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फिल्मों में एंग्री मेन की वाहवाही, पर्दे से क्यों लापता लेडीज
06-Jan-2026 4:47 PM
फिल्मों में एंग्री मेन की वाहवाही, पर्दे से क्यों लापता लेडीज

-यासर उस्मान

2025 में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री जैसे अपने जाने-पहचाने मैदान में खेलने के लिए वापस पहुंच गई। उससे पहले वाले साल में महिला केंद्रित कहानियों ने थोड़े समय के लिए भारत की वैश्विक सिनेमाई छवि को बदला थाज् वाहवाही बटोरी थी और नए लोगों का ध्यान खींचा था। लेकिन पिछले साल बॉलीवुड की हिंसक, पुरुष-प्रधान एक्शन थ्रिलर फिल्में घरेलू बॉक्स ऑफिस और सांस्कृतिक चर्चाओं पर छा गईं।

2025 के आखिरी हफ्तों में भारतीय सोशल मीडिया पर बस एक ही फिल्म की चर्चा थी, ‘धुरंधर’। यह भारत-पाकिस्तान तनाव की पृष्ठभूमि पर बनी एक जासूसी थ्रिलर फिल्म है। हिंसा को खुलकर दिखाने वाली और अपराध की दुनिया की राजनीति से भरी यह फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट बनी। इसके साथ ही यह आक्रामक, अति-पुरुषवादी फि़ल्मों की उस श्रृंखला में शामिल हो गई जो बहुत लोकप्रिय रही हैं।

यह रुझान 2024 से पूरी तरह अलग था। उस साल महिलाओं की बनाई कई फि़ल्में, जैसे कि पायल कपाडिय़ा की ‘ऑल वी इमैजिन ऐज लाइट’, शुचि तलाठी की ‘गल्र्स विल बी गल्र्स’ और किरण राव की ‘लापता लेडीज’, ने दुनिया का ध्यान खींचा था और सराहना पाई थी।

फिल्म समीक्षक मयंक शेखर कहते हैं, ‘2024 ने साबित किया कि भारतीय महिला फिल्मकार हाशिए की नहीं, बल्कि दुनिया की अगुवाई करने वाली आवाजें हैं।’ वह इसे कोई अस्थायी ट्रेंड नहीं बल्कि ‘एक निर्णायक पल’ मानते हैं।

उम्मीद थी कि महिलाओं की कहानियों पर आधारित और गहरी, परतदार फिल्में संख्या और लोकप्रियता दोनों में बढ़ेंगी। लेकिन 2025 में टॉप 10 बॉक्स ऑफिस हिट्स में असाधारण, अति-पुरुषवादी हीरो छाए रहे।

वैसे इनमें से पांच फि़ल्में बॉलीवुड की थीं जो महामारी के बाद अब तक संघर्ष कर रही हिंदी फि़ल्म इंडस्ट्री के लिए थोड़ी राहत की बात थी। इनमें ‘छावा’ जैसी ऐतिहासिक और ‘वॉर 2’ जैसी एक्शन फिल्में शामिल थीं। इस सूची में महिला-प्रधान सिर्फ एक फिल्म थी, मलयालम भाषा की सुपरहीरो फिल्म ‘लोकाह’।

मर्दानगी का भाव हावी रहा

सिर्फ एक्शन थ्रिलर ही नहीं, रोमांटिक ब्लॉकबस्टर ‘सैयारा’ भी एक परेशान पुरुष रॉकस्टार की कहानी थी, जो अंत में अपनी अल्जाइमर से जूझ रही पार्टनर को ‘संभालता’ है।

यहां तक कि ‘कांतारा: चैप्टर 1’ (कन्नड़) और ‘महावतार नरसिंह’ (कई भाषाओं में डब) जैसी पौराणिक फिल्में भी पारंपरिक पुरुष वीरता को और मजबूत करती दिखीं।

साल की सबसे चर्चित फि़ल्मों में पुरुषों की पीड़ा, ताकत और बदले के भाव पूरे जोर-शोर से हावी रहे।

टॉप 10 फिल्मों में सबसे ज़्यादा बहस जिस फि़ल्म को लेकर रही वह थी ‘तेरे इश्क में’। इसमें गुस्सैल और अस्थिर पुरुष किरदार है, और एक महत्वाकांक्षी महिला, जिसकी आकांक्षाओं को आदमी के सनकभरे प्यार का ग्रहण लग जाता है। दमनकारी पुरुषवादी सोच को रूमानी बनाकर पेश करने के आरोपों के बावजूद, यह फिल्म अभिनेता धनुष की सबसे बड़ी हिंदी हिट साबित हुई। इसने दुनियाभर में 155 करोड़ रुपये से ज़्यादा कमाए।

एक और चौंकाने वाली हिट रही, ‘एक दीवाने की दीवानियत’। यह छोटे बजट की रोमांटिक ड्रामा फि़ल्म थी। एक रिव्यू के अनुसार इसका हीरो ‘एक सनकी प्रेमी है, जो 'ना' सुनने को तैयार ही नहीं।’

किंग्स कॉलेज लंदन में परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स की सीनियर लेक्चरर प्रियंका बसु कहती हैं कि 2024 ने ‘संभावनाओं की एक झलक’ दिखाई थी। वह कहती हैं कि हिंदी सिनेमा ने ऐतिहासिक रूप से महिला नायिकाओं को हाशिए पर रखा है। पुरुष-प्रधान इंडस्ट्री में लंबे समय से कास्टिंग, पेमेंट और अवसरों में गहरी असमानताएं रही हैं।

उनका कहना है, ‘सिर्फ एक साल में यह सब बदलना संभव नहीं है। हमें ऐसे और साल चाहिए, ऐसी और कहानियां चाहिए जिनमें महिलाएं केंद्र में हों।’

भारतीय सिनेमा, ख़ासकर बॉलीवुड की मर्दाना हीरो वाली दीवानगी 1970 के दशक में अमिताभ बच्चन की ‘एंग्री यंग मैन’ वाली छवि से शुरू हुई थी। यहां तक कि शाहरुख खान का रोमांटिक दौर भी बस एक छोटा सा बदलाव था, जिसे छोडक़र उन्होंने बाद में पठान और जवान जैसी एक्शन-प्रधान ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम करना पसंद किया।

ओटीटी में भी घट गईं महिला-प्रधान कहानियां

कभी माना जाता था कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉम्र्स में महिलाओं की कहानियों को केंद्र में रखकर कही गई कहानियां चल सकती हैं लेकिन यह ट्रेंड अब वहां भी पहुंच गया है।

मीडिया रिसर्च कंपनी ऑरमैक्स की एक ताज़ा रिपोर्ट में 338 हिंदी शोज़ का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि अब एक्शन और क्राइम थ्रिलर (ज़्यादातर पुरुष-प्रधान) की 43त्न हिस्सेदारी है। महिला-प्रधान कहानियां जो 2022 में 31त्न थीं, 2025 में घटकर सिर्फ 12त्न रह गईं।

मयंक शेखर कहते हैं, ‘ओटीटी प्लेटफॉम्र्स ने बॉक्स ऑफिस की राह पर चलना शुरू कर दिया। अब स्ट्रीमिंग प्लेटफॉम्र्स सिनेमा में चल रहे ट्रेंड्स को चुनौती देने के बजाय उनकी नकल कर रहे हैं।’

लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि यह बदलाव इंडस्ट्री की रचनात्मक गिरावट नहीं, बल्कि दर्शकों की मांग को दर्शाता है।

ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श कहते हैं, ‘भारतीय फि़ल्में परंपरागत रूप से पुरुष-प्रधान रही हैं, लेकिन हमारे पास ‘मदर इंडिया’ और ‘पाकीजा’ जैसी महिला-केंद्रित क्लासिक्स भी रही हैं।’

उनका कहना है कि दमनकारी पुरुषवादी सोच के आरोप कुछ ‘गिने-चुने आलोचक’ ही लगाते हैं और इनसे फिल्मों का भाग्य तय नहीं होता।

वह आगे कहते हैं, ‘अंत में जिस बात से सचमुच में असर पड़ता है वह सिर्फ दर्शकों का फ़ैसला होता है।’

लेकिन अनु सिंह चौधरी का मानना है कि सब कुछ दर्शकों की पसंद पर डाल देना बहुत सरलीकरण है। अनु, नेटफ्लिक्स थ्रिलर ‘दिल्ली क्राइम 3’ की सह-लेखिका हैं। इस सीरीज में महिलाओं की तस्करी के मुद्दे को नारीवादी नजरिए से दिखाया गया है।

वह कहती हैं, ‘मर्दाना कहानी वाली ब्लॉकबस्टर लंबे समय से इसलिए मौजूद हैं क्योंकि वे एक ऐसे समाज को दिखाती हैं जो हमेशा से पितृसत्तात्मक और पुरुष-प्रधान रहा है। क्या यह रातों-रात बदल जाएगा? नहीं। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया का ढांचा बदलता है, हमारी फिल्में भी बदलेंगी।’

इसके साथ ही आर्थिक हकीकत भी है। निर्माता, वितरक और प्रदर्शक तय करते हैं कि किसी फि़ल्म को कितनी स्क्रीन मिलेगी, कितना प्रचार होगा और दर्शकों तक उसकी कितनी पहुंच होगी। और यह अक्सर इस बात पर निर्भर करता है कि पुरुष स्टार बॉक्स ऑफिस पर कितना भरोसेमंद है या कितनी कमाई कराने वाला माना जाता है। स्वतंत्र और महिला-प्रधान फि़ल्मों के लिए लड़ाई मुश्किल होती है, ख़ासकर तब जब उनमें बड़े सितारे न हों। )

क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री से है उम्मीद

‘छपाक’ और ‘मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ’ जैसी महिला-प्रधान फि़ल्मों की स्क्रीनराइटर अतीका चौहान, कहती हैं कि आजकल की फिल्में ‘दिखावटी और अतिरंजित स्त्री-विरोध के दौर’से गुजर रही हैं। उनका मानना है कि इसकी कुछ वजह 2017-19 के ‘मी टू’ आंदोलन के दौरान महिलाओं द्वारा मांगी गई जवाबदेही की प्रतिक्रिया है।

‘मी टू’ आंदोलन ने फिल्म इंडस्ट्री में फैले व्यापक शोषण को उजागर किया था, लेकिन उसका असर असमान रहा। जिन पर आरोप लगे उनमें से कुछ को अस्थायी झटके लगे, लेकिन ज़्यादातर वापस काम पर लौट आए और सत्ता का ढांचा वैसा ही बना रहा। अतीका चौहान कहती हैं, ‘जब तक ये अति-मर्दानेपन वाली फिल्में पैसा कमा रही हैं, कुछ नहीं बदलने जा रहा।’

लेकिन हमेशा की तरह उम्मीद की कुछ किरणें भी हैं, जो ज़्यादातर छोटी, क्षेत्रीय फि़ल्म इंडस्ट्री और स्वतंत्र फिल्मकारों की तरफ़ से आ रही हैं।

अनु सिंह चौधरी ध्यान दिलाती हैं कि भारत में नई पीढ़ी के स्वतंत्र फिल्मकार ‘दिलचस्प और व्यवहारिक सिनेमा’ बना रहे हैं, न कि सिर्फ ‘जनता को लुभाने वाला मनोरंजन।’

‘सबर बोंडा’ और ‘सॉन्ग्स ऑफ फॉरगॉटन ट्रीज’ जैसी भारतीय फिल्में भी हैं जो सामाजिक और राजनीतिक परतों में गहराई से उतरकर रिश्तों की संवेदनशील कहानियां सुनाती हैं। तेलुगु फिल्म ‘द गर्लफ्रेंड’ एक महिला की कहानी थी, जो जहरबुझे रिश्ते से खुद को आजाद करना सीखती है। वहीं तमिल फिल्म ‘बैड गर्ल’ को महिला दृष्टिकोण से दिखाए गए परिपक्व होने के सफल ड्रामा के रूप में सराहा गया।

मलयालम फि़ल्म ‘फेमिनिची फातिमा’, जिसमें फ़ेमिनिची सोशल मीडिया पर फेमिनिस्ट का बिगड़ा हुआ रूप है, ने मजाक के जरिए एक मुस्लिम गृहिणी की पितृसत्ता के खिलाफ शांत बग़ावत को दिखाया है। स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर 'द ग्रेट शम्सुद्दीन फ़ैमिली' को आधुनिक मुस्लिम महिलाओं की रोज़मर्रा की जद्दोजहद और जटिलताओं को बारीकी से पकडऩे के लिए सराहा गया।

चौधरी कहती हैं, ‘यह शांति के साथ चल रहा एक आंदोलन है, जो हाशिए से काम कर रहा है। और यह गायब होने वाला नहीं है।’ (bbc.com/hindi)


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