राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : कांग्रेस जिलाध्यक्षों का राज
01-Dec-2025 6:34 PM
राजपथ-जनपथ : कांग्रेस जिलाध्यक्षों का राज

कांग्रेस जिलाध्यक्षों का राज

कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए संगठन सृजन कार्यक्रम चलाया था, और दावा किया था कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से रायशुमारी से ही जिलाध्यक्षों की नियुक्ति होगी। जिलाध्यक्षों की सूची तो जारी हो गई, लेकिन संगठन सृजन की जो मूल भावना थी, वो नियुक्ति में दिखाई नहीं दी। ज्यादातर अध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता पूर्व सीएम भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव की पसंद पर ही तय किए गए। इससे कई जगहों पर नाराजगी देखने को मिल रही है। 

महासमुंद जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद पर विधायक द्वारिकाधीश यादव की नियुक्ति के विरोध में जिले के ही एक मोर्चा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष जफर उल्ला खान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को भेजे अपने इस्तीफे में लिखा कि जिलेभर के कार्यकर्ताओं से रायशुमारी की गई थी। इससे कार्यकर्ताओं में जोश था। मगर नतीजे कार्यकर्ताओं के अनुरूप नहीं आ सके, यह कार्यकर्ताओं की भावनाओं के साथ धोखा हुआ है।

बताते हैं कि द्वारिकाधीश जिला अध्यक्ष की दौड़ में नहीं थे, लेकिन पूर्व सीएम भूपेश बघेल की सलाह पर उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति से दिवंगत वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा, और श्यामाचरण शुक्ल व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू के समर्थक खासे नाराज बताए जाते हैं।

दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा दुर्ग शहर, अमितेश शुक्ल गरियाबंद, और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू के पुत्र प्रवीण साहू रायपुर ग्रामीण जिलाध्यक्ष की दौड़ में थे। बड़ी संख्या में स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं ने उनके पक्ष में राय भी दी थी, लेकिन तीनों को नजरअंदाज कर दिया गया।

दशकों बाद ऐसा हुआ है जब वोरा परिवार की पसंद को नजरअंदाज कर दुर्ग शहर में अध्यक्ष नियुक्ति हुई है। वैसे तो दुर्ग शहर अध्यक्ष पूर्व मेयर धीरज बाकलीवाल को मेयर बनवाने में अरुण वोरा का हाथ था, लेकिन उन्हें जिलाध्यक्ष पूर्व सीएम भूपेश बघेल की अनुशंसा पर बनाया गया।

दूसरी तरफ, पूर्व मंत्री कवासी लखमा के पुत्र हरीश लखमा सुकमा, और दिवंगत पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री शशि सिंह को सूरजपुर जिले की कमान सौंपी गई है। दोनों ही नेताओं के पक्ष में स्थानीय कार्यकर्ताओं ने राय दी थी। कुल मिलाकर असंतुष्ट नेता संगठन सृजन कार्यक्रम को प्रतीकात्मक   बता रहे हैं। अब नवनियुक्त अध्यक्ष असंतुष्टों को साधने में कामयाब हो पाते है या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।

अफसरों की मनमानी और परेशानी

साइंस कॉलेज के पीछे वाली रोड में दो दिन पहले एक बड़ा सा गेट लगा दिया गया है। इसे कभी भी बंद कर दिया जाता है। सुबह-सुबह केंद्रीय विद्यालय से लेकर कई स्कूलों के बच्चे इस रोड से आना जाना करते हैं, लेकिन सुबह यह गेट बंद होने से उन्हें जीई रोड से घूम कर जाना पड़ रहा है। साइंस कॉलेज के पीछे की यह सडक़ डीडी नगर से पं. रविशंकर विश्वविद्यालय को भी जोड़ती है, जहां रोजाना सुबह हजारों लोग मॉर्निंग वाक करते हैं। अब उन्हें जीई रोड का सहारा लेना पड़ रहा है।

साइंस कॉलेज खेल मैदान में भी सैकड़ों लोग खेलने जाते हैं। सुबह ही सैकड़ों युवा सेना भर्ती की ट्रेनिंग, रनिंग के अभ्यास करने वाले भी इस मार्ग का उपयोग करते थे, लेकिन अफसरों ने जनता की परेशानी को नहीं देखा और मनमानी करते हुए लोहे की गेट लगा दी है। बताया जाता है कि पिछले दिनों साइंस कॉलेज के हास्टल में मारपीट के कारण यह गेट लगाया गया है, परन्तु हजारों बच्चों, युवा और बुजुर्गों की सहूलियत नहीं देखी जा रही है, जिन्हें सुबह जल्द जाना होता है। इसके बजाय हास्टल गेट में ही गेट लगाना पर्याप्त था। एक सार्वजनिक आवागमन की सडक़ के लिए ऐसा मनमाना फैसले से जनता परेशान है।

स्वागत और शिकवे

भाजपा में बड़े नेताओं का लगातार प्रवास हो रहा है। पीएम, और केन्द्रीय मंत्रियों के स्वागत के लिए पार्टी के अंदरखाने में रोज किचकिच हो रही है। पीएम, केन्द्रीय गृह मंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित अन्य नेताओं के एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए चुनिंदा नेताओं को ही मौका मिलता है। इसके लिए नाम प्रदेश कार्यालय मंत्री संगठन के प्रमुख नेताओं से चर्चा कर तय करते हैं। उन्हीं नेताओं को एयरपोर्ट पर स्वागत का मौका मिल पाता है।  बड़े नेताओं के साथ फोटो खिंचवाने का क्रेज हर राजनीतिक दल में है। सोशल मीडिया के दौर में बड़े नेताओं का स्वागत करते फोटो वायरल करने की होड़ मची हुई है। इसके चलते भाजपा में काफी विवाद सुनने को मिल रहा है।

कई प्रमुख नेताओं की शिकायत है कि सूची तैयार करने में पक्षपात होता है। यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी के करीब दो दशक तक कार्यालय मंत्री रहे सुभाष राव जब तक पद पर रहे, इस तरह की शिकायतें नहीं आई। वो खुद कभी स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं गए। मगर उनके हटने के बाद से शिकवा-शिकायतों का क्रम जारी है। नरेश चंद गुप्ता प्रदेश कार्यालय मंत्री थे तब रोज उनके खिलाफ शिकायतें होती थी। पार्टी के नेता सवाल उठाते थे कि सूची तैयार करने वाले कार्यालय मंत्री खुद ही स्वागत के लिए चले जाते हैं, जो कि सही नहीं है। गुप्ता के हटने के बाद भी शिकवा-शिकायतें दूर नहीं हुई है। एक-दो नेताओं ने तो महामंत्री(संगठन) पवन साय तक अपनी बात पहुंचाई है।

नन्हें कीट प्रेमी की बड़ी सोच

प्रवासी भारतीय परिवार का बालक, नींव (उम्र 8 वर्ष) अमेरिका में जन्मा और वहीं का नागरिक है। नींव की रुचि प्रकृति के जीवों से प्रेम और जिज्ञासा का अनोखा उदाहरण है।

आज जब अधिकांश बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही मोबाइल, टैब और वीडियो गेम की आभासी दुनिया में उलझ जाते हैं, नींव ने बिल्कुल अलग राह चुनी है। उसे कीड़े-मकौड़ों और छोटे जीवों से गहरा लगाव है। बिच्छू, मकड़ी, छिपकली और विभिन्न प्रजातियों के कीड़े, जिनसे बच्चे ही नहीं बड़े भी आमतौर पर डरते हैं, नींव न केवल उनके प्रति आकर्षित है बल्कि उन्हें पहचानता, समझता है। कई कीटों को तो उसने अपने घर में पाल-पोसकर रखा है। नींव को कीटों और समुद्री जीवों का अपनी उम्र के हिसाब से काफी ज्ञान है। वह उनकी जीवनशैली, वातावरण और प्रकृति में उनकी भूमिका के बारे में अध्ययन करता रहता है। वह बड़ा होकर एंटोमोलॉजिस्ट (कीट विशेषज्ञ) बनना चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि ये कीट और जीव-जन्तु प्रकृति के संतुलन और जीवन चक्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। नींव की रुचि, दिलचस्पी जगाता तो है, पर उससे भी खास बात यह है कि उनके अभिभावक उसके जुनून को प्रोत्साहित करते हैं। आम तौर पर माता-पिता इस तरह के किसी प्रयोग करने की मंजूरी आसानी से देने वाले नहीं होते। नींव, बिलासपुर के राजकुमार अग्रवाल के नाती हैं।

एड्स में छत्तीसगढ़ में हाई-प्रिवलेंस राज्य क्यों?

छत्तीसगढ़ में एचआईवी-एड्स पर जारी रिपोर्ट चिंता बढ़ा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर जहां संक्रमण और मृत्यु दर में बड़ी गिरावट आई है, वहीं हमारा राज्य अब भी उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है जहां एचआईवी का प्रसार सामान्य से काफी ज्यादा है। देश का औसत 0.22 प्रतिशत है, लेकिन छत्तीसगढ़ में वयस्क आबादी में यह दर 0.41 प्रतिशत है। राज्य में हर साल 4 से 5 हजार नए मामले सामने आ रहे हैं। खासकर रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, कोरबा और सरगुजा जैसे जिलों में हालात ज्यादा गंभीर हैं। जाहिर तौर पर, बाहर काम करने जाने वाले मजदूरों में असुरक्षित यौन संबंध, गांवों और आदिवासी इलाकों में जागरूकता की कमी, कंडोम का कम उपयोग, नशे के दौरान सुई साझा करना और गर्भवती महिलाओं का समय पर जांच न करवाना, ये सभी कारण बीमारी को फैलाते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 23 एआरटी सेंटर और 50 से अधिक लिंक एआरटी सेंटर हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर शहरों तक सीमित हैं। दूरस्थ गांवों के मरीजों को दवा लेने के लिए कई-कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। पहले एड्स नियंत्रण के लिए इतना फंड आता था कि जागरूकता के नाम पर बड़े-बड़े सिलेब्रिटी पहुंचते थे। अब लगता है कि इलाज और दवाओं के नए सेंटर्स खोलने के लिए भी फंड की कमी है।


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