रायपुर
अक्ति पर पूर्वजों को तर्पण, माटी पूजा का भी महत्व
टिकेश कुमार यादव
रायपुर,18 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। अक्षय तृतीया 19-20 अप्रैल को मनाई जाएगी। छत्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया, जिसे स्थानीय भाषा में अक्ती कहा जाता है। यह कृषि और संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। यह वैशाख शुक्ल की तृतीया को मनाया जाता है। जिसे अबूझ मुहूर्त मानकर बिना पंचांग देखे विवाह, गृह प्रवेश व सोने के जेवर खरीदने के लिए शुभ दिन माना जाता है। इस दिन किसान प्रतीकात्मक रूप से बीजों की बुवाई (माटी पूजन) करते हैं और बच्चे गुड्डा-गुडिय़ा का विवाह (पुतरा-पुतरी बिहाव)ररचते हैं।
अक्षय तृतीया में मिट्टी के घड़े का बड़ा महत्व है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार इस दिन मिट्टी के घड़े में पानी भरकर दान करने की परंपरा है। कहा जाता है कि ऐसा करने से घर में मां लक्ष्मी का वास होता है। और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में इस दिन द्रोपदी को भगवान सूर्यदेव ने अक्षय पात्र का दान किया था। जिसमें भोजन कभी समाप्त नहीं होता था। और इसे पत्र से ही पांडवों के लिए भोजन की प्राप्ति होती थी।
अक्षय तृतीया पर्व को देश के कई राज्यों में अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में इसे अक्ति कहा जाता है। इस दिन को किसान माटी पूजा के रूप में भी मनाते हैं। कहा जाता है कि साल भर अन्न देने वाली भूमि के आराधना का दिन होता है। किसान खेती में मिट्टी की पूजा करते है। आंचल में संस्कृति की पहचान को जीवित रखने और बच्चों को इससे जोड़े रखने के लिए अक्ती पर मिट्टी के गुडग़ुड़ा गुडिय़ों की शादी रचाई जाती है। इस दौरान बच्चे ही इनके परिजन बनकर शादी की रस्म पूरा करते है।
पितरों को तर्पण भी...
मान्यता है कि अक्ती पर मिट्टी के नए घड़े का दान कर पूर्वजों को जल का तर्पण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि घर में किसी सदस्य की मृत्यु के बाद उसे पहली अक्षय तृतीया को जल का तर्पण किया जाता है। इसे पितृपक्ष के बराबर फलदायी माना गया है। साथ ही ग्रामीण अंचलों में कुल, ग्राम देवी देवताओं को मिट्टी के घड़े में जल भर कर अर्पण करने से परिवार में सुख समृद्धि बनी रहती है।


