राजपथ - जनपथ
गुटबाजी का मतलब, कांग्रेस जिंदा है!
कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल, और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ था, लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं होने पर दोनों के बीच खाई बनी थी, वह अब तक नहीं भर पाई है। भूपेश, सरगुजा संभाग के दौरे पर हैं। वो अंबिकापुर पहुंचे, तो सिंहदेव समर्थक गायब रहे।
हालांकि सिंहदेव के विरोधी माने जाने वाले पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने पूर्व सीएम के स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखी। भूपेश, अमरजीत भगत के घर भी गए। मगर अंबिकापुर शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक, और अन्य पदाधिकारी पूर्व सीएम से मिलने नहीं पहुंचे। इस पर सिंहदेव समर्थकों ने सफाई दी कि पूर्व सीएम के आने की सूचना जिला कांग्रेस को नहीं दी गई थी।
बात यही खत्म नहीं हुई। सूरजपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष शशि सिंह का शपथ ग्रहण समारोह था। इसमें पूर्व सीएम तो मौजूद थे, लेकिन टीएस सिंहदेव नहीं आए। पीसीसी चीफ दीपक बैज रायगढ़ दौरे पर थे, लेकिन वो भी सूरजपुर नहीं गए। पूर्व सीएम के सम्मान में भगत के करीबी खाद्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष गुरूप्रीत सिंह ने अपने निवास पर भोजन भी रखा था। इसमें सिंहदेव समर्थकों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन सिंहदेव समर्थक नहीं आए। कुल मिलाकर भूपेश, और सिंहदेव के बीच रिश्तों में खटास आई थी, वो अब मैदानी कार्यकर्ताओं में भी दिखने लगी है।
शिक्षकों पर एक और डिजिटल बोझ?

स्कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए विद्या समीक्षा केंद्र (वीएसके) मोबाइल ऐप डाउनलोड करने का आदेश हाल ही में जारी किया है। इसके माध्यम से शिक्षकों की शालाओं में उपस्थिति दर्ज की जाएगी। शिक्षक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षकों पर दबाव डालकर उनके निजी मोबाइल फोन में शासकीय ऐप को इंस्टाल करने का निर्देश देना उनकी निजता पर चोट है और पेशे के प्रति निष्ठा पर अविश्वास जताने जैसा है। शिक्षकों का यह भी कहना है कि यदि उनकी हाजिरी ही दर्ज करनी है तो शालाओं में बायोमेट्रिक उपकरण लगा दिए जाएं। या फिर उन्हें सरकारी फोन या टेबलेट उपलब्ध कराया जाए। वैसे प्रदेश के शिक्षक पहले ही दर्जन भर से अधिक सरकारी ऐप्स और पोर्टलों पर काम कर रहे हैं। मिड-डे मील, निष्ठा, दीक्षा, यू-डायस, छात्रवृत्ति पोर्टल, इंस्पायर अवॉर्ड, जादुई पिटारा, अपार आईडी, दर्पण पोर्टल, स्कूल रेडिनेस, मासिक चर्चा पत्र, धान-चावल और प्रतिदिन लाभान्वित विद्यार्थियों की ऑनलाइन एंट्री जैसे कार्य पहले से उनके जिम्मे हैं और यह सब उनके निजी मोबाइल फोन के जरिये ही किया जाता है। इस बीच एक और ऐप अनिवार्य कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों मोबाइल कंपनियों को निर्देश दिया था कि संचार साथी ऐप को प्री-इंस्टाल करके ही मोबाइल सेट बेचें। यह भी कहा गया था कि इसे डिलीट नहीं किया जा सकेगा। पर, विपक्ष ने इसे बड़े मुद्दे के रूप में पेश किया। कहा, कि सरकार इसके जरिये नागरिकों पर निगरानी रखना चाहती है। सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा। संचार साथी को अनिवार्य करने के फैसले को वापस लेना पड़ा है। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग का वीएसके ऐप दरअसल, शिक्षकों की स्कूलों में उपस्थिति को दर्ज करने वाला है। दूरदराज और ग्रामीण इलाकों की शालाओं में अक्सर शिक्षकों के गैरहाजिर होने की शिकायतें जनप्रतिनिधि और छात्र करते आ रहे हैं। यह ऐप न केवल शिक्षकों की, बल्कि छात्रों की गतिविधियों को भी रियल टाइम दर्ज करेगा। स्कूल में कौन सी गतिविधियां चल रही हैं, इसका ब्यौरा भी विभाग को मिल जाएगा। छुट्टी के लिए आवेदन भी इसी ऐप के जरिये करना होगा। फायदे तो बहुत हैं, पर शिक्षकों की ओर से उठाया जा रहा निजता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आदेश को वापस लेने की संभावना कम ही दिखाई देती है क्योंकि यह नई शिक्षा नीति- 2020 के तहत किया गया प्रावधान है। अन्य राज्यों में भी ये ही अथवा इसी तरह के दूसरे ऐप इंस्टाल कराए जा रहे हैं।
जांच और प्रमोशन
पहली जनवरी को भारतीय पुलिस सेवा के वर्ष-08 बैच के डीआईजी स्तर के अफसर आईजी के लिए पात्र हो जाएंगे, इसके लिए डीपीसी की प्रक्रिया चल रही है। मगर इसी बैच के अफसर कमलोचन कश्यप बुधवार को आईजी के पद पर प्रमोट हुए बिना रिटायर हो गए।

कमलोचन कश्यप मूलत: बस्तर के रहने वाले हैं। वो दंतेवाड़ा, और बीजापुर एसपी रह चुके हैं। नक्सल इलाकों में बतौर डीआईजी के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। उम्मीद थी कि साल के अंतिम दिन डीपीसी हो जाएगी, और प्रमोशन लिस्ट जारी होगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया।
चर्चा है कि इस बैच के अफसरों के प्रमोशन में कई पेंच है। एक-दो अफसरों के खिलाफ जांच चल रही है। ईडी ने उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए चि_ी राज्य शासन को भेजी है। इन सब वजहों से संबंधित अफसरों को विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिल पाया है। उनकी पदोन्नति रुक सकती है। अब आगे क्या होता है यह तो डीपीसी होने के बाद ही पता चल पाएगा।
तीर्थ पर तुलना!
सरकार की तीर्थ यात्रा योजना को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। पिछले दिनों रायपुर जिले के साढ़े 8 सौ लोग अयोध्या, और बनारस की यात्रा में गए थे। यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए हर संभव प्रयास किए गए थे। सभी यात्रियों को पहचान के लिए परिचय पत्र, और कैप भी दिए गए थे।
ये यात्री अयोध्या पहुंचे, तो वहां अलग ही नजारा देखने को मिला। महाराष्ट्र से भी सैकड़ों की संख्या में तीर्थयात्री अयोध्या पहुंचे थे। महाराष्ट्र के तीर्थ यात्री केसरिया टोपी लगाए थे, तो छत्तीसगढ़ के तीर्थ यात्री सफेद टोपी लगाए हुए थे। अयोध्या में मिले दोनों ही राज्य के यात्री अपनी-अपनी सरकारों द्वारा की गई व्यवस्थाओं की पूछपरख कर रहे थे।
रायपुर से गए यात्रियों ने पूरे सफर के दौरान की गई व्यवस्थाओं से संतुष्टि जताई है। खासकर ट्रेन में मिले भोजन, नाश्ते की गुणवत्ता को बेहतर बताया। साथ ही रात्रिकालीन आवासीय व्यवस्था को भी घर जैसा ही माना। बस, इस यात्रा में बुजुर्ग कम पार्टी कार्यकर्ता और उनके सगे संबंधी अधिक रहे।


