राजपथ - जनपथ
शांति के दौर में असंतोष की आहट
बस्तर के तोकापाल ब्लॉक के डिलमिली काटाकांदा में ग्रामीणों ने ‘मावा नाटे मावा राज संघर्ष समिति’ का गठन किया है। इसमें जरिये उन्होंने छठवीं अनुसूची को प्रभावी तरीके से लागू करने के साथ पृथक बस्तर राज्य की मांग उठाई है। ठीक उसी तरह जैसे अलग गोंडवाना लैंड की मांग भी उठाई जाती है। अलग राज्य की मांग के पीछे की ध्वनि के पीछे आदिवासी अधिकारों और संसाधनों के वितरण में भेदभाव प्रतीत होता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान कर रखा है। कल नक्सली लीडर देवा के आत्मसमर्पण के बाद यह दावा भी किया जा रहा है कि बस्तर में नक्सलियों का नेतृत्व पूरी तरह खत्म हो चुका है। 1500 से अधिक नक्सलियों के आत्मसमर्पण और सुरक्षा बलों के ऑपरेशन के बाद माओवादी गतिविधियां बस्तर में अपने न्यूनतम स्तर पर है।
छत्तीसगढ़ राज्य की मांग 1920 के दशक में शुरू हुई थी, जिसमें बस्तर को जोड़ा गया, मगर इसकी अलग पहचान हमेशा से एक मुद्दा रही।
भौगोलिक कारणों से यह मांग मजबूत है। बस्तर घने जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक संसाधनों से भरा है, जो इसे छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों से अलग करता है। यह क्षेत्र लौह अयस्क, बॉक्साइट से समृद्ध है, लेकिन विकास की कमी और बाहरी शोषण ने असंतोष बढ़ाया है। सामाजिक रूप से, यहां 70 फीसदी से अधिक आबादी आदिवासी- गोंड, मारिया, हल्बा आदि है, जिनकी संस्कृति, भाषा और परंपराएं मुख्यधारा से भिन्न हैं। शोषण, भूमि अधिग्रहण और सांस्कृतिक ह्रास ने अलग राज्य की मांग को बल देता रहा है।
ताजा मांग छठवीं अनुसूची के अनुच्छेद 244(2) के तहत आदिवासी क्षेत्रों में जिला परिषद और स्वशासन की है। पृथक बस्तर राज्य की मांग पेसा कानून दिवस पर हुई बैठक से उठी। ग्रामीणों ने-हमारा बस्तर, हमारा राज का नारा बनाया है। यह मांग दर्शाती है कि नक्सलवाद के कमजोर पडऩे से शांति आई है, लेकिन मूल मुद्देभूमि अधिकार, संसाधन का वितरण, शोषण और सांस्कृतिक संरक्षण की मांग अभी भी जिंदा हैं। नक्सली जिस लक्ष्य के लिए हिंसा का सहारा लेने का दावा करते रहे हैं वह अहिंसक और लोकतांत्रिक रूप में सामने आ रहा है।
अभी आंदोलन व्यापक स्तर पर नहीं है, पर यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चुनौती है। छठवीं अनुसूची प्रभावी तरीके से लागू करने पर आदिवासी सशक्त होंगे, लेकिन राज्य विभाजन से प्रशासनिक और आर्थिक जटिलताएं बढ़ेंगी। विभाजन से छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, क्योंकि खनिज समृद्ध बस्तर छत्तीसगढ़ के राजस्व में बड़ी भूमिका निभाता है।
पुलिस कमिश्नरी पर खींचतान
आखिरकार राजधानी रायपुर में 23 तारीख को पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हो जाएगी। आईजी स्तर के अफसर की पुलिस कमिश्नर के पद पर पोस्टिंग होगी। पहले एक जनवरी से पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने की चर्चा थी, लेकिन तकनीकी अड़चनों से लागू नहीं किया जा सका। अब चर्चा है कि जिस तरह पुलिस कमिश्नरी को लागू किया जा रहा है, उससे विशेषकर आईपीएस लॉबी संतुष्ट नहीं है।
सरकार ने पुलिस कमिश्नर के अधिकार को लेकर डीजीपी से सुझाव मांगे थे। एडीजी प्रदीप गुप्ता की कमेटी ने महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओडिशा, और कर्नाटक के पुलिस कमिश्नरी सिस्टम का अध्ययन कर रिपोर्ट डीजीपी को सौंप दी थी, और फिर गृह विभाग को रिपोर्ट भेजी गई। रिपोर्ट में कमिश्नर के अधिकार को लेकर सिफारिशें की गई थी, और इसके लिए एक्ट में संशोधन का सुझाव भी दिया गया था।
पहले चर्चा थी कि अध्यादेश लाकर एक्ट में संशोधन किया जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ, कैबिनेट की बैठक में सिर्फ कमिश्नर प्रणाली लागू करने की तिथि को मंजूरी दी गई। चर्चा है कि आईपीएस बिरादरी चाहती है कि ओडिशा की तरह छत्तीसगढ़ के पुलिस कमिश्नर को अधिकार दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। हालांकि यह कहा जा रहा है कि जरूरत पडऩे पर संशोधन किए जाएंगे, और कमिश्नर का अधिकार दिए जाएंगे। देखना है कि 23 तारीख के बाद राजधानी की पुलिस व्यवस्था में क्या कुछ बदलाव होता है।
राजभवन की बढ़ती दखल
राजभवन के ताजा फरमान से सरकार में हडक़ंप मचा हुआ है। इसमें कहा गया है कि सरकारी विवि के कुलसचिव, प्रभारी कुलसचिव की नियुक्ति या पदस्थापना के लिए कुलाधिपति से अनुमोदन प्राप्त किया जाए।
यही नहीं, उच्च शिक्षा और कृषि सचिव को लिखे पत्र में यह भी कहा गया कि विवि के शिक्षक, अधिकारी-कर्मचारी के विरूद्ध जांच के बाद अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले कुलाधिपति का अनुमोदन लिया जाए।
राजभवन की चि_ी के चलते बहस भी हो रही है। ऐसी चि_ी क्यों निकाली गई है, इसको लेकर मंत्रालय में कई तरह की चर्चा है। बताते हैं कि बिलासपुर विवि के कार्यपरिषद ने कुलसचिवों की नियुक्ति या पदस्थापना से पहले कुलाधिपति का अनुमोदन लेने का सुझाव दिया था। इसके बाद सभी विवि के लिए चि_ी जारी कर दी गई। विवि के कुलसचिवों की नियुक्ति राज्य शासन करती आई है, लेकिन अब इसमें राजभवन की भी दखल रहेगी। देखना है आगे क्या कुछ होता है।


