विचार / लेख

साहित्य उत्सव : उम्मीदों का एक उजला क्षितिज
13-Dec-2025 9:53 PM
साहित्य उत्सव : उम्मीदों का एक उजला क्षितिज

-समरेन्द्र शर्मा

छत्तीसगढ़ में साहित्य उत्सव के आयोजन के लिए सबसे पहले आयोजकों को साधुवाद। मेरी कामना है कि यह उत्सव समावेशी और मूल्य आधारित साहित्यिक आंदोलन की दिशा में रूपांतरित हो, जहां विचारों की स्वतंत्रता, रचनात्मकता एवं अभिव्यक्ति के अधिकार को सर्वोच्च महत्व मिले। सबसे जरूरी यह कि यह आयोजन किसी भी सियासी ध्रुवीकरण, जातीय-धार्मिक विभाजन रेखाओं या लेफ्ट-राइट के वैचारिक खांचों तक सीमित न हो।

इस मंच की सार्थकता तभी होगी जब यहां तुलसीदास की लोक-आस्था, कबीर की निर्भीकता, नागार्जुन की जनपक्षधरता, प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि व भीष्म साहनी की मानवीय करुणा, सभी समान सम्मान के साथ उपस्थित हों और पंडवानी से लेकर डिजिटल लेखन तक, परंपरा और आधुनिकता का समागम ही इस महोत्सव की आत्मा बने।

इसके साथ ही, छत्तीसगढ़ को देश विदेश में विशिष्ट पहचान दिलाने वाले पंडवानी, चरन दास की कथाएं, ददरिया, लोकगीत, लोकनाट्य एवं आधुनिक छत्तीसगढ़ी साहित्य को सम्मान मिले, जो अक्सर राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर सीमित हो जाते हैं।

इस उत्सव का दायित्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि वह उन छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों को प्राथमिकता दे, जो अपनी मातृभाषा, लोकजीवन, संघर्ष, प्रकृति और समकालीन संवेदनाओं को सशक्त स्वर देते रहे हैं। यदि ये रचनाकार मुख्य मंचों, पैनलों, कार्यशालाओं और चर्चाओं में समुचित स्थान प्राप्त करते हैं, तो यह छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक आत्मसम्मान को नई ऊंचाइयां देगा।

इसके साथ ही, स्थानीय लेखकों की पुस्तकों, पांडुलिपियों और रचनाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्देश्य से विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे तो यह आयोजन वास्तव में ‘स्थानीय से वैश्विक’ की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा।

आज जब सोशल मीडिया के कोलाहल में ज्ञान की धारा अक्सर सूचनाओं के शोर में दब जाती है, ऐसे समय में साहित्य उत्सव एक दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। जहां मनन, विमर्श और शालीन असहमति के बीच संवाद की संस्कृति जीवित रहती है।

साहित्य केवल कहानी या कविता नहीं, वह प्रश्न पूछने का साहस है, संवेदना को गहराई देने की प्रक्रिया है और समाज को दिशा देने वाला आत्मचिंतन भी।

बरसों बाद आयोजित होने वाला यह साहित्य उत्सव अपनी गरिमा और गहराई के कारण तभी याद रखा जाएगा जब लोक साहित्य पर केंद्रित सत्र, पंडवानी, ददरिया, लोकगीत और छत्तीसगढ़ी कविता पर संवाद, युवा साहित्यकार मंच, ब्लॉगर्स, डिजिटल राइटर्स और नए रचनाकारों के लिए ओपन सत्र, हिंदी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हलबी जैसी भाषाओं की सहभागिता, स्थानीय पुस्तकों की प्रदर्शनी, स्कूल-कॉलेजों के छात्रों के लिए संवाद कार्यक्रम का समावेश हो।

सृजन वहीं जन्म लेता है, जहां मन खुला हो और कथा वहीं आकार लेती है जहां मनुष्य अपने सत्य से संवाद करने का साहस रखता है।


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