विचार / लेख

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Date : 11-Nov-2019

रेहान फजल
भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का रविवार रात साढ़े नौ बजे चेन्नई में अपने आवास पर 86 साल की उम्र में निधन हो गया। 1955 बैच के आईएएस अधिकारी रहे टीएन शेषन 12 दिसंबर 1990 को भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे। उन्हें देश में व्यापक चुनाव सुधार करवाने का श्रेय दिया जाता है।
बीते दशकों में टीएन शेषन से ज़्यादा नाम शायद ही किसी नौकरशाह ने कमाया है। 90 के दशक में तो भारत में एक मज़ाक प्रचलित था कि भारतीय राजनेता सिफऱ् दो चीज़ों से डरते हैं।
एक ख़ुदा और दूसरे टी एन शेषन से और ज़रूरी नहीं कि उसी क्रम में! शेषन के आने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त एक आज्ञाकारी नौकरशाह होता था जो वही करता था जो उस समय की सरकार चाहती थी। शेषन भी एक अच्छे प्रबंधक की छवि के साथ भारतीय अफ़सरशाही के सर्वोच्च पद कैबिनेट सचिव तक पहुंचे थे। उनकी प्रसिद्धि का कारण ही यही था कि उन्होंने जिस मंत्रालय में काम किया उस मंत्री की छवि अपने आप ही सुधर गई। लेकिन 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद इन्हीं शेषन ने अपने मंत्रियों से मुँह फेर लिया।
बल्कि उन्होंने बक़ायदा एलान किया, ‘आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेक फ़ास्ट।’  उन्होंने न सिर्फ इसका एलान किया बल्कि इसको कर भी दिखाया। तभी तो उनका दूसरा नाम रखा गया, ‘अल्सेशियन।’ 
1992 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने सभी जि़ला मजिस्ट्रेटों, चोटी के पुलिस अधिकारियों और करीब 280 चुनाव पर्यवेक्षकों को ये साफ़ कर दिया कि चुनाव की अवधि तक किसी भी ग़लती के लिए वो उनके प्रति जवाबदेह होंगे।
एक रिटर्निंग ऑफिसर ने तभी एक मज़ेदार टिप्पणी की थी, ‘हम एक दयाविहीन इंसान की दया पर निर्भर हैं।’  सिर्फ उत्तर प्रदेश में शेषन ने करीब 50,000 अपराधियों को ये विकल्प दिया कि या तो वो अग्रिम ज़मानत ले लें या अपने आप को पुलिस के हवाले कर दें।
हिमाचल प्रदेश में चुनाव के दिन पंजाब के मंत्रियों के 18 बंदूकधारियों को राज्य की सीमा पार करते हुए धर दबोचा गया। उत्तर प्रदेश और बिहार सीमा पर तैनात नागालैंड पुलिस ने बिहार के विधायक पप्पू यादव को सीमा नहीं पार करने दी।
शेषन के सबसे हाई प्रोफ़ाइल शिकार थे हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद। चुनाव आयोग द्वारा सतना का चुनाव स्थगित करने के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। गुलशेर अहमद पर आरोप था कि उन्होंने राज्यपाल पद पर रहते हुए अपने पुत्र के पक्ष में सतना चुनाव क्षेत्र में चुनाव प्रचार किया था।
उसी तरह राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत को भी शेषन का कोपभाजन बनना पड़ा था जब उन्होंने एक बिहारी अफ़सर को पुलिस का महानिदेशक बनाने की कोशिश की।
उसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्व खाद्य राज्य मंत्री कल्पनाथ राय को चुनाव प्रचार बंद हो जाने के बाद अपने भतीजे के लिए चुनाव प्रचार करते हुए पकड़ा गया। जि़ला मजिस्ट्रेट ने उनके भाषण को बीच में रोकते हुए उन्हें चेतावनी दी कि अगर उन्होंने भाषण देना जारी रखा तो चुनाव आयोग को वो चुनाव रद्द करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।
चुनाव आयोग में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री अकादमी ने उन्हें आईएएस अधिकारियों को भाषण देने के लिए बुलाया।
शेषन का पहला वाक्य था, ‘आपसे ज़्यादा तो एक पान वाला कमाता है।’  उनकी साफग़ोई ने ये सुनिश्चित कर दिया कि उन्हें इस तरह का निमंत्रण फिर कभी न भेजा जाए। शेषन अपनी आत्मकथा लिख चुके हैं लेकिन वो इसे छपवाने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे कई लोगों को तकलीफ़ होगी। उनका कहना है, ‘मैंने ये आत्मकथा सिफऱ् अपने संतोष के लिए लिखी है।’ 
शेषन 1955 बैच के आईएएस टॉपर हैं। भारतीय नौकरशाही के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर काम करने के बावजूद वो चेन्नई में यातायात आयुक्त के रूप में बिताए गए दो सालों को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय मानते हैं। उस पोस्टिंग के दौरान 3000 बसें और 40,000 हज़ार कर्मचारी उनके नियंत्रण में थे। एक बार एक ड्राइवर ने शेषन से पूछा कि अगर आप बस के इंजन को नहीं समझते और ये नहीं जानते कि बस को ड्राइव कैसे किया जाता है, तो आप ड्राइवरों की समस्याओं को कैसे समझ पाएंगे।
शेषन ने इसको एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने न सिर्फ बस की ड्राइविंग सीखी बल्कि बस वर्कशॉप में भी काफ़ी समय बिताया। उनका कहना है, ‘मैं इंजनों को बस से निकाल कर उनमें दोबारा फि़ट कर सकता था।’  एक बार उन्होंने बीच सडक़ पर ड्राइवर को रोक कर स्टेयरिंग संभाल लिया और यात्रियों से भरी बस को 80 किलोमीटर तक चलाया।
ये शेषन का ही बूता था कि उन्होंने चुनाव में पहचान पत्र का इस्तेमाल आवश्यक कर दिया। नेताओं ने उसका ये कह कर विरोध किया कि ये भारत जैसे देश के लिए बहुत ख़र्चीली चीज़ है। शेषन का जवाब था कि अगर मतदाता पहचान पत्र नहीं बनाए गए तो 1 जनवरी 1995 के बाद भारत में कोई चुनाव नहीं कराए जाएंगे।
कई चुनावों को सिफऱ् इसी वजह से स्थगित किया गया क्योंकि उस राज्य में वोटर पहचानपत्र तैयार नहीं थे। उनकी एक और उपलब्धि थी उम्मीदवारों के चुनाव ख़र्च को कम करना। उनसे एक बार एक पत्रकार ने पूछा था, ‘आप हर समय कोड़े का इस्तेमाल क्यों करना चाहते हैं?’ 
शेषन का जवाब था, ‘मैं वही कर रहा हूँ जो कानून मुझसे करवाना चाहता है। उससे न कम न ज़्यादा। अगर आपको कानून नहीं पसंद तो उसे बदल दीजिए। लेकिन जब तक कानून है मैं उसको टूटने नहीं दूँगा।’  टीएन शेषन को 1996 में रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। (बीबीसी)

 

 


Date : 11-Nov-2019

अव्यक्त
आज मौलाना आज़ाद का जन्मदिन है। भारतीय इतिहास के एक महान ‘राष्ट्रवादी’ और देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद के जन्म के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी है कि उनका जन्म सऊदी अरब के मक्का में हुआ था। आज़ाद जब दो साल के थे तभी उनके पिता कलकत्ते में आ बसे। आज़ाद का परिवार कई पीढिय़ों से आज़ादीपसंद विद्वानों का परिवार रहा था और इसलिए शहंशाहों से उनके परिवार का संबंध बहुत अच्छा नहीं रहा था। 
उदाहरण के लिए, उनके पूर्वजों में से एक मौलाना जमालुद्दीन उर्फ देहली के शेख बहलोल सम्राट अकबर के समकालीन थे। और जब अकबर ने दीन-ए-इलाही नाम का नया धर्म चलाने की कोशिश की, तो मौलाना जमालुद्दीन ने उस मसौदे पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। मौलाना जमालुद्दीन के बेटे शेख मोहम्मद ने अपने पिता की तरह ही जहांगीर के सामने झुकने से इनकार कर दिया, जिसकी वजह से उन्हें ग्वालियर के किले में कैद कर दिया गया। मौलाना आज़ाद खुद को उसी परंपरा का मानते थे और अंग्रेजों के प्रति उनका रवैया भी वैसा ही रहा।
शेरो-शायरी और गज़लगोई का शौक अबुल कलाम को युवावस्था से ही था। ‘आज़ाद’ उनका तखल्लुस था। कहा जाता है कि यह तखल्लुस उन्होंने इसलिए भी रखा था ताकि वर्णक्रम के अनुसार छपने वाले कविता संग्रहों में उनका नाम और उनकी रचना पहले आ सके। उनकी शुरुआती रचनाएं ‘अरमुग़ान-ए-फारुख़’ और ‘ख़दंग-ए-नजऱ’ जैसी पत्रिकाओं में छपीं। तेरह साल की उमर में ही आज़ाद का निकाह ज़ुलैखा बेग़म से हो गया। ‘हसीन’ नाम का उनका बेटा जो उनकी इकलौती संतान था, वह चार साल की उमर में चल बसा। 
1942 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बंबई में हंगामेदार अधिवेशन चल रहा था, और आज़ाद उसकी अध्यक्षता करने के लिए घर से निकल रहे थे, तो उनकी पत्नी बहुत ज्यादा बीमार थीं। बाद में जब आज़ाद गिरफ़्तार हुए और उन्हें अहमदनगर किले में कैद कर दिया गया, उसी दौरान उनकी पत्नी का निधन हो गया। गांधी, नेहरू और आज़ाद सरीखों ने आज़ादी की लड़ाई में अपने पारिवारिक जीवन के स्तर पर जो कुर्बानियां दीं, वे हमें अक्सर याद नहीं रहतीं।
महात्मा गांधी के सहयोगी महादेव देसाई ने मौलाना आज़ाद पर 1940 में अंग्रेजी में एक किताब लिखी थी। किताब का नाम था- ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद’। यह एक संस्मरणात्मक जीवनी जैसी थी। महादेव देसाई ने गांधीजी से अनुरोध किया कि वे इस किताब की प्रस्तावना में मौलाना आज़ाद के बारे में दो शब्द लिख दें। 18 मई, 1940 को सेवाग्राम में गांधीजी ने मौलाना आज़ाद के बारे में लिखा - ‘मुझे 1920 से ही राष्ट्रीय कार्य के सिलसिले में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के संपर्क में रहने का सौभाग्य प्राप्त रहा है। 
इस्लाम का जितना ज्ञान उन्हें है, उससे अधिक किसी को नहीं होगा। वे अरबी के उद्भट विद्वान हैं। उनकी जितनी दृढ़ श्रद्धा इस्लाम में है, उतनी ही दृढ़ श्रद्धा राष्ट्रवादिता में भी है। और आज वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं, इसका एक गहरा अर्थ है, जिसकी उपेक्षा भारतीय राजनीति के किसी भी अध्येता को नहीं करनी चाहिए।’
लेकिन यदि हमें मौलाना आज़ाद की शख्सियत का सबसे प्रामाणिक और सबसे गहरा विश्लेषण पढऩा हो, तो वह जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में ही मिल सकता है। इस किताब को लिखने के दौरान आज़ाद भी नेहरू के ही साथ अहमदनगर किले में कैद थे। नेहरू ने मौलाना आज़ाद के बारे में लिखा था - ‘हिंदुस्तान के मुसलमानी दिमाग़ की तरक्क़ी में सन् 1912 भी एक ख़ास साल है, क्योंकि उसमें दो नए साप्ताहिक निकलने शुरू हुए। उनमें से एक तो ‘अल-हिलाल’ था, जो उर्दू में था और दूसरा अंग्रेज़ी में ‘दि कॉमरेड’ था। 
‘अल-हिलाल’ को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (कांग्रेस के वर्तमान सभापति) ने चलाया था। वे एक चौबीस बरस के नौजवान थे। उनकी शुरू की पढ़ाई लिखाई क़ाहिरा में अल-अज़हर विश्वविद्यालय में हुई थी और जिस वक्त वे पंद्रह और बीस बरस के ही बीच में थे, उसी वक्त अपनी अरबी और फ़ारसी की क़ाबिलियत के लिए मशहूर हो गए थे। इसके अलावा उन्हें हिंदुस्तान के बाहर की इस्लामी दुनिया की अच्छी जानकारी थी और उन सुधार-आंदोलनों का पूरा पता था जो वहां पर चल रहे थे। साथ ही उन्हें यूरोपीय मामलों की भी अच्छी जानकारी थी।’
नेहरू ने आगे लिखा है - ‘मौलाना आज़ाद का नज़रिया बुद्धिवादी था और साथ ही इस्लामी साहित्य और इतिहास की उन्हें पूरी जानकारी थी। उन्होंने इस्लामी धर्मग्रंथों की बुद्धिवादी नज़रिए से व्याख्या की। इस्लामी परंपरा से वे छके हुए थे और मिस्त्र, तुर्की, सीरिया, फि़लिस्तीन, इराक और ईरान के मशहूर मुस्लिम नेताओं से उनके ज़ाती ताल्लुक़ात थे। 
इन देशों के इख़लाकी और राजनीतिक हालात का उनपर बहुत ज़्यादा असर था। अपने लेखों की वजह से इस्लामी देशों में अन्य किसी हिंदुस्तानी मुसलमान की अपेक्षा वे ज़्यादा प्रसिद्ध थे। उन लड़ाइयों में, जिनमें कि तुर्की फंस गया था, उनकी बेहद दिलचस्पी हुई, और उनकी हमदर्दी तुर्की के लिए सामने आई। लेकिन उनके ढंग और नज़रिए में और दूसरे बुज़ुर्ग मुसलमान नेताओं के नज़रिए में फक़ऱ् था।’
‘मौलाना आज़ाद का नज़रिया विस्तृत और तर्कसंगत था और इसकी वजह से न तो उनमें सामंतवाद था और न संकरी धार्मिकता और न ही सांप्रदायिक अलहदगी। इसने उनको लाजि़मी तौर पर हिंदुस्तानी क़ौमियत का हामी बना दिया। उन्होंने तुर्की में और दूसरे इस्लामी देशों में क़ौमियत की तरक्क़ी को ख़ुद देखा था। उस जानकारी का उन्होंने हिंदुस्तान में इस्तेमाल किया और उन्हें हिंदुस्तानी क़ौमी आंदोलन का वही रुख़ दिखाई दिया। हिंदुस्तान के दूसरे मुसलमानों को इन देशों के आंदोलनों की शायद ही जानकारी रही हो और वे अपने सामंती वातावरण में घिरे रहे। वे सिर्फ मज़हबी नजऱ से चीज़ों को देखते थे और तुर्की के साथ उनकी हमदर्दी सिर्फ धर्म के नाते थी। ये मजहबी मुसलमान तुर्की के साथ अपनी ज़बरदस्त हमर्ददी के बावजूद तुर्की की क़ौमी और ग़ैरमजहबी तहरीक़ों के साथ न थे।’
मौलाना आज़ाद अव्वल दर्जे के पत्रकार और प्रखर संपादक के रूप में भी जाने जाते रहे। नेहरू ने आज़ाद की पत्रकारिता पर भी विस्तार से लिखा है। उनकी साप्ताहिक पत्रिका ‘अल-हिलाल’ के बारे में नेहरू लिखते हैं -‘अबुल कलाम आज़ाद ने अपने हफ़्तेवार रिसाले ‘अल-हिलाल’ में एक नई भाषा में बात की। वह भाषा सिर्फ नज़रिए या विचार के लिहाज से ही नई नहीं थी, बल्कि उसका गठन भी दूसरे ढंग का था। उसकी वजह यह थी कि आज़ाद की शैली में ज़ोर था, मर्दानगी थी और फ़ारसी पृष्ठभूमि के कारण कभी-कभी वह समझने में मुश्किल होती थी। उन्होंने नए विचार के लिए नई शब्दावली का इस्तेमाल किया और उर्दू भाषा आज जैसी भी है, उसको बनाने में एक निश्चित असर डाला। 
मुसलमानों के पुराने कट्टरपंथी नेताओं में इस सबके लिए अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं हुई और उन्होंने आज़ाद के विचारों और उनके नज़रिये की आलोचना की। लेकिन उनमें से क़ाबिल-से-काबिल लोग भी आज़ाद से बहस या दलील में, यहां तक कि धर्म-ग्रंथों और पुरानी परंपरा की बुनियाद पर भी, आसानी से टक्कर नहीं ले सकते थे। वजह यह थी कि इन चीज़ों के बारे में उनके मुक़ाबले में आज़ाद की जानकारी ज़्यादा थी। उन्हें मध्य-युग के इल्म, अठारहवीं सदी के तर्कवाद और मौजूदा ज़माने के नज़रिये का एक अजीब मेल था।’
नेहरू ने आज़ाद के बारे में आगे लिखा है - ‘पुरानी पीढ़ी के कुछ ऐसे लोग थे, जिन्होंने आज़ाद के लेखों को पसंद किया। इनमें एक तो मौलाना शिबली नूमानी थे, जो खुद तुर्की घूमकर आए थे और अलीगढ़ कॉलेज के सिलसिले में सर सैयद अहमद खां के साथ थे। जो भी हो, अलीगढ़ कॉलेज की परंपरा बिल्कुल जुदा और राजनीतिक तथा सामाजिक दोनों ही नज़रिये से अनुदार थी। उसके ट्रस्टी नवाब और ज़मींदार थे, जो सामंती ढांचे के ही नुमाइंदे थे। 
एक के बाद दूसरे ऐसे अंग्रेज प्रिंसिपलों के अधीन रहकर, जो सरकारी हलक़ों से नज़दीकी ताल्लुक रखते थे, इसमें अलहदगी के रुझान ने तरक्क़ी की और क़ौमियत के ख़िलाफ़ और कांग्रेस के ख़िलाफ़ नज़रिया कायम किया। अबुल कलाम आज़ाद ने कट्टरता और क़ौमियत-विरोधियों के इस गढ़ पर हमला किया। सीधे तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे विचारों का प्रचार करके, जो अलीगढ़ की परंपरा को ही खोखला कर देते। मुसलमानों के बुद्धिजीवी लोगों के दायरे में इस नौजवान लेखक और संपादक ने हलचल मचा दी। नई पीढ़ी के दिमाग़ में उनके शब्दों से एक उबाल पैदा हुआ।’

‘ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों ने ‘अल-हिलाल’ को पसंद नहीं किया। प्रेस एक्ट के मातहत उससे ज़मानत मांगी गई और आखऱि सन् 1914 में उसका प्रेस जब्त कर लिया गया। इसके बाद आज़ाद ने एक दूसरा साप्ताहिक ‘अल-बलाग़’ निकाला, लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा आज़ाद को क़ैद किए जाने पर यह भी सन् 1916 में ख़त्म हो गया। चार साल तक वह क़ैद में रखे गए और जब बाहर आए, तो उन्होंने फौरन ही इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेताओं में अपनी जगह हासिल कर ली। तबसे वे बराबर कांग्रेस की ऊंची कार्यकारिणी में रहे, और उस वक्त कम उम्र के होते हुए भी वे कांग्रेस के बड़ों में गिने गए। क़ौमी और राजनैतिक मामलों के साथ ही सांप्रदायिक या अल्पसंख्यक समस्या के सिलसिले में उनकी सलाह की बहुत क़द्र की जाती है। दो बार वे कांग्रेस के सभापति रहे हैं और कई बार उन्होंने लंबी मुद्दतें जेल में बिताई हैं।’
इतना विस्तार से लिखा है नेहरू में आज़ाद के बारे में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में। भारत में राष्ट्रवाद या क़ौमियत के बारे में छिड़ी नई बहसों को देखते हुए मौलाना आज़ाद जैसी शख्सियतों के बारे में पढऩे-पढ़ाने की जरूरत है। अबुल कलाम आज़ाद एक विवेकवान और सच्ची रूहानियत में यक़ीन रखने वाले मौलाना थे जिसे संकरी धार्मिकता और सांप्रदायिक अलहदगी जैसी बीमारियां कभी छू नहीं सकीं। ये बीमारियां हमें भी न ही छुएं, तो बेहतर है। आखऱि शारीरिक, दिमाग़ी और रूहानी तौर पर स्वस्थ और तंदुरुस्त रहना कौन नहीं चाहता! (सत्याग्रह)


Date : 10-Nov-2019

Romila Thapar 

It has annulled respect for history and seeks to replace it with religious faith.

The verdict is a political judgment and reflects a decision which could as well have been taken by the state years ago. Its focus is on the possession of land and the building a new temple to replace the destroyed mosque. The problem was entangled in contemporary politics involving religious identities but also claimed to be based on historical evidence. This latter aspect has been invoked but subsequently set aside in the judgment.

The court has declared that a particular spot is where a divine or semi-divine person was born and where a new temple is to be built to commemorate the birth. This is in response to an appeal by Hindu faith and belief. Given the absence of evidence in support of the claim, such a verdict is not what one expects from a court of law. Hindus deeply revere Rama as a deity but can this support a legal decision on claims to a birth-place, possession of land and the deliberate destruction of a major historical monument to assist in acquiring the land?

The verdict claims that there was a temple of the 12th Century AD at the site which was destroyed to build the mosque — hence the legitimacy of building a new temple.

The excavations of the Archaeological Survey of India (ASI) and its readings have been fully accepted even though these have been strongly disputed by other archaeologists and historians. Since this is a matter of professional expertise on which there was a sharp difference of opinion the categorical acceptance of the one point of view, and that too in a simplistic manner, does little to build confidence in the verdict. One judge stated that he did not delve into the historical aspect since he was not a historian but went to say that history and archaeology were not absolutely essential to decide these suits! Yet what are at issue are the historicity of the claims and the historical structures of the past one millennium.

A mosque built almost 500 years ago and which was part of our cultural heritage was destroyed wilfully by a mob urged on by a political leadership. There is no mention in the summary of the verdict that this act of wanton destruction, and a crime against our heritage, should be condemned. The new temple will have its sanctum — the presumed birthplace of Rama — in the area of the debris of the mosque. Whereas the destruction of the supposed temple is condemned and becomes the justification for building a new temple, the destruction of the mosque is not, perhaps by placing it conveniently outside the purview of the case.

Has created a precedent

The verdict has created a precedent in the court of law that land can be claimed by declaring it to be the birthplace of a divine or semi-divine being worshipped by a group that defines itself as a community. There will now be many such janmasthans wherever appropriate property can be found or a required dispute manufactured. Since the deliberate destruction of historical monuments has not been condemned what is to stop people from continuing to destroy others? The legislation of 1993 against changing the status of places of worship has been, as we have seen in recent years, quite ineffective.

What happened in history, happened. It cannot be changed. But we can learn to understand what happened in its fuller context and strive to look at it on the basis of reliable evidence. We cannot change the past to justify the politics of the present. The verdict has annulled respect for history and seeks to replace history with religious faith. True reconciliation can only come when there is confidence that the law in this country bases itself not just on faith and belief, but on evidence. (The Hindu)

( Romila Thapar is a distinguished historian of Early India.)


Date : 10-Nov-2019

दिलनवाज पाशा
शनिवार को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क़ानूनी इतिहास में मालिकाना हक के सबसे विवादित मुकदमे का निपटारा कर दिया। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्ष में फैसले देते हुए विवादित भूमि मंदिर के लिए दी और मस्जिद के लिए अलग से पांच एकड़ जमीन की व्यवस्था की है। यानी जहां बाबरी मस्जिद थी वहां अब राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है।
अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर के हक़ में सुप्रीम कोर्ट का ्रफैसला आने के बाद बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामलों की जांच करने वाले जस्टिस मनमोहन लिब्रहान ने कहा है कि इस फैसले का असर मस्जिद विध्वंस मामले पर भी हो सकता है। बीबीसी से बात करते हुए जस्टिस लिब्रहान ने कहा सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला किया है वो ठीक है, सुप्रीम कोर्ट में ठीक ही फैसले होते हैं।
ये पूछे जाने पर कि क्या इसका असर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने और इससे जुड़े आपराधिक साजिश के मामले पर भी हो सकता है, उन्होंने कहा मेरा मानना है कि इस फैसले का असर उस मामले पर भी हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है। क्या सुप्रीम कोर्ट में आज आए फैसले के आधार पर बाबरी मस्जिद के ध्वंस को सही ठहराए जाने का तर्क भी दिया जा सकता है, जस्टिस लिब्रहान ने कहा अदालत में ये तर्क भी दिया जा सकता है।
जस्टिस लिब्रहान ने कहा जिस तेजी से सुप्रीम कोर्ट में मालिकाना हक के विवाद की सुनवाई हुई है उसी तेजी से बाबरी मस्जिद गिराए जाने के लिए हुई आपराधिक साजिश के मामले भी सुने जाने चाहिए।
जस्टिस लिब्राहन को विश्वास है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले में भी अदालत में इंसाफ होगा। उन्होंने कहा जब फैसला आएगा तब पता चलेगा कि इंसाफ होगा या नहीं लेकिन हम यही समझते हैं कि अदालतें फैसला करती हैं और इंसाफ देती हैं। मेरा विश्वास है कि इन मामलों में भी अदालत फैसला करेगी और इंसाफ करेगी।
विवादित भूमि पर मालिकाना हक को लेकर तो सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट फैसला दे दिया है लेकिन बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने से जुड़े आपराधिक मुकदमे 27 साल से अदालत में लंबित हैं। उग्र कारसेवकों की भीड़ ने 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था। इसके बाद हुए दंगों में करीब दो हजार लोग मारे गए थे। बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले जस्टिस लिब्रहान आयोग ने 17 साल चली लंबी तफ्तीश के बाद 2009 में अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें बताया गया कि मस्जिद को एक गहरी साजिश के तहत गिराया गया था। उन्होंने इस साजि़श में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाए जाने की सिफारिश भी की थी।
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में क्या हुआ था?
छह दिसंबर 1992 को विवादित बाबरी मस्जिद गिरने के बाद दो आपराधिक मुकदमे कायम किए गए थे। एक कई अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ और दूसरा आडवाणी समेत आठ बड़े नेताओं के खिलाफ नामजद मामला। आडवाणी और अन्य नेताओं पर भड़काऊ भाषण देने के आरोपों में मुकदमा दर्ज हुआ था।
इन दो के अलावा 47 और मुकदमे पत्रकारों के साथ मारपीट और लूट आदि के भी लिखाए गए थे। बाद में सारे मुकदमों की जांच सीबीआई को दी गई। सीबीआई ने दोनों मामलों की संयुक्त चार्जशीट फाइल की। इसके लिए हाई कोर्ट की सलाह पर लखनऊ में अयोध्या मामलों के लिए एक नई विशेष अदालत गठित हुई। लेकिन उसकी अधिसूचना में दूसरे वाले मुकदमे का जिक्र नहीं था। यानी दूसरा मुकदमा रायबरेली में ही चलता रहा।
विशेष अदालत ने आरोप निर्धारण के लिए अपने आदेश में कहा कि चूंकि सभी मामले एक ही कृत्य से जुड़े हैं, इसलिए सभी मामलों में संयुक्त मुकदमा चलाने का पर्याप्त आधार बनता है। लेकिन आडवाणी समेत अनेक अभियुक्तों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी।
12 फरवरी 2001 को हाई कोर्ट ने सभी मामलों की संयुक्त चार्जशीट को तो सही माना लेकिन साथ में यह भी कहा कि लखनऊ विशेष अदालत को आठ नामजद अभियुक्तों वाला दूसरा केस सुनने का अधिकार नही है, क्योंकि उसके गठन की अधिसूचना में वह केस नंबर शामिल नहीं था। आडवाणी और अन्य हिंदूवादी नेताओं पर दर्ज मुकदमा कानूनी दांव-पेच और तकनीकी कारणों में फंसा रहा।
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी बताते हैं आडवाणी और अन्य नेताओं ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। अदालत ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए आपराधिक साजिश के मुकदमे को रायबरेली की अदालत भेज दिया था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रायबरेली में चल रहे मुकदमे को बाबरी विध्वंस के मुकदमे से जोड़ दिया।
रामदत्त कहते हैं अब दोबारा सम्मिलित सुनवाई लखनऊ की विशेष अदालत में चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इन मामलों की सुनवाई कर रहे जज का कार्यकाल बढ़ाते हुए आदेश दिया है कि वो इन मुकदमों का फैसला देकर ही रिटायर होंगे। 
आपराधिक साजिश में आरोप तय
पहले आडवाणी और अन्य नेताओं पर सिर्फ भड़काऊ भाषण देने का मुकदमा रायबरेली में चल रहा था। लेकिन अप्रैल 2017 में सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित 8 लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज किया गया था। 2017 में ही बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत 12 अभियुक्तों पर आपराधिक साजिश के आरोप तय कर दिए गए थे।
लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने कहा था कि आडवाणी, जोशी, उमा भारती और अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा लेकिन वो इसे निभा नहीं पाए थे। कल्याण सिंह भी बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अभियुक्त हैं और फिलहाल बाकी नेताओं की ही तरह जमानत पर बाहर हैं।
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद के नेता मस्जिद गिराने का श्रेय तो लेते हैं लेकिन किसी ने मस्जिद को गिराने की नैतिक जि़म्मेदारी कभी स्वीकार नहीं की। ये नेता अदालत में हमेशा तर्क देते रहे कि वो मस्जिद गिराने के ग़ुनहगार नहीं हैं।
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं अब ये उम्मीद तो जगी है कि इस मामले में भी फैसला होगा लेकिन इस मामले के कई अभियुक्त अब इस दुनिया में ही नहीं है। इनमें विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल भी शामिल है। त्रिपाठी कहते हैं मामलों के कई अभियुक्त, गवाह और पैरोकार भी इतने बूढ़े और कमजोर हो चले हैं कि उन्हें लखनऊ में विशेष अदालत की तीसरी मंजिल पर चढऩे में भी कठिनाई होती है।
वो कहते हैं इंसाफ होते-होते कितने अभियुक्त जिंदा बचेंगे ये देखना होगा। इंसाफ भी वक्त पर होना चाहिए। अगर फैजाबाद में चले राम जन्मभूमि विवाद का निपटारा उसी अदालत में हो गया होता तो ना ही ये मुकदमा इतना लंबा चला होता और न ही इस पर राजनीति होती। (बीबीसी)


Date : 09-Nov-2019

शरत प्रधान, वरिष्ठ पत्रकार
अयोध्या के बहुचर्चित और विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ज़मीन के मुक़दमे में आज रामलला विराजमान सबसे प्रमुख हिंदू पक्ष के तौर पर दिखाई दे रहे हैं। लेकिन, एक हकीकत ये भी है कि हिंदू पक्ष को भगवान श्रीराम यानी आज के रामलला विराजमान की कानूनी अहमियत समझने में 104 बरस लग गए।

अयोध्या की विवादित जमीन के मालिकाना हक़ को लेकर कानूनी लड़ाई औपचारिक रूप से आज से कऱीब 135 साल पहले यानी सन 1885 में शुरू हुई थी। लेकिन, इस मामले में किसी हिंदू पक्ष ने ‘रामलला विराजमान’ को भी एक पक्ष बनाने का फ़ैसला 1989 में लिया था।
पहली बार हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज, जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल, भगवान राम के प्रतिनिधि के तौर पर अदालत में पेश हुए थे और भगवान का दावा कोर्ट के सामने रखने की कोशिश की थी। 1885 में अयोध्या के एक स्थानीय निवासी रघुबर दास ने 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद के ठीक बाहर स्थित चबूतरे पर एक मंदिर बनाने की इजाजत मांगी थी। अयोध्या के लोग इस जगह को राम चबूतरा कहकर पुकारते थे। लेकिन, एक सब-जज ने मस्जिद के बाहर के चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया। ग़ौरतलब है कि मंदिर बनाने की इजाजत देने से इनकार करने वाले वो सब-जज एक हिंदू थे।
1963 का लॉ ऑफ़ 
लिमिटेशन क्या कहता है?
सिन्हा ने हिंदू पक्षकारों को समझाया कि अगर वो अपने मुकदमे में भगवान को भी पार्टी बनाते हैं, तो उससे उनकी राह की कानूनी अड़चनें दूर होंगी। ऐसा माना जा रहा था कि मुस्लिम पक्ष, लॉ ऑफ़ लिमिटेशन यानी परिसीमन क़ानून के हवाले से मंदिर के पक्षकारों के दावे का विरोध करेंगे। 1963 का लॉ ऑफ़ लिमिटेशन यानी परिसीमन क़ानून, किसी विवाद में पीडि़त पक्ष के दावा जताने की सीमा तय करता है।
हिंदू पक्षकारों के दावे के खिलाफ मुस्लिम पक्ष इस क़ानून के हवाले से ये दावा कर रहे थे कि सदियों से वो विवादित जगह उनके क़ब्ज़े में है और इतना लंबा समय गुजऱ जाने के बाद हिंदू पक्षकार इस पर दावा नहीं जता सकते।
रंजना अग्निहोत्री, हिंदू महासभा की तरफ़ से वक़ीलों की लंबी चौड़ी फौज की एक प्रमुख सदस्य हैं। वे कहती हैं कि, ‘इस विवाद में भगवान श्रीराम ‘अपने सबसे कऱीबी दोस्त’  देवकी नंदन अग्रवाल के माध्यम से एक पक्षकार के तौर पर शामिल हो गए। इसके बाद से इस मुक़दमे को परिसीमन क़ानून के हर बंधन से आने वाले समय में अनंत काल के लिए छूट मिल गई।’
रंजना अग्निहोत्री ने बीबीसी को लखनऊ में बताया कि, ‘जब एक जुलाई 1989 को फैज़ाबाद की अदालत में रामलला विराजमान की तरफ से दावा पेश किया गया, तब सिविल कोर्ट के सामने इस विवाद से जुड़े चार मुक़दमे पहले से ही चल रहे थे। इसके बाद, 11 जुलाई 1989 को इन सभी पांच मामलों को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में ट्रांसफर कर दिया गया।’
यहां ध्यान देने वाली अहम बात ये है कि हाई कोर्ट के सामने 1987 से ही उत्तर प्रदेश सरकार की एक अजऱ्ी विचाराधीन थी। इसमें यूपी सरकार ने उच्च न्यायलय से आग्रह किया था कि अयोध्या विवाद के सभी मुक़दमे, जो फैजबाद की सिविल कोर्ट में चल रहे हैं, उन्हें हाईकोर्ट में भेज दिया जाए।
आखऱिकार हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 में इस मामले में अपना फैसला सुनाया जिस में अदालत ने अयोध्या की विवादित ज़मीन को तीन पक्षों, निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड में बांटने का फ़ैसला सुनाया था। लेकिन, इलाहाबाद हाईकोर्ट का ये फ़ैसला किसी भी पक्ष को मंज़ूर नहीं था।
सभी पक्षों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद 17 अक्टूबर 2019 को अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया।
मज़े की बात ये है कि जब इस मुक़दमे में रामलला विराजमान को भी एक पक्ष के तौर पर शामिल करने की अजऱ्ी दी गई, तो इसका किसी ने विरोध नहीं किया था।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वक़ील जफ़ऱयाब जिलानी इस बारे में कहते हैं कि, ‘भगवान की याचिका का विरोध करने का कोई सवाल ही नहीं था, क्योंकि इस केस में भगवान भी एक इंसान की तरह ही पक्षकार थे। रामलला विराजमान को भी एक पक्षकार बनाना हमारे विरोधी पक्ष का वैधानिक हक़ था। क्योंकि इसके बग़ैर इस विवाद में अपने दावे के हक़ में पेश करने के लिए उनके पास पर्याप्त दस्तावेज़ी सबूत नहीं थे।’
अब जबकि इस विवाद में देश की सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला आने में ज़्यादा दिन नहीं बचे हैं, तो इस बात की अटकलें तेज़ हो गई हैं, कि आगे क्या होगा।
सवाल ये भी उठ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अगर मंदिर के हक में जाता है, तो कहीं निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच तो संघर्ष नहीं छिड़ जाएगा।
वकील रंजना अग्निहोत्री कहती हैं कि, ‘इन दोनों पक्षों के बीच टकराव का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।’ रंजना अग्निहोत्री इसके बाद कहती हैं, ‘शैव संगठन होने की वजह से निर्मोही अखाड़ो को उस स्थान पर सदैव ही भगवान की पूजा अर्चना का विशेषाधिकार हासिल रहा है। फ़ैसला आने के बाद भी निर्मोही अखाड़ा अपने इसी अधिकार के तहत भगवान राम की पूजा करता रहेगा। ऐसे में टकराव का सवाल ही कहां से पैदा होता है?’ (बीबीसी)

 


Date : 09-Nov-2019

गिरीश मालवीय
रेल नीर घोटाले का आरोप जिन 7 कंपनियों पर लगा था उन 7 में से 4 कंपनियां एक ही परिवार से है। यह चार की चार कंपनियां आर के एसोसिएट्स एंड होटेलियर्स की है।  बाकी की 3 कंपनियों में भी इस परिवार के सदस्य शेयर होल्डर है। कहा जाता है कि रेलवे में छोटे से लेकर हर बड़ा अधिकारी आर के एसोसिएट्स के बारे में जानता है।
सोशल मीडिया पर एक वेकेंसी का एक विज्ञापन चर्चा का विषय बना। यह विज्ञापन रेलवे में बड़े पैमाने पर कैटरिंग सर्विसेज प्रोवाइड करने वाली एक कंपनी ने दिया था। वृंदावन फूड  प्रोडक्ट्स कंपनी रेलवे के लिए काम करने वाले हॉस्पिटेलिटी कॉन्ट्रैक्टर्स में से एक है।  यह कंपनी मौजूदा समय में 100 रेलगाडिय़ों में खाना बेचने का काम करती है। इस कंनपी ने 6 नवंबर को एक अंग्रेजी दैनिक में विज्ञापन दिया जिसमें कहा गया था कि रेलवे फूड प्लाजा, ट्रेन कैटरिंग, बेस किचन और स्टोर मैनेजर जैसे विभागों में विभिन्न प्रबंधकीय पदों के लिए 100 पुरुषों की आवश्यकता है। कंपनी ने इसके लिए शर्त रखी कि आवेदक अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि, 12वीं पास होना चाहिए। इन 100 लोगों को देश के किसी भी हिस्से में काम करना पड़ सकता है। 
लेकिन सबसे कमाल की शर्त यह थी कि इस नौकरी के आवेदक केवल अग्रवाल व वैश्य समुदाय के पुरुष ही होने चाहिए। इस विज्ञापन पर हंगामा खड़ा हो गया कि किस तरह से सरे आम धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है, वह भी रेलवे को कैटरिंग सर्विस उपलब्ध कराने वाली कंपनी के द्वारा? लेकिन हमारी इस पोस्ट का विषय यह नहीं है। यह पोस्ट इससे आगे की कहानी कहती है! यह जानकारी आपको चौका सकती है। 
क्या आपने रेल नीर घोटाले का नाम सुना है?  सन् 2015 में एक घोटाला पकड़ में आया था जिसमें पाया गया कि राजधानी और शताब्दी जैसी सुपरफास्ट ट्रेनों में रेल नीर के स्थान पर सस्ता सीलबंद पानी बेचा गया। इन लाइसेंसधारकों ने रेलवे विभाग से प्राप्त धनराशि से अन्य ब्रांडों के पेयजल की आपूर्ति की, जो एक अपराध है। बता दें कि ईडी ने इस मामले में सीबीआइ एफआइआर के आधार पर केस दर्ज किया था। जिसमे वृंदावन फूड प्रोडक्ट्स का भी नाम है। 
दरअसल यह वृंदावन फूड प्रोडक्ट्स नामक यह कंपनी आरके एसोसिएट्स की ही है, जिसके मालिक श्याम बिहारी अग्रवाल हैं जो रेल नीर घोटाले की मुख्य कर्ताधर्ता है। 
रेल नीर घोटाले का आरोप जिन 7 कंपनियों पर लगा था उन 7 में से 4 कंपनियां एक ही परिवार से है। यह चार की चार कंपनियां आर के एसोसिएट्स एंड होटेलियर्स की है।  बाकी की 3 कंपनियों में भी इस परिवार के सदस्य शेयर होल्डर है। कहा जाता है कि रेलवे में छोटे से लेकर हर बड़ा अधिकारी आर के एसोसिएट्स के बारे में जानता है।  आपको जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि इंडियन रेलवे के करीब 70 फीसदी कैटरिंग का जिम्मा शरण बिहारी अग्रवाल और उसकी बनाई कंपनियों के पास आज भी मौजूद हैं, अग्रवाल ने महज एक दशक में 500 करोड़ से अधिक की संपत्ति बना ली है। यह बात भी रेल नीर घोटाले के सामने आने बाद सामने आई थी। रेलवे की कैटरिंग पॉलिसी को शरण बिहारी अग्रवाल अपने हिसाब से मोल्ड कर लेते हैं। रेल नीर घोटाले की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारी ने बताया था कि जब भी रेलवे में कोई कॉन्ट्रैक्ट खुलता तो अग्रवाल किसी दूसरे शख्स के नाम पर एक कंपनी बना लेता था ओर येन केन प्रकारेण वह कांट्रेक्ट हासिल कर लेता था
रू/ह्य क्र ्य ्रह्यह्यशष्द्बड्डह्लद्गह्य & द्धशह्लद्गद्यद्बद्गह्म्ह्य के डायरेक्टर हैं शरण बिहारी अग्रवाल, सुषमा अग्रवाल, और प्रिया अग्रवाल. शरण बिहारी अग्रवाल ही इसके कर्ताधर्ता हैं।
आर के नाम रत्ना कुमारी के नाम से लिया गया है। रत्नाजी के तीन बेटे हैं।  शरण बिहारी अग्रवाल, विजय कुमार अग्रवाल, और अरुण अग्रवाल। शरण बिहारी अग्रवाल की कंपनी बनी आरके एसोसिएट्स एंड होटेलियर्स।  विजय कुमार की कंपनी हुई सत्यम कैटरर्स और अरुण अग्रवाल की कंपनी हुई सनशाइन।  शरण बिहारी अग्रवाल के दो बेटे हैं राहुल और अभिषेक अग्रवाल। इन दोनों के नाम है वृंदावन फूड प्रोडक्ट्स। 
अग्रवाल परिवार के बारे में यह सारी जानकारी एबीपी यूज़ के एक लिंक से मिली। जिसमें बताया गया था कि आकड़ों के मुताबिक अकेले 1.1.2014 से 31.10.2014 यानि 10 महीने में वृंदावन फ़ूड प्रोडक्ट्स के खाने के 212 शिकायतें आई।  आरके एसोसिएट्स की 138 शिकायतें आई। सनशाइन कैटेरेर्स की 114. सत्यम कैटेरेर्स की 68 और रूप कैटेरेर्स की 54।  लेकिन सभी में जुर्माना लगा कर और वार्निंग दे कर छोड़ दिया गया। 
यहां तक कि 2017 में सीएजी ने संसद में अपनी जो रिपोर्ट पेश की थी उसमे यह साफ लिखा था कि रेलवे कैटरिंग में कुछ कंपनियों की मोनोपोली चलती है, जिसे तोडऩे के लिए रेलवे की तरफ से सफल प्रयास नहीं किए जा रहे हैं सच यह है कि रेलवे और उसके कुछ अफसरों ने एक कंपनी के सामने बीते कई दशकों में किसी दूसरी कंपनी को रेल कैटरिंग के क्षेत्र में खड़ा होने ही नहीं दिया हैं।  सीएजी ने इस रिपोर्ट में यह भी कहा था कि ट्रेन और रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाला खाना इंसान के खाने लायक नहीं है। 
आरके एसोसिएट की पकड़ बीजेपी सरकार में बहुत गहरी हैं। जब रमन सिंह की सरकार थी तब छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना का काम भी उन्हीं दिया गया, और शिवराज सिंह की कृपा से मध्यप्रदेश सरकार के तीर्थ यात्रियों को भी अग्रवाल की फर्म कई बार यात्रा करा चुकी है। समाज कल्याण विभाग के अफसरों के अनुसार एक ट्रिप का न्यूनतम भुगतान एक करोड़ रुपए के आसपास किया जाता है।
2015 में रेल नीर घोटाले में आर के असोसिएट्स और वृंदावन फूड प्रॉडक्ट के मालिक श्याम बिहारी अग्रवाल, उनके बेटे अभिषेक अग्रवाल और राहुल अग्रवाल के आवास से 20 करोड़ रुपए नगद बरामद किए गए थे और उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ भेज दिया गया था।  लेकिन पता नहीं मोदी सरकार में इनकी कौनसी ऐसी सेटिंग है जिसके चलते उनकी कम्पनी को ब्लैक लिस्ट नही किया जा रहा, जबकि रेलवे कैटरिंग पॉलिसी में किसी कंपनी के खाने के बारे में बार-बार शिकायत मिलने पर कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने का प्रावधान भी है।  शताब्दी और राजधानी जैसी सुपरफास्ट ट्रेनों में हजारों शिकायतें ट्रेन के खाने को लेकर की जाती है। लेकिन ठेका निरस्त जैसी एक भी कार्रवाई नहीं की जाती। जबकि उपभोक्ता न्यायालय तक ने इनके खिलाफ सेवा में कमी के डिसीजन तक दिए है। 
ऐसी दागी कंपनियों को मोदी सरकार में आज भी रेलवे के ऐसे बड़े-बड़े ठेके दिए जा रहे हैं जिसमें वह 100 लोगों रिक्रूटमेंट कर रहे हैं। यह विज्ञापन बता रहा है कि इसके मालिक कितने बेखौफ हैं जो खुलकर अपने विज्ञापन में ‘आपल्याचं पाहिजे’  लिख रहे हैं। 

 


Date : 08-Nov-2019

अंतररराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके और इन दिनों हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे प्रोफेसर केन रोगॉफ को अर्थनीति के सबसे बड़े विचारकों में गिना जाता है। उनकी किताब ‘द कर्स ऑफ कैश’ (नकदी का शाप) के प्रकाशित होने के कुछ ही समय बाद मोदी सरकार ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया था। इसका समर्थन करने वाले कई लोगों ने ‘द कर्स ऑफ कैश’ का भी हवाला दिया। केन रोगॉफ ने इसके बाद अपनी किताब में भारत को लेकर कुछ और अंश जोड़े हैं। आइए जानते हैं इनमें उनकी नोटबंदी को लेकर क्या राय है।
आठ नवंबर, 2016। अमरीकी जनता डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति पद पर चुन रही थी। उसी दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय चैनलों पर आए और एक चौंकाने वाली घोषणा कर दी : आज मध्य रात्रि से भारत के दो सबसे अधिक मूल्य - 500 और 1000 रुपये के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे, यानी अमान्य हो जाएंगे; आपके पास 50 दिन का समय है, इतने में आप पुराने नोटों को बैंकों में जमा कर सकते हैं या इनके बदले नए नोट ले सकते हैं।
उस वक्त भारत में कुल लेन-देन का तकरीबन 90 फीसदी हिस्सा नकदी में ही चल रहा था और इस नकदी का करीब 86 प्रतिशत हिस्सा 500 और 1000 के नोटों में था। तेज गति से आगे बढ़ रहे 1.30 अरब लोगों के इस देश में मोदी की यह नोटबंदी बेहद नाटकीय और ऐसी आर्थिक घटना थी जिसका दूर-दूर तक असर पहुंचा।
इस नाटकीयता को और बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की जानकारी देने से पहले अपनी कैबिनेट के सभी सदस्यों के फोन जमा करवा लिए थे। इस कदम का मकसद जनता को आश्वस्त करना था कि मंत्रियों के पास भी इस फैसले के जरिए कोई फायदा उठाने का मौका नहीं था।
काला धन टैक्स चोरी, अपराध, आतंकवाद और भ्रष्टाचार में इस्तेमाल होता है और इसी काले धन से लड़ाई मोदी की नोटबंदी का घोषित लक्ष्य था। आत्मविश्वास और साहस से भरा यह कदम उस अर्थव्यवस्था से जुड़ी मानसिकता को क्रांतिकारी तरीके से बदलने के इरादे से उठाया गया जहां दो प्रतिशत से भी कम लोग टैक्स देते हैं और प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार महामारी की तरह फैला है।
यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने नकदी से जुड़ी उन समस्याओं को तो गिनवाया था जिनका जिक्र ‘कर्स ऑफ कैश’ में है। लेकिन किताब में इससे निपटने की व्यवस्था और रणनीति लागू करने का तरीका काफी अलग है।
इस किताब में दलील दी गई थी कि उभरते हुए बाजारों को कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ाते समय सावधानी बरतने की जरूरत होती है क्योंकि इनमें बुनियादी वित्तीय ढांचा पूरी तरह से तैयार नहीं होता। इसके अलावा इरादतन और धीरे-धीरे ही इस दिशा में बढऩे के और भी कारण हैं-धीरे-धीरे आगे बढऩा एक हद से ज्यादा अफरा-तफरी की स्थिति टालने में मदद करता है और यह संस्थानों के साथ-साथ लोगों को बदलाव के साथ तालमेल बिठाने का वक्त देता है। इस बीच अगर कोई दिक्कत पैदा होती है तो संस्थान इस हालत में रहते हैं कि आसानी से जरूरी सुधार कर सकें।
दूसरा एक बड़ा अंतर यह था कि भारत में प्रचलित सबसे बड़े मूल्य के नोट अंतररराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से ज्यादा मूल्य के नोट नहीं कहे जा सकते। डॉलर में बात करें तो एक साल पहले 1000 के नोट की कीमत 15 डॉलर से भी कम थी। इस लिहाज से 500 रुपये के नोट को बंद करना आम लोगों के लिए बेहद असुविधाजनक साबित हुआ क्योंकि यह नोट बड़ी आबादी के बीच प्रचलित था। इसके मुकाबले अगर अमेरिका में 20 डॉलर के नोट को रद्द किया जाए तो लोगों को उतनी दिक्कत नहीं होगी।
वहीं भारत में इन नोटों के बदले 2000 का नोट जारी किया गया। जबकि यह काले धन के लेन-देन में पुराने नोटों के मुकाबले ज्यादा सुविधाजनक होगा। भारत में मौजूद काले धन को पकडऩा नोटबंदी का सीधा मकसद था लेकिन हमने ऊपर उन कारणों पर बात की है जिनकी बदौलत व्यावहारिक रूप से यह मुमकिन नहीं है। इसके लिए ज्यादा व्यावहारिक योजना उन तरीकों की खोज करना है जिससे टैक्स से बचने की जुगत भिड़ाने वाले और भ्रष्टाचार या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगों के लेनदेन पर लागत बढ़ जाए।
लेकिन इस सबसे इतर भारत के सामने एक सबसे बड़ी चुनौती थी और वह यह थी कि नोटबंदी के बाद जितने नोट चलन से बाहर हुए उनकी भरपाई करने के लिए पर्याप्त नोट नहीं थे। ऐसा लगता है कि सरकार को चिंता थी कि कहीं अगर यह खबर फैल गई कि वह नए नोट छाप रही है तो भ्रष्ट तत्वों को अपना काला धन इधर-उधर करने का वक्त मिल जाएगा। वैसे अनुकूल से अनुकूल हालात में भी नोटों को तुरंत वापस लेने से प्रक्रियागत समस्याएं होतीं ही, लेकिन सबसे कड़ी चोट उन लोगों पर हुई जिन्होंने तात्कालिक जरूरतों के लिए नकद पैसा इक_ा कर रखा था। यह खासकर कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में हुआ जहां लेन-देन लगभग पूरी तरह नकद पर चलता है। हालांकि आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि यह चोट इतनी बड़ी नहीं थी जितना कि कुछ लोग शुरुआत में मानकर चल रहे थे (नोटबंदी के बाद भी विकास दर 6।5 फीसदी रही जो इससे पहले की तुलना में एक फीसदी की गिरावट थी)। लेकिन यह निश्चित रूप से चीजों को कम करके बताने जैसी बात है। इस गिरावट में सिर्फ संगठित क्षेत्र का आंकड़ा शामिल है। असंगठित क्षेत्र - जिसकी कुछ विकसित देशों में भी जीडीपी में हिस्सेदारी 20 से 25 फीसदी होती है- पर इसकी चोट निश्चित रूप से ज्यादा थी।
नोटबंदी के तरीके ने जो उथल-पुथल मचाई उसके चलते भारतीय अधिकारियों के पास इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वे इस पर ध्यान लगा सकें कि जो पैसा वापस आ रहा है उसमें से कौन सा कालाधन है और कौन सा नहीं। इसके बजाय सरकार और बैंकों को जल्द से जल्द अर्थव्यवस्था में नकदी वापस डालने के काम में लगना पड़ा। इस दौरान कोशिशें की गईं कि विशाल और संदिग्ध रकम पर नजर रखी जाए, लेकिन काम के बोझ से दबे बैंकों के लिए इसकी व्यापक तरीके से जांच करना बहुत मुश्किल था। भारतीय अधिकारियों का दावा है कि वे नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा रकम के रिकॉर्ड खंगालेंगे और इससे उन्हें अवैध रकम तक पहुंचने का एक दूसरा मौका मिलेगा। क्या इससे कुछ अहम नतीजे हासिल होंगे, यह अभी देखा जाना बाकी है।
अब सवाल है कि क्या नोटबंदी से भारत को दीर्घकालिक फायदे होंगे। जवाब इस पर निर्भर करता है कि कालेधन और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जो नीतियां हैं उन्हें सरकार कैसे अमल में लाती है और वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया में तेजी लाने में वह कितनी सफल होती है। उदाहरण के लिए नया वस्तु और सेवा कर टैक्स की व्यवस्था को कुछ आसान बना सकता है। इसके अलावा मनी लॉन्डरिंग को मुश्किल बनाने के लिए सरकार दूसरे देशों के साथ ऐसे समझौते भी कर रही है जिससे वे भारत के साथ वित्तीय सूचनाएं साझा कर सकें। और इसमें कोई शक नहीं कि वित्तीय समावेशन और नकदीरहित अर्थव्यवस्था की तरफ बढऩे के लिए सरकार ने जो नीतियां बनाई हैं उनमें से कुछ के सफल नतीजे दिखने भी लगे हैं। लाइसेंस फीस नकद के बजाय ऑनलाइन जमा करने के मोदी सरकार के फैसले की हमने चर्चा की ही थी। इसके अलावा बायोमेट्रिक डेटा से जुड़े निशुल्क जन-धन खातों ने उन लोगों के लिए भी वित्तीय व्यवस्था से जुडऩा आसान बनाया है पढ़-लिख नहीं सकते। यह भी दिलचस्प है कि बायोमेट्रिक सुरक्षा ने भ्रष्ट अधिकारियों के लिए फर्जी खातों द्वारा पैसे की लूट को और मुश्किल बना दिया है क्योंकि इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था को गच्चा देकर खातों से पैसे निकालना उतना आसान नहीं है।
अर्थशास्त्री कितनी भी आलोचना करें, लेकिन शायद नोटबंदी को भारत में समर्थन मिला है। यह आश्चर्य की भी बात है। भारत एक ऐसा देश है जहां लोग भ्रष्टाचार की इस महामारी से बहुत परेशान हैं और वे इससे लडऩे की सरकार की कोशशों की सराहना करते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस सद्भावना का फायदा उठाएगी और ऐसी नीतियां लागू करेगी जिनसे समय के साथ भ्रष्टाचार और अपराध पर लगाम लगे। इसमें कोई शक नहीं कि नोटबंदी वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया में काफी तेजी लाई है। करोड़ों भारतीय अब उस जनधन खाता योजना का फायदा उठा रहे हैं जिसकी रफ्तार कुछ समय पहले तक बनिस्बत धीमी थी। निश्चित रूप से भारत की इस नोटबंदी पर अभी काफी कुछ लिखा जाएगा, लेकिन इसके नतीजों की गुत्थी पूरी तरह से सुलझाने में अभी कई साल लग सकते हैं। इसका संबंध जितना अर्थशास्त्र से है उतना ही मनोविज्ञान से भी। (सत्याग्रह)

 


Date : 08-Nov-2019

ब्रिटिश लेखक और पत्रकार आतिश अली तासीर ने कहा है कि उनका ओवरसीज़ सिटीजऩ ऑफ़ इंडिया (ओसीआई) दर्जा एक कुटिल योजना के तहत ख़त्म किया गया।

भारत सरकार ने आतीश का ओसीआई कार्ड रद्द कर दिया है जिसे लेकर विवाद पैदा हो गया है।कई लोग इस फ़ैसले को टाइम पत्रिका में छपे उनके लेख से जोडक़र देख रहे हैं जिसमें उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए उन्हें 'ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड'ह्य ष्ठद्ब1द्बस्रद्गह्म् ढ्ढठ्ठ ष्टद्धद्बद्गद्घ' या महाविभाजनकारी बताया था।

भारत के गृह मंत्रालय ने गुरुवार को ये कहते हुए आतिश का ओसीआई दर्जा ख़त्म कर दिया कि उन्होंने ये बात छिपाई कि उनके पिता पाकिस्तानी मूल के थे। लेकिन आतीश का कहना है कि उन्हें अपना जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
आतिश अली तासीर के पिता सलमान तासीर पाकिस्तान के उदारवादी नेता थे। सलमान को उनके अंगरक्षक ने ही पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून के ख़िलाफ़ बोलने पर गोली मार दी थी। तासीर की मां भारत की जानी-मानी पत्रकार तवलीन सिंह हैं।
ओसीआई कार्ड भारतीय मूल के विदेशी लोगों को भारत आने, यहां रहने और काम करने का अधिकार देता है। हालांकि, उन्हें वोट देने और संवैधानिक पद प्राप्त करने जैसे कुछ अन्य अधिकार नहीं होते।
भारतीय मूल के लोगों (पीआईओ) को ओसीआई (विदेश में रहने वाले भारतीय) कार्ड दिया जाता है।
फ़ैसले पर आसिफ़ की प्रतिक्रिया
आसिफ़ तासीर ने बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास को बताया कि वे अपना ओसीआई कार्ड रद्द करने के फ़ैसले से काफ़ी आहत हैं और उन्हें लगता है कि जिस तरह से ऐसा किया गया वो बहुत कुटिल योजना थी। उन्होंने कहा, पहले उन्होंने अपने एक आदमी से मुझे उग्र इस्लामी कहलवाकर मेरी छवि खऱाब की और फिर इस घटना को प्रेस को लीक करवाया।
आसिफ़ ने बताया कि उनके पास 2000 से ही पीआईओ कार्ड है जिसे बाद में ओसीआई कार्ड में बदल दिया गया। उन्होंने बताया कि वो दो साल से 10 साल और फिर 26 साल से 35 साल की उम्र तक भारत में रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पास भारत में बैंक खाते हैं, आधार कार्ड है और वे भारत में टैक्स भी भरते रहे हैं।
आसिफ़ ने कहा,मेरे पिता का नाम इन दस्तावेज़ों में दर्ज है। मेरे पास इस बात को साबित करने का कोई कागज़़ी सबूत नहीं है क्योंक हमारे बीच कोई संपर्क नहीं था और मेरी मां भी उनसे अलग रहती थीं।
आसिफ़ तासीर ने अपने पिता के साथ संबंध के बारे में विस्तार से एक किताब में लिखा था जो 2007 में प्रकाशित हुई थी। उनकी मां तवलीन सिंह एक पत्रकार हैं। उनके माता और पिता की शादी नहीं हुई थी और आसिफ़ ने अपने जवाब में लिखा है कि उनकी मां ही क़ानूनन उनकी अभिभावक हैं।
आसिफ़ ने कहा, अगर कोई भ्रम था तो वो मुझसे पूछ सकते थे क्योंकि उन्हें पता था कि मैं जान-बूझकर कुछ भी ग़लत नहीं कर रहा। अपने पिता का नाम छिपाने का कोई सवाल ही नहीं है: उनका नाम दस्तावेज़ पर है, और मैं उनके बारे में लिखता भी रहा हूँ।
क्या है मामला
मामले ने तूल गुरुवार को अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट 'द प्रिंट' के एक लेख से पकड़ा जिसमें लिखा था कि 'टाइम पत्रिका में मोदी की आलोचना वाले लेख के बाद सरकार लेखक आतिश अली तासीर के ओसीआई कार्ड को रद्द करने पर विचार कर रही है।'
आतिश तासीर ने अमरीका की प्रतिष्ठित पत्रिका 'टाइम' के इस साल के मई अंक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक लेख लिखा था।
पत्रिका के 20 मई 2019 वाले अंतरराष्ट्रीय संस्करण के कवर पेज पर छपे उस लेख के शीर्षक में नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ 'ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड'ह्य ष्ठद्ब1द्बस्रद्गह्म् ढ्ढठ्ठ ष्टद्धद्बद्गद्घ (महाविभाजनकारी)' लिखा गया था। इस लेख को लेकर भारत में काफ़ी विवाद भी हुआ था।
मगर 'द प्रिंट' की इस स्टोरी पर आपत्ति जताते हुए गृह मंत्रालय की प्रवक्ता ने गुरुवार रात को अपने ट्विटर हैंडल पर स्पष्टीकरण दिया और इसे ग़लत बताया।
इसके आगे भी गृह मंत्रालय की प्रवक्ता के ट्विटर हैंडल से कई ट्वीट किए गए। इनमें से एक ट्वीट में लिखा गया है, "श्री आतिश अली ने पीआईओ आवेदन करते समय ये बात छिपाई कि उनके पिता पाकिस्तानी मूल के थे।"
"श्रीमान् तासीर को उनके पीआईओ/ओसीआई कार्ड के संबंध में जवाब/आपत्तियां दर्ज करने का मौका दिया गया लेकिन वो ऐसा करने में असफ़ल रहे।"इसलिए, आतिश अली तासीर नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार ओसीआई कार्ड प्राप्त करने के लिए आयोग्य हो जाते हैं। उन्होंने बुनियादी ज़रूरी बातों और छिपी हुई जानकारियों को लेकर स्पष्ट रूप से अनुपालन नहीं किया है।"
आतिश ने किया खंडन
आतिश अली तासीर ने गृह मंत्रालय की बातों को ग़लत बताते हुए एक तस्वीर ट्वीट की है। उन्होंने गृह मंत्रालय की प्रवक्ता के एक ट्वीट का जि़क्र करते हुए लिखा, ''ये सच नहीं है। मेरे जवाब पर ये कांउसिल जनरल की एक्नॉलेजमेंट (पावती) है। मुझे जवाब देने के लिए 21 दिनों की जगह सिफऱ् 24 घंटों का समय दिया गया। तब से मंत्रालय की तरफ़ से मुझे कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है।"
आतिश तासीर ने ट्वीट के साथ अपने मेबलॉक्स की एक तस्वीर भी लगाई है। इसमें दिख रहा है कि उन्होंने भारतीय गृह मंत्रालय से मिले एक पत्र के संबंध में अपना जवाब दिया है और डिप्टी काउंसिल जनरल के एक मेल में इस जवाब को प्राप्त करने की बात कही गई है।
इसके लगभग दो घंटे बाद अपने ओसीआई कोर्ड के रद्द होने की जानकारी दी और इस संबंध में मिली सूचना वाले ईमेल का स्क्रीनशॉट शेयर किया है।
इसमें नियमों का हवाला देते हुए ओसीआई पंजीकरण को रद्द करने की सूचना देते हुए आतिश तासीर को अपना ओसीआई कार्ड न्यूयॉर्क स्थित भारत के महावाणिज्यदूतावास में जमा करने के लिए कहा गया है।
इस स्क्रीनशॉट के साथ आतिश ने लिखा है, "मुझे ये प्राप्त हुआ। कुछ घंटे पहले तक गृह मंत्रालय ख़ुद मान रहा था कि उसे नहीं पता कि मैंने जवाब दिया है या नहीं। मगर अब वे किसी तरह- संभवत: जब गृह मंत्रालय बंद है- मेरे मामले की समीक्षा 'उचित अधिकारी' से करवाने और मेरे ओसीआई को रद्द करने में सफल रहे हैं।" (बीबीसी)

 


Date : 07-Nov-2019

वंदना
सात नवंबर 1969 - आज से 50 बरस पहले हिंदी की एक फि़ल्म रिलीज़ हुई थी सात हिंदुस्तानी।
दिग्गज लेखक-निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास की इस फि़ल्म में उत्पल दत्त थे जो साहित्य, पत्रकारिता और फिल्मी दुनिया की जानी मानी शख्सियत थे। साथ में था दुबला पतला और लंबे कद वाला एक नया लडक़ा- नाम था अमिताभ बच्चन। ऐसा नाम जिसे तब तक कोई नहीं जानता था।
निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास से जब अमिताभ से पहली बार मिले तो उस मुलाकात का जिक्र किताब ‘ब्रेड ब्यूटी रिवॉल्यूशन: ख्वाजा अहमद अब्बास’ में किया गया है।
इस किताब में सईदा हमीद और इफ्फ्त फातिमा ने अब्बास की आत्मकथा और उनके लेखों को एक जगह समेटा है। किताब में अब्बास साहब ने लिखा है -
ख्वाजा अहमद अब्बास - आपका नाम ?
जवाब- अमिताभ...
ख्वाजा अहमद अब्बास - फिल्मों में पहले काम किया है ?
जवाब- किसी ने लिया नहीं अब तक...
ख्वाजा अहमद अब्बास - क्यों क्या कमी लगी आपमें ?
जवाब- (कई बड़े नाम लेते हुए) सब कहते हैं कि उनकी हीरोइनों के हिसाब से मैं बहुत लंबा हूँ।
ख्वाजा अहमद अब्बास- हमारी फिल्म में ऐसी कोई दिक्कत नहीं क्योंकि इसमें हीरोइन ही नहीं है।
जब फिल्मफेयर ने किया अमिताभ को रिजेक्ट
अब्बास को अपनी फिल्म के लिए ऐसे युवक की तलाश थी जो एक्टिंग के गुर जानता हो, दिखने में दुबला-पतला हो, ख़ूबसूरत और जोशीला हो।
बात 1969 से पहले की है। उस वक्त अमिताभ बच्चन कलकत्ता की ‘बर्ड एंड को’ कंपनी में काम किया करते थे। सुबह से शाम दफ्तर में काम और शाम को थिएटर करते। एक्ंिटग का शौक अमिताभ को लग चुका था।
अमिताभ बच्चन ने कुछ साल पहले अपने ब्लॉग में लिखा था, ‘मैंने मैगजीन फिल्मफेयर-माधुरी की प्रतियोगिता के लिए फोटो भेजी जो फिल्मों में जगह बनाने वाले चेहरों के लिए अच्छा मंच होता था। मेरी फ़ोटो रिजेक्ट हो गई, क्या ये कोई अचरज की बात थी।
लेकिन अमिताभ ने फिल्मों में किस्मत आजमाने का मन बना लिया था। वो कलकत्ता में अपनी ठीक ठाक नौकरी छोड़ मुंबई आ गए।
उन्हीं दिनों के ए अब्बास गोवा की आज़ादी के संघर्ष पर फि़ल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें सात हीरो चाहिए थे जो एक दूसरे से एकदम जुदा हों।
एक रोल के लिए अब्बास साहब ने नए लडक़े टीनू आनंद को लिया था जो उनके दोस्त और मशहूर लेखक इंदर राज के बेटे थे। टीनू आनंद की एक दोस्त थी नीना सिंह, जो मॉडल थी। सातवें हिंदुस्तानी के लिए नीना को लिया गया। अमिताभ बच्चन दूर-दूर तक फि़ल्म का हिस्सा नहीं थे।
पहले रोल के लिए मिले 5000
निर्देशक और एक्टर टीनू आनंद कई बार मीडिया से बातचीत में ये किस्सा सुना चुके हैं, ‘हुआ कुछ यूँ कि मुझे बीच सत्यजीत रे के सहायक निर्देशक बनने का प्रस्ताव मिला। वैसे भी मैं वो रोल शौकिया तौर पर कर रहा था। मैंने वो रोल छोड़ कलकत्ता जाने का फैसला किया। इससे पहले मेरी दोस्त और अब फिल्म की हीरोइन बन चुकी नैना ने अपने कलकत्ता के किसी दोस्त की फोटो सेट पर दिखाई। अब्बास साहब जरा गर्म मिजाज़ के आदमी थे। नीना ने गुजारिश की कि मैं वो फोटो अब्बास साहब को दिखाऊँ ताकि ऑडिशन हो जाए। बस उस नए लडक़े को को सेट पर बुलाया गया।’
किताब ‘ब्रेड ब्यूटी रिवॉल्यूशन: ख्वाजा अहमद अब्बास’ किताब के एक लेख में अब्बास लिखते हैं,  ‘मैंने अमिताभ से मिलने के बाद कहा कि मैं 5000 रुपए से ज़्यादा नहीं दे सकता। अमिताभ के चेहरे पर थोड़ी मायूसी दिखी। मैंने पूछा कि क्या नौकरी में ज़्यादा पैसे मिलते हैं? जवाब आया हाँ, 1600 रुपए हर महीने।
तो मैंने पूछा ऐसी नौकरी छोडक़र क्यों आए हो जबकि अभी सिर्फ एक चांस भर है कि तुम्हे रोल मिल सकता है? तब अमिताभ ने बहुत ही आत्मविश्वास से कहा कि इंसान को ऐसा दांव खेलना पड़ता है। बस वो आत्मविश्वास देखते ही मैंने कहा रोल तुम्हारा।’
तो इस तरह अमिताभ बच्चन को उनकी पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी मिलना तय हो गया।
जब पता चला कि अमिताभ ‘बच्चन’ के बेटे हैं
लेकिन अभी एक पेंच बाकी था। जब रोल का कॉन्ट्रेक्ट लिखा जा रहा था तो अमिताभ ने अपना पूरा नाम बताया -अमिताभ बच्चन, पुत्र डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन।
इससे पहल तक उन्होंने के ए अब्बास को अपना नाम केवल अमिताभ बताया था। लेकिन डॉक्टर हरिवंश का नाम सुनकर ही ख्वाजा अहमद अब्बास ठिठक गए। हरिवंश राय बच्चन उस समय के उम्दा कवि थे और के ए अब्बास से उनकी जान-पहचान थी।
के ए अब्बास नहीं चाहते थे कि डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन से किसी तरह की गलतफहमी हो जाए। के ए अब्बास ने कहा डॉक्टर बच्चन को टेलीग्राम किया जाए कि उनका बेटा फिल्मों में काम करने वाला है।
दो दिन बाद पिता की टेलीग्राम आई और उसके बाद ही सात हिंदुस्तान के लिए कॉन्ट्रेक्ट साइन हुआ।
इस तरह 15 फरवरी 1969 को अमिताभ बच्चन ने अपने करियर की पहली फि़ल्म सात हिंदुस्तानी साइन की जो 7 नंबवर 1969 को रिलीज हुई।
इत्तेफाक की बात है कि जिस नीना सिंह ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और जो फिल्म की हीरोइन भी थीं और जो टीनू आनंद अमिताभ का नाम लेकर अब्बास साहब के पास गए थे, दोनों ही फिल्म नहीं कर सके।
नीना सिंह शूटिंग के एक शेड्यूल के बाद मुंबई लौटी ही नहीं और टीनू आनंद अपना रोल छोड़ सत्यजीत रे के सहायक बनने चले गए।
नीना की जगह जलाल आगा की बहन शहनाज को लिया गया जिन्होंने बाद में टीनू आनंद से शादी की।
हफ्ता भर पहले से लगानी पड़ती थी दाढ़ी
फिल्म की शूटिंग की कहानी भी काफी दिलचस्प है। फिल्म एक महिला क्रांतिकारी के नजरिए से आगे बढ़ती है जो अस्पताल में लेटे-लेटे उन पुराने दिनों को याद करती है जब देश के अलग-अलग धर्मों और इलाकों से आए उसके साथियों ने मिलकर गोवा को पुर्तगालियों से आजादी दिलवाई थी।
अमिताभ बच्चन बिहार के एक मुसलमान युवक अनवर अली का रोल कर रहे थे। फिल्म का बजट काफी कम था और ऐसे में मशहूर मेक अप आर्टिस्ट पंधारा जूकर बिना फ़ीस के काम करने के लिए तैयार हो गए लेकिन वो बहुत व्यस्त रहते थे।
के ए अब्बास एक किताब के विमोचन पर अमिताभ ने अपनी पहली फि़ल्म का किस्सा सांझा किया था, ‘शूटिंग मुंबई में नहीं गोवा में थी। मेक अप आर्टिस्ट जूकरजी ने कहा कि मेरे पास शूटिंग से एक हफ़्ते पहले का समय है तो मैं अमिताभ की दाढ़ी एक हफ़्ते पहले लगाकर चला जाऊँगा। उन दिनों मेक अप का काम उतना विकसित नहीं था। एक-एक बाल जोडक़र दाढ़ी बनती थी। मैं एक हफ़्ते तक दाढ़ी लगाकर घूमता रहा। एक हफ्ते तक नहाया तक नहीं कि दाढ़ी निकल न जाए।’
फिल्म में अमिताभ के काम की बहुत तारीफ  हुई थी। उन्हें एक ऐसे मुसलमान व्यक्ति का रोल करना था जो छह क्रांतिकारियों के साथ मिलकर गोवा की आज़ादी के लिए लड़ रहा है लेकिन सात हिंदुस्तानियों में वो अकेला है जिस पर अपने मजहब की वजह से शक का साया है कि कहीं वो गद्दार तो नहीं।
एक नए कलाकार के लिए वो मुश्किल रोल था। फिल्म का एक सीन है जहाँ अमिताभ का एक साथी और आरएसएस कार्यकर्ता मान लेता है कि अनवर यानी अमिताभ ने जेल में देश से गद्दारी की है।
लेकिन एक दिन लडख़ड़ाते अमिताभ को गोवा की जेल से बाहर फेंका जाता है जहाँ उसके पैर के तलवे चाकू के निशानों से कटे पड़े हैं जो दिखाता है कि प्रताडऩा के बावजूद उन्होंने देश के बाद गद्दारी नहीं की। इन चंद सीन में अमिताभ की अभिनय प्रतिभा का अंदाज़ा लग जाता है।
नहीं लगा कि ये दुबला पतला, लंबा इंसान कभी सुपरस्टार बनेगा
फिल्म में एक ही महिला किरदार था जिसे अभिनेत्री शहनाज ने निभाया था। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया था, उनकी आवाज जरूर शानदार थी लेकिन उन्हें देखकर मुझे उस वक्त तो कम से कम कतई नहीं लगा कि ये दुबला-पतला, लंबा इंसान कभी सुपरस्टार बन पाएगा। सेट पर वो बिलकुल खामोश रहते थे। फिर फिल्म के एक सीन में उन्हें पुर्तगाली टॉर्चर कर रहे हैं। उनका पांव काट दिया गया है और वो रेंग रहे हैं। ये सीन उन्होंने जब किया तो सेट पर मौजूद सारे लोग तालियां बजाने लगे और तब मुझे अहसास हुआ कि ये बंदा काफी दूर तक जाएगा।’ शहनाज बाद में टीनू आनंद की पत्नी बनी।
अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म होने के अलावा भी सात हिंदुस्तानी बहुत अहम फिल्म रही जो राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीयवाद और भाषाओं की दीवारों को लांघती एक फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
दरअसल के ए अब्बास एक प्रयोग करना चाहते थे कि जो एक्टर जिस भाषा या राज्य से है उससे एकदम अलग किरदार उससे वो फिल्म में करवाएँगे।
सो बंगाल के हीरो उत्पल दत्त को पंजाब का किसान बनाया, मलायली हीरो मुध को बंगाली बनाया, मॉर्डन दिखने वाला जलाल आगा को ग्रामीण मराठी बनाया, अभिनेता अनवर अली (महमूद के भाई) को एक आरएसएस कार्यकर्ता का रोल मिला था जिसे उर्दू से नफरत है और अमिताभ को उर्दू शायर का रोल दिया जो हिंदी को नापसंद करते हैं।
फिल्म का एक सीन है जहाँ अमिताभ को हिंदी में चि_ी आती है लेकिन वो ये कहते हुए पढऩे से इंकार कर देते हैं कि ये अरंतु-परंतु की भाषा अपने बस की नहीं और कहते हैं कि क्या जबड़ा तोड़ जुबान लिखी है।
फिल्म के एक किरदार में हिंदी के अरंतु-परंतु से चिढऩे वाला यही नौजवान आगे चलकर हिंदी फिल्मों का शहंशाह कहलाया- अमिताभ बच्चन। और आज उनकी पहली फिल्म को 50 साल हो गए हैं।

 

 

 


Date : 07-Nov-2019

भारत और पाकिस्तान में चर्चित करतारपुर कॉरिडोर 9 नवंबर को खुलने वाला है। इसे लेकर दोनों देशों के बीच समझौता हो चुका है और कई सांसद, विधायक व मंत्री करतारपुर जाने वाले पहले जत्थे का हिस्सा बनने जा रहे हैं।
दोनों देशों के बीच हुए समझौते में भारतीय पासपोर्ट धारकों एवं ओसीआई (भारतीय विदेशी नागरिकता) कार्ड धारकों के लिए वीजा मुक्त यात्रा, भारत के हिस्से को जोडऩे के लिए रावी नदी के डूबे क्षेत्र पर पुल निर्माण और रोज़ाना कम से कम पाँच हजार श्रद्धालुओं को दर्शन की इजाजत शामिल है।
पहले जत्थे में पंजाब के विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्रियों में हरसिमरत कौर व हरदीप सिंह पुरी शामिल होंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस पहले जत्थे की अगुवाई करेंगे।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की तरफ से और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पाकिस्तान की तरफ से कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे।
करतारपुर कॉरिडोर पंजाब स्थित डेरा बाबा नानक को करतारपुर स्थित दरबार साहेब से जोड़ेगा। इससे पहले लोगों को वीजा लेकर लाहौर के रास्ते दरबार साहेब जाना पड़ता था जो एक लंबा रास्ता था।
अब दोनों देशों के लोगों को इस यात्रा के लिए वीजा की जरूरत नहीं होगी।
लंबे समय से सिख करतारपुर कॉरिडोर की मांग करते रहे हैं ताकि तीर्थयात्री दरबार साहेब दर्शन के लिए जा सकें।
पिछले साल भारत और पाकिस्तान सरकार ने करतारपुर कॉरिडोर की नीव रखी थी। इसे लेकर दोनों देशों के बीच कुछ विवाद भी हुआ और दोनों ने अपनी-अपनी शर्तें सामने रखीं थी। अंत में दोनों देश एक समझौते पर पहुंच गए।
अब जैसे-जैसे कॉरिडोर खुलने की तारीख़ नज़दीक आ रही है तो लोगों के बीच भी चर्चा बढ़ गई है। पढि़ए करतारपुर साहेब से जुड़े कुछ सामान्य सवालों के जवाब -
करतारपुर कॉरिडोर कब खुल रहा है?
कॉरिडोर 9 नवंबर, 2019 को खुलेगा।
क्या करतारपुर कॉरिडोर वीज़ा मुक्त है?
करतारपुर कॉरिडोर के लिए कोई वीजा नहीं है।
यहां जाने की फीस क्या है?
ये 20 डॉलर है। जो लोग 9 और 12 नवंबर को जाएंगे उन्हें फीस का भुगतान नहीं करना होगा। 12 नवंबर को 550वीं गुरुनानक जयंती है।
20 डॉलर रुपये में कितने होते हैं?
लगभग 1400 रुपये।
क्या आपको पासपोर्ट ले जाने की जरूरत है?
यह करतारपुर कॉरिडोर के लिए ऑनलाइन आवेदन के दौरान जरूरी है। अब पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान ने घोषणा की है कि पासपोर्ट की जरूरत नहीं है और सिर्फ वैध पहचान पत्र लाना होगा।
करतारपुर कॉरिडोर को किसने फंड किया है?
दोनों सरकारों ने अपनी-अपनी तरफ से इसमें फंड दिया है।
आप करतारपुर कैसे जा सकते हैं?
आप ऑनलाइन पंजीकरण के लिए ये वेबसाइट द्धह्लह्लश्चह्य://श्चह्म्ड्डद्मड्डह्यद्धश्चह्वह्म्ड्ढ५५०.द्वद्धड्ड.द्दश1.द्बठ्ठ/ देख सकते हैं।
डेरा बाबा नानक से दरबार साहेब करतारपुर तक की दूरी कितनी है?
दोनों के बीच दूरी 4.6 किमी. है।
आप अपने पंजीकरण की ताजा जानकारी कहां देख सकते हैं?
आपको पंजीकरण के बाद नोटिफिकेशन प्राप्त होगा। इसके अलावा आप गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर भी देख सकते हैं।
क्या अनिवासी भारतीय (एनआरआई)भी करतारपुर कॉरिडोर से जा सकते हैं?
जिस व्यक्ति के पास ओसीआई कार्ड है वो करतारपुर कॉरिडोर से जा सकता है। अन्य लोगों को वीज़ा के लए आवेदन करना होगा।
क्यों अहम है ये जगह
सोमवार को होने वाले कार्यक्रम को भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के लिए अहम माना जा रहा है।
करतारपुर साहिब पाकिस्तान में आता है लेकिन इसकी भारत से दूरी महज़ साढ़े चार किलोमीटर है।
अब तक कुछ श्रद्धालु दूरबीन से करतारपुर साहिब के दर्शन करते रहे हैं। ये काम बीएसएफ़ की निगरानी में होता है।
श्रद्धालु यहां आकर दूरबीन से सीमा पार मौजूद करतापुर साहेब के दर्शन करते हैं।
मान्यताओं के मुताबिक, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक 1522 में करतारपुर आए थे। उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी 18 साल यहीं गुजारे थे।
माना जाता है कि करतारपुर में जिस जगह गुरु नानक देव का देहावसान हुआ था वहां पर गुरुद्वारा बनाया गया था।
दोनों देशों के बीच समझौते में क्या है
कोई भी भारतीय किसी भी धर्म या मज़हब को मानने वाला हो। उसे इस यात्रा के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं होगी।
यात्रियों के लिए पासपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवेल ऑथराइजेशन (ईटीए) की जरूरत होगी।
ये कॉरिडोर पूरे साल खुला रहेगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की लिस्ट 10 दिन पहले पाकिस्तान को देगा।
हर श्रद्धालु को 20 डॉलर यानि कऱीब 1400 रुपये देने होंगे।
एक दिन में पाँच हज़ार लोग इस कॉरिडोर के जरिए दर्शन के लिए जा सकेंगे।
अभी अस्थाई पुल का इस्तेमाल किया जा रहा है और आने वाले वक्त में एक स्थाई पुल बनाया जाएगा।
श्रद्धालुओं को इस यात्रा के लिए ऑनलाइन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा। ये पोर्टल गुरुवार से शुरु हो चुका है। आवेदकों के मेल और मैसेज के ज़रिए चार दिन पहले उनके आवेदन के कन्फर्मेशन की जानकारी दी जाएगी। (बीबीसी)

 

 

 


Date : 07-Nov-2019

कृष्ण कांत

यह पराली उर्फ पुआल से प्रदूषण नाम की बला कहाँ से आई? पारंपरिक रूप से धान हंसिया से काट लिया जाता है। बस थोड़ी सी जड़ रह जाती है जो जुताई के साथ मिट्टी में मिल जाती है। पुआल से धान अलग करके उसे खलिहान में लगा दिया जाता है। पूर्वी यूपी में आज भी ज्यादातर पुआल पशुओं को खिलाने के काम आता है। वहां पराली जलाई नहीं जाती। वैसे भी पराली एक बार भीग जाए तो मुश्किल से महीने भर में सडक़र मिट्टी हो जाती है। यह समस्या उपजी कैसे?
धान तो देश के तमाम हिस्से में उगाया जाता है तो पराली पंजाब में ही क्यों जलाई जाती है? क्योंकि हरित क्रांति के बहाने जब खेती में कंपनियों ने घुसपैठ की तो सरकार ने कहा कि तकनीकी खेती से पैदावार बढ़ाएंगे। ट्रैक्टर के अलावा बीज बोने और गेहूं-धान काटने की मशीनें लाई गईं। अमीर किसानों ने ये मशीनें खरीद लीं।
अब पंजाब का संकट है कि खेती मशीन से होती है तो पशुओं का योगदान भी बंद और पशुओं के भोजन के रूप में पराली की कोई उपयोगिता नहीं। किसान उसका करे क्या। तो उसने तरकीब निकाली कि इसे खेत में जलाकर राख कर दो टंटा खतम।
बेशक हरित क्रांति वाले क्षेत्रों ने अनाज उपलब्धता में अहम योगदान दिया, लेकिन सरकार जब पारंपरिक चीजों में दखल देती है तो उसके अंजाम की चिंता क्यों नहीं करती? यह वैसे ही है जैसे बीजेपी सरकार ने गौहत्या रोकने का बहाना लेकर पशुओं का पूरा बाजार तोड़ दिया लेकिन यह नहीं सोचा कि बेकार पशुओं का क्या होगा? अब आवारा पशु समस्या बने हुए हैं। क्योंकि किसान उतने ही जानवर रखता है जितने की परवरिश कर सके। किसान ऐसा नहीं होता जो तमाम बेकार पशुओं को अपने खूंटे पर बांधकर भूखा मारे। यह काम कथित योगी और फकीर की गौशालाएं ही कर सकती हैं।
कहने का मतलब है कि सरकार के प्रयासों से हम अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर तो हुए, लेकिन इसकी भारी कीमत चुकाई है। किसानों को लालच देकर कर्ज बांटा गया तो उसका परिणाम 3 लाख से ऊपर आत्महत्याओं के रूप में सामने आया जिसका सरकार के पास कोई हल नहीं है। इसी तरह तकनीकी खेती का परिणाम पराली का धुआं है।
किसानों को कोसने की जगह आप अपने विकास मॉडल पर तरस खाइये कि आप काला धन रोकने निकलते हैं तो नोटबंदी कर देते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। पराली सरकार का दिया तोहफा है।
एक जानकार का तो यह भी कहना है कि मशीनों को खपाने के लिए ही यह पराली और धुएं का महाभारत रचा जा रहा है। एक खतरनाक स्तर का प्रदूषण तो पूरे साल होता है तो प्रदूषण पर बहस सिर्फ 15 दिन क्यों होती है जब धान काटने का सीजन होता है।
इस साल 5 नवम्बर तक पूरे साल में सिर्फ दो दिन ऐसे गुजरे जब दिल्ली की हवा में एक्यूआई सामान्य रहा, बाकी पूरे साल या तो खतरनाक श्रेणी का रहा या खराब रहा। फिर यह प्रदूषण चर्चा मियादी बुखार की तरह क्यों आती है?


Date : 06-Nov-2019

सुहैल ए शाह

कश्मीर घाटी में संचार सेवाएं पिछले दो महीने से ज़्यादा समय से बंद हैं, जो यहां अभी तक का सबसे लंबा संचार प्रतिबंध है। बीती पांच अगस्त को अनुच्छेद-370, जो भारत के संविधान में जम्मू कश्मीर को एक विशेष स्थिति देता था, हटा देने से एक दिन पहले सरकार ने सारी संचार सेवाएं बंद कर दी थीं।

इन दो महीनों में सरकार ने सिर्फ लैंड्लाइन फोन वापिस चालू किए हैं, जबकि इंटरनेट सेवाएं और मोबाइल फोन अभी भी बंद हैं। सडक़ों पर लगे प्रतिबंध हटा दिये गए हैं लेकिन कारोबार ठप्प है -दुकानें, स्कूल, कॉलेज, निजी दफ्तर, यातायात सब कुछ बंद पड़ा हुआ है।
ऐसे में कश्मीर में इस समय स्थानीय लोगों के पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है, तो टीवी के सामने बिताया जाने वाला समय थोड़ा सा बढ़ गया है।
मैंने सालों से टीवी नहीं देखा था। पहले तो इसके लिए ज़्यादा वक़्त नहीं मिलता था और मिलता भी था तो ऑनलाइन कॉन्टेंट देखने में बीत जाता था। अब कई दिन लगातार किताबों के पन्ने टटोलने के बाद में भी इस ईडियट बॉक्स के सामने बैठ गया। टीवी खोलते ही सामने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार दिखे थे, किसी अस्पताल के कमरे में बेहोश पड़े मरीज के सामने लोगों को यह बता रहे थे कि इस मरीज ने अपना सारा पैसा हस्पताल के बिल भरने में गंवा दिया।
जब अक्षय यह कह रहे थे कि ‘सिर्फ 5 रुपया प्रतिदिन में आप अपना स्वास्थ बीमा करा सकते हैं’ तो मुझे अपने पड़ोस में रहने वाले इजाज अहमद की याद आ गयी। उनसे कुछ दिन पहले ही मेरी मुलाक़ात मोहल्ले के नुक्कड़ पर हुई थी।
इजाज परेशान थे, उनकी माता जी का ऑपरेशन होना था और उनके पास पैसे नहीं थे। पता नहीं अक्षय कुमार की बात सुनकर या खुद की ही अक्ल से इजाज ने अपने परिवार के लिए स्वास्थ बीमा ले तो लिया था लेकिन इंटरनेट बंद होने के चलते उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। ‘अस्पताल वाले भी बेचारे क्या करें। वो लोग भी लाचार हैं,’ इजाज ने मुझे बताया था।
इजाज की ही तरह घाटी में हजारों लोग इस समय अपने परिजनों का इलाज कराने के लिए दूसरों के मोहताज हो गए हैं। इन लोगों में ख़ासी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वास्थ योजना का ‘गोल्ड कार्ड’ है। लेकिन बावजूद इसके इन्हें औरों से इलाज के लिए पैसे मांगने पड़ रहे हैं। जिनके पास पैसे हैं उनको भी बैंक या एटीएम से निकालने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बैंक भी छुप-छुपा के काम कर रहे हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर बैंक की एक शाखा का जेनरेटर किसी ने जला दिया था और उसके बाद मिलीटेंट्स ने बैंक वालों को धमकी दे दी कि वे काम न करें। ‘ऐसे में पिछले 5 दिनों से बैंक से अपने ही पैसे लेने के लिए, एक शाखा से दूसरी और एक एटीएम से दूसरी तक भटक रहा हूं लेकिन अभी पैसे नहीं मिले’ अनंतनाग जिले के ज़मीर अहमद, जिनको अपने बेटे के इलाज के लिए श्रीनगर के एक हस्पताल जाना था, सत्याग्रह से कहते हैं। दिल में यह सवाल था कि क्या अक्षय कुमार को पता होगा भारत में हजारों लोग अभी ऐसे हैं जो बीमा होते हुए भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।
खैर, अक्षय कुमार कहां मेरे सवाल का जवाब देने के लिए रुकने वाले थे। ध्यान फिर से टीवी की तरफ गया तो अक्षय कुमार वहां से जा चुके थे और स्क्रीन पर अब गूगल सर्च का विज्ञापन आ रहा था। इसमें एक जोड़ा अपनी शादी के लिए ‘वैडिंग फॉटोग्राफर’ की तलाश कर रहा था। उन्हें फॉटोग्राफर मिल जाता है और धूमधाम से उनकी शादी भी हो जाती है। विज्ञापन देखकर ध्यान मरियम बानो की तरफ गया, जिनकी बेटी की शादी अभी कुछ समय पहले ही हुई है।
मरियम, जो एक विधवा हैं, ने शादी के लिए 40 हजार रुपये देकर एक मैरिज हाल बुक किया था। लेकिन जब शादी का वक्त आया तो मैरिज हाल वालों से संपर्क करना संभव नहीं था। वैसे इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी क्यूंकि 300 मेहमानों में से सिर्फ 30 या 40 ही आ पाये थे।
तो कुल मिलाकर सिर्फ विदाई हुई और वह भी इस तरह से कि उसके होते-होते मरियम का कलेजा हलक में आ गया था। दूल्हे को चार बजे आने को कहा गया था लेकिन वह 9 बजे पहुंचा। ‘पता चला कि उसको सुरक्षाकर्मियों ने कम से कम सात जगहों पर रोका था और आगे जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे’ मरियम सत्याग्रह को बताती हैं। जैसे-तैसे दूल्हा पहुंचा और शादी हुई। अब हालात थोड़े सामान्य हो गए हैं तो रिश्तेदार आकर फोटो दिखाने को कहते हैं। मरियम मोबाइल से खींची कुछ तस्वीरें उन्हें मोबाइल पर ही दिखा देती हैं।
इन खय़ालों से ध्यान भटकाने के लिए मैंने सोचा कोई फिल्म ही देख लूं। खोजा तो देखा अजय देवगन की सिंघम किसी चैनल पर चल रही है। दस पंद्रह मिनट तो रोहित शेट्टी की अद्भुत मार-धाड़ में निपट गए। फिर देखा कि अजय देवगन फिल्म में अपने होने वाले ससुर को उनका ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर होने के लिए फटकार लगा रहे थे। ‘कल सुबह आरटीओ ऑफिस आ जाइएगा दो फोटो लेकर, स्माइल के साथ’ सिंघम अपने ससुर से कहते हैं।
‘काश इतना आसान होता’ मैं सोचने लगा, क्यूंकि फिर मुझे मुझे गुलजार अहमद डार याद आ गए थे, जो अपना परिवार चलाने के लिए ड्राइवर का काम करते हैं। उनका भी सिंघम के ससुर की तरह ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर हो गया है। पिछले एक महीने से गुलजार श्रीनगर के आरटीओ ऑफिस के चक्कर काट रहे हैं लेकिन इस लेख को लिखे जाने तक उनका लाइसेंस रिन्यू नहीं हुआ है।
‘मैं अपनी जान जोखिम में डालकर गाड़ी लेकर निकल पड़ता, लेकिन पुलिस वाले चालान काट देते हैं और वह भी इतना कि आदमी भर ही नहीं पाये। आरटीओ ऑफिस वाले कह रहे हैं कि इंटरनेट बेन हटने से पहले वे कुछ नहीं कर सकते’ गुलजार सत्याग्रह को बताते हैं।
‘न नए लाइसेन्स, न रिन्यूवल और न लर्नर्स लाइसेन्स, कोई भी सुविधा नहीं दे पा रहे हैं हम। और ऐसा तब तक चलता रहेगा जब तक इंटरनेट नहीं चल जाता है यहां’ अपनी मजबूरी बताते हुए श्रीनगर के आरटीओ ऑफिस के एक अधिकारी सत्याग्रह से कहते हैं।
में अभी भी सिंघम देख ही देख रहा था कि बीच में विज्ञापन फिर आ गए। इस बार एक ऑनलाइन शॉपिंग की वैबसाइट का विज्ञापन था, ‘क्रोमा’। शायद नयी वैबसाइट है, मैंने कभी पहले नाम नहीं सुना था। विज्ञापन में पूरा क्या था यह तो मैंने ध्यान से नहीं देखा लेकिन उसका संदेश यह था कि क्रोमा वाले आप तक सिर्फ तीन घंटे में चीजें पहुंचा देते हैं। मैं हंस पड़ा।
कुछ समय पहले मेरे पिताजी को जोड़ों के दर्द के लिए डॉक्टर ने एक अच्छा स्पोर्ट्स शू पहनने की सलाह दी थी। मैंने ऑनलाइन एक अच्छा सा जूता देखा और ऑर्डर कर दिया। क्रोमा की तरह तीन घंटे में तो नहीं, एक हफ्ते में वह एमज़ोन से आने वाला था।
अब किसी वेयरहाउस में पड़ा वह धूल खा रहा होगा। देश के अन्य भागों की तरह कश्मीर में भी जगह-जगह लोगों ने ऑनलाइन शॉपिंग की डिलीवेरी सेवाएं अपने जि़म्मे लेकर वेयरहाउस बना लिए हैं। ‘मेरे वेयरहाउस में लाखों का माल धूल में सड़ रहा है। और पिछले दो महीनों से कोई नया माल नहीं आया है। हमारे खाने के लाले पड़ गए हैं’ दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में एक ऐसा ही डिलीवरी सेंटर चला रहे, मुश्ताक़ अहमद मीर, सत्याग्रह को बताते हैं। मुश्ताक के बारे में मैं सोचा ही रहा था कि मेरे बेटे की बात से मेरा ध्यान टूटा। ‘मैंने अपनी साइकिल के लिए लाइट मंगाई थी। कब आएगी’ उसने पूछा तो मैं जवाब में बस ‘जल्दी’ बोल पाया।
टीवी की तरफ फिर ध्यान गया तो देखा गूगल सर्च का एक और विज्ञापन चल रहा था। इस बार एक गंजा व्यक्ति अपने लिए हज्जाम ढूंढ रहा था, ‘सलोन्स नियर मी’
‘मुझे भी बाल कटवाने हैं’ मैंने सोचा। नहीं, गंजे को देखकर नहीं, विज्ञापन देखकर। लेकिन कश्मीर में इस समय बाल कटवाना भी और कामों की तरह ही असंभव सा हो गया है।
पांच अगस्त से पहले ही सरकार के आदेश के अनुसार कश्मीर घाटी से बाहर के राज्यों से यहां आए सारे लोग चले गए थे और उसमें उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आए सैंकड़ों नाई भी शामिल हैं। पिछले कुछ साल में इन नाइयों ने पूरी तरह से कश्मीर के स्थानीय नाइयों की जगह ले ली थी।
अब ये लोग यहां नहीं हैं तो लोगों को काफी दिक्कत हो रही है। कश्मीर के स्थानीय नाई फिर मैदान में कूद तो पड़े हैं, लेकिन वे बहुत थोड़े से हैं और कारीगर भी बिजनौर वालों के मुक़ाबले के नहीं हैं। तभी टीवी पर देखा कि क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली किसी को फिलिप्स का शेवर इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं। मैं मुस्कुरा दिया और सोचा कि चलो दाढ़ी तो बना ही सकता हूं। उकताकर मैंने चैनल बदला और सोचा थोड़ी देर न्यूज़ देख लूं। देखा एनडीटीवी पर एक महिला कह रही थीं कि उनके माता-पिता बीमार हैं और उनका सारा पैसा उस बैंक में पड़ा हुआ है जो वे निकाल नहीं पा रही हैं। साथ में वित्त मंत्री, निर्मला सितारमण के दफ्तर के बाहर ऐसे ही कुछ अकाउंट होल्डर्स के किए गए प्रदर्शन की भी खबर भी थी।
ध्यान फिर कश्मीर के बीमारों की तरफ गया। ‘कम से कम यह लोग प्रदर्शन तो कर पाते हैं’ मैंने सोचा। फिर निराश होकर रिमोट उठाया और टीवी बंद करने लगा तो एनडीटीवी पर भी विज्ञापन चलने लगा था, ‘एयरटेल एक्स-स्ट्रीम’ का, जिसमें नेट्फ़्िलक्स और एमज़ोन प्राइम देखने को मिलता है।
यह सोचकर कि इंटरनेट चलेगा तो नेट्फ़्िलक्स और एमज़ोन प्राइम देखूंगा, मैंने अपना टीवी बंद कर दिया। (सत्याग्रह)


Date : 06-Nov-2019

पुलिस और अभियोजक सेक्स वर्करों की बलात्कार की शिकायत पर कार्रवाई करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते. ये आरोप ब्रिटेन की सेक्स वर्करों ने लगाया है.

1995 के बलात्कार से जुड़े ऐतिहासिक मुकदमे के 25 साल बीत जाने के बाद भी सेक्स वर्करों को बलात्कार और उन पर होने वाले दूसरे हमलों में न्याय के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है. ब्रिटेन में सेक्स वर्करों के स्वयंसेवी संगठन इंग्लिश कलेक्टिव ऑफ प्रॉस्टिट्यूट्स का कहना है कि उन्हें अकसर अधिकारियों के अविश्वास और खुद को ही सजा मिलने की आशंका से जूझना पड़ता है. ईसीपी की सदस्य निकी एडम्स कहती हैं, "एक समय लग रहा था कि चीजें बेहतर हो रही हैं लेकिन अब लग रहा है कि सब कुछ पीछे जा रहा है."
ईसीपी का आकलन है कि करीब दो तिहाई सेक्स वर्करों को किसी ना किसी तरह की हिंसा झेलनी पड़ती है. हाल ही में उनकी समस्याओं को लेकर लंदन में एक प्ले भी हुआ. निकी एडम्स बताती हैं, "नो बैड वीमेन: रेप ऑन ट्रायल, ने दिखाया है कि सेक्स वर्करों को कोर्ट में किस तरह से हमले झेलने पड़ते हैं और कैसे बलात्कारियों की बजाय उन्हीं का ट्रायल शुरू हो जाता है. वो अकसर यह मान लेते हैं कि अगर आपने सेक्स के लिए सहमति दे दी है तो आपको बलात्कार से इनकार का कोई हक नहीं है."
पुलिस सेक्स वर्करों की सुरक्षा को बेहतर करने और उनमें भरोसा बनाने की कोशिश कर रही है. नेशनल पुलिस चीफ्स काउंसिल का कहना है कि हाल ही में उसने ऐसे अधिकारियों को ऐसे दिशानिर्देश जारी किए हैं कि जब कोई सेक्स वर्कर कोई रिपोर्ट करे तो उन्हें अपराधी मान कर उसकी छानबीन नहीं करनी है. 
ब्रिटेन के क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस का कहना है कि वह पर्याप्त सबूत होने पर ही कार्रवाई कर सकता है और उसने अपने कर्मचारियों को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया है कि वे सहमति की बात को समझें और अकसर सेक्स वर्करों के बारे में बनी हुई छवि और मिथकों को तोड़ें. प्रॉसिक्यूशन सर्विस के एक प्रवक्ता ने कहा, "सेक्स वर्करों के अधिकार सहमति को लेकर वैसे ही हैं जैसे किसी और के, जिस लेन देन के लिए ग्राहकों के साथ मोलभाव करती हैं वह सहमति से किए गए कामों के लिए होता है बलात्कार या फिर यौन उत्पीडऩ के लिए नहीं."
सितंबर में जारी आंकड़ों से पता चलता है कि इंग्लैंड और वेल्स में साल 2018-19 में बलात्कार के मामलों में सबसे कम लोगों को दोषी ठहराया गया जबकि पुलिस में दर्ज हुई शिकायतों में इस दौरान काफी इजाफा हुआ था.
1995 के मशहूर मुकदमे का ब्यौरा "नो बैड वीमेन" में भी दिखाया गया. यह दो सेक्स वर्करों के बारे में हैं जिनसे एक ही आदमी अलग अलग समय पर चाकू की नोक पर बलात्कार करता है. बाद में सेक्स वर्कर शिकायत करती हैं लेकिन मुकदमे खारिज कर दिए जाते हैं. ईसीपी का कहना है कि यह मुकदमा पूर्वाग्रह के कारण खारिज किया गया था.
इस फैसले से नाराज इसीपी और वीमेन अगेंस्ट रेप ने एक कानूनी टीम जुटाई और उन महिलाओं की मदद की जिसके बाद बलात्कारी को गिरफ्तार किया गया और उसे जेल हुई. एडम्स ने इस मुकदमे में अहम भूमिका निभाई थी.
नाटक का ज्यादातर हिस्सा मुकदमे की प्रतिलिपियों पर ही आधारित था. जिसमें यह दिखाया गया कि पीडि़त सेक्स वर्करों के चरित्र को लेकर कैसे सवाल किए गए. कैसे उनकी कहानियों पर अविश्वास जताया गया.
इंडोनेशिया में देह व्यापार गैरकानूनी है. इसे नैतिक अपराध माना जाता है. लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में देह व्यापार काफी फैला हुआ और संगठित है. यूनिसेफ के मुताबिक इंडोनेशिया में देह व्यापार से जुड़ी 30 फीसदी युवतियां नाबालिग है.
एडम्स का कहना है कि सेक्स वर्करों से लेकर ड्रग का इस्तेमाल करने वाली और यहां तक कि मानसिक असंतुलन वाली महिलाओं को "अच्छी पीडि़ता" नहीं माना जाता. ऐसे में उन पर हमला करने वालों को सजा दिलाने में उन्हें जंग लडऩी पड़ती है. एडम्स ने कहा, "बहुत से अलग अलग कारण है जिनके कारण कोर्ट में महिलाओं को खारिज कर दिया जाता है. हम एक बात पूछना चाहते हैं कि आखिर इतना सम्मानित कौन है जिसे संरक्षण मिलेगा, सच में? क्योंकि फिर तो इसमें बहुत कम ही लोग आएंगे."
करीब दर्जनों सेक्स वर्करों से सबूत इक_ा करने के बाद गृह मंत्रालय के लिए बनाई गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि "बहुत सी" औरतों ने काम के दौरान शारीरिक या फिर यौन हिंसा झेली है लेकिन ये लोग अकसर पुलिस में शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं.
इसमें एक चिंता देह व्यापार के लिए बनाए नियमों को लेकर भी है. ब्रिटेन में देह व्यापार अपराध नहीं है लेकिन सेक्स वर्करों को ग्राहक पटाने या फिर साथ मिल कर देहव्यापार के अड्डे चलाने के लिए उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है. उन्हें डर लगता है कि अगर वो पुलिस में शिकायत करेंगी तो उन पर ही मुकदमा चल जाएगा. एडम्स कहती हैं, "हर कोई यह मानता है कि सेक्स वर्करों के खिलाफ बहुत हिंसा होती है. पुरुष यह जानते हैं कि अगर वो सेक्स वर्करों पर हमला करेंगे तो ज्यादा उम्मीद इसी बात की है कि वो छूट जाएंगे."
एनआर/एमजे(रॉयटर्स)


Date : 05-Nov-2019

भागीरथ श्रीवास

दिल्ली और एनसीआर में सर्दियों में स्मॉग प्रदूषण पर बहुत हल्ला मचता है। स्मॉग धुंध और कोहरे का मिश्रण है जो पर्यावरण में प्रदूषण को खतरनाक स्तर पर पहुंचा देता है। स्मॉग प्रदूषण आज की परिघटना नहीं है। स्मॉग का जिक्र सबसे पहले 1905 में लंदन के रसायनशास्त्री एचए डेस वॉक्स ने किया था। उस वक्त लंदन की हवा धुएं से बेहद खराब हो गई थी। उन्होंने 1911 में ब्रिटेन की स्मोक एबेंटमेंट लीग को भेजी रिपोर्ट में बताया था कि दो साल पहले ग्लास्गो और एडिनबर्ग में हुई मौतें स्मॉग का परिणाम थीं। इससे पहले 13वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सम्राट एडवर्ड प्रथम ने लंदन में स्मॉग की वजह बनने वाले समुद्री कोयले पर प्रतिबंध लगा दिया था और लकड़ी के इस्तेमाल का आदेश दिया था।
आदेश न मानने पर मृत्युदंड का प्रावधान था लेकिन लंदन के लोग इससे भयभीत नहीं हुए। दरअसल उस समय लकड़ी महंगी थी और समुद्री कोयला उत्तरपूर्वी तट पर बहुतायत में था। समुद्री कोयला बहुत ज्यादा धुआं छोड़ता था और यह कोहरे के साथ मिलकर स्मॉग बनाता था। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वैज्ञानिक जॉन ग्रांट और जॉन एवलिन ने पहली बार स्मॉग को बीमारियों से जोड़ा। एवलिन ने लिखा कि लंदन के नागरिक धुंध की मोटी और अशुद्ध परत में सांस ले रहे हैं। इससे उन्हें भारी असुविधा हो रही है। 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के बाद हालात और बदतर हो गए। पहले जहां लंदन में साल में 20 दिन धुंध छाई रहती थी, 19वीं शताब्दी में वह बढक़र 60 दिन हो गई। 
स्मॉग से हालात खराब होने पर राजनेताओं का इस पर ध्यान गया। ग्रेट ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विस्काउंट पाम्र्सटन को 1853 में कहना पड़ा, लंदन में शायद 100 भद्र पुरुष हैं जो विभिन्न भट्टियों से जुड़े हैं। वे अपने 20 लाख लोगों की सांसों में धुआं भरना चाहते हैं जिसका शायद वे खुद भी उपभोग न करें। धुएं के विरोध में खड़े लोगों और ब्रिटिश संसद में पाम्र्सटन की मजबूत स्थिति के कारण 1853 में लंदन स्मोक एबेटमेंट एक्ट पास हो गया। इस कानून ने लंदन की पुलिस को धुआं फैलाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की ताकत दे दी।
1891 में ये शक्तियां स्वच्छता से संबंधित प्राधिकरणों को स्थानांतरित कर दी गईं। हालांकि कानून से बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा। उद्योपतियों ने दलील दी कि 95 प्रतिशत धुआं लंदन के 700,000 घरों की चिमनियों से निकलता है। यहां तक िक लंदन काउंटी काउंसिल ने भी स्वीकार किया कि खुले में आग जलाना हमारी जिंदगी में शामिल हो चुका है और इसे खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता। धुआं फैलाने वालों के अपराध सिद्ध करने के लिए अधिकारियों को यह भी साबित करना था कि उनके परिसर से निकलने वाला धुआं काले रंग का है। अत: दोष सिद्ध करना असंभव था।
इन सबसे बीच धुआं निर्बाध रूप से जारी रहा। अध्ययन में यह साबित हुआ कि 1873 के स्मॉग में 250 लोगों की मौत ब्रोंकाइटिस से हुई है। 1892 में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए। सबसे दर्दनाक हादसा 1952 में हुआ जब लंदन में महज चार दिन के भीतर स्मॉग के कारण 4,000 लोग मारे गए। इस हादसे के बाद जनदबाव के कारण सरकार को हग बेवर की अध्यक्षता में समिति गठित करने को मजबूर होना पड़ा।
समिति ने 1953 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि घरों में उद्योगों से दोगुना धुआं निकलता है। समिति के सुझावों के चलते 1956 में ब्रिटिश क्लीन एयर कानून पारित हुआ। इस कानून ने ठोस, तरल और गैसीय ईंधनों को विनियमित किया। साथ ही औद्योगिक चिमनियों की ऊंचाई को नियंत्रित किया। पहले यह सब किसी कानून के दायरे में नहीं था। (डाऊन टू अर्थ)

 


Date : 05-Nov-2019

प्रकाश दुबे

कहावतें और परम्पराएं आसानी से करवट लेती हैं। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील होता है। नेता का बेटा, बहू, बेटी, पत्नी, प्रेयसी सब राजनीति के महल में जगह पा जाते हैं। वक्त ने करवट ली। नए रिवाज के हिसाब से नेता के बेटे राजनीति में सफल रहें या हार जाएं, खेल के कारोबार की कुर्सी बोनस में उनसे जा चिपकती है। गुजरात, हिमाचल प्रदेश के सभी दलों के नेता आसानी से यह बात समझ गए। पूर्व सांसद रामेश्वर डूडी लड़ाकू जाट हैं। राजनीति के पिच पर अकड़ गए।  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव राजस्थान क्रिकेट एसोशियेशन के अध्यक्ष बन गए हैं। डूडी समर्थक खेल संगठनों को मान्यता से वंचित कर दिया। एक मंत्री और मुख्य सचिव ने चुनाव अधिकारी को वश में किया। डूडी का दुखड़ा हमने सुना दिया। डूडी सौगंध ले चुके हैं कि अपने दिल के दाग सोनिया गांधी को ही बताएंगे। विकेट राजनीति में लेना है, क्रिकेट में नहीं।  
 सेब की सौगंध
कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का चेहरा सेब की तरह लाल हो गया। भारी पुलिस तैनाती के बावजूद बंगलूरु के हजारों लोग कट्टर येदि के विरोधी की अगवानी करने पहुंचे। यही नहीं, फूलों के साथ ही सेब फलों की विशाल माला से स्वागत किया। हजारों सेब में गुंथी माला वजनी थी। हवाई अड्डे तक दो क्रेन की सहायता से माला पहुंचाई गई। पुलिस ने टोंका तक नहीं। कई झटके खा चुके मुख्यमंत्री येदि का अपना ऐसा स्वागत कभी नहीं हुआ। जिस आदमी को 50 दिन जेल में रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी, जमानत मिलने के बाद उसका ऐसा स्वागत? गम दोगुना हो गया। डी.के. शिवकुमार जेल में हजामत तक नहीं बना पाए। भीड़ ने दाढ़ी वाले शिवकुमार के नए लुक-नए अंदाज को जमकर सराहा। शिवकुमार ने यह नहीं बताया कि दाढ़ी बढ़ाने के साथ कोई शर्त, कसम जुड़ी है?
 तिरुपति में आचमन
तिरुपति के बालाजी पर भरोसा रखने हजारों श्रद्धालु रोज दर्शन करने तिरुमला पहाड़ी चढ़ जाते हैं। उनकी श्रद्धा के बावजूद तिरुपति शहर में शराब दूकानों और होटलों में बार की भरमार है। तिरुमला तरुपति विकास बोर्ड को चिंता है कि बालाजी दर्शन के बाद भक्तजन लक्ष्मी के आर्शीवाद को मदिरा सेवन में न उड़ा दें। बोर्ड ने आंध्र प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर तिरुपति शहर में मदिरा व्यवसाय पर रोक लगाने की मांग की है। तिरुपति में घोर जल संकट है। किसी ज्ञानी ने सोचा होगा कि जल संकट के कारण सुरापान का विकल्प अपनाया जाता होगा। मुख्यमंत्री जगन्मोहन रेड्डी को भी इस बात की, पेयजल संकट की चिंता नहीं है। इसलिए तिरुपति बोर्ड ने जलाशय बनाने की पहल की। बालाजी जलाशय के निर्माण पर ज्यादा नहीं, करीब दो अरब रुपए खर्च आएगा। पूरा खर्च बोर्ड उठाएगा।  
जन्मदिन मुबारक
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.फारुक अब्दुल्ला को 82 वां जन्मदिन जेल में मनाने का मौका मिला। वे अपने घर में नजऱबंद हैं। कई राज्यों में पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिले मुफ्त सरकारी बंगले खाली कराए जा रहे हैं। केन्द्रशासित बनते ही जम्मू-कश्मीर इस कतार में शामिल हो गया। उमर के पिताश्री डॉ. फारुक अब्दुल्ला ने सरकारी बंगला नहीं लिया था। उन्हें दसवें दिन सरकार से तोहफा मिला। मुफ्त वाहन और सुरक्षा सुविधा एक नवंबर से बंद की दी। दलील दी गई कि इन सुविधाओं पर पर भारी खर्च आ रहा था। डॉ. फारुक सहित सभी पूर्व मुख्यमंत्री जेल में हैं। 
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ही नौकरशाहों से पूछ सकते हैं कि कैदी डा अब्दुल्ला, उनका बेटा उमर और महबूबा नजऱबंदी के दौरान कहां घूमते हैं? इन सबकी निगरानी के लिए पुलिस और केन्द्र सरकार के हथियारबंद तैनात किए गए हैं। उपराज्यपाल गिरीशचंद्र मुर्मू प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के चहेते अफसर हैं। अब्दुल्ला परिवार ने घर को जेल में तब्दील करने पर किराया मांगा, तब जवाबदेही उनपर आएगी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 05-Nov-2019

प्रभाकर

पूर्वोत्तर राज्य मेघालय ने घुसपैठ रोकने और स्थानीय आदिवासियों और मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए एक नया कानून बनाया है। इसके तहत 24 घंटे से ज्यादा राज्य में ठहरने वाले बाहरी लोगों को अब पंजीकरण कराना होगा।

देश में पहली बार किसी राज्य ने ऐसा कानून बनाया है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इनर लाइन परमिट की व्यवस्था जरूर लागू है। लेकिन यह कानून उससे कई मायनों में अलग है। राज्य के कई संगठन लंबे अर्से से इसकी मांग करते रहे हैं।  पड़ोसी असम में नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) लागू होने के बाद संभावित घुसपैठ के अंदेशे से इसके प्रावधानों में बड़े पैमाने पर संशोधन करते हुए इसे नए स्वरूप में लागू किया गया है। इस बीच, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है कि असम में तैयार एनआरसी कोई नया या अनूठा विचार नहीं हैं। यह अवैध घुसपैठियों को रोकने के लिए एक ऐसा दस्तावेज है जिसके आधार पर भविष्य में दावों को निपटाया जा सकेगा।
नया कानून
मेघालय सरकार ने बीते शुक्रवार को मेघालय रेजिडेंट्स सेफ्टी एंड सिक्योरिटी एक्ट (एमआरआरएसए), 2016 को संशोधित स्वरूप में लागू कर दिया। फिलहाल इसे अध्यादेश के जरिए लागू किया गया है, लेकिन विधानसभा के अगले सत्र में इसे पारित करा लिया जाएगा।
उपमुख्यमंत्री प्रेस्टोन टेनसांग बताते हैं, उक्त अधिनियम सरकारी कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा। यह उनके लिए है जो पर्यटन, मजदूर और व्यापार के सिलसिले में मेघालय आएंगे। इस अधिनियम का उल्लंघन करने वालों को खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
राज्य में अवैध आप्रवासियों को रोकने के उपायों के तहत वर्ष 2016 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस अधिनियम को पारित किया था। हालांकि तब इसमें किराएदारों की निगरानी पर ही जोर दिया गया था। उस समय तमाम मकान मालिकों को जरूरी कागजात दुरुस्त रखने और किराएदारों के बारे में पारंपरिक सामुदायिक मुखिया को सूचित करने का निर्देश दिया गया था। अब उस अधिनियम में कई बदलाव करते हुए इसे धारदार बनाया गया है।
टेनसांग कहते हैं, संशोधित अधिनियम के तहत राज्य में आने वाले लोग ऑनलाइन पंजीकरण भी करा सकते हैं। सरकार ने पंजीकरण के नियमों को पहले के मुकाबले काफी सरल बना दिया है। यह अधिनियम तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। विधानसभा के अगले अधिवेशन में इसे अनुमोदित कर दिया जाएगा।
उक्त अधिनियम में संशोधन से पहले मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने विभिन्न राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों और दूसरे संबंधित पक्षों की अलग-अलग बैठक बुला कर नए प्रावधानों पर चर्चा की थी। पहले वाला अधिनियम सिर्फ किरायेदारों पर लागू होता था। संशोधनों के बाद यह मेघालय आने वाले तमाम लोगों पर लागू होगा। अगर कोई व्यक्ति राज्य में प्रवेश करने से पहले अपनी जानकारी नहीं देता या फिर गलत जानकारी देता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। राज्य की कोनराड संगमा सरकार केंद्र के प्रस्तावित नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध कर रही है। इसके तहत पड़ोसी देशों से बिना किसी कागजात के यहां आने वाले हिंदू, सिख, ईसाई, जैन व पारसी तबके के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। बीजेपी भी राज्य सरकार में शामिल है। वैसे तो राज्य के तमाम संगठन पहले से ही स्थानीय निवासियों के हितों की रक्षा के लिए समुचित कानून बनाने की मांग करते रहे हैं। पड़ोसी असम राज्य में एनआरसी लागू होने के बाद वहां से लोगों के भाग कर मेघालय में आने का अंदेशा बढऩे के बाद इस मांग ने काफी जोर पकड़ा था। बीते अगस्त में असम में जारी एनआरसी की अंतिम सूची में 19.06 लाख लोगों को जगह नहीं मिल सकी थी।
असम में तैयार एनआरसी पर जारी विवादों के बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इसे भविष्य का दस्तावेज बताते हुए इसका बचाव किया है। न्यायमूर्ति गोगोई सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के अध्यक्ष हैं जो असम में एनआरसी की प्रक्रिया की निगरानी कर रही है। दिल्ली में आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह में उन्होंने कहा, एनआरसी कोई तात्कालिक दस्तावेज नहीं है। यह भविष्य का मूल दस्तावेज है, जिसके आधार पर भविष्य के दावों को निपटाने में सहूलियत होगी।
गोगोई ने एनआरसी का विरोध करने वालों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे लोगों को जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग जमीनी हकीकत से दूर हैं ही, विकृत तस्वीर भी पेश करते हैं। इसी वजह से असम और उसके विकास का एजंडा प्रभावित हुआ है।
असम के रहने वाले न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा, एनआरसी का विचार कोई नया नहीं है। इसे वर्ष 1951 में ही तैयार किया गया था। मौजूदा कवायद तो वर्ष 1951 के एनआरसी को अपडेट करने का महज एक प्रयास है।  (डॉयचेवेले)

 


Date : 04-Nov-2019

ज्ञान चतुर्वेदी

एंटीबायोटिक दवाओं और मेडिकल जांचों से जुड़ी ये गलतफहमियां इतनी आम हैं कि इन्हें शायद ही आपने कभी गंभीरता से लिया हो।

बीमारियों और उनके इलाज से जुड़ी गलतफहमियों की सूची वैसे तो बहुत लंबी है, लेकिन इस बार के कॉलम में हम सिर्र्फ एंटीबायोटिक दवाओं और मेडिकल जांचों से जुड़ी गलफहमियों की ही चर्चा करेंगे। ये ऐसी गलतफहमियां हैं जिनसे आप भी कई बार दो-चार हुए ही होंगे। चलिए शुरू करते हैं -
1. एंटीबायोटिक्स ‘गरम’ करती हैं
कोई इन्फेक्शन हो जाए तो डॉक्टरों के हाथ में ‘एंटीबायोटिक्स’ नाम का एक बड़ा कारगर हथियार है। वह निमोनिया, टायफायड, टीबी आदि हजारों बीमारियों का इलाज उचित एंटीबायोटिक्स देकर करता है। और हम क्या करते हैं?
 हम यह मानते हैं कि एंटीबायोटिक्स बड़ी ‘गरम’ दवाइयां हैं। डॉक्टर ने चार गोलियां लेने को लिखा है, हम दो ही लेते हैं। मानते हैं कि चार की जगह दो भी लेंगे तो थोड़ा कम ही सही पर काम तो करेंगी ही, गरमी भी कम होगी। लेकिन ऐसा नहीं है।
हर एंटीबायोटिक्स का एक तय ‘डोज’ होता है। जब तक रक्त में दवा का वह लेवल न पहुंचे यानी कि ‘मारक लेवल’ न बने, दवा बैक्टीरिया को नहीं मार पाती। इसी कारण एंटीबायोटिक्स की उतनी ही गोलियां लिखी जाती हैं जितनी रक्त में उसको ‘मारक स्तर’ तक पहुंचा सके। कम गोली खाईं तो असर नहीं होगा।
इसे हम डॉक्टरी भाषा में ‘ऑल ऑर नन’ का खेल कहते हैं। या तो गोली पूरा काम करेगी, या बिल्कुल भी नहीं करेगी। ऐसा कभी नहीं होगा कि हम यदि स्वयं ही डोज कम करके एंटीबायोटिक्स ले लेंगे तो वह थोड़ा ही सही परंतु कुछ न कुछ लाभ तो जरूर पहुंचाएगी। समझ लें और याद रखें कि एंटीबायोटिक्स उसी डोज में लें, जिसमें डॉक्टर द्वारा बताई गई हो। वरना, लेना, न लेना बराबर।
इसी सिद्धांत पर चलकर हम एंटीबायोटिक्स उसी दिन बंद कर डालते हैं, जिस दिन बुखार उतरा या जो तकलीफ थी, वह कम हुई। यह तो और भी खतरनाक बात है। हम बैक्टीरिया को अधमरा छोड़े दे रहे हैं। उसकी आधी-पौनी फौज को ही मार के हमने अपने एंटीबायोटिक्स के हथियार वापस धर दिए। तो जो दुश्मन जीवित बचे, वे अब नई तैयारी से, प्रतिरोध (एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस) के रक्षा कवच पहनकर वापस आक्रमण करेंगे। कुछ समय बाद आपको फिर तकलीफ होगी और तब ये ही एंटीबायोटिक्स आप पर काम नहीं करेगी। याद रहे कि हर इनफेक्शन में दवाएं देने की समय अवधि अलग-अलग होती है। इस मामले में खुद का दिमाग न चलाएं। डॉक्टर की मानें।
यह भी याद रहे कि एंटीबायोटिक्स मात्र एक हथियार है। उसे चलाने वाला आपका शरीर है। शरीर की प्रतिरोधी शक्तियां यदि पहले ही बुढ़ापे, मधुमेह, एड्स,कुपोषण आदि के कारण कमजोर होंगी, तब एंटीबायोटिक्स भी प्रभावी सिद्ध नहीं होंगी। हमें दवा की यह सीमा समझनी ही चाहिए और उचित खान-पान, व्यायाम आदि द्वारा शरीर मजबूत रखने की कोशिश करनी चाहिए।
2. हमारी तो सारी जांचें ठीक निकली हैं सो अब हमें कुछ भी नहीं हो सकता
बहुत से मरीज अपनी जांच रिपोर्टों को गर्व से तमगे की भांति लिए घूमते हैं। उन्हें तब बड़ा धक्का पहुंचता है जब ‘सब ठीक’ रहते हुए भी किसी बड़ी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। तब उन्हें जांच रिपोर्टों की सत्यता पर भी शक होता है। इतनी बढिय़ा रिपोर्टें थीं, फिर कैसे? वे पूछते हैं।
याद रखें कि हर जांच रिपोर्ट की सेंसिटिविटी तथा स्पेसिफिसिटी होती है। कोई भी जांच सौ प्रतिशत पूरी नहीं होती। इसे मरीज के हाल से जोडक़र ही समझा जाता है। उदाहरण के लिए जिस टीएमटी जांच के ठीक निकल आने पर हम खुश होकर सोचते हैं कि इसका मतलब है कि हमारा दिल एकदम बढिय़ा है, उसकी भी अपनी सीमा है। मान लें कि यदि दिल की एक ही नली बंद हो रही हो तो हार्ट अटैक तो आगे पीछे आएगा पर टीएमटी की जांच लगभग साठ प्रतिशत ऐसे केसों में ठीक ही बताती रहेगी। मेरी अपनी प्रैक्टिस में मैंने ऐसा देखा है कि जिसका टीएमटी मैंने पंद्रह दिन पूर्व नॉर्मल (निगेटिव) बताया था, वही हार्ट अटैक से भर्ती हो गया। ऐसे लोग यही शिकायत करते हैं कि जब जांच में सब ठीक था तो फिर ऐसा कैसे हुआ? 
इसका जवाब यह है कि कोई भी जांच प्राय: सौ प्रतिशत सेंसिटिव नहीं होती। ईसीजी की जांच नार्मल बताकर इमर्जेंसी से घर वापस भेज दिया था पर दो घंटे बाद ही हार्ट अटैक हो गया क्योंकि शायद डॉक्टर को भी यह सीमा नहीं पता थी कि ईसीजी लगभग 40 प्रतिशत केस में शुरू में नॉर्मल हो सकता है।
फिर तो मर गए साब? जब जांच पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता तो आदमी कहां जाएं? इसका उत्तर यही है कि हर जांच डॉक्टर को निर्णय लेने में सहायता के लिए बनी है। एक अच्छा डॉक्टर कभी भी रिपोर्ट का इलाज नहीं करता। वह हर जांच को मरीज की बीमारी से जोडक़र ही फिर तय करता है कि जांच रिपोर्ट को कितना महत्व दिया जाए। एक अच्छा डॉक्टर रिपोर्टों की सीमा को समझता है। सो हर रिपोर्ट उसी को समझने दें। स्वयं रिपोर्ट पढक़र अपने नतीजे न निकालें।
कई मरीज यही कहते हैं कि हमारी हर संभव जांच करा दें क्योंकि ‘आई वॉन्ट टू बी श्योर।’ आप कभी, किसी जांच के बाद भी ऐसा श्योर नहीं हो सकते। भ्रम में न रहें। ऐसी कोई मशीन अभी तक नहीं बनी है जिसमें से शरीर को गुजार दें तो दूसरी तरफ से अदालत का प्रभावीकृत शपथपत्र निकल आए जो बता दे कि आप एकदम ठीक हैं। रिपोर्ट सही आने पर ये मीठे भ्रम न पाल बैठें। यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें।
(सत्याग्रह)

 


Date : 04-Nov-2019

जसिंता केरकेट्टा और जयंती बुरुदा 

जयंती बुरुदा ओडिशा के मलकानगिरि जिले के एक सुदूर गांव सेरपाली से है। 11 भाई बहनों में जयंती नौवें स्थान पर है। जब वह कॉलेज भी थी, मां को कैंसर हो गया। उनकी बीमारी के वक्त जयंती पढ़ाई छोडक़र उनकी देखभाल करने लगी। जयंती कहती है सिर्फ मां को भरोसा था कि मैं कुछ कर सकती हूं। उनकी बीमारी के कारण मेरी पढ़ाई छूट जाने पर मां कहती थी वो जल्दी मर जाना चाहती है ताकि मैं फिर से पढ़ाई कर सकूं।
 एक दिन उसने आत्महत्या करने की भी कोशिश की। मैंने उन्हें रोक लिया। आज याद करती हूं कि वे मेरी शिक्षा को लेकर कितनी अधिक जागरूक थी। अपने प्राण भी देना चाहती थी।
जयंती मलकानगिरि के स्थानीय टीवी चैनल में काम करती है। बूढ़े पिता साथ रहते हैं। गांव के एक परिवार में जब एक मां की हत्या हो गई, पिता बच्चों को छोड़ भाग गए तब छोड़ दिए गए छोटे-छोटे 4 बच्चों को जयंती ने गोद ले लिया। इस तरह बूढ़े पिता के साथ उसके पांच बच्चे हैं। वो अपने काम के साथ-साथ गांव की दूसरी लड़कियों को पढऩे के लिए प्रोत्साहित करती है। कॉलेज के दिनों में ही एक संगठन बनाया और संगठन के माध्यम से लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर भी काम कर रही है। हमारी कहानी बहुत मिलती-जुलती है। सोचती हूं अपनी एक बहन को लेकर जयंती और उसके बच्चों के साथ मिलकर इस परिवार को बड़ा परिवार बना लें। ताकि हम एक-दूसरे को सहयोग कर सकें। अकेले - अकेले मां बने रहने से यह ज्यादा अच्छा है कि हम एक साथ चलें और जीवन के साथ जिम्मेदारियां भी साझा कर लें।
स्त्रियों की दुनिया ऐसे नहीं बदल सकती। एक दूसरे के खिलाफ होने के बजाए उनके साथ चलने से ही नए रास्ते निकल सकते हैं। दु:ख, ख़ुशी और जीवन साझा कर लेने से जीवन की बाकी लड़ाइयां आसानी से जीती जा सकती हैं।
हर लडक़ी को बर्तन की जगह रोज-रोज अपने संघर्ष के हथियार मांजने होंगे इसलिए कि उसकी रगड़ की आवाज से बहुतों के दिमाग के पर्दे खुले और उसकी चमक से बहुतों की आंखों में चमक आ सके...।

 


Date : 04-Nov-2019

अपूर्व भारद्वाज

1. आज से कुछ दिन पहले खबर आती है कि इसराइल स्पाई वेयर के द्वारा व्हाट्सएप पर जासूसी की जा रही है। व्हाट्सएप और सरकार दोनों इस बात से इंकार कर देती है लेकिन व्हाट्सएप ने आज इसकी पुष्टि कर दी है और सरकार ने भी व्हाट्सएप को नोटिस देकर उससे स्पष्टीकरण मांग लिया है। यह मसला सीधे आपके निजी गोपनीयता और सुरक्षा से जुड़ा है। इस पर और विस्तार से लिखूंगा। लेकिन अभी यह समझ लीजिए कि अगर आपने मेरी व्हाट्सएप हैक वाली पोस्ट को नही पढ़ा है तो समझ लीजिए आप कितनी बड़ी गलती कर रहे है।
2. आज के दैनिक भास्कर में आपने 12 लाख यूजर का क्रेडिट कार्ड और डेबिट का डॉटा चोरी का समाचार पढ़ा ही होगा लेकिन यह एक अधूरा समाचार है इससे बड़ी डॉटा डकैती इसी फिन 7 हैकर ग्रुप ने इटली के सबसे बड़े बैंक यूनिक्रेडिट बैंक के 30 लाख यूजर का डाटा उसी दिन हैक किया था। फिन 7 एक हैकिंग माफिया है जो अमरीका के बैंक, होटल्स और हॉस्पिटल के डॉटा की चोरी करके 2015 में आया था अमेरिकन इसे रशियन कहते है लेकिन यह सब साइबरवॉर का हिस्सा है जो अमरीका, चीन और रशियन के बीच चार साल से जारी है। लेकिन अचानक इनका टारगेट भारत क्यों हो गया है। इसका संकेत में अपनी सायबरवॉर वाली सीरीज में दे चुका हूँ लेकिन यह सब इतना जल्दी होगा उसका मुझे भी अंदाजा नही था। डॉटा चोरी पर बहुत लिख चुका हूं। आगे भी इस पर लिखूंगा। लेकिन अभी समझ लीजिये आप एक नाजुक समय में जी रहे है, अपने आप को बचा कर रखिए।
3. यह सबसे बड़ी और चिंतित करने वाली खबर है। यह कहानी तब शुरू हुई जब सायबर सुरक्षा विशेषज्ञ पुखराज सिंह ने ट्वीट किया कि उन्होंने कुछ महीने पहले भारतीय अधिकारियों को एक सूचना-चोरी करने वाले मालवेयर ‘डीट्रैक’ के बारे में बताया, जो कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की पर अटैक कर चुका है। शुरू में परमाणु शक्ति निगम ने इसका खंडन किया लेकिन बाद में बाकायदा प्रेस रिलीज जारी कर के इस मालवेयर अटैक की पुष्टि की है।  हृक्कष्टढ्ढरु के अनुसार ‘यह मालवेयर अटैक एक यूजर के सिस्टम पर हुआ था जो इंटरनेट से जुड़ा हुआ था जांच में पाया गया है कि न्यूक्लियर प्लांट के सिस्टम इससे अफेक्टेड नही थे।’ 
जब मैंने डी ट्रेक के बारे में रिसर्च किया तो पाया कि इसे उत्तर कोरिया की जासूसी एजेंसियों के द्वारा प्रेषित एक हैकिंग ग्रुप ने डेवलप किया है और ऊत्तर कोरिया किस बात के लिए प्रसिद्ध है वो तो आपको न्यूज चैनल दिन में तीन बार तो दिखा ही देते है।
यह तीनों खबरें बहुत विचलित करने वाली है और अच्छे से अच्छे की नींद खोलने वाली है यदि आप अब भी सो रहे है तो जाग जाइये यह देश अभी बहुत बड़े साइबर खतरे से जूझ रहा है और यह खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है सबसे बड़ा खतरा इसकी दिनोंदिन बढ़ती पहुंच है जो आपके बेड रूम से शुरू होकर बैंकों के स्ट्रांग रूम से होकर परमाणु प्लांट के वॉर रूम तक हो गई है जैसे आपको यह पता ही नहीं चला कि डॉटा की छिटपुट लड़ाईया कब दंगल बन गई वैसे ही आपको यह भी नही पता नही पड़ेगा कि कब यह दंगल एक फूल फ्लैश साइबर वॉर में तब्दील हो गया।
इन तीनों डॉटा टाइम लाइन पर विस्तार से लिखूंगा लेकिन जब तक अपनी टाइमलाइन इस पोस्ट को लगाए ताकि डॉटा सुरक्षा पर बरसो से सो रही इस सरकार की कान में जू रेंगे औऱ वो अपनी कुंभकर्ण नींद से जागकर हिन्दू। मुसलमान छोडक़र देश के सही मुद्दों पर ध्यान दे ईश्वर सरकार को सद्बुद्धि प्रदान करे?


Date : 03-Nov-2019

पूर्वी जर्मनी के शहर हाले में मंदिर में पूजा करने गए यहूदी एक मास शूटिंग से बाल बाल ही बचे। डॉयचेवेले की मुख्य संपादक इनेस पोल का कहना है कि यहूदी विरोधी भावनाओं को किसी भी हाल में हल्के में नहीं लिया जा सकता।

पूर्वी जर्मनी के एक सिनोगॉग में करीब 70 लोग पूजा करने और यहूदियों का पर्व योम किपुर मनाने पहुंचे थे। पूजा घर के मजबूत दरवाजे ने उन्हें उस जर्मन शख्स से बचा लिया जो हथगोले और राइफल लिए खून खराबा करने वहां पहुंचा था। यह 9 अक्टूबर 2019 की घटना है।
दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत के अस्सी साल बाद, वह युद्ध जिसमें 60 लाख यहूदियों की हत्या की गई थी, आज एक बार फिर जर्मनी में अगर यहूदी खुले आम अपने धर्म का पालन करना चाहें, सिनोगॉग जाना चाहें, तो उन्हें अपनी जान की फिक्र करनी पड़ रही है।
इससे जर्मनी के बारे में क्या समझ में आता है? और क्या मतलब है इस बात का कि 27 साल के एक नौजवान ने हेलमेट पर कैमरा लगा कर अपने कारनामों को फिल्माना चाहा और फिर उसे एक वीडियो गेम वाली वेबसाइट पर अपलोड भी किया? 
न्यूजीलैंड में हुए क्राइस्टचर्च हमले की ही तरह यह व्यक्ति भी हमले की जगह पर जाता है और गोलीबारी शुरू करने से ठीक पहले अपने अंतरराष्ट्रीय दर्शकों से अंग्रेजी में कहता है, सारी मुसीबतों की जड़ यहूदी हैं। किसी की पीड़ा की ना तो कभी तुलना की जा सकती है और ना ही करनी चाहिए। इसलिए सबसे पहले तो हमारी संवेदनाएं उस महिला और पुरुष के परिवारों के साथ हैं जिनकी बर्बरता से हत्या कर दी गई।
हम मुंह नहीं फेर सकते। अगर स्थिति जरा भी अलग होती तो हमने बुधवार को जर्मनी में यहूदी लोगों की सामूहिक हत्या देखी होती।
यह तथ्य साफ दिखाता है कि इस देश में यहूदियों के प्रति बढ़ती हीन भावना किसी भी सूरत में इस्लामिक आतंकवाद तक सीमित नहीं है। अगर अभी भी कोई ऐसा दावा करता है तो वह झूठ बोल रहा है और सच्चाई का सामना करने से इनकार कर रहा है। इससे यह पता चलता है कि जर्मनी में यहूदी संस्थाओं की सुरक्षा अब भी जरूरी है, नाजी काल के खात्मे के 75 साल बाद भी। इस पर सवाल उठना लाजमी है कि योम किपुर जैसे त्योहार के दिन भी सिनोगॉग को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई थी।  यह अपराध दिखाता है कि यहूदी विरोधी गतिविधि के छोटे से छोटे संकेत को भी गंभीरतापूर्वक लेना होगा और उसकी जांच करनी होगी। इसमें इस्राएल के झंडे को जलाना भी शामिल है और यहूदी टोपी किप्पा पहनने वालों का अपमान भी।
यहूदी विरोधी भावना को हल्के में नहीं लिया जास सकता। थोड़ा-बहुत यहूदी विरोधी जैसा कुछ नहीं होता है। कहीं भी नहीं। और खास कर जर्मनी में तो बिलकुल भी नहीं। (डॉयचेवेले)


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