विचार/लेख

Previous123456789...8283Next
05-May-2021 7:11 PM 26

-गिरीश मालवीय
विदेश से जो मेडिकल मदद आ रही है उसको लेकर मोदी सरकार कितनी लापरवाह है ये भी समझ लीजिए  25 अप्रैल को मेडिकल हेल्प पहली खेप भारतीय बंदरगाहों पर पुहंच गयी थी उसके वितरण के नियम यानि SOP स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2 मई को जारी किए। यानी एक हफ्ते तक आई मेडिकल मदद एयरपोर्ट, बंदरगाहों पर यूं ही पड़ी रही।  यानि केंद्र में बैठी मोदी सरकार को इस बारे में SOP बनाने में ही सात दिन लग गए कि इसे कैसे राज्यों और अस्पतालों में वितरण करे जबकि अगर आमद के साथ ही यह राज्यों में पहुंचना शुरू हो जाती तो कई मरीजों की जान बचाई जा सकती थी।

एक ओर बात है भारत सरकार विदेशों से आ रही मेडिकल मदद रेडक्रॉस सोसायटी के जरिए ले रही है, जो एनजीओ है। मेडिकल सप्लाई राज्यों तक न पहुंच पाने के सवाल पर रेडक्रॉस सोसायटी के प्रबंधन का कहना है कि उसका काम सिर्फ मदद कस्टम क्लीयरेंस से निकाल कर सरकारी कंपनी एचएलएल (HLL) को सौंप देना है। वहीं, HLL का कहना है कि उसका काम केवल मदद की देखभाल करना है। मदद कैसे बांटी जाएगी, इसका फैसला केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय करेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय इस बारे में चुप्पी साधे हुए है......

अभी भाई Dilip Khan की पोस्ट पर पढ़ा कि गुजरात के गांधीधाम के SEZ में जहा देश के कुल दो तिहाई ऑक्सीजन सिलेंडर बनते हैं वहा पिछले 10 दिनों से SEZ के सभी प्लांट्स में ताला बंद है. वजह ये है कि सरकार ने औद्योगिक ऑक्सीजन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई थी. लेकिन, आदेश में इन सिलेंडर निर्माता ईकाइयों को भी शामिल कर लिया गया. अभी हालत ये है कि सरकार विदेशों से भीख मांग रही है या फिर दोगुने-चौगुने दाम पर ऑक्सीजन सिलेंडर ख़रीद रही है. जो अपने कारखाने हैं, वहां ताला जड़कर बैठी हुई है.

मतलब आप सिर पीट लो कि ऐसे क्राइसिस में भी लालफीताशाही किस तरह से हावी है।  


05-May-2021 6:50 PM 22

-प्रकाश दुबे

परदे के पास बैठकर सिनेमा देखने वाले दर्शकों के प्रिय अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती टोपी लगाकर बांकी अदा में चुनाव प्रचार करते पाए गए। अचानक तबियत बिगडऩे पर ऊटी के अपने घर-होटल में आराम करने खिसक गए। मतगणना के दो दिन पहले सहसा कोलकाता के राजभवन में प्रकट हुए। फिलमी कयास अफवाह बनकर लोगों की जबान पर पहुंचा-मिठुदा को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। गुलूबंद इशारा यह, कि ममता की रवानगी तय है।

राजभवन में मिथुन की आवभगत भी रोबदार तरीके से हुई। शहर कोलकाता और वहां भी राजभवन पहुंचने की चटपटी चर्चा को मतगणना का दीमक चट कर गया। आप जानें कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के समर्थन की वैचारिक शुरुआत छोडक़र डिस्को डांसर बनकर ठुमके लगाने वाला कलाकार राजभवन काहे जा पहुंचा? तबियत बिगडऩे पर चिंतित राज्यपाल ने मिथुन की मिजाजपुर्सी की थी। ठीक होने पर चाय पीने बुलाया था। चुनावी फिल्म खत्म होने से पहले चाय पर चर्चा कर ली। इस बहाने प्रचार हुआ कि तबियत की अनदेखी कर जीत के लिए कोश्प्चािश् की। श्रेय याद दिलाने और भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रचार का अलबत्ता किसी को फायदा नहीं हुआ।     

छोड़ मीठा गुड़, तू वहां तक उड़

बंबइया फिल्मों में सुर नहीं जमा। दिल्ली वालों की सियासी-सरगम में शामिल होकर बाबुल सुप्रियो लोकसभा सदस्य और राज्यमंत्री बने। अच्छे दिन कट रहे थे। अचानक दिल्ली वालों का आदेश मिलने पर टालीगंज के चुनावी कीचड़ में कूदना पड़ा। बुझे मन से भद्रलोक के बांग्ला चित्रलोक पहुंचे। ममता बनर्जी सरकार के सूचना मंत्री अरूप बिश्वास से चुनावी पटखनी खाकर बाबुल प्रसन्न हैं। राज्यमंत्री की कुर्सी बची।

बाबुल की तरह चुनाव मैदान में उतारे गए लगभग सभी सांसद पहलवान हारकर खुश हैं। पार्टी और अपनी हार से दिल्ली का घर बचा। अंग्रेजी के आधा दर्जन अखबारों में काम करने और भाजपा पक्ष में किताबें लिखने वाले स्वपन दासगुप्त एकमात्र अपवाद हैं। तारकेश्वर से विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए राज्यसभा सदस्यता से त्यागपत्र दिया। दुनियादारी नहीं सीखी? अजी, मुफ्त में नैतिकता का पुण्य मिला। गनीमत है कि उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडु ने राज्यसभा से त्यागपत्र मंजूर नहीं किया।

थाम तुरही, छोडक़र मीठा पपइया

भाषण देने और रैली करने से किसी को रोका नहीं था। इसका मतलब यह नहीं, कि लुटियन के टीले पर रहने वालों को संसद और सांसदों की सेहत की चिंता नहीं होती। कोरोना महामारी के डर से लुटियन इलाके में संसद अधिवेशन और संसदीय समितियों की बैठकों में कटौती हो जाती है। संसद की वर्तमान इमारत कुछ सालों की मेहमान है। चुनाव लडऩे वाले और लड़ाने वाले भी इन दिनों फुर्सत हैं। हालात की बदहाली के बावजूद कुछ सांसद देश की बेहाली पर चर्चा की मांग उठा रहे हैं। समितियों की बैठक के लिए सभापति बार बार पत्र लिखते हैं। खतोकिताबत कर परेशान करने वालों में जयराम रमेश शामिल हैं। दिल्ली के अस्पतालों में बिस्तर और प्राणवायु यानी आक्सीजन के लिए हाहाकार मचा है। मंत्रियों और कुछ सांसदों के महामारी के चपेट में आने के बावजूद ये नादान मांग करने से बाज नहीं आते।

काट तन मोटी व्यवस्था का

आस्ट्रेलिया दोस्त देश है। वहां के अखबार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यकुशलता पर तीखी कलम चलाई। भारतीय उच्चायुक्त ने तुरंत अखबार को चिट्ठी लिखकर प्रतिवाद किया। न अखबार ने ध्यान दिया और न अभिव्यक्ति की आजादी के हिमायती देश की सरकार ने। बल्कि भारत से हवाई यातायात पर रोक लगा दी। गाजियाबाद वासी कवि गजलकार कुंअर बेचैन महामारी की चपेट में आए। शब्द और भाव के धनी कवि का बेटा प्रगीत आस्ट्रेलिया से आने के लिए छटपटाता रहा। न तो प्रगीत की प्रधानमंत्री से दोस्ती है और न विदेशमंत्री जयशंकर को उनकी गुहार सुनने की फुर्सत मिली।

कवि के प्रशंसकों के प्रयास परवान नहीं चढ़े। कवि और कारोबारी में यही अंतर है। इस भेद को कुंअर बेचैन भलीभांति जानते थे। चल ततइया रचना में कवि ने कहा था-काट तन मोटी व्यवस्था का जो धकेले जा रही है देश का पइया। चल ततइया, है जहां पर कैद पेटों में रुपइया। व्यवस्था का पहिया नहीं हिला। बेटे की राह तकते कवि के प्राण पखेरू उड़ गए।

भास्करवारी के सारे शीर्षक उनकी रचना चल ततइया से। कवि की स्मृति को समर्पित हैं।

 (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


05-May-2021 6:43 PM 22

-गोपाल राठी

तस्वीर में महिला सीधी-सादी लग रही है न। लगती है न एक साधारण सी महिला। रसायन शास्त्र में स्नातक। वर्ष 2004 तक एक हाईस्कूल में पढ़ाया। फिर राजनीति में शामिल। वर्तमान में, केरल की वामपंथी सरकार की स्वास्थ्य मंत्री-के.के.शैलजा। पूरे केरल में इन्हें टीचर अम्मा के नाम से जाना जाता है, शैलजा टीचर। 2018 के निपाह वायरस को संक्रमण से होने वाले मौत के जुलूस को मजबूती से रोक दिया था। फिर इसके ठीक दो साल बाद, जिस तरह कोरोना का मुकाबला कर केरल मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल करवाई- वह निश्चित ही इतिहास में दर्ज होगा।

इस कोरोना काल में वे रात 12 बजे कार्यालय छोड़ती है। सभी अधिकारियों को रवाना कर फिर खुद प्रस्थान करती है। घर पर भी रात 2.30-3.00 बजे तक फाइलें देखती-निपटाती है। फिर सुबह सात बजे ऑफिस पहुंच जाती है। उनका व्यक्तिगत मोबाइल नंबर न जाने कितने ही आम लोगों को पता है। निपाह के दौरान ही केरल के राज्यभर में चमगादड़ों का आतंक पैदा हुआ। अब कोरोना के दौरान बिल्ली तक को देख तो आस-पड़ोस के लोग घबराकर फोन करने लगें। उन्होंने स्वयं फोन उठाकर सभी को आश्वस्त किया।

किसी को साथ में लेने के बजाय अकेले ही तमाम अस्पतालों में घूमती है। बस चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान। प्रचार की रौशनी से सैकड़ों कदम दूर। एक नियम के तौर पर, रोजाना केवल एक बार पत्रकारवार्ता बुलाती हैं। छिपाने के लिए नहीं, बल्कि जानकारी देने के लिए। श्रेय भी नहीं लेना चाहती। बस कहती है, 'I don’t do anything special. I have a degree in chemistry so I have some knowledge about molecules and medicines. Otherwise, it is always a team effort' (मैं कुछ भी विशेष नहीं कर रही हूं। मेरे पास रसायन शास्त्र की डिग्री है, इसलिए मुझे अणुओं और दवाओं के बारे में कुछ जानकारी है। अन्यथा, यह हमेशा एक टीम प्रयास है।)

 ब्रिटेन की प्रतिष्ठित मैगजीन ने केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा को ‘टॉप थिंकर 2020’ चुना, कोरोना काल में उनके प्रयासों से पाया ये सम्मान मिला। इससे पहले भी शैलजा द्वारा कोरोना को रोकने की दिशा में किए गए प्रयासों को तारीफ मिली है।

शैलजा ने कोरोना अभियान में आम लोगों का साथ देकर इस बीमारी को मिटाने का हरसंभव प्रयास किया।

ब्रिटिश पत्रिका प्रोस्पेक्ट ने पूरी दुनिया में केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा को ‘टॉप थिंकर 2020’ के रूप में नामित किया है। इस मैगजीन में दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और लेखकों को पाठकों द्वारा मतदान के आधार पर और विशेषज्ञों व संपादकों की पैनल की राय के आधार पर चुना गया है।

प्रोस्पेक्ट की लिस्ट में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न को नंबर 2 पर रखा गया है। (बाकी पेज 5 पर)

 शैलजा का नाम कोरोना काल के दौरान राज्य में समय रहते उचित कदम उठाने के लिए शामिल किया गया। पत्रिका के अनुसार, इस लिस्ट को अंतिम रूप देने के लिए 20,000 से अधिक वोट डाले गए। केके शैलजा इस लिस्ट में एकमात्र भारतीय महिला हैं। इस मैगजीन ने शैलजा की प्रशंसा करते हुए लिखा, ‘साल 2018 में भी शैलजा ने केरल में फैले निपाह वायरस का डटकर सामना किया था।’

ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘द गार्जियन’ ने भी कोरोना काल में शैलजा द्वारा किए गए कामों की प्रशंसा की थी। संयुक्त राष्ट्र ने ष्टह्रङ्कढ्ढष्ठ-19 महामारी की सीमाओं पर काम कर रहे लोक सेवकों को सम्मानित करने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी बात रखने के लिए शैलजा को आमंत्रित किया था। यह भारत के एक प्रांत केरल की स्वास्थ्य मंत्री की कहानी है जो अभी हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में वामपंथी मोर्चे की उम्मीदवार के रूप में 61000 मतों से विजयी हुई है।

कॉमरेड शैलजा टीचर अम्मा को बहुत-बहुत बधाई।


05-May-2021 6:41 PM 23

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

दिल्ली के पास फरीदाबाद के विधायक नीरज शर्मा का एक वीडियो देखकर मैं दंग रह गया। नीरज ने बड़ी हिम्मत की और वे एक ऐसे गोदाम में घुस गए, जहां ऑक्सीजन  के दर्जनों सिलेंडर खड़े हुए थे। उन्हें देखते ही उस गोदाम के चौकीदार भाग खड़े हुए। नीरज ने अपने वीडियो में यह सवाल उठाया है कि फरीदाबाद और गुडग़ांव में लोग ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ रहे हैं और यहां इतने सिलेंडरों का भंडार कैसे जमा हुआ है?

हो सकता है कि ये सिलेंडर किसी ऑक्सीजन पैदा करने वाली कंपनी के हों और किसी कालाबाजारी दलाल के न हों लेकिन नीरज शर्मा की पहल का परिणाम यह हुआ कि उस गोदाम के मालिक ने वे सिलेंडर तुरंत ही हरियाणा सरकार के एक अस्पताल को समर्पित कर दिए। नीरज ने उस गोदाम पर छापा इसलिए मारा था कि उनके विधानसभा क्षेत्र के कई लोगों ने आकर शिकायत की थी कि उनके परिजन ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ रहे हैं और फलां जगह सिलेंडर का भंडार भरा हुआ है।

यहां असली सवाल यह है कि हमारे देश के पंच, पार्षद, विधायक और सांसद नीरज शर्मा की तरह सक्रिय क्यों नहीं हो जाते? सारे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की संख्या लगभग 15 करोड़ है। यदि ये सब एक साथ जुट जाएं तो एक कार्यकर्ता को सिर्फ 14-15 लोगों की देखभाल करनी होगी। याने अपने अड़ोस-पड़ोस के सिर्फ 3-4 घरों की जिम्मेदारी वे ले लें तो सारा देश सुरक्षित हो सकता है।

वे मरीजों के लिए ऑक्सीजन, इंजेक्शन, पलंग और दवाई का पर्याप्त इंतजाम कर सकते हैं। प्रशासनिक अधिकारी उनकी मांग पर अपेक्षाकृत जल्दी और ज्यादा ध्यान देंगे। आम लोगों का मनोबल भी अपने आप ऊंचा हो जाएगा। लगभग इसी तरह का काम अलवर (राजस्थान) के एक विधायक संजय शर्मा ने किया है। उन्होंने कलेक्टर के दफ्तर पर धरना देकर मांग की है कि अलवर के अस्पतालों में ऑक्सीजन तुरंत पहुंचाई जाए। यदि हमारे जन-प्रतिनिधि सक्रिय हो जाएं तो कालाबाजारी पर भी तुरंत लगाम लग सकती है।

हमारी अदालतें और सरकारें इस भयंकर अपराध पर सिर्फ जबानी जमा-खर्च कर रही हैं। इस तरह के जनशत्रुओं को कैसे दंडित किया जाता है, यह मैंने अपनी आंखों से अफगानिस्तान में देखा है। अरब देशों में ऐसे नरपशुओं को सरेआम कोड़ों से पीटा जाता है, उनके हाथ काट दिए जाते हैं और उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता है। उनकी दुर्गति देखकर भावी अपराधियों की रुह कांपने लगती है। यदि हमारी सरकारें और पार्टियां इन जनशत्रुओं का इलाज तुरंत नहीं करेंगी तो उसके सारे इलाज-इंतजाम नाकाम हो सकते हैं।

(नया इंडिया की अनुमति से)


05-May-2021 9:29 AM 41

कार्ल मार्क्‍स का का जन्म 05 मई 1818 को जर्मनी के ट्रिएर नाम के शहर में था, जो प्रुशिया में आता था. आमतौर पर उनका नाम आते ही जेहन में एक धीर गंभीर दार्शनिक,लेखक और चिंतक की छवि उभरती है. मार्क्स का अपना एक भावनात्मक पक्ष भी था. उन्होंने अपनी प्रेमिका जेनी से टूटकर प्यार किया. बाद में उससे शादी भी की.

वे एक सच्‍चे कामरेड होने के साथ साथ बेहद संवेदनशील प्रेमी, पति, पिता और मित्र भी थे.  उनका जीवन बेहद उतार चढ़ाव भरा था. इसके बावजूद उनके दिल में इंसानियत के लिए और हर इंसानी रिश्‍ते के लिए अथाह प्‍यार भरा था.

पत्नी के निधन के दो साल बाद ही मृत्यु 

ये बात उनके लिखे पत्रों से भी पता लगती है. प्रेमिका जेनी के बगैर वो रह नहीं पाते थे. जब उससे अलग होते थे तो उसे पत्र लिखते थे. बाद में उन्होंने जेनी से शादी की. जेनी का निधन 1881 में हुआ. इसके दो साल बाद मार्क्स की भी इंग्लैंड में मृत्यु हो गई.

मार्क्‍स को जेनी से बहुत प्‍यार था. उनकी 07 संतानें हुईं. उन्होंने जेनी से बेइंतिहा प्यार के चलते अपनी हर लड़की के नाम के साथ जेनी जरूर जोड़ा.  21 जून  1865 काे जेनी के लिए लिखा गया कार्ल मार्क्स का लव लेटर.

मार्क्स का लव लेटर

मेनचेस्टर, 21 जून  1865

मेरी दिल अज़ीज़,

देखो, मैं तुम्हें फिर से खत लिख रहा हूँ. जानती हो क्यों? क्योंकि मैं तुमसे दूर हूँ और जब भी मैं तुमसे दूर होता हूँ तुम्हें अपने और भी करीब महसूस करता हूँ. तुम हर वक़्त मेरे जेहन में होती हो और मैं बिना तुम्हारे किसी भी प्रतिउत्तर के तुमसे कुछ न कुछ बातें करता रहता हूँ,

ये जो छणिक दूरियां होती हैं न प्रिय, ये बहुत सुन्दर होती हैं. लगातार साथ रहते-रहते हम एक-दूसरे में, एक-दूसरे की बातों में, आदतों में इस कदर इकसार होने लगते हैं कि उसमें से कुछ भी अलग से देखा जा सकना संभव नहीं रहता. फिर छोटी छोटी सी बातें, आदतें बड़ा रूप लेने लगती हैं, चिडचिड़ाहट भरने लगती हैं. लेकिन दूर जाते ही वो सब एक पल में कहीं दूर हो जाता है, किसी करिश्मे की तरह दूरियां प्यार की परवरिश करती हैं ठीक वैसे ही जैसे सूरज और बारिश करती है नन्हे पौधों की. ओ मेरी प्रिय, इन दिनों मेरे साथ प्यार का यही करिश्मा घट रहा है. तुम्हारी परछाईयां मेरे आसपास रहती हैं, मेरे ख्वाब तुम्हारी खुशबू से सजे होते हैं. मैं जानता हूँ कि इन दूरियों ने मेरे प्यार को किस तरह संजोया है, संवारा है.

जेनी और युवा मार्क्स

जिस पल मैं तुमसे दूर होता हूँ मेरी प्रिय, मैं अपने भीतर प्रेम की शिद्दत को फिर से महसूस करता हूँ, मुझे महसूस होता है कि मैं कुछ हूँ. ये जो पढ़ना-लिखना है, जानना है, आधुनिक होना है ये सब हमारे भीतर के संशयों को उजागर करता है, तार्किक बनाता है लेकिन इन सबका प्यार से कोई लेना-देना नहीं. तुम्हारा प्यार मुझे मेरा होना बताता है, मैं अपना होना महसूस कर पाता हूँ तुम्हारे प्यार में.

इस दुनिया में बहुत सारी स्त्रियाँ हैं, बहुत खूबसूरत स्त्रियाँ हैं लेकिन वो स्त्री सिर्फ तुम ही हो जिसके चेहरे में मैं खुद को देख पाता हूँ. जिसकी एक एक सांस, त्वचा की एक एक झुर्री तुम्हारे प्यार की तस्दीक करती है, जो मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत याद है. यहाँ तक कि मेरी तमाम तकलीफों और जीवन में होने वाले तमाम अपूरणीय नुकसान भी उन मीठी यादों के साये में कम लगने लगते हैं.

मैं तुम्हारी उन प्रेमिल अभिव्यक्तियों को याद करता हूँ, तुम्हारे चेहरे को चूमते हुए अपने जीवन की तमाम तकलीफों को, दर्द को भूल जाता हूँ...

विदा, मेरी प्रिय. तुम्हें और बच्चों को बहुत सारा प्यार और चुम्बन...

तुम्हारा

मार्क्स 

(news18.com)


04-May-2021 7:12 PM 67

-रवीश कुमार

सबसे पहले अदालत डॉ. हर्षवर्धन से पूछे कि वे किन वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर महामारी के खात्मे का एलान कर रहे थे जब महामारी उसी वक्त दस्तक दे रही थी? क्या डॉ हर्षवर्धन व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी का फार्वर्ड पढ़ कर यह बयान दे रहे थे? इसी एक सवाल पर उनसे घंटों पूछा जा सकता है। जब देश का स्वास्थ्य मंत्री ही कहेगा कि महामारी ख़ात्मे पर है तो जनता को बेपरवाह होने का दोष नहीं दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट को अब स्वास्थ्य के मामले में केंद्र सरकार के वकीलों से बात बंद कर देनी चाहिए। उनसे पूछे जाने वाले सवाल दीवार से पूछे जाने के जैसा है। सुप्रीम कोर्ट जल्दी अपने इजलास में देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन को बुलाए और हर दिन घंटों खड़ा रखे। डॉ हर्षवर्धन से पूछे गए सवालों के जवाब से जनता को सही जानकारी मिलेगी। हम सभी को पता चलेगा कि हजारों करोड़ों के मंत्रालय के शीर्ष पर बैठा यह शख्स क्या कर रहा था और इस वक्त क्या कर रहा है। अब बात आमने-सामने होनी चाहिए। सबसे पहले अदालत डॉ. हर्षवर्धन से पूछे कि वे किन वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर महामारी के खात्मे का ऐलान कर रहे थे। जब महामारी उसी वक्त दस्तक दे रही थी? क्या डॉ हर्षवर्धन व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी का फार्वर्ड पढ़ कर यह बयान दे रहे थे? इसी एक सवाल पर उनसे घंटों पूछा जा सकता है। जब देश का स्वास्थ्य मंत्री ही कहेगा कि महामारी ख़ात्मे पर है तो जनता को बेपरवाह होने का दोष नहीं दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट अपने सामने डॉ हर्षवर्धन से जब सवाल करेगा तो सरकार के झूठ की परतें खुलेंगी। हमारे जज साहिबान डॉ हर्षवर्धन को बुलाकर पूछें कि जब पिछले साल महामारी आई तब से लेकर अब तक केंद्र सरकार के अस्पतालों में कितने नए डॉक्टर और अन्य हेल्थ वर्कर भर्ती किए गए? फार्मा से लेकर नर्सिंग के लोगों को कितनी नौकरियां दी गईं? कितने वेंटिलेटर वाले एंबुलेंस का इंतज़ाम किया गया? इस वक्त केंद्र सरकार के अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में डॉक्टरों की कितनी वेकेंसी है ? इस वक्त केंद्र सरकार के अस्पतालों में कितने वेंटिलेटर हैं? पिछले एक साल में इन अस्पतालों में कितने वेंटिलेटर खऱीद कर लगाए गए? चालू हैं? कितने गोदाम में पड़े हैं? खरीदें गए और लगाने के सवाल अलग होने चाहिए। एक वेंटिलेटर को चलाने के लिए एक पूरी टीम होती है। क्या उस टीम की नियुक्ति हुई? ऐसे कितने लोगों को केंद्र सरकार ने अपने अस्पतालों में बहाल किया है?

सुप्रीम कोर्ट डॉ. हर्षवर्धन से पूछे कि किसी बड़े अस्पताल को बिना आक्सीजन उत्पादन के प्लांट लगाए कैसे लाइसेंस दिया जाता है? जब अस्पताल अपना प्लांट लगा सकते हैं तो पहले से प्लांट क्यों नहीं लगाए गए? कोविड आने के बाद इस बात की कब कब समीक्षा की गई, कितने निर्देश दिए गए? दिल्ली के बड़े अस्पतालों के पास अपना प्लांट क्यों नहीं था? पीएम केयर के जरिए प्लांट लगाने के फैसले की नौटंकी से अलग स्वास्थ्य मंत्री से सीधा सवाल किया जाना चाहिए। उनके मंत्रालय ने क्या किया? पीएम केयर इस देश का स्वास्थ्य मंत्री नहीं है? यह भी पूछा जाना चाहिए कि कोविड को लेकर हमारे देश में कितने रिसर्च पेपर छपे हैं? सरकार ने कितने रिसर्च किए है? हम वायरस के बारे में नई समझ क्या रखते हैं? इन सब सवालों के लिए अलग सा दिन रखे। हमें क्यों नहीं पता चला कि यह वायरस इतनी बड़ी तबाही लाने वाला है और जनता को क्यों नहीं अलर्ट किया गया?

और अंत में एक बात। हम आभारी हैं अपनी अदालतों के। जज साहिबानों के। उन्होंने उस वक्त ख़ुद को कहने बोलने से नहीं रोका जब लोग बेआवाज दम तोड़ गए। अस्पताल के बाहर आक्सीजन और वेंटिलेटर के लिए तड़प-तड़प कर मर गए। यह हत्या है जज साहिबान। हत्या की गई है भारत के नागरिकों की। उन्हें मार दिया गया। आपकी आवाज में इसकी दर्द तो है मगर इंसाफ नहीं है। हमें दर्द नहीं चाहिए। इंसाफ चाहिए। लोग अस्पताल की कमी के कारण मार दिए गए उनकी मौत का इंसाफ आपकी कुर्सी से आती आवाज से नहीं हो रहा है। इतने लोग मर गए और किसी एक को सज़ा नहीं हुई है। यह नरसंहार है। यह वक्त कविता लिखने और नारे गढऩे का नहीं है। मैं देश की अदालतों की दहलीज पर खड़ा होकर पूछना चाहता हूं कि इंसाफ कहां है?

यह सही है कि अगर अदालतें न बोलतीं तो एक अरब से अधिक की आबादी वाला देश चुपचाप श्मशान में बदल जाता। इस निराश क्षण में जजों की आवाज़ ने आक्सीजऩ का काम किया मगर जान नहीं बची। आज अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं है। अदालत में है। लेकिन जान तो वहां बचनी है जहां ऑक्सीजन होना चाहिए था। अफसोस हमारे जज साहिबान की चीखों, चित्कारों और नाराजगी का जीरो असर हुआ है। लोग फिर भी मर रहे हैं। इसलिए हमारी अदालतें जो इस वक्त कह रही हैं वो राहत से अधिक कुछ नहीं है।

उसी तरह की राहत है जैसे मैं लोगों की मदद की अपील फेसबुक पर पोस्ट कर देता हूं। मदद मांगने वालों को अच्छा लगता है मगर ज्यादातर मामलों में कुछ नहीं होता है। हम जजों के आभारी हैं लेकिन उनका काम केवल आवाज बनने के स्तर तक ही सीमित रहा। एक जिद्दी, नकारी और हत्यारी सरकार को अपनी जगह से हिलाना कितना असंभव है यह आप देख रहे होंगे अगर दिखाई दे रहा होगा तो। यह एक तथ्य है कि लोग बिना ऑक्सीजन और वेंटिलेटर के मर गए और अब भी मर रहे हैं।जो नहीं मरे हैं वो लाश में बदल गए हैं। उनसे दवा से लेकर टेस्ट की अनाप-शनाप कीमतें वसूली जा रही हैं। लोग मिट ही नहीं गए, बिक भी गए जज साहब। लूट मची है चारों तरफ।

सुप्रीम कोर्ट से एक नागरिक की गुजारिश है। आप अपने इजलास में स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन को खड़ा करें। और खड़ा ही रखें। कुर्सी पर न बैठने दें। ऑनलाइन सुनवाई में भी। हर दिन छह घंटे खड़ा रखें। सवाल करें।


04-May-2021 7:10 PM 28

-कृष्ण कांत

बिहार में अब तक कोरोना से 96 डॉक्टरों की मौत हो चुकी है। पहली लहर में यहां 50 डॉक्टरों की मौत हुई थी। दूसरी लहर में अब तक 46 डॉक्टर जान गवां चुके हैं। देश भर का यही हाल है। सरकारों द्वारा लाई गई इस त्रासदी में डॉक्टर भी दयनीय स्थितियों में जान गवां रहे हैं।

बिहार के मधुबनी सदर अस्पताल की एक नर्स की कोरोना से मौत हो गई। नालंदा की रहने वाली नर्स 7 माह की गर्भवती थी और ड्यूटी के दौरान उसे कोरोना हो गया था और उसकी हालात बेहद खराब हो गई थी। नाजुक हालात में उन्हें डीएमएसएच रेफर कर दिया गया लेकिन ऑक्सीजन सिलेंडर और बेड न मिलने के कारण उसकी मौत हो गई। इस घटना से दुखी सदर अस्पताल के डॉक्टर और नर्स हड़ताल पर चले गए। उनकी मांग है कि कोविड केयर सेंटर और अस्पतालों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कराए जाएं। पानी, ग्लब्स, और कोरोना काल में में ड्यूटी भत्ता दिया जाए, तभी वे काम पर लौटेंगे।

साल भर में ये निकम्मी सरकारें ग्लब्स और ऑक्सीजन जैसी मामूली व्यवस्था नहीं कर पाई हैं और नेता भाषणबाजी करते हैं कि वे भारत को दुनिया का सिरमौर बना देंगे।

इलाहाबाद के नामी डॉक्टर जेके मिश्रा जिस स्वरूपरानी अस्पताल में पांच दशक तक लोगों का इलाज किया, जिनके पढ़ाए हुए तमाम छात्र उसी अस्पताल में डॉक्टर हैं, उन्हें कोरोना हुआ तो देखभाल के लिए कोई डॉक्टर तक नहीं मिला। उनकी डॉ. पत्नी रमा मिश्रा के हिस्से आया ये दुख ज्यादा बड़ा है कि न उनके छात्र उनके काम आए, न ही मैं एक डॉक्टर के तौर पर उनकी जान बचा सकी। उनके सामने ही उनके पति ने दम तोड़ दिया।

डॉ रमा मिश्रा बताती हैं, ‘पॉजिटिव आने के बाद हम लोग होम क्वारंटीन में ही थे। उनका ऑक्सीजन लेवल कम था। डॉक्टरों ने ही सलाह दी कि अस्पताल में भर्ती करा दीजिए। बेड की बहुत किल्लत थी। बेड का तो इंतजाम कर दिया, लेकिन उसके बाद के जो हालात थे, वो बेहद डरावने थे। अस्पताल के कोविड वॉर्ड में सिर्फ एक ही बेड मिल सका। उस रात मैं फर्श पर ही पड़ी रही। अगले दिन बेड मिला। वहां रात में हमने जो देखा, वो बेहद डरावना था। रात भर मरीज चिल्लाते रहते थे। कोई उन्हें देखने वाला नहीं था। बीच-बीच में जब नर्स या डॉक्टर आते थे, तो डांटकर चुप करा देते थे या कोई इंजेक्शन दे देते थे। उनमें से कई लोग सुबह सफेद कपड़े में लपेटकर बाहर कर दिए जाते थे, यानी उनकी मौत हो चुकी होती थी।’

पटना के पुनपुन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉक्टर अमीरचंद प्रसाद ने 23 तारीख को बेटी की शादी की थी। फिर कोरोना संक्रमित हो गए। रविवार की रात पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका निधन हो गया।

दिल्ली के मैक्स अस्पताल के डॉक्टर विवेक ने कुछ दिन पहले ही आत्महत्या कर ली। हाल ही में उनकी शादी हुई थी। पत्नी दो महीने के गर्भ से है। बताया गया कि डॉ विवेक आईसीयू में तैनात थे, वहां लगातार मरीजों की मौत हो रही थी। डॉ. विवेक इससे बहुत परेशान थे।

कोई डॉक्टर सिर्फ भगवान नहीं होता। ऐसा तो डॉक्टरों के सम्मान में बोला जाता है। डॉक्टर भी हमारी तरह इंसान हैं। उनका भी अपना परिवार होता है। वे भी नागरिक होते हैं। उसकी भी जान वैसी ही होती है जैसी किसी दूसरे व्यक्ति की। लेकिन एक डॉक्टर तमाम लोगों की जान बचा सकता है, इसलिए वह ज्यादा खास है।

डॉक्टर लोगों की जान बचाते हैं। डॉक्टर की जान कौन बचाए? जान बचाने के लिए दवा चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए। इन्हीं चीजों की कमी से डॉक्टर लोगों की जान नहीं बचा पा रहे हैं। इन्हीं चीजों की कमी से डॉक्टर अपने साथियों की जान नहीं बचा पा रहे हैं।

यह विचित्र देश है। हमारा लोकतंत्र ठगों, चोरों, लुटेरों, बहुरुपियों और जल्लादों का स्वर्ग है। दो सवा दो लाख मौतों के बाद भी किसी की जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है। कोई नहीं पूछ रहा है कि अस्पताल के डॉक्टर एक साल बाद भी दस्ताने और मास्क के लिए हड़ताल क्यों कर रहे हैं? इसका जिम्मेदार कौन है?

गोदी मीडिया के कब्र पर लेटकर भी नेताओं का भजन करने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते! लेकिन आप नागरिक हैं। ये देश आपका है। आपको राजनीति नहीं करनी है। व्यवस्था सबसे पहले जान आपकी ही लेती है। आप सवाल क्यों नहीं पूछते?


04-May-2021 7:08 PM 28

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद आशा थी कि सरकार, संचार माध्यमों और जनता का ध्यान पूरी तरह से कोरोना को काबू करने पर लगेगा लेकिन आज भी हताहतों के जो आंकड़े आ रहे हैं, वे दुखद और निराशाजनक हैं। यह ठीक है कि जगह-जगह तालाबंदी होने से मरीजों की संख्या में थोड़ी कमी बताई जा रही है लेकिन वह कितनी सही है, कुछ पता नहीं।

हजारों-लाखों लोग तो ऐसे हैं, जिन्हें पता ही नहीं चल रहा है कि वे संक्रमित हुए हैं या नहीं ? वे डर के मारे डाक्टरों के पास ही नहीं जा रहे हैं। ज्यादातर लोगों के पास पैसे ही नहीं हैं कि वे डाक्टरों की हजारों रु. की फीसें भर सकें। अस्पतालों में उनके भर्ती होने का सवाल ही नहीं उठता। अस्पतालों का हाल यह है कि सेवा-निवृत्त राजदूत, जाने-माने फिल्मी सितारे और नेताओं के रिश्तेदार तक अस्पताल में भर्ती होने के इंतजार में दम तोड़ रहे हैं।

जो लोग अपने रसूख के दम पर किसी अस्पताल में पलंग पा जाते हैं, वे भी कराह रहे हैं। जो लोग महलनुमा बंगलों में रहने के आदी हैं और घर से बाहर वे पांच-सितारा होटलों में ही रुकते हैं, ऐसे लोग या तो कई मरीजों वाले कमरों में पड़े हुए हैं या अस्पताल के बरामदे में लेटे हुए हैं। कई लोग भर्ती नहीं हो पाते तो वह अपनी कार या ठेले पर पड़े-पड़े ऑक्सीजन लेकर अपनी जान बचा रहे हैं लेकिन अफसोस है कि परेशानी के इस माहौल में हमारे देश में ऐसे नरपशु भी हैं, जो दवा और इंजेक्शनों की कालाबाजारी बड़ी बेशर्मी से कर रहे हैं।

पिछले 15-20 दिनों में ऐसी खबरें रोज आ रही हैं। लोग ऑक्सीजन की कमी से कई शहरों में रोज मर रहे हैं और उसके सिलेंडरो की सरे-आम कालाबाजारी हो रही है। मेरी समझ में नहीं आता कि हमारी अदालतें और सरकारें क्या कर रही हैं? वे विशेष अध्यादेश जारी करके इन लोगों को फांसी पर तुरंत क्यों नहीं लटकाती?

मुझे अमेरिका, चीन, यूरोप और जापान आदि देशों में बसे भारतीय मित्रों ने बताया कि वे करोड़ों रु. इक_ा करके सैकड़ों ऑक्सीजन-यंत्र और इंजेक्शन भेज रहे हैं, हमारे उद्योगपतियों ने अपने कारखानों की ऑक्सीजन अस्पतालों के लिए खोल दी है और सरकार दावा कर रही है कि ऑक्सीजन की कमी नहीं है, फिर भी देश के अस्पतालों में अफरा-तफरी क्यों मची हुई है ?

अब यह कोरोना शहरों से निकलकर गांवों तक पहुंच गया है और मध्यम और निम्न वर्ग में भी उसकी घुसपैठ हो गई है। जिन लोगों के पास खाने को पर्याप्त रोटी भी नहीं है, उनके इलाज का इंतजाम मुफ्त क्यों नहीं होता और तुरंत क्यों नहीं होता ? देश के करोड़ों समर्थ लोग आगे क्यों नहीं आ रहे हैं ? क्या कोरोना से उन्होंने कोई सबक नहीं सीखा ? सब यहीं धरा रह जाएगा। खाली हाथ ही ऊपर जाना है।

(नया इंडिया की अनुमति से)


03-May-2021 10:37 PM 53

-पंकज मुकाती 

बंगाल में दो मई को पश्चिम से सूरज निकला (भाजपाइयों और मोदी समर्थकों के लिए)।  क्योंकि वे सब तो पूर्व दिशा की तरफ मुंह किये हाथों में जल लिए खड़े थे। उन्हें भरोसा नहीं अति भरोसा था अपने 'देवता' पर। उनकी सभाओं पर। उनके उस प्रवचन पर जिसमे उन्होंने दावा किया था कि दो मई दीदी गई। हाथों में जल का वो कलश धरा ही रह गया क्योंकि सूरज पश्चिम से उदय हुआ।

ममता की तृणमूल कांग्रेस भारी मतों से जीती। सीधे दो सौ पार। भाजपा के साथ खुद ममता भी हैरान। शाम होते-होते कमल दल ने इस बात से संतुष्टि कर ली कि खुद ममता तो हार गई। और हमें भी  ठीक ठाक सीट मिली। इसमें कोई शक भी नहीं। पर जब अश्वमेघ यज्ञ की घोषणा हो और उसमे सिर्फ धुंआ और थोड़ी चिंगारी निकलेगी तो मज़ाक तो उड़ेगा ही। नहीं तो अंधेरे में चिंगारी भी शाबाशी का ही काम है। 

पश्चिम बंगाल चुनाव में दरससल ममता नहीं जीती। मोदी ने उन्हें जितवा दिया। ममता के नाम के स्टार प्रचारक तो खुद मोदी साबित हुए। हर सभा में मोदी ने जिस अंदाज़ में ममता, दीदी की हुंकार भरी, उतना ही ममता का नाम और ऊपर उठता गया। वे सभाओं में ममता का नाम सौ से ज्यादा बार लेते रहे। 

मोदी ने ममता को इस कदर लपेटा कि आम बंगाली भी ममता के पिछले सारे कुशासन को भूल सिर्फ दीदी और बंगाली गर्व को देखने लगा। हमेशा कि तरह मोदी ने विरोधी को दुष्ट बताने कि कोशिश की और  अपने हर काम की तरह दुष्टता के बखान में भी शीर्ष पर गए। आम बंगाली ने इसे अपना अपमान माना। और ममता के प्रति सहानुभूति से ज्यादा वो मोदी और उनके करीबियों में दुश्मन देखने लगा। यदि  बंगाल की ममता के प्रति सहानुभूति या सम्मान होता तो ममता खुद नहीं हारती। उनके सामने खड़े सुवेंदु अधिकारी की जमानत जब्त  हो जाती। 

नरेंद्र मोदी जब भाजपा के स्टार प्रचारक के रूप में होते हैं, तो वे फिर अपने पद की गरिमा और देश के प्रति जिम्मेदारी भूल सिर्फ और सिर्फ भाजपा के  एक ऐसा नेता बन जाते हैं, जिसे सिर्फ जीत चाहिए। इसकी कीमत चाहे जो हो। पद की गरिमा, शब्दों के संयम, राजनीतिक मर्यादा सब कुछ वे दांव पर लगा देते हैं। 

ऐसे वक्त में जब पूरे देश में कोरोना संक्रमण से लोग तड़प रहे थे, मोदी ने खुद को भाजपा के सेनापति के रूप में बनाये रखा। वे सभाएं करते रहे, लोगों को 
वोट देने का न्योता देते रहे। लोकतंत्र के जश्न में शामिल होने के ट्वीट करते रहे। उनकी ये जो युद्धनीति थी वो बीजेपी के सेनापति के रूप में भले उचित थी, पर प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी छवि गैर जिम्मेदार और लापरवाह की बनती गई। जिसे वे अंत तक समझ ही नहीं पाए। इसने भी उनकी छवि को तगड़ा झटका दिया। उनके प्रति मतदाताओं में सम्मान घटा। इस घटे सम्मान से ही ममता की जीत की राह आसान हुई। 

पश्चिम बंगाल का उपमुख्यमंत्री मुस्लिम होगा, कोलकाता का मेयर भी मुस्लिम होगा। बंगाल मुस्लिमों के हवाले होगा। ऐसे जुमलों ने भी भाजपा को नुकसान पहुँचाया।  इस नीति ने भी बहुत काम नहीं किया। बंगाल में 82 सीटें मुस्लिम बहुल है। उस राज्य में हिन्दू-मुस्लिम बंटवारा संभव ही नहीं।

 क्योंकि बंगाल में भाजपा के माँ दुर्गा और ताज़िये के जुलुस का जो मामला खड़ा हुआ, इसे किसी भी बंगाली ने गंभीरता से नहीं लिया। क्योंकि वो इस मामले में ममता के साथ ही था। स्थानीय नेताओं के साथ मुद्दों को समझने के बजाय शाह-मोदी ने बंगाल में भी मुद्दे ऊपर से फेंके जो नहीं चले। इसके पहले भी दिल्ली, झारखण्ड और बिहार में ऐसे मुद्दों से वे मात खा चुके हैं। भाजपा को इस पर सोचना चाहिए था कि ममता के सामने कौन ? कोई नहीं? इसने एक खाली मैदान दिया। मोदी देश के नेता हो सकते हैं, पर राज्यों में उनके प्रति भरोसा  नहीं है।  राज्यों में स्थानीय नेता जरुरी है। 

भाजपा ने बंगाल में भी  वही हिन्दू-मुस्लिम, मुख्यमंत्री को दुष्ट बताने और बाहरी और स्थानीय जैसे मुद्दों से खेलने की कोशिश की। पर हिन्दू -मुस्लिम कार्ड ने मुस्लिमों को ममता के प्रति और मजबूत किया। दूसरा बाहरी और स्थानीय वाले मुद्दे में भी ममता ने पटकनी दे दी। बंगाली जन को वो ये समझाने में सफल रही कि बाहरी तो भाजपा है। भाजपा के रणनीतिकारों ने भी गैर बंगालियों पर कुछ ज्यादा ही फोकस कर लिया। हिंदीभाषी मतदाताओं में से कितनों ने भाजपा को वोट दिया इसका विश्लेषण अभी बाकी है, पर बंगालियों को ममता से चिढ के बावजूद तृणमूल से जोड़े रखा। 

इस चुनाव के नतीजों के बाद क्या उम्मीद की जाए कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री वाले जिम्मेदार रूप में लौटेंगे। देश को कोरोना संकट से निजात दिलाने की कोशिश तेज करेंगे। हालांकि बंगाल का परिणाम आते ही रात को उन्होंने मीटिंग करके इस बात के संकेत दे दिए कि प्रधानमंत्री कार्यालय फिर सक्रिय हो गया है। 

बेहतर तो ये होता कि वे खुद को तीसरे चरण के बाद ही चुनाव प्रचार से बाहर कर लेते। प्रधानमंत्री के पास भी बेहतर सलाहकार नहीं है या फिर वे किसी की सुनते नहीं। यदि वे तीसरे चरण के बाद खुद ये घोषणा करते कि मैं पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार से खुद  को अलग कर रहा हूँ। इस वक्त देश को मेरी ज्यादा जरुरत है। इस एक घोषणा से उनके प्रति पश्चिम बंगाल में भी सम्मान बढ़ता। पर वे चूक गए। वैसे भी कोई भी प्रधानमंत्री राज्यों के चुनाव में उतना अंदर तक नहीं उतरता जितना नरेंद्र मोदी। अब भी वक्त है आगे के चुनावों में वे खुद के लिए एक सीमा तय कर लें। हालाँकि उनके आसपास जमे उनकी स्तुतिगान करने वाले कभी ऐसा होने नहीं देंगे। (POLITICSWALA.COM)


03-May-2021 10:13 PM 137

-चिन्मय मिश्र

"अब नहीं कोई बात खतरे की
अब सभी को सभी से खतरा है |"
जौन एलिया 

ऐसा माना जाता है कि संकट में ही व्यक्ति और समाज का असली चेहरा सामने आता है | कोविड महामारी के इस दूसरे दौर ने भारतीय समाज के उस भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है कि हमारा समाज एक सभ्य, शिष्ट, संस्कारवान व अहिंसक समाज है | इस महामारी ने हमें समझाया है कि भारतीय का समाज का एक तबका/वर्ग अब पहले से अधिक दानवी, अशिष्ट, असभ्य, हिंसक व खूंखार होने के साथ ही साथ निर्लज्जता की सीमाओं को लांघ चुका है ! निम्न चार घटनाओं पर गौर करिए | 

पहली है आगरा की | जहाँ पर एक तस्वीर में एक महिला, अपने पति को बचाने के लिये, उसके मुँह से मुँह लगाकर साँस देते हुए उसे जीवित रखने की असफल कोशिश कर रही है | वह एक दर्जन से ज्यादा अस्पताल घूम आई है | कुछ हाथ नहीं आया | उसे मालूम ही होगा कोरोना बेहद संक्रामक है | इस तरह से सांस देने से स्वयं की जान खतरे में पड़ जाएगी | पर प्रेम में विचार की गुंजाइश, नहीं होती वहां तो सिर्फ भावना होती है | साथ जीने और मरने की | यह तस्वीर एक मायने में सिर्फ नए आगरा, जिसे अभी तक अपने ताजमहल पर नाज था, की ही नहीं बल्कि पूरे भारत के लिए एक नया प्रतीक है, कि कैसे एक अस्पताल के ठीक बाहर व्यक्ति बिना आक्सीजन के मर सकता है | क्या भारतीय शासन-प्रशासन (सिस्टम नहीं) में अपने नागरिकों को लेकर वैसी तड़प नहीं है जैसी इस तस्वीर में रेणु सिंघल की अपने पति रवि सिंघल के लिए दिखाई पड़ रही है ? 

दूसरी घटना भी उत्तरप्रदेश की ही है | यहां एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति अपनी मृत पत्नी को साईकिल पर पैडल के ऊपर कुछ इस तरह लादकर (जी हां लादकर ही ठीक शब्द है) ले जा रहे हैं, जैसे कि किसी मृत पशु या  सामान भरे बोरे को ले जाया जाता है | मृतका का शरीर जमीन से घिसट रहा है | यह बुजुर्ग भारतीय नागरिक किस मनःस्थिति में होंगे इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती | आजादी के सात दशक बाद शव को ले जाने तक की कोई व्यवस्था नहीं | यहाँ पर शासन-प्रशासन ही नहीं, समाज भी असफल और निर्दयी नजर आ रहा है | याद रखिये अपवाद हर जगह होते हैं | 

तीसरी घटना या स्थिति तो पूरे भारत में व्याप्त है | यह है श्मशान गृहों व घाटों में लाशों के जलने का न टूटने वाला सिलसिला | पहले बनारस का मणिकर्णिका घाट ही अपवाद था, जहाँ पर कि लगातार चौबीसों घंटे चिताएं प्रज्जवलित रहती हैं | अब पूरे भारत के लिए यह सामान्य घटना हो गई है | शवदाह गृह छोटे पड़ रहे हैं, युद्धस्तर पर नए प्लेटफार्म  बनाए जा रहे हैं | बिजली से चलने वाले शवदाह गृहों की भट्टियां स्वयं ही जल गई हैं और लगातार शवदाह की वजह से चिमनियां गरम होकर पिघल गई हैं, गिर गई हैं | परन्तु मृत्यु के सरकारी आंकड़े इस सबको झुठला रहे हैं | 

चौथी घटना भी बेहद त्रासद है | दिल्ली में अब कुत्तों के लिए निर्मित शवदाह गृह में मनुष्यों का अंतिम संस्कार होगा | कोरोना ने प्राणियों के बीच का अंतर ही समाप्त कर दिया, खासकर मृत्यु के बाद | यह एक अकल्पनीय स्थिति है और इसके बावजूद सरकारी आकड़े स्वीकार कर ही नहीं रहे हैं कि इतनी अधिक संख्या में मौते हुई हैं | तो अब मनुष्य और कुत्ते के बीच का भेद भी खत्म हो गया है | वैसे पहले भी आम जनता को मनुष्य समझने की गलती हमारा अधिकांश शक्तिशाली वर्ग जिसके पास सत्ता व समृद्धि है नहीं करता था | वर्ना लोग इस महामारी में वापस अपने घर जो कि सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं, क्यों लौटते ? घटनाएं तो अनगिनत हैं | 

पश्चिम में महामारियों की व्यापकता और वीभत्स्ता दिखने के लिए अक्सर पिशाचों/चुडैलों का सहारा लिया जाता रहा है | हम उन्हें एक काल्पनिक प्राणी की संज्ञा देते हैं | परन्तु भारत की वर्तमान स्थिति को देखते हुए लगता है कि अब पिशाच होने के लिए मृत्यु जरुरी नहीं है | कोई व्यक्ति जीते जी पिशाच हो सकता है | वह मनुष्य का रक्तपान कर सकता है | अपने आसपास नजर दौड़ाइये, हर तरफ पिशाचनुमा मनुष्य नजर आएँगे | ऐसा लगने लगा है कि पिशाच अब मनुष्य से अलग कोई योनि नहीं बल्कि मनुष्यों की ही एक प्रजाति है | यह तय है कि वे संख्या में कम हैं, अपवाद हैं, परन्तु कमोवेश उनका पूरी मानवता पर कब्जा हो गया है | पिशाचों के बारे में विस्तार में जाएं तो पता चलता है कि, "पिशाच यूं तो एक काल्पनिक प्राणी है, जो प्राणियों के जीवन-सार खाकर जीवित रहते हैं, आमतौर पर उनका खून पीकर | हालांकि विशिष्ट रूप से इनका वर्णन मरे हुए किन्तु अलौलिक रूप से अनुप्रमाणित जीवों के रूप में किया गया | कुछ अप्रचलित परंपराएं विश्वास करती थीं कि पिशाच (रक्त चूषक) जीवित लोग थे |" अगर हम इसकी आखिरी पंक्ति में यह परिवर्तन कर दें कि, "कुछ वर्तमान प्रचलित परंपराएं विश्वास करती हैं कि पिशाच (रक्त चूषक) जीवित लोग हैं |" तो क्या यह आपत्तिजनक है ? जैसा कि मैंने पहले भी लिखा कि यहाँ सामान्यीकरण नहीं किया जा रहा है | नव पिशाच मनुष्यों में से निकला एक वर्ग है |

सोचिए | लोग आक्सीजन के बिना मर रहे हैं | वहीं दूसरी ओर आक्सीजन का एक सिलेंडर 1 लाख रु. तक में बेचा जा रहा है | शासन के स्तर पर आरोप प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं | एक राज्य दूसरे राज्य में जा रहे आक्सीजन टेंकर को जबरन रोक रहा है | सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय तक हैरान हैं | ऐसा तब जबकि अधिकांश सरकारी विज्ञप्तियां बता रहीं है कि देश में आक्सीजन की कोई कमी नहीं है | और आगे बढ़िये अस्पताल पहुंचिए | वैसे तो वहां जगह मिल जाए तो, अपनी किस्मत को सराहिये | अन्दर जाने के पहले ही निजी अस्पताल के शुल्क देखते ही हम किस्मत को कोसने लगते हैं | अपवादों को छोड़ दें, तो जिस तरह का अनापशनाप लाभ कमाया जा रहा है और संवेदनाओं को ताक पर रखा जा रहा है, वह किसी साधारण मनुष्य का काम नहीं है, उसके लिए तो (आप समझ ही गए होंगे) वही बनना पड़ता है | परन्तु कोई विकल्प नहीं है | सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को जिस तरह से पिछले वर्षों में नष्ट किया गया, उसके परिणाम हमारे सामने हैं | हर ओर मौत ही मौत है, और मर्मातक चीत्कारें हैं | पर कुछ लोगों पर इस सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता | क्यों ? आप ही बताइये | 

जब अस्पताल पहुंचेंगे तो दवाइयां भी लगेगीं | 800 रु. वाला इंजेक्शन 15000 रु. से लेकर 50,000 रु. में भी मिल जाए तो गनीमत | इससे कम का मिलेगा तो उसमें पुरानी बोतल में ग्लूकोज भरा होगा | साँस लेने में मददगार सारे उपकरण 5 गुना से ज्यादा महंगे हो चुके हैं| परन्तु केंद्र शासन, राज्य शासन और स्थानीय प्रशासन की और से अब तक कोई भी ठोस कार्यवाही सामने नहीं आई | इन नव पिशाचों की बन आई है | अब शवदाह भी ठेके पर देना शुरू हो गया है, प्रशासन इसे नकार रहा है | कंधे देने के लिए 5000 रु. तक मांगे जा रहे हैं | तो क्या इन्हें मनुष्य कहा जा सकता है ? सोचिए और खुद को ही उत्तर दीजिए | यहीं पर इस बात पर गौर करना आवश्यक है कि यह पैशाचिकी प्रवृत्ति समाज के ऊपरी तबके या सतह तक सीमित नहीं रह गई है | इसकी एक व्यापकता वास्तव में झुरझुरी पैदा कर देती है | सांस तोड़ते मरीज को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस वाले औसतन 300 रु. प्रति किलोमीटर मांग रहे हैं, खासकर दिल्ली जैसे महानगरों में | महामारी से पहले यह 12 रु. प्रति किलोमीटर था | घर से 50 किलोमीटर दूर ले जाने का 15000 से 25000 रु. तक | क्या कोई सामान्य मनुष्य एक दम तोड़ते व्यक्ति से मोलभाव कर सकता है | उसकी उखड़ती सांसें भी अब विचलित नहीं कर पा रहीं हैं |

इस सबके बाद, या कहें तो सबसे पहले सरकार और प्रशासन पर बात करना चाहिए | परन्तु उन पर क्या बात करें | वे दूरदर्शी लोग हैं कुछ भी अनजाने में नहीं करते | कोरोना की पहली लहर के बाद से ही यह तय था कि यह जल्दी जाने वाला नहीं है | कम से कम सन् 2022 तक तो बना ही रहेगा | पर आज जो परिस्थितियां हमारे आपके सामने हैं, उसे देखकर साफ लगता है कि शासन-प्रशासन की प्राथमिकता में से जनता नदारद है | वैसे एक और तबका है, हमारे वैज्ञानिकों का | कोरोना को लेकर यह आजतक किसी एक बात पर सहमत नहीं हुआ | एक दवाई की कमी हुई तो उसे अनुपयोगी ठहरा दिया गया | आक्सीजन की कमी हुई तो समझाया गया कि इसका दुरूपयोग हो रहा है | अस्पताल में बिस्तरों कि कमी हुई तो कहा गया कि भर्ती होने की जरुरत ही नहीं है | यह सब पहले से तय क्यों नहीं था ?  

वैसे पिशाच की एक और परिभाषा है, "एक प्रकार का भूत या प्रेत जिनकी गणना हीन देव योनियों में होती है तथा जो वीभत्स कार्य करने वाले माने जाते हैं | उक्त के आधार पर वीभत्स तथा जघन्य कार्य करने वाला व्यक्ति | किसी काम या बात के सन्दर्भ में वैसा ही उग्र और भीषण रूप रखने वाला जैसा पिशाचों का होता है |" तो अपने आस पास देखिए | मूल्यांकन कीजिए और पहचानिए | इतना जरुर करिए कि जो हो रहा है उसे भूलने की कोशिश न करें | बहुत घबड़ाहट हो तो आगरा के प्रौढ़ युगल के असीम प्रेम वाली तस्वीर को याद करिए | बेहद सुकून मिलेगा | पर यह भी याद रखिए कि इस कलयुग में सावित्रियां भी अपने सत्यावानों को नहीं बचा पा रहीं हैं | ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्यता पर पैशाचिक प्रवृत्ति हावी होती जा रही है | 


03-May-2021 4:34 PM 81

-गिरीश मालवीय

बायो बबल फूट गया। केकेआर के दो खिलाड़ी कोरोना पॉजिटव हुए। आज का मैच पोस्टपोन किया गया। 
इस बार के आईपीएल में खिलाडिय़ों के कोरोना से बचाव के लिए एक फुलप्रूफ व्यवस्था की गई थी जिसे बहुत सुरक्षित बताया जा रहा था इसे बायो बबल कहा जा रहा है
दरअसल बायो-बबल (Bio-bubble) एक ऐसा वातावरण है जिसमें रहने वाले लोग पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कट जाते हैं। आईपीएल के सफल आयोजन के लिए भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा हैं इस व्यवस्था में खिलाड़ी, सपोर्ट स्टाफ, होटल स्टाफ के साथ ही आयोजन से जुड़े हुए सभी व्यक्ति को कोरोना टेस्ट कर के निगेटिव आने पर बाहरी लोगों के संपर्क से दुर रखा जाता है। सीरीज शुरू होने से पहले भी इन्हें सात दिनों के लिए क्वरैंटाइन किया जाता है। जब तक सीरीज खत्म नहीं हो जाता तब तक इन्हें किसी से भी मिलने की इजाजत नहीं होती है।

ये खिलाड़ी बायो बबल एरिया में रहें और जो एरिया निर्धारित की गई है उससे बाहर न जाएं। इस पर नजर रखने के लिए सभी खिलाडिय़ों को ट्रैकिंग डिवाइस दी गई थी।
यह डिवाइस रिस्ट बैंड या चेन के रूप में है जो हमेशा खिलाडिय़ों को होटल कमरे से बाहर निकलने पर पहननी होती है।  इससे खिलाडिय़ों को पता चलेगा कि उन्हें किन जगहों पर जाना है और कौन सी जगह बायो-बबल के तहत आते हैं। जैसे ही खिलाड़ी बायो-बबल एरिया से बाहर जाएंगे  इस डिवाइस से आवाज आएगी और खिलाड़ी अलर्ट हो सकते है।

यही नहीं जिन होटलों में खिलाड़ी ठहरे हैं, वहां के सभी कर्मचारी और खिलाडिय़ों की बस के ड्राइवर को 14 दिन का क्वारंटाइन रखा गया था। इस बीच उनकी नियमित कोरोना जांच भी की गई। नेगेटिव रिपोर्ट आने पर ही इनकी ड्यूटी लगाई गई। पूरे आईपीएल के दौरान ये बायो बबल से बाहर नहीं जा सकते हैं। अपने घर भी उन्हें जाने की इजाजत नही थी
इतनी कड़ी व्यवस्था भी महीने भर नही चल पाई ओर कोरोना वायरस ने बायो बबल ब्रेक कर दिया तो आपका हमारा घर कौन सी बड़ी चीज है।
 

 


03-May-2021 3:34 PM 37

ममता की जीत से कांग्रेस और कम्युनिस्ट पाटियों का सूपड़ा साफ हो जाना लोकतंत्र के लिए हार्ट अटैक से छोटी घटना मैं नहीं मानता। 1997 के उस कांग्रेस सम्मेलन में मैं हाजिर था जहां समानांतर सम्मेलन तृणमूल कांग्रेस स्थापित होने की शुरुआत की सुगबुगाहट देते ममता के नेतृत्व में ब्रिगेड परेड मैदान में चल रहा था। यह कांग्रेस को सोचना रहा है कि उसके अंदर कौन सी बुराइयां लोगों को दिख रही हैं कि मैदानी ताकत के नेता उससे छिटकते रहे हैं। ममता भी हालात की स्वार्थमय मजबूरी के कारण अटल बिहारी वाजपेयी की कूटनीति के चलते भाजपा के साथ जुड़ गई थीं। हालांकि वह सैद्धांतिक रूप से गलत था। इसी तरह जगन रेड्डी आंध्रप्रदेश में, नवीन पटनायक उड़ीसा में, शरद पवार महाराष्ट्र में तथा अन्य कई नेता कांग्रेस की मूल प्रवृत्ति के हैं। कांग्रेस तो हार गई लेकिन तृणमूल कांग्रेस की संस्कृति मूल कांग्रेसी संस्कृति से बहुत जुदा नहीं है, बल्कि उत्तराधिकार में है। अन्यथा ममता ने अपने दम पर पार्टी बनाते वक्त कांग्रेस शब्द छोड़ दिया होता। उनकी पार्टी के नाम में कांग्रेस तो लिहाफ है जिसमें तृणमूल कार्यकर्ताओं को अहमियत है, कुर्सी तोड़ने वालों की नहीं। ममता को लाखों के कार्यकर्ताओं को समर्थन के बावजूद बंगाल के धाकड़ अध्यक्ष सोमेन मित्रा की तिकड़मों से पहले सीताराम केशरी और बाद में सोनिया गांधी का संरक्षण नहीं मिल पाया। 

बंगाल में साम्यवादियों का पतन प्रगतिशील राष्ट्र के भविष्य के लिए काला धब्बा लेकर आया है। नंदीग्राम और सिंगूर में ही टाटा का नैनो कारखाना और मलेशिया के सलीम संस्थान जैसे कारखाने को प्रश्रय देने के कारण युवा ममता बनर्जी एक छत्रप बनकर उभरी थीं। वहां आधा बीघा एक बीघा जोत के जमीन के किसान और खालिस गरीब मुस्लिम आबादी को प्रताड़ित और विस्थापित होना पड़ रहा था। लोकतंत्र में यदि ममता द्वारा इस तरह का विरोध महात्मा गांधी की शिक्षाओं के अनुकूल नहीं रहा है तो क्या कांग्रेस पार्टी को इस ओर से भी आंख मूंद लेना चाहिए था? ऐसे भी नेता हैं जो कांग्रेस में राष्ट्रीय महासचिव या पर्यवेक्षक बनकर उत्तरप्रदेश, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और बंगाल वगैरह में कबाड़ा करते हैं लेकिन हाईकमांड की आंख का सुरमा बनते रहे हैं। कौन बचाएगा गांधी- नेहरू-इंदिरा के रास्ते पर चलकर देश की सबसे बड़ी प्रतिनिधि पार्टी के भविष्य को? 

विधानसभा में लगभग चौथाई सीटें जीत लेने के बाद भाजपा का आश्वस्त होना जरूरी है कि पांच साल बाद क्या क्या गुल वह खिला पाएगी। 3 सीट से 77 सीट तक पहुंचना एक राजनीतिक अजूबा तो है। हालांकि वह लोकसभा में 128 सीटों की बढ़त के मुकाबिले 51 सीट नीचे गिरी है। यह वह करिश्मा है जिसकी कीमत कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने चुकाई है। उनके ढीले ढाले मैदानी प्रतिनिधित्व के कारण उनका ही वोट बैंक भाजपा की झोली में फिलहाल कुछ वर्षों के लिए चला ही गया है। उन्हें तो अंकगणित के प्राथमिक पाठ पढ़ने होंगे वर्ना बंगाल में इन दोनों पार्टियों का यश फिलहाल तो भाजपा ने पोंछ दिया है। संयुक्त मोर्चे का कथन बेमानी है कि उनका वोट बैंक ममता को गया है। तो फिर भाजपा के पास किसका वोट बैंक आया? भारतीय राजनीति में विषैला दलबदल अभियान भाजपा ने कर रखा है। वह लोकतंत्र के नाम पर संसार की सबसे बड़ी चुनौती है। 

कांग्रेस के उदार नेता राजीव गांधी ने कुछ गलतियां सद्भावना या बहकावे में आकर कर दी होंगी। राममंदिर का ताला खुलवाना, मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के अत्याचार से बचाने के मामले में कठमुल्ला ताकतों के सामने शाहबानो प्रकरण में दब जाना और लोकसभा में 80 प्रतिशत बहुमत होने पर भी भाजपा के भी सहयोग से दलबदल के उदार कानून को पास कराकर राजीव गांधी ने राजनीतिक चिंतन और नेकनीयती का परिचय दिया। कड़ियल राजनीति की कुटिल चाल में उनकी सद्भावना बस इतनी ही काम आई कि उनका जन्मदिन सद्भावना दिवस के रूप में मनाया जाए। उनके राजनीतिक वंशज निश्चित रूप से शाइस्तगी और शराफत के प्रतीक हैं लेकिन मौजूदा दौर में ममता बनर्जी जैसी खुद्दार मैदानी नेताओं की कांग्रेस को जरूरत है। यह तो लालू यादव जैसे प्रतिबद्ध समाजवादी को न्यायिक अन्याय की अमरबेल में फंसाकर उनकी सेहत टूटने तक जेल में रखा गया। वरना बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेताओं को पानी पिलाने में दिक्कत नहीं होती। उत्तरप्रदेश के अखिलेश यादव, दिल्ली के केजरीवाल, महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे बिल्कुल ही अलग फितरत के हैं। लेकिन महाबली से लड़ने के लिए उनके पास कूटनीतिक सफलता के अलग अलग हथियार हैं। पता नहीं देश का भविष्य क्या होगा? 

राष्ट्रीय आंदोलन की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस की केन्द्रीय भूमिका की इतिहास को जरूरत है। सत्ता के नज़रिए से पार्टियों को देखने का काम राजनीति के सिद्धांत में नहीं होता। राष्ट्रीय आंदोलन में लोकतंत्र, व्यक्ति की गरिमा, समान अवसर, समाजवाद, सेक्युलरिज़्म सबको पाल पोसकर बड़ा किया गया है। मुझे कहने में गुरेज़ नहीं है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी लड़ते जरूर हैं लेकिन जनता को क्यों लगता है कि प्रतीकात्मक तौर पर लड़ रहे हैं। एक साथ पूरी पार्टी उठकर क्यों खड़ी नहीं होती? तब तो नतीजा मिल सकता है। नेता और कार्यकर्ताओं के बीच यदि कांग्रेस फासला बढ़ाती लगती प्रचारित होती रहेगी तो कार्यकर्ताओं को लोग पिछलग्गू और अनुयायी कहने लगेंगे। यहीं से पतन के बिन्दु की शुरुआत होती है। कांग्रेस के मुख्यमंत्री अचानक इतने मजबूत भी हो गए हैं और उन्हें मीडिया प्रचारित लोकप्रियता भी मिल रही है। इससे भी एक राष्ट्रीय पार्टी के संविधान के तहत ढांचागत आचरण के लिए सवाल भी पैदा हो सकते हैं। 


03-May-2021 2:34 PM 49

   विश्व प्रेस स्वतन्त्रता दिवस विशेष (3 मई)  


-डॉ राजू पाण्डेय
अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विथाउट बॉर्डर्स(मुख्यालय-पेरिस) द्वारा जारी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में हम 142 वें स्थान पर हैं। वर्ष 2016 से हमारी रैंकिंग में जो गिरावट प्रारंभ हुई थी वह अब तक जारी है। तब हम 133 वें स्थान पर थे। आरएसएफ के विशेषज्ञों ने भारत के प्रदर्शन के विषय में अपनी टिप्पणी को जो शीर्षक दिया है वह अत्यंत महत्वपूर्ण है-"मोदी टाइटन्स हिज ग्रिप ऑन द मीडिया"। यह टिप्पणी निम्नानुसार है- "वर्ष 2020 में अपने कार्य को लेकर चार पत्रकारों की हत्या के साथ भारत अपना काम सही रूप से करने का प्रयास कर रहे पत्रकारों हेतु विश्व में सबसे खतरनाक मुल्कों में से एक है। इन्हें हर प्रकार के आक्रमण का सामना करना पड़ा है- संवाददाताओं के साथ पुलिस की हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ मुठभेड़ एवं आपराधिक समूहों तथा स्थानीय भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारियों द्वारा प्रेरित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को 2019 के वसंत में हुए आम चुनावों में मिली भारी सफलता के बाद से ही मीडिया पर हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार की विचारधारा एवं नीतियों का अनुसरण करने हेतु दबाव बढ़ा है। उग्र दक्षिणपंथी हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाली हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करने वाले भारतीय अब कथित राष्ट्र विरोधी चिंतन की हर अभिव्यक्ति को सार्वजनिक विमर्श से  हटाने  की चेष्टा कर रहे हैं। हिंदुत्व के समर्थकों में खीज पैदा करने वाले विषयों पर लिखने और बोलने का साहस करने वाले पत्रकारों के विरुद्ध सोशल मीडिया पर चलाई जा रही समन्वित हेट कैंपेन्स डरावनी हैं और इनमें सम्बंधित पत्रकारों की हत्या करने तक का आह्वान किया जाता है। विशेषकर तब जब इन अभियानों का निशाना महिलाएं होती हैं,  इनका स्वरूप  हिंसक हो जाता है। सत्ताधीशों की आलोचना करने वाले पत्रकारों का मुँह बन्द रखने के लिए उन पर आपराधिक मुकद्दमे कायम किए जाते हैं, कुछ अभियोजक दंड संहिता के सेक्शन 124ए का उपयोग करते हैं जिसके अधीन राजद्रोह के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान है। वर्ष 2020 में सरकार ने कोरोना वायरस के संकट का लाभ उठाकर समाचारों की कवरेज पर अपने नियंत्रण को मजबूत किया और सरकारी पक्ष से भिन्नता रखने वाली सूचनाएं प्रसारित करने वाले पत्रकारों पर मुकद्दमे कायम किए। कश्मीर में स्थिति अब भी चिंताजनक है जहाँ पत्रकारों को प्रायः पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है, पत्रकारों को समाचारों की विषय वस्तु के संबंध में ओरवेलियन कंटेंट रेगुलेशन्स(सरकार द्वारा जनजीवन के प्रत्येक पक्ष पर अपना नियंत्रण सुनिश्चित करने हेतु निर्मित नियम)  का पालन करने को मजबूर किया जाता है और जहाँ मीडिया आउटलेट्स का बन्द होना तय है जैसा कि घाटी के प्रमुख समाचार पत्र कश्मीर टाइम्स के साथ हुआ।"

भारत इस इंडेक्स में बैड केटेगरी में है। हम आरएसएफ द्वारा प्रयुक्त चारों पैमानों पर खरे नहीं उतरे हैं- बहुलवाद, मीडिया की स्वतंत्रता,कानूनी ढांचे की गुणवत्ता और पत्रकारों की सुरक्षा। हमारे दक्षिण एशियाई पड़ोसी नेपाल(106),श्रीलंका(127), म्यांमार(140,सैन्य विद्रोह के पहले की स्थिति)प्रेस की स्वतंत्रता के विषय में हमसे बेहतर कर रहे हैं। जबकि पाकिस्तान में हालात हमसे थोड़े खराब हैं वह 145 वें और बांग्लादेश कुछ और गिरावट के साथ 152 वें स्थान पर है।

इससे पहले मार्च 2021 में अमेरिकी थिंक टैंक फ्रीडम हाउस ने भारत का दर्जा स्वतंत्र से घटाकर आंशिक स्वतंत्र कर दिया था। फ्रीडम हाउस के अनुसार जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता में गिरावट आई है और यह गिरावट 2019 में मोदीजी के दुबारा चुने जाने के बाद और तेज हुई है। दिसंबर 2020 में अमेरिका के कैटो इंस्टीट्यूट और कनाडा के फ्रेजर इंस्टीट्यूट द्वारा जारी ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स 2020 में हम 162 देशों में 111 वें स्थान पर रहे। वर्ष 2019 में हम 94 वें स्थान पर थे। स्वीडन के वी डेम इंस्टीट्यूट ने 22 मार्च 2021 को जारी डेमोक्रेसी रिपोर्ट में भारत के दर्जे को डेमोक्रेसी से इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील कर दिया था।

इन सारे सूचकांकों का जिक्र महज इसलिए कि आरएसएफ के इन आंकड़ों को भारत के विरुद्ध षड्यंत्र की भांति प्रस्तुत करने की सत्ता समर्थकों की कोशिशों से कोई भ्रमित न हो जाए। पिछले अनेक महीनों से विश्व के अलग अलग देशों की एजेंसियां भारत के लोकतंत्र में आ रही गिरावट की ओर संकेत करती रही हैं और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग को इन सारी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा समय समय पर किए गए आकलन की पुष्टि करने वाली अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस आलेख में जैसा पहले ही लिखा गया है आरएसएफ की टिप्पणी का शीर्षक बहुत उपयुक्त और सारगर्भित है। शीर्षक में भारत सरकार या उसके प्रधानमंत्री का जिक्र नहीं है, यह श्री नरेंद्र मोदी हैं जो मीडिया पर अपना शिकंजा और मजबूत कर रहे हैं। उनका व्यवहार विश्व के विशालतम लोकतंत्र के निर्वाचित प्रधानमंत्री की भांति नहीं है अपितु वे उग्र दक्षिणपंथ की राह का सफर खतरनाक तेजी से तय करती भाजपा के कप्तान की भूमिका में हैं। जैसा कि आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में होता है हमारे देश में भी सत्ता अर्जित करने के बाद राजनीतिक दल अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं और पूर्वाग्रहों को एक सीमा तक नियंत्रित कर लेते थे और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप सरकार का संचालन करते थे। शायद ऐसा इसलिए भी था कि देश में लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया था और उसे लोकतांत्रिक स्वतन्त्रता का मूल्य पता था। कांग्रेस को अपदस्थ करने वाले गठबंधनों की वैचारिक भिन्नता और गठबंधन धर्म का पालन करने की विवशता किसी एक विचारधारा के अतिरेक से रक्षा करने वाली और लोकतंत्र को परिपुष्ट करने वाली ही सिद्ध हुई थी।

भारतीय राजनीति का मोदी युग सरकार, पार्टी और मीडिया के फ्यूज़न के लिए जाना जाएगा। हम आज मीडिया के एक बड़े भाग को सरकार और पार्टी के प्रवक्ता के रूप में व्यवहार करता देखते हैं, वह सरकार का रक्षक है और सहायक भी। कभी मीडिया भाजपा के लिए एक रणनीतिकार का कार्य करता दिखता है तो कभी पार्टी की रणनीतियों के क्रियान्वयन का जिम्मा उठा लेता है। भाजपा पार्टी कभी सरकार की भांति अहंकारी बनकर लचीलापन खोती दिखती है तो कभी मीडिया की भांति आक्रामक होकर प्रोपेगंडा और वैचारिक छद्म रचती दिखती है। सरकार गवर्नेंस छोड़कर सारे काम करती दिखती है। प्रायः वह पार्टी की भांति संकीर्ण और पक्षपाती बन जाती है और पार्टी के लिए चुनाव केंद्रित शासन करने लगती है। हम उसे मीडिया की भांति इवेंट बनाते और मैनेज करते देखते हैं जिसमें जमीनी कामकाज पर नगण्य और आंकड़ेबाजी तथा विजुअल्स पर अधिक जोर होता है। सत्ता में होने के बावजूद भाजपा पार्टी और उसकी सरकार दोनों ही मीडिया की भांति एक सशक्त विपक्ष की भूमिका में दिखते हैं। यद्यपि इनके द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों को शत्रु समझकर की गई उनकी आलोचना अतार्किक और अनैतिक होने के कारण द्वेषजनित निंदा का रूप ले लेती है तथा इसका स्वरूप मारक एवं हिंसक बन जाता है। 

मीडिया, सत्ताधारी दल और सरकार के इस फ्यूज़न का परिणाम यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता के संकट का समाधान अब प्रेस बिरादरी के आंतरिक उपचारों, उपायों और नियामकों द्वारा नहीं हो सकता। प्रेस की आजादी अब सम्पूर्ण परिवर्तन द्वारा ही संभव है। यह सत्ता परिवर्तन ही नहीं होगा बल्कि इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की ओर ले जाने वाला विचारधारात्मक परिवर्तन होगा।

प्रेस की आजादी का सवाल इस कारण भी जटिल बन गया है क्योंकि अब यह दमनकारी सरकार और पीड़ित जनता के पक्ष में खड़ी पत्रकार बिरादरी जैसा आसान मुद्दा नहीं है। नव फासीवाद ने जनता के बड़े हिस्से में अलोकतांत्रिक संस्कार डालने में सफलता पाई है और पहली बार हम बहुमत को लोकतंत्र विरोधी आचरण करता देख रहे हैं। लोकतंत्र और बहुसंख्यक की तानाशाही के बीच की स्पष्ट और गहरी विभाजन रेखा को धुंधला करने में नव फ़ासिस्ट शक्तियों को मिली सफलता के बाद अब धार्मिक ध्रुवीकरण करने वाली, नफरत और बंटवारे को बढ़ावा देने वाली, साम्प्रदायिक एवं जातीय उन्माद पैदा करने वाली, हिंसा की ओर धकेलने वाली तथा बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने वाली खबरों को इस रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे ये प्राकृतिक न्याय की स्थापना की सहज प्रक्रिया का कोई हिस्सा हों । यह दर्शाया जा रहा है कि धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व,अहिंसा तथा समानता जैसे मूल्य आरोपित और अन्यायपूर्ण थे जिनका स्थान अब नए मूल्य ले रहे हैं।

बंटवारे और नफरत का जहर सूचना और विचारों के आदान प्रदान से जुड़े लोगों(इन्हें सामान्य रूप से पत्रकार कह दिया जाता है जो सही नहीं है, यह राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक कार्यकर्ता हैं, किसी विभाजनकारी एवं हिंसक विचारधारा के घोषित-अघोषित समर्थक हैं, स्पष्ट व्यावसायिक और राजनीतिक एजेंडे वाले समाचार चैनलों पर खबरों को पढ़ने वाले एंकर हैं, वे सभी लोग हैं जो डिजिटल और कुछ हद तक प्रिंट मीडिया का उपयोग अपने एजेंडे के प्रचार प्रसार में कर रहे हैं, इन्हें पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों से कोई वास्ता नहीं है और न ही सच्ची, प्रामाणिक, वस्तुनिष्ठ सूचना को बिना मिर्च मसाले के प्रस्तुत करना इनका ध्येय है। ये जनपक्षधर तो कतई नहीं हैं।) में इस प्रकार फैल गया है कि वैचारिक, भाषिक और कई बार शारीरिक हिंसा भी देखने में आ रही है।

सोशल मीडिया का जन्म उन्मुक्त और स्वछंद रहने के लिए हुआ है और यह अपनी प्रकृति में अनुशासन और नियंत्रण का विरोधी है। इसके अराजक और आज़ादी पसंद स्वभाव को नव फ़ासिस्ट शक्तियों ने बहुत चतुराई से अपने पक्ष में दिशा दी है और हजारों असंबद्ध और अनर्गल लगने वाली वायरल पोस्टों के माध्यम से जनमानस को हिंसा और घृणा के विमर्श का अभ्यस्त बनाया है। इस हिंसा के आकर्षण से नव फ़ासिस्ट शक्तियों के विरोधी भी अछूते नहीं रहे हैं।

अनेक बार हम देखते हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किसी आवश्यक,जनोपयोगी और बुनियादी मुद्दे पर चल रही बहस केवल इस कारण से पटरी से उतर जाती है क्योंकि भाषा का संयम टूट जाता है, हम भाषिक हिंसा पर उतर आते हैं, हम आरोप प्रत्यारोप तथा गाली गलौज की उस भाषा का प्रयोग करने लगते हैं जिस पर नफरतजीवियों का विशेषाधिकार है। 

किसान आंदोलन की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगाने के ध्येय से कवरेज कर रहे मुख्यधारा के षड्यंत्रकारी मीडिया के किसी नफरतजीवी पत्रकार के साथ धक्का मुक्की और दिल्ली दंगे की वास्तविक सच्चाई दिखाने की कोशिश कर रहे किसी साहसी पत्रकार के साथ मारपीट बिल्कुल अलग घटनाएं हो सकती हैं। संभव है कि पहली हिंसा झूठ दिखाने से रोकने के लिए की गई हो और दूसरी हिंसा सच दिखाने से रोकने के लिए की गई हो। किंतु जब पहली घटना को हिंसक किसानों की गुंडागर्दी और दूसरी घटना को भावनात्मक रूप से उद्वेलित भीड़ की सहज प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तब आघात सत्य एवं न्याय हेतु चल रहे संघर्ष को ही लगता है। अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए चल रहे संघर्ष में भी भूल से ही सही जब हम हिंसा का आश्रय लेते हैं तब भी हम आतताइयों को एक अवसर प्रदान कर देते हैं कि वह अपनी हिंसा को न्यायोचित ठहराएं। और हम पर हिंसक होने का आरोप लगाकर हमारी स्वतन्त्रता का अपहरण करें।

यही स्थिति पत्रकारिता में है। हम उग्र दक्षिणपंथी शक्तियों के विरोध में इतने लीन हो जाते हैं कि हमें पता ही चलता कि कब हम उनकी तरह घृणा की भाषा बोलने लगे हैं, कब हमारे प्रतिरोध में हिंसा और प्रतिशोध के तत्व घुस आए हैं। हम स्वयं को स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता का पैरोकार समझ रहे होते हैं और उग्र दक्षिणपंथी शक्तियां इस बात का जश्न मना रही होती हैं कि हम उनके द्वारा दिए गए मुद्दों पर उन्हीं की भाषा में उनकी भांति ही सोचने के लिए धीरे धीरे प्रशिक्षित किए जा रहे हैं।

हमें पत्रकारिता के गैंगवार का हिंसाप्रिय अपराधी बनाने की कोशिश हो रही है और जैसे ही हम भाषिक एवं वैचारिक हिंसा का आश्रय लेंगे सरकारों का दमन चक्र प्रारंभ हो जाएगा और हम उनकी संगठित हिंसा का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।

हाल ही में संकीर्ण और असमावेशी उग्र दक्षिणपंथी  विचारधारा का प्रचार प्रसार करने वाले एक नामचीन टीवी एंकर के असामयिक दुःखद निधन पर हममें से अनेक लोगों की प्रतिक्रिया अतिरंजित और अमर्यादित थी। यदि उन्होंने अपनी प्रतिभा और लोकप्रियता का दुरुपयोग समाज में घृणा और विभाजन का विष फैलाने हेतु किया है तो आने वाली पीढियां उन्हें उसी रूप में याद रखेंगी। हो सकता है कि किसी अप्रिय और कष्टप्रद अनुभव की भांति उन्हें विस्मृत कर दिया जाए। किंतु हमें तो चाहिए था कि एक युवा जीवन के आकस्मिक अवसान पर शोक व्यक्त करते और इस बात पर अफसोस व्यक्त करते कि हमें इतना समय नहीं मिल पाया कि हम उन्हें सहिष्णुता, समावेशन,अहिंसा और सर्व धर्म समभाव जैसे मूल्यों के वास्तविक महत्व से परिचित करा पाते। हमें तो इस बात की कामना करनी थी  कि समाज को घृणा और विभाजन की ओर धकेलने वाली विचारधारा के समर्थन की जो भूल उनसे हुई थी वह कोई अन्य प्रतिभावान नवयुवक दुबारा न करे। किंतु हमने उनके निधन पर हर्ष व्यक्त कर उसी नफरत को मजबूती दी जिसके विरोध का हम दावा करते हैं। 

हम स्वयं को मौलिक और स्वतंत्र पत्रकारिता का पोषक तभी कह सकते हैं जब हम घृणा की भाषा और विभाजनकारी मुद्दों का बहिष्कार करें। चाहे वह सरकारी दमन हो या उग्र दक्षिणपंथी शक्तियों की हिंसा हो या सूचना एवं विचारधारा के  प्रचार-प्रसार से जुड़े व्यक्तियों के आक्रमण हों, इन सभी के दो उद्देश्य होते हैं- पहला प्रकट उद्देश्य होता है कि भय उत्पन्न कर सत्यान्वेषण और जनपक्षधर पत्रकारिता को बाधित किया जाए किंतु दूसरा अप्रकट उद्देश्य अहिंसा,सहिष्णुता और संयम की राह से भटकाकर हिंसा और असहिष्णुता की ओर ले जाने का होता है। जब यह दूसरा उद्देश्य कामयाब हो जाता है तब हमारा विरोध भी इन नव फ़ासिस्ट शक्तियों को मजबूती देता है।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)


03-May-2021 1:43 PM 34

-बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक 
पांच अहिंदीभाषी राज्यों में हुए ये चुनाव थे तो प्रांतीय लेकिन इन्हें राष्ट्रीय स्वरुप देने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को है। भाजपा के जितने नेता अकेले पश्चिम बंगाल में डटे रहे, आज तक किसी भी प्रांतीय चुनाव में राष्ट्रीय स्तर के इतने नेता कभी नहीं डटे। इसलिए अब इसके नतीजों का असर भी राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना अवश्यम्भावी है। ममता बेनर्जी अब नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएंगी। अभी तक मोदी की टक्कर का एक भी नेता विपक्ष में उभर नहीं पाया था। दो पार्टियां अखिल भारतीय हैं। एक कांग्रेस और दूसरी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी। कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ केरल में है। वह मलयाली उपराष्ट्रवाद का ज्यादा, मार्क्सवाद का कम प्रतिनिधित्व करती है। वह मोदी को कोई चुनौती नहीं दे सकती। हाँ, कांग्रेस जरुर एक अखिल भारतीय पार्टी है और इन पांच राज्यों के चुनाव में बंगाल के अलावा सर्वत्र वह अस्तित्ववान है लेकिन उसके पास प्रांतीय नेता तो हैं लेकिन उसके पास ऐसे अखिल भारतीय नेता का अभाव है, जो मोदी को चुनौती दे सके। कांग्रेस में अनेक अत्यंत अनुभवी और दक्ष नेता हैं, जो मोदी पर भारी पड़ सकते हैं लेकिन कांग्रेस का माँ-बेटा नेतृत्व उन्हें आगे नहीं आने देगा।

आज भी देश के लगभग हर जिले में कांग्रेस का संगठन है लेकिन उसकी हैसियत अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की एक शाखा से ज्यादा नहीं है। ऐसी हालत में प. बंगाल के चुनाव ने ममता बेनर्जी को लाकर मोदी की टक्कर में खड़ा कर दिया है। ममता के समर्थन में कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सामने नहीं आए और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के विरोध में अपने उम्मीदवार भी खड़े किए थे लेकिन देश की लगभग सभी प्रांतीय पार्टियों के नेता ममता को जिताने के लिए बंगाल गए थे। हालांकि ममता नंदीग्राम में खुद हार गई हैं लेकिन पूरे बंगाल में वे विजय पताका फहरा रही हैं। अब ममता को अखिल भारतीय नेता मानने में उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। हो सकता है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां भी इस उदीयमान गठबंधन में शामिल हो जाएं। फिर भी हो सकता है कि इस गठबंधन को किसी जयप्रकाश नारायण की जरुरत हो, हालांकि नरेंद्र मोदी की हैसियत इंदिरा गांधी-जैसी नहीं है लेकिन यह भी सत्य है कि आज नरेंद्र मोदी की हालत वैसी भी नहीं हुई है, जैसी कि 1977 में इंदिरा गांधी की हो गई थी। कोरोना की बदहाली ने केंद्र सरकार के प्रति व्यापक असंतोष जरुर पैदा कर दिया है लेकिन देश की जनता मोदी के मुकाबले ममता को स्वीकार तभी करेगी, जबकि ममता बंगाली उपराष्ट्रवाद से ऊपर उठेंगी और वे देश के अन्य खुर्राट नेताओं के साथ ताल-मेल बिठाने की कला में प्रवीणता हासिल कर लेंगी। (नया इंडिया की अनुमति से)


03-May-2021 1:40 PM 34

-गोपाल राठी 
तस्वीर में महिला सीधी सादी लग रही है न। लगती है न एक साधारण सी महिला। रसायन शास्त्र में स्नातक। वर्ष 2004 तक एक हाईस्कूल में पढ़ाया। फिर राजनीति में शामिल। वर्तमान में, केरल की वामपंथी सरकार की स्वास्थ्य मंत्री - के.के.शैलजा। पूरे केरल में इन्हें टीचर अम्मा के नाम से जाना जाता है, शैलजा टीचर। 2018 के निपाह वायरस को संक्रमण से होने वाले मौत के जुलूस को मजबूती से रोक दिया था। फिर इसके ठीक दो साल बाद, जिस तरह कोरोना का मुकाबला कर केरल मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल करवाई - वह निश्चित ही इतिहास में दर्ज होगा।

इस कोरोना काल में वे रात 12 बजे कार्यालय छोड़ती है। सभी अधिकारियों को रवाना कर फिर खुद प्रस्थान करती है। घर पर भी रात 2.30 - 3.00 बजे तक फाइलें देखती -निपटाती है। फिर सुबह सात बजे ऑफिस पहुंच जाती है। उनका व्यक्तिगत मोबाइल नंबर न जाने कितने ही आम लोगों को पता है। निपाह के दौरान ही, केरल के राज्य भर में चमगादड़ों का आतंक पैदा हुआ। अब कोरोना के दौरान बिल्ली तक को देख तो आस पड़ोस के लोग घबरा कर फोन करने लगें। उन्होंने स्वयं फोन उठाकर सभी को आश्वस्त किया। 

किसी को साथ में लेने के बजाय अकेले ही तमाम अस्पतालों में घूमती है। बस चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान। प्रचार की रौशनी से सैकड़ों कदम दूर। एक नियम के तौर पर, रोजाना केवल एक बार पत्रकार वार्ता बुलाती हैं। छिपाने के लिए नहीं, बल्कि जानकारी देने के लिए। श्रेय भी नहीं लेना चाहती। बस कहती है, “I don’t do anything special. I have a degree in chemistry so I have some knowledge about molecules and medicines. Otherwise, it is always a team effort" (मैं कुछ भी विशेष नही कर रही हूं। मेरे पास रसायन शास्त्र की डिग्री है, इसलिए मुझे अणुओं और दवाओं के बारे में कुछ जानकारी है। अन्यथा, यह हमेशा एक टीम प्रयास है।)

ब्रिटेन की प्रतिष्ठित मैगजीन ने केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा को 'टॉप थिंकर 2020' चुना, कोरोना काल में उनके प्रयासों से पाया ये सम्मान मिला
इससे पहले भी शैलजा द्वारा कोरोना को रोकने की दिशा में किए गए प्रयासों को तारीफ मिली है।शैलजा ने कोरोना अभियान में आम लोगों का साथ देकर इस बीमारी को मिटाने का हर संभव प्रयास किया।

ब्रिटिश पत्रिका प्रोस्पेक्ट ने पूरी दुनिया में केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा को 'टॉप थिंकर 2020' के रूप में नामित किया है। इस मैगजीन में दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और लेखकों को पाठकों द्वारा मतदान के आधार पर और विशेषज्ञों व संपादकों की पैनल की राय के आधार पर चुना गया है।


प्रोस्पेक्ट की लिस्ट में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न को नंबर 2 पर रखा गया है। शैलजा का नाम कोरोना काल के दौरान राज्य में समय रहते उचित कदम उठाने के लिए शामिल किया गया।

पत्रिका के अनुसार, इस लिस्ट को अंतिम रूप देने के लिए 20,000 से अधिक वोट डाले गए। केके शैलजा इस लिस्ट में एकमात्र भारतीय महिला हैं। इस मैगजीन ने शैलजा की प्रशंसा करते हुए लिखा, '' साल 2018 में भी शैलजा ने केरल में फैले निपाह वायरस का डटकर सामना किया था''।


ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार 'द गार्जियन' ने भी कोरोना काल में शैलजा द्वारा किए गए कामों की प्रशंसा की थी।

संयुक्त राष्ट्र ने COVID-19 महामारी की सीमाओं पर काम कर रहे लोक सेवकों को सम्मानित करने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी बात रखने के लिए शैलजा को आमंत्रित किया था। 

यह भारत के एक प्रांत केरल की स्वास्थ्य मंत्री की कहानी है जो अभी हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में वामपंथी मोर्चे की उम्मीदवार के रूप में 61000 मतों से विजयी हुई है l 
कॉमरेड शैलजा टीचर अम्मा को बहुत-बहुत बधाई


02-May-2021 5:55 PM 55

-कृष्ण कांत

मुसलमान कोरोना फैलाते हैं, ये घृणा अभियान था। मुसलमान इस देश के सुख-दुख में हिस्सेदार हैं, ये अंतिम सच है।

सूबा महाराष्ट्र। जिला यवतमाल। नाम अब्दुल जब्बार, शेख अहमद, शेख अलीम और आरिफ खान। ये चारों लडक़े इस कोरोना काल में यवतमाल के एक श्मशान घाट में रात-दिन एक करके लोगों को मुखाग्नि देते हैं। ये चारों मुस्लिम लडक़े अब तक 800 से ज्यादा हिंदुओं का दाह-संस्कार कर चुके हैं। यही नहीं, वे हिंदुओं के अंतिम संस्कार में हिंदू रीति-रिवाजों का भी ख्याल रखते हैं।

ऐसे समय में जब तमाम लोग अपने परिजनों तक का अंतिम संस्कार करने से दूर भाग रहे हैं, ये चारों नौजवान पूरी शिद्दत से इस सामाजिक कार्य में जुटे हैं। इनको पता है कि श्मशान भूमि में आने वाली ज्यादातर लाशें कोरोना संक्रमित हैं, लेकिन वे अपनी जान की परवाह किये बगैर रात-दिन अपना काम कर रहे हैं।

मेरठ में सुषमा अग्रवाल की अचानक तबियत बिगड़ी और मौत हो गई। उनके पति अमित अग्रवाल किसी काम से बनारस गए थे। बेटा और बेटी दिल्ली में रहते हैं।  मौत के वक्त घर में सुषमा की एक भांजी और एक नौकर ही मौजूद थे। मौत की खबर सुनने के बाद भी शहर में रहने वाले रिश्तेदार, करीबी लोग और पड़ोसियों में से कोई नहीं पहुंचा।

मेरठ के रहने वाले तहसीन अंसारी को सुषमा की मौत की खबर मिली। तहसीन अंसारी ने रात को एक बजे फोन पर सुषमा के पति से बात की तो उन्होंने बताया कि वो सुबह तक मेरठ पहुंच जाएंगे। सुबह अमित अग्रवाल और उनका बेटा मेरठ पहुंचे। लेकिन वहां सुषमा की अर्थी को कंधा देने के लिए सगे-संबंधियों, पड़ोसियों में से कोई भी नहीं पहुंचा। 

सुबह साढ़े ग्यारह बजे तक इंतजार होता रहा, लेकिन कोई नहीं आया तो तहसीन अपने कुछ साथियों के साथ वहां पहुंचे। मुस्लिम समाज से ही आसपास के कुछ और लोग आगे आए और यही लोग अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट तक ले गए। उन्होंने हिंदू परंपरा के मुताबिक ‘राम नाम सत्य है’ बोलते हुए सुषमा की अंतिम यात्रा संपन्न कराई। इधर कुछ सालों से नेता ‘नेशन फस्र्ट’ का नारा लगाकर समाज को बांट रहे थे। लोग पार्टियों के लिए या नेताओं के कहने पर आपस में खूब लड़ रहे थे। महामारी ने हम सबको एकजुट रहने का सबक दे दिया। अब हिंदुओं और मुसलमानों का खून एक-दूसरे की रंगों में उतरकर हम सबकी जान बचा रहा है।

दुआएं कीजिए कि ये प्रेमभाव बना रहे।


02-May-2021 5:48 PM 32

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

विदेशों से मिल रही जबर्दस्त मदद के बावजूद कोरोना मरीजों का जो हाल भारत में हो रहा है, उसने सारे देश को ऐसे हिलाकर रख दिया है, जैसे कि किसी युद्ध ने भी नहीं हिलाया था। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि हजारों ऑक्सीजन-यंत्र और हजारों टन ऑक्सीजन के जहाजों से भारत पहुंचने के बाद भी कई अस्पतालों में मरीज क्यों मर रहे हैं? उन्हें ऑक्सीजन क्यों नहीं मिल रही है?

जो लापरवाही हमने बंगाल में चुनाव के दौरान देखी और कुंभ के मेले ने जैसे कोरोना को गांव-गांव तक पहुंचा दिया, उसे हम अभी भूल भी जाएं तो कम से कम इतना इंतजाम तो अभी तक हो जाना चाहिए था कि करोड़ों लोगों को टीका लग जाता। लेकिन अभी तक मुश्किल से तीन करोड़ लोगों को पूरे दो टीके लगे हैं। उन्हें भी 20-25 दिन बाद पूर्ण सुरक्षित माना जाएगा।

यदि डॉक्टरों और नर्सों की कमी है तो देश की फौज और पुलिस कब काम आएगी ? यदि हमारे 20 लाख फौजी और पुलिस के जवान भिड़ा दिए जाएं तो वे कोरोना मरीजों को क्यों नहीं सम्हाल सकते हैं ? फौज के पास तो अपने अस्पतालों और डाक्टरों की भरमार है। ऑक्सीजन सिलेंडरों को ढोने के लिए उसके पास क्या जहाजों और वाहनों की कमी है ? फौज का इंजीनियरी विभाग इतना दक्ष है कि वह चुटकियों में सैकड़ों अस्पताल खड़े कर सकता है।

दिल्ली में पांच-हजार पंलगों के तात्कालिक अस्पताल का कितना प्रचार किया गया लेकिन खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। अभी तक वहां मुश्किल से दो सौ-ढाई सौ लोगों का ही इंतजाम हो पाया है। लोग अस्पताल के बाहर कारों, फुटपाथों और बरामदों में पड़े दम तोड़ रहे हैं। अस्पतालों के बाहर बोर्डों पर लिखा हुआ है कि सब वयस्कों को टीके नहीं लग पाएंगे, क्योंकि हैं ही नहीं। सर्वोच्च न्यायालय और विविध उच्च न्यायालय सरकारों के कान जमकर खींच रहे हैं लेकिन उनका कोई ठोस असर होता दिखाई नहीं पड़ता।

केंद्र सरकार ने अभी तक विशेषज्ञों और जिम्मेदार अधिकारियों की कोई कमेटी भी नहीं बनाई है जो  लोगों की समस्याओं को सुलझा सके और संकट में फंसे लोगों को राहत पहुंचा सके।

अकेला स्वास्थ्य मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय इस अपूर्व संकट को कैसे झेल सकता है? यह युद्ध से भी बड़ा संकट है। यह अपूर्व आफतकाल है। देश के विरोधी नेता अपनी आदतन बयानबाजी बंद करें और सरकार उनसे भी निरंतर परामर्श और सहयोग ले, यह जरुरी है।

हम जब अपने प्रतिद्वंदी चीन से हजारों वेंटिलेटर और आक्सीजन जनरेटर ले रहे हैं तो मेरी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण आपस में तकरार क्यों कर रहे हैं ? जो गैर-सरकारी स्वयंसेवी संगठन हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन, साधुओं के अखाड़े तथा सारे गुरुद्वारों, गिरजों और मस्जिदों से जुड़ी संस्थाओं को भी सक्रिय किया जाए ताकि अगले एक हफ्ते में इस महामारी पर काबू कर लिया जाए। देश के हर नागरिक को मुफ्त टीका लगे और हर मरीज का इलाज हो, यह बहुत जरुरी है।

(नया इंडिया की अनुमति से)


02-May-2021 9:22 AM 19

-कनक तिवारी

भारत रत्न सत्यजीत राय 2 मई 1921 को पैदा हुए थे। यह मेरे लिए सुखद संयोग रहा कि 2 मई 1971 को उनके 50 वर्ष पूरे होने पर टाइम्स आॅफ इंडिया समूह की अग्रणी फिल्म पत्रिका ‘माधुरी‘ के संपादक अरविन्द कुमार ने सत्यजीत राय पर मेरी रचना को अनेक चित्रों के साथ केन्द्रीय लेख के रूप में छापा था। अरविन्द जी ने मुझसे कहा था कि यह लेख मैं किसी को नहीं दूं। बस यही एक रचना मैंने माधुरी को दी थी।......वर्षों बाद कभी संभवतः ‘सद्गति‘ फिल्म की शूटिंग को लेकर सत्यजीत राय रायपुर आए थे। तब मैंने संभालकर रखा वह अंक उनको दिया था। मुझे ख्याल पड़ता है कि सर्किट हाउस में हबीब तनवीर भी उनके साथ थे। बेहद गंभीर मुखमुद्रा के सत्यजीत राय के चेहरे पर लेख को देखकर कोई मुस्कराहट नहीं छाई। अलबत्ता अंगरेजी में उन्होंने कहा ‘धन्यवाद, यह मुझे मिल गया था।‘ आज भारत           रत्न सत्यजीत राय 100 वर्ष के हो गए। बेहद खराब चल रहे समय में सोचा इस महान शख्सियत की अपनी लिपिबद्ध याद आपके साथ साझा करता चलूं। 

सेल्युलायड का कवि

सेल्युलायड का कवि 

प्रख्यात फिल्म निर्माता चिदानन्द दास गुप्ता ने सत्यजित राय को ‘एक अपवाद, एक घटना तथा कोणार्क के मन्दिर और बनारस के वस्त्रोद्योग की तरह भारत कि लिये गौरव की वस्तु‘ की संज्ञा दी थी। सत्यजित की फिल्मों में एक साथ गहरी स्थानिकता और विस्तीर्ण वैश्विकता रही है। बंगाल की धरती की महक, इठलाती नदियां, सादा ग्राम्य जीवन, रूमानी क्रांतिकारिता, रहस्यमयता और कलात्मक चेतना वाली सत्यजित राय की फिल्में बंग धरती की धड़कनें है। उनमें कविता है। विस्तृत औपन्यासिक कैनवस है। जिन्दगी के टूटते मूल्यों की असलियत का अहसास है। टैगोर के बाद सत्यजित राय ने ‘बांग्ला-जीवन‘ को सारे विश्व की सहानुभूति और संवेदना का केन्द्र बना दिया। उनके अनुसार जीवन के पुराने और नये मूल्यों का सतत संघर्ष उनकी फिल्मों का केन्द्रीय तत्व रहा है। सत्यजित की फिल्में केवल सतही दृष्टिकोण से परखी नहीं जा सकतीं। संवाद, प्रतीक-विधान, चरित्र कथा-वस्तु के अलावा मुख्य आग्रह पृष्ठभूमि अथवा वातावरण के प्रस्तुतिकरण में है। सत्यजित राय ने ही पहली बार प्रचलित फार्मूलों का बहिष्कार कर नवयथार्थवाद की नींव डाली और अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि के नक्षे पर हिन्दुस्तान को सम्मानजनक जगह दिलाई।

2 मई 1921 को बंगाल के प्रसिद्ध लेखक, चित्रकार और फोटोग्राफर सुकुमार राय के घर जन्मे सत्यजित राय में प्रतिभा का अंकुरण गुरुदेव टैगोर ने शांति निकेतन में किया। कोलकाता की एक व्यावसायिक विज्ञापन एजेन्सी ने कलाकार के रूप में युवा सत्यजित को 1950 में लन्दन जाने का मौका दिया। वहां उसने जी भर कर फिल्में देखीं। उनमें गहरे डूब कर पाया कलाकार का वह सौन्दर्य-बोध जिसके लिये वह भारत में छटपटाता रहा था। विश्वविख्यात इतालवी निर्देशक विक्टोरिया डी सिका की ‘बाइसिकल थीफ‘ ने नौजवान सत्यजित में आत्मविश्वास का संचार किया। कोलकाता में ही उसने विभूति बाबू की ‘पथेर पांचाली‘ पढ़ रखी थी। अब इसको फिल्माने की इच्छा ने एक आब्शेसन का रूप लिया। फिल्म उद्योग के लखपति निर्माताओं के रहते हुए विभूति बाबू के उत्तराधिकारियों ने केवल छः हजार रूपयों में उपन्यास की पट कथा के अधिकार सत्यजित राय को बेच दिये। यह उसके गहरे अध्यवसाय, तीखी कला संवेदनशीलता और कथाकार के मर्म की सही समझ का पहला पुरस्कार था।

राय ने ‘पथेर पंचाली‘ को बनाने का बीड़ा उठाया। प्रथमेश चन्द्र बरुआ के बाद निष्चेष्टता और संषय का एक विराम बंगाल की फिल्म-निर्माण कला पर छा गया था। तब आया मानवीय गरिमा के गीत गाता सत्यजित राय। उसने एक नहीं चार चार फिल्में बना कर बुलंदियों के आसमान को छू लिया। फिल्मों के जर्जर ढांचे को संवदेनाओं और मनोद्वेगों से पगी राय की ‘पथेर पांचाली‘ ने जोरदार टक्कर दी। चरमरा कर वह ढांचा टूट गया। ‘पथेर पांचाली‘ फिल्मी दुनिया का भूचाल या तूफान है। उसने पारंपरिक मूल्यों से जकड़े अप्रबुद्ध दर्शक को बौद्धिकता की कड़वी घुट्टी पीने कहा। 

इटली और अमेरिका के नव यथार्थवादी निर्देशकों से प्रभावित सत्यजित राय ने ‘पथेर पांचाली‘ में प्राकृतिक परिवेश और शौकिया कलाकारों का उपयोग किया। फिल्म को बनाने उसने अपनी पुस्तकें, रेकार्ड आदि बेच कर किसी तरह बीस हजार रूपये इकठ्ठे किये। पैसों के अभाव में निर्माण कार्य ठप्प भी हो गया था। अमेरिकी निर्देशक जान हस्टन, न्यूयार्क माडर्न आर्ट म्यूजियम के मनरो व्हीलर तथा पश्चिमी बंगाल प्रशासन के उत्साहवर्द्धन और सहयोेग से फिल्म किसी तरह पूरी हुई। प्रख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर ने संगीत का दायित्व पूरा कर साबित किया कि जहां मानवीय कार्य व्यापार है, वहीं उत्कृष्ट कविता है। न्यूयार्क माडर्न आर्ट म्यूजियम में इस फिल्म का निजी शो जब एडवर्ड हैरिसन जैसी फिल्मी हस्ती ने देखा तो वह दंग रह गया। उसने न केवल ‘पथेर पांचाली‘ वरन सत्यजित की सभी आगामी फिल्मों के वितरण के अधिकार खरीद लिये। केन्स फिल्म महोत्सव में निर्णायकों ने ‘पथेर पांचाली‘ को सर्वोत्तम मानवीय दस्तावेज की संज्ञा देकर पुरस्कृत किया। यह बात अलग है कि मशहूर फ्रांसीसी फिल्म समीक्षक आन्द्रे बेजिन यदि अपनी कलम के बल पर ‘पथेर पांचाली‘ का तीसरी बार प्रदर्शन आयोजित नहीं करा पाता तो सत्यजित के जीवन की यह उपलब्धि गुमनामी के अंधेरे में खो जाती।
केन्स फिल्म महोत्सव ने सत्यजित राय को दुनिया के चोटी के निर्देशकों के साथ ला खड़ा किया। उसकी फिल्में अपराजितो (1957), जलसाघर (1958), पारस पाथर (1958), अपुर संसार (1959), देवी (1961) तीन कन्या (1961), रवीन्द्र नाथ टैगोर (1961), कंचनजंघा (1962), और अभिजान (1962) दुनिया की मषहूर कलात्मक और प्रयोगात्मक फिल्मों के रूप में सराही गई। 1957 में वेनिस में ‘अपराजितो‘ ने ग्रैंड प्रिक्स पुरस्कार जीत कर भारत को संसार के सांस्कृतिक नक्षे में सम्मानजनक जगह दिला दी। अकेले ‘अपु-त्रयी‘ ने सोलह अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतेे हैं। 

महान बांग्ला साहित्यकारों में सत्यजित रवीन्द्रनाथ ठाकुर से विशेष प्रभावित रहे हैं। शरत चंद्र ने उन्हें अधिक प्रभावित नहीं किया। रवीन्द्र की कृति ‘नष्ट नीड़‘ पर आधारित फिल्म ‘चारुलता‘ उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षो के उच्च-मध्यवर्गीय बंगाली जीवन की गाथा है। पतिव्रत धर्म की आड़ में भी एक  उपेक्षित विवाहिता नारी और पर-पुरुष के मांसल प्रणय की यह कहानी लिख कर स्वयं टैगोर ने अपने युग में क्रांतिकारी साहस का परिचय दिया था। पूरी फिल्म आश्चर्यजनक ढंग से उन्नीसवीं सदी की सांझ को अपने आयामों में समाए चलती है। वातावरण में महज सच्चाई है- कटु और तिक्त नाटकीयता कहीं कुछ नहीं। माधवी मुखर्जी (चारुलता) ने इसमें अपने जीवन का लगभग श्रेष्ठतम अभिनय किया है। समीक्षकों के अनुसार इसमें सत्यजित का निर्देशन अपनी पूर्व ऊँचाइयों पर स्थिर नहीं रह पाया। सत्यजित इसे अपनी श्रेष्ठतम फिल्म करार देते हैं। वैसे समीक्षक केनेथ टाइनन को फिल्म के प्रणय दृष्य मांसल-यौन संबंधों से रहित होने के कारण यथार्थ जीवन की अनुकृति नहीं मालूम पड़ते। 

प्रेमेन्द्र मित्र और परशुराम की दो कहानियों को मिला कर बनाई फिल्म ‘कापुरुष ओ महापुरुष‘ कृतिकार की उपलब्धियों का कीर्तिध्वज तो नहीं कहा जा सकता लेकिन केवल ‘कापुरुष‘ सत्यजित राय की कला के सर्वश्रेष्ठ अंशों में है। काव्यात्मक अंतर्दृष्टि और अद्वितीय तकनीक से राय ने फिल्म में लिरिकल यथार्थवाद पर अपनी पकड़ का परिचय दिया। कथानक की गति सत्यजित के स्वाभाविक शैथिल्य से कहीं ज्यादा तेज है। सेटिंग में स्वप्नशीलता है, फिर भी यथार्थवादी है। सिने पटकथा लेखक अभिताभ राय, चाय बागानों के मालिक विमल गुप्ता, उनकी पत्नी और अभिताभ राय की भूतपूर्व प्रेमिका करुणा के चरित्र त्रिकोण में फंसी कहानी जिन्दगी के बहुत करीब है। ‘महापुरुष‘ एक अर्थ में पूर्व-कथा की प्रति-पराकाष्ठा है। विरंची बाबा की धूर्तता के कथा-तत्व से सत्यजित राय ने औसत निर्देशकों से कहीं ज्यादा सच्ची फिल्म निर्मित की है। फिर भी सत्यजित राय के सन्दर्भ में वह एक अनमने, अधूरे प्रयास का प्रतिफल मालूम पड़ती है। ‘महापुरुष‘ में कलात्मक आग्रह कुछ दब सा गया। 

हावड़ा से दिल्ली जाने वाली डीलक्स ट्रेन में घटी कहानी का दूसरा नाम है ‘नायक।‘ आधुनिक जीवन की विडंबना के प्रतीक पात्रों की स्वार्थपरक, व्यवसायी प्रवृत्तियों को सत्यजित राय ने अपनी फिल्म-कथा में छोटी छोटी घटनाओें के संग्रहण से उभारा है। ऐसा करने में कैमरा-कोणों की और प्रयोजन पूर्व लिये गये कुछ विशेष ‘शाटों‘ की मदद ली है। आधुनिक जीवन की विसंगतियों के ये प्रतिनिधि पात्र कई बार राय की अतिरिक्त सतर्कता के कारण प्रभावरहित या ज्यादा कलात्मक हो जाते हैं। कौंध या बिम्ब की तरह उभरते है, लेकिन कोई समग्र प्रभाव नहीं पड़ता। 

‘प्रतिद्वंद्वी‘ में सत्यजित ने समकालीन कलकत्ता की भागती दौड़ती तेज जिन्दगी के बीच बहुत चीजों को पकड़ा है। एक मध्यवर्गीय परिवार की आशंकाओं, चुनौतियों और समस्याओं के सन्दर्भ का कुशल फिल्मांकन औसत सर्वहारा जिन्दगी में भी कविता ढूंढ़ लेता है। बाल्यकाल के प्रति सत्यजित की संवेदनशीलता स्मृत्यवर्तन (फ्लैश बैक) के बार बार कौंधने से साबित हो जाती है। औसत और साधारण को अर्थवान बनाना औसत और साधारण आदमी का काम नहीं है। महानगर की भोगी जिन्दगी की तल्ख हकीकत का अहसास इस फिल्म की असली उपलब्धि है। 

‘अरण्येर दिनरात्रि‘ और ‘गोपी गायन बाघा बायन‘ को आलोचना सहनी पड़ी। सत्यजित पर पिटे-पिटाए हल्के-फुल्के, व्यावसायिक नुस्खे अपनाने का आरोप लगा। ‘पारस पाथर‘ जैसी फिल्म सत्यजित को नहीं बनाना था। यही गलती ‘कांचनजंघा‘ में भी हुई। नामी कलाकारों से लैस ‘चिड़ियाखाना‘ ने भी सत्यजित के निर्देशन को नये अर्थ और प्रतिमान प्रदान नहीं किये। उन्होंने खुद माना कि ‘चिड़ियाखाना मेरी एक घटिया फिल्म है।‘

‘‘क्या सत्यजित राय की संभावनाएं चुक रही थीं?‘ एक विवादास्पद लेख में प्रभात मुखर्जी ने ऐसे संकेत उभारने की कोशिश की है। कला के स्खलन की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा है कि सत्यजित में कलात्मक चेतना के प्रति सजगता का क्रमिक लोप होता गया है और उसकी जगह प्रयोगधर्मिता के आग्रह ने ले ली है। खास ऊँचाई पर जाकर भी सत्यजित पीड़ित मानवता के प्रति अपनी हमदर्दी जतलाते हैं। उनकी व्यवस्था को स्वयं भोगते नहीं लगते। ‘अरण्येर दिनरात्रि‘ में डाकबंगले के चैकीदार की बीमार पत्नी के प्रति नायक (सौमित्र चटर्जी) की उदासीनता पर किये गये व्यंग्य और इसी फिल्म में लाखा को अपने अपमान का बदला लेते हुए देख कर यह आशंका हो रही थी कि राय अपनी ‘खास ऊँचाई‘ से नीचे उतर रहे थे। यथार्थवाद पर पकड़ के बावजूद उनका ‘जीवन‘ से अलगाव होता गया था। सत्यजित राय के लिये शायद ‘मनुष्य‘- उसकी भावनाएं, संवेदनाएं, अनुभूतियां आदि उसके परिवेश से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और अर्थवान हो उठी थी। इस तरह उनमें फिल्म जैसी सशक्त लोक-विधा के प्रतिनिधि होने के बावजूद सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना के प्रति उदासीनता साफ दीख रही थी। ‘महानगर‘ जैसी फिल्में यद्यपि अपवाद हैं। फिर भी बेखबर सत्यजित राय ऊबड़खाबड़पन भरे जन जीवन में कविता की तलाश में एकजुट रहे हैं। 

आरोपों और प्रश्नों की बौछार के बावजूद सत्यजित राय का यष अक्षुण्ण है। वे भारतीय फिल्मों के युग निर्माता के रूप में अमर हैं। उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति भारत की राष्ट्रीय उपलब्धि है। उनकी फिल्मों में बौद्धिकता का संस्पर्श है और मानव-मूल्यों के द्वंद्व का अनोखा प्रतीकात्मक चित्रण भी। उनकी फिल्में बंगाल की, इसलिये भारत की, इसलिये विश्व की मौजूदा मूल्यों से जूझती जिन्दगी का शानदार आईना हैं। सत्यजित राय के बिना भारतीय फिल्म उद्योग का इतिहास असंभव रहेगा।

 


01-May-2021 8:47 PM 43

-रति सक्सेना

कल केरल में चुनाव के नतीजें आ रहे हैं, लेकिन आज भी ठीक 5.30 बजे विजयन पत्रकारों और जनता के सम्मुख है़ सबसे पहले वे बताते है कि आज 35630 लोगों को करोना निकला है़, कुल रोगियों की संख्या अब 146704 हो गई। आज की मृत्यु संख्या 48 है। 320300 लोगों की चिकित्सा चल रही है।

आज मई दिन है, मैं कोविड से जुड़े सभी स्वास्थ्य कर्मचारियों कामगारों का अभिवादन करता हूं, स्वास्थ्य कर्मचारी एक साल से बड़ी विषम स्थिति में काम कर रहे हैं। इसलिए यदि कोई छोटी-मोटी समस्या आती है तो स्वास्थ्य कर्मचारियों का अपमान ना करे़। यह सोचिये कि एक दिन में 500000 रोगियों की देखभाल की जिम्मेवारी उन पर हैं। हमारे समाज को उनकी समस्या भी समझनी चाहिये। भारत में आज एक दिन में 400000 करोना रोगी निकल रहे हैं। केरल में ही आज के दिन 300000 एक्टिव केस है। कल एर्णाकुलम जैसे एक प्रान्त में ही 50000 से ज्यादा की चिकीत्सा हो रही है। कोषिकोड में 31000 से ज्यादा है. यानी कि एक जिले मे ही पचास हजार से अधिक केस चल रहे हैं। हमें सोचना है कि हम कैसे समस्या को समझे। 
  
सरकार में हम आवश्यकता अनुसार सुविधाएं तैयार कर चुके हैं, आइसीयू बेड, आक्सीजन बेड आदि तैयार कर चुके है, लेकिन हमें रोजाना  बिस्तरों की संख्या बढ़ानी पड़ती है। जिनकी अधिक खराब हालत नहीं है, वे घर में भी आइसोलेशन में रहे हैं। जिलों के वार्ड भी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। सभी वार्ड के फोन नम्बर रोगियों के अपने पास रखना है। आरपीटीआर टेस्ट को हमने 15000 से 500 कर दिये तो बहुत सी प्राइवेट लैब ने काम करना बन्द कर दिया, लेकिन उन्हें समझना चाहिये कि इस टेस्ट का खर्चा 240 रुपये मात्र होता है, टेस्ट करने वाले का खर्चा जोड़ कर 500 टैस्ट का दाम रख दिया, आरटीपीसीआर टेस्ट नहीं करेगा, यह नहीं चल सकता है। फिर भी यदि वे मना करे तो शिकायत की जानी चाहिये, समय खराब है, इसलिए सभी को मदद के लिए आगे बढ़ना है, यह कोई लाभ उठाने का मौका नहीं है। आरटीपीसीआर की अलावा महंगे टेस्ट की खबर भी मिल रही है, लेकिन यह समय लाभ उठाने वाला नहीं है। सरकारी लैब में टेस्ट मुफ्त करना पड़ेगा, सरकारी टेस्ट फ्री होता है। 

किसी भी तरह के अराधना गृह के लिए नियम है, पुलिस ख्याल रख रही है, बड़े -बड़े अराधना घर में पचास से ज्यादा लोग नहीं जाने चाहिये, छोटे अराधना घरों में पांच से ज्यादा लोग नहीं जाने चाहिये, इन नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। 

कल वोट गणना है, सभी के लिए नियमों का पालन करना जरूरी है, वोट केन्द्र में किसी तरह की भीड़ नहीं होनी चाहिये. जो जीते तब भी जयघोष न करे। इसके लिए मीडिया को भी सहायता करनी चाहिये। लोगों को खुशी मनाने की इच्छा तो होगी, लेकिन आज की स्थिति को देखते हुए लोगों को अपने को वश में रखना पड़ेगा। जीते हुए सदस्यों को धन्यवाद देने की कोशिश भी बाद के लिए रख लेनी चाहिये। आप सोशल मीडिया का प्रयोग कर लें, सोशल मीडिया के द्वारा खुशी जाहिर कर सकते हैं। आज के समय धन्यवाद देने का मतलब समझिये, मीडिया का सहारा लीजिये, सोशल मीडिया का उपयोग कीजिये, कल ही मास्क के बिना 21733 लोग के विरोध केस रजिस्ट्रेशन, नियम ना पालन 11210 खिलाफ चालान, और 650750 पिछले दिनों चालान के रूप में ही राज्य को मिला। 

हरेक जिलों को आक्सीजन भेज दी गईं हैं, पंचायत के स्वास्थ्य केन्द्रों में 24 घण्टे सेवा चलेगी। 

जाग्रता एप रजिस्ट्रेशन अनेक हुए हैं। ग्राम पंचायते बेहतरीन काम कर रही हैं. ग्राम पंचायतों के साथ पुलिस का भी सहयोग मिलेगा। 

वैक्सीनेशन सेन्टर रोग बढ़ाने का केन्द्र बनता जा रहा है, इसलिए अब दूसरी डोज के लिए केन्द्र मेनेजर खुद फोन कर के आमन्त्रित करेगा। अट्ठारह से ऊपर का वैक्सीनेशन के लिए देरी होगी, 94 करोड़ अधिक लोगों को वैक्सीनेशन लगेगी। केरल में 30 मई तक 45 से ऊपर लोगों को लग जाने का निर्णय लिया, लेकिन हमें उसके लिए जितनी वैक्सीनेशन मिलनी थी, उसका पचास प्रतिशत भी नहीं मिला है। 

केन्द्र सरकार की वैक्सीनेशन में मदद चाहिये. वैक्सीनेशन कम्पनियों को सहायता करना है, लेकिन अभी समस्या बनी हुई है। 

आप लोग मास्क पहनने पर ध्यान दीजिये, N 95 उपयोग में लाइये, या फिर सर्जीकल मास्क के साथ कपड़े के मास्क को प्रयोग में लाइये। 

सुना है कि लोग घरों में आक्सीजन रख रहे है, कृपया ये बन्द करें। व्हाट्स अप मेसेज को देख कर लोग गलत काम कर रहे हैं। 

हम आप लोगों की सुरक्षा के तत्पर हैं.
इसके बाद में उन्होंने दो लाख से दो हजार तक के सरकार को दिए चन्दे का ब्यौरा दिया, हरेक का नाम लेकर। 

बाद में पत्रकारों ने सवाल जवाब किये, जो लगभग वैक्सीनेशन को लेकर थे, जिन्हे वे स्पष्ट करते रहे। बाद में एक पत्रकार ने कहा कि सुना है कि लेफ्ट जीतने वाली है, क्या आप मीडिया से बात चीत आखिरी बार कर रहे हैं, विजयन ने कहा, नहीं, मैं कल भी बोलूंगा, परसों क्या होगा, यह कल ही पता चलेगा। 

इस तरह उन्होंने मुस्कुरा कर मिटिंग भंग कर दी।

सवाल, क्या इतनी स्पष्टता और ईमानदारी से कोई अन्य नेता बात कर रहा है। 


01-May-2021 5:14 PM 28

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

टी.वी. एंकर रोहित सरदाना के महाप्रयाण की खबर ने तो अभी-अभी गहरा धक्का पहुंचाया है लेकिन मेरे पास उनकी ही उम्र के लगभग आधा दर्जनों लोगों की खबरें पिछले दो हफ्तों में आ चुकी हैं। ये वे लोग हैं, जिन्हें मैंने गोद में खिलाया है या जो कभी मेरे छात्र रहे हैं या जिनके माता-पिता मेरे घनिष्ट मित्र रहे हैं। कई बुजुर्ग लोग भी जा चुके हैं। आपको भी अपने आत्मीय लोगों के बारे में ऐसी दुखद खबरें मिल रही होंगी।

दूसरे शब्दों में सारा देश ही गमगीन हो रहा है। कौन होगा, जिसे ऐसी दुखद खबरें नहीं मिल रही होंगी। यह इतना विचित्र समय है, जब दिवंगत व्यक्ति के परिवार के लोग ही आपसे आग्रह करते हैं कि आप दाह-संस्कार में उपस्थित न हों। मैंने कुछ ऐसे परिवार भी देखे हैं, जिनका मुखिया मरणासन्न है, और उस परिवार के जवान बेटे बीमारी का बहाना बनाकर घर में छिपे बैठे हैं। वे अपने बाप का हाल भी सीधे नहीं जानना चाहते। वे उनके मित्रों से अपने बाप का हाल पूछते रहते हैं।

लेकिन कुछ मित्र ऐसे भी देखे गए हैं, जो अपनी जान हथेली पर रखकर अपने मित्रों को अस्पताल पहुंचाते हैं और उनकी पूरी देखभाल भी कर रहे हैं। अनेक समाजसेवी सज्जन ऐसे भी हैं, जो अनजान मरीजों को भी अस्पताल पहुंचाने की हिम्मत कर रहे हैं, मुफ्त ऑक्सीजन बांट रहे हैं, मरीजों के निर्धन परिजनों को वे भोजन करवा रहे हैं, अपने प्रिय मित्र की जान बचाने के लिए हजार मील कार चलाकर ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचा रहे हैं, अपने रिश्तेदारों और मित्रों के इलाज के लिए सैकड़ों लोगों से नित्य संपर्क कर रहे हैं, अपनी बचत के पैसे खर्च करके अपने परिचितों को काढ़ा और आयुर्वेदिक औषधियां बांट रहे हैं।

इस संकट की अवधि में मनुष्य के दोनों रूप प्रकट हो रहे हैं, देव का भी और दानव का भी! उनसे नीच दानव कौन हो सकता है, जो इस संकट काल में भी ऑक्सीजन सिलेंडर 80-80 हजार और रेमडेसवीर का इंजेक्शन सवा-सवा लाख रु. में बेच रहे हैं।

इन नरपशुओं को, दानवों को, राक्षसों को सरकारें सिर्फ गिरफ्तार कर रही है, फांसी पर नहीं लटका रही हैं। वे जेल में पड़े-पड़े सरकारी रोटियां तोड़ते रहेंगे और सुरक्षित रहेंगे जबकि इन कालाबाजारियों की वजह से सैकड़ों लोग मौत के घाट रोज़ उतर रहे हैं। यदि देश के 5-10 शहरों में भी इन कालाबाजारी राक्षसों को लटका दिया जाए तो देश में अब दवाइयों और ऑक्सीजन की कमी नहीं होगी। (नया इंडिया की अनुमति से)


Previous123456789...8283Next