विचार/लेख

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18-Oct-2021 3:11 PM (30)

-डॉ राजू पाण्डेय

 

क्या सावरकर की जीवन यात्रा को दो भागों में मूल्यांकित करना ठीक है? क्या उनके जीवन का गौरवशाली और उदार हिस्सा वह है जब वे -1857 का भारत का स्वाधीनता संग्राम- पुस्तक की रचना(आरंभ 1907- पूर्णता-1909) करते हैं। इस पुस्तक के विषय में कहा जाता है कि यह 1857 के  विद्रोह को स्वाधीनता संग्राम की व्यापकता प्रदान करती है। बाद में क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्तता के कारण सावरकर को अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया जाता है। अंडमान की इस जेल की भयंकर यातनाओं से सावरकर का मनोबल शायद कमजोर होने लगता है। विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इसके बाद सावरकर का एक नया रूप देखने में आता है जो कट्टर हिंदूवादी है और जिसे सर्वसमावेशी राष्ट्रीय आंदोलन से कुछ लेना देना नहीं है।

किंतु 1857 का भारत का स्वाधीनता संग्राम सावरकर की दृष्टि में स्वतंत्रताकामी भारतीय जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि उनके अनुसार यह ईसाई धर्म के खिलाफ हिंदुओं और मुस्लिमों का विद्रोह है। वे जस्टिन मैकार्थी को उद्धृत करते हुए लिखते हैं- हिन्दू और मुसलमान अपनी पुरानी धार्मिक शत्रुता को भुलाकर ईसाइयों के खिलाफ एक हो गए। पवन कुलकर्णी अपने लेख – हाऊ डिड सावरकर अ स्टांच सपोर्टर ऑफ ब्रिटिश कॉलोनिअलिज्म कम टू बी नोन एज वीर में सावरकर को उद्धृत करते हैं- 'चहुंओर लोगों को यह विश्वास को चला था कि सरकार देश के धर्म को नष्ट कर ईसाई धर्म को देश का प्रधान धर्म बनाने का निर्णय ले चुकी है।' इस प्रकार सावरकर 1857 के स्वाधीनता संग्राम को एक धर्म युद्ध की भांति व्याख्यायित करते लगते हैं। बाद में जिस कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा के प्रतिपादक के रूप में सावरकर को ख्याति मिली उसके बीज तो उनकी 1909 में पूर्ण हुई पुस्तक '1857 का भारत का स्वाधीनता संग्राम' में ही उपस्थित थे।

बहरहाल सावरकर में आए परिवर्तनों में सेल्युलर जेल के भयावह माहौल और यंत्रणाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। अनेक इतिहासकारों और अध्येताओं इस ओर संकेत किया है। प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम अपनी पुस्तक ‘सावरकर: मिथस एंड फैक्ट्स’ में लिखते हैं कि -"सावरकर का सेल सबसे ऊंची मंज़िल पर था, जहां से फांसी का तख्ता स्पष्ट दिखाई देता था। हर माह वहां किसी न किसी बंदी को फांसी दी जाती थी।  संभव है कि फांसी पर लटकाए जाने के इस भय ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया हो।"

सावरकर पर महत्वपूर्ण शोध कार्य करने वाले निरंजन तकले का भी निष्कर्ष प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम जैसा ही है। निरंजन तकले बताते हैं- "अंडमान की इस जेल में सावरकर की रूमानी क्रांतिकारिता ध्वस्त हो गई। 11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और वहाँ पहुंचने के डेढ़ महीने के अंदर 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा, इसके बाद 9 सालों में उन्होंने 6 बार अंग्रेज़ों को क्षमादान हेतु प्रार्थना पत्र दिए।"

निरंजन तकले के अनुसार जैसा बाद में त्रैलोक्यनाथ एवं अन्य साथी क्रांतिकारियों द्वारा दिए गए विवरणों से ज्ञात होता है, सावरकर के इन माफीनामों के विषय में इन्हें पता नहीं था।

सावरकर के साथ ही सेल्युलर जेल में कैद क्रांतिकारी बरिंद्र घोष सावरकर की जेलर से नजदीकी का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि अन्य साथी क्रांतिकारियों को विद्रोह के लिए प्रेरित करने वाले सावरकर कभी स्वयं खुलकर सामने नहीं आते थे। बरिंद्र घोष जैसा ही अनुभव सावरकर के साथ जेल की सजा काट रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्रैलोक्यनाथ का भी है जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक थर्टी इयर्स इन प्रिजन में साझा किया है।

सावरकर अपने अनुयायियों को इस हद तक सम्मोहित कर लेते थे कि वे हिंसा की गतिविधियों को अंजाम देने के लिए उद्यत हो जाते थे। उनके समर्थकों की सावरकर पर श्रद्धा का आलम यह था कि जब हिंसक गतिविधि के बाद वे पकड़े जाते थे और मुकदमे का सामना करते थे जिसका परिणाम अनिवार्यतः मृत्युदंड जैसा भयंकर होता था तब भी वे सावरकर का नाम तक नहीं लेते थे और उनसे कोई भी संबंध होने तक से इनकार कर देते थे क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि सावरकर का जीवन देशहित में उनके अपने जीवन से अधिक मूल्यवान है। जब मदनलाल धींगरा ने कर्नल वायली की हत्या की तब भी इस बात की व्यापक चर्चा होने के बावजूद कि वे सावरकर से प्रेरित थे उन्होंने सावरकर को बचाने का पूरा प्रयास किया। शायद यही स्थिति तब बनी जब गोडसे गांधी जी की हत्या के आरोप में मुकद्दमे का सामना कर रहा था।

निरंजन तकले इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं कि - हर 15 दिन में सेल्युलर जेल में कैदी का वज़न लिया जाता था। जब सावरकर सेल्युलर जेल पहुंचे तब उनका वज़न 112 पाउंड था। सवा दो साल बाद जब उन्होंने सर रेजिनॉल्ड क्रेडॉक को अपना चौथा माफ़ीनामा दिया, तब उनका वज़न 126 पाउंड हो गया था।

सावरकर द्वारा दिए जाने वाले माफीनामों की भाषा उत्तरोत्तर दीनता की चरम सीमा को स्पर्श करती दिखती है, उदाहरण स्वरूप 1913 में उनके द्वारा भेजी गई दूसरी क्षमादान याचिका के अंतिम हिस्से पर गौर किया जा सकता है- "अंत में मैं महामहिम को यह स्मरण दिलाना चाहता हूं कि वह मेरी क्षमादान याचिका पर विचार करे, जिसे मैंने 1911 में भेजा था और उसे स्वीकृत कर भारत सरकार को भेजे। भारत की राजनीति की नवीनतम परिस्थितियों और सरकार की समन्वय की नीति ने फिर एक बार संवैधानिक रास्ते को खोल दिया है।

अब कोई भी व्यक्ति जो हिंदुस्तान और मानवता का दिल से भला चाहता हो वह उन कंटकाकीर्ण रास्तों पर आंख मूंदकर नहीं चलेगा जैसा कि 1906-1907 के उत्तेजित करने वाली और नाउम्मीदी से भरी परिस्थितियों में हमने किया तथा अमन एवं तरक्की के मार्ग को त्याग दिया था।"

सावरकर लिखते हैं- "इसलिए सरकार यदि अपने बहुविध एहसान एवं दया की भावना के तहत मुझे रिहा करेगी तो मैं इस संवैधानिक तरक्की तथा अंग्रेज सरकार से वफादारी का सबसे बड़ा हिमायती बनूंगा, जो आज उन्नति की पूर्वशर्त है… इसके अलावा संवैधानिक मार्ग पर मेरा लौटना भारत तथा विदेशों के तमाम पथभ्रष्ट नवयुवकों को वापस लाने में मदद करेगा, जो अपने मार्गदर्शक के रूप में मुझे देखते हैं।

सरकार जैसा चाहे उसी तरह से मैं सरकार की सेवा करने के लिए तैयार हूं, क्योंकि मेरा यह रूपांतरण विवेकशील है और मैं उम्मीद करता हूं कि भविष्य का मेरा आचरण भी उसके अनुरूप होगा। मुझे जेल में रख कर सरकार को कुछ नहीं मिलेगा जबकि मुझे रिहा किया जाएगा तो सरकार का लाभ होगा।"

अंत में सावरकर दीनता पूर्वक विनती करते हैं- "सिर्फ बलशाली ही दयावान हो सकते हैं और आखिर पश्चात्ताप करनेवाला पुत्र माई-बाप सरकार के दरवाजे नहीं जाएगा तो कहां जाएगा।"(आर सी मजूमदार, पीनल सेटलमेंटस इन अंडमान, पब्लिकेशन डिवीज़न, 1975 द्वारा उद्धृत)।

यद्यपि पिछले 2 वर्षों में सावरकर को नए रूप में प्रस्तुत करने की चेष्टा में लगे इतिहासकारों का मानना है कि सावरकर द्वारा प्रयुक्त भाषा उस काल में दी जाने वाली दया याचिकाओं में उपयोग की जाने वाली भाषा जैसी ही है जिनके आधार पर आंदोलनकारियों की रिहाई होती थी।

यहां सावरकर शहीद भगत सिंह की परंपरा से बहुत दूर चले जाते हैं- एक ऐसी परंपरा जो हिंसा के दर्शन पर विश्वास करने के कारण किसी भी रूप में स्वीकार्य तो नहीं है किंतु जिस परंपरा के क्रांतिकारियों के लिए राष्ट्र हेतु प्राणोत्सर्ग करना हर्ष और गौरव का विषय था। इन क्रांतिकारियों की हिंसा आदतन नहीं थी, अपितु यह प्रतीकात्मक थी और वे गौरवपूर्वक अपने किए का दंड भुगतने को तत्पर रहते थे क्योंकि वे जानते थे उनका बलिदान देश के आम जन को निर्भीक और साहसी बनाएगा। हिंसा के बाद पलायन न करने अपितु वीरतापूर्वक स्वयं को पुलिस और कानूनी प्रक्रिया के हवाले कर देने की रणनीति जहां एक ओर अत्याचारी ब्रिटिश सरकार को न केवल मारक शक्ति के प्रदर्शन द्वारा भयभीत करती थी अपितु नैतिक रूप से भी उन्हें परास्त करने का प्रयास करती थी। क्रांतिकारी का घटना स्थल से न भागना, अपने अपराध को सहर्ष स्वीकार कर लेना, अपने लिए क्षमादान के स्थान पर मृत्युदंड की मांग करना और इस मृत्युदंड का हँसते-हँसते वरण करना उस ब्रिटिश सरकार के लिए एक गहरे मनोवैज्ञानिक आघात से कम नहीं होता था जो इन क्रांतिकारियों को आम अपराधियों की भांति यंत्रणाओं के आगे टूटते और सजा के डर से कांपते हुए देखना चाहती थी। मृत्युदंड को स्वीकार क्रांतिकारी अनकहे ही यह संदेश दे जाते थे कि हिंसा का परिणाम अच्छा नहीं होता भले ही उस हिंसा के पीछे नैतिक बल छिपा हुआ हो।

 यह देखना आश्चर्यजनक है कि सावरकर का मनोबल हेमचंद्र कानूनगो, उल्लासकर दत्त, बरिंद्र कुमार घोष(अलीपुर बम विस्फोट,1908) तथा त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती (बारीसाल षड्यंत्र मामला,1913) एवं सचीन्द्रनाथ सान्याल, जैसे उसी सेल्युलर जेल में उनके साथ ही बन्द अन्य क्रांतिकारियों से भी कम सिद्ध हुआ जो बड़ी बहादुरी से जेल में होने अत्याचारों को न केवल सहन करते रहे बल्कि इनके विरुद्ध आवाज भी बुलंद करते रहे। सावरकर के वैचारिक साथी भाई परमानंद ने तो जेल में हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध दो माह का अनशन भी किया था।

इतिहासकार विक्रम संपत ने सावरकर की दया याचिकाओं को सही ठहराने हेतु एक नया तर्क दिया है- "उन्हें(सावरकर को) यह जानकर बड़ा झटका लगा कि अथक प्रयासों से जो रियायतें उन्हें अंडमान में मिली थीं वो रत्नागिरि जेल में वापस ले ली गई थीं और वह दोबारा अपनी जेल यात्रा की शुरुआत की स्थिति में आ चुके थे। इस बात ने उनका मनोबल तोड़ दिया और उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘माय ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ़’ में खुलकर लिखा कि यह तीसरा मौका था (इससे पहले दो बार पोर्ट ब्लेयर में) कि उन्होंने आत्महत्या की सोची क्योंकि उन्हें अपनी स्थिति बेहद निराशाजनक लग रही थी। अपनी दृढ़ता और आंतरिक ताकत के बल पर ही वे उन निराशाजनक विचारों से पार पा सके, वरना कई अन्य राजनीतिक बंदी या तो अपनी छोटी कालकोठरियों में फंदे से झूल गए थे या विक्षिप्त हो गए थे। ऐसी मानसिक अवस्था में, 19 अगस्त 1921 की उनकी याचिका में एक टूटे और निराश व्यक्ति की भावना झलकती है जो कि राजनीतिक संन्यास तक की सोच रहा था।" (द प्रिंट, 28 मई 2019)

यहां विक्रम संपत अनजाने में स्वयं यह स्वीकारते लगते हैं कि लंबे और कठोर कारावास ने सावरकर को इतना तोड़ दिया था कि वे आत्महत्या तक के लिए तैयार हो गए थे। क्या ऐसे हताश व्यक्ति के लिए क्रांति का मार्ग छोड़कर ब्रिटिश सरकार के साथ टकराव रहित सहयोगपूर्ण रिश्ते बनाने का प्रयास अपने कष्टों का एक सहज-स्वाभाविक हल नहीं था?

मंगलेश जोशी को भी  इंडियाफैक्ट्स.इन में प्रकाशित अपने आलेख में यह उल्लेख करना ही पड़ता है कि  चीफ कमिश्नर ऑफ अंडमान एंड निकोबार आइलैंडस तथा सुपरिन्टेन्डेन्ट पोर्ट ब्लेयर ने 1919 में सावरकर बंधुओं के जेल में चाल चलन के बारे में भेजी रिपोर्ट में विनायक दामोदर सावरकर के विषय में लिखा- 1912,1913,1914 के दौरान काम करने से इनकार करने और प्रतिबंधित साहित्य रखने के कारण 8 बार दंडित। किन्तु पिछले 5 सालों में इसका व्यवहार बहुत अच्छा रहा है।

इतिहास के नए पाठ में इस बात को बार बार रेखांकित किया जा रहा है कि सावरकर के माफीनामे जेल से बाहर निकलकर पुनः क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने का मौका प्राप्त करने की रणनीति का हिस्सा थे।

यह देखना रोचक होगा कि सेल्युलर जेल से रिहा होने के बाद सावरकर के साथी क्रांतिकारियों का जीवन किस प्रकार बीता।

सचीन्द्रनाथ सान्याल सेल्युलर जेल से रिहा होने के बाद भी ब्रिटिश सरकार का उग्र विरोध करते रहे। कहा जाता है उनकी इन क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें दुबारा सेल्युलर जेल भेज दिया गया था। बाद में 1924 में रामप्रसाद बिस्मिल और सान्याल तथा उनके अन्य साथियों ने क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की। इसका द रेवोल्यूशनरी शीर्षक मैनिफेस्टो सान्याल ने ही लिखा था। काकोरी बम कांड में संलिप्तता के कारण सान्याल को सजा हुई किन्तु वे 1937 में नैनी सेंट्रल जेल से रिहा कर दिए गए। टीबी से ग्रस्त हो जाने के बाद 1942 में उनकी मृत्यु हुई।

हेमचंद्र कानूनगो के विषय में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य अपनी पुस्तक- महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग में लिखते हैं- वहां(सेल्युलर जेल) उन्होंने दस वर्ष बिताए और 1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड योजना के अनुसार बंदियों की आम रिहाई के समय उन्हें भी(1921 में) मुक्त किया गया। काले पानी की सजा काट कर आने के बाद वे पुनः राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगे। किन्तु 10 वर्ष तक असह्य शारीरिक यंत्रणाओं का भार झेलते झेलते उनका शरीर लगभग टूट चुका था। अतः अब वे उस जोश खरोश के साथ काम न कर पाए। अंत में 1951 में उनका देहांत हो गया।(पृष्ठ 95)

बरिंद्र घोष की सेल्युलर जेल से रिहाई बाद उनके आचरण के विषय में सोर्स मैटेरियल फ़ॉर द हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया वॉल्यूम 2 बॉम्बे गवर्नमेंट रिकार्ड्स में अंकित है- बरिंद्र के बारे में नवीनतम गोपनीय रिपोर्ट्स यह दर्शाती हैं कि इस प्रकार के अपराधियों को क्षमादान देना किसी भी प्रकार लाभदायक नहीं है।(मंगलेश जोशी द्वारा इंडिया फैक्ट्स, 8 दिसंबर 2019 में प्रकाशित आलेख में उद्धृत) बरिंद्र बाद में अपने भाई महर्षि अरविंद से प्रभावित होकर 1923 में उनके पांडिचेरी स्थित आश्रम में चले गए। 1929 में वे लौटे और मुख्य रूप से पत्रकारिता करते रहे।

उल्लासकर दत्त को सेल्युलर जेल में अमानवीय यंत्रणाएं दी गईं और कहा जाता है कि कुछ समय के लिए उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया था। 1920 में उन्हें रिहा किया गया और वे कलकत्ता लौट आए। बाद में 1931 में उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण पुनः गिरफ्तार किया गया और पुनः 18 महीनों की सजा दी गई।

त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती सेल्युलर जेल से रिहाई के बाद कलकत्ता वापस आए किन्तु 1927 में क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। वे बर्मा की मांडले जेल भेज दिए गए। वे 1928 में रिहा हुए। फिर उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी में प्रवेश ले लिया। वे 1929 की लाहौर कांग्रेस का भी हिस्सा रहे। इसके बाद 1930 से 1938 की अवधि तक वे पुनः कारागार में रहे। अपनी रिहाई के बाद उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश इंडियन आर्मी में विद्रोह कराने का असफल प्रयास किया। वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे और फिर जेल भेज दिए गए। उनकी रिहाई 1946 में हुई।

सेल्युलर जेल में सावरकर के साथ कैद यह सभी क्रांतिकारी गांधी की अहिंसक रणनीति से सहमत नहीं थे। इनके धार्मिक विश्वास भी अलग अलग थे। इनकी विचारधाराएं भी अलग अलग थीं। किंतु गांधी की विचारधारा से असहमति और स्वाधीनता संग्राम की मुख्यधारा का हिस्सा न होने के बावजूद इन्होंने सेल्युलर जेल से अपनी रिहाई के बाद यथाशक्ति देश को आज़ाद कराने का प्रयत्न जारी रखा। इनका गांधी विरोध कभी भी स्वाधीनता आंदोलन को खारिज करने का कारण नहीं बना। न ही उन्होंने कभी कोई ऐसा कदम उठाया जो ब्रिटिश सरकार के लिए फायदेमंद होता।

इतिहासकारों और विद्वानों एवं लेखकों का एक समूह (वाय डी फड़के, वेद राही, विक्रम संपत, मंगलेश जोशी आदि) सावरकर को एक चतुर और प्रैक्टिकल क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता रहा है जो मूर्खतापूर्ण भावुकता में पड़कर अपने प्राण गंवाने के स्थान पर कारागार से निकलकर देश में स्वाधीनता संग्राम को गति देने का इच्छुक था। यह कहने में बहुत पीड़ा होती है कि आगे का घटनाक्रम इस बात का समर्थन नहीं करता। बल्कि इससे बार बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।

अंततः मई 1921 में सावरकर सेल्युलर जेल से निकलने में कामयाब रहे। निरंजन तकले(द वीक, अ लैम्ब लायनाइज़ड,24 जनवरी 2016) तथा प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम (हिंदुत्व: सावरकर अनमास्क्ड, तृतीय संस्करण, 24 नवंबर 2015) के अनुसार यद्यपि उन पर राजनीतिक गतिविधि न करने समेत अनेक पाबंदियां थीं किन्तु अंडमान से लौटने के बाद उन्हें अपनी पुस्तक- हिंदुत्व हू इज हिन्दू- लिखने की पूरी सहूलियत जेल में ही अंग्रेज अधिकारियों ने दी थी। वर्ष 1924 में 6 जनवरी को अंग्रेज सरकार से समझौते के बाद पुणे की यरवदा जेल से उनकी रिहाई हुई। वे अब राजनीतिक गतिविधि न करने की पाबंदी के साथ रत्नागिरि में नजरबंद थे। राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदी के बावजूद अंग्रेजों ने 1925 में तब कांग्रेस के सदस्य और गांधी से गहन असहमति रखने वाले श्री हेडगेवार और सावरकर की मुलाकात पर कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि श्री हेडगेवार सावरकर के हिंदुत्व से प्रभावित थे और सावरकर की गांधी विरोध की रणनीति में उनका सहयोग स्वाधीनता आंदोलन को कमजोर ही करता। ऐसा नहीं लगता है कि सावरकर पर रत्नागिरि में नजरबंदी के दौरान कोई विशेष बंधन लगाए गए थे, इस दौरान वे गांधी जी से भी मिले और हिन्दू महासभा की गतिविधियों को भी संचालित करते रहे। सावरकर को बी एस मुंजे द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में नासिक जाने की अनुमति भी दी गई। सावरकर के जीवनी लेखक धनंजय कीर के अनुसार उन्होंने नासिक में 'कुछ महार हिंदुओं को आगाखानी मुसलमानों के चंगुल से छुड़ाया। सरकार की अनुमति से उन्होंने भागुर, त्रिम्बक, येओला तथा नागर की यात्रा की और अपनी विचारधारा का प्रचार किया'। सावरकर ने 1924 में ही शुद्धि समारोह शुरू किए जो आज के घर वापसी अभियान की भांति थे। शम्सुल इस्लाम के अनुसार इस अभियान ने स्वाधीनता संग्राम में हर वर्ग के लोगों को सम्मिलित करने की कोशिशों को काफी नुकसान पहुंचाया।

निरंजन तकले ने बीबीसी संवाददाता रेहान फजल को बताया - "सावरकर ने वायसराय लिनलिथगो के साथ लिखित समझौता किया था कि उन दोनों का समान उद्देश्य है गाँधी, कांग्रेस और मुसलमानों का विरोध करना है। अंग्रेज़ उनको पेंशन दिया करते थे, साठ रुपए महीना। वे अंग्रेज़ों की कौन सी ऐसी सेवा करते थे, जिसके लिए उनको पेंशन मिलती थी? वे इस तरह की पेंशन प्राप्त करने वाले अकेले व्यक्ति थे।"

जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था तब सावरकर भारत में विभिन्न स्थानों का दौरा करके हिन्दू युवकों से सेना में प्रवेश लेने की अपील कर रहे थे। उन्होंने नारा दिया-  हिंदुओं का सैन्यकरण करो और राष्ट्र का हिंदूकरण करो।

प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम ने हिन्दू महासभा आर्काइव्ज के गहन अध्ययन के बाद बताया है कि ब्रिटिश कमांडर इन चीफ ने हिंदुओं को ब्रिटिश सेना में प्रवेश हेतु प्रेरित करने के लिए बैरिस्टर सावरकर का आभार व्यक्त किया था।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सावरकर ने हिन्दू महासभा के सभी सदस्यों से अपील की थी कि वे चाहे सरकार के किसी भी विभाग में हों वे अपने पद पर बने रहें। (महासभा इन कॉलोनियल नार्थ इंडिया, प्रभु बापू)।

इसी कालखंड में जब विभिन्न प्रान्तों में संचालित कांग्रेस की सरकारें अपनी पार्टी के निर्देश पर त्यागपत्र दे रही थीं तब सिंध, उत्तर पश्चिम प्रांत और बंगाल में हिन्दू महासभा मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चला रही थी। (सावरकर: मिथ्स एंड फैक्ट्स, शम्सुल इस्लाम)।

सावरकर ने जेल से अपनी रिहाई के बाद स्वाधीनता हेतु किए जा रहे प्रयासों से दूरी बना ली थी- चाहे वह गांधी का अहिंसक आंदोलन हो अथवा क्रांतिकारियों की हिंसक कोशिशें। वे तटस्थ भी नहीं थे, उन्होंने अंग्रेजों को अपना सक्रिय सहयोग दिया। शायद वे स्वाधीनता आंदोलन के अहिंसक और सर्वसमावेशी स्वरूप को हिन्दू राष्ट्र की स्थापना में बाधक समझने लगे थे।  
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)


18-Oct-2021 1:20 PM (48)

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

सन् 1935 के आसपास की बात है, उत्तरप्रदेश के मथुरा से चिरौंजीलाल खंडेलवाल आजीविका की तलाश में बिलासपुर आ गए। गोलबाजार में ‘कल्लामल बृजलाल’ के बृजलाल उनके साढ़ू थे जिनका मिठाई बेचने का व्यापार था। बृजलाल के पुत्र चिरौंजीलाल को मौसाजी कहते थे इसलिए चिरौंजीलाल ‘मौसाजी’ के नाम से पुकारे जाने लगे। वे चाट बनाने के विशेषज्ञ थे। शाम के वक्त सडक़ के एक किनारे में अपना खोमचा जमाते थे और रात को नौ बजे तक अपना माल बेचकर गोंडपारा में स्थित दर्जी मंदिर के बगल वाले अपने घर चले जाते।

चिरौंजीलाल के चार लडक़े थे, छेदीलाल, दशरथलाल, मूलचंद और लक्ष्मीप्रसाद। छेदीलाल जब बड़े हुए तो उन्होंने ‘इंद्रपुरी’ और दशरथलाल ने गोलबाजार के अंदर ‘मौसाजी मथुरा वाले’ नामक हलवाई की दूकानें शुरू की। इन दूकानों के खुलने के बाद चिरौंजीलाल ने चाट की दूकान लगाना बंद कर दिया और ‘रिटायरमेंट’ ले लिया। शहर में ‘इंद्रपुरी’ की लस्सी और ‘मौसाजी मथुरा वाले’ का दही-खटाई वाला समोसा बेहद लोकप्रिय था। ‘मौसा जी मथुरा वाले’ में मूलचंद अपने बड़े भाई के साथ दूकान में बैठते थे और कारखाने मे मिठाई-नमकीन बनाने का काम सीखते थे। मूलचंद ने म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ाई भी की थी लेकिन आठवीं कक्षा में उनके मास्टर ने उनकी ऐसी पिटाई की कि उनका स्कूल जाने से जी उचट गया और वे अपनी दूकान में ही व्यस्त हो गए। इस बीच गोलबाजार की एक दूकान श्यामलाल ने बेची जिसे मूलचंद के लिए खरीद लिया गया और वहाँ  ‘नीलकमल’ नामक आधुनिक शैली की हलवाई-दूकान खुली।

मूलचंद खंडेलवाल साहसी और दूरदर्शी युवक थे। उन पर हर समय कूछ नया करने का जुनून हावी रहता था। उनकी बातचीत के लहजे में बनारस का असर था, कहने का मतलब यह है कि उनका कोई भी वाक्य अपशब्दों के बिना पूरा नहीं होता था। माँ-बहन वाली गाली का उच्चारण वे शास्त्रीय संगीत की शैली में करते थे, अर्थात आरंभ के तीन शब्द ‘द्रुत’ में और शेष दो शब्द ‘विलंबित’ में।

मूलचंद का झुकाव भारतीय जनसंघ की ओर था। एक बार वे बाज़ार वार्ड से जनसंघ की टिकट पर चुनाव लड़े और अपने पड़ोसी हलवाई ‘कोहिनूर’ वाले नत्थूलाल केशरवानी को परास्त करके नगरपालिका के सदस्य बने। यहीं से उन्हें राजनीति का चस्का लग गया और वे ‘नीलकमल’ को कम और राजनीति को अधिक समय देने लगे। नीलकमल राजनीतिक चर्चा का अड्डा बन गया और जनसंघ के बड़े नेताओं से उनकी जान-पहचान विकसित होती गई। अटलबिहारी बाजपेयी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे राष्ट्रीय और राज्य स्तर की हस्तियाँ मूलचंद के आदर्श कॉलोनी स्थित घर में मेहमान हुआ करते थे। मूलचंद और उनकी पत्नी देवकी उन सबका स्वागत-सत्कार अत्यंत आत्मीयता से करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनता पार्टी के पदाधिकारियों को नीलकमल में रसमलाई, दही-खटाई वाली आलू भजिया और चाय नि:शुल्क उपलब्ध थी।
मूलचंद अत्यंत सावधानी से अपने ‘होने’ को स्थापित कर रहे थे, परिणामस्वरूप उन्हें सन 1985 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बिलासपुर शहर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी बनने का अवसर मिल गया। मूलचंद चुनाव हार गए लेकिन इसी पराजय से उनकी विजय पताका को हवा मिलने लगी।

यद्यपि मूलचंद एक बड़ी राजनीतिक गफलत कर चुके थे, आपातकाल के दौरान जब मूलचंद को मालूम हुआ कि जेलयात्रा का उनका भी मुहूर्त निकल चुका है तो वे सफ़ेद टोपी पहनकर गाजे-बाजे के साथ कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। यह समझना बेहद कठिन है कि वह कौन सा चमत्कार रहा होगा कि उस भयंकर भूल के बावजूद उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव लडऩे का टिकट दिया। यह सच है कि जेल की सजा भुगत कर आए अन्य नेता उनसे बहुत खखुवाए हुए थे। मूलचंद चुनाव हार गए तो भन्नाए हुए ‘मीसाबंदी’ मूलचंद के चयन पर उंगली उठाने लगे और मूलचंद अपने बचाव की कोई नई तरकीब खोजने में लग गए।

आमतौर पर चुनाव जीतने के बाद नेतागण अपने चुनाव क्षेत्र को भूल जाते हैं। केवल चुनाव लडऩे के समय ‘डोर-टू-डोर’ जाते है और जीतने या हारने के बाद उन्हें मतदाता के घर की ‘लोकेशन’ अगले चुनाव तक के लिए याद रखने की जरूरत नहीं रहती। मूलचंद ने हारने के बाद मतदाताओं के घर जाने का निर्णय लिया और घर-घर जाकर धन्यवाद दिया। यह बात सबको प्रभावित कर गई और जिसने उन्हें वोट नहीं दिया था, उसे भी मूलचंद का हारना अखर गया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि वे शहर के लिए अवतार जैसे हो गए और गली-गली में उनके नाम का डंका बजने लगा। उनके आलोचकों की घिग्घी बंध गई। पाँच साल बीत गए, सन 1990 में पुन: विधानसभा चुनाव घोषित हुए और मूलचंद को फिर से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया गया।

इस बार बिलासपुर का मतदाता मूलचंद को जिताने के लिए उतारू था और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर किला फतह किया। संयोग से उस चुनाव के पश्चात प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और मूलचंद को पहली बार विधायक बनने के बावजूद बी.आर.यादव जैसे दिग्गज को हराने के पुरस्कार स्वरूप मंत्रिमंडल में जगह मिली, वह भी मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य का नागरिक आपूर्ति मंत्री!

क्या कोई कल्पना कर सकता था कि एक अल्पशिक्षित हलवाई अपने दृढ़संकल्प और दूरदृष्टि से ऐसी ऊंचाई तक पहुँचेगा? मूलचंद खंडेलवाल बिलासपुर शहर की वह हस्ती बने जिसने यह साबित किया कि उसका ‘बैकग्राउंड’ कुछ भी हो, यदि मनुष्य में लगन हो और वह सही दिशा में प्रयत्न करे तो सब संभव है।

15 अक्टूबर को 84 वर्षीय मूलचंद खंडेलवाल अपना पार्थिव शरीर प्रकृति को सौंप कर हम सबसे बहुत दूर चले गए।


18-Oct-2021 1:16 PM (49)

-कनक तिवारी

स्मिता हम तुम्हारे गुनहगार हैं
यह सबके साथ होता है। हमारे साथ भी हुआ।

आज से कोई 50 साल पहले की बात होगी। मैं दुर्ग के जिला न्यायालय में वकालत करता था। मेरा दफ्तर बाजार में मुख्य सडक़ पर था। वहां काफी चहलपहल होती थी। मुअक्किलों के मिल जाने का सुभीता और भरोसा होता था। नए वकीलों को ये सब तिकड़में करनी पड़ती हैं। आठ बरस से ज्यादा महाविद्यालयों में अंगरेजी साहित्य पढ़ा चुका था। हिन्दी भाषा तो मां ने घुट्टी में डालकर पिला रखी है। फितरती छात्र और अध्यापक के रूप में चुप बैठना कभी गवारा नहीं हुआ।

छत्तीसगढ़ के गौरव, नाट्य निर्देशक, सर्जक, हबीब तनवीर मुझे छोटे भाई की तरह प्यार करते। बीच बीच में उनसे मिल जाना भी होता। अचानक फोन आया ‘कनक, मैं बहुत कम समय के लिए लेकिन बहुत ज़रूरी काम से तुम्हारे पास आ रहा हूं।‘ मैंने कहा वह वक्त आपके लिए है। उन्होंने सबब नहीं बताया। वे एक पुरुष और दो महिलाओं के साथ प्रथम तल के मेरे कार्यालय में आ गए। उनके साथी सज्जन श्याम बेनेगल थे जिनकी ख्याति हो चली थी। एकाध बार की मुलाकात भी हो चुकी थी। उन्होंने बताया एक फिल्म की शूटिंग के लिए आए हैं। कुछ दृश्य स्थल मैं बता दूं। बातचीत होने लगी।

मेरे दफ्तर की बालकनी से सामने पटरे पर कपड़ों पर इस्तरी कर रहे धोबी और उसकी दूकान को श्याम बेनेगल के कैमरे ने कैद किया। दुर्ग की सबसे मशहूर कचौरियां मिलने वाली जलाराम की ठीक सामने दूकान से सबको कचौरियां और मशहूर पेड़े खिलाए गए। उनके साथ एक खूबसूरत महिला थी। उनकी कला की समझ मुझे इसलिए अच्छी लगनी थी क्योंकि मैं सुंदर महिलाओं को ही कला समझता रहा हूं। (आज का पता नहीं)। मुझे नाटक, फिल्में, कला वगैरह के लिए दर्शक के रूप में जीवन को दिलचस्प बनाने की जिजीविषा आज तक कायम है। ज्ञान वह तत्व भी है, जो शेखी बघारने के भी काम आता है। इस काम में नौजवान वकील महारत हासिल कर चुका था।

पता लगा ये सबा जैदी हैं। बहुत बाद में मालूम हुआ था वे मशहूर शायर हाली की वंशज थीं। बाद में विदेश चली गईं। कला और फिल्मों को लेकर उनके योगदान की चर्चा होती रही। युवा वकील में कला पारखी तो नहीं उभरा। वह पहले वह पढ़ा चुका है जॉन कीट्स को जिसने लिखा है ‘‘ए थिंग ऑफ ब्यूटी इज़ ज्वाय फॉर एवर।’’ (‘A thing of beauty is joy for ever’) कीट्स को उस दिन धन्यवाद देना इतना अच्छा लगा कि वह अपनी कब्र में हुलस गया होगा मुझे आशीष देने के लिए। कुछ और दृश्य हमने उन्हें बताए। वहां भी श्याम बेनेगल शूट करने गए।

दुबली पतली लेकिन आकर्षक सांवले नाक नक्श, तीखा बोलने को उद्यत आंखें, गहरे नीले रंग की जींस, मटमैली जामुनी रंग की टी शर्ट और चप्पल पहने युवती उत्सुक होकर मेरे बताए जाने को लगा जैसे जज्ब करती जा रही है। उसने चेहरे पर मेकअप भी नहीं किया था। लगता था उसे कहीं देखा तो है।

मेरी पत्नी लगातार साथ थीं क्योंकि मैंने उन्हें बुला लिया था। इसलिए मैं अपनी क्षमता के अनुरूप सबा जैदी की तारीफ में ज्यादा कसीदे नहीं काढ़ पाया था।

स्त्री होने के बावजूद मेरी पत्नी को उस सांवली युवती से औपचारिक बात करना अच्छा तो लगा लेकिन हम यथोचित पारस्परिक नहीं हो सके। कमबख्त यह गोरा रंग कब तक जेहन में उथल पुथल करता रहेगा! सांवली युवती बार बार कुछ सवालों के जरिए हमें कुरेद रही थी। मुझे याद है कॉलेज में खूबसूरत छात्राएं भी सवाल करती थीं। सभी प्रोफेसरों की तरह मैं भी उनके जवाब देने में खास नस्ल की युवा रूमानियत महसूस करता था। यह सांवली युवती मेरे अंतर को उद्वेलित नहीं कर पा रही थी। लेकिन उसकी आवाज और आंखें इतनी आकर्षक थीं कि उससे बेरुख होना संभव नहीं था। उसके प्रति मैंने शराफत और अदब का पूरा इस्तेमाल किया। मेरी पत्नी और वह संतुष्ट लगे।

हबीब तनवीर उस युवती का परिचय कराना भूल गए थे। लौटने लगे तो कुशल नाट्य निर्देशक ने समझ लिया मेरा छोटा भाई चमक दमक के परे नहीं जा पाया। वह कला को क्यों नहीं पहचानता? शायद इसलिए सीढिय़ां उतरते-उतरते उन्होंने कहा ‘कनक, माफ करना। मैं परिचय कराना भूल गया था। ये स्मिता पाटिल हैं।‘ तब तक स्मिता की धमक देश में होने को थी। इसलिए मुझे बड़ा धक्का नहीं लगा। शायद पत्नी को भी नहीं।

बाद के वर्षों में स्मिता पाटिल के अभिनय के समुद्र में ज्वार आया। शायद उस दिन लगा था यह हमारे और सबा जैदी के वार्तालाप के बीच हस्तक्षेप है। हमारी उस बेरुखी के कारण आज चेहरे पर विद्रूप की फसल लहलहा रही है। भ्रूण हत्या तो स्मिता के कलात्मक जीवन की भी हो गई, जो परवान चढ़ते चढ़ते कुदरत के कहर से नीचे मौत ने ढहा दिया। स्मिता की आंखें आज भी सवाल पूछ रही हैं। वे कितनी बोलती हुई थीं। वे आंखें आवाज़ में उस दिन भी हमें देख रही थीं। आज भी बोल रही हैं। हमारे हीरे को पत्थर समझा!

जैसे जैसे समय बीता। स्मिता की शान परवान चढ़ी। उसके उलट अनुपात में मेरे अंदर एक गहरी कोफ्त बढ़ती रही है। मैं अपनी ही निगाह में अभियुक्त हो गया हूं। आईने के सामने खड़े होने से लगता है पीछे से स्मिता पाटिल की आंखें अपने सांवलेपन में कला का उजास मेरी जेहनियत में उलीच देती हैं। कितना मूर्ख था जो स्मिता को पहचान नहीं पाया। सबा जैदी के सौंदर्य, आकर्षण का विकल्प स्मिता की जिज्ञासा, ललक और कॉमरेड की तरह बतकहियों में ढूंढ नहीं पाया। स्मिता तुम कहां हो? अपनी फिल्मों में भी तुमने गुनाहों को माफ किया है। यह बात तो तुमसे कह सकता हूं।


18-Oct-2021 11:34 AM (28)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने इस वर्ष दशहरे पर जो भाषण दिया, उसमें ज्यादा ध्यान जनसंख्या के मुद्दे पर गया। उसकी चर्चा सबसे ज्यादा हुई। इस मुद्दे को लोगों ने ज्यादा तूल दिया कि उन्होंने अल्पसंख्यकों की बढ़ती आबादी पर आक्षेप क्यों किया? यह आक्षेप तो इसीलिए किया जाता है कि भारत-विभाजन के वक्त मजहबी संख्या-बल के तर्क के तीर सबसे ज्यादा छोड़े गए थे। यहां असली सवाल यह है कि देश में सबसे ज्यादा किनकी जनसंख्या बढ़ रही है? सबसे ज्यादा बच्चे किनके पैदा होते हैं? क्या आपने पढ़े-लिखे और संपन्न पति-पत्नी के छह-छह आठ-आठ बच्चे होते हुए कहीं देखे हैं ? नहीं।

ये बच्चे होते हैं— गरीबों, ग्रामीणों, मजदूरों, अशिक्षितों के परिवारों में। जाहिर है कि ऐसे लोगों में सबसे ज्यादा लोग वे हैं, जो पिछड़े हैं, अल्पसंख्यक हैं, मेहनतकश हैं। देश के मुसलमान इसी वर्ग में आते हैं। जो मुसलमान संपन्न हैं, पढ़े-लिखे हैं, शहरी हैं, क्या उनके घरों में दर्जन-आधा दर्जन बच्चे आपने कभी देखे हैं? यह मामला जाति और मजहब का नहीं, गरीबी और अशिक्षा का है। भारत में यों तो जनसंख्या की रफ्तार पहले के मुकाबले घटी है, खासतौर से मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, जैनों और बौद्धों की। लेकिन इसके बावजूद लगभग सवा दो करोड़ लोग हर साल बढ़ जाते हैं।

इस समय भारत की जनसंख्या १४० करोड़ को छू रही है। शीघ्र ही भारत चीन से आगे निकलने वाला है। इस समय भारत में जनसंख्या घनत्व काफी ज्यादा है। दुनिया की कुल जनसंख्या की १५ प्रतिशत आबादी भारत में रहती है और उसके पास दुनिया की कुल २.४ प्रतिशत जमीन ही है। यदि जनसंख्या-नियंत्रण की कोई स्पष्ट नीति नहीं बनी और आर्थिक विकास की रफ्तार जैसी अभी है, वैसी ही रही तो कुछ ही वर्षों में भारत भुखमरी और बेरोजगारी का अड्डा बन सकता है। इसीलिए अब जरुरी है कि अब दो-बच्चों की नीति भारत सरकार सख्ती से लागू करे।
 

इस कानून में हिंदू-मुसलमान और सवर्ण-शूद्र का कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। जो परिवार दो बच्चों से ज्यादा पैदा करें, उनकी समस्त सरकारी विशेष सुविधाओं पर रोक लगाने में कोई हर्ज नहीं है। परिवार-नियोजन के उपकरणों का मुफ्त वितरण किया जाए। इन कदमों से भी ज्यादा जरुरी यह है कि मेहनतकश लोगों की शिक्षा और आमदनी बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया जाए। यदि सरकार इस समस्या की अनदेखी करती रही तो देश के लिए इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे। अस्थिरता फैलेगी, अपराध बढ़ेंगे और जनसंख्या में अनुपात बिगड़ने पर जातिगत और सांप्रदायिक राजनीति तूल पकड़ेगी। भारत के टुकड़े १९४७ की तरह चाहे न हों लेकिन अंदर ही अंदर वह कई टुकड़ों में बंट चुकेगा।

 


17-Oct-2021 8:26 PM (140)

-रुचिर गर्ग

स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका की एक झलक पानी हो तो फिल्म सरदार उधम जरूर देखिए.

शहीद ऊधम सिंह पर बनी इस फिल्म में स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर को देखा और जाना जा सकता है जिसे आमतौर पर शहीद ए आजम भगत सिंह  का दौर कह सकते हैं.

इसे भगत सिंह के विचारों के प्रभाव का दौर कह सकते हैं, नौजवानों को भगत सिंह ने किस तरह उद्वेलित किया ,उनके विचारों ने किस तरह राजनीतिक समझ से लैस क्रांति के योद्धा तैयार किए इसकी झलक सरदार उधम में दिखती है.

जलियांवाला बाग नरसंहार के अपराधी जनरल डायर को लंदन में जा कर मारने के लिए कई अवसर मिलने के बाद भी भरी सभा को चुनना, वहीं गिरफ्तारी देना,फिर अमानवीय यातनाएं झेलते हुए पूछताछ से लेकर ब्रिटिश मुकदमे की नौटंकी के दौरान एक ऐसा उधम सिंह सामने होता है जिसका मकसद महज बदला नहीं था, बल्कि ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई से दुनिया को अवगत कराना था.

इस फिल्म में भगत सिंह के संवाद उनकी राजनीति की स्पष्ट छाप छोड़ते हैं और यह भी पता चलता है कि उन राजनीतिक विचारों की आंच में तपकर कैसे उधम सिंह जैसे क्रांतिकारी तैयार हुए.

फांसी के बाद शहीद उधम सिंह की बंद मुट्ठी जब एक ब्रिटिश अफसर खोलता है तो एक तस्वीर की शक्ल में वो विचार सामने होते हैं जिसमें उधम सिंह ढले थे.

ये आजादी के एक ऐसे अप्रतिम योद्धा की कहानी है जिसने न मुखबिरी की ना माफीनामे का रास्ता चुना !

ये एक ऐसे वीर की कहानी है जो ब्रिटिश यातनाओं के आगे टूटा नहीं !

ये एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो विचारों से धर्मनिरपेक्ष था, मानव स्वतंत्रता का हिमायती था और अपने वतन को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए भगत सिंह के रास्ते पर चल पड़ा था!

ऐसे वीरों के मुकाबले जब माफी वीरों को प्रतिष्ठित करने की कोशिश होती है तब एक बार शूजित सरकार द्वारा निर्देशित सरदार उधम देखना चाहिए.

अभिनेता विकी कौशल ने तो उधम सिंह के किरदार में जान ही डाल दी है !

और हां ! उन लोगों को इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए जो आजकल आजादी के आंदोलन में माफी की भूमिका को पढ़ रहे हैं, गुन रहे हैं ! कुर्बानी की इस महान परंपरा को देखकर उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी अफसोस होगा कि उनके वैचारिक पुरखे किस कदर गुलामी पसंद और अंग्रेज परस्त थे !


17-Oct-2021 8:18 PM (38)

-पुष्य मित्र
अभी हम अपने धर्म के सबसे बड़े त्योहारों में से एक दशहरे के कर्मकांड, आनंद और उत्सव से उबर नहीं पाये थे कि यह दिल को दहला देने वाली खबर आयी। खबर उस सिंघु बॉर्डर से थी, जहां किसान एक साल से अधिक वक्त से अपनी मांगों को लेकर डटे हैं। वहां एक और मजहब सिख संप्रदाय के निहंगों ने एक व्यक्ति को बहुत क्रूर तरीके से इसलिए मार डाला, क्योंकि उसने उनके धर्म ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी की थी। इस खबर के बारे में जानकर पूरा देश सन्न है। ऐसा लग रहा है कि हम किसी मध्ययुगीन बर्बरता के दौर में चले गये हैं। हत्या का आरोपी कह रहा है कि उसे कोई अफसोस नहीं है, कोई भी उसके धर्मग्रंथ का अपमान करेगा, उसे वह ऐसी ही सजा देगा। हत्यारोपी को सम्मानित भी किया जा रहा है।

यह घटना एक तरफ तो धर्मों में फैले कट्टरपंथ की असली तस्वीर पेश कर समाज को सचेत कर रहा है, तो वहीं अंदर ही अंदर तमाम धर्मों में मौजूद ऐसे तत्वों को प्रोत्साहित भी करता नजर आ रहा है कि ऐसे ही करना चाहिए। यह घटना न पहली है, न आखिरी। यह वह क्रूर सच्चाई है, जो प्रेम और शांति को बढ़ावा देने के लिए बने धर्मों का सबसे स्याह पक्ष है। सबसे पुरातन काल से लेकर आज तक बने सभी धर्मों के साथ यह दिक्कत रही है, लगभग हर धर्म किसी न किसी मुद्दे पर आहत हो जाता है और वह हिंसा पर उतारू हो जाता है। चाहे वह धर्म अहिंसा के नाम पर ही क्यों न बना हो, अपने संप्रदाय की कथित प्रतिष्ठा बचाने के लिए वह तलवार उठा ही लेता है। और धीरे-धीरे धर्म ऐसे कट्टर समूह में बदल जाते हैं, जहां सवाल पूछना अपराध मान लिया जाता है, जहां हर सिद्धांत को फ्रीज कर दिया जाता है और बदलाव की किसी गुंजाइश को सख्ती से रोक दिया जाता है।

संभवतः सभी धर्मों की यही कमजोरी है, जिस वजह से नास्तिकों ने धर्मों को गलत बता दिया है, अभी भी बता रहे हैं। मगर क्या इन वजहों के आधार पर हम धर्म को खारिज कर सकते हैं और क्या नास्तिक परंपराएं इस दोष से मुक्त हैं? क्या दुनिया में हुए तमाम कत्लेआम सिर्फ धार्मिक वजहों से हुए हैं, क्या नास्तिक विचारों पर आधारित सत्ता ने ठीक उसी तरह खूनखराबा नहीं किया है, जैसे धार्मिक कट्टरपंथियों ने किये हैं। किसी भी नतीजे पर पहुंचने के लिए इस सवाल से होकर गुजरना बहुत जरूरी है। इन सवालों से गुजरते हुए हम स्तालिन और दूसरे ऐसे तमाम तानाशाहों के विवरणों से होकर गुजरते हैं, जिन्होंने नास्तिक होते हुए भी लाखों लोगों को सिर्फ इसलिए मरवा दिये, क्योंकि वे उनसे सहमत नहीं थे। इसलिए मसला सिर्फ धर्म का नहीं है। दोष विचारों के फ्रीज हो जाने का है, हम किसी सत्य को जब आखिरी सत्य मान लेते हैं और बदलाव के तमाम रास्ते बंद कर देते हैं तो बहुत जल्द हमारे इर्द-गिर्द ऐसे धार्मिक समूह बन जाते हैं, जो किसी भी बात पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह धर्म भी हो सकता है, सिद्धांत भी, मगर सच पूछिये तो आखिर में यह एक सत्ता, एक राजनीतिक उपक्रम ही होती है, जो किसी विचार, धर्म, सिद्धांत, नीति के आधार पर हत्याओं, हिंसाओं और क्रूरताओं को जायज ठहरा देती है। इसलिए हर चीज का जिम्मेदार धर्म को करार दे देना ठीक नहीं।

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि मैंने कम से कम एक उदाहरण ऐसा जरूर देखा है, जो धर्मों के बेहतरीन इस्तेमाल के जरिये शांति लाने का प्रयास करता काफी हद तक सफल हुआ था। वह उदाहरण है गांधी के आखिरी अभियान का, जो नोआखली से शुरू होकर, बिहार, बंगाल और दिल्ली तक चला और आखिर में उनकी हत्या के बाद खत्म हुआ। उस पूरे अभियान में प्रेम, अहिंसा, सद्भाव, उपवास के साथ जो सबसे महत्वपूर्ण उपकरण था वह थी, उनकी सर्वधर्म प्रार्थना।


बंटवारे की पृष्ठभूमि में इसी तरह मुस्लिम लीग ने धर्म को संगठित हिंसा का उपकरण बनाकर पूरे भारत को नफरत की आग में झोंक दिया था। मगर जब उस आग को बुझाने के लिए महात्मा गांधी मैदान में उतरे तब उन्होंने धर्म को ही अपना हथियार बनाया। नोआखली से लेकर दिल्ली तक हर रोज उन्होंने सर्वधर्म प्रार्थना की और लोगों को संदेश दिये। इन प्रार्थनाओं में हमेशा बहुसंख्य-अल्पसंख्यक समेत हर धर्म के स्थानीय लोग जुटे और वहां हर धर्म की प्रार्थना की गयी। ये प्रार्थनाएं सिर्फ रिचुअल नहीं थीं, गांधी इनके जरिये लोगों के दिलों को छूने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें बता रहे थे कि धर्म का असल मर्म क्या है, क्यों सभी धर्म प्रेम और शांति की ही बात करते हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे से नफरत और मारकाट करना, खून-खराबा करना क्यों गलत है। उसी दौर में ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम की पंक्तियां पापुलर हुईं।

महात्मा गांधी की राजनीति पर नजर रखने वाले लोग जानते हैं कि उन्होंने कभी धर्म से परहेज नहीं किया और कट्टरपंथ का मुकाबला करने के लिए नास्तिकता की तरफ नहीं गये। क्योंकि उन्हें मालूम था कि धर्म ही वह तत्व जिसके सहारे भारत के आम लोगों की आत्मा तक पहुंचा जा सकता है, आप जैसे नास्तिकता के खेमे में जाते हैं, इस देश की बड़ी आबादी से कट जाते हैं। वे जानते थे कि सिर्फ अंधविश्वास और कट्टरता के दोष की वजह से धर्मों को खारिज नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि हम धर्मों के सकारात्मक तत्वों की तलाश करें और उसके सहारे आम लोगों को बेहतर बनाने की कोशिश करें। हालांकि ऐसा करने वाले वे अकेले व्यक्ति नहीं थे, अशोक से लेकर अकबर तक भारत के प्रसिद्ध शासकों ने ऐसे ही प्रयोग किये थे।

ये उदाहरण बताते हैं कि दिक्कत धर्म में नहीं, धर्मों में बढ़ते कट्टरपंथ की वजह से हैं। उसके राजनीतिक इस्तेमाल की वजह से हैं, उसके न बदलने की जिद की वजह से हैं। अगर धर्म इन सवालों पर बात नहीं करना चाहता तो जाहिर है वह सत्ता को अपने दायरे में हस्तक्षेप करने की इजाजत दे रहा है। साथ ही ये उदाहरण हमें यह संकेत भी देते हैं कि धर्म के कट्टरपंथ और उसकी जड़ता को खत्म करने के लिए अंदर से प्रयास होने चाहिए, उसे छोड़ देना, खारिज कर देना कोई समाधान नहीं है। तार्किक और प्रगतिशील तत्वों को कभी धर्म को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। उन्हें लगातार धर्म की कुरीतियों के सवाल पर सक्रिय रहना चाहिए। चाहे वह सिख धर्म की बात हो, इस्लाम की या हिंदू धर्म की। अगर आप समय के साथ बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, अगर आपका आधार प्रेम नहीं, नफरत है, शांति नहीं हिंसा है तो एक दिन आप किसी बर्बर समूह में बदलकर मर जायेंगे। खत्म हो जायेंगे।
 
आज अगर सिख धर्म कहीं थोड़ा सा कलंकित हुआ है, तो उस व्यक्ति की वजह से नहीं जिसने गलत तरीके से गुरुग्रंथ साहिब को छुआ, वह उस व्यक्ति की वजह से कलंकित हुआ है, जिसने बर्बर हत्या की। उस निहंग की बर्बरता ने उन तमाम खालसा सिखों के वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिये जो हर आपदा और हर संकट में लोगों की मदद के लिए दुनिया के हर इलाके में दौड़ जाते हैं। जिनके गुरुद्वारों के दरवाजे हर भूखे के लिए हमेशा खुले रहते हैं। इस बात को हम सबको सोचना पड़ेगा, चाहे वह धर्म को मानने वाले हो या नास्तिक।


17-Oct-2021 11:42 AM (56)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

कल मैंने पाकिस्तान और बांग्लादेश के सांप्रदायिक दंगों पर इन दोनों पूर्व-भारतीय देशों की बदनामी का जिक्र किया था लेकिन कल दिल्ली की सिंघु-सीमा पर हुई नृशंस हत्या ने तो भारत को भी उसी श्रेणी में ला खड़ा किया है। यदि पाकिस्तान और बांग्लादेश जिन्ना और मुजीब को शीर्षासन करवा रहे हैं तो भारत गांधी को शीर्षासन करवा रहा है। बांग्लादेश में चल रही हिंसा का कारण कुरान के प्रति बेअदबी को बताया जा रहा है तो सिंघु बार्डर पर हुए एक अनुसूचित मजदूर की हत्या का कारण गुरु ग्रंथसाहब के प्रति उसकी बेअदबी को बताया जा रहा है। किसी धर्मग्रंथ या धर्मध्वजी या श्रद्धेय का अपमान करना सर्वथा अनुचित है। उनका अपमान उनके माननेवालों का अपमान है। यह उनके दिल को दुखाने का काम है।

किसी धर्मग्रंथ या किसी महापुरुष का अपमान करके आप उसके अनुयायियों का न तो दिल जीत सकते हैं और न ही उनको डरा सकते हैं। लेकिन ऐसा करनेवाले की हत्या करना या उन्हें लंबी-चौड़ी सजा देना भी मेरी विनम्र राय में उचित नहीं है। ईसा मसीह ने तो उन्हें सूली पर लटकानेवाले लोगों के लिए ईश्वर को कहा था कि आप इन्हें माफ कर दीजिए, क्योंकि इन्हें पता नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं। खुद पैगंबर मुहम्मद साहब उस यहूदी महिला की सेवा में जाकर जुट गए, जो रोज़ उन पर कूड़ा फेंकती थी। महर्षि दयानंद ने अपने रसोइए जगन्नाथ को 500 रु. कल्दार दिए और नेपाल भाग जाने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें ज़हर देने के अपराध में पुलिस उसको पकड़ सकती थी। ये अदभुत उदाहरण हैं— महापुरुषों के लेकिन उनके अनुनायियों की अंधभक्ति देखिए कि किसी धर्मग्रंथ के खातिर वे किसी भी आदमी की जान लेने को तैयार हो जाते हैं। क्या ईसा मसीह, पैगंबर मुहम्मद, महर्षि दयानंद और गुरु नानक महाराज इस तरह के जघन्य कृत्य का समर्थन करते?

कतई नहीं। लेकिन निहंग सिखों ने मिलकर यह काम कर दिया। उनका गुस्सा स्वाभाविक है। जिस व्यक्ति ने उस अनुसूचित मजदूर की हत्या की है, उसे महानायक बनाकर उसका जुलूस निकाला गया और उसने स्वयं जाकर पुलिस थाने में समर्पण किया याने उस हत्या को निहंग लोग पुण्य-कार्य की श्रेणी में ले गए हैं लेकिन यह हत्या इतनी भयंकर थी कि इस तरह के हत्याकांड तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी नहीं होते। हत्यारे ने 'दोषीÓ के पहले हाथ काटे, फिर पांव काटे और फिर मार डाला। हमारे निहंगों ने गांधी के भारत को जिन्ना के पाकिस्तान और मुजीब के बांग्लादेश से भी ज्यादा नीचे गिरा दिया। उनका यह कुकृत्य उस अहिंसक किसान आंदोलन के लिए भी एक बदनुमा धब्बा बन गया है, जो अब तक सिंघु बार्डर पर शांतिपूर्वक चल रहा था। समझ में नहीं आता कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मध्यकालीन यूरोप की तरह छाया हुआ यह मजहबी नशा कब और कैसे दूर होगा? जब तक इस मजहबी नशे से भारत मुक्त नहीं होगा, वह आधुनिक नहीं बन पाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)

 


16-Oct-2021 2:02 PM (56)

-मनोज श्रीवास्तव

 

मैं 1994-96 के बीच अविभाजित मंदसौर का कलेक्टर रहा था। तब अफीम तस्करी और उपभोग के विरुद्ध तब प्रशासनिक कार्रवाइयों के अलावा जो एक कार्य अपनी व्यक्तिगत रुचि के लिए किया था, उसमें से एक था अफीम पर दोहों का संग्रह। ये दोहे मारवाड़ी थे और मेरे समझाने से ज्यादा प्रभावशाली थे। यह वर्णन उनके लिये जो उसके सेवन को बड़ा हीरोइक समझते हैं।
लालां सेडो झर झरै, अखियाँ गीड अमाप।
जीतोड़ा भोगै नरक, अमली माणस आप।

जिसके मुंह से लार टपकती रहती है, नाक से सेडा (गंदा पानी) बहता रहता है और आँखों में अपार गीड भरे रहते हंै, ऐसा अमल का नशा करने वाला मनुष्य इस संसार में जिन्दा रहकर नरक ही भोग रहा है। (मारवाड़ी में अफीम को अमल या कुसुंबा कहते हैं)

और लोग उस नरक को पार्टी बोलते हैं। कमाल है। नरक में पार्टी होती है। फिर भी लोग उसे बदनाम करते हैं।

और अफ़ीम के सप्लायर को ‘केरो केरो’ झांकने वाला बताना तो कितना ग्राफिक लगता है-
अमलां हेलो आवियौ, कांधे बाल लियांह।
केरो केरो झाँकतो, ढेरी हाथ लियांह।

जब अमल लेने के लिए आवाज हुई तो अमलदार (अफीमची) जिसके कन्धों तक बाल थे, अमल की ढेरी हाथ में लिए टेढ़ा-टेढ़ा देखता हुआ पहुंचा। ढेरी मतलब यही पुडिय़ा।

और कितना अनप्रोडक्टिव, कितना बंजर, कितना उबाऊ जीवन होता है उन लोगों का जिनके पास पाने के लिए, उपलब्धि के लिए कुछ और नहीं है-सिवाय इस डोज़ के
मीठा माथै मन रमै, बेगो बावड़ीयोह।
बंदाणी जूवां चुगै, तपतां ताबड़ीयोह।।
प्रतिदिन अमल खाने वाला (बंदाणी) धूप में बैठा अपने कपड़ों से जुएँ निकाल रहा है। नशा करने का समय नजदीक आता जा था व पास में अफीम नहीं था। इसलिए किसी को अमल लाने के लिए भेजता है व निर्देश देता है कि मुंह में मिठास आने लगा है (अर्थात नशा पूरी तरह उतरने वाला है)अत: तू अफीम लेकर के जल्दी आना ।

वहाँ के लोक में अफीम बस चुका था। उनके सामाजिक धार्मिक संस्कारों में। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वे इसके कुप्रभावों को नहीं जानते। वे इसे नागझाग कहते थे-अहिधर मुख सूं ऊपणों, अह फीण नाम अमल। (यानी सर्प के मुख से जो झाग उपजा, वो अमल नाम से जाना गया)। यह शायद संस्कृत के ‘अहिफेन’ शब्द से उपजा है। वहाँ लोकगीतों में अफीम की हिस्सेदारी थी। मांगणियार के गीतों में अफीम की मनुहारें छाई रहतीं थीं और सगाई आदि में ‘अमल’ ऑफर किए जाने पर मुँह से ‘ना’ बोलना असभ्यता मानी जाती थी और उसे छूकर प्रणाम कर लेने से ही यह संकेत माना जाता था कि इसे मना किया जा रहा है।

आज तो दुर्गा नवमी का दिन है। इन नवरात्रों और होली पर ‘रंग देने’ की एक परंपरा वहाँ थी। रंग देते हुए अपनी अनामिका से हथेली में भरे हुए अफीम से छींटा दिया जाता था। वह अमल की बेला कहलाती थी और वह पवित्र अवसरों पर होती थी जब देवी-देवताओं को रंग दिया जाता था। करनी माँ की इष्ट देवी को रंग देते हुए यह कहा जाता था कि-  
तौ सरणै खटवन तणी लोहडय़ाली लाज। आवड़ करनी आप ने रँग इधका महाराज।

यानी तुम्हारी शरण में ही सारे समाज और वर्ण की लाज है। हे करनी, हे देवी आवड़ माँ आपको खूब खूब रंग है।

और यह माँ को रंग देना ऐय्याशी के लिए नहीं, शौर्य और वीरता को सेलिब्रेट करने के लिए होता था। तब के सेलेब्रिटी कुछ और हुआ करते थे-
जबर जितायो जैतसी कामर सूं कर जंग।
उण करनल री इष्ट जो वा वड़ आवड़ रंग।।

यानी बीकानेर के शासक राव जैतसी  को हुमायूँ के भाई कामरान मिर्जा से-युद्ध में कम संसाधन होने के बावजूद विजयी बनाने वाली करनी की इष्ट देवी माँ आवड़ को रंग है।
क्या लोग थे वे भी?


16-Oct-2021 1:51 PM (54)

-रमेश अनुपम

किशोर साहू, किशोर साहू थे, अपनी तरह के एक अलग ही किरदार। एक प्रतिभाशाली अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक ही नहीं, हिंदी साहित्य में दखल रखने वाले सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखक भी।  

अशोक कुमार, देवानंद, मनोज कुमार, राजकुमार, विश्वजीत जैसे अभिनेताओं के मित्र और देविका रानी, शोभना समर्थ, स्नेहलता प्रधान, प्रतिमा दासगुप्ता, अनुराधा, शमीम, रमोला जैसी उस जमाने की सुप्रसिद्ध सीने तारिकाओं के हरदिल अजीज।

अमृत लाल नागर, इस्मत चुगतई, मंटो, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी जैसे हिंदी के मशहूर लेखक किशोर साहू के मित्र हुआ करते थे।

साधना, माला सिन्हा तथा परवीन बॉबी जैसी उस जमाने की तारिकाओं को उन्होंने पहले पहल अपनी फिल्मों में काम देकर हिंदी सिनेमा जगत से परिचित करवाया था।

किशोर साहू देवानंद के अभिन्न मित्र थे। देवानंद की नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले बन रही फिल्म ‘गाइड’ में मारको के चरित्र के लिए देवानंद को एक चरित्र अभिनेता की जरूरत थी। आर.के.नारायण के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘गाइड’ को वे अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में बना रहे थे।

अंग्रेजी फिल्म की पटकथा सुप्रसिद्ध लेखिका नोबेल प्राइज विजेता पर्ल बक लिख रही थीं और निर्देशन के लिए टेड डेनिलेविस्कि को चुना गया था। दोनों भारत भी आ चुके थे।

किशोर साहू उन दिनों मद्रास में अपनी फिल्म ‘गृहस्थी’ की शूटिंग में व्यस्त थे।

एक दिन बंबई से देवानंद का ट्रंक कॉल आया कि वे ‘गाइड’ फिल्म के सिलसिले में उनसे बात करना चाहते हैं इसलिए वे तुरंत बंबई आ जाएं।

देवानंद ने किशोर साहू को यह भी बताया की टेड और पर्ल बक भारत आ चुके हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि इस फिल्म में नायक की भूमिका वे स्वयं करेंगे तथा नायिका के रूप में वहीदा रहमान का चुनाव किया जा चुका है।

देवानंद ने फोन पर ही किशोर साहू को बताया कि ‘गाइड’ के सहनायक का चुनाव होना अभी बाकी है। उनका नाम भी सहनायक के पैनल में है इसलिए उनका बंबई आना जरूरी है।

किशोर साहू ने अपने अभिन्न मित्र देव को बताया कि ‘गृहस्थी’ की शूटिंग में व्यस्त होने के कारण फिलहाल उनका मद्रास से निकल पाना मुश्किल है। उन्होंने देव से कहा कि अच्छा होता तुम ही एक दिन के लिए मद्रास चले आते।

देव ने अपने मित्र की बात मान ली और दूसरे दिन टेड को लेकर मद्रास पहुंच गए।

दोपहर में किशोर साहू ने अपने मित्र देव को लंच पर आमंत्रित किया। देव और टेड दोनों लंच पर किशोर साहू के मद्रास स्थित बंगले पर पहुंचे।

टेड ने किशोर साहू को नजर भर देखा और देवानंद से कहा कि हमें जिस मारको की तलाश थी वे हमें किशोर साहू के रूप में मिल गए हैं।

देवानंद ने तुरंत अनुबंध पत्र निकाला और किशोर साहू से उस पर हस्ताक्षर करवा लिए। टेड और देव दोनों शाम की फ्लाइट से वापस बंबई लौट आए।

कुछ दिनों के पश्चात ‘गृहस्थी’ फिल्म की शूटिंग समाप्त कर तथा मद्रास को अलविदा कह किशोर साहू अपनी पत्नी प्रीति के साथ वापस बंबई लौट आए।

फरवरी सन 1963 में वे ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग में भाग लेने सपत्नीक उदयपुर पहुंचे। ‘गाइड’ फिल्म की पूरी यूनिट पहले ही उदयपुर पहुंच चुकी थी।

देवानंद ने पहले से ही किशोर साहू के लिए उदयपुर के लैक पैलेस होटल में रुकने का प्रबंध कर लिया था, जहां वे स्वयं तथा वहीदा रहमान, चेतन आनंद, पर्ल बक, टेड सभी ठहरे हुए थे।

‘गाइड’ फिल्म के लिए उदयपुर और चित्तौड़ का लोकेशन तय किया गया था। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं के लिए एक साथ शूटिंग की जा रही थी पर दोनों की पटकथा और निर्देशन में काफी भिन्नता थी।

अंग्रेजी फिल्म का निर्देशन टेड कर रहे थे और हिंदी फिल्म का देव के अनुज विजय आनंद कर रहे थे। पटकथा भी विजय आनंद ने ही लिखी थी। पहले इस फिल्म का निर्देशन देव के बड़े भाई चेतन आनंद करने वाले थे पर देव से कुछ मनमुटाव हो जाने के चलते बात नहीं बनी सो निर्देशन की जिम्मेदारी भी विजय आनंद पर आ गई। शायद फिल्म की अपार सफलता के लिए इस संयोग का होना भी जरूरी था।

अंग्रेजी ‘गाइड’ फिल्म जल्दी बन गई और रिलीज भी हो गई साथ ही बुरी तरह से फ्लॉप भी हो गई। टेड एक कमजोर निर्देशक साबित हुए थे।

हिंदी में बनी ‘गाइड ’ 6 फरवरी सन 1965 में रिलीज हुई। हिंदी में बनी च् गाइड च् ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। यह फिल्म सुपरहिट फिल्म साबित हुई। देवानंद, वहीदा रहमान, किशोर साहू और विजय आनंद की कभी न भुलाई जाने वाली फिल्म सिद्ध हुई।

सचिनदेव बर्मन के संगीत और शैलेंद्र के लाजवाब गीतों ने तहलका मचा दिया। हर किसी के होंठ उन गीतों को गुनगुनाने के लिए जैसे बेताब थे ये गीत आज भी उतने ही कर्णप्रिय और सुमधुर हैं जितने आज से पचपन वर्ष पूर्व थे।

‘पिया तोसे नैना लागे रे’, ‘आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है’, ‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं ’, ‘दिन ढल जाए हाय रात न जाए’, ‘वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां’ जैसे गीतों को आज भी भुला पाना मुमकिन नहीं है।

‘गाइड’ फिल्म के विषय में स्वयं किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

‘हिंदी चित्र ‘गाइड’ बढिय़ा बना। लोगों ने इसमें एक नया देवानंद देखा। वहीदा रहमान इतनी आकर्षक कभी नहीं लगी जितनी वह ‘गाइड’ में लगी है। लोगों को मेरा अभिनय भी पसंद आया। ‘गाइड’ हर दृष्टि से एक अच्छा चित्र था और वह चली भी अच्छी थी।’

एक तरह से ‘गाइड’ किशोर साहू की अंतिम फिल्म साबित हुई।

हिंदी सिनेमा का यह नायाब सितारा और छत्तीसगढ़ का लाडला तथा प्यारा 22 अगस्त सन् 1980 में बैंकाक से उड़ान भरते समय हृदयाघात से मात्र 65 वर्ष की आयु में सदा-सदा के लिए सुदूर अंतरिक्ष में विलीन हो गया।

(अगले सप्ताह केदार नाथ ठाकुर और ‘बस्तर भूषण ’...)


16-Oct-2021 11:06 AM (80)

 बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर ने अलग-अलग मौकों पर अफगानिस्तान के बारे में जो भी कहा है, वह शतप्रतिशत सही है लेकिन आश्चर्य है कि भारत की तरफ से कोई ठोस पहले क्यों नहीं है? 20 प्रमुख देशों के जी-20 सम्मेलन में दिया गया मोदी का भाषण अफगानिस्तान की वर्तमान समस्याओं या संकट का जीवंत वर्णन करता है और उसके समाधान भी सुझाता है। जैसे सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का संदर्भ देते हुए मोदी ने मांग की कि काबुल में एक सर्वसमावेशी सरकार बने, वह नागरिकों के मानव अधिकारों की रक्षा करे, वह स्त्रियों का सम्मान करे और अफगान अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाकर अफगान जनता को अकाल से बचाए। उनका सबसे ज्यादा जोर इस बात पर था कि तालिबान सरकार आतंकवाद को बिल्कुल भी प्रश्रय न दे। वह किसी भी देश का मोहरा न बने और पड़ौसी देशों में आतंकवाद को फैलने से रोके। लगभग यही बात विदेश मंत्री जिस देश में भी जाते हैं, बार-बार दोहराते रहते हैं।

ये दोनों सज्जन सिर्फ इसी बात से संतुष्ट दिखाई पड़ रहे हैं कि अफगानिस्तान के बहाने वे हर जगह पाकिस्तान को आड़े हाथों ले रहे हैं। यहां मुख्य सवाल यह है कि हमें अफगान-संकट को हल करना है या पाकिस्तान को कूटनीतिक पटकनी मारनी है? हम खुश हैं कि इस वक्त हमने पाकिस्तान को घसीटकर हाशिए में डलवा दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने अभी तक इमरान खान से हाय-हलो तक नहीं की है। हमारी यह समझ गलत है कि यह हमारी वजह से हो रहा है। यह इसलिए हो रहा है कि पाकिस्तान इस वक्त चीन की गोद में बैठा है और चीन व अमेरिका के बीच शीत-युद्ध चल रहा है। ज्यों ही चीन से अमेरिकी संबंध सहज हुए नहीं कि पाकिस्तान दुबारा अमेरिका का प्रेम-भाजन बन जाएगा।

पाकिस्तान की किस्मत में लिखा है कि वह सदैव किसी न किसी महाशक्ति का दुमछल्ला बनकर रहेगा। भारत न तो कभी किसी महाशक्ति का दुमछल्ला बना है और न ही उसे कभी बनना चाहिए लेकिन इधर उल्टा ही हो रहा है। अफगानिस्तान के मामले में ही नहीं, चौगुटे (क्वाड) के चंगुल में भी वह इस तरह फंसा हुआ है कि उसकी स्वतंत्र विदेश नीति कहीं छिपी-छिपी— सी नजऱ आने लगी है। बजाय इसके कि वह तालिबान से सीधी बात करता, जैसे कि अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और यूरोपीय समुदाय कर रहे हैं, हमारे विदेश मंत्री अन्य छोटे-मोटे देशों के चक्कर लगा रहे हैं। जो महाशक्तियां तालिबान से सीधे बात कर रही हैं, उनके मुकाबले भारत अफगानिस्तान का सबसे निकट पड़ौसी है और उसने वहां 500 से भी ज्यादा निर्माण कार्य किए हैं। क्या यह कम शर्म की बात नहीं है कि अमेरिका के निमंत्रण पर हम पहले क़तर गए और रूस के निमंत्रण पर अब हम मास्को जाकर तालिबान से चलनेवाली बात में शामिल होंगे? ये अंतरराष्ट्रीय बैठकें नई दिल्ली में क्यों नहीं होतीं? क्या भारत फुटपाथ पर खड़ा-खड़ा तमाशबीन ही बना रहेगा?
(नया इंडिया की अनुमति से)


15-Oct-2021 1:51 PM (57)

गोपाल राठी,  अनिल जैन

सावरकर के जीवन का प्रारम्भिक समय काला पानी में बीता है जिससे किसी को इनकार नहीं है। इतिहास में उनके साहस के किस्से भी दर्ज है। सावरकर मराठी के अच्छे साहित्यकार और कवि थे। उनकी 1857 के विद्रोह पर और हिंदुत्व सम्बंधित दो पुस्तकें चर्चित रही। सावरकर की मृत्यु के तुरंत बाद भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकिट जारी कर उन्हें सम्मान दिया था। 

सावरकर ने जेल से बाहर आने के लिए अंग्रेजों को समय-समय जो माफीनामे लिखे वे आज दास्तावेज के रूप में मौजूद हैं। माफीनामे में सिर्फ पिछली गलतियों की माफी ही नहीं मांगी गई है बल्कि रिहा होने के बाद स्वतन्त्रता संग्राम से दूर रहने और अंग्रेजों के वफादार रहने का वचन भी दिया गया था। जेल से रिहा होने के बाद सावरकर ने किसी आंदोलन में भाग नही लिया और हर बार अंग्रेजों के मददगार के रूप में खड़े दिखाई दिए। बताया जाता है कि उन्हें अंग्रेजो से 60 रुपये प्रति माह पेंशन मिलती थी। 

सावरकर पर गांधी जी की हत्या के मास्टरमाइंड होने का आरोप भी लगा था क्योंकि गोडसे को हत्या के लिए प्रेरित करने वाले वे ही माने जाते है। खैर सुबूतों के अभाव में सावरकर सजा से बच गए लेकिन उनके चेला गोडसे को मृत्युदण्ड दिया गया। हालांकि गांधी-हत्याकांड की जांच करने वाले जस्टिस जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता वाले आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सावरकर को हत्या की साजिश का सूत्रधार माना है। सावरकर हिन्दू महासभा नामक राजनैतिक पार्टी से जुड़े थे। जिस तरह मुस्लिम लीग मुस्लिमो की हिमायती थी उसी तरह हिन्दू महासभा हिंदुओ की। सबसे मजेदार बात यह है कि परस्पर विरोधी लगने वाली इन दोनों पार्टियों ने बाकायदा प्रस्ताव पास करके भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। बंगाल में मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने मिलकर संयुक्त सरकार बनाई थी जिसमे हिन्दू महासभा के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी उपमुख्यमंत्री थे। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अंग्रेज बहादुर को पत्र लिखकर भारत छोड़ो आंदोलन के दमन के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए और बंगाल में आंदोलन को दबाने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की थी। बाद में श्यामाप्रसाद मुखर्जी नेहरू जी की अंतरिम सरकार में केंद्रीय मंत्री बने और संविधान निर्माण समिति के सदस्य भी रहे। 

महात्मा गांधी की हत्या के बाद आज़ाद भारत मे पहली बार गृहमंत्री सरदार पटेल ने आर एस एस पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरदार पटेल ने डॉ मुखर्जी और गोलवलकर को लिखे हुए पत्रों में स्पष्ट लिखा कि संघियों द्वारा देश में फैलाई गई साम्प्रदायिक नफरत की भावना की परिणीति गांधी जी की हत्या है। संघ पर प्रतिबंध के बाद संघ को एक राजनैतिक संगठन (पार्टी ) की ज़रूरत महसूस हुई। संघ ऐसी पार्टी की कल्पना कर रहा था जिसका रिमोट कंट्रोल संघ के हाथ में हो। उस समय हिन्दू हित की पैरवी करने वाली पार्टी हिंदू महासभा संघियों के काम की नहीं थी क्योंकि इस पर संघ का कोई नियंत्रण नहीं था। हिन्दू महासभा के नेता सावरकर जैसा कोई बौद्धिक व्यक्तित्व संघियों के पास नहीं था।
 
संघियों ने हिन्दू महासभा के नेता और सावरकर जी के सहयोगी डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को बहला फुसला कर उनके नेतृत्व में 21 अक्टूबर 1951 में एक नई राजनैतिक पार्टी बनाई।  इस नई पार्टी का नाम जनसंघ था। यह पार्टी पूरी तरह संघ के नियंत्रण में थी। अब जनसंघ का नया संस्करण भाजपा पर भी संघ का ही आधिपत्य है। संघ इस पार्टी में अपनी ओर से जिला राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर संगठन मंत्री भेजता है। संघ द्वारा नियुक्त संगठनमंत्री इतना पावरफुल होता है कि पार्टी सदस्यों चुने गए अध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारी उसके सामने बौने होते है। उसकी मर्जी के बिना पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता। पार्टी में संघ की इस जकड़न को सभी महसूस करते है लेकिन कोई कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। 

जनसंघ के अध्यक्ष रहे प्रोफेसर बलराज मधोक ने इस मुद्दे पर आवाज़ उठाई लेकिन अंततः उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। डॉ मुखर्जी द्वारा जनसंघ बनाने से सावरकर और उनकी पार्टी हिन्दू महासभा को करारा झटका लगा था। सावरकर आज़ादी के बाद लगभग 19 वर्ष ज़िंदा रहे। इस बीच जनसंघ ने विभिन्न पार्टियों से राजनैतिक समझौता किये लेकिन हिन्दू महासभा से कोई समझौता नहीं हुआ। और धीरे धीरे राष्ट्रीय पार्टी रही हिन्दू महासभा के जनाधार पर जनसंघ ने कब्जा कर लिया। सावरकर जी को संघी ना किसी मीटिंग में बुलाते थे और ना आम सभा मे उनसे राजनैतिक सलाह मशविरा करना भी उचित नहीं समझते थे। उनकीं उपेक्षा उनके लोग ही करने लगे। इस तरह उपेक्षित रहते हुए हिंदुत्व के असली नायक का 22 फरवरी 1966 में निधन हो गया। इस तरह संघियों ने सावरकर की राजनैतिक विरासत पर कब्ज़ा कर लिया। भाजपा की ओर से अटल जी तीन बार पीएम है और मोदी जी दूसरी बार पीएम बने है, बहुत से प्रांतों में भाजपा की सरकार पहले भी रही है और अब भी है लेकिन किसी भी जनकल्याणकारी सरकारी योजना का नामकरण सावरकर जी के नाम पर नही किया गया। अधिकांश योजनाओं का नामकरण दीनदयाल उपाध्याय के नाम से किया गया है। सावरकर जी भले ही माफी मांग कर जेल से छूटे हों लेकिन उन्होंने वर्षो काले पानी के कठोर कारावास की सजा भुगती दूसरी तरफ दीनदयाल पंडित जी आज़ादी के आंदोलन के समय युवा थे लेकिन उन्होंने आंदोलन में भाग तक नहीं लिया। भाजपा की किसी मीटिंग, सभा, अभ्यास वर्ग आदि के आयोजनों में मंच पर  सावरकर जी की तस्वीर कभी नहीं लगाई गई। 

इससे यह साबित होता है कि सावरकर इनके प्रेरणा स्रोत नही राजनैतिक खिलौने है जिनका यह समय समय पर इस्तेमाल करते है।
 
सावरकर को भारत रत्न देने के पक्ष में जितने तर्क पेश किए गए उससे ज़्यादा मज़बूत तर्क उन्हें भारत रत्न न देने के आ आये इसलिए अटल जी की सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने का विचार त्याग दिया और मोदी सरकार भी अभी तक उन्हें भारत रत्न देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है।
 
वैसे भी भारत रत्न का इतना अधिक अवमूल्यन हो चुका है कि अब आप उसे सावरकर को तो ठीक, गोडसे को भी दे दीजिए तो कोई फर्क नहीं पडता। दुनिया में भारत की पहचान तो गांधी के नाम से ही होगी। यह प्रधान मंत्री मोदी को अपने विदेशी दौड़ी में भी समझ मे आ गया हैं। इसलिए मोदी सारे महत्वपूर्ण मेहमानों को गांधी के स्मारकों में ही ले जाते है सावरकर या गोलवलकर के स्मारकों में नहीं। 
गोपाल राठी,  अनिल जैन


15-Oct-2021 1:46 PM (64)

-आशुतोष भारद्वाज

बीसवीं सदी के पहले दशक में जब विनायक सावरकर इंग्लैंड में रहते थे, उनकी एक अंग्रेज़ युवक से दोस्ती थी। हिंदी के मुहावरे में कहें तो डेविड गारनेट उभरते हुए लेखक थे, लेकिन उनकी माँ कांस्टेंस गारनेट की अनुवादक के रूप में वैश्विक प्रसिद्धि हो चुकी थी। आधुनिक साहित्य की महानतम अनुवादकों में शुमार कांस्टेंस तोलस्तोय और चेखव समेत तमाम रूसी लेखकों का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर चुकी थीं, आगामी वर्षों में वे दोस्तोयेव्स्की के अनुवाद करने वाली थीं। ख़ुद डेविड भी बहुत जल्द वर्जीनिया वूल्फ़ के ब्लूम्सबरी समूह के सदस्य बनने वाले थे। 

डेविड गारनेट के अलावा सावरकर की दोस्ती मदन लाल धींगड़ा जैसे क्रांतिकारियों से भी थी। उन दिनों सावरकर इंग्लैंड में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए भारतीय युवकों को एकत्र कर रहे थे। १९०९ में मदन लाल ने लंदन में अभिजात्य अंग्रेज़ों की एक सभा में कर्ज़न वाइली के चेहरे पर कारतूसों से भरी अपनी पिस्तौल ख़ाली कर दी, और इससे पहले कि बदहवास अंग्रेज़ सिपाही उनकी तरफ़ दौड़ें, मदन लाल ने वही पिस्तौल अपनी कनपटी से लगाकर घोड़ा दबा दिया। अंग्रेज़ दुश्मन की हत्या करने के उन्माद में मदन भूल गये थे कि सारी गोलियाँ तो वे पहले ही वाइली के शरीर में उतार चुके थे, न उन्हें यह याद रहा कि उनके कोट की जेब में एक भरी हुई पिस्तौल और रखी थी।
मदन लाल पकड़े गए, मुक़दमा चला, फाँसी की सज़ा हुई। अंग्रेज़ों की धरती पर किसी भारतीय क्रांतिकारी द्वारा यह शायद पहली हत्या थी,वह भी अत्यंत उच्च अधिकारी की। बर्तानवी हुकूमत सकते में थी, लेकिन इससे बड़ा अचंभा अभी बाक़ी था। 

फाँसी लगने से ठीक एक दिन पहले मदन लाल का बर्तानी पुलिस को दिया ज़बरदस्त बयान, देशभक्ति में डूबा हुआ बयान, एकदम गुप्त बयान जिसे पुलिस ने अदालत में भी पेश नहीं किया था, लंदन के अख़बार ‘डेली न्यूज़’ ने छाप दिया। अंग्रेज़ समुदाय सन्न। 

यह बयान कैसे लीक हो गया? अख़बार के पास कैसे पहुँच गया? कौन सा अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी भारतीय क्रांतिकारियों से मिल गया? या इस बयान की एक प्रति और भी थी?
बाद में पता चला कि सावरकर के पास मदन लाल के बयान की मूल प्रति थी। ‘डेली न्यूज़’ के किसी सम्पादक से डेविड गारनेट की दोस्ती थी। सावरकर ने डेविड से आग्रह किया था कि क्या इस बयान को हम सार्वजनिक कर सकते हैं, डेविड ने तुरंत अपने दोस्त से सम्पर्क किया, और इस तरह एक भारतीय क्रांतिकारी का बयान एक अंग्रेज़ लेखक और अंग्रेज़ सम्पादक की मदद से लंदन के अख़बार में प्रकाशित हुआ। 

लंदन के एक अन्य अख़बार ‘द टाइम्स’ ने इस बयान को मदन लाल के अदालत में दिए वक्तव्यों से मिलाया और लिखा कि “बहुत सम्भव है धींगड़ा ने इस बयान को ख़ुद नहीं लिखा था, किसी अन्य व्यक्ति ने उनके लिए लिखा था”। 

ज़ाहिर है कि यह व्यक्ति कौन हो सकता था। 
इस घटना को एक सौ बारह बरस हुए। आज कोई भारतीय सम्पादक कश्मीर या उत्तरपूर्व के किसी 'हत्यारे अलगाववादी' का ख़ुफ़िया बयान छापता है, उसे तुरंत देशद्रोही क़रार दिया जाएगा और अगर कोई लेखक ऐसा बयान छापने में मदद करेगा, सीधा राजद्रोह के इल्ज़ाम में जेल जायेगा।


15-Oct-2021 8:40 AM (267)

-अपूर्व गर्ग

'फ्रंट लाइन' पत्रिका  में ['The Tale of Veer Savarkar', Frontline, April 7, 1995.'] सावरकर का माफ़ीनामा प्रकाशित हुआ और इसके बाद सावरकर पर बहस मुबाहिसे में कई तथ्य एक के बाद एक सामने आते गए और सावरकर की सारी वीरता पर पानी फिर गया !

ज़ाहिर है ऐसे फ्रंट लाइन जैसे तथ्य और डिबेट 1970 से पहले सामने होते तो सावरकर पर 28 मई 1970 को बीस पैसे का डाक टिकट कांग्रेस सरकार ने जो जारी किया वो शायद ही करती  !!

     इस दौरान सोशल मीडिया में  सावरकर के एक -एक पहलू पर पक्ष और विपक्ष में लोगों ने ढेर तर्क -कुतर्क सामने रखे . 1995  से पहले अगर किसी को सावरकर के माफीनामे की जानकारी न थी तो अब सबके पास बाक़ायदा उसकी प्रतिलिपि तक है .

 सावरकर को जो हीरो मानते हैं वो सावरकर पार्ट -1 का  तो काफी ज़िक्र करते हैं पर सावरकर पार्ट -2 पर चुप्पी साध लेते हैं .
 बहरहाल सावरकर के दो राष्ट्र सिद्धांत , सावरकर को वीर बनाने की थ्योरी से लेकर सावरकर और उनके चेले गोडसे पर कई नए प्रसंग सामने आये .
सावरकर पर गांधीजी की हत्या का मुकदमा चला बाद में वो बरी हुए ...पर बाद में गठित  कपूर आयोग की रिपोर्ट में उन पर सीधे ऊँगली उठाई गयी थी. 

ये भी तथ्य सामने आया कि सावरकर की जीवनी के लेखक 'चित्रगुप्त' और कोई नहीं, सावरकर स्वयं थे...
सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के विचारों के कारण हिंदूवादी संगठन के लिए  सावरकर  नायक हैं ,ये और बात है सावरकर के गाय पर विचार और स्वयं सेवकों पर उनकी टिप्पणी जो दर्ज़ है ,वो ये संगठन कभी हज़म न कर पाएंगे .

हिंदूवादी ब्रिगेड का कहना है सावरकर की सोच हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र की रही इसलिए उन पर हमले होते हैं . 

यहाँ इनसे एक सवाल हैं बहुत से क्रांतिकारियों की सोच धर्म आधारित रही उनकी वीरता पर तो किसी ने ऊँगली न उठाई .

चापेकर बंधुओं की सोच भी हिंदुत्व पर आधारित थी .वे हिन्दू धर्म  और गाय की रक्षा के लिए अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे, तीनों भाई शहीद हुए .
चापेकर बधुओं की शहादत पर तो भगत सिंह के साथ क्रांतिकारी और मार्क्सवादी लेखक शिव वर्मा ने लिखा हैं -"तमाम सीमाओं के बावजूद मुक़दमे के दौरान या बाद में, चापेकर भाइयों ने जिस वीरता, साहस और आत्मबलिदान  की भावना का परिचय दिया उसके महत्त्व को किसी भी तरह काम करके नहीं आँका जा सकता. सर ऊंचा किये हुए तीनों भाइयों ने फाँसी के फंदे को चूमा.''

सावरकर के माफीनामे, अंग्रेज़ों से मिलने वाली पेंशन, हिन्दू राष्ट्र ,गांधीहत्या काण्ड ही नहीं कई और तथ्य हैं जो चौकाते हैं . आने वाले दिनों में और भी तथ्य सामने आ सकते हैं .

भगत सिंह के क्रांतिकारी साथी और प्रसिद्ध लेखक यशपाल ने अपनी पुस्तक में बी. डी. सावरकर के बड़े भाई के बारे में जो लिखा हैं वो बहुत चौकाने वाला हैं .

यशपाल की पुस्तक ' सिंहावलोकन  ' 1952  में तीन खंडों में प्रकाशित हुई थी. इस पुस्तक के खंड -2 
में करीब सात पेज में उन्होंने उनके बड़े भाई बाबा सावरकर से मिलने का पूरा विवरण दिया हैं.
यशपाल बाबा सावरकर से अपने दल 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' [HSRA ]के लिए सहयोग  के उद्देश्य से उनसे अकोला में मिले .
इस मुलाकात में बाबा सावरकर ने यशपाल से अपना दृष्टिकोण सामने रखते हुए यशपाल से कहा --'' इस समय राष्ट्र के लिए सबसे घातक हैं जिन्ना के नेतृत्व में मुसलमानों की भारतीय राष्ट्रीयता का विरोध करना, राष्ट्र में दूसरा राष्ट्र बनाने की नीति. जिन्ना इस नीति के प्रतीक और प्रतिनिधि हैं. यदि आप लोग जिन्ना को समाप्त करने की ज़िम्मेदारी लें तो स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा दूर करने का प्रयत्न होगा. इसके लिए हम 50000 / रुपये तक का प्रबंध करने की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं .''[ सिंहावलोकन भाग -2 ,पृष्ठ -106  ]

यशपाल ने बाबा सावरकर को इंकार कर दिया, जबकि उस दौरान HSRA पैसे और हथियारों के लिए भटक रहा था ..
यशपाल ने इस पर आगे विस्तार से लिखा है. उन्होंने रेखांकित किया कि -'' मिस्टर जिन्ना के सम्बन्ध में बाबा का प्रस्ताव ऐसी मामूली बात नहीं थी ...वह सम्पूर्ण  राष्ट्र की राजनीति पर बहुत गहरा प्रभाव डालने वाली बात थी. उसका मतलब सैकड़ों-हज़ारों हिन्दू -मुसलमानों का पारस्परिक क़त्ल होता .''[सिंहावलोकन भाग -2 ,पृष्ठ -107 ]

आगे यशपाल ने लिखा है '' दिल्ली पहुँच कर मैंने भगवती भाई और आज़ाद को बाबा सावरकर से भेंट के लिए यात्रा का विवरण सुनाया. जिन्ना साहब के सम्बन्ध में बाबा का प्रस्ताव सुनकर आज़ाद झुंझला उठे -यह लोग क्या हमें पेशेवर हत्यारा समझते हैं ?'' [सिंहावलोकन भाग -2 ,पृष्ठ -110 ]

'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' ने अपने ऐसे ही महान क्रांतिकारी विचारों से आतंकवादी के आरोपों को चूर- चूर करते हिन्दुस्तान ही नहीं दुनिया के लोगों के दिलों में ख़ास जगह बनाते चले गए. इसलिए भगतसिंह-आज़ाद के सामने दक्षिणपंथी भी सर झुकाते हैं, भले ही इंकलाब ज़िंदाबाद उच्चारित न कर पाते हों !!


14-Oct-2021 8:15 PM (62)

-डॉ राजू पाण्डेय

 

पिछले तीन चार वर्ष से वी डी सावरकर को प्रखर राष्ट्रवादी सिद्ध करने का एक अघोषित अभियान कतिपय इतिहासकारों द्वारा अकादमिक स्तर पर अघोषित रूप से चलाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी सावरकर को महिमामण्डित करने वाली पोस्ट्स बहुत सुनियोजित रूप से यूज़र्स तक पहुंचाई जा रही हैं। अब ऐसा लगता है कि यह अभियान सरकारी स्वीकृति प्राप्त कर रहा है। किंतु जब ऐतिहासिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है तब हमें यह ज्ञात होता है कि सावरकर किसी विचारधारा विशेष के जनक अवश्य हो सकते हैं किंतु भारतीय स्वाधीनता संग्राम के किसी उज्ज्वल एवं निर्विवाद सितारे के रूप में उन्हें प्रस्तुत करने के लिए कल्पना, अर्धसत्यों तथा असत्यों का कोई ऐसा कॉकटेल ही बनाया जा सकता है जो नशीला भी होगा और नुकसानदेह भी।

जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था तब सावरकर भारत में विभिन्न स्थानों का दौरा करके हिन्दू युवकों से सेना में प्रवेश लेने की अपील कर रहे थे। उन्होंने नारा दिया-  हिंदुओं का सैन्यकरण करो और राष्ट्र का हिंदूकरण करो। सावरकर ने 1941 में हिन्दू महासभा के भागलपुर अधिवेशन को संबोधित करते हुए कहा कि- हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि जापान के युद्ध में प्रवेश से हम पर ब्रिटेन के शत्रुओं द्वारा हमले का सीधा और तत्काल खतरा आ गया है। इसलिए हिन्दू महासभा के सभी सदस्य सभी हिंदुओं को और विशेषकर बंगाल और असम के हिंदुओं को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे सभी प्रकार की ब्रिटिश सेनाओं में बिना एक मिनट भी गंवाए प्रवेश कर जाएं।  भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में लगे अंग्रेजों को सावरकर के इस अभियान से सहायता ही मिली। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस 1942 में जर्मनी से जापान जाकर आजाद हिंद फौज की गतिविधियों को परवान चढ़ा रहे थे तब सावरकर ब्रिटिश सेना में हिंदुओं की भर्ती हेतु  उन मिलिट्री कैम्पों का आयोजन कर रहे थे जिनके माध्यम से ब्रिटिश सेना में प्रविष्ट होने वाले सैनिकों ने आजाद हिंद फौज का उत्तर पूर्व में दमन करने में अहम भूमिका निभाई । प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम ने हिन्दू महासभा आर्काइव्ज के गहन अध्ययन के बाद बताया है कि ब्रिटिश कमांडर इन चीफ ने हिंदुओं को ब्रिटिश सेना में प्रवेश हेतु प्रेरित करने के लिए बैरिस्टर सावरकर का आभार व्यक्त किया था। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सावरकर ने हिन्दू महासभा के सभी सदस्यों से अपील की थी कि वे चाहे सरकार के किसी भी विभाग में हों (चाहे वह म्यूनिसिपैलिटी हो या स्थानीय निकाय हों या विधान सभाएं हों या फिर सेना हो) अपने पद पर बने रहें उन्हें त्यागपत्र आदि देने की कोई आवश्यकता नहीं है (महासभा इन कॉलोनियल नार्थ इंडिया, प्रभु बापू)। इसी कालखंड में जब विभिन्न प्रान्तों में संचालित कांग्रेस की सरकारें अपनी पार्टी के निर्देश पर त्यागपत्र दे रही थीं तब सिंध, उत्तर पश्चिम प्रांत और बंगाल में हिन्दू महासभा मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चला रही थी। (सावरकर: मिथ्स एंड फैक्ट्स, शम्सुल इस्लाम)।

आजकल यह भी कहा जा रहा है कि यदि सावरकर नेतृत्वकारी स्थिति में होते तो भारत का विभाजन नहीं होने देते। वस्तुस्थिति यह है कि जिन्ना द्वारा 1939 में द्विराष्ट्र के सिद्धांत के प्रतिपादन के लगभग दो वर्ष पहले ही सावरकर इस आशय के विचार व्यक्त कर चुके थे। उन्होंने हिन्दू महासभा के 1937 के अहमदाबाद में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में अध्यक्ष की आसंदी से  कहा- भारत में दो विरोधी राष्ट्र एक साथ बसते हैं, कई बचकाने राजनेता यह मानने की गंभीर भूल करते हैं कि भारत पहले से ही एक सद्भावनापूर्ण राष्ट्र बन चुका है या यही कि इस बात की महज इच्छा होना ही पर्याप्त है। हमारे यह सदिच्छा रखने वाले किन्तु अविचारी मित्र अपने स्वप्नों को ही यथार्थ मान लेते हैं। इस कारण वे सांप्रदायिक विवादों को लेकर व्यथित रहते हैं और इसके लिए सांप्रदायिक संगठनों को जिम्मेदार मानते हैं। किन्तु ठोस वस्तुस्थिति यह है कि कथित सांप्रदायिक प्रश्न हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय शत्रुता… की ही विरासत है  … भारत को हम एक एकजुट (Unitarian) और समरूप राष्ट्र के तौर पर समझ नहीं सकते, बल्कि इसके विपरीत उसमें मुख्यतः दो राष्ट्र बसे हैं: हिंदू और मुस्लिम। (समग्र सावरकर वाङ्गमय, हिन्दू राष्ट्र दर्शन, खंड 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिन्दू सभा पूना, 1963, पृष्ठ 296) इसके बाद 1938 के नागपुर अधिवेशन में उन्होंने पुनः कहा – जो मूल राजनीतिक अपराध हमारे कांग्रेसी हिंदुओं ने इंडियन नेशनल कांग्रेस आंदोलन की शुरुआत में किया और जो अभी भी वे लगातार करते आ रहे हैं वह है टेरीटोरियल नेशनलिज्म की मरु मरीचिका के पीछे भागना और इस निरर्थक दौड़ में आर्गेनिक हिन्दू नेशन को बाधा मानकर उसे कुचलना।

1937 में सावरकर ने द्विराष्ट्र सिद्धांत की स्पष्ट सार्वजनिक अभिव्यक्ति की किन्तु इसके बीज तो उनके द्वारा 1923 में रचित हिंदुत्व नामक पुस्तक में ही बड़ी स्पष्टता से उपस्थित थे।

जिन्ना और उनके सहयोगी द्विराष्ट्र के सिद्धांत का जहर भारतीय समाज में फैलाने और देश के विभाजन हेतु अवश्य ही उत्तरदायी हैं किंतु देश के बंटवारे में सावरकर के विचारों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। संघ परिवार द्वारा स्वीकृत और प्रशंसित इतिहासकार आर सी मजूमदार लिखते हैं- साम्प्रदायिक आधार पर बंटवारे के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार एक बड़ा कारक ---------- हिन्दू महासभा थी------------- जिसका नेतृत्व महान क्रांतिकारी नेता वी डी सावरकर कर रहे थे। (स्ट्रगल फ़ॉर फ्रीडम, भारतीय विद्या भवन, 1969, पृष्ठ 611) आम्बेडकर ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया(1946) में सावरकर के द्विराष्ट्र सिद्धांत और अखंड भारत की उनकी अवधारणा के छद्म को उजागर किया है। आंबेडकर लिखते हैं-  वे चाहते हैं कि हिन्दू राष्ट्र प्रधान राष्ट्र हो और मुस्लिम राष्ट्र इसके अधीन सेवक राष्ट्र हो। यह समझ पाना कठिन है कि हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र के बीच शत्रुता का बीज बोने के बाद सावरकर यह इच्छा क्यों कर रहे हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक संविधान के अधीन एक देश में रहना चाहिए।(पृष्ठ 133-134)

15 अगस्त 1943 को सावरकर ने नागपुर में कहा-  मेरा श्री जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत से कोई विरोध नहीं है। हम हिन्दू अपने आप में एक राष्ट्र हैं और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग अलग राष्ट्र हैं। (निरंजन तकले द्वारा उद्धृत द वीक, अ लैम्ब लायनाइज़ड,24 जनवरी 2016) इसी आलेख में निरंजन सावरकर और तत्कालीन वाइसराय लिनलिथगो की मुंबई में 9 अक्टूबर 1939 को हुई मुलाकात का उल्लेख करते हैं जिसके बाद लिनलिथगो ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फ़ॉर इंडिया लार्ड ज़ेटलैंड को एक रिपोर्ट भेजी जिसमें लिखा गया था- सावरकर ने कहा स्थिति अब यह है कि महामहिम की सरकार हिंदुओं की ओर उन्मुख हो और उनके सहयोग से कार्य करे। ----- सावरकर के अनुसार अब हमारे हित एक जैसे थे और हमें  एक साथ कार्य करना आवश्यक था। उन्होंने कहा- हमारे हित परस्पर इतनी नजदीकी से जुड़े हुए हैं कि हिंदुइज्म और ग्रेट ब्रिटेन के लिए मित्रता जरूरी है और पुरानी शत्रुता अब महत्वहीन हो गई है।

एक ऐतिहासिक प्रसंग और है जो सावरकर की पसंद और प्राथमिकताओं को दर्शाता है। यह भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य के सबसे विवादित व्यक्तित्वों में से एक सी पी रामास्वामी से संबंधित है। अतिशय महत्वाकांक्षी, स्वेच्छाचारी, सिद्धांतहीन, अधिनायकवादी चिंतन से संचालित और पुन्नापरा वायलार विद्रोह के बर्बर दमन के कारण जनता में अलोकप्रिय सी पी रामास्वामी ने 18 जून 1946 को त्रावणकोर के महाराजा को अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद अपनी रियासत को स्वतंत्र घोषित करने के लिए दुष्प्रेरित किया। सी पी रामास्वामी ने इसके बाद पाकिस्तान के लिए अपना प्रतिनिधि भी नियुक्त कर दिया। 20 जून 1946 को सी पी रामास्वामी को जिन्ना का तार मिला जिसमें उन्होंने सी पी के कदम की प्रशंसा की थी। किंतु इसी दिन एक और तार उन्हें प्राप्त हुआ, शायद वे इसकी अपेक्षा भी नहीं कर रहे थे- यह तार था सावरकर का- जिसमें उन्होंने हिन्दू राज्य त्रावणकोर की स्वतंत्रता की घोषणा के दूरदर्शितापूर्ण और साहसिक निर्णय के लिए सी पी की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। (अ नेशनल हीरो, ए जी नूरानी, फ्रंट लाइन, वॉल्यूम 21, इशू 22, अक्टूबर 23 से नवंबर 5, 2004)

मनु एस पिल्लई ने उल्लेख किया है कि सावरकर ने 1944 में जयपुर के राजा को लिखे एक पत्र में हिन्दू महासभा की रणनीति का खुलासा करते हुए बताया कि हिन्दू महासभा कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और मुसलमानों से हिन्दू राज्यों के सम्मान, स्थिरता और शक्ति की रक्षा के लिए हमेशा उनके साथ खड़ी है। सावरकर ने लिखा हिन्दू राज्य हिन्दू शक्ति के केंद्र हैं और इसलिए वे स्वाभाविक रूप से हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में सहायक होंगे। राजाओं ने सावरकर के विचारों पर एकदम अमल तो नहीं किया किन्तु उनके विचारों से सहमति व्यक्त की और अनेक राजाओं के साथ हिन्दू महासभा की बैठकें भी हुईं। ये बैठकें मैसूर और बड़ोदा जैसे आधुनिक और विकसित रियासतों के साथ भी हुईं किंतु हिन्दू महासभा को खूब समर्थन  परंपरावादी रियासतों से ही मिला।(सावरकरस थ्वार्टेड रेसियल ड्रीम, 28 मई 2018,लाइव मिंट)।

मनु एस पिल्लई ने 1940 में सावरकर के उनके छद्म नाम (एक मराठा) से प्रकाशित एक आलेख का उल्लेख किया है जिसमें सावरकर ने लिखा था कि यदि गृह युद्ध की स्थिति बनी तो हिन्दू रियासतों में सैनिक कैम्प तत्काल उठ खड़े होंगे। इनका विस्तार उत्तर में उदयपुर और ग्वालियर तक और दक्षिण में मैसूर और त्रावणकोर तक होगा। तब दक्षिण के समुद्र और उत्तर की यमुना तक मुस्लिम शासन का लेश मात्र भी नहीं बच पाएगा। पंजाब में सिख लोग मुसलमान जनजातियों को खदेड़ देंगे और स्वतंत्र नेपाल हिन्दू विश्वास के रक्षक तथा हिन्दू सेनाओं के कमांडर के रूप में उभरेगा। नेपाल हिंदुस्थान के हिन्दू साम्राज्य के राजसिंहासन के लिए भी दावेदार बन सकता है। (सावरकरस थ्वार्टेड रेसियल ड्रीम, 28 मई 2018,लाइव मिंट)।

इन राजाओं की रुचि हिन्दू राष्ट्र की स्थापना में कम और अपने शानोशौकत तथा ऐशोआराम भरे जीवन को जारी रखने में अधिक थी तथा ये ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी वफादारी व्यक्त करने के ज्यादा इच्छुक थे। इन राजाओं की रियासतों के छोटे आकार, आपसी बिखराव और जनता में इनकी अलोकप्रियता के कारण हिन्दू राष्ट्र निर्माण का सावरकर का सपना साकार नहीं हो पाया।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)


14-Oct-2021 12:04 PM (46)

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
जब हरिशंकर परसाई को मैंने कार्यक्रम में निमंत्रित करने हेतु पत्र लिखा तो उन्होंने पारिश्रमिक की मांग रखी तो उसके उत्तर में मैंने उन्हें याद दिलाया- ‘हम आपको कवि सम्मेलन नहीं वरन भाषण देने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं’ तो उन्होंने जवाब दिया- ‘महोदय, न तो मैं कहीं नौकरी करता और न ही मेरी कोई दुकान है। लिखना और बोलना ही मेरा रोजगार है, इसे समझकर निर्णय लीजिए।’ हमने उनकी बात मानी और उन्हें बुलाया।

बिलासपुर के राघवेंद्र राव सभा भवन में सैकड़ों नागरिकों की उपस्थिति में वह कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम में उपस्थित स्थानीय गल्र्स कॉलेज के हिंदी विभाग की अध्यक्ष ने उनके कॉलेज में भी हरिशंकर परसाई का भाषण रखवाने का मुझसे अनुरोध किया। मैंने परसाईजी से बात की तो थोड़ी ना-नुकुर के बाद उन्होंने अगली दोपहर एक बजे का समय दे दिया।

अगले दिन कॉलेज के सभागार में मंच पर परसाईजी के साथ प्राचार्य और विभागाध्यक्ष बैठी। स्वागत भाषण एवं परिचय के पश्चात परसाईजी ने भाषण देने के लिए माइक संभाला और संबोधन आदि की औपचारिकता के पश्चात परसाईजी ने कहा- ‘बुजुर्ग होने के नाते तुम बच्चियों को मेरी सलाह है कि तुम लोग अपने माता-पिता की मर्जी से नहीं बल्कि घर से भागकर विवाह करना।’

उनके प्रथम वाक्य को सुनकर लड़कियों से भरा सभागार हँसी-ठहाके से सराबोर हो गया, मेरी जान सूख गई और मैं बाहर भागने के उपाय देखने लगा पर अपनी साँस थामे बैठे रहा। शांति स्थापित होने के पश्चात परसाईजी ने बात आगे बढ़ाई-‘मैं जबलपुर के नेपियर टाउन में रहता हूँ। प्रत्येक सुबह मैं सैर के लिए जाया करता हूँ। मेरी ही उम्र के एक पड़ोसी भी मेरे साथ जाया करते थे। लौटकर पड़ोसी के घर में चाय और गपशप होती थी। उनकी विवाह योग्य दो कन्याएं थी, जो कॉलेज में पढ़ती थी, जो हमारे लिए चाय लाया करती थी। अचानक पड़ोसी महोदय ने सुबह घूमने जाना बंद कर दिया और लंबे समय तक विलुप्त रहने के पश्चात एक सुबह फिर मिल गए। मैंने उनसे पूछा- ‘कहाँ थे इतने दिन, दिखाई नहीं पड़े?’

- मैं मुंह दिखाने लायक न रहा, परसाईजी। वे बोले।

- क्या हुआ ?

- कुछ न पूछिए, अपनी दुर्दशा क्या बताऊँ?

- बताने लायक हो तो बताओ।

- अब आपसे क्या छुपाना, दो लडक़े मेरे घर आया जाया करते थे। मेरी दोनों लड़कियों ने घर से भागकर उनके साथ विवाह कर लिया।

- तो क्या गलत हुआ? आपकी लड़कियों ने ठीक किया।

- आप क्या कहते हैं, परसाईजी ? एक तो मेरे घर इतना बड़ा काण्ड हो गया, आप उपहास कर रहे हैं।

- नहीं, ऐसी बात नहीं, अच्छा, एक बात बताओ, लड़कियों की शादी के लिए कितना पैसा इक_ा किया था?

- नहीं, पास में तो कुछ नहीं था लेकिन जरूरत पडऩे पर ‘प्रॉविडेंट फंड’ से कर्ज लेता।

- और गहने?

- श्रीमती के जो आभूषण हैं, उन्हीं से काम चलाते।

- फिर तो आपकी बच्चियों ने बहुत ही अच्छा काम किया, आपके पैसे और आभूषण दोनों बच गए और लडक़े खोजने में दस-बीस घटिया लोगों के पैर पकडऩे पड़ते, आप उससे भी बच गए।

- वो सब ठीक है परसाईजी, लेकिन समाज में मेरी इज्जत चली गई, उसका क्या? मेरी तो किसी से बात करने की हिम्मत नहीं होती।

- चलिए छोडि़ए समाज को, बच्चियां कहाँ हैं ?

- उनका तो नाम मत लीजिए, वे दोनों मर गई हमारे लिए।

फिर किसी एक सुबह जब मैं अपने मित्र के साथ प्रात: भ्रमण के पश्चात उनके घर गया तो देखता हूँ कि उनकी दोनों लड़कियां नास्ते और चाय की ट्रे लेकर चली आ रही हैं। लड़कियों के वहां से चले जाने के बाद मैंने उनसे पूछा-

- अरे ये क्या, आप तो कह रहे थे कि आपके लिए दोनों लड़कियां मर गई?

- हाँ परसाईजी, उस समय मैं गुस्से में था लेकिन बाद में समझ आया कि मेरी लड़कियों ने बुद्धिमानी की। कहाँ से मैं उनके लिए दहेज जोड़ता, कहाँ मैं दो-दो लड़कियों के लिए वर खोजता? सब मिलाकर ठीक ही हुआ।

इसीलिए मैंने तुम सबको घर से भागकर शादी करने की सलाह दी। मेरी इस बात को सुनकर तुम सबको जो हँसी आई तो वह ‘हास्य’ है और यदि मेरी बात पर तुम्हें लड़कियों के माँ-बाप की दयनीय स्थिति याद आए, समाज में लड़कियों के विवाह में प्रचलित कुरीतियाँ याद आएं, वह मजबूरी याद आए, जब घर से भागकर शादी करने वाली लडक़ी को उसका बाप बुद्धिमान माने, आपको मेरी सलाह पर हँसी न आए, दिल कचोट जाए- तो वह ‘व्यंग्य’ है।’

जब हास्य और व्यंग्य का अंतर स्थापित हो गया, कुछ क्षणों के लिए सभागार में सन्नाटा छा गया। कुछ देर बाद एक ताली बजी और उसके बाद असंख्य तालियों की गडग़ड़ाहट से पूरा कॉलेज गूँज उठा। हरिशंकर परसाई अपने अर्थपूर्ण शब्दों के माध्यम से श्रोताओं के ह्रदय में उतर गए।
(आत्मकथा ‘कहाँ शुरू कहाँ खत्म’ का एक अंश)


14-Oct-2021 10:57 AM (60)

 बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर पर एक पुस्तक का विमोचन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत और रक्षा मंत्री राजनाथसिंह ने सावरकर पर किए जाने वाले आक्षेपों का कड़ा प्रतिवाद किया है। उन्होंने सावरकर को बेजोड़ राष्ट्रभक्त और विलक्षण स्वातंत्र्य-सेनानी बताया है लेकिन कई वामपंथी और कांग्रेसी मानते हैं कि सावरकर माफी मांगकर अंडमान-निकोबार की जेल से छूटे थे, उन्होंने हिंदुत्व की संकीर्ण सांप्रदायिकता फैलाई थी और उन्होंने ही गांधी के हत्यारे नाथूराम गोड़से को आशीर्वाद दिया था। गांधी-हत्याकांड में सावरकर को भी फंसा लिया गया था, लेकिन उन्हें ससम्मान बरी करते हुए जस्टिस खोसला ने कहा था कि इतने बड़े आदमी को फिजूल ही इतना सताया गया। स्वयं गांधीजी सावरकर से लंदन के 'इंडिया हाउसÓ में 1909 में मिले और 1927 में वे उनसे मिलने रत्नागिरी में उनके घर भी गए। दोनों में अहिंसा और उस समय की मुस्लिम सांप्रदायिकता को लेकर गहरा मतभेद था। सावरकर अखंड भारत के कट्टर समर्थक थे लेकिन जिन्ना के नेतृत्व में खड़े दो राष्ट्रों की सच्चाई को वे खुलकर बताते थे। वे मुसलमानों के नहीं, मुस्लिम लीगियों के विरोधी थे।

हिंदू महासभा के अपने अध्यक्षीय भाषणों में उन्होंने सदा हिंदुओं और मुसलमानों के समान अधिकार की बात कही। उनके विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ '1857 का स्वातंत्र्य-समरÓ में उन्होंने बहादुरशाह जफर, अवध की बेगमों तथा कई मुस्लिम फौजी अफसरों की बहादुरी का मार्मिक वर्णन किया है। जब वे लंदन में पढ़ते थे तो आसफअली, सय्यद रजा हैदर, सिकंदर हयात खां, मदाम भिकायजी कामा वगैरह उनके अभिन्न मित्र होते थे। उन्होंने खिलाफत आंदोलन का विरोध जरुर किया। गांधीजी उसके समर्थक थे लेकिन वही आंदोलन भारत-विभाजन की नींव बना।
यह ठीक है कि सावरकर का हिंदुत्व ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा का आधार बना लेकिन सावरकर का हिंदुत्व संकीर्ण और पोंगापंथी नहीं था। सावरकर की विचारधारा पर आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद और उनके भक्त श्यामजी कृष्ण वर्मा का गहरा प्रभाव था। वे इतने निर्भीक और तर्कशील थे कि उन्होंने वेदों की अपौरूषेयता, गौरक्षा, फलित ज्योतिष, व्रत-उपवास, ब्राह्मणी कर्मकांड, जन्मना वर्ण-व्यवस्था, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि को भी अमान्य किया है।वे ऐसे मुक्त विचारक और बुद्धिजीवी थे कि उनके सामने विवेकानंद, गांधी और आंबेडकर भी कहीं-कहीं फीके पड़ जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी उनके सभी विचारों से सहमत नहीं हो सकता। सावरकर के विचारों पर यदि मुल्ला-मौलवी छुरा ताने रहते थे तो पंडित-पुरोहित उन पर गदा प्रहार किया करते थे। जहां तक सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार से माफी मांगने की बात है, इस मुद्दे पर मैंने कई वर्षों पहले 'राष्ट्रीय संग्रहालयÓ के गोपनीय दस्तावेज खंगाले थे और अंग्रेजी में लेख भी लिखे थे।

उन दस्तावेजों से पता चलता है कि सावरकर और उनके चार साथियों ने ब्रिटिश वायसराय को अपनी रिहाई के लिए जो पत्र भेजा था, उस पर गवर्नर जनरल के विशेष अफसर रेजिनाल्ड क्रेडोक ने लिखा था कि सावरकर झूठा अफसोस जाहिर कर रहा है। वह जेल से छूटकर यूरोप के आतंकवादियों से जाकर हाथ मिलाएगा और सरकार को उलटाने की कोशिश करेगा। सावरकर की इस सच्चाई को छिपाकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश कई बार की गई। अंडमान-निकोबार जेल से उनकी नामपट्टी भी हटाई गई लेकिन मैं तो उस कोठरी को देखकर रोमांचित हो उठा, जिसमें सावरकर ने बरसों काटे थे और जिसकी दीवारों पर गोदकर सावरकर ने कविताएं लिखी थीं।

(नया इंडिया की अनुमति से)

 


13-Oct-2021 11:28 AM (42)

भारत में बिजली की गंभीर कमी होने की बात कही जा रही है. विद्युत मंत्री जहां कोयले कमी की को नकार रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से पावर प्लांट में कोयले की कमी का निरीक्षण कराए जाने की खबरें हैं.

    डॉयचे वैले पर अविनाश द्विवेदी का लिखा-

कई पावर प्लांट्स में बिजली उत्पादन के लिए बिल्कुल भी कोयला न होने की खबरें हैं. इसके लिए मॉनसून के दौरान कोयला खनन में आई गिरावट और कोरोना की दूसरी लहर के बाद बढ़ी बिजली की मांग को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. हालांकि सरकार की ओर से अब तक इस मामले पर जो प्रतिक्रिया आई है, वह उलझाने वाली है. विद्युत मंत्री ने कोयले की कमी की होने की बात को पूरी तरह नकार दिया था. वहीं मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से थर्मल पावर प्लांट में कोयले की कमी का निरीक्षण किया जा रहा है.

कोयोले की कमी की खबरों में कितनी सच्चाई है, इसे समझने के लिए डीडब्ल्यू ने 'कोयला घोटाले' के नाम से मशहूर कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले के मामले में मुख्य याचिकाकर्ता रहे छत्तीसगढ़ के वकील और एक्टिविस्ट सुदीप श्रीवास्तव से बात की. इस मामले में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2014 में कोयल ब्लॉक आवंटन को मनमाना और गैरकानूनी ठहराया था. सुदीप इस मुद्दे पर भी सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं कि चूंकि भारत के 15 फीसदी से भी कम हिस्से में घने वन बचे हैं, इसलिए कोयले की मांग को पूरा करने के लिए इसे नहीं छुआ जाना चाहिए.

वह दावा करते हैं, "भारत में कोयले की पर्याप्त मौजूदगी है और राज्यों के अंतर्गत आने वाले पावर प्लांट्स में इसकी कमी की अलग-अलग वजहें हैं." वह यह भी कहते हैं, "भारत के किसी भी कोने में पावर प्लांट हो, कोयला पहुंचाने में अधिकतम तीन दिनों का समय लगेगा. बाकी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के पावर प्लांट्स में यह कुछ घंटों में पहुंचाया जा सकता है, ऐसे में यह डर बेवजह बनाया गया है."
बिजली कमी में कितनी सच्चाई?

सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, पिछले साल अप्रैल से सितंबर के बीच छह महीनों में कोयले का उत्पादन 28.2 करोड़ टन था. इस साल यह 31.5 करोड़ टन रहा है. यानी इसमें 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. कोरोना काल में इस पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है क्योंकि इस दौरान सरकारी कंपनियां काम कर रही थीं. आम तौर पर मॉनसून के दौरान उत्पादन में कमी आती है लेकिन आंकड़े स्पष्ट कर रहे हैं कि इस बार पिछले साल से ज्यादा उत्पादन हुआ है. साल भर को पैमाना मानें तो भी 2019-20 के मुकाबले कोयला उत्पादन में खास कमी नहीं है.

कोल इंडिया के एक अधिकारी ने भी नाम न छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताया, "राज्य सरकारों के अंतर्गत आने वाले पावर प्लांट और एनटीपीसी जैसी सरकारी कंपनियों को कोयले की सप्लाई फ्यूल सप्लाई अग्रीमेंट (FSA) के तहत होती है. इसके बाद कोयले की सप्लाई पहले ही कर दी जाती है और भुगतान बाद में लिया जाता है. कई राज्यों ने समय से भुगतान नहीं किया है, जिसके चलते कोल इंडिया ने इनकी सप्लाई रोक दी है." ऐसा करने वाले चार बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और राजस्थान हैं.
'जान-बूझकर बनाया खतरा'

जानकार मानते हैं कि कोल इंडिया की आपूर्ति रुकने के बाद भी चिंता नहीं होनी चाहिए. सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, "भारत के पास जल, सौर और पवन ऊर्जा के जरिए करीब 1.4 लाख मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता है. बिजली वितरण कंपनियों से इसका इस्तेमाल करने के लिए क्यों नहीं कहा जा रहा? भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में कोयला और लिग्नाइट का हिस्सा 56 फीसदी है. लेकिन कुल बिजली उत्पादन का 76 फीसदी इनसे आता है. यानी हम अन्य स्रोतों की आधी क्षमता का भी इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं."

वह कहते हैं, "भारत की कुल उत्पादन क्षमता करीब 3.9 लाख मेगावाट है. लेकिन बिजली की अधिकतम मांग अब तक 2 लाख मेगावाट से ज्यादा नहीं रही है. ऐसे में तब तक खतरा नहीं होना चाहिए, जब तक उसे जान-बूझकर न खड़ा किया जाए." वह मानते हैं कि इसके पीछे कई स्तर पर प्राइवेट कंपनियों का हाथ है. ऐसा माहौल इन कंपनियों के लिए कानूनी छूट का प्रबंध करने के लिए बनाया जा रहा है. इसलिए विद्युत मंत्रालय ऐसे पावर प्लांट्स की लिस्ट नहीं जारी कर रहा, जिनके पास सिर्फ चार दिनों का कोयला बचा हुआ है."
कोल ब्लॉक भी चाह रही हैं कंपनियां

सुदीप बताते हैं, "प्राइवेट कंपनियां अच्छी कोयला क्षमता वाली जमीनों को हथियाना चाह रही हैं. ये कंपनियां कोल बियरिंग एरियाज एक्विजीशन एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1957 के तहत भी आना चाह रही हैं. इस कानून के तहत किसी जमीन पर रहने वाले लोगों को मुआवजा देने से पहले ही वहां कोयले का खनन शुरू किया जा सकता है. अभी तक कोल इंडिया जैसी कंपनियों को इस कानून के तहत कोयला खनन का अधिकार है. अब प्राइवेट कंपनियां भी चाहती हैं कि यह कानून उन पर लागू हो."

ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगलों में आने वाले पारसा कोल ब्लॉक का भी है. राजस्थान सरकार के अंतर्गत आने वाली विद्युत कॉरपोरेशन कंपनी राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को हजारों किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ में यह कोल ब्लॉक दिया गया था. उसने फिलहाल इसे खनन के लिए अडानी इंटरप्राइजेज को दे दिया है. यानी अपनी ही आवंटित जमीन से राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड बहुत महंगा कोयला खरीद रहा है.

सुदीप कहते हैं, "ये प्राइवेट कंपनियां, बिजली बेचने के दौरान खुले बाजार की बातें करती हैं लेकिन कोल ब्लॉक आवंटन जैसे मामलों में सरकारी छूट चाहती हैं. इनका ऐसा दोहरा रवैया क्यों है."
लोगों को चुकाने होंगे ज्यादा पैसे

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार की ओर से टाटा पावर और अडानी पावर को एक्सचेंज पर राज्यों को और बिजली बेचने का निर्देश दिया गया है. ऐसा एक्सचेंज पर बिजली के दाम औसतन 16 रुपये प्रति यूनिट तक चले जाने के बाद किया गया है. बिजली एक्सचेंज पर बिजली खरीदी-बेची जा सकती है. यहां मांग-आपूर्ति के हिसाब से बिजली का दाम तय होता है, यानी इसके दामों में बढ़ोतरी और गिरावट होती रहती है.

इस निर्देश के बाद अडानी पावर और टाटा पावर अपने आयातित कोयला आधारित गुजरात के प्लांट्स में एक या दो दिनों में बिजली उत्पादन शुरू कर सकते हैं. जानकार मानते हैं, जाहिर है कि इससे दामों में बहुत थोड़ी ही कमी होगी.

खास असर न होने की एक वजह यह भी है कि अब तक भारत में ज्यादातर आयातित कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स काम नहीं कर रहे हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कोयला बाजारों में कोयले के दाम 150 डॉलर प्रति टन तक के स्तर पर पहुंच चुके हैं. अडानी पावर और टाटा पावर देश के कई राज्यों से बिजली बेचने का करार भी कर रहे हैं. जानकार कहते हैं सभी बातें इस दिशा में बढ़ रही हैं कि जल्द ही भारत में बिजली उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की भूमिका बढ़ने वाली है और लोगों को बिजली के लिए ज्यादा पैसा चुकाना होगा. (dw.com)


13-Oct-2021 10:56 AM (39)

 बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया श्री मोहन भागवत ने यह बिल्कुल ठीक कहा है कि शादी की खातिर धर्म-परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए। अक्सर यह देखा जाता है कि जब किसी हिंदू और मुसलमान लड़के और लड़की के बीच शादी होती है तो उनमें से कोई एक अपना धर्म-परिवर्तन करवा लेता है। कई बार तो यह भी देखा गया है कि शादी भी इसीलिए की जाती है कि किसी का धर्म-परिवर्तन करवाना है। यह तो धर्म-परिवर्तन नहीं, धर्म-हनन है। यह अधर्म नहीं तो क्या है? शादी का लालच तो रूपयों और ओहदों के लालच से भी बुरा है। धर्म-परिवर्तन वही किसी हद तक ठीक माना जा सकता है, जो बहुत सोच-समझकर, पढ़-लिखकर और लालच व भय के बिना किया जाए।

दुनिया में ज्यादातर धर्म-परिवर्तन भय, लालच या धोखे से किए जाते हैं। ईसाइयत और इस्लाम का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है। यदि ऐसी घटनाएं स्वयं ईसा मसीह या पैगंबर मुहम्मद के सामने होतीं तो क्या वे उन्हें उचित ठहराते? बिल्कुल नहीं। तो उनके अनुयायी यही सब कुछ करने पर क्यों तुले रहते हैं? इसका कारण उनकी अंधभक्ति और अज्ञान है। इसी कारण यूरोप और पश्चिम एशिया में खून की नदियां बहती रहीं। इन मुल्कों में महत्वाकांक्षी लोगों ने मजहब को सत्ता और अय्याशी के साधन के रुप में इस्तेमाल किया। भारत भी इस प्रवृत्ति का शिकार कई बार हुआ लेकिन अब जो आधुनिक भारत है, उसे अपने आप को इस अंधकूप में गिरने से बचाना होगा।


दो व्यक्तियों में यदि पति-पत्नी का संबंध बनता है और उसका आधार परस्पर प्रेम और पसंदगी है तो उससे बड़ा धर्म कोई नहीं है। सारे धर्म और मजहब उसके आगे छोटे पड़ जाते हैं। मज़हब तो माँ-बाप का दिया होता है और मोहब्बत तो खुद की पैदा की हुई होती है। मजहबमजबूरी है और मोहब्बत आजादी है। इस आजादी को आप मजबूरी का गुलाम क्यों बनाएँ? पति और पत्नी, दोनों को अपना-अपना नाम,काम और मजहब बनाए रखने की आजादी क्यों नहीं होनी चाहिए? मेरे ऐसे दर्जनों मित्र देश और विदेशों में हैं, जिन्होंने अंतरधार्मिक शादियाँ की हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी अपना धर्म-परिवर्तन नहीं करवाया। भारत में तो धर्म से भी ज्यादा जातियों ने कहर ढाया है। धर्म तो बदल सकता है लेकिन आप जाति कैसे बदलेंगे? अंतरजातीय विवाह ही जातिवाद को खत्म कर सकता है। यदि भारत में अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाह बड़े पैमाने पर होने लगें तो राष्ट्रीय एकता तो मजबूत होगी ही, लोगों के जीवन में समरसता और आनंद का अतिरिक्त संचार भी तेजी से होगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)

 


13-Oct-2021 10:10 AM (35)

-प्राण चड्ढा 

अंग्रेज जंगल में भी जब रेस्ट हाउस बनवाते तो सड़क से दूर हट कर ताकि कोई दखलंदाजी न हो शोर गुल ना है। छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व  में पहले बिलासपुर-अमरकंटक रोड पर अचानकमार, छपरवा और लमनी में एक ही वास्तुशिल्प के तीन रेस्ट हाउस हैं। जहां सैलानी गतिविधियां अब प्रतिबंधित हैं। यहां रस्सी से खींचने वाला पंखा और शीतकाल में आग सेंकने का बंदोबस्त भीतर है।

''कोई मानेगा ''अचानकमार टायगर रिजर्व'[छत्तीसगढ़] का ये डाक बंगला महज 2573 रूपये में कभी बना होगा ..?
पर हकीकत यही है. 

घने जंगल में समुद्र सतह से 1468 फीट की ऊंचाई पर ये रेस्ट हाउस सन 1911 में बना था अब ये कोर एरिया में है ,, यहाँ सैलानी अब नहीं ठहरते, इसे म्यूजियम का रूप दे दिया गया है, ये कैंप कार्यालय का हिस्सा है ! 

सैलानी अब रिजर्व के बाहरी क्षेत्र शिवतराई में नए बने आवासीय स्थल में रुकते हैं!


12-Oct-2021 12:12 PM (56)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

क्या नरेंद्र मोदी तानाशाह हैं? एक टीवी चैनल के इस प्रश्न का जवाब देते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि नहीं, बिल्कुल नहीं। यह विरोधियों का कुप्रचार-मात्र है। नरेंद्र मोदी सबकी बात बहुत धैर्य से सुनते हैं। इस समय मोदी सरकार जितने लोकतांत्रिक ढंग से काम कर रही है, अब तक किसी अन्य सरकार ने नहीं किया। देश के भले के लिए मोदी आनन-फानन फैसले करते हैं और छोटे-से-छोटे अफसर से सलाह करने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता। अमित शाह ने ऐसे कई कदम गिनाए, जो मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए उठाए और उन अपूर्व कदमों से लोक-कल्याण संपन्न हुआ। अमित भाई के इस कथन से कौन असहमत हो सकता है? क्या हम भारत के किसी भी प्रधानमंत्री के बारे में कह सकते हैं कि उसने लोक-कल्याण के कदम नहीं उठाए? चंद्रशेखर, देवगौड़ा और इंदर गुजराल तो कुछ माह तक ही प्रधानमंत्री रहे लेकिन उन्होंने भी कई उल्लेखनीय कदम उठाए। शास्त्रीजी, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह और वि.प्र. सिंह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने भी भरसक कोशिश की कि वे जनता की सेवा कर सकें।

जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, नरसिंहराव, अटलजी और राजीव गांधी की आप जो भी कमियाँ गिनाएँ लेकिन इन पूर्वकालिक प्रधानमंत्रियों ने कई एतिहासिक कार्य संपन्न किए। मनमोहनसिंह हालांकि नेता नहीं हैं लेकिन प्रधानमंत्री दो अवधियों तक रहे और उन्होंने भी अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने में उल्लेखनीय योगदान किया। इसी प्रकार नरेंद्र मोदी भी लगातार कुछ न कुछ योगदान कर रहे हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यदि उनका योगदान शून्य होता तो भारत की जनता उन्हें 2019 में दुबारा क्यों चुनती ? उनका वोट प्रतिशत क्यों बढ़ जाता? सारा विपक्ष मोदी को अपदस्थ करने के लिए बेताब है लेकिन वह एकजुट क्यों नहीं हो पाता है? क्योंकि उसके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है। उसके पास न तो कोई नेता है और न ही कोई नीति है। यह तथ्य है, इसके बावजूद यह मानना पड़ेगा कि देश की व्यवस्था में हम कोई मौलिक परिवर्तन नहीं देख पा रहे हैं। यह ठीक है कि कोरोना महामारी का मुकाबला सरकार ने जमकर किया और साक्षरता भी बढ़ी है।

धारा 370 और तीन तलाक को खत्म करना भी सराहनीय रहा। गरीबों, पिछड़ों, दलितों, किसानों और सभी वंचितों को तरह-तरह के तात्कालिक लाभ भी इस सरकार ने दिए हैं लेकिन अभी भी राहत की पारंपरिक राजनीति ही चल रही है। इसका मूल कारण हमारे नेताओं में सुदूर और मौलिक दृष्टि का अभाव है। वे अपनी नीतियों के लिए नौकरशाहों पर निर्भर हैं। नौकरशाहों की यह नौकरी तानाशाही से भी बुरी है। नरेंद्र मोदी का निजी जीवन निष्कलंक है लेकिन न तो वे अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह जनता-दरबार लगाते हैं, न उन्होंने आज तक अपने 'मार्गदर्शक मंडल' की एक भी बैठक बुलाई। उन्होंने अपने तीन-चार अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालय नौकरशाहों के भरोसे छोड़ रखे हैं। मैंने कभी नहीं सुना कि अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह वे विशेषज्ञों से नम्रतापूर्वक कभी कोई सलाह भी लेते हैं। इसका नतीजा क्या है? नोटबंदी बुरी तरह से मार खा गई और हमारी विदेश नीति दुमछल्ला बनकर रह गई। यदि मंत्रिमंडल में नोटबंदी पर बहस हुई होती तो देश पर उसक कहर टूटता क्या? डर यही है कि भाजपा कहीं आपात्काल के पहले की इंदिरा कांग्रेस न बन जाए? सभी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र शून्य होता जा रहा है। पत्रकारिता पर कोई प्रत्यक्ष बंधन नहीं है लेकिन पता नहीं, पत्रकार क्यों घबराए हुए हैं? जब आप अपने आप को चूहाशाह बना दे रहे हैं तो सामनेवाले को आप तानाशाह क्यों नहीं कहेंगे?
(नया इंडिया की अनुमति से)

 


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