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15-Jul-2020 1:48 PM

मेहमान लेखक

कहते है कि भारत की आत्मा गांवों में बस्ती है। लेकिन अब इसे संयोग कहें या विडंबना कि गाँवों के केंद्र परिवारों के आधा सदस्य घरेलू प्रदूषण के कारण कई तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं।दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों के ज़्यादातर परिवारों का खाना मिट्टी के चूल्हों पर बनता है, जिसमें ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। शहरी क्षेत्र के झुगी-झोपड़ी वाले इलाकों में भी इस ईंधन का इस्तेमाल कर खाना बनाया जाता हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत 24 करोड़ से अधिक घरों का देश है, जिनमें से क़रीब 10 करोड़ परिवार अभी भी एलपीजी को खाना पकाने के ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने से वंचित हैं और उन्हें खाना पकाने के लिए प्राथमिक स्रोत के रूप में लकड़ी, कोयले, गोबर के उपले, केरोसिन तेल जैसी चीजों का इस्तेमाल करना पड़ता हैं।

ऐसे ईंधन के जलने से उत्पन्न धुआं खतरनाक घरेलू प्रदूषण का कारण बनता है, जिससे कई तरह के श्वसन रोग सम्बन्धी विकारों का प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।वैज्ञानिकों का भी मानना है कि लकड़ी जैसे अन्य ठोस ईंधनों का इस्तेमाल खाना बनाने में करने से फेफड़ों में प्रति घंटा चार सौ सिगरेट पीने जितना धुआं भरता है, जो किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है।

साल 2011 की आवास जनगणना डेटा हाइलाइट्स के अनुसार, भारत में खाना पकाने के लिए ईंधन का इस्तेमाल करने वाले 0.2 बिलियन लोगों में से 49 फ़ीसद जलाऊ लकड़ी का,  8.9 फ़ीसद गाय का गोबर केक, 1.5 फ़ीसद कोयला, लिग्नाइट या चारकोल, 2.9 फ़ीसद केरोसीन, 28.6 फ़ीसद लिक्विड पेट्रोलियम गैस (LPG), 0.1 फ़ीसद बिजली, 0.4 फ़ीसद बायोगैस और 0.5 फ़ीसद किसी अन्य साधन का इस्तेमाल करते हैं। 

जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में खाना पकाने के लिए 67.4 फ़ीसद घरों में मुख्य रूप से ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। यही आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में 86.5 फीसद का हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 26.1 फीसद का। भारत में लगभग सत्तर करोड़ लोग खाना पकाने के लिए पारंपरिक ईंधन जैसे – लकड़ी, कोयला, गोबर के उपले और मिट्टी के तेल आदि का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया से उत्पन्न कालिख इन घरों में लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर काली छाया डाल रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रदूषणकारी ईंधन की वजह से भारत में हर साल 13 लाख लोगों की मौत होती है।

ठोस ईंधन काफी मात्रा में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदूषकों का उत्सर्जन करते हैं, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, बेंजीन, फॉर्मलाडेहाइड और पोलीरोमैटिक आदि जैसे विनाशकारी गैसों का उत्सर्जन होता हैं। घरेलू वायु प्रदूषण हानिकारक रसायनों और अन्य सामग्रियों से घरेलू वायु गुणवत्ता को दुष्प्रभावित करने से उत्पन्न होता है। वैज्ञानिकों का मानना हैं कि  यह (घरेलू वायु प्रदूषण) बाहरी वायु प्रदूषण से दस गुना अधिक दुष्प्रभावित कर सकता है।

विकासशील देशों में घरेलू वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभाव बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में बहुत अधिक हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ठोस ईंधन से उत्पन्न घरेलू वायु प्रदूषण की वजह से साल 2010 में 35 लाख लोगों की मौत हुई और वैश्विक दैनिक-समायोजित जीवन वर्ष (DALY) का दर भी 4.5 फीसद का रहा। इंडियन जर्नल फॉर कम्युनिटी मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव से प्रतिवर्ष क़रीब दो मिलियन लोगों की मौत होती हैं, जिसमें 44 फ़ीसद निमोनिया, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) से 54 फ़ीसद और 2 फ़ीसद फेफड़ों के कैंसर के कारण होते हैं। सबसे अधिक प्रभावित समूह महिलाएं और छोटे बच्चे हैं, क्योंकि वे घर पर अधिकतम समय बिताते हैं।

इसी रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस ईंधन के इस्तेमाल से उत्सर्जित होने वाले विभिन्न रासायनिक गैसों और अन्य सामग्रियों से पैदा होने वाले बिमारियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य दुष्प्रभावित होते हैं। इसके कारण श्वास सम्बन्धी संक्रमण, दीर्घकालिक या स्थायी फेफड़े की सूजन और सीओपीडी का कारण बनता है।

सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से अस्थमा होने की संभावना होती है। इसके अलावा, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड श्वसन संक्रमण का कारण बनता है और फेफड़ों के कार्यों को बिगड़ता है। सीओपीडी और हृदय रोग के विस्तार में सल्फर डाइऑक्साइड की भी भूमिका होती है। कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क में आने से गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम बढ़ जाता है। इससे कम वजन के बच्चे होने की संभावना होती है। साथ ही, प्रसवकालीन मृत्यु का डर भी बना रहता है। बायोमास धुआं विशेष रूप से धातु आयनों और पॉलीसाइक्लिक एरोमेटिक्स से मोतियाबिंद होने की भी संभावना बनी रहती है। पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन से फेफड़े, मुंह, नासॉफरीनक्स और स्वरयंत्र के कैंसर भी होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गरीबी और जानकारी के अभाव में खाना बनाने में ठोस ईंधनों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वज़ह से वे खुद को मौत के तरफ धकेल रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में ऐसे घरों में कमी आयी हैं। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2030 में खाना पकाने के लिए 580 मिलियन भारतीय ठोस ईंधन का इस्तेमाल करेंगे। ज़ाहिर है इससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा बल्कि मनुष्य के लिए भी एक गहरा संकट को जन्म देगा। (feminisminindiah)

(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)

 

 


15-Jul-2020 11:14 AM

-सुसान चाको दयानिधि 

देश में रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) तकनीक के उपयोग के कारण पानी की अत्यधिक हानि हो रही है। इस मामले पर 13 जुलाई 2020, को एनजीटी के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति सोनम फिंटसो वांग्दी की दो सदस्यीय पीठ में सुनवाई हुई।

अदालत ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को 20 मई, 2019 के अपने आदेश में एनजीटी द्वारा निर्धारित तरीके से आरओ के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए एक अधिसूचना जारी करने को कहा था, पर ऐसा नहीं किया गया। इस देरी पर अदालत ने मंत्रालय से जवाब मांगा।

एक वर्ष बीतने के बाद भी, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने लॉकडाउन के कारण समय बढ़ाने की मांग की थी। अदालत ने निर्देश दिया कि आवश्यक कार्रवाई अब 31 दिसंबर, 2020 तक पूरी की जानी चाहिए।

मामले को 25 जनवरी, 2021 को फिर से विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

दिल्ली में चल रहे अवैध बोरवेल को बंद करें

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) को दिल्ली में अवैध बोरवेल और ट्यूबवेल के उपयोग पर पर्यावरण विभाग, दिल्ली सरकार द्वारा तय मानकों के तहत चलाने की प्रक्रिया (एसओपी) का पालन करने का निर्देश दिया। 

एसओपी में 'भूजल को निकालने के नियम, बंद करने, बोरवेल / ट्यूबवेल के उपयोग से संबंधित गैरकानूनी गतिविधियों' पर रोक लगाने के लिए दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी), स्थानीय निकायों और खंड विकास अधिकारियों जैसी विभिन्न एजेंसियों को जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। अवैध बोरवेल की पहचान उपयोग की प्रकृति के आधार पर और जिलों के डिप्टी कमिश्नर (राजस्व) को अवैध बोरवेलों के बंद और उल्लंघन की जांच की देखरेख करने की भूमिका सौंपी गई थी।

उपायुक्तों की सहायता के लिए प्रत्येक जिले में एक अंतर विभागीय सलाहकार समिति का गठन किया गया था।

ड्रिलिंग मशीन / रिग्स का इस्तेमाल अवैध बोरवेल खोदने के लिए किया जाता है। भूजन निकालने के लिए पंजीकरण, पूर्व अनुमति और पर्यावरण क्षतिपूर्ति सहित एक प्रणाली को एसओपी में शामिल किया गया था।

यह बताया गया था कि दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के द्वारा पहले ही 19661 अवैध बोरवेल की पहचान कर ली गई है, जिस पर कार्रवाई की जा रही है और 7248 इकाइयों को पहले ही जिला अधिकारियों द्वारा बंद करवा दिया गया था। शेष इकाइयों को प्राथमिकता से बंद किया जाना है। ये इकाईयां पहले ही पहचान ली गईं थी और इन्हें तीन महीने की अवधि के अंदर पूरी तरह बंद करने की बात कही गई है।

एनजीटी का यह आदेश बिना लाइसेंस के जमीन से पानी निकालने वाले यंत्रों के चलने, दिल्ली के कुछ हिस्सों में दूषित पानी की आपूर्ति पर की गई शिकायत पर था।(downtoearth)


15-Jul-2020 11:04 AM

-ईशान कुकरेटी 

वनवासियों पर एक बार फिर बेदखली की तलवार लटक रही है। इस साल 24 फरवरी तक 14 राज्यों ने कुल 5,43,432 वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 के तहत किए गए दावों को स्वत: संज्ञान समीक्षा के बाद खारिज कर दिया। ये राज्य हैं- आंध्र प्रदेश (2,355), बिहार (1,481) छत्तीसगढ़ (39,4851), हिमाचल प्रदेश (47), कर्नाटक (58,002), केरल (801), महाराष्ट्र (9,213), ओडिशा (73737), राजस्थान (5,906), तेलंगाना (5,312), तमिलनाडु (214), उत्तराखंड (16), त्रिपुरा (4), पश्चिम बंगाल (54,993)। पश्चिम बंगाल ने कुल 92 प्रतिशत दावों को खारिज कर दिया। राज्य में कुल 59,524 दावों की समीक्षा की गई थी।

यह जानकारी राज्यों ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय को 24 फरवरी के दिन हुई एक बैठक में दी है। मंत्रालय ने इस बैठक के मिनट्स को अपनी वेबसाइट पर 2 जुलाई को अपलोड किया।

गौरतलब है कि 13 फरवरी, 2019 को एफआरए मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को उन दावेदारों को बेदखल करने को कहा था जिनका दवा खारिज हो चुका था। हालांकि कोर्ट ने सरकार के दखल के बाद 28 फरवरी को आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने सभी राज्यों के साथ एक बैठक आयोजित की थी।

6 मार्च और 18 जून को दो बैठकों में राज्यों ने मंत्रालय को बताया था कि उन्होंने दावों को खारिज करने में एफआरए के कई प्रावधानों का पालन नहीं किया था। मंत्रालय ने तब राज्यों को सभी खारिज किए गए दावों की स्वत: समीक्षा की सलाह दी थी।

24 फरवरी की बैठक के मिनट्स के अनुसार, 14,19,259 में से 1,72,439 दावों की समीक्षा की गई। समीक्षा किए गए दावों की संख्या की तुलना में अधिक दावों को खारिज किया जाना डेटा में विसंगति की वजह से है। कुछ राज्यों ने कुल की गई समीक्षाओं के डेटा को साझा नहीं किया है और कुछ ने यह नहीं बताया है कि कुल कितने दावों की समीक्षा होनी है।  

मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि ने मंत्रालय को बताया कि इस प्रकिया में कम से कम 12 महीने का समय लगेगा। तब तक कोई दावेदार बेदखल नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार खारिज दावों की समीक्षा और दावेदार की पहचान के लिए मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (एमआईएस) का सहारा ले रही है। राज्य सरकार ने फील्ड स्टाफ और अधिकारियों को एमआईएस और मोबाइल एप्लीकेशन का प्रशिक्षण देने के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम किए हैं।

जरूरी नहीं है कि समीक्षा में खारिज सभी दावे बेदखल होंगे क्योंकि बहुत सारे दावे डुप्लीकेशन की वजह से भी खारिज कुए हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान ने मंत्रालय को बताया कि 18,446 खारिज किए गए दावे कब्जे नहीं होने, दोहरे दावे, अन्य राजस्व भूमि पर कब्जे, दावेदार की मृत्यु, गलत प्रविष्टि, प्रवास आदि के कारण गैर बेदखली दावे हैं।

दावेदारों की बेदखली के क्या परिणाम होंगे, यह जानने के लिए राज्य खारिज किए गए दावों का समुचित वर्गीकरण करेंगे और बताएंगे कि किस आधार पर यह बेदखली हुई है। एफआरए बेदखली के बारे में कुछ नहीं कहता है, इसलिए बैठक में यह निर्णय लिया गया कि एक विस्तृत वर्गीकरण किया जाएगा जो बेदखली की प्रकृति का चित्रण करेगा।(downtoearth)


15-Jul-2020 10:55 AM

-ललित मौर्या

चमगादड़ों में कोरोनावायरस के साथ-साथ न जाने कितने वायरस होते हैं। इसके बावजूद इन वायरसों का असर उसके शरीर पर नहीं पड़ता। आखिर ऐसा क्या होता है इन चमगादड़ों के शरीर में, जिनसे वो बीमार नहीं पड़ते। आइये जानते हैं चमगादड़ों की इस ‘सुपर इम्युनिटी’ का राज। और क्या मनुष्य भी इस ‘सुपर इम्युनिटी’ को समझकर इन हानिकारक वायरसों से बच सकते हैं। मनुष्यों में कई बीमारियां चमगादड़ों से ही फैली हैं।  इनमें इबोला, रेबीज, सार्स और कोविड-19 भी शामिल है। 

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इंसानों को बीमार करने वाले इन वायरसों का असर चमगादड़ों पर क्यों नहीं पड़ता। और क्यों उनमें यह बीमारियां नहीं होती हैं। इसका कारण चमगादड़ों की सुपर इम्युनिटी है जो इन्हें इन बीमारियों को सहन करने के लायक बनाती हैं। जबकि यदि सामान आकर के स्तनधारियों से चमगादड़ों की तुलना करें तो वो उनसे अधिक समय तक जीवित रहते हैं। अनुमान है कि चमगादड़ 30 से 40 साल तक जीवित रह सकते हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर के शोधकर्ताओं के अनुसार, चमगादड़ की लंबी उम्र और वायरस को सहन करने की क्षमता का मुख्य कारण उसके इन्फ्लेमेशन (सूजन) को नियंत्रित करने की क्षमता से है। जब भी शरीर में कोई विकार आता है या फिर चोट लगती है तो शरीर में मौजूद श्वेत रक्त कोशिकाएं शरीर को बाहरी आक्रमणों (जैसे वायरस और बैक्टीरिया) से बचाने के लिए सक्रिय हो जाती हैं। यदि इस प्रक्रिया को नियंत्रित कर लिया जाये तो यह शरीर में बीमारी को फैलने से रोक सकती हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किया गया यह शोध जर्नल सेल मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुआ है। इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर वेरा गोरबुनोवा और आंद्रेई सेलुआनोव ने चमगादड़ों के शरीर में यह प्रक्रिया कैसे काम करती है उसकी पूरी रुपरेखा तैयार की है। साथ ही इस बात का भी पता लगाया है कि यह तंत्र किस तरह से बीमारियों के लिए नए उपचार खोजने में मदद कर सकता है।

वायरसों को कैसे सह लेता है चमगादड़ का शरीर?

इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने चमगादड़ों की लम्बी उम्र के रहस्य और उनके वायरसों के खिलाफ सुपर इम्युनिटी को साथ-साथ समझने का प्रयास किया है। बढ़ती उम्र और उम्र से जुडी बीमारियों दोनों में ही इन्फ्लेमेशन (सूजन) का बहुत बड़ा हाथ होता है। कई बड़ी बीमारियां जैसे कैंसर, अल्जाइमर और हृदय रोग सहित उम्र से जुड़े विकारों में इन्फ्लेमेशन का बहुत बड़ा हाथ होता है। कोरोनावायरस भी शरीर में सूजन को सक्रिय कर देता है।  

गोरबुनोवा के अनुसार कोरोनावायरस के मामले में जब वायरस को रोकने के लिए शरीर का इम्यून सिस्टम काम करता है, तो इन्फ्लेमेशन अनियंत्रित हो जाती है। जिसके कारण वो वायरस को खत्म करने की जगह मरीज को ही नुकसान पहुंचाने लगती है। उनके अनुसार हमारा इम्यून सिस्टम इस तरह काम करता है कि जैसे ही हम संक्रमित होते हैं तो हमारे शरीर में अपने आप ही एक प्रतिरक्षा प्रणाली काम करने लगती है। संक्रमण को रोकने के लिए शरीर में बुखार और सूजन होने लगती है, जिसका मकसद वायरस को खत्म करना और संक्रमण को रोकना होता है। पर कभी-कभी यह प्रतिक्रिया अनियंत्रित हो जाती है जिसकी वजह से यह रोगी पर ही असर डालना शुरू कर देती है।

जबकि चमगादड़ों के साथ ऐसा नहीं होता। मनुष्यों के विपरीत उन्होंने इससे निपटने के लिए विशिष्ट तंत्र विकसित कर लिया है। जो वायरस के फैलने की गति को काम कर सकता है। इसके साथ ही वो अपने इम्यून की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी नियंत्रित कर लेते हैं।  जिस वजह से जो संतुलन बनता है वो उनके शरीर में वायरस के असर को खत्म कर देता है। और उन्हें लम्बे समय तक जीने में मददगार होता है।

क्यों बन गए हैं चमगादड़ बीमारियों को सहने के काबिल?

शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसे कई कारक हैं जो इनके वायरस से लड़ने और लंबे जीवन के लिए मददगार होते हैं। एक कारक उनकी उड़ने की क्षमता में छिपा है। चमगादड़ अकेले ऐसे स्तनधारी हैं जो उड़ सकते हैं। जिसके लिए उसे अपने शरीर के तापमान में तेजी से वृद्धि और कमी को नियंत्रित करना होगा है। साथ ही अपने मेटाबोलिज्म में होने वाली एकाएक वृद्धि को भी नियंत्रित करना पड़ता है। साथ ही उन्हें अपने मॉलिक्यूलर को होने वाली क्षति को भी नियंत्रित करने में वर्षों लगे हैं। उनका यह अनुकूलन रोगों से लड़ने में भी मदद करता है।

दूसरा कारण इनका वातावरण है। इनकी कई प्रजातियां बहुत तंग जगह और घुप्प अंधेरे वाली गुफाओं में रहते हैं। जहां इनकी एक बड़ी आबादी साथ-साथ होती है। यह दशा वायरस को फैलने के लिए आदर्श स्थिति प्रदान करती है। यह लगातार वायरस के संपर्क में रहते हैं। जब वो बहार से गुफाओं में आते हैं तो अपने साथ वायरस भी लाते हैं जो बड़ी आसानी से दूसरों में भी फ़ैल जाता है। लगातार लम्बे समय से इन वायरसों के संपर्क में रहने के कारण इनका इम्यून सिस्टम इन वायरसों से लड़ने के काबिल बन गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार चमगादड़ों का विकास इन वायरसों के साथ लड़ते-लड़ते ही हुआ है जिसने इसे इनसे निपटने के काबिल बना दिया है। साथ ही यह इनके दीर्घायु होने में भी मददगार रहा है।

क्या इंसानों में भी विकसित हो सकती है इसी तरह की रोगप्रतिरोधक क्षमता?

विकास कुछ महीनों में नहीं होता यह साल दर साल विकसित होने की प्रक्रिया है। चमगादड़ों में यह क्षमता हजारों सालों में विकसित हुई है। इंसान अपनी सुख-सुविधाओं के बीच शहरों में रहने लगा है। साथ ही तकनीकों के बल पर एक जगह से दूसरी जगह जा सकता है। हमारी कुछ सामाजिक आदतें भले ही चमगादड़ों की तरह हैं। पर हमारा विकास उनकी तरह नहीं हुआ है। इंसानों के शरीर में अभी तक चमगादड़ों की तरह परिष्कृत तंत्र विकसित नहीं हुआ है। क्योंकि उनका शरीर वायरस का मुकाबला करता है उसके साथ-साथ और तेजी से विकसित होता जाता है।

गोरबुनोवा के अनुसार यह हमारे शरीर में अधिक इन्फ्लेमेशन के कारण हो सकता है। शोधकर्ताओं का यह भी मत है कि अधिक उम्र के लोगों पर यह वायरस ज्यादा बुरा असर करता है। यह उम्रदराज लोगों में अलग तरह से असर डालता है। वैसे भी जीवन और मृत्यु के लिए उम्र बहुत मायने रखती है। उम्र पर काबू पाने के लिए हमें इसकी पूरी प्रक्रिया पर नियंत्रण पाना होगा, न कि केवल उसके एक कारक पर काम करके उसे नियंत्रित किया जा सकता है।

हालांकि इसके बावजूद शोधकर्ताओं का मानना है कि चमगादड़ों के इम्यून सिस्टम का अध्ययन चिकित्सा जगत के लिए मददगार हो सकता है। इसकी मदद से रोगों और बुढ़ापे से लड़ने में मदद मिल सकती है। चमगादड़ों ने इन्फ्लेमेशन से निपटने के लिए अपनी कई जीनों में बदलाव और कई को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। मनुष्य इन जीनों में बदलाव करने के लिए नई दवाओं का विकास कर सकता है। पर शोधकर्ताओं ने यह भी माना है कि इससे सभी वायरसों से लड़ने में मदद मिलेगी यह मुमकिन नहीं है, पर हम इसकी मदद से अपने इम्यून सिस्टम को चमगादड़ कि तरह बेहतर बना सकते हैं, यह मुमकिन है। (downtoearth)


15-Jul-2020 10:40 AM

जयपुर, 15 जुलाई। राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर जो अदावत अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच बीते डेढ़ साल से चली आ रही थी वो अपने चरम पर पहुंच चुकी है. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब प्रदेश का मुखिया बनने की चाह में राजस्थान कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बीच बड़ी खींचतान देखने को मिली है. असल में राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई उतनी ही पुरानी है जितना कि इस राज्य का राजनीतिक इतिहास.

30 मार्च 1949 का दिन था. वृहद राजस्थान के उद्घाटन समारोह की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं और कुछ ही देर में कांग्रेस के नेता हीरालाल शास्त्री यहां का पहला मुख्यमंत्री (इस पद को तब प्रधानमंत्री कहा जाता था) बनने के लिए शपथ लेने वाले थे. तभी सूचना मिली कि लोकनायक कहे जाने वाले जयनारायण व्यास और माणिक्यलाल वर्मा जैसे दिग्गज नेता समारोह का बहिष्कार कर चले गए. उन्हें शिकायत थी कि समारोह में उनके बैठने के लिए सम्मानजनक व्यवस्था नहीं की गई थी. लेकिन सूबे के पुराने राजनीतिकारों का कहना है कि इस नाराज़गी की असल वजह समारोह नहीं बल्कि मुख्यमंत्री पद की कुर्सी से जुड़ी थी.

दरअसल, कांग्रेस नेता होने के बावजूद हीरालाल शास्त्री ने कथित निजी हितों के लिए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ जैसे आंदोलनों को जयपुर में व्यापक नहीं होने दिया था. बताया जाता है कि इस वजह से वे तत्कालीन जयपुर महाराज सवाई मानसिंह और प्रख्यात व्यवसायी घनश्याम दास बिड़ला को भा गए थे. आजाद हिंदुस्तान की राजनीति को करीब से देखने वाले अमेरिकी लेखक रिचर्ड सिसन अपनी किताब ‘कांग्रेस पार्टी इन राजस्थान : पॉलिटिकल इंटिग्रेशन एंड इंस्टिट्युशन बिल्डिंग इन एन इंडियन स्टेट’ में ज़िक्र करते हैं कि जयपुर महाराज ने रियासती विभाग के सर्वेसर्वा और गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल से आश्वासन ले लिया था कि राजस्थान का पहला मुख्यमंत्री उन्हीं की पसंद का होगा.

दूसरी तरफ जयनारायण व्यास और माणिक्यलाल वर्मा, गोकुलभाई भट्ट को मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते थे. लेकिन शास्त्री को सरदार पटेल का वरदहस्त होने की वजह से एकबारगी मामला शांत हो गया. पर यह सब्र ज्यादा दिन नहीं चला. तीन महीने भी नहीं गुज़रे कि शास्त्री के विरुद्ध प्रदेश कांग्रेस समिति ने भारी बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया. हालांकि पटेल ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था. लेकिन कांग्रेस में हमेशा के लिए रार पड़ गई. अपने अपमान का बदला लेने के लिए शास्त्री ने जयनारायण व्यास समेत उनके दो सहयोगियों पर विशेष न्यायालय में भ्रष्टाचार का मुकदमा चला दिया. हालांकि भारतीय संविधान के लागू हो जाने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे रोक दिया.

इसी बीच सरदार पटेल का निधन हो जाने से शास्त्री के पैर डिगने लगे थे. नतीजतन उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अप्रैल, 1951 में यह जिम्मेदारी जयनारायण व्यास के कंधे पर आ गई. लेकिन फरवरी, 1952 के पहले आम चुनाव में व्यास दो क्षेत्रों से चुनाव हार गए. बताया जाता है कि व्यास के समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने और उपचुनाव लड़वाने की पुरजोर पैरवी की थी. लेकिन विरोधियों के आगे उनकी एक न चली. और, राजस्थान को टीकाराम पालीवाल की शक्ल में कांग्रेस की तरफ से तीसरे मुख्यमंत्री मिले.

लेकिन व्यास और उनके समर्थकों ने जब हीरालाल शास्त्री को ही नहीं टिकने दिया तो अपेक्षाकृत कमजोर पालीवाल की दाल भला कैसे गलती! आठ महीने की अंदरूनी रस्साकशी के बाद नवंबर, 1952 में यह पद एक बार फिर व्यास के पास आ गया. लेकिन तब तक कांग्रेस में एक नया धड़ा अपनी जगह तलाश चुका था.

अपनी किताब ‘राजस्थान की राजनीति : सामंतवाद से जातिवाद की ओर’ में वरिष्ठ पत्रकार विजय भंडारी लिखते हैं, ‘कुंभाराम आर्य और मथुरादास माथुर जैसे प्रमुख नेताओं ने व्यास की जगह मोहनलाल सुखाड़िया को मुख्यमंत्री बनाने की योजना तैयार कर ली.’ इन तमाम नेताओं ने व्यास पर शक्ति परिक्षण का दबाव बनाया. न-न करते भी व्यास को नवंबर, 1954 में यह परीक्षण करवाना ही पड़ा. इसमें 110 विधायकों में से 51 ने व्यास का पक्ष लिया तो 59 के समर्थन से सुखाड़िया पांच साल में राजस्थान के पांचवें मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए. इसके बाद सत्रह साल तक सुखाड़िया इस पद पर बने रहे. हालांकि इस दौरान कुंभाराम आर्य, नाथूराम मिर्धा और माथुरदास माथुर जैसे नेताओं ने सुखाड़िया को भी कमजोर करने की कई बार कोशिश की. लेकिन नाकाम रहे.

1969 के राष्ट्रपति चुनाव में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विधायकों से ‘अंतरात्मा की आवाज पर’ मत देने की अपील की थी, तब मोहनलाल सुखाड़िया ने इंदिरा गांधी की पसंद वीवी गिरि के बजाय नीलम संजीव रेड्डी पर गलत दांव खेला और इसका खामियाजा उठाया. इसके चलते सुखाड़िया को पद से इस्तीफा देना पड़ा और राजस्थान को 1971 में पहला पैराशूट और अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री यानी बरकतुल्लाह ख़ान का नेतृत्व मिला. 1973 में ख़ान के असामयिक निधन के बाद पार्टी के अनुशासित सिपाही हरिदेव जोशी ने यह बागडोर संभाली. इस बात पर आज भी सवाल खड़े किए जाते हैं पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई थी कि तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री रामनिवास मिर्धा को परास्त कर जोशी राजस्थान के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए?

जोशी के कार्यकाल के दौरान ही देश में आपातकाल लगा था और अप्रैल, 1977 में राजस्थान में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. जनवरी, 1978 में कांग्रेस के दो फाड़ हो गए. राजस्थान के संदर्भ में इस घटना का ज़िक्र इसलिए आवश्यक है कि तब अशोक गहलोत ने रेड्डी कांग्रेस को चुना था. यदि समझाइश के बाद गहलोत कांग्रेस (आई) में शामिल न होते तो शायद राजस्थान का राजनैतिक इतिहास कुछ और ही होता.

सातवीं विधानसभा (1980-1985) में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन इस दौरान भी पार्टी ने तीन मुख्यमंत्री बदले. 1980 में संजय गांधी के करीबी जगन्नाथ पहाड़िया को मुख्यमंत्री चुना गया. लेकिन तमाम कारणों के चलते राज्य की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और संगठन के प्रमुख नेता शिवचरण माथुर ने अपने समर्थकों के साथ जाकर इंदिरा गांधी से इस बात की शिकायत की. नतीजतन पहाड़िया से इस्तीफा लेकर जुलाई, 1981 में शिवचरण माथुर को सूबे का मुख्यमंत्री चुना गया. लेकिन 1985 में डीग-कुम्हेर (भरतपुर) के निर्दलीय प्रत्याशी और पूर्व जाट राजघराने से ताल्लुक रखने वाले मानसिंह की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई. मानसिंह पर शिवचरण माथुर की अनुपस्थिति में उनका हेलीकॉप्टर और उनकी सभा का मंच तोड़ देने का आरोप था. मामले की गंभीरता को देखते हुए माथुर से आधी रात को ही इस्तीफा ले लिया गया और हीरालाल देवपुरा को मुख्यमंत्री बनाया गया.

1985 के विधानसभा चुनाव के बाद हीरालाल देवपुरा के ही मुख्यमंत्री बने रहने की पूरी संभावना थी. लेकिन हरिदेव जोशी पार्टी आलाकमान को लुभाने में सफल रहे और बाजी मार ले गए. लेकिन सितंबर, 1987 को सीकर के दिवराला सती कांड को लेकर मंत्री नरेंद्र सिंह भाटी ने विधानसभा में अपनी ही सरकार की जमकर आलोचना की. बताया जाता है कि भाटी ने इस घटना को रोक पाने में असफल रहे जोशी के विरुद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कान भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 1986 में जब राजीव गांधी रणथंभौर अभ्यारण्य में भ्रमण के लिए आए तो भाटी की सलाह पर जोशी ने सादगी से उनका स्वागत किया, जो गांधी को अखर गया. हालांकि इस मामले मे जोशी अपना पक्ष मजबूती से रख पाए और भाटी को शक्ति केंद्र बनने से पहले ही अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

लेकिन अगले ही साल जब राजीव गांधी सरिस्का अभ्यारण्य गए तो जोशी के हिस्से में एक बार फिर नाराज़गी ही आई. दरअसल, इस बार राजीव ने बेहद साधारण तरीके से स्वागत करने के निर्देश दिए थे. लेकिन जोशी को पिछला सबक याद था. उन्होंने नेताओं के साथ तमाम तामझाम इकठ्ठा तो कर लिया था, किंतु उचित मौका मिलने तक उन्हें अभ्यारण्य से दूर रखा था. प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि जोशी विरोधियों ने सड़क पर लगे दिशानिर्देशों को उस तरफ मोड़ दिया जहां सैंकड़ो गाड़ियां खड़ी थीं. अपनी कार खुद चला रहे राजीव निर्देशों के सहारे वहां पहुंच गए और उस लवाजमे को देखकर भौचक्के रह गए. इसके बाद उन्होंने जोशी को जमकर लताड़ लगाई. वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता से ऐसा व्यवहार करने पर राष्ट्रीय मीडिया ने राजीव गांधी को जमकर आड़े हाथों लिया और आखिर में उनकी खीज उतरी जोशी पर. 1988 में जोशी से उनका पद छीन लिया गया और शिवचरण माथुर को फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया.

1989 के लोकसभा चुनावों में बोफोर्स कांड के काले साये में घिरी कांग्रेस के हाथों से राजस्थान की सभी पच्चीस सीटें फिसल गईं जो उसे 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मिली थीं. केंद्र में राजीव कमजोर हो चुके थे. मौका भांपकर राजस्थान में माथुर के विरोधियों ने उन्हें पद से हटाने में देर नहीं लगाई और असम के राज्यपाल बना दिए गए हरिदेव जोशी एक बार फिर मुख्यमंत्री बनकर राजस्थान आए. हालांकि अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी.

इसके बाद दिसंबर, 1998 में कांग्रेस 153 विधायकों के साथ रिकॉर्ड बहुमत हासिल करने में सफल रही. उस समय अशोक गहलोत पार्टी प्रदेशाध्यक्ष हुआ करते थे और हाईकमान का कथित इशारा मिलने के बाद परसराम मदेरणा मुख्यमंत्री बनने के लिए आश्वस्त थे. वहीं मदेरणा के बाद लाइन में लगे नवलकिशोर शर्मा और शिवचरण माथुर को भी यह पद मिलने की उम्मीद थी. लेकिन सेहरा बंधा अशोक गहलोत के सर पर. बड़ी गहमागहमी हुई. कहा जाता है कि इस घटना के बाद प्रदेश में सबसे ज्यादा आबादी वाला जाट समुदाय गहलोत और कांग्रेस से बिदक गया. हालांकि गहलोत ने सर्वाधिक जाट मंत्रियों को चुनकर इस नुकसान की भरपाई की कोशिश की लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं माने गए. मदेरणा को भी मंत्रिमंडल में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार करने से इन्कार कर दिया.

फ़िर 2008 के चुनाव आए जिनमें मुख्यमंत्री पद और अशोक गहलोत के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी को बड़ा रोड़ा माना जा रहा था. लेकिन जोशी एक वोट से अपना चुनाव हार गए. मजेदार बात है कि इस चुनाव में उनकी पत्नी ने वोट नहीं डाला था. आखिरकार गहलोत तकरीबन एकतरफा मुख्यमंत्री चुन लिए गए. प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में यह शायद पहला और अब तक का आख़िरी मौका था जब इस पद को लेकर कुछ खास गहमागहमी देखने को नहीं मिली थी.

इसके बाद जब 2018 के विधानसभा चुनाव हुए तब राजस्थान में एक बार फिर से कांग्रेस पार्टी अपना परचम फहराने में सफल रही. तब कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते पायलट अपनी अगुवाई में मिली इस जीत के इनाम के तौर पर मुख्यमंत्री पद चाहते थे. लेकिन राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत ऐन मौके पर बाजी मार ले गए. इसके बाद से दोनों के बीच में राजनीतिक शह-मात का खेल लगातार चलता ही रहा है.(satyagrah)


14-Jul-2020 10:37 PM

-श्रवण गर्ग

राहुल गांधी केवल सवाल पूछते हैं ! प्रधानमंत्री से, भाजपा से ; पर अपनी ही पार्टी के लोगों के द्वारा खड़े किए जाने वाले प्रश्नों के जवाब नहीं देते।राहुल न तो कांग्रेस के अब अध्यक्ष हैं और न ही संसद में कांग्रेस दल के नेता।वे इसके बावजूद भी सवाल पूछते रहते हैं और प्रधानमंत्री से उत्तर की माँग भी करते रहते हैं।कई बार तो वे पार्टी में ही अपने स्वयं के द्वारा खड़े किए जाने वाले सवालों के जवाब भी नहीं देते और उन्हें अधर में ही लटकता हुआ छोड़ देते हैं।मसलन, लोक सभा चुनावों में पार्टी के सफ़ाये के लिए उन्होंने नाम लेकर जिन प्रमुख नेताओं के पुत्र-मोह को दोष दिया था उनमें एक राजस्थान के और दूसरे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी थे। क्या हुआ उसके बाद ? अशोक गेहलोत भी बने रहे और कमलनाथ भी।जो पहले चले गए वे ज्योतिरादित्य सिंधिया थे और अब जो लगभग जा ही चुके हैं वे सचिन पायलट हैं।

इसे अतिरंजित प्रचार माना जा सकता है कि सचिन की समस्या केवल गेहलोत को ही लेकर है।उनकी समस्या शायद राहुल गांधी को लेकर ज़्यादा बड़ी है। राहुल का कम्फ़र्ट लेवल या तो अपनी टीम के उन युवा साथियों के साथ है जिनकी कि कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ नहीं हैं या फिर उन सीनियर नेताओं से है जो कहीं और नहीं जा सकते। क्या ऐसे भी किसी ड्रामे की कल्पना की जा सकती थी जिसमें सचिन की छह महीने से चल रही कथित ‘साज़िश’ से नाराज़ होकर गेहलोत घोषणा करते कि वे अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ रहे हैं ? वैसी स्थिति में क्या भाजपा गेहलोत को अपने साथ लेने को तैयार हो जाती ? हक़ीक़त यह है कि जिन विधायकों का इस समय गेहलोत को समर्थन प्राप्त है उनमें अधिकांश कांग्रेस पार्टी के साथ हैं और जो छोड़ कर जा रहे हैं वे सचिन के विधायक हैं।यही स्थिति मध्य प्रदेश में भी थी।जो छोड़कर भाजपा में गए उनकी गिनती आज भी सिंधिया खेमे के लोगों के रूप में होती है, ख़ालिस भाजपा कार्यकर्ताओं की तरह नहीं।

सवाल यह भी है कि कांग्रेस पार्टी को अगर ऐसे ही चलना है तो फिर राहुल गांधी किसकी ताक़त के बल पर नरेंद्र मोदी सरकार को चुनौती देना चाह रहे हैं ? वे अगर भाजपा पर देश में प्रजातंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाते हैं तो उन्हें इस बात का दोष भी अपने सिर पर ढोना पड़ेगा कि अब जिन गिने-चुने राज्यों में कांग्रेस की जो सरकारें बची हैं वे उन्हें भी हाथों से फिसलने दे रहे हैं।नए लोग आ नहीं रहे हैं और जो जा रहे हैं उनके लिए शोक की कोई बैठकें नहीं आयोजित हो रही हैं।असंतुष्ट नेताओं में सचिन और सिंधिया के साथ-साथ मिलिंद देवड़ा ,जितिन प्रसाद ,प्रियंका चतुर्वेदी और संजय झा की भी गिनती की जा सकती है।

गोवा तब कैसे हाथ से निकल गया उसकी चर्चा न करें तो भी देखते ही देखते मध्य प्रदेश चला गया, अब राजस्थान संकट में है ।महाराष्ट्र को फ़िलहाल कोरोना बचाए हुए है ।छत्तीसगढ़ सरकार को गिराने का काम ज़ोरों पर है।संकट राजस्थान का हो या मध्य प्रदेश का ,यह सब बाहर से पारदर्शी दिखने वाली पर अंदर से पूरी तरह साउंड-प्रूफ़ उस दीवार की उपज है जो गांधी परिवार और असंतुष्ट युवा नेताओं के बीच तैनात है।इस राजनीतिक भूकम्प-रोधी दीवार को भेदकर पार्टी का कोई बड़ा से बड़ा संकट और ऊँची से ऊँची आवाज़ भी पार नहीं कर पाती है।

पिछले साल लोक सभा के चुनाव परिणाम आने के बाद कश्मीर में पीडीपी की नेता महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट करते हुए ‘शुभकामना’ संदेश तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजा था पर ‘कामना’ संदेश कांग्रेस के लिए था कि उसके पास भी एक ‘अमित शाह’ होना चाहिए।सवाल यह है कि गांधी परिवार या कांग्रेस में किसी अमित शाह को बर्दाश्त करने की गुंजाइश अभी बची है क्या? और राहुल गांधी इसलिए मोदी नहीं बन सकते हैं कि वे अपने अतीत और परिवार को लेकर सार्वजनिक रूप से उस तरह से गर्व करने में संकोच कर जाते हैं जिसे वर्तमान प्रधानमंत्री न सिर्फ़ सहजता से कर लेते हैं बल्कि उसे अपनी विजय का हथियार भी बना लेते हैं।

अर्नब गोस्वामी द्वारा पिछले लोक सभा चुनावों के समय अपने चैनल के लिए लिया गया वह चर्चित इंटरव्यू याद किया जा सकता है जिसमें राहुल गांधी ने कहा था :’ मैंने अपना परिवार नहीं चुना।मैंने नहीं कहा कि मुझे इसी परिवार में पैदा होना है।अब दो ही विकल्प हैं :या तो मैं सब कुछ छोड़कर हट जाऊँ या फिर कुछ बदलने की कोशिश करूँ।’ राहुल गांधी दोनों विकल्पों में से किसी एक पर भी काम नहीं कर पाए।

कई लोग सवाल कर रहे हैं कि एक ऐसे समय जबकि कांग्रेस पार्टी चारों तरफ़ से घोर संकट में है ,क्या सचिन पायलट इस तरह से विद्रोह करके उसे और कमज़ोर नहीं कर रहे हैं ? इसका जवाब निश्चित ही एक बड़ी ‘हाँ’ में ही होना चाहिए पर साथ में यह जोड़ते हुए कि इस नए धक्के के बाद अगर पार्टी नेतृत्व जाग जाता है तो उसे एक बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए।हो सकता है इसके कारण वह भविष्य में हो सकने वाले दूसरे बहुत सारे नुक़सान से बच जाए।किसे पता सचिन यह विद्रोह वास्तव में कांग्रेस पार्टी को बचाने के लिए ही कर रहे हों !


14-Jul-2020 7:59 PM

सीटू तिवारी

बिहार के अररिया में एक गैंगरेप की सर्वाइवर को ही जेल भेज दिया गया है। रेप सर्वाइवर और उनके दो सहयोगियों पर कोर्ट की अवमानना का आरोप लगा है। जिसके बाद इन गैंगरेप की सर्वाइवर सहित तीनों लोगों को समस्तीपुर के दलसिंहसराय जेल भेज दिया गया है।

6 जुलाई को इस गैंगरेप की रिपोर्ट रेप सर्वाइवर ने अररिया महिला थाना में 7 जुलाई को दर्ज कराई।

महिला थाने में कांड संख्या 59/2020, भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (डी) के तहत दर्ज इस एफआईआर में जिक्र है कि मोटरसाइकिल सिखाने के बहाने उनको एक परिचित लडक़े ने बुलाया।
रेप सर्वाइवर को एक सुनसान जगह ले जाया गया। जहाँ मौजूद चार अज्ञात पुरूषों ने उसके साथ बलात्कार किया। एफआईआर के मुताबिक़ रेप सर्वाइवर ने अपने परिचित से मदद मांगी, लेकिन वो वहाँ से भाग गया।

घबराई रेप सर्वाइवर, अररिया में काम करने वाले जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) के सदस्यों की मदद से अपने घर पहुँची। लेकिन जब उन्हें अपने घर में भी असहज लगा तो रेप सर्वाइवर ने अपना घर छोडक़र जन जागरण शक्ति संगठन के सदस्यों के साथ ही रहने लगी।

7 और 8 जुलाई को उनकी मेडिकल जाँच हुई। जिसके बाद 10 जुलाई को बयान दर्ज कराने के लिए रेप सर्वाइवर को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट में ले जाया गया। जन जागरण शक्ति संगठन की ओर से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, रेप सर्वाइवर और जन जागरण शक्ति संगठन के कार्यकर्ता 10 जुलाई को दोपहर 1 बजे कोर्ट पहुँचे। वहाँ इन लोगों ने कॉरीडोर में इंतज़ार किया। उस वक़्त केस का एक अभियुक्त भी वहीं मौजूद था। तकरीबन 4 घंटे के इंतज़ार के बाद रेप सर्वाइवर का बयान हुआ।

प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, ‘बयान के बाद जब उसे न्यायिक दंडाधिकारी ने बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा, तो वो(रेप सर्वाइवर) उत्तेजित हो गई। उन्होंने उत्तेजना में कहा कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। आप क्या पढ़ रहे है, मेरी कल्याणी दीदी को बुलाइए।’

कल्याणी और तन्मय निवेदिता जन जागरण शक्ति संगठन के कार्यकर्ता हैं।
‘बाद में, केस की जाँच अधिकारी को बुलाया गया, तब रेप सर्वावइवर ने बयान पर हस्ताक्षर किए। बाहर आकर रेप सर्वावइवर ने जेजेएसएस के दो सहयोगियों तन्मय निवेदिता और कल्याणी बडोला से तेज आवाज में पूछा कि ‘तब आप लोग कहाँ थे, जब मुझे आपकी जरूरत थी।’

बाहर से आ रही तेज आवाजों के बीच ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने कल्याणी को अंदर बुलाया। कल्याणी ने रेप सर्वावइवर का बयान पढक़र सुनाए जाने की मांग की। जिसके बाद वहाँ हालात तल्ख होते चले गए। तकरीबन शाम 5 बजे कल्याणी, तन्मय और रेप सर्वाइवर को हिरासत में लिया गया और 11 जुलाई को जेल भेज दिया गया।

स्थानीय अखबार दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट में लिखा है, ‘न्यायालय के पेशकार राजीव रंजन सिन्हा ने दुष्कर्म पीडि़ता सहित दो अन्य महिलाओं के विरुद्ध महिला थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई है। दर्ज प्राथमिकी में बताया गया है कि पीडि़ता ने बयान देकर फिर उसी पर अपनी आपत्ति जताई।’
रिपोर्ट में लिखा है कि, ‘न्यायालय में बयान की कॉपी भी छीनने का प्रयास किया गया। न्यायालय में इस तरह की अभद्रता से आक्रोशित न्यायिक दंडाधिकारी ने तीनों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है।’

बीबीसी के पास भी एफ़आईआर की कॉपी मौजूद है।
इस मामले में बीबीसी ने जब पब्लिक प्रोसिक्यूटर (लोक अभियोजक) लक्ष्मी नारायण यादव से बात की तो उन्होंने कहा, ‘मुझे इस मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं है। लॉकडाउन के चलते हम लोग अभी मजिस्ट्रेट कोर्ट नहीं जा पा रहे है।’ वहीं अररिया के एसडीपीओ पुष्कर कुमार ने बीबीसी के सवाल पर सिर्फ इतना कहा, ‘जेल नहीं भेजा गया है।’
ये कहकर उन्होंने कहा कि आपकी (रिपोर्टर की) आवाज नहीं आ रही है और फोन काट दिया। इसके बाद फोन मिलाने पर उन्होंने फोन नहीं उठाया। वहीं अररिया की पुलिस अधीक्षक धुरात साईली सावलाराम और महिला थाना अध्यक्ष रीता कुमारी से संपर्क करने की तमाम कोशिशें असफल रही। बीबीसी ने ई-मेल के जरिए भी संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, जिसका जवाब ख़बर लिखे जाने तक नहीं मिला है।

महिला संगठनों ने की रिहाई की मांग
इस घटना के सामने आने के बाद बिहार के महिला संगठनों ने रेप सर्वाइवर और जन जागरण शक्ति संगठन के कार्यकर्ताओं को रिहा करने की मांग की है।
एडवा की राज्य अध्यक्ष रामपरी के मुताबिक, ‘ये एक अमानवीय फैसला है। वो मानसिक तनाव की स्थिति से गुजर रही थी। उसको कई बार घटना को बताना पड़ा, उसकी पहचान उजागर की गई। एक अभियुक्त और उसके परिवार के लोगों ने शादी का प्रस्ताव देकर मामले को रफ़ा- दफ़ा करने की कोशिश की, जिसको रेप सर्वाइवर ने ठुकरा दिया। वो 22 साल की है, वयस्क है और अपना केस मज़बूती से लडऩा चाहती है, लेकिन उससे, उसके ‘लीगल गार्जियन’ के बारे में पूछा जा रहा है। कांउसलिंग की भी कोई सुविधा नहीं है। हम न्यायपालिका में विश्वास रखते हुए, न्याय की मांग और उम्मीद करते है।’

भारत में बलात्कार कानून
भारत में बलात्कार कानूनों की बात करें तो 80 के दशक में बलात्कार कानूनों में एक बड़ा बदलाव ये आया कि ‘ओनस ऑफ प्रूफ’ महिला से पुरूष को चला गया। बाद में साल 2013 में क्रिमिनल लॉ एमेन्डमेंट एक्ट में महिला केंद्रित कानून बना। मानवाधिकार कार्यकर्ता खदीजा फारूखी बताती है, ‘इसके मुताबिक़ पुरानी सेक्शुएलिटी हिस्ट्री डिस्कस नहीं करने, रेप सर्वाइवर की प्राइवेसी को अहम माना गया तो 164 का बयान दर्ज कराते वक्त अगर रेप सर्वाइवर किसी ‘पर्सन ऑफ कॉन्फिडेंस’ (विश्वस्त व्यक्ति) को साथ में ले जाना चाहती है, तो इसकी अनुमति दी गई। साथ ही उसे बयान की कॉपी भी मिलने का प्रावधान किया गया। इसमें अगर संभव है तो महिला जज के सामने बयान दर्ज किया जाना चाहिए। लेकिन इन सबके बावजूद रेप सर्वाइवर्स के साथ सामाजिक, पारिवारिक और कानूनी स्तर पर अमानवीय व्यवहार होता है।’

रेप सर्वाइवर का ट्रामा
खदीजा जो बात कर रही है उसे 21 साल की दूसरी रेप सर्वाइवर सुलेखा (बदला हुआ नाम) के जीवन से समझा जा सकता है।
बीबीसी से वो कहती हैं, ‘बिहार में उसी की चलती है जिसके पास पैसा है। दुष्कर्म हो जाता है उसके बाद आप शिकायत करें तो गंदे-गंदे सवाल पूछे जाते है। बार-बार पूछते हैं, क्या हुआ था, क्यों गई थी वहाँ? क्या पहना था? ऐसा लगता है केस करके मैंने ही बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो। मेरे साथ तो एक पुलिस वाले ने ही रेप किया था तो मुझे न्याय कैसे मिलेगा।’
इस मामले में रिपोर्ट छपने तक प्रशासन की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। (बीबीसी)

 


14-Jul-2020 7:57 PM

प्रकाश दुबे

संविधान की शपथ के कारण केन्द्रीय गृह मंत्री पर देश की विधि- व्यवस्था का दायित्व है। उन पौधों के विकास का ध्यान रख्नना है, जिन्हें  पार्टी अध्यक्ष के नाते रोपा था। पूर्वोत्तर  में अमित शाह का मिनी अवतार जि़म्मेदारी संभाल लेता है। असम के स्वास्थ्य मंत्री हिमांत विश्व शर्मा समूचे पूर्वोत्तर में पार्टी की सरकारों को बनाने और संभालने में जुटे रहते हैं। हिमांत ने मणिपुर में जुगाड़ से सरकार बनवाई। दल बदल के कारण सरकार अल्मपत में आई। फौरन पहुंचकर दल बदलुओं से पुनर्दलबदल कराया। सरकार बचाई। मेघालय में एक पार्टी विधायक की बदौलत केन्द्र समर्थित सरकार चल रही है।

इतनी दौड़ भाग में असम के स्वास्थ्य मंत्रालय पर पकड़ कम हुई। असम के करीब आधा दर्जन जिलों से राजधानी दिसपुर में आवागमन पर रोक लगी है। स्वास्थ्य मंत्री शर्मा का विधानसभा क्षेत्र जालुकबारी कामरूप जिले में आता है। मंत्री हिमांत को  कुछ जिलों में कोरोना के सामुदायिक संक्रमण के खतरे की आशंका है। राजनीतिक दल बदल पर काबू पाना आसान है। विषाणु के देह- बदल का पता ही नहीं लगता।  

कोरोना हाजिऱ है
संसद के अधिवेशन की तिथि और तरीके पर निर्णय नहीं हो सका है। संसद से संबंधित स्थायी समितियों की बैठकों पर भी कोरोना का कोप मंडराता है।  गृह मंत्रालय से संबंधित स्थायी समिति की बैठक नहीं हो सकी।  विज्ञान और प्रौद्योगिकी से संबंधित बैठक में कोरम का सवाल उठा। 30 सदस्यों में दो तिहाई से अधिक गैर हाजिऱ रहे। विज्ञान और प्रोद्योगिकी स्थायी समिति के अध्यक्ष जयराम रमेश ने राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर कोरम के अभाव का हल सुझाया। रमेश् चाहते हँं कि सदस्यों का स्वयं आना मुश्किल है तब आभासी बैठकों को मान्यता दी जाए। लोग आन लाइन बैठक में अपने विचार बतायें। वरना गणपूर्ति यानी कोरम के अभाव में काम नहीं होगा। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू राज्य सभा के पदेन सभापति हैं। नायडू ने तात्कालिक हल सुझाया। बैठकों में कोरम के अभाव के बावजूद विचार विनिमय पर रोक नहीं है। समिति की रपट पेश करने या कोई अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय करते समय कोरम की आवश्यकता पर विचार करें। मजेदार बात यह है कि जिस बैठक में कोरम नहीं था उसमें कोरोना का मुकाबला करने की रणनीति पर विचार होना था। 

आज नकद कल उधार
चतुर व्यापारी उधार देने से पहले दस बार सोचते हैं। पुराने  बकाये का भुगतान होने तक लेन देन बंद। मुश्किल तब आती है, जब आप माल को बेहतरीन बताकर बेचने की जुगत भिड़ा रहे हों और जाना पहचाना, पुराना ग्राहक पोल खोल दे। नाम लेकर ही सारा किस्सा सुनाए देते हैं। एयर इंडिया को बेचने के लिए केन्द्र सरकार बेताब है।  बोली लगाने वाले दिलचस्पी नहीं दिखाते। इस बीच भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने एयर इंडिया का चीरहरण कर दिया।  कुछ हवाई अड्?डों ने एयर इंडिया के हवाई जहाज उतरने पर शर्त लगाई। शर्त बताते हुए हमें शर्मिंदगी हो रही है। हवाई अड्?डे पर विमान तभी उतार सकोगे जब नकद रकम साथ लेकर आओ। भुगतान करो। तब हवाई जहाज उतरने देंगे। एक उड़ान भरते हो तो उसकी रकम। एक से ज्यादा तब दिन भर का भुगतान। उड़ानें स्थगित होने के कारण हैरान एयर इंडिया ने दो जुलाई को दो करोड़ रु जमा किए हैं। हवाई अड्?डों का रखरखाव करने वाला प्राधिकरण अड़ा है।  जिन हवाई अड्?डों पर एयर इंडिया के ज़हाज उतरने से रोक लग सकती है, उनमें अहमदाबाद हवाई अड्?डा शामिल है। नागरिक उड्?डयन मंत्री हरदीप पुरी के माथे एक नया सिरदर्द। भई गति सांप-छंछूदर केरी। 

अतिथि, मत आओ
देवभूमि हिमाचल प्रदेश में रहने या जाने का किसका मन नहीं करेगा? जीते जी देवलोक में। कोरोना के कहर के कारण हिमाचल राज्य में संक्रमित बढ़ रहे हैं।  देवभूमि में घुसपैठ के लिए सैलानी दानवीय छल बल का आसरा लेने से बाज़ नहीं आते। आसपास के राज्यों के लोग हिमाचल में प्रवेश के लिए फर्जी ई पास दिखाते पकड़े गए। किसी ने शादी का झूठा निमंत्रण दिखाया।  संक्रमण मुक्ति का झूठा कोरोना निगेटिव प्रमाण पत्र दिखाने से नहीं चूके। वह भी देश भर में मशहूर दिल्ली के सरकारी अस्पताल का। सैलानियों पर कड़ी नजऱ रखी जा रही है।  फर्जी  दस्तावेज़ों और और झूठे कारण  बताने वाले सैकड़ों लोगों को पुलिस सीमा से लौटा रही है। अब तक मुख्यमंत्री की तस्वीर के साथ देव भूमि में सदेह आमंत्रित करने वाले विज्ञापन बंद हैं। होटल वाले कहते हैं-अतिथि मत आओ। सैलानी निजी घरों का जुगाड़ कर घुस जाते हैं।  फर्जीवाड़ा पकड़ में आने के बाद से मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर हैरान हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


14-Jul-2020 7:55 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाड ट्रंप की कृपा कुछ ऐसी है, जो ईरान को चीन की गोद में बिठा देगी। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने एक 18 पृष्ठ का दस्तावेज उजागर किया है, जिससे पता चलता है कि ईरान में चीन अगले 25 साल में 400 बिलियन डॉलर्स का विनियोग करेगा। इस पैसे का इस्तेमाल किस-किस क्षेत्र में घुसने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, यह जानकर ही आप दंग रह जाएंगे। ईरान में रेलें, सडक़ें, पुल, बंदरगाह आदि के निर्माण में तो चीनी पूंजी लगेगी ही, चीन का बस चलेगा तो वह ईरान की बैंकों, दूर-संचार और फौजी जरुरतों पर भी अपना वर्चस्व कायम करना चाहेगा। ईरान के जरिए वह दक्षिण और मध्य एशिया के राष्ट्रों में अपनी सामरिक उपस्थिति बढ़ाने की पूरी कोशिश करेगा। दक्षिण एशिया के साथ 2000 तक चीन का व्यापार सिर्फ 5.57 बिलियन डॉलकर का था, पिछले 18-19 साल में वह 23 गुना बढक़र 127.36 बिलियन डॉलर का हो गया है। पाकिस्तान पर तो चीन की पकड़ काफी मजबूत है ही वह अफगानिस्तान में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान- इन तीनों देशों में चीन का वर्चस्व बढ़ गया तो भारतीय विदेश नीति के लिए यह काफी चिंता का विषय बन जाएगा। इसकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा अमेरिका पर होगी, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी अतिवादी और बड़बोली नीतियों के कारण ईरान को चीन पर निर्भर कर दिया है। ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के पहले से यह एलान कर रखा था कि वे ईरान के साथ हुए बहुराष्ट्रीय परमाणु समझौते को गलत मानते हैं और यदि वे राष्ट्रपति बन गए तो उसे वे रद्द कर देंगे।

2015 में वह समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और छह राष्ट्रों ने मिलकर किया था। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद वह अंतरराष्ट्रीय समझौता संपन्न हुआ था और ईरान पर लगे प्रतिबंध उठा लिए गए थे लेकिन ट्रंप ने उस समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया और 2018 से ईरान पर सारे प्रतिबंध दुबारा थोप दिए। उसने उन देशों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दे दी, जो ईरान से तेल खरीदते हैं या व्यापार करते हैं। ईरान की अर्थ-व्यवस्था लगभग चौपट हो गई है। मरता, क्या नहीं करता ? 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने अपनी ईरान-यात्रा के दौरान सामरिक सहयोग का जो प्रस्ताव रखा था, उसे अब ईरान ने स्वीकार कर लिया है। इस समय चीन अपना 70 प्रतिशत तेल आयात करता है। उसे अब वह सस्ता और आसानी से मिलेगा।

 इस समय ईरान-चीन व्यापार सिर्फ 23 बिलियन डॉलर का है लेकिन चीनी राष्ट्रपति के अनुसार वह 600 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यदि ऐसा होता है तो सबसे ज्यादा चिंता सउदी अरब और इस्राइल को ही होगी, क्योकि इन दोनों देशों के विरोधियों को टेका लगाने का दोष ईरान के मत्थे ही मढ़ा जाता है। यदि नवंबर में अमेरिका में सत्ता-परिवर्तन हो जाता है तो निश्चय ही ईरान के साथ उसके संबंध सुधरेंगे और एशिया के इस क्षेत्र में तनाव घटेगा।
  (नया इंडिया की अनुमति से)

 


14-Jul-2020 9:54 AM

-पुलकित भारद्वाज

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की अंदरूनी खींचतान चरम पर पहुंच चुकी है. इस बात का अंदाज पायलट के उस मैसेज से लगाया जा सकता है जो उन्होंने अपने ऑफिशियल ग्रुप में रविवार रात को भेजा था. सूत्रों के मुताबिक इसमें उन्होंने तीस कांग्रेसी और निर्दलीय विधायकों का समर्थन अपने पक्ष में होने की बात कही थी. जबकि उनके समर्थक इससे पहले ही राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार के अल्पमत में आने की घोषणा कर चुके थे.

कांग्रेस से सचिन पायलट के बाग़ी हो जाने के कयासों को तब और हवा मिल गई जब रविवार को उन्होंने अपने करीबी और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को बड़ा झटका दे चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया से एक लंबी मुलाकात की. सिंधिया के अलावा पायलट के भारतीय जनता पार्टी के कुछ अन्य नेताओं से भी मुलाकात की सूचना है. इस पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट कर कहा था कि - मुझे इस बात का दुख है कि मेरे साथी रह चुके सचिन पायलट को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने परेशान करते हुए हाशिए पर पहुंचा दिया है. यह दिखाता है कि कांग्रेस में प्रतिभा और योग्यता को बहुत कम महत्व मिलता है.

इससे पहले जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद कांग्रेस के अधिकतर छोटे-बड़े नेता उन्हें जमकर आड़े हाथ ले रहे थे, तब सचिन पायलट ने एक बहुत संतुलित सा ट्वीट कर लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था. उन्होंने लिखा था कि ‘ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस से अलग होते देखना दुखद है. काश चीजों को पार्टी के अंदर ही मिल-जुलकर सुलझा लिया गया होता.’ उनके इस संदेश को कांग्रेस आलाकमान के लिए नसीहत के तौर पर देखा गया जो पार्टी के नए नेताओं की शिकायतों को कथित पर लगातार अनसुना कर रहा है.

यूं तो सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच की तनातनी 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद से किसी से नहीं छिपी है जब छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की ही तरह राजस्थान में भी कांग्रेस पार्टी अपना परचम फहराने में सफल रही थी. तब कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते पायलट अपनी अगुवाई में मिली इस जीत के इनाम के तौर पर मुख्यमंत्री पद चाहते थे. लेकिन राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत ऐन मौके पर बाजी मार ले गए. तभी से सचिन पायलट, राजस्थान में मुख्यमंत्री गहलोत और उनके नेतृत्व वाली सरकार को घेरने का कोई मौका छोड़ते नहीं दिखे हैं.

लेकिन जानकार कहते हैं कि जो उठापटक इस समय राजस्थान में देखने को मिल रही है उसके तार हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों से जुड़ते हैं. इस चुनाव में भाजपा ने राजस्थान में नाटकीय ढंग से अपने विधायकों के संख्या बल को दरकिनार करते हुए एक की बजाय दो प्रत्याशी मैदान में उतार दिए थे. तब यह संभावना जोर-शोर से जताई गई थी कि राज्यसभा चुनाव के साथ भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश की ही तरह राजस्थान में भी सत्ता पलटने की कोशिश कर सकती है. उसकी इस कवायद में पायलट खेमे का सहयोग मिलने के भी कयास लगाए गए. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसके लिए जानकारों ने मुख्यमंत्री गहलोत के रणनीतिक कौशल को श्रेय दिया. लेकिन बात तब बिगड़ी जब स्पेशल ऑपरेशनल ग्रुप (एसओजी) ने बीते शुक्रवार इस बारे में पूछताछ करने के लिए सचिन पायलट को एक पत्र लिखा.

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, राजस्थान की तरफ़ से भेजे गए इस पत्र में धारा 124 ए, 120 बी के तहत मामले की जांच करने और इस संदर्भ में सचिन पायलट के बयान लेने की बात कही गई है. पायलट इसी बात पर भड़क गए. उन्होंने इस पत्र को अपने स्वाभिमान पर चोट बताया. उन्होंने बयान दिया कि ‘एसओजी का नोटिस उचित नहीं है. धारा 124 ए के तहत पूछताछ आत्मसम्मान पर चोट है. पुलिस इस केस की आड़ में फोन टैप कर सकती है जो कतई उचित नहीं है. यह क़दम एक रणनीति के तहत उठाया गया है.’ इसके बाद से सचिन पायलट ने कांग्रेस नेताओं के फ़ोन उठाने बंद कर दिए. वहीं, अशोक गहलोत समर्थकों का कहना है कि ऐसा ही एक पत्र एसओजी ने मुख्यमंत्री के नाम भी भेजा था. लेकिन सिर्फ पायलट का इस बात पर भड़कना ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली कहावत को सही साबित करता है.

राजस्थान कांग्रेस से जुड़े सूत्र इस पूरे मामले पर कहते हैं कि लंबे समय से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करना चाहते थे. लेकिन इसके लिए वे सचिन पायलट के पार्टी प्रदेशाध्यक्ष पद से हटने का इंतजार कर रहे थे ताकि वे नए मंत्रियों के चयन या पुराने मंत्रियों को हटाए जाने पर ज़्यादा हस्तक्षेप न कर सकें. कुछ ऐसी ही स्थिति विभिन्न राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भी बनी हुई थी. लेकिन अब गहलोत की राह आसान होती दिख रही है.

दरअसल इस पूरी खींचतान के मद्देनज़र पार्टी ने आज जयपुर में कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई है जिसमें आने के लिए सभी विधायकों को व्हिप जारी कर दिया गया है. कांग्रेस महासचिव और पार्टी के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय ने इस बारे में बयान दिया है कि इस बैठक में न आने वाले विधायकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. उधर, बागी रुख अपनाए हुए राजस्थान कांग्रेस के मुखिया और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने अपने समर्थकों के साथ इस बैठक में हिस्सा लेने से साफ इनकार कर दिया है. जानकारी के अनुसार कांग्रेस के 107 विधायकों में से 102 विधायक इस बैठक में भाग लेने के लिए पहुंच चुके हैं. ऐसे में पायलट और उनके समर्थक विधायकों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई होना तय है. ऐसा शायद न भी होता अगर मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की वजह से कांग्रेस हाईकमान पहले ही अपमान का घूंट नहीं पी चुका होता.

विश्लेषकों के मुताबिक ऐसी स्थिति में पायलट के सामने तीन विकल्प बचते हैं. और तीनों में से एक भी उनके लिए फ़ायदे का सौदा नज़र नहीं आता. पहला तो यही कि इतना सब होने के बाद भी वे कांग्रेस से ही जुड़े रहें. इसके लिए वे पार्टी हाईकमान से जमकर मोल-भाव करने की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन सूत्रों का कहना है कि बात इतनी बढ़ जाने के बाद ऐसा हो पाना मुश्किल है. फ़िर अशोक गहलोत भी ऐसा आसानी से होने देने से रहे. हालांकि इसके लिए गहलोत को हाईकमान को इस बात का यकीन दिलाना होगा कि राजस्थान में किसी भी हाल में वे सत्ता की चाबी को अपने हाथ से नहीं फिसलने देंगे. यदि वे ऐसा कर पाए तो ज़ाहिर तौर पर इससे पार्टी और प्रदेश सरकार में सचिन पायलट का क़द घटेगा और संगठन पर भी उनकी पकड़ कमज़ोर होगी. अभी तक प्रदेश कांग्रेस में पायलट का क़द दूसरे नंबर का माना जाता है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद उनकी क्या स्थिति क्या होगी, इस बारे में अभी निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है.

सचिन पायलट के सामने दूसरा विकल्प यह बचता है कि वे भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह भाजपा में शामिल हो जाएं. रविवार शाम तक ऐसी संभावना जताने वाली ख़बरें जमकर सामने आई थीं और सोमवार को भी राजस्थान के प्रमुख अख़बारों के पहले पन्ने पर छाई रहीं. लेकिन पायलट ने बयान ज़ारी कर यह क़दम उठाने से इन्कार कर दिया है. इसके पीछे बड़ी वजह तो यही है कि राजस्थान में दल-बदलू नेता की छवि के साथ लंबा राजनैतिक सफ़र तय करना अब तक मुश्किल ही रहा है. फ़िर जानकारों की मानें तो यदि सचिन पायलट चाहें तो भी भारतीय जनता पार्टी उन्हें अपने साथ जोड़ने में कम ही दिलचस्पी दिखाएगी. इसके कई कारण हैं:

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया इस बारे में हमें बताते हैं कि ‘मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया से भारतीय जनता पार्टी ने इसलिए हाथ मिलाया क्योंकि वे वहां सरकार गिराने की स्थिति में थे. जबकि राजस्थान विधानसभा का गणित पायलट को ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता.’ ग़ौरतलब है कि राजस्थान के कुल 200 विधायकों में से 107 विधायक सत्ताधारी दल कांग्रेस से आते हैं. इनमें बहुजन समाज पार्टी के छह विधायक भी शामिल हैं जो पिछले साल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. इनके अलावा राज्य के 13 निर्दलीय, भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के दो, सीपीएम के दो और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के एक विधायक का भी समर्थन अब तक प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार को हासिल रहा है. वहीं भाजपा की बात करें तो राजस्थान में उसके पास 72 विधायक हैं और उसे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के तीन और विधायकों का समर्थन हासिल है. इस तरह उसके पास कुल 75 विधायक ही हैं.

बकौल आकोदिया, ‘यदि 30 विधायकों के साथ होने के सचिन पायलट के दावे को सही मान लें तो जैसा कि सामान्य तौर पर होता है सरकार को अस्थिर करने के लिए इन सभी विधायकों को इस्तीफ़ा देना होगा. तब विधानसभा में बचे विधायकों की संख्या रहेगी 170 और बहुमत के लिए आवश्यक होंगे 85 विधायक. यानी पूरी खींचतान करने के बाद भी भाजपा को सरकार बनाने के लिए दस और विधायकों की आवश्यकता पड़ेगी जिसे पूरा कर पाना टेड़ी खीर है. और बाद में इन सीटों के लिए बाद में जो उपचुनाव होंगे उसमें भी पार्टी के लिए जोख़िम ही रहेगा. इसलिए भाजपा के लिए तो यही बेहतर नज़र आता है कि वह दूर खड़े रहकर पूरा तमाशा देखे. वहीं जानकारी के मुताबिक 109 विधायक अभी तक गहलोत कैंप में पहुंच चुके हैं जो कि सामान्य बहुमत (101) से भी ज़्यादा हैं.’

फ़िर, एक से एक दिग्गज नेताओं से भरी भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई में किसी बाहरी नेता के लिए पैर रखने की भी जगह नज़र नहीं आती. राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी इस समय कई छोटे-बड़े गुटों में बंटी हुई है. इनमें सबसे बड़ी धुरी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ख़ुद हैं. कहा जाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में सिर्फ़ राजे ही हैं जो पार्टी के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की आंखों में आंख डालकर बात कहने का माद्दा रखती हैं.

भाजपा से जुड़े सूत्रों की मानें तो भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व से नाख़ुश धड़ा अगले लोकसभा चुनाव से पहले उन पर दबाव बनाने के लिए वसुंधरा राजे की मदद ले सकता है. शायद यह भी एक प्रमुख कारण है कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद भाजपा हाईकमान राजे को कमजोर करने में कोई कसर छोड़ता नहीं दिख रहा है. ऐसे में राजस्थान की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार अभी से यह जानने में खासी दिलचस्पी दिखाते हैं कि करीब सवा तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में राजे क्या रुख़ अपनाएंगी! इस समय राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के 72 विधायकों में से पचास से ज्यादा ऐसे माने जाते हैं जिनके लिए ‘वसुंधरा ही भाजपा’ हैं. राजस्थान से आने वाले भाजपा के सभी 25 सांसदों में से कमोबेश आधों की भी यही स्थिति बताई जाती है.

अवधेश आकोदिया के मुताबिक ‘यदि भाजपा ने राजस्थान में वसुंधरा राजे की बजाय किसी और नेता को मुख्यमंत्री बनाने की सोची भी तो पार्टी में इस तरह की तोड़-फोड़ देखने को मिल सकती है जैसी कांग्रेस में भी नहीं है.’ यानी कुल मिलाकर राजे भाजपा हाईकमान ना तो राजे को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाकर और ज़्यादा ताकतवर करने का ख़तरा मोल ले सकता है और ना ही मुख्यमंत्री ना बनाकर उन्हें नाराज़ करने का. चूंकि अगले लोकसभा और राजस्थान विधानसभा चुनावों में अभी ठीक-ठाक समय बाकी है सो विश्लेषकों का कहना है कि इस समय राजे को लेकर ‘वेट एंड वॉच’ ही सबसे सही रणनीति हो सकती है, क्योंकि अगले चुनावों तक न जाने कितने समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे. ऐसे में सचिन पायलट को साथ जोड़कर भाजपा आलाकमान दुविधा के उस जिन्न से अभी शायद ही जूझना चाहेगा जो अगले कुछ साल के लिए बोतल में बंद है.

इसके अलावा भी देखें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा के रंग में ढल जाना उनके समर्थकों को ज़्यादा इसलिए नहीं अखरा क्योंकि सिंधिया परिवार की जड़ें पूर्व राजमाता विजया राजे के जमाने से ही जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी रही हैं. जबकि सचिन पायलट का दूर-दूर तक किसी भी तरह का कोई रिश्ता भाजपा से नहीं रहा है. फ़िर ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाकर संतुष्ट नज़र आ सकते हैं. वहीं, सचिन पायलट का ध्यान केंद्र के बजाय प्रदेश की राजनीति पर ज़्यादा है. ऊपर से सचिन की पत्नी सारा जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं. इन दोनों ही नेताओं को मोदी सरकार ने धारा-370 के हटाने के बाद से ही नजरबंद कर रखा था. लेकिन कुछ महीने पहले जिस तरह पहले फारूख़ अबदुल्ला और फ़िर उमर अब्दुल्ला की अचानक रिहाई हुई, उसे कुछ लोगों ने पायलट को भी खुश करने की भाजपा की कवायद के तौर पर देखा. लेकिन विश्लेषकों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि अब्दुल्ला परिवार की वजह से सचिन पायलट और भारतीय जनता पार्टी के बीच किसी सहज राजनीतिक रिश्ते की गुंजाइश कम ही नज़र आती है.

अब सचिन पायलट के सामने बचा तीसरा और आख़िरी रास्ता है एक नई पार्टी बनाने का. राजस्थान युवा कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता आयुष भारद्वाज इस बारे में कहते हैं कि ‘आज़ादी के बाद से ही राजस्थान में किसी तीसरे मोर्चे का कोई प्रभावशाली वज़ूद नहीं रहा है. हमारे प्रदेशाध्यक्ष से पहले भी प्रदेश के कई कद्दावर नेताओं ने ऐसा करने की कोशिश की और उन्हें मन मसोस कर ही रहना पड़ा.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘सामान्य समझ से भी देखें तो विधायकों को भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से कुछ न कुछ आर्थिक या राजनीतिक लाभ मिल सकता है. लेकिन सिर्फ़ सचिन पायलट के साथ जाने के लिए कौन अपनी विधायकी को दांव पर लगाना चाहेगा, कहना मुश्किल है. उन्होंने जाने-अनजाने अपनी छवि एक मनमौजी नेता के तौर पर स्थापित कर ली है जिस पर भरोसा करते हुए बड़ा फ़ैसला लेना कोई आसान काम नहीं.’

बहरहाल, बीते कुछ सालों में ऐसे कई मौके आए जब पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पेशानी पर बल ला दिए थे. यह सही है कि गहलोत सरीखे परिपक्व नेता के लिए चुनौती बनना पायलट की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. लेकिन अपने लंबे राजनीतिक अनुभव की मदद से गहलोत हर बार उन पर इक्कीस ही साबित होते रहे. राजनीतिक विश्लेषकों का इस बारे में मानना है कि जब भी सचिन पायलट ने गहलोत पर छोटी बढ़त हासिल की, उन्होंने उसे अपनी जीत समझा. जबकि असल में वे ऐसा करके गहलोत के जाल में फंसते जा रहे थे. गहलोत ने उन्हें पटकने के लिए सही समय का इंतजार किया. जबकि पायलट ने हर मौके पर अतिउत्साहित होकर अपनी अपरिपक्वता ज़ाहिर की.

पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘पायलट गहलोत के बिछाए ऐसे व्यूह में फंस चुक जिसमें घुसना तो आसान है, लेकिन निकलना नहीं. पायलट को ये बात तभी समझ लेनी चाहिए थी जब सत्ता में आने के बाद ही उनके कई विश्वस्त नेता पाला बदलते हुए गहलोत की तरफ़ झुकते चले गए थे. लेकिन पायलट इसमें नाकाम रहे और शायद अब उन्हें इस बात का ही ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.’(satyagrah)


13-Jul-2020 8:00 PM

पुष्य मित्र

उत्तर बिहार में बाढ़ की आशंकाओं के बीच कुछ ज्ञान की बातें

1. यह सच है कि उत्तर बिहार में बाढ़ नेपाल और उत्तरी बंगाल से आने वाली नदियों में पानी की मात्रा बढ़ जाने के कारण आती है।

2. गजानन मिश्रजी के मुताबिक नेपाल से इस वक्त 206 जलधाराएं बिहार में प्रवेश कर रही हैं। इनमें घाघरा, गंडक, बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला, बलान, कोसी आदि नदियां प्रमुख हैं, शेष छोटी छोटी जलधाराएं हैं। उत्तरी बंगाल यानी सिलिगुडी से महानंदा और डोंक नदी किशनगंज के इलाके में प्रवेश करती हैं।

3. ये सभी हिमालयी नदियां हैं। पहाड़ पर जब भारी बारिश होती है तो ये नदियां पहले नेपाल में उफनती हैं फिर उत्तर बिहार के इलाकों में फैलती है।

4. हिमालय के इलाके में वनों की कटाई के कारण अपरदन यानी मिट्टी का कटाव बढ़ा है, जिससे इन नदियों का पानी तेजी से बिहार आने लगा है और पिछले कुछ वर्षों में गाद भी भारी मात्रा में लाने लगा है।

5. बिहार सरकार ने अपनी लगभग तमाम नदियों को तटबंध से घेर दिया है, इसलिए गाद का फैलाव नहीं हो पा रहा है और यह नदी की पेटी में ही जमा हो रहा है, जिससे नदियां उथली हो जा रही हैं।

6. नदियों के उथले होने के कारण अब उनमें अधिक मात्रा में पानी रखने की जगह नहीं है। इसके अलावा तटबंधों के कारण बड़ी नदियों का अपनी सहायक नदियों से और चौरों से सम्पर्क कट गया है।

7. पहले जब तटबंध नहीं थे तो पानी अधिक होने पर नदियां अपना सरप्लस पानी सहायक नदियों और चौरों को दे देती थी अब उसे इस अधिक पानी को कहीं फैलाने का रास्ता नहीं मिलता जिस वजह से बाढ़ आना अवश्यंभावी हो जाता है। इसलिये हाल के दिनों में बाढ़ बढ़े हैं।

8. काश हम इस अतिरिक्त पानी को गर्मी के मौसम के लिये कहीं सहेज कर रख पाते, यह नदियों को सहायक नदियों, चौरों, तालाबों से जोडऩे से मुमकिन हो सकता था। मगर हमारे जल संसाधन या जल शक्ति विभाग के पास इसकी कोई योजना नहीं है। उनका पूरा जोर बरसात के मौसम में उफनती नदियों के पानी को सुरक्षित तरीके से समुद्र तक पहुंचा देने में रहता है। इसलिये वे लगातार तटबंध को मजबूत करने में जुटे रहते हैं।

9. अगर बहुत कुछ वे करेंगे तो इस पानी को नहरों में डाल देंगे। मगर इस मौसम में जब खेत ही डूबे हैं तो नहरों के पानी की जरूरत किसे हैं।

10. सारांश यह है कि बाढ़ का पानी जो आज खतरा लग रहा है वह वरदान हो सकता है, अगर हम बड़ी नदियों को फिर से उनकी सहायक नदियों से जोड़ सकें, जो सम्पर्क पिछ्ले दिनों टूट गया है। सूखे पड़े कांवर लेक को और ऐसे कई बड़े तालाबों को नदियों से जोड़ सकें, या नदियों के किनारे बड़े तालाब बने। फिर हम इस मौसम में आये जल रूपी धन का संचय कर पायेंगे। ऐसे में बाढ़ का खतरा भी कम होगा और गर्मियों में होने वाले जल संकट से भी निजात मिलेगा।

11. बाढ़ खतरा नहीं है अगर हम इस दौरान आये अधिक जल के संचय के लिये सही बर्तन का इन्तजाम कर लें।

(और हां, इस भ्रम का निवारण कर लें, नेपाल किसी बराज से पानी नहीं छोड़ता। नेपाल से बिहार आने वाली सिर्फ दो नदियों गंडक और कोसी पर बराज है। दोनों का संचालन बिहार के जल संसाधन विभाग के हाथों में है। वे अपनी सहूलियत से पटना से आदेश मिलने पर ही बराज का फाटक खोल कर पानी छोड़ते हैं। इसलिये बाढ़ के वक्त ‘नेपाल ने पानी छोड़ा’ जैसे जुमले का इस्तेमाल करने से बचें। हां सिलिगुडी में महानंदा पर जरूर बराज है और बंगाल सरकार बिना बताये पानी छोड़ दिया करती है।)

 

 

 


13-Jul-2020 7:59 PM

पवन वर्मा

ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित गल्प या उपन्यासों के साथ अमूमन यह सवाल जुड़ा रहता है कि उन्हें कितना सच माना जाए और कितना मिथकीय। खासतौर पर जब कोई रचना हाल ही की किसी त्रासदी से जुड़ी हो और मामला धार्मिक गुटों से संबंधित हो। ऐसे में इस पर सवाल खड़े होने और विवादों की गुंजाइश और बढ़ जाती है। हालांकि आश्चर्यजनक रूप से 1974 में जब भीष्म साहनी का उन्यास ‘तमस’ आया तो उस पर कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ। यह उपन्यास भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था औऱ इसमें दंगों के पीछे हिंदू-मुस्लिम कट्टरपंथियों की भूमिका का बेहद वास्तविक चित्रण था। इसके बावजूद यह उपन्यास न सिर्फ जल्दी ही हिंदी की सबसे अच्छी कृतियों में शामिल हो गया बल्कि खासा लोकप्रिय भी हुआ।

1987-88 में गोविंद निहलानी ने इसी उपन्यास और साहनी की दो और कहानियों पर आधारित ‘तमस’ नाम से ही एक टेलीफिल्म बनाई थी। जनवरी, 1988 में धारावाहिक के रूप में जब इस टेलीफिल्म का पहला भाग दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ तो इस पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। यह वही दौर था जब राजनीति में कट्टर हिंदूवादी विचारधारा हावी हो रही थी। इस धारावाहिक पर भाजपा का कहना था कि दूरदर्शन को तुरंत ही इसका प्रसारण बंद करना चाहिए क्योंकि इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आर्यसमाज को धार्मिक उन्मादी बताकर इतिहास को विकृत करने की कोशिश की गई है। वहीं कुछ मुस्लिम समूहों का आरोप था कि ‘तमस’ में उनके समुदाय की बर्बर छवि दिखाई गई है।

वामपंथियों और उदारवादियों के साथ विद्यार्थियों का एक बड़ा तबका ऐसा भी था जो पूरी तरह ‘तमस’ के प्रसारण के पक्ष में था। राजनीतिक गलियारों में जब यह विवाद बढ़ता जा रहा था उसी समय बंबई उच्च न्यायालय में धारावाहिक का प्रसारण बंद करवाने के लिए एक याचिका दायर की गई। इसके पक्ष में अदालत में तर्क दिए गए कि ‘तमस’ का प्रसारण आम लोगों के मानस में पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है। साथ ही हो सकता है कि इससे फिर दंगे जैसे हालात बन जाएं।

राजनीतिक विवाद और धार्मिक गुटों की संवेदनशीलता को देखते हुए यह प्रकरण तुरंत ही मीडिया में सुर्खियां बनने लगा। जब इस मामले पर अदालत का फैसला आया तो यह एक ऐतिहासिक फैसला साबित हुआ। बंबई उच्च न्यायालय में जस्टिस लैंटिन और सुजाता मनोहर की पीठ ने तमस के प्रसारण पर रोक संबंधी याचिका खारिज करते हुए फैसला दिया कि यह एक त्रासदी का विश्लेषण है। इसमे दिखाया गया है कि कैसे कट्टरपंथी दंगों को भडक़ाते हैं। फैसले में दोनों जजों ने आगे यह भी जोड़ा कि इसका प्रसारण आने वाली पीढिय़ों के लिए एक सबक होगा।

इस विवाद से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि दूरदर्शन ने बाद में तमाम तरह के दबावों और विरोधों के बावजूद ‘तमस’ के पूरे आठ भागों का प्रसारण किया था। ओमपुरी और दीपा साही के जीवंत अभिनय और गोविंद निहलानी के सधे हुए निर्देशन वाला यह धारावाहिक उस समय काफी लोकप्रिय भी हुआ। इसे दूरदर्शन के सबसे यादगार धारावाहिकों में गिना जाता है। (सत्याग्रह)


13-Jul-2020 7:57 PM

संजय श्रमण

दलित या ओबीसी युवा एक बहुत बड़ा और निर्णायक काम कर सकते हैं। और यह काम भारत की दिशा बदल सकता है।

आप पिछली पीढ़ी को भूल जाइए, आप अपने जीवन में अपनी दिनचर्या में अगर अन्धविश्वासी धर्म और भेदभाव भरी व्यवस्था से दूरी बना लेते हैं तो आधे से अधिक काम अपने आप हो जाएगा।

आपको इस सड़ी-गली व्यवस्था में जीने के लिए कोई मजबूर नहीं कर रहा है।

आपके अपने परिवार में आप पूजा पाठ भजन कीर्तन करेंगे या नहीं करेंगे ये आपका अपना निर्णय है। कोई आपके सर पर बंदूक रखकर नहीं मजबूर कर रहा है।

आपके बच्चे और स्त्रियां धार्मिक सीरियल कार्टून और प्रवचन देखेंगे या नहीं-ये आपका निर्णय है।

आपके घर में अनपढ़ और धूर्त धर्मगुरु या पंडित आकर कर्मकांड करेगा या नहीं-ये आपका निर्णय है। आपके बच्चे आसमान की तरफ मुंह उठाकर भगवान या देवता से मदद की भीख मांगेंगे या अपनी मेहनत और बुद्धि से अपना भविष्य बनायेंगे-ये आपका निर्णय है।

आपके बच्चे आपस में एक दूसरे से इंसानों की तरह पेश आयेंगे या एकदूसरे को छोटी बड़ी जाति का समझकर लड़ेंगे-ये आपका निर्णय है।

ऐसे और बहुत से छोटे-छोटे कदम हैं जो पूरी तरह आपके हाथ में हैं। आप सामूहिक या संगठित क्रान्ति का इंतजार मत कीजिये। अभी आज से ही अपना व्यवहार बदल दीजिये।

अगर आप ये कर पाते हैं तो दुनिया की कोई ताकत आपको और आपके समाज को ज्यादा समय तक पिछड़ा बनाकर नहीं रख सकती।

आप दलित हैं, दमित हैं और पिछड़े हैं क्योंकि आपने दलन दमन और पिछड़ापन पैदा करने वाला धर्म, कर्मकांड, व्यवहार और मानसिकता खुद अपने हाथ से पकड़ रखी है।

आप जब चाहें इन चीजों को छोडक़र आजाद हो सकते हैं।

आपने खूंटा पकड़ रखा है, खूंटे ने आपको नहीं पकड़ा है।


13-Jul-2020 7:54 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

इन दिनों मुसीबतों के कई छोटे-मोटे बादल भारत पर एक साथ मंडरा रहे हैं। कोरोना, चीन और तालाबंदी की मुसीबतों के साथ-साथ अब लाखों प्रवासी भारतीयों की वापसी के आसार भी दिखाई पड़ रहे हैं। इस समय खाड़ी के देशों में 80 लाख भारतीय काम कर रहे हैं। कोरोना में फैली बेरोजगारी से पीडि़त सैकड़ों भारतीय इन देशों से वापस भारत लौट रहे हैं। यह उनकी मजबूरी है लेकिन बड़ी चिंता का विषय यह है कि इन देशों के शासकों पर दबाव पड़ रहा है कि वे विदेशी कार्मिकों को भगाएं ताकि स्थानीय लोगों के रोजगार में बढ़ोतरी हो सके।

इन देशों के कई उच्चपदस्थ शेखों से आजकल जब मेरी बात होती है तो वे यह कहते हुए पाए जाते हैं कि उनके बच्चे अभी-अभी विदेशों से पढक़र लौटे हैं लेकिन अपने ही देश में सब अच्छी नौकरियों पर विदेशियों ने कब्जा कर रखा है। इस प्रपंच पर इधर सबसे पहले ठोस हमला किया है, कुवैत ने। कुवैत में कुवैतियों की संख्या सिर्फ 13 लाख है जबकि वहां आजकल 43 लाख लोग रहते हैं याने विदेशियों की संख्या तीन गुनी है। कुवैत में कुवैतियों से ज्यादा भारतीयों की संख्या है। वह है, 15 लाख ! कुवैती प्रधानमंत्री शेख अल-सबाह का कहना है कि कुवैत में विदेशी 30 प्रतिशत रहें और 70 प्रतिशत कुवैती ! यह आदर्श स्थिति होगी। यदि इसी सोच के आधार पर कुवैती संसद ने कानून बना दिया तो 7-8 लाख भारतीयों को अपनी नौकरियां छोडक़र भारत आना पड़ेगा।

ये भारतीय अभी अकेले कुवैत से लगभग 5 बिलियन डॉलर हर साल भारत भिजवा देते है।। यदि कुवैत ने सख्त निर्णय कर दिया तो उसे देखकर बहरीन, यूएई, सउदी अरब, ओमान, कतर आदि देश भी वैसी ही घोषणा कर सकते हैं। यदि ऐसा हो गया तो 40-50 लाख लोगों को भारत में नौकरियां कैसे मिलेंगी और कुछ को मिल भी गईं तो उनको उतने पैसे कौन दे पाएगा ? अकेले केरल से 21 लाख लोग खाड़ी-देशों में गए हुए हैं। इसमें शक नहीं कि कोरोना के संकट के कारण इन अति-संपन्न राष्ट्रों की अर्थ-व्यवस्थाएं भी संकट का सामना कर रही हैं लेकिन उनको इतनी समझ तो होनी चाहिए कि प्रवासी भारतीयों को ही सबसे ज्यादा श्रेय इस बात का है कि उन्होंने अपने खून-पसीने से इन देशों की अर्थ-व्यवस्थाओं को सींचा है।

इसके अलावा क्या इतनी बड़ी संख्या में भारतीयों के हटने से इन देशों की अर्थ-व्यवस्थाएं बुरी तरह से लंगड़ाने नहीं लगेंगी ? खाड़ी के शेख जरा यह भी सोचें कि वहां भारतीय लोग जिस तरह के छोटे-से-छोटे काम भी खुशी-खुशी करते हैं, क्या अरब लोग करना पसंद करेंगे ? इस तरह के आनन-फानन फैसलों से ये देश अपने लिए तो संकट खड़े करेंगे ही, भारत के लिए भी नया सिरदर्द  पैदा कर देंगे। (nayaindia.com)

  (नया इंडिया की अनुमति से)


13-Jul-2020 12:35 PM

-विष्णु नागर

जिस दिन यह टिप्पणी लिख रहा हूँ उस दिन पता नहीं क्यों सुबह से ही हेमंत कुमार का गाया और बचपन में और विशेषकर स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर कई बार सुना यह गाना मन में बारबार गूँजता रहा- ‘इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के’। कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं है इसका, फिर भी न जाने क्यों मेरे साथ उस दिं ऐसा हुआ। ऐसा भी नहीं है कि इसे पहली बार रेडियो या टीवी पर सुना हो, इसलिए यह मन में गूँज रहा हो। कभी-कभी मेरे साथ ऐसा होता है। कभी मौका मिला तो ऐसी चीजें यू ट्यूब पर सुन लेता हूँ हालांकि उसे कई-कई बार सुनकर भी मन नहीं भरता लेकिन आज इस गाने के मन में गूँजने का कारण क्या यह है कि मैं किसी संयोग से अपने बचपन में लौट आया हूँ? लगता तो नहीं मगर पता नहीं। 1961 में जब दिलीप कुमार-वैजयंती माला की फिल्म ‘गंगा जमुना’ आई थी-जिसका यह गाना है- तब मैं 11 साल का था और मेरे कस्बे में फिल्म का प्रचार करने के लिए स्थानीय अमीन सयानी साहब नई आई फिल्म की खूबियों का बखान करते हुए गली-गली में तांगे में घूमा करते थे। वे थे, तो लगभग अनपढ़ मगर फिल्म के प्रचार का अंदाज उनका इतना जोरदार होता था कि ऐसा हो नहीं सकता था कि उनके प्रचार के बाद कोई सड़ी से सड़ी फिल्म देखने से भी अपने को बचा पाए।

तब पता नहीं था कि यह गाना सुकूनभरी और भरोसा दिलानेवाली आवाज में किसने गाया है और इसे लिखा किसने है, उस उम्र में यह जानने की उत्सुकता भी नहीं होती थी लेकिन शायद हेमंत कुमार की आवाज से भी ज्यादा या यूं कहें कि उनकी आवाज के साथ शकील बदायूंनी के ये बोल बहुत अपील करते थे, इसलिए भी कि यह गाना खासकर बच्चों को संबोधित था। तब स्कूलों में पंडित नेहरू को चाचा नेहरू कहलवाया जाता था और नारा लगवाया जाता था- चाचा नेहरू जिंदाबाद। मुझे तब सचमुच लगता था कि नेहरूजी मेरे चाचा हैं, भले ही मैंने उन्हें दूर से भी कभी देखा नहीं था और शाजापुर जैसे छोटे से पिछड़े कस्बे में उनके आने की कोई उम्मीद भी नहीं थी। जब नेहरूजी नहीं रहे तो पड़ोसी के रेडियो पर उनकी शव यात्रा का वर्णन सुनकर मैं खूब रोया था-शायद किसी नेता के लिए पहली और आखिरी बार। तब लगता था कि जैसे यह गाना नेहरूजी की ओर से हमें दिया गया संदेश है, इसलिए बहुत द्रवित करता था।

अभी-अभी फिर से इसे सुना तो यह गाना फिर से बहुत अच्छा लगा, जबकि पंडित प्रदीप के लिखे और लता मंगेशकर द्वारा गाये जिस गाने को सुनकर नेहरू खूब रोये थे- ‘ओ मेरे वतन के लोगो जरा आँख मे भर लो पानी’ वह गाना न तब मुझे अपील करता था, न अब, जबकि उसी दौरान हुए चीनी हमले के समय मैंने अपने तीन-चार दोस्तों के साथ जूते पालिश करके सेना के जवानों के लिए चंदा जमा करके राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में जमा किया था। पिछले न जाने कितने वर्षों से देशभक्ति के बहुत से गीत फालतू लगने लगे हैं। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा-मोती’ टाइप गीत तो क्षमा कीजिए न तब बर्दाश्त होते थे, न अब। मनोज कुमार ने भावुकताभरी फिल्मी देशभक्ति से नाम बहुत कमाया मगर उनकी सिनेमाई देशभक्ति कभी अच्छी नहीं लगी। उसके बाद भी नकली देशभक्ति का व्यावसायिक उछाल बहुत आता रहा, जिसने चिढ़ को और बढ़ाया ही।

बहरहाल ‘जब इन्साफ की डगर पे’ गीत प्रचलित था, उस दौर में जो बच्चे थे या किशोर थे, उनमें से कई आज इस देश के भाग्यविधाता बने हुए हैं। उस दौर के मोदीजी तो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। इन सबने मिलकर देश को जहाँ पहुँचा दिया है, उस जगह पर आकर आज के बच्चों को यह गीत शायद हास्यास्पद ही लगेगा और वे कहेंगे कि क्या पापा (मम्मी) आप बोर कर रहे हो। इस गाने में शकील बदायूं ने नेहरू युग के स्वप्नों, आकांक्षाओं को पिरोया है। इस गीत से पता चलता है कि तब नेता होना गंदी बात नहीं मानी थी, इसीलिए शायद बच्चों से कहा गया है- ‘नेता तुम्हीं हो कल के’। आज तो फिल्मी गानों में भी नेता बनने की बात व्यंग्य में ही कही जा सकती है। आज नेता गली-गली में हैं, उन्होंने डटकर-बेखटके कमाया है, खूब ठाठ हैं उनके, वे चुनाव भी बार-बार जीत जाते हैं मगर जनता के मन में उनके प्रति धेलेभर की भी इज्जत नहीं है। उस दौर के जिन बच्चों से शकील बदायूंनी और हेमंत कुमार ने ‘इन्साफ की डगर पे’ चलने की उम्मीद की थी, उनके लिए जुल्म की डगर पर चलना ही असली इन्साफ है, सच्चाइयों के बल पे आगे बढऩे की जिनसे उम्मीद आशा थी, वे झूठ और बेईमानी का हाथ मजबूती से पकड़ चुके है। जिन्हें संसार को बदलना था, उन्हें संसार ने बदल दिया है पूँजी की सेवा करने के लिए।जिन्हें तनमन की भेंट देकर भारत की लाज बचाना था, वे अपनी इज्जत लुटाने में लगे हैं। अपनों के लिए तो ठीक है मगर परायों के लिए, सबके लिए, न्याय की बात करना उनके लिए असंभव है। इन्सानियत के सर पर इज्जत का ताज नहीं कचरा रखा जा रहा है। बहुत कुछ इस बीच खो गया है, इसलिए इस बीच यह गीत भी खो गया है और इन्साफ की डगर भी।


13-Jul-2020 12:17 PM

साल का पेड़ और उसके पत्ते कई राज्यों के आदिवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसे सराई का पेड़ भी कहते हैं, जिसकी छत्तीसगढ़ में बहुत उपयोगिता है। लोग इस पेड़ को पूजनीय मानते हैं। यह पेड़ बहुत बड़ा होता है और इसकी लकड़ी बहुत भारी होती है। इसलिए इसका उपयोग घर की कई चीज़ों को बनाने के लिए किया जाता है। चाहे घर में लगाने के लिए लकड़ी हो (कड़ेरी) या दरवाज़े और खिड़कियां बनानी हों, इस लकड़ी से हर तरह का सामान बनाया जाता है। घर में लकड़ी जलाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। इन सब उपयोगिताओं में से और एक उपयोगिता यह है कि साल के पत्तों से दोना और पत्तल बनाए जाते हैं। 

छत्तीसगढ़ में पत्तल में खाना खाया जाता है और इसे यहां पत्री बोलते हैं। इसमें सब्ज़ी भी रखी जाती है, जिसे दोना कहते हैं। दोना और पत्तल बनाने के लिए साल के वृक्ष से पहले पत्ते तोड़कर लाते हैं। बांस की लड़की भी लाई जाती है, जिसे पतले-पतले हिस्सों में काट लेते हैं। यह बांस के टुकड़े धागे का काम करते हैं और इसी से साल के पत्तों को सिलाया जाता है। दोना को बड़ा बनाते है ताकि भोजन ना गिरे। दोना की सिलाई ऐसे ही होती है। 

ऐसे पत्तों से बने दोना पत्तल का फायदा यह है कि ये पत्ते गाँव के जंगलों में आसानी से मिल जाते हैं जिन्हें घर पर बना सकते हैं। यह बनाने के लिए हुनर और मेहनत की ज़रूरत होती है। आदिवासी बखूबी अपने आसपास के मिलने वाले सामग्रियों का उपयोग करना जानते ही हैं। यह पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि इससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता है। खाना खाने के बाद सभी दोना पत्तल को एक जगह इकट्ठा करते हैं और यह बरसात के दिनों में सड़कर खाद बन जाता है। इस खाद का उपयोग लोग अपने खेतों में करते हैं।

सरकार को भी दोना-पत्तल को आगे बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि शहरों और प्रकृति के संतुलन के लिए ये अच्छा विकल्प है।

इसका उपयोग बड़े पैमाने पर त्यौहारों और शादियों में भी किया जाता है, जहां मेहमानों की अधिक संख्या के साथ-साथ कचरा भी ज़्यादा होने की सम्भावना होती है। बाज़ार से थालियां खरीदने के बदले में लोग साल के ये दोने और पत्तल बनाना पसंद करते हैं। बाज़ार से ये चीज़ें खरीदना महंगा काम है और दोना-पत्तल से पैसे भी बच जाते हैं। आज की प्लास्टिक की दुनिया में लोग कई इलाकों में प्लास्टिक के छोटे-छोटे बर्तन खरीदते हैं। इससे पर्यावरण, पशुओं, नदियों के साथ-साथ हमारी भी हानि होती है। ऐसे लोगों को जो प्लास्टिक इस्तेमाल करते हैं, गाँव वालों से सीखना चाहिए कि हम अपने जीवन पर्यावरण की सुरक्षा के हिसाब से कैसे जिएं। 

कई आदिवासी गाँवों में यह परंपरा होती है कि अगर गाँव में कोई काम होता है, चाहे वह किसी के घर में शादी हो या त्यौहार या कुछ बनाना हो, पूरा गाँव मदद करने के लिए हाज़िर होता है। चाहे लकड़ी लाना हो, चाहे पत्तल तोड़ना हो या कुछ और। गाँव के सभी लोग इसमें निपुण होते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग एक-दूसरे की मदद करते आ रहे हैं।

सरकार को भी दोना-पत्तल को आगे बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि शहरों और प्रकृति के संतुलन के लिए ये अच्छा विकल्प है। लोग प्लास्टिक से बने बर्तनों का उपयोग करते हैं। अगर हम गाँवों में दोना-पत्तल का उत्पादन करते हैं, तो इसे गाँव के लोगों को भी रोज़गार मिल सकता है। सरकार को गाँव के लोगों को ट्रेनिंग देने की ज़रूरत है ताकि गाँव जागरूक होकर अपने पैरों पर खड़ा हो सके। इसके अलावा प्लास्टिक के बर्तनों पर कड़ाई से प्रतिबंध लगाना चाहिए और उसे लागू करना चाहिए जिससे हमारा पर्यावरण भी बचा रहे और हम भी बचे रहें।

यह लेख राकेश नागदेव ने लिखा है, जो छत्तीसगढ़ से हैं और इस लेख को इससे पहले आदिवासी लाइव मैटर में प्रकाशित किया जा चुका है।

(hindi.feminisminindia)


13-Jul-2020 10:25 AM

-डॉ. ललित कुमार 

हम इस समय कोरोना लॉकडाउन के 100 दिन की दहलीज को पार कर चुके हैं। इस दहलीज सेजब हम लॉकडाउन के अतीत पर नज़र डालते हैं तो पाते हैं कि पूरे विश्व में कोरोना का कहर अभी भी लगातार जारी है। जहां दुनिया के 215 देश कोरोना संक्रमितहो चुके हैं, वहीं सभी देशों के लिए यह दौर एक बेहद चुनौतीपूर्ण है। हर देश अपने-अपने तरीके से इससे बचने के लिए वैक्सीन की खोज करने में लगे हैं, लेकिन अभी तक इसके कोई भी ठोस प्रमाण निकलकर सामने नहीं आए, ताकि गर्व से कहा जा सके कि हमने इसका इलाज खोज निकाला है। कोरोना महामारी जहां पूरे विश्व में अपना कहर बरपा रही है, वहीं प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ से यह मानवता को सचेत करने का भी मौका दे रही है। इस महामारी में प्राकृतिक आपदाओं का लगातार एक साथ आना चिंता का विषय तो है ही, लेकिन हमारे लिए एक सीख भी है, जो हमें संकेत कर रही है कि अगर हम अभी न संभले तो कभी नहीं संभल सकते। इस विषय पर लिखने से पहले मेरे मन में बहुत से विचार आये। जिनके सवालों के जवाब ढूंढ पाना मुश्किल हो गया था कि आखिर कैसे अचानक दुनिया की अर्थव्यवस्था जहां अपनी गति से आगे बढ़ रही थी, वहीं उस पर लॉकडाउन की ऐसी चोट पड़ी कि वह एकदम से धराशाही हो गई। जब चीन के वुहान शहर से शुरू हुए कोरोना वायरस की ख़बरों को देखते- सुनते और पढ़ते थे तो लगता था कि यह कोई छोटी-मोटी बीमारी होगी, जो जल्दी ही नियंत्रण में कर ली जाएगी। लेकिन जैसे-जैसे इस वायरस ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेना शुरू किया तो लगा कि ये बीमारी नियंत्रण के बाहर है। लेकिन अब यह बीमारी पूरे भारत में अपने पैर पसार चुकी है। 30 जून 2020 के अपराह्न 7.30 बजे तक भारत में 5 लाख 85 हज़ारसे अधिक लोग संक्रमित हुए और मौतों की संख्या का आंकड़ा 17 हज़ार के पार जा पहुंचा।

Worldometer वेबसाइट के आंकड़ें बताते हैं कि कोरोना संक्रमित देशों की सूची में टॉप पर क्रमशः अमेरिका, ब्राज़ील, रूस और भारत हैं। अमेरिका और ब्राज़ील देशों की हालात बाकी दोनों देशों की तुलना में बहुत खराब है। भारत में 24 मार्च 2020 से लगने वाले लॉकडाउनके चार चरणों के साथ ही अनलॉक 1.0 के 100 दिन 4 जुलाई को पूरे हुए। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हमने लॉकडाउन और अनलॉक के दौरान अब तक क्या खोया और पाया! भारत में संपूर्ण लॉकडाउन का असर पूरे देश में देखने को मिला, जिसे आंकड़ों के ज़रिए समझने की ज़रूरत है कि भारत में लॉकडाउन के दौरान जो मृत्यु दर 15 अप्रैल 2020 को 3.41 फीसदी थी, वहीं 01 जून 2020 तक घटकर वह 2.82 फीसदी तक आ गई। लेकिन इसे अगर पूरी दुनिया के हिसाब से समझा जाये, तो यह प्रति एक लाख संक्रमण पर मृत्यु दर 5.97 फीसदी रही, वहीं फ्रांस में 18.9 फीसदी, इटली में 14.3 फीसदी, यूके में 14.12 फीसदी, स्पेन में 9.78 फीसदी और जबकि बेल्जियम में 16.21 फीसदी लॉकडाउन के दौरान हुई। प्रथम चरण के लॉकडाउन में भारत में मरीजों के ठीक होने की दर 7.1 फीसदी थी, जबकि वहीं चौथे चरण में यह दर 41.61 फीसदी हो गई यानी ये आंकडे कहीं न कहीं देश के प्रति एक आत्मविश्वास पैदा करने वाले रहे हैं। 

जब देश में लॉकडाउन को चार चरणों में बांटा गया तो इसके पहले और चौथे चरण के दौरान भारत की सबसे बदहाल तस्वीर ऐसे समय में उभरकर सामने आई, जब करोड़ों श्रमिक अपनी बदहाली को कन्धों पर ढोकर घरों की ओर निकल पड़े थे। जिसमें पहला लॉकडाउन 25 मार्च से 14 अप्रैल 2020 तक रहा, जिसमें आवश्यक वस्तुओं की सेवाओं को छोड़कर पूरा देश पूरी तरह से बंद रहा। दूसरा लॉकडाउन 15 अप्रैल से 3 मई 2020 तक रहा, जिसमें संक्रमित मामलों के आधार पर देश को तीन जोन यानी रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन में बांटा गया। तीसरा लॉकडाउन 4 मई से 17 मई तक रहा, जिसमें जोन के हिसाब से दुकानें खुली और कुछ रियायतें भी दी गई। जिसमें जान के साथ जहान को भी प्राथमिक दी गई। चौथा और अंतिम लॉकडाउन 18 मई से 31 मई तक रहा, जिसमें स्कूल, शोपिंग मॉल, धार्मिक स्थल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल को छोड़कर हर किसी क्षेत्र में छूट दी गई। विश्व में सबसे ज्यादा लॉकडाउन लगाने वाले देशों की सूची में इटली पहले नंबर पर आता हैं। जहां 10 मार्च से 03 मई तक लॉकडाउन लगा रहा, लेकिन इटली में 31 मई तक 33 हज़ार 354 मौतों हुई, जिसमें 2 लाख 32 हज़ार 979 लोग संक्रमित हुए। वहीं भारत में 31 मई तक 5408 मौतें हुई और 01 लाख 90 हज़ार 609 लोग संक्रमित हुए। सबसे लंबा लॉकडाउन लगाने वाले शहरों में फिलीपिंस की राजधानी मनीला का नाम आता है। जहां कुल मौतों में 73 फीसदी अकेले मनीला शहर में हुई। मनीला में लॉकडाउन जबकि 76 दिनों तक चला।

भारत का आलम ये है कि पिछले 01 जून से 01 जुलाई 2020 तक के बीच कोरोना मरीजों की संख्या 5 गुना से ज्यादा बढ़ी है। देश में अगर ऐसे ही हालात रहे तो कोरोना संक्रमितों का आंकड़ाकहां तक पहुचेगा,कुछ कहा नहीं जा सकता। लॉकडाउन के चार चरण खत्म होने के बाद भारत में अनलॉक का पहला चरण 01 जून 2020 से लागू किया गया। अनलॉक का निर्णय ऐसे समय में लिया गया,जब देश में बढ़ती बेरोजगारी के साथ देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने और बाज़ारों में दुकानों को अल्टरनेटिव तरीके से खोलने का प्रयास किया गया यानी अनलॉक का मुख्य आधार देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से गति देना रहा। जब लॉकडाउन था तो यह व्यवस्था पूरी तरह से धराशाही थी लेकिन अब फिर से इसको गति देने का काम अनलॉक करेगा। वहीं देश के सामने सबसे बड़ी चिंता कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में होने वाली बढ़ोतरी को लेकर भी है। जहां संपूर्ण लॉकडाउन के बाद से संक्रमित मरीजों की संख्या का ग्राफ तेजी से बढ़ा है, जो कि एक चिंता का विषय है। अनलॉक1.0 की पूरी प्रक्रिया संपूर्ण लॉकडाउन से एकदम भिन्न थी। वह रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक था। जिसमें दिन के समय बाज़ार, मॉल और परिवहन सुविधाओं के साथ सामाजिक दूरी को ध्यान में रखकर आने जाने की छूट दी गई।

देश में कोरोना वायरस के मामलों की बढ़ती रफ्तार के बीच अब 01 जुलाई 2020 से अनलॉक 2.0 की शुरुआत हो चुकी है। केंद्र सरकार के दिशा निर्देश के अनुसार ये फेज़ 01 जुलाई से लेकर 31 जुलाई तक चलेगा। करीब चार महीने तक देश में लॉकडाउन रहा और उसके बाद फेज़ के हिसाब से देश को अनलॉक किया जा रहा है। अनलॉक 1.0 में काफी गतिविधियों में छूट मिली थी, जिसके बाद अब अनलॉक 2.0 में इसे बढ़ाया गया है। अब रात को 10 बजे से सुबह 5 बजे तक नाइट कर्फ्यू रहेगा। पहले ये रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक था। अनलॉक 2.0 में फ्लाइट और ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाएगी, दुकानों में 5 लोग से ज्यादा भी जुट सकते हैं लेकिन इसके लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखना होगा, 15 जुलाई से केंद्र और राज्य सरकारों के ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में कामकाज शुरू हो जायेगा। स्कूल-कॉलेज 31 जुलाई तक बंद रहेंगे। साथ ही मेट्रो रेल, सिनेमा हॉल्स, जिम, स्वीमिंग पूल, एंटरटेनमेंट पार्क, थिएटर, ऑडिटोरियम और असेंबली हॉल ये सब बंद रहेंगे।

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर फिच, क्रिसिल और आरबीआई संस्थाओं का ताज़ा अनुमान है कि वित्त वर्ष 2020-21 में यह माइनस में जा सकती है। भारत के जीडीपी की ग्रोथ रेट जिन राज्यों में 60 फीसदी है, वे राज्य रेड और ऑरेंज जोन में रहे। वहां पर लॉकडाउन के सख्ती की वजह से कारोबार पूरी तरह से ठप रहा, इसलिए ऐसे में उन राज्यों की ग्रोथ रेट को पटरी पर वापस लाना पहले की अपेक्षा थोड़ा मुश्किल होगा। अब आइये नज़र डालते हैं, विश्व में लॉकडाउन नहीं लगाने वाले देशों पर, जहां अर्थव्यवस्था सबसे बुरे दौर से गुजरी है- 

अमेरिका- अमेरिका में 30 जून 2020 तक 27 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित और 01 लाख 29 हज़ार से ज्यादा लोगों की मौतें हो चुकी हैं, जोकि कोरोना संक्रमित देशों की सूची में पहले नंबर पर आता है। यहाँ लॉकडाउन को आंशिक रूप से लगाया गया। लोगों की यहां जान भले ही न बचाई जा सकी हो लेकिन तमाम रेटिंग एजेंसी अमेरिका की जीडीपी -5.9 फीसदी रहने का अनुमान लगा रही है।

ब्राज़ील-ब्राज़ील में 30 जून 2020 तक 13 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए और 58 हज़ार से अधिक मौतें अब तक हो चुकी हैं। ब्राज़ील की सरकार हमेशा से लॉकडाउन के खिलाफ रही है, जो कोरोना संक्रमित देशों की सूची में दूसरे नंबर पर आता है। ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था इस वक़्त सबसे ख़राब दौर में है, जहां 4.7 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है, जो कि 100 सालों की सबसे बुरी अर्थव्यवस्था साबित होगी।

स्वीडन- स्वीडन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के चक्कर में लॉकडाउन नहीं लगाया। देश में कोई पाबन्दी भी नहीं लगायी। साथ ही मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्री सेक्टर भी बंद नहीं किए। इसलिए वहां के हालात काबू में नहीं आ सके। स्वीडन के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यहां का निर्यात 10 फीसदी गिरा। जिसके कारण वर्ष 2020 के आउटपुट में गिरावट आएगी। स्वीडन की आबादी के हिसाब से यहां संक्रमित लोगों की संख्या और मौतों का आंकड़ा बेहद डराने वाला रहा है।

जापान- जापान में लोगों के आने जाने के लिए कोई पाबन्दी नहीं लगायी गई। यहाँ की अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही। होटल, मॉल और रेस्तरां खुले रहे। लोगों की आवाजाही पर नजर नहीं रखी गई। यहाँ हालात जब बेकाबू हुए तो देश के प्रधानमंत्री को आनन-फानन में इमरजेंसी लगानी पड़ी। लेकिन अर्थव्यवस्था में तेजी से गिरावट देखी गई। जापान में निवेश कमजोर हुआ तो यहां का आयात भी गिरा। जिसके कारण पीएम ने एक ख़राब डॉलर का आर्थिक पैकेज दिया, यानी फिर भी जापान की अर्थव्यवस्था सबसे बुरे दौर में है।

चीन- चीन का लॉकडाउन वुहान शहर पर केंद्रित रहा ताकि चीन की अर्थव्यवस्था कमजोर न हो, वर्ष 1952 से चीन को दुनिया का ग्रोथ इंजन कहा गया, लेकिन कोरोना के बावजूद पहली बार चीन की तिमाही ग्रोथ रेट माइनस में गई यानी जीडीपी में 6.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

भारत फिर भी इन देशों की अपेक्षा जान बचाने में कामयाब तो रहा। लेकिन अर्थव्यवस्था कोई भी देश नहीं बचा पाया। भारत पर लॉकडाउन की मार सबसे बुरे दौर से गुजरी है। जिस वजह से चारों ओर मायूसी छाई रही। सड़कें सूनी, बाज़ारों की रोनक एक तरीके से अँधेरे में तब्दील हो गई साथ ही देश की अर्थव्यवस्था से लेकर कृषि, शिक्षण संस्थान, रोजगार, पर्यटन, चिकित्सा, पर्यावरण और जातीय व्यवस्था तक पर इसका असर देखा गया। अब इसके कुछ विविध आयामों को बिन्दुवार समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर कहां लॉकडाउन से नुकसान हुआ और कहां फ़ायदा हुआ- 

अर्थव्यवस्था- कोरोना के चलते जो हालात अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में देखे गये, उसने देश के सामने कई गंभीर चुनौती खड़ी की। कोरोना काल में पूरे देश का सिस्टम धराशाही हुआ तो लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। यानी इस दौर में देश की जनता के सामने एक साथ कई संकट आये। जिसके कारण देश का गरीब मजदूर और किसान बहुत दुखी हुआ। साथ ही देश के कामगार तबकों पर लॉकडाउन की ऐसी मार पड़ी कि काम धंधे सब बंद होने से उन्हें अपने घरों की ओर हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा करके पलायन करना पड़ा। जिस वजह से देशके गरीब श्रमिकों की मौत रास्ते में ही हो हुई। कोरोना वायरस से 30 जून 2020 के अपराह्न 7.30 बजे तक विश्व में 01 करोड़ 57 लाख से अधिक लोग संक्रमित हुए। जिसमें 50 लाख 72 हज़ार से ज्यादा लोगअपनी जान गवां चुके हैं। भारत में भी अब तक 5 लाख 85 हज़ार से अधिक मरीजों की पुष्टि हो चुकी है। जिसमें 17 हज़ार 410 लोग अपनी जान गवां चुके हैं। हमने देशव्यापी चार लॉकडाउन का सामना किया और अब हम अनलॉक1.0 और 2.0 के दौर में हैं, लेकिन अनलॉक के कारण देश की अर्थव्यवस्था में थोड़े बहुत सुधार होने के संकेत जरूर  मिल सकते हैं। 

कृषि- देश में कोरोना का संकट ऐसे समय में आया, जब देश में रबी की फसल कड़ी थी यानी भारत का किसान पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था और फिर लॉकडाउन के कारण खेतों में खड़ी फसल सही समय पर मंडी में नहीं पहुंच पायी। इसलिए कोरोना महामारी किसानों के लिए एक नई मुसीबत बनाकर उभरी है। लॉकडाउन की वजह से देश का खुदरा बाज़ार, शोपिंग मॉल और कुटीर उद्योग से लेकर बड़े औद्योगिक क्षेत्र पर कोरोना का असर देखा गया। किसानों की परेशानी को समझते हुए केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के तीसरे चरण में कुछ छूट दी गई ताकि किसानों की फसल सही समय पर मंडी में पहुंच सके। सरकार द्वारा मंडी, खरीद एजेंसियों, खेतों से जुड़े कामकाज और भाड़े पर कृषि संबंधित सामान को अंतरराज्यीय परिवहन द्वारा लॉकडाउन से मुक्त करा दिया गया। केंद्र सरकार ने किसानों की परेशानी को देखते हुए मोबाइल गवर्नेंस की दिशा में ‘किसान रथ मोबाइल ऐप’ के ज़रिए एक पहल शुरू की। जिसमें किसानों को मंडी भाव सहित किराये पर परिवहन सुविधा के लाभ इस ऐप के ज़रिए मिला। 31 मई के बाद से देश में अनलॉक 1.0 और अब अनलॉक 2.0 के तहत कृषि बाज़ार व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में कृषि विकास दर तीन फीसदी से कम रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए अब 15 फीसदी कृषि विकास दर की जरूरत होगी जो असंभव है। हकीकत यह है कि डीजल और उर्वरकों के महंगे होने से कृषि लागत बढ़ी है। आय के अभाव में ग्रामीण मांग लगातार कमजोर बनी हुई है। इसका अर्थव्यवस्था पर चैतरफा असर पड़ रहा है, विशेषकर मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र पर जो मौजूदा आर्थिक सुस्ती का एक बड़ा कारण है।

चिकित्सा- इस समय कोरोना वायरस ने पूरे विश्व में कोहराम मचा रखा है। लेकिन भारत में भी कोरोना महामारी ने बड़ी तेजी से अपने पैर पसार लिए है। वैश्वीकरण के दौर में आजकल के वायरस इतने ताकतवर हैं कि जिनके इलाज को खोजने के लिए वर्षों लग जाते हैं। कोरोना इसी का एक उदाहरण है। मेरे ध्यान में नहीं आता कि भारत ने कभी किसी महामारी की दवा को दुनिया भर में उपलब्ध कराया हो या उपलब्ध कराने के गंभीर प्रयास किए गए हों। लेकिन वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए हमें किसी देश की तरफ अब हाथ फैलकर बैठने की ज़रूरत नहीं है कि वे हमारे लिए कोई मदद करेंगे या हमारी समस्याओं को हल करेंगे। इसीलिए स्वदेशी चिकित्सा पद्धति में न केवल अनुसंधान की जरूरत है, बल्कि पुरातन भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में भी शोध की दरकार है। कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए हमें अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक मजबूत बनाने की ज़रूरत है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि जिला स्तर के सार्वजनिक अस्पतालों को एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के रूप में विकसित किया जाये ताकि ग्रामीण लोगों को सभी प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकें। जिससे मरीजों को सही समय पर इलाज मिलना संभव होगा और साथ ही बड़े अस्पतालों में मरीजों के दबाव भी कम होंगे।

शिक्षा- कोरोना महामारी के खतरे को भांपते हुए केंद्र सरकार ने संपूर्ण भारत में 24 मार्च से 31 मई 2020 तक लॉकडाउन लगाया यानी 67 दिनों की अवधि में लॉकडाउन और अब 01 जून से 31 जुलाई 2020 तक अनलॉक के कारण सारे स्कूल, कॉलेज व उच्च शिक्षण संस्थान बंद पड़े हैं। ऐसे में इसका सीधा असर अध्यापकों और विद्यार्थियों के जीवन पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना महामारी से भारत में लगभग 32 करोड़ छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई है। जिसमें 15.81 करोड़  लड़कियां और 16.25 करोड़ लड़के शामिल हैं। वैश्विक स्तर की बात करें तो यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार 14 अप्रैल 2020 तक अनुमानित रूप से दुनिया के 193 देशों के 157 करोड़ छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई है। हालांकि कुछ स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालयों ने जूम, हैंगआउट गूगल मीट, माइक्रोसॉफ्ट टीम और स्काइप जैसे प्लेटफॉर्मों के साथ-साथ यू-ट्यूब और व्हाट्सएप आदि के माध्यम से ऑनलाइन शिक्षण के विकल्प को अपनाया है, जो ऐसे में इस संकट-काल का एकमात्र रास्ता है। लेकिन ऑनलाइन शिक्षा का कुछ क्षेत्रों में इस प्रकार से महिमामंडन किया जा रहा है कि मानो हमारी शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या का समाधान इसमें छिपा है। क्या सचमुच ऑनलाइन शिक्षा देश की सारी शैक्षिक जरूरतों का हल है? क्या ऑनलाइन शिक्षा कक्षीय शिक्षा का समुचित विकल्प है और क्या ये भारतीय परिवेश के अनुकूल है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के साथ यह समझना भी जरूरी होगा कि शिक्षा के उद्देश्य क्या हैं? फिर भी ऑनलाइन शिक्षा को अगर एक रामबाण के रूप में पेश किया जा रहा है तो उसकी वजह या तो लोगों की आधी-अधूरी समझ है या शिक्षा को मुनाफा कमाने का धंधा मानने वाली मानसिकता है। यानी ऑनलाइन शिक्षा के सबसे बड़े प्रवक्ता निजी क्षेत्र के संस्थान ही हैं। लेकिन अकादमिक जगत में इसे लेकर ज्यादा उत्साह नहीं है। 

परिवहन- ट्रैफिक, कोरोना वायरस के फैलने का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। लॉकडाउन के चलते सभी सड़कें खाली रही और विमान, ट्रेनों का यातायात भी ठप्प रहा। लॉकडाउन जैसे ही खुला सड़कों पर ट्रैफिक पहले की अपेक्षा कम दिखा है, लेकिन इस वायरस के चलते लोगों में चेतना ज़रूर आई है। इसलिए अब बेवजह लोग अपने घरों से बहार नहीं निकलते हैं। शायद बेवजह सड़कों पर निकलने वाली भीड़ वायरस के फैलने का मुख्य कारण बन सकती है। इसलिए दुनिया भर के ट्रैफिक साइंटिस्ट बताते हैं कि कैसे सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करते हुए यातायात को जारी रखा जा सकेगा। अब लोग ज्यादा अपने वाहन को प्राथमिकता देंगे क्योंकि यह संक्रमण से बचने का एक बेहतर तरीका होगा साथ ही सार्वजनिक परिवहन को ज्यादा साफ बनाना होगा। बस स्टॉप, बस डिपो और मेट्रो स्टेशन हर जगह को सैनेटाइज किया जाए, साथ ही वाहनों को भी सैनेटाइज किया जाए। अब रेलवे स्टेशन पर स्क्रीनिंग की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे मरीजों की पहचान हो सके। परिवहन व्यवस्था में सोशल डिस्टैंसिंग के चलते ओला-ऊबर जैसी सेवाओं में ड्राइवर और यात्री के बीच के संपर्क को खत्म कर दिया जाए। हाल में कोरोना वारियर्स के लिए शुरू की गई टैक्सी सेवा में यह प्रयोग शुरू हुआ है। इसमें प्लास्टिक के जरिए चालक और यात्री के बीच डिस्टैंसिंग की कोशिश की गई है। सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करते हुए पैदल चलना यातायात का सबसे सुरक्षित तरीका है। इसलिए इस पर भी जोर देना होगा। फुटपाथ को इतना चौड़ा किया जाए कि लोग एक मीटर की दूरी के नियम का पालन करते हुए सड़कों पर चल सकें। लॉकडाउन के बाद का वक्त पेडेस्ट्रियन और साइकिलिंग को बढ़ावा देने का है। कई शहरों में इसके लिए अर्बन प्लानिंग में बदलाव शुरू भी हो गये हैं। साइकिल में सोशल डिस्टैंसिंस का सबसे ज्यादा पालन होता है। इसलिए भारत में भी इस बदलाव की शुरुआत पोस्ट कोरोना लॉकडाउन काल के लिए ट्रैफिक को लेकर हो चुकी है। 

पर्यटन- पर्यटन उद्योग ने कोरोना की मार से हजारों करोड़ के नुकसान की आशंका जाहिर की है। कन्फेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) की पर्यटन समिति ने कोरोना महामारी के पर्यटन उद्योग पर पड़ने वाले असर का आंकलन करके बताया है कि मार्च से अब तक कई भारतीय पर्यटन स्थलों पर बुकिंग का कैंसिलेशन लगभग 90 फीसदी तक बढ़ चुका है। यानी कुल मिलाकर घरेलू और विदेशी पर्यटकों के कारण इस बाजार पर असर पड़ा है। पर्यटन उद्योग से जुड़े होटल, ट्रैवेल एजेंट, पर्यटन सेवा कंपनियों, रेस्तरां, विरासत स्थल, क्रूज, कॉरपोरेट पर्यटन और साहसिक पर्यटन इत्यादि उद्योग भी इससे प्रभावित हुए हैं। अक्टूबर से मार्च के बीच भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की वार्षिक संख्या 60-65 फीसदी होती है। भारत को विदेशी पर्यटकों से लगभग 28 अरब डॉलर से अधिक की आय होती है। कोरोना महामारी की खबरें नवंबर से आना शुरू हुईं और इसके बाद से यात्रा टिकटों और होटल बुकिंग इत्यादि का कैंसिलेशन शुरू हुआ। सीआईआई का कहना है कि भारत सरकार द्वारा वीजा रद्द करने से यह स्थिति और भी 'बदतर' हुई है। भारत में लॉकडाउन के चार चरण खत्म होने के बाद 25 मार्च से बंद पड़े स्मारकों को अनलॉक में सरकार ने 15 जून से पर्यटक स्थलों को खोलने की बात कही। तभी से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे लेकर दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है, ताकि पर्यटकों को स्मारकों का भ्रमण कराने के साथ ही कोरोना वायरस से उनका बचाव हो सके। 

पर्यावरण- कोरोना वायरस के कहर की वजह से दुनिया भर की औद्योगिक गतिविधियां पूरी तरह से ठप्प रही और भारत सहित कई देशों में लॉकडाउन लगाया गया। इससे पर्यावरण को भी फायदा पहुंचा है। पिछले कई दशकों से पृथ्वी की रक्षा कर रही ओजोन परत को जो उद्योगों से नुकसान पहुंचा है, उसमें कमी आने से इसकी हालत में काफी सुधार हुआ है। ओजोन परत को सबसे ज्यादा नुकसान अंटार्कटिका के ऊपर हो रहा था। ‘नेचर’ में प्रकाशित ताजा शोध के अनुसार, जो केमिकल ओजोन परत के नुकसान के लिए जिम्मेदार थे, उनके उत्सर्जन में कमी होने के कारण यह सुधार देखा गया है। मोट्रियल प्रोटोकॉल (1987) समझौते के मुताबिक इस तरह के केमिकल्स के उत्पादन पर बैन लगाया था लेकिन इन हानिकारक कैमिकल्स को ओजोन डिप्लीटिंग पदार्थ (ODS) कहा जाता है। इन पदार्थों की कमी की वजह से दुनिया भर में सकारात्मक वायु संचार बना हुआ है, जिसका असर एंटार्टिका के ऊपर वाले वायुमंडल के हिस्से में भी हुआ है।हाल ही में भारत सहित विश्व के अन्य हिस्सों में लॉकडाउन के दौरान प्रकृति और पर्यावरण के बीच बहुत से बदलाव देखे गये। जिसमें ‘अम्फान’ और ‘निसर्ग’ जैसे चक्रवाती तूफ़ान के साथ साथ बेमौसम बारिश और भूकम्प के झटकों की वजह से पूरे देश में भय का माहौल बना रहा। वैज्ञानिक इस मामले में अभी कोई जल्दबाजी में नहीं दिखाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि जब औद्योगिक गतिविधियां शुरू होंगी,तब फिर से बड़े पैमाने पर कार्बन डाइ ऑक्साइड और अन्य ओडीएस का उत्सर्जन शुरू होगा और फिर शायद यह पहले की स्थिति न लौट आए। पर्यावरण को इसका कितना फायदा पहुंचा है, इसका आंकलन अभी नहीं हो पा पाया है। फिलहाल सभी का ध्यान दुनिया भर में फैले कोरोना वायरस के खतरे से बचाव पर है। दुनिया भर के शोधकर्ता इस संकट से निपटने के लिए दिन रात लगे हैं, लेकिन दुनिया भर में हो रही प्राकृतिक गतिविधियों पर वैज्ञानिकों की नजरें जरूर हैं।

मीडिया- आज अगर इतने न्यूज़ चैनल न होते तो हम कोरोना जैसी महामारी से कैसे लड़ते? लॉकडाउन को नीचे तक कैसे ले जा पाते? इतिहास गवाह है कि 1894 में जब प्लेग की महामारी चीन के युन्नान से शुरू होकर भारत में फैली, तब जनता उससे कितनी अनजान थी और इसीलिए भारत उस बीमारी का आसानी से शिकार भी बना। कोरोना काल में मीडिया से हमारा मतलब सिर्फ खबर चैनलों से नहीं है। बल्कि सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया से भी है।अपने यहां चौबीसों घंटे समाचार देने वाले भारतीय भाषाओं के सैकड़ों चैनल न होते तो कोरोना से लड़ने में ‘लॉकडाउन’ को सफलतापूर्वक लागू करने में क्या-क्या दिक्कतें आतीं, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कब, क्या करें और क्या न करें? घर में बंद रहें या बाहर निकलें। ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ करें और मुंह पर ‘मास्क’ पहनें या ‘गमछा’ या रूमाल लपेटें। हाथ धोते रहें। डरने की जरूरत नहीं। आस्था रखें,ऐसे संदेश घर-घर तक पहुंचाये गये। इसलिए‘लॉकडाउन’ को डब्लूएचओ तक ने सराहा है। लेकिन ‘कोरोना’ के खतरे ने देश को एक सूत्र में पिरो दिया है। हां! प्रिंट मीडिया पर ज़रूर संकट मंडराया है। इसका कारण है प्रिंट मीडिया का ज्यादा‘फिजीकल’होना। बिजनेस बंद होने से उनके विज्ञापन के साथ-साथ उसके पेज भी कम हुए हैं। पाठक ‘डिजिटल पेपर’ या ‘ई-पेपर’ की ओरज़रूर हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया का जो हिस्सा किसी तरह अपने को बचाए हुए है, वह प्रशंसा का पात्र है। यकीनन जब हालात सामान्य होंगे तो एक फिर बार प्रिंट मीडिया में वैसे ही उभार दिखेंगे, जैसा कि आपातकाल के बाद देखने को मिला था।

जातीय व्यवस्था-कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाउन के कारण पूरे देश के सामने जो आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था की नकारात्मक तस्वीरें सामने आईं, जिसमें कहीं न कहीं जाति, धर्म व क्षेत्र के आधार पर शोषण का शिकार होना पड़ा। लॉकडाउन की मार सबसे अधिक गरीब दलित-आदिवासी मजदूर पर पड़ी, जो रोजी-रोटी के लिए एक शहर से दूसरे शहरों में जाकर काम की तलाश करता है। भारत में जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई, तभी से उनके सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया था। जब वे लॉकडाउन के दौरान पैदल ही अपने घरों की ओर  निकल पड़े, तो क्वारंटाइन में जातीय मतभेद देखने का मिला यानी संकट की इस घडी में हमें कई बार इंसानियत के नाते एक दूसरे के मदद की बहुत ज़रूरत होती है। जिसमें पुराने मतभेदों को भुलाकर विपरीत परिस्थितियों से लड़ना पड़ता है लेकिन हमारे देश में जातीय व्यवस्था का इतिहास एक रेखीय नहीं है। कई बार बुरे वक़्त में व्यक्ति, समाज और देश का जब सबसे बुरा पक्ष उभरकर सामने आता है तो ऐसे में मानवता के बीच की खाई और भी चौड़ी हो जाती है, जो पहले से समाज में मौजूद होती है। कोरोना के समय में जहां सब फील गुड जैसा फील हो रहा है, वहां सब सकारात्मक ख़बरें टीवी न्यूज़ चैनल, रेडियो और प्रिंट मीडिया के माध्यम से लिखी जा रही हैं और पूरे राष्ट्र ने ऐसे लोगों का स्वागत भी किया। लेकिन ऐसे समय में देश का दलित-आदिवासी और शोषित वर्ग कोरोना महामारी के चलते दम तोड़ता रहा, जिनके सामने रोजी-रोटी का सवाल सबसे पहले था और इस दौर में इंसानियत, समाज और देश के कुछ नकारात्मक पहलू भी हमारे सामने उभरकर आये हैं।

                                              
 डॉ. ललित कुमार
अतिथि अध्यापक, जनसंचार विभाग, क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

ई-मेल आईडी : medialalit@gmail.com 


13-Jul-2020 8:33 AM

-आकार पटेल

संयुक्त राष्ट्र ने शासन के जिन सिद्धांतों को परिभाषित किया है उसके मुताबिक सभी व्यक्ति, संस्थान और संस्थाएं (निजी और सार्वजनिक) और सरकार भी उन कानून के तहत प्रतिबद्ध है जो सार्वजनिक तौर पर बनाए गए हैं, समान रूप से लागू हैं और स्वतंत्र रूप से उनका न्याय कर सकते हैं और इनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और मानकों का पालन होता है।

भारत कानून पर आधारित एक देश है हमारे संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है, "कोई भी व्यक्ति कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार अपने जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं होगा।" सरकार इसके पालन के लिए कानूनन बाध्य है। इस नियम को तोड़ना, कानून को तोड़ना और अपराध करना है।

लेकिन आज भारत में जो हो रहा है वह कानून का राज नहीं है। हम एक कानून विहीन देश हो गए हैं, और मैं ऐसा सिर्फ गुस्से या हताशा में नहीं कह रहा हूं। मैं ऐसा अपने आसपास होने वाली घटनाओँ के आधार पर ऐसा कह रहा हूं। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर संगीन से संगीन अपराध से भी दोषमुक्त होता रहा वह आत्मसमर्पण करता है और इससे पहले कि वह कुछ राज खोलता पुलिस हिरासत में ही उसे गोली मार दी जाती है। उस पर संविधान के मुताबिक मुकदम नहीं चलाया जाता और किसी भी प्रक्रिया को अपनाए बिना ही उसे मृत्युदंड दे दिया जाता है।

लेकिन सिर्फ यही एक आधार नहीं जिसके कारण में देश को काननू विहीन कह रहा हूं। उत्तर प्रदेश में हुआ यह कोई पहला एनकाउंटर नहीं है। योगी आदित्यनाथ ने जब से उत्तर प्रदेश की कमान संभाली है तब से राज्य में 119 ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं और हजाओं घटनाएं अन्य जगहों पर हुई हैं। और आने वाले समय में भी होती ही रहेंगी। एक पिता और उसके बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने अपनी दुकान खोल रखी थी। ऐसा सिर्फ भारत में हो रहा है। दूसरे कानून विहीन देशों में भी ऐसा होता है, यह भी सत्य है। जिन लोगों के हाथ में सत्ता है वे कानून विहीन देशों में ऐसा करते रहेंगे।

लेकिन भारत जैसे देश में सरकार तक को कानून के बारे में जानकारी नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार ने एक कानून बनाकर गाय-भैंसों की मांस के लिए बिक्री पर रोक लगा दी। मोदी जी गाय से प्रेम करते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता है कि उनके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है। कारण, यह मामला संविधान के मुताबिक राज्यों का अधिकार है न कि केंद्र सरकार का। लेकिन कानून बनाते समय केंद्र सरकार को यह पता नहीं था। और, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर इशारा किया तो इस कानून को वापस ले लिया गया।

कानून विहीन देशों में ऐसा ही होता है। सरकारों को कानून की ही जानकारी नहीं है तो वे खुद कानून का पालन कैसे करेंगी? कई बार राज्य सरकारों को भी नहीं पता होता है, और कुछ मामलों में तो सुप्रीम कोर्ट को कानून की जानकारी नहीं होती। ओडिशा ने एक कानून बनाकर 1967 में धर्मपरिवर्तन पर रोक लगा दी। लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन था। संविधान सभा में हुई बहसों के साफ जाहिर है कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म परिवर्तन की गारंटी दी गई है। ओडिशा हाईकोर्ट ने इस कानून को खारिज कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तर्कहीन आधार पर हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि कम से कम दस राज्यों में ऐसा कानून बन गया और यूपी ऐसा करने वाला 11वां राज्य है।

योगी आदित्यनाथ इस बात को जानकर चौंक उठेंगे कि उन्होंने राज्य की पुलिस को जो करने का निर्देश दिया वह संविधान के मुताबिक एक अपराध है और उन्हें इसकी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन मोदी की ही तरह वह भी ऐसा सोचते हैं कि गाय वाला कानून बनाकर वह सही कर रहे हैं क्योंकि भारतीय संस्कृति तो यही है।

कानून विहीन देशों और राज्यों में ऐसा होता रहता है। अदालतें बेकार हो चुकी हैं, जजों को कानून की पूरी जानकारी नहीं है, निचली अदालतें राष्ट्र द्रोह जैसे मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को नहीं मान रही हैं, विधायक मिलते नहीं हैं, निर्वाचित प्रतिनिधि कानून का पालन नहीं करते और पुलिस किसी की भी हिरासत में हत्या कर देती है।

ऐसा होता है, और यही नया भारत है।(navjivan)


13-Jul-2020 8:26 AM

पुलिस न्यायपालक की बजाय उत्पीड़क 

-मृणाल पाण्डे

संवैधानिक लोकतंत्र का मतलब क्या है? एक ऐसा लोकतंत्र जहां जनता की चुनी विधायिका संविधान में उल्लिखित अधिकारों और कर्तव्यों की पृष्ठभूमि में कानून का पालन सबके लिए एक जैसा जरूरी बनाए। भय बिनु होय न प्रीति के अनुसार, कानून किताबों तक ही सिमटा न रहे बल्कि जमीन पर लागू होता और दिखता भी रहे, इसी के लिए दंड विधान के हथियार से लैस सरकारी पुलिस बल की संकल्पना भी गई। औपनिवेशिक भारत में पुलिस थाने जनता की जरूरतों से नहीं उपजे थे बल्कि विदेशी हुक्मरानों की ताकत के प्रतीक की बतौर कायम किए गए थे। इसलिए यातना देकर सच (या झूठ) उगलवाना पुलिसिया प्रणाली का एक भाग बन गया जो अब तक त्यागा नहीं गया है। इस तरह अंग्रेज हमको जाते-जाते एक सुसंगत न्याय प्रणाली और पुख्ता अदालतें भले दे गए हों, पर जनता के प्रति खुद को जवाबदेह मानने वाली ईमानदार पुलिस हमको उनसे विरासत में नहीं मिली। पर आजादी के 70 बरसों में हर रंग की सरकारें आईं और गईं, हम फिर भी पुलिस को अधिक न्याय प्रिय, अधिक ईमानदार और जनता के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं बना पाए?

हाल में उत्तर प्रदेश के एक दुर्दांत अपराधी विकास दुबे और उसके लोगों द्वारा आठ पुलिस वालों की सरेआम हत्या करके फरार हो जाना दिखाता है कि हमारे यहां अपराधियों के दिल में पुलिस का भय लगभग मिट चला है। जो ब्योरे प्रकाश में आए हैं, वे दिखा रहे हैं कि एक जमाने में जहां पुलिस अपने मुखबिरों के नेटवर्क की मदद से अपराधियों की पकड़-धकड़ करती थी, अब पुलिस के कई थानों के अधिकारी खुद बड़े अपराधियों के मुखबिर बनकर उनको अपने इलाके की पुलिस द्वारा दबिश की पूर्व सूचना पहुंचा कर फरार होने में मदद कर रहे हैं। पूछने पर पुराने बड़े अफसर भी इसकी तसदीक करते हैं कि पिछले कुछ दशकों से देश के लगभग हर राज्य में जनता के लिए पुलिस बार-बार न्यायपालक की बजाय उत्पीड़क की भूमिका में सामने आने लगी है।

यह सही है कि राजनीतिक सरपरस्ती के दबाव से कई बार जानकारी होते हुए भी पुलिस को ज्ञात अपराधियों की तरफ तोता-चश्मी अख्तियार करनी पड़ती है। पर इसकी वसूली वह कस कर आम जनसे क्यों करती है? जनता, खास कर औरतों, दलितों और अल्पसंख्यकों को आज अपनी पुलिस खौफ का पर्याय नजर आती है। उधर जीवन में (और फिल्मों में भी) राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी पुलिस या विधायक जी से कई बार करीबी दोस्तों की तरह बरताव करते दिखते हैं। इस विभाजित मानसिकता की ही वजह से अधिकतर थाने हैवानियत के गढ़ बन गए हैं। यकीन न हो तो आम लोगों से पूछिए जिनको हमारी जेल के तीन महीनों की बजाय थानों में पूछताछ के तीन दिन और अदालती चक्कर इतने भयावह लगते हैं कि अधिकतर कमजोर वर्गों के लोग रपटें दर्ज कराने के लिए थाना-कचहरी जाने से झिझकते हैं। नेशनल कैंपेन अगेन्स्ट टॉर्चर संस्था के अनुसार, 2019 में पुलिस हिरासत में 1,723 मौतें हुईं। इनमें से 125 मामलों के अध्ययन से उनका निष्कर्ष है कि अधिकतर (94 फीसदी) मौतें उत्पीड़न से हुई लगती हैं।

कभी सबकी खबर देने और सबकी खबर लेने का दावा करता रहा मुख्यधारा मीडिया इन दिनों या तो गोदी मीडिया बनकर सुरक्षित बन गया है या फिर छंटनियों से बेतरह असुरक्षित है। दोनों स्थितियों में विशुद्ध खोजी रपटें देने से वह बचता रहता है जब तक कि वे विपक्ष के खिलाफ न हों। विधायक के सरेआम कत्ल (ताजा मामला बागपत का है) जैसी स्टोरी भी जब मीडिया में उभरती है, तो कुछ घंटों के लिए पुलिस सुधारों पर हमारे खबरिया चैनलों और संपादकीय पन्नों में कई (1977-81 तक बैठी पुलिस कमीशन या 99 की रिबेरो कमिटी या 2000 की पद्मना भैया कमिटी या 2006 की प्रकाश सिंह कमिटी के) प्रस्तावित पुलिस सुधारों के लंबित रहने और पुलिस के राजनीतिकरण पर चर्चे गरम होते हैं। फिर बातचीत किसी और मुद्दे पर मोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया और गैर सरकारी जनसेवी संस्थाओं में लाख खोट हों, उनका बड़े से बड़ा आलोचक भी यह मानता है कि वे आज जनता को (और अखबारों को भी) मुख्यधारा के बहुसंख्य गोदी मीडिया की तुलना में जान पर खेल कर भी प्रशासकीय अन्याय, भ्रष्टाचार और अत्याचार के सचित्र जमीनी ब्योरे लगातार देती रहती हैं। नतीजतन हाल के महीनों में, खासकर जब से महामारी निरोधक-2005 का कानून और सख्त बनाया गया है, मीडिया कर्मियों पर पुलिस का कोप बार-बार कई राज्यों में कहर बनकर टूट रहा है। जानने के हक और उस पर मंडराते खतरों पर शोध कर रही दिल्ली की संस्था (राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस) का आकलन अभी एक प्रतिष्ठित डिजिटल खबरिया पोर्टल पर छपा है। उसके अनुसार, तालाबंदी यानी 25 मार्च से 31 मई के बीच पत्रकारों के खिलाफ 22 प्राथमिकियां दर्ज कराई गईं। 55 पत्रकारों को या तो अपनी खबरों को लेकर कानूनी नोटिस मिला है या उनसे पुलिस ने पूछताछ की है और 10 को हिरासत में लिया गया। विडंबना यह कि लगभग सारी रपटें व्यवस्था की खामियों को उजागर कर रही थीं जिनका खुद सरकार और स्थानीय प्रशासन को संज्ञान लेकर समुचित कार्रवाई करनी चाहिए थी। अगर वे गलत साबित हों तो बहुत अच्छा लेकिन अगर सच हैं तो उनसे कई सामान्य लोगों पर खतरा बनता है। एक रपट तालाबंदी के दौरान अभयारण्य में वन तस्करी बढ़ने पर थी। दो मामलों में पत्रकारों के फेसबुक के वीडियो पर प्राथमिकी दर्ज हुई जो तालाबंदी के दौरान जिलों में राशन व्यवस्था की गड़बड़ियों पर थे। एक पत्रकार ने सरकारी हस्पतालों में कोविड के सुरक्षा उपकरणों पर सवाल उठाए तो उससे स्पेशल टास्क फोर्स ने पूछताछ की। स्थानीय मुसहरों द्वारा तालाबंदी के दौरान भुखमरी की रपट पर मालिक और पत्रकार- दोनों को सराहना की बजाय जिले के डीएम की तरफ से कारण बताओ नोटिस आ गया।

इन बातों के उजास में विकास दुबे जैसे 50 से अधिक मामलों के आरोपी द्वारा की गई आठ पुलिस कर्मियों की नृशंस हत्या का मामला जैसे-जैसे बढ़ रहा है, बरसों से चली आई उसकी नाना राजनीतिक दलों, स्थानीय पुलिस और प्रशासन से नजदीकियां और जनता की उपेक्षा भी सामने ला रहा है। कोई व्यक्ति पुलिस की वर्दी पहनकर बाहर आता है, तो उससे उम्मीद बनती है कि अब वह जाति, धर्म या इलाकाई कबीलावादी आग्रहों से परे रहेगा। होता इसके उलट है क्योंकि हमारी राजनीति में कबीलावादी आग्रह लगातार बढ़ रहे हैं। चूंकि भर्ती से लेकर प्रोन्नति तक सब कुछ जाति, धर्म और सत्तारूढ़ दल के इलाकाई सरोकारों से तय होता है, इसलिए जो लोग सत्तारूढ़ दल के आग्रहों से बाहर हैं, उनको कमतर नागरिक मानकर उनसे दुर्व्यवहार करने की एक अलिखित खुली छूट वर्दीधारियों को मिल जाती है।

यहां पर पुलिस की भीतरी दारुण दशा पर भी लिखना ही होगा। आखिर, कोविड के दौरान इसी बल ने मानवीयता और करुणा की मिसालें भी दी हैं और फ्रंटफुट पर काम करते हुए उनमें से कई शहीद भी हुए हैं। इसलिए उनको दोष देकर यह फाइल बंद नहीं की जा सकती। दो मान्य जनसेवी संस्थाओं- कॉमन कॉज और लोकनीति द्वारा जारी रपट के अनुसार, 2012- 16 के बीच देश के कुल पुलिस बलों के 6.4 हिस्से को सेवा अवधि के दौरान दोबारा ट्रेनिंग मिल पाई थी। कोविड के बीच भी शुरू में जब उनको मुहल्लों की पहरेदारी दी गई तो अधिकतर को न तो जरूरी रक्षा उपकरण दिए गए और न ही रोग की बाबत जानकारी कि संक्रमण से खुद वे किस तरह बचें।

रखवालों की रखवाली के कुछ मान्य नियम-कायदे हर लोकतंत्र के विधान में बनाए गए हैं। हर बदलाव के साथ उनमें और उसी के साथ-साथ उनको लागू कराने वालों में समय-समय पर तरमीम करते रहना भी प्रशासन का एक बुनियादी उसूल है। कोविड की शुरुआती दौर की चूक में इसी वजह से कई पुलिसवाले काल कवलित हुए। इससे पहले रेप और समलैंगिकता के कानूनों में वक्त के मुताबिक बदलाव लाते हुए भी सभी सरकारी सशस्त्रबलों को कानून की सही जानकारी और कामकाज की व्यावहारिक शैली की बाबत लगातार समयानुसार प्रशिक्षण मिले और उनके कामकाज करने के तरीकों ही नहीं, उनकी मानसिक दशा की भी प्रोफेशनल पड़ताल भी हो। यह सनातन सवाल है। रोमन कवि जुवेनाल ने सदियों पहले पूछा था- कानून के रखवालों की रखवाली कौन कानून करता है?(navjivan)


13-Jul-2020 8:17 AM

 क्या ऑनलाइन शिक्षा की आड़ में किया जा रहा है धंधा !

-रजीउद्दीन अकील

कोरोना महामारी के डर के कारण पूरे देश में छोटे बच्चों के स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में ऑनलाइन पढ़ाई होने लगी है। बाजार की शक्तियों द्वारा तय एजेंडे को सरकार से लेकर शिक्षा के सभी स्तरों के प्रशासन तक पूरा करने में लगे हैं। यह सब तब है जबकि डिजिटल विभाजन हर जगह है और कई जगह तो परिवारों के पास संतुलित, हाई स्पीड इंटरनेट या अपेक्षित डिवाइस भी नहीं हैं। चूंकि पढ़ाई और परीक्षाओं की निश्चित डेडलाइन हैं, इसलिए उन्हें पूरा करने के खयाल से ईमेल अटैचमेंट के तौर पर हजारों असाइनमेंट शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच जा-आ रहे हैं। भारत के लोग होशियार हैं और किसी भी स्थिति का सामना जुगाड़ से कर लेते हैं। असाइनमेंट पूरा कर शिक्षकों को जो मेल किए जा रहे हैं, वे आम तौर पर ‘हाथ से लिखे स्कैन्ड उत्तर’ होते हैं और वे भी दूसरों के ईमेल एड्रेस से। इन सबको लेकर किसी तरफ से कोई शिकायत होती भी नहीं दिख रही है।

चूंकि कोई नियमित परीक्षा नहीं हो सकती इसलिए विश्वविद्यालय किताब खोलकर परीक्षा देने-जैसी ऑनलाइन/ऑफलाइन तौर-तरीके आजमा रहे हैं। इसमें किसी विषय की परीक्षा तीन घंटे में तो होती है- इसी अवधि में प्रश्न डाउनलोड करने होते हैं और उनके उत्तर अपलोड किए जाते हैं। अगर ईमेल काम नहीं कर रहे हैं, तो यह विकल्प भी आजमाया जा रहा है कि सेमेस्टर के अंत में होने वाली परीक्षाओं को असाइनमेंट के तौर पर दे दिया जाए और उनके उत्तर कुरियर से मंगवाए जाएं। उन लोगोंकी प्रशंसा करनी चाहिए जो जरूरत होने पर कमजोर नेटवर्क के बाद भी कनेक्ट हो जा रहे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अपने कच्चे मकान की छत या किसी पेड़ पर चढ़ जाना पड़े!

कैसे-कैसे जुगाड़ किए जा रहे, उसके कुछ उदाहरण जानने-देखने चाहिएः

शिक्षक किसी पेड़ की डाल या मचान पर चढ़कर नेटवर्क से कनेक्ट हो रहे हैं और क्लास ले रहे हैं।

विद्यार्थी और शिक्षक पड़ोसियों से डाटा उधार ले रहे हैं। बंगाल में अम्फान चक्रवात के बाद ऐसा खास तौर से देखा गया।

नेटवर्क कनेक्शन वाले एक ही लैपटॉप या मोबाइल फोन का इस्तेमाल बच्चे, उनके अभिभावक और यहां तक कि उनके रिश्तेदार भी ऑनलाइन क्लास के लिए कर रहे हैं।

इस तरह, महामारी के बावजूद, यथाशीघ्र विभिन्न कोर्सों को पूरा करने और परीक्षाएं संचालित करने के आदेश दिए गए हैं ताकि अगले सेमेस्टर के लिए एडमिशन बिना विलंब पूरे किए जा सकें। इन सबको युद्धस्तर पर पूरा करने की जल्दबाजी है और फिर भी लगता नहीं कि महामारी की वजह से पैदा हुए संकट से उबरने के लिए ये सब अस्थायी उपाय हैं। कोरोना का खौफ रहे या नहीं, लगता है, हम नए चलन के तौर पर पूरी तरह अराजनीतिक डिस्टेंस लर्निंग की लंबी अवधि में जा रहे हैं।

कोरोना का भय और सोशल डिस्टेन्सिंग ऑनलाइन पढ़ाई के मापदंड का बहाना बन गया है। इसका मतलब है, विद्यार्थियों को कैंपस में आने की अनुमति नहीं होगी- आखिर, विद्यार्थी अधिकारवादी शासन के खिलाफ हर जगह दृढ़ता से खड़े भी हो रहे थे। यह भी उतना ही आश्चर्यजनक, असंगत और परस्पर विरोधी है कि वैसे शिक्षक जो वैसे तो ऑनलाइन टीचिंग और परीक्षाओं का विरोध कर रहे थे, वे भी वेबिनार और इन्स्टाग्राम शो में अचानक काफी सक्रिय हो गए हैं। लाइव कैमरे के सामने कुछ मिनट की प्रसिद्धि क्या सचमुच इतनी आकर्षक है कि दीर्घावधि वाले असर पर विचार भी नहीं किया जा रहा है? यह खास तौर पर भारत में हो रहा है। अमेरिका समेत कई देशों से संकेत मिल रहे हैं कि शिक्षक और छात्र क्लासरूम शिक्षा की ओर वापस आने को आतुर हैं, जूम पर कुछ हफ्तों ने ही ऑनलाइन शिक्षा के लालच से लोगों को मुक्त कर दिया है। लग रहा है कि अगला सेमेस्टर देर से शुरू होगा और जब इसकी शुरुआत होगी, तो यह (लंबे क्लास के लिए) ऑनलाइन और (छोटे सेमिनारों के लिए) सामान्य का मिश्रण होगा। ऐसा आने वाले महीनों में होना चाहिए और वह भी कोविड-19 की स्थिति देखकर, न कि अंधाधुंध डिजिटल बमवर्षा-जैसा जो आजकल हम देख रहे हैं। इन सब में शिक्षा का भारी-भरकम व्यापार शामिल है जो संकट की वजह से अपने लाभ में कटौती बर्दाश्त नहीं कर सकता। डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए यह वस्तुतः फायदा उठाने वाला अवसर है।

पुराने, समझदार समय में इस तरह की भयानक महामारी का दौर होता, तो गर्मी की छुट्टियों के दिन बढ़ा दिए जाते और महामारी का प्रकोप कम होने और सामान्य स्थिति बहाल होने की प्रतीक्षा की जाती। ऐसा ही कुछ मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों ने किया भी है। उन्होंने गर्मी की छुट्टी पहले घोषित कर दी और इसकी अवधि बढ़ा दी। जब वे खोलने की हालत में होंगे और सामान्य ढंग से काम करने लगेंगे, तब परीक्षाएं लेने की उनकी योजना है- जब ये कराने की हालत नहीं है, तो इसमें शर्म कैसी! अगर महामारी से लोगों की मौत जारी रही और लंबे समय तक या पूरे टर्म के लिए सोशल डिस्टेन्सिंग की जरूरत पड़ ही जाए, तब उपयोग में समझी जा सकने वाली प्राइवेसी चिंताओं के बावजूद कुछ दिनों के लिए वेब-आधारित प्लेटफॉर्म वाले ऑनलाइन क्लास को उचित कदम कहा जा सकता है। आखिर, एक सरकारी सर्कुलर में भी गोपनीय डाटा की सुरक्षा के संबंध में चिंताओं के मद्देनजर सरकारी कामों के लिए जूम के उपयोग को लेकर चेतावनी दी ही गई है।

यह समझने की जरूरत है किशै क्षिक संस्थान सीखने, पढ़ने, प्रयोग करने, विचारों के आदान-प्रदान, बहस करने, सवाल उठाने और विरोधी रुख रखने की जगह है- ये सब शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। डिजिटल स्रोत शिक्षा के काफी महत्वपूर्ण सहायक हैं या उनका कुशल तरीके से उपयोग किया जा सकता है लेकिन वे आमने-सामने की बातचीत, पढ़ाने और सीखने-सिखाने के विकल्प नहीं हो सकते। ऑनलाइन परीक्षाएं- ओपन बुक परीक्षा (ओबीई) या घर से लिखकर दी जाने वाली (टेक होम) परीक्षा- पूरी तरह बेकार ही होगी। अधिकारी और समाज जितनी जल्दी इसे समझेंगे, उतना ही अच्छा है।(navjivan)


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