राजपथ - जनपथ
नए साल में शुरू नहीं होगी बस्तर ट्रेन
एक केंद्रीय राज्य मंत्री सहित 10 भाजपा सांसदों की केंद्र में मौजूदगी के बावजूद छत्तीसगढ़ से जुड़ी रेलवे और हवाई सेवाओं की जनाकांक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं। खासतौर पर रेलवे से जुड़ी आम लोगों की मांगों पर लंबे समय से सिर्फ आश्वासन चल रहा है। दिल्ली में रेल मंत्री के साथ सांसदों की मुलाकातों की तस्वीरें समय-समय पर सामने आती हैं, जिससे लोगों को उम्मीद बंधती है कि उनके क्षेत्र में रेल सेवाओं का विस्तार होगा, लेकिन उम्मीद बार-बार टूट जाती है।
बात यदि बस्तर को राज्य की राजधानी रायपुर से जोडऩे की करें, तो कभी एक ट्रेन इस जरूरत को काफी हद तक पूरा करती थी। यह ट्रेन थी दुर्ग–जगदलपुर–दुर्ग एक्सप्रेस, जिसकी शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी। यह भले ही सीधे रायपुर तक नहीं पहुंचाती थी, लेकिन दुर्ग पहुंचने के बाद बस्तर के लोगों के लिए राजधानी से जुडऩा आसान हो जाता था। करीब 16 घंटे और 640 किलोमीटर की लंबी यात्रा होने के बावजूद, अधिकतर सफर रात में होने और किराया किफायती होने के कारण यह ट्रेन यात्रियों की पहली पसंद बनी रही।
यह ट्रेन न केवल बस्तर को जोड़ती थी, बल्कि ओडिशा के प्रमुख शहरोंखरियार रोड, कांटाबांजी और रायगढ़ा से भी संपर्क होता था। यूपीए-2 सरकार के दौरान शुरू की गई इस ट्रेन को केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद बंद कर दिया गया। कुछ समय के लिए इसे दोबारा चलाया गया, लेकिन फिर रोक दिया गया। वजह बताई गई कि यह ट्रेन रेलवे की आय के ढांचे में फिट नहीं बैठती।
इस महीने सांसद महेश कश्यप ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात कर इस ट्रेन का मुद्दा उठाया था। मंत्री की ओर से गंभीरता से विचार करने का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन हाल ही में जारी नई रेलवे समय-सारिणी में जगदलपुर–दुर्ग–जगदलपुर ट्रेन का नाम नहीं है। इससे बस्तर के लोगों की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लगा है।
विडंबना यह है कि रेलवे एक-एक साधारण यात्री ट्रेन के घाटे और मुनाफे का हिसाब तो लगाती है, लेकिन वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी महंगी ट्रेनों से हो रहे नुकसान की चिंता नहीं करती, जिनकी टिकटें आम यात्रियों की पहुंच से बाहर हैं। हजारों यात्रियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने वाली ट्रेन के घाटे को आधार बनाकर बंद कर दिया जाता है।
यह सही है कि रेलवे को नुकसान नहीं होना चाहिए, लेकिन कारोबारी, छात्र और नौकरीपेशा लोग ऐसी ट्रेनों से न सिर्फ यात्रा करते हैं, बल्कि समय और पैसे की बचत भी करते हैं। इस तरह वे देश की अर्थव्यवस्था में कुछ तो योगदान देते हैं। वैसे भी रेलवे आरक्षित टिकटों पर यह स्वीकार करती है कि यात्री सेवाओं के खर्च का बड़ा हिस्सा वह स्वयं वहन करती है।
इधर, बिलासपुर रेलवे जोन देश के सर्वाधिक राजस्व देने वाले जोनों में शामिल है। यहां से कोयला, बॉक्साइट और सीमेंट जैसे खनिजों की मिलियन्स टन ढुलाई रेलवे को निरंतर आय देती है। ऐसे में कम से कम इतनी उम्मीद तो की जा सकती है कि रेलवे बिना नफा-नुकसान की गिनती किए, छत्तीसगढ़ में यात्री सेवाओं का विस्तार करे।
रेल मंत्री वर्ष में दो-तीन बार वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में रेलवे अधोसंरचना पर पहले से कई गुना अधिक खर्च किया जा रहा है। यदि वास्तव में इतनी उदारता और निवेश है, तो फिर रेल सुविधाओं का विकास छत्तीसगढ़ के लोगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप क्यों नहीं हो रहा है?
एक नियुक्ति, चर्चा ही चर्चा

रिटायर्ड आईएएस अशोक अग्रवाल की राज्य निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के सचिव पद पर नियुक्ति क्या हुई, वो सोशल मीडिया पर ट्रोल हो गए। ‘छत्तीसगढ़’ ़ ने 22 दिसंबर को दैनिक कॉलम राजपथ-जनपथ में अशोक अग्रवाल की नियुक्ति, और पर्दे के पीछे की कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
नियामक आयोग के सचिव के पद पर डिप्टी कलेक्टर, अथवा सहायक प्राध्यापक स्तर के अफसर ही पदस्थ होते रहे हैं। अब इस पद पर सचिव स्तर के पद से रिटायर्ड अशोक अग्रवाल की नियुक्ति की गई है। अशोक अग्रवाल सूचना आयुक्त भी रह चुके हैं जो कि हाईकोर्ट जज के समकक्ष का पद है। बावजूद इसके अशोक अग्रवाल कई पायदान नीचे के पद पर काम करने के लिए तैयार हो गए।
पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी ने राजपथ-जनपथ को फेसबुक पर पोस्ट किया, उस पर काफी प्रतिक्रियाएं आई है। अशोक अग्रवाल को लेकर एक ने लिखा सरकारों को इनसे कितना विशिष्ट फायदा मिलता रहा होगा, यह जांच का विषय होना चाहिए। साथ ही सिविल सर्विसेस के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने योग्य उदाहरण भी है।
एक अन्य यूजर ने लिखा कि ये गलत तरीका है नौकरशाही में। आरटीआई एक्टिविस्ट संजय सिंह ठाकुर ने लिखा कि रायपुर कमिश्नर रहा व्यक्ति, रिटायरमेंट के बाद सूचना आयुक्त बना, फिर रोडक्रास में, और अब विवि नियामक आयोग में क्लास-टू पद पर...। सरकार और इसने दोनों ने ही लाज शर्म बेच खाई है। कुल मिलाकर अशोक अग्रवाल की नियुक्ति की काफी चर्चा हो रही है।
अब बारी एल्डरमैन की
चर्चा है कि सरकार के भीतर नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति के लिए सहमति नहीं बन पाई है। प्रदेश की कुल पौने दो सौ निकायों में साढ़े सात सौ से अधिक एल्डरमैन(मनोनीत पार्षद) की नियुक्ति होनी है।
सरकार से जुड़े कुछ का मानना है कि एल्डरमैन की नियुक्ति से सिर्फ फिजूलखर्ची होती है। ऐसे में नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। नियुक्ति के प्रावधान को ही खत्म करने का सुझाव दिया गया है। जबकि सांसद-विधायक, कार्यकर्ताओं को उपकृत करने के लिए एल्डरमैन नियुक्त करने के लिए दबाव बना रहे हैं। नगर निगमों में आठ, नगर पालिकाओं में पांच, और नगर पंचायतों में तीन एल्डरमैन नियुक्त किए जा सकते हैं। इस तरह 759 एल्डरमैन नियुक्त होना है। कहा जा रहा है कि प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद नए प्रभारी की नियुक्ति होनी है। नए प्रभारी के आने के बाद निगम-मंडलों, और एल्डरमैन की नियुक्ति पर फैसला हो सकता है। फिलहाल तो पद के आकांक्षी कार्यकर्ताओं को इंतजार करना होगा।
महादेव की जांच का क्या?
चर्चा है कि महादेव ऑनलाइन सट्टेबाजी प्रकरण पर जांच रोक दी गई है। पिछली सरकार में महादेव ऑनलाइन सट्टा प्रकरण में कई नामी लोगों के नाम आए थे। कई पुलिस अफसर जांच के घेरे में आए थे, और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों, और अन्य लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी।
ताजा जानकारी यह है कि महादेव सट्टेबाजी केस से जुड़े सारे अभियुक्त जमानत पर रिहा हो चुके हैं। पहले ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर कोई कानून नहीं था। अब केन्द्र सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग एक्ट लाया है, जो कि 1 अक्टूबर 2025 से प्रभावशील हो गया है। इस कानून के तहत, देश में ऑनलाइन मनी गेमिंग यानी रुपए लगाकर खेले जाने वाले सभी गेमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसमें ऑनलाइन जुआ, सट्टेबाजी शामिल है। पहले कोई एक्ट नहीं था, फिर भी जांच एजेंसियां कार्रवाई कर रही थी। ऐसे में कार्रवाई में आरोपियों को सजा दिलवाना कठिन था। लिहाजा, पुराने पेंडिंग केसों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।


