विचार / लेख

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Date : 21-Sep-2019

प्रशांत श्रीवास्तव

2018 में योगी सरकार ने पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ दर्ज रेप और अपहरण केस वापस लेने का फैसला किया था। स्वामी चिन्मयानंद पर सात साल पहले नवंबर 2011 को शाहजहांपुर में एफआईआर दर्ज हुई थी।

भाजर्पा के पूर्व सांसद स्वामी चिन्मयानंद को लंबे समय के इंतजार के बाद उनके मुमुक्षु आश्रम से गिरफ्तार कर लिया गया। स्वामी को शुक्रवार सुबह एसआईटी ने गिरफ्तार किया है। दुष्कर्म पीड़ता काफी दिनों से स्वामी चिन्मयानंद की गिरफ्तारी की मांग कर रही थी। गिरफ्तारी में हो रही देरी से पीडि़ता ने आत्महत्या करने की धमकी भी दी थी।
स्वामी चिन्मयानंद यूपी के गोंडा के निवासी हैं। बीजेपी से तीन बार सांसद रह चुके हैं।  जौनपुर, बदायूं व मछलीशहर सीट से वह सांसद रहे हैं। वह अटल सरकार में गृह राज्यमंत्री भी रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बीते साल 25 फरवरी को शाहजहांपुर गए थे। वहां उन्होंने स्वामी चिन्मयानंद के आश्रम में आयोजित मुमुक्षु युवा महोत्सव में भाग भी लिया था। चिन्मयानंद पर पहले भी रेप और अपहरण के आरोप लगे हैं।
उप्र में योगी सरकार बनते ही स्वामी चिन्मयानंद के ऊपर से पुराने केस खत्म करने की बात भी उठी थी। यूपी की सरकार की ओर से चिन्मयानंद के खिलाफ दर्ज रेप और अपहरण केस वापस लेने का फैसला भी लिया गया था। स्वामी चिन्मयानंद पर सात साल पहले नवंबर 2011 को शाहजहांपुर में एफआईआर दर्ज हुई थी। अपहरण और रेप का आरोप उनके ही आश्रम में कई वर्षों तक रहने वाली एक युवती ने लगाया था।
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ मुमुक्षु युवा महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए शाहजहांपुर के मुमुक्षु आश्रम भी गए थे जबकि उस वक्त स्वामी चिन्मयानंद यौन शोषण के केस का सामना कर रहे थे। इस महोत्सव के दौरान ही एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें शाहजहांपुर के कुछ प्रशासनिक अधिकारी स्वामी चिन्मयानंद की आरती उतार रहे थे।
2018 में योगी सरकार ने पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ दर्ज रेप और अपहरण केस वापस लेने का फैसला किया था। बीजेपी से जुड़े एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘अस्सी के दशक में चिन्मयानंद शाहजहांपुर आ गए और स्वामी धर्मानंद के शिष्य बन कर उन्हीं के आश्रम में रहने लगे।वहां के मशहूर मुमुक्षु आश्रम की स्थापना धर्मानंद के गुरु स्वामी शुकदेवानंद ने की थी। अस्सी के दशक के अंतिम हिस्से में देश में राम मंदिर आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था।’
विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े तमाम साधु-संत पहले इस आंदोलन से जुड़े। इस दौरान चिन्मयानंद भी इसमें शामिल हो गए। बीजेपी नेता के मुताबिक, मंदिर आंदोलन के समय चिन्मयानंद ने महंत अवैद्यनाथ (योगी आदित्यनाथ के गुरू) के साथ मिलकर राम मंदिर मुक्ति यज्ञ समिति बनाई और इसी के जरिए इन लोगों ने मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका निभाने लगे। बाद में दूसरे बड़े संत रामविलास वेदांती और रामचंद्र परमहंस समेत तमाम संतों को भी राम मंदिर आंदोलन से जोड़ लिया
1991 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उस बदायूं की सीट से स्वामी चिन्मयानंद को टिकट दिया जहां से उनका न तो कोई नाता था लेकिन मंदिर आंदोलन के कारण पैदा हुई लहर में उन्होंने ये चुनाव जीत लिया।
बीजेपी के एक बड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि साल 2014 में भी उन्होंने जौनपुर से चुनाव लडऩे के लिए काफी प्रयास किया लेकिन टिकट पाने में असफल रहे।
बीजेपी के इस नेता के मुताबिक़, स्वामी चिन्मयानंद पार्टी से बग़ावत करके भी चुनाव लडऩे को तैयार थे लेकिन वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप के बाद इरादा बदल दिया। हालांकि, इसके बाद बीजेपी के संगठन में उनकी पकड़ कमजोर हो गई। मोदी-शाह की टीम में उन्हें विशेष तवज्जों ंंनहीं मिली। इसी कारण वह बीजेपी की राजनीति में ज्यादा सक्रिय नहीं रहे। उनका ध्यान शाहजहांपुर व हरिद्वार के आश्रम से जुड़े कामों पर ही होने लगा।
यूपी के शाहजहांपुर जिले के एक निजी कॉलेज की लॉ स्टूडेंट ने बीजेपी नेता व पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर छात्राओं के साथ शारीरिक शोषण का आरोप लगाते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। परिजनों की तहरीर के बावजूद कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। परिजनों ने स्वामी चिन्मयानंद पर आरोप लगाते हुए तहरीर दी थी। पीडि़त छात्रा ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘चिन्मयानंद ने मेरा रेप किया और उसके बाद एक साल तक शारीरिक शोषण किया। शाहजहांपुर पुलिस ने रेप का केस नहीं दर्ज किया। मैं जब दिल्ली में थी तब दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज कर उसे शाहजहांपुर पुलिस को फॉरवर्ड किया था, मगर वह अब भी कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।’
उसने आगे बताया, ‘रविवार को एसआईटी ने मुझसे करीब 11 घंटे पूछताछ की। मैंने उन्हें रेप के बारे में बताया। उन्हें बताने के बाद भी अब तक चिन्मयानंद को नहीं गिरफ्तार किया गया है। ऐसा क्यों हो रहा है। वहीं जब उसके पिता ने चिन्मयानंद के खिलाफ शारीरिक शोषण के आरोप में मुकदमे की तहरीर दी थी तब मुकदमा दर्ज नहीं किया जा रहा था। मीडिया में मामला आने के बाद मुकदमा दर्ज हुआ।
पीडि़ता ने ये भी कहा कि उसके पास सारे साक्ष्य मौजूद हैं। वह कॉलेज हॉस्टल के जिस कमरे में रहती थी उसे सील कर दिया गया है। उसे मीडिया के सामने खोला जाए। सही समय आने पर साक्ष्य (विडियो क्लिप) भी पेश कर देगी। लडक़ी ने कहा कि उसने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए ही अपना वह विडियो वायरल किया था, जिसमें उसने चिन्मयानंद से जान का खतरा बताया था। 
वीडियो वायरल होते ही ये मामला चर्चा में आया था। इसके बाद छात्रा लापता हो गई थी। यूपी पुलिस की स्पेशल टीम राजस्थान से छात्रा को खोजकर लाई थी। गायब हुई छात्रा के पिता हरीश चंद्र शर्मा ने थाना कोतवाली के प्रभारी को दी तहरीर में लिखा था। उनकी बेटी ने कॉलेज प्रबंधक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ये वीडियो वायरल होने के बाद से उनकी बेटी गायब है। वीडियो में छात्रा रो-रोकर सीएम और पीएम से मदद की गुहार लगा रही है। साथ ही ये बताया कि आरोपी प्रबंधक धमकी देता है कि डीएम और सभी अधिकारी हमारी जेब में रहते है इसलिए उसका कुछ नहीं हो सकता है। 
वहीं, छात्रा के परिजनों ने पुलिस को तहरीर देकर आरोपी प्रबंधक के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर बेटी को तलाश करने की गुहार लगाई है। उसके सारे एविडेंस हमारे पास हैं। उसकी जान को खतरा है, इसलिए वह सीएम और पीएम से मदद की गुहार लगा रही है। साथ ही उसने ये भी बताया कि कॉलेज का प्रबंधक धमकी देता है कि डीएम हमारी जेब में रहते हैं, वह उसका कुछ नहीं कर सकती है। रीना शर्मा (परिवर्तित नाम) नाम की छात्रा एलएलएम पढ़ाई के साथ-साथ कम्प्यूटर लैब में पढ़ाती भी है, लेकिन उसने सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल किया है, जिसमें उसने कॉलेज प्रबंधक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने वीडियो में रो-रोकर सीएम और पीएम से मदद की गुहार लगाई है।
इस पूरे मामले में चिन्मयानंद का कहा था कि ‘उनके खिलाफ साजिश की जा रही है।’ उनके वकील की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई थी जिसमें कहा गया था कि चिन्मयानंद सरस्वती को ब्लैक मेल से पांच करोड़ रुपये मांगे गए हैं। ये रकम स्वामी चिन्मयानंद के व्हाटसएप नंबर पर मैसेज करके मांगी गई। वकील ने शाहजहांपुर चौक कोतवाली में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। वकील ओम सिंह ने बताया कि मैसेज में किसी अज्ञात व्यक्ति ने 5 करोड़ रुपये की मांगी गई थी, साथ ही धमकी दी गई कि उसके पास जो वीडियो हैं, उसे वह वायरल भी करा दिया जाएगा और बाद में कुछ वीडियो वायरल किए गए थे। ओम सिंह ने दर्ज कराई रिपोर्ट में आशंका जताई है कि आपराधिक षडय़ंत्र के तहत कुछ लोगों द्वारा धन उगाही तथा चरित्र हनन का प्रयास किया जा रहा है। डर का माहौल पैदा कर शैक्षणिक संस्थान को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। (द प्रिंट)

 


Date : 21-Sep-2019

जगदीश्वर चतुर्वेदी

मंदिर या देवालय सामंजस्य और समन्वय के केन्द्र हैं। मंदिरों की सबसे बड़ी भूमिका है सामंजस्य और समन्वय पैदा करने की। विभिन्न जातियों में सामाजिक सामंजस्य की परंपरा मंदिर जाने की आदत के गर्भ से ही जन्मी।


मैं जानता हूं मेरे नास्तिक दोस्त मेरे इस तरह के लेखन से नाराज हो सकते हैं, लेकिन ईश्वर के प्रसंग में उनके साथ जाने में अनेक बाधाएं हैं। पहले अपना अनुभव साझा करता हूं, फिर ईश्वर-उपासना संबंधी अपनी समझ रखूंगा। मैं जब कलकत्ता गया तो उस समय मैं माकपा का सदस्य था, यह सदस्यता मैंने 2005 में छोड़ी। मैं जब माकपा में था तब भगवान से दूर नहीं था। क्योंकि माकपा में रहते हुए भगवान को लेकर कोई समस्या नहीं थी। खासकर मथुरा और दिल्ली में रहते समय कोई समस्या नहीं आई। लेकिन कलकत्ता जाने के बाद एक बार समस्या आई। 
यह वाक्या 1993-94 का है। उस समय माकपा ने अपनी पार्टी चि_ी में सभी सदस्यों से कहा कि वे दुर्गापूजा पर होने वाले पूजा पंडालों और पूजा के आयोजनों से दूर रहें। इस पत्र में यह भी था कि सदस्यगण पूजा न करें। मैंने अपनी ब्रांच में इसका प्रतिवाद किया और कहा कि मेरे लिए दुर्गा से दूर रहना संभव नहीं है। मेरे मथुरा घर पर तो देवी का मंदिर है और मैं उसी मंदिर की आमदनी से पढ़-लिखकर बड़ा हुआ हूं। इससे भी बड़ी बात यह कि मैं देवी पूजा करता हूं। इसलिए दुर्गापूजा न करूं यह संभव नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि पार्टी प्रोग्राम में कहीं पर भी ईश्वर न मानने की शर्त पर पार्टी सदस्यता की बात नहीं लिखी है। मैं पंडित था तब ही पार्टी सदस्य बना। संस्कृत पाठशाला में पढ़ता था। खैर, लंबी बहस के बाद पार्टी को अपनी गलती का अहसास हुआ और बाद वर्षों में पूजा के मौके पर उस तरह की हिदायती चि_ी नहीं आई।
हम फेसबुक पर लगातार उन लोगों की प्रशंसा करते रहे हैं जो ईश्वर को नहीं मानते थे, मूर्ति पूजा नहीं मानते थे। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हम पूजा-उपासना के मनोविज्ञान और विवेकवादी तर्कशास्त्र से परिचित हैं। यह सही है राधामोहन गोकुलजी से लेकर शहीद भगत सिंह तक नास्तिकों के तर्कशास्त्र की आधुनिक परंपरा है। स्वयं पंडित नेहरू और महात्मा गांधी भी ईश्वर को नहीं मानते थे।  प्रेमचंद से लेकर मुक्तिबोध तक ईश्वर को नहीं मानते थे।  ईश्वर न मानने वालों की इस समृद्ध परंपरा में वे तमाम समाजविज्ञानी भी शामिल हैं जो विज्ञानसम्मत इतिहास लेखन करते रहे हैं।
हमारा मानना है ईश्वर मानव सभ्यता की सांस्कृतिक विरासत का अंग है। यह हमारे सामाजिक विकास के बचपन की सबसे सुंदर कृति है। इसके साथ उपासना-पूजा-कर्मकांड-तंत्र-मंत्र आदि को सामाजिक विकास के बहुत बाद के वर्षों में निहित-स्वार्थी तत्वों ने जोड़ा। मैंने जहां तक संस्कृत शास्त्रों का अध्ययन किया है तो यही पाया है कि मंत्र की दीक्षा का मतलब है हमेशा जागृत रहना। रात-दिन जाग्रत रहना। ठीक यही चीज मुझे कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के लेखन में मिली। 
मंत्र दीक्षा का मतलब भोंदू की तरह, संसार के यथार्थ से विमुख होकर भजन पूजा करना नहीं है बल्कि इसका अर्थ है सत्य की रक्षा करते हुए जितनी दूर चल सको चलो। यही वह मूल लक्ष्य था जिसको पुराने ऋषियों ने मंत्र दीक्षा के साथ पेश किया था। मंत्र दीक्षित होने का मतलब है सत्यनिष्ठ होना,सत्य की रक्षा के लिए तुम्हारा कुछ भी चला जाए तो चले जाने दो। लेकिन सत्य के प्रति असम्मान कभी प्रकट मत करो। यही वह बुनियादी समझ रही है जिसके आधार पर मुझे सबसे पहले गायत्री मंत्र, और उसके बाद बाला,भुवनेश्वरी की दीक्षा मिली।
 इन मंत्रों के साथ उसके उपासना के रूपों का भी यथाशक्ति अभ्यास किया। महात्रिपुरसुंदरी की आज भी नियमित पूजा करता हूँ। घर में मथुरा की सबसे प्रसिद्ध देवी का पुश्तैनी मंदिर है,इसे चर्चिका देवी के नाम से मथुरा शहर जानता है। मंत्र लेने का अर्थ सत्य का ईश्वर से दान लेना। ईश्वर से सत्य का दान लेकर आप कभी असत्य के साथ खड़े नहीं हो सकते। इसके लिए चाहे जो कीमत देनी पड़े। 
मंत्र के मार्ग पर चलने का मतलब है सत्य के मार्ग का अनुसरण करना। समाज ने यदि मंत्र दीक्षा के इस अर्थ को स्वीकार कर लिया होता तो समाज में अनेक परिवर्तन होते,सामाजिक क्रांतियां भी होतीं, लेकिन समाज में पुरोहितवाद ने मंत्र के अर्थ को ही बदल दिया। उसे कर्मकांड, पूजा और बाह्य आडंबर के विभिन्न रूपों से ढंक दिया। जब कि मंत्र दीक्षा माने सत्यरक्षा का प्रण। मंत्र का मतलब आंखें बंद करके,कान बंद करके अक्षर जाप नहीं है। निर्भय और बिना किसी संकोच के सत्य का ग्रहण,सत्य का पक्ष लेना यही है मंत्र दीक्षा और इस भावबोध का मैंने यथाशक्ति पालन किया। यही हमारे उपनिषदों की सबसे बड़ी शिक्षा है।
सवाल उठता है जब मंदिर जाते हैं तो किसलिए जाते हैं? ऊपर से यही लगता है कि भगवान के दर्शन करने जाते हैं, पूजा करने जाते हैं। ये मंदिर जाने का मूल कारण नहीं है, मंदिर जाने का अर्थ सामंजस्य की खोज के लिए निकलना। समाज में सामंजस्य की तलाश ही हमें मंदिर ले जाती है। इसके कारण विविध किस्म के लोगों से संवाद, मेल-मुलाकात, विचारों का आदान-प्रदान, दुआ-सलाम आदि होता है। अन्य के साथ सामंजस्य की कला के प्रवेश द्वार का नाम है मंदिर। मंदिर जाने के इस अर्थ को हम क्यों भूल गए मुझे अभी तक इसके कारणों का पता नहीं चला। 
हमारे मथुरा में मंदिर जाने के लिए औरतों को अलसुबह घर से निकलने में कोई रोकटोक नहीं होती। उनका घर से निकलना, उनका एक सार्वजनिक स्पेस में अन्य से मिलना,उससे सामंजस्य बिठाना ही मूल मकसद है। इसीलिए कहा गया मंदिर या देवालय सामंजस्य और समन्वय के केन्द्र हैं। मंदिरों की सबसे बड़ी भूमिका है सामंजस्य और समन्वय पैदा करने की। विभिन्न जातियों में सामाजिक सामंजस्य की परंपरा मंदिर जाने की आदत के गर्भ से ही जन्मी। मंदिर माने धर्म,कर्म,भाव और कल्पना के बीच में सामंजस्य के केन्द्र।मंदिरों के इस समाजशास्त्रीय पक्ष की हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

 


Date : 20-Sep-2019

नई दिल्ली, 20 सितंबर । देश की अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से कोशिशें जारी हैं। पिछले 2 महीने में वित्तमंत्री की ओर से देश को मंदी की ओर जाने से रोकने के लिए कई ऐलान किए गए हैं। आज हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कारपोरेट टैक्स घटाकर 30 फीसदी से 25.2 फीसदी कर दिया है। उनके इस ऐलान के बाद शेयर बाजार में तगड़ा उछाल आया और सेंसेक्स 1800 अंकों तक पहुंच गया है। गौरतलब है कि इस तिमाही में देश की विकास दर 5 फीसदी पर पहुंच गई है। इसके बाद से मोदी सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने इसे नोटबंदी और जल्दबाजी में लागू किए जीएसटी को वजह बताया। इसके साथ ही उन्होंने मोदी सरकार को कुछ कदम उठाने की सलाह दी। मंदी का सबसे कारण घरेलू बाजार में मांग की कमी है जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था सबसे ज्यादा प्रभावित है। इसका सबसे ज्यादा असर ऑटो सेक्टर पर दिखाई दे रहा है। वहीं मैन्यूफैक्चरिंग और कृषि के हालात भी ठीक नहीं है। सरकार इससे निपटने के लिए पिछले दो महीने में कई बड़े ऐलान कर चुकी है और कई फैसले भी वापस भी लिए हैं जो बजट के दौरान किए गए थे। हालांकि उसकी ओर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में मंदी का असर भारत पर बताया जा रहा है। इससे पहले जो ऐलान किए गए थे उसका स्वागत भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) ने भी किया है और उम्मीद जताई कि इससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के 12 फैसले
सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में शुरुआती दौर में ही 70 हजार करोड़ रुपये की पूंजी डालेगी ताकि बैंक बाजार में पांच लाख करोड़ रुपये तक की नकदी जारी करने में सक्षम हो सकें उन्होंने कहा कि रेपो रेट से ब्याज दरें भी जुड़ेंगी। रेपो रेट कम होने पर होम और कार लोन सस्ते होंगे।
कर्ज की अर्जियां ऑनलाइन देखी जा सकेंगी। लोन सेटलमेंट की शर्तों को आसान बनाया जाएगा। हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों को भी 30 हजार करोड़ रुपये देने का ऐलान। 
अब से 60 दिनों के अंदर जीएसटी का रीफंड मिलेगा। वहीं, लघु उद्योंगों को 30 दिन में जीएसटी का रीफंड मिलेगा। इसी तरह एमएसएमई ऐक्ट में उद्योंगों की एक ही परिभाषा होगी। उन्होंने कहा की डीमैट खातों में भी आधार की केवाईसी चलेगी। सरकारी काम के लिए वक्त पर पैसा जारी किया जाएगा। 
31 मार्च 2020 तक खरीदी गईं बीएस फोर गाडिय़ां अब मान्य होंगी। रजिस्ट्रेशन फीस में बढ़ोतरी भी जून 2020 तक टाल दी गई है। वित्त मंत्री ने कहा कि घर खरीदारों की भी जल्द राहत मिलेगी। नई सरकारी गाडिय़ों की खरीद पर रोक भी हटा ली गई है।इस पर सरकार बेहद गंभीरता से काम कर रही है। 
लॉन्ग, शॉर्ट टर्म कैपिटेल गेन सरचार्ज वापस लिया जाएगा। सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनस और ईज ऑफ लिविंग पर फोकस कर रही है। अब विजयादशमी से केंद्रीय सिस्टम से नोटिस भेजे जाएंगे। टैक्स के नाम पर किसी को परेशान नहीं किया जाएगा।
स्टार्टअप्स और उनके निवेशकों की दिक्कतों को दूर करने के लिए उनके लिए एंजल कर के प्रावधान को भी वापस लेने का फैसला किया गया है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के सदस्य के तहत स्टार्टअप्स की समस्याओं के समाधान के लिए एक प्रकोष्ठ बनाया जाएगा। 
निर्यात उत्पादों पर करों एवं शुल्कों से छूट (रोडीटीईपी) अमल में आ जाएगी। यह देश से वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात संवर्धन की योजना (एमईआईएस) की जगह लेगी। इस योजना से सरकारी राजस्व पर 50 हजार करोड़ रुपये का प्रभाव पडऩे का अनुमान है। 
इसके अलावा निर्यात ऋण गारंटी निगम (ईसीजीसी) निर्यात ऋण बीमा योजना का दायरा बढ़ाएगा। इस पहल की सालाना लागत 1,700 करोड़ रुपये आएगी।
 इनपुट टैक्स क्रेडिट का पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक रिफंड, प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर बंदरगाहों और हवाईअड्डों पर माल की अवाजाही में लगने वाले समय को दिसंबर से कम करने तथा मुक्त व्यापार समझौता उपयोग मिशन की भी स्थापना करने का निर्णय लिया गया।
सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भी कई अहम ऐलान किए हैं। एक्सपोर्ट क्रेडिट के लिए 36,000 करोड़ से 68,000 रुपए और दिए जाएंगे।
नई योजना रेमिशन ऑफ ड्यूटीज-टैक्सेस ऑन एक्सपोर्ट के जरिए एक्सपोर्टर को 50 हजार करोड़ रुपए का फायदा दिया जाएगा।  हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री निर्यात के  लिए ई-कॉमर्स का इस्तेमाल कर पाएगी। 
फंड की कमी से अटके मिडिल क्लॉस किफ़ायती हाउसिंग प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए सहायता दी जाएगी। इसके लिए सरकार 10000 करोड़ देगी। लेकिन इसका लाभ वही बिल्डर्स उठा पाएंगे जिनका  हृक्क्र नहीं है और न ही जिनके केस दिवालिया अदालत में चल रहे हैं। (एनडीटीवी)
 


Date : 20-Sep-2019

हिमांशु शेखर

जानकारों और झारखंड की जनता का मानना है कि राज्य के विधानसभा चुनाव के परिणाम लोकसभा चुनाव से बिलकुल अलग हो सकते हैं, लेकिन ऐसा होगा नहीं

झारखंड में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में अब दो-तीन महीने का ही वक्त बचा है। 2014 में यहां रघुबर दास के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी। झारखंड के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि प्रदेश के लोगों में भाजपा के प्रति गुस्सा हो या न हो लेकिन रघुबर दास की सरकार के खिलाफ गुस्सा है। लेकिन इसके बावजूद प्रदेश की विपक्षी पार्टियां विधानसभा चुनावों में इसका लाभ लेने की स्थिति में नहीं दिख रही हैं।
12 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड की राजधानी से कुछ प्रमुख योजनाओं की शुरुआत की। इस मौके पर उन्होंने रांची में एक जनसभा भी की। इस जनसभा को झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ केंद्र सरकार की कामयाबियों का जिक्र किया बल्कि झारखंड की राज्य सरकार के कामकाज की भी सराहना की।
लेकिन झारखंड सरकार के पिछले पांच सालों के कामकाज की जमीनी स्थिति उतनी ठीक नहीं बतायी जाती है। जब रघुबर दास को 2014 में मुख्यमंत्री बनाया गया था तो उस वक्त भी पार्टी के अंदर से ही उन्हें यह जिम्मेदारी दिए जाने पर विरोध के स्वर उठे थे। अब उन्हें पांच साल मुख्यमंत्री के रूप में देखने के बाद भाजपा से सहानुभूति रखने वाले कई लोगों का भी कहना है कि रघुबर दास उतने सक्षम मुख्यमंत्री साबित नहीं हुए जितने होने चाहिए थे। उनकी सरकार से झारखंड के लोगों की मुख्य शिकायत यह है कि बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर जैसा दूसरे राज्यों की सरकारें कर रही हैं, उस तरह का काम रघुबर सरकार ने पिछले पांच सालों में नहीं किया। लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सडक़, बिजली जैसे मोर्चे पर इस सरकार को नाकाम मान रहे हैं।
झारखंड के पलामू जिले के निवासी सत्येंद्र सिंह इस बारे में कहते हैं, ‘जब बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना था तो उस वक्त कहा गया था कि यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है और इसके विकास के लिए अलग राज्य बनाया जा रहा है। लेकिन आज स्थिति यह है कि बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर बिहार की स्थिति झारखंड से बेहतर होती जा रही है। सडक़ों के मामले में भी बिहार झारखंड से बेहतर दिख रहा है। झारखंड में इससे पहले अस्थिर सरकार रही थी। इसलिए लगता था कि विकास नहीं हो रहा है। रघुबर दास को स्थिर सरकार चलाने का अवसर मिला लेकिन इसके बावजूद उन्होंने प्रदेश का विकास नहीं किया।’
पिछले पांच साल में कुछ अवसर ऐसे भी आए जब प्रदेश भाजपा के नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व से प्रदेश में सरकार का नेतृत्व बदलने की मांग की। कम से कम दो मौके ऐसे आए जब लगा कि झारखंड में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। इस संबंध में झारखंड के प्रमुख भाजपा नेताओं से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मंत्रणा भी की। लेकिन इसके बावजूद रघुबर दास मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे।
जाहिर है कि अगर किसी चुनावी राज्य में ऐसी स्थिति हो तो इसका फायदा विपक्ष को मिलना चाहिए। लेकिन झारखंड में वह स्थिति बनती हुई नहीं दिख रही है। झारखंड की मुख्य विपक्षी पा?र्टी है झारखंड मुक्ति मोर्चा। इसके अलावा कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा भी विपक्ष में हैं। लोकसभा चुनावों में ये तीनों पार्टियां एक साथ चुनाव लड़ी थीं। इनके साथ राष्ट्रीय जनता दल को भी होना था लेकिन आखिरी वक्त पर सीटों के बंटवारे को लेकर बात नहीं बन सकी। लेकिन तीनों पार्टियों के एक होकर लडऩे के बावजूद लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ी कामयाबी मिली। प्रदेश की 14 लोकसभा सीटों में से इस गठबंधन को सिर्फ दो सीटें ही मिलीं।
झारखंड की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में वोट नरेंद्र मोदी के नाम पर डाले गए इसलिए इस गठबंधन को खास सफलता नहीं मिली लेकिन विधानसभा चुनावों में अगर विपक्ष एकजुट रहे तो स्थितियां अलग हो सकती हैं। लेकिन चुनाव नजदीक होने के बावजूद न सिर्फ इस गठबंधन में दरार पड़ती दिख रही है बल्कि कांग्रेस में भी आंतरिक कलह खुलकर सामने आ रही है। इस वजह से यह माना जा रहा है कि रघुबर दास सरकार की अलोकप्रियता का फायदा उठाने का अवसर विपक्ष गंवा रहा है।
लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद उस वक्त झारखंड प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे अजय कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। वे अब कांग्रेस छोडक़र आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुके हैं। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे अजय कुमार की जगह कांग्रेस ने इसी सेवा के अधिकारी रहे रामेश्वर उरांव को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। झारखंड कांग्रेस में किस तरह की आंतरिक खींचतान चल रही है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी को इतने छोटे राज्य में भी पांच कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति करनी पड़ी है। प्रदेश की यह नई टीम बनाते वक्त यह ध्यान में रखा गया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग और सामान्य वर्ग का उसमें प्रतिनिधित्व दिखे।
झारखंड में विपक्ष की इस स्थिति के बारे में प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्याग्रह से कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सबसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ी थी। उस वक्त बात यह हुई थी कि विधानसभा चुनावों में अधिक सीटों पर चुनाव लडऩे का अवसर जेएमएम को मिलेगा। प्रदेश स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व परिवर्तन होने के बाद सीटों के बंटवारे को लेकर क्या स्थिति रहेगी, कहा नहीं जा सकता। स्थिति जटिल इसलिए भी है क्योंकि झारखंड कांग्रेस के कुछ नेता जरा सी वजह से ही पार्टी छोडक़र भाजपा का रुख कर सकते हैं।’
विपक्ष की दूसरी चुनौतियों का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में आरजेडी अलग हो गई थी। विधानसभा चुनावों में अगर विपक्ष को अच्छा प्रदर्शन करना है तो आरजेडी को भी अपने खेमे में लाना चाहिए। कुछ सीटों पर वामपंथी पार्टियां नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। उन सीटों पर उनके साथ समझौता होना चाहिए। लेकिन इन पार्टियों से बातचीत की पहल नहीं की जा रही है। जबकि समय काफी कम बचा है। 
विपक्ष की एक चुनौ?ती बिहार की सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड भी है। कुछ सीटों पर उसका प्रभाव है। जेडीयू ने घोषणा कर दी है कि वो झारखंड विधानसभा चुनावों में अकेले उतरेगी। जेडीयू के साथ अगर औपचारिक गठबंधन नहीं भी हो तो रणनीतिक तालमेल की कोशिश विपक्ष की ओर से होनी चाहिए। इन सभी कोशिशों के लिए कांग्रेस और जेएमएम को खुद अपने स्तर पर पहल करनी होगी लेकिन दोनों में से कोई पार्टी ऐसा करते हुए नहीं दिख रही है। जाहिर है कि अगर विपक्ष एकजुट नहीं होता है तो इसका लाभ सत्ता पक्ष को चुनावों में मिलेगा।’ (सत्याग्रह)


Date : 19-Sep-2019

राम यादव
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन जितने महत्वाकांक्षी हैं, उतने ही अधीर और अडिय़ल भी। महत्वाकांक्षी इतने कि मान बैठे थे कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से तलाक दिलाने का जो काम उनकी पूर्ववर्ती टेरेसा मे तीन साल में नहीं कर पायीं, उसे वे चुटकी बजाते हुए तीन महीनों में ही निपटा देंगे। अधीर इतने कि गत 24 जुलाई को ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनते ही कहने लगे, ‘मैं कब्र में जाना पसंद करूंगा, पर ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ के मुख्यालय) से यह नहीं कहूंगा कि हमें कुछ और समय चाहिए।’ और अडिय़ल इतने कि रट लगाए हुए हैं कि तलाक के व्यवस्थित (सॉफ्ट) या अव्यवस्थित (हार्ड) स्वरूप के बारे में यूरोपीय संघ के साथ कोई सहमति हो या न हो, 31 अक्टूबर 2019 ही उसकी अंतिम तारीख़ रहेगी।
बोरिस जॉन्सन की जिद और रूखेपन से त्रस्त होकर उनके अपने ही भाई जो जॉन्सन सहित कई मंत्रियों और सांसदों ने उनका साथ छोड़ दिया। 21 सांसदों को खोकर संसद में अपनी पार्टी का बहुमत खोना उन्हें पसंद था लेकिन अपनी जिद से टस से मस होना स्वीकार नहीं था। अपने मन की मनवाने के लिए उन्होंने जो भी चालें चलीं, वे उलटी पड़ीं और अपने झांसों में वे खुद ही फंसते चले गए। दुनिया उनकी और उनके ‘बर्तानिया महान’ (ग्रेट ब्रिटेन) की आज चटखारे ले-लेकर खिल्लियां उड़ा रही है।
बोरिस जॉन्सन अब तक अपनी एक ही मनमानी कर पाए हैं- संसदीय बैठक की पांच हफ़्तों के लिए ‘ज़बर्दस्ती छुट्टी।’ हालांकि इसे भी कई अदालती चुनौतियां दी गई हैं। 75 सांसदों की शिकायत पर स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरॉ के न्यायालय ने 11 सितंबर के अपने फैसले में इस बलात अवकाश को ‘अवैध’ और ‘संसद को बाधित करने वाला’ बताया। लंदन में ब्रिटेन का सर्वोच्च न्यायालय भी इस पर 17 सितंबर को अपना फैसला सुनाने वाला है।
 सोमवार 9 सितंबर को, संसद की अंतिम बैठक हुई। जॉन्सन की अपनी ही पार्टी के 21 विद्रोही सांसदों के विपक्ष के साथ मिल जाने से संसद में विपक्ष का बहुमत हो गया था। इससे नए संसदीय चुनाव करवाने के बोरिस जॉन्सन के कुटिल प्रयास एक बार फिर से विफल हो गए। बैठक में तय हुआ कि प्रधानमंत्री महोदय, 19 अक्टूबर तक, यूरोपीय संघ के साथ या तो किसी नई सहमति (नए डील) पर पहुंचे या फिर अगले सत्र में संसद को विश्वास दिलाएं कि बिना इसके ही यूरोपीय संघ से तलाक अपरिहार्य क्यों है। यानी कि बोरिस जॉनसन भी उसी मुद्दे पर विफल होते दिख रहे हैं, जिस मुद्दे पर उनसे पहले टेरेसा मे भी दांत पीस कर रह गयी थीं।
ब्रिटेन का एक समुद्रपारीय पड़ोसी देश है आयरलैंड गणराज्य। दोनों के बीच 30 से 490 किलोमीटर चौड़ा अयरिश सागर है। स्वतंत्र देश आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन का उत्तरी आयरलैंड प्रदेश एक-दूसरे से सटे हुए एक ही आयरिश द्वीप पर स्थित हैं। इस समय दोनों देश, यानी ब्रिटेन और आयरलैंड गणराज्य, यूरोपीय संघ के सदस्य हैं। इसलिए संघ के नियमों के अनुसार आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड प्रदेश के बीच की साझी सीमा हर प्रकार के बेरोकटोक आवागमन के लिए खुली हुई है। लेकिन जब ब्रिटेन यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं रह जाएगा, तब क्या हो, यही यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच किसी नई सहमति का वह गतिरोधक रोड़ा है, जो हट नहीं पा रहा है।
नियमानुसार होना तो यह चाहिए कि यूरोपीय संघ की ब्रिटिश सदस्यता का अंत होते ही आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड के बीच की सीमा पर पासपोर्ट, वीसा और सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) वाले वे सारे नियम लागू हो जाएं, जो दो स्वतंत्र देशों के बीच हुआ करते हैं। किंतु यूरोपीय संघ और आयरलैंड गणराज्य यह नहीं चाहते। उन्हें डर है कि तब ब्रिटिश उत्तरी आयरलैंड के वे निवासी जो आयरलैंड गणराज्य से जुड़े रहना चाहते हैं, उससे कट जायेंगे। उत्तरी आयरलैंड के रोमन कैथलिक (41 फीसदी) आयरिश गणराज्य के साथ विलय चाहते रहे हैं, जबकि वहां के प्रोटेस्टैंट (19 फीसदी) व अन्य अल्पसंख्यक ब्रिटेन का अंग बने रहना चाहते हैं।
दूसरी ओर ब्रिटेन को डर है कि इस सीमा को ब्रेग्जिट के बाद भी खुला रखने (इस व्यवस्था को ‘बैकस्टॉप’ का नाम दिया गया है) का अर्थ होगा उत्तरी आयरलैंड के प्रश्न पर अपनी प्रभुसत्ता के साथ सौदेबाज़ी करना। इससे उत्तरी आयरलैंड उसके बजाय आयरलैंड गणराज्य के ज्यादा करीब हो जाएगा। इसे ब्रिटेन कतई स्वीकार नहीं कर सकता। बोरिस जॉन्सन और उनके समर्थक यह भी कहते फिरते हैं कि आयरिश सीमा को खुली रखने के बहाने से, यूरोपीय संघ ब्रिटेन के विदेश-व्यापार पर अपनी पकड़ बनाये रखना चाहता है।
सांसदों को नौ सितंबर वाले जिस दिन पांच सप्ताह की छुट्टी देदी गयी, उसी दिन बोरिस जॉन्सन आयरलैंड गणराज्य के प्रधानमंत्री, अर्धभारतवंशी लेओ वरादकर से मिलने डब्लिन पहुंचे। वरादकर ने उनसे दो टूक कहा, ‘बैकस्टॉप के बिना हम कोई डील नहीं कर सकते।’ उन्होंने जॉन्सन से यह भी कहा कि वे यूरोपीय संघ के विरोधियों के इस भुलावे में न रहें कि ब्रिटेन यदि 31 अक्टूबर या 31 जनवरी को यूरोपीय संघ से बाहर हो गया, तो ब्रेग्जिट से जुड़ा सारा किस्सा खत्म हो जाएगा।
वरादकर का कहना था कि तलाक हो या न हो, वह आपसी सहमति से हो या असहमति से हो, दोनों पक्षों को बातचीत करते रहना पड़ेगा। वरादकर ने इस बारे में कोई संदेह नहीं छोड़ा कि वे अपने देश आयरलैंड और उससे सटे ब्रिटिश उत्तरी आयरलैंड की सीमा को किसी भी हालत में बंद होते नहीं देखना चाहते।
यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि भारत की तरह आयरलैंड गणराज्य भी 120 वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहने के बाद छह दिसंबर 1922 को स्वतंत्र हुआ था। उसकी जनसंख्या इस समय कऱीब 50 लाख है। स्वतंत्र देश आयरिश गणराज्य और 19 लाख की जनसंख्या वाले ब्रिटिश प्रदेश उत्तरी आयरलैंड का 1921 में हुआ बंटवारा कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा भारत- पाकिस्तान और कश्मीर का बंटा होना है। उत्तरी आयरलैंड को कश्मीर जैसा मान सकते हैं।
दोनों बड़े समुदायों के बीच 1960 से 1990 वाले दशक तक खूब सिर-फुटौवल हुई है। इसमें सवा तीन हज़ार लोग मरे हैं। 50 हज़ार से अधिक घायल हुए हैं। करीब 37 हज़ार बार गोलियां चली हैं। 16 हज़ार बम-धमाके हुए हैं। ब्रिटिश पुलिस और सेना पर वहां उसी तरह के दमन और अत्याचारों के आरोप लगे हैं, जैसे ब्रिटिश व अन्य पश्चिमी मीडिया, कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों पर लगाते रहे हैं। वही ब्रिटेन, जिसने उत्तरी आयरलैंड को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं दिया, भारत को कश्मीर में इसी अधिकार के आदर का उपदेश दिया करता है। अब डर यह है कि सीमाएं बद होने पर उत्तरी आयरलैंड में पहले जैसी स्थिति फिर न हो जाए। इसके कुछ संकेत अभी से देखने को मिलने लगे हैं।
जुलाई के अंत में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ब्रिटिश संसद में बोरिस जॉन्सन की जो छीछालेदर हुई है, उससे प्रेक्षक यही अनुमान लगाते हैं कि वे, 19 अक्टूबर से पहले, उत्तरी आयरलैंड की सीमा के नियमन (बैकस्टॉप) की गुत्थी सुलझाने के बारे में कोई चमत्कार नहीं कर पाएंगे। बोरिस जॉन्सन अपने आपको जितना तेजतर्रार और चतुर समझते हैं, उनकी समस्याएं उससे कहीं तेज़ी से बढ़ रही हैं और जटिल होती जा रही हैं। ऐसे में सबसे प्रबल संभावना यही दिखती है कि यूरोपीय संघ से तलाक लेने की तारीख 31 अक्टूबर, आगामी जनवरी तक के लिए, या यह भी हो सकता है कि हमेशा के लिए टाल दी जाए। 
बोरिस जॉन्सन चाहते थे कि 31 अक्टूबर तक यूरोपीय संघ के साथ यदि कोई नई सहमति नहीं बन पाती है, तो संसद या तो उन्हें बिना किसी समझौते के ही एकपक्षीय ढंग से यूरोपीय संघ से बाहर हो जाने का अधिकार दे दे, या 19 अक्टूबर से पहले नए संसदीय चुनाव करवाने के लिए हरी झंडी दिखा दे। संसद ने उनकी दोनों मांगे ठुकरा दीं। इससे जो नई स्थिति पैदा हुई हैं, उसे देखते हुए वे ये चार विकल्प आजमाने की कोशिश कर सकते हैं।
संसद की बैठक जब तक नहीं हो रही है, वे अपने क़ानूनी और राजनीतिक सलाहकारों की सहायता से ब्रिटेन के अलिखित संविधान में कोई ऐसा अनुच्छेद या यूरोपीय संघ की संधियों में कोई ऐसी कमी खोज निकालें, जिससे यूरोपीय संघ के साथ किसी समझौते के बिना ही उससे बाहर निकलने का रास्ता मिल जाए।  समस्या यह है कि तब वे सांसद, जो बिना समझौते के बाहर निकलने के विरोधी हैं, बोरिस जॉन्सन को अदालत में घसीट सकते हैं। अदालत ने यदि यह पाया कि वे तिकड़में भिड़ा रहे और देश को झांसा दे रहे हैं, तो उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। तब वे यही कह कर संतोष कर सकते हैं कि मैं क़ानून के हाथों शहीद हो गया।
बोरिस जॉन्सन यदि यह सोचते हैं कि वे अपने वचन के बहुत पक्के हैं पर 31 अक्टूबर तक अपना वादा पूरा नहीं कर पायेंगे, तो उससे पहले ही त्यागपत्र देकर कुर्सी ख़ाली कर सकते हैं। तब प्रश्न यह होगा कि नया प्रधानमंत्री कौन बन सकता है। उनकी अपनी ही मनमानी से उनकी टोरी पार्टी संसद में सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी अल्पमत में आ गई है। ऐसे में संभावना इसी बात की अधिक होगी कि दो-तीन विपक्षी पार्टियां मिलकर एक नई सरकार बनाए और उन्हीं के बीच से कोई प्रधानमंत्री भी बनेगा।
जॉन्सन यह भी कर सकते हैं कि वे संसद में किसी तरह दो-तिहाई बहुमत जुटा कर नये चुनावों की घोषणा कर दें। नये चुनावों को जनता के सामने ब्रेग्जि़ट के लिए एक नये जनमतसंग्रह के तौर पर पेश करें। चुनाव होने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहें। 
चुनाव जीत जाने पर इसे ब्रेग्जि़ट साकार करने का नया जनादेश बताते हुए यूरोपीय संघ के साथ कुछ ले-देकर तलाक़ की सहमति प्राप्त कर लें। चुनाव हार जाने पर निश्चित है कि ब्रिटेन अनिश्चित काल तक के लिए यूरोपीय संघ का सदस्य बना रहेगा। बोरिस जॉन्सन को तब ब्रिटेन के सबसे अल्पकालिक प्रधानमंत्री के तौर पर याद किया जायेगा।
यूरोपीय संघ में नियम है कि संघ में किसी नये देश के आगमन या किसी सदस्य देश के निर्गमन जैसे बड़े निर्णय सभी सदस्य देशों की सर्वसम्मति से होने चाहिए। दूसरे शब्दों में, हर देश के पास ऐसे किसी निर्णय को रोकने का वीटो-अधिकार है। बोरिस जॉन्सन यह कर सकते हैं कि वे यूरोपीय संघ के शेष 27 सदस्यों में से किसी एक देश को पटा लें। वह ब्रिटेन का पक्ष लेते हुए संघ के अक्टूबर में होने वाले शिखर सम्मेलन में अपने वीटो अधिकार का प्रयोग करेगा। तब ब्रिटेन अपने बहिर्गमन के लिए उत्तरी आयरलैंड संबंधी ‘बैकस्टाप’ वाले बंधन से मुक्त हो सकता है। कहा जाता है कि यूरोपीय संघ से काफ़ी नाराज़ दिखने वाले हंगरी के प्रधानमंत्री विक्तोर ओर्बान इस काम के लिए सही व्यक्ति हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने ब्रिटेन के प्रति ऐसी कोई सहानुभूति अभी तक नहीं दिखायी है।
यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स में स्थित यूरोपीय संसद में 12 सितंबर को एक बहुदलीय प्रस्ताव पेश किया गया। सितंबर के तीसरे सप्ताह में उस पर मतदान होगा। प्रस्ताव में कहा गया है कि यूरोपीय संसद की भी सहमति के बिना ब्रेग्जि़ट संभव नहीं है। यूरोपीय सासंद ब्रिटेन के बहिर्गमन की अनुमति तभी देंगे, जब अन्य यूरोपीय देशों के वहां रहने वाले नागरिकों के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित किया जाएगा। प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि ब्रेग्जि़ट समझौते में आयरलैंड गणराज्य और ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड के बीच की सीमा को खुला रखने का तथाकथित ‘बैकसटॉप’ प्रवधान भी शामिल होना चाहिए। 
12 सितंबर को ही ब्रिटिश सरकार का एक ऐसा आकलन मीडिया में लीक हो गया, जिसमें उस भयावह परिदृश्य का पूर्वानुमान लगाया गया है, जो यूरोपीय संघ के साथ बिना किसी समझौते के अलग होने पर ब्रिटेन में पैदा हो सकता है। स्वयं ब्रिटिश सरकार का अनुमान है कि तब ताज़े खाद्यपदार्थों और दवाओं की भारी कमी पड़ सकती है। इससे जनता में भारी असंतोष फैल सकता है।
इसके अलावा तब बंदरगाहों में जहाज़ों की लंबीं क़तारें लग सकती हैं, क्योंकि हर जहाज की सीमा शुल्क आदि के लिए जांच करनी पड़ेगी। इंग्लिश चैनल पार कर यूरापीय देशों से आने वाले ट्रकों को दो-तीन दिनों तक लाइन में खड़े रहना पड़ सकता है। यह भी हो सकता है कि लोग घबराहट में अंधाधुंध खरीददारी और जमाख़ोरी करने लगें। यूरोपीय संघ की सदस्यता त्यागने के समर्थकों और विरोधियों के बीच दंगे भी हो सकते हैं और देश में अराजकता फैल सकती है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन और पुलिस तथा सुरक्षा विभागों के बीच संचार-संपर्क में भी बाधा पड़ सकती है।
दो अगस्त को लिखे गए और अब जाकर सामने आए इस सरकारी आकलन को नाम दिया गया है ‘ऑपरेशन येलो-हैमर’ (पीला हथौड़ा अभियान)। इससे नौ दिन पहले ही बोरिस जॉन्सन ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने थे। इस आकलन के कुछ अंश ‘संडे टाइम्स’ ने 18 अगस्त को प्रकाशित किए थे। किंतु कई पृष्ठों का पूरा आकलन अब जाकर लीक हुआ है। जबकि प्रधानमंत्री बनने से पहले और उसके बाद भी बोरिस जॉन्सन यही सब्जबाग दिखाते रहे हैं कि यूरोपीय संघ को विदा कहने के बाद ब्रिटेन को न केवल अपनी संपूर्ण प्रभुसत्ता वापस मिल जाएगी, देश में सुख-चैन का राज होगा और दूध-दही की नदियां बहेंगी। फिलहाल जो नजर आ रहा है वह बोरिस जॉन्सन की महत्वाकांक्षा, अधीरता और अडिय़लपन की वजह से उनकी असफलता की मुनादी कर रहा है। (सत्याग्रह)

 


Date : 19-Sep-2019

दिनेश श्रीनेत
बुखार दुनिया के प्रति हमारा नजरिया बदल देता है। बहुत मामूली-सी बातें हमें अहम लगने लगती हैं। बाहर बाल्कनी में चिडिय़ा का चहकना, खिडक़ी से उतरती धूप या शाम का ढलना। रातें लंबी हो जाती हैं और दिन किसी पहाड़ की चढ़ाई जैसे- थकाने वाले। हल्के बुखार में हम अपने शरीर के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील हो जाते हैं। रोशनी चुभने लगती है और आवाजें भी।
हमारे आसपास जो कुछ भी घटित हो रहा है, हम उसे देखना नहीं चाहते। अपने-आप में सिमटना चाहते हैं। अपने एकांत, अपने मन अपने शरीर के भीतर समा जाना चाहते हैं। अपने शरीर से बातें कर पाते हैं। उसकी छोटी से छोटी आहट अब हमें सुनाई देने लगती है।  शरीर में दर्द के हल्के रेशे, आंखों की जलन या त्वचा की गरमाहट। प्यास की शिद्दत महसूस होती है। आसपास की दुनिया के रंग धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं। खाने की चीजों से स्वाद मिटने लगता है। आपको लगता है कि आपको भोजन नहीं करना है और जीवित भी रहना है।
एक निर्गुण-सा भाव उपजता है जीवन के प्रति। नींद आती है तो लगता है कि भीतर से जगे हुए हैं। कोई एक ही बात आपके सपनों में चिपकी रहती है। अपने पैरों पर शरीर का वजन महसूस होता है। बुखार में किताबें अच्छी दोस्त बन जाती हैं। अक्सर किसी परिचित किताब के परिचित किरदार से मिलना अच्छा लगता है। हालांकि उन्हें पढऩा थका देता है मगर शब्दों का साथ बाकी दुनिया के मुकाबले अच्छा लगने लगता है।
शायद बुखार हमारे आसपास के भौतिक जीवन की धमक और चमक को अचानक से फीका कर देता है। स्वाद, रंग, ध्वनि, स्पर्श सभी कुछ तो दुख देते हैं। ऐसे में शब्द जो संसार रचते हैं उन पर भरोसा होने लगता है। आपका शरीर आपसे अजनबी बन जाता है, मगर शब्द आपके पास आपके साथ होते हैं। लोगों से हमारी अपेक्षाएं बदल जाती हैं। उनका पास बैठना, हाथ थाम लेना, आकर हालचाल पूछ जाना, सर पर हाथ रखकर बुखार देखना, सहारा देना सब कुछ किसी अलग इनसानी रिश्ते में बांधता है।
जब शाम को कोई मित्र आपका हाल पूछने आता है तो वह सिर्फ और सिर्फ आपके लिए आता है। उसका आपने सिरहाने कुर्सी खींचकर बैठना और आपको बोलने से बना करना एक अबोले रिश्ते को मजबूत करता है। इस रिश्ते में कहने से ज्यादा मौन की अहमियत होती है। जितना गहरा मौन, उतना ही मरीज का ख्याल। कई बार आपको पता लगता है कि जब आप सो रहे थे तो कोई आपको देखने आया था और वह बिना जगाए आपको देखकर, आपका हालचाल पूछकर चला गया। बिना मिले आपका दिल उसके प्रति एक गहरी कृतज्ञता से भर जाता है।
जब बुखार कम होता है तो आप थोड़ा प्रसन्न होते हैं और चहकने लगते हैं। कम से कम चेहरे पर मुस्कुराहट तो लौट ही आती है। मगर जल्दी ही स्याह बादलों सा बुखार फिर आपके वजूद पर छा जाता है। आप चुप हो जाते हैं। शिकायत करना भी बंद कर देते हैं। खुद को हालात पर छोड़ देते हैं। जब बुखार उतरता है तो रोशनी उतनी नहीं चुभती और संगीत बुरा नहीं लगता। रंग वापस लौटने लगते हैं। एक साथ नहीं, एक-एक करके। जुबान पर स्वाद महसूस होता है।
आप सबसे पहले अपने बिस्तर से उठना चाहते हैं। बाहर की दुनिया को देखना चाहते हैं। उस वक्त जीवन की सबसे मामूली बातें आपको सबसे ज्यादा सुख देती हैं। जैसे सडक़ पर लड़ते कुत्ते। लगता है कि जीवन में कुछ बदला नहीं है। वह उतना ही सामान्य है जितना कि उसे होना चाहिए। कितनी अजीब बात है कि इसी सामान्य जीवन को तो हम नजरअंदाज़ करते भागते रहते हैं।

 


Date : 19-Sep-2019

गिरीश मालवीय
गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर कहा है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजन यानी एनआरसी को पूरे देश में लागू करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।
अच्छा आप ये बताइये कि मोदी राज से पहले कभी आपने यह सुना था कि एनआरसी सरीखा एक रजिस्टर होता है! जिसमें नागरिकों की राष्ट्रीय सूची दर्ज होती है उस सूची में भारत के निवासियों का नाम दर्ज होता है ओर जिन लोगों का नाम इस रजिस्टर में नहीं रहता वो भारत के नागरिक नहीं होते?
दरअसल यह एनआरसी के पीछे एक बड़ा इतिहास रहा है यह मूल रूप से पूर्वोत्तर में बढ़ रहे शरणार्थियों की समस्या से संबंधित है।
हमेशा से असम में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों का मामला बहुत बड़ा मुद्दा रहा है। इस मुद्दे पर कई बड़े और हिंसक आंदोलन भी हुए है। असम के मूल नागरिकों ने तर्क दिया कि अवैध रूप से आकर यहां रह रहे ये लोग उनका हक मार रहे हैं। 80 के दशक में इसे लेकर एक बड़ा स्टूडेंट मूवमेंट हुआ था जिसके बाद असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ कि 1971 तक जो भी बांग्लोदशी असम में घुसे उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को निर्वासित किया जाएगा।
असम का एनआरसी असल में साल 1951 में बने एनआरसी को अपडेट करने की ही कवायद है। इसमें उन सभी लोगों को शामिल किया जा रहा है जिनका नाम 1971 से पहले की मतदाता सूची या 1951 के एनआरसी में शामिल है।
अब यह कहा जा रहा है कि असम एनआरसी के मामले में पहल करने वाला पहला राज्य है और अब बाकी राज्यों में भी एनआरसी लाने की मांग की जा रही है। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश के सभी राज्यों में पहले ही एनआरसी तैयार हो चुका है।
दरअसल में देश के बंटवारे के बाद यह जानना जरूरी था कि देश में कितने लोग वैध या अवैध तरीके से रहे हैं। इसलिए आजादी के बाद साल 1951 में ही देश भर में एक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स तैयार किया गया था...... जी हाँ पूरे देश भर में !
यह सभी राज्यों में तैयार किया गया था यानी अभी जो असम में जो एनआरसी तैयार किया जा रहा है वह नया नहीं है।
साल 1951 में देश भर में जनगणना हुई थी, जिसमें हर गांव में सभी मकानों की क्रमवार ऑर्डर के मुताबिक जानकारी और उसमें कितने लोग रहते हैं, यह जानकारी हासिल हुई थी। इसके बाद इस जनगणना की सहायता से ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस तैयार किया गया। इस रजिस्टर को तैयार करने के बाद इसे केंद्र सरकार के निर्देश पर सभी इलाकों के डिप्टी कमिश्नर और एसडीएम के दफ्तरों में रखा गया. बाद में 1960 के दशक में ये रजिस्टर पुलिस विभाग को सौंप दिए गए।
असल में सभी राज्यों में 1951 में जो एनआरसी तैयार की गई थी, वह जनगणना पर आधारित थी, इसमें लोगों का समुचित वेरिफिकेशन नहीं किया गया था। इस तरह असम में एनआरसी का अपडेशन, वह भी सिटीजनशिप के वेरिफिकेशन के साथ करने की इतनी बड़ी कवायद किसी राज्य में पहली बार हुई है। अब इस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को देश भर में लागू किये जाने की बात की जा रही है।
लेकिन सच तो यह है कि देश भर में एनआरसी लागू करने की बात के पीछे एक छिपा हुआ एजेंडा है ओर एनआरसी के नाम पर देश में एक समुदाय को डराने और उन्हें घुसपैठिया साबित करने की कोशिश की जा रही है।
ओर इसके लिए संभवत: सदन के अगले सत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा इस विधेयक द्वारा अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 से पहले आने वाले 6 धर्मों के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का रास्ता खोल दिया जाना है ये धर्म हैं- हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई। गौरतलब है कि इस्लाम मानने वालों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा
यही बार बार एनआरसी के लागू किये जाने की बात का असली कारण है

 


Date : 18-Sep-2019

हिमांशु शेखर

कुछ समय पहले तक दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच हमेशा की तरह तीखी बयानबाजी का दौर चल रहा था। दोनों दलों के नेता एक-दूसरे के बारे में काफी भला-बुरा कह रहे थे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हर बात के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराते दिखते थे। वहीं दिल्ली भाजपा के छोटे-बड़े कई नेता भी केजरीवाल पर निजी हमले करने तक से बाज नहीं आ रहे थे।
लेकिन अब जब विधानसभा चुनावों में कुछ ही महीने का वक्त बचा है तो दोनों दलों के सुर बदल से गए लगते हैं। अरविंद केजरीवाल आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आक्रामक बयान नहीं दे रहे हैं। इसकी बजाए आम आदमी पार्टी अब मोदी सरकार पर हमला करने के लिए सधी हुई प्रतिक्रियाओं का सहारा ले रही है।
इस बारे में आम आदमी पार्टी से जुड़े एक नेता कहते हैं, ‘पार्टी से बाहर जो लोग आप और अरविंद केजरीवाल के शुभचिंतक हैं, उन लोगों ने केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के साथ-साथ पार्टी के सभी बड़े नेताओं को लगातार यह नसीहत दी कि बेवजह हर बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने से जनता के बीच आप को लेकर एक नकारात्मक छवि बन रही है। लोगों को लग रहा है कि केजरीवाल अपना काम कर नहीं रहे हैं और अपने बचाव में प्रधानमंत्री पर हमला बोल रहे हैं। भाजपा विरोधी पार्टियों के कुछ मुख्यमंत्रियों ने भी अरविंद केजरीवाल को नरेंद्र मोदी और भाजपा पर बेवजह हमला करने से बचने की सलाह दी है। इन सबका असर अब आपको न सिर्फ पार्टी के बयानों ? बल्कि अरविंद केजरीवाल की बातों में भी दिख रहा होगा।’
आप के रुख में आए इस बदलाव से भाजपा भी अपनी रणनीति बदलने लगी है। दिल्ली के चुनाव प्रभारी बनाए गए प्रकाश जावड़ेकर ने पिछले दिनों दिल्ली प्रदेश भाजपा के पदाधिकारियों की जो बैठक ली थी, उसमें उन्होंने प्रदेश के नेताओं को यह निर्देश भी दिया है कि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के खिलाफ तीखे बयान नहीं देने हैं। जावड़ेकर ने उनसे कहा है कि केजरीवाल सरकार की आलोचना के लिए तथ्यों और तर्कों का सहारा लेना है।
इस बारे में दिल्ली प्रदेश भाजपा के एक नेता सत्याग्रह को बताते हैं, ‘पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व यह भांप गया है कि आप ने अपनी रणनीति बदल ली है। अब वह उस स्तर पर जाकर भाजपा की आलोचना नहीं कर रही है जिस स्तर पर जाकर पहले किया करती थी। ऐसे में अगर भाजपा की ओर से बेवजह हमला जारी रहा तो इसका लाभ विधानसभा चुनावों में आप को मिल सकता है। इस वजह से केंद्रीय नेतृत्व ने प्रकाश जावड़ेकर के जरिए प्रदेश के नेताओं को यह निर्देश दिया है कि बेवजह आलोचना से बचना है लेकिन तार्किक आलोचना का कोई अवसर नहीं गंवाना है।’
पिछले कुछ दिनों में दिल्ली सरकार ने कई लोक-लुभावन घोषणाएं भी की हैं। उसने हाल ही में डीटीसी में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की शुरुआत की है। साथ ही बिजली और पानी के बिलों में भी कई तरह की रियायतों की घोषणा केजरीवाल सरकार ने की है। सब्सिडी वाली इन योजनाओं की प्रदेश भाजपा के कुछ नेताओं ने तीखी आलोचना कर दी थी। लेकिन अब भाजपा के केंद्रीय नेताओं को लग रहा है कि इन घोषणाओं से आम लोगों को सीधा फायदा होगा और ऐसे में अगर भाजपा इनका विरोध करती हुई दिखेगी तो लोग उससे नाराज हो सकते हैं। भाजपा का यह भी आकलन है कि दिल्ली के आम लोगों को केजरीवाल सरकार की पहले की सब्सिडी योजनाओं से भी लाभ हुआ है। इसलिए इन योजनाओं का विरोध राजनीतिक तौर पर सही नहीं होगा। यह भी एक वजह है कि प्रकाश जावड़ेकर ने प्रदेश भाजपा के नेताओं को सिर्फ तर्क के साथ आलोचना करने की नसीहत दी है।
‘भाजपा के शीर्ष नेताओं को यह लगता है कि आम लोगों को सीधा लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं का क्रियान्वयन जिस तरह से केंद्र की मोदी सरकार ने किया है, उसी तरह की कोशिश दिल्ली की केजरीवाल सरकार कर रही है। केंद्र की उज्जवला योजना से लेकर किसान मान धन योजना तक से आम लोगों को सीधा लाभ मिला है। इसी तरह से केजरीवाल सरकार की कई योजनाओं से भी लोगों को सीधा लाभ मिल रहा है। पार्टी को लगता है कि इन योजनाओं की आलोचना करने से आम लोगों में उसका मजाक बनेगा और चुनावों में इसका राजनीतिक नुकसान भी होगा’ प्रदेश भाजपा के नेता सत्याग्रह से कहते हैं,
हालांकि, दोनों राजनीतिक दलों के बीच चल रही जुबानी जंग के बीच बयानों का यह संघर्ष विराम कब तक चलेगा, इसके बारे में दोनों पार्टियों में कई तरह के संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं। दोनों दलों के नेताओं को लग रहा है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनावों के दिन नजदीक आएंगे, वैसे-वैसे यह संघर्ष विराम कमजोर पड़ता जाएगा और दोनों दल फिर से अपने पुराने रंग में आकर एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने का काम शुरू कर देंगे।
इस बारे में प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘केजरीवाल की पूरी राजनीति तीखी आलोचना की बुनियादी पर ही खड़ी हुई है। कांग्रेस सरकार की आलोचना करके आम आदमी पार्टी को खड़ा करने का काम अरविंद केजरीवाल ने किया। जो आरोप वे लगाते थे, सरकार में आने के बाद उन पर चुप्पी मारकर बैठ गए। अरुण जेटली और नितिन गडकरी जैसे नेताओं पर उन्होंने बेबुनियाद आरोप लगाए। जब ये मामले अदालत में पहुंचे तो उन्होंने भाजपा के दोनों नेताओं से माफी भी मांग ली। इसलिए ये कहना मुश्किल है कि अरविंद केजरीवाल कब तक तार्किक आलोचना के रास्ते पर चलेंगे। क्योंकि उनका अब तक का राजनीतिक सफर बेबुनियाद राजनीतिक आरोपों पर ही आधारित रहा है।’
 यह पूछने पर कि अगर आम आदमी पार्टी फिर से हमले की पुरानी रणनीति पर लौटती है तो भाजपा की रणनीति क्या होगी, वे कहते हैं, ‘निश्चित तौर पर हम आक्रामक ढंग से जवाब देंगे। लेकिन यह आक्रामकता कितनी होगी और किन मुद्दों पर होगी, इस बारे में शीर्ष नेतृत्व की ओर से जिन केंद्रीय नेताओं को दिल्ली की जिम्मेदारी दी गई है, वे ही तय करेंगे। केजरीवाल को घेरने के लिए मुद्दों का चयन बेहद अहम है। गलत ?मुद्दों पर घेरने की कोशिश का भाजपा को नुकसान हो सकता है।’ (सत्याग्रह)

 


Date : 18-Sep-2019

गाबी रॉयशर

भारतीय मूल के ब्रिटिश स्कॉलर और उत्तर-उपनिवेशवाद विषयों के अग्रणी विचारक माने जाने वाले होमी के भाभा से जर्मनी के रुअर में होने वाले सालाना संगीत और कला महोत्सव रुअरट्रीनाले में डीडब्ल्यू ने की खास बातचीत।

अनजाने देशों में ठिकाना पाने के लिए वे अपनी मातृभूमि छोड़ देते हैं, कभी तो अपने ही देश में भागते हैं, कभी रबड़ के बूट पहने भूमध्य सागर में खतरनाक यात्राओं पर निकल जाते हैं, हमेशा एक बेहतर जीवन की आस में, गरिमामय जीवन की उम्मीद में। जर्मनी के बोखुम में आयोजित सालाना संगीत और कला महोत्सव रुअरट्रीनाले को संबोधित करते हुए होमी के भाभा ने मानव अधिकारों, रास्ते में मरने वाले रिफ्यूजियों और आप्रवासन के साथ साथ जीवन ही नहीं मृत्यु की गरिमा की भी बात की।
अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भाभा निर्वासन और आप्रवासन के मामलों में सांस्कृतिक विविधताओं के बारे में बात करते हुए सैद्धांतिक बातों से ज्यादा ताजा हालात पर ध्यान देते हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, मैं अमेरिका में रहता हूं। मुझे मिस्टर ट्रंप का नजरिया और नीतियां निन्दायोग्य लगती हैं। भाभा का मानना है कि ट्रंप की भाषा एक लोकतांत्रिक बातचीत का हिस्सा ही नहीं लगती। वे कहते हैं, मुझे लगता है कि जैसी भाषा वे लोगों के बारे में, अलग अलग नस्ल के लोगों के बारे में, महिलाओं के बारे में, दूसरे देशों के लोगों के बारे में इस्तेमाल करते हैं - वह शर्मनाक है।
भाभा ने रुअरट्रीनाले में अपना भाषण अफ्रीकी-अमेरिकी लेखिका टोनी मॉरिसन की स्मृति में दिया। साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाली मॉरिसन की मृत्यु अगस्त 2019 में हुई। भाभा ने मॉरिसन के साथ कई यूनिवर्सिटी के प्राख्यानों के लिए व्यक्तिगत तौर पर भी साथ काम किया था।
मॉरिसन ने चार शब्दों वाली मशहूर हो चुकी पंक्ति, ये किसका घर है? , से 2012 में आई अपनी किताब ‘होम’  की शुरुआत की थी। उस घर के लिए भाभा की परिकल्पना राष्ट्रीय इतिहास के उस अंधेरे घर की है जो नए निवासियों के इतिहास को नजरअंदाज करता है। भले ही उस विदेशी घर की चाबी प्रवासी के पास हो। भाभा बताते हैं कि आप्रवासी अपने घरों में भी कैसे अजनबीपन महसूस करते हैं। मेक्सिको के वे लोग जो कानूनी तौर पर अमेरिका में रहते और काम करते हैं, उन्हें भी मेक्सिको के लोगों को राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा चोर, खूनी और बलात्कारी कहे जाने से अपमानित महसूस होता है।
ट्रंप को ऐसी ‘असभ्य’  बयानबाजी करने के लिए बाकायदा सलाह मिली थी। 2016 का चुनाव जीतने के लिए ट्रंप के पूर्व सलाहकार स्टीव बैनन ने उन्हें कहा था, इसका खुलासा बैनन के एक इंटरव्यू से हुआ जो उन्होंने 2018 में न्यूजवीकली ‘द इकोनॉमिस्ट’  को दिया था।
ऐसा अमानवीय बर्ताव करने वाले पॉपुलिस्ट और नौसिखिए राष्ट्रवाद को  भाभा कबीलाई राष्ट्रवाद कहते हैं। ऐसा नहीं कि केवल अमेरिका में ऐसा हो रहा है बल्कि भारत में मोदी, वेनेजुएला में मादुरो, ब्राजील में बोल्सोनारो, रूस में पुतिन से लेकर हंगरी में ओरबान तक इसी कतार में हैं।
भाभा इस बात पर खासे हैरान हैं कि इनमें से ज्यादातर लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आए हैं। वे कहते हैं, मुझे इस बात से डर है कि राष्ट्रवाद के हर इन रूपों की अपनी अलग ही बात है। पूरे विश्व में आज ऐसे निरंकुश आदमियों का दबदबा है, किसी महिला को तो कभी ऐसी भूमिका में नहीं देखा है।
अपने भाषण में ट्यूनिशिया के तटीय शहर जारसिस में कचरे के पहाड़ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये वो जगह है जहां पानी में बह कर आने वाली आप्रवासियों की लाशों को फेंका जाता है। उन्होंने बताया कि तट पर कई लोग ऐसे भी हैं स्वेच्छा से आगे आकर ऐसे फेंके हुए शवों को समुद्र तट पर गाड़ पर उनकी मौत को कुछ गरिमा देने की कोशिश करते हैं।
भाभा ने पाया है कि निरंकुश सरकारें गरिमा की धज्जियां उड़ाने में खासी आगे होती हैं। शरणार्थियों के लिए बने कानूनों, मानवाधिकार और आप्रवासन पर आयोजित सम्मेलनों को धीरे धीरे करके कम करती हैं। रिफ्यूजियों को बेहद खराब माहौल में लंबे लंबे समय के लिए कैंपों में रख कर इंतजार करवाया जाता है। भाभा बताते हैं कि ये सब करने से उन्हें बंधन में रख कर बेइज्जत करने का मकसद पूरा होता है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर चल रहे कैंपों को ही देखा जा सकता है।
सरकारें अपनी आर्थिक और राजनीतिक गलतियों के लिए समाज के सबसे कमजोर तबकों पर आरोप लगाती हैं। जैसे कि भारत में अलग संस्कृति, ट्रांसजेंडर और अलग जाति वालों पर आरोप मढ़ा जाता है। भाभा कहते हैं कि ऐसे में गरीब होना ही आपकी गलती बन जाती है और पॉपुलिस्ट सरकारें कहती हैं, गरीबों को घर दो तो वे उसे ठीक से नहीं रखते। समाज कल्याण के लिए कुछ करो तो वे उसका फायदा उठाते हैं। काम नहीं करते क्योंकि आलसी होते हैं।
बाहर से आए लोगों के प्रति घृणा का भाव पैदा करके कुछ राष्ट्रवादी सोच वाले पॉपुलिस्ट नेता जो करते हैं उसका मुकाबला कोई कानून नहीं कर सकता। कानून आपको अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव करने से भले ही रोक पाए लेकिन किसी को नीचा दिखाने के खिलाफ कौन सा कानून काम करेगा।
भाभा का मानना है कि शिक्षा से ही ऐसा हो सकता है कि लोगों के मन से विदेशियों के प्रति डर को हटाया जा सके। उनका मानना है कि प्रगतिशील सरकारों और मीडिया का ये कर्तव्य होना चाहिए कि वे इस पर आम बहस करवाएं। अपने भाषण में उन्होंने आम लोगों से भी आगे बढ़ कर रिफ्यूजियों से एकजुटता दिखाने और जिम्मेदारी उठाने का आह्वान किया। इस पर भी भाभा का कहना है कि ऐसा दया खाकर नहीं बल्कि ये सोच कर करें कि वे भी आपकी ही तरह इंसान हैं, जिन्होंने आंखों के सामने मौत देखी है और फिलहाल आपकी हालत उनकी हालत से बेहतर है। 
जर्मन लेखिका और दार्शनिक हाना आरेंट के सिद्धांतों को भाभा ने विस्तार से पढ़ा है। उन्होंने लिखा था कि आजादी की परिकल्पना में आवाजाही की आजादी निहित होनी चाहिए। भाभा ने उन्हीं के विचारों पर बल देते हुए कहा कि शरणार्थियों को भी आवाजाही की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपनी मातृभूमि को छोडऩे का कठिन फैसला किया है, अपनी जान का जोखिम उठाया है और किसी नए घर को अपनी चाभी से खोलने की कोशिश कर रहे हैं, वे ऐसा केवल और केवल गरिमापूर्ण जीवन जी सकने के लिए करते हैं। अगर सवाल अब भी यही है कि ये किसका घर है?, तो जवाब केवल एक हो सकता है: यह रिफ्यूजियों और आप्रवासियों का भी घर है। (डॉयचेवेले)
 

 

 


Date : 17-Sep-2019

पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैरिस खालिक कहते हैं कि इमरान खान जिन वादों को लोगों के सामने रख सरकार में आए थे, वो उन्हें पूरा नहीं कर सके हैं। इमरान के सत्ता संभालने के बाद पस्थितियां सुधरी नहीं बल्कि और बिगड़ी हैं।
18 अगस्त 2018 को जब इमरान खान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली तो कई पाकिस्तानियों ने उन्हें मौजूद विकल्पों में सबसे बेहतर माना। बाकी पाकिस्तानियों ने उन्हें एक मसीहा की तरह माना और उनका अंधसमर्थन किया। इमरान की जीत को पाकिस्तान के दक्षिणपंथी और संपन्न शहरी मध्य वर्ग की जीत माना गया। उन्हें विदेशों में रह रहे पाकिस्तानियों से भी मदद मिली। साथ ही मनोवैज्ञानिक रूप से अधीर न्यायपालिका और राजनीतिक रूप से ताकतवर सेना का भी साथ मिला। 
इमरान के समर्थकों ने उन्हें अर्थव्यवस्था की कमजोरी को दूर करने और राजनीतिक मुश्किलों का हल करने के लिए समर्थन दिया। वो मूलभूत समस्याओं का प्रशासनिक हल और भौतिक सवालों के नैतिक जवाब चाहते थे। लेकिन अब तक इमरान ऐसा करने में नाकाम दिख रहे हैं। लोगों की मुश्किलें दूर होने की बजाय बढ़ती दिख रही हैं। 2018 में पाकिस्तान की जनता के लिए नया पाकिस्तान का नारा इमरान ने दिया था। इसे संक्षेप में भ्रष्टाचार मुक्त अर्थव्यवस्था और सही तरीके से काम करने वाली सरकार के रूप में देखा गया था। यह इमरान खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ के उभार और सत्ता तक पहुंचने की कहानी  भी रहा है।
जुलाई 2018 में हुए आम चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगे। लेकिन फिर भी पाकिस्तान के लोग और दूसरी पार्टियों ने इमरान खान को एक मौका दिया। विपक्षी पार्टियों की मजबूरी ये थी कि अगर वो इस चुनाव के नतीजों को नहीं मानते तो आशंका थी कि कहीं यह पाकिस्तान में लोकतंत्र के अंत और फिर से फौजी हुक्मरानों के सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की वजह ना बन जाए।
हालांकि इमरान खान को अपने दो पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों जुल्फिकार अली भुट्टो और नवाज शरीफ की तुलना में बेहतर समर्थन मिला। अधिकांश शक्तिशाली संगठन उनकी तरफ थे, विपक्ष एकदम निष्क्रिय था और बाजार और मीडिया के साथ पाकिस्तान के पूरे मध्यम वर्ग को इमरान एक ऐसे नेता की तरह लग रहे थे जो उन्हें बचा सकेगा और उनका उद्धार करेगा।
इमरान के सत्ता संभालने के सालभर बाद अब लगता है कि अर्थव्यवस्था को ठीक करने के उनके वादे हवा हवाई निकले हैं। अर्थव्यवस्था आगे तो नहीं बढ़ी बल्कि और भी पीछे पहुंच गई है। एक विकासशील देश में हमेशा पूंजीवाद काम आता है। इमरान खान की पार्टी कहती है कि वो सिस्टम को ठीक कर देंगे लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि सिस्टम काम कैसे करता है।
पीटीआई का भ्रष्टाचार मिटाने और आर्थिक कर्ज खत्म करने का वादा उम्मीद से जल्दी धाराशाई हो गया। इमरान द्वारा नियुक्त किए गए आर्थिक प्रबंधकों की कम जानकारी और कुप्रबंधन इसकी वजह बना है। यही कारण है कि उनका ये वादा अब धूमिल होता नजर आ रहा है। आईएमएफ के साथ देरी से हुए समझौते ने ना सिर्फ इमरान खान की सरकार पर अतिरिक्त दबाव बनाया बल्कि आईएमएफ को पाकिस्तान की आर्थिक नीति पर अधिक नियंत्रण दे दिया।
मैक्रोइकोनॉमिक स्टैबिलिटी के नाम पर विकास रुक गया है। रुपये की कीमत लगातार कम होती जा रही है। बाजार ने अपना भरोसा खो दिया है। बिजली के बढ़ते दामों के साथ-साथ बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की जेब ढीली कर दी है। लोगों की आमदनी कम होने से उनके सामने और भी मुश्किलें आ रही हैं। इस आर्थिक मंदी की वजह से बेरोजगारी और गरीबी लगातार बढ़ती जा रही है। इन सब के बावजूद खर्चों की सबसे मुख्य कटौती शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में की गई है। इसका नुकसान होना तय है। कर्ज की बात की जाए तो पाकिस्तानी अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून की खबर के मुताबिक पिछले पांच साल में नवाज शरीफ की सरकार ने जितना कर्ज लिया उसका दो तिहाई कर्ज इमरान खान की सरकार महज एक साल में ले चुकी है।
विदेश नीति में इमरान की सरकार चीन और अमरीका के साथ अपने संबंधों में सामंजस्य बिठाने में असफल रही है। चीन की महत्वाकांक्षी चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना अभी अधर में है। वहीं अमरीका भी पाकिस्तान को अफगान शांति वार्ता में  उसके  मुताबिक काम नहीं करने पर कोई भी मदद देने को तैयार नहीं है। अर्थव्यवस्था को स्थिर करने की कोशिश में पिछले एक साल में सऊदी अरब और यूएई को लुभाने के लिए झुकना, पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता के लिए बहुत थोड़ी ही राहत ला सका है। भारत के कश्मीर को लेकर अनुच्छेद 370 में किए गए परिवर्तनों पर अरब मुल्कों ने बहुत ठंडी प्रतिक्रिया दी। इस प्रतिक्रिया के चलते पाकिस्तान का पक्ष कमजोर हो गया।
पिछले एक साल में इमरान खान और उनके समर्थकों ने बस दो काम ठीक से किए हैं। एक राजनीतिक असंतोष को कम करना और दूसरा मेनस्ट्रीम मीडिया पर नियंत्रण करना। हालांकि जो लोग पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास से परिचित हैं वो ये बात अच्छे से जानते हैं कि आवाज दबाने का प्रतिरोध इतना घातक होता है कि वो सरकार की जड़ों को हिला देता है।
एक साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद इमरान खान की सरकार को आत्मनिरीक्षण की जरूरत है जिससे वो पाकिस्तानी नागिरकों के आर्थिक अधिकारों को सुनिश्चित कर सकें।  इसमें गरीबी हटाना, उत्पादकता और रोजगार बढ़ाना भी शामिल है। साथ ही इमरान की सरकार को दूसरे देशों और महाशक्तियों के साथ दूरगामी हितों को देखकर अपने संबंधों में सामंजस्य स्थापित करना होगा। 
साथ ही सरकार को अपने नागरिकों के सिविल और नागरिक अधिकारों को देना होगा। सरकार को लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी देना होगा। पाकिस्तान में हो रही आलोचनाओं को सुनने और उन्हें सकारात्मक रूप में लेकर इमरान खान की सरकार को काम करना होगा जिससे जिन वादों को करके वो सत्ता में आए थे उन्हें पूरा कर सकें और जनता की उम्मीदों पर खरा उतर सकें। (डॉयचेवेले)


Date : 17-Sep-2019

राजू पाण्डेय

सरकार का नया मोटर व्हीकल एक्ट विवादों में है। जहां अनेक विपक्षी दल और बुद्धिजीवी यह आरोप लगा रहे हैं कि इसके अनेक प्रावधान हमारे संघीय ढांचे की आत्मा पर आघात हैं वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि अठारह राज्यों के परिवहन मंत्रियों से चर्चा और विमर्श के बाद ही यह बिल तैयार किया गया है और अब इसकी आलोचना करने का नैतिक अधिकार विपक्ष को नहीं है। क्योंकि इनमें से कई राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं और बिल में इन राज्यों के सुझाव भी सम्मिलित हैं। राज्यसभा में भी बिल में अंतिम समय में संशोधन किया गया और परिवहन से संबंधित किसी भी योजना की घोषणा से पहले इसके प्रावधानों पर राज्यों की सहमति को आवश्यक बना दिया गया। जबकि पहले इसके लिए राज्यों से चर्चा का ही प्रावधान था, आवश्यक नहीं था कि केंद्र उनके विचारों से सहमत होता। 
केंद्रीय परिवहन मंत्री का कहना है कि यह बिल उन ढांचागत सुधारों की ओर एक मजबूत कदम है जिनकी आवश्यकता परिवहन क्षेत्र लंबे समय से महसूस कर रहा था। लेकिन भ्रष्ट रीजनल ट्रांसपोर्ट सिस्टम द्वारा खड़ी की गई बाधाओं और पिछली सरकारों में इच्छाशक्ति के अभाव के कारण यह मामला लंबित पड़ा हुआ था। 
नया बिल नेशनल ट्रांसपोर्ट पॉलिसी और नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड के गठन का मार्ग प्रशस्त करेगा। रूरल ट्रांसपोर्ट जो अब तक राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षित था वह प्राथमिकताओं के केंद्र में आ जाएगा। सब्सिडी प्राप्त इलेक्ट्रिक बसों के प्रचलन से कम खर्च में वातानुकूलित सडक़ यात्रा सर्वसुलभ होगी। इससे लोगों में निजी वाहन नहीं रखने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और पर्यावरण प्रदूषण कम होगा तथा यह नए निवेश का जरिया भी बनेगा।
नए मोटर व्हीकल एक्ट में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार का यह मानना है कि भारी-भरकम जुर्माने के डर से लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करने लगेंगे और जानलेवा दुर्घटनाओं में कमी आएगी। सरकार का यह तर्क आश्चर्यजनक है क्योंकि वैश्विक स्तर पर अनेक सरकारों के अनुभव अब तक यह रहे हैं कि भले ही जुर्माने की राशि कम हो किंतु यदि इसे बिना भेदभाव के और बिना कोई रियायत दिए ईमानदारी से वसूला जाए तो नियमों के उल्लंघन की प्रवृत्ति घटती है, चाहे वह ट्रैफिक के नियम हों या किसी अन्य क्षेत्र के। इसके विपरीत यदि जुर्माना असाधारण रूप से अधिक होता है तो या तो इसे वसूला ही नहीं जाता या इसके कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और वसूलीकर्ता अधिकारी इसका उपयोग अपनी जेब भरने के लिए करते हैं। 
गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्य नए मोटर व्हीकल एक्ट में प्रस्तावित जुर्मानों को घटाने की ओर अग्रसर हैं जबकि उत्तरप्रदेश ने पूर्व की दरों को यथावत रखा है। यद्यपि वह केंद्र से सहमति का आकांक्षी है। ऐसा नहीं है कि परिवहन मंत्री आरटीओ महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार से अपरिचित हैं। एक दैनिक समाचार पत्र के कार्यक्रम में उन्होंने 10 दिसंबर 2015 में कहा था- आरटीओ देश का सबसे भ्रष्ट महकमा है। इनके द्वारा की जा रही लूट-खसोट चंबल के डाकुओं को भी पीछे छोड़ देती है। उन्होंने कहा- मैं स्वयं को अपराधबोध से ग्रस्त अनुभव करता हूं। भारत जैसी सरलता से ड्राइविंग लाइसेंस पूरी दुनिया में नहीं मिलते। इनमें से तीस प्रतिशत बोगस होते हैं। 
देश में हर साल 5 लाख दुर्घटनाएं होती हैं जिसमें डेढ़ लाख लोग मारे जाते हैं और तीन लाख लोग अपाहिज हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश युवा होते हैं। इनके परिवार उजड़ जाते हैं। स्वयं एक दुर्घटना में मेरा पैर चार स्थानों पर टूट गया था। मेरे सचिव ने अपना बच्चा खोया। इन दुर्घटनाओं के लिए मैं जिम्मेदार हूँ। हमारी रोड इंजीनियरिंग इसके लिए जिम्मेदार है। श्री गडकरी ने पहले भी एक अवसर पर महाराष्ट्र में रिश्वतखोरी के लिए बोलचाल की भाषा में प्रचलित शब्द लक्ष्मी दर्शन का उल्लेख करते हुए आरटीओ महकमे के भ्रष्टाचार पर अपना गुस्सा व्यक्त किया था। पुन: 2 अगस्त 2018 को एक अंग्रेजी अखबार को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि भ्रष्ट आरटीओ एसोसिएशन लॉबी ही नए मोटर वाहन अधिनियम के मार्ग में बाधा है और वह राज्यों को इस बिल का विरोध करने के लिए उकसाती रहती है जबकि सच्चाई यह है कि इस बिल में न तो राज्यों के अधिकारों और शक्तियों पर अतिक्रमण किया गया है न ही उनमें कोई कटौती की गई है।
इस बिल के माध्यम से परिवहन सेक्टर को पारदर्शी, भ्रष्टाचार रहित, मैनुअल प्रक्रियाओं से मुक्त और ई लाइसेंसिंग तथा ई रजिस्ट्रेशन जैसी सुविधाओं से युक्त बनाने का दावा करने वाले गडकरी ने इस बिल में जब इस सेक्टर की अनियमितता पर निशाना साधा तो भ्रष्टाचारियों से अधिक भ्रष्टाचार पीडि़त आम जनता को दोषी मानते हुए उससे मनमाना जुर्माना वसूलने में लग गए।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 18 महीनों तक कराए गए भ्रष्टाचार विषयक एक सर्वेक्षण के नतीजे जब मई 2017 में सामने आए थे तब 69 प्रतिशत ब्राइबरी रेट के साथ भारत का नाम एशिया के सबसे भ्रष्ट देश के रूप में उजागर हुआ था। सर्वे के अनुसार हमारे 62 प्रतिशत लॉ एनफोर्समेंट ऑफिसर्स रिश्वत लेते हैं। एक भारतीय के द्वारा वर्ष भर में औसत रूप से जितनी रिश्वत दी जाती है उसका एक चौथाई यातायात नियमों का पालन कराने वाले अधिकारियों की जेब में जाता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वेक्षण के अनुसार भारत के ट्रक मालिक वर्ष में 222 करोड़ रुपए की रिश्वत देने के लिए बाध्य किए जाते हैं। इस रिश्वत का 43 प्रतिशत आरटीओ अधिकारियों को और 45 प्रतिशत पुलिस कर्मियों को दिया जाता है। यातायात, वन सुरक्षा और एक्साइज से जुड़े अधिकारी इनकी ट्रकों को रोकते हैं और 60 प्रतिशत बार  रोकने की इस कार्रवाई का उद्देश्य पैसा वसूलना होता है। हार्वर्ड कॉलेज तथा मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में 2007 में प्रकाशित एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में ड्राइविंग लाइसेंस धारी 60 प्रतिशत लोगों ने ड्राइविंग टेस्ट दिया ही नहीं और ड्राइविंग लाइसेंस रखने वाले 54 प्रतिशत लोग स्वतंत्र ड्राइविंग परीक्षण में असफल रहे। तब से लेकर अब तक स्थिति बदली नहीं है। 
ऐसा नहीं है कि लोग ड्राइविंग सीखना नहीं चाहते लेकिन हमारी भ्रष्ट व्यवस्था ऐसी है कि ड्राइविंग लाइसेंस पाने के लिए ड्राइविंग जानने से अधिक रिश्वत देने को जरूरी बना देती है। बिना रिश्वत के योग्य ड्राइवर भी लाइसेंस नहीं बना सकता। देश के लगभग 1000 आरटीओ कार्यालय भ्रष्टाचार के केंद्र बने हुए हैं। भारत सडक़ दुर्घटनाओं को कम करने पर केंद्रित ब्राजीलिया डिक्लेरेशन पर नवंबर 2015 में हस्ताक्षर कर चुका है और 2020 तक सडक़ दुर्घटनाओं को कम करने हेतु अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुका है।
यातायात और परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए बिना सडक़ दुर्घटनाओं का कम होना कठिन है। 2016 में मुम्बई पुलिस के हेड कांस्टेबल सुनील बलवंत राव टोके ने मुंबई हाई कोर्ट में मुम्बई ट्रैफिक पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार के संबंध में एक जनहित याचिका दायर की थी। उसने यह आरोप लगाया था कि मुम्बई पुलिस 10000 रुपये से 50000 रुपए की अवैध वसूली कर शराबी ड्राइवर्स को छोड़ देती है तथा अवैध ऑटो और टैक्सी मालिक मुम्बई पुलिस को नियमित रूप से 1000 से 2000  रुपए की रिश्वत देते हैं। उसने कुछ ऐसे मामलों के कथित वीडियो सबूत भी प्रस्तुत किए थे। बाद में अगस्त 2017 में मुम्बई पुलिस ने हाई कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर उन उपायों की जानकारी दी थी जो भ्रष्टाचार कम करने के लिए उसने लागू किए थे। इनमें हजारों की संख्या में सीसीटीवी कैमरों का संस्थापन भी एक उपाय था जिनका संबंध पुलिस और ट्रैफिक के कंट्रोल रूम से था। इनके माध्यम से ट्रैफिक पुलिस कर्मियों की गतिविधि पर निगरानी रखी जा रही थी। इन सीसीटीवी कैमरों द्वारा यातायात नियमों के उल्लंघन कर्ताओं को चिह्नित किया जा रहा था। इन्हें मोबाइल पर चालान का विवरण, प्रमाण के तौर पर फोटोग्राफ और पेमेंट हेतु लिंक भेजा जाता था। 
इस तरह इस पूरी प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप को कम करने की कोशिश की गई थी। ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को ई चालान हेतु हैंडसेट भी मुहैया कराए गए थे ताकि कैश का लेन देन न करना पड़े। पुलिस वालों के शरीर पर कैमरे फिट करने का भी प्रस्ताव था जो उनकी सारी बातचीत और गतिविधियों को रिकॉर्ड करता। जनता को शिकायत दर्ज करने के लिए ईमेल आईडी भी उपलब्ध कराने का जिक्र इस हलफनामे में था। मुम्बई हाई कोर्ट इस हलफनामे से संतुष्ट हुआ और उसने इन उपायों को अन्य स्थानों पर लागू करने का सुझाव भी दिया।
आरटीओ विभाग का भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं है, अपितु यह जानलेवा सिद्ध होता है। 27 जून 2019 को मुगल रोड पर हुई एक दुर्घटना में 11 बच्चों की जान गई। बाद में यह पता चला कि दुर्घटना ग्रस्त गाड़ी पुंछ की थी किंतु सारे नियम कायदों को ताक में रखकर इसे जम्मू आरटीओ द्वारा फिटनेस प्रमाण पत्र दिया गया था। गाड़ी के पास रुट परमिट भी नहीं था। इस घटना की जांच में जम्मू आरटीओ में व्याप्त भयानक भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी तीन चक्का वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट देने में अनियमितता और भ्रष्टाचार के बाद जुलाई 2018 में दिल्ली की तत्कालीन ट्रांसपोर्ट कमिश्नर को आड़े हाथों लिया था। 
आंध्र प्रदेश के एन्टी करप्शन ब्यूरो द्वारा नवंबर 2018 में यह जानकारी दी गई कि प्रदेश के सबसे भ्रष्ट अधिकारियों की सूची में पहले 10 स्थानों पर आरटीओ विभाग के अधिकारी ही काबिज हैं। देश के कुछ शहरों में सेकंड हैंड गाडिय़ों की बिक्री के नाम पर चोरी की गाडिय़ों की बिक्री करने वाले गिरोहों का पर्दाफाश हुआ था। यह दु:खद स्थिति कुछ प्रांतों की ही नहीं है, आरटीओ में व्याप्त भ्रष्टाचार देशव्यापी है। जब गलत ढंग से फिटनेस सर्टिफिकेट और रोड परमिट हासिल करने वाली ओवर लोडेड गाड़ी द्वारा कोई एक्सीडेंट होता है तो इसके लिए केवल ड्राइवर उत्तरदायी नहीं होता इसके पीछे एक पूरी भ्रष्ट व्यवस्था उत्तरदायी होती है। लेकिन अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए तरह तरह के समझौते करने को बाध्य ड्राइवर को दंडित करना भ्रष्ट व्यवस्था के संचालकों के लिए सबसे आसान होता है और आवश्यक भी क्योंकि इस तरह वे अपने गुनाहों पर पर्दा डाल सकते हैं। 
ओवर लोडिंग हमारे रोड ट्रांसपोर्ट सिस्टम में एक आम परिघटना है और दुर्घटनाओं का कारण भी। छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में जहां कोल ब्लॉक अवस्थित हैं और स्टील तथा पावर उद्योगों की भरमार है वहां अवैध तरीके से कोयले एवं अन्य खनिजों का परिवहन करते दैत्याकार वाहनों द्वारा आम लोगों को कुचल देना एक आम बात है। ओवर लोडेड वाहनों के कारण भ्रष्टाचार की वजह से पहले से ही कमजोर बनी सडक़ें गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। पैदल और दोपहिया वाहन चालक इन सडक़ों पर रोज अपनी जान हथेली पर लेकर यात्रा करने को बाध्य होते हैं। देश में स्टील और पावर उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी स्थान रखने वाले छत्तीसगढ़ के उद्योग बहुल रायगढ़ जिले में केवल 100 किलोमीटर की परिधि में ही 2015 से 2018 की अवधि में लगभग 1000 लोग ऐसी औद्योगिक वाहन कारित दुर्घटनाओं में अपने प्राण गंवा चुके हैं। 
इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग ने एक अध्ययन में यह बताया था कि देश में हर तीन ट्रकों में एक ओवर लोडेड होता है और 50 फीसदी दुर्घटनाओं की जिम्मेदार यही ओवर लोडिंग होती है। जब कोई ट्रक 10 फीसदी ओवर लोडेड होता है तो उसके स्टीयरिंग पर 50 प्रतिशत और ब्रेक पर 40 फीसदी नियंत्रण कम हो जाता है। यह ओवर लोडिंग सडक़ की आयु को 80 प्रतिशत कम कर देती है जबकि ट्रक की आयु 30 प्रतिशत कम हो जाती है। बिचौलिए और अस्थायी अल्पकालिक स्वामित्व वाले छोटे ट्रक ऑपरेटर ओवर लोडिंग को अनिवार्य बुराई की तरह देखते हैं, यही स्थिति खाद, सीमेंट और स्टील उत्पादकों की है जो माल भाड़े में कमी लाने के लिए ओवर लोडिंग करते हैं। ऐसी गाडिय़ों द्वारा जो प्रदूषण फैलाया जाता है उसका तो ठीक से आकलन भी नहीं किया गया है।
छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और मध्यप्रदेश के सघन वनाच्छादित क्षेत्रों में कोयले और अन्य बहुमूल्य खनिजों के प्राचुर्य के कारण यहां उद्योगों का एक जाल बिछ चुका है। कस्बे नगरों का और नगर महानगरों का रूप ले रहे हैं। नगर निवेश के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अराजक और अनियोजित रूप से इन नगरों में संपन्नता के साधनों के ढेर लगाए जा रहे हैं। वर्तमान महानगरों के कटु अनुभवों से सबक सीखने के स्थान पर इनकी बेतरतीबी को आदर्श और अनुकरणीय समझा जा रहा है। इस प्रकार इन नगरों को यातायात की दृष्टि से अबूझ पहेली में बदल दिया गया है- जहां न पार्किंग की सुविधाएं हैं, न नालियां हैं, न सडक़ें हैं और जहां ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं की लोगों को आदत सी पड़ गई है। यह स्थिति कमोबेश देश के हर उस इलाके की है जहां औद्योगीकरण और नगरीकरण ने पैर पसारे हैं।
किंतु बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित मोटर व्हीकल एक्ट में इस अराजक और भ्रष्ट तंत्र की बड़ी मछलियों पर कार्रवाई करने की हिम्मत और नीयत दोनों का अभाव दिखता है। भ्रष्टाचार के गड्ढों से भरी सडक़ों पर बिना परमिट के झूठे फिटनेस सर्टिफिकेट के आधार पर तूफानी रफ्तार से चल रहे ओवर लोडेड दैत्याकार वाहनों से खुद को किसी तरह बचाते -मानो अपने आखिरी सफर पर निकले-निरीह दुपहिया वाहन चालक की गाड़ी का रजिस्ट्रेशन, प्रदूषण सर्टिफिकेट और ड्राइविंग लाइसेंस देखना या बिना हेलमेट के पाए जाने पर उससे अवैध वसूली करना भ्रष्ट व्यवस्था की निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। 
नया मोटर व्हीकल एक्ट लोगों को पेपर सर्टिफिकेट इक_ा करने के लिए प्रेरित करने वाला है। भ्रष्ट व्यवस्था में चंद रुपये देकर हासिल किए गए प्रमाण पत्रों से न तो कोई दक्ष चालक बन जाएगा न खटारा गाडिय़ां प्रदूषणमुक्त गाडिय़ों में तबदील हो जाएंगी। नए मोटर व्हीकल एक्ट के लागू होने के बाद से मीडिया में दो तरह के दृश्य देखने में आ रहे हैं या तो रसूखदार और सत्तासीन लोग ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर ट्रैफिक पुलिस के अधिकारियों को आंख दिखा रहे हैं या ट्रैफिक पुलिस कर्मी आम नागरिकों के साथ बर्बरता से पेश आ रहे हैं। 
यह दृश्य नए नहीं हैं किंतु इसलिए चर्चा में हैं कि ये जादुई मोटर व्हीकल एक्ट के लागू होने पर यातायात व्यवस्था में चमत्कारिक सुधार होने के सरकारी दावों की हकीकत बयान करते हैं। शोहरत, सत्ता और शराब के नशे में मदहोश नामचीन फिल्मी सितारों, नेता पुत्रों और रईसजादों द्वारा मासूम लोगों को कुचल डालने और कानून की गिरफ्त से बच निकलने के अनेक मामले सबके जेहन में हैं। जब कानूनों को लागू करने वाले लोगों को भ्रष्टाचार की लत लगी हुई हो तब कठोर कानून इन भ्रष्टाचारियों के लिए भ्रष्टाचार के नए आयाम खोलते हैं। पूर्वानुभव यह सिद्ध करते हैं कि कठोर कानूनों से अपराध नहीं रुकते बल्कि इनसे लोगों में अपराधों पर पर्दा डालने की प्रवृत्ति बढ़ती है। सरकार को समझना होगा कि भ्रष्टाचार आम आदमी की आदत नहीं मजबूरी है तभी वह आम आदमी के विषय में अधिक मानवीय ढंग से सोच पाएगी। 

 

 


Date : 16-Sep-2019

उदित राज

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाने की बहस के दौरान भाजपा के कई नेताओं ने दलितों को राज्य में आरक्षण का पूरा लाभ मिलने का जि़क्र किया. यह भी कहा गया कि डॉ. आंबेडकर भी ऐसा चाहते थे. लेकिन क्या वास्तव में 370 हटने के पहले राज्य में दलितों की स्थिति खऱाब थी?

संसद में जब अनुच्छेद 370 और 35 ए ख़त्म करने का बिल पास हो रहा था तो सरकार को सबसे ज्यादा चिंता दलित हित की दिखी। बिल पेश करते समय और बारी-बारी से जो भी अन्य वक्ता भाजपा की ओर बोले, सबसे पहले उनकी फिक्र दिखी कि इन अनुच्छेदों के हटने से दलितों को आरक्षण का पूरा लाभ मिलेगा।

हालांकि 2014 से उनका खुद का इतिहास आरक्षण के संरक्षण और इसे लागू करने को लेकर क्या रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है। दूसरी बार जब सरकार में आए तो दनादन ऐलान किया कि ज्यादातर सरकारी कंपनियों को बेचना है ताकि रहा-सहा भी आरक्षण समाप्त हो जाये। यहां तक प्रचार किया गया कि वहां के वाल्मीकि समाज का केवल मैला साफ करने के लिए कानून बना है, यह साबित भी करने की कोशिश किया गया कि मुस्लिम बाहुल्य राज्य होने की वजह से दलितों के साथ भेदभाव हुआ। डॉ। बीआर आंबेडकर अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे इसका भी जोर-शोर से प्रचार-प्रसार किया गया। ऐसे में जांच-पड़ताल की जरूरत है कि क्या वास्तव में अनुच्छेद 370 के पहले दलितों की स्थिति खऱाब थी।

इतिहास बताता है कि डोगरा रियासत ने कभी लगभग 556 वाल्मीकि परिवार को बसाया था। गोरखा भी बाहर से आए थे। जो भी बाहर से आए वे सब अपने ही पेशे तक सीमित कर दिए गये थे। बड़ी संख्या में लोग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से भी आए। उन सभी को जम्मू कश्मीर की नागरिकता नहीं मिली और अब अनुच्छेद 35 ए हटने के बाद, सबको नागरिकता स्वाभाविक रूप से मिल गयी है।

अब तक इन सभी को सरकारी नौकरियां नहीं मिलती थी क्योंकि नागरिकता ही नहीं थी। वाल्मीकि समुदाय को एक छूट जरूर दी गयी थी कि वे नगर निगम में सफाई के काम में नौकरी कर सकते हैं। कश्मीर में दलित हैं ही नही, जम्मू क्षेत्र में जरूर इनकी आबादी 8त्न है।

अनुसूचित जाति/जनजाति परिसंघ के जम्मू कश्मीर के अध्यक्ष आरके कल्सोत्रा ने विरोध जताया कि दलितों के कंधे पर भाजपा बंदूक न चलाये। उनका कहना है कि जो भी अत्याचार होता है वो सवर्ण हिंदू करते हैं न कि मुस्लिम।

उन्होंने एक दृष्टांत का जिक्र किया कि पूर्व में सांसद रहे श्री जुगल किशोर ने अपने कोष से सवर्णों को अलग से शमशान बनाने के लिए राशि अनुमोदित की, जो जगह बिश्नाह के नाम से जानी जाती है। जब इसका विरोध हुआ तब जा करके रोक लगी। अभी भी जम्मू में अलग-अलग शमशान घाट हैं । अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटा तो दिया लेकिन पिछड़ों और दलितों को फायदा क्या हुआ यह जानना जरूरी है। अभी तक पिछड़ों का आरक्षण वहां 2त्न लागू था जबकि 27 त्न होना चाहिए। अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा आयोग स्थापित किया जायेगा कि नहीं इस पर अभी तक सरकार का कोई रुख साफ नहीं हुआ।

अब और संविधान के 106 अनुच्छेद लागू होने हैं जिसमें यह साफ नहीं है कि 81वां, 82वां, 85वां संवैधानिक संशोधन क्या इसमें शामिल है।

यह संवैधानिक संशोधन आरक्षण से संबंधित हैं। जम्मू कश्मीर में 2004 में आरक्षण कानून और एसआरओ 144 पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए बना था लेकिन हाईकोर्ट ने इसको खारिज कर दिया था, अब इसका क्या होगा कुछ स्पष्ट नही है। जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जनजाति को 10त्न, अनुसूचित जाति को 8त्न, पिछड़ा वर्ग को 2त्न, क्षेत्रीय पिछड़ा वर्ग को 20त्न, गरीब सवर्णों को 10त्न, पहाडिय़ों को 3त्न, लाइन आफ कंट्रोल वालों को 3त्न और सीमा पर रहने वालों को 3त्न- कुल 59त्न आरक्षण बनता है। अब केंद्र सरकार के आरक्षण के मापदंड लागू होंगे तो क्या स्थिति होगी, यह तो आने वाला समय बताएगा। आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी को वहां के दलितों की बड़ी चिंता है लेकिन जब इन्हें मौका मिला था तो क्या किया?

2001 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ में सरकार बनाई, पीडीपी के साथ भी चार साल की सरकार रही है। क्या भाजपा के विधायकों ने विधानसभा में दलितों और पिछड़ों से संबंधित इन सवालों को उठाया? अप्रैल 2015 में जम्मू कश्मीर सरकार की कैबिनेट ने फैसला लिया कि बिना आरक्षण सरकारी नौकरी में भर्ती की जायेगी। परिसंघ सहित तमाम संगठनों ने जब आंदोलन किया तब जाकर आरक्षण कोटे को भी आधार माना। ध्यान रहे कि उस समय भाजपा और पीडीपी की सरकार थी।अगर उन्होंने इससे पहले ऐसे कोई मुद्दे उठाये होते तो माना जाता कि उनके इरादे नेक हैं वरना मुस्लिम-हिंदू का कार्ड खेलने के अलावा इसमें और क्या है? जब अनुच्छेद 370 का विवाद बढ़ा तब कुछ सच्चाई उभर के सामने आई वरना तो लोग सोचते थे कि जम्मू कश्मीर में भुखमरी और गरीबी ज्यादा है। अब जाकर पता लगा कि कई मानकों में यह राज्य न केवल विकास का पर्याय बना दिए गए गुजरात से बल्कि तमाम अन्य प्रदेशों से भी आगे है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता शेख अब्दुल्ला और बख्शी गुलाम जब मुख्यमंत्री थे, तब भूमि सुधार कानून सख्ती से लागू किया, जिससे जमींदारी टूटी और सबके पास जोतने के लिए जमीन मुहैया हो सकी।यह कानून सख्ती से इसलिए लागू हो सका कि अनुच्छेद 370 की वजह से जमींदार अदालत का सहारा नहीं ले पाए वरना दसियों साल तक मामले लटके रहते हैं। कई राज्यों में भूमि सुधार कानून इसलिए सफल नहीं हो पाया कि अदालतों में मामले दशकों से लंबित रहे। दलितों को भी इसका फायदा मिला।

यही कारण है कि वहां पर अन्य राज्यों से स्थिति बेहतर है। अन्य राज्यों जैसे जम्मू कश्मीर में दलितों के साथ बलात्कार, उत्पीडऩ और हिंसा जैसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलती हैं।

अगर अभी तक दलितों का भला नहीं हुआ है तो यह अवसर अच्छा है, कुछ करके दिखाएं। जहां तक डॉ। आंबेडकर का मत अनुच्छेद 370 के बारे में है, तो इस तरह से उनकी सैकड़ों मांगे नहीं पूरी की जा सकीं। डॉ। आंबेडकर जाति खत्म करना चाहते थे तो क्या हो पाई? जमीन के राष्ट्रीयकरण की बात कही थी, वह भी न हो पाया। समय और परिस्थितियां बदल गए हैं, पुरानी बातों को उद्धृत करने से समस्याओं को सुलझाने के बजाय उलझाने में ही लगे रहेंगे।

डॉ। आंबेडकर ने यह भी कहा था कि जम्मू कश्मीर को तीन भागों में विभाजित कर दिया जाए। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाए और कश्मीर के लोगों को यह स्वतंत्रता दी जाए कि वह भारत के साथ रहना चाहते हैं या स्वायत्तता चाहते हैं। आधे-अधूरे तथ्य उद्धृत करके किसी महान पुरुष को गलत नहीं पेश करना चाहिए, जैसा कि मायावती और भाजपा ने किया है। ( द वायर)

(लेखक पूर्व सांसद और कांग्रेस के सदस्य हैं।)


Date : 16-Sep-2019

अशोक वाजपेयी

ऐसी संस्थाओं की संख्या बढ़ गयी और बढ़ती जाती है जो क़ानून का धड़ल्ले से दिनदहाड़े उल्लंघन करती हैं क्योंकि वे आश्वस्त हैं कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा।

इन दिनों हमारे चंद्रयान के चंद्रमा पर न पहुंचने के कारण जो तकनीकी विफलता सामने आयी है वह ज़ेरे-बहस है। आम तौर पर विफलता की निंदा होती है या अवहेलना। पर इस बार अंतत: विफल हो जाने को कुछ परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। लगभग पहुंच ही गये थे, सिफऱ् आखिऱ में कुछ गड़बड़ हो गयी! एक महत्वाकांक्षी अभियान था जो कुल मिलाकर सफल था बस अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका। अगर यही दृष्टि हम अपने आसपास हो रही अनेक विफलताओं को समझने में लगा सकें तो विफल होने का अर्थ व्यर्थ हो जाना बंद हो जायेगा जो ज़्यादातर होता रहता है।

सफल होने की भयानक और तेज़ होड़ है। उसमें सफल होने के लिए राजनीति, धर्म, मीडिया आदि दिनरात साधनों की या नैतिकता की परवाह किये बिना लगे रहते हैं। जैसे भी हो वैसे सफल होना एकमात्र लक्ष्य बन गया है। जो ऐसे सफल नहीं होता उसे हाशिये पर ढकेल दिया जाता है। ज़्यादातर एक बार विफल होने के बाद लोग फिर दृश्य से ओझल ही हो जाते हैं। पर ऐसे भी कम नहीं हैं जो फिर कोशिश करते हैं, फिर हिम्मत जुटाते हैं, अपनी भूलचूकों को दुरुस्त कर फिर होड़ लगाते हैं और सफल हो जाते हैं। एक बार सफल हुए कि आपकी पिछली विफलता भुला दी जाती है। जब सफल सो सदा सफल!

कुछ बेहद सफल लगते-दिखते-माने गये लोग अंतत: विफल भी होते हैं। मार्क्स और गांधी ऐसी ही विफलता की महान शबीहें हैं। मार्क्स की दृष्टि और विचार ने सारे संसार को गहरे प्रभावित किया, उनसे प्रेरित महान साहित्य और कलाएं सम्भव हुए। लेकिन जो शोषणहीन समतामूलक मुक्त समाज उनका असली लक्ष्य था वह संभव नहीं हुआ। उसके नाम पर नरसंहार, समता और मुक्ति का भीषण हनन हुआ।

 गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था वह उनके अन्तरिम लक्ष्य देश की आज़ादी हासिल करने के बाद से ही भारत ने उसकी राजनीति, धर्म, सामाजिक आचरण ने तजना शुरू कर दिया था और अब हम गांधी से जितना अधिकतम दूर हो सकते थे केन्द्रीकरण, हिंसा-हत्या, घृणा, अभद्रता आदि के बढ़ते वर्चस्व में, झूठ की लगभग दिग्विजय में, उतना दूर हो गये हैं। कई अर्थों में गांधी-150 गांधी की विफलता का अनुष्ठान है।

साहित्य और कलाओं में ऐसे महान लोगों की क़तार है जो अपने समय में विफल माने गये। पर उनकी विफलता कभी उनकी सार्थकता और प्रासंगिकता को क्षत-विक्षत नहीं कर सकी। शायद सर्जनात्मकता ही वह एकमात्र क्षेत्र, अब तक बचा हुआ है, जहां विफल होकर भी सार्थक रहा जा सकता है। उसका एक कारण शायद यह भी है कि सर्जनात्मकता से परिसर में समय और समयातीत दोनों साथ रहते हैं और एक अधिक लंबा परिप्रेक्ष्य संभव हो पाता है।

एक ऐसे लोकतंत्र में जिसका नया आप्त वाक्य हो गया है ‘असत्यमेव जयते’, सत्याग्रह की बात करना सत्य की बढ़ती अल्पसंख्यकता का एहतराम करते हुए भी उसकी संघर्ष-शक्ति को जगह देना और उद्दीप्त करना है। आज सत्याग्रह अभी कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं है हालांकि कई क्षेत्रों में जैसे पर्यावरण, शिक्षा आदि में जो छोटे-छोटे अक्सर स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध की और विकल्प की खोज की जो गतिविधियां हैं उन्हें सत्याग्रह के नये संस्करण कहा जा सकता है। महात्मा गांधी के समय में सत्याग्रह का अनिवार्य संबंध सविनय अवज्ञा, सिविल नाफऱमानी और साध्य-साधन की एकता और शुद्धता से जोड़ा जाता है। हमारे समय में अवज्ञा, राज्य और सत्ता द्वारा पोषित तबकों द्वारा, बहुत बढ़ गयी है। विनय का तत्व उसमें सिरे से ग़ायब है। ऐसी क़ानून स्थापित संस्थाओं की संख्या बढ़ गयी और बढ़ती जाती है जो क़ानून का धड़ल्ले से दिनदहाड़े उल्लंघन करती हैं क्योंकि वे आश्वस्त हैं कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा। ज्ञान, परम्परा, इतिहास, संस्कृति, धर्म आदि अनेक क्षेत्रों में झूठ तेज़ी से घुसपैठ कर चुके हैं और उन सबके बारे में झूठ को तकनालजी की मदद से, हेकड़ी-अकड़-अभद्रता, हिंसा और गालीगलौज का सहारा लेकर इस क़दर बढ़ाया जा रहा है कि वे सच लगने लगें। जनविवेक, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है, इतना दूषित और दुर्बल पहले कभी नहीं रहा।

सत्याग्रह का एक और पहलू है निडरता। उसमें हर रोज़ कटौती हो रही है क्योंकि डर का राज, झूठ का सुराज लगातार अद्भुत गति से बढ़ और फैल रहे हैं। शायद बहुतों ने अपनी निडरता को एक आन्तरिक शक्ति बनाकर उसका सार्वजनिक उपयोग या इज़हार करना बंद कर दिया है। अगर यह एक समयानुकूल रणनीति है तो समझ में आती है पर यह आशंका बनी रहती है कि सब ओर निडरता, अहिंसा और अवज्ञा अगर भूमिस्थ ही बने रहेंगे तो उनसे कोई सामाजिक हित नहीं सध पायेगा। तब यह विडंबना होगी कि हम लोकतंत्र में डरे हुए होंगे लेकिन आत्मतंत्र में निडर!

भले उसमें आन्तरिकता बेहद ज़रूरी है, सत्याग्रह निरा अध्यात्म या आन्तरिक सक्रियता भर नहीं हो सकता। उसे सामाजिक रूप लेना ही चाहिये। न सुने जायें पर निडर लोगों को बोलने की हिम्मत करना चाहिये। ये सब बातें सूझीं छठवें क्रिएटिव थ्योरी कोलोक्वियम के दौरान जो इस बार ‘लोकतंत्र और सत्याग्रह’ पर व्यापक विचार-विमर्श पर एकाग्र था। अनेक पक्षों पर कई अकादेमिक विशेषज्ञों ने राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन आदि के सन्दर्भ में बहुत सार्थक प्रस्तुतियां दीं और उन पर प्रश्नोत्तर भी हुए। इन दिनों अकादेमिक दुनिया पर लगातार हमले हो रहे हैं। उसके बावजूद गांधी-दृष्टि पर इतना विशद और गहरा विचार सम्भव है इस बात ने विद्वत्ता की शक्ति, प्रतिबद्धता और ज्ञान-सम्पन्नता तथा उसमें संभव नवाचार के प्रति आश्वस्त किया। गांधी विचार और सर्जनात्मक कर्म में जि़ंदा है और यह उनका सार्थक उत्तर जीवन है। (सत्याग्रह)


Date : 15-Sep-2019

अनुराग शुक्ला
देश के अर्थ जगत से इस समय हर तरफ आर्थिक सुस्ती की खबरें आ रही हैं। हर तरफ मंदी से निपटने के उपाय और देश में खपत का स्तर बढ़ाने के उपायों की चर्चा है। सस्ते कर्ज से लेकर सरकारी निवेश बढ़ाकर मंदी से निपटने की जुगत बिठाई जा रही है। चुनाव के बाद शानदार बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आई मोदी सरकार बजट में उद्योग जगत और बड़े निवेशकों पर थोड़ी सख्त दिखी और सुपर रिच टैक्स जैसे प्रावधान आयद किए गए। मंदी की बढ़ती चर्चा के साथ उसने ऐसी घोषणाओं को करीब-करीब वापस ले लिया है। लेकिन, सरकार के प्रयास फिलहाल ज्यादा रंग लाते नहीं दिख रहे हैं। 2019 के अप्रैल-जून की तिमाही में आर्थिक विकास की दर सिर्फ पांच फीसद रही है जो पिछले छह सालों में सबसे कम है।
यह तो मौजूदा आर्थिक हालात हैं, जिनकी आशंका चुनावों से पहले ही जताई जा रही थी। चुनाव से पहले ही ऑटोमोबाइल से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं की खपत गिरने की खबरें आने लगीं थीं। तभी विश्लेषक कहने लगे थे कि आने वाली नई सरकार को आर्थिक मोर्चे पर काफी तकलीफों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन, आम चुनाव की खबरों के बीच अर्थ जगत की खबरें मद्धम पड़ गईं और पूरा माहौल राजनीतिमय हो गया।

अर्थव्यवस्था के मंदी में घिरने की खबरें चुनाव बाद तेजी से आनी शुरु हुईं। सवाल यह उठता है कि क्या अगर देश में आम चुनाव न होते तो आर्थिक आंकड़े थोड़े और निराशाजनक होते? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि भारत के आम चुनावों को दुनिया में सबसे महंगा चुनाव माना जाता है और कहा जाता है कि चुनावों के समय अर्थव्यवस्था में पैसे का प्रवाह काफी बढ़ जाता है।

तो क्या अगर देश में चुनाव न होते तो मंदी के हालात अभी से ज्यादा गहरे होते? चुनावों को लेकर सामान्य धारणा यह है कि हर चुनाव महंगाई लाता है और आखिरकार इसका प्रभाव आम जनता पर ही पड़ता है। बहुत से आर्थिक जानकार भी मानते हैं कि चुनाव में हुआ मोटा खर्च लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था को कोई खास लाभ नहीं पहुंचाता है। लेकिन, आर्थिक जानकार इस बात पर भी एकमत हैं कि एक निश्चित अवधि में रोजगार और खपत के लिहाज से चुनाव में होने वाला खर्च महत्वपूर्ण होता है। यह एक तरह से अर्थव्यवस्था के लिए ‘बूस्टर शॉट’ का काम करता है।

अगर 2019 के लोकसभा चुनावों पर खर्च की बात करी जाए तो सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनावों में पचास हजार करोड़ से ज्यादा का खर्च हुआ है। यह 2014 के लोकसभा चुनावों से करीब 40 फीसदी ज्यादा है। हालांकि कुछ जानकार इसे 60 हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा बताते हैं। जाहिर है कि चुनावों पर खर्च हुई इतनी मोटी रकम के आर्थिक प्रवाह में आने पर अर्थव्यवस्था को कुछ न कुछ रफ्तार तो मिली ही होगी।

निवेश सलाहकार पंकज गोयल कहते हैं, ‘चुनावों में खर्च होने वाली 50 से 60 हजार करोड़ की रकम का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि सरकार मंदी से निपटने के लिए सरकारी बैंकों के री-कैपटिलाइजेशन के लिए 70 हजार करोड़ रूपये खर्च करने जा रही है। जाहिर है कि जिस तिमाही में चुनाव हुए उसके आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में इस पैसे का भी योगदान होगा।’

एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के सोशल मीडिया प्रभाग से जुड़े एक नेता अपना नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि भारत में चुनाव जिस तरह से लड़े जाते हैं, उसमें पैसा खर्च होने के साथ यह भी महत्वपूर्ण होता है कि उसका वितरण किस प्रकार होता है। वे उदाहरण देकर समझाते हैं कि ‘मान लीजिए किसी प्रभावशाली ग्राम प्रधान या जिला पंचायत सदस्य को चुनाव के दौरान पांच लाख रूपये दिए जाते हैं तो उन पैसों का प्रवाह ट्रिकल डाउन थ्योरी (ऊपर से नीचे की ओर) के तहत होता है। यानी कि इस पैसे का एक हिस्सा भले ही प्रभावशाली आदमी रख ले, लेकिन इसका कुछ न कुछ हिस्सा नकद, भोज या शराब के रूप में लोगों तक पहुंचता ही है। यानी अगर एक संसदीय क्षेत्र का भी उदाहरण लें तो कहा जा सकता है कि चुनावों के दौरान उस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में थोड़ी तेजी आ जाती है।’

भारतीय चुनावों पर अध्ययन करने वाले राजनीति विज्ञान के शोधार्थी अमित चौरासिया कहते हैं कि अगर फिलहाल मंदी की वजहों पर गौर किया जाए तो साफ दिखता है कि इसकी बड़ी वजह ग्रामीण क्षेत्रों से मांग का काफी कम होना है। ‘आम चुनावों में खर्च होने वाली मोटी रकम का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण संसदीय क्षेत्रों में शराब और नगदी बांटने जैसी चीजों में खर्च किया जाता है।  ऐसे में कहा जा सकता है कि चुनावों के दौरान ग्रामीण इलाकों में मांग और खपत की स्थिति थोड़ी सुधरी होगी। लेकिन यह एक बहुत ‘अस्थायी प्रवृत्ति’ है क्योंकि इससे रोजगार या खपत का कोई स्थायी चक्र नहीं शुरु होता।’ हालांकि अमित यह भी मानते हैं कि चुनाव के दौरान किसानों को लुभाने के लिए गन्ना या अन्य भुगतान करने में थोड़ी तेजी दिखाई जाती है, जिससे एक फौरी वक्त के लिए किसानों की क्रय शक्ति में इजाफा हो जाता है। इस लिहाज से चुनाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए थोड़े मददगार हो जाते हैं।
अवध विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर एनसी त्रिपाठी कहते हैं कि भारतीय चुनावों में खर्च होने वाली 50 से 60 हजार करोड़ की रकम अस्थाई तौर पर रोजगार और खपत तेज करती है, इससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता है। वे आगे कहते हैं कि उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा खर्च के अलावा चुनावी साल में अंतरिम बजट में भी लोकोपकोरी योजनाओं या अन्य मदों में सरकारी खर्च बढ़ा दिया जाता है जो अंतत: आर्थिक गति को थोड़ी रफ्तार देता ही है।

इस लिहाज से देखें तो एक अनुमान के मुताबिक, मोदी सरकार ने अपने अंतरिम बजट में 1.8 लाख करोड़ की ऐसी योजनाओं की घोषणा की जिन्हें लोकोपकोरी कहा जा सकता है। इनमें किसानों को सीधे नकद मदद करने वाली पीएम किसान योजना भी थी। इसका बजट 72 हजार करोड़ रूपये था। इस मोर्चे पर सरकार इतनी मुस्तैद थी कि चुनावों से पहले ही दो हजार की दो किश्तें किसानों के खाते में पहुंचा दी गई थीं। विश्लेषक भी मानते हैं कि ग्रामीण संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था में इन पैसों ने खपत को कुछ न कुछ तो बढ़ाया ही होगा।

केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों ने भी चुनाव के मद्देनजर लोकोपकोरी योजनाओं में अपने खर्च बढ़ाए और वे भी आर्थिक सुस्ती की हालत में कुछ न कुछ मददगार तो हुए ही होंगे। लेकिन फिर भी चुनावी धूमधाम शुरु होने के बाद की दो तिमाहियों पर गौर किया जाए तो आर्थिक वृद्धि की हालत बहुत संतोषजनक नहीं दिखती। 2019 की जनवरी-मार्च की तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 5.8 फीसद पर आ गई और अप्रैल से जून की तिमाही में यह और घटकर पांच फीसद पर आ गई। जबकि 2018 की आखिरी तिमाही में यह 6.8 फीसद थी।
(बाकी पेज 8 पर)

 


Date : 15-Sep-2019

बांग्लादेश के मदरसों में बाल यौन उत्पीडऩ की घटनाओं का पहले दबे-छिपे स्वरों में जिक्र तो होता था। लेकिन अपने एक शिक्षक पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली एक किशोरी की अप्रैल में जलाकर हत्या की घटना के बाद लोग इस विषय पर बात करने के लिए आगे आने लगे हैं। अकेले जुलाई में ही देश के विभिन्न मदरसों के कम से कम पांच शिक्षकों को उनके संरक्षण में रहने वाले लडक़ों और लड़कियों के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है। 

उक्त छात्रा को जिंदा जलाने की घटना के बाद बांग्लादेश मदरसा शिक्षा बोर्ड (बीएमईबी) ने मदरसों में छात्राओं की सुरक्षा और यौन उत्पीडऩ की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे। लेकिन बावजूद इसके ऐसी घटनाएं थम नहीं रही हैं।

बांग्लादेश के मदरसों में शिक्षकों और मौलवियों की ओर से छात्र-छात्राओं के यौन उत्पीडऩ की घटनाएं नई नहीं हैं। लेकिन पहले आतंक के मारे कोई भी इस बारे में मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। अब एक छात्रा की जला कर हत्या होने और कई मौलवियों के गिरफ्तार होने के बाद लोग खुल कर सामने आने लगे हैं। दरअसल, बीते मार्च में एक 18 वर्षीय छात्रा नुसरत जहां रफी ने अपने मदरसे के प्रिंसिपल सिराजुद्दौला के खिलाफ यौन उत्पीडऩ की शिकायत की थी।

उसका आरोप था कि प्रिंसिपल अपने चेंबर में बुलाकर उसे गलत तरीके से छूता था। उसकी शिकायत पर प्रिंसिपल को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन इसके कुछ दिनों बाद छह अप्रैल को चार बुर्काधारी हमलावरों ने उस छात्रा के शरीर पर मिट्टी तेल छिड़ कर उसे जिंदा जला दिया। चार दिनों तक जीवन और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद 10 अप्रैल को उसने दम तोड़ दिया था। उसके बाद राजधानी ढाका समेत पूरे देश में विरोध-प्रदर्शनों का लंबा सिलसिला चलता रहा। उसकी हत्या के मामले में 15 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर एकेएम सैफउल्लाह कहते हैं, शिक्षा विभाग इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए दिशा-निर्देशों को लागू करने की कड़ी निगरानी करेगा।
इससे पहले ढाका हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में तमाम स्थानों में पांच-सदस्यीय यौन उत्पीडऩ विरोधी समिति के गठन का निर्देश दिया था। अकेले जुलाई में लडक़ों व लड़कियों के साथ बलात्कार के आरोप में पांच मदरसा शिक्षकों की गिरफ्तारी से साफ है कि तमाम कवायद के बावजूद मदरसों में यौन उत्पीडऩ की घटनाएं थमने की बजाए बढ़ती ही जा रहीं हैं।
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि ऐसी इक्का-दुक्का घटनाएं ही सामने आ पाती हैं। इस वजह से यौन उत्पीडऩ करने वालों के हौसले मजबूत होते रहे हैं। ऐसे एक संगठन बांग्लादेश शिशु अधिकार फोरम के अध्यक्ष अब्दुस शाहिद कहते हैं, यह मामला इतना संवेदनशील है कि बरसों से कोई इस पर बात तक नहीं करता था। ढाका के कई मदरसों में तालीम हासिल कर चुके होजाईफा अल ममदूह ने बीती जुलाई में अपनी कई फेसबुक पोस्ट में अपने अलावा दूसरे लडक़ों के साथ हुए यौन उत्पीडऩ का खुलासा किया था।

ढाका विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्र ममदूह कहते हैं, मदरसे में पढऩे वाले हर छात्र को इस यौन उत्पीडऩ की जानकारी है। वहां बड़े पैमाने पर ऐसी घटनाएं होती रही हैं। ममदूह के फोसबुक पोस्ट के बाद पूरे देश में इस मामले पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई। ममदूह को इसके लिए धमकियां भी मिलीं। लेकिन उसके बाद कई छात्रों ने सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती साझा की। उनमें से सबकी कहानी लगभग एक जैसी थी। उन सबके साथ कभी न कभी बलात्कार हुआ था और मुंह बंद रखने की धमकी मिली थी

हालांकि मदरसा शिक्षकों ने इसे नकारात्मक प्रचार करार देते हुए कहा है कि यह उनकी छवि खराब करने की साजिश है। एक मदरसे के प्रिंसिपल महफजूल हक कहते हैं, अपवाद के तौर पर एकाध ऐसी घटनाएं हो सकती हैं। लेकिन सबको एक ही चश्मे से देखना उचित नहीं है। उनका कहना था कि जिन छात्रों को मदरसे की जीवनशैली पसंद नहीं है वही लोग ऐसी अफवाहें फैला रहे हैं। लगभग एक हजार मदरसों का प्रतिनिधत्व करने वाला कट्टरपंथी इस्लामी संगठन हेफाजते-ऐ-इस्लामी के एक प्रवक्ता कहते हैं, हाल में एक सम्मेलन में 1,200 मदरसा प्रमुखों को यौन अपराधों के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करने का निर्देश दिया गया था।

मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि ऐसे मामले अपवाद नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता जमील कहते हैं, मदरसा छात्रों के सोने की जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने चाहिए। ऐसे मामलों की अनदेखी करने या इनको साजिश बताने की बजाए मदरसों को जिम्मेदारी लेकर ऐसे अपराधों से निपटने की ठोस कार्य योजना तैयार करनी चाहिए।
शिशु अधिकार फोरम के अब्दुस शाहिद कहते हैं, किफायती होने की वजह से इन मदरसों में ज्यादातर गरीब परिवारों के बच्चे पढऩे आते हैं। लोग बच्चों को मदरसों में तो भेजते हैं। लेकिन जानकारी होने के बावजूद वह लोग ऐसे अपराधों के बारे में मुंह नहीं खोलते। उनको लगता है कि इससे इन अहम धार्मिक संस्थानों की बदनामी होगी। यही मानसिकता मदरसों के लिए कवच का काम करती रही है।

प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मदरसा छात्रा को जिंदा जलाने के मामले में तमाम अभियुक्तों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया है। मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष सैफुल्लाह कहते हैं, इन घटनाओं से मदरसों की छवि खराब हो रही है। वह बताते हैं कि आगे से ऐसा आरोप सामने आने के बाद उसे गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई की जाएगी। मदरसा परिसर में किसी अपराध या हिंसा से कड़ाई से निपटा जाएगा।

लेकिन एक गैर-सरकारी संगठन मानुषेर जन्यो (लोगों के लिए) फाउंडेशन ने दावा किया है कि बीते अप्रैल से अब तक 18 साल से कम उम्र के बच्चों के यौन शोषण की 39 शिकायतें सामने आई हैं। मानवाधिकार संगठन आईन ओ सालिश केंद्र की कार्यकारी निदेशक शिपा हाफिजा कहती हैं, हमारी पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। ऐसे मामलों में ताकतवर लोग अपराधियों को बचाने के लिए एकजुट हो जाते हैं।
(डॉयचेवेले)


Date : 14-Sep-2019

जगदीश्वर चतुर्वेदी

जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा,संभवत:बहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे।मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता,लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा ,अपनी लिखने की आदत बदली,कम्प्यूटर पर पढऩे का अभ्यास डाला।कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा,अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूँ।जब आरंभ में लिखना शुरू किया तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था,कृति फॉण्ट था,उसमें ही लिखता था।बाद में जब पहलीबार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया,फिर लिखने की आदत बदली,और आज मंगल ही मंगल है।कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए। भाषा लेखन से बदलती है,समृद्ध होती है।भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती।
मैं अंग्रेजी से प्यार करता हूँ लेकिन मैंने कभी अंग्रेजी पढ़ी नहीं,प्रिंट अंग्रेजी किसी तरह डिक्शनरी की मदद से थोड़ा बहुत समझ लेता हूँ,लेकिन मैंने अंग्रेजी कभी नहीं पढ़ी। अंग्रेजी दां लोगों में रहा हूँ।मेरे अनेक मित्र बेहतरीन अंग्रेजी जानतेहैं।मैंने अंग्रेजी पढऩे का अभ्यास जेएनयू में अंग्रेजी के राजनीतिक पर्चे पढक़र विकसित किया।जेएनयू से लेकर आज तक मेरा अंग्रेजी का सारा काम मित्रों और छात्रों ने किया।लेकिन मुझे अंग्रेजी न जानने के कारण कभी कुंठा का सामना नहीं करना पड़ा।
मैंने जेएनयू में पढ़ते समय हिन्दी की भरपूर सेवा की,यह काम मैंने भाषा के नाम पर संगठन बनाकर नहीं किया।मैंने कभी हिन्दी के लिए जिद नहीं की,मैंने कभी अंग्रेजी या अन्य भाषा के प्रति कभी कोई बयान नहीं दिया।
मैंने मार्क्सवाद पढ़ते हुए यही सीखा कि सब भाषा और बोलियां हमारी हैं।वे देशी हों या विदेशी हों।मेरा मानना है हिन्दी भाषा या अन्य भाषाओं में भाषा के नाम पर बने संगठन भाषा का उपकार कम और अपकार ज्यादा करते हैं।भाषाय़ी संगठनों को हमलोग न बनाएं और उनमें न जाएं तो बेहतर होगा।भाषा के नाम पर बने संगठन भाषा के कत्लघर हैं।
हमारे एक मित्र हैं ,प्रोफेसर हैं,जब भी कोई उनसे पूछता है भाईसाहब आपकी विचारधारा क्या है तुरंत कहते हैं हम तो मार्क्सवादी हैं! लेकिन ज्यों ही भाषा की समस्या पर सवाल दाग दो तो उनका मार्क्सवाद मुरझा जाता है! वे उस समय आरएसएस वालों की तरह हिन्दीवादी हो जाते हैं।मार्क्सवाद और संघी विचारधारा के इस खेल ने ही हिन्दी को कमजोर बनाया है।हिन्दी को कमजोर संवैधानिक भाषादृष्टि ने भी बनाया है।हम संविधान में अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को देखना नहीं चाहते।हम भूल जाते हैं कि हिन्दी संविधान या राष्ट्रवाद या राष्ट्र की नहीं जनता की भाषा है।वह भाषायी मित्रता और समानता में जी रही है,संविधान में नहीं।
हम मांग करते हैं कि केन्द्र सरकार भारत की सभी भाषाओं और बोलियों के साथ समान व्यवहार करे,भाषा विशेष को वरीयता न दी जाय,भाषा विशेष को वरीयता देने का अर्थ है भाषायी भेदभाव,हिन्दी दिवस को भाषायी वरीयता की व्यवस्था से बाहर निकालो,इससे हिन्दी का विकास बाधित हुआ है,वह सरकारी भाषा होकर रह गयी है।
सिस्टम बदलो,भाषा बदलो। आदत बदलो ,भाषा बदलो।दृष्टि बदलो,भाषा बदलो।
पीएम मोदी फैसला लें कि मंत्रीमंडल के फैसले हिन्दी लिखे जाएंगे और उनके सचिव आदि जो भी नोट तैयार करेंगे वह हिन्दी में होगा,भारत का बजट मूलत: हिन्दी में तैयार होगा ,बाद में अन्य भाषा में अनुवाद किया जाय।
हमारे देश के पीएम,मंत्री,सांसद,विधायक आदि के मोबाइल सिस्टम की भाषा अंग्रेजी है,इसकी जगह ये लोग मातृभाषा या हिन्दी का प्रयोग क्यों नहीं करते? चीन,फ्रांस,जापान,रुस आदि के नेता अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं।
हिन्दी के अधिकांश मास्टर और हिन्दी अधिकारी हिन्दी में एसएमएस तक नहीं करते,मोबाइल में आधार भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग तक नहीं करते। ये इतने जड़ क्यों हैं? मोबाइल का भाषा सिस्टम बदलो,हिन्दी को ताकतवर बनाओ।
हिन्दीवाले दिवस के दीवाने क्यों हैं ? दीवाने न बनो यूनीकोड फॉण्ट के जरिए हिन्दी माध्यम से पढ़ो- लिखो।
हिन्दी पर गर्व अब कोई नहीं करता, वह मन की नहीं ,धंधे की नहीं, खोखले हाहाकार की भाषा है।
हिन्दी के 12 कटु सत्य
1.हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है ।
2.राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी,सांस्कृतिक,अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है।
3.इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया। हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती।संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं। गोया ,हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो।
4.केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है।
5.हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।
6.ज्यादातर मोबाइल में हिन्दी का यूनीकोड़ फॉण्ट तक नहीं है।ज्यादातर शिक्षित हिन्दी भाषी यूनीकोड फॉण्ट मंगल का नाम तक नहीं जानते।ऐसी स्थिति में हिन्दी का विकास कैसे होगा ?

7.राजभाषा संसदीय समिति और उसके देश-विदेश में हिन्दी की निगरानी के लिए किए गए दौरे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अपव्ययों में से एक है.
8.विगत 62सालों में हिन्दी में पठन-पाठन,अनुसंधान और मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरा है।
9.राजभाषा संसदीय समिति की सालाना रिपोर्ट अपठनीय और बोगस होती हैं।
10.भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय में मूल बयान कभी हिन्दी में तैयार नहीं होता। सरकारी दफ्तरों में हिन्दी मूलत: अनुवाद की भाषा मात्र बनकर रह गयी है
11.हिन्दी दिवस के बहाने भाषायी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला है इससे भाषायी समुदायों में तनाव पैदा हुआ है। हिन्दीभाषीक्षेत्र की अन्य बोलियों और भाषाओं की उपेक्षा हुई है।
12.सारी दुनिया में आधुनिकभाषाओं के विकास में भाषायी पूंजीपतिवर्ग या अभिजनवर्ग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी की मुश्किल यह है कि हिन्दीभाषी पूंजीपतिवर्ग का अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं है।जबकि यह स्थिति बंगला,मराठी, तमिल, मलयालम,तेलुगू आदि में नहीं है।वहां का पूंजीपति अपनी भाषा के साथ जोडक़र देखता है।हिन्दी में हिन्दीभाषी पूंजीपति का परायी संस्कृति और भाषा से याराना है।

 


Date : 14-Sep-2019

संजय श्रमण

भारत में भाषा जोडऩे के लिए नहीं बल्कि तोडऩे के लिए इस्तेमाल होती आई है। राज्यों का गठन भाषावार हुआ है। प्राचीन उल्लेख हैं शास्त्रार्थों के बारे में, शास्त्रार्थ इस बात का नहीं होता था कि शास्त्र में सत्य है या नहीं बल्कि इस बात का होता था कि शुद्ध व्याकरण के अनुसार शास्त्र का अर्थ क्या है। शास्त्रार्थ शब्द ही शास्त्र और अर्थ से मिलकर बना है। चाणक्य के बारे में कथा है कि वो व्याकरण के आतंक से सबको हलकान कर देता था और लोग हार मान लेते थे।
कबीर रविदास और रामतीर्थ पर भी आरोप ये नहीं थे कि ये ज्ञानी नहीं हैं बल्कि आरोप ये था कि इन्हें संस्कृत नहीं आती। भाषा और व्याकरण की भी यहां जाति होती है। वैसे हिंदी-हिंदी चिल्लाने वालों को एक सलाह फ्री में दी जा सकती है। उन्हें हिंदी का कल्याण करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए। हिंदी के विकास का मतलब होगा आम जन के ज्ञान के अधिकार का समर्थन और शिक्षा सहित ज्ञान विज्ञान का लोकतांत्रीकरण।
इसका सीधा मतलब हुआ दलित आदिवासी और ओबीसी की ज्ञान विज्ञान में बढ़ी हुई भागीदारी। ये भागीदारी पहले संस्कृत, अरबी, फ़ारसी ने कंट्रोल की थी और अब अंग्रेजी ने ये महान दायित्व उठा रखा है। इसी का सत्परिणाम है कि मु_ी भर सवर्ण जन इंग्लिश के सहारे मलाई काट रहे हैं। उनके बच्चों को भी देखिए वे किन स्कूल कॉलेजों में पढ़ते हैं। वे चंदा मामा दूर के नहीं गाते, बल्कि टुंकल-टुंकल लिटिल इष्टार गाते हैं।
हिंदी का व्यापक प्रचार होने पर और हिंदी में ज्ञान विज्ञान का सृजन होने पर ज्ञान की राजनीति मलाईदार वर्ग के काबू से बाहर हो जाएगी। काबू से बाहर होते ही देश के सनातन ठेकेदारों का ठेका खत्म हो सकता है। दुबारा सोच लीजिए, क्या आप वाकई ज्ञान का लोकतंत्र और हिंदी की भलाई चाहते हैं? बाद में न कहिएगा कि समय रहते बताया नहीं!


Date : 14-Sep-2019

पितृपक्ष का आरंभ हो चुका है। यह पक्ष तन और मन को निर्मल कर अपने दिवंगत आत्मीयों और पुरखों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने का अवसर है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार देह नहीं, देह के भीतर स्थित चेतना या आत्मा ही अंतिम सत्य है। देह की मृत्यु के बाद ऊर्जा स्वरुप पवित्र वीतरागी आत्माएं ब्रह्मांडीय ऊर्जा में समाहित हो जाती हैं। इसे मोक्ष या निर्वाण की स्थिति कहते हैं। ऐसी आत्माओं का संबंध अपने पिछले जन्मों से पूरी तरह टूट जाता है और वे लौटकर फिर पृथ्वी पर फिर नहीं आतीं। हमारी तरह जो लोग प्रेम, आकर्षण, मोह और कुछ अधूरी इच्छाएं लेकर मरते हैं वे पृथ्वी के आसपास के किन्हीं दूसरे आयामों में प्रेत बनकर भटकते हुए पुनर्जन्म के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करते हैं।

यह प्रतीक्षा कुछ दिनों की भी हो सकती है और सदियों की भी। विज्ञान कुछ अरसे पहले तक देह से परे किसी ऊर्जा, चेतना या आत्मा का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता था। उसके अनुसार देह के साथ ही सब कुछ खत्म हो जाता है। अब विज्ञान की सोच में भी बदलाव आने लगा है।हाल में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के गणित और भौतिकी के दो सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने वर्षों के शोध से यह साबित किया है कि मनुष्य का मस्तिष्क एक जैविक कंप्यूटर की तरह है जिसका प्रोग्राम चेतना है जिसे आत्मा भी कहा जाता है। यह चेतना हमारे मस्तिष्क में मौजूद एक क्वांटम के जरिए संचालित होता है। क्वांटम से तात्पर्य मस्तिष्क की कोशिकाओं में स्थित सूक्ष्म नलिकाओं से है जो प्रोटीन आधारित अणुओं से निर्मित हैं। जब व्यक्ति दिमागी तौर पर मृत होने लगता है तब मस्तिष्क की सूक्ष्म नलिकाएं क्वांटम स्टेट खोने लगती हैं। ये सूक्ष्म ऊर्जा कण ब्रह्माण्ड में चली जाती हैं। इन ऊर्जा कणों में अपने पिछले अनुभवों की दजऱ् स्मृतियां कभी नष्ट नहीं होती।
संभव है कि हमारे पुरखे भी अपने पिछले जन्म की यादों के साथ हमारे ब्रह्माण्ड में उपस्थित हों। अपने पूर्वजों को याद करने और उन्हें श्रद्धांजलि देने की परंपरा किसी किसी न किसी रूप में दुनिया की लगभग सभी संस्कृतियों में है। हिन्दू संस्कृति में पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को याद करते है। इस परंपरा को रूढि़ और अंधविश्वास मानकर खारिज़ कर देने का उतावलापन अनावश्यक ही नहीं, अवैज्ञानिक भी साबित होने लगा है। विरोध इस परंपरा के साथ कालांतर में जुड़ते चले गए असंख्य कर्मकांडों और अंधविश्वासों का होना चाहिए। कर्मकांडों से अलग अपने पुरखों को दिल से याद करना और उनके प्रति आभार प्रकट करना धार्मिक से ज्यादा एक भावनात्मक अनुभव है। अगर हमारे पूर्वजों की आत्माएं या चेतना हमारे ब्रह्मांड में कहीं मौजूद हैं तो उन्हें यह देखकर संतोष अवश्य होगा कि उनके विगत हो जाने के बाद भी उनके अपने शिद्दत से उन्हें याद करते हैं। मृत्यु के बाद अगर कुछ भी नहीं बचता तब भी अपने दिवंगत आत्मीयों और पूर्वजों को याद करने का संवेगात्मक अनुभव आपको थोड़ा और बेहतर इंसान बनाने में आपकी मदद ही करता है।
पितृपक्ष पर अपने और आप सबके ही नहीं, इस दुनिया के हमारे तमाम पुरखों को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !


Date : 13-Sep-2019

राधिका रामाशेषन

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की गुरुवार को एक बैठक हुई जिसमें पार्टी को पटरी पर लाने की एक ठोस कोशिश दिखाई दी। इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की। हालांकि, सोनिया गांधी के ब्लूप्रिंट का कुछ हिस्सा आरएसएस-बीजेपी के चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के फॉर्मूले से मिलता-जुलता था। लेकिन फिर भी उन्होंने दिखाया कि उन्होंने कांग्रेस के उबर न पाने के कारणों पर गंभीरता से सोच-विचार किया है। साथ ही इन स्थितियों से पार्टी को निकालने के तरीके ढूंढने की कोशिश की है।
सोनिया गांधी के संदेश में एक और बात जो निकलकर आई, जो उनके नजरिये को राहुल गांधी से कुछ अलग दिखाती है। राहुल गांधी आधुनिक तकनीक के चश्मे से राजनीति को देखते हैं लेकिन सोनिया गांधी के विचार इससे अलग हैं।
सोनिया गांधी ने कहा कि सोशल मीडिया पर सक्रिय होना और आक्रामक दिखना ही काफी नहीं है। इससे ज़्यादा जरूरी है लोगों से सीधे तौर पर जुडऩा। आंदोलन के एक ठोस एजेंडे के साथ गलियों-कूचों, गांवों और शहरों में निकलना जरूरी है।
इस बैठक में कांग्रेस के मुद्दे भी कुछ बदलते नजऱ आए। सोनिया गांधी ने आर्थिक मंदी, नौकरियों की कमी और निवेशकों के डगमगाए विश्वास जैसे प्रमुखों मुद्दों को लोगों के सामने उठाने की बात कही।
एक तरह से उन्होंने कांग्रेस को सामाजिक ध्रुवीकरण करने वाले मसलों जैसे अनुच्छेद 370 को हटाना, असम में एनआरसी और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह दी है।
सोनिया गांधी ने कांग्रेस को लोगों की रोजी-रोटी के मुद्दे पर ध्यान देने पर जोर दिया। उन्होंने शायद ये महसूस किया है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे भले ही पार्टी को कम समय में चुनावी फायदा नहीं दिला सकते लेकिन बीजेपी को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर हराने की कोशिश करके अपनी फजीहत कराने का कोई मतलब नहीं है। पिछले दिनों नरम हिंदुत्व कार्ड खेलने के राहुल के प्रयासों से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ है।
सोनिया गांधी ने ये भी माना है कि जब तक कांग्रेस को व्यवस्थित नहीं किया जाता तब तक किसी भी अभियान का कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर्स नियुक्त करने का फैसला किया है। ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर सामूहिक संपर्क अभियान पर जाने से पहले कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते समय कांग्रेस के दृष्टिकोण और विचारधारा के बारे में बताएगा। हालांकि, ये बीजेपी के प्रचारक से थोड़ा अलग होगा क्योंकि ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर के लिए चुनाव न लडऩे की कोई बाध्यता नहीं होगी।
सोनिया गांधी ने घर-घर जाकर सदस्यता अभियान चलाने की बात कही जिसमें मुख्यमंत्रियों से लेकर बूथ कार्यकर्ताओं तक को शामिल करने की योजना है ताकि निचले स्तर तक संपर्क बनाया जा सके।
ये एक और सीख है जो कांग्रेस ने बीजेपी से ली है जिसमें राजनीतिक गतिविधियों के मामले में शीर्ष नेता से लेकर काडर के व्यक्ति तक में कोई अंतर नहीं है। आखिर में, सोनिया गांधी ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस को अपनी विरासत को बीजेपी को नहीं हड़पने देना चाहिए, हालांकि ये सलाह बहुत देर से आई। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के पास अपने गलत उद्देश्यों के लिए महात्मा गांधी, सरदार पटेल और बीआर अंबेडकर जैसे महान प्रतीकों के संदेशों को अपने अनुसार बदलने के तरीके हैं।
अर्थव्यवस्था कांग्रेस के लिए प्रमुख मुद्दा रहा जो इस बात से भी साबित होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर कई साक्षात्कार दिए जो बैठक के दिन बड़े हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित हुए।
इन साक्षात्कारों में उन्होंने सरकार से मीडिया में खबरें प्रभावित करने के तरीकों को छोडक़र देश के सामने मौजूद संकट को स्वीकारने का अनुरोध किया।
नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहते हुए देश को खराब आर्थिक स्थिति से निकालने वाले मनमोहन सिंह ने मौजूदा आर्थिक हालात सुधारने के लिए जीएसटी के रेशनलाइजेशन (भले ही इससे अल्पकालिक राजस्व हानि हो) और ग्रामीण खपत में वृद्धि जैसे उपायों का सुझाव दिया। आज की बैठक ने कांग्रेस के अंदर एक धारणा को मजबूत किया कि सोनिया गांधी अब भी पार्टी के लिए सबसे जरूरी हैं।
इस बैठक की एक वजह ये भी थी कि लगभग हर राज्य और खास तौर पर कांग्रेस शासित राज्यों में पार्टी नेताओं में मनमुटाव और गुटबाजी है। जिससे ये बात साबित होती है कि बीजेपी नेतृत्व ने कांग्रेस को अपंग बना दिया है।
मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें तो राज्य के बड़े नेताओं मुख्यमंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच तब से ही टकराव बना हुआ है जब से कांग्रेस सत्ता में आई है।
कमलनाथ इस बैठक में शामिल नहीं थे जबकि सिंधिया वहां मौजूद थे। सोनिया गांधी को दो दिग्गज नेताओं के बीच टकराव को ख़त्म करने वाला माना जाता था लेकिन अब वो बात भी नहीं रही। इन हालात में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश में कर्नाटक जैसी स्थितियां बनाने का रास्ता आसान हो गया है।
इसी तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट एक-दूसरे से नजरें तक नहीं मिलाते। बुधवार को सचिन पायलट ने अपराध रोकने में असफलता को लेकर सरकार की आलोचना की थी। जाहिर है कि कांग्रेस को मजबूत रखने के लिए सिर्फ सत्ता मिलना ही काफी नहीं है।
हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हालात और खराब हैं जिनमें जल्द ही चुनाव होने वाले हैं। इन सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सरकार है।
हरियाणा में एक नया विवाद तब पैदा हो गया जब सोनिया गांधी की विश्वासपात्र कुमारी सैलजा ने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के पसंदीदा अशोक तंवर की जगह ली।
सोनिया गांधी ने पूर्व मुख्यमंत्री और मजबूत जाट नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा को चुनाव समिति का प्रमुख बनाकर एक और विवाद छिडऩे से तो रोक लिया लेकिन अशोक तंवर की नाराजग़ी खुले तौर पर जाहिर हो गई। उन्होंने कह दिया कि वो कांग्रेस के लिए काम करेंगे लेकिन सैलजा और हुडा के नेतृत्व में नहीं।
महाराष्ट्र में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ बीजेपी और शिवसेना में जाने का सिलसिला जारी है।
सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के हालात ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की है। वहीं, एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी बेबस नजर आते हैं।
झारखंड में भी गुटबाजी है क्योंकि हफ्तों पहले प्रदेश कांग्रेस प्रमुख अजॉय कुमार ने भी मनमुटाव के चलते पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों सुबोधकांत सहाय और प्रदीप कुमार बलमुचु के समर्थकों के कथित हमले के बाद ये फैसला लिया था। लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन एकजुट नहीं है। ये दिखाता है कि कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए सोनिया गांधी को कई और बैठकें करने, जोश जगाने और मनोबल बढ़ाने की जरूरत होगी। उन्होंने इस बैठक के साथ शायद इसकी शुरुआत की है। (बीबीसी)

 


Date : 13-Sep-2019

गिरीश मालवीय

हमें तभी समझ जाना चाहिए था कि कोई गलत व्यक्ति वित्तमंत्री की कुर्सी पर बैठ गया है। जब यह महिला लाल साड़ी पहनकर लाल थैली में लाया हुआ बजट पेश करने गई थी। उन्होंने कहा कि ऑटो सेक्टर में मंदी इसलिए आई है कि लोग आजकल मेट्रो में सफर करना या ओला-ऊबर का उपयोग करना पसंद करते हैं। 
यह कमाल का बयान है। यह ज्ञान हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क से भी उच्चतम है। यह सरल सोच का चरम बिंदु है। शायद आपने ध्यान दिया हो टीवी पर एक विज्ञापन आता था किसी बड़ी कंपनी की एजीएम चल रही हैं और चेयरमेन बड़ी शान से भाषण दे रहे हैं। भाषण खत्म होने के बाद जब क्वेश्चन आवर शुरू होता है तो चेयरमेन एक सरदारजी की तरफ इशारा करते हैं कि तुम पूछो।  उनका आशय यह रहता है कि यह क्या पूछेगा!  लेकिन सरदारजी उस भरी सभा में इतनी टेक्निकल डिटेल वाला सवाल पूछते हैं कि बेचारे चेयरमेन के पसीने छूट जाते हैं। 
ठीक यही बात है हम उम्मीद कर रहे थे कि वित्तमंत्री मंदी को लेकर कोई ऐसा तगड़ा तर्क सामने रखेगी कि सामने वालों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाएगी। लेकिन वह इतना बोदा तर्क सामने रखेगी इस की उम्मीद किसी को भी नही थी यह ऐसा ही तर्क है जैसा व्हाट्सएप पर आता है। 
अब मैं कन्फ्यूज हूं। सरकार के लोग आईटी सेल चला रहे हैं या आईटी सेल वाले ही सरकार चला रहे हैं।  क्या ऑटो सेक्टर में केवल कारों की ही गिनती होती है? नहीं भाई ! ऑटो सेक्टर एक वृहद अवधारणा है इसमें कार ही नहीं अन्य पैसेंजर व्हीकल जैसे टूव्हीलर और थ्री व्हीलर भी शामिल हैं। ऑटो सेक्टर में कमर्शियल व्हीकल्स भी शामिल हैं। 
पिछले दिनों अशोक लीलैंड ने भी कम मांग को देखते हुए अपने 5 प्लांट्स में नो वर्क डेज का ऐलान कर दिया। सितंबर में अशोक लीलैंड ने अपने प्लांट्स में 5 से 18 दिन तक कामकाज बंद रखने की घोषणा की है।  वित्तमंत्री से पूछिए कि अशोक लीलैंड कौन-सी कार बनाती है?
हीरो मोटोकॉर्प ने भी पिछले महीने 15 अगस्त से 18 अगस्त तक चार दिनों के लिए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद कर दिए थे।  हीरो मोटोकॉर्प कौन-सी कार बनाती है मैडम? आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि हीरो मोटोकॉर्प देश की सबसे बड़ी दोपहिया वाहन निर्माता कंपनी है
टू व्हीलर की बिक्री लगातार घटती जा रही है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल्स मैन्युफैक्चरर्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक टू-व्हीलर्स की बिक्री की बात करें तो अप्रैल से अगस्त 2019 में अप्रैल-अगस्त 2018 के मुकाबले 14.85 फीसद की गिरावट आई है। टू-व्हीलर सेगमेंट में, स्कूटर्स की बिक्री में 17.01 फीसद की गिरावट, मोटरसाइकिल्स में 13.42 फीसद की गिरावट और मोपेड्स में 20.39 की गिरावट दर्ज की है।
थ्री व्हीलर्स की बिक्री की बात करें तो अप्रैल से अगस्त 2019 में 7.32 फीसद की गिरावट आई है। थ्री व्हीलर्स में, पैसेंजर कैरियर्स की बिक्री में 7.25 फीसद की गिरावट और गुड्स कैरियर में 7.64 फीसद की गिरावट आई है।
अब टूव्हीलर से चलने वाला ओर थ्री व्हीलर चलाने वाला ओला उबर बुलाकर तो कहीं जाता नहीं होगा न? ऑटो सेक्टर में सबसे बुरी हालत है। कमर्शियल व्हीकल्स निर्माताओं की टाटा मोटर्स, अशोक लीलैंड, वोल्वो आयशर और महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के कमर्शियल वाहनों की कुल बिक्री पिछले साल अगस्त की तुलना में इस साल अगस्त में 40 से 60 फीसदी तक घट गई है। 
बाजार में मंदी के कारण डिमांड ही पैदा नहीं हो रही है और इसका सीधा असर सप्लाई चेन की सबसे अहम कड़ी ट्रांसपोर्टर पर पड़ा है। कई ट्रांसपोर्टर संगठनों ने अगले छह महीने तक नए ट्रक न खरीदने का आव्हान किया है ट्रांसपोर्टर अपने पास मौजूद वाहनों के पूरे काफिले का ही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए वे नए वाहनों की खरीद टाल रहे हैं, ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि बाजार में मंदी की वजह से उनका कारोबारा मंदा है, ऐसे में नए ट्रक के लिए लोन लेने के बाद किश्त के लिए पैसे भी नहीं निकाल पा रहे हैं। कमजोर मांग के कारण मालवहन की उपलब्धता कम है और माल भाड़ा भी कम हुआ है, नवंबर 2018 के बाद से ट्रक रेंटल में 15त्न की गिरावट आ चुकी है।  जिस ओला उबर का यह हवाला दे रही है उसकी ग्रोथ घट गयीं है 2018 में ग्रोथ 20 पर्सेंट रह गई हैं, जबकि 2017 में 57 पर्सेंट और 2016 में करीब 90 पर्सेंट की थी।
इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले छह महीनों में डेली राइड्स केवल 4 पर्सेंट ही बढ़ी है। यात्री सबसे ज्यादा परेशान है। उन्हें अब कैब के लिए औसत 12-15 मिनट का इंतजार करना पड़ रहा है, जो दो वर्ष पहले 2-4 मिनट का था। इसके साथ ही बड़े शहरों में नॉन-पीक आवर्स में किराए भी 15-20 पर्सेंट बढ़ गए हैं। 
महाराष्ट्र में 2017-18 में ओला और उबर इंडिया के लिए कार्य करने वाली 66,683 टूरिस्ट कैब रजिस्टर्ड हुई थी, लेकिन यह संख्या 2018-19 में घटकर 24,386 पर आ गई। पिछले एक वर्ष में ड्राइवर इंसेंटिव लगभग 40 पर्सेंट घटे हैं देश के विभिन्न भागों में ओला उबर के ड्राइवर हड़ताल कर रहे हैं। क्योंकि उनकी मांग है कि पहले की तरह उनको मासिक कम से कम 1.25 लाख रुपए कारोबार मिले लेकिन नहीं मिल रहा है उनकी आमदनी में लगातार कम हो रही है। 
यह है ओला उबर के व्यापार की असलियत लेकिन वित्तमंत्री से इन सब फैक्ट के साथ काउंटर क्वेश्चन करे कौन?
 मीडिया तो सुबह शाम पाकिस्तान पुराण लेकर बैठ जाता है। यह बात सत्ताधारी दल को अच्छी तरह से मालूम पड़ गई है कि जब व्हाट्सएप का ज्ञान ही लोगों को पसंद है तो अब ऑफिशियल रूप से व्हाट्सएप ही सरकारी मंत्री परोस रहे हैं। दुख इस बात का है यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था?

 


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