राजपथ - जनपथ
देवेंद्र और भूपेश की दूरी
भिलाई के कांग्रेस विधायक देवेन्द्र यादव का भिलाई से जुड़ी समस्याओं को लेकर अनशन तो तीन दिन पहले खत्म हो गया, लेकिन उनके अनशन से पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमा दूर रहा। पार्टी के अंदरखाने में इसकी काफी चर्चा है। देवेन्द्र बिहार कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं, और वो हाईकमान से सीधे जुड़े हैं। यहां भी उनका अलग खेमा तैयार हो गया है, जिसमें युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के पदाधिकारी हैं। चर्चा है कि भूपेश बघेल, देवेन्द्र की कार्यशैली से नाखुश बताए जाते हैं।
और जब देवेन्द्र यादव आधा दर्जन मांगों को लेकर भिलाई के सिविक सेंटर में अनशन पर बैठे, तो भूपेश बघेल नहीं गए। देवेन्द्र समर्थकों की कोशिश थी कि पूरे दुर्ग संभाग के नेता अनशन के समर्थन में साथ आ दिखे। मगर उनकी कोशिश सफल नहीं हो पाई। पूर्व नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे अनशनरत देवेन्द्र से मिलने नहीं गए। हालांकि पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू और पूर्व विधायक अरुण वोरा ने देवेन्द्र को समर्थन देने अनशन स्थल पहुंचे थे। देवेन्द्र का अनशन पांच दिन चला। संगठन का हाल यह रहा कि भूपेश के करीबी दुर्ग ग्रामीण के जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर नजर नहीं आए।
इसी तरह दुर्ग शहर के जिलाध्यक्ष धीरज बाकलीवाल ने भी देवेन्द्र के अनशन से दूरी बना ली थी। इससे परे भूपेश के करीबी भिलाई जिलाध्यक्ष मुकेश चंद्राकर एक दिन जरूर देवेन्द्र के साथ रहे, लेकिन अगले दिन से वो भी गायब हो गए। कुल मिलाकर देवेन्द्र के प्रदर्शन से भूपेश खेमे ने दूरी बना ली थी। हालांकि अनशन खत्म होने के बाद देवेन्द्र, पूर्व सीएम भूपेश बघेल से मिलने भिलाई-3 स्थित निवास भी गए थे। फिर भी भूपेश, देवेन्द्र को खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं। कुल मिलाकर देवेन्द्र का अनशन गुटबाजी से अछूता नहीं रहा।
भारतमाला कई गर्दनों का फंदा
आखिरकार भारतमाला परियोजना मुआवजा घोटाले की ईडी ने पड़ताल शुरू कर दी है। ईडी ने जमीन कारोबारी हरमीत सिंह खनूजा के रायपुर के लॉ विस्टा स्थित घर पर दबिश दी। करीब 16 घंटे तक जांच पड़ताल चलती रही। मुआवजा घोटाले की जांच ईओडब्ल्यू-एसीबी कर रही है। खनुजा सहित आधा दर्जन आरोपी जमानत पर हैं, लेकिन ईडी ने उन्हें फिर घेर लिया है।
रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला सडक़ परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहित हुई थी, और रायपुर से सटे अभनपुर-कुरूद आदि जगहों पर अपात्र लोगों को मुआवजा मिल गया। करीब 43 करोड़ रुपए अतिरिक्त भुगतान हुआ है। राज्य सरकार ने भी मुआवजा वितरण में गड़बड़ी को माना है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई थी। बताते हैं कि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, उनकी पत्नी कोरबा सांसद डॉ. ज्योत्सना महंत, और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के अलावा पूर्व सांसद सुनील सोनी ने घोटाले पर कार्रवाई के लिए केंद्र को चि_ी लिखी थी। केन्द्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया था। इस पर राज्य की जांच एजेंसी, और एनएचएआई (राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण)के बीच मतभेद रहे हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने एनएचएआई के चार अफसरों के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज किया है।
एनएचएआई का तर्क है कि मुआवजा वितरण का विषय स्थानीय प्रशासन का था, और एनएचएआई अफसरों की कोई भूमिका नहीं रही है। एनएचएआई ने कार्रवाई के लिए अनुमति नहीं दी है। इसलिए अब तक एनएचएआई के अफसरों से पूछताछ नहीं हो पाई है। अब केंद्र की एजेंसी ईडी जांच में जुटी है, तो सब कुछ साफ होने की उम्मीद जताई जा रही है। चर्चा है कि तत्कालीन कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर नरेन्द्र भुरे से भी पूछताछ हो सकती है। भुरे केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
नई सडक़ के साथ जोर-आजमाइश

कवर्धा की जर्जर सडक़ों ने इस बरसात आम लोगों को खूब परेशान किया। जगह-जगह गड्ढे, कीचड़ और फिसलन के बीच लोगों का आना-जाना मुश्किल हो गया। बारिश थमने के बाद सडक़ों की मरम्मत कराई गई, लेकिन मरम्मत की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ है। दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा के क्षेत्र में हाल ही में बनी सडक़ का है। वीडियो में कार से उतरे कुछ लोग सडक़ की सतह को हाथों से ही उखाड़ते दिखाई दे रहे हैं। डामर की पूरी परत इतनी कमजोर है कि वह बिना किसी औजार के सडक़ को छोड़ देती है। वीडियो में सुनाई देता है कि सडक़ तो लोगों के चलने से कुछ दब गई, वरना यह कपड़े की तरह एक झटके में अलग हो जाती। सडक़ के नीचे गिट्टी और मुरूम का बेस दिखाई नहीं दे रहा है।
इस वीडियो को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) और फेसबुक पेज पर साझा किया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी सडक़ केवल भ्रष्टाचार का नतीजा हो सकती है। कट और कमीशन के खेल में जनता के साथ सीधा छल किया जा रहा है।
वायरल वीडियो पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कम दिलचस्प नहीं हैं। एक यूजर ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि यह तो बड़ी सहूलियत की सडक़ है। उखाड़ो और जहां मन हो वहां ले जाकर बिछा दो, गांव-गली कहीं भी स्थापित कर दो। वहीं दूसरे ने कहा कि कांग्रेसी सडक़ बनवाते नहीं, उखाड़ते ही हैं और जो लोग सडक़ उखाड़ रहे हैं, उनके खिलाफ सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई होनी चाहिए।
कुल मिलाकर सवाल यही है कि नई सडक़ें जनता को राहत देने के लिए बन रही हैं या फिर उसकी मजबूती सिर्फ कागजों में हैं।


