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जब स्कोरबोर्ड भी परफेक्शन को समझ नहीं पाया
18-Dec-2025 10:02 PM
जब स्कोरबोर्ड भी परफेक्शन को समझ नहीं पाया

-चित्रगुप्त

18 जुलाई 1976 को कनाडा के मॉन्ट्रियल फ़ोरम में महिला जिम्नास्टिक प्रतियोगिता चल रही थी। स्टेडियम में करीब 18 हज़ार दर्शक मौजूद थे। उसी दिन एक 14 साल की दुबली-पतली रोमानियाई लडक़ी ने ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने खेल की परिभाषा ही बदल दी। उसका नाम था नादिया कोमानेची।

नादिया की लंबाई करीब 4 फुट 11 इंच थी और वजऩ लगभग 39 किलो। वह बेहद शांत चेहरे के साथ अनइवन बार्स की ओर बढ़ी। न कोई घबराहट, न मुस्कान—बस पूरा ध्यान। छह साल की उम्र से वह जिम्नास्टिक की कठिन ट्रेनिंग ले रही थी। मशहूर कोच बेला कारोली ने उसे स्कूल के मैदान में करतब करते हुए खोजा था। इसके बाद आठ साल तक वह रोज़ छह घंटे, हफ्ते में छह दिन अभ्यास करती रही।

नादिया का रूटीन महज़ 23 सेकंड का था, लेकिन उन 23 सेकंड में उसने जजों और दर्शकों को हैरान कर दिया। हर मूव सटीक था, हर पकड़ बिल्कुल साफ़, हर संतुलन परफेक्ट। जब उसने बिना हिले-डुले लैंडिंग की, तो कुछ पल के लिए पूरा स्टेडियम खामोश हो गया। (बाकी पेज 8 पर)

इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया। जजों ने सर्वसम्मति से उसे पूरे 10 अंक दिए—ओलंपिक इतिहास का पहला ‘परफेक्ट 10’। लेकिन स्कोरबोर्ड सिर्फ 9.99 तक के लिए बना था। इसलिए स्क्रीन पर अंक दिखा—1.00। दर्शक उलझन में पड़ गए। फिर ऐलान हुआ कि यह 1.00 नहीं, बल्कि 10.00 है। स्टेडियम तालियों से गूंज उठा।

नादिया ने मॉन्ट्रियल ओलंपिक में कुल सात बार परफेक्ट 10 हासिल किए। उसने तीन स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जीता और सबसे कम उम्र की ऑल-अराउंड चैंपियन बनी—एक रिकॉर्ड जो आज भी कायम है।

उसने सिर्फ मेडल नहीं जीते, बल्कि महिला जिम्नास्टिक की दिशा बदल दी। उसकी वजह से खेल ज़्यादा कठिन, ज़्यादा ताक़तवर और ज़्यादा तकनीकी बना। बाद में स्कोरिंग सिस्टम ही बदल दिया गया, जिससे परफेक्ट 10 अब संभव नहीं रहा।

आज नादिया कोमानेची 60 से ज़्यादा उम्र में भी दुनिया की सबसे पहचानी जाने वाली खिलाडिय़ों में हैं। उसका परफेक्शन अब इतिहास का हिस्सा है—ऐसा इतिहास, जिसे दोहराया नहीं जा सकता।

स्कोरबोर्ड ने उस दिन भले ही ‘1.00’ दिखाया हो, लेकिन पूरी दुनिया जानती थी—वह एक परफेक्ट 10 था।


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