विचार / लेख

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Posted Date : 15-Jul-2018
  • पाकिस्तान में इन-दिनों चुनावी सरगर्मी जोरों पर है। पारंपरिक राजनीतिक दलों के अलावा कई कट्टरपंथी दल भी अपने उम्मीदवार उतार रहे हैं। एक पार्टी तो ऐसी भी है जो अमेरिका के वॉटेंड हाफिज सईद से चुनाव प्रचार करा रही है।
    मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले सईद पर अमेरिका ने 1 करोड़ डॉलर के ईनाम की घोषणा की हुई है। लेकिन वह पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय है। जानकार मानते हैं कि यह माहौल एक रुढि़वादी देश को कट्टरपंथ की ओर ढकेल सकता है।
    अमेरिका के विल्सन सेंटर में एशिया प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर माइकल कुग्लमैन कहते हैं, कट्टरपंथी समूहों का आम चुनावों में भाग लेना बहुत मायने रखता है। यह इन्हें न सिर्फ सत्ता में आने का मौका देता है बल्कि ये गुट अपनी राजनीतिक बढ़त का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा को जायज ठहराने के लिए कर सकते हैं।
    कैसे करते हैं काम
    पाकिस्तान का ऐसा ही एक राजनीतिक संगठन है मिली मुस्लिम लीग (एमएमएल)। अप्रैल, 2018 में अमेरिका ने एमएमएल को विदेशी आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल दिया था। कहा गया था कि ये लश्कर ए तैयबा का साथी संगठन है जिसे बनाने में हाफिज सईद का भी हाथ है। हाफिज सईद पर 2008 में हुए मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड होने के आरोप लगते हैं। इसके अलावा उसे अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी करार दिया है।
    पहले पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने एमएमएल को 2018 के आम चुनावों के लिए रजिस्टर करने से मना कर दिया था। इसके बाद हाफिज सईद ने अपने साथियों को पहले से रजिस्टर पार्टी अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक पार्टी से टिकट दिलवाए।
    एक ही पार्टी
    कुग्लमैन मानते हैं कि ऐसे राजनीतिक संगठन आतंकवादी गुटों के कट्टरपंथी और उग्र विचारों को सामने लाते हैं। वह कहते हैं ऐसे विचारों के पाकिस्तान के माहौल में खपने की संभावना भी अधिक है। संसदीय चुनावों में पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर से खड़े उम्मीदवार मोहम्मद याकूब शेख खुले आम कहते हैं कि अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक और एमएमएल एक ही पार्टी है। अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक के 260 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। 
    हाल में दक्षिणी पंजाब के फैसलाबाद शहर में एक राजनीतिक मंच पर जब सईद ने कदम रखा तो उस पर फूलों की बारिश की गई। हाफिज सईद को दुनिया एक आतंकवादी के रूप में पहचानती है लेकिन जब उसके साथ समर्थकों की भीड़ नजर आए तो यह कुछ अजीब सा नजारा हो जाता है। सईद अपनी चुनावी रैली में भारत और अमेरिका के रुख को इस्लाम के लिए खतरा बताता है। उसने कहा, हिंदुओं, यहूदियों और ईसाइयों के खिलाफ हमारी जंग जारी रहेगी।
    सेना का रुख
    अधिकार समूह और सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि सेना इन कट्टरपंथियों गुटों का लाभ उठाकर पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सत्ता से दूर रखना चाहती है। देश के पिछले 71 साल के इतिहास में तकरीबन 31 साल सेना ने प्रत्यक्ष रूप से तो बाकी सालों में परोक्ष रूप से शासन किया है।
    अब इन चुनावों में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सेना से सीधे मुकाबला कर रहे हैं। शरीफ राजनीति में सेना के दखल की आलोचना कर रहे हैं। पाकिस्तान की एक अदालत ने भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति मामले में नवाज शरीफ को 10 साल की कैद और उनकी बेटी मरियम शरीफ को 7 साल की सजा सुनाई है। इसे पीएमएल-एन समर्थक राजनीतिक षड्यंत्र मानते हैं।  कुग्लमैन मानते हैं कि सेना कट्टरवादी गुटों का इस्तेमाल राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कर रही है, क्योंकि ये समूह पीएमएल-एन के समर्थकों को खिसका सकते हैं।
    आने वाली मुश्किल
    पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ पीस स्टडीज से जुड़े मोहम्मद आमिर राणा कहते हैं, कट्टरपंथी सुन्नी गुटों ने अपना नाम बदल लिया है लेकिन उनका एजेंडा पुराना है। राणा मानते हैं, चुनावी लाभ उन्हें मान्यता दे सकता है और वे अपना प्रभाव फैला सकते हैं।
    अल्लाह-ओ-अकबर पार्टी की तरह एक अन्य कट्टरपंथी समूह है तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान। जानकारों के मुताबिक अगर ये पार्टी चुनावों में थोड़ी-बहुत भी सीट जीत लेती है तो नीति-निर्माताओं के लिए विवादित ईशनिंदा कानून को खत्म करना आसान नहीं होगा। (डॉयचे वैले)
        

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Posted Date : 15-Jul-2018
  •  अभिमन्यु कोहाड़ 
    पिछले 20 साल में देश में 5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं, नीति आयोग के अनुसार पिछले 5 साल में किसानों की वार्षिक आय में सालाना सिर्फ 0.44 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 17 राज्यों में एक किसान परिवार की औसत वार्षिक आय सिर्फ 20,000 रुपए है। चुनावों से पहले हर राजनीतिक पार्टी किसानों की स्थिति सुधारने के बड़े-बड़े वादे करती हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद 5 साल तक किसान को फिर भूला दिया जाता है।  सरकारें किसानों के विषय में सिर्फ कुछ सार्थक करते हुए दिखने की कोशिश करती हैं लेकिन असल में कुछ सार्थक करती नहीं हैं। अक्सर पत्रकारों द्वारा हम से यह पूछ जाता है कि एक किसान नेता होने के नाते आपके अनुसार वो क्या कदम होने चाहिए जो सरकार किसानों की हालत सुधारने के लिए उठाये?
    मेरे अनुसार अगर सरकार किसानों के विषय पर गम्भीर है तो सरकार को 3 कदम उठाने चाहिए। 
    पहला कदम है किसानों की पूर्ण कजऱ् मुक्ति। कजऱ् मुक्ति की मांग पर कुछ सरकारी बुद्धिजीवी व शहरवासी कहते हैं कि जब किसान ने कजऱ् लिया है तो वो लौटा क्यों नहीं रहा है? लेकिन यह सवाल करने से पहले सरकारी बुद्धिजीवियों को अपनी सरकारों से यह सवाल करना चाहिए कि क्या सरकारों ने अपने वादों व अपने द्वारा बनाये हुए आयोगों की सिफारिशों को पूरा किया है? 2005-06 में स्वामीनाथन आयोग ने किसानों को लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की सिफारिश की लेकिन उस रिपोर्ट को 12 साल बीत चुके हैं व कांग्रेस और बीजेपी दोनों की सरकारें सत्ता में रह चुकी हैं लेकिन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को अब तक लागू नहीं किया गया है। 
    प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले किसानों से यह वादा किया था कि उनकी सरकार बनते ही वे किसानों को लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थित मूल्य देंगे। लेकिन पहले 4 साल में बीजेपी सरकार ने इस मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं लिया। अब 2018 में इस मुद्दे पर बात भी की तो ए 2+एफएल लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बात कह रहे हैं जबकि किसानों की मांग है सी 2 लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। 
    अब अगर सरकारों ने अपने वादों के अनुसार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया होता तो किसानों के ऊपर कोई कजऱ् नहीं बनता, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। 2016-17 की कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एंड प्राइस के अनुसार अगर स्वामीनाथन रिपोर्ट व मोदी जी के वादे के अनुसार किसानों को समर्थन मूल्य मिलता तो गेहूं पर किसानों को 119 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलते। 2016-17 में भारत में गेहूं की पैदावार 94.56 मिलियन टन यानि 94.56 करोड़ क्विंटल थी। अब हर क्विंटल पर किसान को 119 रुपए अधिक मिलते तो 1 साल में सिर्फ गेहूं की फसल पर किसानों को कुल 11252 करोड़ रुपए अधिक मिलते। 
    इसी तरह कपास की फसल पर किसान को 1720 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलने चाहिए थे, बाजरे पर 537 रुपए प्रति क्विंटल अधिक, धान पर 597 रुपए प्रति क्विंटल अधिक, चने पर 653 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलने चाहिए थे लेकिन सरकारों ने किसानों को अपने वादों के अनुसार उचित दाम नहीं दिए। इस तरह अगर यूपीए व एनडीए अपने वादे ईमानदारी से पूरा करती तो किसानों को 12 साल में लगभग 6 लाख करोड़ रुपये ज्यादा मिलते। 
    इस समय एग्रो इंडस्ट्री के अलावा किसानों पर लगभग 6.35 लाख करोड़ का कर्ज है तो अगर सरकारें वादाखिलाफी नहीं करती तो किसानों के ऊपर इस समय कोई कजऱ् नहीं होता।
    दूसरा कदम जो सरकार को उठाना चाहिए वह है सी 2 लागत मूल्य पर 50 फीसदी जोड़कर किसानों को एमएसपी दिया जाए। सी 2 लागत मूल्य में बीज, कीटनाशक का खर्चा, मजदूरी, जमीन का किराया, लागत पर ब्याज आदि सब शामिल हैं। स्वमीनाथन आयोग ने भी सी 2 लागत मूल्य पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी देने की सिफारिश की थी। लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी जी ने स्वामीनाथन आयोग के अनुसार ही सी 2 लागत मूल्य पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी देने का वादा किया था लेकिन इसके बाद सरकार ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू नहीं कर सकते। 
    अभी कुछ दिन पहले सरकार ने ए 2+एफएल लागत मूल्य में 50फीसदी जोड़कर किसानों को एमएसपी दिया है। अगर सी 2 के आधार पर बढ़ोतरी की जाती तो धान पर लगभग 700 रुपए प्रति क्विंटल बढऩे चाहिए थे।
    तीसरा व अंतिम कदम जो सरकार को उठाना चाहिए वह है सभी फसलों की एमएसपी पर पूर्ण खरीद की गारंटी का कानून। इस समय देश में सिर्फ 6 फीसदी किसान एमएसपी पर अपनी फसल बेच पाते हैं। सरकार मुख्य तौर पर सिर्फ गेहूं व धान की खरीद एमएसपी पर करती है। सरकार को एक कानून बनाना चाहिए जिसके तहत किसान की फसल को किसी व्यापारी द्वारा एमएसपी से कम पर खरीदने को गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाए, यह कानून पूरे देश में लागू होना चाहिए। अगर किसान एमएसपी पर अपनी फसल बेच ही नहीं पा रहा है तो एमएसपी बढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है। मध्यप्रदेश में मंडी-एक्ट 1972 के अनुसार अगर कोई व्यापारी किसी किसान की फसल को एमएसपी से कम पर खरीदता है तो व्यापारी के खिलाफ मामला दर्ज कर के कारवाई की जाएगी लेकिन व्यापारियों व सरकार की सांठगांठ होने की वजह से यह कानून मध्यप्रदेश में भी जमीन पर लागू नहीं होता। सरकार को दूध व फल का भी एमएसपी घोषित करना चाहिए क्योंकि कई जगहों के किसान फल की खेती व दूध की डेयरी पर मुख्य तौर पर निर्भर हैं। अगर सरकार तत्काल यह तीन कदम उठाए तो देश के अन्नदाता किसान को बचाया जा सकता है अन्यथा किसान का बचना बहुत मुश्किल है। (फेसबुक पर पोस्ट)
    (लेखक राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। राष्ट्रीय किसान महासंघ देश के 132 किसान संगठनों का महासंघ है)

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Posted Date : 15-Jul-2018
  • नवीन जोशी,  वरिष्ठ पत्रकार
    स्वाभाविक है कि भाजपा 2019 में केंद्र की सता में बहुमत से वापसी की कोशिश करे, जैसे कि विरोधी दल उसे बेदखल करने के प्रयत्न में लग रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष काफी समय से चुनावी मोड में हैं।  अंदरखाने तैयारियां हैं ही, सरकारों के स्तर पर खुल्लम-खुल्ला लुभावनी चुनावी घोषणाएं होने लगी हैं। चर्चा यहां यह करनी है कि मोदी सरकार क्या उपलब्धियां लेकर जनता के पास जाना चाहती है और स्वयं जनता जनार्दन उसके लिए कैसा प्रश्नपत्र तैयार कर रही है? 
    साल 2014 में देश की जनता कांग्रेस नीत यूपीए शासन के भ्रष्टाचार से त्रस्त थी। वह बदलाव चाहती थी। भाजपा में तेजी से उभरे नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तृत्व, तेजी और ताजगी से भ्रष्टाचार मिटाकर, काला धन वापस लाने एवं चौतरफा परिवर्तन के वादों से जो लहर पैदा की, उसने भाजपा को विशाल बहुमत से सत्ता में ला बिठाया। आज जब वे चार साल पूरे कर चुकने के बाद पांचवें वर्ष में जनता की परीक्षा में बैठनेवाले हैं, तो पास होने की कसौटी क्या होगी?
    सरकार के पास तो उपलब्धियां गिनाने के लिए हमेशा ही बहुत कुछ होता है। मोदी सरकार ने भी अपना चार साल का प्रभावशाली लेखा-जोखा पेश किया है, मगर पास-फेल करना जनता के हाथ में है। 
    आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार ने नोटबंदी जैसे दुस्साहसिक और जीएसटी जैसे साहसिक कदम उठाये। इनके नतीजों पर विवाद हैं। तमाम दावों के बावजूद अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में नहीं है, विशेष रूप से वह हिस्सा, जो सीधे जनता को प्रभावित करता है। महंगाई लगातार बढ़ी है। पेट्रोल-डीजल के ऊंचे भावों ने उसे अनियंत्रित किया है।  बैंकों पर डूबे हुए कर्ज का बोझ बढ़ा, किंतु प्रयासों के बावजूद वसूली के प्रयास सफल होते नहीं दिखे। बेरोजगारों की संख्या बढऩे की तुलना में रोजगारों का सृजन अत्यंत सीमित हुआ। युवा वर्ग में आक्रोश है, जो तरह-तरह के असंतोषों में फूटा। 
    इस पूरे दौर में देश का किसान क्षुब्ध और आंदोलित रहा। बदहाली के कारण उनकी आत्महत्याओं का सिलसिला बिल्कुल नहीं रुका। हाल ही में खरीफ फसलों के समर्थन मूल्यों में अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि की जो घोषणा की गयी है, उससे भी किसान समुदाय का बड़ा हिस्सा प्रसन्न नहीं लगता। 
    आरोपों के अलावा मोदी सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों में क्लीन चिट हासिल है। यूपीए-2 सरकार के लिहाज से यह बड़ी राहत है, लेकिन आम जनता को रोजमर्रा के कामों में भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है।  काले धन पर अंकुश नहीं लग सका। डिजिटल लेन-देन के मोर्चे पर भी शुरुआती उपलब्धि हाथ से फिसल गयी। नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने यह कहकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है कि 2014 के बाद देश की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से पीछे की ओर गयी है।
    सामाजिक क्षेत्र में सरकार कुछ करती दिखायी दी, लेकिन वास्तव में परिवर्तन कितना आया? हाशिये पर जीनेवाली बड़ी आबादी के हालात कितना सुधरे? स्वच्छता अभियान और 2019 तक देश को खुले में शौच-मुक्त करने की महत्वाकांक्षी, सराहनीय योजना पर स्वयं प्रधानमंत्री ने बहुत रुचि ली, किंतु आंकड़ों से इतर व्यवहार में वह कितना उतर पायी? 
    दलितों के कल्याण के वास्ते घोषणाएं बहुत हुईं, लेकिन उन्हें सचमुच कितनी आजादी और सामथ्र्य मिली? महिलाओं के प्रति समाज और राजनीति के नजरिए एवं व्यवहार में कितना फर्क आया? दैनंदिन जीवन में अनुभव करने के कारण जनता इन मुद्दों से सीधे जुड़ी रहती है। वह क्या महसूस करती है? यहां यह कहना जरूरी है कि देश की ये समस्याएं न आज की हैं, न इनके लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है।  चूंकि स्वयं मोदी ने व्यक्तिगत रूप से भी इस बारे में जनता में बहुत ज्यादा उम्मीदें जगायीं, बढ़-चढ़कर दावे किये थे, इसलिए उनकी सरकार की जवाबदेही निश्चय ही बढ़ जाती है। 
    पिछले दिनों की चंद घटनाओं ने संकेत दिये हैं कि मोदी सरकार इन कसौटियों पर शायद असहज अनुभव कर रही है। प्रधानमंत्री का जोर आज भी परिवर्तन और विकास के मुद्दों पर है।  उनकी लोकप्रियता अधिक कम नहीं हुई है, लेकिन उनके मंत्री और भाजपा नेता क्या कर रहे हैं? केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने चंद रोज पहले झारखंड में उन आठ लोगों को जमानत पर छूटने पर माला पहनाकर मिठाई खिलायी, जिन्हें अदालत ने गोरक्षा के नाम पर हत्याओं का दोषी पाया है। 
    उसी दिन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह बिहार के अपने निर्वाचन क्षेत्र में दंगा भड़काने के आरोप में जेल में बंद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं के घर गये, उनके साथ हुए 'अन्यायÓ पर रोये और बिहार की अपनी ही सरकार को ही दोष देने लगे।  इन्हें हम इन नेताओं की स्फुट भटकनों के रूप में भी देख सकते थे, परंतु विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अपने ही कैडर के हाथों अब तक जारी ट्रॉलिंग को किस रूप में देखें, जबकि पार्टी नेतृत्व और सरकार उनके पक्ष में आना तो दूर, मौन साधे रहे? राजनाथ सिंह और गडकरी उनके बचाव में आये, मगर काफी बाद में। फिर, पिछले महीने जम्मू-कश्मीर सरकार से भाजपा के अचानक अलग होने के फैसले से क्या समझा जाये, जबकि कश्मीर में शांति बहाली भाजपा सरकार का प्रमुख एजेंडा था? 
    तो, क्या इसे उग्र हिंदुत्व और प्रखर राष्ट्रवाद के पुराने एजेंडे को प्रमुख स्वर देने के रूप में देखा जाये? यह आशंका इसलिए बलवती होती है कि 2014 के चुनाव की पूरी तैयारी भाजपा ने इसी एजेंडे के तहत की थी। प्रधानमंत्री-प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र मोदी परिवर्तन लाने, विकास करने तथा भ्रष्टाचार और परिवारवाद मिटाने की गर्जनाएं कर रहे थे, तो उनके कई नेता गोहत्या, खतरे में हिंदुत्व, देशद्रोह जैसे मुद्दे उछालने में लगे थे।  खूबसूरत सपने दिखाने और भावनाओं के उबाल का यह चुनावी मिश्रण-फॉर्मूला सफल रहा था। अब, जबकि सपनों को साकार करने के प्रयासों की परीक्षा होनी है, तब क्या फिर से धर्म और राष्ट्रवाद की भावनाओं का ज्वार उठाना भाजपा को आवश्यक लग रहा है? विपक्षी मोर्चेबंदी की काट के लिए उपलब्धियां पर्याप्त नहीं लग रहीं? ध्रुवीकरण का सहारा लिए बिना रास्ता कठिन लग रहा है?  
    सरकारों की परीक्षा का पैमाना जनता कब क्या बनाती है, यह स्पष्ट नहीं होता। साल 2004 में एनडीए के 'शाइनिंग इंडियाÓ को उसने नकार दिया और 2009 में यूपीए को अप्रत्याशित विजय दे दी थी। साल 2014 में जनता ने भाजपा को विशाल बहुमत दिया। तो अब 2019 के लिए भी प्रश्न-पत्र जनता बना ही रही होगी। https://www.prabhatkhabar.com/
     

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Posted Date : 14-Jul-2018
  • डॉ. विजय अग्रवाल 
    लोकसभा चुनाव से करीब 10 महीने पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह धमाकेदार घोषणा कर देश की सियासत को गर्मा दिया है कि वह हर जिले में दारुल कजा (शरिया अदालत) खोलेगी। ज़ाहिर है, इस प्रस्ताव का संबंध संवैधानिक अथवा लोकतांत्रिक स्वरूप से सीधे-सीधे न होकर हिन्दुस्तान बनाम इस्लाम से है, इसीलिए भारतीय जनता पार्टी ने इस प्रस्ताव के खिलाफ तत्काल अपनी तीखी प्रतिक्रिया दे दी कि यह इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया नहीं है। आश्चर्य तो तब हुआ, जब समाजवादी पार्टी भी इसी पंक्ति में खड़ी दिखाई दी। यह सिक्के का दूसरा पहलू है।
    सिक्के के पहले पहलू के दर्शन 25 जून के अख़बारों में छपे कुछ चित्रों में देखने को मिले। इस चित्र से जुड़ी सुखद घटना भारत से लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर दूर उस सऊदी अरब में घटी थी, जो इस्लाम की जन्मभूमि रही है, और जहां इस्लाम की दो सबसे पवित्र मस्जिद अल हरम और मदीना स्थित हैं। गौर करने की बात यहां यह भी है कि इस ऐतिहासिक और क्रांतिकारी घटना का स्रोत बना वहां का राजमहल, जब राजकुमार मुहम्मद बिन सलमान ने अपने देश की महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाज़त देने संबंधी आदेश जारी किया। सुबह के अखबारों की ये तस्वीरें धूप से झुलसते चेहरों पर पानी की फुहारें बनकर उसे तरबतर कर गईं।
    केवल साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला देश सऊदी अरब सुन्नी मुसलमान प्रधान देश है। साथ ही यह इस्लामिक जगत का भी एक महत्वपूर्ण मुल्क है। ऐसे में सऊदी की इस घटना का प्रभाव विशेषकर दक्षिण एशिया के सुन्नी मुसलमानों पर पडऩा लाजि़मी है।
    भारत के भी लगभग 19 करोड़ मुस्लिमों में सुन्नी बहुसंख्या में हैं। शियाओं की संख्या काफी कम है। साथ ही भारत के लगभग 50 लाख लोग सऊदी अरब में काम कर रहे हैं, जिन्हें भारत का संदेशवाहक कहा जा सकता है, फिर चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों। तो क्या ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि सऊदी की खिड़की से निकलने वाली उदारवादी विचारों की यह बयार 3,500 किलोमीटर का सफर तय कर हिन्दुस्तान की फिज़़ां को खुशनुमा बनाएगी?
    इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की बंद खिड़कियों में चरमराहट होने लगी है।  तीन तलाकज् पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है। मुस्लिम लॉ बोर्ड द्वारा शरीयत अदालतें बनाने के प्रस्ताव के समानांतर ही इस देश की सर्वोच्च अदालत ने हलाला तथा बहुविवाह प्रथाओं पर विचार करने के लिए एक संवैधानिक पीठ के गठन की घोषणा की है। ये दोनों घोषणाएं दिख तो समानांतर रही हैं, लेकिन इनकी दिशाएं एक नहीं हैं, सो, हो सकता है, इनके निष्कर्ष आगे जाकर टकराव में तब्दील हो जाएं। यहां सोचने की बात यह है कि यदि ऐसा होता है, तो फिर क्या होगा?
    इसमें भी कोई दो राय नहीं कि भारत का इस्लामिक समाज अपेक्षाकृत खुला हुआ समाज है। दिन-प्रतिदिन उसमें, विशेषकर उसके महिला वर्ग में, उदारवादी लोकतांत्रिक विचार सांस लेने लगे हैं। 
    इसके बेहतरीन प्रमाण के तौर पर चैनल पर आने वाले इश्क सुभान अल्ला धारावाहिक को पेश किया जाना गलत नहीं होगा। मुझे लगता है कि इस धारावाहिक का अंतिम निष्कर्ष, जिसके सुखद होने की संभावना अधिक है, इन दोनों के टकराव का अंतिम परिणाम होगा।इस प्रकार समाज चाहे कोई भी हो, इसकी खिड़कियां खुलेंगी और खुलनी ही चाहिए। https://khabar.ndtv.com/n

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Posted Date : 14-Jul-2018
  • अभय शर्मा
    बीते हफ्ते पाकिस्तान के नेशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो (नैब) की एक विशेष अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम शरीफ को भ्रष्टाचार का दोषी पाते हुए 10 और सात साल की सजा सुना दी। नवाज शरीफ पर लंदन में स्थित एवनफील्ड में अवैध तरीके से चार फ्लैट खरीदने का आरोप था जिसे अदालत ने सही पाया। करीब एक महीने से लंदन में अपनी पत्नी का इलाज करा रहे नवाज शरीफ ने गिरफ्तारी के आदेश के बाद भी पाकिस्तान लौटने का निर्णय लिया। शुक्रवार रात लाहौर हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
    पाकिस्तान में आम चुनाव इसी महीने की 25 जुलाई को होने वाले हैं। इनमें अब तक नवाज शरीफ की स्थिति बेहद कमजोर नजर आ रही थी। वे खुद चुनाव नहीं लड़ सकते। उनकी बेटी, दामाद और बेटों को भी अदालत ने चुनाव में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया है। शरीफ परिवार पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों की वजह से उनकी पार्टी पीएमएल-एन को भी भारी नुकसान हुआ है। कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं। इस बार का चुनाव पार्टी उनके छोटे भाई और पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। पर शहबाज के साथ दिक्क्त यह है कि उनका पंजाब के बाहर कोई खास जनाधार नजर नहीं आता।
    लेकिन, विशेष अदालत का फैसला आने के बाद पाकिस्तान में चुनावी परस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। पाकिस्तान के लगभग सभी जानकारों का मानना है कि पहले अदालत के फैसले और उसके बाद नवाज शरीफ के लंदन से पाकिस्तान लौट कर जेल जाने के निर्णय ने चुनावी समीकरणों को काफी हद तक पलट दिया है।
    अगर विशेष अदालत के फैसले पर नजर डालें तो इसमें कई झोल नजर आते हैं। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि नेशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो यह साबित नहीं कर पाया कि नवाज शरीफ ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्डरिंग के जरिये लंदन में फ्लैट खरीदे थे। लेकिन, नवाज शरीफ अपने निर्दोष होने का कोई पुख्ता सबूत नहीं दे सके हैं इसलिए अदालत ने यह मान लिया कि ये फ्लैट उन्होंने काले धन से ही खरीदे थे। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि अदालत ने मरियम शरीफ को केवल यह मानकर सजा सुना दी कि उन्होंने सच्चाई को छिपाने और जाली दस्तावेज बनवाने में अपने पिता की मदद की थी।
    पाकिस्तान के चर्चित वकील अली अहमद कुर्द और सलमान अकरम रजा सहित लगभग सभी कानूनी जानकार अदालत के इस फैसले को कानूनन दोषपूर्ण बताते हैं। उनका कहना है कि संदेह के आधार पर अदालत द्वारा इतना बड़ा फैसला सुनाया जाना सही नहीं है। कइयों के मुताबिक ऐसा पहली बार देखने में आया है कि कोर्ट ने जांच एजेंसी के सबूत न दे पाने के बाद भी आरोपित को सजा सुना दी।
    पाकिस्तान में अदालत के फैसले को लेकर कई और बातें भी कही जा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अदालत के फैसले पर जज के दो जगह हस्ताक्षर हैं और दोनों ही जगह ये अलग-अलग तरह से किए गए हैं। साथ इस फैसले में कई जगह स्पेलिंग की गलतियां भी देखने को मिली हैं। इसे लेकर कहा जा रहा है कि अदालत से यह फैसला जल्दबाजी में दिलवाया गया जिससे मरियम शरीफ को चुनाव लडऩे से रोका जा सके। खबरें तो ये भी हैं कि यह फैसला पाकिस्तानी सेना की ओर से लिखकर दिया गया था जिसे जज ने अदालत में पढ़ दिया।
    पाकिस्तान की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि चुनाव से कुछ रोज पहले जनता के बीच इस तरह की बातें सामने आने से चीजें नवाज शरीफ के हक में जाएंगी और इससे उनकी पार्टी को ही फायदा होगा।
    पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार खालिद महमूद एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहते हैं, अभी तक इस चुनाव में इमरान खान का पलड़ा भारी नजर आ रहा था। लेकिन नवाज शरीफ के पाकिस्तान आने के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलेंगी। खालिद कहते हैं अदालत के विवादित फैसले के बाद नवाज शरीफ द्वारा जेल जाने का फैसला करना 'मौके पर चौकाÓ मारने जैसा है।
    दरअसल, नवाज शरीफ जानते हैं कि अदालत के इस फैसले के बाद भी अगर वे जेल जाते हैं तो निश्चित ही उन्हें जनता का भावनात्मक सपोर्ट मिलेगा। पाकिस्तान का इतिहास देखें तो जनता ने भावनाओं में बहकर कई बार मतदान किया है। जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी और फिर 2008 में बेनजीर भुट्टो को गोली मारे जाने के बाद जनता ने बिना लीडर वाली पार्टी को भी सत्ता में पहुंचा दिया था।
    पाकिस्तानी जानकारों की मानें तो शहबाज शरीफ और पार्टी के अन्य बड़े नेता अच्छे से जानते हैं कि उनकी पार्टी को केवल नवाज शरीफ के नाम पर ही वोट मिल सकते हैं। पाकिस्तान में शहरी आबादी और नौजवान भले इमरान खान के साथ हैं। लेकिन, ग्रामीण इलाके और 40 की उम्र से ऊपर की अधिकांश आबादी आज भी नवाज शरीफ को अपना नेता मानती है। यही वजह है कि पार्टी ने उनके जेल जाने को चुनाव में भुनाने की पूरी तैयारी कर ली है। बताया जाता है कि पार्टी की पूरी कोशिश है कि किसी तरह नवाज शरीफ के पाकिस्तान आने को ऐतिहासिक क्षण बना दिया जाए। पंजाब में पीएमएलएन के सभी उम्मीदवारों से बड़ी संख्या में लाहौर एयरपोर्ट के बाहर भीड़ जुटाने को कहा गया।
    पाकिस्तानी मीडिया की मानें तो पार्टी की रणनीति जनता के बीच यह संदेश भेजने की है कि नवाज शरीफ ने बड़ी कुर्बानी दी है, वे अपने साथ भेदभाव किए जाने और पत्नी की हालत नाजुक होने के बाद भी देश और अवाम के लिए वापस लौटे हैं। पार्टी के कुछ नेता मीडिया को यह भी बताते हैं कि अगर नवाज शरीफ और मरियम शरीफ को लंदन से पाकिस्तान आने में एक हफ्ते का समय लगा है तो इसके पीछे भी एक वजह है। उनके मुताबिक लंदन में शरीफ और उनकी बेटी के भावनात्मक भाषणों की वीडियो रिकॉर्डिंग्स तैयार की गई हैं जिन्हें तब चुनावी रैलियों में चलाया जा रहा होगा जब नवाज शरीफ और उनकी बेटी जेल में होंगे। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 13-Jul-2018
  • - जेके कर
    हमारे देश में सरकार जनता के स्वास्थ्य पर प्रतिदिन 3 रुपये खर्च करती है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट से यह बात उभर कर आई है। सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटीलीजेंस की इस रिपोर्ट के अऩुसार साल 2015-16 में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च प्रतिव्यक्ति साल में 1112 रुपये याने प्रतिदिन 3 रुपये खर्च किया गया। इसी रिपोर्ट की शुरुआत में अमरीकी लेखक मार्क ट्वीन ने भारत के बारें में जो कहा था उसे मोटे अक्षरों में लिखा गया है। 
    अमरीकी लेखक मार्क ट्वीन ने भारत के बारे में कहा था कि यह मानव जाति का पालना है, यह मानव के वाणी का जन्मस्थान है, इतिहास की मां है, किवदंती की दादी है तथा परंपरा के दादी की मां है। यदि आज मार्क ट्वीन होते और उन्हें बताया जाता कि भारत से ज्यादा स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च पड़ोसी देश मालद्वीप, भूटान, श्रीलंका तथा नेपाल करते हैं तो शायद वे अपने कहे में जरूर कुछ सुधार करते। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2015-16 सकल घरेलू उत्पादन का 1.02 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च किया गया जबकि मालद्वीप ने स्वास्थ्य पर 9.4 फीसदी, भूटान ने 2.5 फीसदी, श्रीलंका ने 1.6 फीसदी तथा नेपाल ने 1.1 फीसदी खर्च किया है।
    साल 2015-16 में केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने मिलकर जनता के स्वास्थ्य पर 1.4 लाख करोड़ रुपये खर्च किये थे। जिसमें से केन्द्र सरकार ने 31 फीसदी तथा राज्य सरकारों ने 69 फीसदी खर्च किये थे। पिछले 9 साल के आंकड़ों पर यदि नजऱ डाले तो पता चलता है कि स्वास्थ्य पर सरकार द्वारा किया जा रहा खर्च कम होता गया है केवल साल 2016-17 के संशोधित अनुमान के अनुसार इसमें मामूली बढ़त हुई है। 
    साल 2009-10 में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पादन का 1.12 फीसदी, साल 2010-11 में 1.07 फीसदी, साल 2011-12 में 1।10 फीसदी, साल 2012-13 में 1.09 फीसदी, साल 2013-14 में 1.00 फीसदी, साल 2014-15 में 0.98 फीसदी तथा साल 2015-16 में 1.02 फीसदी खर्च किए गए।  साल 2016-17 के संशोधित अनुमान के अऩुसार यह 1.17 फीसदी का रहा है अर्थात पिछले साल की तुलना में मात्र 0.15 फीसदी की बढ़त। साल 2017-18 के बजट अनुमान के अनुसार यह 1.28 फीसदी प्रस्तावित है। जाहिर है कि स्वास्थ्य पर किए जा रहे सरकारी खर्च में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो रही है नतीजन बीमार पडऩे पर लोगों को अपने जेब से भारी खर्च करना पड़ रहा है।
    अब जरा बीमार पडऩे पर अस्पताल में भर्ती होने के खर्च पर भी एक नजऱ डाल लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 14,935 रुपये तथा अन्य खर्च 2019 रुपयों का होता है कुल मिलाकर, ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 16,956 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 26,455 रुपये खर्च करना पड़ता है। अब इसकी तुलना स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च प्रतिव्यक्ति साल 1112 रुपये से करें तो नतीजा निकलेगा कि औसतन अस्पताल में भर्ती होने पर जनता की क्या हालत होती है। इसी तरह से संस्थागत प्रसव या बच्चे का जन्म अस्पताल में होने पर ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी अस्पतालों में औसतन 1587 रुपये तथा निजी अस्पतालों में 14,778 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि शहरों में सरकारी अस्पतालों में प्रवस का खर्च 2117 रुपये तथा निजी अस्पतालों में 20,328 रुपये खर्च होता है।
    अब जरा अस्पताल में भर्ती होने पर भारतीय किस तरह से खर्चों को वहन करते हैं उनकी सुध ले ली जाये। सरकारी आकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 67.8 फीसदी खर्च अपने आय/बचत में से करनी पड़ती है, 24.9 फीसदी के लिये उधार लेना पड़ता है, 0.8 फीसदी रकम का जुगाड़ घऱ के सामान को बेचकर करना पड़ता है, 5.4 फीसदी रकम के लिये दोस्त/रिश्तेदार मदद करते हैं तथा 0.7 फीसदी रकम की व्यवस्था अन्य स्त्रोत से करनी पड़ती है। 
    इसी तरह से शहरी क्षेत्रों में अस्पताल में भर्ती होने पर अपनी आय/बचत में से 74.9 फीसदी रकम खर्च करनी पड़ती है, 18.2 फीसदी रकम के लिये उधार लेना पड़ता है, 0.4 फीसदी रकम के लिए घऱ के सामान बेचना पड़ता है, दोस्त/रिश्तेदार 5 फीसदी रकम दे देते हैं तथा अन्य स्त्रोतों से 1.3 फीसदी रकम का जुगाड़ करना पड़ता है।
    विश्व-बैंक की 2015 की रिपोर्ट के अऩुसार स्वास्थ्य पर उच्च आय वर्ग के देश अपने सकल घरेलू उत्पादन का 5.2 फीसदी, उच्च मध्यम वर्ग के देश 3.8 फीसदी, निम्न मध्यम आय वर्ग के देश 2.5 फीसदी, निम्न आय वर्ग के देश 1.4 फीसदी तथा भारत 1 फीसदी खर्च करता है। साल 2016-17 के आंकड़ों के अऩुसार करीब 43 करोड़ देशवासी किसी न किसी तरह के स्वास्थ्य बीमा के तहत आते हैं। यह हुआ देश की 34 फीसदी आबादी का हाल बाकी के बचे लोग किसी भी तरह के स्वास्थ्य बीमा के तहत लाभार्थी नहीं हैं। 
    जाहिर है कि स्वास्थ्य-सेवा मुहैय्या करवाने से पीछे हटती सरकारों के कारण निजी दवा कंपनियों, निजी अस्पतालों तथा निजी जांच के केन्द्रों की बन आई है। इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि इनसे जुड़े लोग नई-नई गाडिय़ां खरीद रहें हैं, मकान-जमीन-म्युचल फंड पर निवेश कर रहें हैं तथा बहुमंजिली अस्पतालों के मालिक बनते जा रहे हैं। जिसका सीधा-सादा अर्थ है कि स्वास्थ्य सेवा मुहैय्या कराने से जुड़े लोगों के हाथों में संपदा केन्द्रित होती जा रही जोकि जनता का है तथा जिसे पूर्ववर्ती तथा वर्तमान सरकार ने बाजार से अच्छा स्वास्थ्य खरीदने के लिये मजबूर कर दिया है।
    गौरतलब है कि पिछली यूपीए सरकार ने वादा किया था कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पादन के 3 फीसदी के बराबर लाया जाएगा। लेकिन दो कार्यकाल में भी उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका था। वर्तमान एनडीए सरकार ने भी अपने चार साल के कार्यकाल में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं की है। यह बढ़ोतरी महज दशमलव के अंदर ही सिमटकर रह गयी है। इतना तो तय है कि बीमारों के अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं।

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Posted Date : 13-Jul-2018
  • दुनिया के कई सारे हिस्सों में बेटियों को स्कूल नहीं भेजा जाता। वल्र्ड बैंक का कहना है कि बेटियों को शिक्षा नहीं देने की कीमत दुनिया को हजारों अरब डॉलर के रूप में चुकानी पड़ रही है।
    ये खर्च उनकी आय और भागीदारी न होने के कारण उत्पादन में कमी का नतीजा है। वल्र्ड बैंक का कहना है कि उत्पादन में कमी और आय की संभावना के बावजूद दुनिया भर में 13 करोड़ लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता। स्कूली शिक्षा पूरी करने वाली महिलाओं के आमतौर पर काम करने की संभावना होती है और उनकी कमाई उन लोगों से कम से कम दोगुनी होती है जिन्होंने पढ़ाई नहीं की है।
    वल्र्ड बैंक की नई रिपोर्ट के अनुसार 6 से 17 साल की उम्र की करीब 13 करोड़ लड़कियां स्कूल नहीं जातीं। गरीब देशों में दो तिहाई बच्चियां प्राइमरी स्कूली शिक्षा पूरा नहीं करती और सिर्फ एक तिहाई लोवर सेकंडरी स्कूल की पढ़ाई पूरी करती है।
    वल्र्ड बैंक के अनुसार यदि हर लड़की को 12 साल की स्तरीय स्कूली शिक्षा मिले तो महिलाओं की कमाई साला 15 से 30 हजार अरब डॉलर हो जाएगी। इसका दूसरा असर ये होगा कि बाल विवाहों में कमी आएगी, आबादी में तेज वृद्धि वाले देशों में जनसंख्या दर गिरेगी और बाल मृत्यु दर और कुपोषण के मामलों में भी कमी आएगी। वल्र्ड बैंक की सीईओ क्रिस्टालीना गियोर्गिएवा ने कहा कि हम लैंगिक असानता को वैश्विक विकास की राह में बाधा नहीं बनने दे सकते।  
    रिपोर्ट के मुख्य लेखक क्वेंटिन वोदोन ने कहा कि लड़कियों को शिक्षा देने के फायदे हायर सेकंडरी शिक्षा के स्तर पर प्राइमरी शिक्षा से ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि हमें इस बात को सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सभी लड़कियां प्राइमरी शिक्षा पूरी करें, लेकिन यह काफी नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार उच्च स्कूली शिक्षा पूरी करने वाली महिलाओं के पार्टनर के हाथों हिंसा का शिकार होने या बच्चों के कुपोषण का शिकार होने का जोखिम कम होता है। उनके स्कूल जाने की संभावना भी ज्यादा होती है।
    पाकिस्तान की नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला युसूफजई ने भी लड़कियों को शिक्षा दिए जाने का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि यदि 13 करोड़ लड़कियां इंजीनियर, पत्रकार या सीईओ बनने में असमर्थ रहती हैं क्योंकि शिक्षा उनकी पहुंच से बाहर थी, तो हमारी दुनिया को अरबों डॉलर का नुकसान होता है। 15 साल की उम्र में तालिबान के हमले का शिकार होने वाली मलाला ने कहा कि वल्र्ड बैंक की रिपोर्ट दिखाती है कि लड़कियों की शिक्षा में निवेश में और देरी नहीं की जानी चाहिए। (रिपोर्ट के मुख्य लेखक क्वेंटिन वोदोन) (रॉयटर्स थॉम्पसन)

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • सुनील मेहरोत्रा
    3 जुलाई को जब लखनऊ के लिए सुबह की फ्लाइट पकड़ी थी, तो उसकी पिछली रात सो नहीं पाया था, क्योंकि उस रात भर बारिश अपने पूरे चरम पर थी। उसी दिन सुबह अंधेरी ब्रिज गिरा था। इस वजह से करीब 20 घंटे तक कुछ उपनगरों के बीच लोकल ट्रेनें ठप्प रही थीं। आज जब एक सप्ताह बाद दोपहर मुंबई लौटा, तो हालात और भी ज्यादा बुरे दिखे। वसई जहाँ मेरा घर है, वहाँ गले- गले तक पानी है। घरों-घरों में पानी है। लोकल ट्रेनें वहाँ तक चल ही नहीं रही हैं। सड़कों पर कोई ऑटो नहीं। इलाके और घरों में लाइट नहीं। घरों में पानी भी बंद कर दिया गया है। 
    चूंकि घर जा नहीं सकता, इसलिए सोचा, सामान के साथ ऑफिस आया जाए। अंधेरी से वेस्टर्न रेलवे से दादर आ गया। मुझे मालूम था कि मरीन लाइन्स या चर्चगेट से बारिश के मौसम में टैक्सी मिलना दुनिया के आठवें आश्चर्य जैसा है। इसलिए मैंने दादर से सेंट्रल लाइन की ट्रेन पकड़कर सीएसटी जाने का फैसला किया। हालांकि मुझे यह भी मालूम था कि बारिश के मौसम में सेंट्रल लाइन की ट्रेन पकड़कर समय पर गंतव्य तक पहुंचना भी दुनिया के नवें अजूबे जैसा ही है। सूटकेस और एक बैग साथ में था इसलिए कोई विकल्प था नहीं। सेंट्रल लाइन की लोकल में बैठा और सिर्फ 17 मिनट में जो सफर पूरा होना था, वह 120 मिनट बाद जाकर पूरा हो पाया। ऐसे आपात मौकों के लिए मुंबई में डिजास्टर मैनेजमेंट बना है। पर जब भी ऐसी आपात स्थिति आई है, इतिहास गवाह है कि मुंबई में डिजास्टर मैनेजमेंट फेल ही रहा है। कई बार प्रकति के आगे कोई कुछ कर भी नहीं सकता।
    खास बात यह है कि जिस यूपी से मैं एक हफ्ता गुजार कर आया हूँ, वहाँ इतनी भयंकर गर्मी है कि दिन में 6 से 7 बार नहाता था, फिर भी बदन चिपचिपाता रहता था। एक देश, पर मौसम का मिजाज हर जगह अलग-अलग। कई बार वाकई ताज्जुब होता है।
    जिस उपनगर वसई में मैं रहता हूं, यह सच है यहां हरियाली बहुत है। इसके गांव में जाइए्, तो कई बार लगेगा कि आप मिनी गोवा में घूम रहे हैं। लगभग दो दशक हो गए, इस इलाके में रहते हुए। एक-दो दिन लगातार बारिश तो हर साल हुई है, पर पूरे एक सप्ताह तक इतनी बारिश मुझे याद नहीं पड़ता, इससे पहले कभी सुनी हो। वाकई, इस बार की बारिश ने डरा दिया है। शायद पहली बार बारिश की वजह से घर नहीं पहुंचा हूं। 
    मेरे तो कष्ट फिर भी बहुत मामूली हैं, जो ऑफिस पहुंचते ही अतीत भी बन गए । वसई या पालघर इलाके में बारिश के जो फोटो या वीडियो मैंने देखे हैं, सिर्फ कल्पना कर सकता हंू कि सैकड़ों, हजारों लोग किस खौफनाक अनुभव से गुजरे होंगे या गुजर रहे होंगे।

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • प्रियदर्शन, सीनियर एडिटर एनडीटीवी इंडिया
     निर्भया के मुजरिमों के साथ कोई हमदर्दी नहीं रखी जा सकती है। उनका अपराध इतना नृशंस था कि 6 साल बाद भी उसकी याद एक सिहरन पैदा करती है। न्याय की सहज बुद्धि कहती है कि इनके साथ किसी कि़स्म की नरमी की बात सोचना गलत है। हमारे संविधान में अगर किसी जघन्य अपराध के लिए फांसी की व्यवस्था है तो वह जघन्य अपराध ऐसा ही हो सकता है। इसलिए कोई नादान ही बोलेगा कि निर्भया के मुजरिमों को फांसी नहीं होनी चाहिए।
    फिर भी मेरी तरह के कुछ खब्ती लेखक के भीतर यह नादानी करने की इच्छा होती है। बस इसलिए कि अपराध और दंड का सदियों पुराना जो विधान चला आ रहा है, उसका अनुभव यही बताता है कि न इससे अपराध घटे हैं और न नृशंसता घटी है। न्याय की निष्फलता इस इच्छा का आधार नहीं है। मानव स्वभाव में प्रतिशोध का अपना एक मूल्य होता है। व्यक्ति ही नहीं, देश भी प्रतिशोध लेते हैं, सभ्यताएं भी प्रतिशोध लेती हैं। तब कोई गांधी की यह तजबीज याद नहीं करता कि आंख के बदले आंख का सिद्धांत अंतत: एक दिन इस दुनिया को अंधा कर देगा।
    बहरहाल, यह आदर्शवादी खय़ाल भी मेरी नादान इच्छा का स्रोत नहीं है। लेकिन जिस तरह निर्भया के मुजरिमों को फांसी देने की मांग एक सामूहिक कोरस में बदल रही है, वह मुझे डराता है। इन्हें जल्दी से जल्दी फांसी पर लटका देने की मांग के पीछे चाहे जितना सात्विक आक्रोश हो, लेकिन मुझे लगता है कि यह आक्रोश विवेक से कम, अंधे आवेग से ज्यादा संचालित है। यह आक्रोश इस ज़रूरी प्रश्न पर भी विचार करने को तैयार नहीं है कि बलात्कार से हमारी सामूहिक घृणा के बावजूद न बलात्कारी कम हो रहे हैं, न निर्भयाएं कम हो रही हैं। उल्टे सामने आ रहा हर नया मामला शायद बर्बरता की नई हद पार करता नजऱ आ रहा है।
    बर्बरता से बर्बरता की काट खोजने और सुझाने वाली इस दृष्टि का एक और ख़तरनाक पहलू है। हमारे दैनंदिन के शब्दकोश में जो नए शब्द शामिल हुए हैं- उनमें एक मॉब लिंचिंग भी है। इस मॉब लिंचिंग के कई रूप हैं- एक तो वह जो बच्चा चोरी से गोरक्षा और राष्ट्र रक्षा तक के नाम पर हम सड़कों पर देखते हैं। बीते दो साल में इस मॉब लिंचिंग ने कम से कम 60 लोगों की जान ली है- यह कई रिपोर्ट्स बताती हैं।
    मॉब लिंचिंग की यह मानसिकता एक अन्य स्तर पर सोशल मीडिया पर दिखाई पड़ती है जिसके लिए एक दूसरा शब्द ट्रोलिंग है। यह ट्रोलिंग अमूमन इतनी अमानवीय और असामाजिक होती है जैसे लगता है कोई बर्बर सेना विवेक के खात्मे के लिए उतरी हुई हो। कुछ दिन पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ऐसी ही ट्रोलिंग झेलनी पड़ी जिसमें उनके पति से यह कहा गया कि वे उन्हें पीटते क्यों नहीं हैं।
    यह बेचेहरा हिंसक मानसिकता जैसे हमारे स्वभाव का हिस्सा होती जा रही है। जब हम निर्भया के गुनहगारों के लिए फांसी-फांसी चिल्लाते हैं तो ऊपर से तो एक उचित न्याय की मांग करते हैं, लेकिन भीतर से उसी हिंसक मनोवृत्ति से संचालित होते हैं जो हमें भरोसा दिलाए कि हम अब भी न्याय चाहते हैं। यह इसलिए कि हमारे आसपास शायद अन्याय बढ़ते जा रहे हैं। हम अमूमन ऐसे अन्याय झेलने के आदी होते जा रहे हैं। जब कोई कमज़ोर आदमी हमें मिलता है तो हम उसे गो-तस्कर बना कर या बच्चा चोर मान कर- मार डालते हैं। लगातार अन्याय झेलते-झेलते खुद न्याय कर बैठने की यह दमित इच्छा अक्सर ख़ौफऩाक नतीजों में फूटती है और ज़्यादातर ऐसे मामलों के शिकार निरीह और मासूम लोग होते हैं।
    बलात्कार के मुद्दे पर लौटें। क्या हर तरह का बलात्कार हमारी संवेदना को झकझोरता है? या हम सिर्फ उन्हीं बलात्कारों से परेशान होते हैं जिनमें अतिरिक्त बर्बरता बरती गई हो या जो महानगरों के आसपास हों या जिनमें हमें कोई सांप्रदायिक कोण मिलता हो या फिर अपने हिस्से की राजनीति मिलती हो या फिर अपने ऊपर कोई वर्गीय हमला नजऱ आता है? क्या हम वाकई बलात्कार के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करते हैं? क्या हम कभी सोचते हैं कि जिस देश में हर 18 मिनट पर किसी लड़की के साथ बलात्कार होता हो, वहां हमें किसी निर्भया की, किसी कठुआ की या किसी मंदसौर की पीड़ा ही बड़ी क्यों लगने लगती है? हम जिस उग्रता से निर्भया के बलात्कारियों के लिए फांसी चाहते हैं, क्या उस उग्रता से कभी हमने बिलक़ीस बानो के बलात्कारियों के लिए फांसी की मांग की? बर्बरता में वे भी इनसे पीछे नहीं थे। या हम बलात्कारों को भी अपनी जातिगत और धार्मिक पहचान के साथ जोड़ कर देखने के आदी हैं? क्या झारखंड-छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर और कश्मीर में स्त्रियों के साथ होने वाले ऐसे दुराचार हमारे संवेदना-तंतुओं को प्रभावित करते हैं? ये असुविधा में डालने वाले सवाल हैं। इनसे आंख मिलाते मुश्किल होती है। हम समझ नहीं पाते कि बिलक़ीस बानो अपने न्याय से संतुष्ट क्यों है। वह अपने मुजरिमों के लिए उम्रक़ैद ही चाहती है, उनकी मौत क्यों नहीं।
    अगर कुछ और ध्यान से देखें तो हम पाएंगे कि हमारी प्रतिक्रियाओं में हमारे निजी पूर्वग्रहों का रंग ही नहीं, हमारी कई तरह की ग्रंथियां झांकती हैं। हम स्त्रियों के बलात्कार का विरोध करते हैं, लेकिन स्त्रियों को लगातार वस्तु में- कमोडिटी- में बदलने वाले मनोरंजन और विज्ञापन उद्योग से हमें परहेज नहीं है। उल्टे, स्त्रियों को बस उनकी देह तक महदूद करने वाली उस संस्कृति का हम हिस्सा हैं जिसमें वे साबुन से लेकर कार बेचने तक में इस्तेमाल की जा रही हैं। इस प्रश्न पर कुछ और विचार करें तो पाते हैं कि धीरे-धीरे हमारी सामाजिकता के तार टूटते जा रहे हैं। हम बस उपभोग के लिए व्याकुल एक समाज में बदल रहे हैं जहां स्त्री भी एक आखेट है।
    यह अनायास नहीं है कि इस नई दुनिया में जहां-जहां पर्यटन उद्योग बड़े पैमाने पर विकसित हो रहा है, वहां देह-व्यापार भी गैरकानूनी ढंग से उसका हिस्सा होता जा रहा है। दुनिया के कई हरे-सुनहरे समुद्र तटों की सुंदरता के पीछे जो अंधेरा है, उसमें गरीब मुल्कों से खऱीदी और लाई गई लड़कियों की सिसकियां भी शामिल होती हैं- क्या यह हम जानते हैं? क्या हमें नहीं मालूम है कि इक्कीसवीं सदी में स्त्री की खरीद-फऱोख्त किसी दूसरे कारोबार की तरह लगातार बड़ी हुई है? इन सबकी याद दिलाने का अभिप्राय कहीं भी यह नहीं है कि निर्भया के मुजरिमों को फांसी न हो। उन्हें यह फांसी होगी तो एक न्यायिक कार्यवाही के दायरे में होगी। इस दायरे के बाहर कोई भी मांग या कोशिश हत्या या हत्या की इच्छा ही कहलाएगी। बेशक, इसके बाद हमें अगली बहस यह करने की ज़रूरत भी है कि फांसी बरकरार रखी जाए या नहीं।
    दरअसल सभ्यता और मनुष्यता में आस्था वह चीज़ है जो हमारे यहां हाल के वर्षों में बहुत तेज़ी से क्षरित हुई है। हम लगातार जैसे झाग उगलते, एक-दूसरे से नफऱत करते, एक-दूसरे पर संदेह करते ऐसे बीमार समाज में बदल रहे हैं जिसमें निर्भयाएं असुरक्षित होने को अभिशप्त हैं। ऐसा बीमार समाज अपने लोगों को नहीं बचा सकता। दुनिया के कई देशों ने फांसी पर रोक लगा दी है- अगर हम भी लगाएंगे तो कहीं ज़्यादा सभ्य देश और ज्यादा मानवीय समाज होंगे। अगर हम इस मनुष्यता का सम्मान करेंगे तो अपने कमजोर जनों को बचाएंगे- अपने दलितों को, अपने आदिवासियों को, अपने गऱीबों को, अपने बच्चों को और अपनी लड़कियों को भी। बल्कि ऐसा करके हम अपने-आप को भी बचाएंगे- ये सब लोग हमारी भी मनुष्यता के रक्षक होंगे। यह यूटोपिया लग सकता है- लेकिन यह यूटोपिया भी मुझे किसी खूंखार यथार्थ से ज़्यादा प्रिय है। https://khabar.ndtv.com/

     

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • शशांक, पूर्व विदेश सचिव
    बुधवार को जब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन भारत से विदा हो रहे थे, तो एक सफल यात्रा की खुशी उनके चेहरे पर साफ-साफ दिख रही थी। उनका यह दौरा दक्षिण कोरिया की  'न्यू सदर्न पॉलिसीÓ (नई दक्षिण नीति) को गति देने में खासा मददगार साबित हुआ है। यह नीति आपसी समृद्धि और शांति के लिए दक्षिण एशियाई देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने पर जोर देता है। जाहिर है, भारत इसमें एक महत्वपूर्ण साझेदार है। हालांकि इस यात्रा में हमारे हित भी जुड़े थे। भले ही हम दक्षिण कोरिया के लिए एक बड़े बाजार की भूमिका ज्यादा निभाएंगे, पर 'एक्ट ईस्ट पॉलिसीÓ (पूर्वी देशों के साथ खास सहयोग बनाने की नीति) के बेहतर संचालन में वह हमारा बड़ा सहयोगी है। दक्षिण कोरिया के पास न तो उन्नत तकनीक की कमी है और न विशेषज्ञों व पूंजी की। भारत यह सब हासिल करके अपने बुनियादी ढांचे में सुधार ला सकता है। 
    राष्ट्रपति मून जे-इन की यह पहली भारत यात्रा थी। उनकी छवि मानवाधिकार समर्थक की रही है। पिछले दिनों कोरियाई प्रायद्वीप में शांति-स्थापना में भी उनकी अहम भूमिका थी। उन्होंने उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग-उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सफल वार्ता के लिए परदे के पीछे काफी मेहनत की है। भारत आकर मून जे-इन दरअसल उन तमाम वादों को ही आगे बढ़ा रहे थे, जो वहां के पूर्ववर्ती शासनाध्यक्षों किम युंग-साम, किम डे-जुंग ने हमसे किए थे। किम युंग-साम साल 1996 में भारत आए थे। उस समय मैं बतौर राजदूत दक्षिण कोरिया में था। अपने भारत दौरे में किम युंग-साम ने कहा था कि वह भारत को अपना 'खास सहयोगीÓ बनाएंगे और निवेश व द्विपक्षीय कारोबार को गति देंगे। उसके बाद ही सैमसंग, एलजी जैसी तमाम दक्षिण कोरियाई कंपनियों ने भारत में अपना कारोबार बढ़ाया। नतीजतन, आज दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार 20 अरब डॉलर के आसपास पहुंच गया है, जिसे 2020 तक 50 अरब डॉलर तक ले जाने का भरोसा मून जे-इन की इस यात्रा में दिया गया है।
    मंगलवार को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद जारी साझा बयान भी इसी की पुष्टि करता है। उसमें कहा गया है कि दोनों देश आपसी रणनीतिक साझेदारी मजबूत बनाने को लेकर संकल्पित तो हैं ही, समग्र आर्थिक साझेदारी (सीपीईए) को भी खासा मजबूत बनाएंगे। साफ है कि दोनों देश आपसी रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने को लेकर संजीदा हैं। हालांकि इस दिशा में हमें अपने तईं भी काफी काम करना होगा। ओडिशा में पोस्को विवाद इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जिसे सबक के तौर पर लेना चाहिए। दक्षिण कोरियाई स्टील कंपनी पोस्को ने 2005 में ओडिशा सरकार के साथ एक इस्पात इकाई बनाने का समझौता किया था, जिसे 2010 तक तैयार होना था। इस संयंत्र पर दक्षिण कोरिया ने 12 अरब डॉलर के निवेश का भरोसा दिया था। मगर विवाद इतने गहराने लगे कि 2015 में पोस्को ने अपने कदम वापस खींचने का फैसला किया, और यह निवेश अधूरा छूट गया। 
    दक्षिण कोरिया, चीन, जापान जैसे देश यदि शीर्ष स्तर पर कोई फैसला लेते हैं, तो उस पर अमल करने की हरसंभव कोशिश करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो अपनी जी-जान तक लगा देते हैं। इसलिए हमें निवेश का अनुकूल माहौल बनाना होगा, ताकि निवेशकों को यहां कोई दिक्कत न हो। यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'मेक इन इंडियाÓ की सबसे बड़ी चुनौती भी है, जिसे जल्द ही दूर करने का भरोसा उन्होंने मून जे-इन के साथ नोएडा में सैमसंग मोबाइल प्लांट के उद्घाटन समारोह में दिया। 
    दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति की यह यात्रा अंतरराष्ट्रीय शांति व्यवस्था में भारत के कद को बढ़ाने वाला भी साबित हो सकता है। विशेषकर कोरियाई प्रायद्वीप में शांति बहाली में भारत खासा मददगार होगा। दक्षिण कोरिया ने आतंकवाद के मसले पर भी भारत का साथ देने की बात कही है। इसका अर्थ है कि उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के बीच परमाणु और मिसाइल तकनीक की जो लेन-देन चलती रहती है, उस पर आने वाले दिनों में लगाम लग सकेगी। पाकिस्तान पर चीन के माध्यम से भी दबाव बन सकता है। चीन का अभी भले ही दक्षिण कोरिया से मजबूत आर्थिक संबंध है, पर भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेज गति से आगे बढ़ रही है, उससे यह कयास गलत नहीं है कि 2035 तक हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक होंगे। 
    इतना ही नहीं, योग्य मानव श्रम में भी हम दुनिया में सिरमौर होंगे। चूंकि दक्षिण कोरिया के आईटी क्षेत्र व कृत्रिम बौद्धिकता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को गति ऐसे ही कुशल मानव हाथों की जरूरत होगी, इसलिए वह हमारा साथ छोडऩे को शायद ही तैयार हो। ऐसी सूरत में हम दक्षिण कोरिया व जापान जैसे देशों के साथ संबंध बढ़ाकर चीन पर दबाव बना सकेंगे कि वह किसी तरह का बेजा फायदा न उठा पाए। समुद्री सुरक्षा को भी ध्यान में रखकर दोनों देशों ने समझौते किए हैं, जिसका इंडो-पैसिफिक में खासा असर पड़ेगा।
    जाहिर है, दक्षिण कोरिया और भारत की मजबूत होती दोस्ती दोनों देशों के हित में है। वैसे भी, भारत ने कदम-कदम पर कोरिया प्रायद्वीप की स्थिरता में अपनी भागीदारी निभाई है। 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र ने रिपैट्रीएशन कमिशन यानी देश-प्रत्यावर्तन आयोग का गठन किया था, तो भारत उसका अध्यक्ष था। बाद में भारत ने वहां अपना मेडिकल मिशन भी भेजा। कोरिया के लोग अब भी उन तमाम वाकये को याद करते हैं।
     रवींद्र नाथ टैगोर ने तो 1929 में कोरिया को लेकर कुछ पंक्तियां लिखी थीं- 'एशिया के स्वर्ण काल में/ कोरिया एक मशाल वाहक था/ वह मशाल आज भी इंतजार कर रही है/ उसे फिर एक बार प्रकाशित किया जाए/ जिससे कि पूरा पूरब जगमगा उठेÓ। यह दोनों देशों के बीच एक मजबूत व दीर्घकालिक रिश्ते की शुरुआत को चिह्नित करने वाली पंक्ति मानी जाती है। शुरुआत में इस द्विपक्षीय रिश्ते का दायरा छोटा था, मगर मून जे-इन इसे अब एक असीमित ऊंचाई देकर गए हैं। https://www.livehindustan.com/blog/l

     

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • विवेक पाठक

     भारत हो या पाकिस्तान, सीमा के दोनों तरफ मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिहाज से कश्मीर ऐसा मुद्दा रहा है, जिसे सभी सियासी पार्टियां भुनाना चाहती हैं। लिहाजा दोनों मुल्कों के सभी दलों के घोषणापत्र में कश्मीर के मुद्दे को हमेशा प्रथमिकता दी जाती रही है। ऐसे में एक चौंकाने वाली खबर पड़ोसी देश पाकिस्तान से आई है जहां के बड़े राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में कश्मीर का मुद्दा लगभग गायब दिख रहा है।

    पाकिस्तान में 25 जुलाई को होने वाले आम चुनावों को लेकर जहां सियासी सरगर्मी चरम पर है। वहीं मतदाताओं को लुभाने के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है।
    पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यदि पाकिस्तान के बड़े दल- पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) यानी पीएमएल-एन, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) और पाकिस्तान पिपुल्स पार्टी (पीपीपी) के चुनावी घोषणापत्र पर नजर डाले तो कश्मीर का जिक्र नाममात्र ही हुआ है। कश्मीर को लेकर आक्रामक रुख रखने वाली, पाकिस्तानी सेना द्वारा परोक्ष रूप से समर्थित पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी पीटीआई के सोमवार को जारी 58 पन्नों के घोषणापत्र में कश्मीर का जिक्र सिर्फ दो बार आया है। चार प्रमुख विदेशी मुद्दों में कश्मीर तीसरे नंबर पर है। इमरान खान की पार्टी के घोषणापत्र में कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के प्रस्ताव के दायरे में सुलझाने के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करने की बात कही गई है।
    वहीं पाकिस्तान के सबसे बड़े दल, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पीएमएल-एन के घोषणापत्र में चीन के साथ नजदीकी को प्राथमिकता के साथ पाकिस्तान के परमाणू हथियारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। वहीं कश्मीर को विदेशी रिश्तों को सुधारने के लिहाज से दस सुत्रीय एजेंडे में नौंवा स्थान दिया गया है। जबकि घोषणापत्र में कश्मीर, फिलिस्तीन व रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे कथित अत्याचार पर सहानुभूति जताई गई है।
    वहीं पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की पीपीपी के घोषणापत्र में भारत के साथ संबंध को मजबूत करने व बातचीत के दौर को जारी रखने की वकालत की गई है। 62 पन्नों के घोषणापत्र में कश्मीर का मुद्दा 59वें पेज पर है ।
    लिहाजा पाकिस्तान की इन तीनों बड़ी पार्टियों के घोषणापत्र के अध्ययन से यह पता चलता है कि तीनों सियासी दल भारत से अच्छे रिश्ते चाहती हैं। कश्मीर मुद्दे को पीछे छोड़ते हुए भारत के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध स्थापित करनी चाहती है। ब सवाल ये है कि जब, इमरान की पीटीआई का नारा नया पाकिस्तान है तो क्या इमरान खान के इस नए पाकिस्तान में कश्मीर नहीं है ? नवाज की पार्टी पीएमएल-एन का नारा है वोट को इज्जत दो, तो कश्मीर के लिए नवाज की इज्जत कहां है ? पीपीपी का नारा है बीबी का वादा निभाना है, पाकिस्तान बचाना है, तो कश्मीर पर कब्जे की बात करने वाले बिलावल भुट्टो जरदारी के घोषणापत्र में कश्मीर के बजाय पाकिस्तान को बचाने पर जोर क्यों है?
    बहरहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान ने कश्मीर राग छोड़ दिया है। लेकिन इस महीने के अंत में होने वाले आम चुनावों में बड़े सियासी दलों के घोषणापत्र से कश्मीर के मुद्दे का लगभग गायब होना इस बात की ओर इशारा जरूर करता है कि कश्मीर के नाम पर अब पाकिस्तान में वोट नहीं मिलने वाले हैं। (आज तक)

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • अखिलेश शर्मा
    जो हमें नुकसान पहुंचाएगा, उसका ही नुकसान होगा।ज् अपनी पार्टी जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नीतीश के ये बोल बीजेपी को साफ संदेश है। यह उस नारे की याद दिलाता है जो राजनीतिक कार्यकर्ता चुनाव के वक्त या फिर पार्टियों में अंदरूनी विभाजन के वक्त लगाते हैं। वो नारा होता है- जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा। वैसे तो नीतीश और बीजेपी अभी साथ हैं। लेकिन ये साथ इसी बात पर निर्भर है कि बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच 40 लोकसभा सीटों का बंटवारा कैसे होता है। गुरुवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पटना जा रहे हैं। वे नीतीश कुमार से मिलेंगे। इसमें सीटों के बंटवारे पर बातचीत होगी। उसी के बाद गठबंधन की तस्वीर साफ होगी।
    लेकिन इस बीच जेडीयू के आला सूत्रों से जानकारी मिली है कि जेडीयू किसी भी कीमत पर बीजेपी से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी। यानी बीजेपी को यह मानना होगा कि बिहार में नीतीश बड़े भाई हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी 30 सीटों पर लड़ी और 22 जीती। सात सीटें रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति को दी गईं जिसमें वे छह पर जीते। तीन पर उपेंद्र कुशवाहा जीते थे। 
    जेडीयू को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन जेडीयू ने याद दिलाया है कि 2014 उसके लिए सबसे खराब समय था इसके बावजूद उसे 17 फीसदी वोट मिले थे। यानी इस बार सीटों का बंटवारा उसकी इसी ताकत के हिसाब से हो। 2009 लोकसभा चुनाव बीजेपी और जेडीयू ने मिल कर लड़ा था। तब जेडीयू ने 25 में से 20 और बीजेपी ने 15 में से 12 सीटों पर जीत हासिल की थी।
    लेकिन अब 40 सीटों के लिए चार दावेदार हैं। बीजेपी किसी भी हालत में 2014 में हासिल की गई बढ़त को छोडऩे को तैयार नहीं है। उधर, जेडीयू का कहना है कि 2014 में बीजेपी ने जेडीयू की कई सीटों पर जीत हासिल की थी। वो भी बाहरी उम्मीदवार लाकर या फिर जेडीयू के नेताओं को टिकट देकर। जैसे औरंगाबाद और आरा जैसी सीटें। इसीलिए इन सीटों पर अब जेडीयू का दावा है। गौरतलब है कि जेडीयू आरजेडी के साथ वापस जाने से इनकार कर चुकी है। रविवार की बैठक में कहा गया कि क्राइम, करप्शन और कम्यूनलाइजेशन पर समझौता नहीं होगा। ये अलग बात है कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह नवादा जेल में सांप्रदायिक तनाव के बाद बंद बजरंग दल के कार्यकर्ताओं से मिल आते हैं और राज्य सरकार पर तोहमत लगाते हैं। नीतीश इससे खुश नहीं हैं। नीतीश तेजप्रताप के उस पोस्टर से भी बेहद नाराज हैं जिसमें उन्होंने नीतीश के लिए नो एंट्री कहा था। नीतीश कुमार कह रहे हैं कि अब वे हाल-चाल पूछने के लिए लालू प्रसाद को फोन नहीं करेंगे और अखबार से ही उनकी सेहत का हाल पता कर लेंगे।
    जेडीयू नेता कहते हैं कि जब लालू प्रसाद के साथ मिल कर सरकार बनाई तब समझ में आया कि उनके साथ काम नहीं कर सकते। इससे गवर्नेंस पर असर होता है और साख खराब होती है जिस पर अब कोई समझौता नहीं हो सकता। लेकिन दिलचस्प बात है कि जेडीयू कांग्रेस को लेकर वैसी सख्त नहीं है। 
    जेडीयू सूत्र कहते हैं कि अगर कांग्रेस आरजेडी से रिश्ता तोड़े तो उसके साथ जाने पर विचार हो सकता है। यह शायद बीजेपी पर दबाव बनाए रखने की रणनीति हो सकती है। लेकिन इसमें ज़्यादा दम नहीं है क्योंकि कांग्रेस शायद ही अब आरजेडी की कीमत पर नीतीश कुमार को साथ ले। इसे राजनीति में सेक्यूलर जोडिय़ां बनाना कहा जा रहा है पर यह शायद ही हो।
    उधर, जेडीयू नेता मानते हैं कि साथ रहना बीजेपी की मजबूरी है। खासतौर से तब जबकि एक-एक कर उसके सहयोगी उससे छिटक रहे हैं या फिर छिटकाए जा रहे हैं। जैसे आंध्र प्रदेश में बीजेपी और टीडीपी के रिश्ते टूटे। फिर जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने खुद ही पीडीपी से किनारा कर लिया और सरकार गिर गई। अब चर्चा है कि बीजेपी पीडीपी को तोडऩे की फिराक में है। हालांकि राम माधव इससे इनकार कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना किस दिन छोड़ कर चली जाएगी यह कोई नहीं कह सकता। वैसे पीएम एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि एनडीए का कुनबा बढ़ रहा है। 
    लेकिन क्षेत्रीय दलों को आशंका है कि बीजेपी उनकी कीमत पर राज्यों में विस्तार कर रही है। ऐसे में वे अपनी जमीन बचाए रखना चाहते हैं। जेडीयू की यह ज़ोर-आजमाइश इसी कवायद का हिस्सा है। लेकिन क्या क्षेत्रीय दल बीजेपी जैसे विस्तारवादी पार्टी पर भरोसा कर सकते हैं? क्या नीतीश कुमार और अमित शाह की बैठक में सीटों का बंटवारे पर सहमति बन जाएगी? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाबों पर बीजेपी का मिशन 2019 काफी हद तक निर्भर रहेगा।
    http://khabar.ndtv.com
    (राजनीतिक संपादक एनडीटीवी इंडिया )

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • प्रकाश दुबे
    दिल्ली और देहात 
    दिल्ली के वातानुकूलित टीवी स्टूडियो में किसान की खुशखबरी की खबर आ रही थी। सौ किलोमीटर दूर रेवाड़ी के ताकड़ी गांव में चारपाई पर बैठे योगेन्द्र यादव से टीवी पत्रकार ने कहा-अब तो खुश हो जाइए। किसानों को बाजिव दाम दिलाने स्वराज पार्टी के नेता यादव गांव-गांव भटक रहे हैं। किसान बता चुके थे-न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी का पता ही नहीं है। बाजरा का एमएसपी गत वर्ष 1450 रु था। किसानों को 11 सौ मिले। अब एमएसपी 1950 रु क्विंटल किया गया है। अफसर बहाने बनाकर कई फसलों की खरीदी टाल देते हैं। टीवी वालों को यादव कैसे बताएं कि किसान और सरकार दो अलग अलग देशों में बैठे हैं? इंडिया बनाम भारत। शायद दो अलग अलग दुनिया में।              
     सपनों की सैर 
     जल-जहाज खरीद कर लाओ। सड़क देश की खाली कर बैठ क्रूज में मजे उड़ाओ। यह कविता नितीन गडकरी ने नहीं लिखी है। करना यही चाहते हैं।( रेल छोड़कर) जल-थल परिवहन की कमान गडकरी संभाल रहे हैं। जहाजरानी निगम को दस अरब रुपए की भारी रकम का जुगाड़ कराने गडकरी एक शर्त पर तैयार हैं। यूनान अभी कड़की में है। जल-जहाजों का बेड़ा बेचने की नौबत है। यूनान से जहाज खरीदो। भारत में जल परिवहन के लिए भाड़े पर दो। सागरमाला परियोजना नाम का सपना पूरा करने में जुटे गडकरी का दूसरा सपना है कि लोग सड़क मार्ग से चलना बंद करें। इथेनाल से लेकर सागर सैर का सपना देखने के बाद पेट्रोल कीमत में बढ़ोत्तरी की शिकायत मत करना।     
      नौका डूबी बाढ़ में  
    जम्मू-कश्मीर में सिंचाई और बाढ़ राहत की मद के करोड़ों रुपए अनखर्चे रहे। श्रीनगर में झेलम और नहरों से जल निकासी के लिए 24 करोड़ रु मिले थे। चार बरस से जमा हैं। पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी की मिली जुली सरकार की मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी बनती है। जांच की मांग उठने पर भाजपा के (अब पूर्व) मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी और राज्यपाल सचिवालय की ठंडी हवा में गरिष्ठï ज्ञान वितरित करने वाले चपेट में आएंगे। राज्य को अंगुली पर नचाने वाले केन्द्रीय राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह और राम माधव जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।       
     गणित और समीकरण  
    कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने मिली जुली सरकार का बजट पेश किया। बजट भाषण में कहा कि कांग्रेस राज में सिद्घरामैया बजट पेश कर चुके हैं। मैं सिर्फ कुछ नए प्रस्ताव शामिल कर रहा हूं। मुख्यमंत्री के रिश्तेदार शिक्षा मंत्री कम पढ़े लिखे हैं। उनका गणित कमजोर हो सकता है। अपमान से लाल पीले हो रहे सिद्घरामैया सहित कांग्रेस के गले यह दलील नहीं उतरी। उतरे भी कैसे? सिद्घरामैया ने 16 फरवरी को दो लाख करोड़ रूपये का बजट पेश किया था। महज कुछ नए प्रस्तावों वाला कुमारस्वामी का बजट- आकार मात्र 9 हजार करोड़ रूपये अधिक है। कांगेस और जनता एस का सत्ता-समीकरण जम गया। खजाने के खर्च को लेकर आपस में गणित सही नहीं बैठ रहा।         
    (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

     

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • सुशांत सरीन, सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन 
    पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लिए 'सजाÓ तो पिछले साल जनवरी में ही तय हो गई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ खारिज किए गए 'रेफरेन्सÓ यानी मामले को फिर से खोलने का निर्देश दिया। ये 'रेफरेन्सÓपनामा पेपर लीक से जुड़े हुए थे। विडंबना है कि जिस पनामा कांड में नवाज शरीफ का नाम ही नहीं है, उसमें उन्हें यह सजा दी गई है। इस मामले में तो उनके बच्चों के नाम सीधे तौर आए हैं। दिलचस्प यह भी है कि भ्रष्टाचार-निरोधक अदालत में जिस जज मुहम्मद बशीर ने मियां शरीफ को यह सजा सुनाई है, उन्हीं की अदालत में पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भी ऐसे ही भ्रष्टाचार के 'रेफरेन्सÓ दाखिल किए गए थे। मगर जरदारी को उन तमाम मामलों से यह कहकर बरी कर दिया गया कि उनके खिलाफ कोई दस्तावेजी सुबूत नहीं है। नवाज शरीफ के वकीलों ने यह तर्क भी अदालत में दिए, मगर उन्हें मायूसी हाथ लगी। और नवाज शरीफ 10 वर्षों के लिए सलाखों के पीछे धकेल दिए गए हैं। 
    एक ही जज, एक ही अदालत, एक जैसे मामले, फिर भी फैसला अलग-अलग। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी वजह साफ-साफ यह है कि नवाज शरीफ अब सेना की आंखों की किरकिरी बन चुके हैं। पाकिस्तान भले ही अपनी न्यापालिका के निष्पक्ष होने का दावा करे, मगर असलियत में वहां की कानूनी प्रणालियों में कई छेद हैं। वहां 'डीप स्टेटÓ के करीबी होने का पूरा फायदा मिलता है। 'डीप स्टेटÓ फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई के शीर्ष अधिकारियों का एक अनधिकृत ढांचा है, जो सियासत में पर्याप्त दखल रखता है। 
    अगर यह साथ खड़ा हो, तो तमाम सुबूत खिलाफ होने पर भी अपराधी को सजा नहीं मिलती। लेकिन यदि 'डीप स्टेटÓ की नजर टेढ़ी हो जाए, तो सुबूतों का हक में होना भी आपको सजा से नहीं बचा सकता। यही पाकिस्तान की 'निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिकाÓ का पैमाना है। नवाज शरीफ इसी के शिकार बने हैं। उनके ऊपर भ्रष्टाचार के तमाम मामले उस वक्त अदालत में खारिज हो रहे थे, जब वह 'डीप स्टेटÓ के करीब थे, मगर इस रक्षा कवच के टूटते ही पहले वह दोषी साबित हुए और अब सजायाफ्ता।
    उनकी नई रणनीति ने भी मुश्किलें बढ़ाई हैं। जब से नवाज शरीफ को बर्खास्त किया गया था, वह देश भर में घूम-घूमकर चुनावी जलसों (सभाओं) को संबोधित कर रहे थे। वह लोगों को यह समझाने में सफल हो रहे थे कि उनके साथ गलत हुआ है। उन्हें साजिशन सत्ता से हटाया गया है। लिहाजा वोट की इज्जत के लिए उन्हें ही वोट मिलना चाहिए। मगर यह माहौल चरम पर पहुंच पाता कि बीमार पत्नी कुलसुम नवाज को देखने उन्हें अचानक लंदन जाना पड़ा। कुलसुम की हालत इस समय काफी नाजुक है। इधर, नवाज के भाई शहबाज शरीफ चुनाव प्रचार की उस लय को नहीं पकड़ पाए। एक सच यह भी है कि वह ऐसा करना ही नहीं चाहते। 
    लगता है, वह फौज व अदालतों के सामने घुटने टेककर अपने लिए 'रहमÓ की फिराक में हैं। वह सुलह के लिए 'डीप स्टेटÓ के करीब जाने की कोशिश करते दिखे। इस दौरान उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज को भी तोड़ा गया। पार्टी के कई उम्मीदवारों ने ठीक उसी वक्त अपनी उम्मीदवारी छोड़ दी, जब चुनाव के लिए नामांकन वापस लेने का आखिरी दिन था। इन सबने नवाज शरीफ के पक्ष में बने माहौल को कमजोर कर दिया है। हालांकि पिछले महीने आए एक सर्वे का नतीजा बताता है कि अब भी वह एक बड़ी ताकत बने हुए हैं। पंजाब प्रांत में उन्हें बहुमत मिलने की बात कही गई है, जबकि कई अन्य सीटों पर कांटे की टक्कर दिखाई गई है। मगर यह सर्वे पिछले महीने का है, जबकि चुनावी माहौल में एक हफ्ते में ही 'हवाÓ बदल जाया करती है। 
    सवाल यह है कि अब नवाज शरीफ के सामने विकल्प क्या हैं? दो रास्ते नजर आते हैं, लेकिन दोनों के अपने-अपने खतरे हैं। एक रास्ता तो यह हो सकता है कि वह अपने मुल्क वापस लौटे ही नहीं। लंदन में ही रुके रहें और वहीं से पाकिस्तान में यह पैगाम देने की कोशिश करें कि उनके साथ ज्यादती हुई है। मगर इस स्थिति में सत्ता छिटकने की आशंका ज्यादा है। दरअसल, 1999 में जब उनकी कुरसी को पलटा गया था, तब वह करीब डेढ़ साल के लिए मुल्क से भाग गए थे। इसका खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा। अगर इस बार भी वह ऐसा कुछ करते हैं, तो लोगों की नजर में 'भगोड़ाÓ साबित हो जाएंगे। इसका उन्हें सियासी नुकसान होगा। 
    इसमें वह एक उम्मीद की किरण भी देख रहे होंगे, जिसकी वजह खुद इमरान खान हैं। इमरान अस्थिर मिजाज के इंसान माने जाते हैं। अभी उन्हें 'डीप स्टेटÓ का साथ मिला हुआ है, मगर संभव है कि सत्ता संभालने के एकाध वर्षों में सेना के साथ उनकी तनातनी बढ़े। तब नवाज शरीफ अपने लिए कुछ संभावना देख पाएंगे। संभव है कि उनके पक्ष में फिर से माहौल बने और वह पाकिस्तान वापस लौट सकें। मगर ऐसा नहीं हो पाया और यथास्थिति बनी रही या घरेलू सियासत में तब्दीलियों की वजह से नए खिलाड़ी मैदान में आ गए, तो फिर नवाज के लिए जगह हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।
    दूसरा रास्ता यह है कि वह हीरो बनकर वापस लौट आएं। चूंकि कुलसुम नाजुक स्थिति में हैं, इसका नवाज को भावनात्मक फायदा मिल सकता है। तब उनकी पार्टी के चुनाव जीतने की संभावना काफी बढ़ जाएगी। इस स्थिति में उनका जेल में भी रहना कोई घाटे का सौदा नहीं होगा। मगर इसमें जोखिम यह है कि यदि जनता ने सहानुभूति नहीं दिखाई, तो वह सत्ता से भी दूर होंगे और जेल की हवा भी खाएंगे। ऐसा पहले भी हो चुका है, जब परवेज मुशर्रफ तानाशाह के रूप में देश के मुखिया थे।  तब नवाज शरीफ पूरे जोर-शोर से देश लौटे जरूर, पर उन्हें जनता का भरपूर साथ नहीं मिला। जाहिर है, नवाज शरीफ के सामने एक असमंजस सी स्थिति होगी। वह तमाम सियासी गुणा-भाग कर रहे होंगे। ऐसे में, उनका फैसला क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। मगर पाकिस्तानी सियासत में उथल-पुथल लाने वाली बिसात बिछ चुकी है। https://www.livehindustan.com/

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Posted Date : 10-Jul-2018
  • शिवप्रसाद जोशी
    समस्त जंतु जगत का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा है कि इसके दायरे में जल और वायु के जीव भी शामिल होंगे। कोर्ट का ये फैसला अनूठा और अभूतपूर्व है और विस्मयकारी भी। पशु अधिकारों के लिये काम करनेवाली संस्थाएं इससे खुश हैं कि इससे लोगों में जानवरों के प्रति संवेदनशीलता और जागरूकता आएगी तो वहीं सवाल उठ रहे हैं कि इसे लागू कैसे किया जा सकेगा। फैसले और फैसले की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पता चलता है कि हाईकोर्ट ने जानवरों के प्रति संवेदनहीनता की निंदा ही नहीं की है बल्कि प्रशासनिक और चिकित्सकीय लापरवाहियों के प्रति सावधान रहने और मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की हिदायत भी है। संविधान में निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों और मौलिक कर्तव्यों के प्रावधानों को देखते हुए ये फैसला उचित ही लगता है। लेकिन ये उत्तराखंड की सर्वोच्च अदालत से ही क्यों और कैसे आया?
    नैनीताल हाईकोर्ट की जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने उत्तराखंड निवासी नारायण दत्त भट्ट की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला दिया है। इस याचिका में उत्तराखंड से जुड़ी नेपाल सीमा पर होने वाली घोड़ागाडिय़ों या तांगा की आवाजाही पर रोक लगाने को कहा गया था। उत्तराखंड के चंपावत जिले की सीमा नेपाल से जुड़ती है और वहां से इस आवाजाही की बात याचिका में की गई थी। याचिकाकर्ता ने अनिवार्य रूप से मांग की थी कि घोड़ों का टीकाकरण होना चाहिए और भारतीय क्षेत्र में घुसने से पहले संक्रमण या किसी बीमारी की आशंका के लिहाज से एहतियातन उनकी जांच की जानी चाहिए।
    हालांकि इस याचिका की परिधि में सभी जानवरों की सुरक्षा और कल्याण की बात भी स्वत: ही निहित थी। क्योंकि इसमें जंतु कल्याण से जुड़े कानूनों का उल्लेख भी किया गया था। और उन पर अमल की शोचनीय स्थिति का भी। मिसाल के लिए प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनीमल्स (पीसीए) एक्ट का जिक्र याचिका में था। प्राचीन आख्यानों और उपनिषदों आदि के हवाले से समस्त प्राणिजगत की बराबरी का उल्लेख भी था। इसमें बताया गया था कि जानवर के जीने का अधिकार सिर्फ मनुष्य का उसके दोहन करने देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसे भी मनुष्य की तरह गरिमा और सम्मान से जीने का हक है और उसके जीवन को सीमित, प्रतिबंधित या अपनी मर्जी से हांका नहीं जा सकता है।
    कोर्ट ने उत्तराखंड के प्रशासन और नागरिकों को पशुओं के अधिकारों की रक्षा करने और इस संबंध में जुड़े कानूनों पर अमल करने के लिए जिम्मेदार बनाया है। अदालत ने कहा है कि भारतीय सीमा में दाखिल होने से पहले जानवरों का मेडिकल चेकअप कराना होगा। आवाजाही के नियमों के तहत लाइसेंस आदि जारी करने होंगे। जीबी पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति की निगरानी में विशेषज्ञों और जानवरों के डॉक्टरों की एक कमेटी बनाई जाएगी जो इस बात का अध्ययन करेगी कि आखिर जानवर कितना अधिकतम वजन ढो सकते हैं। और मौजूदा नियम क्या उचित हैं। कमेटी को 12 हफ्तों में अपनी रिपोर्ट विश्वविद्यालय के कुलपति को देनी होगी जो इसे उत्तराखंड के मुख्य सचिव को भेजेंगे।
    हाईकोर्ट ने जानवरों को डंडे या किसी वस्तु से मारने, छेडऩे, कोंचने या तंग करने पर प्रतिबंध लगा दिया है ताकि उन्हें कोई घाव, सूजन या किसी भी तरह का शारीरिक नुकसान न हो। सभी शहरी निकायों के लिए ये अनिवार्य होगा कि पशुगाडिय़ों के मालिकों से उन वाहनों के वजन का प्रमाण पत्र लें जिनमें उन पशुओं को जोता जाएगा।
     सभी बैलगाड़ी, तांगा और ऊंटगाड़ी में आगे-पीछे रात में चमकने वाली पट्टी लगानी होगी और रात में पशुओं के शरीर पर भी ताकि रात में किसी संभावित खतरे से बचे रहें। पशुवाहनों के चलने के समय और उनमें अधिकतम सवारी, विश्राम और चिकित्सीय जांचों और सावधानियों के संबंध में भी विस्तृत निर्देश जारी किए हैं। आदेश में प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल एक्ट और प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ इंफेक्शियस डिजीज एक्ट को भी कड़ाई से लागू करने के आदेश दिए हैं। साथ ही सरकार से कहा है कि सभी जिलों में ऐसी सोसायटी बनाई जाएं जो इनके अनुपालन को सुनिश्चित करे।    
    ध्यान देने की बात ये है कि पिछले वर्ष मार्च में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इसी तरह का फैसला गंगा-यमुना और उसकी सहयोगी नदियों के बारे में दिया था कि उन्हें भी नागरिकों की तरह अधिकार प्राप्त हैं लेकिन तीन महीने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। पशुप्रेमियों और समाज को ये सुनिश्चित करना होगा कि जानवरों के संबंध में आए इस फैसले की भी वही गति न हो और सबसे बुनियादी बात ये है कि जानवरों के अधिकारों के प्रति सम्मान और संवेदना का पर्यावरण विकसित हो सके। (डॉयचे वैले) 

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Posted Date : 10-Jul-2018
  • प्रभाकर एम
    कोलकाता, 10 जुलाई । बंगाल में भाजपा के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों ने राजनीतिक शतरंज की बिसात पर गोटियां बिछाने की कवायद तेज कर दी है। तृणमूल कांग्रेस ने इसके लिए संगठन और मंत्रिमंडल में फेरबदल किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस में चुनावी तालमेल के सवाल पर दो गुट आमने-सामने हैं। इनमें से एक गुट सीपीएम की अगुवाई वाले वाममोर्चा के साथ तालमेल जारी रखने की वकालत कर रहा है तो दूसरा गुट तृणमूल कांग्रेस के साथ एक बार फिर हाथ मिलाने के पक्ष में है।
    इस मुद्दे पर बीते हफ्ते प्रदेश के नेताओं के साथ दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की बैठक में भी कोई हल नहीं निकल सका। हालात यह है कि तालमेल के सवाल पर पार्टी दो-फाड़ होने की कगार पर है। पार्टी का प्रदेश नेतृत्व विधायकों और दूसरे नेताओं के पलायन से भी परेशान है।
    सीपीएम का प्रदेश नेतृत्व फिलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठा है। पार्टी की केंद्रीय समिति भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस का हाथ थामने के प्रस्ताव को पहले ही लाल झंडी दिखा चुकी है। बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के बीच तालमेल होता रहा है।
    दूसरी ओर, भाजपा अपने पैरों तले की जमीन मजबूत करने और जवाबी रणनीति बनाने में जुटी है। बीते महीने के आखिर में राज्य के दो-दिवसीय दौरे पर आए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश नेताओं को लोकसभा की 42 में से कम से कम 22 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है। वैसे प्रदेश भाजपा ने जो चुनावी ब्लूप्रिंट तैयार किया है उसमें कहा गया है कि पार्टी राज्य में कम से कम 26 सीटें जीत सकती है।
    हाल के पंचायत चुनावों में, खासकर आदिवासी इलाकों में, पार्टी का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है, इससे उसके हौसले बुलंद हैं। वैसे भी बीते दो-तीन वर्षों के दौरान होने वाले तमाम उपचुनावों और शहरी निकायों के लिए हुए चुनावों में कांग्रेस और सीपीएम को पीछे धकेलते हुए भाजपा दूसरे स्थान पर रही है।
    पहले तृणमूल कांग्रेस और उसके बाद सीपीएम के साथ हाथ मिलाने वाली कांग्रेस एक बार फिर दोराहे पर खड़ी नजर आ रही है। वह यह तय नहीं कर पा रही है कि अगले साल लोकसभा चुनावों में उसे माकपा के साथ हाथ मिलाना चाहिए या कांग्रेस से। पार्टी का एक गुट माकपा से हाथ मिलाने के पक्ष में है तो दूसरा तृणमूल कांग्रेस से।
    प्रदेश कांग्रेस के महासचिव ओम प्रकाश मिश्र ने हाल में केंद्रीय नेतृत्व को जो रिपोर्ट भेजी है उसमें माकपा से हाथ मिलाने की सिफारिश की गई है। लेकिन पार्टी के सांसदों और विधायकों के एक गुट का मानना है कि कांग्रेस को अगर लोकसभा की सीटें बढ़ानी हैं तो इसके लिए तृणमूल कांग्रेस से हाथ मिलाना बेहतर होगा।
    पूर्व केंद्रीय मंत्री एबीए गनी खान चौधरी के भाई और मालदा के कांग्रेस सांसद अबू हाशिम खान चौधरी ने बीती 28 जुलाई को यहां तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी से उनके आवास पर मुलाकात की थी। उक्त मुलाकात के बाद अबू हाशिम ने पत्रकारों को बताया था कि दूसरे मुद्दों के अलावा भाजपा के खिलाफ एक महागठजोड़ बनाने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।
    हाशिम कहते हैं, ज्यहां कांग्रेस को अगर सीटों की तादाद बढ़ानी है तो उसे तृणमूल से हाथ मिलाना ही होगा, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी दलील देते हैं कि यहां तृणमूल कांग्रेस से हाथ मिलाना कांग्रेस के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा।
    अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, कांग्रेस ने पहले भी तृणमूल से हाथ मिलाया था और उसका नतीजा सबके सामने है। अब उस गलती को दोहराने का कोई मतलब नहीं है।
    तृणमूल कांग्रेस के कट्टर आलोचक रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी आरोप लगाते हैं, तृणमूल की वजह से ही भाजपा को बंगाल में पांव जमाने का मौका मिला है। उसी की वजह से यहां कांग्रेस लगातार कमजोर हुई है।
    कांग्रेस ने वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा के साथ हाथ मिलाया था। तब पार्टी को 44 सीटें मिली थीं। लेकिन बीते दो वर्षों के दौरान उसके एक दर्जन विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। पलायन का यह सिलसिला अब भी जारी है। 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस की ओर से होने वाली शहीद रैली के दौरान कुछ और विधायकों के पाला बदलने की संभावना है।
    वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को 34 सीटें मिली थीं। कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि सीपीएम और भाजपा को दो-दो सीटें मिली थीं।
    हाल के पंचायत चुनावों में खासकर राज्य के आदिवासी इलाकों में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने आदिवासी नेताओं के साथ संबंधों को मजबूत करने की कवायद शुरू की है। इसी कवायद के तहत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक आदिवासी कल्याण समिति का गठन कर माकपा के निष्कासित सांसद ऋतब्रत बनर्जी को इसका संयोजक बनाया है।
    इस समिति में हर जिले से आदिवासियों के दो प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा और ये लोग व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए आपस में संपर्क रखेंगे।
    पंचायत चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद ममता ने आदिवासी तबके के दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटा दिया था। उनकी जगह दो वरिष्ठ मंत्रियों पार्थ चटर्जी और ज्योतिप्रिय मल्लिक को आदिवासी-बहुल जंगलमहल इलाके में लोगों में फैले असंतोष को दूर करने का जिम्मा सौंपा गया है। तृणमूल कांग्रेस ने तालमेल के सवाल पर कांग्रेस में होने वाले मंथन को उसका अंदरूनी मामला बताते हुए इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है।
    वैसे ममता बनर्जी ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा है कि भाजपा से निपटने के लिए उन्हें कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने पर कोई आपत्ति नहीं है। ममता ने ही भाजपा के खिलाफ हर सीट पर विपक्ष के साझा उम्मीदवार का प्रस्ताव रखा था।
    पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, फिलहाल किसी के साथ तालमेल के मुद्दे पर कोई फैसला नहीं किया गया है। आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा अपनी रणनीति को ठोस स्वरूप देने में जुट गई है। मिशन बंगाल के तहत पार्टी अध्यक्ष अमित शाह बीते महीने के आखिर में दो दिनों के बंगाल दौरे पर आए थे।
    उन्होंने कोलकाता के अलावा बीरभूम और पुरुलिया में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में चुनावी रणनीति पर विचार-विमर्श किया। शाह ने पुरुलिया में अपनी रैली में ममता बनर्जी सरकार पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हुए उसे सत्ता से हटाने की अपील की थी। उनका कहना था कि सरकार बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ रोकने और राज्य में सक्रिय माफियाओं पर अंकुश लगाने में नाकाम रही है।
    ध्यान रहे कि पुरुलिया में पंचायत चुनावों के बाद भाजपा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या हो गई थी। अमित शाह ने प्रदेश भाजपा को कम से कम 22 लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, मुक्त और निष्पक्ष चुनावों की स्थिति में पार्टी यहां कम से कम 26 सीटें जीत सकती है।
    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनावी तालमेल के लिए सहयोगी दल का चयन कांग्रेस के लिए बेहद अहम है। उसके लिए फिलहाल सबसे प्रमुख मुद्दा भाजपा से निपटना नहीं बल्कि अपना वजूद बचाना है।
    एक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष फिलहाल एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है। तृणमूल से तालमेल नहीं होने की हालत में पार्टी में चुनावों से पहले भगदड़ मचने का अंदेशा है। दूसरी ओर, तालमेल के बावजूद उसे क्या और कितना लाभ होगा, इसका अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है। शायद इसी वजह से तालमेल पर फैसले का जिम्मा पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर डाल दिया गया है।  (बीबीसी)

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Posted Date : 10-Jul-2018
  • -प्रभाकर एम
    बंगाल में भाजपा के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों ने राजनीतिक शतरंज की बिसात पर गोटियां बिछाने की कवायद तेज कर दी है। तृणमूल कांग्रेस ने इसके लिए संगठन और मंत्रिमंडल में फेरबदल किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस में चुनावी तालमेल के सवाल पर दो गुट आमने-सामने हैं। इनमें से एक गुट सीपीएम की अगुवाई वाले वाममोर्चा के साथ तालमेल जारी रखने की वकालत कर रहा है तो दूसरा गुट तृणमूल कांग्रेस के साथ एक बार फिर हाथ मिलाने के पक्ष में है।
    इस मुद्दे पर बीते हफ्ते प्रदेश के नेताओं के साथ दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की बैठक में भी कोई हल नहीं निकल सका। हालात यह है कि तालमेल के सवाल पर पार्टी दो-फाड़ होने की कगार पर है। पार्टी का प्रदेश नेतृत्व विधायकों और दूसरे नेताओं के पलायन से भी परेशान है।
    सीपीएम का प्रदेश नेतृत्व फिलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठा है। पार्टी की केंद्रीय समिति भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस का हाथ थामने के प्रस्ताव को पहले ही लाल झंडी दिखा चुकी है। बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के बीच तालमेल होता रहा है।
    दूसरी ओर, भाजपा अपने पैरों तले की जमीन मजबूत करने और जवाबी रणनीति बनाने में जुटी है। बीते महीने के आखिर में राज्य के दो-दिवसीय दौरे पर आए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश नेताओं को लोकसभा की 42 में से कम से कम 22 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है। वैसे प्रदेश भाजपा ने जो चुनावी ब्लूप्रिंट तैयार किया है उसमें कहा गया है कि पार्टी राज्य में कम से कम 26 सीटें जीत सकती है।
    हाल के पंचायत चुनावों में, खासकर आदिवासी इलाकों में, पार्टी का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है, इससे उसके हौसले बुलंद हैं। वैसे भी बीते दो-तीन वर्षों के दौरान होने वाले तमाम उपचुनावों और शहरी निकायों के लिए हुए चुनावों में कांग्रेस और सीपीएम को पीछे धकेलते हुए भाजपा दूसरे स्थान पर रही है।
    पहले तृणमूल कांग्रेस और उसके बाद सीपीएम के साथ हाथ मिलाने वाली कांग्रेस एक बार फिर दोराहे पर खड़ी नजर आ रही है। वह यह तय नहीं कर पा रही है कि अगले साल लोकसभा चुनावों में उसे माकपा के साथ हाथ मिलाना चाहिए या कांग्रेस से। पार्टी का एक गुट माकपा से हाथ मिलाने के पक्ष में है तो दूसरा तृणमूल कांग्रेस से।
    प्रदेश कांग्रेस के महासचिव ओम प्रकाश मिश्र ने हाल में केंद्रीय नेतृत्व को जो रिपोर्ट भेजी है उसमें माकपा से हाथ मिलाने की सिफारिश की गई है। लेकिन पार्टी के सांसदों और विधायकों के एक गुट का मानना है कि कांग्रेस को अगर लोकसभा की सीटें बढ़ानी हैं तो इसके लिए तृणमूल कांग्रेस से हाथ मिलाना बेहतर होगा।
    पूर्व केंद्रीय मंत्री एबीए गनी खान चौधरी के भाई और मालदा के कांग्रेस सांसद अबू हाशिम खान चौधरी ने बीती 28 जुलाई को यहां तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी से उनके आवास पर मुलाकात की थी। उक्त मुलाकात के बाद अबू हाशिम ने पत्रकारों को बताया था कि दूसरे मुद्दों के अलावा भाजपा के खिलाफ एक महागठजोड़ बनाने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।
    हाशिम कहते हैं, जहां कांग्रेस को अगर सीटों की तादाद बढ़ानी है तो उसे तृणमूल से हाथ मिलाना ही होगा, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी दलील देते हैं कि यहां तृणमूल कांग्रेस से  हाथ मिलाना कांग्रेस के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा।
    अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, कांग्रेस ने पहले भी तृणमूल से हाथ मिलाया था और उसका नतीजा सबके सामने है। अब उस गलती को दोहराने का कोई मतलब नहीं है।
    तृणमूल कांग्रेस के कट्टर आलोचक रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी आरोप लगाते हैं, तृणमूल की वजह से ही भाजपा को बंगाल में पांव जमाने का मौका मिला है। उसी की वजह से यहां कांग्रेस लगातार कमजोर हुई है।
    कांग्रेस ने वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा के साथ हाथ मिलाया था। तब पार्टी को 44 सीटें मिली थीं। लेकिन बीते दो वर्षों के दौरान उसके एक दर्जन विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। पलायन का यह सिलसिला अब भी जारी है। 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस की ओर से होने वाली शहीद रैली के दौरान कुछ और विधायकों के पाला बदलने की संभावना है।
    वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को 34 सीटें मिली थीं। कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि सीपीएम और भाजपा को दो-दो सीटें मिली थीं।
    हाल के पंचायत चुनावों में खासकर राज्य के आदिवासी इलाकों में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने आदिवासी नेताओं के साथ संबंधों को मजबूत करने की कवायद शुरू की है। इसी कवायद के तहत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक आदिवासी कल्याण समिति का गठन कर माकपा के निष्कासित सांसद ऋतब्रत बनर्जी को इसका संयोजक बनाया है।
    इस समिति में हर जिले से आदिवासियों के दो प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा और ये लोग व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए आपस में संपर्क रखेंगे।
    पंचायत चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद ममता ने आदिवासी तबके के दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटा दिया था। उनकी जगह दो वरिष्ठ मंत्रियों पार्थ चटर्जी और ज्योतिप्रिय मल्लिक को आदिवासी-बहुल जंगलमहल इलाके में लोगों में फैले असंतोष को दूर करने का जिम्मा सौंपा गया है। तृणमूल कांग्रेस ने तालमेल के सवाल पर कांग्रेस में होने वाले मंथन को उसका अंदरूनी मामला बताते हुए इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है।
    वैसे ममता बनर्जी ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा है कि भाजपा से निपटने के लिए उन्हें कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने पर कोई आपत्ति नहीं है। ममता ने ही भाजपा के खिलाफ हर सीट पर विपक्ष के साझा उम्मीदवार का प्रस्ताव रखा था।
    पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, फिलहाल किसी के साथ तालमेल के मुद्दे पर कोई फैसला नहीं किया गया है। आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा अपनी रणनीति को ठोस स्वरूप देने में जुट गई है। मिशन बंगाल के तहत पार्टी अध्यक्ष अमित शाह बीते महीने के आखिर में दो दिनों के बंगाल दौरे पर आए थे।
    उन्होंने कोलकाता के अलावा बीरभूम और पुरुलिया में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में चुनावी रणनीति पर विचार-विमर्श किया। शाह ने पुरुलिया में अपनी रैली में ममता बनर्जी सरकार पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हुए उसे सत्ता से हटाने की अपील की थी। उनका कहना था कि सरकार बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ रोकने और राज्य में सक्रिय माफियाओं पर अंकुश लगाने में नाकाम रही है।
    ध्यान रहे कि पुरुलिया में पंचायत चुनावों के बाद भाजपा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या हो गई थी। अमित शाह ने प्रदेश भाजपा को कम से कम 22 लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, मुक्त और निष्पक्ष चुनावों की स्थिति में पार्टी यहां कम से कम 26 सीटें जीत सकती है।
    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनावी तालमेल के लिए सहयोगी दल का चयन कांग्रेस के लिए बेहद अहम है। उसके लिए फिलहाल सबसे प्रमुख मुद्दा भाजपा से निपटना नहीं बल्कि अपना वजूद बचाना है।
    एक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष फिलहाल एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है। तृणमूल से तालमेल नहीं होने की हालत में पार्टी में चुनावों से पहले भगदड़ मचने का अंदेशा है। दूसरी ओर, तालमेल के बावजूद उसे क्या और कितना लाभ होगा, इसका अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है। शायद इसी वजह से तालमेल पर फैसले का जिम्मा पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर डाल दिया गया है।  (बीबीसी)

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Posted Date : 09-Jul-2018
  • अखिलेश शर्मा
    सोशल मीडिया पर फैलता अफवाहों का जाल समाज के ताने-बाने को बुरी तरह से तहस-नहस कर रहा है। लोग आंखें मूंद कर व्हाट्सएप या ऐसे ही दूसरे प्लेटफॉर्मस पर आई झूठी बातों, फर्जी खबरों और अफ़वाहों पर भरोसा कर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। शरारती और असामाजिक तत्व सोशल मीडिया की व्यापक पहुंच का फायदा उठा कर समाज में अशांति और गड़बड़ी फैलाने के लिए कर रहे हैं। देश का सांप्रदायिक माहौल खराब करना, झूठे प्रचार के ज़रिए किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन में माहौल तैयार करना या फिर गांव-कस्बों में अपरिचित या बाहरी लोगों के खिलाफ बच्चा चोरी की अफवाह फैला कर भीड़ की हिंसा यह सब इन प्लेटफॉर्म के जरिए हो रहा है।
    मणिपुर की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं जहां  दो अलग-अलग गांवों में बच्चा चोरी के शक में भीड़ पिटाई कर रही है।  महाराष्ट्र के धुले में पांच लोगों को गांव वालों ने मार डाला। घुमंतू समाज के ये पांच लोग गांव में खाने की तलाश में आए थे। चेन्नई में मेट्रो में काम करने वाले दो मजदूरों की पिटाई कर दी गई। दो जुलाई को बेंगलुरू में भीड़ ने बच्चा चोरी करने के शक में एक आदमी को क्रिकेट के बल्लों और लाठियों से पीट-पीट कर मार डाला। 
    नाशिक के मालेगांव में भीड़ ने पांच लोगों पर हमला कर दिया लेकिन पुलिस उन्हें बचाने में कामयाब रही। बाद में गुस्साई भीड़ ने पुलिस की गाड़ी को जला डाला। मंगलवार को अहमदाबाद में एक महिला को भीड़ ने मार डाला। सूरत और राजकोट में भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। त्रिपुरा में 28 जून को भीड़ ने उसी शख्स को मार डाला जो अफवाहों से खबरदार करने आया था। असम में आठ जून को दो दोस्तों को भीड़ ने मार डाला। खबरों के मुताबिक पिछले एक साल में कम से कम 20 लोग ऐसे हमलों में मारे गए हैं। व्हाट्सएप पर चले मैसेज में बच्चे चोरी के प्रति आगाह किया जाता है। इसमें कहा जाता है कि बाहरी लोगों से अपने बच्चों को बचा कर रखें। एक वीडियो भी फॉरवर्ड होता है जिसमें बाइक पर सवार दो लोग एक बच्चे को चुरा रहे हैं। पर यह वीडियो पाकिस्तान का है और यह सड़क सुरक्षा के बारे में है।
    लगातार बढ़ रही घटनाओं के बाद सरकार हरकत में आई है। आईटी मंत्रालय ने व्हाट्सएप को पत्र लिखा था जिसका जवाब व्हाट्सएप ने दिया। इसमें कहा गया है कि व्हाट्सएप सिर्फ भारत के लिए एक नया फीचर ला रहा है जिसमें हर फॉरवर्ड मैसेज पर लिखा होगा कि यह फॉरवर्ड किया गया है ताकि उसे आगे भेजने से पहले लोग सोचें कि यह गलत भी हो सकता है। साथ ही हर ग्रुप का एडमिन यह तय कर पाएगा कि कौन सदस्य मैसेज भेज सकता है और कौन नहीं।
    मार्क स्पैम फीचर ऑप्शन भी लाया जाएगा ताकि बिना सोचे-समझे मैसेज फॉर्वर्ड का प्रचलन काबू किया जा सके। अगर अधिकांश लोग किसी मैसेज को स्पैम के तौर पर मार्क करेंगे तो यह ब्लॉक हो जाएगा और आगे फॉर्वर्ड नहीं किया जा सकेगा। हालांकि व्हाट्सएप के मुताबिक भारत में उसका इस्तेमाल करने वाली करीब 25 फीसदी लोग किसी ग्रुप में नहीं हैं। अधिकांश लोग छोटे ग्रुप में हैं जिसकी सदस्य संख्या दस से भी कम है। व्हाट्सएप कहता है कि गोपनीयता और प्राइवेसी से वो छेड़छाड़ नहीं चाहता और उसके सभी मैसेज इनक्रिप्टेड होते हैं। उधर, ट्विटर भी नई पॉलिसी ला रहा है ताकि गुमनाम और हिंसा की धमकी देने वाले अकाउंट की पहचान हो सके।
    अफवाह के साथ सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और धमकियों का सिलसिला भी बदस्तूर जारी है जिस पर पाबंदी की तमाम कोशिशें अभी तक नाकाम रही हैं। इस बीच, गृह मंत्रालय के कहने पर कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी के परिवार को कथित रूप से ट्विटर पर धमकी देने वाले शख्स को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
    क्या यह कदम एक छोटी शुरुआत भर है? क्या सरकार का दखल सोशल मीडिया पर फैली गंदगी को दूर कर पाएगा? जाहिर है इन सवालों का जवाब आसान नहीं है। सिर्फ सरकार के भरोसे सब कुछ छोड़ देने से समस्याएं हल नहीं होंगी। लोगों को अपने विवेक का इस्तेमाल भी करना होगा। मोबाइल पर आए हर संदेश पर आंखें मूंद कर भरोसा करने की प्रवृत्ति को छोडऩा होगा। फॉरवर्ड उन्हीं संदेशों को करें जिनकी विश्वसनीयत पर आपको संदेह न हो।    https://khabar.ndtv.com/news/blogs/
    (लेखक एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

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Posted Date : 09-Jul-2018
  •  आशुतोष चतुर्वेदी
    पाकिस्तान में 25 जुलाई को होने वाले संसदीय चुनावों पर सबकी निगाहें लगी हुईं हैं। भारत के लिए चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान में बनने वाली सरकार सीधे तौर से भारत को प्रभावित करती है। 
     इस बार भी मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग और इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ के बीच है, लेकिन इस बार पाकिस्तानी सेना इमरान खान को जिताने के लिए पूरा जोर लगा रही है। गैलप पोल के अनुसार नवाज शरीफ की पार्टी के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने की संभावनाएं हैं, लेकिन इस पोल के जवाब में तुरंत एक पोल आया, जिसमें इमरान खान की पार्टी तहरीके इंसाफ को जीतता हुआ बताया गया है। और तो और, चुनाव से ठीक पहले भ्रष्टाचार के एक मामले में नवाज शरीफ को 10 साल और उनकी बेटी मरियम को सात साल की जेल की सजा सुना दी गयी। पाक सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर लीक मामले में नवाज शरीफ पर सरकारी या पार्टी में कोई पद लेने पर पहले से ही रोक रखी है, लेकिन अब भी वह पार्टी का चेहरा हैं। 
     तीसरी सबसे बड़ी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी पीपीपी  है, जिसकी बागडोर बिलावह भुट्टो जरदारी के हाथ में है। बिलावल भुट्टो बेनजीर भुट्टो और आसिफ अली जरदारी के बेटे हैं, लेकिन इन्हें सत्ता की दौड़ में नहीं माना जा रहा है। तीनों पार्टियों की तुलना करें, तो नवाज इनमें सबसे शरीफ हैं, लेकिन वह भी कोई दूध के धुले हों, ऐसा भी नहीं है। फिर भी, सेना इनको नापसंद करती है। खबरों के अनुसार, इन्हें सेना ने ही पनामा मामले में लपेटकर सत्ता से बेदखल करवा दिया। 
     दूसरी ओर इमरान खान हैं, जो भारत और कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तानी सेना की जुबान बोलते हैं। ऐसी भी आशंका है कि किसी एक पार्टी को बहुमत न मिल पाए। ऐसे में छोटी पार्टियों के समर्थन से पाकिस्तान में नई सरकार का गठन हो सकता है। दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान में ज्यादातर छोटी पार्टियां कट्टरपंथी विचारधारा की समर्थक हैं। 
     यदि वे सरकार में हिस्सेदार बनेंगी, तो सरकार का रुख और अधिक भारत विरोधी रहेगा।  छोटी पार्टियों में पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ की ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग और मुंबई  हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग जैसी पार्टियां शामिल हैं। हालांकि हाफिज सईद की पार्टी को तो चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं मिली है, इसलिए वह अपने उम्मीदवारों को अल्लाह-उ-अकबर तहरीक के टिकट पर चुनाव लड़वा रहा है।
     इस बार सेना ने चुनाव प्रचार तक पर अपना शिकंजा कस दिया है। जो भी पत्रकार, चैनल अथवा अखबार नवाज शरीफ के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा है, खुफिया एजेंसियां उन्हें निशाना बना रही हैं। 
    पाकिस्तान के सबसे बड़े टीवी प्रसारक जियो टीवी को हफ्तों तक आंशिक रूप से ऑफ एयर रहना पड़ा। इसी तरह डॉन अखबार लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है, क्योंकि उसने बीच में नवाज शरीफ का पक्ष लिया था। खुफिया एजेंसियों की धमकी के कारण एजेंट और हॉकर उसे बांट नहीं रहे हैं। 
     भारत के संदर्भ में देखें, तो पड़ोसी मुल्क में राजनीतिक अस्थिरता, लोकतांत्रिक शाक्तियों का कमजोर होना और सेना का मजबूत होना शुभ संकेत नहीं है। 
     नवाज शरीफ या फिर इसके पहले जब भी किसी राजनेता ने भारत के साथ रिश्ते सामान्य करने की कोशिश की है, सेना ने उसमें हमेशा पलीता लगाया है। सेना को नवाज शरीफ की पीएम मोदी से मुलाकातें और रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें पसंद नहीं आयीं थीं। कुछ समय पहले वहां के अखबार डॉन में एक खबर छपी थी कि नवाज शरीफ ने एक मीटिंग में सेना के अधिकारियों से साफ तौर से कह दिया कि आतंकवादियों की ऐसे ही मदद जारी रही, तो पाकिस्तान दुनिया में अलग-थलग पड़ जाएगा। इस पर भारी बावेला मचा और सेना-शरीफ के बीच तनातनी इतनी बढ़ गयी कि उन्हें पीएम पद तक गंवाना पड़ा।
     पाकिस्तान में सेना का साम्राज्य फैला हुआ है। वह उद्योग धंधे चलाती है। प्रापर्टी के धंधे में उसकी खासी दिलचस्पी है। उसकी अपनी अलग अदालतें हैं। सेना का एक फौजी ट्रस्ट है, जिसके पास करोड़ों की संपदा है। खास बात यह है कि सेना के सारे काम-धंधे सभी तरह की जांच-पड़ताल के दायरे से बाहर हैं। कोई उन पर सवाल नहीं उठा सकता है।  कराची और लाहौर में तो डिफेस हाउसिंग अथॉरिटी के पास लंबी चौड़ी जमीनें हैं। गोल्फ क्लब से लेकर शापिंग माल और बिजनेस पार्क तक सेना ने तैयार किए हैं। अदालतें उसके इशारे पर फैसले सुनाती हैं, अन्यथा जजों को रुखसत कर दिया जाता है। अब तक पाकिस्तान में जितने भी तख्ता पलट हुए हैं, सभी को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने उचित ठहराया है। सेना हमेशा से दबे-छुपे ढंग से चुनावों में खेल खेलती आयी है, लेकिन इस बार खुला खेल फर्रुखाबादी है। 
     इस बार इमरान खान की पार्टी को सेना का पूरा समर्थन हासिल है। 1977 में जब जनरल जिया उल हक ने तख्ता पलट कर सत्ता संभाली, उस दौरान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो बड़े नेता हुआ करते थे। जिया ने उनके खिलाफ कई मामले चला कर उन्हें फांसी पर लटकवा दिया। उस दौरान नवाज शरीफ जिया के साथ हुआ करते थे और पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री थे। जिया का नवाज शरीफ पर हाथ था और माना जाता है कि उन्होंने ही नवाज शरीफ को अलग दल मुसलिम लीग (नवाज) गठित करने को प्रेरित किया।  जिया की मौत के बाद पीपीपी की नेता बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ के बीच सत्ता संघर्ष चला। बेनजीर लोकप्रिय नेता थीं और नवाज शरीफ उनके आगे कहीं नहीं टिकते थे। शह-मात के खेल में सेना ने कमजोर नवाज शरीफ पर हाथ रख दिया। आज इमरान खान सेना की शह पर नवाज शरीफ के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं।
     उस दौरान नवाज शरीफ सेना की शह पर बेनजीर की सरकार के पीछे हाथ धोकर पड़े थे। आज इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है, लेकिन 1997 में जब नवाज शरीफ दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, तो उनके सेना से रिश्ते खराब हो गए। जब उन्होंने सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ को हटाना चाहा, तो उन्होंने नवाज शरीफ का ही तख्ता पलट दिया। उन्हें भ्रष्टाचार और देशद्रोह के आरोप में जेल भेज दिया गया। बाद में नवाज शरीफ को देश निकाला दे दिया गया। 
     पाकिस्तान में सेना और राजनीतिज्ञों के बीच शह-मात के इस खेल का खामियाजा भारत को भी झेलना पड़ता है। लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार से संवाद की गुंजाइश रहती है, सेना पर भी थोड़ा बहुत अंकुश रहता है। वह खुले आम आतंकवादियों को बढ़ावा नहीं दे पाती, लेकिन अब तक का जो अनुभव रहा है, उसके अनुसार पाकिस्तानी सेना केवल सर्जिकल स्ट्राइक की भाषा ही समझती है। भारत के दृष्टिकोण से यह स्थिति चिंताजनक है।  https://www.prabhatkhabar.com/

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Posted Date : 08-Jul-2018
  • कादंबिनी शर्मा 
    मेरी आंखें बार-बार भर आ रही थीं। उन पुरानी तस्वीरों, अखबार की कतरनों को देख-पढ़ कर सिहर जा रही थी। ये अमेरिकी इतिहास का सबसे डरावना और शर्मनाक पन्ना है। अमरीका के अलबामा राज्य के मौंटगोमरी शहर में 26 अप्रैल, 2018 को खोला गया लेगेसी म्यूजिय़म ठीक उस जगह पर बना है जहां एक गोदाम में अफ्रीकी-अमेरिकी गुलामों को रखा जाता था। मौंटगोमरी के Equal Justice Initiative ने इसे लिंचिंग से मारे गए अफ्रीकी अमेरिकियों की याद में बनाया है और इनकी संख्या हज़ारों में रही। इस म्यूजिय़म से कुछ ही कदमों की दूरी पर गुलामों की नीलामी के लिए बना चौराहा हुआ करता था और यहां से बह रही अलाबामा नदी उनको लाने ले जाने का ज़रिया।
    1860 में मौंटगोमरी गुलामों की सबसे बड़ी मंडी हुआ करता था। इस म्यूजिय़म में रखे उस वक्त अखबारों में गुलामों को बेचने के लिए निकले विज्ञापन बताते हैं कि कैसे इंसानों को जानवरों की तरह बेचा जाता था। कैसे उन पर अत्याचार होते थे। जिन जगहों पर पीडि़तों की लिंचिंग हुई वहां की ज़मीन की मिट्टी उनके अपने यहां लाए और ये मिट्टी मर्तबानों में रखी गई है, नाम के साथ। शोध, तस्वीरें और तकनीक इसे एक ना भूलने वाला अनुभव बना देती हैं।
    ये अनुभव आज के अमेरिका में रंगभेद को एक संदर्भ भी देता है। लेकिन ये म्यूजिय़म एक और चीज़ बताता है कि कैसे आज के अमरीका में इतनी परिपक्वता और खुलापन है कि वो इस बारे में बात करता है, अपने सबसे शर्मनाक पहलू को छिपाता नहीं। अपने नेताओं के बयानों और कदमों पर सवाल उठाता है। मीडिया घुटने नहीं टेक देता। सोचिए, मैं इस जगह अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक कार्यक्रम के तहत ही गई।
    उनका रंगभेद हमारा जातिवाद है। लेकिन फर्क है। हम जातिवाद पर, जाति के नाम पर किए अत्याचार पर शर्मसार नहीं होते। हम उसे छिपा लेते हैं या उसे सही करार देते हैं- सीधे या घुमा फिरा कर। यहीं एक लोकतंत्र, एक समाज के तौर पर हम फेल हो जाते हैं। हम अत्याचार के इतिहास को नकारते हैं। दलितों के खिलाफ आज भी हो रहे अत्याचारों को नकार देते हैं। प्रशासन आम तौर पर तभी कार्रवाई करता है जब किसी प्रकार का दबाव हो। हम अब भी भेद-भाव को सहज तौर पर लेते हैं। क्या सिर्फ हत्या बलात्कार ही अपराध हैं? कोई सिर्फ इसलिए हैंडपंप या कुएं से पानी नहीं निकाल सकता क्योंकि वो नीची जाति का है, क्या ये अपराध नहीं? किसी को जाति या धर्म के कारण अगर आप नीचा महसूस करा रहे हैं तो क्या वो अपराध नहीं?
    उदाहरण इतने हैं कि मैं यहां लिखना भी जरूरी नहीं समझती। और सबसे डरावना यही है कि इसे अब भी अपने देश का शर्मनाक पहलू मान कर पूरे मन से सही करने को हम तैयार नहीं। तभी तो देश के राष्ट्रपति के साथ एक मंदिर में दुव्र्यवहार हो जाता है और हम देखते रह जाते हैं। शायद हमें भी ऐसा ही लेगेसी म्यूजिय़म बनाना चाहिए ताकि अपनी अंदर की गंदगी देखें, समझें और बीते कल की स्याह छाया को आज खत्म कर सकें। पर उससे पहले ये माहौल तो बनाना होगा कि उसके सामने, उसके खिलाफ किसी तथाकथित ऊंची जाति की सेना प्रदर्शन ना शुरू कर दे, उसे आग न लगा दे। https://khabar.ndtv.com/news/blogs/
    (एंकर और एडिटर फॉरेन अफेयर्स एनडीटीवी इंडिया)

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