बस्तर में भूदान को लेकर जानकारी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
कोंडागांव, 5 अप्रैल। बस्तर अंचल से एक बार फिर सामाजिक परिवर्तन की नई धारा प्रवाहित होती दिखाई दे रही है। कोंडागांव में आयोजित ‘भूदान स्मृति विचार एवं सद्भावना यात्रा’ के दौरान समाजसेवी डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने अपनी भूमि को ट्रस्ट में देकर भूमिहीन आदिवासी परिवारों को खेती के लिए उपलब्ध कराने का ऐतिहासिक संकल्प लिया। यह पहल विनोबा भावे के भूदान आंदोलन की आधुनिक पुनव्र्याख्या के रूप में देखी जा रही है।
पंच राज्यों से गुजर रही यह यात्रा भूदान महायज्ञ के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर निकाली जा रही है। कोंडागांव में इसका स्वागत ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ और ‘साथी समाज’ संस्थान द्वारा किया गया। यहां विचार मंथन बैठक के साथ-साथ हर्बल फार्म और रिसर्च सेंटर का निरीक्षण भी कराया गया।
बैठक में डॉ. त्रिपाठी ने अपने तीन दशकों के सामूहिक खेती के अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनका मॉडल पारंपरिक सहकारी खेती से अलग है और सीधे तौर पर भूदान की मूल भावना भूमि के न्यायपूर्ण वितरण से जुड़ा है। उन्होंने घोषणा की कि ट्रस्ट के माध्यम से बस्तर के भूमिहीन आदिवासियों को जैविक पद्धति से खेती के लिए भूमि दी जाएगी, जहां हर्बल फसलें, मसाले और श्रीअन्न उगाए जाएंगे।
यात्रा दल के प्रमुख रमेश भाई ने इस पहल को देश में कृषि और सामाजिक न्याय का अनूठा मॉडल बताया। उन्होंने बताया कि 35,000 किलोमीटर की यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक प्रयोग देखे, लेकिन कोंडागांव का यह मॉडल सबसे अलग और प्रभावी है।
फार्म विजिट के दौरान प्रतिभागियों ने बहुस्तरीय जैविक खेती, नेचुरल ग्रीनहाउस और ऊंची काली मिर्च की बेलों सहित मिश्रित खेती के प्रयोगों का अवलोकन किया।
इस मॉडल में हल्दी, सफेद मूसली, स्टीविया और ऑस्ट्रेलियन टीक जैसी फसलों का संयोजन देखने को मिला, जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ पर्यावरण संतुलन में भी सहायक है।
रमेश भाई ने कहा कि यह मॉडल जलवायु परिवर्तन, सिंचाई, खाद की समस्या, किसानों की आय और युवाओं के रोजगार जैसे कई ज्वलंत मुद्दों का एक समग्र समाधान प्रस्तुत करता है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि इस नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल को पवनार आश्रम सहित देशभर के विनोबा आश्रमों में लागू करने की दिशा में पहल की जाएगी।
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ की सदस्यता भी ग्रहण की। समाजसेवी भूपेश तिवारी सहित अन्य सहयोगियों ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह आयोजन न केवल भूदान आंदोलन की स्मृति को पुनर्जीवित करता है, बल्कि उसे वर्तमान समय की जरूरतों के अनुरूप एक नई दिशा देने का सशक्त प्रयास भी साबित हुआ।