राजपथ - जनपथ
एक मात्रा ने छीन ली नौकरी...
तिल्दा ब्लॉक के नकटी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षा का प्रश्न पत्र तैयार करने में हुई गड़बड़ी और कथित रूप से धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के मामले की जांच हो गई है और कार्रवाई का ऐलान भी कर दिया गया है। कार्रवाई को देखकर पता चलता है कि शिक्षा विभाग में जिम्मेदारी का बंटवारा कितना असंतुलित है।
सबसे पहले संविदा शिक्षिका नम्रता वर्मा जो अस्थायी कर्मचारी हैं, उनकी नौकरी सबसे आसानी से छीनी जा रही है। सवाल यह है कि प्रश्न-पत्र जैसा संवेदनशील काम इतने अनुभवहीन या संविदा शिक्षक को क्यों सौंपा गया? यह विभाग की व्यवस्था की नाकामी नहीं है?
जांच कमेटी के सामने प्रधान पाठक शिखा सोनी ने खुद गलती मानी कि विकल्प में बड़ी ऊ की मात्रा को राम शब्द के साथ जोडऩा था। प्रश्न पत्र उन्होंने देखा था पर इस गलती की तरफ ध्यान नहीं गया, इसलिये कुत्ते के नामों के विकल्प में रामू की जगह भगवान का नाम छपा हुआ बंट गया। इनका वेतन नौकरी से हटाई गई संविदा कर्मचारी से कई गुना अधिक होगा, पर कार्रवाई छोटी हुई है, निलंबन की। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों की पहले से ही भारी कमी है। कुछ महीने बाद शायद उन्हें बहाल भी कर दिया जाए।
उनसे बड़े अधिकारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी होते हैं। सिस्टम के हिसाब से अनुभवी शिक्षक चुनने और सही मॉडरेटर तय करने की जिम्मेदारी उनकी ही थी। मगर उनको सिर्फ चेतावनी पत्र जारी किया गया है। जिला शिक्षा अधिकारी ने जांच करवाई है, मानो उनकी कोई गलती ही नहीं हो। उनके जिले में ऐसे कितने स्कूल हैं, जहां संविदा या अस्थायी कर्मचारियों, शिक्षकों के भरोसे प्रश्न पत्र तैयार करने जैसा संवेदनशील और गंभीर काम हो रहा है। क्या उन्होंने पहले पता किया है? वैसे उन्होंने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें भी व्याकरण की अनेक त्रुटियां है, जो म में मात्रा छूट जाने से भी बड़ी है।
आस्था का मामला होने के कारण मामले ने तूल पकड़ा और सबसे नीचे की अस्थायी कर्मचारी को नौकरी से हाथ धोना पड़ गया। मामला आस्था से जुड़ गया था, वरना ऐसी गलतियां तो प्रश्न पत्रों में भी ढेरों मिल जाती हैं। पूरे के पूरे विकल्प ही गलत मिल जाते हैं, वह भी प्रायमरी स्कूलों में नहीं, बड़ी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी। चार विकल्पों में एक भी सही नहीं होता, या फिर एक से अधिक विकल्प सही निकलते हैं।
हालांकि एक बात सरकारी कामकाज में कॉमन है कि दोष ऊपर से नीचे धकेल दिया जाए। जब किसी चूक पर बवाल मचता है तो बलि का बकरा सबसे नीचे के स्टाफ को ही बनाया जाता है। असल में जिनकी जवाबदेही होती है वे बच निकलते हैं, बचा लिए जाते हैं। इस मामले में भी गलती पूरी व्यवस्था की है, पर नौकरी छिनी कम वेतन पर संविदा में काम कर रही एक शिक्षिका की।
महाराष्ट्र में छत्तीसगढिय़ा
महाराष्ट्र में म्युनिसिपल के चुनाव चल रहे हैं। यहां सभी दलों ने अपनी ताकत झोंक रखी है। छत्तीसगढ़ के कई कांग्रेस, और भाजपा नेता अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के प्रचार के लिए गए हैं। इन चुनावों की काफी अहमियत है। बीएमसी (बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) का अकेले का बजट छत्तीसगढ़ सरकार के बजट से अधिक है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व की नजर म्युनिसिपल चुनाव पर है।
कांग्रेस से पूर्व मंत्री गुरु रूद्र कुमार के अलावा तीन विधायक दलेश्वर साहू, संदीप साहू, और यशोदा वर्मा की ड्यूटी लगाई गई है। ये नेता नागपुर म्युनिसिपल में पार्टी प्रत्याशियों का प्रचार कर रहे हैं। नागपुर, और आसपास के इलाकों में छत्तीसगढ़ के लोग काफी संख्या में रहते हैं। ये कांग्रेस नेता छत्तीसगढिय़ों के बीच अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं।
भाजपा से धमतरी के मेयर रामू रोहरा, और रायपुर जिला उपाध्यक्ष ललित जैसिंघ की प्रचार में ड्यूटी लगाई गई है। रामू, मुंबई में भाजपा प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे हैं, तो ललित जैसिंघ की ड्यूटी उल्हासनगर में हैं। ललित, उल्हास नगर के भाजपा विधायक कुमार ऐहलानी के साथ चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। कुल मिलाकर यहां मुकाबला काफी दिलचस्प है।
अपनी ही फाइलों के लिए आरटीआई!!
बेमेतरा जिले के देवकर (साजा) नगर पंचायत के वर्तमान अध्यक्ष सुरेश सिहोरे हैं। वो पहले कांग्रेस में थे, लेकिन टिकट नहीं मिली, तो उन्होंने दुखी आत्मा पार्टी के नाम से नया दल बनाया, और नगरीय निकाय चुनाव में उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवारों को पीछे छोडक़र जीत दर्ज की।
हालांकि, चुनाव जीतने के बाद उन्हें प्रशासन चलाने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें पार्षदों का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा है। सहारे से जुड़े लोगों का कहना है कि सीएमओ (मुख्य नगर पालिका अधिकारी) का रवैया भी सहयोगात्मक नहीं है और वे अध्यक्ष पर प्रशासनिक दबाव बनाए रखते हैं।
स्थिति इतनी जटिल हो गई है कि निर्वाचित अध्यक्ष को अपनी ही नगर पंचायत की फाइलों और कार्यों की जानकारी पाने के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) लगाना पड़ रहा है। यह इस बात का संकेत है कि देवकर नगर पंचायत में चुने हुए प्रतिनिधि की स्थिति कितनी कमजोर हो गई है और प्रशासनिक तंत्र किस हद तक हावी हो चुका है। देवकर आज इस बात का उदाहरण बन गया है कि एक निर्वाचित अध्यक्ष किस तरह सिस्टम के सामने मजबूर हो सकता है।


