राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : कुर्सी कुनबे में ही रहेगी?
24-Nov-2025 6:14 PM
राजपथ-जनपथ : कुर्सी कुनबे में ही रहेगी?

कुर्सी कुनबे में ही रहेगी?

प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल के उत्तराधिकारी की खोज चल रही है। रामगोपाल कोल-कस्टम मिलिंग स्कैम में फंसे हैं, और पिछले तीन साल से फरार चल रहे हैं। इन सबके बीच पार्टी के कई नेता रामगोपाल की जगह लेने के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। पार्टी के कुछ लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि पार्टी का अगला कोषाध्यक्ष दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा के परिवार से हो सकता है।

प्रदेश कांग्रेस बिना कोषाध्यक्ष के चल रहा है। वर्तमान में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति हो रही है, तो प्रदेश कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की भी चर्चा है। हालांकि पार्टी के प्रमुख नेताओं का मानना है कि प्रदेश संगठन में बदलाव के साथ ही कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। बताते हैं कि विधानसभा चुनाव के समय ही रामगोपाल अग्रवाल की जगह नई नियुक्ति पर मंथन हुआ था। एक बिल्डर के नाम पर सहमति भी बन गई थी। मगर बिल्डर उस समय गंभीर रूप से बीमार हो गए, उनसे जुड़े कुछ विवाद पार्टी को बताए गए, और फिर नियुक्ति अटक गई।

कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ कारोबारी नेताओं ने कोषाध्यक्ष पद के लिए भागदौड़ करना भी शुरू कर दिया है। पार्टी के एक खेमे के लोगों के बीच दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा के परिवार के सदस्यों में से एक नाम की चर्चा भी हो रही है। दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा करीब 2 दशक तक राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे हैं। वो गांधी परिवार के बेहद करीबी माने जाते थे। वोरा के पुत्र अरुण वोरा दुर्ग से तीन बार विधायक रहे हैं, और चुनाव हारने के बाद दुर्ग शहर जिलाध्यक्ष बनने की होड़ में हैं। अरुण वोरा अपने पिता की तरह सीधे सरल माने जाते हैं। मगर कोषाध्यक्ष के लिए अरुण नहीं, बल्कि उनके चचेरे भाई राजीव वोरा के नाम का हल्ला है।

चर्चा है कि राजीव वोरा के लिए पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव सहमत हो सकते हैं। मगर पूर्व सीएम भूपेश बघेल, राजीव वोरा के नाम पर सहमत होंगे, इस पर संशय है। इन सबके बीच पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष पारस चोपड़ा सहित कई और कारोबारी नेताओं के नाम उछल रहे हैं। देखना है पार्टी क्या कुछ करती है।

आखिर कमरा एलॉट हो गया...

कुछ दिन पहले सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव ने पर्यटन, संस्कृति व धर्मस्व विभाग के मंत्री राजेश अग्रवाल के पीए को ससम्मान एक पत्र लिखा था जिसमें बताया गया था कि मंत्री जी के आदेश पर अमल नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति को अपना निजी सहायक नियुक्त करने का आदेश जारी करने कहा गया है वे केवल आठवीं पास हैं। जबकि छत्तीसगढ़ सचिवालय सेवा भर्ती नियम 2012 के तहत उन्हें कम से कम 12वीं पास होना चाहिए।

इस जवाब के बाद ऐसा लग रहा था कि नियुक्ति की जिद छोड़ दी गई होगी। मगर सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी से प्रत्याशी रहे डॉ. सुनील किरण ने एक तस्वीर पोस्ट की है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे हैंडल की पोस्ट भी शेयर की है। इसमें यह दिखाया गया है कि जिस तरबेज आलम को नियुक्ति करने से मना किया गया है, उनको मंत्री के बंगले में एक कमरा मिल गया है और निज सहायक का ओहदा भी दे दिया गया है। इसमें यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि जीएडी ने इस नियुक्ति के लिए सहमति दे दी है या फिर अपने स्तर पर ही मंत्री या अफसरों ने फैसला ले लिया है। लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया भी इस पोस्ट पर दे रहे हैं। कुछ लोग लिख रहे हैं कि अपने से ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों को शायद मंत्री जी अपना सहायक नहीं बनाना चाहते होंगे। मंत्री जी हायर सेकेंडरी स्कूल तक पढ़े हुए हैं। यह शिक्षा कम नहीं है- कई विधायक और मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता इससे भी कम है और रही है।

अब गवाह मुद्दई बना

कल ईओडब्ल्यू ने कांग्रेस शासन काल में हुए दो घोटालों को लेकर चल रही अपनी जांच के सिलसिले में 19 ठिकानों पर सर्च किया। इनमें भ्रष्टाचार की कमाई से क्या मिला, कितना मिला इसे लेकर ब्यूरो ने कोई जानकारी नहीं दी। उसके संक्षिप्त से दो पैराग्राफ के प्रेस नोट में केवल छापे मारे गए, यही सूचना थी। बहरहाल इस कार्रवाई में एक नई जानकारी सामने आई। वह यह कि  एक ऐसे अधिकारी भी लपेटे में आए जो अब तक एसीबी ईओडब्ल्यू की पंचनामा कार्रवाई में बतौर गवाह पैनलिस्ट हुआ करते थे। इन्हें विभाग ने ही मनोनीत कर रखा था। यानी सरगुजा संभाग में जहां भी ब्यूरो रेड करता या रेड हैंडेड पकड़ता ये साहब गवाह के रूप में सील साइन करते। शायद यही वजह रही कि उन्हें अब तक एसीबी से बचने के तौर तरीके समझ में आ गए थे। लेकिन कहा गया है न कि पुलिस की दोस्ती और दुश्मनी दोनों अच्छी नहीं। आखिरकार डॉक्टर साहब फंस ही गए।

डॉ. साहब वर्तमान में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में उप संचालक के पद पर हैं। इससे पहले वे वर्षों तक अंबिकापुर में पशु चिकित्सक के रूप में पदस्थ रहे हैं। बाद में वे सरगुजा जिला पंचायत में सहायक परियोजना अधिकारी रहे और पुन: मूल विभाग में लौटने के बाद कांग्रेस शासनकाल में बलरामपुर जिले में उपसंचालक पशुपालन भी रहे। डीएमएफ घोटाले के दौरान पशुपालन विभाग के कई कार्यों में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं, जिसकी आंच उन पर पड़ गई है।


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