बेचने की जुगत में लगे रहने वाले इनाम-सम्मान के इस बाजारी मकडज़ाल से हेलेन का सामना पहले भी हो चुका था। साल 2000 में छपे उनके बेहतरीन उपन्यास की एक लाख से ऊपर प्रतियाँ बिकीं लेकिन उसके बाद सोलह बरसों तक किताब आउट ऑफ़ प्रिंट रही। इसका परोक्ष कारण उनका प्रकाशक था जिसने किताब छापने में लापरवाही दिखाई थी और टाइपिंग की बहुत सारी गलतियाँ की थीं। पैसे के लेनदेन को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ था – जब हेलेन को यकीन था कि प्रकाशक ने उन्हें 75,000 डॉलर देने हैं, प्रकाशक ने उलटे उन पर 80,000 डॉलर की देनदारी निकाल दी।
बहरहाल उपन्यास 2016 में दोबारा छपा और उसे हाथों हाथ लिया गया। मशहूर आलोचक क्रिस्चियन लोरेन्ज़ेन ने अपने एक लेख में इसे शताब्दी का महानतम उपन्यास बताया। हेलेन के कुल चार उपन्यास छपे हैं और वे भीड़भाड़ से दूर रहना पसंद करती हैं।
इनाम ठुकराने के बाद उन्होंने मीडिया को बताया, ‘मेरी एक दोस्त ने मुझसे कहा की अगर तुम किसी तरह पांच मिनट के लिए एक टीवी चैनल के मॉर्निंग शो में मौक़ा हासिल कर पाओ तो हर कोई तुम्हारी किताब खरीद लेगा। तब मैंने अपनी कल्पना में खुद को देखा कि मैं, जिसे कैमरे से इस कदर झेंप लगती है, स्टूडियो में तेज रोशनी के सामने गाढ़ा मेकप पोते, सोफे पर बैठी हुई किसी अपढ़ एंकर को यह बताने की कोशिश कर रही हूँ कि किस तरह मैंने एक महान फ्रांसीसी आलोचक की प्रेरणा से अपना पहला उपन्यास लिखा था। मुझे यह बहुत हास्यास्पद और भोंडा लगा।’
-मोहम्मद हनीफ
बाबू और ब्यूरोक्रेट्स, चाहे वे कहीं से भी हों, काफ़ी पढ़े-लिखे होते हैं और थोड़े चालाक भी होते हैं। क़ानून की किताब से कोई बारीक सी बात निकालकर उसके पीछे पड़ जाते हैं।
उन्हें अपनी गलियों और मोहल्लों में हंसती-खेलती और कभी-कभी रोती जि़ंदगी नजऱ ही नहीं आती है।
वे अपने हाथ से लिखे कानून को भगवान का आदेश मानने लगते हैं।
भारत में आशा भोसले गुजऱ गई हैं। 92 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ है। वह अपनी जि़ंदगी का पूरा आनंद लेकर गई हैं और कोई चार पीढिय़ों के लोग उनके गाए हुए गाने सुनते रहे हैं।
इधर पाकिस्तान में ख़बरें चलीं कि पेमरा (पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी) के बाबुओं ने नोटिस भेजे हैं कि आशा जी के जाने की ख़बर के साथ-साथ उनके गाने क्यों चलाए गए हैं।
अब पाकिस्तानी संस्थाओं की हरकतें देखकर गुस्सा नहीं आता लेकिन यह सुनकर सच में अंदर से निकला है, ‘ओए पेमरा वालों तुम कौन लोग हो?’
पाकिस्तान में बॉलीवुड का जुनून
इंडिया-पाकिस्तान में एक-दूसरे की फि़ल्मों और गानों पर बैन है।
वैसे तो बैन किताबों पर भी है, लेकिन ज़ाहिर है लोग किताबें कम पढ़ते हैं।
लेकिन गानों और फि़ल्मों को न कोई जंग रोक पाई है और न ही कोई बॉर्डर।
हमारे बुजुर्ग छतों पर चढक़र, दूरदर्शन का सिग्नल पकडक़र ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म देखने के लिए एंटेना घुमाते थे।
उसके बाद वीसीआर किराए पर लेकर ‘उमराव जान अदा’ देखते रहे हैं।
हमने वो जमाना भी देखा है, जब वहां मुंबई में कोई फिल्म रिलीज होती, चार घंटे बाद उसका कैमरा प्रिंट डीवीडी में कराची में मिल जाता था।
अगर किसी को मास्टर प्रिंट चाहिए होता था तो उसे कहा जाता कि तुम दो दिन इंतजार कर लो।
अब डिजिटल ज़माना है। किसी दुकान पर, किसी बाजार जाने की या किसी स्मगलिंग में जाने की ज़रूरत नहीं है।
अपने फोन पर, कंप्यूटर पर पाकिस्तान में बैठे लोग ‘धुरंधर’ देख भी रहे हैं और साथ ही उसमें गलतियां निकाल रहे हैं।
यह पेमरा के बाबू पता नहीं किस पाकिस्तान में पले-बढ़े हैं, वे तो आशा भोसले के गानों के लिए क़ानून की किताब खोलकर बैठ गए हैं।
- प्रवीण झा
गांधी ने भले ही वकालत की पढ़ाई की, लेकिन उन्होंने पत्रकारिता में अधिक समय बिताया। उन्होंने अखबारों की शुरुआत की, और उसका लंबे समय तक संपादन करते रहे।
गांधी के इक्कीस अलग-अलग आयामों पर ये लेख मूलत: अंग्रेज़ी में प्रवीण कुमार झा द्वारा लिखे गए थे। पढ़ें एक लेख का चैटजीपीटी द्वारा हिंदी अनुवाद
4 जून 1903 को अफ्रीका में एक सामान्य गर्मी का दिन था। भारत से आया 34 वर्षीय एक वकील डरबन में अपने कार्यालय में रात 3 बजे तक कड़ी मेहनत करता है और घर लौटने वाली अपनी ट्राम छूट जाती है। वह पैदल घर जाता है और अगले दिन फिर रात 11 बजे तक काम करता है; और अंतत: उसकी आँखें खुशी से चमक उठती हैं जब वह दक्षिण अफ्रीका में पहले भारतीय अख़बार की खुशबू महसूस करता है। वह इसका नाम रखता है, 'द इंडियन ओपिनियन'।
वह थोड़ा रुकता है, आराम करता है और अपनी डायरी में लिखता है, ‘अब मुझे दूसरे अंक की चिंता हो रही है। कम स्टाफ, सामग्री, टाइप आदि, और सुविधाओं की कमी के साथ, हमें अख़बार को स्तर पर बनाए रखना है।’
उन दिनों प्रिंटिंग प्रेस पूरी तरह से मशीनीकृत नहीं था। जब इंजन खराब हो जाता, तो गांधी खुद पहियों को हाथ से चलाते, अख़बार छापते, उसे मोड़ते, पते लिखते और रेलवे स्टेशन तक भेजते। प्रकाशन कार्य में वह लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर थे।
गांधी ने बाद में लिखा, ‘जब तक 'इंडियन ओपिनियन' मेरे नियंत्रण में था, पत्रिका में होने वाले परिवर्तन मेरे जीवन में होने वाले परिवर्तनों के संकेत थे।’
लेकिन उनकी पत्रकारिता की जड़ें 'इंडियन ओपिनियन' से बहुत पहले की थीं।
उन्होंने लंदन (1888-1891) के अपने छात्र जीवन के बारे में लिखा, ‘भारत में मैंने कभी अख़बार नहीं पढ़ा था। लेकिन यहाँ नियमित पढऩे से मुझे उनमें रुचि हो गई। मैं हमेशा ‘द डेली न्यूज़’, ‘द डेली टेलीग्राफ’ और ‘द पॉल मॉल गजट’ देखता था।’
दादा भाई नौरोजी ने 1890 में ‘इंडिया’ नामक अख़बार शुरू किया था, और गांधी बाद में उसके लिए दक्षिण अफ्रीका से संवाददाता बने। उन्होंने लंदन की वेजिटेरियन सोसाइटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘वेजिटेरियन’ में भारतीय भोजन, रीति-रिवाजों और त्योहारों पर लेख भी लिखे।
1893 में जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की अदालत में अपनी पगड़ी उतारने से इनकार किया, तो स्थानीय अख़बार ‘नटाल एडवर्टाइजऱ’ ने उनके बारे में ‘द अनवेलकम विजि़टर’ शीर्षक से लेख प्रकाशित किया। गांधी ने संपादक को एक लंबा शिकायत पत्र लिखा, जो प्रकाशित हुआ। इसी से उनकी ‘नटाल मर्करी’ और ‘नटाल एडवरटाइजर’ के साथ पत्राचार की शुरुआत हुई। गांधी न तो वेतनभोगी पत्रकार थे और न ही फील्ड संवाददाता, लेकिन उनके ‘लेटर टू एडिटर’ प्रकाशित होते थे और नटाल के लोग उन्हें रुचि से पढ़ते थे।
1896 में जब गांधी अपने परिवार को लेने भारत लौटे, तो उन्होंने हरे कवर में एक लंबा पत्र छापा, ‘द ग्रीन पैम्फलेट’। यह दक्षिण अफ्रीका में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की पीड़ा की पहली मार्मिक कहानी थी। भारत में उनके पास कोई सचिव नहीं था, इसलिए उन्होंने पड़ोस के स्कूल के बच्चों को संगठित किया। उन्होंने उनसे लिफाफे बनाने और पते लिखने में मदद ली और बदले में उन्हें कुछ उपहार दिए। यह बच्चों की टोली भारत में उनकी पहली प्रकाशन टीम थी! उन्होंने देशभर में घूम-घूमकर सभी दस हज़ार प्रतियाँ बेच दीं और उत्साह में दस हज़ार और छपवाए।
1899 में बोअर युद्ध आया, जहाँ गांधी भारतीय एम्बुलेंस कोर का नेतृत्व कर रहे थे। वह ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के लिए युद्ध संवाददाता बने। उनके साथ एक और संवाददाता था, जो आगे चलकर उनका बड़ा विरोधी बना, विंस्टन चर्चिल! जहाँ चर्चिल हथियारों और हमलों के बारे में लिखते थे, वहीं गांधी मानवीय पीड़ा और घावों के बारे में लिखते थे।
उन्होंने ‘पायनियर’, ‘द हिंदू’, ‘मद्रास स्टैंडर्ड’, ‘द स्टेट्समैन’ के लिए भी लिखा। उन्होंने इसे दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों के मुद्दों को प्रचारित करने का माध्यम बनाया। उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में लिखा, ‘प्रचार हमारा सबसे अच्छा और एकमात्र रक्षा का हथियार है।’
पर्याप्त प्रसिद्धि मिलने के बाद उन्होंने अपना अख़बार ‘इंडियन ओपिनियन’ शुरू किया। यह नटाल के 50,000 भारतीयों के लिए एक सामुदायिक अखबार था। गांधी ने इसे बहुभाषी बनाया ताकि अधिकतम लोगों तक पहुँचा जा सके। यह गुजराती और अंग्रेज़ी में प्रकाशित होता था, और कुछ संस्करण तमिल और हिंदी में भी थे। अपने बेटे मणिलाल को जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्होंने लिखा, ‘संपादक को धैर्यवान होना चाहिए और केवल सत्य की खोज करनी चाहिए। ‘इंडियन ओपिनियन’ में सत्य लिखो; लेकिन असभ्य मत बनो और क्रोध में मत बहो! अपनी भाषा में संयम रखो।’
भारत लौटने के बाद, उन्होंने चंपारण (1917) में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान लेख लिखे। दक्षिण अफ्रीका से उन्हें प्रचार की शक्ति का ज्ञान था, और यह भारत में भी काम आया। वह पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गए, जबकि वे हिमालय की तलहटी के एक दूरस्थ जिले में काम कर रहे थे।
1919 के रॉलेट एक्ट विरोध के दौरान, उन्होंने एक गुप्त अख़बार ‘सत्याग्रह’ (पहले ‘सत्याग्रही’) भी निकाला।
जल्द ही वह ‘यंग इंडिया’ नामक प्रतिष्ठित ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ पत्रिका के संपादक बने।
साथ ही उन्होंने गुजराती पत्रिका ‘नवजीवन’ का संपादन भी शुरू किया। ये पत्रिकाएँ 1932 तक चलती रहीं और विभिन्न भाषाओं में गांधी की आवाज़ पूरे भारत तक पहुँचाती रहीं। उन्होंने पाठकों से व्यक्तिगत रूप से जुडऩे की कोशिश की और संपादक को भेजे गए हर महत्वपूर्ण पत्र का उत्तर देने में काफी समय लगाया।
1933 में गांधी ने ग्रामीण पत्रकारिता पर ध्यान केंद्रित किया, क्योंकि उन्हें पता था कि भारत की 90 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है। उन्होंने अंग्रेजी और उर्दू में ‘हरिजन’, हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ और गुजराती में ‘हरिजन बंधु’ शुरू किए। जहाँ ‘यंग इंडिया’ शहरी और शिक्षित वर्ग को आकर्षित करता था, वहीं ये पत्र गाँवों और वंचित वर्गों के लिए थे। कई वर्षों तक ‘हरिजन’ में राजनीतिक आंदोलनों पर लेख नहीं छपे; यह अस्पृश्यता और ग्रामोद्योग जैसे सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित था।
गांधी अपने अख़बारों का खर्च कैसे चलाते थे? क्या विज्ञापनों से?
शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने विज्ञापन लिए, लेकिन जल्द ही उन्हें इसमें नैतिक समस्या दिखी। उन्होंने वार्षिक सदस्यता और अग्रिम भुगतान का रास्ता चुना। जैसे-जैसे प्रसार बढ़ा, अख़बार का आकार और पृष्ठ संख्या भी बढ़ी।
‘हरिजन’ के पहले अंक में स्पष्ट लिखा था, ‘आप देखेंगे कि इस पत्र के संचालन के लिए कोई विज्ञापन नहीं लिया जा रहा है। यह पूरी तरह सदस्यताओं पर निर्भर है। सदस्यता शुल्क अग्रिम में देना अनिवार्य है।’
उन्होंने 1925 में ‘द हिंदू’ में लिखा, ‘पत्रकारिता को कभी भी स्वार्थ या केवल जीविका कमाने, या उससे भी बुरा, धन इक_ा करने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पत्रकारिता तभी उपयोगी और देश के लिए सेवा योग्य होगी, जब वह निस्वार्थ हो और देश की सेवा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दे।’
-डॉ.परिवेश मिश्रा
साढ़े चार हजार की आबादी वाला लेन्ध्रा सारंगढ़ जिले में एक अपेक्षाकृत बड़ा गांव है। किसान-ठेकेदारों के माध्यम से पुरानी पारम्परिक बसाहट को जब कृषि प्रधान गांव के रूप में पुनर्स्थापित किया गया तो शुरुआती परिवार रिकॉर्ड का हिस्सा बन गये।
1707 मे जब तक औरंगजेब की मृत्यु नहीं हुई, भारत के इस हिस्से के मूल निवासी वन-आश्रित अपनी जीवन शैली में थोड़ी सी खेती के साथ मस्त और संतुष्ट थे। पहले मराठों और फिर अंग्रेजों के आने के साथ साथ राजाओं से राजस्व-कर वसूली में अनाप-शनाप बढ़ोतरी हुई और राजाओं के सामने नये खेत तैयार कर उपज बढ़ाने की आवश्यकता मजबूरी बन गयी। अच्छी किसानी मे उस्ताद माने जाने वाली कृषि-आधारित जातियों की पूछ-परख बढ़ी। ऐसी अनेक जाति समूहों का सारंगढ़ में भी आगमन हुआ। अधरिया उनमे से एक थे।
छोटी, बिखरी और अक्सर में अक्सर अस्थाई बसाहटों को गांव का रूप दे कर कृषि-आधारित जीवन शैली विकसित होना शुरू हुई। गांव को ठेके पर दिया जाने लगा। ठेकेदार किसान ‘गौंटिया’ कहलाये। ठेका केवल गौंटिया के वंशजों में हस्तांतरणीय होता था। यदि पुत्र नहीं हुआ तो गौंटिया की मृत्यु पर ठेका उसकी पत्नी और यहां तक कि अविवाहित बेटी को भी हस्तांतरित होता था। उसका जि़म्मा था गांव बसाना, नये खेत तैयार करना और करवाना। इसके लिये सिंचाई के साधन उपलब्ध कराना। तालाब खोदे गये, जहां ज़रूरी और संभव हुआ बहते पानी को रोका गया। ठेका दिये जाने के समय पर तमाम शर्तें जो राज्य के वाजिब-उल-अजऱ् में दर्ज थीं, समझा दी जाती थीं। वाजिब-उल-अजऱ् गांव के प्रशासन का एक तरह का संविधान था। कुछ शर्तें ऐसी थीं जिनके उल्लंघन पर ठेका निरस्त किये जाने का प्रावधान था। ऐसी एक शर्त थी कि गांव में भूख से किसी की मृत्यु नहीं होना चाहिये। ठेकेदार के बाकायदा हस्ताक्षर लिये जाते थे। जिसे हम साक्षरता समझते हैं वह नहीं थी तो क्या – कोई तीर का चिन्ह बनाकर हस्ताक्षर करता तो कोई सीढ़ी का। सीढ़ी में तीन पायदान बनाकर उस हस्ताक्षर पर कोई पहले कब्जा कर चुका है तो बाद में आने वालों के सामने दो या चार या पांच पायदान बनाकर अपना विशिष्ट हस्ताक्षर इज़ाद करने का विकल्प मौजूद रहता। आज होती तो यह व्यवस्था अंग्रेज़ी में ‘बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मॉडल’ या ‘पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप’-मॉडल के नामों से जानी जाती।
लेन्ध्रा के पहले गौंटिया अघरिया थे। शुरुआत करने के लिये चार अन्य गांवों से अपनी जाति के चार परिवारों को बुला कर बसाया। कुछ और परिवार भी आ कर बसे। इनमे माली थे। तेली, कलार, और हलवाई थे। ये रैयत कहलाये। गांव के चौकीदार का पद गांड़ा और झांखर या बैगा के लिये आरक्षित था। वे नियुक्त हुए। स्थानीय बोली मे जोर से आवाज देने या चिल्लाने के लिये नरियाना शब्द प्रयुक्त होता है। हर साल ‘पुस-पुन्नी’ के दिन ‘नरिहा’ की नियुक्ति होती थी (या कहें नियुक्ति का नवीनीकरण होता था)। इस तरह एक राउत (यदुवंशी) का परिवार भी बसा। यह व्यक्ति रोज सुबह घरों की दहलीज पर पहुंच कर नरियाता और घर का मालिक मवेशियों को इसके हवाले कर देता। शाम को इस का दोहराव होता जब नरिहा मवेशियों को वापस सौंपने पहुंचता। दिन भर मवेशी गांव से बाहर जिस जमीन पर चरते वह राजा की थी सो नरिहा साल मे एक बार एक सेर घी गौंटिया के माध्यम से राजा तक पहुंचाता। बढ़ई, लोहार, नाई, धोबी, सब बसे। उनकी सेवाओं के बदले र राज्य की ओर से सबको टैक्स-फ्ऱी जमीन दी गयीं।
रैयत को खेत तैयार कर फसल लेने के लिये टैक्स के साथ वाली जमीनें दी गईं। टैक्स इक_ा करने की जिम्मेदारी गौंटिया की थी। गौंटिया के पास जो जमीन थी वह ‘भोगरा’ जमीन कहलाती थी और टैक्स-फ्ऱी थी। उसके पास गांव की सरहद के भीतर रैयती भूमि का कुछ हिस्सा रख कर और टैक्स अदा कर खेती करने का विकल्प मौजूद था।
रैयतों मे एक थे बुद्धूराम। उस काल मे सरनेम जैसे शब्दों की जगह जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल होता था सो वे बुद्धूराम कलार के रूप मे जाने गये। बाद की पीढिय़ों ने सरनेम के रूप मे ‘डनसेना’ शब्द का उपयोग किया जो आज भी लेन्ध्रा मे बुद्धूराम के वंशजों की पहचान है।
प्रचलित कहानी के अनुसार एक समय था जब इस ‘सरनेम’ का अस्तित्व नहीं था। उस काल मे वर्तमान दुर्ग जि़ले के बालोद नामक स्थान पर एक राजपूत राजा का राज्य था। एक कलार लडक़ा भी था जिसकी मित्रता राजा के बेटे से थी। दोनो ‘महाप्रसाद’ थे-रिश्ते मे दोस्त से भी बढ़ कर। एक दिन कलार लडक़े ने महसूस किया कि उसका महाप्रसाद कलार लडक़े की बहन पर बुरी नजऱ और नीयत रखता है। विचलित कलार लडक़ा राजा के पास पहुंचा। महाप्रसाद वाले रिश्ते के विस्तारित रूप मे राजा उसका ‘फूल बाप’ था। लडक़े ने फूल बाप से सवाल पूछा – अगर आपके घर मे बाहरी कुत्ता आ कर गंदगी करे तो आप क्या करेंगे? राजा ने कहा – मार दूंगा।
-गोकुल सोनी
आज जब लोग किसी के अतीत को लेकर तरह-तरह की कहानियां गढ़ लेते हैं, तो मुझे अपने जीवन का एक सच्चा और दिलचस्प प्रसंग याद आ जाता है। यह सुनकर शायद आपको थोड़ा आश्चर्य हो, लेकिन सच यही है, मैं भी कभी चाय बेचता था। यह कोई रूपक या राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि मेरे जीवन का बिल्कुल सच्चा अनुभव है। यह कहानी है वर्ष 1977 की, जब जीवन मुझे छोटे-छोटे कामों के जरिए बड़े सबक सिखा रहा था।
उस समय रायपुर के गांधी मैदान के पास स्थित बंदोबस्त कार्यालय को पहले चकबंदी ऑफिस कहा जाता था। बाद में जब यहां लैंड रिकॉर्ड का काम शुरू हुआ तो इसे बंदोबस्त कार्यालय के रूप में जाना जाने लगा। इसी कार्यालय परिसर में मेरे एक बेहद करीबी पारिवारिक सदस्य चपरासी के पद पर कार्यरत थे। उन्हें वहीं रहने के लिए एक सरकारी मकान मिला हुआ था और पूरा परिवार उसी परिसर में रहता था।
उस कार्यालय में बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी काम करते थे। इसके अलावा वहां पटवारी प्रशिक्षण भी चलता था, जिसमें रोज लगभग 60-70 प्रशिक्षु आते थे।
लेकिन आसपास चाय की कोई दुकान नहीं थी। चाय पीने के लिए लोगों को कोतवाली चौक या कालीबाड़ी चौक तक जाना पड़ता था। तब मेरे उस पारिवारिक सदस्य के मन में एक विचार आया, क्यों न यहीं चाय बनाकर लोगों को पिलाई जाए ?
बस फिर क्या था, सरकारी क्वार्टर में ही चाय बननी शुरू हो गई और धीरे-धीरे कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी वहीं आकर चाय पीने लगे। देखते ही देखते यह छोटी-सी व्यवस्था एक चलती-फिरती दुकान बन गई।
दुकान अच्छी चलने लगी तो लोगों की टेबल तक चाय पहुंचाने के लिए एक लडक़ा रखा गया। उसका नाम था मेघनाथ, जो उत्कल (ओडिशा) का रहने वाला था। जब कभी मेघनाथ छुट्टी पर चला जाता, तब चाय पहुंचाने की समस्या खड़ी हो जाती। ऐसे ही एक दिन मेरे रिश्तेदार ने मुझसे कहा, गोकुल, जरा अमुक साहब के पास चाय छोड़ आओ। बस यहीं से मेरी भी इस ‘चाय सेवा’ में एंट्री हो गई।
धीरे-धीरे दफ्तर के कई अधिकारी-कर्मचारी मुझसे ही चाय मंगाने लगे। मेघनाथ मौजूद रहता तब भी लोग कहते, गोकुल को भेज दो, वही चाय लेकर आए। इसकी एक छोटी-सी वजह थी। मैं चाय का गिलास थोड़ा ज्यादा भरकर दे देता था। उस समय मुझे न घाटे की चिंता थी, न मुनाफे की, बस लोगों को भरपूर चाय मिलनी चाहिए, यही सोचकर गिलास थोड़ा उदारता से भर देता था।
उन दिनों वहां के आयुक्त ए.के. वाजपेयी (ढ्ढ्रस्) और उपायुक्त श्रीवास्तवजी सहित कई अधिकारियों तक भी मैं चाय पहुंचाया करता था। करीब दो-चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। उस समय वहां काम करने वाली सुवार्ता जॉन मैडम मुझे छोटे भाई की तरह स्नेह देती थीं। वे अक्सर समझाती थीं, तू ये चाय-वाय छोड़ और पढ़ाई पर ध्यान दे।
इसी बीच मेरे बड़े भैया की भी उसी कार्यालय में सरकारी नौकरी लग गई। धीरे-धीरे मैंने चाय पहुंचाने का काम छोड़ दिया और पढ़ाई की ओर ध्यान देने लगा। वैसे भी चाय की दुकान चलाने वाले मेरे अपने पारिवारिक सदस्य ही थे, इसलिए मैं वहां पूरी तरह मुफ्त सेवा देता था। कभी किसी प्रकार का पारिश्रमिक नहीं लिया।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया। कई वर्ष बाद जब मैं नवभारत अखबार में पत्रकार बन गया, तो एक दिन किसी कवरेज के सिलसिले में उसी बंदोबस्त कार्यालय जाना हुआ। वहीं अचानक जॉन मैडम मिल गईं। जब उन्होंने मुझे एक बड़े अखबार के पत्रकार के रूप में देखा, तो वे बेहद खुश हुईं। मुझे आज भी याद है, उनकी आंखें खुशी से भर आई थीं। शायद उन्हें उस समय का वह चाय पहुंचाने वाला लडक़ा याद आ गया था।
यह है मेरे जीवन का वह छोटा-सा अध्याय जब मैं चाय पहुंचाया करता था। कुछ लोगों को यह कहानी शायद अविश्वसनीय लगे, लेकिन यह मेरे जीवन की एक सच्ची घटना है। उस दौर के कई अधिकारी-कर्मचारी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जॉन मैडम भी अब रिटायर होकर संभवत: बैरन बाजार क्षेत्र में रहती हैं। मेघनाथ अब अपनी खुद की बढ़ईपारा में चाय दुकान संचालित करता है।
जीवन की यही खूबसूरती है कभी हम छोटे-छोटे काम करते हुए बड़े सपने देखते हैं, और वही अनुभव आगे चलकर हमारी पहचान बन जाते हैं।
आपको मेरे जीवन की यह सच्ची घटना कैसी लगी, जरूर बताइयेगा। आपके विचार और प्रतिक्रियाएँ हमेशा मुझे प्रेरणा देती हैं।
(इस तस्वीर को मेरे निवेदन पर ्रढ्ढ ने बनाकर दिया है। उसका आभार)
(लेखक छत्तीसगढ़ के सबसे वरिष्ठ सक्रिय न्यूज-फोटोग्राफर हैं। वे फेसबुक पर दिलचस्प संस्मरण लिखते ही रहते हैं।)


